अध्याय 43

इकतालीसवाँ उपदेश, जो छठवें अध्याय पर चौथा है - गलातियों 6:9-11

Sermons upon Galatians · John Calvin

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इकतालीसवाँ उपदेश, जो छठवें अध्याय पर चौथा है - गलातियों 6:9-11

इकतालीसवाँ उपदेश,

जो छठवें अध्याय पर चौथा है।

9 हम भले काम करने में थकें नहीं: क्योंकि ठीक समय पर हम बिना थके कटनी काटेंगे।

10 इसलिए जब तक हमारे पास समय है, हम सब मनुष्यों के साथ भलाई करें, परन्तु विशेष करके उनके साथ जो विश्वास के घराने के हैं।

11 देखो, मैंने अपने हाथ से तुम्हें कितना बड़ा पत्र लिखा है।

हम वह उपमा देख चुके हैं जिसके द्वारा सन्त पौलुस ने हमें उभारा कि जब तक परमेश्वर हमें इस संसार में समय देता है, हम भलाई करें। क्योंकि जब तक हम यहाँ हैं, हमें परमेश्वर की सब देनों को उसकी सेवा में, और उसके सब लोगों की सेवा में, वरन् सामान्य रूप से सब मनुष्यों की सेवा में लगाना चाहिए। क्योंकि परमेश्वर जैसे-जैसे हम में से किसी को कोई सामर्थ्य या वरदान देता है, वैसे-वैसे वह उसे उन लोगों से बाँध देता है जिन्हें उसकी आवश्यकता है और जिनकी सहायता वह कर सकता है। इसलिए हमें इस बात का पूरा निश्चय कर लेना चाहिए कि हम में से कोई भी निठल्ला या निकम्मा न रहे, परन्तु उन साधनों पर दृष्टि रखे जो परमेश्वर ने हमें दिए हैं, ताकि हम में से हर एक उन्हें मानो उसके लिए एक बलिदान के रूप में चढ़ाए।

और इसी कारण, हमें और अधिक साहस देने के लिए, सन्त पौलुस कहता है कि ऐसा करने में हम बोते हैं: और जब हम उन बातों में लगे रहने का यत्न करेंगे जिनकी वह आज्ञा देता है, तब परमेश्वर हमें निराश न होने देगा। हमारी राय यह है कि यदि हर कोई अपना ही लाभ न खोजे और पूरी रीति से अपने ही में न लगा रहे तो सब कुछ खो जाता है। परन्तु बात इसके ठीक उलटी है। क्योंकि चाहे जो अपने पड़ोसी की सहायता करता है वह उस वस्तु को खो दे जो वह उसे देता है, तौभी वह उसे अच्छी रखवाली में रखता है, जैसे वह जो अपना बीज भूमि में डालता है, अर्थात् इसलिए कि ठीक समय पर उसका फल काटे। इसके विपरीत सब के नाश होने का एक मार्ग है: अर्थात् यदि हम इस संसार के धन के लिए बहुत कंजूस हों, और अपने लाभ के सिवाय हमें किसी बात की चिन्ता या परवाह न हो: तो हम विनाश ही काटेंगे, अर्थात् सब कुछ नाश हो जाएगा, जैसा कि वास्तव में संसार और उसका रूप अवश्य ही मिट जाएगा और जाता रहेगा।

इस प्रकार तुम देखते हो कि वह सारा खज़ाना क्या है जो वे बटोर सकते हैं जो इस संसार में अपना हाथ जमाने का यत्न करते हैं। क्योंकि जैसे उनका जीवन क्षणभंगुर और नाशमान है, वैसे ही वे सब वस्तुएँ भी हैं जो उन्होंने जमा की होंगी, और सब नष्ट हो जाएगा। परन्तु यदि हम सांसारिक चिन्ताओं से अपने को मुक्त कर सकें, और परमेश्वर के राज्य की ओर ऊपर देखें, तो चाहे भलाई करने से हम घटे हुए और कंगाल दिखाई दें: तौभी हमारा खज़ाना नाश न होगा, वरन् अन्तिम दिन तक परमेश्वर के हाथ में भली-भाँति सुरक्षित रहेगा।

तौभी, क्योंकि शैतान हमें ठण्डा करने, या हमें पीछे लौटा देने के बहुत से अवसर हमारे सामने लाता है, सन्त पौलुस एक अत्यन्त आवश्यक प्रोत्साहन जोड़ता है, अर्थात् यह कि हम भले काम करने में थकें नहीं। और आगे वह यह जोड़ता है कि कटनी के उचित समय की बाट जोहने में हमें धीरज रखना चाहिए।

इसलिए जहाँ वह कहता है कि हमें थकना नहीं चाहिए, वह इस कारण है कि जिनमें भलाई करने की कुछ भी इच्छा या चाह है, वे शैतान के आक्रमणों से, और उन अनेक बाधाओं और रुकावटों से जो वह उनके मार्ग में डालेगा, पीछे खींचे जाएँगे। यदि कोई मनुष्य अपने मनबहलाव के लिए बाहर घूमने निकलता है, तो उसे चेताने की आवश्यकता नहीं कि वह थक न जाए। और क्यों? क्योंकि वह कोई अच्छी, चलती हुई सुन्दर पगडण्डी चुन लेता है, वह नपी-तुली चाल से चलता है, और आराम से जाता है: क्योंकि उसके लिए यह ठहरा नहीं कि दिन में इतने कोस चले, वरन् जैसे ही उसकी यात्रा उसके मन के अनुसार न रहे वह लौट आता है।

इसलिए यह चेतावनी उनके लिए है जिन्हें लम्बी यात्राएँ करनी हैं, और केवल एक-दो नहीं, वरन् निरन्तर यात्राएँ। सम्भव है उन्हें कठिन घाटियाँ मिलें, पथरीले और झाड़-झंखाड़ वाले मार्ग मिलें, या कीचड़ और दलदल वाले मार्ग मिलें, उन्हें पहाड़ियाँ और घाटियाँ मिलें। ऐसे लोगों को आगे बढ़ने के लिए उभारे जाने की आवश्यकता है, कि वे उत्साहित हों और हियाव बाँधें, ताकि वे अपनी यात्रा के बीच में न थकें और न हार मानें। ठीक ऐसा ही हमारे साथ होता है जब परमेश्वर अपने पवित्र आत्मा से हमें छूता है, ताकि हम उसकी सेवा करने और उन लोगों की भलाई करने को तैयार हों जो हमारे हाथ से सहायता चाहते हैं।

परन्तु एक ओर हम अविश्वास के कारण पीछे खींचे जाते हैं, क्योंकि हम डरते हैं कि पृथ्वी हमें घटी देगी: और यदि किसी की सहायता करनी हो, तो हम मन में सोचते हैं कि कहीं वैसी ही घटी और तंगी हम पर भी न आ पड़े। इस प्रकार तुम देखते हो कि हम पीछे खींचे जाते हैं, हम उस अति-चिन्ता में उलझ जाते हैं, और अपनी लालसाओं में अतृप्त रहते हैं, और समझते हैं कि हमारे पास कभी पर्याप्त न होगा।

इसी से हम बहाने खोजने के लिए भी परखे जाते हैं। क्योंकि [एक ओर] हम यह दलील देंगे कि हम नहीं जानते कि जो शिकायत करता है उसे सचमुच उतनी आवश्यकता है जितनी वह कहता है, या वह इतना दया के योग्य है भी या नहीं: और दूसरी ओर यह कि संसार इतना दुष्ट और अधर्मी है कि मनुष्य नहीं जान सकता कि किसकी भलाई करे, और प्रायः भलाई व्यर्थ चली जाती है, और ऐसी कृतघ्नता है कि उन शिकायत करनेवालों को भूख और प्यास सहने देना इससे अच्छा है कि उन्हें परमेश्वर को अप्रसन्न करने का अवसर दिया जाए, जो वे इस रीति से लोगों को छलकर और उनके परिश्रम पर उनकी हँसी उड़ाकर करते हैं।

भलाई करने से बच निकलने के लिए सदा बहुत बहाने और युक्तियाँ मिल जाएँगी, जैसा अनुभव बहुत ही दिखाता है, विशेषकर इस बात को देखते हुए कि हम स्वभाव से कितने आलसी और निर्बल हैं। इसलिए इतना ही अधिक हमारे लिए आवश्यक है कि हम इस शिक्षा को स्मरण रखें जो सन्त पौलुस यहाँ रखता है, अर्थात् बिना थके डटे रहना, हाँ सचमुच भलाई करने में।

यह विषय हमारे मनों के विस्तार से, और अपनी सम्पत्ति (यदि हमारे पास कुछ हो) को अपने अभावग्रस्त पड़ोसियों की सहायता में लगाने से सम्बन्ध रखता है। और हम जानते हैं कि सन्त पौलुस ने परमेश्वर के वचन के सेवकों से आरम्भ किया है। तौभी वह हम सब को सामान्य रूप से उभारता है, क्योंकि परमेश्वर ने हम सब को एक साथ बाँधा है, और हमें संसार में इस शर्त पर रखा है कि हम में से हर एक यह विचार करे कि वह किन बातों में उनकी सहायता कर सकता है जिन्हें उसकी आवश्यकता है।

आओ हम अपने जीवन को इसी में लगाएँ, ताकि हम प्रकृति की व्यवस्था को न बिगाड़ें। और फिर, क्योंकि हम इतने सुस्त और ठण्डे हैं, और हमें अपने कर्तव्य को पूरा करने की जो धुन है उसे रोकने और तोड़ने के बहुत से अवसर भी मिलेंगे। आओ हम सब बाधाओं को लाँघ जाएँ, और हियाव बाँधें कि हम हार न मानें।

और जितना ही अधिक संसार आजकल अधर्म, कृतघ्नता और द्वेष की चरम सीमा पर पहुँच गया है, उतना ही अधिक हमारे लिए आवश्यक है कि हम ऐसी परीक्षाओं को पैरों तले रौंदें, और जिनकी सहायता करनी है उनकी अयोग्यता को नहीं, वरन् परमेश्वर को ताकें। क्योंकि सारे संसार में चाहे कितना ही दुराचार हो: तौभी परमेश्वर अपने उद्देश्य में सदा अटल बना रहेगा: अर्थात् वह चाहता है कि हम में से हर एक अपनी सामर्थ्य पर और उस माप पर विचार करे जो उसे दिया गया है, और यह कि हम अपने ही लिए नहीं जन्मे हैं (क्योंकि परमेश्वर ने हमें इस उद्देश्य से नहीं रचा) परन्तु वह चाहता है कि हम में से हर एक अपने आप को आगे बढ़ाए और मानो अपने आप को विवश करे कि उनकी सहायता करे जो उससे सहायता चाहते हैं: और यदि वे माँगें भी नहीं, तौभी यदि हम उन्हें आवश्यकता में देखें, तो वह चाहता है कि हम उन साधनों से जो वह देता है उनकी सहायता करें।

अन्यजाति के लोग भी ऐसी बात कहना भली-भाँति जानते थे। इसलिए यदि हम यह न जानें कि परमेश्वर ने हमें किसलिए रचा है, और वह हम पर इतना उदार क्यों दिखाई देता है, तो यह हमारे लिए दुगुनी लज्जा की बात है। सच है कि वह संसार को ऐसी रीति से व्यवस्थित कर सकता था कि किसी को कोई घटी न होती, और हर एक दूसरे के बिना काम चला लेता। परन्तु वह हमारे सामने करुणा और दया का अवसर रखता है, कि प्रकट हो कि हम में कोई कोमल-हृदयता है या नहीं। अब हमें उस प्रतिज्ञा पर भी भली-भाँति ध्यान देना चाहिए जो सन्त पौलुस जोड़ता है: अर्थात् यह कि हम उचित समय पर काटेंगे या बटोरेंगे। यह सच है कि यदि कोई प्रतिफल न भी होता, परमेश्वर केवल यही कह देता कि वह ऐसा चाहता है, तब भी हम निर्दोष न ठहरते: क्योंकि यही काफी है कि उसने हमें संसार में रखा है, और अपनी उदारता से हमें खिलाया है, और इसकी कम से कम यह माँग है कि हम पूरी रीति से उसकी आज्ञा में रहें: तौभी, क्योंकि वह हमारी निर्बलता और सुस्ती को देखता है, वह यह और भी जोड़ता है कि हम और अच्छा हियाव बाँधें, यह कहकर कि हमारे सब कामों में से कोई भी व्यर्थ न जाएगा।

क्योंकि वह उन्हें मानो अपनी रखवाली में ले लेता है, और उन्हें हमें लौटा देगा, वरन् उस लाभ के साथ जो हम इस संसार में जितनी आशा या कामना कर सकते थे उससे भी अधिक होगा। जिसकी थैली में रुपया है, और जिसे कोई लाभ का सौदा सामने दिखाई देता है, वह उसे चारों ओर लगा देगा: क्योंकि वह मानकर चलता है कि उसमें उसकी कोई हानि न होगी, वरन् मूलधन लौट आने के अतिरिक्त उससे जो लाभ उठेगा उससे उसकी बहुत बढ़ती होगी। सच है कि जब कोई रुपया उधार देने या किसी व्यापार में लगाने को हो, तो वह दो-तीन बार देख लेगा कि वह सुरक्षित रहे: परन्तु अन्त में यदि वह किसी धनी मनुष्य को देखे जो चुकाने में समर्थ और अच्छी साख वाला है: तो वह तुरन्त निष्कर्ष निकालता है कि वह उस पर भली-भाँति भरोसा कर सकता है।

परन्तु यद्यपि परमेश्वर हमें जितना हो सके उतना निश्चय दिलाता है कि जो कुछ हम उसके हाथों में रखेंगे वह सुरक्षित हमारे पास लौट आएगा, और हमें उससे उन सब वस्तुओं की अपेक्षा जो हम संसार में कर सकते हैं अधिक लाभ होगा: तौभी हम में उसकी इतनी साख नहीं कि हम उसके वचन पर भरोसा करें: नहीं, हम उस ओर बहरे हैं। इसलिए सबसे पहले, ताकि हम तुच्छता और निष्ठुरता के कारण मार्ग से हटा न दिए जाएँ: हमारा प्रभु कहता है, इन छोटों में से जो सबसे छोटा, या जो सबसे तुच्छ समझा जाता है, उसके साथ तुम जो कुछ करते हो, उसे मैं ग्रहण करता हूँ और स्वीकार करता हूँ मानो वह मेरे साथ किया गया हो। संक्षेप में मैं उसे अपने ही हाथ से पाया हुआ मानता हूँ। देखो, परमेश्वर लाभ के विषय में मानो कैसे बोलता है।

वह एक प्रतिज्ञा भी जोड़ता है, कि कोई ब्याज या कमाई उस लाभ के बराबर नहीं जिसकी आशा उसके हाथ से की जा सकती है, यदि हम सांसारिक वस्तुओं की ओर से अपनी आँखें मूँद लें कि वे हमें रोक न रखें, और जो वस्तुएँ उसने हमारे हाथों में रखी हैं, और जो हमारे सुपुर्द की हैं, उन्हें वैसे ही लगाएँ जैसे वह अपने वचन से ठहराता है। परन्तु परमेश्वर इस रीति से एक-दो बार नहीं वरन् बहुत बार बोलता है, ऐसा कि यदि हम में भरोसे की एक बूँद भी होती, तो निश्चय हम इसका पूरा निश्चय कर लेते: तौभी हम अपने आप को मनाते हैं कि हम अब भी यहीं नीचे बँधे हैं, और न विश्वास कर सकते हैं और न अपने आप को मना सकते हैं कि परमेश्वर सचमुच गम्भीरता से बोलता है।

इसलिए सन्त पौलुस का यह प्रतिज्ञा रखना कि हम काटेंगे या बटोरेंगे, अकारण नहीं, मानो वह कह रहा हो, हे अभागे मनुष्यो, जब तुम्हें कोई लाभ दिखाया जाता है तो तुम काँटों पर खड़े हो जाते हो, और यद्यपि परिणाम अनिश्चित है, तौभी तुम्हारा लोभ तुम्हें उसकी ओर धकेलता है, और तुम में से हर एक अपना रुपया लगाने को तैयार है। देखो, परमेश्वर जो सच्चा है और झूठ नहीं बोल सकता, हमें बार-बार निश्चय दिलाता है, वरन् हमें प्रतिज्ञा देता है कि जो कुछ हम उसके हाथ में रखेंगे वह हमें अनमोल लाभ देगा: और तौभी हम उसकी सब प्रतिज्ञाओं के होते हुए भी अपने मन में उस पर विश्वास नहीं कर पाते। क्या हम उसके साथ इससे बड़ा अन्याय कर सकते हैं? वह अपनी ओर से हमारा कुछ भी देनदार नहीं: जो कुछ वह हमसे प्रतिज्ञा करता है, वह उसकी अपनी भली इच्छा से है, बिना किसी रीति से हमारे प्रति बाध्य हुए, और तौभी कोई भी बात हमें उसकी सेवा करने को प्रेरित नहीं कर सकती।

इसलिए सन्त पौलुस जो हमें बताता है उस पर भली-भाँति ध्यान दो, ताकि हम में से हर एक लोभ की इस शापित जड़ को सुधारने का यत्न करे, जो हमारे मनों में इतनी गहरी बैठी है कि जब हमें वहाँ चलना चाहिए जहाँ परमेश्वर बुलाता है, तब हमें अपने आप पर ज़ोर लगाना पड़ता है, और विशेषकर तब जब हमें उन वस्तुओं के बाँटने में जो उसने हमें सौंपी हैं विश्वासयोग्य भण्डारी बनना चाहिए। तौभी आओ हम उन शब्दों पर ध्यान दें जो वह जोड़ता है, वह कहता है, "ठीक समय पर।" और यह हमें धीरज में पक्का और दृढ़ करने के काम आता है। क्योंकि हम चाहते हैं कि परमेश्वर हमें आज या कल, वरन् तुरन्त दिखा दे कि वह लाभ क्या है जिसकी वह बात करता है।

किसान जब अपना बीज भूमि में डाल चुकता है तब चुपचाप रहता है। फिर वह पाला और हिम, आँधी और वर्षा, गर्मी और सर्दी देखता है; और तौभी वह कटनी के आने की बाट जोहता ही रहता है। जो व्यापार का काम करते हैं, वे अपना रुपया, वरन् अपने प्राण भी बड़े जोखिम में डालते हैं: और इस बीच उनकी चाँदी चलती-फिरती और इधर-उधर होती रहती है: तौभी, क्योंकि वे क्रय-विक्रय के अभ्यस्त हैं, वे भली-भाँति जानते हैं कि उन्हें पहले ही दिन कोई लाभ न मिलेगा, वरन् समय आने तक उन्हें बाट जोहनी ही पड़ेगी। परन्तु जब हमारा परमेश्वर से सामना होता है तब तुरन्त लाभ की आशा या ताक रहती है, और तौभी हमें उसके विषय में हर सन्देह से मुक्त समझना चाहिए, यहाँ तक कि यदि हम स्वर्ग के राज्य की अनन्तता की ओर ऊपर देखें तो समय हमें बहुत लम्बा न लगना चाहिए।

और इस सब पर भी कोई धीरजवन्त नहीं। जब तक हम अपनी सम्पत्ति को जोखिम और दाँव पर लगाते हैं तब तक हम बहुत शान्त रहते हैं। और क्या यह बड़ी दयनीय बात नहीं कि जब परमेश्वर हमसे कहता है कि जो वस्तुएँ [उसकी सेवा में] खर्च होनी हैं उनका वह विश्वासयोग्य रखवाला होगा, तो हम शोक और बेचैनी में पड़ जाते हैं, और अपने आप को समझाते हैं कि सब कुछ खो गया, यदि हम वह बात तुरन्त पूरी होती न देखें? तो तुम देखते हो कि इस वचन पर जो बात हमें ध्यान में रखनी है वह यह है कि हम उचित समय आने तक अपने आप पर लगाम रखें। क्योंकि निश्चित दिन ठहराना हमारा काम नहीं: वह परमेश्वर के हाथ में रहना चाहिए।

इसलिए आओ हम सन्तुष्ट रहें कि वह हमारे धीरज की परीक्षा लेता है, और समय उससे अधिक लम्बा न होगा जितना हमारे लाभ के लिए है। फिर, सन्त पौलुस का यह भी अभिप्राय था कि हमें संसार से खींचे, क्योंकि हम सांसारिक लाभ की लालसा करते हैं। निःसन्देह हम इस बात से बहुत प्रसन्न होंगे कि परमेश्वर हमें वह दे: परन्तु उसी में हम अपने आप को पूरी तरह सांसारिक प्रकट करते हैं। क्योंकि यदि कोई मनुष्य कुछ दान के काम करे, चाहे उसका उद्देश्य परमेश्वर की सेवा करना ही हो: तौभी वह मन में चाहेगा कि तुरन्त हर पैसे के बदले उसे शिलिंग, वरन् एक क्राउन मिले, और थोड़े-से दान के काम करने के बहाने वह चारों ओर से अपने लिए बटोरना चाहेगा।

क्योंकि हम परमेश्वर के साथ ऐसा मोल-भाव करना चाहते हैं: इसलिए सन्त पौलुस ऐसे दोष को सुधारने के लिए कहता है कि हमें देखना चाहिए कि परमेश्वर हमें कहाँ बुलाता है, अर्थात् उस महान दिन की ओर जब हर एक को अपनी मज़दूरी मिलेगी। इसलिए यद्यपि इस संसार और इस वर्तमान जीवन के विचार से सब कुछ खोया हुआ दिखाई दे, तौभी आओ हम परमेश्वर पर भरोसा रखना न छोड़ें, जो हमारी धरोहर और गिरवी की विश्वासयोग्य रखवाली करनेवाला है, और हमारे लिए उससे कहीं अधिक करेगा जितनी हम आशा कर सकते हैं, यदि हम अपनी ओर से धीरज रखें। इस पर वह यह निष्कर्ष निकालता है कि जब तक हमारे पास समय और अवसर है, हमें सब मनुष्यों के साथ, और विशेष करके विश्वास के घराने के साथ भलाई करनी चाहिए।

अब, यह कहकर कि जब तक अवसर है हमें भलाई करने का परिश्रम करना चाहिए: वह हमारे सामने हमारे जीवन की क्षणभंगुरता रखता है। और हम देखते हैं कि इस विषय में हम में अब भी एक घृणित रोग है: क्योंकि हमें हर दिन वर्ष के समान लगता है। क्या इसका कभी अन्त न होगा, हम कहते हैं? क्या हमें इसी दशा में बने रहना होगा? क्या हम हमेशा नए सिरे से आरम्भ करते रहेंगे? देखो, हम में से हर एक को भलाई करने में बिताया हुआ समय कितना अधिक लम्बा जान पड़ता है। और इस पर, "अरे," हम कहते हैं, "मैं बहुत जल्दी पहुँच जाऊँगा: क्योंकि यदि मैं आज अपने आप को खर्च कर दूँ, और कल कोई मुझसे माँगने आए, तो मेरे पास देने को कुछ न होगा, इसलिए मेरे लिए अपने आप को बचाए रखना ही अच्छा है।" अब ऐसी टालमटोल से मनुष्य को भलाई करने का समय कभी न मिलेगा। क्योंकि हर कोई अपने साथी को अपने से आगे रखना चाहेगा, इस उद्देश्य से नहीं कि उसके पीछे भलाई करने में चले, परन्तु इसलिए कि स्वयं ज्यों का त्यों ठहरा रहे।

परन्तु इसके विपरीत सन्त पौलुस हमें बताता है कि यदि हम बात पर सोच-समझकर विचार करें जैसी वह वास्तव में है, तो हम पाएँगे कि हमारे जीवन भर के सारे समय में हमारे पास बहुत अवकाश नहीं है। क्योंकि चाहे हम कभी न रुकें, वरन् हर एक यथासम्भव अपने पड़ोसियों की सेवा में अपने आप को खर्च करने पर ज़ोर लगाए: तौभी वह कभी रत्ती भर भी अधिक न होगा। हम देखते हैं कि जब तक हम इस संसार में हैं, हम पर सदा भार रहता है। हम देखते हैं कि जब हम बालक होते हैं तब हमें खिलाया-पहनाया जाना पड़ता है, उस समय हम एक आलपिन के बराबर भी नहीं कमा सकते, और दूसरों को हमारे लिए परिश्रम करना पड़ता है।

अच्छा: क्या हम समझ की अवस्था को पहुँच गए? तौभी हमें प्रायः सहायता और सहारे की आवश्यकता रहती है, मेरा अभिप्राय हम में के सबसे धनी लोगों से भी है। क्योंकि कोई बीमारी, या कोई और विपत्ति आएगी, जो उन्हें गिरा देगी जो अपने आप को सबसे हृष्ट-पुष्ट और बलवन्त समझते हैं।

फिर, हमें इतनी बातों की आवश्यकता होगी और हम अपने ही लिए इतने बोझ से दबे होंगे, कि जो कर्तव्य परमेश्वर की ठहराई हुई रीति से हमें उन लोगों के प्रति निभाना चाहिए जिनके हम देनदार हैं, उसका सौवाँ भाग भी हम मुश्किल से दे सकेंगे। वे (मैं कहता हूँ) जो धनी हैं और जिनके पास सम्पत्ति का भण्डार है, वे भी, भली इच्छा रखते हुए भी, (जो कुछ कर सकें करें, और चाहे वे बिना रुके कितना ही परिश्रम करें) उन लोगों के प्रति जिनके वे बाध्य हैं अपने कर्तव्य का सौवाँ भाग भी मुश्किल से या कभी नहीं निभा पाएँगे।

इसलिए जब सब बातों पर भली-भाँति विचार किया जाए, तो हम पाएँगे कि हमारे पास अपने पड़ोसियों की भलाई करने का बहुत अवकाश नहीं है। क्योंकि जब हम बुढ़ापे को पहुँचते हैं, तब वह दूसरे बचपन में लौट जाना है, ऐसा कि हम छोटे शिशुओं से अधिक किसी काम के नहीं रहते, इतना अन्तर छोड़कर कि हम अधिक बोझ हैं, क्योंकि हम हठीले और कठिनाई से सन्तुष्ट होनेवाले होते हैं: सब किसी को हमारी सेवा करने में लगना पड़ता है, और जब सब कुछ हो चुकता है, तब भी हम बिलकुल निकम्मे हैं।

इससे हम देखते हैं कि हमारे पास भलाई करने का बहुत अवकाश नहीं है: और इसलिए जब तक परमेश्वर हमें उचित समय देता है, हमें और भी अधिक ज़ोर लगाना चाहिए। जब किसान को अच्छा मौसम दिखाई देता है, तो वह कहता है, "लगे रहो, भाइयो, लगे रहो, हम नहीं जानते कि वर्षा होगी या नहीं: हमें अपनी दाख की बारियाँ खोदनी हैं, अपनी भूमि जोतनी है, अपना बीज बोना है, जब तक मौसम साथ दे हमें कोई न कोई काम करना है, क्योंकि हम नहीं जानते कि यह कब तक रहेगा।" वैसा ही व्यापारी करता है जब उसे यात्रा करनी होती है, और वैसा ही सब और मनुष्य भी करते हैं।

और अब वह परिश्रम या मेहनत सामने आती है जिसके लिए परमेश्वर हमें बुलाता है। विषय बोने का है, वरन् आत्मा के लिए, और अविनाशी जीवन के लिए बोने का: और तौभी इस सब पर हम कहते हैं कि हम जल्दबाज़ी करनेवाले नहीं हैं: हम इसे एक वर्ष और टाल सकते हैं, वरन् दो या तीन वर्ष और, अर्थात् अब से सदा के लिए: ऐसी है हमारी लापरवाही और ठण्डापन।

इसलिए आओ हम इस चेतावनी को जो पवित्र आत्मा के द्वारा हमें यहाँ दी गई है व्यवहार में लाना सीखें: अर्थात् जब तक हमारे पास अवकाश है भलाई करें, क्योंकि वह हमेशा न रहेगा। और यह एक विशेष अनुग्रह है जो परमेश्वर हमें देता है जब वह हमारे हाथों में अपने पड़ोसियों की सहायता करने का साधन देता है। और ऐसा करके वह हमें पहले से कुछ चिह्न देता है कि वह हमें अपनी सन्तान मानता है, और यदि हम अपने मन में उसके दान उन्हें बाँटने को तैयार हों जिन्हें उनकी आवश्यकता है, तो यह उसके स्वरूप का चिह्न है जो वह हम में डालता है।

अब यदि हम उन लोगों की आवश्यकता पूरी करने को तैयार हों जो हमारी सहायता चाहते हैं, जब हमारे पास साधन और अवसर हो: तो निश्चय परमेश्वर इसमें हमारा बड़ा आदर करता है। और हम नहीं जानते कि वह अवकाश हमारे साथ सदा रहेगा या नहीं: क्योंकि हम देखते हैं कि वह इन जलकौओं से, और ऐसे लोगों से जो समुद्री पक्षियों के समान हैं, अपनी सम्पत्ति कैसे छीन लेता है: हम देखते हैं कि वह उन्हें कैसी दयनीय रीति से नंगा कर देता है, ऐसा कि वे आप ही सहायता ढूँढ़ने पर विवश होते हैं, और उनकी कोई परवाह नहीं करता, क्योंकि वे ऐसे क्रूरता से भरे थे कि उन्होंने उन पर कोई तरस न खाया जो उनसे सहायता माँगते थे।

जब ऐसा ही है तो: आओ हम ध्यान दें कि हमारा जीवन छोटा ही है, और शीघ्र बीत जाता है, और भलाई करने के अवसर तुरन्त हाथ से निकल जाते हैं। और इसलिए आओ हम उतना ही लगे रहें जितना हमारा प्रभु हमें अवकाश देता है, वरन् सब मनुष्यों के प्रति (सन्त पौलुस कहता है) परन्तु विशेष करके विश्वास के घराने के प्रति।

अब जब वह कहता है कि सब मनुष्यों के प्रति, तो यह हमें दिखाने के लिए है कि चाहे मनुष्य हमें उनकी भलाई करने से हतोत्साहित करें, तौभी हमें वैसे ही करते रहना है जैसी परमेश्वर आज्ञा देता है। क्योंकि (जैसा मैं पहले छू चुका हूँ) हमें यह न देखना चाहिए कि हर कोई कैसा है, या वह क्या पाने के योग्य है: परन्तु हमें और ऊपर चढ़कर विचार करना चाहिए कि परमेश्वर ने हमें इस संसार में इसलिए रखा है कि हम एक हों और एक साथ बँधे रहें: और यह कि उसने अपना स्वरूप हम में अंकित किया है, और हम सब की एक ही सामान्य प्रकृति है: यही बात हमें एक दूसरे की सहायता करने को प्रेरित करे।

क्योंकि जो अपने पड़ोसियों की सहायता करने से अपने आप को छुड़ाना चाहता है, उसे अपने लिए नया रूप धारण करना होगा, और दिखाना होगा कि वह अब मनुष्य नहीं रहना चाहता: क्योंकि जब तक हम मनुष्य-जाति के हैं, हम निर्धन और तुच्छ जन में मानो दर्पण में अपना ही मुख देखे बिना नहीं रह सकते, जो अब और टिक नहीं सकता, वरन् अपने बोझ के नीचे कराहता पड़ा है, चाहे वह संसार का सबसे दूर का परदेशी ही क्यों न हो। कोई हब्शी या विदेशी हमारे बीच आए, तौभी, जब तक वह मनुष्य है, वह अपने साथ एक दर्पण लाता है, जिसमें हम देख सकते हैं कि वह हमारा भाई और पड़ोसी है।

क्योंकि हम प्रकृति की उस व्यवस्था को मिटा नहीं सकते जिसे परमेश्वर ने अटूट ठहराया है। इसलिए हम बिना भेद के सब मनुष्यों के प्रति बाध्य हैं, क्योंकि हम सब एक ही मांस हैं, जैसा यशायाह भविष्यद्वक्ता घोषणा करता है, यह कहकर: "तू अपने ही मांस से मुँह न छिपाना।" मानो वह कहे, जो कंजूस और तंगदिल हैं, और जब भलाई करनी चाहिए तब सिकुड़ जाते हैं, वे न केवल परमेश्वर को तुच्छ जानते और उसके वचन को ठुकराते हैं: परन्तु भयानक राक्षस भी हैं, क्योंकि वे नहीं सोचते कि सब मनुष्यों में एक सहभागिता होनी चाहिए।

इस प्रकार तुम देखते हो कि सन्त पौलुस स्पष्ट क्यों कहता है कि हमें सब मनुष्यों की भलाई करने का यत्न करना चाहिए, वरन् उनकी भी जो अयोग्य हैं, चाहे वे हमारे प्राणघातक शत्रु ही क्यों न हों। सच है कि यह कठिन है, और हमारी प्रवृत्ति के विरुद्ध है: परन्तु इसी में परमेश्वर हमारी और भी अच्छी परीक्षा लेता है।

क्योंकि यदि हम उनकी भलाई करें जो उसके योग्य हैं, या जो उसका बदला चुका सकते हैं: तो यह इसकी घोषणा या प्रमाण नहीं कि हम परमेश्वर की सेवा करने को तैयार हैं: क्योंकि हो सकता है कि हमने अपने ही लाभ का ध्यान रखा हो। और जैसा हमारा प्रभु यीशु मसीह हमें बताता है, अन्यजाति के लोग और संसार के सबसे बुरे लोग भी उतना तो करते ही हैं। कैसे? वे अपने मन में सोचते हैं, मुझे सहायता चाहिए, मुझे कोई मित्र बनाना चाहिए। तो यदि हम उन्हें छाँट लें जो भलाई पाने के योग्य हैं, और जो बराबर का बदला चुका सकते हैं: तो यह इस बात का सच्चा प्रमाण या निश्चित परख नहीं कि हम वैसे अपने आप को लगाने को तैयार हैं जैसी परमेश्वर आज्ञा देता है। परन्तु जब हम मनुष्यों की कृतघ्नता की ओर से आँखें मूँद लें, और केवल उनकी दरिद्रता और दुर्दशा को देखकर दया करने को प्रवृत्त हों: तब निश्चय हम परमेश्वर की सेवा करते हैं।

और यदि हम एक बार उस स्थिति में पहुँच जाएँ, तो निश्चय (जैसा मैंने तुम्हें पहले कहा) हम सब मनुष्यों की भलाई करने का यत्न करेंगे, ऐसा कि हमारा मन उस अटूट बन्धन को तोड़ने को न मानेगा जिससे परमेश्वर ने हमें बाँधा और मिलाया है। इसलिए संसार के सबसे दूर के परदेशी भी हमारे बहुत निकट के पड़ोसी हैं, चाहे वे न हमारे माता-पिता हों, न हमारे सम्बन्धी, न हमारे परिचित। और क्यों? क्योंकि हम सब एक ही मांस के हैं, और हम सब एक ही चिह्न धारण करते हैं, जो हमें इस बात का कायल करे कि हम एक दूसरे के लिए जो कुछ बन पड़े करें।

परन्तु बात चाहे जैसी हो, सन्त पौलुस हमें मुख्य रूप से विश्वास के घराने के लोगों की सिफारिश करता है। और वह "घराने के लोग" शब्द का प्रयोग इसलिए करता है कि उस उपमा से हमें और गहराई तक छुए। क्योंकि चाहे प्रकृति हमें सिखाती है कि हमें अभावग्रस्त लोगों की सहायता करनी चाहिए: तौभी जो एक ही घराने के हैं वे एक दूसरे की भलाई करने को अधिक प्रवृत्त और तैयार रहते हैं।

तुम यहाँ देखते हो कि मनुष्यों में कैसे-कैसे स्तर हैं, कैसे सब जानते हैं कि कोई परस्पर बन्धन है, ऐसा कि यदि वे संसार के सबसे दूर के परदेशियों को भी त्याग दें तो उसमें वे अपने आप को भूलते हैं: तौभी, क्योंकि मनुष्य के लिए अपने आप को इतनी दूर और इतने विस्तार तक पहुँचाना कठिन है: इसलिए मनुष्य अनजान लोगों की भलाई करने को उतने प्रवृत्त नहीं होते, जब तक अत्यन्त आवश्यकता न हो। क्योंकि तब हम चाहे कितने ही कठोर हृदय के हों, हम में से हर एक किसी मनुष्य को सिर पर आए संकट में देखकर उसकी सहायता के लिए हाथ बढ़ाने को प्रेरित होता है।

हाँ, और यह दयालुता हम में इतनी रची-बसी है कि वह मूक पशुओं तक भी फैल जाती है: और इसलिए यह और भी उचित है कि वह उन तक फैले जो हमारे समान परमेश्वर के स्वरूप में रचे गए हैं। परन्तु जैसा मैंने कहा, यदि कोई मनुष्य अत्यन्त आवश्यकता में हो, तब हम अभाव में सहायता करने को और भी तत्पर होते हैं। और जब हम एक ही देश और भाषा के हों, तब हम अपने आप को एक दूसरे के कुछ और निकट देखते हैं, और इससे वह स्नेह बढ़ता है जो अन्यथा सामान्य रूप से ठण्डा ही रहता।

परन्तु जब पड़ोस की कोई मित्रता और घनिष्ठता हो जाती है, तब वह और भी अधिक है: जैसा हम देखते हैं कि जो एक ही देश के हैं वे कहेंगे, "जब परमेश्वर हमें इतने निकट ले आया है, तो हम कम से कम एक दूसरे के काम आने का यत्न करें।" फिर, हम देखते हैं कि जो पड़ोसी एक ही गली में रहते हैं और घनिष्ठता से आपस में मेल-जोल रखते हैं, वे सम्बन्धियों और निकट कुटुम्बियों के समान हैं। अब तो यह और भी अधिक उचित है कि जो सब एक ही घर के हैं, और मानो एक छोटे समुदाय या देह में इकट्ठे किए गए हैं, उन्हें परमेश्वर की ओर से मानो दृढ़ता से जोड़ा हुआ समझा जाए: और यह कि वह उन्हें इस प्रकार गले लगाए जैसे पिता अपने सब बच्चों को अपने चारों ओर रखता है।

इसलिए जब हमें इस बात से और भी अधिक प्रेरित होना चाहिए कि हम और अच्छे साहस के साथ अपने आप को लगाएँ, क्योंकि परमेश्वर ने हमें इस प्रकार एक साथ बाँधा है, और हमें एक दूसरे के इतने घनिष्ठ निकट ला दिया है: सन्त पौलुस कहता है कि सब विश्वासी, और वे सब जो उसी सुसमाचार को मानते हैं जिसे हम मानते हैं, एक ही घर के घराने के लोग हैं। और वास्तव में कलीसिया परमेश्वर का घर कहलाती है, और वह हमारे बीच में विराजमान है। जब पवित्रशास्त्र ऐसा बोलता है, तो उसका अभिप्राय यह नहीं कि हमारा एक साथ मिलना ऐसी भौतिक कलीसिया या मन्दिर में होना चाहिए जैसा यह है: परन्तु यह कि चाहे हर एक अपने घर में रहता हो, तौभी परमेश्वर ने हमें इस रीति से अपने पास इकट्ठा किया है कि हम मानो एक दूसरे के घर के साथी हैं, और हम केवल एक राज्य या राजदण्ड के अधीन देशवासी ही नहीं हैं, परन्तु एक और निकट का सम्बन्ध है, जो हमें और अधिक पास-पास बाँधे रखना चाहिए।

संक्षेप में, जब यह कहा जाता है कि जो परमेश्वर की सन्तान होना चाहते हैं उन्हें सब एक ही घर में रहना चाहिए: तो यह दिखाने के लिए है कि हमारे बीच मानो एक सामान्य भाईचारा है। और चाहे सांसारिक भाई एक दूसरे से अलग हो जाते हैं, और हर एक अपनी अलग राह पकड़ लेता है: तौभी हमें उस एकता में सदा बने रहना चाहिए जो परमेश्वर ने हमारे बीच ठहराई है। यह सुनकर, क्या हम पशुओं से भी बुरे, और मूक और जंगली पशुओं से भी अधिक क्रूर न ठहरेंगे, यदि हम परमेश्वर के दानों को अपने पड़ोसियों, मेरा अभिप्राय विश्वासियों, की सहायता में लगाने को प्रेरित न हों?

अब तो हम देखते हैं कि सन्त पौलुस का आशय सार रूप में यह है, कि जब परमेश्वर ने हमें सब मनुष्यों की भलाई करने को बाँधा है, क्योंकि वे हमारे ही मांस हैं: तो कोई द्वेष हम में से किसी को इससे न रोके कि जिन सब को परमेश्वर उसके सामने लाता है, और जिनमें वह हमारी कोमलता की परीक्षा लेना चाहता है, उनके प्रति वह सामान्य रूप से अपना कर्तव्य निभाने का यत्न करे। और फिर भी, क्योंकि उसने हमें अपने झुण्ड में इकट्ठा किया है, और अपने नाम में हमें एक साथ बाँधा है, और हम एक ही मुँह से उसे पिता कहकर पुकारते हैं: इसलिए हमारा कर्तव्य है कि हम एक दूसरे के भाइयों के समान हों।

इसलिए यदि हम चाहते हैं कि वह हमें अपनी सन्तान गिने, तो हमें उस गोद लिए जाने को ऐसा बढ़ाना चाहिए जिससे उसने हमें चुना है, कि हम अपने कामों से निष्कपट रीति से प्रकट कर सकें कि हम उन्हें अपना भाई समझते हैं जिन्हें परमेश्वर ने अपने घर और कलीसिया में इस प्रकार इकट्ठा किया है। इस प्रकार तुम देखते हो कि इस पाठ पर हमें क्या स्मरण रखना है। इसलिए आओ हम आगे से ये मूर्खतापूर्ण बहाने न बनाएँ, कि "मैं नहीं जानता वह कौन है, मैं उसे नहीं जानता।" परन्तु क्या परमेश्वर उसे नहीं जानता? हाँ जानता है: और तौभी तू अपनी आँखें खोलकर उसे देखने से घृणा करता है जो तेरा ही प्रतिरूप है, वरन् जिसे परमेश्वर अपनी सन्तानों में से एक गिनता है।

तू उसे नहीं जानता, और फिर भी देख कि परमेश्वर हम पर, जो अत्यन्त दीन हैं, कैसे कृपा करके दृष्टि डालता है, वरन् वह जिसकी महिमा इतनी ऊँची और भयानक है कि स्वर्ग के स्वर्गदूत भी पूरी दीनता से उसके सामने थरथराते हैं। तो तुम देखते हो कि परमेश्वर हमारा सर्वोच्च प्रभु हम पर जो धरती के कीड़े और मैल मात्र हैं नीचे दृष्टि करता है: वरन् वह न केवल यह कहने की कृपा करता है, "मैं तुम्हें जानता हूँ:" परन्तु घोषणा भी करता है, "मैंने तुम्हें अपनी सन्तान के रूप में गोद लिया है, तुम मेरी रचना हो, तुम मेरे उत्तराधिकारी हो, तुम किसी रीति से मेरे अंग हो।"

परमेश्वर इस रीति से बोलने की कृपा करता है: और हम इतने घमण्ड और अकड़ से भरे हैं कि उन्हें तुच्छ जानते हैं जो हमारे ही समान भले हैं, और प्रायः हमसे कहीं अच्छे हैं। तो ऐसे घमण्ड को कौन सह सकता है? संक्षेप में, जो अपने भाइयों से अलग होने में इतने पराए बन जाते हैं, और किसी रीति से उनके साथ सहभागी होना नहीं चाहते, वे इस योग्य हैं कि जीवन की पुस्तक में से मिटा दिए जाएँ, ऐसा कि परमेश्वर उन्हें पूरी रीति से मिटा और खुरच डाले, और उन्हें शैतान के अधिकार में सौंप दे जो उनका पिता है, क्योंकि वह आरम्भ से हत्यारा था और क्रूरता से भरा था।

इस प्रकार तुम सार रूप में देखते हो कि हमें क्या स्मरण रखना है, और हमें इस शिक्षा को कैसे व्यवहार में लाना चाहिए, जिसमें विश्वास के घराने के लोगों की विशेष रूप से सिफारिश हमारे सामने की गई है। और इसलिए, जब परमेश्वर ने हमें अपने पास बुलाने की कृपा की है, तो आओ हम दिखाएँ कि हम उस अनुग्रह और सम्मान को संसार की सब सम्पत्ति से अधिक मानते हैं। और इसके प्रमाण में आओ हम यह भी दिखाएँ कि हम में भाईचारे का स्नेह है कि जिन्हें हमारी आवश्यकता है उनकी भलाई करें, जैसा अवसर परमेश्वर देगा, और जैसी हमारी सामर्थ्य का माप है।

अब इसी पर सन्त पौलुस कहता है कि गलातियों को विचार करना चाहिए कि उसने उन्हें अपने हाथ से एक बड़ा पत्र लिखा है। और यह उन्हें और अधिक ध्यान लगाने के काम आता है, जब वे देखते हैं कि उसे उनके उद्धार की कितनी चिन्ता है। क्योंकि उसका अपने पत्र की लम्बाई की चर्चा करना इसलिए नहीं था कि उसे इसके लिए (जैसा कहते हैं) तौलकर मोल मिले, परन्तु इसलिए कि गलातियों को मालूम हो कि वह अपना हृदय उनके सामने खोलना चाहता था, और यह कि क्योंकि उसने उन्हें मार्ग से हटकर एक गलत चाल में पड़ा देखा, और नहीं चाहता था कि वे नाश हों, इसलिए उसने उन्हें केवल एक-दो शब्दों में ही चेतावनी नहीं दी, वरन् अपनी शिक्षा को पक्का भी किया, ताकि वे जान लें कि वे पहले भटकाए गए थे।

देखो, सार रूप में सन्त पौलुस का लक्ष्य यह था। और इस पाठ से हम सब को चेतावनी पानी चाहिए कि हम उन साधनों और सहायताओं के अनुसार जो हमारा प्रभु हमें अपने पास आने के लिए देता है अपने आप को और भी दृढ़ करें। यदि परमेश्वर हमारी ओर एक ही शब्द में अपना मन झुकाता, तौभी यदि हम उस पर विश्वास न कर पाते और उस आज्ञाकारिता के साथ जो हमें शोभा देती है अपने आप को उसके अधीन न करते, तो हमारे लिए कोई बहाना न होता। परन्तु जब हम देखते हैं कि व्यवस्था देने के अतिरिक्त उसने उसकी व्याख्या भी जोड़ी, और इसके अतिरिक्त अपने भविष्यद्वक्ताओं को भेजा कि शिक्षा सदा और अधिक अधिकार वाली हो, और वे बातें स्पष्ट हो जाएँ जो अन्यथा अन्धकारमय रहतीं: और अपने भविष्यद्वक्ताओं के बाद अपने एकलौते पुत्र को भेजा जिसने हमें सारी बुद्धि की पूर्ण सिद्धता पहुँचाई: और अन्त में अपने प्रेरितों को: ऐसा कि उसने केवल व्यवस्था देना पर्याप्त न समझा, वरन् चाहा कि सुसमाचार भी प्रचारित हो, और वह अन्त तक बना रहे, और अब भी योग्य मनुष्यों को हमें सिखाने के लिए उभारता है: जब (मैं कहता हूँ) परमेश्वर हमारे लिए इतना कुछ करता है, और उसे हमारे कल्याण की ऐसी चिन्ता है, कि निरन्तर बिना अन्त और बिना रुके हमें जगाता रहता है: तो यदि हम लापरवाह रहें और यह सब हमारे किसी काम न आए, तो क्या हम उतने ही अधिक दोषी न ठहरेंगे?

इसलिए आओ हम यहाँ सन्त पौलुस को न देखें कि गलातियों ने उसकी कितनी कम परवाह की: परन्तु यह विचार करें कि परमेश्वर ने उसे खड़ा किया था, और यह दिखाना चाहता था कि हम उसे कितने प्रिय हैं, और वह हमारे प्राणों को कितना मूल्यवान समझता है, कि उसने अपनी शिक्षा को इस प्रकार पक्का करवाना चाहा। यह सच है कि इस पत्री में छः-सात पत्रों से अधिक नहीं हैं, और पहली दृष्टि में यह इतना बड़ा पत्र न दिखाई दे। परन्तु यदि हम इसके सार और विषय पर ध्यान दें, तो निश्चय हम यहाँ वह पाएँगे जिससे शैतान को और उसकी सब चालों को जो वह साथ ला सकता है लज्जित कर सकें, ऐसा कि परमेश्वर का सत्य (जो हमारा उद्धार है) प्रबल हो। यहाँ तक कि यदि हमारे पास केवल यही पत्री होती, तो भी हम उन सब झूठों, छलों और दुरुपयोगों के विरुद्ध लड़ने के लिए जो शैतान हमारी आँखों में धूल झोंकने के लिए कह सकता है, पर्याप्त रीति से सुरक्षित और सज्जित होते।

परन्तु हमारे पास केवल यह पत्री नहीं है: वरन् परमेश्वर की और भी इतनी साक्षियाँ हैं जो (जैसे तुम कहो) हमारी आँखें फोड़ देने को पर्याप्त हैं, यदि हम उन पर दृष्टि न करना चाहें। और इसके साथ हमारी सहायता के लिए इतनी पुष्टियाँ हैं: कि यदि हम संसार के सबसे हठीले और जंगली प्राणी भी होते, तौभी हम किसी ज्ञान की ओर खींचे जा सकते थे, क्योंकि परमेश्वर हमें अपनी ओर जीतने के लिए इतने उपाय आज़माता है। संक्षेप में, वह हमें अपने पास आने पर विवश करता है चाहे हम अपनी इच्छा से न आएँ। और यदि हम वहाँ पीछे हटें जहाँ हमें आगे बढ़ना चाहिए: तो क्या हम में की यह विद्रोही प्रवृत्ति असहनीय नहीं?

इसलिए जब कभी और जितनी बार हम इस पाठ को पढ़ें, चाहे वह हमें छूता न दिखाई दे, वरन् केवल गलातियों से कहा गया जान पड़े: तौभी हम समझ लें कि परमेश्वर हमें उलाहना देता है कि उसका परिश्रम हमारे बीच व्यर्थ और निष्फल जाएगा, यदि हम शिक्षा के द्वारा, जो और अधिक पक्की की गई है, निरन्तर आगे न बढ़ाए जाएँ। तौभी वह कहीं अधिक चाहता है कि हम प्रसन्न साहस के साथ आएँ। क्योंकि वह हमें दोष देना या हमसे मुकद्दमा लड़ना नहीं चाहता, इस शर्त पर कि हम इतने समझदार हों कि कह उठें, चलो, अब मैं देखता हूँ कि मेरा परमेश्वर इस योग्य है कि मैं उसके पास जाऊँ, चाहे वह मुझे दूर से इशारा ही करता। परन्तु वह मुझे अद्भुत घनिष्ठता से बुलाता है, और केवल एक बार मुँह खोलकर चले जाने से सन्तुष्ट नहीं: वरन् उसने मूसा और सब भविष्यद्वक्ताओं को भेजा है, उसने अनगिनत शिक्षक भेजे हैं, उसने अपने प्रेरितों को भेजा है, वरन् अपने ही एकलौते पुत्र को भी जो उसकी सनातन बुद्धि और वचन है।

जब परमेश्वर मुझ पर इतना कृपालु है, वरन् मुझे उत्तम प्रतिष्ठा तक उठाता है, और जब सब सम्भव उपायों से वह मुझे अपनी बुद्धि दिखाता है, जिसके द्वारा वह मुझे अपनी ओर जीतना चाहता है, और बिना अन्त और बिना रुके, भोर और साँझ, उसी में लगा रहता है: तो क्या मैं सोया हुआ सा पड़ा रहूँ, मानो मुझ में किसी लकड़ी के कुन्दे से अधिक न समझ है न संवेदना? इसलिए और भी अधिक हमारे लिए आवश्यक है कि परमेश्वर के वचन का और अच्छा स्वाद चखें, और अपना सारा यत्न उसी में लगाएँ।

और क्योंकि उसमें कुछ भी अनावश्यक नहीं, और हमें उसमें अपने आप को लगाने के लिए उभारे जाने की आवश्यकता है: तो हम में से हर एक उसमें अपने आप को लगाने को प्रेरित हो, और यह न कहे कि एक ही बात को दोहराना अनावश्यक है: परन्तु यह समझे कि चाहे मनुष्य हमारे सामने कोई नई बात न लाएँ, तौभी हमें उसी पाठ पर निरन्तर चोट करते रहना है: अर्थात् यह कि परमेश्वर ने जो मूसा, भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों को भेजा, और इसके अतिरिक्त अपनी शिक्षा को लिखित रूप में दिलवाने की कृपा की: यह सब हमारी शिक्षा के लिए किया गया: और यह कि जब हमारा प्रभु यीशु मसीह समय पूरा होने पर भेजा गया, तब उसने वह सब कह दिया जो हमारे उद्धार के लिए आवश्यक है, और इसके अतिरिक्त अपने आत्मा के साधन होने के लिए मनुष्य खड़े किए, कि वे हमें उसकी इच्छा दिखाएँ और उद्धार का समाचार हमें पहुँचाएँ, (जैसा वह आज भी करता है) जो हमारे लिए उन बातों के साक्षी हैं जो अन्यथा हमसे छिपी रहतीं।

इसलिए जब ऐसा ही है: तो हम में से हर एक इस पर सहमत हो, और चाहे हम उसे अकेले अपने आप पढ़ें, चाहे सार्वजनिक रूप से सिखाए जाएँ: आओ हम उस वचन में स्थापित हों जो परमेश्वर को हमें देना अच्छा लगा। इस प्रकार तुम सार रूप में देखते हो कि हमें क्या स्मरण रखना है, ताकि हम इस पवित्र वचन के प्रति अपने आप को पूरी रीति से सौंपने की और भी अधिक भली इच्छा रखें, और वह और भी अधिक श्रद्धा के साथ ग्रहण किया जाए, जैसा वह सचमुच इसके योग्य भी है।

परन्तु अब आओ हम अपने भले परमेश्वर और पिता की महिमा के सामने गिरें, उसे अपना न्यायी मानते हुए, जब तक कि वह अपनी असीम दया से हमारे अपराधों को न ढाँप दे, और आओ हम उससे विनती करें कि वह हमारे प्रभु यीशु मसीह के कारण हम पर दया करे, और इस बीच हमें अनुग्रह दे कि हम ऐसी रीति से चलें कि इसका सच्चा प्रमाण दे सकें कि हम उसकी सन्तान हैं, और उसका हमें बुलाना व्यर्थ नहीं गया: और यह भी कि वही अनुग्रह हमारे मनों में ऐसा प्रभावशाली हो कि हम उसमें बढ़ें, और अपने सारे जीवन भर उसकी पवित्र वचन की सच्ची आज्ञाकारिता में उसकी सेवा और आराधना करने के लिए और अधिक दृढ़ किए जाएँ। और इसलिए हम सब कहें, हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, स्वर्गीय पिता, इत्यादि।

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