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6 मुझे आश्चर्य होता है कि जिसने तुम्हें मसीह के अनुग्रह से बुलाया, उससे तुम इतनी शीघ्रता से फिरकर दूसरे सुसमाचार की ओर बहक गए हो।
7 जो वास्तव में और कुछ नहीं, केवल इतना है कि कुछ लोग तुम्हें घबरा देते हैं और मसीह के सुसमाचार को उलट देना चाहते हैं।
8 परन्तु यदि मैं स्वयं या स्वर्ग का कोई दूत भी तुम्हें उससे भिन्न सुनाए जो मैंने तुम्हें सुनाया है, तो वह श्रापित हो।
जो बात मैं आज प्रातःकाल पहले ही छू चुका हूँ, उसे हम यहाँ और खुलकर देखते हैं: अर्थात् यह कि सन्त पौलुस गलातियों को नहीं बख्शता, यद्यपि उसका आशय उन्हें उद्धार के द्वार से बाहर कर देना नहीं है। क्योंकि उसका उद्देश्य उन्हें पश्चाताप की ओर लौटा लाना है, इसलिए यह उचित ही है कि वह परमेश्वर के अनुग्रह को उनके सम्मुख एक ऐसी वस्तु के रूप में रखे जो उनके लिए भी साझी है। फिर भी वह उनकी चापलूसी नहीं करता, वरन् उनके दोषों के लिए उन्हें डाँटता है, और विशेष रूप से उस अत्यधिक हल्कापन के लिए जो उनमें इस बात में था कि उन्होंने उन धोखा देनेवालों की सुन ली जो सुसमाचार की शिक्षा को रूप बदलकर प्रस्तुत करने उनके पास आए थे। और उन्हें अपनी कृतघ्नता का और अच्छी रीति से बोध कराने के लिए वह कहता है कि उसे यह देखकर आश्चर्य होता है कि वे स्वर्गीय बुलाहट से इतनी जल्दी और इतनी सरलता से बहका दिए गए, और यह कैसे हुआ कि वे इतनी शीघ्र मार्ग से हटा दिए जा सके और अब भी अपने इसी आचरण में बने रहें, जबकि वे हमारे प्रभु यीशु मसीह में परमेश्वर के अनुग्रह का अनुभव कर और उसे परख चुके थे। क्योंकि उन्हें फिर लौटा लाने का उसका जो प्रयत्न था, उसके कारण वह पहले ही झटके में यह नहीं कहता कि वे सुसमाचार से फिर गए हैं, वरन् यह कि वे उस परीक्षा से पराजित हो गए हैं। और फिर वह यह जोड़ता है कि वह परीक्षा और कुछ नहीं थी, केवल यह कि वे दूसरों के काम में दखल देनेवाले लोग परमेश्वर के सत्य को उलट देना चाहते थे। क्योंकि सुसमाचार की खरी शिक्षा एक ही है, जैसे यीशु मसीह एक ही है जिस पर वह शिक्षा आधारित है; इसलिए हमारे वश में नहीं कि हम कोई नया सुसमाचार गढ़ लें, पर जब कभी कोई उस शुद्ध बीज में, जो हमें अपने प्रभु यीशु मसीह से मिला है, कुछ भी मिलाने लगता है, तो वह परमेश्वर की बनाई हुई इमारत को उलट देने के सिवा और कुछ नहीं है। सन्त पौलुस के इस पहले वाक्य में, सार रूप में, यही बात निहित है। परन्तु यहाँ ऐसा प्रतीत हो सकता है कि वह गलातियों की दुर्बलता में दोष निकालने में बहुत कठोर और रूखा है, क्योंकि उनका तो कभी सुसमाचार को, या उस यीशु मसीह को जिसका प्रचार उनके बीच हुआ था, छोड़ देने का इरादा ही नहीं था।
तथापि सन्त पौलुस उनके अपने विचार की परवाह नहीं करता, वरन् मामले की वास्तविकता को देखता है, जो यह है कि ज्यों ही मनुष्य परमेश्वर के सत्य से मुड़ते हैं, त्यों ही वे यीशु मसीह को त्याग देते हैं और अपने आपको उसके लिए पराया बना लेते हैं।
बहुत से लोग इसे विचित्र समझेंगे, जैसा कि हम देखते हैं कि बहुतेरे ऐसे हैं जो ज्योति और अन्धकार को एक में मिलाना चाहते हैं। और विशेष रूप से पोप-मत में जो गड़बड़ी है, वह इसका एक अति उल्लेखनीय उदाहरण है : क्योंकि वहाँ तुम लोगों को यह अद्भुत घोषणाएँ करते सुनोगे कि वे अब भी उस मसीही विश्वास को थामे हुए हैं जिसमें उन्होंने बपतिस्मा पाया है।
फिर भी यह प्रत्यक्ष है कि वहाँ सब कुछ उलट-पुलट हो गया है: क्योंकि वहाँ सब प्रकार के अन्धविश्वास राज्य करते हैं, और इसके अतिरिक्त वहाँ प्रकट मूर्तिपूजा है, और वह भी उतनी ही स्थूल जितनी अन्यजातियों में कभी रही हो। इसी कारण वहाँ परमेश्वर का आदर लगभग पूरी तरह मिट गया है, क्योंकि हर मनुष्य हमारे प्रभु यीशु मसीह के स्थान पर अपने आपको उद्धारकर्ता बना लेता है।
पर अब पोप के अनुयायी बड़े साहस से उत्तर देंगे कि वे न तो पीछे हटनेवाले हैं और न उन्होंने मसीह को छोड़ा है। हाँ, परन्तु हमारा प्रभु यीशु मसीह कोई भूत-छाया नहीं है कि मनुष्यों की अभिलाषाओं के अनुसार अपना रूप बदल ले। संक्षेप में, वह अपनी कलीसिया से अलग नहीं किया जा सकता।
जब कभी पोप के अनुयायी यह बात कहते हैं, तब वे यीशु मसीह को सारे अधिकार से वंचित कर देते हैं। क्योंकि वे कहते हैं कि यदि मध्यस्थ केवल एक ही है, तो फिर उन पुरुष-सन्तों का क्या होगा जो संरक्षक हैं, और उन स्त्री-सन्तों का क्या होगा जो हमारी वकील हैं?
यदि कोई उनसे उस बलिदान की चर्चा करे जिसके द्वारा हमारे प्रभु यीशु मसीह ने सब विश्वासियों के लिए एक ही बार सिद्ध धार्मिकता मोल ले ली है, तो वे कहते हैं: क्या मिस्सा प्रतिदिन नहीं चढ़ाई जानी चाहिए, और क्या वहाँ मसीह को परमेश्वर का क्रोध शान्त करने के लिए फिर से अर्पित नहीं किया जाना चाहिए?
यदि कोई उन्हें पापों की मुफ़्त क्षमा के विषय में बताए, तो वे कहते हैं: तो फिर हमारे अपने प्रायश्चित्तों का क्या होगा, जिनके द्वारा हम परमेश्वर के हाथ से दया पाने के योग्य ठहरते हैं? फिर, यदि कोई उनसे कहे कि हमारी सारी भलाई परमेश्वर के आत्मा के द्वारा हमारे नया जन्म पाने से आती है, और जब तक परमेश्वर हमें बदल न दे तब तक हम में मलिनता और विद्रोह के सिवा और कुछ नहीं है, तो वे उत्तर देते हैं: ऐसा कैसे? तब हमारी अपनी स्वतंत्र इच्छा का क्या होगा?
संक्षेप में, यीशु मसीह का नाम तो बहुत बार लिया जाएगा, और लोग उसके लिए छुड़ानेवाले की उपाधि सुरक्षित रखेंगे। परन्तु इसी बीच उसके पद का बँटवारा कर दिया जाएगा, उसे लूट का माल बना दिया जाएगा, और हर कोई उसका एक अंश अपने लिए झपट लेगा।
इसके अतिरिक्त वे कल्पना करते हैं कि स्वर्ग के सन्त और स्वर्गदूत उनके संरक्षक हैं, और अन्ततः उनके पास (अपनी समझ में) परमेश्वर के पास पहुँचने के अनगिनत मार्ग हैं। परन्तु इससे हम भली-भाँति यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि पवित्र आत्मा उन्हें ठीक ही पीछे हटनेवाले, यीशु मसीह को त्याग देनेवाले और उसके लिए पराये बन जानेवाले ठहराता है।
क्योंकि वे उसके नाम का झूठा दुरुपयोग करते हैं। यीशु मसीह परिवर्तनशील नहीं है, जैसा कि हम देख चुके हैं कि सन्त पौलुस ने कुरिन्थियों की दूसरी पत्री में कहा था कि हम उसमें "हाँ" और "नहीं" दोनों न पाएँगे, वरन् वह सदा एक ही दशा में बना रहेगा।
संक्षेप में, मसीही धर्म के विषय में पोप के अनुयायी जो कुछ बकते हैं, वह सब का सब कपट और झूठ है, और वे परमेश्वर के पुत्र के नाम को केवल बिगाड़ते और उसका दुष्टता से दुरुपयोग करते हैं। क्योंकि वे उसे नकाबपोश स्वाँग बना देते हैं, या यों कहें कि एक मूर्ति।
तुम देखते हो कि सन्त पौलुस गलातियों को इस प्रकार बहक जाने के लिए क्यों दोष देता है। अब यदि कोई पूछे कि यह कैसे हुआ, तो बात यह थी कि कुछ लोग उनसे व्यवस्था की रीतियों को आवश्यक वस्तुएँ मानकर मनवाना चाहते थे; और फिर भी परमेश्वर ने ही उनकी आज्ञा दी थी।
हाँ, निस्सन्देह; परन्तु वह तो प्राचीन काल के लोगों के लिए केवल एक सामयिक शर्त के साथ थी, इसलिए अनिवार्य था कि हमारे प्रभु यीशु मसीह के आने पर वे सब समाप्त हो जाएँ। अतः जब गलातियों ने व्यवस्था की पुरानी प्रतिछायाओं और छायाओं को सुसमाचार के स्पष्ट प्रकाश में मिला दिया, तब सन्त पौलुस ने इसे सहन न कर पाकर कहा कि वे परमेश्वर से फिर गए हैं, वरन् उससे पूरी तरह दूर जा पड़े हैं।
परन्तु इससे भी बुरी एक बात है: अर्थात् यह कि इसके द्वारा हमारे प्रभु यीशु मसीह का अनुग्रह रद्द कर दिया गया, क्योंकि मनुष्य सदा अपने आपको यह समझाते रहते हैं कि वे परमेश्वर के सम्मुख धार्मिकता के योग्य हैं और उसे कमाते हैं, कि उसकी सेवा करने के कारण वे उसके अनुग्रह के पात्र हैं; और इसलिए जब उन धोखा देनेवालों ने यह भ्रम फैला दिया कि मनुष्यों को वे पुरानी, त्यागी हुई प्रतिछायाएँ माननी चाहिए, तो यह वैसा ही था मानो उन्होंने परमेश्वर पर [चाहे वह चाहे या न चाहे] एक पुण्य-कमानेवाली सेवा थोप दी हो।
परन्तु हमारा उद्धार मुफ़्त दान से होना चाहिए, नहीं तो यीशु मसीह का कोई मूल्य नहीं। मैं इसे मुफ़्त दान का उद्धार इसलिए कहता हूँ कि वह हमें परमेश्वर की ओर से केवल दिया जाता है, ऐसा कि उसे पाने के लिए हम अपने साथ कुछ नहीं लाते, केवल इतनी तीव्र लालसा लाते हैं कि जिस वस्तु की हमें घटी है उससे भर दिए जाएँ।
इसलिए यदि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के कारण धर्मी ठहराए जाना चाहते हैं, तो हमें परमेश्वर के पास दीन भिखारियों के समान आना चाहिए। क्योंकि यदि हम अपने में योग्यता की छोटी-सी बूँद की भी कल्पना करें, तो वह हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह के पास आने से रोक देती है।
और एक प्राचीन शिक्षक का यह कहना अकारण नहीं है कि जो उद्धार हमारे प्रभु यीशु मसीह में हमें प्रस्तावित किया गया है, उसे हम तब तक ग्रहण नहीं कर सकते जब तक पहले अपनी योग्यताओं का विचार त्याग न दें और यह स्वीकार न कर लें कि हम में घोर दुर्दशा के सिवा और कुछ नहीं है।
तुम देखते हो कि सन्त पौलुस के पास यह कहने का और भी न्यायसंगत कारण क्यों था कि गलाती यीशु मसीह से और उसके पिता से बहका दिए गए हैं। परन्तु इसके साथ एक बाधा और थी: अर्थात् यह कि उन्हें वह सब मानने पर विवश किया गया जो दूसरे लोग चाहते थे, और इस प्रकार वे दासत्व की बेड़ी के अधीन लाए गए, कि हमारे प्रभु यीशु मसीह में हमें जो विवेक की शान्ति मिलनी चाहिए उससे वे वंचित कर दिए जाएँ।
क्योंकि इसके अतिरिक्त कि हम उसकी मृत्यु और दुःखभोग के बलिदान के द्वारा परमेश्वर से मेल-मिलाप पा चुके हैं, हम व्यवस्था की कठोरता से भी छुड़ाए गए हैं, जिसके अधीन हम दासत्व में जकड़े हुए थे। जैसे उदाहरण के लिए (जैसा कि हम आगे और विस्तार से देखेंगे, क्योंकि अभी तो मैं उन बातों पर केवल दृष्टि दौड़ा रहा हूँ जिन पर आगे अधिक विस्तृत चर्चा होगी)।
तुम जानते हो कि व्यवस्था में कैसा कहा गया है कि जो कोई परमेश्वर की आज्ञा की प्रत्येक बात को पूर्णता तक पूरी नहीं करता, वह श्रापित होगा। परन्तु हमारे लिए ऐसी सिद्धता तक पहुँचना असम्भव है। इसलिए हमारे लिए आवश्यक था कि हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमारी स्वतंत्रता मोल ली जाए, ताकि प्रभु हमें अपने उस जूए के नीचे और न रखे, जो असह्य था, जैसा कि प्रेरितों के काम के पन्द्रहवें अध्याय में कहा गया है।
अब हम देखते हैं कि सन्त पौलुस गलातियों को क्यों दोष देता है कि वे परमेश्वर की ओर और हमारे प्रभु यीशु मसीह की ओर झूठी शपथ खानेवालों के समान गिर गए हैं, मानो उसे चकमा दे गए हों और उस विश्वास को छोड़ बैठे हों जिसकी उन्होंने उससे प्रतिज्ञा की थी।
और इस उदाहरण से हमें चेतावनी मिलती है कि हम सुसमाचार की खरी शिक्षा और सरलता से इधर-उधर डगमगाए बिना लगे रहें। क्योंकि मसीहियों का नाम और उपाधि रखना, यहाँ तक कि बपतिस्मा का चिह्न धारण करना भी पर्याप्त नहीं है: हमें सुसमाचार की शिक्षा में दृढ़ बने रहना चाहिए।
क्योंकि (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) हमारा प्रभु यीशु मसीह अपने आपका इन्कार नहीं कर सकता: और जब हम उसके विषय में यह-वह स्वप्न गढ़ चुके हों, तब भी हमें उसे वैसा ही जानना पड़ेगा जैसा वह हमें उसके पिता परमेश्वर की ओर से दिया गया है।
अब सुसमाचार यह बताता है कि वह किसलिए आया, उसका पद क्या है, उसके द्वारा हमें कौन-कौन से लाभ मिलते हैं, और हमारे प्रति उसकी सामर्थ्य क्या है। और इसलिए यदि हमारे पास वह शुद्ध और सीधी शिक्षा नहीं है जिसमें हमारे प्रभु यीशु मसीह हम पर प्रकट हुआ, तो निश्चय ही हमारे पास कुछ भी नहीं है: और जब एक बार हमें उसकी शिक्षा मिल गई, तो हमें उसे अन्तिम क्षण तक थामे रखना चाहिए।
क्योंकि यदि हम उससे तनिक भी भटकें, तो हम में विश्वासघात के सिवा और कुछ न होगा। और सचमुच हमारे लिए आवश्यक है कि उस भयानक पतन का स्मरण करें जिसमें हम दूसरों के साथ जा गिरे थे, जब हम इतनी भ्रान्तियों, छलों और शैतान के भ्रमजालों में डूबे हुए थे कि यीशु मसीह हमारे लिए सर्वथा अज्ञात था।
अब जबकि परमेश्वर ने अपनी असीम भलाई से हमें ऐसे अथाह गड्ढे से निकाल लिया है, तो आओ हम दृढ़ और स्थिर विश्वास में अपने को जमाएँ, कि हम हर हवा से हिलनेवाले सरकण्डों के समान फिर न हिलें, वरन् सुसमाचार की जड़ में दृढ़ बने रहें, और अपने प्रभु यीशु मसीह की अजेय सामर्थ्य पर स्थापित रहें।
और फिर, क्योंकि उसमें परमेश्वर की सारी प्रतिज्ञाएँ "हाँ" और "आमीन" हैं और उसी में उनकी सत्यता है, ऐसा कि वे वहीं पूरी की जाती हैं: इसलिए हमारा विश्वास भी वहीं दृढ़ बना रहे। सन्त पौलुस के इस कथन में हमें यही स्मरण रखना है।
इसके अतिरिक्त, गलातियों को और अधिक लज्जित करने के लिए, वह उनके सामने अनुग्रह से मिली उनकी बुलाहट को रखता है। ये शब्द, "उससे जिसने तुम्हें बुलाया," यीशु मसीह के लिए भी कहे जा सकते हैं और पिता परमेश्वर के लिए भी, क्योंकि बात में कोई बड़ा अन्तर नहीं।
परन्तु इसी बीच हम देखते हैं कि सन्त पौलुस वास्तव में क्या कहना चाहता था। इसलिए वह गलातियों को उनकी कुटिलता के लिए ताना मारता है, कि इस प्रकार किनारा काटने का उनके पास उतना ही कम बहाना था, क्योंकि परमेश्वर ने उन पर कितनी भलाई दिखाई थी। क्योंकि यदि परमेश्वर हमें बुलाए, चाहे वह हमारे विनाश के लिए ही क्यों न बुलाए, तब भी हमें उसकी आज्ञा माननी चाहिए क्योंकि हम उसकी सृष्टि हैं। हमें उसके अधिकार के अधीन रहना शोभा देता है, और वह हमारे साथ चाहे जैसा व्यवहार करे, हमारा कर्तव्य सदा यही है कि कहें, "हे प्रभु, देख, मैं तेरी इच्छा पर हूँ।" इसलिए जब परमेश्वर बुलाए तब पीछे हटना सारी व्यवस्था को पूरी तरह उलट देना है।
और विशेषकर तब, जब परमेश्वर हमें केवल अपनी ओर बुलाता ही नहीं, वरन् हमारे प्रभु यीशु मसीह में अपनी भलाई के सारे भण्डार हमारे सामने रख देता है, और दिखाता है कि वह इसके सिवा और कुछ नहीं चाहता कि अपने आपको हमें इतनी उदारता से देकर हमें अपना बना ले; जब परमेश्वर (मैं कहता हूँ) हमारे प्रति ऐसी उदारता दिखाता है जो हमारी सारी बुद्धि को चकित करके मोह ले, तो यदि हम पीछे हटें तो क्या हम अत्यन्त आलसी नहीं ठहरते?
इसके अतिरिक्त, यदि हम उसके पास एक बार आ जाने के बाद इधर-उधर भटकें, तो हमारे पास उतना ही कम बहाना होगा, और हम और भी कठोर और भयानक दण्ड अनुभव करेंगे, जैसा मैं पहले छू चुका हूँ। अब हम देख चुके कि इस कथन में, जहाँ सन्त पौलुस उस अनुग्रह का उल्लेख करता है जिसके लिए गलाती बुलाए गए थे, क्या अर्थ निहित है।
और निस्सन्देह आजकल हम व्यवस्था के अधीन जीनेवाले पूर्वजों से कहीं अधिक दोषी हैं, यदि हम सुसमाचार की शुद्ध शिक्षा में बने न रहें और उसमें निहित बातों से मुड़ जाएँ। क्योंकि यद्यपि परमेश्वर ने पूर्वजों को भी व्यवस्था के अधीन उद्धार के लिए बुलाया, जैसे अब हमें, तथापि वह बुलाहट अपनी दया की सम्पदा के ऐसे खुले और भरपूर प्रकटीकरण के साथ न थी जैसी हमें अपने प्रभु यीशु मसीह में मिली है।
इसलिए आओ हम अपने चारों ओर भली-भाँति देखें, और क्योंकि उसने हमें अपना अनुग्रह पहले ही अनुभव करा दिया है, वही हमें उभारे और भड़काए कि हम और साहस के साथ उसी बुलाहट में अजेय हियाव से तब तक बने रहें जब तक उस स्थान तक न पहुँच जाएँ जहाँ परमेश्वर हमें खींच रहा है।
अतः यदि हम अपनी तुलना बहुत से अविश्वासी और अज्ञानी प्राणियों से करें, तो यह निश्चित है कि हमारी कृतघ्नता उतनी ही बड़ी होगी जितना परमेश्वर का अनुग्रह हम पर और अधिक विस्तृत और गहरा प्रकट हुआ है। हम बहुत से भोले प्राणियों को इधर-उधर भटकते देखेंगे , फिर भी वे इस कारण दण्ड के भागी होने से नहीं बचते। क्योंकि जिसने बिना व्यवस्था के पाप किया, वह बिना व्यवस्था के नष्ट भी होगा।
अब क्योंकि परमेश्वर ने अपनी इच्छा हम पर इतने मित्रभाव से प्रकट की है, और विवेक के प्रयोग के साथ हमारे पास उसके सुसमाचार की शिक्षा भी है, जो (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) हमें यह दिखाने का काम देती है कि यदि हम अपने आपको पूरी तरह उसे समर्पित करने का प्रयत्न न करें तो हमारा दण्ड और भी भयानक होगा, जिसके कारण हमारा बन्धन उतना ही कसकर हो जाता है: सन्त पौलुस एक और परिस्थिति जोड़ता है, जो यह है कि यह बहुत ही शीघ्रता से हुआ।
क्योंकि निश्चय ही यह भयानक बात थी कि गलाती, जिन्हें पवित्र प्रेरित के अपने मुख से शिक्षा मिली थी, उसके जीते-जी ही इतने बिगड़ गए। तुम देखते हो कि यह उनके लिए कितना अधिक दोष की बात थी कि सुसमाचार ग्रहण करने के तीन [या चार] दिन के भीतर ही वे बह गए और परमेश्वर के सत्य में अनेक झूठे विचार मिला बैठे।
परन्तु यदि वे पौलुस की मृत्यु के बाद भी कुछ अच्छे समय तक सत्य में बने रहते, तब भी इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि उनका ऐसा करना उनके लिए पर्याप्त छुटकारा होता यदि वे आगे चलकर गिर जाते। क्योंकि जैसे वह सत्य, जिस पर हमारा विश्वास टिका है, सनातन है, चाहे आकाश और पृथ्वी टल जाएँ: वैसे ही हमारे विश्वास को अन्त तक टिके रहना चाहिए, और किसी मनुष्य के जीवन या मृत्यु पर टँगा नहीं रहना चाहिए, वरन् उसका लंगर स्वर्ग में गड़ा होना चाहिए।
इसलिए यदि हम [किसी भी समय] बदल जाएँ, चाहे आज चाहे कल, तो हम और अधिक दोषी ठहरेंगे, और हमारी कृतघ्नता उतनी ही अधिक लज्जाजनक होगी। और सचमुच जो बात सन्त पौलुस यहाँ गलातियों के व्यक्तित्व में बताता है, वह आजकल बहुत अधिक देखी जाती है। क्योंकि जिन्होंने सुसमाचार की थोड़ी-सी जानकारी पा ली है, वे दो-तीन वर्ष में उससे ऊब जाएँगे, यदि इस बीच कोई नया परिवर्तन न आए।
क्योंकि उनके कान खुजलाते हैं, और हम बहुत से सनकी लोगों को पीछे हटते देखते हैं: और क्योंकि सुसमाचार का सत्य उन्हें भाता नहीं, वे सदा इधर-उधर उड़ते रहना चाहते हैं, और पता नहीं कौन-सी नई सामग्री मँगवाते हैं कि उनकी मूर्खतापूर्ण कल्पनाओं का पोषण हो। हम दूसरों को खिन्न होते देखते हैं क्योंकि वे समझते हैं कि सुसमाचार से उन्हें संसार की दृष्टि से कोई लाभ नहीं होता: वरन् कुछ लोग इसलिए फिर जाते हैं कि वे देखते हैं कि यह उन पर सताव लाने और उनके बहुत से शत्रु बना देने का कारण है, या फिर (जैसा वे समझते हैं) वे भूखों मरते हैं जबकि दूसरे लोग फलते-फूलते और सुख से रहते हैं।
इस प्रकार तुम देखते हो कि यीशु मसीह बहुतों के द्वारा त्यागा जाता है; पर पिता से पुत्र की ओर नहीं, वरन् इस कारण कि जिन्होंने उसे अच्छा मुख दिखाया था, वे अचानक बदल जाते हैं और दो-तीन वर्ष के भीतर, या अधिक से अधिक आधे दर्जन वर्ष के बाद, उससे उड़ जाते हैं। इसलिए हमें इस शिक्षा पर और भी भली-भाँति ध्यान देना चाहिए, क्योंकि यह हमसे कही जा रही है: और उस उलाहने का भी विचार करना चाहिए जो यिर्मयाह ने यहूदियों को दिया था।
वह कहता है, "दूर देशों में जाओ, समुद्र पार दौड़ जाओ, देखो कि और लोग क्या करते हैं: हर एक अपनी-अपनी मूर्तियों से चिपका रहता है, और फिर भी उनमें कोई ईश्वरत्व नहीं है: शैतान उन्हें भक्ति के बहाने छलता है, और वे उसमें ऐसे जमे हुए हैं कि किसी रीति से उससे हटाए नहीं जा सकते। अब कम से कम तुम भी उनके समान दृढ़ बनो, क्योंकि परमेश्वर ने अपने आपको तुम पर प्रकट किया है, और तुम उसकी इच्छा को पूरी तरह और निश्चय के साथ जानते हो।"
हम सावधान रहें कि आजकल हमसे भी ऐसी ही बात न कही जाए: क्योंकि हम तुर्कों का [अपने धर्म में] अत्यधिक उत्साह देखते हैं। और यद्यपि यहूदी अशुद्ध कुत्तों से अच्छे नहीं, तब भी वे अपनी व्यवस्था के अधिकार को बनाए रखने में अब भी अड़े हुए हैं। रहे पोप के अनुयायी, उनके पास तो केवल सनकें हैं, इतनी पशुवत् कि देखकर भय होता है: बच्चे भी उन्हें परख सकते हैं: फिर भी हम देखते हैं कि वे अपने विश्वासघातों को बनाए रखने के लिए कैसे उग्र उत्साह से जलते हैं।
परन्तु हमारा हाल यह है कि शैतान ज्यों ही अँगुली उठाता है, त्यों ही हम उसके पीछे भटक चल पड़ते हैं: ऐसा प्रतीत होता है कि हम में से हर एक यह ताकता रहता है कि कोई नया खिलौना आए, और संसार का सबसे छोटा अवसर भी हमें तुरन्त झकझोर देता और हमारे मार्ग से डरा भगाता है: और इसके उदाहरण हम यहीं, कहीं और जाए बिना, बहुत देखते हैं।
इसलिए और भी अधिक हमें यह ध्यान देना चाहिए कि सन्त पौलुस के मुख से यहाँ उन लोगों की चंचलता पर जो दोष लगाया गया है, जो परमेश्वर से फिर जाते हैं, विशेषकर इतनी शीघ्र जबकि उसने उन्हें हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह में बुलाया था। और इस पर सन्त पौलुस कहता है कि यह और कुछ नहीं, केवल यह कि उनके बीच कुछ लोग हैं जो उन्हें घबरा देते हैं और हमारे प्रभु यीशु मसीह के सुसमाचार को उलट देना चाहते हैं।
यहाँ सन्त पौलुस दिखाता है कि जो कुछ भी मनुष्य सुसमाचार के अतिरिक्त लाते हैं, वह सब का सब निरा धुआँ है, और अन्त में यह प्रकट हो जाएगा कि शैतान ने उनके मार्ग में तुच्छ खिलौने डाल दिए थे, ताकि उन भोले मूर्खों को ठग ले जो पूरी तरह परमेश्वर के सत्य पर विश्राम न कर सके।
वह कहता है, "यह और कुछ नहीं, केवल यह कि कुछ लोग तुम्हें घबरा देते हैं।" सचमुच इस शब्द "और" का तात्पर्य है कि वह कुछ भी नहीं, बिलकुल कुछ भी नहीं। तथापि सन्त पौलुस यह प्रकट करता है कि गलाती यह बहाना कर सकते थे कि जो यरूशलेम से और यहूदिया देश से आए थे, उन्होंने उनसे कहा था कि उन्हें व्यवस्था को सुसमाचार से अलग नहीं करना चाहिए।
वह कहता है, "नहीं, नहीं, यीशु मसीह एक ही है, और न कोई एक से अधिक शिक्षा है जो हमें उसकी ओर ले चलती और हमें विश्वास में थामे रखती है, जिसके द्वारा हम उसके वसीले से उद्धार पाते हैं।"
अतः जो कोई सुसमाचार के शुद्ध ज्ञान से लिपटे रहना और उसी में बने रहना चाहते हैं, उन्हें [उससे] अधिक कोई और सिद्धता नहीं खोजनी चाहिए: जो उससे आगे जाते हैं, वे सब कुछ को उलट-पुलट और अस्त-व्यस्त करनेवाले घबरानेवाले लोग हैं।
और यह कथन ध्यान देने योग्य है, ताकि हम जानें कि जब प्रभु ने हम पर यह अनुग्रह किया है कि हमें अपनी पाठशाला में सिखाए, तब हमारा विश्वास अब इधर-उधर लड़खड़ानेवाला न रहे, वरन् एक दृढ़ निर्णय और संकल्प हो कि कह सकें, "यही वह बात है जिसमें हमें जीना और मरना है।"
परन्तु तुम बहुतों को देखोगे जो सुसमाचार की शिक्षा के विरुद्ध खुलकर तो नहीं बोलेंगे, पर हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह का प्रचार होने देंगे। यदि कोई उनसे पूछे कि तुम्हें किस बात में दोष दिखता है, तो वे कहते हैं, "कुछ नहीं।" परन्तु वेदी कितनी ही शीघ्र खड़ी कर दी जाए, और उस पर पुतले रख दिए जाएँ, तो वे तुरन्त वहाँ दौड़ पड़ते हैं, उन्हें मिस्सा सुनने और पोप-मत का सारा कूड़ा-कर्कट देखने जाना ही पड़ता है, उन्हें इसकी परवाह नहीं कि संसार किस ओर चलता है, और जब वे सारी गड़बड़ियाँ उनके सामने रखी जाती हैं, तो वे समझते ही नहीं कि इनमें कोई अन्तर भी है।
परन्तु ध्यान दें कि ऐसी पशुता यह प्रकट करती है कि उनमें विश्वास है ही नहीं। और क्यों? क्योंकि जिस बात में हम दिखा सकते हैं, वरन् (अपने विषय में) अनुभव कर सकते हैं, कि हम विश्वासी हैं या नहीं, वह यह है कि सुसमाचार की ऐसी समझ हो कि हम यह निष्कर्ष निकालें कि वह परमेश्वर का अचूक सत्य है, और यदि हम उसका अनुसरण करें तो वह हमें कभी भटका नहीं सकता।
इसके विपरीत, पोप के अनुयायियों ने एक "निहित विश्वास" (जैसा वे उसे कहते हैं) गढ़ लिया है, और वही उनके लिए पर्याप्त है: और यद्यपि वे अभागे प्राणी स्वयं नहीं जानते कि उनका क्या अभिप्राय है, तथापि वे कहते हैं, देखो, मैं अपनी माता पवित्र कलीसिया पर छोड़ता हूँ, जैसा वह विश्वास करती है वैसा मैं विश्वास करता हूँ। परन्तु ऐसे लोग खुले रूप से दिखाते हैं कि उनमें कोई विश्वास है ही नहीं, और वे यह भी नहीं जानते कि किस उपाय से उद्धार पाया जाता है।
फिर भी कहा जाता है कि हम विश्वास के द्वारा धार्मिकता और उद्धार पाते हैं, अर्थात् इसलिए कि हम मसीह को उस व्यक्ति के रूप में ग्रहण करते हैं जिसके द्वारा सब भली वस्तुएँ हमें दी जाती हैं। तब यदि हमारा प्रभु यीशु मसीह अज्ञात हो, तो वह विश्वास नहीं रहता, वरन् शैतान का एक स्थूल भ्रमजाल है, जिसने पोप के शिक्षकों पर जादू करके उन्हें उस रीति से बोलने को प्रेरित किया है: और इससे हम देखते हैं कि उन्हें परमेश्वर का कोई ज्ञान नहीं, वरन् वे पूरी तरह एक भ्रष्ट मन के वश में छोड़ दिए गए हैं।
इसलिए भली-भाँति ध्यान दें कि जब सन्त पौलुस यहाँ कहता है कि कोई दूसरा सुसमाचार नहीं है: तो यह इसलिए है कि हम ऐसी दृढ़ता में बने रहें कि एक बार यह सीख लेने पर कि हमारा प्रभु यीशु मसीह कौन है, हम उसी में बने रहें, और उन सब बातों को पूरी तरह त्याग दें जो सुसमाचार की शिक्षा के विपरीत हैं।
एक बार ऐसी समझ हमें मिल जाए, तो वह हमारे काम आएगी कि हम शैतान से और उन सब मतभेदों से लड़ें जो आज संसार में हैं, ऐसा कि चाहे जो कष्ट आए हम गिराए न जाएँ, और अन्ततः अपने विश्वास की निश्चयता से हटाए न जाएँ।
परन्तु यदि हम इस रीति से डगमगाएँ कि छोटे बच्चों के समान हो जाएँ, जिन्हें यदि कोई एक ओर से सेब दे तो वे उधर दौड़ पड़ते हैं, और यदि कोई दूसरा दूसरी ओर से कोई और मनभावनी वस्तु दे तो वे वैसे ही उधर दौड़ते हैं, और पहले को छोड़कर दूसरे के हाथ में अपने को सौंप देते हैं।
मैं कहता हूँ कि यदि हम ऐसे चंचल मन के हों, तो यह इस बात का चिह्न है कि हम में निरे अविश्वास के सिवा और कुछ नहीं है। तब हम निश्चय जान लें कि हमारे विश्वास और सुसमाचार के बीच ऐसा पारस्परिक मेल होना चाहिए कि हम अपने आपको पूरी तरह उसके प्रति समर्पित कर दें, और कभी उससे खींचे न जाएँ, और उसमें जो बातें निहित हैं उनका हमारा ज्ञान ऐसा हो कि हम उन्हीं पर विश्राम करें, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ।
ऐसा नहीं कि सब मनुष्य समान रूप से शिक्षक हो सकते हैं (क्योंकि यह बहुत निश्चित है कि जिन्हें हमारे प्रभु यीशु मसीह ने अपने झुण्ड में रखा है, उनमें से अधिकांश पवित्रशास्त्र की समझ का दसवाँ भाग भी नहीं समझ पाते), पर संसार चाहे जैसा चले, हम सब को इन बातों में दृढ़ होना चाहिए: अर्थात् यह कि केवल एक ही परमेश्वर पिता है, जिससे हमें सब कुछ मिला है, और जिसने अपनी निरी दया से हमें लेपालक बनाया है: यह कि केवल एक ही यीशु मसीह है, जिसके द्वारा हम सब भली वस्तुओं के भागी बनाए गए हैं: और यह कि पवित्र आत्मा के द्वारा हम फिर से नया जन्म पाए हैं:
और जहाँ तक हमारे प्रभु यीशु मसीह की बात है, हमारे लिए आवश्यक है कि हम भली-भाँति निश्चय रखें कि वह हमारा वकील है, और उसके बिना हम परमेश्वर के पास नहीं आ सकते, न उसे अपना पिता कहने को मुँह खोलने का साहस कर सकते हैं, केवल इस कारण कि हम हमारे प्रभु यीशु मसीह के अंग हैं, और वह हमारा प्रवक्ता और संरक्षक होकर हमारे लिए बोलता है, मानो हाथ पकड़कर हमें मार्ग दिखाता हुआ अपने पिता परमेश्वर के पास पहुँचाता है।
यदि हम इन बातों को न जानें, तो निश्चित है कि हम कोई उद्धार नहीं पा सकते। और यही कारण है कि सन्त पौलुस गलातियों को दोष देता है, कि उन्होंने यह नहीं सोचा कि सुसमाचार केवल एक ही है, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के साथ अन्याय किए बिना बदला नहीं जा सकता, जिसे अकेले ही सब सुनवाई मिलनी चाहिए।
इसके साथ ही वह हमें चेतावनी भी देता है कि जब कभी कोई दखल देनेवाले लोग हमें उस शुद्ध सरलता से हटाने आएँ जिसे परमेश्वर और हमारे प्रभु यीशु मसीह के विषय में हमें थामे रहना चाहिए, तो हमें उन्हें श्रापित ठहराना चाहिए।
क्योंकि (जैसा आगे और विस्तार से कहा जाएगा) वे हमारे प्रभु यीशु मसीह के सुसमाचार को उलट देते हैं। और यह सचमुच भयानक बात है कि वह सुसमाचार, जो हमारे विश्वास की नींव है और स्वर्गलोक का द्वार खोलनेवाली कुंजी है, उलट दिया जाए। क्योंकि वही हमारा सारा कल्याण है, वही परमेश्वर का वह राज्य है जिससे हम (एक प्रकार से) निर्वासित हैं: और हम किसी रीति से उसके पास नहीं आ सकते जब तक वह अपने सुसमाचार के द्वारा हमारे लिए मार्ग न बना दे, ताकि हम उसकी प्रजा हों और वह हमारा राजा, और हम उसके अधिकार से चलाए और शासित किए जाएँ।
तुम देखते हो कि सुसमाचार में जो अमूल्य लाभ समाए हैं, वे ये हैं: अर्थात् मनुष्यों का परमेश्वर से मेल-मिलाप हो गया है: स्वर्गलोक का द्वार हमारे लिए खुल गया है: और हमारा प्रभु यीशु मसीह हमें हमारी मीरास के रूप में दिया गया है, ऐसा कि जो सब लाभ उसने हम पर उँडेले हैं उनके हम भागी बनाए गए हैं, और उसने हमारे अनन्त उद्धार को प्रमाणित कर दिया है।
अब क्या यह अच्छा न होता कि सारा संसार डूबकर नष्ट हो जाए, बजाय इसके कि यह सब उलट दिया जाए? इसी कारण सन्त पौलुस हमें बताता है कि वे सब जो हमें विश्वासयोग्य रीति से सिखाए जाने के बाद उपद्रव खड़े करने आते हैं, और वे सब जो कोई जिज्ञासाएँ लाते हैं या अपने मस्तिष्क की यह-वह बात घुसेड़ देते हैं, वे मनुष्यों को परमेश्वर के राज्य से और उसके राजसिंहासन से फेर देते हैं, इस उद्देश्य से कि वे फिर उसके द्वारा शासित न हों, और हमारे प्रभु यीशु मसीह का राजदण्ड उनके बीच उनके उद्धार के लिए और ऊँचा न किया जाए।
अब यदि हम परमेश्वर के आदर को उतना मूल्यवान समझते हैं जितना समझना चाहिए, या स्वर्गीय लाभों का भागी होना अनमोल मानते हैं, या अपने कल्याण की कुछ गिनती करते हैं: तो क्या हम में से हर एक को उन उपद्रवियों से बचना और उन्हें संसार की प्राणघातक महामारियों के समान निकाल बाहर करना नहीं चाहिए, जब वे हमारे बीच आकर परमेश्वर की सारी महिमा को और हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह को, और परिणामस्वरूप हमारे उद्धार को भी मिटाने में लग जाएँ?
इस प्रकार तुम देखते हो कि सार रूप में यहाँ हमें यह ध्यान देना है कि हमें सुसमाचार से ऐसे उत्कट मन से चिपके रहना चाहिए कि हम किसी रीति से मार्ग से हटाए जाने न दें, और न यह सहें कि कोई पहले की अपेक्षा कोई नई बात लाकर हमारी बुद्धि को घबरा दे। चाहे वे मनुष्य कितने ही कुशल, चतुर, तीक्ष्णबुद्धि और वाक्पटु क्यों न हों: फिर भी यदि वह हमें सुसमाचार की शुद्धता से फेरने का प्रयत्न करे, तो हम उसे पूरी तरह श्रापित जानकर झटक दें। सन्त पौलुस यहाँ हमें यही सिखाता है।
और ऐसा कहकर वह जोड़ता है कि यदि वह स्वयं, या कोई स्वर्गदूत उस सुसमाचार से भिन्न कोई और सुसमाचार सुनाने आए जो गलातियों ने सुना और समझा था, तो वे उन्हें झटक दें, उन्हें श्रापित मानें, उन्हें बहिष्कृत करें, और उन्हें शैतान ही समझें। यहाँ हम देखते हैं कि सन्त पौलुस (जैसा तुम कहोगे) विश्वास की दृढ़ता को बनाए रखने के लिए उत्साह से जलता है, ताकि हम किसी रीति से उससे हिलाए न जाएँ, और यह अकारण नहीं है।
क्योंकि हम देखते हैं कि हम में कैसी दुर्बलता है, और केवल दुर्बलता ही नहीं, वरन् मूर्खता और विद्रोहीपन भी है, जो और भी बुरे हैं। पहली दृष्टि में, यदि कोई हमें परमेश्वर का वचन सिखाए, और हम उससे सच्चे मन से प्रभावित न हों, तो हम उसे संसार की सबसे विचित्र बात समझेंगे: क्योंकि वह शिक्षा मनुष्य की बुद्धि को सदा मूर्खता लगेगी, जैसा कि हम पहले देख चुके हैं। और इसका कारण क्या है? हमारी वही मूर्खता, क्योंकि हमारी बुद्धि भटकनेवाली और घूमनेवाली है, और हम स्वभाव से झूठ की ओर झुके और उतावले हैं, और (मानो जानबूझकर) धोखा खाना चाहते हैं।
अब जब हमारी बुद्धि इतनी बिगड़ी हुई है, तो आश्चर्य नहीं कि हमें परमेश्वर का वचन नहीं भाता, या वह हम में प्रवेश नहीं पाता, क्योंकि हमारा सारा बल विद्रोहीपन ही है, और जहाँ हम समझते हैं कि हम में विवेक है, वहाँ हम निरे अन्धे हैं: और संक्षेप में, पवित्रशास्त्र का यह कहना अकारण नहीं कि मनुष्य निरी व्यर्थता और झूठ हैं, वरन् परमेश्वर के विद्रोही हैं, ऐसा कि जिस ओर परमेश्वर उन्हें बुलाता है उससे वे सदा पीछे हटते हैं।
परन्तु मान लें कि परमेश्वर ने हमारे लिए इतना किया कि हमें अपनी ओर खींच लिया, और हमें यह स्वाद चखा दिया कि उसका सत्य वही है जिसमें हमें अपने आपको थामे रखना चाहिए, और हम ऐसे सधा दिए गए कि हम में और हठ न रहा, वरन् हम उसकी हर आज्ञा मानने को तैयार हो गए: फिर भी हम में ऐसी दुर्बलता और अस्थिरता है कि शैतान घड़ी के हर क्षण हमें सरलता से मार्ग से हटा देगा।
और इसका अनुभव हम उन्हीं में देखते हैं जो पवित्रता के दर्पण के समान थे, ऐसा कि उन्हें अचानक बदलते और सीधे मार्ग से चले जाते देखकर तुम चकित हो जाओगे। और इसका कारण क्या है? जैसा मैंने पहले कहा, यद्यपि हम अच्छी उन्नति पर हों, तब भी हम अपनी स्थिति को देर तक थाम नहीं सकते, वरन् शीघ्र ही पूरी तरह टेढ़े हो जाएँगे, जब तक परमेश्वर हम में कार्य करके हमारी दुर्बलता को सुधार न दे।
इस प्रकार तुम देखते हो कि सन्त पौलुस सुसमाचार की शिक्षा को ऐसी महिमा के साथ क्यों थामे रखता है, और इसका अवसर उसे गलातियों ने दिया, क्योंकि वे मार्ग से इसलिए हटा दिए गए थे कि उन्हें यह विश्वास दिलाया गया था कि उन्हें व्यवस्था की रीतियाँ माननी चाहिए।
इसलिए सन्त पौलुस मनुष्य की दुर्बलता और अत्यधिक हल्केपन का ऐसा उदाहरण और प्रतिबिम्ब देखकर कहता है कि सुसमाचार का विश्वास उस सब से बढ़कर होना चाहिए जिसकी हम कल्पना कर सकते हैं, और हमें उससे न मनुष्यों के ज्ञान के कारण, न उनकी बड़ी चतुराई के कारण, न उनकी वाक्पटुता के कारण हटाया जाना चाहिए; यहाँ तक कि यदि स्वर्ग के दूत भी इस विषय में हमसे व्यवहार करें, तो हम उन्हें शैतान ही जानें।
परन्तु बात जैसी भी हो, यह बहुत विचित्र था। क्या? स्वर्ग के दूत? और फिर, सन्त पौलुस किस की बात करता है? अपने ही प्रचार की। वह केवल मसीह का सुसमाचार नहीं कहता, वरन् वह सुसमाचार जो मैंने तुम्हें सुनाया। और क्या वह स्वर्ग के सब दूतों से श्रेष्ठ होना चाहिए? सबसे पहले हम देखते हैं कि सामान्य और अस्पष्ट शब्दों में सुसमाचार की शिक्षा की बड़ाई करना व्यर्थ है: वरन् हमें साथ ही यह भी निश्चित करना चाहिए कि वह कौन-सी शिक्षा है। संक्षेप में, हम में बहुत से हैं जो पोप के अनुयायियों की मूर्खता का तो खूब उपहास कर सकते हैं: परन्तु यदि कोई उन्हें उन मूल बातों में परखे जिन्हें छोटे बच्चों को भी भली-भाँति जानना चाहिए, तो वे उनके विषय में कुछ नहीं जानते: और चाहे कोई एक मनुष्य की बात करे और कोई दूसरा किसी और की, उनके लिए सब एक है, उनमें कोई विवेक नहीं, वे बात की ऐसी खिचड़ी बना देते हैं, मानो कोई नमक और पानी और राई और न जाने क्या-क्या सब एक साथ घोल दे।
तुम देखते हो कि वे सामान्य शब्दों में तो भली-भाँति मान सकते हैं कि सुसमाचार का प्रचार होना चाहिए, परन्तु इसी बीच वे नहीं जानते कि सुसमाचार है क्या। अब ऐसी भूलों को सुधारने के लिए सन्त पौलुस कहता है: अर्थात् वह सुसमाचार जो मैंने तुम्हें सुनाया। और इससे (जैसा मैंने कहा) वह हमें दिखाता है कि हमें यह जानना चाहिए कि परमेश्वर के नाम से जो शिक्षा हमारे सामने रखी जाती है उसमें कौन-सा सार समाया है, ताकि हमारा विश्वास उस पर पूरी तरह जम जाए, कि हम चंचल मन के होकर हर हवा से डोलते न फिरें, और न सब कुछ दाँव पर लगाकर दिन में सौ बार अपना संकल्प बदलें, वरन् अन्त तक टिके रहें। सार रूप में यही बात हमें स्मरण रखनी है।
परन्तु साथ ही, पौलुस की शिक्षा को और अधिकार देना चाहिए कि वह उसके बचाव में इतने साहस से बोलता है, और वह भी मानवीय उतावलेपन और घमण्ड से नहीं, वरन् परमेश्वर के नाम से। क्योंकि वास्तव में वह यहाँ अपने व्यक्तित्व की प्रशंसा पर नहीं टिकता: और यह वह भली-भाँति इसी से दिखाता है कि वह कहता है, यदि मैं स्वयं। वह अपने आपको सबसे पहले रखता है, मानो उसने कहा हो कि मुझे, हाँ मुझ ही को, शैतान समझा जाए, यदि मैं शिक्षा बदलूँ, या तुम मुझे किसी भी रीति से भटका हुआ पाओ।
यहाँ सन्त पौलुस दिखाता है कि उसका अभिप्राय अपने लिए प्रतिष्ठा कमाना नहीं था, और न वह अपने ही झगड़े के लिए लड़ा, कि लोग उसके विषय में कहें कि वह बड़ा तेज़ बुद्धिवाला मनुष्य है, या बुद्धिमान और श्रेष्ठ पुरुष: नहीं, वरन् वह अपने आपको विश्वासियों की पंक्ति में रखता है, और कहता है, आओ हम सब उस स्वामी की शिक्षा को ग्रहण करें जिसके भार में परमेश्वर ने हमें सौंपा है, और जिसके शासन के अधीन हमें रहना चाहिए। क्योंकि यद्यपि मैं ही वह हूँ जिसने तुम्हें यह शिक्षा दी, तथापि वह मेरी नहीं, वरन् परमेश्वर की है जो अपरिवर्तनीय है: और यद्यपि तुम मुझे बदलते देखो, तब भी तुम उससे न डिगो, न घबराओ, वरन् मुझे शैतान समझो, मुझे श्रापित मानो, और तुम अपनी ओर से उस सत्य में, जो तुमने सीखा है, दृढ़ बने रहो, और मेरे लिए, मुझे श्राप दो और मुझे वर्जित करो, वरन् स्वर्ग के दूतों को भी, इसके बजाय कि परमेश्वर के पुत्र के सत्य में कुछ भी बदलो या उससे फिरो।
यहाँ हम भली-भाँति देखते हैं कि सन्त पौलुस और कुछ नहीं चाहता था, केवल यह कि परमेश्वर के सत्य को मनुष्यों के बीच वैसा आदर मिले जिसके वह योग्य है, और वह ऐसा ग्रहण किया जाए कि हमारी सारी बुद्धि, हमारे सारे विचार, हमारी सारी अभिलाषाएँ और हमारी सारी भावनाएँ उसके अधीन वश में और बन्दी बनाई जाएँ, और किसी भी जीवित प्राणी के लिए यह उचित न हो कि उसमें कुछ भी बदले, वरन् केवल परमेश्वर ही अपने एकलौते पुत्र के मुख से बोले, और हम उसे अपना स्वामी मानें, और हम में से हर एक बिना विरोध किए उसकी आज्ञा माने। सन्त पौलुस यही चाहता था। तथापि क्योंकि अब हम शेष को प्रस्तुत नहीं कर सकते, वह अगले रविवार तक के लिए रखा जाएगा, यदि परमेश्वर की इच्छा हो।
अब आओ हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सम्मुख अपने दोषों को स्वीकार करते हुए गिर पड़ें, और उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उन्हें अधिकाधिक समझाए, और उनका बोध हमें सच्चे पश्चाताप की ओर खींचे, और हमें विश्वास में बढ़ाए और उन्नत करे, कि हम उसके लिए सच्चे बलिदान ठहरें: कि जैसे हमारे प्रभु यीशु ने हमारे छुटकारे के लिए अपने आपको अर्पित किया, वैसे ही हम भी अपने आपको पूरी तरह उसे समर्पित करने का ध्यान रखें, और उसके द्वारा ऐसी दृढ़ता में चलाए जाएँ कि न जीवन में न मृत्यु में हम उसकी भली इच्छा के अनुसार अपने आपको ढालने के सिवा कोई और सन्तोष और विश्राम खोजें, और न उस उद्धार के सिवा, जो उसमें हमारे लिए मोल लिया गया है, किसी और बात पर घमण्ड करें। कि वह यह अनुग्रह न केवल हमें, वरन् पृथ्वी के सब लोगों और जातियों को भी देने की कृपा करे, इत्यादि।
