अध्याय 31

उनतीसवाँ उपदेश, जो चौथे अध्याय पर छठा है - गलतियों 4:21-25

Sermons upon Galatians · John Calvin

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उनतीसवाँ उपदेश, जो चौथे अध्याय पर छठा है - गलतियों 4:21-25

जो चौथे अध्याय पर छठा है।

21 तुम जो व्यवस्था के अधीन रहना चाहते हो, मुझे बताओ, क्या तुम व्यवस्था की नहीं सुनते?

22 क्योंकि लिखा है कि अब्राहम के दो पुत्र हुए, एक दासी से, और दूसरा स्वतंत्र स्त्री से।

23 परन्तु जो दासी से हुआ वह शरीर के अनुसार जन्मा, और जो स्वतंत्र स्त्री से हुआ वह प्रतिज्ञा के अनुसार जन्मा।

24 इन बातों में एक दृष्टान्त है; क्योंकि ये स्त्रियाँ दो वाचाएँ हैं: एक तो सीनै पहाड़ की, जिससे दासत्व के लिए सन्तान उत्पन्न होती है, और वह हाजिरा है।

25 क्योंकि हाजिरा अरब का सीनै पहाड़ है, और वर्तमान यरूशलेम की समानता में है, क्योंकि वह अपने बच्चों समेत दासत्व में है।

हर कोई कह सकता है कि स्वतंत्रता ऐसी वस्तु है जिसकी इतनी अधिक अभिलाषा की जानी चाहिए कि उसके बिना मनुष्य का जीवन मानो अधमरा, या निरन्तर घुलते जाने के समान है। और सचमुच हम दासत्व और पराधीनता से यथासम्भव दूर भागते हैं, और स्वतंत्रता तथा मुक्ति को चाहते हैं, जैसा कि लोक-कहावत में भी उसे अनमोल वरदान कहा गया है। अब यदि इस पार्थिव जीवन के विषय में ऐसा है, तो जब बात हमारे प्राणों के अनन्त उद्धार की हो, तब यह और भी अधिक सच है। फिर भी हम देखते हैं कि बहुत लोग दासत्व में दौड़ पड़ते हैं और अपने ही गले में जानबूझकर रस्सी बाँध लेते हैं। वे यह कहना तो खूब जानते हैं कि हम स्वतंत्रता चाहते हैं; परन्तु इसी बीच वे अपने आप को ऐसा दिखाते हैं मानो उन्होंने दासता के लिए मन्नत ही मान रखी हो।

और यह विशेष रूप से तब देखा और बहुत अधिक परखा जाता है जब हम उस स्वतंत्रता का आनन्द लेने पर आते हैं जो हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमारे लिए मोल ली है, ताकि हमारे प्राणों को विश्राम मिले। क्योंकि यद्यपि परमेश्वर ने सुसमाचार के द्वारा हमें शैतान के बन्धनों से और पाप के अत्याचार से छुड़ाया है, यह बताकर कि वह हमें अपनी सन्तान करके अपनाता है, तो भी ऐसे लोग मुश्किल से ही दिखाई देते हैं जो उस वरदान को, जब वह उन्हें दिया जाता है, ग्रहण करें; वरन सब के सब अपने आप को पाप की शापित बन्धुआई में डुबो देते हैं, और परमेश्वर की आज्ञा मानने में अपने आप को सौंपकर स्वतंत्रता से चलने की अपेक्षा अपनी ही अभिलाषाओं के वश में रहना अधिक पसन्द करते हैं। इसलिए पौलुस का यहाँ उन लोगों की कृतघ्नता को डाँटना अकारण नहीं है जो व्यवस्था के अधीन होना चाहते हैं; वह उनसे कहता है कि जिस वस्तु की उन्हें सबसे बढ़कर कामना करनी चाहिए, अर्थात् परमेश्वर की सन्तान के समान स्वतंत्र और मुक्त होना, उसी को वे छोड़ रहे हैं।

और इसके विषय में वह हमें मानो एक दर्पण या जीवित चित्र देता है, यह कहकर कि व्यवस्था में ही मनुष्य देख सकता है कि जब तक वह व्यवस्था के अधीन रहता है तब तक उसकी दशा कितनी दीन और दयनीय है। क्योंकि अब्राहम का घराना परमेश्वर की कलीसिया का मानो जीवित प्रतिरूप था। इसलिए वहाँ हम देख सकते हैं कि कलीसिया की दशा कैसी है। अब कहा गया है कि अब्राहम के दो पुत्र थे: एक का नाम इश्माएल था, और दूसरे का इसहाक। इश्माएल हाजिरा से उत्पन्न हुआ, जो अब्राहम की दासी थी और उसे पत्नी के रूप में दी गई थी। तो भी इसमें एक घोर दोष था, कि वह उस प्रतिज्ञा और बन्धन को निभा न सका जो उसने अपनी वैध पत्नी सारा से बाँधा था। फिर हम देखते हैं कि अब्राहम और हाजिरा के इस विवाह का कारण सारा की अत्यधिक उतावली थी, क्योंकि उसने सोचा कि परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञा के पूरा करने में इतनी देर लगा रहा है, और वह सन्तान की अभिलाषी थी। परन्तु उसने सोचा कि यह उसके अपने उपाय के बिना नहीं हो सकता, और इसलिए उसने परमेश्वर के वचन का बहुत बुरा अर्थ निकाला, और प्रकट होता है कि वह अपने विश्वास में उतनी धीरजवन्त और स्थिर नहीं थी जितना आवश्यक था। संक्षेप में, वह विवाह निन्दनीय था, और व्यभिचार से कुछ बेहतर नहीं था, चाहे अब्राहम का इरादा ऐसा नहीं था। क्योंकि वह बुरी वासना से प्रेरित नहीं था। वह भली-भाँति उस वंश की इच्छा कर सकता था जिससे संसार का उद्धार उत्पन्न होना था; परन्तु देखो, हमारे मूर्खतापूर्ण इरादे क्या कर डालते हैं। जब हम परमेश्वर के वचन की आधार-आज्ञा के बिना कोई न कोई काम करने लगते हैं, तो अपनी ही उतावली के कारण हम अनेक दोषों में बह जाते और घसीटे जाते हैं।

इसी रीति से इश्माएल दासी हाजिरा से उत्पन्न होता है, और फिर भी वह न तो वैध विवाह है और न परमेश्वर को स्वीकार। इसहाक सारा से इश्माएल के बहुत समय बाद उत्पन्न होता है, क्योंकि इसहाक के जन्म से पहले इश्माएल सोलह वर्ष का तो हो ही चुका होगा। परन्तु सन्त पौलुस, मूसा के वृत्तान्त का अनुसरण करते हुए, कहता है कि इसहाक प्रतिज्ञा के अनुसार जन्मा, और इश्माएल शरीर के अनुसार। इसका अर्थ यह नहीं कि अब्राहम ने अपने पुत्र इसहाक को उत्पन्न नहीं किया, परन्तु यह कि उसने यह स्वर्गीय सामर्थ्य से किया, क्योंकि उसकी देह पहले ही सूख चुकी थी और अधमरी-सी हो गई थी, और उसमें अब कोई जोश न रहा था। वह सौ वर्ष का पुरुष था, और उसकी पत्नी भी लगभग उसी आयु की थी, जो अपने जीवन के पिछले सारे समय में बाँझ रही थी, और जब वह गर्भवती होने पाई तब पूरे नब्बे वर्ष की या उसके आसपास की थी, यहाँ तक कि जब स्वर्गदूतों के द्वारा उसके पास सन्देश पहुँचा, तो वह स्वयं भी उसे केवल एक कहानी और हँसी की बात ही समझी।

तो तुम देखते हो कि इसहाक प्रतिज्ञा के अनुसार जन्मा। क्योंकि उस अवसर पर परमेश्वर ने आश्चर्यकर्म किया, ताकि यह जाना जाए कि हमारा प्रभु यीशु संसार में प्रकृति की सामान्य रीति के अनुसार नहीं भेजा जाएगा, वरन परमेश्वर की भलाई और उसके अद्भुत पूर्व-संकल्प से आनेवाला होगा। परन्तु बात जैसी भी हो, तुम यहाँ अब्राहम के घराने में (जो मानो कलीसिया का एक प्रतीक और प्रतिरूप है) दो स्त्रियों को देखते हो, और उनके दो पुत्र, जिनमें से एक एक की सन्तान है। अब जहाँ तक हाजिरा का सम्बन्ध है, सन्त पौलुस कहता है कि वह सीनै पहाड़ को दर्शाती है जहाँ व्यवस्था दी गई: और वह उसे अरब का एक पहाड़ कहता है, यह दिखाने के लिए कि वह उस पवित्र देश में नहीं था जिसे परमेश्वर ने अपने लोगों का भाग ठहराया था।

और सारा यरूशलेम को दर्शाती है: वह कहता है, वह यरूशलेम नहीं जो अब खड़ा है, क्योंकि वह तो बिगड़ चुका था और परमेश्वर की व्यवस्था और शुद्ध शिक्षा से भटक गया था: मैं व्यवस्था से कहता हूँ, उस रीति से नहीं जिस रीति से सन्त पौलुस यहाँ उसे दासत्व के लिए सन्तान उत्पन्न करनेवाली ठहराता है, परन्तु उस वाचा के अनुसार जो परमेश्वर ने अपने लोगों से हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम में बाँधी थी। तो जब कि पौलुस के समय का यरूशलेम यीशु मसीह को त्याग चुका था, और इस प्रकार परमेश्वर की वाचा को रद्द कर चुका था, इसलिए सन्त पौलुस कहता है कि उसे हाजिरा या सीनै पहाड़ के साथ जोड़ा जाना चाहिए। वह कहता है, यहूदी अपने मन्दिर, बलिदानों और ऐसी ही अन्य बातों के बहाने डींग मारें कि वे परमेश्वर के चुने हुए और निज लोग हैं, तो इससे कुछ नहीं होता: क्योंकि इस सब साज-सामान के होते हुए भी वे लगभग पवित्र देश से निकाले और उखाड़े हुए हैं, और उनके पास व्यवस्था का केवल एक खोखला नाम ही रह गया है। क्योंकि कोई यरूशलेम की वर्तमान दशा को देखे, तो वह सीनै से बिलकुल भिन्न नहीं है।

परन्तु वह कहता है कि ऊपर की एक यरूशलेम है, अर्थात् कलीसिया, जो परमेश्वर के सामने हमें उत्पन्न करती है, और सुसमाचार का अविनाशी बीज रखते हुए वह स्वतंत्र और बन्धनमुक्त सन्तान को जन्म देती है, और वह सब विश्वासियों की माता है, जैसा लिखा है, “हे बाँझ, तू जो दीन है, आनन्द कर।” और यशायाह किसी एक स्त्री से नहीं कहता, परन्तु परमेश्वर की कलीसिया को ही उपमा के रूप में ऐसा कहता है, जिस कलीसिया को कुछ समय के लिए बहुत तितर-बितर होना था। इसलिए उसका कहना यह है, ठीक है, तू त्यागी हुई होगी, और परमेश्वर और तेरे बीच मानो एक प्रकार का त्याग-पत्र होगा: परन्तु अन्त में वह तुझे फिर बढ़ाएगा, और तेरी सन्तान उस से अधिक होगी जितनी तब होती यदि तू सारे समय समृद्धि में फूलती-फलती रहती: और यह तब हुआ जब सुसमाचार का प्रचार संसार में खुलकर किया गया। क्योंकि तब कलीसिया के पास केवल अब्राहम की सन्तान, या कोई एक निश्चित जाति ही नहीं रही: परन्तु सुसमाचार के स्वर्गीय बीज के द्वारा उसने सब जातियों और देशों से, दूर-दूर तक, परमेश्वर के लिए असंख्य सन्तान उत्पन्न की, उस सामर्थ्य के अनुसार जो परमेश्वर ने सारे संसार में प्रकट की। देखो, जो पाठ मैंने सुनाया है उसका सार संक्षेप में यही है।

परन्तु सबसे पहले हमें ध्यान देना है कि जब सन्त पौलुस कहता है कि ये बातें एक दृष्टान्त में कही गई हैं, तो उसका आशय पवित्र शास्त्र के स्वाभाविक अर्थ को बिगाड़ना नहीं था, जैसा कि हम देखते हैं कि कुछ लोगों ने किया है, जिन्होंने पवित्र शास्त्र में मूर्खतापूर्ण कल्पनाओं को खोजने की अपनी निरर्थक जिज्ञासा से सब कुछ उलट-पुलट और अस्त-व्यस्त कर दिया है, और शाब्दिक अर्थ को कुछ भी मूल्य का न माना है। इसी कारण सब कुछ मिलावटी और बिगड़ा हुआ हो गया, और इन रूपकों से बढ़कर कोई शैतानी युक्ति नहीं हुई, जिनका संसार में इतना बोलबाला रहा है, और जो अब भी बहुत लोगों को इतना भाती हैं कि वे मानो उनसे मोहित हो गए हैं, क्योंकि वे बड़ी मनभावनी और लुभावनी हैं। वे कहते हैं, “वाह, कैसी उत्तम व्याख्या!” और ऐसा क्यों? क्योंकि जब वह न आकाश को छूती है न पृथ्वी को, तब भोले लोग उस पर लट्टू हो जाते हैं, और उस में अधर में लटके और डगमगाते रहना सहज बात है।

परन्तु सन्त पौलुस का आशय यह नहीं था कि जो बातें मूसा इसहाक और इश्माएल के विषय में बताता है वे केवल ऐसी जिज्ञासापूर्ण कल्पनाओं के काम आएँ: परन्तु वह दिखाता है कि उस इतिहास में हम वास्तव में कलीसिया की दशा देखते हैं, क्योंकि उस समय संसार में परमेश्वर से शासित कोई कलीसिया नहीं थी, केवल अब्राहम का घराना था। सालेम तब भी था, जहाँ मलिकिसिदक राजा था: तो भी, क्योंकि वह निरन्तर क्षय की ओर जा रहा था, परमेश्वर ने अब्राहम के व्यक्ति में एक जाति को इकट्ठा किया, जिससे उसने संकेत दिया कि जिन्हें उसने शेष संसार से अलग करके शिक्षित किया है, उन्हीं के द्वारा उसे पुकारा जाएगा।

इसलिए हमें मूसा के इस वृत्तान्त को ठंडे मन से, बिना आगे विचार किए नहीं पढ़ना चाहिए, अर्थात् उन बातों पर ध्यान दिए बिना जो उस घराने में घटीं, जिसमें हमें कलीसिया की दशा दिखाई गई है। इसे एक बात के रूप में स्मरण रखो।

परन्तु अब मुख्य बात पर आकर, आइए ध्यान दें कि जब सन्त पौलुस अब्राहम की दासी हाजिरा की तुलना सीनै पहाड़ से, और वहाँ प्रकाशित की गई व्यवस्था से करता है, तो उसका आशय व्यवस्था को उसकी सम्पूर्ण विषय-वस्तु और सार समेत लेना नहीं है। क्योंकि व्यवस्था में उद्धार की प्रतिज्ञाएँ हैं, जिनकी आशा हमें अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा रखनी है, जैसा कि सन्त पौलुस ने अनेक स्थानों पर बताया है, और जैसा हम स्वयं देख चुके हैं। तो यदि हम व्यवस्था को उसके सही और वैध उपयोग में ले सकें, तो निश्चय है कि हमें वहाँ जीवन का अविनाशी बीज मिलेगा, और परमेश्वर हमारा पिता होगा, और हम उसके द्वारा स्वतंत्र किए जाएँगे। व्यवस्था ने निःसन्देह बाहरी दृष्टि से दासत्व के लिए सन्तान उत्पन्न की, जैसा पहले बताया जा चुका है।

यद्यपि प्राचीन काल के पुरखे हमारी ही तरह परमेश्वर की सन्तान और स्वर्ग के राज्य के वारिस थे, तो भी वे संरक्षकों और भण्डारियों के अधीन थे। क्योंकि वे तब तक छोटे बालकों के समान थे, और बातों की परिपूर्णता हमारे प्रभु यीशु मसीह के आने तक के लिए रखी गई थी: और रीति-विधियाँ मानो लगाम और पट्टे थीं, ताकि जो उन्हें मानते थे उन्हें वह पूर्ण स्वतंत्रता न मिले जो परमेश्वर आज हमें भोगने के लिए देता है, जैसी वह हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमारे लिए मोल ली गई है। तो भी सन्त पौलुस, यहाँ उस व्यवस्था की चर्चा करते हुए जो दासत्व के लिए सन्तान उत्पन्न करती है, उसे उस मिथ्या धारणा के रूप में लेता है जो उन लोगों की थी जिनके विरुद्ध वह वाद-विवाद करता है। क्योंकि वह आगे चलकर जोड़ेगा कि जो ऐसे उत्पन्न होते हैं वे सब अन्त में परमेश्वर के घर और मीरास से निकाल दिए और खदेड़ दिए जाएँगे। अब यद्यपि पुरखे बाहरी दासत्व में उत्पन्न हुए थे, जैसा रोमियों के आठवें अध्याय में उनके विषय में कहा गया है, तो भी वे विश्वास की आत्मा के द्वारा स्वतंत्र थे, जिसने उस दासत्व पर प्रभुत्व रखा, नहीं तो वे उद्धार की सारी आशा से काट दिए गए होते। संक्षेप में, सन्त पौलुस यहाँ व्यवस्था की उस व्याख्या के अनुसार बोलता है जिससे कपटियों ने उसे बिगाड़ दिया था, जो तुच्छ बातों में अपना सिर खपाते थे, और उन्हीं से पुण्य के कर्म बनाना चाहते थे, और इसी बीच लोगों के विवेक को ऐसे कठोर बन्धनों में डाल देते थे कि उनका गला घुट जाए। परन्तु इस विषय में पहले पर्याप्त कहा जा चुका है।

तो भी हमें स्मरण करना चाहिए कि व्यवस्था की तुलना सुसमाचार से कैसे की गई है, क्योंकि जो लोग उसके द्वारा अपने लिए धार्मिकता मोल लेना चाहते हैं, वे अपने आप को यह विश्वास दिलाते हैं कि अपना कर्तव्य निभाने के कारण परमेश्वर उनका ऋणी है, और सोचते हैं कि वे उसे सचमुच पूरी तरह निभाते हैं। जब वे यह प्रतिज्ञा सुनते हैं, “जो इन बातों को करेगा वह इनसे जीवित रहेगा,” तो तुरन्त अपने आप को कसते हैं, और मानते हैं कि परमेश्वर जो कुछ माँगता और आज्ञा देता है वह सब पूरा करके दिखा देंगे। और जब वे एक बार प्रतिज्ञा को अपने हाथ में पकड़ लेते हैं, तो तुरन्त मजदूरी की भी बाट जोहने लगते हैं: और वे फिर कभी नहीं सोचते कि उनका उद्धार मुफ़्त का दान है, परन्तु यह कि उन्होंने परमेश्वर की प्रतिज्ञा को कमाया और अर्जित किया है, ताकि अनन्त जीवन उनके लिए केवल उनकी योग्यता का प्रतिफल हो। तो तुम देखते हो कि जब सन्त पौलुस व्यवस्था की तुलना सुसमाचार से करता है तब व्यवस्था से क्या अभिप्राय है।

और जहाँ तक सुसमाचार की बात है, वह हमें बताता है कि वह ऐसी शिक्षा है जिसके द्वारा परमेश्वर अपने आप को हमारा पिता प्रकट करता है, इस वाचा के साथ कि हम शैतान और पाप के दण्ड से, वरन व्यवस्था के शाप से भी, छुड़ाए जाएँ। क्योंकि (जैसा हम पहले देख चुके हैं) कहा गया है कि जो व्यवस्था की सब बातों को पूरा नहीं करते वे सब शापित हैं। अब बात ऐसी है कि हम सब संकट में हैं। और इस प्रकार सारा संसार निराशा में निगल लिया जाता है, और कोई उपाय नहीं, जब तक कि परमेश्वर अभागे पापियों को उस दण्ड-आज्ञा से न निकाले, और उन पर सुनाई गई दण्ड की आज्ञा से उन्हें बरी न करे। तो अब हम देखते हैं कि सन्त पौलुस ने “व्यवस्था” नाम को किस रीति से लिया: अर्थात् यह कि उसका यह आशय नहीं कि मूसा में जो शिक्षा है वह हमें ठीक रीति से परमेश्वर की सन्तान नहीं बनाती, या उसमें वे प्रतिज्ञाएँ नहीं हैं जो मनुष्य जाति के अनन्त उद्धार के लिए थीं: परन्तु केवल यह कि यीशु मसीह के संसार में आने से पहले अब तक वैसी पूरी स्वतंत्रता या मुक्ति नहीं थी जैसी आज है, और इसके अतिरिक्त यह कि कपटियों ने अपनी झूठी व्याख्याओं से व्यवस्था का दुरुपयोग किया। क्योंकि उन्होंने कल्पना की कि वे परमेश्वर को क्षतिपूर्ति दे सकते हैं, और इस प्रकार उसके हाथ से अनुग्रह मोल ले सकते हैं। और इसलिए सन्त पौलुस कहता है कि जब तक हम एक और प्रकार के बीज से, अर्थात् सुसमाचार से, फिर से उत्पन्न न किए जाएँ, तब तक हम सदा दासत्व में रहेंगे। परन्तु इन शब्दों को भली-भाँति ध्यान में रखें, जहाँ कहा गया है कि हाजिरा या सीनै उस यरूशलेम को दर्शाती है जो उस समय था, अर्थात् उसी नगर को जो पहले परमेश्वर का पवित्रस्थान था, और जिसे सारी स्वर्गीय शिक्षा का सोता होना था, यशायाह और मीका के अनुसार, जो कहते हैं, “व्यवस्था सिय्योन से निकलेगी,” और “परमेश्वर का वचन यरूशलेम से।” तो भी, क्योंकि यहूदी भ्रष्ट हो गए थे, और उन्होंने सच्ची शिक्षा की शुद्धता में अपनी गढ़ी हुई बातें और टीकाएँ मिला दी थीं, वरन जीवन के सोते यीशु मसीह को भी त्याग दिया था: सन्त पौलुस कहता है कि उनका वह यरूशलेम दासी हाजिरा के समान है, और सीनै पहाड़ के समान जो दण्ड-आज्ञा के सिवाय कुछ उत्पन्न नहीं कर सकता: और यह बात ध्यान देने के बहुत योग्य है: क्योंकि इससे दिखाया जाता है कि परमेश्वर ने अपने अनुग्रह को कभी किसी एक स्थान से ऐसा नहीं बाँधा कि वह वहाँ के निवासियों की कृतघ्नता को दण्ड न दे, जब उन्हें इतनी बुद्धि न थी कि जो भली वस्तुएँ उसने उनके हाथ में रखी थीं उनसे लाभ उठाएँ। देखो, यरूशलेम परमेश्वर का पवित्र नगर, उसका राजमहल, उसका घर, और उसके निवास का स्थान कहलाता है: ये सब उपाधियाँ उसे पवित्र शास्त्र में दी गई हैं। तो भी सन्त पौलुस कहता है कि वह सीनै के समान हो गई है, जो एक उजाड़ और भयावह स्थान में बंजर पहाड़ है, और उस पवित्र देश की सीमाओं से बाहर, जिसे परमेश्वर अपना विश्रामस्थान और अपने विश्वासियों और चुने हुओं की मीरास कहता है। जब परमेश्वर के चुने हुए और ऐसी अनेक सुन्दर और उत्तम उपाधियों से सम्मानित यरूशलेम नगर में ऐसा परिवर्तन हुआ, तो उन सब लोगों का क्या होगा जो आज सुसमाचार की शिक्षा को ठुकराते हैं? यद्यपि वे वैसे ही सम्मान तक ऊँचे उठाए गए हों, तो भी परमेश्वर उन्हें सब प्रकार की निन्दा में गिराने में पूरी तरह समर्थ है। हम देखते हैं कि उन सब नगरों के विषय में क्या कहा गया है जहाँ हमारे प्रभु यीशु मसीह ने सुसमाचार का प्रचार किया था: जैसे कफरनहूम और बाकी के विषय में। क्योंकि वे इस पर घमण्ड कर सकते थे कि उद्धार का सन्देश सबसे पहले उन्हें मिला, और मसीह यरूशलेम की अपेक्षा उन्हीं के बीच रहा करता था।

परन्तु वह कहता है, तू अधोलोक की तलहटी तक गिराया जाएगा: और यह इसलिए था कि वे हठी और द्वेषपूर्वक अड़ियल थे, उस अनुग्रह को ग्रहण करने से घृणा करते हुए जिसका उन्हें प्रचार सुनाया गया था। वरन हम देखते हैं कि यिर्मयाह शीलो के विषय में क्या कहता है। क्योंकि यहूदी मन्दिर और वेदी के बहाने अपने यरूशलेम नगर पर इतना घमण्ड करते थे: वह कहता है, शीलो को जाओ: क्या वहाँ बहुत समय तक सन्दूक नहीं रखा गया था? क्या लोग सब ओर से वहाँ परमेश्वर की आराधना करने नहीं जाते थे? क्या वे वहाँ बलिदान नहीं चढ़ाते थे? और अब तुम क्या देखते हो? परमेश्वर के बदले का भयानक चिन्ह, क्योंकि उन्होंने उस वरदान से, जो सबसे पहले उन्हें दिया गया था, लाभ नहीं उठाया। इसलिए अब आइए हम इसे अपनी शिक्षा के लिए लागू करें, कि जब कभी परमेश्वर हम पर ऐसी कृपा करे कि हमारे बीच निवास करे, और मानो अपना राजसिंहासन हमारे बीच स्थापित करे कि हम पर राज्य करे, तब हम भय और सावधानी से चलें, अपनी ओर से उसकी आज्ञा मानने का यत्न करें, और संयम और विवेक के साथ उसके पंखों की छाया में अपने आप को छिपाएँ। क्योंकि यदि हम सोचें कि हमने उसे अपने से बाँध रखा है, और इसी पर अपनी ही समझ में हठी होने का साहस करें, और उन अनुग्रह के दानों को अपवित्र करें जो उसने हमारे उद्धार के लिए समर्पित किए थे, तो निश्चय ऐसी दुष्टता बिना दण्ड के नहीं रहेगी। तो यरूशलेम के उदाहरण से हमें चेतावनी मिलती है कि हम शान्ति से अपने परमेश्वर की आज्ञा मानने को अपने आप को सौंप दें, और उसे अपने ऊपर शासन करने दें, सब बातों में अपने आप को उसके अधीन करें, और जब वह हमें अपने आत्मिक दानों में से कोई दान दे तब व्यर्थ घमण्ड में न फूलें, वरन यह मानें कि हम उसके और भी अधिक ऋणी हैं, और इसी से अपने आप को दीन करने का अवसर लें। और यहाँ प्रसंगवश हम देखते हैं कि पोपवादियों की यह कैसी मूर्खता है कि वे परमेश्वर को रोम से बाँध देते हैं, इस बहाने से (जैसा वे कहते हैं) कि वह प्रेरितीय आसन है। मान लें कि ऐसा ही हो, यद्यपि हम नहीं जानते क्यों, क्योंकि सन्त पतरस के विषय में वे जो कुछ कहते हैं वह सब कहानियाँ और सरासर झूठ हैं। यह तो निश्चित है कि सन्त पौलुस रोम में बन्दी बनाकर रखा गया था, और यह अनुमान किया जा सकता है कि वहीं उसे मार भी डाला गया। देखो, रोम की सारी पवित्रता यही है कि वहाँ सुसमाचार को सताया गया, और वह शैतानी कालकोठरी शहीदों के लहू से अपवित्र की गई, मानो परमेश्वर के कोप को भड़काने के लिए, और सत्य के विरुद्ध लड़ने के लिए गठबन्धन करने के लिए, और जहाँ तक हो सके हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम और स्मृति को मिटा देने के लिए। देखो, रोम की सारी योग्यता यही है। परन्तु अब मान लें कि उनके पास वे अभिलेख होते जो यरूशलेम नगर के पास थे, जिनका उन्हें पवित्र शास्त्र में एक अक्षर भी नहीं मिलता। यह नहीं कहा गया कि परमेश्वर रोम नगर में राज्य करेगा या निवास करेगा, न यह कि वह माता कलीसिया कहलाएगा, और न यह कि उसकी कोई और प्रतिष्ठा या श्रेष्ठता होगी। सच है कि सन्त पौलुस कहता है कि रोमियों का विश्वास, (और वे तब मुट्ठी भर लोग ही थे,) उस समय सब कहीं प्रसिद्ध था, और उनकी बड़ी कीर्ति थी। क्योंकि तुम यह न समझो कि जो वहाँ तलवार लिए हुए थे वे मसीही थे: वे तो गुप्त रूप से इकट्ठा हुए थोड़े-से लोग थे। उन्हीं की सन्त पौलुस प्रशंसा और सराहना करता है: तो भी इससे यह नहीं निकलता कि कलीसिया रोम के सारे नगर में फैली थी, फिर भी, जो कुछ भी हो, हम देखते हैं कि यरूशलेम का क्या हुआ। सन्त पौलुस हमें बताता है कि वह हाजिरा या सीनै से भिन्न न था, जो एक अपवित्र और अशुद्ध स्थान है, ताकि उसकी पवित्रता पूरी तरह मिट गई, क्योंकि वह सुसमाचार की शुद्ध शिक्षा में स्थिर न रहा। इसलिए हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि जो परमेश्वर के सबसे निकट रहे हैं, और जिन से उसने अपने आप को सबसे अधिक घनिष्ठता से बाँटा है, वे परायों के समान झटक दिए जाएँगे, यदि वे [सत्य] की उस शुद्धता में बने न रहें जो वह अटूट बन्धन है जिससे हम अपने परमेश्वर के साथ एक किए जाते हैं। परन्तु निश्चय हम देखते हैं कि आज, हमारे प्रभु यीशु मसीह की शुद्ध शिक्षा रोम में न केवल झटक दी गई, पैरों तले रौंदी गई, तुच्छ जानी गई और उसकी हँसी उड़ाई गई, वरन आग और तलवार से क्रूरता से सताई भी गई, और अन्त में वहाँ कोई धर्म ही नहीं है। क्योंकि वह स्थान ऐसी गन्दगी और दुराचार से भरा है कि यदि कोई वहाँ जाए तो आश्चर्य है कि वह कभी परमेश्वर का भय या अपने में कोई भला बीज लेकर लौटे। इसलिए हम देखते हैं कि वह अधोलोक की कालकोठरी के समान है: और परमेश्वर करे कि जो वहाँ गए हैं उन्होंने वहाँ जाने को पाँव उठाने की अपेक्षा अपनी गर्दनें ही तोड़ ली होतीं। क्योंकि हम अभी देखते हैं कि फ्रांस देश उसी के द्वारा सब प्रकार की अभक्ति से संक्रमित हो गया है, यहाँ तक कि उनमें से अधिकांश सूअरों और कुत्तों से बेहतर नहीं रहे, और उनमें पशुओं से भी कम धर्म है। परन्तु फिर भी (जैसा मैंने पहले छुआ है) इससे हमें चेतावनी मिलती है कि हम भय और सावधानी से चलें, और भली-भाँति चौकस रहें कि जो वरदान हमने पाया है उससे हम वंचित और हीन न कर दिए जाएँ, यदि हम उसका दुरुपयोग करें, ऐसा न हो कि परमेश्वर अपना भयानक कोप हम पर उण्डेले, और हम यरूशलेम की रीति से निन्दा के दर्पण और नमूना बन जाएँ, जिसे सन्त पौलुस यहाँ मंच पर खड़ा करता है, यद्यपि वह पहले इतने ऊँचे सम्मान से सम्मानित था।

इसके अतिरिक्त, ध्यान दें कि अब्राहम के प्रतीक के अधीन परमेश्वर यहाँ अपने आप को अपने सब लोगों का पिता प्रकट करता है: और इस प्रकार तुम देखते हो कि हम परमेश्वर से उत्पन्न किए गए हैं, ताकि उसकी कलीसिया में हमारा स्थान हो। परन्तु हमारे लिए परमेश्वर को अपना पिता कहकर पुकारना ही पर्याप्त नहीं है, जब तक कि हम उस अविनाशी बीज के द्वारा ठीक रीति से फिर से उत्पन्न न किए जाएँ, जो हमारे लिए अनन्त जीवन और उद्धार की गारण्टी है। यदि पूछा जाए कि फिर यह कैसे सम्भव है कि हम परमेश्वर से उत्पन्न किए जाएँ और तो भी मानो एक अवैध बीज हों? उत्तर यह है कि हम अपने ही दोष और दुष्टता से परमेश्वर के बीज को, जो उसका वचन है, बिगाड़ देते हैं: क्योंकि सन्त पतरस ने उसे यही नाम दिया है।

परन्तु यह निश्चित है कि इस दृष्टि से कि वचन परमेश्वर से निकलता है, उसमें अपने भीतर भलाई ही भलाई है। और फिर हम देखते हैं कि वहाँ कैसी शुद्धता चमकती है, कि परमेश्वर की धार्मिकता, दया और भलाई के सब भण्डार वहाँ प्रकट किए गए हैं। तो तुम देखते हो कि परमेश्वर का वचन कैसी वस्तु है, और उसका स्वभाव क्या है। तो भी जब हम उसे अपनी कल्पनाओं से भ्रष्ट और झूठा बना देते हैं, और उसकी खिचड़ी पका देते हैं, तब भी हम परमेश्वर की सन्तान गिने जा सकते हैं, परन्तु केवल अवैध सन्तान के रूप में, जैसा कि (परमेश्वर की अनुमति से) भोजन के बाद और विस्तार से बताया जाएगा। क्योंकि तब सन्त पौलुस बताएगा कि यद्यपि इश्माएल सबसे बड़ा पुत्र था, तो भी अन्त में वह उस घर से निकाल दिया गया जिसमें उसने प्रमुख स्थान अपने ऊपर ले लिया था, चाहे वह अवैध ही था, और दासी से भी उत्पन्न हुआ था। तो ध्यान दें कि हमें केवल परमेश्वर के वचन के द्वारा शुद्ध विश्वास में उत्पन्न ही नहीं होना है, वरन परमेश्वर अपने पवित्र आत्मा से हमें प्रकाशित भी करे कि हम उसकी इच्छा को जानें, जैसी वह उसे हम पर प्रकट करता है। क्योंकि यदि हम उसके वचन को अपनी कल्पना के अनुसार बदल दें, और उसका भेस बदल दें: तो सच है कि वह अब भी परमेश्वर का बीज कहा जा सकता है, परन्तु वास्तव में वह वैसा नहीं रहता, हम उसका जो कुछ भी करें, क्योंकि वह अपनी ही सम्पूर्णता में बना नहीं रहता।

और यहाँ तुम उसका कारण देखते हो कि आज इतने लोग झूठ-मूठ अपने आप को मसीही क्यों कहते हैं: जैसे पोपवादी भली-भाँति मान लेंगे कि वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, और पवित्र शास्त्र को थामे रहने में सन्तुष्ट हैं। परन्तु इतना होते हुए भी प्रकट है कि वे बिलकुल बिगड़ गए हैं, और जहाँ तक शास्त्र की बात है, उन्हें उसे पूरे आदर के साथ ग्रहण करना चाहिए था, वहाँ वे उसे अपनी रुचि के अनुसार मोड़ लेते हैं, वरन उसका उपहास और ठट्ठा करते हैं, और (जैसा मैंने अभी कहा) उसके विरुद्ध यह निन्दा उगलते हैं कि वह मोम की नाक है, और मनुष्य उसे जिस ओर चाहें मोड़ सकते हैं: और इसके अतिरिक्त प्रकट है कि उन्होंने अपनी ही गढ़ी हुई बातों से सब कुछ उलट-पुलट कर दिया है। क्योंकि पोपवाद में मनुष्य परमेश्वर की सेवा किसे कहते हैं, उन्हीं बातों को छोड़ और क्या, जो मनुष्यों ने अपने ही मस्तिष्क से ठहरा दी हैं। परमेश्वर की आज्ञा और विधि के अनुसार अपने आप को चलाने का कहीं उल्लेख नहीं। परमेश्वर को उसके स्थान से धक्का देकर निकालना पड़ता है, और मनुष्य उस वस्तु को अपने ऊपर ले लेते हैं जो उसकी है, लोगों के विवेक को दासत्व में डालने और जो नियम उन्हें अच्छे लगें वे बनाने का अधिकार जताते हैं। परन्तु यह बहुत ही नीच और घोर भ्रष्टता है। दूसरी ओर, पोपवादी अपने विश्वास के अनुच्छेद कहाँ से लेते हैं? अपने ही आदेशों से, क्योंकि वे पवित्र शास्त्र से कोई निर्णय निकालने की परवाह नहीं करते। इसलिए उन्हें इसकी रत्ती भर परवाह नहीं कि पवित्र शास्त्र में क्या है: परन्तु यदि कोई बात सर्वसम्मत राय से मान ली और स्वीकार कर ली गई हो, तो वह उनके लिए स्वर्ग से आई दैववाणी के समान है। और हम यह भी देखते हैं कि जब वे अपनी किसी खिलौने जैसी बात को सिद्ध करना चाहते हैं, तो उनका पहला तर्क यह होता है कि वह स्वीकृत है, और प्राचीनता को प्रबल होना चाहिए, मानो इस विषय में कोई पूर्व-अधिकार हो: और इसके बाद वे पवित्र शास्त्र के कुछ पदों को बालों से घसीट लाते हैं, और उन्हें भी बात को आगे बढ़ाने में सहायक होना पड़ता है। परन्तु [जब सब कुछ कहा जा चुका] तब यह केवल सरासर ठट्ठा है, & प्रकट है कि वे जानबूझकर परमेश्वर के वचन को बिगाड़ते हैं। क्योंकि उनमें ऐसी मोटी और पशु-जैसी अज्ञानता है कि बच्चे भी इसके लिए उनके मुँह पर थूकें तो उचित होगा। इसलिए पोपवादी आज हमारे लिए उन बातों का एक सुन्दर दर्पण हैं जो यहाँ सन्त पौलुस में हैं: अर्थात् यह कि उनमें से बहुत लोग अपने आप को परमेश्वर की सन्तान और उसकी कलीसिया के घराने के सदस्य होने का दावा करते हैं, और फिर भी केवल अवैध टहनियाँ और बिगड़े हुए बीज के हैं, क्योंकि उस शुद्ध शिक्षा से पूरी तरह लगे रहने के बदले जो उन्हें स्वर्गीय जीवन की आशा में फिर से उत्पन्न कर सकती थी, वे अपनी ही मिलावटों में ऐसे लगे हैं कि उनमें अब कोई सम्पूर्णता नहीं रही।

परन्तु यह दिखाने के लिए कि जिस विषय की चर्चा सन्त पौलुस यहाँ करता है वह पोपवाद पर बहुत अधिक चरितार्थ होता है, हमें और आगे जाने की आवश्यकता नहीं। क्योंकि आज हमारा सबसे बड़ा झगड़ा किस विषय पर है, सिवाय स्वतंत्र इच्छा, पुण्य, प्रायश्चित्त-कर्मों और ऐसी ही अन्य बातों के? पोपवादी कहते हैं कि हम अपनी स्वतंत्र इच्छा से परमेश्वर के हाथ से अनुग्रह मोल ले सकते हैं, इसलिए नहीं कि हमें उसके पवित्र आत्मा की सहायता और सहारे की आवश्यकता नहीं, परन्तु इसलिए कि (वे कहते हैं) परमेश्वर और हमारे बीच एक प्रकार का मेल-जोल है, ताकि परमेश्वर एक भाग का काम करे और हम दूसरे का। इस प्रकार वे हमें परमेश्वर के साथी बना देते हैं, और जैसे हमारा बल परमेश्वर की ओर से सहारा न पाए तो बहुत निर्बल होता, वैसे ही (वे कहते हैं) परमेश्वर का अनुग्रह निष्फल हो जाता, यदि हम अपने उस ओर प्रवृत्त होने से उसे प्रभावी न बनाते। और इसी पर वे फिर अपने पुण्य गढ़ते और खड़े करते हैं: उनके बीच और कोई बात नहीं होती, सिवाय परमेश्वर को अपना ऋणी बनाकर स्वर्गराज्य मोल लेने की: & तब उनके पुण्य और प्रायश्चित्त-कर्म आगे आते हैं कि उनके किए हुए सब दोषों का मोल चुकाएँ। तो तुम देखते हो कि सार रूप में पोपवादी क्या बकबक और बड़बड़ करते हैं। इसी पर वे यह निष्कर्ष निकालते हैं कि यह कहना निन्दा है कि परमेश्वर की व्यवस्था असम्भव है, और हम उसे पूरा करने के योग्य नहीं: वे कहते हैं कि कोई मनुष्य ऐसा नहीं जो जब चाहे उससे पूरी तरह छूट न सके। छाया में बैठकर इस प्रकार बकवास करना उनके लिए सहज बात है: परन्तु जो ऐसा कहते हैं, वे दुष्ट गुण्डे, पियक्कड़, शपथ खानेवाले, और सब प्रकार की नीचता और उपद्रव में लगे हुए लोग हैं। क्योंकि लोग भली-भाँति जानते हैं कि भिक्षुओं, मुण्डे हुओं, और उनकी सारी टोली, उनके कूड़े-कचरे और कीड़ों की पवित्रता कैसी है। परन्तु हम अपनी ओर से कहते हैं कि हम पाप के बन्धुआ दास उत्पन्न हुए हैं, और शैतान के अत्याचार के अधीन ऐसे कठोर बन्धनों में जकड़े हुए हैं कि हम भले काम करने का एक भला विचार भी नहीं कर सकते, वरन सब बुराई की ओर निरन्तर बढ़ते जाते हैं, जैसे गधा सदा अपना जूआ या बोझ अपने साथ ढोता है, और फिर भी हम स्वेच्छा से ही पाप नहीं करते ऐसा नहीं।

परन्तु हमारी जो भी दशा हो, हम पाप में ऐसे डूबे हुए हैं कि स्वभाव से हम परमेश्वर को अप्रसन्न करने के सिवाय कुछ नहीं कर सकते, और इसलिए उसे विवश होकर अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें छुड़ाना और स्वतंत्र करना पड़ता है। इसके अतिरिक्त, हम कहते हैं कि परमेश्वर की व्यवस्था का पूरा किया जाना असम्भव है, और वह हमें हमारा कर्तव्य इसलिए दिखाती है कि हमें दोषी ठहराए और हमारे मुँह बन्द करे, और हमें परमेश्वर के सामने अभागे अपराधियों के रूप में आने पर विवश करे, ताकि जो पाप हमने किए हैं उनके लिए उसके हाथ से अनुग्रह पाएँ, और हमें लज्जा से भ्रम में डाल दे, ताकि हम अपने आप को दोषी मान लें, और हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह के द्वारा परमेश्वर के हाथ से उद्धार पाना चाहें। अन्त में, हम कहते हैं कि उसके सामने अपने आप को धर्मी ठहराना हमारी सारी सामर्थ्य से परे की बात है, और वह हमारी घटियों को इसलिए पूरा करता है कि वह हमें कठोरता से नहीं छानता, न हमसे लेखा लेने बैठता है: और जब हमने उसे अप्रसन्न किया हो, तब उसके लिए उस बलिदान के सिवाय, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह ने चढ़ाया, और कोई प्रायश्चित्त नहीं, न उसके लहू में सिर से पाँव तक अपने आप को डुबो देने के सिवाय कोई और शुद्धि। तो तुम देखते हो कि पोपवादियों के हमारे विरुद्ध विवादों के सम्बन्ध में सन्त पौलुस की शिक्षा को किस प्रकार व्यवहार में लाना है। क्योंकि यह निश्चित है कि उनकी सारी डींग और परमेश्वर के नाम का झूठा दिखावा करने पर भी, और यह कहने पर भी कि वे उसकी सन्तान हैं क्योंकि वे पवित्र शास्त्र से उत्पन्न हुए हैं: वे दिखाते हैं कि उनकी माता हाजिरा या सीनै है, और इसलिए वे जन्म से दास हैं, और अपने ही गले में रस्सी बाँधते हैं क्योंकि उनकी इच्छा परमेश्वर के पास जाकर उस स्वतंत्रता को पाने की नहीं जो वह उन्हें देता है, परन्तु वे उस वस्तु को जो केवल परमेश्वर की है अपने लिए हथिया लेना चाहते हैं, और अपने ही पुण्यों से अपने आप को धर्मी ठहराना, और व्यवस्था को अपने आप से पूरा करना चाहते हैं। इसलिए वे दास सन्तान हैं, और दास ही बने रहते हैं, और अन्त में घर से पूरी तरह निकाल दिए जाएँगे। जहाँ तक हमारी बात है, हम आगे देखेंगे कि जो शिक्षा हम मानते हैं उसकी परख क्या है और वह अपने साथ क्या लाती है: वह यह है कि हमारे पास कोई और स्वतंत्रता नहीं सिवाय उसके जो सुसमाचार की शिक्षा के द्वारा हमें दी गई है, जैसा कि हमारा प्रभु यीशु मसीह यूहन्ना के आठवें अध्याय में दिखाता है, कि हमें स्वतंत्र करना उसी का विशेष कार्य है, और हमें दण्ड से निकालना वह विशेष अधिकार है जो उसके पिता परमेश्वर ने उसे दिया है। इसलिए जब हम अपने प्रभु यीशु मसीह के पास आते हैं, और उसी में अपनी सब घटियों का उपाय खोजते हैं, यह जानते हुए कि उसी के द्वारा हम उस व्यवस्था के जूए से छुड़ाए गए हैं जिसे हम उठा नहीं सकते थे, और जिसने न केवल हमें झुकाया, वरन अधोलोक की तलहटी तक दबा डाला: तब वही सच्चा बीज है जो हमें फिर से उत्पन्न करके पूर्ण स्वतंत्रता में परमेश्वर की सन्तान बनाता है, न केवल इस संसार में ऐसा गिने जाने के लिए, वरन उसके हाथ से उसके स्वर्गदूतों के सामने भी ऐसा स्वीकार किए जाने के लिए, ताकि अन्त में हम उस मीरास तक पहुँचें जो हमारे लिए इतने महँगे मोल पर खरीदी गई है, और जिसे हम अपनी सामर्थ्य से नहीं पा सकते, परन्तु उसके द्वारा जिसका वह है, जो उसे हमें बाँटता है, जैसे वह उसे हमें प्रतिदिन अपने सुसमाचार के द्वारा देता है।

परन्तु अब आइए हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने दोषों को मानते हुए गिर पड़ें, उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उन्हें उससे अधिक अच्छी तरह अनुभव कराए जितना हमने अब तक किया है, ताकि हम सच्चे पश्चाताप में अधिक से अधिक बढ़ते जाएँ, कि हमारा उसके पास आना पूरी दीनता के साथ, बिना कपट के हो, अपनी दुर्दशा से लज्जित होकर, और हमारे प्रभु यीशु मसीह के सिवाय और कहीं उपाय न ढूँढ़ते हुए: और कि क्योंकि हमारे भले परमेश्वर ने हमें अपनी सन्तान करके अपनाया है और अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे हृदयों में अपने लेपालकपन के अनुग्रह पर मुहर लगाई है, हम उसके सुसमाचार की शुद्धता में दृढ़ बने रहें, अपनी ओर से कुछ न जोड़ें, और अपनी व्याख्याओं से उसे न बिगाड़ें, और वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें विश्वास की आज्ञाकारिता में ऐसा थामे रखे, कि जैसे उसने अपने आप को हमारे प्रति उदार दिखाना आरम्भ किया है, वैसे ही हम भी उसी पूर्णता की ओर निरन्तर बढ़ते जाएँ, कभी किनारे न मुड़ें। और इसलिए आओ हम सब कहें, हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, हमारे स्वर्गीय पिता। इत्यादि।

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