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पैंतीसवाँ उपदेश, जो पाँचवें अध्याय पर पाँचवाँ है — गलातियों 5:14-18
जो पाँचवें अध्याय पर पाँचवाँ है।
14 क्योंकि सारी व्यवस्था इस एक ही वचन में पूरी होती है, अर्थात् यह कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।
15 पर यदि तुम एक दूसरे को काटते और फाड़ खाते हो, तो चौकस रहो कि कहीं एक दूसरे का सत्यानाश न कर दो।
16 पर मैं कहता हूँ, आत्मा के अनुसार चलो, तो तुम शरीर की लालसा किसी रीति से पूरी न करोगे।
17 क्योंकि शरीर आत्मा के विरोध में लालसा करता है, और आत्मा शरीर के विरोध में; और ये एक दूसरे के विरोधी हैं, इसलिए कि जो तुम करना चाहते हो वह न करने पाओ।
18 पर यदि तुम आत्मा के चलाए चलते हो, तो व्यवस्था के अधीन न रहे।
हम देखते हैं कि मूसा ने, व्यवस्था को संक्षेप में समेटने के अभिप्राय से, ताकि हम जान लें कि हमें क्या सिखाया और बताया गया है, कहा है कि परमेश्वर चाहता है कि हम उससे प्रेम करें; और यह उचित भी है कि हम पहले उसी से लगे रहें और उसी से जुड़ें, और तब हमारे बीच मित्रता का ऐसा बन्धन हो कि हम एक देह के अंगों के समान आपस में जुड़े रहें।
और हमारे प्रभु यीशु मसीह ने भी कहा है कि इसी से उसके चेले पहचाने जाएँगे; इस प्रकार उसने दिखाया कि उसने ऐसी कोई शिक्षा नहीं चलाई जो उस शिक्षा के विपरीत हो जो परमेश्वर ने प्राचीन काल के लोगों को सदा दी थी। और इसी कारण सन्त पौलुस अब कहता है कि व्यवस्था की पूर्ति इसी वचन में है कि हम अपने पड़ोसियों से प्रेम रखें।
परन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि इस बीच परमेश्वर को भुला देना चाहिए (जैसा मैं तुम्हें पहले बता चुका हूँ), क्योंकि यही उचित है कि वह सबसे पहले रखा जाए और अपनी सब सृष्टि से ऊपर माना जाए, यहाँ तक कि उसके लिए हमें अपने माता-पिता, अपनी पत्नी और बच्चों, और इस संसार में जो कुछ भी है, उसे भी भूल जाना चाहिए। तथापि परमेश्वर से प्रेम रखना और अपने पड़ोसियों से उनके स्तर के अनुसार प्रेम रखना परस्पर विरोधी बातें नहीं हैं।
क्योंकि जब हर मनुष्य प्रेम में चलता है, तब वह इसी से उस प्रेम को प्रकट करता है जो वह अपने परमेश्वर से रखता है, जैसा मैं पहले बता चुका हूँ। और इसी कारण मैं इन बातों पर और नहीं ठहरता। संक्षेप में, यदि हम अपने ही में लगे रहते हैं, तो यह इस बात का चिह्न है कि हम नहीं जानते कि परमेश्वर का जूआ उठाना क्या है; क्योंकि हमारा अपना स्वभाव हमें इसी ओर घसीटता है।
अब (जैसा हम शीघ्र देखेंगे) मनुष्य पूरी तरह सब बुराई की ओर झुके हुए हैं, और साथ ही वे अपनी सब अभिलाषाओं की लगाम ढीली छोड़ देते हैं, वे परमेश्वर से युद्ध करते हैं, और उनका सारा जीवन एक बलवे के सिवाय और कुछ नहीं है; इससे प्रकट होता है कि शैतान हमारी सब भावनाओं पर ऐसा अधिकार जमाए हुए है कि परमेश्वर हमारे बीच तब तक कुछ वज़न नहीं रखता, जब तक हम अपने स्वभाव की सारी बातों को कुचल न दें।
अब हम जानते हैं कि जो अपने पड़ोसियों से प्रेम रखता है, वह अपना स्वार्थ नहीं ढूँढ़ता, और न अपने ही में लगा रहता है। इसलिए यह इस बात का सच्चा और निश्चित प्रमाण है कि हम परमेश्वर की आज्ञा मानने के इच्छुक हैं, और अपने जीवन को उसके वचन के अनुसार चलाना चाहते हैं। हमारे प्रभु यीशु मसीह भी जब संक्षेप में बताना चाहता है कि उसकी शिक्षा क्या है, तो इसी बिन्दु से आरम्भ करता है: वह कहता है, यह अपने आप का इन्कार करना या त्याग देना सीखना है।
क्योंकि जब तक हम अपनी ही राह पर चलते हैं, तब तक हमें अवश्य ही परमेश्वर की इच्छा के बिलकुल विपरीत जाना पड़ता है। इसलिए सन्त पौलुस का इस पद में यह कहना निराधार नहीं कि सारी व्यवस्था इसी बात में समाई है कि हम अपने पड़ोसियों से प्रेम रखें। परन्तु हमें यह ध्यान देना चाहिए कि इस "पड़ोसी" शब्द से परमेश्वर का आशय हमारे कुटुम्बियों और मित्रों से नहीं है, जिनसे हमें कुछ लाभ या सुविधा की आशा हो, या जिन्होंने हमारे हाथों कुछ बदला पाने के योग्य काम किया हो; परन्तु वह चाहता है कि हम उस सामान्य सम्बन्ध पर दृष्टि रखें जो उसने हमारे बीच ठहराया है।
इसलिए हम सब उसके स्वरूप में रचे गए हैं, और हम पर उसकी छाप है। इसके अतिरिक्त हम सब एक ही स्वभाव के हैं, और यही हमें सच्ची एकता और भाईचारे में बाँधे रखे। परन्तु बहुत से लोग अपने आप को इसके अयोग्य ठहरा लेते हैं: क्योंकि कुछ लोमड़ियों के समान चतुराई और द्वेष से भरे हैं; कुछ सिंहों के समान अहंकार से भरे हैं; कुछ फाड़नेवाले भेड़ियों के समान हैं जो सब कुछ निगल जाने के सिवाय और कुछ नहीं चाहते; और कुछ [बन्दरों के समान] छल-कपट और हानि पहुँचाने से भरे हैं।
ये सब (जहाँ तक उनसे हो सके) अपने आप को पड़ोसियों की पंक्ति और संगति से काट लेते हैं: परन्तु इस मामले में हमें परमेश्वर की व्यवस्था का ध्यान रखना चाहिए। और यद्यपि मनुष्य अपनी ओर से पड़ोसी गिने जाने और माने जाने के योग्य नहीं ठहरते, तथापि उनसे प्रेम रखने में हम दिखाते हैं कि यही उचित है कि परमेश्वर हमारी अपनी दुष्टता पर भारी पड़े। इसलिए हम देखते हैं कि जो हमारे बैरी हैं और हमें निगल जाने का यत्न करते हैं, वे भी परमेश्वर की ठहराई हुई व्यवस्था के कारण पड़ोसी ही रहते हैं।
और इसी कारण हमारे प्रभु यीशु मसीह हमें बताते हैं कि जिसने हमारे साथ भलाई या सेवा की हो उसे बदला चुकाना, या उनसे प्रेम करना जो हमें अच्छे लगते हैं या जिनसे हमें कुछ लाभ की आशा है, प्रेम नहीं है। क्योंकि अन्यजाति भी इतना तो करते हैं, परन्तु वे यह परमेश्वर और उसकी व्यवस्था का पालन करने के लिए नहीं करते; और जब हम अपने ही लाभ का ध्यान रखते हैं, तो वह प्रेम का कोई अंश नहीं, वरन् अपने आप से प्रेम करना है।
क्योंकि प्रेम का लक्ष्य परमेश्वर है और वह सहभागिता या संगति जो हमारे बीच होनी चाहिए, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ। अब हम देखते हैं कि जब हम उनकी भी भलाई करने का यत्न करते हैं जो उसके योग्य नहीं, तब यह परमेश्वर से प्रेम रखने की इच्छा का सच्चा प्रमाण होता है। फिर, "अपने समान" यह वाक्य जोड़ने का यह आशय नहीं कि हर एक पहले अपने आप से प्रेम करे, और तब उसके बाद अपने पड़ोसी से।
परन्तु हमारे प्रभु का अभिप्राय उस घाव को चीरना था जो हमें प्रेम में जीने से रोकता है: और वह यह है (जैसा मैं तुम्हें पहले बता चुका हूँ) कि यदि मनुष्य अपने आप से इतना प्रेम न करते जितना करते हैं, तो सब मनुष्यों में भला प्रेम और मेल होता: परन्तु क्योंकि हम अपने आप से प्रेम करने में इतने डूबे हैं, और उस भावना की अति हमें ऐसा अन्धा कर देती है कि वह हमारी सारी बुद्धि, न्याय और खराई को हर लेती है, इसलिए परमेश्वर कहता है कि हमें अपने पड़ोसियों से अपने समान प्रेम रखना चाहिए। क्योंकि यदि यह स्पष्ट रूप से न कहा जाता, तो हम अपने पड़ोसियों से प्रेम करने की बहुत बातें करते, और कहते कि उनसे प्रेम रखना चाहिए: परन्तु सब कुछ इन कपटियों की रीति पर केवल दिखावा होता, जो यह दावा करते हैं कि वे अपने बैरियों की कोई हानि नहीं चाहते, वरन् उनका भला चाहते हैं, और अपने मन में उनका भला करवाने को तैयार भी हैं।
परन्तु आओ हम उस कसौटी पर आएँ जो परमेश्वर ने यहाँ ठहराई है, और हर एक अपने भीतर देखे, और तब निर्णय करे कि वह अपने आप से अत्यधिक प्रेम करता है या नहीं, अथवा जो प्रेम वह अपने पड़ोसियों से रखता है वह कहीं अत्यन्त फीका और ठण्डा तो नहीं।
संक्षेप में, यहाँ परमेश्वर ने उस कपट का उपचार करना चाहा जिससे हम बहुत अधिक अन्धे हो गए हैं। साथ ही उसने मनुष्यों को जगाना भी चाहा, कि जब यह कहा जाए कि तुम्हारे लिए एक दूसरे से प्रेम करना ही पर्याप्त नहीं, वरन् तुम्हें अपने पड़ोसियों से अपने समान प्रेम रखना है, तो वे अपनी चापलूसी करना छोड़ना सीखें। और इससे हम देखते हैं कि हम व्यवस्था की सिद्धता से कितनी दूर भटके हुए हैं, और यह कि परमेश्वर की आज्ञा मानने के लिए हमें अपने ही स्वभाव से लड़ना आवश्यक है।
तब मसीहियों का सच्चा अभ्यास क्या है? यह कि वे परमेश्वर के प्रति अपना कर्तव्य निभाने में अपने पाप-स्वभाव और निर्बलता को पहचानें और उस पर विलाप करें, और इसी कारण दिन-प्रतिदिन अपने ऊपर जय पाने का परिश्रम और यत्न करें, कि हमारी अभिलाषाएँ हम पर प्रबल न हों, वरन् परमेश्वर का ऐसा प्रभुत्व हो कि अपने आप से प्रेम करने के बदले हम जहाँ-जहाँ वह बुलाए वहाँ भलाई करने में अपने आप को लगाने का यत्न करें।
फिर, सन्त पौलुस ने व्यवस्था की सिद्धता, और उस लक्ष्य को दिखाकर जिस पर हमें अपने जीवन को परमेश्वर के वचन के अनुसार चलाने के लिए दृष्टि रखनी है, यह जोड़ा कि यदि मनुष्य कुत्तों और बिल्लियों के समान एक दूसरे को काटें और झपटें, तो अन्त में उनका नाश अवश्य होगा। और यह उन्हें और लज्जित करने के लिए है जो अपने झगड़ों और कलहों में ऐसे रम गए हैं, और सब बुद्धि के विरुद्ध ऐसे आँखें मूँद लेते हैं कि उन्हें इसकी चिन्ता नहीं कि परिणाम क्या होगा, बस बदला लेने की उनकी लालसा पूरी हो जाए।
और सन्त पौलुस कहता है कि इससे तुम क्या सीखोगे? स्वभाव ही से तुम अपने आप को बचाए रखना चाहते हो: क्योंकि यह तो हम में और पशुओं में भी समान है। तुम देखते हो कि जिस पशु में न बुद्धि है न समझ, वह भी अपने आप को बचाने का यत्न करता है और हानि से दूर भागता है। तब जो मनुष्य भले और बुरे में भेद करते हैं, उनके लिए तो और भी उचित है कि वे अपने आप को बनाए रखने और सुरक्षित तथा स्वस्थ बने रहने का वैसा ही यत्न करें।
परन्तु अब देखें कि घृणा, झगड़े, कलह, बैर, गाली-गलौज और ऐसी ही बातों का परिणाम क्या है। परिणाम यह है कि अन्त में हम सब नाश हो जाएँगे। तब अवश्य ही शैतान ने उनकी सारी बुद्धि हर ली होगी जो अपनी अत्यधिक घृणा में इस प्रकार उबल पड़ते हैं और किसी रीति से शान्त नहीं किए जा सकते।
संक्षेप में, सन्त पौलुस दिखाता है कि यद्यपि हमें डराने के लिए परमेश्वर की कोई व्यवस्था न होती कि हम उसे अप्रसन्न न करें, तौभी यदि हम सुविचारित होते या हम में विवेक की एक बूँद भी होती, तो हम में अपने आप पर कुछ रोक होती, और हम एक दूसरे से इस प्रकार झगड़ते और कलह न करते जैसा अब करते हैं। परन्तु हम जान-बूझकर और मानो पक्के इरादे से अपने विनाश में दौड़ते हैं: और यह स्वभाव के भी विरुद्ध है।
तब तुम देखते हो कि जब मनुष्य एक बार भड़क उठते हैं तो कितने शैतानी हो जाते हैं, यहाँ तक कि वे अपना ही नाश ढूँढ़ने लगते हैं। और हम अपने बैरियों से घृणा क्यों करते हैं? इसलिए कि हम अपनी भावनाओं की लगाम ढीली छोड़ना चाहते हैं। पर हमारा बहाना देखो: हम कहते हैं, अरे, उन्होंने मेरी हानि चाही, उन्होंने उसका प्रबन्ध किया, और कर भी दिया। बहुत अच्छा, तो फिर? (जैसा कहावत है) एक शैतान से दो शैतान बनाने में तुझे क्या मिलेगा? या उस आग को और तेज़ जलाने का यत्न करने में, जो पहले ही बहुत अधिक सुलग चुकी है? इससे उसका क्रोध दुगुना ही होगा और वह पहले से और उग्र हो जाएगा।
जब ऐसा है, तो तू इस मामले को अपने दोनों के विनाश से क्यों निपटाने चलता है? तौभी यदि हम केवल इसी कारण ऐसा करें, तो पर्याप्त न होगा: क्योंकि इसमें हम बहुत शारीरिक ठहरेंगे। क्योंकि यदि मैं सब घृणा से इसलिए बचूँ कि उससे मुझे हानि पहुँचेगी, तो मैं फिर भी अपना ही लाभ ढूँढ़ता हूँ। परन्तु परमेश्वर चाहता है कि हम अपनी ओर से सदा आँखें मूँदे रहें, और सब बैर-भाव को झटक दें, और सब झगड़ों को पैरों तले रौंद डालें। और क्यों? इसलिए कि वह स्वयं हम पर पूरा प्रभुत्व रखे।
और यद्यपि मनुष्य अपनी दुष्टता के कारण हमें अपने से घृणा करने का कारण देते हैं, तौभी क्योंकि परमेश्वर ने हमें आपस में जोड़ा है, हम उसी एकता में बने रहें। इसलिए जो आदर हमें परमेश्वर को देना है, वह यह है कि हम अपने आप का इन्कार करें, ताकि हम उनसे भी प्रेम रखें जो हम से बैर रखते हैं। और जैसा मैं तुम्हें पहले बता चुका हूँ, यह चेतावनी अनावश्यक नहीं है। क्योंकि सन्त पौलुस का अभिप्राय उन लोगों को लज्जित करना है जो पहली ही चोट में ऐसे आग-बबूला हो जाते हैं कि बुद्धि न उन्हें शान्त कर सकती है न रोक सकती है।
इसलिए जब मनुष्य इतने गर्म हों और सब जोखिम की परवाह किए बिना अपने आप को झोंक दें, तब उनके स्वभाव के अनुकूल बातें उनके सामने रखनी चाहिए, ताकि वे लज्जित हों और परमेश्वर की आज्ञाकारिता की ओर खिंच आएँ। तो सन्त पौलुस का यहाँ अभिप्राय यह है कि वह हमें धीरे-धीरे अपनी उन सब भावनाओं पर जय पाने की ओर ले जाए जो बहुत ही बेसुरी हो गई हैं, ताकि जब कभी हम किसी से घृणा करने या उससे बदला लेने को उकसाए जाएँ, तब हम अपने मन में यों विचार करें: इसका अन्त इसके सिवाय और क्या होगा कि हम कुत्तों और बिल्लियों के समान एक दूसरे को खा जाएँगे?
और जब हम यह विचार कर लें, तब हमें और आगे बढ़ना चाहिए, वह यह कि यद्यपि हमारी घृणा से हमें कितना ही लाभ क्यों न हो, यद्यपि हम अपने बैरियों पर सदा प्रबल रहें, और यद्यपि हम अपनी सब युक्तियों और प्रयासों को सफल कर सकें: मैं कहता हूँ, यद्यपि अपनी भावनाओं को खुली छूट देने से हमें लाभ भी हो, तौभी यह परमेश्वर के क्रोध को भड़काना ही होगा, क्योंकि हम उसके लिए इतना भी न कर सके कि उनसे प्रेम रखें जो उसके योग्य नहीं।
जब बात ऐसी है, तो हम डरें और पूरी दीनता के साथ अपने आप को अधीन करें। और क्योंकि यह कठिन बात है, इसलिए हम और भी पुरुषार्थ से लड़ें, जब तक परमेश्वर प्रभुत्व न पा ले, और हम, जैसा मैंने कहा, अपने आप का इन्कार न कर दें, अपना सारा स्वभाव त्यागकर, ताकि हम उस पवित्र एकता को बनाए रखें जो उसने हमारे बीच तब ठहराई जब उसे यह अच्छा लगा कि हम एक देह हों।
अब इस पर सन्त पौलुस यह जोड़ता है कि यदि हम चाहते हैं कि हमारे शरीर की अभिलाषाएँ हम पर राज्य न करें, तो हमें आत्मा के अनुसार चलना चाहिए। फिर, यह लड़ाई बहुत कठिन है: ऐसी कि हम वह नहीं करते जो करना चाहते हैं: परन्तु यद्यपि परमेश्वर ने हमें सुधारा है और हमारे मर्म को छुआ है, ऐसा कि हम सब बातों में उसे प्रसन्न करना चाहते हैं, तौभी हम अभी सिद्धता तक नहीं पहुँचेंगे, क्योंकि हमारा अपना स्वभाव सदा हमें बुराई की ओर ले जाएगा।
परन्तु आगे बढ़ने से पहले हमें यह ध्यान देना चाहिए कि "शरीर" शब्द से सन्त पौलुस का अर्थ वह सब है जो मनुष्य में है, और जो कुछ हम अपने जन्म के साथ लाते हैं। जैसा हमारे प्रभु यीशु मसीह ने यूहन्ना के तीसरे अध्याय में पर्याप्त रीति से बताया है। वह कहता है, जो शरीर से जन्मा है वह शरीर है। "आत्मा" शब्द से उसका आशय मनुष्य के प्राण से नहीं, वरन् उस अनुग्रह से है जो परमेश्वर हमें तब देता है जब वह हमें अपनी आज्ञाकारिता में लौटा लाता है, और हमारे दोषों को और जो कुछ उसके वचन के विपरीत है उसे सुधारता है।
और पवित्र शास्त्र में मनुष्यों को "शरीर" नाम से पुकारना तिरस्कार के रूप में है। परन्तु इस पद में यह दोष और भ्रष्टता का चिह्न है। कभी-कभी जब शास्त्र शरीर की चर्चा करता है, तो वह कहता है: ठीक है, मनुष्य शरीर के सिवाय और क्या हैं? अर्थात् सड़न के सिवाय? फिर, सब प्राणी घास हैं। और फिर, मिस्री क्या हैं? वे शरीर हैं, आत्मा नहीं।
तब तुम देखते हो कि इस "शरीर" शब्द के अधीन मनुष्यों को उनकी अपनी निर्बलता सिखाई जाती है, और उन्हें समझाया जाता है कि वे मिट्टी और धूल, कीड़े और कीड़ों का भोजन मात्र हैं। और यह सबसे पहले उन्हें दीन करने के लिए है। परन्तु जब शरीर को आत्मा के सामने रखा जाता है, तब मनुष्यों को उनकी पहली दशा में नहीं लिया जाता जैसे वे परमेश्वर के द्वारा रचे गए थे: वरन् यह दिखाने के लिए है कि वे बिगड़े हुए और संक्रमण तथा दुष्टता से भरे हैं, ऐसे कि उनमें ठीक-ठीक भेद करने की कोई रुचि ही नहीं, वरन् वे अपनी सब अभिलाषाओं में पूरी तरह उलटे हो गए हैं।
तब तुम देखते हो कि जब हमारा प्रभु यीशु मसीह कहता है कि हम जन्म ही से शरीर हैं, तो उसका आशय यह है कि हम अन्धे अभागे हैं जिनमें परमेश्वर के पास आने की कोई बुद्धि है ही नहीं: और यद्यपि उसने हम में भले-बुरे का भेद करने की समझ रखी है, तौभी हम पशु-समान हो गए हैं, और उसके पास नहीं आ सकते, और जो भी बुद्धि हम में है वह हमें निरुत्तर करने के काम ही आती है: और अन्त में यह कि हम पूरी बुराई के सिवाय और कुछ नहीं चाहते, और जितनी हमारी भावनाएँ हैं उतने ही शत्रु हैं जो सब धार्मिकता से लड़ते हैं।
देखो, पवित्र आत्मा हमारे अस्त्र-शस्त्र कैसे प्रकट करता है, जबकि अधिकतर लोग अपनी स्वतन्त्र इच्छा और अपने गुणों पर डींग मारते हैं: कहा गया है कि हम में पूर्ण भ्रष्टता के सिवाय कुछ नहीं, और यही परमेश्वर से बैर है, और हमें उसकी धार्मिकता से अलग करती है।
यह सच है कि हमारे प्राण या मन को प्रायः "आत्मा" नाम से पुकारा जाता है: क्योंकि "आत्मा" शब्द एक अदृश्य सत्ता को बताता है, जिसे देह के समान देखा या छुआ नहीं जा सकता। स्वर्गदूत आत्माएँ हैं, और दुष्टात्माएँ भी। तथापि ये बिगड़ी हुई आत्माएँ हैं और परमेश्वर से अलग हो गई हैं, ऐसी कि उनमें पूरी दुष्टता के सिवाय कुछ नहीं।
इसलिए हमारे प्राण भी आत्माएँ हैं, परन्तु पाप से संक्रमित आत्माएँ, जो तब हुआ जब आदम के पतन से हम बदल गए, गिर गए और हम में परमेश्वर का स्वरूप बिगड़ गया। अब ऐसी दशा में उसके नवीनीकरण की आवश्यकता थी: और वही नवीनीकरण "आत्मा" कहलाता है, अर्थात् जब परमेश्वर अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें सुधारता और नई सृष्टि बनाता है।
इसका पहला पहलू यह है कि हम ज्योति पाएँ ताकि हम उन बातों को समझें जो स्वभाव से हम से छिपी थीं: क्योंकि विश्वास परमेश्वर का विशेष दान है, इसलिए कि मनुष्य के लिए उन बातों को समझना असम्भव है जो उसकी आत्मा के उद्धार की हैं, जब तक परमेश्वर उस में कार्य न करे।
तब तुम देखते हो कि विश्वास आत्मा का दान है (जैसा हम आगे उचित समय और स्थान पर देखेंगे), ऐसा कि जैसे हम में परमेश्वर के पास आने और अपने आप को उसकी इच्छा के अनुसार ढालने की एक भी भली प्रेरणा नहीं, जब तक वह हमारा संचालन न करे: वैसे ही क्योंकि उसने हमें गोद लिया है, वह हमें अपना पवित्र आत्मा देता है, जो सच्चा चिह्न है जो हमें परमेश्वर की सन्तान ठहराता है।
संक्षेप में, जो कुछ परमेश्वर अपने चुने हुए और विश्वासी लोगों में उनके दुष्ट और पापमय स्वभाव को सुधारने के लिए डालता है, वह सब "आत्मा" शब्द में समाया है।
अब सन्त पौलुस कहता है कि हमें आत्मा के अनुसार चलना चाहिए, और तब हम अपने शरीर की अभिलाषाओं को पूरी न करेंगे। इससे वह उन्हें चेतावनी देता है जो अपने ही दोषों में अत्यधिक मग्न रहते हैं और यह बहाना बनाकर कि हम उसका सामना नहीं कर सकते, बुराई करने की छूट ले लेते हैं। यहाँ वह उन्हें जगाता है, और बताता है कि वे निरुत्तर हैं: और यद्यपि वे बुराई में पड़े हैं, तौभी उन्हें उसका उपचार ढूँढ़ना चाहिए। और वह क्या है? निश्चय हम उसे अपने में न पाएँगे, परन्तु परमेश्वर इस विषय में पूर्ति करेगा, हमें अनुग्रह देकर कि हम अपनी सब अभिलाषाओं और दुष्ट भावनाओं से इस प्रकार लड़ें कि उसका पवित्र आत्मा हम में राज्य करे और उन पर प्रबल हो। परमेश्वर ऐसी प्रतिज्ञा करके हमें धोखा न देगा: इसलिए आओ हम रोगियों के समान वैद्य के पास उसके पास शीघ्र जाएँ।
संक्षेप में, सन्त पौलुस उस बहाने पर दृष्टि रखता है जो मनुष्य इस विषय में बनाएँगे और बनाने के आदी हैं। वे कहते हैं, हम तो शारीरिक हैं, और प्रेम तो स्वर्गदूतों की सिद्धता है: तब हम उसे कैसे निभा सकते हैं, जब हम सब बुराई की ओर झुके हैं और हमारी अपनी पापमयता हमें बहा ले जाती है? यदि पाप हम में राज्य न करता, तो कहा जा सकता था कि हमें परमेश्वर से जुड़ना चाहिए: परन्तु हमारी निर्बलता बहुत बड़ी है। तब तुम देखते हो कि बहुत से लोग क्या बहाना बताते हैं, और समझते हैं कि इससे बच जाएँगे। परन्तु सन्त पौलुस कहता है: यह सच है कि हम में सब दुष्टता की खाई के सिवाय कुछ नहीं, और जब तक मनुष्य अपनी ही भावनाओं में इस रीति से ऊँघते रहेंगे, तब तक उन्हें अवश्य शैतान की सेवा करनी पड़ेगी, और वे दिन-प्रतिदिन एक से बढ़कर एक पशु बनते जाएँगे: परन्तु उपचार ढूँढ़ो। परमेश्वर तुम्हें अपने सुसमाचार के द्वारा अपने पास बुलाता है, वह तुम्हें अपना पवित्र आत्मा देता है। इसलिए बुराई को दोषी ठहराओ, ताकि तुम उस पर शोक करो, और परमेश्वर तुम में ऐसा कार्य करेगा कि वह तुम्हारी सब भावनाओं पर प्रबल हो जाए। तब तुम देखते हो कि इस पद में सन्त पौलुस का क्या अभिप्राय था।
तथापि इसके साथ ही उसका अभिप्राय उन पर, जिनके विरुद्ध वह विवाद करता है, एक आड़ा प्रहार करना भी था। क्योंकि मैं तुम्हें पहले बता चुका हूँ कि वे धोखा देनेवाले, जिन्होंने उस देश की कलीसिया को घबराया था, बहुत सी तुच्छ और सर्वथा अनावश्यक बातों में लगे थे, यहाँ तक कि उन्होंने सारी पवित्रता व्यवस्था की विधियों पर टिकाई थी। अब यह सच है कि परमेश्वर का कुछ समय के लिए विधियों को ठहराना व्यर्थ नहीं था: क्योंकि वे हमारे प्रभु यीशु मसीह के आने तक छायाएँ थीं। परन्तु अब जब वह आ चुका है, तो वे निष्फल बातें हैं, और ऐसी बातें हैं जो हमें वैसे चलने से रोकती हैं जैसे चलना चाहिए। क्योंकि विधियाँ और छायाएँ प्राचीन पूर्वजों को हमारे प्रभु यीशु मसीह तक पहुँचाने की सहायक थीं। परन्तु यदि हम आज भी उन्हें पकड़े रहें, तो वे हमें यीशु मसीह की ओर से पीठ फिरवा देंगी: इसलिए सन्त पौलुस ने पहले जो दिखाया कि ऐसी बातों का पालन अब किसी मूल्य का नहीं, वह निराधार नहीं, और वह आगे इस पर और भी कहेगा।
अब क्योंकि उसे उनके विरुद्ध विवाद करना था जो विधियों को आगे बढ़ाते थे, वह उनसे कहता है, आत्मा के अनुसार चलो। मानो वह कहता, विचार करो कि परमेश्वर की सच्ची सेवा क्या है: वह दीपकों में नहीं, न धूप में, न खतने में, न दिनों के मानने में, न कुछ विशेष प्रकार के भोजन से परहेज़ करने में है। ये वे बातें नहीं हैं जिनमें परमेश्वर चाहता है कि उसके लोग ठहरें: परन्तु अपनी आत्मिक सेवा पर। इसलिए तुम आत्मा में चलो, तब तुम शरीर की अभिलाषाओं को पूरी न करोगे। तथापि जैसा मैं तुम्हें पहले बता चुका हूँ, बात इतनी ही नहीं है। परन्तु साथ ही सन्त पौलुस परोक्ष रीति से इस ओर भी संकेत करता है कि वे धोखा देनेवाले जिनसे वह लड़ रहा था, उन छोटी और हल्की बातों में फँसे थे जो इस संसार की आरम्भिक शिक्षाएँ और छोटे बच्चों की प्रशिक्षा के समान हैं। इसलिए क्योंकि वे उनमें पूरी तरह उलझे थे, वह गलातियों से कहता है कि तुम्हें आत्मा में चलना चाहिए।
फिर (जैसा मैं पहले बता चुका हूँ) यहाँ वह हमें प्रेम में जोड़ने का सच्चा उपाय बताता है। क्योंकि जब तक हम [अपनी ही भावनाओं के विरुद्ध] पुरुषार्थ से न लड़ें, तब तक हमारे लिए परमेश्वर के पास आना और सब बैर भूल जाना असम्भव है। और इसका उपचार (जैसा मैंने कहा) परमेश्वर में है। इसलिए हमें उससे प्रार्थना करनी चाहिए कि वह अपने पवित्र आत्मा का अनुग्रह हम में अधिकाधिक बढ़ाए, और तब हम पाएँगे कि शरीर चाहे कितना ही प्रचण्ड हो, चाहे कितने ही बड़े बुलबुले और उबाल उठाए, वरन् चाहे वह ऐसे जंगली पशु के समान दिखाई दे जो वश में नहीं आ सकता: मैं कहता हूँ, हम पाएँगे कि वह परमेश्वर के आत्मा, और उस अनुग्रह से जो हमें ऊपर से दिया जाएगा, अधिक बलवन्त न होगा, जो हमें लौटा लाने और हमें अपने परमेश्वर के जूए और आज्ञाकारिता के अधीन रखने में समर्थ होगा। संक्षेप में, सन्त पौलुस बताता है कि हम अपनी बुरी अभिलाषाओं का सामना क्यों नहीं कर पाते, इसका कारण हमारी अपनी लापरवाही और ठण्डापन है, क्योंकि हम में से हर एक व्यर्थ आत्म-सान्त्वना से अपनी ही दुष्टता में अपने आप को पालता है, और हम परमेश्वर के पास उस लगन और उत्साह से नहीं जाते जैसा आवश्यक था।
तब आओ हम यह निष्कर्ष निकालें कि जब मनुष्य पाप करते हैं तो उनके लिए कोई बहाना नहीं। क्योंकि वे उसमें आनन्दित होते हैं, और चाहते हैं कि परमेश्वर उन्हें उसमें लोटने दे, और (जहाँ तक उनसे हो सके) वे उसके उपचार और सुधार से भागते हैं, वरन् वे उसमें ऐसे मतवाले हैं कि परमेश्वर का क्रोध भड़काने की उन्हें चिन्ता नहीं, क्योंकि वे किसी रीति से सिखाया जाना सह नहीं सकते। यह सच है कि कभी-कभी वे मुँह से तो खूब दावा करते हैं कि वे बड़ी प्रसन्नता से चाहेंगे कि उनका स्वभाव और झुकाव बदल जाए: परन्तु फिर भी वे परमेश्वर से यह ठहराव करना चाहते हैं कि वह उन्हें जैसे हैं वैसा ही छोड़ दे, कुछ भी न बदले; उस रोगी के समान, जिसे जब उसका रोग सताता है तो कहता है, "अरे, मैं तो चंगा होना चाहता हूँ": परन्तु इतने पर भी जब वैद्य के हाथ से सम्मति लेने और परहेज़ ठहराए जाने की बात आती है, तो वह उसे नहीं मानता। वैद्य उसे भली सम्मति देता है और उसके रोग को चंगा करने की औषधियाँ तैयार रखता है: तथापि रोगी बहाना बनाता है, कहता है, "अरे साहब, मेरा मन ऐसा करने को नहीं मानता।" यदि रोगी पीने पर ही अड़ जाए, और गर्मी के बदले ठण्डा ले, और ऐसा अड़ियल हो कि उसे रोका न जा सके, परन्तु अपने स्वास्थ्य के लिए जो कुछ दिया जाए उसे ठुकरा दे और पागलों के समान व्यवहार करे: तो वह चाहे कितना ही दावा करे कि वह चंगा होना चाहता है, पर प्रकट इसका ठीक उलटा होता है। ठीक वैसा ही उनके साथ है जो परमेश्वर के पास जाकर उससे प्रार्थना करते हैं कि वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा उनका ऐसा संचालन करे कि वे बदल जाएँ और अपनी सब अभिलाषाओं को भूलकर उन्हें पैरों तले रौंद डालें: और फिर भी इस बीच उन्हीं में बने रहने और लोटने पर अड़े हैं। तब तुम देखते हो कि सार रूप में हमें क्या स्मरण रखना है।
तथापि यह निश्चित है कि यद्यपि हम परमेश्वर से गम्भीरता से प्रार्थना करते हैं, और हम में से हर एक अपनी बुरी भावनाओं को दबाने का यत्न करता है, तौभी संसार जैसा भी चले, हम में निर्बलताएँ बनी रहेंगी। मैं कपटियों की बात नहीं कर रहा, मैं परमेश्वर की सच्ची सन्तानों की बात कर रहा हूँ। क्योंकि जिन्होंने सब प्रकार की सिद्धता में सबसे अधिक उन्नति की है, वे भी परमेश्वर की ओर मानो लँगड़ाते हुए ही चलते हैं, और वे वह नहीं करते जो चाहते हैं, जैसा सन्त पौलुस आगे शीघ्र ही जोड़ेगा, और जैसा वह रोमियों के सातवें अध्याय में विस्तार से दिखाता है। तथापि जैसे ही विश्वासी अपना रोग अनुभव करते हैं, वे परमेश्वर में उसका उपचार ढूँढ़ते हैं, वरन् गम्भीरता से और निष्कपट होकर ढूँढ़ते हैं, और जान लेते हैं कि उसकी सहायता उनकी अपनी सब बुरी भावनाओं से बढ़कर है। इसी के अनुसार सन्त पौलुस कहता है, "तुम शरीर की अभिलाषाओं को पूरी न करोगे।" वह यह नहीं कहता कि हमारे सारे जीवन भर शैतान हमें कोई बुराई करने के लिए न परखेगा, या यह कि हमें उकसावे बहुत न होंगे, क्योंकि हमारे शरीर के पास सदा हमें बुराई के लिए उभारने के डंक रहेंगे। इसलिए हम सब दोषों की ओर परखे जाएँगे: परन्तु परमेश्वर के अनुग्रह से हम उनका सामना करेंगे। और यह बात निराधार नहीं जोड़ी गई: क्योंकि यदि हमें यह निश्चय न होता कि परमेश्वर हमारी सेवा को, चाहे वह दोषपूर्ण हो और हम निर्बल हों, और हम उस साहस से न दौड़ें जैसा आवश्यक था, तौभी ग्रहण करता है: तो हम में से हर एक मानो पस्त हो जाता, और अन्त में निराशा में गिर पड़ता, जैसा बहुतों के साथ होता है, जो अपने जीवन की जाँच करने पर अपने आप को इतना अधूरा और परमेश्वर से अब तक दूर पाकर समझते हैं कि उन्होंने कुछ भी उन्नति नहीं की, और इसी कारण झुँझलाने और कुढ़ने लगते हैं, और अन्त में निपट पागल हो जाते हैं। निश्चय हमें उस सिद्धता की ओर आगे बढ़ना और उसके लिए निरन्तर परिश्रम करना चाहिए: परन्तु हमारी दशा जैसी भी हो, हम परमेश्वर को ढूँढ़ना न छोड़ें, चाहे बहुत सी रुकावटों और बाधाओं के कारण हम उस तक पहुँच न सकें, और चाहे हम कभी-कभी चूक जाएँ, और हमारी बुरी अभिलाषाएँ हमें पीछे खींचें, रोकें, और हम पर भारी पड़ें (जैसा मैंने कहा): तौभी हम अपनी राह न छोड़ें, चाहे कभी-कभी हम डगमगा जाएँ।
तब यद्यपि स्वभाव से हम अपने परमेश्वर के पास आने के लिए उमंग से अपनी राह पर बने नहीं रह सकते, तौभी यही पर्याप्त है कि हम अपने शरीर की अभिलाषाओं को पूरी न करें: क्योंकि यद्यपि हम उन्हें अनुभव करते हैं, और यद्यपि वे हम में बहुत प्रबल हैं, तौभी यदि हम उन पर जय पाएँ तो परमेश्वर इसे ग्रहण करता है, और हमारी सारी चूक क्षमा कर देता है। इसी के अनुसार सन्त पौलुस विश्वासियों को उत्साहित करता है कि वे अपने मन को हद से अधिक न गिराएँ, और कहता है कि शरीर हम पर राज्य नहीं करता। वह यह नहीं कहता कि बुरी अभिलाषाएँ और पापमय भावनाएँ अब हम में नहीं रहतीं: क्योंकि जब तक परमेश्वर हमें अपने पास न ले ले, तब तक हम उनसे कभी मुक्त न होंगे। तब जब तक हम इस संसार से बाहर नहीं हैं, तब तक हम में सदा दाग और धब्बे रहेंगे, और हमें अपने पापों और निर्बलताओं की गठरी के नीचे झुकना पड़ेगा, और यह इसलिए है कि हम और भी दीन हों, और यह दिखाया जाए कि हमारा जीवन निरन्तर युद्ध है।
फिर, यद्यपि पाप हम में बसा है, तौभी उसे राज्य नहीं करना चाहिए, परन्तु परमेश्वर के आत्मा को उस पर प्रबल होना चाहिए, और यह तब होगा जब हम उत्कट लगन से परमेश्वर की ओर भागें, और उससे प्रार्थना करें कि वह उस बुराई का उपचार करे जिसे सुधारना हमारी शक्ति से बाहर है, और हम में अपने आत्मा के दानों को ऐसे बढ़ाए कि हम उन सब बातों पर जय पाएँ जो हमें मानो नीचे दबाए रखती हैं।
तब तुम देखते हो कि इस पद में उस कथन से सन्त पौलुस का क्या अभिप्राय था। और वह इसके साथ यह जोड़ता है कि आत्मा शरीर के विरोध में लालसा करता है और शरीर आत्मा के विरोध में, ऐसा कि हम वह नहीं करते जो करना चाहते हैं। यहाँ उसका अभिप्राय हमें जगाना है कि हम चौकसी रखें, वरन् जैसा कहते हैं, अपने कवच सदा अपनी पीठ पर रखें, और शत्रु के विरुद्ध तैयार रहें।
यदि हम सब दोषों से मुक्त होते, और सब मनुष्य बिना विरोध के वही करते जो परमेश्वर अपने वचन से आज्ञा देता है: तो हमें बहुत ज़ोर लगाने की आवश्यकता न होती, जैसे स्वर्ग के स्वर्गदूतों को नहीं, जिन्हें लड़ने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि वे जो कुछ आज्ञा पाते हैं उसे करने को तत्पर हैं। तब क्योंकि स्वर्गदूतों में कोई विद्रोह नहीं, इसलिए जब उन्हें परमेश्वर की सेवा में लगना होता है तो उनमें कोई संघर्ष भी नहीं: क्योंकि वे पूरी तरह उसी ओर झुके और प्रवृत्त हैं।
परन्तु सन्त पौलुस हमें जताता है कि हमें परमेश्वर की सेवा में आलसी नहीं होना चाहिए। और क्यों? क्योंकि हमारा स्वभाव सदा पीछे खींचता है, और जब तक हमें विवश और बाध्य न किया जाए, हम कभी भलाई से प्रेम न करेंगे। इसलिए जब मनुष्य भलाई में आगे बढ़ना चाहें, तो उन्हें अपने आप को विवश और बाध्य करना चाहिए, और प्राणघातक शत्रु के समान युद्ध बनाए रखना चाहिए।
और हमारे शत्रु कौन हैं? निश्चय शैतान प्रधान है, और वह हम पर भयंकर आक्रमण करता है। परन्तु इसके साथ ही हमारे अपने सब विचार, हमारी अपनी सब भावनाएँ, हमारी सब इच्छाएँ, सब प्राणघातक शत्रु हैं जो हमें विनाश तक पहुँचाने का परिश्रम करते हैं। अब यदि वे परमेश्वर से लड़ती हैं, तो निश्चय वे हमारे उद्धार के भी विरुद्ध हैं।
तब हम देखते हैं कि यहाँ सन्त पौलुस का अभिप्राय मानो खतरे की घण्टी बजाना है, यह दिखाने के लिए कि यदि मसीही सुस्त या आलसी हों, और अपनी सुविधा से परमेश्वर की सेवा करना सोचें: तो वे अपने आप को धोखा देते हैं, और क्योंकि उन्हें बिना अन्त और विराम के युद्ध पर युद्ध सहना है, और शैतान दिन-रात उन्हें परखता है, कभी छल और विश्वासघात से घूमता है, और कभी खुले बल से उन पर चढ़ आता है कि उन्हें राह से हटा दे: इसलिए उन्हें भली भाँति शस्त्र बाँधकर मुठभेड़ में उतरना, और अन्त तक डटे रहना चाहिए, और जब तक परमेश्वर उन्हें संसार से न उठा ले, तब तक किसी शान्ति या युद्ध-विराम की आशा न रखनी चाहिए।
तुम देखते हो कि सार रूप में सन्त पौलुस की शिक्षा का आशय क्या है। और यह उपदेश हमारे लिए अत्यावश्यक है, क्योंकि अधिकतर लोग समझते हैं कि यदि परमेश्वर की सेवा के लिए थोड़ी-बहुत भक्ति या इच्छा हो तो पर्याप्त है: और यद्यपि वे बहुत मलिनता में लोटते हैं, उनके लिए सब बराबर है: और कुछ और लोग यह देखकर कुड़कुड़ाते हैं कि अपने जीवन को भली रीति से चलाना कितना कठिन है।
और यह कैसे सम्भव है? परमेश्वर हम पर हद से अधिक दबाव डालता प्रतीत होता है, क्योंकि वह यह नहीं देखता कि हमें क्या भाए, वरन् उसे दोषी ठहराता है। पर हम अपने आप को उस में कैसे लगा पाएँगे? क्योंकि हमारा झुकाव उसकी इच्छा के बिलकुल विपरीत जाता है। तब प्रतीत होता है कि जब वह हम पर इतना दबाव डालता है तो हमारा उपहास करता है: और वह हमें उससे भिन्न स्वभाव क्यों नहीं दे देता?
देखो, कितने ही मनुष्य अपनी पापमयता को देखकर परमेश्वर की निन्दा करते हैं। तथापि इसलिए कि हम में से कोई सो न जाए, न यह समझे कि जब उसने कोई मार्ग आधा-अधूरा पकड़ लिया तो उसने वह सब पूरा कर दिया जिसकी परमेश्वर आज्ञा देता है, और न बिलकुल ही राह से बाहर धकेल दिया जाए: सन्त पौलुस कहता है कि शरीर आत्मा के विरोध में लालसा करता है, और आत्मा शरीर के विरोध में।
यह कहकर कि शरीर लालसा करता है, वह हमें जताता है कि हम बिना बेचैनी के परमेश्वर की सेवा कभी न कर सकेंगे, क्योंकि हमारे मार्ग में बहुत सी रुकावटें होंगी, और हम निरन्तर बुराई की ओर परखे जाएँगे। वरन् जब हम पूरे निश्चय से अपने आप को पूरी तरह परमेश्वर के वचन और धार्मिकता के अधीन करने पर ठाने हों, तब भी शैतान के पास उसी समय हमें इधर या उधर खींचने की अपनी रस्सियाँ होंगी।
फिर, वह हमें इस रीति से चकित कर देगा कि हमारी शारीरिक इच्छाएँ हमारे लिए बाधा बनी रहेंगी, और केवल इतना ही नहीं: वरन् हमें बिलकुल उलटी दिशा में पीछे खींचेंगी, ऐसे कि जब परमेश्वर हमें एक ओर बुलाता है, तब हम क्रोध के आवेश में दूसरी ओर बहा लिए जाएँगे। अब जब शरीर आत्मा के विरोध में इस रीति से लालसा करता है, तो आओ हम पुरुषार्थ से लड़ने का निश्चय करें, और ऐसा करना हमें बुरा न लगे।
यद्यपि हमें चाहिए कि हम स्वर्गदूतों के समान होने की कामना करें, ऐसे कि हम में कोई संघर्ष न हो, वरन् हमारी सारी सामर्थ्य परमेश्वर की सेवा में लगे, तथापि जब कभी हमें भलाई करने से रोका जाए, तो हम अपने आप को विवश करना और अपने आप को बन्दियों के समान रखना सीखें: और यद्यपि यह हमें बहुत अप्रिय लगे, तौभी हम और आगे बढ़ते रहें, ताकि परमेश्वर हम पर प्रभुत्व पा ले।
आओ हम अपने आप से घृणा करना, अपने आप से अप्रसन्न होना, और अपनी ही दुष्टता से बदला लेना सीखें, जैसा सन्त पौलुस कुरिन्थियों की दूसरी पत्री में कहता है। क्योंकि पश्चाताप का अर्थ यह है कि जब मनुष्य अपने सारे जीवन को बिगड़ा हुआ देखें, तो वे अपने आप को दोषी ठहराएँ, अपने आप से घृणा करें, और अपने आप से बदला लें, और उसके विरुद्ध पवित्र क्रोध का प्रयोग करें।
जब हमारे बैरी हमारी कुछ हानि करें तो उनसे बदला लेने की इच्छा करने के बदले, हमें अपने आप पर खीजना और क्रोधित होना चाहिए, वरन् जब हम अपने आप को परमेश्वर की इच्छा के अनुसार नहीं ढाल पाते तो अपने दोषों के लिए अपने आप को दण्ड देना चाहिए।
परन्तु क्योंकि हम निराश हो सकते हैं, और हर कोई उत्तर दे सकता है, "हाय, हम इस रीति से कैसे लड़ें? हमारा बल कहाँ है? क्योंकि हम में निर्बलता के सिवाय कुछ नहीं, और फिर हम देखते हैं कि शैतान ऐसा सामर्थी और बलवन्त शत्रु है कि हम कभी उसे वश में नहीं कर सकते, और हमारी अभिलाषाएँ पागल पशुओं के समान हैं, बिना बुद्धि, बिना मर्यादा, बिना रोक के: जिस कारण हम किसी चोट के पड़ने से पहले ही मानो हार चुके हैं।"
सन्त पौलुस कहता है कि आत्मा भी शरीर के विरोध में लालसा करता है: अर्थात् जबकि हम अपने स्वभाव से बुराई करने को उकसाए जाते हैं, और शैतान हमें आगे धकेलता है, तब हमारे लिए आवश्यक है कि हम उन सब परीक्षाओं के विरुद्ध, जिनसे हम चुभोए और उभारे जाते हैं, और भी अधिक वीरता से लड़ें। और ऐसा करने में हमें अच्छी सहायता मिलती है। क्योंकि लक्ष्य किसके हाथ आएगा? प्रभुत्व और विजय किसकी होगी? क्या उस भ्रष्टता की जो हम में है? या परमेश्वर की सामर्थ्य की? इसलिए जब कभी परमेश्वर अपने पवित्र आत्मा का अनुग्रह प्रकट करना चाहे, वह सदा बलवन्त होगा और मैदान जीतेगा, चाहे बात में कितनी ही कठिनाई क्यों न हो।
तब आओ हम परमेश्वर का इतना आदर करें कि भरोसा रखें कि वह हमें थामेगा और हमें युद्ध जिताएगा, और आओ हम उसकी ध्वजा के नीचे साहस से आगे बढ़ें, परन्तु आदर और सावधानी से उसे पुकारते हुए। क्योंकि (जैसा मैं पहले दिखा चुका हूँ) सन्त पौलुस का अभिप्राय बात को बहुत कठिन बनाना नहीं था, क्योंकि मनुष्य आलस्य की ओर बहुत झुके हुए हैं। उसका अभिप्राय मनुष्यों को थपकियाँ देकर सुलाना नहीं: नहीं, वरन् वह हमें पहले यह बताता है कि परमेश्वर की ठीक सेवा करने के लिए हमें अपने ही शत्रु बनना और अपने ही विचारों और अपनी सब भावनाओं से लड़ना चाहिए।
परन्तु अब, क्योंकि हम चकित हो सकते हैं और हम में से हर एक पीछे हट सकता है, इसलिए कि हमारे लिए इसे पूरा करना असम्भव है: वह कहता है, "क्या परमेश्वर का आत्मा प्रबल न होगा? हाँ, पर वह हमारे पास नहीं है।" और इसका दोष किस पर है, सिवाय इसके कि हम उसके पास नहीं जाते जो उसे हमें देने को तैयार है, वरन् उतनी मात्रा और अंश में जितना वह हमारे लाभ के लिए जानता है? हमारा प्रभु भविष्यद्वक्ता यशायाह के द्वारा पुकारता है, "अरे सब प्यासे लोगो, पानी के पास आओ, बिना रुपये और बिना दाम दाखमधु और दूध मोल लो: क्योंकि मैं तुम्हें उदारता से उतना देने को तैयार हूँ जितना तुम्हें चाहिए।"
देखो परमेश्वर कैसे बोलता है। इसी प्रकार हमारा प्रभु यीशु मसीह भी हमें बताता है कि वही सच्चा सोता है जिससे हमें भरना चाहिए, और हम उसकी परिपूर्णता से तृप्त होंगे, जैसा वह यूहन्ना के सातवें अध्याय में कहता है कि जो कोई उसके पास आएगा वह भर पेट जल पीएगा, वरन् अपने भीतर ऐसा कुआँ पाएगा जिससे नदियाँ फूट निकलेंगी, ऐसा कि उसके पास न केवल अपने काम के लिए पर्याप्त होगा, वरन् जल उसके पेट से बह निकलेंगे, यदि वह यीशु मसीह को अपने ऊपर अपना आत्मा उँडेलने दे, क्योंकि वह ऐसा करने को उत्सुक और तैयार है।
तब यद्यपि परमेश्वर का आत्मा हम से बहुत दूर है: तौभी हम उसमें से पर्याप्त पाएँगे, और परमेश्वर उसे हमें देने को तैयार है, और वह देगा क्योंकि उसने प्रतिज्ञा की है, और क्योंकि वह हमें इतनी कोमलता से बुलाता है, हम उतना पाएँगे जितना हमारे काम आएगा। इसलिए जैसे यहाँ हमें चेतावनी दी जाती है कि लड़ें, वरन् पूरे बल और ज़ोर से, वैसे ही दूसरी ओर हमें दिखाया जाता है कि हमारी विजय अत्यन्त निश्चित और अचूक है, बशर्ते हम परमेश्वर के हाथ से सहायता ढूँढ़ें, अपनी निर्बलता को पहचानें और दीनता से मान लें कि हम कुछ नहीं कर सकते।
यदि हम अपने परमेश्वर के पास जाएँ और उससे चाहें कि वह हमारा वैद्य हो: तो उसका पवित्र आत्मा इतना निर्बल न होगा, वरन् वह हमारे शरीर की सब वासनाओं पर जय पाएगा, और हमें वह अनुग्रह देगा कि हमारे विरुद्ध खड़ी की गई सब लड़ाइयों से पार हो जाएँ। और अब फिर सन्त पौलुस कहता है कि विश्वासी वह नहीं करते जो वे चाहते हैं: और यह उन्हें और साहस देने के लिए है, ताकि हम आगे बढ़ना सीखें, यद्यपि हम उन सब बातों को पूरी तरह और सिद्धता से पूरा नहीं कर सकते जो परमेश्वर हमें दिखाता है।
और यह आवश्यक है जैसा मैंने कहा: नहीं तो हम कपटी बन जाते, और अपने आप को यह समझाते कि कुछ भी बुरा नहीं है।
परन्तु ऐसा घमण्ड असह्य होता: जिस प्रकार के कुछ लोग हम देखते हैं, जो मानो झबरे कुत्ते हैं, जिनमें न परमेश्वर का भय है न धर्म, और फिर भी वे उपदेश देते हैं कि विश्वासियों को सिद्ध होना चाहिए। और यह शैतानी निन्दा है, और ऐसी जिससे हमें घृणा करनी चाहिए। कुछ और हैं जो यह देखकर निराश हो जाते हैं कि वे परमेश्वर के प्रति अपना कर्तव्य नहीं निभा सकते। इसलिए कि हम न कपटी हों और न हताश, सन्त पौलुस कहता है कि हम वह सब नहीं करते जो हम चाहते हैं।
परन्तु हमारी दशा जैसी भी हो, हमें उस बात की ओर लौटना चाहिए जिसे उसने कुछ ही समय पहले छुआ था: अर्थात् यह कि जब पवित्र आत्मा हमारा संचालन करता है तब हम शरीर की अभिलाषाओं को पूरी नहीं करते। तब पहले यह समझें कि हम बुराई की ओर ऐसे झुके हैं कि कोई हमारे विचारों और भावनाओं से भलाई की एक बूँद भी निचोड़ नहीं सकता, वरन् वे हमें उससे पूरी तरह और बिलकुल अलग कर देती हैं। इसे एक बिन्दु के रूप में ध्यान रखो।
दूसरे, आओ हम परमेश्वर पर भरोसा रखें कि हमारे दोषों, वरन् विद्रोहों के होते हुए भी वह हमें अपनी आज्ञाकारिता में चलाएगा। क्योंकि हम उसके पवित्र आत्मा से संचालित होंगे, जो हमें अपने भीतर ऐसा कार्य अनुभव कराएगा कि हम अपनी भली दौड़ में आगे बढ़ने से न रोके जाएँगे, न बाधित होंगे, वरन् उस लक्ष्य की ओर जिस पर हमारी दृष्टि है, बढ़ते चले जाएँगे।
तीसरे, यदि हम अब भी अपने में कुछ विरोध देखें, और यह कि हमें और अधिक विवश किए जाने की आवश्यकता है, क्योंकि बहुत सी उलटी बातें हमें रोकती हैं, यहाँ तक कि हम गिर भी पड़ें, या कहीं भटक भी जाएँ: तो भी हम निराश न हों, वरन् परमेश्वर की पवित्र बुलाहट का अनुसरण करें, और अपने दोषों को प्रभावशाली रीति से काट डालना सीखते रहें।
और इसे पूरा करने के लिए, आओ हम उन पर शोक करें और परमेश्वर के सामने उन्हें स्वेच्छा से मान लें। परन्तु हमारी दशा जैसी भी हो, हम यह न समझें कि उसने हमें त्याग दिया है, चाहे हमारा जीवन कितना ही अधूरा क्यों न हो।
तब तुम देखते हो कि हमें यह स्मरण रखना है कि जितनी अपूर्णताएँ और निर्बलताएँ हम अब भी अपने में अनुभव करते हैं, वे हमारे इस यत्न को न रोकेंगी कि हम अपने आप को अपने परमेश्वर के अधीन करें और उसके भय में अधिकाधिक ढालें, और फिर भी इस बीच हम अपनी आँखों के आगे चापलूसी का कोई परदा न रखेंगे जिससे अपने आप को अन्धा करें, वरन् हम हृदय से शोकित होंगे, यह मानते हुए कि हम उसके अत्यन्त ऋणी हैं, और फिर भी उस सिद्धता की आकांक्षा करते रहेंगे जिसकी ओर हमें अपने जीवन भर आगे बढ़ना है, और साथ ही यह स्वीकार करते हुए कि हम सब खोए हुए और दण्ड के भागी हैं, जब तक कि वह अपनी असीम भलाई से हमारे प्रभु यीशु मसीह के कारण हमें न सहे।
परन्तु अब आओ हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने दोषों को मानते हुए गिर पड़ें, और उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उनका अधिकाधिक अनुभव कराए, ऐसा कि हम उन्हें केवल अपने मुँह से ही न मानें, वरन् ऐसे सच्चे पश्चाताप और शुद्ध उत्साह से भी स्पर्श पाएँ कि हम अपने आप को पूरी तरह उसे दे देने और अपने में जो कुछ अतिरिक्त है उसे काट डालने का यत्न करें, और यही हमें उसकी पवित्र इच्छा के अनुसार ढलने, और ऐसी एकता और मेल से उसकी सेवा करने की ओर ले जाए कि हम एक मन और एक मुँह से उसकी बड़ाई करने लगें, और इस प्रकार दिखाएँ कि हम उस गोद लिए जाने में उससे ठीक-ठीक जुड़े हैं जो वह अपने सुसमाचार के द्वारा हमें दिखाता है, जिससे वह अपने आप को हमारा पिता प्रकट करता है, जैसे हम उसकी सच्ची सन्तान होना चाहेंगे। और इसलिए हम सब कहें, "हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, स्वर्गीय पिता," इत्यादि।
