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ग्यारहवाँ उपदेश, जो दूसरे अध्याय पर पाँचवाँ है — गलातियों 2:14-16
ग्यारहवाँ उपदेश,
जो दूसरे अध्याय पर पाँचवाँ है।
14 पर जब मैंने देखा कि वे सुसमाचार की सच्चाई के अनुसार सीधी चाल नहीं चलते, तो मैंने सब के सामने पतरस से कहा, "जब तू यहूदी होकर अन्यजातियों की नाईं चलता है और यहूदियों की नाईं नहीं, तो तू अन्यजातियों को यहूदी बनने के लिये क्यों विवश करता है?
15 हम जन्म से यहूदी हैं, और अन्यजातियों के समान पापी नहीं।
16 तौभी यह जानकर कि मनुष्य व्यवस्था के कर्मों से नहीं, पर केवल यीशु मसीह पर विश्वास करने से धर्मी ठहरता है, हम ने भी मसीह यीशु पर विश्वास किया, कि हम व्यवस्था के कर्मों से नहीं, पर मसीह पर विश्वास करने से धर्मी ठहरें; क्योंकि व्यवस्था के कर्मों से कोई प्राणी धर्मी न ठहरेगा।
यह सदा से एक प्रचलित कहावत रही है कि जो व्यवस्था मनुष्य दूसरों पर थोपता है, उसे उसे स्वयं भी मानना चाहिए। क्योंकि यह न उचित है न न्यायसंगत कि मनुष्य स्वयं तो बच निकले और बोझ दूसरे लोगों के कन्धों पर डाल दे। इसी कारण हमारे प्रभु यीशु मसीह ने शास्त्रियों और फरीसियों को धिक्कारा, कि वे दीन लोगों पर भारी बोझ लादने में तनिक नहीं हिचकते थे, और इस बीच स्वयं जो चाहते थे वही करने की छूट ले लेते थे। और प्रायः कपट के कारण ऐसा होता है कि जो मनुष्य अपने पड़ोसियों के प्रति सब प्रकार की कठोरता में रूखा और अतिकठोर होता है, वही चाहता है कि दूसरे उसे सह लें और उसे छूट दें। परन्तु यदि हमें अपने पड़ोसियों पर उनका कर्तव्य निभाने का दबाव डालना ही है, तो सच्चा और स्वाभाविक क्रम यह माँग करता है कि हम में से हर एक पहले अपने आप से आरम्भ करे। तब देखो, यह कितना प्रत्यक्ष कपट है कि मनुष्य अपने पड़ोसियों को तो सहना नहीं चाहता, उनसे उनके कर्तव्य का पूरा-पूरा हिसाब माँगता है, और इस बीच स्वयं घोर अपराध करता है और किसी सुधार को सहने को तैयार नहीं होता।
हाँ, कभी-कभी ऐसा होता है कि हम दूसरों के खर्च पर भलेमानस बनना चाहते हैं। यहाँ संत पतरस के विषय में भी ऐसा ही हुआ। क्योंकि अन्यजातियों को रीति-विधि की व्यवस्था मानने पर विवश करना उस पूर्वोक्त कपट से नहीं उपजा था कि स्वयं जो चाहे करने की छूट ले ली जाए और दूसरों को ऐसी बात के लिए बाध्य करके परमेश्वर के सामने बिलकुल निर्दोष ठहरने की इच्छा की जाए, परन्तु दोहरेपन से उपजा था, क्योंकि वह अपने ही देशवासियों को प्रसन्न करने के लिए अत्यधिक उत्सुक था। वह तो पहले ही अन्यजातियों की रीति पर चलने की छूट ले चुका था, अर्थात् व्यवस्था की रीति-विधियों का पालन छोड़ चुका था। क्योंकि (जैसा मैं पहले छू चुका हूँ) संत पौलुस यहाँ अविश्वासियों या परमेश्वर को तुच्छ जाननेवालों की बात नहीं कर रहा, परन्तु उन अन्यजातियों की बात कर रहा है जो सुसमाचार के ज्ञान में फिराए गए थे और परमेश्वर की सेवा करना चाहते थे, वह भी पुरानी रीति-विधियों के बिना। अब संत पतरस ने स्वयं को उनकी सामान्य चाल के अनुसार ढाल लिया था, फिर भी वह यहूदी था; इसलिए, जैसा मैं पहले कह चुका, उसने अन्यजातियों पर उससे कड़ी लगाम चढ़ाकर उनके साथ बहुत अन्याय किया जैसी लगाम उसने अपने ऊपर नहीं रखी थी। उसने यह अपने लिए नहीं किया, पर दोनों ओर खेला, जैसे वे लोग करते हैं जो सब दलों की कृपा बनाए रखना चाहते हैं और किसी को अप्रसन्न करने से कतराते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि उसे डाँटने और सारी कलीसिया के सामने लज्जित करने का उचित कारण था। अब शेष यह है कि उसने अपना दोष स्वीकार किया; इस उदाहरण से हमें नम्रता सीखनी चाहिए। अर्थात् हम में से कोई ऐसा नहीं जो डगमगा न सकता हो, क्योंकि हम में ऐसी सिद्ध बुद्धि नहीं कि हम घोर दोषों में भी न गिर सकें; और यद्यपि हम इसे जान नहीं पाते, तौभी निर्बलता के कारण हम कभी-कभी भटक जाते हैं; तो कम से कम जब हमारा सुधार किया जाए तब हम उसका उपहास न करें, जैसा बहुत से घमण्डी और हठीले लोग करते हैं, जो डाँटे जाने पर या तो अपना विष उगलते हैं या मन ही मन कुढ़ते रहते हैं।
सबसे पहले संत पतरस के उदाहरण से हम यह सीखें कि हम में कोई भी पवित्रता, बुद्धि और सद्गुण में इतना आगे नहीं बढ़ा कि चूक न सके। इसलिए जो हमसे कहा जाए उसे धीरज से सुनें, कि हमारा उससे भला हो; और जब हम देखें कि हम पर उचित दोष लगाया और हमें दोषी ठहराया जा रहा है, तब सिर झुकाने में लज्जित न हों। इस प्रकार तुम देखते हो कि इस पाठ के पहले भाग के विषय में हमें क्या स्मरण रखना है। सच है कि आज सबेरे हम देख चुके हैं कि संत पतरस को यह आदरणीय उपाधि मिली थी कि वह परमेश्वर की कलीसिया का, और उस आत्मिक मन्दिर का, जो बनाया जाने को था, प्रधान खम्भा कहलाए। वह सम्मानित था; उसने और उसके साथियों ने पवित्र आत्मा पाया था; और यद्यपि वह पहले एक बार ठोकर खा चुका था, तौभी यीशु मसीह ने उसे फिर खड़ा किया और उससे यह कहकर उस पतन की स्मृति मिटा दी, "मेरी भेड़ों को चरा, मेरे मेमनों की चिन्ता कर।" फिर भी इन सब बातों के होते हुए वह सीधे मार्ग पर नहीं चला, परन्तु एक ओर हट गया। इसलिए हमें और भी अधिक सतर्क रहना चाहिए कि कोई हमें यह कहकर धोखा न दे कि हम परमेश्वर की पाठशाला में इतने बढ़ चुके हैं कि अब हमारे चूकने का कोई भय नहीं रहा। ऐसे अहंकार से हम सावधान रहें और निरन्तर चौकसी करते रहें, कि शैतान की छलनाओं और फन्दों से हम बहकाए न जाएँ; वरन् मनुष्यों को प्रसन्न करने की इच्छा हमारे लिए सन्देह की बात हो, क्योंकि संत पतरस इसी चरम सीमा में जा गिरा। यह सच है कि उसका आशय इसके विपरीत था, और उसका उद्देश्य अपने आप को पूरी तरह परमेश्वर के नाम की महिमा में लगाना था। जब उसे यीशु मसीह के नाम से और प्रचार करने से रोका गया था, तब वह दृढ़ता से डटा रहा था। जब उसने उत्तर दिया, "मनुष्यों की आज्ञा से बढ़कर परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना ही कर्तव्य है," तो वह स्वर स्वर्गदूतों के से साहस का था। क्योंकि उसने वहाँ अपने देश के अधिकारियों को देखा, उन्हें अपने ठाठ-बाट के साथ एकत्र देखा, और वहाँ हाकिमों का वह रौब था जो उस जैसे साधारण, प्रतिष्ठाहीन मनुष्य और उसके साथी यूहन्ना को चकित कर सकता था। तौभी, इस दृढ़ उत्तर के होते हुए कि वह उन सब के बावजूद, जो उस पर अधिकार जताने का दावा करते थे, परमेश्वर की आज्ञा मानेगा, वह इस बात में धोखा खा गया जिसका यहाँ उल्लेख है। इसलिए जब कभी लोग ऐसा काम करें जो हमें मार्ग से हटा दे, और हमारे पास कोई सुन्दर आड़ हो, ऐसी कि हमें लगे कि उन्हें प्रसन्न करने में हम कुछ बुरा नहीं करते, तब हम इस उदाहरण का स्मरण करें जो यहाँ हमारे सामने रखा गया है, और जो इसलिए बताया गया है कि हम में से हर एक यह देखे कि उसकी बुलाहट क्या सह सकती है और परमेश्वर क्या आज्ञा देता है, संसार की कृपा पाने के लिए इधर-उधर आँख लगाए बिना। हम अपने आस-पास की सब वस्तुओं की ओर से आँखें मूँद लें और केवल इसी लक्ष्य को देखें कि हमें सब बातों और सब रीतियों में अपने आप को परमेश्वर की इच्छा के अनुसार ढालना है। और जब हम सीधे परमेश्वर की विधियों की ओर देख चुके होंगे, और उसी के मुख से सम्मति माँग चुके होंगे, और उससे प्रार्थना कर चुके होंगे कि वह अपनी पवित्र आत्मा से हमारी अगुआई और संचालन करे, और अन्त में अपनी बुलाहट की सीमाओं पर भली-भाँति विचार कर चुके होंगे, कि हम कुछ भी जैसा हमें शोभा देता है उससे भिन्न रीति से न करें: तब हम शैतान और संसार की चालों और लुभावनों से बच सकेंगे, ऐसे कि हम प्राणियों को अत्यधिक प्रसन्न करने की चिन्ता न करें। परन्तु इसके बिना हम पग-पग पर छले जाएँगे, जैसा पतरस के साथ हुआ। क्योंकि यदि हम अपनी तुलना उससे करें, तो निश्चय है कि वह अपने आप को सम्भालने में हमसे कहीं अधिक समर्थ था। तौभी वह बाद में गिराया गया, इसलिए कि उसका आचरण हमारी शिक्षा के काम आए, और हम सब घमण्ड से छूट जाएँ, ताकि हम अपनी ही बुद्धि और कल्पना में अति-बुद्धिमान बनकर अपनी राय आगे न बढ़ाएँ, परन्तु हमारी सारी बुद्धि यही हो कि हम परमेश्वर के शुद्ध वचन के अनुसार अपने आप को चलाएँ।
पर अब हम उस पर आएँ जो संत पौलुस आगे कहता है। वह विषय में और गहरे उतरता है और कहता है, "हम जन्म से यहूदी हैं और अन्यजातियों के समान पापी (अर्थात् दण्ड के योग्य, अशुद्ध और अभागे मनुष्य) नहीं। तौभी यह जानकर कि हम व्यवस्था के कामों से धर्मी नहीं ठहर सकते, और परमेश्वर को ग्राह्य ठहरने का और कोई उपाय नहीं सिवाय इसके कि हम हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह के साथ उसके पास आएँ: हमने व्यवस्था की धार्मिकता को त्याग दिया है और अपने आप को निश्चय दिलाया है कि परमेश्वर का हमें ग्रहण करना उसकी अपनी निःशुल्क भलाई से उसके पुत्र के निमित्त होना चाहिए। तो जब हम यहूदियों ने अपनी योग्यता त्याग दी, तब अन्यजाति अब क्या करें? क्या सब को परमेश्वर से अपनी ओर से कुछ भी लाए बिना, और अपनी ओर से किसी प्रकार की योग्यता या पात्रता का दावा किए बिना, केवल उसकी अपनी भलाई के द्वारा उससे मेल-मिलाप नहीं करना चाहिए?"
यहाँ (जैसा मैं पहले छू चुका हूँ) संत पौलुस उन लोगों के विरुद्ध, जो व्यवस्था की रीति-विधियों को सुसमाचार में मिलाते थे, अपने वाद-विवाद के मुख्य बिन्दु में प्रवेश करता है। तथापि संत पतरस उनकी गिनती में न था। क्योंकि निश्चय है कि वह भली-भाँति जानता था कि परमेश्वर के पास आने का और कोई उपाय नहीं सिवाय उसकी दया के, जैसी वह हमारे प्रभु यीशु मसीह में हमें दिखाई गई है। संत पौलुस इस विषय पर उससे पहले ही पर्याप्त बातचीत कर चुका था, जैसा हम देख चुके हैं। वह सिद्धान्त के विषय में संत पौलुस से पूरी तरह सहमत था। तब संत पतरस उस भूल में नहीं फँसा था; क्योंकि वह ऐसा अन्धविश्वास होता जो हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग को पूरी तरह मिटा देता। इसलिए संत पतरस उससे घृणा करता। परन्तु जिस कपट की चर्चा मैंने आज सबेरे की, वह यहूदियों को उस मूर्खतापूर्ण सनक में जिसे उन्होंने अपने पुण्य-कर्मों के विषय में पाल रखा था, और दृढ़ करने का कारण बना। ऐसा नहीं कि उसका यह इरादा था; और हमारे लिए भी यह पर्याप्त बहाना नहीं कि हम सौ बार दुहाई दें कि हमारा आशय बुराई का समर्थन करना नहीं है; परन्तु यदि हम उसके प्रति तनिक भी अनुकूल भाव दिखाएँ, तो निश्चय ही हम परमेश्वर और संसार दोनों के सामने सदा दोषी ठहराए जाने के योग्य हैं। अतः संत पतरस सिद्धान्त के विषय में संत पौलुस से भली-भाँति सहमत था, अर्थात् यह कि परमेश्वर के सम्मुख अनुग्रह पाने के लिए आने का और कोई उपाय नहीं सिवाय इसके कि सब प्राणियों को त्याग दिया जाए, और यह मान लिया जाए कि हम में शाप के सिवाय कुछ नहीं है, और यह कि परमेश्वर को हमें अपनी ही केवल दया से हमारे प्रभु यीशु मसीह के निमित्त ग्रहण करना होगा। संत पतरस यह जानता था और बिना किसी विरोध के यही सिखाता था। और इसके अतिरिक्त वह भली-भाँति जानता था कि उसके लिए रीति-विधियों का पालन छोड़ देना उचित है। क्योंकि वह किसी को ऐसी स्वतन्त्रता न देता, यदि वह यह न जानता कि वही स्वतन्त्रता हमारे लिए परमेश्वर के पुत्र की मृत्यु और दुःखभोग से मोल ली गई है। फिर भी वह अपने ही देशवासियों को अपने साथ बनाए रखने के उद्देश्य से कुछ अधिक ही डिग गया, क्योंकि वह जानता था कि यहूदी कुछ अधिक ही हठीले और टेढ़े थे, और इसलिए उसका आशय बस इतना ही था कि उनके स्वभाव को सह ले। परन्तु संत पौलुस अपने सहकर्मी संत पतरस के व्यक्ति का लिहाज़ नहीं करता, और न उससे इस प्रकार तर्क करता है मानो कह रहा हो, "तू मनुष्यों को बहकानेवाला है, तू नहीं जानता कि सुसमाचार का अर्थ क्या है," परन्तु उससे कहता है, "भली-भाँति विचार कर कि तेरे इस काम का क्या परिणाम होगा, और उससे क्या हानि उत्पन्न होगी। क्योंकि जो लोग चाहते हैं कि मनुष्य व्यवस्था की रीति-विधियों का पालन करें, उनका लक्ष्य क्या है? यही कि उनके द्वारा कुछ पवित्रता प्राप्त करें, या मनुष्यों को उनसे इस प्रकार बाँध दें कि वे उन्हें उद्धार की अनिवार्यता मानकर निभाएँ, और उनके द्वारा परमेश्वर के हाथ से कृपा के योग्य ठहरें, और अन्त में खतने और ऐसी ही सब बातों के पालन से पापों की क्षमा पाएँ। परन्तु ऐसा करते हुए वे इस भूल में जकड़े रहते हैं कि वे हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग को त्याग देते हैं, और तौभी तू उन्हें उस मूर्खता में पोसना चाहता है; यह कैसी बात होगी?"
इसलिए हम भली-भाँति ध्यान दें कि संत पौलुस इस विषय में पतरस की राय की परवाह नहीं करता, परन्तु स्वयं बात से निपटता है, ताकि उन लोगों की सारी आड़ हटा दी जाए जो सुसमाचार को द्वार से बाहर निकाल रहे थे, इसके अतिरिक्त कि वे कलीसिया को भी टुकड़े-टुकड़े कर रहे थे, जैसा हमने आज सबेरे देखा। तथापि, क्योंकि यह ऐसा विषय है जिसका पूर्ण विवेचन एक-दो दिन में नहीं हो सकता, चार दिन में भी नहीं, इसलिए हमें बातों को क्रम से, जैसी वे पड़ी हैं, लेना होगा, ताकि हम जानें कि संत पौलुस ने रीति-विधियों को मिटाने के लिए इतना कड़ा संघर्ष क्यों किया। क्योंकि यह बात हमारी आत्माओं के उद्धार से सम्बन्ध रखती है, और यह वह प्रधान बात है जो परमेश्वर की महिमा करने के बाद हमें परमेश्वर की पाठशाला में सीखनी है।
क्योंकि यदि हम तुलना करने लगें, तो निश्चय है कि परमेश्वर की सेवा सदा हमारी आत्माओं के उद्धार से पहले क्रम और पद में आती है। सच है कि ये दोनों अविभाज्य हैं: क्योंकि परमेश्वर अपना वह असीम प्रेम इस बात में प्रकट करता है जो वह हम से रखता है, कि कोई भी बात उसकी महिमा के काम नहीं आती, पर वही तुरन्त हमारे उद्धार के लिए भी उपयुक्त और लाभकारी होती है। तथापि, क्योंकि परमेश्वर ने हम से इतना प्रेम किया है और हम पर अब भी अपनी कृपा बनाए रखता है, इसलिए हम अपनी ओर से उसके ऋणी हैं, कि अपने आप को भूलें और अपने आप को पूरी रीति से उसे सौंप दें। पर जैसा भी हो, हम यहाँ अपने सारे धर्म की दो नींवें देखते हैं: अर्थात् यह जानना कि परमेश्वर का आदर और सेवा कैसे होनी चाहिए, और यह भी कि हम अपने आप को उसके सम्मुख इस रीति से कैसे अर्पित करें कि वह हमें ग्रहण करे और अपने बच्चे स्वीकार करे, और हम उसे पिता जानें, और इस प्रकार अपने उद्धार के विषय में पूरी निश्चयता पाएँ। और ये दोनों बातें उस विवेचन में समाई हैं जो संत पौलुस यहाँ करता है। क्योंकि प्रश्न यह है कि परमेश्वर की सेवा किस रीति से होनी है: क्योंकि प्रधान बलिदान जो वह माँगता है वह दीनता का अंगीकार है: मैं कहता हूँ दीनता: मुँह पर विनीत भाव दिखाने से नहीं, परन्तु ऐसे पश्चाताप से स्पर्श किए जाने से कि हम अपने आप को परमेश्वर के सामने पूरी तरह दोषी ठहराए जाने दें, और अपने ही कर्मों और पुण्यों का सारा भरोसा पाँवों तले कुचल दिया जाए। इसे एक बात के रूप में ध्यान में रखो।
और फिर, जब परमेश्वर ने रीति-विधियों की आज्ञा दी, तब यह इसलिए नहीं था कि उसे इन बाहरी बातों की परवाह थी: परन्तु इसलिए कि उसका लक्ष्य कुछ और था: अर्थात् एक ओर यहूदी अपनी ही कमियों और दुर्दशा को निरन्तर देखने से धीरज में अभ्यस्त हों, और इस प्रकार शरीर की सब भ्रष्टताओं से छूटें: और दूसरी ओर हमारे प्रभु यीशु मसीह की ओर ले जाए जाएँ, कि उसी पर भरोसा रखें और पूरी रीति से वहीं विश्राम पाएँ। अतः जो लोग चाहते थे कि व्यवस्था की रीति-विधियाँ मानी जाएँ, मानो यह अनिवार्य हो कि मनुष्य मृत्यु-दायक पाप (जैसा वे कहते हैं) के दण्ड के भय से उनसे ठीक-ठीक बँधे रहें: निश्चय है कि उनका आशय परमेश्वर की इच्छा और अभिप्राय के विपरीत उसकी एक सेवा खड़ी करना था, और वे ठग के समान ही थे: क्योंकि उन्होंने व्यवस्था का स्वाभाविक अर्थ बिगाड़ दिया। इसे एक पाठशाला की बात के रूप में ध्यान में रखो।
दूसरी बात यह है कि उन्होंने मनुष्यों को सिखाया कि वे अकड़ें और अपने आप पर घमण्ड करें, और यह परमेश्वर की महिमा को मिटाना था: क्योंकि हम अपने लिए कुछ भी (चाहे कितना ही थोड़ा) दावा नहीं कर सकते, बिना उस वस्तु को लूटे और छीने जो उसकी है। तब देखो, यह कैसा शैतानी विश्वासघात है जब मनुष्य अपने ही बल पर इस प्रकार इतराते हैं मानो उनमें धार्मिकता की कोई चिंगारी हो। और इसके अतिरिक्त, जब हम अपने ही कर्मों से उद्धार पाने की आशा करते हैं, तब हम नरक की खाई में प्रवेश करते हैं। क्योंकि हम हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग को त्याग देते हैं, जबकि अपनी सारी धार्मिकता हमें उसी में खोजनी चाहिए। फिर, शैतान हमें अद्भुत बातों का विश्वास दिलाता है, परन्तु केवल इसलिए कि हम विनाश में जा गिरें। इसलिए हम भली-भाँति ध्यान दें कि संत पौलुस यहाँ परमेश्वर के सम्मुख धर्मी ठहराए जाने की रीति के विषय में कहता है, अर्थात् उन साधनों के विषय में जिनके द्वारा हम उसकी कृपा में लाए जाते हैं, क्योंकि यही वह मुख्य बात है जो हमें सीखनी चाहिए, और इसके बिना जितना भी धर्म या भक्ति कही जा सकती है, वह धुआँ और असार बातें मात्र है।
और संत पौलुस इस प्रश्न में व्यर्थ नहीं उतरता। क्योंकि बहुत से लोग यह आपत्ति उठाते हैं: यह क्या बात हुई? प्रश्न तो व्यवस्था की रीति-विधियों का था: फिर संत पौलुस (जैसा तुम कहोगे) खेतों के आर-पार क्यों भाग रहा है? वह धार्मिकता, मनुष्य के उद्धार, पापों की क्षमा, और अन्त में सारी व्यवस्था की बात क्यों करता है? अब एक ओर, उसे इन सब बातों से निपटना आवश्यक था। उदाहरण के लिए, जब हम आजकल सिखाते हैं कि मनुष्यों को पोप-पन्थियों के अन्धविश्वासों को नहीं मानना चाहिए, और न उन बातों को जो मनुष्य की बुद्धि से गढ़ी गई हैं: तो हम केवल यही बहस नहीं करेंगे कि शुक्रवार को माँस खाया जाए या नहीं, या अमुक जागरण, रात्रि-जागरण या सन्तों की पूर्व-संध्या मनानी चाहिए या नहीं, या यह बात की जाए या वह: परन्तु हम सामान्य रूप से विवेचन करेंगे कि क्या नश्वर मनुष्य को यह उचित है कि वह नियम बनाकर मनुष्यों के विवेक को अत्याचारी दासत्व में डाल दे। क्योंकि परमेश्वर ने अपने ही लिए यह अधिकार और विशेषाधिकार सुरक्षित रखा है कि वही व्यवस्थापक कहलाए, ताकि कलीसिया में कोई मनुष्य ऐसी श्रेष्ठता हड़प न ले।
तब, क्योंकि हमारी आत्माओं का आत्मिक शासन परमेश्वर के शुद्ध वचन से लिया जाना चाहिए: हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि न पोप को और न किसी और मनुष्य को, चाहे वह किसी भी पद का हो, यह अधिकार है कि वह हम पर कोई नियम लादे, और न उसे ऐसी कोई बात करने का प्रयास करना चाहिए जो उस शिक्षा के विरुद्ध हो जो हमें परमेश्वर से मिली है। तब हम उस सामान्य विवेचन में भली-भाँति प्रवेश कर सकते हैं: और यह इसलिए कि उनका कारण सब बातों में एक-सा है। यदि हम केवल मछली या माँस खाने के विषय में बहस करें, तो वह मूर्खतापूर्ण बहस होगी।
क्योंकि हर मनुष्य को वैसा ही खाना चाहिए जैसा उसके स्वास्थ्य के लिए हो, या जैसा वह पा सके: और इसलिए ऐसी बहस का सम्बन्ध मनुष्यों की आत्माओं के कल्याण से नहीं होगा, या उस बात से नहीं जिस पर उनके विवेक को विश्राम करना आवश्यक हो। परन्तु जब हम यह दिखाने का बीड़ा उठाते हैं कि किसी भी जीवित प्राणी के लिए यह उचित नहीं कि वह अपने आप को इतना ऊँचा उठाए कि मनुष्यों की गर्दनों पर व्यवस्थाएँ लादे: तो दूसरी बहस पूरी तरह सुलझ और निपट जाती है।
फिर, जब लोग कहते हैं कि पैटर्नॉस्टर बड़बड़ाकर अपने पाप मोल लेने से, और तीर्थयात्रा में मारे-मारे फिरकर वहाँ वह पाने से जिसे पोप-धर्म में अतिरिक्त पुण्य-कर्म (अर्थात् वे अधिक कर्म जो मनुष्य परमेश्वर की आज्ञा से अधिक करते हैं) कहा जाता है, वे अपने आप को छुड़ाते हैं और जो अपराध उन्होंने किए हैं उनका उसे कुछ बदला चुकाते हैं: यदि हम केवल तीर्थयात्राओं के विषय में सीधे-सीधे बोलें, और विषय की जड़ और स्रोत तक न जाएँ: तो वह फीका और हल्का विवेचन होगा। परन्तु यदि हम यह प्रकट करें कि हमारा सारा प्रायश्चित उन बातों में है जो हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग से हमारे लिए मोल ली गई हैं, और साथ ही यह कि परमेश्वर उस सब से जो हमारी अपनी गढ़ी हुई है पूरी तरह अप्रसन्न है, और यह कि वह आज्ञाकारिता से अपनी सेवा चाहता है: तब हम मामले को वैसे रखते हैं जैसा रखा जाना चाहिए, और उसे एक निश्चित और पक्के निष्कर्ष तक पहुँचा सकते हैं।
संत पौलुस ने इसी रीति से किया। क्योंकि उसने केवल यही नहीं देखा कि यहूदी क्या कहते थे, कि उन्हें सूअर का माँस खाने से दूर रहना चाहिए, और अमुक पर्व या अमुक पर्व मनाना चाहिए, और शेष सब रीति-विधियाँ: परन्तु उसने यह देखा कि वे यह किस उद्देश्य से कहते थे: अर्थात् वे यह दिखाने का यत्न कर रहे थे कि व्यवस्था का पालन उद्धार के लिए अनिवार्य है, और यह मनुष्यों के विवेक पर दासत्व का ऐसा जूआ था जिसे सहा नहीं जा सकता था। फिर उसने देखा कि वह स्वतन्त्रता जो हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमारे लिए मोल ली थी, छीनी जा रही थी, और यह दूसरी बात थी जिसने उसे उस विवेचन में उतरने को विवश किया।
पर प्रमुख बात जिस पर वह यहाँ बोलता है यह है, कि जो लोग चाहते थे कि मनुष्य रीति-विधियों का पालन करें, उनका गुप्त आशय यह था कि यह परमेश्वर के लिए ग्राह्य सेवा है, और ऐसे महत्त्व की कि मनुष्य उससे धार्मिकता और आत्मा का कल्याण मोल लें, और (संक्षेप में) यह कि यह पुण्य कमानेवाली बात थी। परन्तु संत पौलुस दिखाता है कि मनुष्यों के लिए अपने कर्मों से परमेश्वर के सम्मुख धार्मिकता मोल लेना असम्भव है। अब हम देखते हैं कि संत पौलुस ने हमारे धर्मी ठहराए जाने के विषय में सामान्य रूप से क्यों कहा, जबकि उसके विरोधी केवल इतना ही बहाना करते थे कि रीति-विधि की व्यवस्था का पालन किया जाए, और वह हमारे प्रभु यीशु मसीह के आने से पहले की भाँति बनी रहे, ताकि मनुष्य अब भी बलिदान चढ़ाएँ और शेष छायाएँ और प्राचीन प्रतीक करते रहें।
और इससे हम यह भी देखते हैं कि पोप-पन्थियों का यह सोचना कितनी मूर्खता है कि वे यह कहकर बच निकले कि संत पौलुस यहाँ केवल व्यवस्था के कर्मों की बात करता है, नैतिक कर्मों की नहीं। सच है कि इस सनक के आदि प्रवर्तक वे नहीं हैं। क्योंकि शैतान के सेवक सदा से रहे हैं जो लोगों को ठगते आए हैं। परन्तु हमें मनुष्यों के अधिकार पर टिकना नहीं चाहिए, विशेषकर उन पर जिनमें न धर्म है न परमेश्वर का भय। यद्यपि बहुत से भिक्षुओं के विषय में कहा गया है कि वे बड़े कुशल पुरुष थे: तौभी वे केवल कल्पनाशील लोग ही रहे, और उन्होंने परमेश्वर के भय का कभी स्वाद न चखा। जो प्राचीन आचार्य कहलाते थे, उन्होंने भी पवित्र शास्त्र का स्वाभाविक अर्थ बिगाड़ा, और शैतान ने उन्हें पूरी तरह मोहित कर रखा था, और फिर भी अभागा संसार ऐसा अन्धा रहा कि उसे जान न सका।
इस प्रकार के लोगों ने इस वचन की, कि हम व्यवस्था के कामों से धर्मी नहीं ठहरते, यह व्याख्या की कि इसका अर्थ यह है कि हम खतने से, या कुछ विशेष भोजनों से परहेज़ करने से, या अमुक पर्व या अमुक भोज मनाने से धर्मी नहीं ठहरते, जबकि संत पौलुस इन सब में से किसी की बात नहीं करता। वह परमेश्वर के अनुग्रह को हमारे सब कर्मों के सामने रखता है, और अन्त में दिखाता है कि हम परमेश्वर के पास कुछ भी नहीं ला सकते, परन्तु हमें उससे निःशुल्क ग्रहण किया जाना ही होगा। यही संत पौलुस का अभिप्राय है। और यदि हम इसी लक्ष्य को अपनी आँखों के सामने न रखें, तो निश्चय ही इस पत्री में जो सारी शिक्षा है वह व्यर्थ की बात ठहरेगी।
इसके अतिरिक्त हम यह भी ध्यान दें कि संत पौलुस बहुधा बिना किसी जोड़ के सीधे-सीधे कहता है कि हम कर्मों के बिना धर्मी ठहरते हैं: जैसे रोमियों के तीसरे अध्याय में वह कहता है कि हमारी धार्मिकता का हमारे पास स्पष्ट और पक्का प्रमाण है, अर्थात् यह कि हम परमेश्वर के सम्मुख अपने पापों की क्षमा के द्वारा धर्मी हैं, अपने कर्मों से नहीं। वह वहाँ यह नहीं कहता कि व्यवस्था के कर्मों से, परन्तु उसे बिना जोड़ के अकेला रख देता है, ताकि सब के मुँह बन्द हो जाएँ और बच निकलने के सब बिल बन्द कर दिए जाएँ।
तौभी वह व्यवस्था के कर्मों की चर्चा बिना कारण नहीं करता, कि उन सब सेवाओं को निरर्थक ठहराए जो मनुष्य परमेश्वर को बाँधने के लिए गिना सकते हैं, मानो वे अपने आप से धर्मी बनने में समर्थ हों। क्योंकि जैसा हम आगे देखेंगे, यदि हम स्वर्गदूतों के समान सिद्ध भी होते, तौभी वह परमेश्वर को किसी प्रकार बाँध न सकता, यदि उसने अपनी ही इच्छा से अपनी व्यवस्था में यह प्रतिज्ञा न की होती, "जो मनुष्य उन्हें करेगा वह उनके कारण जीवित रहेगा।" तब यदि हम अपने कर्मों के कारण परमेश्वर के हाथ से कृपा पाना चाहें, तो हमें दार्शनिकों की रीति से यह बहस नहीं करनी चाहिए कि परमेश्वर हमारी उस सेवा के लिए, जो हमने उसकी की है, हमें कोई मजदूरी या बदला देने का ऋणी है: क्योंकि हम तो उसी के हैं, और हम जो कुछ कर सकते हैं उससे उसे बाँध नहीं सकते। तो हमारे कर्मों का बदला कैसे मिले मानो वे परमेश्वर के सम्मुख कुछ मूल्य रखते हों? इसी कारण कि उसने ऐसा करने की प्रतिज्ञा की है। यह वह वाचा है जो उसने हम से बाँधी है यह कहकर, "जो मनुष्य उन्हें करेगा वह उनके कारण जीवित रहेगा।" अतः यदि हम व्यवस्था को पूरी रीति से पूरा कर सकते, तो निश्चय ही हम परमेश्वर के सम्मुख धर्मी ठहरते और उद्धार के योग्य होते; यद्यपि हम में किसी योग्यता के कारण नहीं, परन्तु उस वाचा के कारण जो परमेश्वर ने हम से बाँधी है। क्योंकि हम देखते हैं कि जितना पुण्य मनुष्य के पक्ष में गिनाया जा सकता है, वह सब पूरी तरह उसी प्रतिज्ञा पर निर्भर है। और इसी कारण संत पौलुस सदा कहता है, "व्यवस्था के कर्म, व्यवस्था के कर्म।" क्योंकि और कोई कर्म नहीं जो परमेश्वर से ग्रहण किए जाने और कोई बदला पाने के योग्य ठहरें। इसलिए इसे एक बात के रूप में रहने दो।
और हम आगे देखेंगे कि हम उस धार्मिकता से पूरी तरह कैसे बाहर कर दिए गए हैं, क्योंकि हम उस तक पहुँच नहीं पाते: और यह कि परमेश्वर का हमसे यह कहना कि हम व्यवस्था के पालन से उद्धार पाएँगे, ठीक वैसा ही है मानो उसने कहा हो कि हम सब के सब दोषी ठहरे हैं। और क्यों? क्योंकि कोई मनुष्य नहीं जो उसे पूरा करके अपने आप को छुड़ा ले, पर हम सब अपराधी हैं। तब तुम देखते हो कि हमारी निर्बलता के कारण व्यवस्था हमें मृत्यु के सिवाय कुछ नहीं दे सकती। परन्तु यह अपने क्रम में और विस्तार से रखा जाएगा। इस समय इतना जानना पर्याप्त है कि संत पौलुस का यह सिद्धान्त रखना उन यहूदियों के विरुद्ध है जो अपने आप पर घमण्ड करते और फूले हुए थे, मानो व्यवस्था की रीति-विधियों के पालन के कारण परमेश्वर उनके प्रति बँधा हुआ हो। नहीं, नहीं, (वह कहता है) इसका कुछ मूल्य नहीं: और इसका कारण हम आगे देखेंगे।
इसके अतिरिक्त, संत पौलुस का रीति-विधियों के प्रश्न पर विवाद इसलिए है कि ये कपटी, जिन्होंने अपने आप को परमेश्वर के बराबर ठहराने और अपने उद्धार की प्रशंसा स्वयं पाने का बीड़ा उठाया था, सदा छोटी-छोटी तुच्छ बातों में ही अपने सिर खपाते रहे, और प्रमुख बात पर नहीं आए, जो यह है कि अपने ही विवेक के भीतर प्रवेश करें। जैसे आज के दिन पोप-धर्म में, वे जो अपने ही पुण्यों का इतना प्रचार करते हैं, और कहते हैं कि हमें अपने ही कर्मों से स्वर्ग मोल लेना है, और यह कि यद्यपि हम पापी हैं, तौभी हमारे पास प्रायश्चितों के द्वारा परमेश्वर की ओर से अपने आप को छुड़ा लेने का मार्ग है: वे क्या कहते हैं? जब वे बड़े-बड़े रब्बी मनुष्यों को इस रीति से मंच पर बिठाकर मूर्तियों की नाईं आदर दिलाने चलते हैं, और जब वे स्वतंत्र इच्छा, अपने सद्गुणों, अपने प्रायश्चितों और अपने पुण्यों या योग्यताओं पर अपनी बड़ी-बड़ी भूमिकाएँ बाँध चुकते हैं: तब वे क्या सामने रखते हैं? क्या वे मनुष्यों को उपदेश देते हैं कि पवित्रता से जिएँ, दूसरों के साथ अन्याय न करें, या किसी लोभ की इच्छा न रखें, कि हम में से हर एक जो उसके पास है उसी में सन्तुष्ट रहे, विपत्ति में धीरज रखे, अन्याय और निन्दा सहे, और सब बातों में अपने आप को त्यागकर अपने आप को हमारे प्रभु यीशु मसीह का चेला प्रमाणित करे? उनके पास इन बातों का एक शब्द भी नहीं। परन्तु जो भले काम वे हमारे सामने रखते हैं वे ये हैं, कि हम भक्ति से मिस्सा में जाएँ, कलीसिया में प्रवेश करने से पहले पवित्र जल लें, अपने ऊपर क्रूस का चिह्न बनाएँ, किसी लकड़ी के ठूँठ के आगे घुटने टेकें, गुड़िया की उपासना करें, तीर्थयात्राओं में भटकें, अमुक पर्व का दिन मनाएँ, ट्रेन्टल की नींव डालें, मृतकों के लिए दान बाँटें, और यह और वह करें। तो ये सब कपटी जो अपने ही कर्मों से धर्मी बनना चाहते हैं, उनके पास खिलौनों और सनकों के सिवाय कुछ नहीं: और फिर भी वे अपने आप को ऐसा पवित्र और सिद्ध समझते हैं कि उनमें कुछ भी दोष नहीं। वे सोचते हैं कि परमेश्वर को उनके किए हुए स्वाँगों और दिखावों की बड़ी गिनती से सन्तुष्ट हो जाना चाहिए। परन्तु वह ऐसा सिक्का नहीं जिससे उसे चुकाया जाए: क्योंकि उसकी व्यवस्था आत्मिक है। वह बाहरी हाव-भाव को नहीं देखता, और न उन बातों को जो मनुष्यों के आगे सुन्दर चमक रखती हैं, यहाँ तक कि यदि मनुष्य उसकी अपनी रीति-विधियों पर भी अपना मन अत्यधिक लगा दें, तो वह उसे पूरी तरह ठुकरा देता है। और यह बात भली-भाँति ध्यान देने योग्य है। क्योंकि मनुष्य सदा कोई बच निकलने का बिल ढूँढ़ते हैं, कि वे अपने आप को परमेश्वर की आज्ञाकारिता के आगे न झुकाएँ: और वे अपने आप को यह विश्वास दिलाते हैं कि जब वे अपनी मूर्खतापूर्ण भक्ति एक बार निपटा चुके, तब वे भली-भाँति छूट गए, और उनके शेष सब पाप भुला दिए जाने चाहिए, क्योंकि वे उस रीति से उनका छुटकारा-मूल्य चुका देते हैं। इसलिए जो बात हमें यहाँ ध्यान देनी है, वह यह है कि संत पौलुस यहाँ ऐसे मनुष्यों से लड़ा जिन्होंने कभी जाना ही न था कि सच्चे मन से परमेश्वर की सेवा क्या होती है, और न कभी अपने ही विवेक के भीतर प्रवेश किया।
और ऐसे ही हैं पोप-धर्म के ये भिक्षु, और वे दुष्ट जिन्हें वहाँ पूरी छूट है: मैं केवल कार्डिनलों और इन भ्रष्ट बिशपों की बात नहीं करता, (क्योंकि लोग जानते हैं कि वे वह गन्दगी हैं जो सारे संसार को संक्रमित करती है) परन्तु मैं उनकी भी बात करता हूँ जो आचार्य कहलाते हैं, जो उनके कैथोलिक विश्वास के थामनेवाले हैं। निश्चय है कि वे परमेश्वर का उपहास करनेवाले मात्र हैं; उन्होंने कभी अपने विवेक में प्रवेश करके अपने आप को गम्भीरता से नहीं जाँचा, और न कभी उन्हें विवेक का कोई दंश हुआ। निश्चय ही उनका सारा अध्ययन यही रहा कि लोगों को मानो यातना-मंच पर चढ़ाए रखें और उनके हृदयों में बहुत सी पीड़ाएँ भर दें, इस उद्देश्य से कि वे तीक्ष्ण बुद्धिवाले दिखाई दें। पर स्वयं उन्होंने कभी कुछ अनुभव नहीं किया। और इसी कारण वे पुण्यों के विषय में अपने आराम से इतनी बकवास करते हैं, और फिर भी इस बीच स्वयं उनकी कोई परवाह नहीं करते। केवल कुछ छोटी-मोटी तुच्छ बातें करते हैं, उन झुनझुनों की नाईं जो छोटे बच्चों को दिए जाते हैं, जिनसे वे अपने आप को विश्वास दिलाते हैं कि वे परमेश्वर को शान्त कर सकते हैं।
अब इसी कारण संत पौलुस व्यवस्था की रीति-विधियों के विषय में विवाद करता है, जैसे वे उसके सामने रखी गई थीं: और फिर भी वह जड़ तक सीधा काट देता है, अर्थात् वह प्रमाणित करता है कि मनुष्य सब धार्मिकता से बिलकुल नंगे उतारे गए हैं, और परमेश्वर के पास कुछ भी नहीं ला सकते, परन्तु उसके हाथ से भीख माँगनी ही होगी, यह मानकर कि उनमें पूरी कंगाली और दरिद्रता के सिवाय कुछ नहीं।
इसके अतिरिक्त, हम यह भी ध्यान दें कि यहूदी सदा संस्कारों के स्वभाव और उपयोग को बिगाड़ते रहे, इस रूप में कि उन्होंने उन्हें पुण्य-कर्म बना डाला, और यह उस उपयोग के पूरी तरह विपरीत था जिसके लिए उन्हें लगाना चाहिए था। क्योंकि परमेश्वर ने संस्कारों को इसलिए नहीं ठहराया था कि उनका पालन करने के यत्न से मनुष्य कोई ऐसा गुण मोल लें जो उन्हें धार्मिकता के रूप में गिना जाए; परन्तु इसलिए कि उन्हें सिखाया जाए कि सब कुछ परमेश्वर के हाथ से खोजना उनके लिए आवश्यक है। उदाहरण के लिए, जब यहूदियों का खतना होता था, तब परमेश्वर ने उसके द्वारा आँखों के सामने दिखाया कि मनुष्य से जो कुछ भी निकलता है वह भ्रष्टता ही है, और हमारे लिए उसका काट डाला जाना आवश्यक है। इसलिए जो बात यहूदियों को उस दृश्य संस्कार में विचारनी थी, वह यह थी कि मनुष्य का स्वभाव परमेश्वर के सम्मुख शापित है, और हम ढूँढ़ भले ही लें पर उसमें शुद्धता की एक बूँद भी नहीं पा सकते। और दूसरी ओर उनके पास यह चिह्न और साक्षी थी कि फिर भी परमेश्वर उस छुड़ानेवाले के द्वारा उनकी सहायता करेगा, जो मनुष्यों के वंश से आनेवाला था: क्योंकि वह दाऊद के कुल में जन्मा। इसलिए परमेश्वर ने वह बात दृश्य रूप में दिखाई। और इस प्रकार यहूदी अपने भीतर दीन किए गए, और उन्हें विचारना चाहिए था कि उनमें शाप के सिवाय कुछ नहीं, और इस पर आकर उन्हें वह वस्तु हमारे प्रभु यीशु मसीह में खोजनी चाहिए थी जो उनमें नहीं थी। उनके स्नानों के विषय में भी इतना ही समझना चाहिए। जितनी बार यहूदी स्नान करते थे, यह उन्हें स्मरण दिलाता था कि उनमें अशुद्धता के सिवाय कुछ नहीं। और वह स्नान किसमें था? क्या जल में? नहीं: परन्तु हमारे प्रभु यीशु मसीह के लहू में। जब पशु वध किए जाते थे, तब वे देखते थे कि वे मृत्यु के योग्य ठहरे हैं। पशु निर्दोष थे, फिर भी वे मनुष्यों के निमित्त बलि किए गए, कि उनके पाप उठा ले जाएँ। इस प्रकार तुम एक दर्पण देखते हो जो दिखाता है कि सब मनुष्य परमेश्वर की ओर से शापित हैं। और फिर भी ऐसा करते हुए मनुष्य अपने आप को दीन करते थे, परमेश्वर को पुकारते थे, और अंगीकार करते थे कि वे बलिदान के द्वारा छुड़ाए गए हैं: तथापि उन छाया-रूपी बलिदानों से नहीं, परन्तु उस सच्चे बलिदान से जो अभी संसार में आया न था।
पर यहूदियों ने क्या किया? जब उनका एक बार खतना हो गया, तब उन्होंने समझा कि परमेश्वर उनके प्रति उसके कारण बँधा है। और जब उन्होंने बलिदान चढ़ा लिया, तब उन्होंने समझा कि ऐसा करने में बड़ी पवित्रता है, और उस पर घमण्ड किया। परन्तु भविष्यद्वक्ताओं ने उन कपटियों को दोहरी डाँट दी। क्योंकि पहले उन्होंने उन्हें बताया कि जब वे व्यवस्था की सब रीति-विधियाँ पूरी कर चुके, तब भी उनके कर्म कुछ न थे, सब व्यर्थ था। क्योंकि देखो, परमेश्वर कहता है, "मैं दया से प्रसन्न होता हूँ, बलिदान से नहीं:" और फिर, "हे मनुष्य, मैं तुझे दिखाऊँगा कि तू परमेश्वर को कैसे प्रसन्न करेगा: तू सच्चे मन से दीन हो, और यह न समझ कि बहुत सी भेड़ें और बैल उसके पास ले आना कुछ है, क्योंकि वह कुछ नहीं: परन्तु तू न्याय और सीधाई से काम कर, और जब तू उसकी उपासना कर चुके, तब अपने पड़ोसियों के साथ ईमानदारी और निष्कलंकता से जी।" और हम यह भी देखते हैं कि प्रभु यिर्मयाह में क्या कहता है। "क्या मैंने तुम्हारे पुरखाओं से (वह कहता है) बलिदान चढ़ाने की बात कही थी? नहीं," (वह कहता है) "परन्तु मैंने उन्हें आज्ञा दी कि वे मेरी मानें, और मेरी बात पर कान लगाएँ, और खरे मन से मेरी सेवा करें।" फिर एक और स्थान में कहा गया है, "हे प्रभु, तू सच्चाई से प्रेम रखता है।" इस प्रकार हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता कपटियों को इसलिए डाँटते हैं कि वे रीति-विधियों में रुके रहे, जो अपने आप में कुछ नहीं, जब तक कि मनुष्य परमेश्वर के प्रति शुद्ध विवेक से और मनुष्यों के प्रति विश्वासयोग्यता से न चलें।
और भविष्यद्वक्ताओं के ऐसा कह चुकने के बाद, वे दूसरी बात यह जोड़ते हैं कि जब मनुष्य वह सब कर चुके जो वे कर सकते हैं, तब भी वे परमेश्वर के ऋणी बने रहते हैं, और यह कि रीति-विधियाँ उन्हें और निकट लाने के काम आती हैं, अर्थात् उन्हें यह स्वीकार कराने के लिए कि परमेश्वर उन्हें अपने पास बुलाता है, और उनसे प्रतिज्ञा करता है कि वह उन पर दया करेगा, और उनके सब कुकर्मों को भुलाकर गाड़ देगा, यद्यपि उस छुड़ानेवाले के द्वारा जिसकी प्रतिज्ञा उनसे की गई थी। परन्तु अब संत पौलुस पहली बात को छोड़ देता है, अर्थात् यह कि रीति-विधियाँ मुख्य बात के बिना कुछ नहीं, और मुख्य बात यह है कि हम किसी का अन्याय किए बिना, और किसी मनुष्य को हानि या क्षति पहुँचाए बिना चलें, कि हम पवित्र और शुद्ध जीवन बिताएँ, और हमारा विवेक निर्मल और खरा हो। संत पौलुस उस विवेचन को छोड़ देता है: और क्यों? क्योंकि वह उसके प्रयोजन के काम का न था। और इसलिए वह दिखाता है कि व्यवस्था की छायाएँ न लाभकारी थीं न आवश्यक, क्योंकि यदि कोई उन्हें उनके अपने स्वभाव में देखे तो वे कुछ नहीं थीं, परन्तु उनका उद्देश्य देखा जाना चाहिए, जो यह था कि क्योंकि वे उस अनुग्रह की साक्षी थीं जो अब अन्त में हमारे प्रभु यीशु मसीह में हमें दिया गया है: उन्हें पूरी रीति से उसी पर विश्राम करना चाहिए था। और आज के दिन भी यह हमारे हृदय और स्मरण दोनों में भली-भाँति छप जाना चाहिए। क्योंकि हमें बड़ा लाभ होगा यदि हम एक बार जान लें कि हमारे प्रभु यीशु मसीह के ठहराए हुए संस्कारों को अपने उपयोग में कैसे लाएँ, विशेषकर इसलिए कि अगले रविवार को हमें प्रभु-भोज लेना है। क्योंकि यद्यपि आज के दिन हमें उसके लिए तैयार होने का उपदेश दिया जाना चाहिए था, तौभी आज सबेरे उसका स्पर्श नहीं किया गया। परन्तु हम भली-भाँति स्मरण रखें कि यदि हम समझें कि बपतिस्मा से हम धर्मी बनाए जाते हैं, तो हम उस वस्तु को अशुद्ध करते हैं जिसे परमेश्वर ने हमारे उद्धार के लिए ठहराया है। और क्यों? बपतिस्मा हमें केवल यही सिखाता है कि हम में मैल और अशुद्धता के सिवाय कुछ नहीं। क्योंकि हम अपने हाथ, मुँह और शरीर इसी कारण तो धोते हैं कि उनमें जो दाग हैं उनसे उन्हें स्वच्छ करें। अब कहा जाता है कि बपतिस्मा हमारा धोया जाना है: और इसलिए यह निष्कर्ष निकलता है कि जब हम बपतिस्मा के लिए आते हैं, या जब हम में से कोई अपने बच्चों को [बपतिस्मा दिलाने के लिए] लाता है, तब हम घोषणा करते हैं कि बच्चे अपनी माता के गर्भ से ही दोषी ठहरे और खोए हुए हैं, और वे शापित वंश हैं, ऐसे कि उन्हें शुद्धता अपने कमाने से नहीं, परन्तु ग्रहण करने से पानी पड़ती है, क्योंकि वह उन्हें हमारे प्रभु यीशु मसीह में दी जाती है। अब यदि बच्चे संसार में आते ही दूषण से भरे हैं: तो हम क्या हैं, जो अपने परमेश्वर को ठेस पहुँचाने से कभी नहीं रुकते, और अधर्म को ऐसे पीते हैं जैसे मछली पानी पीती है, जैसा अय्यूब की पुस्तक में कहा गया है?
फिर, जब हम प्रभु-भोज के लिए आते हैं, तब हम क्या करने आते हैं? क्या हम अपनी योग्यता से परमेश्वर से कुछ पाने आते हैं? नहीं: परन्तु यह अंगीकार करने कि हम अभागे मरे हुओं के समान हैं, जो अपने से बाहर अपना जीवन ढूँढ़ने आते हैं, और इसलिए हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह का माँस अपने भोजन के लिए, और उसका लहू अपने पेय के लिए, और उसमें वह सब कुछ पाना होगा जिसकी हम में कमी है। तब तुम देखते हो कि संस्कार हमें किसी अहंकार से फुलाने के लिए नहीं, परन्तु हमें दीनता से चलाने के लिए हैं, ताकि सब आत्म-भरोसे से रहित होकर हमारी सारी खोज यही हो कि परमेश्वर की असीम भलाई से हमारी सहायता हो, और उसके अपने अनुग्रह के भण्डार हमारी आवश्यकता के अनुसार हम पर उँडेले जाएँ। और उनके पास हमारा आना इसलिए है कि परमेश्वर हमें हमारे पापों के विषय में चिताए, कि हम सच्चे मन से उनसे स्पर्श किए जाएँ। और हमें केवल मुँह से, या हल्के रूप में और रीति के तौर पर, अपने आप को पापी नहीं मानना चाहिए: परन्तु हमारे हृदय भीतर से इस शोक से घायल हों कि हमने ठेस पहुँचाई है, और हम अनुभव करें कि परमेश्वर का क्रोध कितना भयानक है, ताकि हम अपने भीतर दुखी हों, और तब तक हमें चैन न हो जब तक वह हमें न दिखाए कि हम उसे कहाँ पाएँगे, अर्थात् हमारे प्रभु यीशु मसीह में। और जब हम इस पवित्र मेज़ पर आएँ, तो हम में से हर एक भली-भाँति देखे कि वह हमारे प्रभु यीशु मसीह में ऐसा दृढ़ जमा है कि शैतान के सब मूर्खतापूर्ण भ्रमों को, और उन सब छलों को जो वह हमें परमेश्वर के अनुग्रह से फेरने के लिए हमारे सामने रखता है, त्यागकर, वह हमारे प्रभु यीशु मसीह को उसकी मृत्यु और दुःखभोग के पुण्यों समेत गले लगाए, अपने आप को निश्चय दिलाते हुए कि वही है जिसमें हमारे पास धार्मिकता और उद्धार की पूरी सिद्धि है।
इसके अतिरिक्त, क्योंकि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमें अपनी देह के अंग होने के लिए बुलाया है, हम अपने आप को आपस में एक साथ बाँधें, और मानो एक हृदय और एक मुख से परमेश्वर की महिमा करने का यत्न करें, और साथ ही अपने पड़ोसियों के साथ सच्ची एकता में जिएँ, जैसे हाथ पाँव और आँख दोनों की सेवा करता है। तब हम उस भाईचारे को ऐसा मूल्यवान समझें कि हम दिखा दें कि हम अपने आप को अलग-अलग करके मानो यीशु मसीह को टुकड़े-टुकड़े करने का इरादा नहीं रखते: परन्तु हमारी यह इच्छा है कि वह हमें ऐसा आपस में बाँध दे कि न केवल वह हम में और हम उसमें जीएँ: परन्तु वह हमें अपनी पवित्र आत्मा से इस प्रकार संचालित भी करे कि हम में से हर एक पहले उसकी सेवा और आदर करने का यत्न करे, और उसके बाद अपने आप को अपने पड़ोसियों की सेवा में लगाए, उस सामर्थ्य के अनुसार जो उसे मिलेगी।
और अब आओ, हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सम्मुख अपने दोषों को मानते हुए गिर पड़ें, उससे प्रार्थना करते हुए कि वह हमें उन्हें और अधिक अनुभव कराए, ताकि वही हमें सदा उत्तम पश्चाताप के लिए उभारे, और हमें अन्त तक उसमें बनाए रखे, और हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास में भी बढ़ाए, ऐसे कि हम अपने आप को पूरी तरह उसे सौंप दें, और उसके नाम से परमेश्वर को, जो उसका पिता है, पुकारें, ताकि वह हमारी सुने, और जब तक वह हमें पूरी रीति से अपनी ओर न खींच ले, और हमें उस लाभ का पूरा अनुभव न करा दे जो उसकी मृत्यु और दुःखभोग से हमारे लिए मोल लिया गया है, तब तक हम पर अपनी कृपामय भलाई बनाए रखे। कि वह यह अनुग्रह न केवल हमें, परन्तु सब लोगों को देने की कृपा करे। इत्यादि।
