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गलातियों के पहले अध्याय पर पहला उपदेश - गलातियों 1:1-5
1 पौलुस की ओर से, जो प्रेरित है, न मनुष्यों की ओर से, न मनुष्य के द्वारा, परन्तु यीशु मसीह और परमेश्वर पिता के द्वारा, जिसने उसे मरे हुओं में से जिलाया,
2 और सब भाइयों की ओर से जो मेरे साथ हैं, गलातिया की कलीसियाओं के नाम:
3 परमेश्वर पिता और हमारे प्रभु यीशु मसीह की ओर से तुम्हें अनुग्रह और शान्ति मिलती रहे,
4 जिसने अपने आप को हमारे पापों के लिये दे दिया, ताकि हमारे परमेश्वर और पिता की इच्छा के अनुसार हमें इस वर्तमान बुरे संसार से छुड़ाए।
5 उसकी महिमा युगानुयुग होती रहे। आमीन।
संत पतरस हमें व्यर्थ ही इतनी गम्भीरता से यह चेतावनी नहीं देता कि हम अपने उस शत्रु से सावधान रहें जो गर्जनेवाले सिंह के समान इधर-उधर घूमता है और जिसका मुँह शिकार को निगल जाने के लिये सदा खुला रहता है। क्योंकि यद्यपि एक ओर हमारा प्रभु यीशु मसीह हमें आश्वासन देता है कि परमेश्वर पिता ने हमें उसके सुपुर्द किया है, और जो कुछ उसकी रखवाली में है वह कभी नष्ट न होगा, तथापि इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि हम सो जाएँ और इस बीच परमेश्वर को पुकारने की कोई चिन्ता न करें, जबकि हमें इसकी कितनी आवश्यकता है। क्योंकि विश्वास हमें परमेश्वर की भलाई का ऐसा निश्चय दिलाता है कि फिर भी हमें अपनी निर्बलता पर दृष्टि रखनी चाहिए, और इस प्रकार प्रेरित होकर परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमें अजेय दृढ़ता प्रदान करे। कहा गया है कि विश्वास सदा सारे संसार पर जयवन्त होगा, परन्तु इससे यह नहीं निकलता कि हमें युद्ध न करना पड़ेगा। अब हम अपनी ओर से तो बिलकुल बलहीन हैं, हमें बल कहीं और से उधार लेना है, और ऐसा कर सकें इसके लिये परमेश्वर से प्रार्थना करना हमारे लिये आवश्यक है। क्योंकि, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, हमारी बड़ी आवश्यकता के कारण हमें इसके लिये जागृत होना ही चाहिए। इसलिये यहाँ सब विश्वासियों के सामने एक दर्पण रखा गया है, जिसे यदि हम अपने उपयोग में ला सकें तो हमारा बहुत भला होगा। क्योंकि संत पौलुस ने गलातिया के सारे देश में, जो एक काफ़ी बड़ा देश है, प्रचार किया था और वहाँ बहुत-सी कलीसियाएँ स्थापित की थीं। यदि कभी कोई मनुष्य मनुष्यों को सुसमाचार की ओर जीत लाने के लिये परमेश्वर के आत्मा के सब वरदानों से परिपूर्ण हुआ, तो हम निश्चय जानते हैं कि संत पौलुस सब से बढ़कर था, या कम से कम उन सब से जो उसकी मण्डली में थे। और यह निश्चित है कि उसने अपना कर्तव्य पूरा किया। फिर भी उसने मुश्किल से पीठ ही फेरी थी कि शैतान ने तुरन्त सब कुछ उलट देने के लिये धक्का दिया और सारे देश में भयंकर विनाश मचा दिया; और उसने वहाँ इतनी बड़ी भीड़ को अपनी ओर कर लिया कि सुसमाचार प्रायः पूरी तरह मिटा दिया गया, उन लोगों में भी जिन्हें इतनी विश्वासयोग्यता से सिखाया गया था। जब हम ऐसा उदाहरण देखते हैं, तो क्या हमें आँखें नीची करके यह विचार नहीं करना चाहिए कि परमेश्वर हमें चेतावनी देता है कि हम उसकी ओर भागें और उससे प्रार्थना करें कि वह हमें दृढ़ करे, ताकि हम अन्त तक टिके रहें? और यह हम उसके सँभाले बिना कर ही नहीं सकते। तो देखो, गलातिया के लोगों में जो दोष संत पौलुस यहाँ प्रकट करता है, वे हमारी शिक्षा के काम आने चाहिए। क्योंकि यह ऐसा है मानो परमेश्वर उनके व्यक्तित्व में दिखा रहा हो कि यदि वह हमें दृढ़ता न दे तो हमारी दृढ़ता कैसी होती।
यद्यपि हमें सुसमाचार की विश्वासयोग्य शिक्षा मिली है, फिर भी परमेश्वर को दिन-प्रतिदिन कार्य करते रहना पड़ता है, नहीं तो हम इतने चंचल मन के हैं कि तुरन्त और हर छोटे-से अवसर पर बह जाएँगे। इसके अतिरिक्त (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) शैतान एक भयंकर शत्रु है। इसलिये हमारे लिये असावधान होना उचित नहीं, क्योंकि वह सदा हमारी घात में लगा रहता है और चारों ओर से हम पर चढ़ाई करने का यत्न करता है, और यदि उसे ज़रा-सा भी छेद दिखाई दे तो तुरन्त उस से लाभ उठाकर भीतर घुस आता है। ऐसा प्रतीत भी न होगा कि उसके लिये कोई दरार खुली है, और फिर भी हम जान भी न पाएँ और पकड़े जाएँ। इसलिये आओ, इस पाठ में परमेश्वर जो चेतावनी हमें देता है उसे भली-भाँति ध्यान में रखें और उस से लाभ उठाएँ। और दूसरी ओर हम देखते हैं कि शैतान ने सब समयों में परमेश्वर के नाम से अपना काम निकाला है और उसे सत्य को छिपाने और उसे झूठ में बदलने के लिये, या फिर कोई फूट डालने के लिये झूठा लबादा बनाया है, ताकि धीरे-धीरे सुसमाचार बिलकुल फीका पड़ जाए। प्रेरित (जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के चुने हुए थे कि उसका सुसमाचार दूर-दूर तक ले जाएँ और सारे जगत में उसका प्रचार करें) हर स्थान पर आदर पाने के योग्य थे, और ऐसी ख्याति और अधिकार के योग्य थे कि जो बातें उनके द्वारा प्रकट हों वे भली-भाँति ग्रहण की जाएँ। क्योंकि उनकी बुलाहट वैध थी: यह सब जानते थे कि उन्होंने अपनी ओर से अपने आप को आगे नहीं ठेला, परन्तु परमेश्वर के पुत्र ने अपने ही मुँह से उन्हें चुना और ठहराया था, वरन् उन्हें मानो नई सृष्टि बना दिया था: वे सीधे-सादे और अनपढ़ लोग थे, पर ऐसे बदल गए कि भली-भाँति प्रकट हो गया कि उनकी शिक्षा पूर्णतः स्वर्गीय आश्चर्यकर्म से आई है। क्योंकि उन्होंने परमेश्वर की पाठशाला के सिवा और कहीं कुछ नहीं सीखा था; और उसने एक ही क्षण में उन्हें अपने अनुग्रह और सामर्थ्य से ऐसा सम्पन्न कर दिया कि वे पवित्र आत्मा के यन्त्र बन गए। फिर भी शैतान उनके नाम और पदवी का दुरुपयोग करके कलीसिया में बहुत-से क्लेश और ठोकरें डालने से न चूका। क्योंकि जो उनके साथ रहे थे वे दूर-दूर के देशों में जाकर डींग मारते थे कि वे उनके साथ घनिष्ठता से रहे हैं; और फिर भी उन में से कुछ व्यर्थ घमण्ड और अभिमान से भरे थे और अपनी ही उन्नति के सिवा कुछ न चाहते थे। कुछ दूसरे हठीले थे, और जो कुछ उन्होंने यरूशलेम नगर और यहूदिया देश में देखा था उसके सिवा किसी बात को सह न सकते थे; वे चाहते थे कि सारा संसार उनके शासन के अधीन हो और साथ ही, जैसा कहावत में कहते हैं, सब कुछ उलट-पुलट कर दें। कुछ और लोग इससे भी अधिक दुष्ट मन से प्रेरित थे, यहाँ तक कि वे इसके सिवा और कुछ न चाहते थे कि संत पौलुस ने जो कुछ बनाया था उसे गिरा दें। और ये सब (जैसा मैंने पहले कहा) घमण्ड करते थे कि उन्होंने उस से कुछ नहीं सीखा, परन्तु अपनी शिक्षा स्वयं प्रेरितों से पाई है। इस प्रकार देखो कि शैतान ने परमेश्वर की महिमा को सदा बिगाड़ा है, उन्हीं अनुग्रह के वरदानों की आड़ में जो उसने अपनी सृष्टि को दिए थे। और सचमुच हम देखते हैं कि प्रेरितों और कुँवारी मरियम के नामों की आड़ में आज पोप-तन्त्र में वही मूर्तिपूजा है जो अन्यजातियों में उनके झूठे देवताओं के नामों के अधीन थी: क्योंकि कुछ नहीं बदला, केवल नाम बदल गए हैं। जहाँ तक अन्धविश्वास का प्रश्न है, वह पोप-तन्त्र में उतना ही घिनौना और घृणित है जितना कभी अन्यजातियों में था।
इसलिये यहाँ हमें बुद्धिमान होने की चेतावनी मिलती है, ताकि यदि शैतान परमेश्वर के नाम का दुरुपयोग करे तो हम उसका सामना कर सकें, और यह परख सकें कि मनुष्यों को कितना अधिकार मिलना चाहिए, और साथ ही विश्वास करने में उतावले न हों, और हर हवा से हिलाए और डगमगाए जाने के लिये अत्यन्त सरलता से तैयार न हों। क्योंकि यदि जब हम पूरी तरह निश्चित हो चुके हों कि यह परमेश्वर का शुद्ध सत्य है, तब भी हम में उस शिक्षा पर चलने की दृढ़ता न हो जो हमें सौंपी गई है, तो हमारे साथ भी वही होगा जो गलातिया के लोगों के साथ हुआ। तो देखो कि जो बात हमें स्मरण रखनी है वह सार रूप में यह है: जब परमेश्वर ने हमें अनुग्रह दिया कि हम उसके वचन को समझें, तब हमें सदा उसी में आगे बढ़ते जाना है, और नरकटों के समान हिलाए न जाना है, न इधर-उधर बहना है, न छोटे बच्चों की तरह इधर-उधर घुमाए जाना है: परन्तु हम में इतनी समझ और विवेक होना चाहिए कि जो बात हम जानते हैं कि परमेश्वर की ओर से हमें दी गई है उसी से लगे रहें। इसे एक बात के रूप में ध्यान में रखो।
पर इसी बीच, चूँकि हम अपने में ऐसा सामर्थ्य नहीं रख सकते, आओ हम पूर्ण दीनता और गम्भीरता से परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह अपने पवित्र आत्मा से हमें सुधारे और हमें ऐसी दृढ़ता दे कि हम कभी इधर-उधर न भटकें, और जब हम इस संसार में सब कुछ उलट-पुलट होता देखें तब भी यह नींव अटल रहे, अर्थात् जब परमेश्वर ने, जो झूठ नहीं बोल सकता, हम से बात की है और हम पर अपनी इच्छा प्रकट की है, तो हम निडर होकर उसी पर खड़े रहें और उससे किसी ओर न हटें। फिर भी, चूँकि शैतान के पास हमें मार्ग से हटाने की बहुत-सी चालाक युक्तियाँ हैं, वरन् (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) वह परमेश्वर के नाम का दुरुपयोग करने से भी न हिचकेगा ताकि भीतर घुस आए और हम तक कोई पहुँच बना सके: इसलिये हमें समझना चाहिए कि मनुष्यों के प्रति हमारा आदर ऐसा हो कि इस बीच परमेश्वर पर कोई आँच न आए, और हमारा प्रभु कलीसिया के शिक्षक के रूप में हम पर पूरा अधिकार अपने ही पास रखे: और हमारा विश्वास न तो मनुष्यों के ज्ञान पर, न उनकी बुद्धि, सामर्थ्य या पवित्रता की किसी ख्याति पर निर्भर हो: परन्तु हमारे लिये प्रभु यीशु ही सदा सर्वोपरि रहे कि हम उसी पर विश्राम करें और स्थिर हों। क्योंकि यदि हमारा विश्वास परमेश्वर के उस शुद्ध सत्य पर आधारित न हो जो अपरिवर्तनीय है, तो निश्चय वह केवल हानि ही होगी। यही बात है जो हमें यहाँ गलातियों के विषय में रखे गए उदाहरण से सीखनी है। परन्तु इसी बीच कोई यह अनोखा समझ सकता है कि संत पौलुस उनके साथ इतनी कठोरता से क्यों व्यवहार करता है जैसा हम आगे देखेंगे, जबकि मामला परमेश्वर के खुले इन्कार या सुसमाचार के त्याग का नहीं था, न हमारे प्रभु यीशु मसीह की निन्दा या किसी कुख्यात मूर्तिपूजा के प्रचार का, परन्तु व्यवस्था की विधियों का था। क्योंकि जिनसे संत पौलुस इस पत्री में लड़ता है वे और कुछ नहीं मानते थे, केवल यह कि मूसा की व्यवस्था की विधियाँ मानी जानी चाहिए, और मनुष्य मृत्युदायक पाप के दण्ड के अधीन उनसे बँधे हैं। अब पहली दृष्टि में कहा जा सकता है कि उस विषय में उनका पक्ष अनुकूल था। क्योंकि उनका मामला पोप के जैसा नहीं था, जिसने अपने अत्याचार के काल में बहुत-से नियम गढ़े और यह-वह आज्ञा दी और बेचारी आत्माओं को दासत्व में डाला: वरन् उनका कहना यह था कि चूँकि व्यवस्था मनुष्यों की नहीं परन्तु परमेश्वर की थी, इसलिये वह मानी जानी चाहिए। इससे प्रतीत हो सकता है कि संत पौलुस के पास उस मत के विरुद्ध इतना उत्तेजित होने का कोई कारण न था, भले ही वह पूर्णतः ठीक और भला न हो। फिर एक और कारण भी है: अर्थात् हमें बाहरी बातों पर इतना हो-हल्ला नहीं मचाना चाहिए, जैसे कि एक दिन दूसरे से अधिक माना जाए या नहीं, अथवा सूअर का मांस भेड़ के मांस की तरह क्यों न खाया जाए। क्योंकि चाहे कोई मनुष्य कुछ विधियाँ माने, चाहे कोई न माने, उदाहरणार्थ यदि वह सूअर का मांस खाने से परहेज़ करे या ऐसा कोई और काम करे: तो क्या उसका ऐसा करना मसीही धर्म का पूर्ण त्याग है? नहीं। तो भी संत पौलुस का सारा झगड़ा यही है: और इसी पर वह चिल्ला उठता है कि गलातिया के लोग भटक गए हैं, कि उन्होंने हमारे प्रभु यीशु मसीह को छोड़ दिया है, और धर्मत्यागी बन गए हैं। कोई कहेगा कि वह अत्यधिक उग्रता से काम लेता है: परन्तु इसमें भी हमें चेतावनी मिलती है कि शैतान समय-समय पर छोटी-छोटी तुच्छ बातें ढूँढ़ निकालेगा कि हम जाने बिना ही सुसमाचार से दूर खिंच जाएँ, और इसलिये हमारा और भी अधिक सावधान होना आवश्यक है: क्योंकि हम अपने आप से तो ऐसे न होंगे, परन्तु सचमुच परमेश्वर से चलाए जाने के लिये विवश होना पड़ेगा। और बुद्धि का आत्मा उसी का कहा जाना भी निष्कारण नहीं, ताकि हम उसे उसी में ढूँढ़ें।
इसलिये आओ, हम वहीं की शरण लें: और यदि कोई ऐसी बात लाने का यत्न करे जो कुछ बहुत महत्त्व की नहीं दिखती, तो सोचें कि उसके पीछे कैसी कथा खिंच आ सकती है। और इसके प्रमाण में, जब हम सुसमाचार की सरलता से एक बार फिर जाएँ, तो हम व्यभिचारियों के समान हो जाएँगे: जैसा हमने पिछली पत्री में देखा कि संत पौलुस स्पष्ट कहता है कि जब शैतान हमें सुसमाचार की शिक्षा से फेरने आता है तब वह दलालों और लुच्चों के हथकण्डे अपनाता है। वह सदा कोई सुन्दर और भली घोषणा करता रहेगा, जैसे जब कोई लुच्चा किसी नवयुवती पत्नी या कुँवारी को धोखा देना चाहता है, तब वह कोई अश्लील शब्द या धूर्तता प्रयोग नहीं करता, क्योंकि वह जानता है कि वह उनसे घृणा करेगी: परन्तु वह धीरे-धीरे देखता रहेगा कि कैसे उसे अपने घातक विष से संक्रमित करे। शैतान इस विषय में ठीक ऐसा ही करता है। क्योंकि यदि वह (जैसा कहावत है) पहले ही झटके में अपने सींग दिखाए और खुले रूप में परमेश्वर का बैरी प्रकट हो जाए, तो हर कोई उससे दूर भागे और हम उससे घृणा करें। परन्तु वह चुपके से भीतर घुसता है और छोटी-छोटी दरारों से रेंगकर आता है, ऐसा कि हम चकित होंगे कि कैसे वह अनेक बातों में हम पर प्रबल हो गया, और हम तब भी अपने आप को भुलावा देते रहेंगे कि हम यीशु मसीह और उसकी कलीसिया का साथ नहीं छोड़ते। और फिर भी हम दूर हटा दिए जाएँगे, और अन्त में पाएँगे कि हम बिलकुल कट गए हैं।
इसलिये जब हम यह उदाहरण पढ़ते हैं कि शैतान ने यहाँ जिन कलीसियाओं का उल्लेख है उन्हें मूसा की व्यवस्था की विधियों की आड़ में बिगाड़ और भ्रष्ट कर दिया था: तो आओ हम और भी भली-भाँति सोचें, और सुसमाचार की सरलता से किसी भी प्रकार हटे बिना दृढ़ता से खड़े रहें। इसके अतिरिक्त, चूँकि वह व्यवस्था की विधियों पर झगड़ा और विवाद करता रहा है: आओ हम अपने चारों ओर भली-भाँति देखें कि जो कुछ यहाँ लिखा है उस सब से लाभ उठाएँ, और सदा चौकसी में खड़े रहें, ताकि हम शैतान की चालों और छलों को पहचान सकें। और जब कभी वह हमारे नीचे सुरंग लगाने का यत्न करे, तो हम अपने काम पर भली-भाँति ध्यान दें और सदा उसी पर टिके रहें जो हमने सीखा है, ताकि हम सब सन्देह से परे जानें कि सुसमाचार की शिक्षा में हमें कुछ ऐसा न मिलेगा जो परमेश्वर का शुद्ध वचन न हो। क्योंकि (जैसा मैंने कहा) यही वह बात है जिस पर हमारा विश्वास आधारित होना चाहिए। और यदि कोई उसमें ज़रा-सा भी कुछ जोड़े, तो हम न केवल उस पर सन्देह करें, वरन् उससे घृणा करें: क्योंकि जब परमेश्वर के शुद्ध सत्य में ऐसी खिचड़ी बनाई जाती है, तो वह भ्रष्टता के सिवा और कुछ नहीं हो सकती। अब हम उस क्रम पर आएँ जो संत पौलुस उस शिक्षा के विवेचन में रखता है, जिसे हम एक-एक बात करके देखेंगे। कि वह भली-भाँति सुना और ग्रहण किया जाए, इसके लिये वह अपना अधिकार प्रमाणित करता है, जिसे कुछ लोगों ने खण्डित करने का यत्न किया था। क्योंकि देखो, उन कुत्तों की, जो उसके विरुद्ध खड़े हुए, चाल यह थी कि वे दावा करते थे कि प्रेरितों ने उससे भिन्न शिक्षा दी। अब चूँकि संत पौलुस हमारे प्रभु यीशु मसीह के साथ नहीं रहा था जब वह इस संसार में जीवित था, इसलिये पहले यह माना गया कि प्रेरित उससे एक दर्जा ऊपर हैं और उन्हें उसकी अपेक्षा प्राथमिकता मिलनी चाहिए। और दूसरी ओर वे पूछते थे कि उसे उस पद पर किसने बैठाया, मानो उसने अपने आप को घुसेड़ दिया हो और ऐसा सोच-विचार किए बिना हठ में किया हो। इसलिये संत पौलुस को इस सारे झमेले के विरुद्ध खड़ा होना और दिखाना पड़ा कि वह सचमुच परमेश्वर की ओर से भेजा गया है। इसके अतिरिक्त (जैसा मैंने पहले कहा) शैतान ने औरों को भड़काया, जो यरूशलेम से आकर कहते थे कि वही मातृ-कलीसिया और समस्त मसीही जगत की पवित्रता है: और वे सुसमाचार की शुद्धता के उत्साही प्रचारक होने का ढोंग करते थे। इस कारण संत पौलुस को यह दिखाते जाना आवश्यक हुआ कि उसने अपने आप को ऊँचा नहीं उठाया, न अपनी ओर से कुछ अपने ऊपर ले लिया, परन्तु परमेश्वर और हमारे प्रभु यीशु मसीह की बुलाहट का पालन किया जिसने उसे अपना प्रेरित बनाया। हाँ, वह अपनी तुलना यूहन्ना, याकूब और पतरस से करता है, जो (जैसा लोग उन्हें कहते थे) कलीसिया के खम्भे थे और सब मनुष्यों में ऐसे ही माने जाते थे, और दिखाता है कि वह उनसे किसी बात में कम नहीं है। और वह ऐसा क्यों करता है? इसलिये कि उसकी शिक्षा ग्रहण की जाए: क्योंकि वही वह लक्ष्य है जिस पर उसकी दृष्टि थी। फिर जब वह गलातियों को उन चेतावनियों को आज्ञाकारिता से ग्रहण करने के लिये तैयार कर चुकता है जो वह उन्हें देता है: तब वह उस विषय पर बहस करता है जो उस समय विवाद में था, और दिखाता है कि यदि हमें वह स्वतन्त्रता न मिले जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के लहू से हमारे लिये मोल ली गई है, तो सुसमाचार गिरा दिया जाता है: और वह स्वतन्त्रता यह है कि व्यवस्था की विधियाँ हमें और अधीनता या भय में न रखें। क्योंकि (जैसा हम आगे देखेंगे) यदि ऐसी अधीनता मान ली जाए, तो हमारे छुटकारे का और परमेश्वर के पुत्र द्वारा हमारे लिये मोल लिए गए उद्धार का सारा फल नष्ट हो जाएगा।
अब हम उस क्रम पर आएँ जो संत पौलुस अपने अधिकार की रक्षा के लिये रखता है। वह कहता है कि वह प्रेरित है, न मनुष्यों की ओर से, न मनुष्य के द्वारा, परन्तु यीशु मसीह और परमेश्वर पिता के द्वारा, जिसने उसे मरे हुओं में से जिलाया। सब से पहले हमें यहाँ यह ध्यान देना है कि संत पौलुस, ग्रहण किए जाने के लिये, परमेश्वर की व्यवस्था और ठहराव पर अपने आप को आधारित करता है। क्योंकि निश्चय कोई मनुष्य कलीसिया में कोई सम्मान अपने ऊपर न ले, सिवा उसके जो बुलाया गया है, जैसा मैं पहले बता चुका हूँ। इसके अतिरिक्त हमारा विश्वास बहुत निर्बल होता यदि वह मनुष्यों पर स्थिर किया जाता, चाहे उनमें कितनी ही उत्कृष्टता या योग्यता क्यों न हो: हाँ, चाहे वे स्वर्गदूतों से भी सिद्ध होते, तो भी वह कुछ न था: हमारा विश्वास ऐसा बहुमूल्य रत्न है कि उसे पूर्णतः परमेश्वर और उसके सत्य पर ही टिकना चाहिए। चूँकि ऐसा है, यदि कोई चाहे कि उसकी सुनी जाए, तो यह तर्क न दिया जाए कि वह चतुर और निपुण है, या उसने बहुत देखा और सुना है और बड़े अनुभव का मनुष्य है: जब हमें स्वर्ग के राज्य की ओर ले चलने की बात आती है तो ये सब बातें धुआँ मात्र हैं। क्योंकि वहाँ बात गहरी बुद्धि और ऊँचे तथा परिष्कृत ज्ञान पर नहीं टिकती: ये सब बातें शैतान की चतुराई मात्र हैं: फिर, हम जानते हैं कि मनुष्य की सारी बुद्धि के विषय में सामान्यतः कहा गया है कि वह निरी मूर्खता है, वरन् परमेश्वर उसे उपहास में उड़ाता और उससे घृणा करता है, क्योंकि वह हमें उसकी आज्ञाकारिता से दूर करती है। इसलिये जब कभी हमें शिक्षा देने की बात हो, तो मनुष्य या किसी भी सृष्टि से सम्बन्ध रखनेवाली सब बातें एक ओर रख दी जाएँ, ताकि कलीसिया में सुव्यवस्थित शासन हो, और ऐसा जिसे परमेश्वर मान्य करे। क्योंकि यदि इस विषय में मनुष्य अपने आप को बढ़ाएँ तो उससे परमेश्वर पीछे हटा दिया जाता है, और अन्त में पूर्ण गड़बड़ी के सिवा कुछ न रहेगा।
इसलिये हमारे लिये और भी आवश्यक है कि जो कुछ संत पौलुस यहाँ हमें दिखाता है उस पर भली-भाँति ध्यान दें, कि वह अपने अधिकार की स्थापना के लिये अपनी ओर से कुछ नहीं बताता या लाता, परन्तु अपने आप को पूर्णतः परमेश्वर की बुलाहट पर ही रखता है। इसे एक बात के रूप में ध्यान में रखो। और इसके साथ हमें यह भी देखना है कि संत पौलुस ने बहुतेरे बावले लोगों की तरह अन्धाधुन्ध अपनी बड़ाई नहीं की। क्योंकि उनके मन में आ जाता है कि पूरे मुँह से प्रचार करें कि परमेश्वर ने उन्हें भेजा है, जबकि तौभी वे केवल कल्पनाशील लोग और शैतान के सच्चे योद्धा हैं जो सब कुछ उलट देने का काम करते हैं। परन्तु इसी बीच संत पौलुस अपनी बुलाहट का दावा करते हुए यह भी दिखाना चाहता था कि उसे किसने बुलाया, जैसा हम यहाँ पहले देख चुके हैं। और यह भली-भाँति जाना हुआ था कि वह आश्चर्यकर्म द्वारा सुसमाचार की ओर फिराया गया, कि उसे अचानक सिखाया गया, कि परमेश्वर ने उसके द्वारा एक अनोखे और अपरिचित ढंग से काम किया, और न केवल यह कि अन्ताकिया नगर में दो-तीन मनुष्यों पर खुले रूप में प्रकट हुआ कि संत पौलुस अन्यजातियों का प्रेरित ठहराया गया है, परन्तु यह भी कि जहाँ-जहाँ वह गया वहाँ सब स्थानों में उसके पास इसका उत्तम प्रमाण था, क्योंकि परमेश्वर ने उसमें अपनी सामर्थ्य अति स्पष्ट रूप से प्रकट की। इसलिये जब संत पौलुस ने उनसे कहा कि वह प्रेरित है, तो उसने यह मान लिया कि यह पर्याप्त रूप से प्रमाणित हो चुका है कि परमेश्वर उसके उस पद का रचयिता है, और जो कुछ वह दावा करता है वह मनुष्यों की रीति पर कोई झूठी कल्पना नहीं है, जिन्हें हम अपनी बड़ाई करने के बहुत अधीन देखते हैं। इसलिये हमें संत पौलुस में और उन सब में, जो झूठा घमण्ड और डींग मारते हैं कि वे परमेश्वर के भेजे हुए हैं, भेद करना चाहिए, जैसा पोप करता है, जो अभागे संसार को धोखा देने और अपने उस नारकीय अत्याचार को बनाए रखने के लिये, जो उसने हथिया लिया है, बार-बार कहता है कि वह यीशु मसीह का प्रतिनिधि और उसके प्रेरितों का उत्तराधिकारी है। और उसके याजक-वर्ग के सब कीड़े, जो अपने आप को प्रेलेट कहते हैं, और पोप-मण्डल के सब सींगवाले पशु और बहुरूपियों का सारा झुण्ड, उस आदरणीय पदवी का दावा करेंगे ही: और (यदि कोई उनके केवल कहने पर उनकी बात मानना चाहे) तो वे सब के सब प्रेरितों के वंशज हैं। फिर भी हमें यह विचार करना चाहिए कि उनमें और प्रेरितों में कितनी समानता और मेल है: और उनके लिये भी आवश्यक है कि निश्चित और अचूक अभिलेख से दिखाएँ कि उनकी बुलाहट परमेश्वर से अनुमोदित है। आजकल पोप और उसके सब लोग इतने खुले रूप में प्रमाणित हैं कि उन्होंने सुसमाचार की शिक्षा को झूठा बनाया और भ्रष्ट किया है, और जिसे वे परमेश्वर की सेवा कहते हैं वह निरी घृणित वस्तु के सिवा कुछ नहीं: और इसके अतिरिक्त उनके बीच घोर झूठ और मिथ्या के सिवा कुछ नहीं, वरन् शैतान के जादू-टोने हैं। यह सब भली-भाँति जाना हुआ है। परन्तु देखो, उनकी ढाल, जिससे वे वह धुन्ध फैलाते हैं जो उनकी सारी गन्दगी को ढाँप लेती है, यह है कि प्रेरितों के समय से निरन्तर उत्तराधिकार चला आया है, और वे उनका प्रतिनिधित्व करते हैं और वे ही कलीसिया हैं, इसलिये जो कुछ वे आगे रखें उसे भला मानना चाहिए। अच्छा, चलो, यदि आजकल जो वह पदवी अपने ऊपर लेते हैं वे चाहते हैं कि उनकी सुनी जाए: तो उन्हें देखना चाहिए कि उनमें प्रेरितों से कोई समानता है या नहीं, और वे भले और विश्वासयोग्य चरवाहों का कर्तव्य निभाते हैं या नहीं। परन्तु जब वे उस व्यवस्था के बिलकुल विपरीत हैं जो हमारे प्रभु यीशु मसीह ने अपनी कलीसिया में ठहराई है, तो मनुष्य उनसे क्या कहें? हाँ (वे कहते हैं), पर हमारा तो प्रेरितों से निरन्तर उत्तराधिकार है। पहले तो यही प्रमाणित किया जाना चाहिए। वे कुछ अभिलेख प्रस्तुत करेंगे, पर वे बहुत तुच्छ होंगे। तो भी दूसरे पक्ष से कहा जा सकता है कि गलातिया की कलीसिया में भी उतने ही अच्छे उत्तराधिकारी थे जितने कभी रोम में थे: और केवल किसी एक कलीसिया में नहीं, परन्तु बहुत-सी में, जैसे इफिसुस, कुलुस्से और फिलिप्पी में, और अन्य स्थानों में भी। और अब वह सारा उत्तराधिकार कहाँ है? यदि कोई अपने आप को किसी विशेषाधिकार का अधिकारी माने और संत पौलुस का उत्तराधिकारी कहलाए: तो उचित होगा कि वह जाकर सुसमाचार का प्रचार करे, और साथ ही यह उत्तम प्रमाण दे कि उसे क्यों ग्रहण किया जाए।
इसलिये एक ही शब्द में भली-भाँति ध्यान दो कि जब सुसमाचार का प्रचार करने के लिये मनुष्य हैं, और जब चरवाहे और अध्यक्ष हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वे परमेश्वर के अधिकार को घटाएँ या उसके किसी अधिकार की हानि करें, अर्थात् यह कि केवल उसी का आदर न हो और हमारा विश्वास उसके वचन पर न टिके: परन्तु यह कि मनुष्यों के द्वारा हम सदा उसकी आज्ञाकारिता के अधीन बने रहें। इसे विशेष बात के रूप में ध्यान में रखो। और सब से बढ़कर हमारा प्रभु यह अधिकार अपने ही लिये सुरक्षित रखता है: अर्थात् यह कि मनुष्य अपने ही अहंकार से घुस न आएँ, परन्तु उसके द्वारा उठाए और भेजे जाएँ। अब इसलिये (जैसा मैंने पहले कहा) इसका कारण होना चाहिए, ताकि हम परख सकें और अन्धाधुन्ध या बिना सोचे-समझे विश्वास न करें। क्योंकि शैतान के योद्धा डींग मार और शेखी बघार सकते हैं, और बहुत अधिक, और अपनी ही दृष्टि में अत्यन्त ऊँचे खड़े हो सकते हैं, ताकि अपने दुस्साहस से भीतर घुस जाएँ। परन्तु हमें जाँचना चाहिए कि उनमें क्या है, ताकि हम परमेश्वर की बुलाहट के विषय में निश्चित हों। और संत पौलुस इसके विषय में यहाँ क्या कहता है? न मनुष्यों की ओर से (वह कहता है), न मनुष्य के द्वारा। जब संत पौलुस कहता है कि वह प्रेरित है, मनुष्यों की ओर से नहीं: तो यह एक सामान्य बात है जो परमेश्वर के वचन के सब सेवकों और कलीसिया के सब चरवाहों पर लागू होनी चाहिए। क्योंकि (जैसा मैंने पहले कहा है) जब परमेश्वर को यह भला लगा कि प्राचीन काल में भविष्यद्वक्ता हों और फिर उसके बाद उसकी प्रजा को सिखाने के लिये चरवाहे हों: तो उसने अपनी प्रभुता नहीं छोड़ दी: वरन् यह दिखाने के लिये था कि मनुष्य यहाँ अपनी इच्छा के अनुसार शासन न करें और इस बीच स्वयं केवल शून्य के समान रहें, मात्र पदवी बनाए रखने के लिये, परन्तु हम सब उसी की सुनें, ऐसा कि जिन मनुष्यों को वह पद पर रखता है वे उसके पवित्र आत्मा के यन्त्र या पात्र हों। अब तो हम देखते हैं कि संत पौलुस का लक्ष्य क्या था जब उसने कहा कि वह मनुष्यों की ओर से नहीं भेजा गया: क्योंकि इससे वह दिखाता है कि उसे परमेश्वर का अधिकार प्राप्त था और वह उसका दास था।
दूसरी बात, जहाँ वह कहता है कि वह मनुष्य के द्वारा नहीं भेजा गया, विशेष रूप से प्रेरितों से सम्बन्ध रखती है। क्योंकि यद्यपि हम परमेश्वर की ओर से बुलाए गए हैं और वह हमें स्वीकार करता है, तथापि हम मनुष्यों के द्वारा भी बुलाए जाते हैं: और यदि बुलाहट की वह रीति परमेश्वर की इच्छा के अनुकूल न होती, तो संत पौलुस उसे काम में न लाता। हम जानते हैं कि इस विषय में संत पौलुस ने कैसे किया, अर्थात् यह कि जहाँ-जहाँ वह गया, उसने चुनाव के द्वारा सेवक और चरवाहे ठहराए: और निःसन्देह उसका ऐसा करना वैध था। इसलिये भली-भाँति ध्यान दो कि संत पौलुस यहाँ बिना विवेक के उन्हें दोषी नहीं ठहराता जो मनुष्यों के माध्यम से बुलाए गए: वह केवल उस बात की चर्चा करता है जो प्रेरित के कार्यभार की विशेषता थी। क्योंकि प्रेरितों में और उनमें जिन पर विशेष कलीसियाओं का भार था, यही भेद था: और उसी के अनुसार वही स्थिति आज भी बनी है, और जगत के अन्त तक बनी रहेगी। क्योंकि प्रेरित मनुष्यों के चुनाव से, या कलीसिया की सामान्य व्यवस्था से नहीं चुने गए: परन्तु परमेश्वर के पुत्र के अपने मुँह से। यहाँ तक कि जब प्रेरितों को यहूदा के स्थान पर दूसरा उत्तराधिकारी रखना आवश्यक हुआ, कि बारह की पूरी संख्या फिर से पूरी हो: तब यद्यपि वे स्वयं वहाँ उपस्थित थे और चेलों की एक बड़ी भीड़ उनके साथ थी: तो भी उन्होंने कोई चुनाव करने का साहस न किया। जब यरूशलेम की कलीसिया के लिये, या अन्ताकिया या किसी और लोगों के लिये किसी चरवाहे का चुनाव करना होता था, तो यह रीति काम में लाई जाती थी: अर्थात् पहले वे परमेश्वर से प्रार्थना करते, और तब ऐसे मनुष्य को चुनते जो उस पद के लिये उचित और योग्य पाया जाता। परन्तु उस दूसरे के विषय में उन्होंने उसे पूर्णतः परमेश्वर की इच्छा पर छोड़ा और चिट्ठियाँ डालीं, मानो वह उनकी बुद्धि से परे की बात हो। इसका कारण (जैसा मैंने कहा) यह था कि प्रेरितों का ऊपर से विशेष अधिकार के द्वारा चुना जाना आवश्यक था, क्योंकि वे वही मनुष्य थे जिनके द्वारा सुसमाचार सारे जगत में प्रकाशित होना था। अब जहाँ तक संत पौलुस की बात है, वह बाद में चुना गया। परन्तु जैसा भी हो, उसे शेष सब के बराबर अधिकार प्राप्त था, क्योंकि स्वर्ग से प्रकाशन आया जिसने दिखाया कि वह उस पद के निर्वाह के लिये ग्रहण किया गया है: वह उठाकर तीसरे स्वर्ग तक पहुँचाया गया, और हम देख चुके हैं कि वह सब बातों में भली-भाँति स्वीकार किया गया।
अन्ततः, कि यह प्रकट हो कि परमेश्वर की इच्छा थी कि उसे बड़ा अधिकार-पत्र दे और उसे अन्यजातियों के प्रेरित के रूप में चिह्नित करे: उसे सीधे पवित्र आत्मा प्राप्त हुआ, जिसने ऊपर से वचन कहा और सुनाया। तो देखो कि संत पौलुस मनुष्यों के माध्यम से नहीं चुना गया। फिर भी (जैसा मैंने पहले कहा) चुनने की यह रीति कलीसिया के चरवाहों और सेवकों में कोई दोष नहीं है। परन्तु संत पौलुस को यह विशेषाधिकार मिलना आवश्यक था, ताकि वह पतरस और यूहन्ना के और उन सब के बराबर ठहर सके जो परमेश्वर के पुत्र के साथ रहे थे और उसकी संगति में थे जब वह इस संसार में, इस मरणशील जीवन में रहता था। अब हम सार रूप में देखते हैं कि संत पौलुस का लक्ष्य क्या था। और इससे हमें यह शिक्षा मिलती है कि जो आदर हमें उनके प्रति देना चाहिए जो परमेश्वर का वचन दूर-दूर तक ले जाते हैं और चरवाहे का नाम धारण करते हैं, वह इसलिये नहीं कि परमेश्वर को निरन्तर सुने जाने से रोके, न इसलिये कि हमारे प्रभु यीशु मसीह को कलीसिया का एकमात्र शिक्षक होने से रोके। हमें इस पाठशाला की बात को भली-भाँति मन में रखना चाहिए, नहीं तो हमारा विश्वास सदा बहुत-सी भिन्नताओं के अधीन रहेगा, और जो मनुष्यों में सबसे चतुर होगा वह सदा बाज़ी मार ले जाएगा: और हमारे पास कुछ निश्चित न रहेगा, वरन् हम दिन-प्रतिदिन, यहाँ तक कि घण्टे के हर क्षण बदलते रहेंगे।
इसलिये भली-भाँति ध्यान दो कि यदि मनुष्य कलीसिया, प्रेलेटों या बिशपों के नाम का हवाला दें: तो हमें सदा इसी बात पर लौट आना चाहिए कि वे यीशु मसीह के दास होने से ऊँचे नहीं चढ़ सकते, और उसी से मान्य होने चाहिए। और हम कैसे जानें कि वे उससे मान्य हैं? पहले, यदि वे वैध क्रम से, परमेश्वर का नाम लेकर प्रार्थना करते हुए चुने गए हैं। और दूसरे, यदि ऐसे चुने गए हैं जो योग्य हैं, जिनमें अपने पद को निभाने की क्षमता है। देखो, ये वे चिह्न हैं जिनसे हम जान सकते और निश्चित हो सकते हैं कि वे ऐसे चरवाहे हैं जिन्हें परमेश्वर मान्य करता और स्वीकार करता है। और इसके साथ किसी मनुष्य का उस बुलाहट पर बुलाया जाना ही काफ़ी नहीं: उसे वह कार्यभार भी निभाना चाहिए जो उसे सौंपा गया है, जैसे संत पौलुस केवल यही नहीं कहता कि वह प्रेरित ठहराया गया: परन्तु उस नाम को अपने लिये लेकर वह दिखाता है कि वह उद्धार का सन्देश दूर-दूर तक ले जाने और जगत में सुसमाचार का प्रचार करने के लिये भेजा गया है। इसलिये जो बिशप और प्रेलेट माने जाना चाहते हैं उन्हें सिखाना चाहिए: और यदि वे मूर्तियाँ और गूँगे कुत्ते हैं, तो निश्चय है कि जैसे वे लज्जाजनक रीति से परमेश्वर के नाम का उपहास करते और उसकी महिमा का दुरुपयोग करते हैं, वैसे ही मनुष्य उन्हें अस्वीकार कर सकते और तुच्छ जान सकते हैं, वरन् उन्हें शापित मानना चाहिए, क्योंकि वे परमेश्वर के नाम का झूठा ढोंग करते हैं। इस प्रकार देखो कि इस प्रसंग में हमें क्या ध्यान देना है। अब संत पौलुस जान-बूझकर कहता है कि वह यीशु मसीह और परमेश्वर पिता की ओर से भेजा गया जिसने उसे मरे हुओं में से जिलाया। जब वह कहता है कि वह यीशु मसीह की ओर से भेजा गया, तो यह हमें उस बात की ओर लौटाने के लिये है जिसे मैं पहले छू चुका हूँ: अर्थात् यदि हम परमेश्वर की आज्ञा मानना और उसके अधीन होना चाहते हैं, तो हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह को अपनाना और उसे एकमात्र शिक्षक जानकर उसकी सुनना चाहिए: और छोटे-बड़े सब उसके और उसकी शिक्षा के अधीन हों: क्योंकि जो पुत्र का आदर नहीं करता वह पिता का भी आदर नहीं करता, जैसा यूहन्ना के पाँचवें अध्याय में कहा गया है। और यह भली-भाँति ध्यान देने योग्य है: क्योंकि हर मनुष्य चाहता है कि उसे परमेश्वर का आदर करनेवाला समझा जाए और यह कि वह इससे बढ़कर कुछ नहीं चाहता कि अपने आप को उसके जूए के नीचे रखे। परन्तु इस बीच हम देखते हैं कि संसार सुसमाचार से लड़ता है, और कोई मनुष्य अपने मन में स्वेच्छा से उसके आगे झुकना नहीं चाहता। जब यह बात आती है कि यीशु मसीह हमें अपने पास बुलाता है, तो हम में से हर एक विद्रोही बन जाता है: हम इतने जंगली हैं कि वह हमें वश में नहीं कर सकता: इससे हमारा अविश्वास इतने स्पष्ट रूप से प्रमाणित होता है, और हम दिखाते हैं कि हम परमेश्वर को तुच्छ जानते हैं, चाहे पहले हमने कितनी ही सुन्दर घोषणाएँ क्यों न की हों। क्योंकि वह हमें अपने पुत्र के पास भेजता है और चाहता है कि हम उसके आगे झुककर उसकी अधीनता स्वीकार करें। तो भी, जैसा हम देखते हैं और जैसा अनुभव बहुत ही दिखाता है, हर मनुष्य हमारे प्रभु यीशु मसीह की अधीनता से कतराएगा। इसलिये संत पौलुस दिखाता है कि यीशु मसीह में कैसी महिमा है: अर्थात् हमें उसके वचन से काँपना चाहिए, और जब वह बोले तब चुप रहना चाहिए, और जो कुछ वह सिखाए, या उसकी ओर से आए, उसे बिना किसी विरोध के ग्रहण करना चाहिए। और इसके बिना निश्चय है कि परमेश्वर वे सब घोषणाएँ ठुकरा देता है जो हम उसकी सेवा और आदर करने की इच्छा के विषय में कर सकते हैं। इस प्रकार इस प्रसंग में हमें उपदेश दिया जाता है कि हम अपने आप को पूर्णतः अपने प्रभु यीशु मसीह के हाथ सौंप दें, क्योंकि वही हमारा एकमात्र चरवाहा है, और इस प्रकार दिखाएँ कि हम उसकी सच्ची भेड़ें हैं, और उसका शब्द सुनते हैं और उसे परायों के शब्द से पहचान लेते हैं। अब चूँकि परमेश्वर अपने आप को हम पर ऐसे प्रकट करता है कि हम जानते हैं कि हमारा प्रभु यीशु मसीह हमें अपने पास बुलाता है: तो हम में से हर एक उसके पीछे हो ले और दिखाए कि हम सचमुच उसके झुण्ड के हैं। इस प्रकार देखो कि हमें क्या स्मरण रखना है। तथापि, चूँकि बहुतों में ऐसी कृतघ्नता है कि वे अपने मन में परमेश्वर के पुत्र के भी अधीन होना नहीं चाहते: संत पौलुस यहाँ अतिरिक्त रूप में परमेश्वर पिता का नाम रखता है। यह सच है कि ईश्वरत्व की सारी परिपूर्णता यीशु मसीह में बसती है, और शापित हो वह जो कोई और परमेश्वर ढूँढ़े। परन्तु फिर भी, क्योंकि हमारा प्रभु यीशु मसीह हमारे सामने मनुष्य के रूप में प्रकट हुआ, और इस संसार में रहा, और वहाँ तुच्छ जाना गया, वरन् अति लज्जाजनक मृत्यु तक नीचा किया गया, जिसमें उसने वे सब शाप अपने ऊपर लिये जो हम पर आने थे: इसलिये कहा गया है कि यदि हम परमेश्वर के पुत्र की न सुनें, तो पिता की भी हानि होती है, जैसा हमारा प्रभु यीशु स्वयं घोषणा करता है जब वह कहता है, “जो तुम्हें तुच्छ जानता है वह मुझे तुच्छ जानता है, और जो मुझे तुच्छ जानता है वह उसे तुच्छ जानता है जिसने मुझे भेजा।” तो देखो कि संत पौलुस जो क्रम रखता है उसका लक्ष्य क्या है: अर्थात् यदि हम अपने प्रभु यीशु मसीह की शिक्षा को निश्चित और अचूक मानकर उसका स्वेच्छा से आदर न करें, तो परमेश्वर तुच्छ ठहराया जाता है, और हम यह नहीं कह सकते कि हमारा उद्देश्य उसकी आराधना करना है, क्योंकि वह हमारे सब कामों को ठुकरा देगा। और क्यों? क्योंकि (जैसा मैंने पहले कहा) हमें विद्रोही प्रमाणित करने के लिये यही काफ़ी है कि हम पुत्र को उसके पिता से अलग करें। और संत पौलुस स्पष्ट रूप से जोड़ता है कि यीशु मसीह मरे हुओं में से जिलाया गया, ताकि उसकी प्रेरिताई कम आँकी न जाए, और यह भी कि मनुष्य उसे अन्य प्रेरितों की संख्या और मण्डली में गिनें, जैसा वह उनमें तब जोड़ा गया जब यीशु मसीह पृथ्वी पर और न रहा। क्योंकि (जैसा मैं पहले छू चुका हूँ) जिस बात से सब कुछ उलट देने आए झूठे प्रेरित उसे ताना मारते थे वह यह थी: क्यों, [वे कहते थे] यह क्या है? यह तो परमेश्वर के पुत्र का चेला नहीं रहा जैसे पतरस और यूहन्ना थे: यह तो असमय जन्मा हुआ है। और वह कैसे दिखा सकता है कि उसने अपनी शिक्षा यीशु मसीह से पाई? संत पौलुस घोषणा करता है कि यदि वे हमारे प्रभु यीशु मसीह के अधिकार की पूछताछ करना ही चाहते हैं, तो उसके पुनरुत्थान ने उसे घटाया नहीं होना चाहिए। निश्चय यद्यपि हमारा प्रभु यीशु मसीह उस समय नीचा किया गया जब उस पर मनुष्य-स्वभाव का परदा पड़ा था, जिससे उसकी महिमा एक प्रकार से छिपी थी: तो भी वह अपने आप में नीचा नहीं हुआ।
क्योंकि हम जानते हैं कि स्वर्गदूतों ने उसे अपना परमप्रधान राजा माना, और यद्यपि वह एक गौशाला में जन्मा और सब सहायता से वंचित प्राणी के समान भूमि पर लिटाया गया: तो भी हम देखते हैं कि आकाश के तारों ने उसकी गवाही दी। संक्षेप में, हमारे प्रभु यीशु मसीह की महिमा का सदा पर्याप्त प्रमाण दिया गया, जब तक वह इस संसार में था। फिर भी उसके पुनरुत्थान में कहीं अधिक उत्कृष्ट महिमा थी, जैसा रोमियों की पहली पत्री में कहा गया है कि तब वह परमेश्वर का पुत्र ठहराया गया। और हमने कुरिन्थियों की दूसरी पत्री में भी देखा है कि जैसे वह शरीर की निर्बलता में दुख उठाता रहा, वैसे ही परमेश्वर के आत्मा की अद्भुत सामर्थ्य से जिलाया गया। इसलिये संत पौलुस दिखाता है कि यद्यपि हमारा प्रभु यीशु मसीह आजकल हमारे साथ नहीं रहता, तो भी इसलिये उसकी महिमा घटाई या बिगाड़ी नहीं जानी चाहिए कि हम उसे उसकी उचित और योग्य आज्ञाकारिता न दें, और उसके वचन को आदर के साथ बिना किसी विरोध के ग्रहण न करें। यह चेतावनी हमारे लिये बहुत लाभदायक है। क्योंकि हम कितने ही हल्के मन के लोगों को देखते हैं जो चाहते हैं कि यीशु मसीह यहाँ दृश्य रूप में हो? उनका कहना है, कि वे यीशु मसीह को यहाँ नीचे रहता देखना चाहेंगे, और तब वे पहले ही झटके में जो कुछ वह उनसे कहे ग्रहण कर लेंगे, ऐसा कि उन्हें मोहित करने के लिये उसके मुँह का एक ही शब्द काफ़ी होगा, और न कोई और शिक्षा, न कोई और मनुष्य हमारे बीच अधिक रहने की आवश्यकता होगी।
हाँ, परन्तु परमेश्वर का पुत्र जो नीचे आया, उसने वह कार्यभार पूरा किया जो परमेश्वर पिता की ओर से उसे सौंपा गया था: अर्थात् उसने सुसमाचार का प्रचार किया और उसे अपनी मृत्यु और दुखभोग से भली-भाँति पक्का किया। फिर मरे हुओं में से जी उठकर उसने अपने प्रेरितों को भेजा। और अब जब उसे सर्वोच्च प्रभुता प्राप्त है, ऐसी कि स्वर्गदूत उसके आगे घुटने टेकते हैं, और उसमें ऐसी महिमा है जो स्वर्ग और पृथ्वी दोनों की सब महिमा से बढ़कर है: क्या जो कुछ उसने किया है वह सब हमारे लिये पूर्णतः काफ़ी नहीं होना चाहिए? जब उसे भला लगता है कि हम मरणशील मनुष्यों को भेजे, और अपने सुसमाचार का सन्देश और अनमोल खज़ाना भंगुर पात्रों में भेजे, और फिर भी चाहता है कि हम उन्हें ग्रहण करें: तो क्या यह उपहास नहीं कि कहा जाए कि यदि यीशु मसीह हमारे साथ और हमारी संगति में होता, तो हम उसकी आज्ञा मानते? क्योंकि यदि स्वर्ग और पृथ्वी को उसके आगे थरथराना पड़े और उसकी महिमा नरक के दुष्टात्माओं को भी ज्ञात हो: और फिर भी हम जड़ बने रहें और बहाना करें कि वह हमसे बहुत दूर है: तो भी हमारा प्रभु यीशु पर्याप्त दिखाता है कि उसने हमें त्यागा नहीं, क्योंकि हमारे सुनने के लिये सुसमाचार का प्रचार होता है: और यद्यपि वह यहाँ नीचे दृश्य रूप में हमारे साथ नहीं रहता, तो भी हम निरन्तर उससे जुड़े रहेंगे, और चूँकि वह हमारा सिर है, वह अपनी देह पर शासन करेगा, और उसके और हमारे बीच एक अटूट बन्धन होगा। अब जब ऐसा है, तो हमारा कर्तव्य है कि उसे आज्ञाकारिता दें, और उसका पुनरुत्थान हमें भीतर तक छुए, और हम में ऐसी श्रद्धापूर्ण भय की भावना उत्पन्न करे कि जब कभी हमारे प्रभु यीशु मसीह का नाम लिया जाए, हम निश्चित जानें कि यह वही नाम है जिसकी चर्चा भविष्यद्वक्ता करता है, जिसकी सब मनुष्यों को शपथ खानी चाहिए और जिसके आगे घुटने टेकने चाहिए। इस प्रकार देखो सार रूप में कि जो बात हमें स्मरण रखनी है, वह यह है कि हम सुसमाचार को उन लोगों के आदर और ख्याति के अनुसार न मापें जो हम से बोलते हैं, क्योंकि वे निर्बल मनुष्य हैं। और न ही यह वह बात है जिस पर हमें रुकना चाहिए: क्योंकि यह तो वैसा ही होगा जैसा कहना कि हम अपना उद्धार मनुष्यों की साख पर टिकाएँ, जिससे हम संसार पर टिक जाएँ: परन्तु हमें समझना चाहिए कि यीशु मसीह ही बोलता है। और कैसे? उस महिमा में जो परमेश्वर पिता की ओर से उसे दी गई है: क्योंकि पवित्र आत्मा की सामर्थ्य तब पूर्ण रूप से प्रकट हुई जब वह मरे हुओं में से जिलाया गया। तो जब हमारे प्रभु यीशु मसीह ने स्वर्ग में उठाए जाते समय ऐसा अधिकार पाया कि सब सृष्टि पर प्रभुता रखे: तो आओ हम उसके अधीन होना सीखें, और यही हमें भय में रखे कि हम उसका वचन ग्रहण करें और अपने आप को निश्चित करें कि वही हम पर शासन करता है, और यह कि हमें उसके नाम से सिखाए जाना स्वीकार करना शोभा देता है, और यह समझें कि यद्यपि हमें सुनाया जानेवाला वचन मनुष्यों के मुँह से निकलता है, तो भी वह परमेश्वर के अधिकार से है, और हमारा उद्धार उसी पर आधारित होना चाहिए, वैसे ही जैसे स्वर्ग लाख बार खुलकर हमें परमेश्वर की महिमा दिखाता। देखो (मैं कहता हूँ), हमें इस संसार में कैसे शिक्षित होना चाहिए, जब तक परमेश्वर हमें अपनी अनन्त मीरास में इकट्ठा न कर ले। और यही बात हमें स्मरण रखनी है, कि हमारे प्रभु यीशु मसीह की महिमा इस स्थान में स्पष्ट रूप से रखी गई है।
अब आओ, हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने दोषों को स्वीकार करते हुए गिर पड़ें, और उससे प्रार्थना करें कि वह कृपा करके हमें उनका बोध कराए, ताकि वह हमें और भली-भाँति पश्चाताप की ओर खींचे, और हम सदा यह आशा रखें कि यदि हम एक बार उससे नए किए गए, तो हम भली-भाँति जान लेंगे कि वही अपने पवित्र आत्मा से हम पर शासन करता है, ऐसा कि वह साक्षी हमारे हृदयों में अंकित होकर हम बिना पाखण्ड के घमण्ड कर सकें कि हम इस संसार से बँधे नहीं हैं यद्यपि हम इसमें हैं, और हम इसमें केवल यात्री और परदेशी के समान रहते हैं, क्योंकि स्वर्ग में हमारा एक उत्तम निवासस्थान है, जहाँ हमारी मीरास विश्वास के द्वारा हमारे लिये पूर्णतः सुरक्षित है, यद्यपि हम उसके अधिकारी अभी नहीं हैं। कि वह यह अनुग्रह न केवल हमें, परन्तु पृथ्वी के सब लोगों और जातियों को भी देने की कृपा करे, इत्यादि।
