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चौदहवाँ उपदेश, जो दूसरे अध्याय पर आठवाँ है - गलातियों 2:20-21
चौदहवाँ उपदेश,
जो दूसरे अध्याय पर आठवाँ है।
20 इसलिए मैं जीवित हूँ: [फिर भी] अब मैं नहीं, परन्तु मसीह मुझ में जीवित है, और मैं शरीर में अब जो जीवित हूँ तो परमेश्वर के पुत्र पर विश्वास करने से जीवित हूँ, जिसने मुझ से प्रेम किया और मेरे लिये अपने आप को दे दिया।
21 मैं परमेश्वर के अनुग्रह को व्यर्थ नहीं ठहराता: क्योंकि यदि व्यवस्था से धार्मिकता होती, तो मसीह का मरना व्यर्थ होता।
आज सुबह हमने देखा कि जब हमारा प्रभु यीशु मसीह हमें अपनी देह में एक साथ जोड़ता है, तब हम किस उद्देश्य से परमेश्वर के लिये बलिदान के रूप में चढ़ाए जाते हैं। यह इसलिए नहीं कि हम उस मृत्यु में पड़े रहें जिसमें हम स्वभाव से पहले ही डूबे हुए हैं, वरन् इसलिए कि हमें स्वर्गीय जीवन का भागी बनाया जाए। अब प्रेरित, इस प्रकार कहकर, परमेश्वर के अनुग्रह की महिमा करता है, और कहता है कि वह स्वयं अब जीवित नहीं रहा, परन्तु यीशु मसीह उसमें जीवित है। यह वैसा ही है मानो उसने कहा हो कि हम सब के भीतर स्वभाव से दुर्दशा के सिवाय और कुछ नहीं है। इसलिए परमेश्वर हमें जो कुछ भी भलाई देता है, उसे यह मानना और स्वीकार करना हमारा कर्तव्य है कि वह उसी की ओर से है, और उसके लिये उसकी सेवा करना भी। क्योंकि विश्वास सदा अपने साथ यह नम्रता लाता है कि मनुष्य अपने आप को दीन करके सारी स्तुति परमेश्वर को दे देते हैं।
परन्तु प्रसंगवश, यह अजीब लग सकता है कि एक विश्वासी मनुष्य यह घमण्ड करे कि यीशु मसीह उसमें जीवित है, जबकि वह अब भी नश्वर है। जब तक हम इस संसार में जीते हैं, हम अनेक निर्बलताओं के अधीन हैं। इसलिए यह कथन कि यीशु मसीह हम में जीवित है, एक व्यर्थ कल्पना या मनगढ़न्त विचार जैसा प्रतीत हो सकता है। परन्तु सन्त पौलुस हमें विश्वास की ओर लौटा लाता है और हमें बताता है कि यद्यपि हमारा जीवन बाहर से नाशमान दिखाई देता है, और हम संसार की सब प्रतिकूलताओं के अधीन हैं, फिर भी विश्वास हमें जिलाता है, ताकि हमारा प्रभु यीशु मसीह हमें अपने स्वर्गीय जीवन का भागी बनाने से न रुके। वस्तुतः हम उसके स्वामी हैं, इस अर्थ में कि अब हमें विश्वासियों की दशा को उस आधार पर नहीं आँकना चाहिए जिसका निर्णय हमारी स्वाभाविक बुद्धि से किया जा सकता है, वरन् और ऊपर उठना चाहिए। क्योंकि जो जीवन हमारा प्रभु यीशु मसीह हमें देता है वह एक छिपा हुआ खज़ाना है, जिसे हम केवल विश्वास के द्वारा पाते हैं, जो सारे संसार से ऊपर उठता है।
अब हमारे लिये उचित है कि हम उन बातों की आशा रखें जिन्हें हम नहीं देखते और जो हम से छिपी हुई हैं। परमेश्वर का हमारे द्वारा तब बड़ा आदर होता है जब हम उसके वचन और प्रतिज्ञाओं को इतना महत्त्व देते हैं कि संसार में दिखाई देनेवाली सब बातें हमें निरन्तर उसे ढूँढ़ने, उसके पास जाने और अपनी सारी बुद्धि उसी में लगाने से रोक नहीं सकतीं।
इसलिए पहले तो हमें इस पाठ से यह सीखना है कि मनुष्य ने सुसमाचार में कभी भली-भाँति उन्नति नहीं की, जब तक कि वह अपना सारा कल्याण हमारे प्रभु यीशु मसीह का न माने। क्योंकि यदि हम अपने लिये थोड़ा-सा भी बचा रखें, तो हम परमेश्वर के प्रति सरासर कृतघ्न हैं, और उसके अनुग्रह को हम धुँधला नहीं कर सकते, बिना इसके कि हम उससे वंचित हो जाएँ, जैसा कि हम उचित रूप से योग्य हैं।
इस दृष्टि से प्रकट होता है कि जो अपने पुण्यों पर भरोसा रखते हैं वे अब भी घमण्ड से भरे हैं और परमेश्वर की महिमा के प्राणघातक शत्रु हैं। यह सच है कि वे इसे अपने मुँह से नहीं मानेंगे, तो भी जो कपटी अपनी ही योग्यता से धर्मी होने की आशा रखते हैं, वे परमेश्वर के पंखों से अपने को सजाते हैं। नम्रता सब गुणों में प्रमुख गुण है। क्योंकि उनके सारे पुण्य हैं ही क्या? इसके विपरीत, जब विश्वासी अपने आप को दीन करते हैं, तो वह इसलिए नहीं कि परमेश्वर की दृष्टि में मानो योग्य होकर अनुग्रह मोल लें, परन्तु इसलिए कि वे सत्य के अनुसार यह मान लें कि उनके पास घमण्ड करने को कुछ नहीं है और उन्हें सब कुछ परमेश्वर की निरी उदारता से पाना है।
कम से कम यह हमें यह स्वीकार कराने के काम आता है कि हम उसके कितने ऋणी हैं, क्योंकि उसने हमारे प्रति ऐसी कृपा दिखाई कि हमारे लिये कुछ भी बचा न रखा। इसलिए यही बात सन्त पौलुस हमें यहाँ दिखाता है। और हमें उस दूसरी बात को भली-भाँति तौलना चाहिए जहाँ वह कहता है कि हम शरीर में जीते हैं, तो भी अपने प्रभु यीशु मसीह के विश्वास से। इस पाठ में "शरीर में जीना" इस वाक्यांश का अर्थ है यहाँ पृथ्वी पर यात्री होना और इस क्षणभंगुर जीवन से होकर गुज़रना। क्योंकि जब वह रोमियों 8 में शरीर में जीने की बात कहता है, तो उसका अर्थ दुष्ट अभिलाषाओं के वश में होना है, जैसे वे लोग जिन में परमेश्वर का कोई भय नहीं, जो जो चाहें वही करने में लगे रहते हैं। इसलिए जो पशुओं के समान अपनी ही लालसाओं के पीछे चलते हैं वे शरीर में जीते हैं।
परन्तु इस स्थान पर सन्त पौलुस इस बाहरी जीवन की तुलना उस स्वर्गीय जीवन से करता है जो हमें विश्वास से मिलता है। क्योंकि मनुष्य विश्वासी और अविश्वासी में भेद कैसे करेगा? दोनों खाते और पीते हैं। निश्चय ही विश्वासी संयम से खाते-पीते हैं। फिर भी, तुम अविश्वासियों में से बहुतों को बहुत संयमी देखोगे, जो किसी मतवालेपन या अति में नहीं पड़ते। पर वे जैसे भी रहें, पहली दृष्टि में यही समझा जाएगा कि यह जीवन सब मनुष्यों का साझा है। फिर भी विश्वासी प्रायः अपने पंख घसीटते हैं और इस संसार में बस मुरझाते रहते हैं और अन्त में अन्य सब मनुष्यों के समान मर जाते हैं। तब यदि कोई केवल बाहरी रूप को देखे, तो उनके बीच कोई भेद नहीं।
संक्षेप में, कोई कह सकता है कि यीशु मसीह पर विश्वास करना व्यर्थ का परिश्रम ही है। क्योंकि हमें अपने विश्वास का प्रतिफल यहाँ नहीं मिलता, और यद्यपि परमेश्वर हमें किसी और बात के लिये बुलाता है, फिर भी हम सब का जीवन एक-सा और साझा है, इस अर्थ में कि हम सब को मृत्यु तक पहुँचना है। तब यीशु मसीह हम में कैसे जीवित है? क्योंकि उसका जीना छिपा हुआ है। सन्त पौलुस हमें विश्वास की ओर लौटा लाता है।
अब यह जानना शेष है कि विश्वास का स्वभाव क्या है: वह उन बातों को देखना है जो हमारी इन्द्रियों की समझ से परे हैं, संसार को त्यागना, परमेश्वर के राज्य को खोजना, और उस शुद्ध और सीधे वचन से लगे रहना जो परमेश्वर के मुख से निकलता है, उस किसी भी बात का ध्यान किए बिना जो हम यहाँ देख सकते हैं। यदि हमारे पास यह नींव न हो, तो सन्त पौलुस इस पाठ में जो हमें बताता है उसे हम कभी नहीं समझेंगे। क्योंकि जब मनुष्य इसे सौ बार पढ़ लें, तब भी वे न जानेंगे कि शरीर में जीने और अपने प्रभु यीशु मसीह के विश्वास में जीने के बीच क्या अन्तर है।
तब एक बाहरी दशा है, जिसके सम्बन्ध में सन्त पौलुस इस क्षणभंगुर जीवन से सम्बन्धित सब बातों को सम्मिलित करता है। एक भीतरी दशा भी है जो हम से छिपी है, अर्थात् वह दशा जिसकी हमसे प्रतिज्ञा की गई है और जिसकी हम आशा में बाट जोहते हैं। क्योंकि बाहरी मनुष्य का बिगड़ना और थोड़ा-थोड़ा करके क्षीण होते जाना अवश्य है, जब तक कि वह पूरी तरह मिट न जाए। इसलिए यद्यपि परमेश्वर की सन्तानों से प्रतिज्ञा की गई है कि परमेश्वर उन्हें नई स्फूर्ति देगा और मानो उनके पंख झड़वा देगा, तो भी तुम उन्हें कभी-कभी इतना रोगी देखोगे कि दया आए, और संसार के सबसे बलवान मनुष्य भी बूढ़े होकर मृत्यु को पहुँचते हैं। जब ऐसा है, तो अविश्वासियों की तुलना में उनकी क्या श्रेष्ठता है? बड़ी: तथापि वह आँखों से नहीं देखी जा सकती।
क्योंकि हमारे भीतर एक भीतरी मनुष्य है जो हम में छिपा हुआ है। और सन्त पौलुस का इससे क्या अभिप्राय था? उसका अभिप्राय यह था कि परमेश्वर अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हम में इस प्रकार कार्य करता है कि हमें उस स्वर्गीय जीवन का सदा निश्चय बना रहता है जो हमारे लिये तैयार किया गया है। और यद्यपि हम यहाँ नीचे बस सरकते चले जाते हैं और परदेशियों के समान हैं, तो भी एक अनन्त मीरास है जो हम से कभी छूट नहीं सकती। सन्त पौलुस कहता है कि जैसे-जैसे बाहरी मनुष्य क्षीण होता जाता है, वैसे-वैसे भीतरी मनुष्य नया होता जाता है। क्योंकि विश्वासी जितना अपने आप को क्षीण होते देखते हैं, उतना ही उन्हें ऊपर की ओर देखने की चेतावनी और प्रेरणा मिलती है।
क्योंकि हम जानते हैं कि जो बलवान और हट्टे-कट्टे होते हैं वे बुद्धि खो बैठते हैं और अपने आप को भूल जाते हैं, इसलिए हमारा प्रभु हमें इस रीति से वश में करना उचित समझता है कि हम क्षीण होने के द्वारा नए हो जाएँ: मेरा कहना है कि इस रीति से कि हम, जैसा तुम कहोगे, मानो साँचे में फिर से ढाले जाएँ, ताकि स्वर्गीय जीवन की आशा हम में स्थिर हो जाए, और हमारी दृष्टि साफ हो जाए कि हम उस वस्तु को देख सकें जो अन्यथा हम से लपेटकर छिपाई हुई होती।
देखो कि जब सोने और चाँदी को भट्ठी में से निकाला जाता है तो वे कितने घट जाते हैं। जब वह आग में डाला जाता है, तो वह धातु का एक बड़ा ढेर होता है; परन्तु जब फिर निकाला जाता है, तो उसमें से थोड़ी-सी मात्रा ही बचती है। फिर भी सोना (यदि इस प्रकार शुद्ध न किया जाए) कभी किसी काम का न होता, और चाँदी भी नहीं। हमारा भी यही हाल है: यदि हम पहले मर न जाएँ, तो हम स्वर्ग के राज्य में पहुँचने के लिये कभी नए नहीं किए जा सकते। हमें सदा उस पूर्ण विनाश की ओर बढ़ते जाना है, और जो कुछ हम अपनी आँखों से देखते हैं उसमें से किसी पर मार्ग में विश्राम नहीं करना है। क्योंकि यह पृथ्वी का जीवन तो बस छाया और धुआँ है जो सरककर लोप हो जाता है। और तो भी, इसी के द्वारा हम भीतर से नए किए जाते हैं। ऐसा नहीं कि यह लाभ सब मनुष्यों को मिलता है: क्योंकि अविश्वासी भी अपनी निर्बलता को भली-भाँति पहचान लेते हैं और मृत्यु के बुलावों को अनुभव करने पर विवश होते हैं, विशेषकर जब वे बूढ़े हो जाते हैं, क्योंकि तब वे देखते हैं कि थोड़ी-सी हवा का झोंका भी उन्हें गिराने के लिये बहुत है, और तब वे झल्लाने लगते हैं और उनका जी करता है कि परमेश्वर और प्रकृति से झगड़ पड़ें।
संसार की चाल जैसी भी हो, चाहे वे सड़ जाएँ, तो भी वे नए नहीं किए जाते। क्योंकि अनाज का एक दाना भली-भाँति सड़ सकता है, और फिर भी जड़ न पकड़े कि फिर उगे और फल लाए, और दूसरा दाना भी वैसे ही सड़ेगा, परन्तु क्योंकि वह अच्छी भूमि में है और जड़ पकड़ चुका है, वह उचित समय पर फल लाएगा। इसी प्रकार विश्वासी क्षीण हो जाते हैं, और उसी के साथ नए किए जाते हैं और नया बल पाते हैं। और क्यों? क्योंकि वे इस संसार में सड़ते हैं कि स्वर्गीय मीरास में फिर बहाल किए जाएँ और नए किए जाएँ। अविश्वासी भी चले जाते हैं; वे भी वैसे ही सड़ते हैं, वे फिसलकर एक ओर हो जाते हैं, और पूरी तरह लोप हो जाते हैं। परन्तु इससे उन्हें कोई लाभ नहीं, क्योंकि वे अनन्त जीवन में बहाल नहीं किए जाते।
इसलिए हम भली-भाँति ध्यान दें कि जब सन्त पौलुस कहता है कि हम यीशु मसीह के विश्वास से जीते हैं, तो वह हमें जगाने के लिये है, कि संसार में कोई भी बात हमें परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर निरन्तर टिके रहने से न रोके। जब हम अपने चारों ओर की सब बातों को देखते हैं, तो वहाँ मृत्यु के सिवाय कुछ नहीं। पर इससे क्या? परमेश्वर ने हमें अपना वचन दिया है कि अपने स्वभाव में मरे हुए होने पर भी हमारा जीवन कहीं और है, अर्थात् हमारे प्रभु यीशु मसीह में, क्योंकि वह इसी उद्देश्य से भेजा गया कि हमें मृत्यु से जीवन में ले आए। जब हमारे पास परमेश्वर की यह प्रतिज्ञा है, तो देखो कि हमारे हाथ से उसका आदर किस प्रकार हो सकता है। और जब बात ऐसी है, तो केवल यही कथन हमारे लिये पर्याप्त होना चाहिए। और यदि हम इस पर पूरी तरह स्थिर और दृढ़ हो जाएँ, तो यह इस बात का चिह्न है कि हम परमेश्वर के सत्य पर विश्वासयोग्य गवाहों के समान अपनी मुहर लगाते हैं, जैसा सन्त यूहन्ना कहता है। इसके विपरीत, जब हम सन्देह करते या हकलाते हैं, तब परमेश्वर के वचन का हमारे बीच न कोई अधिकार रहता है, न कोई आदर।
क्योंकि यदि हम अपने सामने की और अपने निकट की बातों से आगे न देखें, तो हम यह नहीं मान सकते कि परमेश्वर विश्वासयोग्य है, और जो बातें परमेश्वर ने अपने ही मुख से कही हैं वे अटल हैं। इतना ही नहीं, ऐसा करने में हम अपने प्रभु यीशु मसीह से मुँह फेर लेते हैं, जो फिर भी उस सब का गारंटी है जो परमेश्वर के वचन में समाया है। जब हमारे पास वचन है, तो हमें और नहीं पूछना चाहिए (जैसा मूसा कहता है) कि कौन बादलों के ऊपर चढ़ेगा? या कौन गहिराव में उतरेगा? या कौन समुद्र पार जाएगा? वह कहता है कि वचन तेरे मुँह में और तेरे मन में है, और हमें उसी से सन्तुष्ट रहना चाहिए। और फिर, जब हमारे पास और अधिक दृढ़ता के लिये हमारा प्रभु यीशु मसीह है, तो हम जानते हैं कि वह अधोलोकों में उतरा, अर्थात् हमारे पापों के कारण हम पर जो श्राप ठहरता था उसे उठाया, और हमारे ज़मानतदार और प्रतिभू के रूप में अपने पिता के न्याय-आसन के सामने उत्तर दिया, और फिर स्वर्ग पर चढ़ गया, और हमारी ओर से उस मीरास पर अधिकार कर लिया जो उसने हमारे लिये मोल ली थी। क्योंकि वह हमारी देह और स्वभाव में ऊपर उठाया गया। जब हमारे पास ऐसा निश्चय है, तो क्या यह आवश्यक नहीं कि यदि हम उस पर टिके न रह सकें तो हम बहुत ही अभागे ठहरें?
फिर, यह विषय हमें बार-बार उस ओर लौटने को कहता है जो कहा जा चुका है, अर्थात् यह कि हम खुली और प्रकट बातों की आशा नहीं रखते, परन्तु उन बातों की जो सांसारिक बोध से अज्ञात हैं। तब जब ऐसा है, तो आओ हम यीशु मसीह के विश्वास से जीना सीखें: अर्थात् यद्यपि हम इस संसार में दुखी हैं और हमें कितनी ही मर्मवेदनाएँ, शोक, पीड़ाएँ, कष्ट और संकट सहने पड़ें, तो भी हम इस दृढ़ विश्वास में बने रहें कि हमारी सब विपत्तियों में अनुपम सुख के सिवाय कुछ नहीं, क्योंकि परमेश्वर हमारे प्रभु यीशु मसीह के निमित्त उन्हें आशीष देता और पवित्र करता है, और सब कुछ हमारी सहायता और कल्याण के लिये बदल जाता है, जैसा रोमियों के आठवें अध्याय में कहा गया है।
इसलिए, जैसा हमने एक और पाठ में देखा, परमेश्वर को हमारी निर्बलता में अपनी सामर्थ्य की सिद्धता प्रकट करनी है, और हम उसे अनुमति दें कि वह हमें इस प्रकार झुकाए कि यह संसार हमें सुसमाचार की प्रतिज्ञाओं को अपने हृदयों में भली-भाँति अंकित करने से न रोक सके, न हमारी विपत्तियों और क्लेशों के बीच हमें आनन्दित और प्रफुल्लित होने से रोके, और न अविश्वासियों की सब निन्दाओं और ठट्ठों को निडर होकर तुच्छ जानने से, जब वे हमें ताने देते हुए कहते हैं, "अरे दीन-हीन अभागो, तुम तो सुसमाचार पर विश्वास करके अपने आप को राजकुमार समझते हो। पर हाय, बेचारे प्राणियो, वह आनन्द और सुख कहाँ है जो तुम कहते हो कि परमेश्वर की ओर से तुम से प्रतिज्ञा किया गया है? वह अनमोल लाभ कहाँ है जिसे तुम इतना बड़ा मानते हो? क्योंकि तुम्हारे पास उनसे अधिक कुछ नहीं जिन्हें तुम परमेश्वर के शत्रु, त्यागे हुए और श्रापित नीच कहते हो।" परन्तु (जैसा मैंने कहा), यह सारा सामान हमें मार्ग से हटा न दे, क्योंकि हमें विश्वास की ओर लौट आना है।
इसलिए यद्यपि यहाँ नीचे हम उन बातों को नहीं देखते जिनकी सुसमाचार में हम से प्रतिज्ञा की गई है, तो भी हम उनके विषय में सब सन्देह से परे निश्चित रहें। क्योंकि (जैसा सन्त पौलुस कहता है) हमारा जीवन छिपा हुआ है, और उसके प्रकट होने का समय अभी नहीं आया। और हमारा जीवन हमारे प्रभु यीशु मसीह के सिवाय और कहाँ है? अब हमारे प्रभु यीशु मसीह का राज्य काफी प्रकट है: तथापि वह केवल अंश भर में है: हमें उसका बस स्वाद मिला है: और इस संसार में बातें इतनी उथल-पुथल और गड़बड़ हैं कि यदि हम अपने उद्धार का निर्णय बाहरी रूप से करें, तो उसका क्या होगा? इसलिए हम अपने जीवन को तब तक छिपा रहने दें जब तक हमारा प्रभु यीशु मसीह न आए, और तब हम देखेंगे कि उस पर भरोसा रखने और उसके सुसमाचार की शिक्षा को स्वीकार करने में हम धोखा नहीं खाए।
तब तुम देखते हो कि हमें विश्वास से किस रीति से जीना है: अर्थात् हम इतने नाज़ुक न बनें कि यहाँ चैन का जीवन ढूँढ़ें और अपनी सब सुख-सुविधाएँ यहीं चाहें। क्योंकि ऐसा करने में हम उस वस्तु को खो देंगे जिसकी परमेश्वर ने हम से प्रतिज्ञा की है, हम उसे भूल जाएँगे, और यह हमारे विश्वास का पूर्ण विनाश होगा। परन्तु हम परमेश्वर के वचन का दर्पण लें, और वहाँ उन बातों को देखें जो हमारी सारी बुद्धि से ऊपर हैं और इस संसार से बहुत दूर रखी गई हैं, और जो पूर्णतः अदृश्य हैं, और हम अपनी आँखें वहाँ उठाएँ, इस सीमा तक नहीं कि हमारा अपना तर्क और कौशल हमारी अगुवाई कर सके (क्योंकि वह पर्याप्त नहीं), परन्तु इस प्रकार कि हम संसार से ऊपर चढ़ सकें और वर्तमान वस्तुओं को त्याग सकें, ताकि परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को दृढ़ता से थामे रहें, और उन सब क्लेशों और विपत्तियों में धीरज धरें जिनसे हमारा अभ्यास कराया जाएगा, और जिनके विरुद्ध हमें तब तक लड़ना होगा जब तक हम अपनी जीत का फल न पा लें, जब हम स्वर्ग के विश्राम में पहुँचा दिए जाएँगे।
इस प्रकार, तुम देखते हो कि सन्त पौलुस के इस कथन से, जो पहली दृष्टि में गूढ़ लग सकता है, हमें क्या सीखना है। परन्तु जब हम एक ओर भली-भाँति ध्यान दे लें कि जब तक हम इस संसार में हैं तब तक हमारी दशा क्या है, और दूसरी ओर विचार कर लें कि विश्वास का स्वभाव क्या है, तब हम सहज ही देखेंगे कि उसमें अन्धकार बिलकुल नहीं है। और अब सन्त पौलुस स्पष्ट रूप से जोड़ता है कि यीशु मसीह ने उससे प्रेम किया और उसके लिये अपने आप को मृत्यु के हाथ सौंप दिया। यह उसकी व्याख्या है जो हमने पहले देखा। क्योंकि मनुष्य प्रायः "विश्वास" शब्द का अर्थ गलत लगाते हैं, क्योंकि वे विचार नहीं करते कि उसका सार क्या है। और वास्तव में हर कोई विश्वासी कहलाएगा, फिर भी जो मसीही धर्म का अंगीकार करते हैं उनमें भी तुम सौ में एक को मुश्किल से पाओगे जिसमें विश्वास की एक बूँद भी हो। क्योंकि (जैसा मैंने पहले कहा) यह कभी नहीं खोजा जाता कि विश्वास से क्या अभिप्राय है। शब्द बहुत छोटा है, परन्तु वह अपने पीछे लम्बी पूँछ खींचता है, जैसा हम यहाँ दी गई बात जोड़ने से देखते हैं। क्योंकि सन्त पौलुस घोषणा करता है कि वह विश्वास से जीवित है क्योंकि यीशु मसीह ने उससे प्रेम किया और उसके लिये अपने आप को मृत्यु के हाथ सौंप दिया। हमें भी उतना ही करना चाहिए। क्योंकि जब हम देखते हैं कि परमेश्वर का पुत्र; महिमा का प्रभु, स्वर्गदूतों का सिरमौर, वह जिसके द्वारा सब वस्तुएँ बनीं, और जिसके द्वारा सब वस्तुएँ अब भी थमी हैं, अपने आप को मृत्यु के हाथ सौंपता है, हाँ, और ऐसी नीच मृत्यु के हाथ कि उसने हमारा श्राप अपने ऊपर ले लिया, और न केवल क्रूस पर टाँगा गया, जो सारे संसार की दृष्टि में एक घृणित बात थी, वरन् परमेश्वर के अपने ही मुख से श्रापित भी ठहराया गया: जब (मैं कहता हूँ) हमारे पास हमें मृत्यु से छुड़ाने और हमारे लिये जीवन और उद्धार मोल लेने के लिये ऐसा मूल्य है: तो क्या हमारे पास (यदि हम इस पर भली-भाँति सोचें) कारण नहीं कि हम उन सब रुकावटों को लाँघ जाएँ जो शैतान हमारे मार्ग में डालता है कि हम पीठ फेर लें या पीछे हट जाएँ, ताकि हम अपने विश्वास की निश्चयता में स्थिर न रहें? निश्चय ही सब परीक्षाओं के विरुद्ध हमारी जीत सहज होगी यदि हम विचार कर सकें कि हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग का मूल्य कितना है, और उसका अर्थ क्या है। इसलिए सन्त पौलुस यहाँ हमें हथियारबन्द करता है, ताकि हम उन सब रुकावटों के विरुद्ध अजेय दृढ़ता से टिके रहें जो शैतान हमारे सामने डालने के लिये परिश्रम करता है, कि हम अपनी दौड़ पर चलते रहने से रुक जाएँ।
जब विश्वासी भूख या प्यास से सताए जाते हैं, तो वे इधर-उधर यह प्रतिज्ञा ढूँढ़ने में व्याकुल होते हैं कि वे जगत के वारिस होंगे, और इस बीच भूख और अभाव से लगभग मरने लगते हैं। परन्तु यदि वे हमारे प्रभु यीशु मसीह की ओर देखें, तो वह उनका सारा कष्ट दूर कर देगा और उस सारी कड़वाहट को मीठा कर देगा जिसने उनके लिये उद्धार की प्रतिज्ञाओं का स्वाद बिगाड़ दिया होता। इसलिए जब कभी विश्वासी किसी खतरे में हों या उन पर अत्याचार हो, कि उन पर अनेक अन्याय और अत्याचार किए जाएँ, और उस सारे समय उन्हें कोई सहायता न मिले, तो वे अपने मन में सोच सकते हैं: परमेश्वर कहाँ है? उसने प्रतिज्ञा की है कि वह हम में वास करेगा, हमें अपनी आँख की पुतली के समान रखेगा, और हमारी ढाल और गढ़ होगा: फिर भी इस बीच हम लूट के लिये छोड़ दिए गए हैं। इसलिए निश्चित है कि हम हर चोट पर नष्ट हो जाएँगे। परन्तु जब हम अपने प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग पर आते हैं, तो हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि परमेश्वर का पुत्र व्यर्थ नहीं चढ़ाया गया। जब हमारे प्रभु यीशु मसीह ने अपने आप को नहीं बचाया, परन्तु अपने आप को इतना दीन किया कि ऐसी निन्दित, हाँ, श्रापित मृत्यु सही, और उसके बाद नरक की पीड़ाएँ भी, यद्यपि थोड़ी देर के लिये ही, ताकि हमें स्वतन्त्र और निर्दोष ठहराए, और अपने पिता परमेश्वर के न्याय-आसन के सामने हमारे लिये अनुग्रह मोल ले: तो क्या उसका वह कार्य निष्फल होगा? क्या यह सम्भव है कि वह निष्फल हो? नहीं: क्योंकि यदि आकाश और पृथ्वी उलट-पुलट हो जाएँ, तो भी यह इतनी बड़ी गड़बड़ न होगी जितनी यह कल्पना करना कि परमेश्वर के पुत्र ने व्यर्थ दुःख उठाया। तब हम अब देखते हैं कि सन्त पौलुस हमें क्यों बताता है कि वह विश्वास से जीवित था। क्योंकि हमारे लिये आवश्यक है कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग पर स्थिर हों, और अपने को निश्चय दिलाएँ कि वह हमें मृत्यु के कारागारों में से निकालने के लिये पर्याप्त समर्थ है।
और इसके अतिरिक्त, हमारे लिये आवश्यक है कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह को न केवल अपनी देह की निर्बलता में मरा हुआ देखें, वरन् अपनी ईश्वरीय और स्वर्गीय सामर्थ्य से जी उठा हुआ भी, जैसा उसके विषय में एक और पाठ में कहा गया है। और इसलिए जब कभी हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु की चर्चा हो, तो हमारे लिये आवश्यक है कि हम विचार करें कि उसका अर्थ क्या है: अर्थात् यह कि वह परमेश्वर और मनुष्य के बीच मेल-मिलाप का प्रायश्चित करने के लिये एक बलिदान है, हम में जो कुछ दुष्टता है उसे ढाँपने के लिये आज्ञाकारिता है, और हमारी सब अशुद्धता और मलिनता को धो डालने के लिये एक धुलाई है। इसलिए जब हम जानते हैं कि परमेश्वर के पुत्र की मृत्यु और दुःखभोग में ऐसी सामर्थ्य है, और उसी पर हम आगे बढ़ते हैं, अर्थात् उस महिमा की ओर जिसकी ओर वह हमें ले जाता है: तो हम अब यह कल्पना न करें कि मनुष्य को आगे भी अपने ही स्वभाव में बना रहना चाहिए, परन्तु यह कि उसे सुसमाचार के विश्वास में जीना चाहिए, और अपने को निश्चय दिलाना चाहिए कि वहाँ जो प्रतिज्ञाएँ समाई हैं उन पर विश्राम करने में वह निराश न होगा।
इस प्रकार, तुम वस्तुतः देखते हो कि इस कथन का सम्बन्ध किस बात से जोड़ना चाहिए, जहाँ सन्त पौलुस हमें स्पष्ट रूप से बताता है कि परमेश्वर के पुत्र ने अपने आप को दे दिया। और वह यह कहकर सन्तुष्ट नहीं होता कि मसीह ने अपने आप को सामान्य रूप से संसार के लिये दे दिया, क्योंकि यह तो एक हल्की बात होती: परन्तु [दिखाता है कि] हम में से हर एक को हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग की सामर्थ्य को विशेष रूप से अपने ऊपर लागू करना है। जब कहा जाता है कि परमेश्वर का पुत्र क्रूस पर चढ़ाया गया, तो हमें केवल यह नहीं सोचना चाहिए कि यह संसार के छुटकारे के लिये किया गया: वरन् हम में से हर एक को अपनी ओर से अपने आप को हमारे प्रभु यीशु मसीह से जोड़ना और यह निष्कर्ष निकालना चाहिए, "उसने मेरे लिये दुःख उठाया है।"
वैसे ही जब हम बपतिस्मा पाते हैं, तो जैसे वह किसी एक ही मनुष्य के लिये नहीं है, वैसे ही जल सब मनुष्यों पर सामान्य रूप से नहीं छिड़का जाता: परन्तु हर मनुष्य अलग-अलग अपनी ओर से बपतिस्मा पाता है, ताकि हम में से हर एक उसे विशेष रूप से अपने ऊपर लागू करे, यह कहने के लिये कि हम सब हमारे प्रभु यीशु मसीह के अंग हैं। वैसे ही जब हम पवित्र भोज लेते हैं, तो हर मनुष्य अपना-अपना भाग लेता है, ताकि हमें दिखाया जाए कि हमारा प्रभु यीशु मसीह हम पर प्रकट किया गया है, हाँ, हम में से हर एक पर। इसलिए सन्त पौलुस जान-बूझकर यह वाक्य-शैली अपनाता है, ताकि हमारी कल्पना ठण्डी न रहे, उन अनेक अज्ञानी लोगों की रीति पर, जो अपने आप को मसीही समझते हैं, और फिर भी इस बीच अभागे पशुओं के समान हैं।
परन्तु जब हम एक बार जान लें कि जो समस्त संसार के छुटकारे के लिये किया गया वह हम में से हर एक से अलग-अलग सम्बन्ध रखता है: तो हम में से हर एक को अपनी ओर से भी यह कहना उचित है, "परमेश्वर के पुत्र ने मुझ से ऐसा प्रेम किया कि उसने मेरे लिये अपने आप को मृत्यु के हाथ सौंप दिया।" इसके अतिरिक्त, "प्रेम" शब्द यहाँ निरर्थक नहीं है: क्योंकि सन्त पौलुस का आशय हमारे प्रभु यीशु मसीह की अनुग्रहपूर्ण भलाई की महिमा करना है: मानो वह कहता हो कि यदि हम ऐसा लाभ, जब वह हमें दिया जाता है, स्वीकार न करें तो हम बड़े अभागे हैं, क्योंकि परमेश्वर ने अपने पुत्र को भेजने में हमारी उन दुर्दशाओं के सिवाय और किसी बात का ध्यान नहीं रखा जिन्हें वह दूर करना चाहता था। और हमारे प्रभु यीशु मसीह ने अपने आप को ऐसा भुला दिया कि हमारे कल्याण के लिये अपने प्राण भी नहीं बचाए। और इसका कारण क्या था? वह प्रेम जो वह हम से रखता था। जब ऐसा है: तो क्या हम होश खोए हुए से भी बदतर न ठहरेंगे यदि हम ऐसा लाभ स्वीकार न करें? परन्तु पवित्र शास्त्र में यह बहुत ही सामान्य शिक्षा है कि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा, कि उसने अपने एकलौते पुत्र को भी नहीं छोड़ा, वरन् हमारे लिये उसे मृत्यु के हाथ सौंप दिया: और यह भी कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने, उस समय जब हम उसके प्राणघातक शत्रु थे जैसा सन्त पौलुस कहता है, हम पर अपना अद्भुत प्रेम प्रमाणित किया, कि उसने परमेश्वर और हमारे बीच मेल कराने के लिये, और हमारे सब पापों को मिटा देने के लिये, ताकि वे फिर लेखे में न आएँ, अपने आप को बलिदान करके चढ़ाया। देखो, यह हमारे उद्धार की गारंटी है, इसलिए हमें अपने आप को उसके विषय में पूरी तरह निश्चित समझना चाहिए। तथापि सन्त पौलुस का आशय यहाँ जान-बूझकर मनुष्यों की कृतघ्नता को डाँटना था, क्योंकि वे उस लाभ को स्वीकार नहीं करते जो परमेश्वर उन्हें इतनी उदारता से, हाँ, अपनी ही निःशुल्क भलाई से देता है। क्योंकि हमें स्मरण करना चाहिए कि सन्त यूहन्ना अपनी सामान्य पत्री में कैसे कहता है कि हम ने पहले परमेश्वर से प्रेम नहीं किया: (मानो वह कहता हो कि हम उससे आगे नहीं बढ़े, जैसा वे समझते हैं जो कहते हैं, "मैंने उसकी ऐसी-ऐसी सेवा की है।" क्योंकि हाय, हम उसके लिये कर ही क्या सकते हैं?) परन्तु यह कि उसने हम से प्रेम किया, [हाँ] उस समय भी जब हम उसके प्राणघातक शत्रु थे,) और तभी हमें खोजने आया, अथाह कारागारों की गहरी से गहरी तह में। और इसी पर सन्त पौलुस जोड़ता है कि वह परमेश्वर के अनुग्रह को तुच्छ नहीं जानता और न उसे ठुकराता है। यह उन बातों का सार है जो हमने अब तक देखी हैं। क्योंकि यहाँ उसका आशय यह दिखाना था कि जो परमेश्वर की उस दया को कुछ नहीं गिनते जो हमारे प्रभु यीशु मसीह में प्रकट हुई और प्रतिदिन उसके सुसमाचार में हमें दी जाती है, उन पर शैतान का अधिकार होना अवश्य है। क्योंकि देखो, जितनी बार हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग का प्रचार हमारे सामने होता है, और हमारे परमेश्वर की असीम भलाई की चर्चा होती है: उतनी ही बार यह सन्देश हमारे लिये नया किया जाता है कि हमारा प्रभु यीशु मसीह हमें अपने पास बुलाता है, ताकि हम संसार को त्यागें और अपने आप में सब आशा से रहित होकर अपना सारा भरोसा उसी में जमा और स्थिर करें। जब ऐसा है: तो यह उचित कारण है कि हम परमेश्वर के अनुग्रह को न ठुकराएँ। और सन्त पौलुस ऐसा कहकर उन लोगों को लौटा लाना चाहता था जो पहले भटक चुके थे, और उन्हें मार्ग दिखाना चाहता था, मानो वह कहता हो कि जबकि वे बेचारे अज्ञानी प्राणी जिन्होंने सुसमाचार की कोई बात कभी सुनी ही नहीं क्षमा के योग्य हो सकते हैं: हम तो दण्ड से भी बदतर ठहरेंगे, क्योंकि जब परमेश्वर का अनुग्रह हमें दिया जाता है तब हम उसे अस्वीकार करते हैं: क्योंकि उसमें ऐसी कृतघ्नता की गन्ध है जो किसी भी प्रकार क्षम्य नहीं हो सकती। इसलिए सन्त पौलुस यहाँ उनका उल्लेख करता है जिन्हें हमारा प्रभु यीशु मसीह अपने सुसमाचार के द्वारा उद्धार की आशा के लिये बुलाता है, और वे फिर भी अपनी ही दुर्दशा में लोटते रहते हैं और पशु-तुल्य हो जाते हैं, यह जाने बिना कि कोई उत्तम जीवन है भी या नहीं; या फिर उनका जो भीतरी मर्मवेदना से काफी पीड़ित हैं, और फिर भी न कोई उपाय खोजते हैं न कोई शान्ति।
तो भी, वे सब जिन्हें हमारे प्रभु यीशु मसीह ने अपना सुसमाचार नहीं सुनाया, बिना दया के नष्ट होने से न चूकेंगे। वे अज्ञानता को ढाल नहीं बना सकते: मैं कहता हूँ कि जितने भी अन्यजाति और मूर्तिपूजक कभी हुए हैं उन सब का मुँह बन्द किया जाना अवश्य है। तब हमारा क्या होगा, जिनके कानों में प्रतिदिन वह सन्देश गूँजता रहा है जो परमेश्वर हमें भेजता है: जो यह है कि वह और कुछ नहीं माँगता सिवाय इसके कि हम उसकी ओर खिंच आएँ, जिसके लिये वह हमें प्रोत्साहित करता है, हाँ और हम से विनती करता है, जैसा हमने कुरिन्थियों की दूसरी पत्री के दूसरे अध्याय में देखा? क्या यह हमारे लिये बड़ी लज्जा की बात नहीं कि परमेश्वर अपने एकलौते पुत्र के व्यक्तित्व में इतना दीन हो जाए कि हम से विनती करे? वह कहता है, "आओ, हम मेल कर लें।" और उसने अपनी ओर से क्या किया है? उसने हमारा क्या बिगाड़ा है? नहीं, इसके विपरीत, हम प्रतिदिन उसे अपने विरुद्ध भड़काने से नहीं रुकते, फिर भी वह हम से कहने आता है, "मैं तुम्हारे साथ मेल करूँगा," जबकि हम में द्वेष के सिवाय कुछ नहीं, हम छोटे-छोटे दुष्टात्माओं के समान हैं, और संक्षेप में हम शापित और खोए हुए हैं, फिर भी वह हम को खोजने आता है और कुछ नहीं चाहता सिवाय इसके कि मेल हो जाए। सन्त पौलुस शब्दशः इसी रीति से कहता है। परन्तु अब हमारा क्या होगा यदि हम ऐसे अनुग्रह को ठुकराएँ, जबकि परमेश्वर उसे हमें इतने निःशुल्क रूप से देता है? इस कथन का यही अर्थ है। और इसी पर वह अन्त में यह निष्कर्ष निकालता है कि यदि हम व्यवस्था में धार्मिकता खोजें, तो यीशु मसीह व्यर्थ मरा। मानो वह कहता हो कि यदि हम उस अनुग्रह का आनन्द लेना चाहते हैं जो सुसमाचार में समाया है, तो हमें अपने पुण्यों की मूर्खतापूर्ण धारणा पूरी तरह छोड़ देनी चाहिए। क्योंकि मनुष्य यह कहकर अपने आप को धोखा देते हैं कि उनमें सदा कुछ मूल्य की बात है: और संक्षेप में, उनका मन नहीं मानता कि दीन भिखारियों के समान परमेश्वर के सामने आएँ, वरन् वे सदा कोई न कोई भेंट अपने साथ लाएँगे। फिर भी जो कुछ हम अपने पास समझते हैं वह सब घृणित वस्तु ही है।
इसलिए सन्त पौलुस हमें दिखाता है कि हमारे प्रभु यीशु मसीह के हाथ से जीवन पाने, और उसकी मृत्यु और पुनरुत्थान के भागी होने, और इस प्रकार उसके द्वारा स्वर्ग की मीरास तक पहुँचने का और कोई उपाय नहीं, सिवाय इसके कि हम उन सब मूर्खतापूर्ण घमण्डों से पूरी तरह खाली हो जाएँ जो इस संसार की सन्तान अपने मन में यह कहकर कल्पित करती है, "ओह, मुझ में तो कुछ सद्गुण है, मुझ में कुछ सुयोग्यता है," और उसे सब रख दें और पूरी तरह फेंक दें। क्योंकि जब तक हम अपनी योग्यताओं को भूल न जाएँ, निश्चय ही हम हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह को कभी ग्रहण न कर सकेंगे। तब क्या हम उसके पास आते हैं? तो हम बिलकुल खाली होकर आएँ। क्योंकि यदि हम यह दिखावा करें कि हमारे पास कुछ है, तो वह हवा के सिवाय और कुछ नहीं। सच है कि जब कभी मनुष्य अभिमान से फूल जाते हैं: तो इतने भर जाते हैं कि फटने को तैयार रहते हैं, फिर भी वह सब हवा ही है। परन्तु हम जैसे भी हों, वह हवा हमें उन लाभों को पाने से रोके रखती है जो परमेश्वर के पुत्र ने मोल लेकर हमारे लिये लाए, और जिन्हें वह अपने सुसमाचार के द्वारा हमें देता है। इस प्रकार तुम देखते हो कि सन्त पौलुस का यहाँ का निष्कर्ष किस ओर झुकता है। अब पोपवादी यह तो मान लेंगे कि हम उद्धार मोल लेने में समर्थ नहीं, जब तक हमारा प्रभु यीशु मसीह हमारी सहायता न करे: तथापि वे कल्पना करते हैं कि मनुष्य आधा अपने आप को बचा सकते हैं, और जो कुछ घटता है वह हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह से पूरा हो जाता है, इत्यादि, इसलिए वे समझते हैं कि उनके पास निकल भागने की एक अच्छी और काम की गुंजाइश है। परन्तु ऐसा कहकर वे अपने आप को हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह के प्राणघातक शत्रु, और उन झूठे प्रेरितों और धोखेबाज़ों के पक्ष और झगड़े के समर्थक प्रकट करते हैं जिन्होंने गलातिया की कलीसिया में शुद्ध सत्य को बिगाड़ा, अपवित्र किया और मिथ्या ठहराया। क्योंकि इस प्रकार के लोग यह तो भली-भाँति मान सकते थे कि यीशु मसीह संसार का उद्धारकर्ता है, और उन्हें यह कहने में लज्जा आती कि यीशु मसीह कुछ भी नहीं, वरन् वे तो मसीही धर्म का अंगीकार करते थे। और वे यीशु मसीह के विषय में क्या समझते थे? कि वह मनुष्यों की निर्बलताओं में सहायता करने आया, क्योंकि वे व्यवस्था को पूरी तरह निभाने में समर्थ न थे, और जब वे उतनी बड़ी और पूरी सिद्धता नहीं पा सकते थे जितनी आवश्यक थी, तब उनके लिये उचित था कि यीशु मसीह उनकी सहायता करे: और पोपवादी आज भी उतना ही कहते हैं। परन्तु सन्त पौलुस इसके विपरीत निष्कर्ष निकालता है कि तब यीशु मसीह व्यर्थ मरा। यदि कोई उत्तर दे, नहीं, ऐसा नहीं: क्योंकि उसकी मृत्यु और दुःखभोग का कुछ फल तो होगा, हमारे पापों की क्षमा पाने में हमारी सहायता करके: और यद्यपि हमारे पास परमेश्वर को सन्तुष्ट करने के साधन हैं, तो भी वे पर्याप्त न होते यदि यीशु मसीह उनके साथ कार्य न करता।
मैं कहता हूँ कि यदि कोई ऐसा उत्तर दे: तो हम ध्यान दें कि सन्त पौलुस इसे एक निश्चित और अटल सिद्धान्त मानता था कि हम चाहे जितना भी अच्छा करें, हम में श्राप के सिवाय कुछ नहीं, जब तक परमेश्वर अपने ही निरे अनुग्रह से हमें ग्रहण न कर ले। देखो, पोपवादी इसी बात में अपने आप को धोखा देते हैं, और केवल वे ही नहीं: क्योंकि यह तुर्कों में और जितने भी अन्यजाति मनुष्य कभी हुए हैं उन सब में एक सामान्य भूल रही है। तुर्क भली-भाँति मान सकते हैं कि उन्हें परमेश्वर की दया की आवश्यकता है, और यह सारे संसार में सदा से एक धारणा रही है: परन्तु उन्होंने अपने प्रायश्चित्तों को परमेश्वर के अनुग्रह के साथ मिला दिया है, मानो वे कहें कि यद्यपि परमेश्वर हम पर दयालु है, फिर भी हमें अपनी योग्यताओं से उसकी दृष्टि में अनुग्रह प्राप्त करना चाहिए। अन्यजाति लोग इसी रीति से बोला करते थे। और आजकल पोपवादी क्या कहते हैं? वही एक बात। क्योंकि जब वे एक बार मान लेते हैं कि वे अभागे पापी हैं, और उन्हें हमारे प्रभु यीशु मसीह की सहायता की आवश्यकता है, और उसकी मृत्यु और दुःखभोग परमेश्वर तक उनका मार्ग बनाने में काम आते हैं: तो वे अपनी स्वतंत्र इच्छा और अपनी तैयारियाँ भी बीच में गूँथ देते हैं, और साथ ही कहते हैं कि वे अपनी ओर से योग्यता अर्जित करते हैं, और यद्यपि यीशु मसीह उनकी सहायता करता है, तो भी वह सब कुछ स्वयं नहीं करता। और सच तो यह है कि यही पोपवादियों की स्पष्ट शिक्षा है, शब्दशः। क्योंकि वे कहते हैं कि हम कुछ भी अर्जित नहीं कर सकते जब तक यीशु मसीह हमारे आगे आगे चलकर हमें मार्ग न दिखाए, क्योंकि वे कहते हैं कि उसने हमारे लिये प्रथम अनुग्रह मोल लिया है, और आगे चलना और दूसरा अनुग्रह पाना हम पर निर्भर है। और यदि कोई उनसे पूछे कि उस प्रथम अनुग्रह से क्या अभिप्राय है, तो वे कहते हैं कि वह पुण्य अर्जित करने या योग्य ठहरने का अवसर है: क्योंकि यही उनका उसे कहने का ढंग और उनकी बोली है। और उनके यहाँ पुण्य अर्जित करने के इस अवसर का और कोई अर्थ नहीं, सिवाय इसके कि मनुष्य अपने ही प्रायश्चित्तों से परमेश्वर को अपने से बाँध सकते हैं।
परन्तु सन्त पौलुस हमें बताता है कि ऐसा घमण्ड रखना अति उद्दण्डता, हाँ, और अति शैतानी विश्वासघात है: और इसलिए वह निष्कर्ष निकालता है कि यदि हम व्यवस्था में धार्मिकता खोजें तो यीशु मसीह व्यर्थ मरा होता। तब क्या हम अपने प्रभु यीशु मसीह को पाना चाहते हैं? हमारे लिये आवश्यक है कि हम जानें कि हम उसके पास क्यों आते हैं: अर्थात् इसलिए कि व्यवस्था के द्वारा हम पहले ही दोषी ठहरे हैं, परमेश्वर की ओर से श्रापित हैं, जीवन की आशा से कटे हुए हैं, और सब भ्रष्टता से भरे हैं, यहाँ तक कि परमेश्वर को अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें शुद्ध करना आवश्यक है, और क्योंकि हम में अनेक निर्बलताएँ हैं, हमें सदा अपने प्रभु यीशु मसीह के पास आना और यह मानना है कि हम में श्राप और दुर्दशा के सिवाय कुछ नहीं: हमें पौलुस के इस निष्कर्ष पर आना ही होगा कि यदि हमें व्यवस्था से धार्मिकता प्राप्त करनी होती, चाहे पूरी चाहे आंशिक, तो मसीह व्यर्थ मरा होता। हमें यह मानना ही होगा, और बिलकुल मूर्ख भी इसे समझ सकते हैं, यहाँ तक कि यदि हम यीशु मसीह को इस शर्त पर ग्रहण न करें, तो निश्चित है कि उसके आने से हमें कुछ भी लाभ न होगा। वह तो बस हवा के समान होगा जो हम सब को उड़ा ले जाएगी, यहाँ तक कि हम परमेश्वर की उस दया को थाम न सकेंगे जो यीशु मसीह में हमें दी जाती है। अब जब ऐसा है: तो हम इस प्रकार के मिश्रण को छोड़ना सीखें, और सब बातों के लिये अपने आप को अपने प्रभु यीशु मसीह का ऋणी मानें: क्योंकि जब हम अपने पापों की निःशुल्क क्षमा में अपने ही पुण्यों को गूँथने का यत्न करते हैं, तो यह परमेश्वर के सत्य को मिथ्या ठहराना ही है।
इसके अतिरिक्त, जब हम इस प्रकार उस पर विश्राम करना सीख लें: तो हम उन आत्मिक लाभों से प्रेम करने लगें जो वह हमारे लिये लाता है, और इस संसार के क्लेश और विपत्तियाँ हमें अपनी दौड़ जारी रखने से, और सब परीक्षाओं और संकटों पर जय पाने से न रोकें, वरन् हमारे सब दुःखों और कष्टों के बीच हमें पूर्ण आनन्द हो, और हम अपने आप को निश्चय दिलाएँ कि जो कुछ हम इस संसार में सह सकते हैं वह उसकी तुलना में कुछ नहीं जो स्वर्ग के राज्य में हमारे लिये तैयार किया गया है। और सन्त पौलुस हमें इसी की ओर ले जाता है। क्योंकि पहले तो वह हमें पवित्र और सुव्यवस्थित जीवन के लिये, और जैसा हमें शोभा देता है वैसे दीन होने के लिये, और अपने आप को पूरी तरह अपने प्रभु यीशु मसीह को सौंप देने के लिये समझाता है।
और दूसरे, वह हमें समझाता है कि हम धीरज से अपने आप को हथियारबन्द करें, ताकि हम उन सब आक्रमणों और संकटों पर जय पाएँ जो हम पर आते हैं, और इस संसार में इस रीति से चलें कि हम सदा उस स्वर्गीय मीरास की ओर आगे बढ़ते रहें, जिसे हम नहीं देखते, और जो हमारी सारी समझ से परे है, और इस पर भी उसके विषय में अपने को निश्चय दिलाने से न रुकें, क्योंकि उसकी हम से ऐसी उत्तम प्रतिज्ञा की गई है। और फिर, जब हमारे पास उसकी बयाना और गारंटी हमारे प्रभु यीशु मसीह में दी गई है: तो वही हमारे लिये पूर्ण निश्चय का काम दे, यह दिखाने के लिये कि हमें बिना उद्देश्य भटकने की आवश्यकता नहीं, वरन् सिद्ध विश्वास और दृढ़ और ठोस आशा रखनी है, क्योंकि हमारे पास परमेश्वर के पुत्र के व्यक्तित्व में उन सब बातों की पूर्ण पूर्ति पहले से है जिनकी हम कामना कर सकते हैं।
परन्तु अब आओ हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने पापों को मानते हुए गिर पड़ें, और उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उनका अनुभव और अधिक कराए, और हमें सच्चे पश्चाताप से इस प्रकार छुए कि वही हमें और अधिक परमेश्वर के हाथ से क्षमा और दया खोजने को प्रेरित करे, और उसके साथ-साथ उससे यह भी विनती करें कि वह अपने पवित्र आत्मा से हमारा ऐसा संचालन करे कि हमें और अधिक हियाव मिले कि हम अपने शरीर की सब अभिलाषाओं को, और अपने पुराने आदम की सब बातों को त्यागें, जब तक कि हम उस सिद्धता तक न पहुँचें जिसकी ओर वह हमें खींचता है, और जिससे हम अभी बहुत दूर हैं। कि वह यह अनुग्रह केवल हमें ही नहीं, वरन् सब लोगों को भी देने की कृपा करे, इत्यादि।
