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बयालीसवाँ उपदेश, जो छठे अध्याय पर पाँचवाँ है - गलातियों 6:12-13
जो छठे अध्याय पर पाँचवाँ है।
12 जितने लोग शरीर के अनुसार अच्छे दिखना चाहते हैं, वे तुम पर खतना करवाने का दबाव डालते हैं, केवल इसलिए कि वे मसीह के क्रूस के कारण सताए न जाएँ।
13 क्योंकि खतना करानेवाले आप ही व्यवस्था को नहीं मानते, परन्तु वे चाहते हैं कि तुम्हारा खतना हो, ताकि वे तुम्हारे शरीर पर घमण्ड करें।
यह व्यर्थ नहीं है कि परमेश्वर ने अपने वचन के प्रचारकों को इतनी बार चेताया है कि वे मनुष्यों की कृपा और अनुग्रह की खोज न करें, वरन् मानो संसार के सब विचारों की ओर से अपनी आँखें मूँद लें, ताकि वे इधर-उधर ताकते न रहें और अपना कर्तव्य ठीक रीति से निभाने में बाधा न पाएँ। क्योंकि हम देखते हैं कि जब तक हम परमेश्वर की ओर दृष्टि न उठाएँ और मनुष्यों की ओर से अपनी दृष्टि न फेर लें, तब तक अपना कर्तव्य ठीक रीति से निभाना हमारे लिए असम्भव है; क्योंकि जब हम इस प्रकार इधर-उधर खींचे जाते हैं तो सहज ही बिगड़ जाते हैं, जबकि कोई भी बात हमें इस ओर या उस ओर झुकानेवाली नहीं होनी चाहिए।
तो भी यह दृढ़ता विशेष रूप से उन लोगों में आवश्यक है जिन्हें परमेश्वर का वचन दूर-दूर तक पहुँचाना है, अर्थात् वे न तो महत्त्वाकांक्षा से और न लोभ से प्रेरित होकर मनुष्यों के पक्ष में बोलें या उन्हें प्रसन्न करें, और किसी धमकी या संकट से न घबराएँ। क्योंकि अनुभव दिखाता है कि ज्यों ही मनुष्य को अपनी हानि का भय होता है या वह अपने लाभ का ध्यान करता है, त्यों ही वह पल भर में बदल जाता है। यह सच है कि जो इस प्रकार मनुष्यों की कृपा चाहते हैं, वे पहली ही बार में अपने को दुष्ट और सत्य के शत्रु प्रकट नहीं करेंगे, जैसा कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने भी मजदूरों और भेड़ियों के बीच भेद किया है।
भले और विश्वासयोग्य चरवाहों की चर्चा करने के बाद, जो झुण्ड का सामूहिक कल्याण चाहते हैं, वह कहता है कि फाड़नेवाले भेड़िये या चोर भी होते हैं, जो सब कुछ को लूटने, नष्ट करने और उलट-पलट करने के सिवाय और कुछ नहीं चाहते। और ये वे हैं जो परमेश्वर से खुला विरोध करते हैं और सुसमाचार की शुद्ध शिक्षा को उलटने का परिश्रम और प्रयत्न करते हैं। फिर भी कुछ ऐसे भी हैं जो दो धाराओं के बीच नाव खेते हैं और परमेश्वर की सेवा करने का दिखावा करते हैं। और सच है कि कुछ लोग निर्माण भी करते हैं, परन्तु किसी उत्साह से नहीं, क्योंकि उनके हृदय में खराई नहीं है।
तो भी जब तक उन्हें कोई हानि न उठानी पड़े, वे बात का अच्छा रूप बनाए रखते हैं, यहाँ तक कि संसार प्रायः उनके द्वारा धोखा खाता है और उन्हें यीशु मसीह के सेवक समझ लेता है; पर उनकी खोज केवल मजदूरी की है, वे पूरी तरह अपने पेट के दास हैं। इसका प्रमाण यह है कि यदि तुम उन्हें केवल धमकाओ, तो वे तुरन्त घबरा जाते हैं और अपनी बात पलट देते हैं, यहाँ तक कि जो कल परमेश्वर के वचन का समर्थन करते दिखाई देते थे, वे आज टेढ़े-मेढ़े झुक जाते हैं। और क्यों? क्योंकि वे देखते हैं कि यही संसार को प्रसन्न करने और अपना लाभ उठाने का मार्ग है।
और इसी कारण सन्त पौलुस अब गलातियों को चेताता है कि भली-भाँति ध्यान दें कि जिन्होंने उन्हें व्याकुल किया और सही मार्ग से बाहर धकेल दिया, वे अपने ही लाभ के चाहनेवाले मनुष्य थे, और इस प्रकार उन्होंने अपनी शिक्षा को सन्देह के योग्य ठहरा दिया। इससे पहले वह पर्याप्त रूप से विवेचन कर चुका है और तर्क से दिखा चुका है कि यदि हम अपना पूरा भरोसा यीशु मसीह पर रखें, तो व्यवस्था की विधियाँ अब अनावश्यक हैं; क्योंकि वे केवल एक समय के लिए थीं, यह दिखाने को कि यदि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह पर भली-भाँति स्थिर हैं, तो हमारे लिए यह उचित नहीं कि अपनी कोई योग्यता मिलाएँ, या परमेश्वर के सम्मुख धार्मिकता मोल लेने की कोई मूर्खतापूर्ण धारणा रखें।
तब सन्त पौलुस ने उस विषय को जितना आवश्यक था उतना सँभाला और खोलकर रखा। और अब इसलिए कि साधारण जन और अधिक प्रभावित हों, वह अपनी बात स्वयं उन व्यक्तियों की ओर मोड़ देता है और कहता है: विचार करो कि वह क्या उद्देश्य है जिससे ये मनुष्य, जिनके विरुद्ध मैं यहाँ संघर्ष कर रहा हूँ, व्यवस्था की विधियों को हमारे प्रभु यीशु मसीह के साथ इस प्रकार मिलाते हैं। क्या कोई उत्साह उन्हें इस ओर प्रेरित करता है? या वे परमेश्वर की सेवा करने की इच्छा रखते हैं? नहीं; बल्कि इसलिए कि वे अपने को सताव के खतरे में डालने से कतराते हैं।
जब भय ही उनसे परमेश्वर के वचन को विकृत करवाता है, तो तुम्हें यह जानने के लिए लम्बी पूछताछ की आवश्यकता नहीं कि वे कैसे मनुष्य हैं और उन पर विश्वास किया जाए या नहीं; क्योंकि तुम देखते हो कि वे अपने को इस प्रकार बदलते और रूप धरते हैं, तो इसलिए कि वे लड़ाई से बचना चाहते हैं। तो जब वे अपनी कायरता के कारण परमेश्वर के प्रति ऐसे विश्वासघाती हैं, तो क्या वे विश्वास के योग्य हैं, या उनकी बातों को कोई आदर दिया जाए? देखो, सन्त पौलुस का आशय यही है।
परन्तु यहाँ परमेश्वर के वचन के सब सेवकों को ऐसी दृढ़ता और स्थिरता रखने की शिक्षा मिलती है कि उन्हें इस बात की चिन्ता न हो कि जो शिक्षा वे लाते हैं उससे संसार घृणा करता है या प्रेम, पर वे अपनी दौड़ में आगे बढ़ते रहें, हर हवा के सामने पाल न उतारें, और डगमगाते नरकटों के समान, जो इधर-उधर झुकते हैं, न हिलाए जाएँ; परन्तु चाहे कैसे ही परिवर्तन और बदलाव हों, और चाहे कैसे ही संकट और उपद्रव आ पड़ें, वे सदा परमेश्वर की सेवा में लगे रहें।
संक्षेप में, हमें उसका अभ्यास करना चाहिए जो हम पहले देख चुके हैं: अर्थात् यदि हम मनुष्यों की कल्पनाओं को प्रसन्न करना चाहें, तो हमें परमेश्वर के पुत्र की सेवा छोड़नी पड़ेगी। इसे एक बात के रूप में ध्यान में रखो। और इसके साथ सब विश्वासी इस पाठ में एक अच्छी और लाभदायक शिक्षा पा सकते हैं, अर्थात् उन्हें उन लोगों को भली-भाँति परखना चाहिए जो अपना ही लाभ और हित चाहते हैं, संसार की कृपा पाने की इच्छा रखते हैं, और प्रशंसा पाने को लालायित रहते हैं; क्योंकि ऐसे लोगों से मनुष्य के हाथ कभी कुछ नहीं लगता।
वे पहली ही झड़प में (जैसा मैं पहले कह चुका) अपने को ऐसा प्रकट नहीं करेंगे; क्योंकि कुछ लोग पोप-भक्त पाखण्डियों का अभिनय करते हैं, यहाँ तक कि ऐसा लगता है कि यदि वे न होते तो परमेश्वर का वचन घृणित हो जाता; और जब तक वह लोकप्रिय है, वे अपने मुँह से आग उगलते हैं, फिर भी इस बीच तुम देखोगे कि वे दिन-प्रतिदिन अपना मन बदलते रहते हैं। यदि कोई संकट आ पड़े, और वे देखें कि उन्हें सचमुच हमारे प्रभु यीशु मसीह की गवाही देनी होगी, तब वे अपनी कायरता दिखाते हैं और अन्त में बिलकुल पलट जाते हैं, और, जैसा कहावत में कहा जाता है, अपना चोला बदल लेते हैं। परन्तु वे जैसे भी चलें, हम निरन्तर चौकस रहें, कि हम उन पर विश्वास करें जो सीधाई से चलते हैं और जब देखते हैं कि संसार उनके विरुद्ध गुट बाँध रहा है तब भी पीछे नहीं हटते, चाहे ऐसा क्रोध भड़के कि प्रायः लगे कि वे निगल लिए जाएँगे, फिर भी जो सामने खड़े संकट देखकर भी सीधी दृढ़ता में बने रहते हैं: ऐसे लोगों को हम परमेश्वर के सेवक जानें।
परन्तु जो चंचल और कपटी हैं, जो मनुष्यों की घृणा से बचने के लिए, या सताव के भय से, कभी कुछ और कभी कुछ और कहते हैं: उनसे सावधान रहें, कि हम उनसे धोखा और छल न खाएँ, क्योंकि वे प्राणघातक महामारियाँ हैं। और यह निश्चित है कि जब तक हम में यह विवेक और सतर्कता न हो, जैसा सन्त पौलुस इस पाठ में हमें दिखाता है, हम कभी दृढ़ और भली-भाँति स्थिर न होंगे। और आजकल यह बहुत आवश्यक है।
क्योंकि इतने पाखण्डी परमेश्वर के वचन के विरुद्ध क्यों बकवास करते हैं, और पोपतन्त्र में दिखाई देनेवाले घोर दुराचारों, अर्थात् उनके अन्धविश्वासों, मूर्तिपूजाओं और भ्रान्तियों का समर्थन करने में निर्लज्ज बनकर क्यों खेल खेलते हैं? केवल इसलिए कि वे भली-भाँति जानते हैं कि यदि वे हण्डी को जल्दी न उबालें तो भूखों मरने की नौबत है; तो क्या वे अपनी वस्तुओं का अधिकार दृढ़ता से न थामे रखें? फिर दूसरी ओर वे ऐसी शिक्षा का समर्थन करने पर सताव के खतरे को भी सोचते हैं; क्योंकि तुम देखते हो कि वह इस संसार के हाकिमों और बड़े लोगों द्वारा दोषी ठहराई गई है, और इसलिए साबुत खाल के साथ सोना ही अच्छा है।
देखो, मैं तुमसे विनती करता हूँ, आजकल कितने असंख्य लोग परमेश्वर के सत्य का रूप बिगाड़ते और उसे झूठा ठहराते हैं और सब भ्रष्टाचारों का समर्थन करते हैं, क्योंकि वे यीशु मसीह के लिए दुःख उठाना नहीं चाहते। यह सच है कि वे पक्के पोप-भक्त नहीं हैं कि परमेश्वर के वचन की खुली निन्दा करें; पर फिर भी वे एक बीच का मार्ग चाहते हैं, वह भी अपनी ही गढ़ी हुई। क्योंकि वे हम पर अत्यधिक कठोरता और अतिवाद का दोष लगाते हैं, इसलिए कि हम उन्हें दोषी ठहराते हैं जो मिस्सा में जाते हैं और अपने मन को समझाते हैं कि वे मूर्तियों की उपासना नहीं करते।
वे कहते हैं: अरे, यह कैसे हो सकता है, यदि मनुष्य अपने हृदय में ऐसा न सोचे? क्या मनुष्यों को इतना कसकर दबाया जाए कि इसे ठोकर का कारण और जीवन-मरण का प्रश्न बना दिया जाए? इसका क्या प्रयोजन होगा? परमेश्वर हमारे जीवन को बहुत मूल्यवान समझता है, और यद्यपि हम चूक भी जाएँ, तो भी वह हमारी निर्बलता पर तरस खाएगा। निश्चय ही जो इस प्रकार बोलते हैं, उन्हें प्रेरित करनेवाला और कोई कारण नहीं, सिवाय इसके कि वे साफ देखते हैं कि सारा संसार हमारे विरुद्ध बुरी तरह भड़क उठा है, और ऐसा लगता है कि हम प्रतिदिन नाश और बिलकुल भ्रष्ट हो जाएँगे।
इस प्रकार तुम देखते हो कि जब वे कोई संकट आता देखते हैं तो पीछे हट जाते हैं और शेष लोगों से अलग अपने को सुरक्षित करने में लगे रहते हैं। परन्तु जब हम इन कायर मनुष्यों को इस रीति से सताव से बचते, हमारे प्रभु यीशु मसीह के लिए किसी हाथापाई में आने से हिचकते, और केवल इस संसार में शान्ति पाने के लिए इस प्रकार टेढ़े-मेढ़े होते और रूप बदलते देखते हैं, तो हमारे लिए और भी आवश्यक है कि सन्त पौलुस की इस चेतावनी पर ध्यान दें और पहचानें कि यीशु मसीह के सच्चे सेवक कौन हैं; अर्थात् वे जो अपने लाभ की परवाह नहीं करते, न चाहते हैं कि मनुष्य उनकी चापलूसी करें, न पेट की मौज और संसार का मान खोजते हैं, परन्तु अपना कर्तव्य निभाने से ही सरलता से सन्तुष्ट रहते हैं, और इसकी चिन्ता नहीं करते कि कैसी हवा चल रही है, चाहे आँधी-तूफान की हो या सुहावनी और शान्त हो; वरन् अपने सुननेवालों को लाभ पहुँचाने और जो शिक्षा उन्हें सौंपी गई है उसे पूरी शुद्धता में बनाए रखने में लगे रहते हैं।
यदि हम उसका पालन करें जो यहाँ हमें दिखाया गया है, तो निश्चय ही हमारा विश्वास कभी डगमगाएगा नहीं, जैसा आजकल बहुतों का डगमगाता है, जो नहीं जानते कि क्या करें, और फिर भी कहेंगे: मुझे इस संसार के क्लेशों, मतों की विभिन्नताओं और झगड़ों का भय है। कुछ लोग भली-भाँति कह सकते हैं कि मुझे अपने आपको पूरी तरह हमारे प्रभु यीशु मसीह को सौंप देना उचित है; परन्तु एक और प्रकार के लोग हैं जो कहीं अधिक सुखद मार्ग अपनाते हैं और सुधार तो चाहते हैं, पर केवल आधा।
और [वे कहते हैं] इनमें से मैं किस पर विश्वास करूँ? अपनी आँखें खोलो; क्योंकि जो ऐसे बहाने बनाते हैं, वे सत्य का अनुसरण करना नहीं चाहते, परन्तु यदि उन्हें अपनी लज्जा छिपाने के लिए कोई ओढ़नी मिल जाए तो वे सन्तुष्ट हैं, और चाहते हैं कि उनकी चापलूसी की जाए; पर इस बीच इससे उन्हें क्या लाभ? क्योंकि शैतान उन्हें विनाश की ओर ले जाता है और वे उसके पीछे चलने को तैयार हैं। क्योंकि उन्हें अपने प्राणों का भय है, इसलिए वे आड़ को प्रिय मानते हैं, और क्योंकि वे सुखभोग में लिप्त हैं, इसलिए अपना आराम खोजते हैं।
इसलिए उन्हें वही बदला मिलना चाहिए जिसके वे योग्य हैं। परन्तु संसार जैसे भी चले, सन्त पौलुस घोषणा करता है कि जो जान-बूझकर पशु-सरीखे बन जाते हैं, वे शैतान द्वारा ऐसे पकड़े जाते और ऐसी उलझन में डाल दिए जाते हैं कि उन्हें सूझता नहीं कि क्या करें: क्योंकि वे यह नहीं सोचते कि जो सुसमाचार के सत्य को सीधाई से दूर-दूर तक पहुँचाते हैं, वे डगमगानेवाले नहीं, परन्तु ऐसे हैं जो अपनी चाल में बने रहते हैं और इसकी परवाह नहीं करते कि संसार उनकी शिक्षा को पसन्द करता है या नहीं; परन्तु इसलिए कि परमेश्वर ने उन्हें बोलने की आज्ञा दी है, वे बोलते हैं।
इसके विपरीत, जो नाजुक-मिजाज लोग कहते हैं कि सावधान रहना अच्छा है, और अपने को काठी से गिराना नहीं चाहिए, और चाहते हैं कि मनुष्य ढोंग रचें और एक ही टोपी में दो चेहरे रखें: निश्चय है कि ऐसे मनुष्य परमेश्वर की सेवा करने के किसी उत्साह या लगन से प्रेरित नहीं हैं, न उन्हें कलीसिया की उन्नति या कल्याण का कोई ध्यान है; और (संक्षेप में) उनकी और कोई चिन्ता या दृष्टि नहीं, सिवाय इसके कि सब सताव से बचें और आराम से जिएँ, ताकि कोई उन पर हाथ न डाल सके। अब जब यह बात इतनी स्पष्ट है, तो निश्चय है कि आजकल जो सब अपने घोंसले में इस प्रकार दुबके रहते हैं, वे परमेश्वर का अपराध करते हैं और बिलकुल निरुत्तर हैं। क्यों? क्योंकि सन्त पौलुस यहाँ हमें एक अचूक चिह्न देता है, जो दिखाता है कि परमेश्वर के सच्चे सेवक कौन हैं और वे मजदूर कौन हैं जिनसे हमें बचना है, अर्थात् वे जो केवल अपना पेट भरना और इस संसार में अपनी सुख-सुविधाएँ पाना चाहते हैं।
इस पर वह जोड़ता है: कि वे मसीह के क्रूस के कारण सताए न जाएँ। निस्सन्देह क्रूस शब्द के अन्तर्गत सन्त पौलुस सारी शिक्षा को समेटता है, पर इस विचार के साथ कि मनुष्य के लिए उन बातों का, जो परमेश्वर के वचन में निहित हैं, सीधे और स्पष्ट रूप से प्रचार करना बहुत कठिन है, क्योंकि उसे अनेक टक्करें झेलनी पड़ेंगी। क्योंकि यद्यपि परमेश्वर हम पर (अर्थात् हम पर जो उसके वचन का प्रचार करते हैं) दया करता है और सदा हमें इतनी कठिन परीक्षा में नहीं डालता कि हमारे शत्रु हम पर तलवारें खींच लें, तो भी संसार सुसमाचार को कभी इतनी आज्ञाकारिता से ग्रहण नहीं करता कि उसके विरुद्ध कुछ बड़बड़ाहट और बोल-चाल न रहे, जैसा आज भी देखा जाता है और आगे भी होगा। क्योंकि हमारा प्रभु अपने विश्वासियों की दृढ़ता को परखना चाहता है, और साथ ही अपने वचन की अजेय सामर्थ्य को प्रकट करना चाहता है कि वह उन सब रुकावटों को जीत लेता है जो शैतान उसके विरुद्ध खड़ी करता है; जैसा यिर्मयाह के इस कथन के अनुसार है, "वे तुझ से लड़ेंगे, पर तू उन पर प्रबल होगा।" इस प्रकार तुम देखते हो कि जब संसार और शैतान पूरा ज़ोर लगाकर भी उसके मार्ग को नहीं रोक सकते, तब परमेश्वर की महिमा होती है।
इसी कारण सन्त पौलुस कहता है कि जो इतने चंचल हैं और परमेश्वर के वचन का रूप बिगाड़ते या उसे झूठा ठहराते हैं, वे क्रूस से, अर्थात् सुसमाचार के सच्चे प्रचार से, कतराते हैं, सताव से बचने के लिए ही। अब यहाँ फिर हमें एक बहुत लाभदायक सम्मति मिलती है। क्योंकि यदि हम परमेश्वर और उसकी कलीसिया की सेवा करना चाहते हैं, तो हमें सदा खतरे की घण्टी सुनने को तैयार रहना चाहिए। और यद्यपि आग अभी भड़की न हो, या शत्रु अभी इतना क्रूर सताव करने को शस्त्र-सज्जित न हुए हों जितना वे चाहते हैं, या अन्ततः हमारा प्रभु उन सबको रोके रखे जो उसके वचन से थके हुए हैं और उसका जूआ उतार फेंकना चाहते हैं; तो भी हमें बहुतों के हाथों तिरस्कार सहना होगा, हमारी बदनामी की जाएगी, हमारे विरुद्ध बड़बड़ाहट और गाली-गलौज होगी, और हमें इसे सह लेना और इसके विरुद्ध अपने को कठोर बना लेना होगा। हाँ, जो विश्वासयोग्यता से अपने को लगाते हैं, उनके विरुद्ध हम सहस्रों चुगलियाँ देखेंगे, उन स्थानों में भी जहाँ सुसमाचार का प्रचार होता है। कुछ पर अपराधियों के समान मुकद्दमा चलाया जाएगा, और कुछ पर यह या वह दोष लगाया जाएगा, और फिर भी सब कुछ निरी निन्दा ही होगी।
संक्षेप में, जो भी अपनी दौड़ पूरी करने का मन रखते हैं, उन्हें अनेक परीक्षाएँ सहने के लिए अपने को तैयार करना होगा, जो उन्हें लड़खड़ा देतीं, यदि वे इस बात में स्थिर न होते कि सारे संसार के होते हुए भी परमेश्वर की आज्ञा माननी है। इसे एक बात के रूप में ध्यान में रखो। और इसके साथ हमें यह भी ध्यान रखना है कि यह सारी कलीसिया पर सामान्य रूप से लागू होता है। इसलिए जब हम परमेश्वर के नाम से लाया गया शान्ति का सन्देश सुनें, तो यह न समझें कि संसार की ओर से हमें विश्राम मिलेगा, वरन् यह कि निरन्तर अनेक क्लेश और बाधाएँ होंगी। और जो इस पर मन न बनाए, उसे अवश्य हमारे प्रभु यीशु मसीह से हट जाना पड़ेगा; क्योंकि वह कभी उसका चेला नहीं हो सकता, जैसा कि वह स्वयं अपने मुँह से घोषणा करता है कि ऐसा मनुष्य उसकी पाठशाला का होने के योग्य नहीं, और इस प्रकार वह उन सबको द्वार से बाहर कर देता है।
इसलिए आओ हम सीखें कि जब हम एक बार अपने प्रभु यीशु मसीह के पास बुलाए गए हैं, तो जब तक वह चाहे हमें उसके क्रूस में सहभागी होना होगा, जैसा कहा गया है कि यदि हम उसके साथ दुःख उठाएँ तो उसके साथ महिमा भी पाएँगे, और उस सामर्थ्य के सहभागी होंगे जो उसके पुनरुत्थान में प्रकट हुई। फिर भी उसने जो दुःख सहे, वे पहले हम में पूरे होने चाहिए, जो उसके अंग हैं। यह सच है कि उसने हमारे उद्धार के लिए जितना आवश्यक था उतना दुःख सह लिया; परन्तु फिर भी हमें उसके स्वरूप के समान ढाला जाना है, जैसा रोमियों के आठवें अध्याय में कहा गया है। अब जब परमेश्वर हम पर दया करता है, कि हम ऐसे अत्याचारियों के बीच नहीं जो हमें सताएँ; या यदि दुष्ट हमें काट नहीं सकते, केवल भौंक ही सकते हैं; या यदि वह हमें शान्ति में रहने देता है: तो जान लें कि यह इसलिए है कि वह हमारी दुर्बलता पर तरस खाता है, और हमें इसलिए बचाता है कि वह देखता है कि हम कितने कमजोर हैं। फिर भी इस सब के बावजूद हम अपने को धोखा न दें, परन्तु परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह अपने पवित्र आत्मा से हमें ऐसा दृढ़ करे कि जब कभी वह हमें लड़ाई की पंक्ति में बुलाए, तो हम कच्चे सिपाहियों जैसे न निकलें, वरन् बहुत पहले से हमारे मन में यह बात बैठी हो कि हमें यीशु मसीह के दुःखों में सहभागी होना है, ताकि उसके पुनरुत्थान की महिमा तक पहुँचें।
अब सन्त पौलुस ने इस प्रकार बोलने के बाद अपनी बात की और पुष्टि के लिए जोड़ा कि जिनका खतना हुआ है और जो खतने का प्रचार करते हैं, वे व्यवस्था को नहीं मानते: वे केवल उन लोगों के शरीर पर घमण्ड करना चाहते हैं जिन्हें वे उस यहूदी रीति पर ले आते हैं। इस पाठ में सन्त पौलुस फिर अपने विरोधियों पर दोगलेपन और पूरे पाखण्ड का दोष लगाता है। क्यों? खतना हमारे प्रभु यीशु मसीह के आने से पहले उसी बात का चिह्न था जिसका चिह्न आज हमारे लिए बपतिस्मा है। क्योंकि [उसके द्वारा] यहूदियों को यह साक्षी मिलती थी कि वे परमेश्वर की ओर से उसकी निज विरासत के रूप में पवित्र किए गए हैं। फिर भी जो खतने को सुसमाचार के साथ मिलाते थे, वे पूरी तरह इस मत के थे कि मूसा की व्यवस्था का पालन होना चाहिए, क्योंकि वह परमेश्वर की ओर से दी गई थी, और वह कभी रद्द नहीं की जानी थी। देखो, उनकी ओट यह थी कि खतना सारी व्यवस्था के पालन का चिह्न था। परन्तु अब सन्त पौलुस उन पर यह दोष लगाता है कि वे व्यवस्था को नहीं मानते: और इसलिए वे बाहरी चिह्न द्वारा वह करने का दिखावा करके, जो वे नहीं करते, परमेश्वर और मनुष्यों दोनों का उपहास करते हैं; क्योंकि बात बिलकुल उलटी है। अब हम सन्त पौलुस का आशय देखते हैं। और व्यवस्था के पालन की इस बात के विषय में, यह कभी-कभी व्यवस्था में निहित सब कुछ को करने या पूरा करने के अर्थ में लिया जाता है। परन्तु कोई मनुष्य व्यवस्था का पालन नहीं कर सकता, अर्थात् कोई मनुष्य उन सब बातों को पूरी तरह निभा नहीं सकता जिनकी व्यवस्था आज्ञा देती है। क्योंकि इसे असहनीय बोझ कहा जाना व्यर्थ नहीं है। और हम अपनी निर्बलता भी देखते हैं, और उधर परमेश्वर हमें स्वर्गदूतों जैसी धार्मिकता दिखाता है। तो हमारे लिए उसे पाना कैसे सम्भव है? इसलिए यदि हम व्यवस्था शब्द को सिद्ध और निर्दोष आज्ञाकारिता के अर्थ में लें, तो कोई उसे वास्तव में नहीं मानता। तो भी विश्वासी, परमेश्वर के आत्मा द्वारा चलाए और संचालित होकर, व्यवस्था का पालन करते हैं, अर्थात् जो नियम वहाँ उन्हें दिया गया है उसके अनुसार चलते हैं।
इसलिए नहीं कि वे उतनी तेज़ दौड़ते हैं जितनी चाहिए, या पहली ही बार में लक्ष्य तक पहुँच जाते हैं; पर फिर भी वे उसकी ओर बढ़ते जाते हैं, और परमेश्वर उन्हें सह लेता है और उनके दोष उनके लेखे में नहीं लगाता। इसलिए विश्वासी व्यवस्था का पालन करते हैं। परन्तु यहाँ सन्त पौलुस विधिपरक व्यवस्था की बात करता है, यद्यपि प्रसंगवश वह पहले दिखा चुका है कि परमेश्वर की सब आज्ञाएँ दण्ड की आज्ञा के सिवाय और कुछ नहीं ला सकतीं, जब तक कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह की शरण न लें: परन्तु (जैसा मैंने कहा) यहाँ वह विधियों और छायाओं की बात करता है। अब देखें कि उसका इससे क्या अर्थ है। वह कहता है कि जिनका खतना हुआ है, वे व्यवस्था को नहीं मानते: अर्थात् उनके पास वह चिह्न तो है, मानो एक झण्डा, ताकि लोग मान लें कि वे यहूदी हैं, जिससे वे घृणा और सताव से बचे रहें; फिर भी वे सारी व्यवस्था का पालन नहीं करते: क्योंकि वे उस सब को तुच्छ जानने की छूट ले लेते हैं जो खतने के साथ मेल रखना चाहिए। क्योंकि जो खतना कराता है, उसे बलिदान भी चढ़ाना चाहिए, व्यवस्था द्वारा वर्जित भोजन से परहेज़ करना चाहिए, वहाँ ठहराए गए दिन और पर्व मनाने चाहिए, आज्ञा दिए गए धुलाई और शुद्धिकरण करने चाहिए, और अन्य अनेक बातें करनी चाहिए। परन्तु ये लोग उनकी कोई गिनती नहीं करते। जब वे कोनों में होते हैं और कोई उन्हें नहीं देखता, तो वे परवाह नहीं करते कि क्या करते हैं, और व्यवस्था की सब विधियों को तुच्छ जानने में उन्हें कोई संकोच नहीं होता। इस प्रकार प्रकट होता है कि वे यह किसी उत्साह से नहीं, केवल मनुष्यों के कारण करते हैं।
अब हमें यह ध्यान देना चाहिए कि सन्त पौलुस यहाँ उनकी बात करता है जो इस बात पर अड़े थे कि मनुष्यों का खतना होना अनिवार्य है। क्योंकि कभी-कभी सन्त पौलुस ने विशेष रूप से यहूदियों के समान बनने का ध्यान रखा, और जो स्वतन्त्रता उसे दी गई थी उससे ठोकरों से बचने के लिए परहेज़ किया: परन्तु क्या उसने सदा यह बनाए रखा कि इस बात में अनिवार्यता का कोई बन्धन नहीं है। इसलिए जब सन्त पौलुस ने अपनी इच्छा से झुकना स्वीकार किया, तो उसका आशय दूसरों को बन्धन में डालना नहीं था, जैसा वह घोषणा करता है कि वह किसी को बाँधना नहीं चाहता। यह सच है कि जब वह विवाह की बात करता है तो मामला बदल जाता है; फिर भी वह सामान्य रूप से कहता है कि वह उन आत्माओं पर, जिन्हें हमारे प्रभु यीशु मसीह ने छुड़ाया है, दासत्व का कोई जूआ नहीं डालेगा: और इस प्रकार तुम देखते हो कि सन्त पौलुस ने इस विषय में कैसा व्यवहार किया। अब वह यहाँ कहता है, "जो तुम पर खतना करवाने का दबाव डालते हैं," अर्थात् जो तुम पर व्यवस्था लादते हैं और कहते हैं कि तुम्हें प्राणघातक पाप के दण्ड के अधीन इस विधि का पालन करना होगा: वे बिना कारण तुम्हें दासत्व में लाने के सिवाय और कुछ नहीं चाहते। संक्षेप में, हम यहाँ देखते हैं कि उन पर किस बात का दोष है जो मसीही लोगों को मूसा की व्यवस्था की विधियों और छायाओं के पालन के अधीन करना चाहते थे: अर्थात् यह कि वे दोगले मनुष्य थे, और उन्हें इस बात के सत्य की परवाह नहीं थी कि परमेश्वर ऐसी बातें माँगता है या नहीं, परन्तु उनका मन संसार को प्रसन्न और सन्तुष्ट करने का था, और इस प्रकार सताव से बचने का। और आजकल हमें भी इसकी चेतावनी की उतनी ही आवश्यकता है जितनी तब गलातियों को थी। और यदि हम अपने समय की दशा और प्रवृत्ति को देखें, तो सहज ही देखेंगे कि यह शिक्षा निरर्थक नहीं है, और पवित्र आत्मा ने उसकी व्यवस्था करना चाहा जिसे वह जानता था कि हमारे हित के लिए है।
क्योंकि आजकल कितने ही ऐसे मिलते हैं जो व्यवस्था की विधियों का बड़े ज़ोर और हठ से समर्थन करते हैं, और फिर भी उनकी कोई गिनती नहीं करते? परन्तु (जो इससे भी बुरा है) वे उन मूर्खताओं और परम्पराओं का समर्थन करते हैं जो मनुष्यों ने गढ़ी हैं, हाँ, ऐसे दुराचारों, भ्रान्तियों और छलों का भी जो जितने मोटे और मूर्खतापूर्ण हो सकते हैं उतने ही हैं। इन सब बातों का समर्थन अत्यन्त कठोरता से उनके द्वारा किया जाएगा जो मनुष्यों से इनका पालन करवाना ही चाहते हैं। जैसे आजकल यदि कोई इन पाखण्डियों पर यह दोष लगाए कि उनकी इतनी बहुत सी रीतियों से हमारे प्रभु यीशु मसीह का अनुग्रह और उसके सुसमाचार का तेज धुँधला हो गया है, और हम तो यहूदियों के बराबर ही हो गए हैं: (क्योंकि सचमुच पोप के अनुयायियों ने व्यवस्था से इतनी बातें उधार ली हैं कि यहूदियों और अपने को मसीही कहनेवालों के बीच अन्तर करना कठिन है:) मैं कहता हूँ, यदि कोई उन पर ये दोष लगाए, तो भी वे पूरी ताकत से यही कहेंगे कि मनुष्यों को ऐसा ही करते रहना चाहिए, क्योंकि ये चिरकाल से चली आ रही हैं। यदि कोई उनसे आगे बढ़कर कहे, यह कैसे? तुम्हारी इतनी सनकें हैं कि अन्यजाति के लोग भी अपने अन्धविश्वासों में कभी इतने मोटे और मूर्ख नहीं थे जितने तुम हो: तो वे कहेंगे, अरे छोड़ो, फिर भी हमें अपनी माता पवित्र कलीसिया की परम्पराओं को मानते रहना है। और इसके साथ वे चिल्लाते हैं, इसे आग में! परन्तु अब ये पाखण्डी क्या करते हैं, जो उनके विरुद्ध हाकिमों और न्यायियों के मन भड़काते हैं जो परमेश्वर के वचन का विश्वासयोग्यता से प्रचार करते हैं? जब तक वे आपस में हैं, वे अपनी ही परम्पराओं का मज़ाक उड़ाते हैं।
और जब वे उनके विषय में विवाद करते हैं, तो वे अपने प्रचार और मंच पर की बातों के बिलकुल उलटा कहेंगे। इससे प्रकट होता है कि उनमें न परमेश्वर का उत्साह है, न खराई: परन्तु उनकी सारी खोज यही है कि उन्हें खिलाया-पिलाया और मोटा किया जाए, और वे चैन से रहें, और उनके आराम और सुख-सुविधाएँ बनी रहें।
तो जब आजकल इतने मनुष्य हैं जिनमें परमेश्वर का भय और उसके वचन का आदर रत्ती भर भी नहीं है, फिर भी जो बड़े उत्साही होने का दिखावा करते हैं, और सचमुच बेचारी आत्माओं को चारे से लुभाते हैं, या यों कहो कि उनका गला घोंटते हैं: तो हमारे लिए और भी आवश्यक है कि उस बात पर भली-भाँति ध्यान दें जो सन्त पौलुस हमें यहाँ बताता है: अर्थात् चूँकि हम देखते हैं कि जो दूसरों पर चिल्लाते और गरजते हैं वे जो कहते हैं उसमें से कुछ भी नहीं करते, इसलिए हमें चौकस रहना चाहिए, और विचार करना चाहिए कि हमें सिखानेवाले किस ओर लक्ष्य साधे हैं।
यह सच है कि यद्यपि वह व्यक्ति जो कहता है उससे बिलकुल उलटा करता है, तो भी इसलिए परमेश्वर का वचन हमारे लिए कम अधिकार का नहीं हो जाता; क्योंकि यह कोई उचित बात नहीं कि मनुष्य दुष्ट है, इसलिए परमेश्वर अपने प्रभुत्वपूर्ण अधिकार से वंचित कर दिया जाए। और यद्यपि कोई मनुष्य ढीला जीवन बिताए, या कोई बुरा काम करे, फिर भी इससे स्वर्गीय शिक्षा की प्रतिष्ठा नहीं मिटनी चाहिए, यदि वह विश्वासयोग्यता से प्रचार करे।
यद्यपि मनुष्य परिवर्तनशील, अस्थिर और चंचल हो, या वह पाखण्डी हो और उसका जीवन उन बातों के अनुरूप न हो जो वह अपने मुँह से कहता है, तो भी परमेश्वर के वचन के सत्य को हमारे लिए घटिया नहीं ठहराना चाहिए। फिर भी मैं अब कहता हूँ कि जब कभी हम देखें कि मनुष्य बड़े उत्साह का दिखावा करते हैं और फिर भी अपने को ढीला छोड़ देते और अपने प्रचार के विपरीत करने की छूट ले लेते हैं: तो हमें इस पर विचार करना चाहिए, और इतना विवेक रखना चाहिए कि हम उनकी बाँसुरी पर न नाचें, और नाक पकड़कर न घसीटे जाएँ, वरन् उनकी शिक्षा की जाँच करें और उसे भली-भाँति और सजीवता से परखें। और जब हम ऐसा करेंगे, तो देखेंगे कि पोप के अनुयायियों की शिक्षा केवल एक ओट है जिसे वे संसार की ओर से चैन से रहने के लिए ओढ़ते हैं, और परमेश्वर की ओर से उन्हें कोई चिन्ता नहीं कि बातें कैसे चलती हैं।
क्योंकि वे किसी परिवर्तन को सहना नहीं चाहेंगे, इसलिए कि वे किसी अप्रसन्नता के खतरे में पड़ने से कतराते हैं: क्योंकि उन्हें सदा किसी प्रकार सताए या दुःखी किए जाने का भय रहता है। इसलिए यह एक अचूक चिह्न है कि हम शैतान की सब घातों से सावधान रहें, ताकि हम धोखा न खा सकें, जब तक कि हम स्वयं न चाहें, जैसा मैं पहले बता चुका हूँ।
इसके अतिरिक्त, सन्त पौलुस जोड़ता है कि ऐसे लोग साधारण जनों के शरीर पर घमण्ड करना चाहते हैं। यह बिलकुल निश्चित है कि यहाँ उसकी दृष्टि खतने के चिह्न पर है, मानो वह कहे कि वे तुम पर अपनी छाप लगाना चाहते हैं, ताकि वे डींग मार सकें कि हमने इन्हें जीत लिया। हाँ, पर इस रीति से मनुष्यों को जीतना उन्हें और भी घृणित बना देता है, क्योंकि वे उस चिह्न का ऐसा दुरुपयोग करते हैं जो परमेश्वर ने इब्राहीम की सन्तान के साथ किए गए गोद लेने की पक्की गारंटी के लिए दिया था, और उसके सच्चे और वैध उपयोग को बिगाड़ते हैं।
क्योंकि परमेश्वर ने यहूदियों को खतना कराने की आज्ञा दी थी। और क्यों? इसलिए कि वे देखें कि सारी मानव जाति शापित है, और हम में अशुद्धता के सिवाय और कुछ नहीं है, और हमें अपने स्वभाव की सब बातों का त्याग करना ही होगा, नहीं तो हम परमेश्वर के सामने कभी अशुद्ध और दण्ड के योग्य बने रहना न छोड़ेंगे। देखो, यहूदियों को अपने खतने से यही सीखना चाहिए था।
तो भी इसके साथ उन्हें यह साक्षी भी मिलती थी कि मनुष्य के वंश के द्वारा उन्हें अपना उद्धार फिर प्राप्त होगा, जैसा हम जानते हैं कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के कारण परमेश्वर की ओर से आशीषित हैं। और इसलिए खतना यहूदियों को दीन करने, उन्हें अपने आप से अप्रसन्न करने, और लज्जित करने के काम आता था, जब वे देखते कि उनके स्वभाव में शाप के सिवाय कुछ नहीं है। मैं कहता हूँ कि खतने का सच्चा और वैध उपयोग यही था।
अब वे क्या करते हैं जिनके विरुद्ध सन्त पौलुस बोलता है? वे जानते हैं कि खतना अब प्रचलन में नहीं रहा: अर्थात् हमारे प्रभु यीशु मसीह के आने के बाद से बपतिस्मा ही पर्याप्त है: परन्तु क्योंकि यहूदी उन सबको धर्मत्यागी या पीछे हटनेवाले कहते थे जिनका खतना न हुआ हो: इसलिए ये दुष्ट लोग सत्य [या सार] के बिना चिह्न को ही थामे रखना चाहते हैं।
तो हम देखते हैं कि वे बड़े छली थे, और जब परमेश्वर ने उस आत्मिक संस्कार को ठहराया तब उसके आशय के बिलकुल उलटा उन्होंने शिक्षा को मरोड़ा, क्योंकि उनकी इच्छा संसार को प्रसन्न करने के सिवाय और कुछ नहीं थी। आज भी ऐसा ही किया जाता है। और जो परमेश्वर के सत्य को उलटने का परिश्रम करते हैं, वे सन्त पौलुस के विरोधियों से कहीं बुरे हैं। क्योंकि उनके पास तो खतने और व्यवस्था के प्रतीकों का समर्थन करने के लिए खरेपन की कुछ ओट थी, क्योंकि वे सब परमेश्वर की ओर से ठहराए और स्थापित किए गए थे।
परन्तु इन पाखण्डियों के विषय में जो आजकल पूरे गले से हम पर चिल्लाते हैं, [कहते हुए] कि पुरानी रीति को बिना कुछ बदले बनाए रखना होगा: वे किस आधार पर खड़े हैं? वे यह नहीं कह सकते कि परमेश्वर उनकी किसी भी वस्तु का रचयिता है। मनुष्यों ने उन्हें अपनी कल्पना के अनुसार गढ़ा है, या यों कहो कि शैतान ने उनके कानों में फूँका है: ताकि (एक शब्द में) पोपतन्त्र में जो कुछ परमेश्वर की सेवा कहलाता है, वह एक उलझी हुई भूलभुलैया के सिवाय और कुछ नहीं: सब मनुष्यों के गढ़े हुए स्वप्न हैं, और शैतान ही सदा उनका मुख्य रचयिता है। और फिर भी ये बदमाश कहते हैं कि उनसे कुछ भी नहीं छीना जाना चाहिए। और वे किस बात का ध्यान रखते हैं?
निश्चय वे यह तर्क देंगे कि मनुष्यों को इनके द्वारा परमेश्वर का अनुग्रह मोल लेना होगा, और ये लोगों को अधिक भक्ति के लिए उभारती हैं। फिर वे अपने ही सिरों की सब मूर्खतापूर्ण युक्तियों को संस्कार की उपाधि देते हैं और कहते हैं: यह बात अवश्य बनाए रखनी चाहिए, क्योंकि यह एक संस्कार है। परन्तु जब ठीक-ठीक हिसाब लगाया जाए, तो मनुष्य देखेगा कि उनका आशय संसार को प्रसन्न करना और अपने आपको बनाए रखना है। क्योंकि वे मन मारकर यह मानने को विवश हैं कि परमेश्वर की दृष्टि में इसका कोई महत्त्व नहीं, और वह उनकी इस प्रकार की सेवा की परवाह नहीं करता, वरन् उसे सर्वथा नापसन्द करता है, क्योंकि वह चाहता है कि उसकी सेवा आज्ञाकारिता से की जाए।
परन्तु क्या? वे कहते हैं कि यदि मनुष्य इस प्रकार सब कुछ काट डालें और बातों को स्पष्ट रूप से कहें तो भयंकर गड़बड़ी होगी। देखो, मैं तुमसे विनती करता हूँ, वे कैसे अपने को छिपाना चाहते हैं, और धर्म को इस रीति से बिगाड़ना और झूठा बनाना चाहते हैं कि सब कुछ में मिलावटी गड़बड़ी हो जाए: या फिर केवल सबसे मोटी और सबसे मूर्खतापूर्ण बातें ही हटाई जाएँ, और इस बीच ऐसी विधियों को रहने दिया जाए जो किसी प्रकार सही जा सकें।
मैं कहता हूँ कि निश्चय है कि जो सब ऐसा बोलते हैं, वे संसार की ओर से अनुकूल हवा और अच्छे मौसम के सिवाय और कुछ नहीं चाहते। जब बात ऐसी है: तो आओ हम पवित्र आत्मा के हाथ से चेतावनी लेकर ऐसी महामारियों से भागें: और यद्यपि हम इस संसार में विजय न मना सकें, यद्यपि हमारी कोई गिनती न हो, यद्यपि मनुष्य खुले मुँह हमें गालियाँ दें: तो भी हम परमेश्वर के सत्य के लिए अपना पक्ष थामे रहना न छोड़ें, और हमारे लिए यही पर्याप्त हो कि स्वर्गीय न्यायी हमें स्वीकार करे, चाहे सारा संसार हमसे घृणा करे।
यद्यपि हम ये सब बातें देखते हैं, तो भी हम धीरज रखें और तब तक ठहरे रहें जब तक हमारा प्रभु यीशु मसीह अपने को हमारा जमानतदार प्रकट न करे, और साथ ही अपने सत्य के पक्ष में हमें जय दे, ताकि उसके सब शत्रु लज्जित हों और उनके मुँह बन्द कर दिए जाएँ।
अब आओ हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने दोषों को मानते हुए गिर पड़ें, और उससे प्रार्थना करें कि वह अपने पवित्र आत्मा से हमें ऐसा सच्चा पश्चाताप दे कि अपने आप में पूरी तरह दीन होकर और सारे घमण्ड से बिलकुल मुक्त होकर, हम उनके लिए हृदय से खेदित हों: और इसके अतिरिक्त वह हम में अपने पवित्र आत्मा के वरदानों को ऐसा बढ़ाए कि हम फिर अपने शरीर और संसार के वश में होकर रुके और दबे न रहें, परन्तु आगे बढ़कर उसकी सेवा करें, और यत्न करें कि उसका नाम अधिकाधिक महिमा पाए, और हम उसके गोद लेने का ऐसा चिह्न धारण करें कि अपने भीतर उससे ऐसे दृढ़ हो जाएँ कि दूसरे मनुष्यों को इस हमारे भले परमेश्वर के नाम की महिमा करने का अवसर मिले, क्योंकि वह हम में ऐसा कार्य करता है। कि वह यह अनुग्रह न केवल हमें, वरन् पृथ्वी के सब लोगों और जातियों को भी प्रदान करे। आदि।
