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चालीसवाँ उपदेश, जो छठवें अध्याय पर तीसरा है - गलातियों 6:6-8
चालीसवाँ उपदेश,
जो छठवें अध्याय पर तीसरा है।
6 जो वचन की शिक्षा पाता है, वह सब अच्छी वस्तुओं में अपने सिखानेवाले को सहभागी करे।
7 धोखा न खाओ; परमेश्वर ठट्ठों में नहीं उड़ाया जाता। क्योंकि मनुष्य जो कुछ बोता है, वही काटेगा भी।
8 क्योंकि जो अपने शरीर के लिये बोता है, वह शरीर के द्वारा विनाश की कटनी काटेगा; और जो आत्मा के लिये बोता है, वह आत्मा के द्वारा अनन्त जीवन की कटनी काटेगा।
हम भली-भाँति देखते हैं कि जहाँ-जहाँ पौलुस जाना जाता था, वहाँ उस पर यह सन्देह नहीं किया जा सकता था कि वह अपने लाभ का बहुत लोभी मनुष्य है। क्योंकि यद्यपि उसके लिये यह उचित था कि वह अपना निर्वाह पाए, क्योंकि वह परमेश्वर का वचन दूर-दूर तक ले जाता था, तो भी (जैसा हम देखते हैं) उसने उस अधिकार को छोड़े रखा, ताकि ठोकर खाने के सब अवसरों को रोक सके। और वह घोषणा करता है कि उसे अपनी जीविका कमाने के लिये दिन-रात अपने हाथों से परिश्रम करना पड़ा। फिर भी इसी कारण वह इस पद में, बिना किसी सन्देह के, ढीले-ढाले लोगों को उनके कर्तव्य की ओर बुलाने में और अधिक समर्थ था। वह आज्ञा देता है कि लोग अपने शिक्षकों का निर्वाह करें, और उन्हें किसी बात की घटी न होने दें। अब यदि सन्त पौलुस (जैसा मैंने कहा) दूसरों की सम्पत्ति अपने लिये बटोरने में लोभी मनुष्य होता, या यदि वह अपने आप को ठाठ-बाट और अधिकता में दिखाना चाहता, तो उसे अपनी ही निन्दा सहनी पड़ती, और उससे कहा जाता कि वह अपने ही लिये बोल रहा है, और यह परमेश्वर की सेवा में अपने आप को समर्पित करना नहीं रहा। परन्तु जब उसने अनुभव से भली-भाँति प्रकट कर दिया था कि वह अपने आप को भूलकर और अपनी निज देह का कुछ विचार न करके, केवल यही चाहता था कि हमारे प्रभु यीशु मसीह का राज्य बढ़े और उसकी कलीसिया की उन्नति हो, इसलिये वह उन लोगों की कृतघ्नता को डाँट सकता था जो अपने चरवाहों के प्रति बुरा व्यवहार करते थे, और उन्हें उनके शरीर के निर्वाह से वंचित रखते थे, जबकि उन्हीं के द्वारा उन्हें अपनी आत्माओं के लिये भोजन और निर्वाह मिलता था।
अब यह बहुत ही निर्दयता का व्यवहार है कि कोई मनुष्य यह विचार न करे कि जो उसके पास उद्धार की शिक्षा लाता है, वह परमेश्वर की ओर से उसके पास भेजा हुआ मानो पालक पिता है, और कम से कम उसे शारीरिक भोजन देने का मन भी न करे। इसलिये जब लोग इस विषय में इतने बेपरवाह होते हैं, तो वे परमेश्वर के वचन के प्रति अपनी तुच्छ दृष्टि प्रकट करते हैं। क्योंकि स्वभाव से ही हमें सिखाना चाहिए कि जब हम किसी के ऋणी हों, तो हम उसे वैसा ही लौटाने के लिये अपनी पूरी शक्ति लगा दें; और यदि हम ऐसा न कर सकें, तो कम से कम यह दिखाएँ कि यह सद्भावना की कमी के कारण नहीं है। परन्तु इस बात में बराबर का बदला बराबर से नहीं चुकाया जा सकता। क्योंकि परमेश्वर के वचन के बराबर तौलने के लिये संसार में कुछ मिलता ही नहीं। तो भी जो शिक्षा पाते हैं, उन्हें कम से कम उन लोगों के निर्वाह के लिये, जिनके हाथ से वे सुसमाचार का अनमोल धन पाते हैं, अपनी सांसारिक वस्तुओं में कोई कंजूसी नहीं करनी चाहिए।
और सचमुच हम देखते हैं कि शैतान की यह चाल सदा से रही है कि वह परमेश्वर की कलीसिया को अच्छे चरवाहों और सेवकों से, उन्हें एक प्रकार से भूखा मारकर, लूट ले। शैतान के पक्षपाती सदा इतना पाएँगे कि सब उनके पेट में ठूँसा जाए; जैसा हम देखते हैं कि पोप-तन्त्र में ये निठल्ले पेटू, जो अपनी मिस्सा और प्रातःकालीन प्रार्थनाओं को भौंकने के सिवा और कुछ नहीं करते, पूरी तरह ठूँस-ठूँसकर भरे जाते हैं। चाहे सारा संसार उसके लिये भूखा-प्यासा हो, इस प्रकार के लोग कभी अभाव नहीं जानेंगे; वरन् जब सारा संसार भूखों मर रहा हो, तब भी उनके पास भोजन-सामग्री का भण्डार रहेगा। परन्तु इसके ठीक विपरीत, जब परमेश्वर की सेवा करनेवाले लोगों की आत्माओं की भलाई के लिये अपनी अनोखी धुन और चिन्ता प्रकट कर चुके होते हैं, तब लोग उन्हें अकेला छोड़ देते हैं, और समझते हैं कि वे उनके बहुत ऋणी हैं क्योंकि वे उनकी सुन लेते हैं। वे कहते हैं, ठीक है, हमने उसकी सुन ली, और अच्छी तरह सुन ली, उसने अपना कर्तव्य निभा दिया। और आजकल कितने हैं जो उपदेश सुनने आते हैं तो चन्दा देते हैं? वे चाहेंगे कि परमेश्वर की चर्चा कभी हो ही नहीं, क्योंकि उनके लिये यह उदास करनेवाली बात है।
इससे हम देखते हैं कि इसी रीति से शैतान ने सारी शिक्षा को दूर करने के लिये एक धक्का दिया है, और यह करवाना चाहा है कि मूरतों को छोड़ और कुछ न रहे, और कोई इस बात की चिन्ता न करे कि वह कैसा व्यवहार करता है। तब सन्त पौलुस का ऐसी बुराई का उपाय करने की इच्छा करना अकारण नहीं था, जब वह कहता है कि जो सिखाता है उसका कम से कम पालन-पोषण और निर्वाह होना चाहिए, और जो उद्धार की शिक्षा पाता है वह कम से कम अपनी सम्पत्ति और वस्तुओं में से उसे दे जिसने उसे आत्मिक भोजन दिया है। और सन्त पौलुस यहाँ स्पष्ट रूप से परमेश्वर के वचन की बात करता है। क्योंकि जब मानवीय विद्याओं का सदा इतना मान रहा है कि जिन्होंने उनका व्यवसाय किया, उनका निर्वाह होता रहा, तब परमेश्वर का वचन, जो अन्य सब वस्तुओं से बढ़कर है, मानो गिरा दिया गया है।
इसलिये सन्त पौलुस मनुष्यों की दुष्टता को डाँटता है, और कहता है: देखो, परमेश्वर के वचन का तुम्हारे पास पहुँचाया जाना कितनी बड़ी बात है; देखो, उसके द्वारा तुम्हें कैसा फल मिलता है। क्योंकि हम सब अभागे और शापित हैं, केवल इसके कि परमेश्वर अपने वचन के द्वारा हमें अपने पास बुलाता है; क्योंकि वही सामर्थ्य है जिसे वह हम पर फैलाता है ताकि हमें अपने राज्य में इकट्ठा करे। जब ऐसा है, तो तुम इस संसार की क्षणभंगुर वस्तुओं में कंजूसी कैसे कर सकते हो, कि जो लोग तुम्हारे कल्याण और उन्नति के लिये परिश्रम करते हैं, उनका कम से कम इतना निर्वाह भी न हो कि वे अपने आप को पूरी रीति से उसी में लगा सकें, और उन चिन्ताओं के कारण खिंचकर न रह जाएँ जो उन्हें रोकें और उनके कर्तव्य निभाने में बाधा डालें?
यहाँ सन्त पौलुस जो शब्द काम में लाता है वह है “कतेख़ेओ” (Catechize), जिसका अर्थ है सिखाना, प्रशिक्षित करना या शिक्षा देना, और उसी से हमारा शब्द “कतेकिज़्म” (Catechism) निकला है, जिसका अर्थ है शिक्षा, प्रशिक्षण या उपदेश। तब वह कहता है कि जो “कतेख़ेओ” करता है, अर्थात् जो परमेश्वर के वचन में लोगों की उन्नति करनेवाला विश्वासयोग्य शिक्षक है, उसका निर्वाह उनके द्वारा हो जो “कतेख़ेओ” किए जाते हैं, अर्थात् जो सिखाए जाते हैं, या जो परमेश्वर के पास शिष्य बनाकर लाए गए हैं। अब हम सन्त पौलुस का अर्थ समझ गए; और इस पर से हमें सबसे पहले यह निष्कर्ष निकालना है कि आजकल हमें किसी को भी परमेश्वर की कलीसिया का सेवक और चरवाहा नहीं मानना चाहिए, सिवाय उनके जो उसका वचन लाते हैं। इसे अपने ही हित के लिये एक चेतावनी जानकर याद रखो। क्योंकि पोप के अनुयायी घमण्ड करते हैं कि कलीसिया उनके पक्ष में है। परन्तु यह निश्चित है कि परमेश्वर की सन्तानों के विषय में यह सच नहीं ठहर सकता कि वे बिना मार्गदर्शक का झुण्ड हों। तब कलीसिया के चिह्न क्या हैं? यह कि एक झुण्ड इकट्ठा हो, और उसी के साथ एक चरवाहा भी हो जो भेड़ों को हमारे प्रभु यीशु मसीह की ओर ले चले।
और सचमुच पोप के अनुयायी यह भी दावा करते हैं कि उनके पास एक पदानुक्रम (Hierarchy) है, अर्थात् एक पवित्र और पावन प्रभुत्व; परन्तु इस बीच जो चिह्न सन्त पौलुस यहाँ बताता है, वह उनमें नहीं पाया जाता। क्योंकि हम देखते हैं कि सब सींगोंवाले प्रधान याजकों और पोप के सारे याजक-दल के पास केवल नाममात्र की उपाधि है। क्योंकि वह परमेश्वर का वचन कहाँ है? वे समझते हैं कि वह उनकी पदवी पर कलंक होगा; उनके लिये अपने अनुष्ठान और खिलौने करना ही बहुत है, और वे अपने मन में मान बैठते हैं कि जब उन्होंने इस प्रकार तमाशा खेल लिया तो अपना कर्तव्य बहुत अच्छी तरह निभा दिया; और इस प्रकार वे कपटी संसार को अपने दुरुपयोगों और भ्रमों से भरने के सिवा और कुछ नहीं करते।
इसलिये आओ हम परमेश्वर की सच्ची कलीसिया को उन सब आराधनालयों से पहचानना सीखें जो शैतान ने संसार में बनाए हैं और जिनसे वह आजकल हमारी आँखों को चौंधिया देता है। अर्थात् जब परमेश्वर का वचन विश्वासयोग्यता से प्रचार किया जाता है, तब हम यह निष्कर्ष निकालें कि परमेश्वर भी वहाँ इकट्ठे हुए झुण्ड को जानता और स्वीकार करता है। और यहाँ तुम देखते हो कि कलीसिया की सम्पत्ति का प्रबन्ध उन्हें किस प्रकार करना चाहिए, जैसा सन्त पौलुस दिखाता है। फिर, जब वह कहता है, “जो शिक्षा पाते हैं वे सब अच्छी वस्तुओं में सहभागी करें,” तो उसका अर्थ यह नहीं कि वे उद्धार की शिक्षा के प्रचारकों पर इतना धन उँड़ेलें कि वे उससे फटने ही लगें। क्योंकि धन की अधिकता घातक महामारी रही है, जब बहुत से लोग मूर्खतापूर्ण भक्ति के वश में आकर अपनी सम्पत्ति उन्हें दे देने को प्रेरित और विवश हुए जिन्हें वे संसार का सबसे बड़ा भाग रखने के योग्य समझते थे, और इस प्रकार उन्होंने सब कुछ भयंकर गड़बड़ी में डाल दिया।
और इसलिये हमें यह न सोचना चाहिए कि सन्त पौलुस का अर्थ परमेश्वर के वचन के सेवकों को इस रीति से धनी बनाना था कि उनके पास हर प्रकार की अति के साथ रंगरेलियाँ मनाने को हो, या ठाठ-बाट के साथ विलासी जीवन चलाने को हो: सन्त पौलुस का अर्थ भोग-विलास के लिये द्वार खोलना नहीं था: वरन् केवल लोगों को यह समझाना था कि उन्हें उनकी सब आवश्यकताओं में उनकी सहायता करनी चाहिए, ताकि उन्हें घोर दरिद्रता में न पड़ना पड़े।
और हमें स्मरण रखना चाहिए कि वह दूसरे स्थान पर कहता है कि यदि हमारे पास खाने और पहनने को हो, तो हम सन्तुष्ट रहें। और हम जानते हैं कि परमेश्वर को सब प्राणियों की चिन्ता है: और इसलिये अपने विश्वासियों की तो और भी अधिक। तो आओ हम संयम से जीवन बिताएँ, मानो हमारे पास जीने को बस एक ही दिन हो, और इस संसार की क्षणभंगुर वस्तुओं का संचय न करें। जब परमेश्वर के वचन के सेवक इस पाठ को स्मरण रखें, अर्थात् संयम और किफ़ायत से जीना, और ऐसी अविश्वास से भरी चिन्ता न करना जो उन्हें सताए और जलाए और उन्हें असीम संचय करने को उकसाए, तब वे थोड़े में सन्तुष्ट रहेंगे; और तो भी लोग उनके माँगे बिना उनके प्रति उदार और दानशील होंगे, और इस प्रकार उनके पास सदा खाने और पहनने को रहेगा।
और सच्चाई से कहूँ तो, जो कहा जा चुका है उसके अतिरिक्त हम देखते हैं कि सन्त पौलुस ने इस शिक्षा का स्वयं ही पालन नहीं किया, वरन् अपने भाइयों और साथियों को भी इसी का उपदेश दिया। क्योंकि प्रेरितों के काम के बीसवें अध्याय में वह मुख्यतः यह बताता है कि उसने अपनी जीविका का कुछ भाग कमाने के लिये अपने हाथों से परिश्रम और कष्ट उठाया था; तो भी लेने से देना कहीं उत्तम है: क्योंकि (वह कहता है) जो बात हमें अपने प्रभु यीशु मसीह की पाठशाला में सीखनी चाहिए वह यह है कि जब हमें भलाई करने और दूसरों की सहायता के लिये देने का अवसर मिले, तब हम अधिक प्रसन्न हों, बनिस्बत इसके कि स्वयं धनी बनने के लिये पाएँ। क्योंकि परमेश्वर के सेवकों को यह शोभा नहीं देता कि वे जमा करने का लालच करें। संक्षेप में, अब हम देखते हैं कि सन्त पौलुस का लक्ष्य क्या था: अर्थात् उसका अर्थ परमेश्वर के वचन के प्रचारकों को यह छूट देना नहीं था कि उनके पास नाज़ुक और स्वादिष्ट भोजन-मेज़ हो, या वे संसार की दृष्टि में ठाठदार हों: वरन् यह कि उनके पास इतना हो कि वे अपनी पदवी के अनुसार संयम से अपना निर्वाह कर सकें। और साथ ही वह संसार की निष्ठुरता को भी डाँटता है, कि जो अपने चरवाहों के ऋणी हैं वे इतने कंजूस दिखाई देते हैं कि जब उनसे उन लोगों की आवश्यकता पूरी करने की बात कही जाती है जिनके वे असीम रूप से ऋणी हैं, तो मानो उनके पेट की आँतें खींची जा रही हों।
अब, क्योंकि यह दोष सब समयों में संसार में राज्य करता रहा है, और शैतान ने (जैसा मैंने कहा) इस चाल से सेवकों को हियाव दिया है, कि और शिक्षा और उपदेश न रहे: तो आओ हम सीखें कि सन्त पौलुस ने यह नियम अकारण नहीं ठहराया कि जो परमेश्वर के वचन के प्रचार में परिश्रम करते हैं, उनके पास अपने निर्वाह और पालन-पोषण के लिये होना चाहिए। और हम आजकल संसार में उससे भी अधिक कृपणता देखते हैं जिसे पौलुस डाँटता और दोषी ठहराता है। क्योंकि जो उन पर तनिक भी खर्च नहीं करते, वे परमेश्वर के वचन के सेवकों की चर्चा होते ही बड़बड़ाने और कुड़कुड़ाने से नहीं चूकेंगे। वे कहते हैं, अरे, इन लोगों को निठल्लेपन में पाला जाए: मानो परमेश्वर और सारी कलीसिया की सेवा करना निठल्लापन हो।
फिर वे कहते हैं कि प्रेरितों ने न तो ऐसा किया न वैसा। हाँ, परन्तु प्रकट है कि प्रेरितों को दूर-दूर से बुलाया जाता था: और हर एक मनुष्य इसके लिये अपने आप को खींचता था, न केवल अपनी सम्पत्ति से, वरन् अपने शरीर से भी। यदि किसी प्रेरित के साथ जाना होता, तो प्रकट है कि धनी और सम्पन्न मनुष्य उनके साथ समुद्र पार करते थे। और आजकल परमेश्वर के सेवकों पर बड़बड़ाने और कुड़कुड़ाने के सिवा कुछ न होगा, चाहे उनका सत्कार कंजूसी से ही क्यों न किया जाए। परन्तु इससे उन कुड़कुड़ानेवालों की दुष्टता प्रकट होती है, और वे अन्यजातीय लोग ठहरते हैं, जिन्हें यह भाता है कि बिना उद्धार की किसी शिक्षा के असभ्यता और पशुओं जैसे आचरण में रहें, और सब कुछ पैरों तले रौंदा जाए, ताकि हर एक मनुष्य अपनी ही अभिलाषाओं के अनुसार जीए।
इसलिये जो बात सन्त पौलुस हमें यहाँ बताता है उसे हम स्मरण रखें, ताकि जो परमेश्वर के वचन के प्रचार की पदवी और सेवा के लिये बुलाए गए हैं वे जानें कि उनका निर्वाह और पालन-पोषण इसलिये होता है कि वे परिश्रम करें और अपनी सेवा से सब लोगों को लाभ पहुँचाएँ, और इस कारण अपना कर्तव्य सावधानी और चौकसी से करने को और प्रेरित हों, और अन्त में और भी अधिक परिश्रमी होने को जगाए जाएँ। और जब उन्हें उचित निर्वाह और सत्कार मिले तो लोग उनसे डाह न करें, न उन पर कुड़कुड़ाएँ, क्योंकि परमेश्वर ने यही ठहराया है: और हम स्वयं भी देखते हैं कि ऐसा क्यों होना चाहिए।
अब इस पर सन्त पौलुस आगे कहता है, “धोखा न खाओ, क्योंकि परमेश्वर ठट्ठों में नहीं उड़ाया जाता, और मनुष्य जो कुछ बोता है, वही काटेगा।” सन्त पौलुस, यह चाहकर कि लोग धोखा न खाएँ, भली-भाँति दिखाता है कि मनुष्यों के पास सब समयों में बहानों की कमी नहीं रही, और जब उन्होंने बुरा करने या कहने का इरादा किया तो सदा कोई न कोई आड़ बनाई है। परन्तु यहाँ वह उन्हें परमेश्वर के न्याय के सामने बुलाता है, मानो उनसे कह रहा हो कि तुम मनुष्यों को तो भली-भाँति सन्तुष्ट कर सकते हो और उनका मुँह बन्द कर सकते हो: परन्तु फिर भी तुम्हें स्वर्गीय न्यायी के सामने लेखा देने आना ही पड़ेगा।
और इसलिये (वह कहता है) तुम्हारे सब बहाने तुम्हारे किसी काम न आएँगे। यह सच है कि ये बहाने मनुष्यों में सहज ही मान लिए जाएँगे, और (जैसा मैं पहले छू चुका हूँ) बहुत से लोग अपने सेवकों को लाठी की दूरी पर रखेंगे, और उनके साथ झगड़ने के सिवा कुछ न होगा। क्योंकि उनके कान ऐसे खुजलाते हैं कि सौ में से मुश्किल से एक मिलेगा जो ऐसी बातें सुनकर प्रसन्न न हो, और उसमें कुछ ठट्ठा भी न मिलाए, या चटनी को और तीखा न कर दे। यह बहुत ही सामान्य बात है। तो भी सन्त पौलुस की शिक्षा उन सब बहानों तक फैलती है जो हम तब बनाते हैं जब अपनी बुराई को उचित ठहराना चाहते हैं, या लोगों को मनवाना चाहते हैं कि कौआ सफ़ेद है।
इसलिये सबसे पहले हम उस आधार पर दृष्टि करें जिसकी चर्चा सन्त पौलुस यहाँ करता है। यहाँ मामला परमेश्वर के वचन के सेवकों के निर्वाह का है। वह चाहता है कि लोग अपने आप को न छलें। और क्यों? क्योंकि यह कहना मूर्खता की बात है कि परमेश्वर के वचन के सेवक अपनी जीविका के लिये परिश्रम क्यों न करें, जबकि उन्हें औरों के लिये उदाहरण होना चाहिए? जब वे मंच से उतरें तो क्या शेष समय किसी काम-धन्धे में नहीं बिता सकते, कि कलीसिया पर बोझ न बनें? ऐसा कहकर बकवास करनेवाले लोग इसे सहज ही मान लेंगे, और अपना पक्ष अच्छा और अपने आप को सार्वजनिक भलाई और कलीसिया की व्यवस्था के लिये बहुत उत्साही समझेंगे। परन्तु ऐसे मनुष्य अपने आप को धोखा देते हैं। क्योंकि उनमें द्वेष के सिवा कुछ नहीं है, और शैतान उन्हें इस ओर धकेलता है, ताकि संसार को उद्धार की शिक्षा से घृणा हो, या कम से कम वह उसे हल्का जाने और उसका उपहास करे। यही असली स्रोत है; हमें वहाँ जाना है और वहीं टिकना है।
इसलिये सन्त पौलुस का गलातियों को चेतावनी देना अकारण नहीं कि वे इन सुन्दर बहानों का प्रयोग करके अपने आप को न छलें। और दूसरी बात यह कि हमें सन्त पौलुस की इस चेतावनी को उन सब आवरणों पर भी सामान्य रूप से लागू करना चाहिए जो हम बातों को छिपाने के प्रयत्न में डालते हैं, क्योंकि यदि लोग हमारा विश्वास करें तो हमारे पास अपने आप को निर्दोष ठहराने के लिये सदा कुछ न कुछ रहेगा: और कोई ऐसा नीच जत्था नहीं जिसके पास मनुष्यों के सामने अपनी लज्जा छिपाने का कोई न कोई उपाय न हो। चाहे हम सौ बार दोषी ठहराए जाएँ, तब भी शैतान हमारे मन में कोई न कोई युक्ति डालता रहेगा, कि गन्दे मामले पर अच्छा मुखौटा चढ़ाएँ। और क्योंकि हम स्वभाव से इस ओर झुके हैं और आदत से इसमें कठोर हो गए हैं, इसलिये हमारे लिये और भी आवश्यक है कि जो बात सन्त पौलुस यहाँ हमसे कहता है उसे ध्यान दें: अर्थात् चौकस रहें कि कोई अपने आप को न छले, और हम जान-बूझकर भटक न जाएँ।
क्योंकि यह निश्चित है कि कपट मनुष्यों को तब तक कभी नहीं धोखा देगा जब तक वे स्वेच्छा से और जानते-बूझते अपने आप को न छलें। कपटी लोग कभी-कभी धोखे में तो पड़ेंगे, तो भी उसी के साथ दोषी भी ठहराए जाएँगे, और उनके मन में ऐसी चुभन होगी कि वे सबसे पहले अपने आप को दोषी ठहराएँगे, चाहे और सब लोग उन्हें निर्दोष ठहराएँ। परन्तु कुछ ऐसे हैं जो सो जाते हैं, और अपने मन में समझते हैं कि उनमें कुछ भी बुरा नहीं है। फिर भी उनके भीतर कुछ न कुछ चुभन होना बन्द नहीं होता: और चाहे वे अन्धे हों, तो भी परमेश्वर उन्हें निरुत्तर कर देता है, क्योंकि वह उन्हें जगाता है, और वे बहाने ढूँढ़ते ही रहते हैं जिनमें अपने आप को उलझाते रहें, ताकि वे स्वयं उस बुराई को न देखें जिससे वे पश्चाताप कर सकें।
तो तुम देखते हो कि सबसे बुरा कपट वह है जब लोग मूर्खतापूर्ण चापलूसी से, यह और वह दलील देकर और बात को टालने का यत्न करके, अपने आप को धोखा देते हैं, और यह न केवल मनुष्यों के सामने, वरन् परमेश्वर के सामने भी करते हैं। अब सन्त पौलुस यहाँ कहता है कि परमेश्वर ठट्ठों में नहीं उड़ाया जाता। मानो वह कह रहा हो कि जो इस रीति से अपनी मूर्खतापूर्ण दलीलों से अपने आप को छलते हैं वे ठट्ठा करनेवाले हैं, वरन् परमेश्वर का सचमुच ठट्ठा करनेवाले हैं। क्योंकि यदि हम परमेश्वर के प्रति ऐसा आदर रखें जैसा रखना चाहिए, तो यह निश्चित है कि जब हम उसकी महिमा के सामने बुलाए जाएँगे, तो हम अपने विचारों और भावनाओं की गहरी से गहरी तह तक अपने आप को टटोलेंगे, ताकि कोई ऐसी बात न रहे जो भली-भाँति परखी न गई हो।
इसलिये वे सब जो परमेश्वर के सम्मुख आने को ऐसी हल्की बात बनाते हैं, मानो वह कोई नन्हा-सा बच्चा हो जिसके साथ वे अपनी इच्छा से खेल सकें, वे इसी से दिखाते हैं कि वे अभक्ति से भरे हैं। अब देखो, यह पद हमारे लिये कितना लाभदायक है, जहाँ सन्त पौलुस लोगों को चेतावनी देकर कि वे अपने आप को न छलें, आगे यह कहता है कि परमेश्वर ठट्ठों में नहीं उड़ाया जाता। यह प्रसंग से हटकर लगता है। क्योंकि क्या हुआ यदि हम छली हैं? क्या इससे यह निकलता है कि हम परमेश्वर का ठट्ठा करनेवाले हैं? हाँ, सन्त पौलुस कहता है। और इसका प्रमाण यह है कि तुम अपने लिये व्यर्थ बहाने ढूँढ़ते हो। परन्तु यदि तुम कर्म को ठीक रीति से देखते, और अपनी ही दुष्टता में लिपटे न होते, तो निश्चय ही तुम्हारा विवेक जैसा अब है उससे अधिक ठीक होता।
तो फिर तुम्हें अपने ऐसे मूर्खतापूर्ण बहानों में सो जाने का कारण क्या है? यह कि तुम नहीं सोचते कि हम सबको परमेश्वर के न्याय-आसन के सामने प्रकट होना है, और वही मनुष्यों के विचारों को जाँचता है, और उससे कुछ छिपा नहीं। परन्तु तुम उसे केवल एक मूरत समझते हो; तुम उसे यह जताना चाहते हो कि उसे तुम्हारे मूर्खतापूर्ण खिलौनों से सन्तुष्ट रहना चाहिए: और जब तुमने मनुष्यों को धोखा दे लिया और उनका उपहास कर लिया, तब तुम समझते हो कि परमेश्वर भी उसी साँचे का है, और उसके प्रति और भी बड़ा साहस करते हो। इसलिये यह निश्चित है कि वे सब जो अपनी चापलूसी करते और भागने के बिल ढूँढ़ते हैं, अविश्वासी हैं, और कर्म स्वयं ही उन्हें परमेश्वर का खुला ठट्ठा करनेवाले दिखाता है।
अब यद्यपि यह वचन छोटा है, तो भी इसे हमें कँपा देना चाहिए, क्योंकि हम ऊपर से इतनी बड़ी गर्जना सुनते हैं, या ऐसी बिजली अपने ऊपर गिरती देखते हैं। और मैं तुमसे पूछता हूँ, क्या यह ऐसा दोष है जिसे क्षमा किया जाए, कि निरे सड़ाँध के पुतले मनुष्य परमेश्वर के विरुद्ध इस प्रकार डींग मारें, वरन् उसका ठट्ठा भी उड़ाएँ? निश्चय हम जानते हैं कि किसी मनुष्य के साथ इस रीति से उसका उपहास करना सबसे बड़ा अपमान और द्वेष है। यदि यह हम तुच्छों में भी असहनीय है, तो क्या परमेश्वर अपना ठट्ठा होने देगा? इसलिये सन्त पौलुस ने यहाँ हमें भली-भाँति अवसर दिया है कि हम अपने आप को ध्यान से देखें, और सीधे चलें, और अपनी हँसी-ठट्ठे की चालें न चलाएँ, मानो इनसे हम अपना बाज़ार बना लेंगे; क्योंकि इससे परमेश्वर उत्तेजित होता है, मानो हम उसे चुनौती दे रहे हों, या मानो हम उसे उसके अधिकार से वंचित करना चाहते हों, और उसे यह विश्वास दिलाना चाहते हों कि कोई उसकी नाक पकड़कर खींच सकता है और उसके साथ हर प्रकार की नीचता कर सकता है और उसे पता भी न चले। यदि यह वचन भली-भाँति ध्यान में रखा जाता, तो हम जैसा अब चलते हैं उससे कहीं भिन्न भय के साथ चलते: परन्तु हम देखते हैं कि लोग कैसे अन्यजातीय बन जाते हैं, वरन् जान-बूझकर, और ऐसे कठोर मन के हो जाते हैं कि जब भले या बुरे का प्रश्न उठता है तब वे न लज्जा की परवाह करते हैं न भलमनसाहत की, परन्तु तुम उन्हें खुले मुँह से सारी शिक्षा को बिगाड़ते और उलटते, और परमेश्वर के विरुद्ध निन्दाएँ उगलते देखोगे।
तो तुम आजकल देखोगे कि सब मेज़ें, सब घर और सब गलियाँ परमेश्वर का ठट्ठा करनेवालों से भरी हैं। और यह कहाँ से आता है? यह सच है कि बहुत से कपटी और आत्म-सान्त्वना देनेवाले हैं: तो भी शैतान ने कुछ को ऐसा अपने वश में कर लिया है कि वे खुल्लमखुल्ला थूकते हैं, अर्थात् अन्तःकरण की किसी चुभन के बिना परमेश्वर को ललकारते हैं, और इससे प्रकट होता है कि वे निकम्मे मन और पागलपन की आत्मा के हवाले कर दिए गए हैं। और अपने आप को इस प्रकार परमेश्वर के विरुद्ध ऊँचा उठाने की ऐसी ढिठाई कहाँ से आती है? जैसा मैंने तुम्हें पहले बताया, यह उसी कपट से आती है, जब हम समझते हैं कि अपनी चतुर चालों और सुन्दर उत्तरों से बातों पर ऐसा पर्दा डाल दें कि सफ़ेद और काले में कोई अन्तर ही न रहे।
इसलिये हमारे लिये इतना आवश्यक है कि सन्त पौलुस की इस चेतावनी को भली-भाँति स्मरण रखें। अब इस पर वह उस विषय को आगे बढ़ाता है जिसे उसने छुआ था, यहाँ तक कि उसे और भी आगे फैलाता है, यह कहकर कि जैसा हम बोएँगे वैसा ही काटेंगे: जो आत्मा के लिये बोता है वह आत्मा से अनन्त जीवन काटेगा, और जो शरीर के लिये बोता है वह विनाश काटेगा।
संक्षेप में, यहाँ सन्त पौलुस हमारे सब यत्न, चिन्ता और परिश्रम की तुलना उस बीज से करता है जिसे किसान बोते हैं। क्योंकि मनुष्य इस या उस काम में क्यों लगे रहते हैं, या क्यों परिश्रम और कष्ट उठाते हैं, सिवाय किसी ऐसे उद्देश्य के जो उन्होंने अपने मन में ठाना है? मैं कहता हूँ, इसलिये कि वे अपने लाभ का फल पाने की आशा रखते हैं: यही कारण है कि वे अपने परिश्रम से थकते नहीं। उदाहरण के लिये, जो बहुत कमाना चाहता है, वह भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी सहेगा, और कोई बात उसे डराएगी नहीं। और क्यों? क्योंकि उसका लोभ उसे आगे बढ़ाता रहता है, यहाँ तक कि वह और सब बातें भूल जाता है, और अपने आप को ऐसा सताता है मानो वह अपने शत्रु के हाथों में हो: वरन् उसके शत्रु भी उसे इतना न सताते।
इसलिये जब कोई मनुष्य धन बटोरने के लिये बड़ा परिश्रम करता है, तो यह किसान के बोने के समान है: और वह आशा रखता है कि कटनी आएगी, और अन्त में वह उसे फिर समेट लेगा। जो संसार की दृष्टि में अपने आप को बढ़ाना चाहता है, वह अपनी नींद भी पूरी नहीं लेता: और वह अपने जागने से क्या चाहता है? किसी मान या प्रतिष्ठा तक पहुँचना, और साख जमाना। तो फिर, महत्त्वाकांक्षा उन लोगों की कटनी है जो सांसारिक सम्मान के लोभी हैं। उनकी इच्छा बटोरने की है। और क्या? वही जो उनके अपने स्वभाव को भाता और जिसकी वह लालसा करता है। सब और बातों में भी ऐसा ही है। जैसे एक उड़ाऊ अपनी भूख मिटाने के लिये परिश्रम करेगा, और कोई नीच काम, जैसे दलाली करना, या कोई ऐसी ही बात करने से भी नहीं हिचकेगा। और किसलिये? इसलिये कि वह पेट भरकर खाए और स्वादिष्ट भोजन करे, या फिर पियक्कड़ बने। और कुछ लोग डकैती और हत्या करने लग जाते हैं, कि अन्त में पक्के चोर बन जाते हैं। देखो मनुष्यों की अभिलाषाएँ उन्हें कहाँ पहुँचाती हैं। क्योंकि वे अपने मन में कटनी करने का ठान लेते हैं: अर्थात् जिस वस्तु की उन्हें लालसा है उसे पाने का, चाहे वह उनके विनाश और उलझन ही के लिये क्यों न हो। परन्तु संसार जैसा भी चले, यदि तुम विचार करो कि मनुष्य क्यों किसी न किसी वस्तु में लगे रहते हैं, तो तुम पाओगे कि वे सदा कटनी की आशा रखते हैं। इसलिये जो काम वे करते हैं, वे उस परिश्रम के बीज हैं जिसके फल की वे आशा रखते हैं। यहाँ सन्त पौलुस कहता है कि जैसा हम बोएँगे वैसा ही काटेंगे। और फिर वह अपनी बात खोलकर कहता है कि एक प्रकार के लोग आत्मा के लिये बोते हैं, और दूसरे प्रकार के शरीर के लिये।
अब आत्मा के लिये बोना यह है कि मनुष्य अपने आप को संसार से और इस क्षणभंगुर जीवन से अलग करे, और जाने कि हम यहाँ नीचे ठहरने के लिये नहीं रचे गए, वरन् आगे बढ़ते जाने के लिये, जब तक हम अपने निज भाग तक न पहुँचें: और कि हमारा जीवन यहाँ थोड़े ही समय के लिये है, और चल देना है (जैसा उस भजन में कहा गया है जो गाया जा चुका और फिर गाया जाएगा),* ताकि यहाँ हमारा होना सदा यहीं रहने के लिये न हो, न इस प्रकार कि हमारा कोई सदा का निवास-स्थान हो: परन्तु परमेश्वर हमें मानो एक छोटी-सी सैर देता है, और हमसे एक-दो चक्कर लगवाता है, और तुरन्त बाद हमसे कहता है, “हे लोगो, आओ और मिट्टी में लौट जाओ,” जैसा मूसा भी अपने गीत में कहता है।
जब ऐसा है, तो यदि हम अपनी सब अभिलाषाओं को त्यागने का भली-भाँति विचार करें, तब हम आत्मा के लिये बोएँगे, अर्थात् हम देखेंगे कि हमें अपना सारा यत्न उस स्वर्गीय जीवन के लिये लगाना चाहिए जिसके लिये हम बुलाए गए हैं। तो तुम देखते हो कि एक प्रकार के लोग, जिनकी संख्या बहुत ही थोड़ी और अल्प है, आत्मा के लिये बोते हैं, क्योंकि वे सांसारिक चिन्ताओं में कूदकर उनसे बँधते नहीं, परन्तु यह सोचते हैं कि परमेश्वर उन्हें और ऊँचे बुलाता है, और इसलिये वहाँ पहुँचने के लिये अपने आप को तैयार करते और यत्न करते हैं। दूसरे प्रकार के लोग शरीर के लिये बोते हैं: अर्थात् वे पशुओं जैसी लालसा से ऐसे भरे हैं कि उनकी दृष्टि में इस जीवन के बराबर कुछ है ही नहीं। और सचमुच यदि तुम देखो कि मनुष्य किस निशाने पर तीर चलाते हैं, तो पाओगे कि संसार उनमें से प्रायः सब को रोके रखता है। तुम हज़ार में से मुश्किल से एक ऐसा पाओगे जो इससे आगे जाकर यह सोचे कि यह संसार तो छाया है जो मिट जाती है, और अपने आप को गम्भीरता और ठीक रीति से स्वर्गीय जीवन की ओर झुकाए।
इसलिये प्रायः सब मनुष्य शरीर के लिये बोते हैं। यह सच है कि उनकी दृष्टियाँ भिन्न हैं। क्योंकि एक व्यभिचारी है, दूसरा पियक्कड़, तीसरा कंजूस मक्खीचूस, और दूसरा उड़ाऊ। तब यदि तुम मनुष्यों के स्वभाव देखो, तो वे भिन्न-भिन्न और मानो परस्पर विरोधी हैं, यहाँ तक कि एक दूसरे से घृणा करता है। और क्यों? क्योंकि (वह कहता है) वह मेरे स्वभाव का नहीं है, उसकी और मेरी नहीं बनती। परन्तु संसार जैसा भी चले, यदि कोई उन्हें छाने, तो पाएगा कि वे सब शरीर के लिये बोते हैं। इसलिये बोने के बहुत प्रकार हैं: तो भी वे सब यहीं नीचे अटके हुए हैं, यहाँ तक कि वे यह नहीं सोच सकते कि परमेश्वर उन्हें किस ओर बुलाता है और उन्हें किस ओर अपने आप को लगाना चाहिए। क्योंकि कोई धनी होना चाहता है, कोई मान और साख चाहता है, कोई चैन से रहना और सुख भोगना चाहता है, कोई यह चाहता है और कोई वह: परन्तु इस बीच वे सब इसी क्षणभंगुर जीवन पर आँख गड़ाए रहते हैं, और अपने आप को ऊपर नहीं उठा सकते। अब सन्त पौलुस कहता है कि यह उचित ही है कि हम अपने बोने के अनुसार काटें। इसलिये जो इस प्रकार अपने आप को संसार को सौंप देते और शरीर के लिये बोते हैं, वे (वह कहता है) विनाश काटेंगे: अर्थात् अन्त में वे जान लेंगे कि जिन वस्तुओं को उन्होंने इतना बहुमूल्य समझा था, वे धुआँ ही थीं। यह सच है कि “विनाश” (Corruption) शब्द का अर्थ अनन्त मृत्यु भी लिया जा सकता है: परन्तु सन्त पौलुस का अर्थ यह नहीं है। क्योंकि वह यह कहना चाहता है कि जब मनुष्य अपनी जड़ और स्थूल चिन्ताओं में जान-बूझकर उलझते हैं, तब वे बुद्धि और विवेक से रहित हैं।
क्योंकि यदि कोई उनसे पूछे: “अच्छा, संसार क्या है?” तो वे कहेंगे कि वह छाया है जो खिसक जाती है। और हमारा जीवन क्या है? कुछ भी नहीं। और इस संसार की सम्पत्ति क्या है? वह एक स्वप्न है। वे सब इतना तो कहेंगे ही, और तो भी वे ऐसे मोहित हैं कि कोई नहीं जानता कि उन्हें इससे कैसे छुड़ाए, और शैतान उन्हें मानो मोहित किए रहता है, यहाँ तक कि परमेश्वर उनके कानों में पुकारता है, “हे अभागे मनुष्यो, तुम कहाँ हो,” और तो भी वे अपने आप को और गहरे दलदल में धँसाते ही जाते हैं। और यद्यपि वे भली-भाँति जानते हैं कि उनकी सब अभिलाषाएँ कुछ भी नहीं, और यह जीवन उनके हाथ से तेज़ी से निकल रहा है: तो भी वे इससे बँधे ही रहेंगे। इसलिये यद्यपि परमेश्वर इन अविवेकी लोगों को ठीक मार्ग पर लाने के लिये पुकारता है, तो भी वे ऐसे जड़ हैं कि न सम्मति मानते हैं न उन चेतावनियों को जो वे सुनते हैं। तो तुम देखते हो कि सन्त पौलुस क्यों कहता है कि जिन्होंने इस रीति से बोया है, वे शरीर से विनाश काटेंगे।
परन्तु वे (वह कहता है) जो आत्मा के लिये बोते हैं, (अर्थात् जो जानते हैं कि इस जीवन से जिसमें हम हैं, कहीं अधिक बहुमूल्य एक जीवन है, और अपना पूरा मन और चाह उसी पर लगाते हैं) आत्मा से अनन्त जीवन काटेंगे। अर्थात् क्योंकि वे परमेश्वर के आत्मा से चलाए गए हैं, और उसके पास आने और उससे जुड़ने के लिये परिश्रम किया है: इसलिये उनका प्रतिफल भी उनके लिये तैयार है।
अब यहाँ सबसे पहले हमें चेतावनी दी जाती है कि हम अपने सब विचारों, कामों, प्रयासों, इच्छाओं और यत्नों पर और अच्छी तरह सोचें, और भली-भाँति विचार करें कि वे किस उद्देश्य की ओर जाते हैं। क्योंकि यह उपमा सदा सच पाई जाएगी कि जब हम अपना परिश्रम या कष्ट किसी बात में लगाते हैं तभी हम बोते हैं। इसलिये आओ हम अपने आप को भली-भाँति देखें, और विचार करें कि यद्यपि परमेश्वर चाहता है कि हम इस संसार में अपने शरीरों के पालन-पोषण के लिये अन्न और दाखमधु बटोरें, तो भी वह हमें और ऊँचे बुलाता है, और नहीं चाहता कि हम यहीं अटके रहें। इसलिये आओ हम सीखें कि पहले यह खोजें कि परमेश्वर राज्य करे और अधिकार रखे, ताकि हम अपने आप को पूरी रीति से उसे और उसकी धार्मिकता को सौंप दें, और इस क्षणभंगुर जीवन की चिन्ता हमें जड़ न बना दे, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ: वरन् वह उस मूल वस्तु की ओर जाने के लिये मानो एक आय हो जहाँ हमें पहुँचना है, अर्थात् परमेश्वर के राज्य की ओर।
संक्षेप में, आओ हम विचार करें कि परमेश्वर ने हमें इस संसार में बोने के लिये रखा है, अर्थात् इसलिये कि हम निठल्ले और बेकाम न रहें। और कैसे? सचमुच परमेश्वर के वचन के सेवकों को बोना चाहिए, ताकि ऐसी कटनी इकट्ठी करें जिसे वे परमेश्वर को पवित्र भेंट के रूप में चढ़ा सकें। और उनका बोना विश्वासयोग्यता से शिक्षा देना है, ताकि परमेश्वर का वचन फल लाए, और उसका नाम महिमा पाए और धन्य कहलाए, जैसा हमारे प्रभु यीशु मसीह ने अपने प्रेरितों से कहा,* “मैंने तुम्हें इसलिये चुना कि तुम जाओ और बहुत फल लाओ, और ऐसा फल जो सदा बना रहे।” सो सेवकों में यह बात विशेष रूप से है: तो भी हम सबको सामान्य रूप से अनन्त जीवन के लिये बोना चाहिए, अर्थात् हमें इस संसार में से परदेशियों के समान होकर गुज़रना है, और अपने मन को उस निज भाग की ओर उठाए रखना है जहाँ हमें विश्राम करना है, और जिसके लिये हमें अपना सारा यत्न लगाना भी उचित है।
और जब हम अपने शरीरों के निर्वाह के लिये परिश्रम भी करें, तब भी वह सदा उसी निशाने की ओर लक्ष्य रखते हुए हो, जैसा कहा गया है कि हमें खाने के लिये जीना नहीं है, वरन् इसलिये खाना-पीना है कि हम दूसरे जीवन में पहुँचाए जाएँ: और कि इस संसार में हमारा जीना यहीं बस जाने के लिये नहीं, वरन् किसी ऊँची वस्तु को, अर्थात् स्वर्गीय जीवन को, प्राप्त करने के लिये है। जब ऐसा है, तो जब कोई मनुष्य अपनी जीविका पाने में लगे, चाहे खेती से, चाहे किसी हस्तकला से, चाहे व्यापार से, या जैसे भी हो, हम अपने लिये या अपने घराने के लिये जो भी चिन्ता करें उन सब में सदा ऊँचा निशाना रखें। क्योंकि निश्चय यह बुरी बात है यदि कोई केवल अपनी जीविका पाने में लगा रहे, और परमेश्वर की सेवा का कुछ विचार न रखे। क्योंकि जीविका पाने में उसे अपने मन में यह विचार करना चाहिए: “परमेश्वर मेरे काम को कैसे मानेगा? वह मेरी सेवा को कैसे ग्रहण करेगा?” सचमुच वह ग्रहण करेगा यदि मैं अपनी अभिलाषाओं के अनुसार न चलूँ, यदि मैं यह देखूँ कि किसी पर अन्याय न करूँ, और जो मेरा कर्तव्य है उसमें विश्वासयोग्यता से लगा रहूँ। मैं कहता हूँ, हमारे लिये बोने का मार्ग यही है: अर्थात् हम संसार से बँधे न रहें, और यहाँ नीचे जकड़े न रहें, वरन् सदा ऊपर स्वर्ग के जीवन की ओर चढ़ते रहें।
तो अब हम इस प्रकार बोने के साधनों को भली-भाँति देखें: अर्थात् आत्मा के लिये बोने के, सन्त पौलुस कहता है। इसलिये हम यह विचार करें कि हम गधों और बैलों के समान नहीं जो परिश्रम और मेहनत करते हैं, और फिर खाते-पीते हैं, और जैसा नियम और उचित न्याय माँगता है वैसे पाले जाते हैं: परन्तु परमेश्वर ने हमें गोद लिया है कि हम स्वर्ग के जीवन में आएँ। इसलिये आओ हम आत्मा के लिये बोएँ; और जो कुछ हमारे ऊपर चढ़ने में बाधा डाले उसे काट डालें, और हानिकारक वस्तुओं के समान उसे झटक दें, और निश्चय जानें कि वे सब जो इस संसार में प्रतिष्ठा पाने के लिये परिश्रम करते हैं, अन्त में अपने आप को निराश पाएँगे। क्यों? क्योंकि वे साफ़ देखेंगे कि यह तो विनाश ही है। जब वह जिसने बहुत सम्पत्ति इकट्ठी की है मृत्यु के निकट आता है, तो उसे उतना ही अधिक दुःख होता है, क्योंकि उसने इस संसार को अपना स्वर्ग बना लिया था।
इसलिये वह तब परमेश्वर पर दाँत पीसता है, और अपने आप को उससे कहीं अधिक झुँझलाता और सताता है जितना यदि उसने बटोरने में इतना परिश्रम न किया होता। तो तुम देखते हो कि जिन्होंने शरीर में बोया है वे [अन्त में] जान लेते हैं कि उन्होंने विनाश के लिये बोया, क्योंकि वे विनाश के सिवा और कुछ नहीं बटोरते: परन्तु यह सब बहुत देर से होता है, और इसलिये आओ हम अभी सोच लें। और यद्यपि हम मनुष्यों को अपने आप को छलते और अपना हिसाब यह बनाते देखें कि वह जीवन सुखी है जिसमें जो कुछ वे चाहें सब हो, जैसा सामान्यतः हर एक मनुष्य अपनी ही पसन्द से चलता है: यद्यपि हम मनुष्यों को इस प्रकार झुँझलाते देखें: तो भी आओ हम सीखें कि कुछ और ही करें, और विचार करें कि परमेश्वर हमें अनन्त जीवन के लिये बुलाता है, जिसे वह अपने सुसमाचार के द्वारा निरन्तर हमारे सामने रखता है। आओ हम अपना सारा मन उसी पर लगाएँ, और हमारे सब इरादे और इच्छाएँ उसी ओर जाएँ, और हम उद्धार की शिक्षा में और अधिक बढ़ने का यत्न करें, ताकि वह हमें ऊपर उठाए और यहाँ नीचे से खींच ले, जैसा सन्त पौलुस भी कहता है जब वह हमें बताता है कि मसीहियों के हथियार क्या हैं, और सुसमाचार की शिक्षा को हमारे जूते बनाता है। क्योंकि हमारे लिये सिर से पाँव तक हथियारबन्द होना आवश्यक है, नहीं तो हम इस संसार में हम पर होनेवाले आक्रमणों से शीघ्र घायल हो जाएँगे। यह बताकर (मैं कहता हूँ) वह कहता है कि सुसमाचार को हमें ऊपर उठाना और उन विनाशकारी बातों से खींच निकालना है जिनमें हम डूबे हैं, ताकि हम परमेश्वर के उस राज्य तक पहुँचें जिसके लिये वह हमें बुलाता है। तो तुम देखते हो कि हमें क्या स्मरण रखना है।
अब जहाँ तक सन्त पौलुस का यह कहना है कि जिन्होंने आत्मा में बोया है वे अनन्त जीवन काटेंगे: उसका अर्थ यह नहीं कि ऐसा करके हम स्वर्ग के राज्य जैसी योग्य और उत्तम वस्तु के योग्य ठहरते हैं: वरन् वह दिखाता है कि विश्वासी अपने बुलाए जाने को जानकर कभी अपने आप को धोखे में न पाएँगे, चाहे संसार की दृष्टि में वे अभागे दिखाई दें। हम जानते हैं कि परमेश्वर अपनी ही मुफ़्त भलाई से हमें गोद लेता है: यही हमारे उद्धार की नींव है। वह हमारे पाप क्षमा करता है: और यही हमारी धार्मिकता है। क्योंकि यदि वह हमें हमारे अपने स्वभाव में देखे, तो उसे हमें घिनौने और शापित जानकर निकाल फेंकने के सिवा कुछ न सूझे: इसलिये हम उसके हाथ से कोई अनुग्रह नहीं पा सकते जब तक वह हमें अपनी ही मुफ़्त भलाई से ग्रहण न करे। और हम यह भी जानते हैं कि हमारे काम सदा अपूर्ण हैं और किसी न किसी दोष से कलंकित हैं, यहाँ तक कि परमेश्वर उन्हें ग्रहण नहीं कर सकता। हम निश्चित हैं कि जब हम उसकी सेवा और भलाई करने जाते हैं, तो अकसर हम बिलकुल उलटे चल पड़ते हैं, ताकि हम सदा उसकी दया पर निर्भर रहें। परन्तु संसार जैसा भी चले, जब परमेश्वर एक बार हमें अपने बच्चे होने को गोद ले चुका, हमारे सब पाप गाड़ चुका, और दिखा चुका कि वह हमारी सेवा से, चाहे अपूर्ण ही हो, प्रसन्न है: तब वह आगे घोषणा करता है और अधिक में जोड़ता है कि अपने जीवन को उसे समर्पित करने में और स्वर्गीय जीवन के लिये परिश्रम करने में हम धोखा न खाएँगे। यह सच है कि मनुष्य हमारा उपहास करेंगे। वे कहेंगे, “देखो इन मूर्खों को: देखो कैसे अपने आप को सताते हैं? और किसलिये? स्वर्ग के राज्य के लिये। और इसका समाचार इन्हें किसने दिया? मैं नहीं जानता यह कैसा धर्म है जो इन लोगों को छलता है, और इस बीच ये कंगाल बहिष्कृत हैं, जिनमें न साहस है न और कुछ।” इसके अनुसार हम आजकल देखते हैं कि जो अपनी प्रतिष्ठा पर अड़े हैं वे हमें गालियाँ देते हैं, कहते हैं: इन अभागे भोले लोगों का क्या करना चाहते हैं? देखो हमारा कैसा उपहास होता है, क्योंकि हम अपने आप को बढ़ाना नहीं चाहते और संसार में प्रतिष्ठा के इच्छुक नहीं। तो यद्यपि हमारा ऐसा उपहास होता है, आओ हम उस प्रतिज्ञा पर कान लगाएँ जो यहाँ हमसे की गई है: अर्थात् यदि हम अपने बुलावे के पीछे सीधाई से चलें, तो हम जान लेंगे कि परमेश्वर जिसने आरम्भ किया है विश्वासयोग्य है, और हमें अपनी ओर खींचने का उसका अभिप्राय हमारा परम कल्याण है, और वह न केवल सब बातों में हमारा लाभ चाहता है: वरन् अपनी असीम भलाई से हमारे प्रति पिता और उद्धारकर्ता के रूप में अपने आप को प्रकट भी करेगा।
इसलिये आओ हम पूरी शक्ति लगाकर उसके पास आएँ, अपने आप को पूरी रीति से उसे समर्पित करें, और उन सब सांसारिक वस्तुओं को छोड़ दें जो उसके पास आने में बाधा हो सकती हैं; मैं कहता हूँ, उन सब को बिलकुल और पूरी रीति से छोड़ दें, और निरन्तर उन्हीं बातों को खोजें जो हमें ऊपर की ओर ले चलें, और अन्त तक उनमें बने रहें। और यदि हम ऐसा करें: तो निश्चय हमारा प्रभु यीशु मसीह दिखाएगा कि हमारे लिये एक कटनी तैयार है, इन सांसारिक धनों की नहीं जो विनाश के अधीन हैं (क्योंकि इस संसार के सबसे बहुमूल्य और धनी वस्त्र और सजावटें कीड़ों और घुनों से खाई जाएँगी: और न सोना न चाँदी न और कुछ, पर अन्त में नाश हो जाता है। और फिर जब मनुष्य उनमें से असीम लेना चाहते हैं: तो वे अपनी बटोरी हुई सम्पत्ति से फट पड़ेंगे, और वह उनके लिये न केवल निष्फल, वरन् उनके सत्यानाश का कारण हो जाएगी।) इसके स्थान पर हम पाएँगे कि हमने एक उत्तम धन संचय किया है, जो परमेश्वर के हाथ में हमारे लिये सुरक्षित रखा जाएगा, ताकि जब हम इस संसार में अपनी दौड़ पूरी कर लें, और अपना बीज बोना जारी रखें, अर्थात् जब हम बिना थके अपने परमेश्वर के मार्गों पर चल चुकें, सदा ऊपर स्वर्ग की ओर देखते हुए, और जितना हमसे हो सके संसार से अपने आप को अलग करते हुए, तब हम उसका फल पाएँ।
और अब आओ हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने पापों को मानकर गिर पड़ें, उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उन्हें ऐसा अनुभव कराए कि वह हमें सच्चे पश्चाताप तक पहुँचाए, और तो भी हम उसकी भलाई से अपने आप को शान्ति और प्रोत्साहन देना न छोड़ें, इसमें कुछ भी सन्देह न करें कि वह हमें दया करके ग्रहण करता है, कम से कम यदि हम उसके पास इसलिये आएँ कि उसके पवित्र आत्मा से सुधारे जाएँ, जब तक कि वह हमें हमारे शरीर की सब अपूर्णताओं और दोषों से बिलकुल छुड़ा न दे, और अपने ही स्वरूप में नया न बना दे, कि हमें उस सिद्ध धार्मिकता तक पहुँचाए जिसके लिये हम परिश्रम करते हैं। और इसलिये हम सब कहें, सर्वशक्तिमान परमेश्वर, स्वर्गीय पिता, इत्यादि।
