अध्याय 18

तीसरे अध्याय पर सोलहवाँ उपदेश, जो दूसरा भी है — गलातियों 3:3-5

Sermons upon Galatians · John Calvin

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तीसरे अध्याय पर सोलहवाँ उपदेश, जो दूसरा भी है — गलातियों 3:3-5

सोलहवाँ उपदेश,

जो तीसरे अध्याय पर दूसरा है।

3 क्या तुम ऐसे निर्बुद्धि हो कि आत्मा से आरम्भ करके अब शरीर में आकर अन्त करते हो?

4 क्या तुमने इतना दुःख व्यर्थ ही उठाया? कम से कम यदि वह व्यर्थ हो तो।

5 सो जो तुम्हें आत्मा देता है और तुम में सामर्थ्य के साथ कार्य करता है, क्या वह व्यवस्था के कामों से करता है, या विश्वास के सन्देश के द्वारा?

हम जानते हैं कि सुसमाचार की सारी शिक्षा हमें इस संसार से बाहर खींचकर परमेश्वर के पास ले आने की ओर लगी है। परन्तु जब तक हम निरन्तर अधिकाधिक ऊपर न उठाए जाएँ, तब तक यह असम्भव है। इसलिए यदि हम परमेश्वर की पाठशाला में उन्नति करना चाहते हैं, तो हमें अपने स्वभाव की निर्बलताओं को सुधारने का परिश्रम इस रीति से करना चाहिए मानो हम सदा संसार से उठा लिए जाने की कगार पर ही हों। यह सच है कि परमेश्वर अपनी भलाई से हमारी ओर झुक आता है, परन्तु इसलिए नहीं कि हमें यहीं नीचे रोके रखे। इसी प्रकार जब वह हम मरणहार मनुष्यों को अपने दूतों के रूप में भेजता है और हमारे लिए सबसे उपयुक्त साधनों से हमें अपने पास आने का आग्रह करता है, और इसके साथ हमें अपने संस्कार देता है, जो पार्थिव और दृश्य चिह्न हैं, तो इसमें हम देखते हैं कि वह कैसी भली रीति से (जैसा कि कहा जाए) अपने आप को छोटा करना स्वीकार करता है, ताकि हमारे पास यह कहने का कोई बहाना न रहे कि हम इतनी ऊँचाई तक चढ़ने के योग्य नहीं थे।

परन्तु बात जैसी भी हो, यदि हम सुसमाचार को भली भाँति देखें तो पाएँगे कि उसका लक्ष्य यही है कि हमें हमारे अपने आप से और उस सब से, जो हमारे शरीर का है, वंचित कर दे, ताकि हम उसके पास आएँ। परन्तु इसके विपरीत, मनुष्य उस अनुग्रह का दुरुपयोग करते हैं जो परमेश्वर उनके सामने ऐसे दृश्य चिह्न रखकर दिखाता है; वे अपने आप को यह समझा लेते हैं कि उनकी पवित्रता की सारी सिद्धता वहीं पाई जाती है, और उसी से उन्हें लगे रहना चाहिए। और यह दो दिन का या कल उपजा हुआ दोष नहीं है, वरन् संसार के आरम्भ से चला आया है और अब भी बना हुआ है; और (जो इससे भी बुरा है) मनुष्य यह समझते हैं कि जिस वस्तु को परमेश्वर ने उन्हें अपनी ओर खींचने के लिए ठहराया था, उसे उलट देना ही पर्याप्त नहीं, वरन् वे अपने को उससे दूर रखने के लिए अनेक बाधाएँ भी गढ़ते और बनाते हैं।

यदि यह उदाहरण से स्पष्ट न किया जाए तो अँधेरा ही रहेगा। परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था में एक समय के लिए बलिदान, छायाएँ और प्रतिरूप ठहराए थे; तो भी उसने यह उन नंगी वस्तुओं में किसी प्रसन्नता के कारण नहीं किया, वरन् उन लोगों की अनगढ़ता के कारण किया (जो उस समय छोटे बालकों के समान थे), जिन्हें वह उनके कच्चेपन के अनुकूल साधनों के द्वारा आत्मिक सेवा की ओर आगे बढ़ाते रहना चाहता था। इसी कारण व्यवस्था की विधियाँ मानो शारीरिक कही गई हैं। क्यों? क्योंकि परमेश्वर अपने लोगों को स्थूल रीति से सिखाना चाहता था कि वे वहाँ तक कैसे पहुँचें जहाँ उन्हें पहुँचना चाहिए। परन्तु उनकी दशा जैसी भी रही हो, जो नमूना पर्वत पर मूसा को दिखाया गया था, वह स्वर्गीय था।

इस प्रकार व्यवस्था की सारी विधियों में दो बातें थीं। क्योंकि जब लोग मन्दिर में प्रवेश करते समय अपने को धोते थे, जब वे बलिदान चढ़ाते थे, जब वे दीपक और सुगन्ध द्रव्य काम में लाते थे, और जब याजक अपने विशेष वस्त्र पहनता था: ये सब बातें (बाहरी दिखावे की दृष्टि से) भली रीति से शारीरिक और अस्थायी कही जा सकती थीं; परन्तु (अपने उद्देश्य की दृष्टि से) वे आत्मिक थीं।

परन्तु यहूदियों ने क्या किया? उन्होंने इस पर विचार किए बिना कि परमेश्वर ने उन्हें क्यों ठहराया है, केवल प्रतिरूपों को ताकते रहना ही जाना, और अपने आप को यह समझा लिया कि हमने अपना कर्तव्य भली भाँति पूरा कर दिया, क्योंकि हम कलीसिया में आते हैं और जो बातें हमें बाहर से आज्ञा दी गई थीं, उन्हें करते हैं। परन्तु सच तो यह है कि उन्होंने अपनी ही कल्पना के अनुसार परमेश्वर का रूप बदल डाला, जैसा कि वह स्वयं अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा उनका उपहास करता है, यह कहकर कि वह हाथ के बनाए हुए भवनों में नहीं रहता, और स्वर्ग भी उसकी महिमा को, जो अनन्त है, समा नहीं सकता।

फिर आज के पोपवादियों ने, यह सोचकर कि परमेश्वर की व्यवस्था में जो बातें हैं उनका दुरुपयोग करना ही काफी नहीं, टुकड़े पर टुकड़ा ऐसा जोड़ा है कि उनकी मूर्खता का कोई अन्त ही नहीं; तो भी वे उन्हें परमेश्वर की सेवा का नाम देते हैं। परन्तु वे जो भी कहें, ये छनछनाती चालबाज़ियों और स्वाँग के खिलौनों के सिवा और कुछ नहीं हैं।

परन्तु अब हम उस ओर आएँ जो यहाँ कहा गया है। सन्त पौलुस आत्मा की तुलना शरीर से करता है। आत्मा से उसका क्या अर्थ है? वह सारी शिक्षा जो परमेश्वर अपने सुसमाचार में हमारे सामने रखता है। क्योंकि वहाँ आत्मिक मार्गदर्शन है, ऐसा कि हम यहूदियों के समान अब पुरानी छायाओं के अधीन नहीं रखे जाते। सो तुम देखते हो कि परमेश्वर इन दिनों में अपने आप को हम पर पूरी रीति से प्रकट करता है, और व्यवस्था की सब छायाओं को गिराकर और रद्द करके हमें दिखाता है कि वह चाहता है कि हम सीधे उसी के पास आएँ, और कुछ भी हमें यहाँ नीचे रोकने के लिए बाकी न रहे।

व्यवस्था के अधीन केवल याजक ही परमेश्वर के निकट जाकर उपदेश करता था, और सब लोग दूर ही दूर रहते थे। परन्तु हमारे पास हमारा प्रभु यीशु मसीह है, जो हमारा याजक है, जिसके द्वारा उसके लहू में हमारे लिए मार्ग खुल गया है कि हम परमेश्वर उसके पिता के पास आएँ, जैसा कि प्रेरित इब्रानियों की पत्री में उसके विषय में कहता है। तो यदि हम सुसमाचार को ऐसे ग्रहण करें जैसा हमें करना चाहिए, तो परमेश्वर हमारे साथ ऐसा व्यवहार करेगा मानो हम उसके निकट आने के योग्य हों, और उन सब बातों को छोड़ देगा जो उसने पुराने समय में उनके लिए ठहराई थीं जो अधिक अनगढ़ और स्थूल थे।

सो तुम देखते हो कि सन्त पौलुस गलातियों को क्यों उलाहना देता है कि उन्होंने आत्मा से आरम्भ किया था, अर्थात् इसलिए कि उन्हें सुसमाचार की शिक्षा मिली थी, जिसने उन्हें वे बातें दिखाई थीं जो यहूदियों से छिपी रही थीं, या कम से कम उन्हें केवल दूर से, अन्धकारमय छायाओं के नीचे दिखाई गई थीं। इस पर वह उन्हें उलाहना देता है कि वे शरीर में अर्थात् इन निचली बातों में अन्त करना चाहते थे। और यह ऐसा ही है मानो वह कहता: परमेश्वर तुम पर ऐसा अनुग्रहकारी रहा कि उसने तुम्हें तुरन्त अपनी इच्छा सिखा दी, और तुम चाहते हो कि तुम्हें अब भी वर्णमाला और प्रथम पाठों में ही रोका जाए। उसने तुम्हें ऊँचा और सिद्ध ज्ञान दिया, जिसके द्वारा तुमने उस अथाह प्रेम को जाना जो वह हमारे प्रभु यीशु मसीह में तुमसे रखता है: और क्या तुम अब फिर अपनी वर्णमाला की ओर लौटोगे और जो बातें तुम्हें सिखाई गई हैं उन्हें भूल जाओगे? क्या यह सारी व्यवस्था को उलट देना और उस अनुग्रह को ठुकरा देना न होगा जो उसने तुम्हें दिया था?

परन्तु हम जानते हैं कि स्वभाव से जब मनुष्य कुछ सीखना चाहते हैं, तो वे सबसे छोटी बातों से आरम्भ करते हैं, और फिर सब कलाओं और सब व्यवसायों में अनुभव के द्वारा थोड़ा-थोड़ा करके आगे बढ़ते हैं। क्योंकि यदि कोई किसी बालक को पहले वर्णमाला, और लिखना-पढ़ना, और फिर व्याकरण सिखाए बिना, जो उसे धीरे-धीरे आगे ले चले, उसे ऊँचे शास्त्र सिखाने लगे, तो यह कैसी बात होगी?

फिर, जब बालक भली भाँति आगे बढ़कर प्रौढ़ अवस्था को पहुँचे, यदि उसके अच्छी उन्नति कर लेने के बाद उसे फिर वर्णमाला की ओर लौटा दिया जाए, तो यह निरा उपहास होगा। हस्तकलाओं का भी यही हाल है। क्योंकि यह भली भाँति जाना हुआ है कि जो नया-नया किसी कारखाने में आता है, वह पहले दिन उतना समझने में समर्थ नहीं होता जितना एक-दो वर्ष के अन्त में होगा; पहले उसे उसके मूल सिद्धान्त सिखाए जाने चाहिए, और फिर वह कुशलता में अधिकाधिक बढ़ता जाए। परन्तु यदि जिसने अपना हुनर सीख लिया है, वह चार वर्ष के अन्त में उस बात की ओर लौट जाए जो उसे पहले ही दिन आनी चाहिए थी, तो ऐसा करके वह दिखा देगा कि वह पशु है और उसने अपना समय खो दिया है।

अब आओ, इस शिक्षा को अपने ऊपर लागू करें। सच है कि हम भारी और मिट्टी के हैं, इसलिए हमें ऐसा होना चाहिए कि जो बातें हम पचा नहीं सकते वे हमारे लिए चबाकर दी जाएँ। तो भी परमेश्वर हम पर ऐसा अनुग्रहकारी और कोमल है कि हमें आत्मिक रीति से सिखाता है, अर्थात् उस रीति से जो ऊँची और अधिक उत्तम है, उस रीति से जिससे उसने व्यवस्था के अधीन पूर्वजों को सिखाया था। हम देखते हैं कि इब्राहीम को यह विशेषाधिकार नहीं मिला था; तो भी वह विश्वासियों का पिता है, और हमें उसके समान ढलना चाहिए, जैसा कि हम थोड़ी देर बाद देखेंगे।

हम देखते हैं कि दाऊद एक उत्तम राजा और भविष्यद्वक्ता था, तो भी उसने वे बातें नहीं देखीं जो हम अब देखते हैं, वरन् केवल छाया में। जिन सब को परमेश्वर ने प्राचीन प्रतिरूपों के अधीन चलाया, उनके विषय में भी यही कहना चाहिए। और इसी कारण हमारा प्रभु यीशु मसीह कहता है कि धन्य हैं वे आँखें जो वह देखती हैं जो हम उसके संसार पर प्रकट होने के बाद से देखते हैं, और धन्य हैं वे कान जो सुसमाचार की शिक्षा को वैसे सुनते हैं जैसे वह हमें सुनाई जाती है।

तो जब परमेश्वर इस रीति से हमारे पास आता है और हमारे साथ इतना घनिष्ठ हो जाता है, तब यदि हम पीछे हटें और उत्तम शिक्षा के बदले विधियाँ और प्रतिरूप पकड़ लें, मानो हम उसके पास आ ही न सकते हों, तो क्या यह मानो उससे बैर करके उस पर लात मारना नहीं है? और क्या वह हठ यह नहीं दिखाता कि हम नहीं चाहते कि परमेश्वर हम पर दयालु और उदार हो, जैसा कि वह अपने आप को दिखाता है? अब हम सहज ही समझ सकते हैं कि सन्त पौलुस का यहाँ क्या अर्थ है। क्योंकि वह गलातियों को उलाहना देता है कि वे केकड़ों के समान पीछे हट रहे हैं, कि जबकि वे सुसमाचार की आत्मिक शिक्षा में सधाए गए थे, वे फिर व्यवस्था की छायाओं की ओर लौट गए। इसी प्रकार यदि हम अपने समय में, एक बार सुसमाचार के अनुसार व्यवस्था से परिचित हो जाने और परमेश्वर की ऐसी सेवा से अभ्यस्त हो जाने के बाद, जो उसके शुद्ध वचन से नियन्त्रित है, फिर उसमें अपनी कल्पनाएँ मिलाने पर तुल जाएँ और कहें कि अभी इस-इस प्रकार से करना भी अच्छा होगा: तो यह शरीर की ओर फिर लौट जाना होगा, अर्थात् जबकि परमेश्वर ने हमें ऊँचे पर चढ़ाया है, हम नीचे खींचना चाहें: और यह उसके विरुद्ध खुला युद्ध है। इसलिए आओ, हम सीखें कि इस शिक्षा को अपने लाभ के लिए लगाएँ; और चूँकि परमेश्वर ने हमारे बीच अपना वचन शुद्धता से सुनाया जाना दिया है, इसलिए यदि हमने एक बार जान लिया है कि वह किस रीति से सम्मानित और सेवित होना चाहता है, तो हम उससे न दाएँ मुड़ें न बाएँ, वरन् उस वचन में, जो परमेश्वर के नाम से हमें विश्वासयोग्यता से सुनाया जाता है, इस प्रकार उन्नति करें कि प्रकट हो कि हम उसे फलदायी बनाना चाहते हैं।

और निश्चय ही हम उसमें जितना आगे बढ़े होंगे, यदि हम पीछे मुड़ें तो हमारे पास उतना ही कम बहाना रहेगा, जैसा हम बहुतों को करते देखते हैं, जो ठण्डे पड़ जाते हैं या दो धाराओं के बीच नाव खेना चाहते हैं; और जबकि यह आशा की जानी चाहिए थी कि वे निरन्तर आगे बढ़ते और परमेश्वर के अधिक से अधिक निकट आते जाते, वे अब भी कुछ निर्बुद्धि खिलौनों पर विचार करते रहते हैं। और आजकल जो सताव से बचना चाहते हैं वे ऐसे बहाने निकालते हैं: वे परमेश्वर के वचन में मनुष्यों की गढ़ी हुई बातें मिलाकर और उसे उथल-पुथल करके उसे बिगाड़ते और झुठलाते हैं। इसलिए हमें इस शिक्षा पर और भी ध्यान देना चाहिए, जहाँ सन्त पौलुस हमें बताता है कि यदि परमेश्वर ने एक बार हमें आगे बढ़ा दिया है, तो हमें छोटे शिशुओं के समान अपनी वर्णमाला की ओर फिर नहीं लौटना चाहिए। क्योंकि हमारे लिए लज्जा की बात है कि जब हम सुसमाचार में एक बार उन्नति कर चुके हों, या कम से कम उन्नति करने का काफी अवसर पा चुके हों, तो भी ऐसा जान पड़े कि हमने उसका एक शब्द भी नहीं सुना, जैसा प्रेरित इब्रानियों की पत्री में यहूदियों को उलाहना देता है, कि तुम्हें तो उस समय को देखते हुए, जब से तुम्हें सिखाया गया है, सब के सब शिक्षक होना चाहिए था, तो भी तुम अब तक नए सीखनेवालों के समान हो।

सो तुम देखते हो कि इस पाठ पर हमें पहली बात यह ध्यान में रखनी है। अब वह आगे जोड़ता है, क्या तुमने इतनी बातें व्यर्थ ही सहीं? यदि कम से कम वह व्यर्थ हो तो। यहाँ वह गलातियों को यह कहकर जगाता है कि परमेश्वर ने उन्हें यह आदर दिया था कि उन्हें अपने सुसमाचार के गवाह ठहराए, और तो भी वे पीछे उससे फिर गए। और यह बात ध्यान देने योग्य है। क्योंकि कभी-कभी परमेश्वर हमें इतना बड़ा आदर देता है कि हमारे द्वारा अपना काम निकालता है, ताकि उसका वचन हमारे द्वारा मनुष्यों के सामने स्थिर रखा जाए। अब यदि इस पर हम एक ओर मुड़ जाएँ और उस स्थिरता के साथ अन्त तक न टिकें जो हम में दिखाई देती थी, तो यह दोहरी लज्जा की बात है, और इसे और भी बड़ा अपराध समझना चाहिए, क्योंकि ठोकर का कारण दोहरा है; और इसके अतिरिक्त यह घोर कृतघ्नता है यदि हम अपने परमेश्वर की सेवा में बने न रहें जब उसने इस रीति से हमारी ओर हाथ बढ़ाया है। और इस पर और भी ध्यान देना चाहिए क्योंकि हम बहुतों को डींग मारते और अपनी बड़ाई करते देखते हैं कि उन्होंने आश्चर्यकर्म किए, यदि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने किसी बात में उनके द्वारा अपना काम निकाला हो। वे क्या कहते हैं? क्या मैंने यह और वह नहीं किया? वे अपनी ही योग्यताएँ गिनाएँगे: यहाँ तक कि (यदि तुम उनकी मानो) परमेश्वर उनका बड़ा ऋणी है। परन्तु मान लो कि उन्होंने जितना कहते हैं उससे सौ गुना अधिक किया हो: तो भी इसी कारण वे परमेश्वर के और भी अधिक ऋणी हैं। क्योंकि वह उनकी अपनी किसी भली प्रवृत्ति से नहीं, वरन् परमेश्वर से हुआ, जो उन्हें अपनी पवित्र आत्मा से चलाता था: और यदि वे पीछे चूक जाएँ, तो उनका दोष और अपराध उतना ही अधिक बुरा है। और क्यों? क्योंकि उन्हें आगे बढ़ना चाहिए, और वे पीछे जाते हैं। और इसके अतिरिक्त वे बहुतों को उससे कहीं अधिक ठोकर खिलाते हैं जितनों को वे तब खिलाते जब वे सामने न लाए गए होते। क्योंकि जब परमेश्वर ने उन्हें मानो मंच पर ऊँचा उठाया, तो इसलिए कि वे दूर से दिखाई दें। इसके द्वारा वे असंख्य लोगों को विचलित करते हैं, और इसलिए उनका दोष उतना ही अधिक घोर है। परन्तु यह दोष बहुत सामान्य है।

क्योंकि आजकल जो अपने आप को ऐसा समझते हैं कि उन्होंने सुसमाचार के लिए कुछ किया है, वे सब व्यवस्था और नियम से छूट पाने पर तुले हैं: यहाँ तक कि यदि कोई उन्हें भूल करने पर दोष लगाए, तो वे (क्या कहते हैं?) क्या मुझे सहा नहीं जाना चाहिए? क्योंकि मैंने यह और वह किया है। संक्षेप में, मनुष्य इसी रीति से अपने आप को छूट दे देंगे, और (जो इससे भी बुरा है) जब परमेश्वर उन्हें अपनी सेवा में लगाने का आदर देता है तब वे उसी के विरुद्ध घमण्ड से अपने आप को ऊँचा करते हैं। परन्तु आओ, देखें कि सन्त पौलुस यहाँ क्या कहता है, क्या तुमने इतना दुःख व्यर्थ ही उठाया? वह गलातियों को और भी कड़ाई से दोष देने का अवसर इस बात से लेता है, कि वे पहले ही सुसमाचार के कारण दुःख उठा चुके थे, और सताए गए थे, और अपनी सम्पत्ति और अपने शरीर दोनों में बहुत क्लेश सह चुके थे। वह कहता है: अब क्या? जो कुछ तुमने सहा उसके विषय में क्या कहा जाए? क्या वह इस बात का प्रमाण नहीं कि परमेश्वर ने तुम्हें अपने नाम की महिमा के लिए बुलाया था? क्योंकि सच तो यह है कि जो कुछ हम सुसमाचार के लिए सहते हैं, वह हमारे लिए एक चिह्न का काम करे, मानो परमेश्वर ने हमें किसी आदरणीय पद पर बैठाया हो। सबसे बड़ा आदर जो हमें मिल सकता है वह परमेश्वर के सत्य के गवाह होना है, ताकि यद्यपि हम झूठ के अधीन हैं, तो भी वह अपने उस अनन्त सत्य को, जो उसी से निकलता है, हम अभागे प्राणियों के द्वारा भी, जो केवल हवा, धुआँ, छाया और शून्य से भी कम हैं, सच्चा ठहराता है।

तो जब परमेश्वर हमें अपने सुसमाचार को हमारे द्वारा बढ़ाने और फैलाने के लिए वैध गवाह नियुक्त और ठहराता है, तो यदि हम उसके लिए दुःख उठाने के बाद उससे मुड़ जाएँ, तो क्या उसे शिकायत करने का उचित कारण नहीं है? इसलिए जिन्होंने कोई भला आरम्भ किया है, वे सब अपने ऊपर कड़ी दृष्टि रखें। और इससे बढ़कर ध्यान देने योग्य कोई चेतावनी नहीं है। क्योंकि जब कलीसिया के सबसे छोटे जन के पास भी परमेश्वर की ओर बँधे रहने के लिए पर्याप्त कारण है, इसलिए कि उसने उसे संसार में से चुन लिया और अपना सुसमाचार उसके पास भेजा, ऐसा कि उसने बड़ों को और उन्हें जो अपनी बड़ी श्रेष्ठता के कारण अपने ऊपर बहुत ऊँचा भाव रखते हैं, छोड़ दिया, और संसार की दृष्टि में छोटों और तुच्छ जनों को चुन लिया, और यदि वे पीछे हट जाएँ तो उन्हें निश्चय ही कठिनतर लेखा देना पड़ेगा: तो उनका क्या होगा जिन्हें परमेश्वर ने अपने झण्डा उठानेवाले बनाने की कृपा की, और जिन्हें उसने इस प्रकार आगे रखा कि उन्हें औरों के लिए आदर्श और दर्पण होना चाहिए था? यदि वे फिसलकर निकल जाएँ तो उनके पास क्या बहाना होगा? और विशेषकर यदि वे जिन्होंने यीशु मसीह के नाम और उसके सुसमाचार की शिक्षा के लिए इतना दुःख उठाया कि बन्दीगृह में डाले गए और यातना सही, वरन् मृत्यु के द्वार तक पहुँचाए गए, पीछे एक ओर हट जाएँ: तो क्या यह जहाँ तक उनसे बन पड़ा परमेश्वर के अनुग्रह को मिटा देना नहीं है? इसलिए किसी का सुसमाचार के लिए दुःख उठाना उसे निर्दोष ठहराने या उसे सह लिए जाने का कारण कदापि न बने: बल्कि जिन्होंने सबसे अधिक दुःख उठाया है उन्हें अपने आप को सबसे अधिक रोके रखना चाहिए, यह जानकर कि जो आदर परमेश्वर उन्हें देता है वह उन्हें उसके प्रति और भी अधिक बाँधता है, और उन्हें और भी सचेत और सावधान रहना चाहिए कि किसी के लिए ठोकर का कारण न बनें। क्योंकि जब लोग कहेंगे, यह कैसे हुआ? अमुक व्यक्ति तो परमेश्वर का शहीद होना था, उसने सत्य की रक्षा के लिए बहुत कुछ सहा है, और अब देखो वह भगोड़ा हो गया है: तो यह सुसमाचार को लज्जा और निन्दा में डालना है, और यह कैसी बात है? इस रीति से परमेश्वर के नाम की बड़ी बदनामी होगी। इसलिए आओ, हम भली भाँति ध्यान दें कि यदि हमने कुछ समय परमेश्वर की सेवा की है और उसने हमारे परिश्रम को सफल किया है, ऐसा कि कलीसिया को उससे लाभ और उन्नति पहुँची है: तो हमें और भी अधिक सावधानी से चलना चाहिए, और भली भाँति चौकस रहना चाहिए कि हम उस दुष्ट गाय के समान न बनें जो बहुत सा दूध देती है, और जब दे चुकती है तो लात मारकर बाल्टी गिरा देती है और दूध फैला देती है। क्योंकि यदि हम भलाई से सौ गुना अधिक बुराई करें: तो अपने बचाव में हम क्या कह सकते हैं? हम कैसे कह सकते हैं कि हमने सुसमाचार के लिए दुःख उठाया?

इसलिए यदि हम चाहते हैं कि परमेश्वर हमारी सेवा को स्वीकार करे, तो आओ, हम स्थिर, दृढ़ और जमे हुए होना सीखें, कि अपनी बुलाहट से कभी न मुड़ें, वरन् उसमें बने रहें और अधिकाधिक आगे बढ़ते जाएँ। तो भी, क्योंकि यह उलाहना बहुत कठोर था, सन्त पौलुस उसे कोमल करता है, यह कहकर: यदि कम से कम वह व्यर्थ हो तो। इसमें वह गलातियों को संकेत देता है कि वह उनसे कहीं अधिक भली आशा रखता है, और यद्यपि वे कुछ समय के लिए एक ओर हट गए थे, तो भी यह अधिक देर तक न रहेगा, वरन् चेतावनी और प्रोत्साहन पाकर वे फिर सही मार्ग पर लौट आएँगे। और इस पद में हम देखते हैं कि जब परमेश्वर की आत्मा हमें डाँटती है, तो वह हमें चिढ़ाने के लिए नहीं, न हमें ऐसी निराशा में धकेलने के लिए कि हम लगाम दाँतों में दबाकर झल्लाने लगें: परन्तु पश्चाताप की ओर खींचने के लिए डाँटती है। इसलिए परमेश्वर हमें इतना घबरा देना नहीं चाहता कि हमें झाड़ियों में छोड़ दे: परन्तु हमारे दोष दिखा देने के बाद वह हमें सदा अपने पास लौटने को बुलाता है, और पश्चाताप के लिए बुलाता है, और हमें दिखाता है कि जितनी बार हम सच्ची दीनता से अपने पापों पर शोक करने और उन्हें निष्कपट और खुले मन से मानने को प्रेरित हों, उतनी बार वह हमें ग्रहण करने और दया में लेने को तैयार है।

जब ऐसा है, तो आओ, हम अपनी ओर से सचेत रहें कि जब हमें हमारे किए हुए दोष बताए जाएँ, तो हम पागलों के समान न हो जाएँ, और न एक ओर हटकर या पीछे घसीटकर कुछ पाने का यत्न करें: परन्तु अपने आप को दोषी मानें, और ऐसे नम्र और धीरजवन्त मन के हों कि जैसा हमें आवश्यक हो वैसे हमें दोष लगाया जाने दें। और जब डाँट कुछ अधिक तीखी और चुभनेवाली जान पड़े: तो आओ, हम सदा यह स्मरण रखें कि वह किस उद्देश्य की ओर ले जाती है और उसका क्या फल निकलता है, और यह कि यद्यपि परमेश्वर हमें भली भाँति डाँटता है, तो भी वह पीछे हमारे सारे दोष भूलने को तैयार है। तो तुम देखते हो कि हमें क्या स्मरण रखना है: मानो सन्त पौलुस यह कहता हो कि यद्यपि हमने अपनी पूरी शक्ति से परमेश्वर के अनुग्रह को मिटा डाला है: तो भी वह अपनी ओर से नहीं चाहता कि वे नष्ट हों, और उन्हें फलवन्त करना चाहता है। और इसी के लिए वह हमें डाँटता है, कि हम सुधार न पाने वाले बने न रहें। इसलिए जब कभी हम इतनी चूक कर बैठें कि सही मार्ग से भटक जाएँ: तो भी जान लें कि हमारा प्रभु हमें अपने पास वापस बुलाता है, और हमें लौटने का मार्ग देता है, यदि हमारा दोष हठ से जुड़ा न हो।

अब जब सन्त पौलुस यह कह चुका, तो वह फिर आगे कहता है कि परमेश्वर ने गलातियों के बीच अपनी पवित्र आत्मा के वरदान बाँटे थे, हाँ, और वह भी सुसमाचार के द्वारा, ऐसा कि वही उन्हें उस शिक्षा से, जो उन्होंने ग्रहण की थी, बाँधे रखने के लिए पर्याप्त होना चाहिए था, कि वे उससे न मुड़ें और न भटकें। जब वह यहाँ परमेश्वर की आत्मा की बात करता है, तो उसका अर्थ वह अनुग्रह नहीं जिसकी चर्चा आज सवेरे हुई थी, जो सब विश्वासियों के लिए सामान्य है: परन्तु वह एक और प्रकार का तर्क लेता है (जैसा कि हम आगे देखेंगे): अर्थात् यह कि सब गलातियों पर सामान्य रीति से अपने आप को प्रकट करने और उन्हें अपनी सन्तान ठहराने के अतिरिक्त, उसने उनके बीच भविष्यद्वक्ता भी ठहराए थे, और ऐसे जन भी जिन्हें किसी को अन्य भाषाओं का, किसी को चंगा करने का, और किसी को ऐसे ही अन्य वरदान मिले थे। परन्तु यह सब उन्हें सुसमाचार के द्वारा मिला था: और इसलिए उनका फिर व्यवस्था की विधियों की ओर लौटना परमेश्वर की आत्मा के सब कामों को दफना देना था। मैं तुम्हें पहले ही बता चुका हूँ कि हमें यह याद रखना चाहिए कि परमेश्वर अपनी आत्मा सब [अपनों] को देता है: क्योंकि उसके बिना हम मसीही नहीं हो सकते, क्योंकि हमारे स्वभाव में बुराई के सिवा कुछ नहीं। परमेश्वर को हमें सुधारना और अपनी ओर लौटा लाना पड़ता है, कि हम मानो नई सृष्टि बन जाएँ।

सो तुम देखते हो कि परमेश्वर हम सब को सामान्य रीति से अपनी पवित्र आत्मा का भागी बनाता है, जिसके द्वारा हम उसके भय से छुए जाते हैं, विश्वास से प्रकाशित होते हैं कि अपना उद्धार यीशु मसीह में ढूँढ़ें, और परमेश्वर की ओर लौटने, उसे पुकारने, और अपने आप को उसकी इच्छा के आज्ञाकारी बनाने के लिए उत्साहित किए जाते हैं: और संक्षेप में, तुम देखते हो कि परमेश्वर की आत्मा सब विश्वासियों और उसकी सब सन्तानों के लिए सामान्य है। परन्तु इसके अतिरिक्त वह हमें और विशेष अनुग्रह भी देता है, जैसे जब वह हमें ऐसे जन देता है जो विश्वासयोग्यता से हमें उसका वचन सिखाते हैं, या जो राज्य का शासन बुद्धि से चलाते हैं, या जिनके पास और वरदान हैं: क्योंकि ऐसा करके वह हमें कुछ चिह्न देता है कि वह हमारे बीच वास करता है, और उसके द्वारा वह हमें अपने साथ और भी अधिक बाँधता है। आओ, उस तर्क पर ध्यान दें जो सन्त पौलुस यहाँ देता है। वह गलातियों की कृतघ्नता पर दोष लगाता है, कि उन्होंने इस पर विचार नहीं किया कि यह उन तक सुसमाचार के प्रचार से आया। और वह जान-बूझकर यह कहता है, क्योंकि मनुष्य सदा काफी सुन्दर घोषणाएँ करते रहेंगे कि हम परमेश्वर के अनुग्रह को ठुकराने का इरादा नहीं रखते, और तो भी अपने कामों में ठीक उलटा दिखाते हैं। कैसे? जो लोग अपने आप को सिखाए जाने देना नहीं चाहते, और यदि हो सके तो परमेश्वर के वचन के सब सेवकों को भगा देते, और जो ईर्ष्या और द्वेष के कारण उन सब की स्मृति को मिटा देने पर मन बना सकते हैं जिन्हें परमेश्वर ने अपने लोगों के कल्याण को बनाए रखने के लिए स्थापित किया है, वे (मैं कहता हूँ) भली भाँति दिखाते हैं कि वे चाहते हैं कि परमेश्वर उनसे दूर रहे: और वे उसके पास आना नहीं चाहते। क्योंकि वह उनके सामने अपने पास आने के साधन रखता है, और वे उसे लेना स्वीकार नहीं करते, वरन् उसे अपने से धकेल देते हैं। तो जब सन्त पौलुस गलातियों में दोष निकालता है, तो इसलिए नहीं कि उन्होंने खुले मुँह से घोषणा की थी कि हम परमेश्वर की आत्मा को नहीं चाहते, या उसके वरदानों का तिरस्कार किया था: परन्तु उन्हें यह दिखाने के लिए कि उन्होंने अपनी कलीसिया में परमेश्वर के अपनी आत्मा के वरदान बाँटने का बहुत ही बुरा ध्यान रखा था।

तब हमें इस पद से क्या सीखना चाहिए? यह कि यदि परमेश्वर हमें अपने पास आने के साधन देता है, तो हमें उन्हें मूल्यवान मानना चाहिए, और अपने आप को उनके अनुसार ढालना चाहिए। क्योंकि यदि हमारे बीच सुसमाचार सुनाया जाए, और हम जान-बूझकर भूल जाएँ कि हमें क्या बताया गया है: तो यह वैसा ही है मानो हमने परमेश्वर को ठुकराया, और उसकी ओर पीठ फेर ली, इसी उद्देश्य से कि उससे भटक जाएँ। इसलिए यदि हम चाहते हैं कि परमेश्वर हम पर अपना अनुग्रह बनाए रखे: तो आओ, उन साधनों से लगे रहें जो उसने हमारे लिए ठहराए हैं: अर्थात् जिन्हें वह हमारे पास भेजता है उनसे सिखाए जाने दें, हम में से हर एक अकेले में भी पवित्र शास्त्र पढ़ने का अभ्यास करे, जिन्होंने कलीसिया की उन्नति में भलाई की है उन्हें हमारे बीच स्थान और जगह मिले, और हम पवित्र आत्मा के लिए द्वार बन्द न करें। संक्षेप में यही बात है जो हमें स्मरण रखनी है।

फिर, चूँकि सन्त पौलुस का आशय यहाँ विश्वासियों को सुसमाचार की ओर वापस लाना है: तो आओ, अपने को निश्चय दिला लें कि यदि हम उससे तनिक भी हटें, तो हम सीधे विनाश के राजमार्ग पर हैं। और इसलिए परमेश्वर को मनुष्यों से जोड़नेवाली और कोई कड़ी नहीं, केवल सुसमाचार है, जो उनके बीच ऐसी जंजीर के समान चले जो टूट नहीं सकती। और पौलुस जान-बूझकर उसे फिर एक बार विश्वास का प्रचार कहता है, कि हमें दिखाए कि हमें कितनी बड़ी आवश्यकता है कि परमेश्वर हम से पहले आए।

क्योंकि जब तक उसने हमारे प्रभु यीशु मसीह में हमारी ओर हाथ नहीं बढ़ाया, और हमें उस घोर अव्यवस्था की खाई में से नहीं निकाला जिसमें हम स्वभाव से हैं, तब तक हम क्या हैं?

इसके अतिरिक्त, हम देखते हैं कि वह हम पर कैसा उदार दिखाई देता है, कि वह अपने आप को पूरी रीति से अपने एकलौते पुत्र के व्यक्तित्व में हमें दे देता है: निश्चय ही यह उससे कहीं अधिक है कि वह हमें आकाश और पृथ्वी और उनमें की सारी सम्पत्ति दे देता। क्योंकि हमारे प्रभु यीशु मसीह की तुलना में और सब वस्तुएँ क्या हैं? इसलिए आओ, ध्यान दें कि जब परमेश्वर ने हमें यह घोषित कर दिया कि हम सब भलाई से बिलकुल खाली हैं, और साथ यह भी जोड़ा कि वह हम से कुछ भी रोक न रखेगा, और यदि हम अपनी हर घटी के लिए उसके पास आएँ तो हमारे प्रति कंजूस न ठहरेगा: तो हमें इसी से सन्तुष्ट होना चाहिए, और यदि हम इधर या उधर तनिक भी हटें तो हम इसके योग्य हैं कि हमसे वह भी, जो हम पा चुके हैं, पूरी तरह छीन लिया जाए।

और इस पर सन्त पौलुस हमें इब्राहीम के उदाहरण पर लौटा लाता है, क्योंकि वह सब विश्वासियों का पिता है, और इसलिए भी कि उसके व्यक्तित्व में परमेश्वर ने यह दिखाना चाहा कि हम उद्धार पाने के लिए कैसे धर्मी ठहर सकते हैं: क्योंकि स्वर्ग के राज्य में पहुँचाने का और कोई मार्ग नहीं, केवल वही जिस पर वह चला। केवल एक ही मार्ग है, और वह हमारे सामने इब्राहीम के उदाहरण में रखा गया है। इसलिए सन्त पौलुस कहता है कि इब्राहीम ने परमेश्वर की प्रतीति की, और यह उसके लिए धर्म गिना गया: और इसलिए यदि हम इब्राहीम की सन्तान होना चाहते हैं तो हमें विश्वास करना चाहिए। यहाँ हमें उस बात को स्मरण करना है जो पहले कही जा चुकी है: अर्थात् यह कि विश्वास या प्रतीति शब्द का क्या अर्थ है। यह केवल इतना मान लेना नहीं कि एक ही परमेश्वर है जो संसार पर शासन करता है: परन्तु अपने आप को निश्चय दिलाना है कि वह हमें अपनी सन्तान मानता है, और यह कि हम उसे अपने पिता के रूप में पूरे और खुले मन से पुकार सकते हैं, क्योंकि वह हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह के कारण ग्रहण करता है। तो यदि हम अपने परमेश्वर की कृपा और पितृवत् प्रेम के विषय में निश्चित हों, और उसकी प्रतिज्ञाओं से उसकी ऐसी गारण्टी लें कि हमारी दृष्टि पूरी तरह हमारे प्रभु यीशु मसीह पर टिकी हो, जिसमें हमें परमेश्वर के पास आने और स्वतन्त्रता से उसके पास जाने का मार्ग मिलता है: वही बात है जो सन्त पौलुस का विश्वास शब्द से अभिप्राय था। और इसलिए जब वह कहता है कि इब्राहीम की सन्तान होने के लिए हमें विश्वासी होना चाहिए: तो यह ऐसा ही है मानो वह कहे कि हम विश्वास के बिना न विश्वासी मसीही हो सकते हैं, न कलीसिया के अंग: अर्थात् जब तक हम अपनी योग्यताओं की सब धारणा से वंचित न हों, और अपने आप में ऐसे कुचले और घबराए हुए न हों कि हमें समझ न आए कि कहाँ जाएँ, और उद्धार का कोई और साधन न ढूँढ़ें, केवल उस मुफ़्त भलाई में जो परमेश्वर हमें देता है, जब वह हमें बताता है कि हम अपने पापों में नाश और दण्डित हैं, और तो भी हमें उद्धार की पूरी आशा और भरोसा रखना नहीं छोड़ना चाहिए, यीशु मसीह में।

सो तुम देखते हो कि मसीही होना क्या है: अर्थात् अपने आप में पूरी तरह निराश होना, यह सोचकर कि वह अपने साथ पाप और श्रापित दशा के सिवा कुछ नहीं लाता: और तो भी अपने आप को सब भले गुणों से ऐसा रिक्त अनुभव करके परमेश्वर के पास आना कि हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह से पहिनाया जाए। क्योंकि हमारे लिए केवल अपने आप में निराश होना काफी नहीं, जैसा हम कैन को देखते हैं, जिसने मानो यातना के यन्त्र पर चढ़कर अपना दोष मान लिया: (परन्तु वह तो केवल निराशा के कारण था, और इसलिए उसमें परमेश्वर के विरुद्ध कुड़कुड़ाने और निन्दा के सिवा कुछ न था: और सब ठुकराए हुओं और परित्यक्तों का भी यही हाल है) परन्तु हमें अपने परमेश्वर के प्रेम का ऐसा स्वाद चखना है कि हम उस पर अपने आप को जमा सकें, और इस बात में सब सन्देह से परे हों कि यदि हम सुसमाचार के पास आएँ तो वह हमें ग्रहण करेगा, कम से कम यदि हम ऐसी रीति से आएँ कि हमारी आशा हमारे अपने अनुमान या कल्पना पर नहीं, परन्तु परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर आधारित हो, और इस पर कि उसकी बाट जोहने में और उसके वचन पर अपने आप को निश्चिन्त रखने में हम निराश नहीं हो सकते। सो तुम देखते हो कि सार रूप में विश्वासी होना क्या है: क्योंकि हमें उस विवाद पर सदा दृष्टि रखनी चाहिए जो सन्त पौलुस उठाता है। वह उनसे लड़ता है जो व्यवस्था के कामों के द्वारा परमेश्वर के सामने धार्मिकता मोल लेने का दिखावा करते थे। यदि यह बिना विचार किए कि सन्त पौलुस यहाँ किस विषय पर बोल रहा है, केवल विश्वास से होने की बात होती, तो वह कथन-शैली अँधेरी ही रहती। परन्तु जब हम देखते हैं कि सन्त पौलुस स्पष्ट घोषणा करता है कि वे सब जो अपनी योग्यताओं से परमेश्वर के हाथ से कृपा मोल लेना चाहते हैं, घमण्ड से फूले हुए हैं, और उनका दुस्साहस उनके लिए स्वर्ग का द्वार बन्द कर देता है, और परमेश्वर उनकी नहीं सुनता, क्योंकि वे उसे उसका उचित आदर नहीं देते, और मानो उसके पंखों से अपने आप को सजाना चाहते हैं, और उसकी धार्मिकता को लूटकर वे विश्वासघाती हैं: क्योंकि सन्त पौलुस इसी बात को लेता है: तो अब कोई सन्देह नहीं कि वह उन सब को विश्वास से मानता है जो अपने आप पर अविश्वास करते हैं, और अपने आप में सारी आशा खो चुके हैं, और तो भी यीशु मसीह की ओर लौटते हैं, पूरी तरह उस पर टिके, उस पर झुके और भरोसा रखे हुए। इसलिए वे ही इब्राहीम की सच्ची सन्तान हैं।

परन्तु अब देखें कि संसार में कितने थोड़े मसीही हैं। यह सच है कि मसीही शब्द हर एक के मुँह पर सहज ही चलता है: परन्तु इस बीच वह बुरी तरह अपवित्र किया जाता है, और परमेश्वर को उन सब को अस्वीकार करना ही पड़ेगा जो इस रीति से उसके होने का दिखावा करते हैं: जैसे पोप-तन्त्र में हर एक अपने बपतिस्मा या मसीहीपन पर भरोसा रखता है। और निश्चय ही बपतिस्मा में हमें परमेश्वर की ओर से अपने उद्धार की अचूक प्रतिज्ञा मिली है। परन्तु इससे क्या? वे केवल दृश्य चिह्न को लेते हैं, और उसे हमारे प्रभु यीशु मसीह से अलग कर देते हैं। और सचमुच पोपवादी उस बात को बिलकुल नहीं जानते जो यहाँ सन्त पौलुस हमें बताता है: परन्तु (जो इससे भी बुरा है) उनके पास उनकी स्वतन्त्र इच्छा, उनकी योग्यताएँ और उनके प्रायश्चित्त हैं: परमेश्वर की सेवा के बदले, जिसे वे पाँव तले रौंदते और बिगाड़ते हैं, उनके पास तुच्छ आभूषण हैं, हाँ, और शैतान की अपनी गढ़ी हुई घृणित बातें: और इसलिए वे भली भाँति दोषी ठहरते हैं कि उनमें मसीहीपन नहीं है। और हमारी बात यह है कि यद्यपि हमारे यहाँ वे मूर्तिपूजाएँ और अन्धविश्वास नहीं जो पोपवादियों के बीच राज करते हैं: तो भी हम सुसमाचार में ऐसे दृढ़ नहीं कि हम में से हर एक अपने आप को खुले मन से परमेश्वर के सामने रख सके, और पूरे और स्वतन्त्र मन से उसे पुकारे, और चुपचाप उसे अपना अगुवा होने दे: वरन् हम बहुतों को देखेंगे जो निरे अभागे पशु ही हैं। यह सच है कि वे यह घोषणा तो भली भाँति कर देंगे कि हम पोप के दुरुपयोगों और अन्धविश्वासों में से कुछ नहीं मानते: परन्तु यदि कोई उनसे सुसमाचार की नींव और मूल सिद्धान्तों की बात करे, तो वे नहीं जानते कि वह क्या वस्तु है। कुछ और जो अपने आप को बड़े विद्वान समझते हैं, परीक्षा आने पर दिखा देते हैं कि सब केवल दिखावा था, और वे पिंजरे में बैठी मैनाओं के समान बकबक ही करते थे। इसलिए हमें और भी अधिक भली भाँति स्मरण रखना चाहिए कि सन्त पौलुस हमें यहाँ क्या बताता है, कि हम इब्राहीम की सन्तान और कलीसिया के अंग नहीं हो सकते, जब तक कि हम सुसमाचार की प्रतीति लेकर वहाँ न आएँ, ऐसा कि हम में से हर एक अपनी योग्यताओं की पूर्वधारित धारणाओं को त्याग दे, और अपने आप को निश्चय दिला ले कि हम बिलकुल दण्डित और निराशा में डूबे हुए हैं, और इस पर परमेश्वर के केवल अनुग्रह और उस दया की शरण ले जो वह हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह में देता है, ऐसा कि हम अपने आप को उस लहू में डुबोने लगें जो उसने हमें शुद्ध करने के लिए बहाया है, यह निश्चय करते हुए कि वहाँ हमारे सब ऋण क्षमा हुए, और परमेश्वर का क्रोध और बदला ऐसा शान्त हुआ कि हम उसे अनुकूल पाए बिना नहीं रह सकते।

तो भी इसकी भली समझ के लिए, यह भी देखें कि इब्राहीम ने किस रीति से परमेश्वर की प्रतीति की। और हमारे लिए आवश्यक है कि हमारे पास विश्वास शब्द की परिभाषा हो: क्योंकि उसके बिना यह सारी शिक्षा निष्प्रयोजन होगी। मैं तुम्हें पहले बता चुका हूँ कि जब पोपवादी हमसे लड़ते हैं: तो वे न जानते हैं कि क्यों और किसलिए करते हैं, न यह कि वे किस ओर निशाना साध रहे हैं, वरन् टेढ़े-मेढ़े और बिना सोचे-समझे आगे बढ़ते हैं। क्योंकि उन्होंने कभी जाना ही नहीं कि विश्वास का क्या अर्थ है, और यह वे भली भाँति दिखा देते हैं, मेरा मतलब उनके सबसे बड़े आचार्यों से है, क्योंकि वे बस यही कहेंगे कि विश्वास परमेश्वर पर विश्वास करना है: और यदि वे परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, तो दुष्टात्मा भी करते हैं। परन्तु जब सन्त पौलुस यहाँ विश्वास की बात करता है, तो उसका अर्थ यह नहीं कि हमें केवल कोई अनुमान हो कि कोई परमेश्वर है जो स्वर्ग में राज करता है: परन्तु यह कि हम उसे अपना पिता मानें, और उन प्रतिज्ञाओं से जो वह हमें देता है इस बात का पूरा निश्चय करें, और अपने आप को हमारे प्रभु यीशु मसीह से ऐसा जोड़ें कि हमें सन्देह न रहे कि जो कुछ उसका है वह सब हमारा और हमारे लिए ही है, क्योंकि हम उसकी देह के अंग हैं।

परन्तु जब पोपवादी विश्वास की बात करते हैं, तो वे कहते हैं कि वह एक धुँधली वस्तु है, और यह कि वह हमें ऐसा भला मनुष्य नहीं बनाती कि हम उससे उद्धार पा सकें। सो हम देखते हैं कि पोपवादी पशुओं की नाईं काम करते हैं, उन लोगों के समान जिन्हें शैतान ने बिलकुल जड़ कर दिया है। और यह उनके घमण्ड पर परमेश्वर का न्यायोचित दण्ड है, क्योंकि वे अपने आप को दीन करने पर मन नहीं बना सकते, यह मानकर कि हम सब कुछ परमेश्वर के ऋणी हैं, और हम में कुछ नहीं जो उसके हाथ से ग्रहण करने के योग्य हो, वरन् हमें वही केवल अनुग्रह ग्रहण करना पड़ता है जो हमें दिया जाता है। सो तुम देखते हो कि हमें विश्वास शब्द को किस रीति से लेना चाहिए।

परन्तु यहाँ एक बात और है जो उस उद्देश्य के लिए बहुत काम की है: अर्थात् यह जानना कि इब्राहीम ने किस रीति से परमेश्वर की प्रतीति की, और यही निष्कर्ष होगा। यदि इब्राहीम केवल इतना ही मानता कि स्वर्ग में कोई परमेश्वर है: तो यह उसे धर्मी ठहराने के काम न आता, क्योंकि अन्यजाति लोग भी इतना मानते थे। फिर, यदि इब्राहीम यह मानता कि परमेश्वर संसार का न्यायी है: तो यह भी उसके काम न आता। परन्तु जब परमेश्वर ने उससे कहा, "मैं तेरा अत्यन्त बड़ा प्रतिफल हूँ, और मैं तेरा परमेश्वर और तेरे बाद तेरे वंश का परमेश्वर होऊँगा, और इसके अतिरिक्त सब जातियाँ तुझ में आशीष पाएँगी": तो ऐसी प्रतिज्ञाओं को ग्रहण करने से, जिनमें परमेश्वर ने अपने आप को उससे परिचित कराया, और उसके सामने गवाही दी कि वह उसे अपने घराने का मानता है और अपने पुत्र के समान, और उसका पिता हो गया है: इब्राहीम उस प्रतिज्ञा को ग्रहण करने से धर्मी ठहराया गया। और क्यों? क्योंकि जैसे ही परमेश्वर ने उसे अपनी भलाई और अनुग्रह दिया, उसने वचन की प्रतीति की और उसे ग्रहण किया: और तब वह अपने उद्धार के विषय में पूरी तरह निश्चित था।

अब हम कहीं अधिक अच्छी तरह निर्णय कर सकते हैं कि विश्वास से धर्मी ठहराया जाना क्या है: अर्थात् यह परमेश्वर के होने पर विश्वास करने की कोई धुँधली धारणा नहीं, वरन् उसे अपना पिता और उद्धारकर्ता मानना है, और वह इसलिए कि वह अपने वचन से अपने आप को वैसा दिखाता है, और हमारे प्रभु यीशु मसीह में उसकी भली बयाना और अग्रिम राशि भी देता है, ऐसा कि वहाँ वह अपने आप को हम से जुड़ा और एक हुआ दिखाता है, और यह कि यद्यपि हम अभागे प्राणी हैं और हम में सब बुराई के सिवा कुछ नहीं, तो भी वह हमें अपना मानने और अपनी कृपा में ग्रहण करने से नहीं चूकता: इसका कारण यह है कि हमारा प्रभु यीशु मसीह उसके और हमारे बीच मध्यस्थ है।

इसलिए जब हमारे पास वह प्रतिज्ञा है, और हम पूरी तरह उसी पर टिके हैं, और इसमें सन्देह नहीं करते कि परमेश्वर अन्त तक हम पर अनुग्रहकारी है और रहेगा, और इसके साथ उसे पुकारते हैं और केवल उसी की शरण लेते हैं, इस संसार को छोड़ देते हैं, और स्वर्गीय जीवन की आशा में बने रहते हैं: तब हम निश्चित हैं कि हमारे पास विश्वास है, और हम धर्मी ठहरे हैं: और हमारे पिता इब्राहीम के विश्वास करने की रीति यही थी: और इसके बिना, अपने आप को निश्चय दिला लें कि हम में मसीहीपन है ही नहीं। क्योंकि (जैसा सन्त पौलुस रोमियों के दसवें अध्याय में कहता है) जब तक हम नहीं जानते कि सुसमाचार क्या है, हम परमेश्वर को अपना पिता नहीं कह सकते। वह कहता है, हम परमेश्वर को पुकार नहीं सकते जब तक उसे जान न लें, और उस पर विश्वास न करें। और जब तक वह हम पर प्रकट न हो, हम उसे कैसे जान सकते हैं? इसलिए विश्वास को पहले आना ही चाहिए। और विश्वास कहाँ से आता है? सन्त पौलुस कहता है, सुनने से।

तब हमें सुसमाचार में सधाया जाना चाहिए, नहीं तो हम में विश्वास नहीं हो सकता। और इससे हम और भी भली भाँति देखते हैं कि पोप-तन्त्र में जो कुछ विश्वास कहलाता है वह निरी सनक है। और क्यों? क्योंकि वहाँ परमेश्वर का वचन छिपा हुआ है, और जो सबसे बड़ी पशुता हो सकती है वही सबसे बड़ी भक्ति मानी जाती है। जब लोग न जाने क्या बड़बड़ाते हैं, जब वे तीर्थयात्रा पर भटकते हैं और परमेश्वर तक कभी नहीं पहुँचते, जब वे अपने सिर मूर्खतापूर्ण विधियों में खपाते हैं और अच्छी शिक्षा का एक शब्द भी नहीं सुनते: वाह, यही बड़ी भक्ति और पवित्रता है। परन्तु हम देखते हैं कि विश्वास के बिना कोई मसीहीपन नहीं, न सुसमाचार की शिक्षा के बिना विश्वास: और इसलिए हम मसीही नहीं हो सकते, जब तक परमेश्वर हमें यह अनुग्रह न दे कि हम उसकी भलाई और दया का स्वाद चखें, जैसी वह सुसमाचार में प्रतिदिन हमारे सामने रखी जाती है: यह निश्चय करते हुए कि वह हमें अपनी सन्तान की गिनती में ग्रहण करता है, ऐसा कि हम उसे पुकारने का साहस करें, और अन्त तक उसमें बने रहें, कम से कम उन बातों की पूरी पूर्ति की बाट जोहते हुए जो वह अब अपने मुँह से, अर्थात् अपने वचन से, हम पर प्रकट करता है।

परन्तु अब आओ, अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने पापों को मानते हुए गिरें, उससे प्रार्थना करते हुए कि वह हमें उनका अधिकाधिक बोध कराए, और उनका वही बोध हमें सच्चे पश्चाताप के साथ उसकी ओर खींचे, ऐसा कि हम केवल उनकी क्षमा ही न माँगें, वरन् अपने आप को ऐसा सुधारें और बदलें कि जब हम उसके न्याय-सिंहासन के सामने उपस्थित हों तब सचमुच उसकी सन्तान का चिह्न धारण किए हों, और हमारा प्रभु यीशु मसीह भी अपने पिता का स्वरूप हम में ऐसी रीति से सुधारे कि वह हमें अपने अंग मान सके। और इस बीच, आओ, उससे विनती करें कि जब तक वह हमें उनसे पूरी तरह शुद्ध न कर ले, तब तक हमारी निर्बलताओं को सह ले। कि वह यह अनुग्रह केवल हम को ही नहीं, वरन् सब लोगों को भी देने की कृपा करे। इत्यादि।

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