अध्याय 19

सत्रहवाँ उपदेश, जो तीसरे अध्याय पर तीसरा भी है — गलातियों 3:7-9

Sermons upon Galatians · John Calvin

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सत्रहवाँ उपदेश, जो तीसरे अध्याय पर तीसरा भी है — गलातियों 3:7-9

जो तीसरे अध्याय पर तीसरा भी है।

7 सो यह जान लो कि जो विश्वास करनेवाले हैं, वे ही अब्राहम की सन्तान हैं।

8 और पवित्रशास्त्र ने पहले ही से यह जानकर कि परमेश्वर अन्यजातियों को विश्वास से धर्मी ठहराएगा, पहले ही से अब्राहम को यह सुसमाचार सुना दिया, कि "तुझ में सब जातियाँ आशीष पाएँगी।"

9 अतः जो विश्वास करनेवाले हैं, वे विश्वासी अब्राहम के साथ आशीष पाते हैं।

यदि हम वैसे होते जैसे हम समझे जाना चाहते हैं, अर्थात् यदि हम मसीही होते, तो विश्वास से धर्मी ठहराए जाने की इस बोलचाल से हम भली-भाँति परिचित होते। परन्तु उन लोगों में भी, जो सुसमाचार में उन्नति करने का घमण्ड करते हैं, बहुत थोड़े ही मिलेंगे जो जानते हैं कि उस धार्मिकता का क्या अर्थ है जिसकी चर्चा पवित्रशास्त्र इतनी अधिक करता है। चाहे जो हो, या तो हमें इस शिक्षा में निपुण होना होगा, नहीं तो हम अपने उद्धार का कभी कोई निश्चय नहीं पा सकेंगे, और न अपनी आवश्यकता में परमेश्वर के पास जाकर उसे निःसंकोच पुकार सकेंगे। और इसी कारण सन्त पौलुस इस विषय पर इतना बल देता है।

पिछले रविवार को हमने देखा कि अब्राहम धर्मी गिना गया क्योंकि उसने परमेश्वर की प्रतीति की; और मैंने तुम्हें बताया कि इससे हमें यह दिखाया गया है कि कोई मनुष्य अपनी ओर से ऐसी कोई योग्यता नहीं ला सकता जिससे वह परमेश्वर की कृपा जीत सके, वरन् हमें उसे उसके मुफ़्त दान के रूप में ग्रहण करना पड़ता है। क्योंकि प्रतीति करने के शब्द का सम्बन्ध प्रतिज्ञा से है, इस अर्थ में कि परमेश्वर का अब्राहम को अपना आप मुफ़्त में सौंप देना ही इसका कारण था कि अब्राहम धर्मी गिना गया, क्योंकि उसने उस कृपा को जो मुफ़्त दान के रूप में उसे दी गई थी स्वीकार किया, और भली-भाँति निश्चय रखा कि अपनी ओर से उसके पास अधर्म और शाप के सिवाय और कुछ नहीं है। और इसी पर सन्त पौलुस यह निष्कर्ष निकालता है कि जो विश्वास करनेवाले हैं वे अब्राहम की सन्तान हैं। यह निश्चित है कि अब्राहम सब विश्वासियों का और परमेश्वर की सब सन्तानों का पिता है; इसलिए इससे यह निकलता है कि या तो हमें उसके उदाहरण के अनुसार ढलना होगा, नहीं तो जीवन और उद्धार का द्वार हमारे लिए बन्द है, और हम परमेश्वर के राज्य से पूरी तरह निकाल दिए गए हैं। यहाँ सन्त पौलुस हमें मार्ग दिखाता है: क्योंकि हम शरीर के अनुसार अब्राहम से नहीं उत्पन्न हुए, और न हमारा उससे कोई सम्बन्ध है; तौभी हमारे लिए उसके वंश का होना आवश्यक है; और इसका एकमात्र उपाय यह है कि हम उस प्रतिज्ञा के भागी बनें जो उसे दी गई थी, और उसे वैसे ही ग्रहण करें जैसे उसने किया (यहीं तुम देखते हो कि विश्वास करनेवाला होने का क्या अर्थ है); अर्थात् जब हम एक बार जान लें और अनुभव से पा लें कि हम परमेश्वर के हाथ से कोई कृपा अर्जित नहीं कर सकते, और न अपने कर्मों और पुण्यों के कारण स्वीकार किए जा सकते हैं, तब हम अपना सारा भरोसा उसकी भलाई पर रखें, और इस प्रतिज्ञा को अपने ऊपर लागू करें, जो यह है कि वह हमें अपनी सन्तान बनाकर ग्रहण करता है। इस प्रकार तुम देखते हो कि सन्त पौलुस का पाठ पर्याप्त स्पष्ट हो गया। तथापि वह यह भी जोड़ता है कि वह प्रतिज्ञा केवल यहूदियों के लिए नहीं थी, वरन् उसमें सब मनुष्य सामान्य रूप से सम्मिलित हैं। क्योंकि इस जोड़ के बिना, जिस शिक्षा की हमने चर्चा की है वह हमारे किसी काम की न होती। परमेश्वर ने अब्राहम और उसके वंश को चुना: तो क्या हम उद्धार की आशा से बाहर कर दिए गए? क्योंकि उसके चुनने का अर्थ उन सब को छोड़ देना है जिन्हें वह नहीं चुनता: परन्तु उसने अब्राहम के वंश को चुना है, और इस प्रकार ऐसा प्रतीत होता है कि हम सब त्यागे गए हैं। परन्तु जिस प्रतिज्ञा का उल्लेख सन्त पौलुस करता है उसके दो भाग हैं। एक यह कि परमेश्वर अब्राहम के वंश का रक्षक होगा, और उसे संसार के शेष लोगों से अलग कर लेगा। दूसरा यह कि अब्राहम में और उसके वंश में सब जातियाँ आशीष पाएँगी। अब यदि परमेश्वर ने अपनी कलीसिया को केवल अब्राहम के घराने में ही रखा होता, तो आज हम अभागे होते।

परन्तु क्योंकि दूसरे भाग में हम भी उसमें जोड़े गए हैं, और परमेश्वर अपनी उस भलाई और दया को, जो उसने एक विशेष वंश के लिए ठहराई थी, और आगे बढ़ाता है, इसलिए हम उद्धार के भागी होते हैं: और यही वह बात है जिसकी चर्चा सन्त पौलुस यहाँ करता है, जब वह हमें बताता है कि पवित्रशास्त्र ने पहले से यह जानकर कि परमेश्वर केवल यहूदियों को ही नहीं वरन् अन्यजातियों पर भी, जो घराने से लगभग कटे हुए के समान थे, वैसी ही दया करता है, कहा, "सब जातियाँ तुझ में आशीष पाएँगी।" तब यहाँ किसी मुट्ठी भर मनुष्यों की, या किसी विशेष जाति की बात नहीं हो रही: वरन् परमेश्वर बिना किसी अपवाद के उन सब के लिए द्वार खोल देता है जो पहले पूरी तरह निराश हो चुके थे। और इसी पर सन्त पौलुस यह भी निष्कर्ष निकालता है कि जो विश्वास करनेवाले हैं वे विश्वासी अब्राहम के साथ आशीष पाएँगे। मानो वह कहता है कि जब परमेश्वर ने अब्राहम को धर्मी ठहराया, तब उसने न खतने को देखा, और न किसी ऐसी वस्तु को जिसके द्वारा मनुष्यों की राय में कृपा जीती जा सकती हो: वरन् उसे दूसरी ही रीति से ग्रहण किया, अर्थात् एक विश्वास करनेवाले मनुष्य के रूप में। इसलिए परमेश्वर अब्राहम के केवल विश्वास से ही सन्तुष्ट हुआ। और इसी कारण उसकी इच्छा हुई कि उसे सारी कलीसिया का पिता बनाए। जब परमेश्वर ने अब्राहम में उसके विश्वास के सिवाय और किसी बात का लेखा नहीं किया, तो आओ हम यह निष्कर्ष निकालें कि परमेश्वर अब भी हमें उसी प्रकार अपने पास ग्रहण करता है, यदि हमारा विश्वास वैसा ही है जैसा अब्राहम का था, यद्यपि उसी मात्रा में नहीं, और परमेश्वर उसे भला मानकर स्वीकार करता है चाहे हम उसके पीछे दूर ही से चल रहे हों। तब यह आशीष केवल अब्राहम के शारीरिक वंश के लिए ही नहीं, वरन् उनके लिए भी है जो उसके लिए अजनबी थे, यदि उनमें विश्वास का वैसा ही सार और स्वरूप हो।

तथापि, इस शिक्षा से हम लाभ उठाएँ, इसके लिए हम उस बात को स्मरण रखें जिसकी चर्चा मैं पहले कर चुका हूँ, अर्थात् विश्वास करनेवाला होने का क्या अर्थ है: यही कि अपने आप को पूरी रीति से परमेश्वर की केवल दया पर छोड़ देना। परन्तु सन्त पौलुस परस्पर विरोधी वस्तुओं की तुलना करता है, जो आग और पानी के समान एक साथ नहीं रह सकतीं: अर्थात् व्यवस्था पर चलनेवाला होना, और विश्वास करनेवाला होना। तौभी इससे यह नहीं निकलता कि व्यवस्था परमेश्वर की ओर से नहीं है: क्योंकि यदि हम उसे ठुकराएँ, तो वह तिरस्कार किस पर पड़ता है? क्या इससे परमेश्वर का अधिकार नहीं ठुकराया जाता? परन्तु व्यवस्था और विश्वास के इन शब्दों में सन्त पौलुस दोनों में से किसी की शिक्षा को अपने आप में नहीं, वरन् उस उद्धार की आशा को देखता है जो मनुष्य उनसे बाँध सकते हैं। क्योंकि विश्वास की धार्मिकता की गवाही व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं में है, जैसा कि सन्त पौलुस रोमियों के तीसरे अध्याय में कहता है। वे परस्पर विरोधी बातें नहीं हैं: परन्तु उनमें भेद इसमें है कि जो लोग अपने विषय में भ्रम में हैं, और कपट से अन्धे हो गए हैं, वे समझते हैं कि व्यवस्था का पालन करके परमेश्वर की दृष्टि में कृपा मोल ले लेंगे, जो असम्भव है। इसलिए व्यवस्था पर चलनेवाले वे हैं जो व्यवस्था से इस प्रकार लिपटे रहते हैं मानो वे परमेश्वर के हाथ से स्वर्गीय जीवन की मीरास कमा सकते हों। इसके विपरीत, जो दीन हैं, वरन् अपनी ओर से पूरी तरह रिक्त हैं, और मानते हैं कि उनमें अनुग्रह की एक बूँद भी नहीं है: वे विश्वास करनेवाले हैं। क्योंकि वे अपने आप को छोड़ देते हैं, और अपनी धार्मिकता कहीं और ढूँढ़ते हैं। वे कंगालों के समान परमेश्वर के पास आकर अपने आप को उसके सामने रखते हैं, कि वह उन्हें भर दे, जबकि वे पहले पूरी तरह रिक्त थे। इसलिए इसे पाठशाला की एक मुख्य बात जानकर ध्यान में रखो कि विश्वास के बल से हमें अपने सारे आत्म-भरोसे से और अपने पुण्यों के सारे अहंकार से पूरी तरह छूट जाना है, और परमेश्वर की केवल भलाई में अपना सारा शरण-स्थान बनाना है। परन्तु सच तो यह है कि हम बिना किसी साधन के सीधे परमेश्वर के पास नहीं जा सकते: हमारे प्रभु यीशु मसीह को हमारे लिए वहाँ तक मार्ग बनाना पड़ता है: और यह सब विश्वास शब्द के अन्तर्गत आ जाता है। क्योंकि विश्वास मनुष्यों की अपनी गढ़ी हुई कोई कल्पना नहीं है: वह एक निश्चयता है जो हम परमेश्वर की भलाई के विषय में पाते हैं, जब वह हमारे पास आता है और हमारे प्रति अपने प्रेम को हम से आत्मीयता से प्रकट करता है। तब प्रतिज्ञा का पहले आना आवश्यक है, नहीं तो विश्वास का कोई अनुसरण हो ही नहीं सकता। संक्षेप में, जिसे सुसमाचार की शिक्षा नहीं मिली, उसमें कोई विश्वास हो ही नहीं सकता। क्योंकि परमेश्वर को पहले हमें बताना होगा कि वह हम से प्रेम रखता है, नहीं तो हम न उसकी भलाई पर भरोसा रख सकते हैं, और न उसे अपना पिता कहकर पुकार सकते हैं।

अब आओ हम देखें कि यह प्रतिज्ञा क्या है। परमेश्वर केवल यही नहीं कहता कि वह हम पर तरस खाएगा, वरन् हमें यह भी बताता है कि यद्यपि हम अभागे पापी हैं, तौभी वह हमें ग्रहण करने से न रुकेगा, क्योंकि वह हमारे सब पापों को गाड़ देता है, अर्थात् हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा: क्योंकि जहाँ कहीं पापों की क्षमा का उल्लेख होता है, वहाँ उस बलिदान का सामने आना अनिवार्य है। परमेश्वर के हाथ से कभी कोई क्षमा नहीं मिल सकती जब तक उसके साथ प्रायश्चित के लिए लहू बहाया जाना न हो। अतः इस प्रतिज्ञा की नींव, जिसमें परमेश्वर कहता है कि वह हम पर दयालु होगा, मसीह का अपना लहू बहाना है कि हमारे दागों को धो डाले, और अपने आप को पूरा हर्जाना चुकाने के लिए अर्पित करना है कि अपने पिता परमेश्वर के क्रोध को शान्त करे। इस प्रकार तुम देखते हो कि यदि हम विश्वास करनेवाले हैं, तो हमारी आँखें यीशु मसीह पर लगी रहती हैं, और हमारा विश्राम और चैन पूरी तरह उसकी मृत्यु और दुःखभोग में है, जो हमें परमेश्वर से मिलाने का एकमात्र उपाय है।

यह भी ध्यान दें कि आशीष पाना और धर्मी ठहराया जाना एक ही बात है, जैसा कि सन्त पौलुस यहाँ बताता है। जो मसीही कहलाते हैं उनमें से तीस में एक भी मुश्किल से मिलेगा जो "धर्मी ठहराना" शब्द की परिभाषा बता सके। और सचमुच यह बड़ी लज्जा की बात है कि हमारे कान प्रतिदिन सुसमाचार से भरे जाएँ, और तौभी हम अपने विश्वास की मुख्य शिक्षा से अनजान रहें। तब धर्मी ठहराया जाना यह नहीं है कि मनुष्य में अपनी कोई धार्मिकता हो, वरन् यह कि परमेश्वर के हाथ से धर्मी के रूप में स्वीकार किया जाए, चाहे हम वैसे न हों। और यहाँ तुम देखते हो कि मैंने क्यों कहा कि इस शिक्षा का हमें अच्छा आरम्भ मिलता है, क्योंकि सन्त पौलुस "धर्मी ठहराना" शब्द के स्थान पर, जिसका वह पहले प्रयोग कर चुका था, "आशीष देना" शब्द रखता है, रोमियों के चौथे अध्याय के अनुसार, जहाँ वह कहता है कि विश्वास की धार्मिकता यह है कि हमारे पाप क्षमा किए जाते हैं। इसलिए जब परमेश्वर हम पर कृपालु और प्रेमी है, और हमें अपनी सन्तान के रूप में ग्रहण करता है, तो कहा जाता है कि हम उसके सामने धर्मी ठहराए गए हैं। और धर्मी क्यों ठहराए गए? इसलिए कि वह पापियों से तब तक प्रेम नहीं कर सकता जब तक उनके पाप क्षमा करके उन्हें पूरी तरह दूर न कर दे। हम जानते हैं कि क्योंकि परमेश्वर धर्मी है, वह पाप से मेल नहीं खा सकता, वरन् सदा उससे घृणा करता है।

तब जब बात यही है: यदि हम उसकी कृपा चाहते हैं, तो पहले हमारा अपने अपराधों से शुद्ध होना आवश्यक है। क्योंकि जब तक वे गिनती में आते हैं, परमेश्वर को हम से घृणा करनी और हमें शाप देना ही होगा। परन्तु इसके विपरीत जब वह हमारे सब पापों को मिटा देता है, तब वह हमें दया के लिए ग्रहण करता है। और इसी रीति से हम उसकी ओर से आशीष पाने लगते हैं। तो क्या हम आशीष पाए हुए हैं, अर्थात् परमेश्वर के प्रिय हैं? निश्चय ही उसी के साथ हम धर्मी भी ठहराए गए हैं: अर्थात् जहाँ हम में पाप के सिवाय कुछ न था, वहाँ परमेश्वर हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह की धार्मिकता का भागी बनाता है, और उसकी सारी आज्ञाकारिता जो उसने की, हमारे नाम कर दी जाती है। उदाहरण के लिए: यदि मुझ पर किसी धनराशि का ऋण हो, और कोई दूसरा मेरी ओर से उसे चुका दे, तो यद्यपि मैंने अपनी थैली से कुछ नहीं दिया, तौभी मैं छूट गया हूँ। मेरे पास चुकाने को कुछ न था, परन्तु मुझे एक ऐसा मिला जिसने मुझे छुड़ा लिया। ठीक यही हमारे साथ है: जो धार्मिकता से रिक्त हैं, उनके लिए यीशु मसीह जमानती है, और उसने हमारे लिए अपने पिता परमेश्वर को सन्तुष्ट कर दिया है। इसके द्वारा हमारे पाप पूरी तरह मिटा दिए गए हैं, यहाँ तक कि वे परमेश्वर के सामने अब न लेखे में आते हैं, न स्मरण में, और इसलिए हम धर्मी ठहराए गए हैं या आशीष पाए हुए हैं, अर्थात् जबकि परमेश्वर को पहले हमें शापित और दण्ड के योग्य मानना पड़ता, अब वह हमें अपनी सन्तान मानता है।

और इसी में हम पोपवादियों की मूर्खता भी देखते हैं, जो अपने मन में यह मानने को तैयार नहीं कि हम विश्वास से धर्मी ठहरते हैं, क्योंकि (उनके विचार में) विश्वास कुछ अन्य गुणों के समान उत्तम गुण नहीं है। क्योंकि जो मनुष्य परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को थामे रहता है और उन पर विश्राम करता है, वह कुछ अधिक करता हुआ दिखाई नहीं देता। लोग कहेंगे, ठीक है, वह एक अभागा पापी है, और जानता है कि उसे परमेश्वर की भलाई से सहायता की सचमुच आवश्यकता है, और इसी कारण वह उस पर विश्राम करता है। परन्तु जिस मनुष्य का आचरण सुन्दर दिखता है और जिसकी सब जगह बड़ाई होती है, वह अधिक धर्मी गिना जाएगा। उदाहरण के लिए, यदि कोई उदार हो और अपनी सम्पत्ति खुले हाथ से बाँटे, और अपने जीवन के अन्य सब भागों में भी अपने आप को भला दिखाए, तो ऐसा मनुष्य विश्वास करनेवाले से अधिक श्रेष्ठ गिना जाएगा। इसके अतिरिक्त वे सन्त पौलुस के दूसरे स्थान के उस कथन का भी हवाला देते हैं कि प्रेम विश्वास और आशा से बढ़कर है। हाँ, सच है: परन्तु यहाँ प्रश्न यह नहीं कि इनमें से कौन बड़ा, ऊँचा या श्रेष्ठतर गुण है।

जब हम कहते हैं कि हम विश्वास से धर्मी ठहरते हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं कि हमारे विश्वास में कोई योग्यता या पात्रता है, मानो परमेश्वर हमारा ऋणी हो, और इसलिए उसने हमें उसके कारण ग्रहण किया: परन्तु यह कि क्योंकि परमेश्वर ने अपने आप को हम पर दयालु दिखाया है, और हमारा उद्धारकर्ता होने की प्रतिज्ञा की है, इसलिए हम, जो पहले अपने गुणों के सारे भरोसे से रहित किए गए हैं, विश्वास के द्वारा उसके पास आते हैं, भली-भाँति जानते हुए कि यदि वह हमें हमारे अपने आप में देखे, तो उसे हमें शाप देना और हम से घृणा करनी ही होगी। जब विश्वास मनुष्य की ओर से कुछ नहीं लाता, वरन् सब कुछ परमेश्वर की केवल मुफ़्त भलाई से ग्रहण करता है: तो इस प्रश्न की कोई गुंजाइश नहीं कि हम में क्या योग्यता है। और इस प्रकार हम देखते हैं कि विश्वास हमें न केवल हमारे उद्धार की प्राप्ति में सहायता देता है, वरन् हमें सब प्रकार की सिद्धता भी देता है।

अब, सन्त पौलुस ने यह कहने के बाद कि सब अन्यजातियाँ अब्राहम में आशीष पाती हैं, यह जोड़ा कि यह विश्वासी अब्राहम के साथ है। मानो वह कहता है कि हमें परमेश्वर की दृष्टि में कृपा दिलाने का और कोई उपाय नहीं, केवल विश्वास है। इस विषय में और कहीं सहायता ढूँढ़ने की गुंजाइश नहीं। क्योंकि वह भूल अब भी बहुत मोटी है जिसमें पोपवादी उलझे हुए हैं। क्योंकि यद्यपि वे नहीं जानते कि विश्वास का क्या अर्थ है, और न यह कि धर्मी ठहराए जाने का क्या अर्थ है, तौभी वे यह कहने को विवश हैं कि विश्वास उद्धार में सहायक है। तथापि वे यह जोड़ देते हैं कि वह केवल आंशिक रूप से है, और प्रेम तथा अन्य सब गुण उसके साथ मिलकर काम करते हैं, और यदि मनुष्य परमेश्वर से स्वीकार किए जाना चाहें, तो उन्हें उसके हाथ से भली-भाँति पुण्य कमाना होगा, इस प्रकार आज्ञाकारिता और जीवन की पवित्रता के बिना सब कुछ व्यर्थ है। यह सच है कि विश्वास परमेश्वर के भय से अलग नहीं किया जा सकता: परन्तु यहाँ मामला केवल यह जानने का है कि परमेश्वर हमें किस उपाय से अपनी सन्तान के रूप में पहचानता है। परन्तु यदि वह हमारे कर्मों को देखे, तो हम पर हाय। इसलिए उसे हमारे व्यक्तियों को देखने से अपना मुख फेर लेना पड़ता है, और हमें केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह में ग्रहण करना पड़ता है, नहीं तो (हम पर दृष्टि करते हुए) हमारी दुर्दशाओं के सिवाय और कुछ न देखे, कि वह दया के लिए उभारा और प्रेरित हो।

तो तुम देखते हो कि हमें धर्मी ठहराने में परमेश्वर की दोहरी दृष्टि है। एक यह कि वह हमारी दुर्दशाओं को देखता है: क्योंकि जब वह हमें सब प्रकार की गड़बड़ी में इस तरह डूबा हुआ देखता है, तो उसे तरस आता है। फिर, इसलिए कि वह हम पापियों का शत्रु बनकर हमारे विरुद्ध पक्ष न ले, उसे हमारे प्रभु यीशु मसीह पर और उसकी धार्मिकता पर दृष्टि करनी पड़ती है, कि वही हमारे सब अपराधों को दूर कर दे। अब सन्त पौलुस यहाँ कहता है कि हम विश्वासी अब्राहम के साथ ही आशीष पा सकते हैं। मानो वह कहता है कि अब्राहम चाहे कितना ही पवित्र मनुष्य क्यों न था, जब उसने परमेश्वर के सामने धार्मिकता पाई तो अपना कुछ भी साथ न लाया। विश्वास (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) मनुष्य को उस सारी योग्यता से पूरी तरह वंचित कर देता है जो वह अपने में मानता है। जब अब्राहम के पास विश्वास के सिवाय और कोई सहारा न था, तो इससे यह निकलता है कि उसने अपने सब कर्मों को त्याग दिया, जो वास्तव में कुछ भी मूल्य के न थे। जब ऐसा है, तो आओ हम इस मिलावट को छोड़ना सीखें, जो परमेश्वर के सामने भ्रष्टता के सिवाय और कुछ नहीं लाती: और इसी में सन्तुष्ट रहें कि यदि वह हमें विश्वासी पाए, तो हम उसके हाथ से स्वीकार किए जाते हैं। यदि कोई हमें उलझाकर पूछे, कि क्या अब्राहम के गुणों का परमेश्वर की दृष्टि में कोई मूल्य न था? तो उत्तर देना सरल है कि अब्राहम अपने स्वभाव से सब प्रकार के अधर्म के सिवाय और कुछ न रखता था। वह त्यागा हुआ होता, यदि परमेश्वर उसे उस अन्धकूप से न खींच निकालता जिसमें वह धँसा हुआ था, जैसा कि वह स्वयं यहोशू के अन्तिम अध्याय में दिखाता है। वह यहूदियों से कहता है, विचार करो कि मैंने तुम्हारे पिता अब्राहम को कहाँ से लिया। क्या उसके पुरखे मूरतों की सेवा नहीं करते थे? तब मैंने उसे अधोलोक की तह से खींच निकाला। इसलिए अब्राहम के पास घमण्ड करने को कुछ भी न था। क्योंकि यदि परमेश्वर अपने अनुग्रह से उसके आगे-आगे न चलता, तो वह कोई भी भला काम न कर सकता। परन्तु अब, परमेश्वर ने अब्राहम को ऐसे बड़े और उत्कृष्ट गुण दिए कि वह सारी पवित्रता का एक नमूना बन गया: तौभी वे गुण उसे धर्मी ठहराने में समर्थ न थे, क्योंकि उसमें सदा कुछ न कुछ दोष पाया जाता था, कम या अधिक। मनुष्य परमेश्वर की आज्ञा मानने के लिए जितना हो सके अपने आप को खींचे, फिर भी वह सदा लँगड़ाता हुआ ही चलेगा। अब हमारे कर्मों में इतना छोटा दोष या इतना छोटा धब्बा भी नहीं हो सकता जो उन्हें परमेश्वर के सामने मैला और घिनौना बनाने के लिए पर्याप्त न हो। इस प्रकार अब्राहम के सारे गुण, यदि कड़ाई से जाँचे जाते, तो उसे दण्ड के सिवाय और कुछ न दिला सकते। यही बात दाऊद के विषय में और सब अन्य लोगों के विषय में कही जानी चाहिए। इसके अतिरिक्त, जब हम यह जाँचने लगते हैं कि परमेश्वर हम से प्रेम रखता है, और हमें अपनी सन्तान के रूप में पहचानता है: तो यह न सोचना चाहिए कि वह दो-तीन भले कामों के कारण ऐसा करता है, वरन् ऐसी सिद्ध आज्ञाकारिता के कारण जिसमें हम एक मात्रा में भी न चूकें।

परन्तु निश्चय ही, यद्यपि अब्राहम अपने जीवन के एक भाग में कुछ सिद्धता रखता था, तौभी वह उससे धर्मी नहीं ठहर सकता था। क्योंकि वह निरन्तर एक मनुष्य था, अर्थात् एक पापी: और परमेश्वर ने उसे इसीलिए डण्डे की दूरी पर रखा कि उसे दीन करे, जैसा वह अन्य सब विश्वासियों के साथ करता है। तब अब्राहम अपनी ओर से कुछ नहीं ला सकता था, क्योंकि जो भलाई उसमें थी, वह उसने परमेश्वर से और उसकी मुफ़्त भलाई से पाई थी। और इसके अतिरिक्त, वह भी उसे बचाने के लिए अब तक अपर्याप्त थी: क्योंकि स्वभाव से वह पूरी तरह नष्ट और दण्डित था, जैसे आदम की सन्तान के अन्य सब लोग हैं। इसलिए उसके लिए आवश्यक था कि परमेश्वर उसके पापों को क्षमा करके उसे ग्रहण करे, और उसे केवल उसके विश्वास में देखे।

परन्तु आओ हम यह भी ध्यान दें कि परमेश्वर का हमें धर्मी ठहराना विश्वास से है, अर्थात् केवल उसकी अपनी ही भलाई से, और इसलिए हमें उसकी प्रतिज्ञा पर विश्राम करना चाहिए, जिसके बल से वह हमें स्वीकार करता है, हाँ, और हमारे कर्मों को भी: इस कारण से नहीं कि वे हम से उत्पन्न होते हैं, वरन् इसलिए कि हम उन्हें उसके पवित्र आत्मा के अनुग्रह से करते हैं: और इसलिए वह उन्हें ग्रहण करता है और धर्मी मानकर स्वीकार करता है, यहाँ तक कि उनका प्रतिफल भी देता है, जैसा कि सारा पवित्रशास्त्र भरपूर गवाही देता है। और फिर भी यह सब भी विश्वास ही से उत्पन्न होता है। क्योंकि जब हम धर्मी ठहराए जाते हैं, अर्थात् परमेश्वर के सामने धर्मी के रूप में स्वीकार किए जाते हैं : तब हमारे कर्म भी धर्मी ठहराए जाते हैं, अर्थात् परमेश्वर उन्हें उचित मानकर स्वीकार करता है, यद्यपि उनमें कोई योग्यता नहीं, और न कोई ऐसा कारण है कि वह उन्हें ग्रहण करे।

अतः जैसे हम स्वयं परमेश्वर की केवल मुफ़्त भलाई से धर्मी ठहराए जाते हैं, जब हम उसकी प्रतिज्ञाओं को विश्वास से ग्रहण करते हैं: वैसे ही हमारे कर्म भी उसी रीति से धर्मी ठहराए जाते हैं। उसी प्रकार अब्राहम अपने व्यक्तित्व में धर्मी ठहराया गया: और तब उसके कर्म भी परमेश्वर के सामने उसी प्रकार धर्मी ठहराए गए। परन्तु संसार चाहे जैसा चले, यदि तुम सब के मूल कारण और स्रोत पर विचार करो, तो तुम्हें यही निष्कर्ष निकालना होगा कि केवल विश्वास को छोड़ और किसी बात का लेखा नहीं किया गया। क्योंकि यदि परमेश्वर अब्राहम के जीवन को छानना चाहता, तो वह भी अन्य सब मरणशील मनुष्यों के समान दोषी ठहरता। परन्तु उसकी इच्छा उसे अपना बना लेने की थी, और उसे इसके लिए किसी बात ने नहीं समझाया या प्रेरित किया सिवाय उसकी अपनी ही दया के।

और अब्राहम की आँखें उन सब व्यर्थ भरोसों के विरुद्ध बन्द थीं जिनसे मनुष्य अपने आप को धोखा देते हैं: वह जानता था कि उसे जीवन तक पहुँचाने में कोई समर्थ नहीं, केवल परमेश्वर की दया। संक्षेप में, जैसे अब्राहम की दृष्टि केवल परमेश्वर की दया पर थी, वैसे ही परमेश्वर की दृष्टि केवल अब्राहम के विश्वास पर थी: और इसी रीति से वह धर्मी ठहराया गया। इसलिए आओ हम उन सब बातों को छोड़ दें जो मनुष्य विश्वास में यह और वह मिलाकर परमेश्वर के सामने अपने आप को कृपापात्र बनाने के लिए कल्पना करते हैं: क्योंकि वे सब झूठ और शैतान के भ्रम मात्र हैं: और विश्वास की नींव ऐसी हो: अर्थात् हम पूरी दीनता से यह मानें कि हम तब धर्मी हैं जब परमेश्वर हमारे पाप क्षमा करता है, और उसी रीति से हमारे कर्म भी भले और धर्म के गिने जाते हैं, क्योंकि परमेश्वर उन्हें कड़ाई से छानना नहीं चाहता, वरन् अपनी पितृवत् भलाई से उन्हें भला मानकर स्वीकार करता है।

इस प्रकार तुम देखते हो कि हमें इस पाठ से क्या निष्कर्ष निकालना है। अब यह कि अब्राहम की आशीष हमारी है, और हमारे ही लिए ठहराई गई है, यह उससे प्रकट होता है जिसकी चर्चा मैं पहले कर चुका हूँ, और उससे जो सन्त पौलुस दृढ़ता से कहता है कि सब जातियाँ अब्राहम में आशीष पाएँगी। और अब यह देखना शेष है कि सन्त पौलुस दूसरी ओर कौन-सा कारण जोड़ता है। क्योंकि मनुष्य अपनी इच्छा से कभी अपने मन में यह नहीं ला सकते कि अपनी धार्मिकता के विषय में अपनी धारणा को छोड़ दें, जब तक कि उन्हें विवश और बाध्य न किया जाए। क्योंकि यद्यपि हम इतने दोषों में डूबे हैं कि देखने में भी घिनौने हैं: तौभी हमारे स्वभाव का सबसे बुरा और सबसे गहरी जड़वाला दोष घमण्ड या ढिठाई है, जो हठी कल्पना है कि हम में कुछ है: इतना कि यद्यपि परमेश्वर हमें बताए कि हम कुछ भी नहीं हैं, और हम में दुष्टता, मलिनता और अशुद्धता के सिवाय कुछ नहीं, और वह सारी भलाई जिसका हम स्वप्न देखते हैं केवल व्यर्थता और झूठ है: तौभी वह हमें दीन करने में सफल नहीं होता, जब तक हम स्वयं अपनी आवश्यकता को न पहचान लें, और उसे अपने सामने प्रमाणित होते न देख लें। और इसलिए हमें उस कारण को भली-भाँति ध्यान में रखना चाहिए जो सन्त पौलुस यहाँ जोड़ता है, कि हमें शुद्ध विश्वास की ओर खींचे, और उन सब व्यर्थ भरोसों से फेर दे जो हम अपनी योग्यताओं पर रख सकते हैं।

"वह कहता है, जितने लोग व्यवस्था के कामों पर भरोसा रखते हैं, वे सब शापित हैं; क्योंकि लिखा है, जो कोई व्यवस्था की पुस्तक में लिखी हुई सब बातों के करने में स्थिर न रहे, वह शापित है।" जब सन्त पौलुस कहता है कि जितने व्यवस्था पर चलनेवाले हैं वे सब शापित हैं: तो उसका अर्थ यह है कि जब तक मनुष्य अपने ही कर्मों पर टिके और उन्हीं में मग्न रहते हैं, और उस उपाय से परमेश्वर के सामने कृपा पाना समझते हैं: तब तक वे शापित हैं। क्योंकि (जैसा मैं पहले बता चुका हूँ) जैसे वह जो अपने आप को छोड़ देता है, और जो कुछ उसका अपना है उस सब को त्याग देता है, और अपने आप को केवल परमेश्वर की दया पर स्थिर करता है, वह विश्वास करनेवाला है: वैसे ही इसके विपरीत, वह जो समझता है कि कोई ऐसी सेवा ला सकता है जिससे परमेश्वर को अपने से बाँध ले, या अपने पुण्यों से उसे बदला चुकाने की कल्पना करता है, वह व्यवस्था पर चलनेवाला है।

परन्तु सन्त पौलुस कहता है कि ऐसे लोग शापित हैं। और क्यों? वह मूसा का वचन प्रस्तुत करता है: "शापित है वह जो यहाँ लिखी सब बातों को पूरा न करे।" इससे पहले कहा गया था, "शापित है वह जो पराए देवताओं की सेवा करे: शापित है वह जो परमेश्वर की निन्दा करे: शापित है वह जो सब्त के दिन को तोड़े: शापित है वह जो अपने माता-पिता के विरुद्ध हठ करे: शापित है वह जो पराई स्त्री को अशुद्ध करे।" इन सब शापों के सुनाए जाने के बाद, और उनके गम्भीर उच्चारण के बाद, लोगों को आमीन, आमीन कहकर उत्तर देना पड़ता था, मानो कोई वाचा बँधी हो, और परमेश्वर ने अपनी ओर से माँग की हो, यह कहकर: "मैं चाहता हूँ कि तुम इसी रीति से मेरी सेवा करो, हाँ, किसी एक बात में भी चूके बिना, और ऐसी रीति से कि जो कुछ मैं तुम्हें आज्ञा दूँ उस सब में तुम मुझ से टाँके-टाँके तक वचन निभाओ:" और लोग अपनी ओर से उत्तर दें, "आमीन, हाँ प्रभु, हम सब के सब दण्डित होने को तैयार हैं यदि हम तेरी सेवा न करें:" और तब परमेश्वर आकर निष्कर्ष सुनाए, "शापित है वह जो इस पुस्तक में लिखी सब बातों को पूरा न करे," अर्थात् जो किसी एक भी बात में चूके, और लोग फिर उत्तर दें, "ऐसा ही हो।" अब जब व्यवस्था उन सब को शाप देती है जो उसे पूरा-पूरा नहीं करते: तो आओ देखें कि क्या कोई एक ऐसा है जो उसे करता है। यह निश्चित है कि सब मनुष्य, बड़े से लेकर छोटे तक, दोषी हैं। क्योंकि देखो, व्यवस्था का सार विचारें, जो यह है कि हम अपने सारे मन से, अपनी सारी बुद्धि से, अपनी सारी शक्ति से, और अपने सारे बल से परमेश्वर से प्रेम रखें, और अपने पड़ोसी से अपने समान, और तब हम में से हर एक अपने जीवन को जाँचे, और उसे अपने को दोषी ठहराने के लिए अपने सिवाय किसी और न्यायी की आवश्यकता न होगी। क्योंकि यद्यपि हम परमेश्वर से निर्मल और स्वस्थ हृदय से निष्कपट प्रेम रखते भी हों: तौभी ऐसा हो ही नहीं सकता कि हम अनेक व्यर्थताओं से तरह-तरह खिंचे न जाएँ।

हाँ, मान लो कि कोई मनुष्य स्वर्गदूत के समान सिद्ध हो: तौभी वह परमेश्वर से वैसा प्रेम नहीं रख सकता जैसा उसे रखना चाहिए, क्योंकि हमारी सारी बुद्धि का उसके प्रेम में लगना आवश्यक होगा। परन्तु अब देखो, क्या हम आँखें खोलते ही अनेक व्यर्थ दृष्टियाँ नहीं डालते; या जब हम कान खोलते हैं, तो क्या हम बहुत अधिक मूर्खतापूर्ण बातों की ओर नहीं झुक जाते जो परमेश्वर की महिमा की ओर नहीं ले जातीं, या जो पाप से पूरी तरह रहित नहीं, यदि कम से कम दुष्टतापूर्ण न भी हों। परन्तु चाहे जो हो, हमें अपनी बुद्धि को पूरी तरह परमेश्वर को समर्पित करना चाहिए, कि हम किसी ऐसी बात पर विचार न करें जिसमें उसकी महिमा न होती हो। और ऐसा करनेवाला कहाँ मिलेगा? कहीं नहीं, वरन् (जो और बुरा है) इसके अतिरिक्त कि हमारी बुद्धि परमेश्वर के प्रेम से बहुत दूर खींची और भटकाई गई है: हम देखते हैं कि वह प्रतिदिन हमें बुराई की ओर गुदगुदाती है, और हम हाथ भी जैसे ही हिलाते हैं तो वह अनेक निकम्मी बातों में लगाने के लिए होता है। यही बात हमारे पाँवों, हमारी आँखों और हमारे कानों के विषय में कही जानी चाहिए।

फिर, मनुष्य के हृदय में कैसा अन्धकूप है? कितनी टेढ़ी लालसाएँ हैं, जो एक-दूसरे में ऐसी उलझी हुई हैं कि उनमें गड़बड़ी के सिवाय और कुछ नहीं मिलता? इतना कि यिर्मयाह का यह पुकार उठना बहुत ठीक कारण से है: "हाय, मनुष्य का हृदय कैसी भूलभुलैया है, जिसका न अन्त दिखता है न माप, यहाँ तक कि मनुष्य अपने आप को कितनी ही गहराई से थाह और नाप ले, तौभी यह सम्भव नहीं कि वह अपनी बुराई के सौवें भाग को भी जान सके। परमेश्वर के सिवाय कोई उसका न्यायी नहीं हो सकता।" इसलिए आओ हम भली-भाँति ध्यान दें कि यद्यपि परमेश्वर ने हमें अपने पवित्र आत्मा से नया जन्म दिया है, और हम उसकी सेवा और आदर करने के लिए अपनी पूरी शक्ति लगाते हैं: तौभी हम लक्ष्य से बहुत पीछे रह जाते हैं, और अब तक उसी ओर के मार्ग में ही हैं, हाँ, और सदा लँगड़ाते ही चलते हैं।

और इसके अतिरिक्त, हमारी सुस्ती के साथ-साथ हम अनेक गिरावटों और अनेक कठिन धक्कों का सामना करते हैं, हम एक पाँव से लँगड़ाते हैं, और दूसरे से ठोकर खाते हैं, और कई बार लुढ़क-लुढ़क जाते हैं। देखो, हमारा जीवन यही है। इसलिए व्यवस्था के द्वारा हम देखते हैं कि हम सब शापित हैं, हाँ, तब भी जब हम में कोई प्रकट पाप न हो। क्योंकि (जैसा मैं पहले बता चुका हूँ) यदि केवल इतना ही होता कि कोई मनुष्य व्यवस्था के पूरे पालन से अपने आप को छुड़ा नहीं सकता: तो इससे निष्कर्ष यही निकलता कि हम सब व्यवस्था के द्वारा दोषी ठहराए गए हैं, और इसलिए हमारे लिए आवश्यक है कि अपनी धार्मिकता कहीं और ढूँढ़ें, अर्थात् परमेश्वर की केवल दया में।

अब तो हम देखते हैं कि सन्त पौलुस हमें कैसे दिखाता है कि जो कोई अपने पुण्यों पर व्यर्थ भरोसा रखते हैं, वे परमेश्वर के घोर विश्वासघाती हैं, और उसके विरुद्ध युद्ध करते हैं। क्योंकि वह उन्हें मानो बालों से घसीटकर बाहर निकालता है, और उन्हें वह संकट दिखाता है जिसमें वे हैं, और यदि वे उसके पास न आएँ तो यह कैसा हठ है! क्या शैतान ने अवश्य ही उन्हें जड़ नहीं बना दिया?

तब हम देखते हैं कि सन्त पौलुस का आशय यहाँ मनुष्यों को इस ओर प्रेरित करना था कि वे अपनी धार्मिकता और उद्धार को केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह में ढूँढ़ें: क्योंकि उसके बिना दूसरी बात हम पर कभी न घटेगी, क्योंकि हम सदा अपने में कुछ मूल्य समझते रहते हैं, और यह आत्म-आकलन या अहंकार हमें ऐसा अन्धा कर देता है कि हम परमेश्वर की धार्मिकता में उसकी महिमा तब तक नहीं कर सकते जब तक अपने मुँह बन्द रखकर दोषी न ठहराए जाएँ, जैसा कि हम इस पाठ में देखते हैं।

इसके अतिरिक्त, यह भी ध्यान दें कि सन्त पौलुस ने यहाँ ऐसा एक सिद्धान्त लिया है जिस पर पोपवादी अपने मन में सहमत नहीं हो सकते। क्योंकि अन्य बातों के साथ वे कहते हैं, शापित और बहिष्कृत हो वह जो कहे कि परमेश्वर ने हमें हमारे सामर्थ्य से अधिक आज्ञा दी है। वे उन सब को बहिष्कृत और शापित करते हैं जो यह मानते हैं कि व्यवस्था की धार्मिकता मनुष्य के सारे सामर्थ्य से परे है। क्योंकि उन्हें लगता है कि परमेश्वर को हमें किसी असम्भव बात की आज्ञा नहीं देनी चाहिए, और या तो हमारे पास व्यवस्था को पूरा करने के साधन होने चाहिए, नहीं तो व्यवस्था का कोई प्रयोजन ही न रहा। वे ऐसा ही सोचते हैं, और ऐसा ही कहते हैं: परन्तु पवित्र आत्मा इसके सर्वथा विपरीत कहता है: क्योंकि परमेश्वर इसके लिए बाध्य नहीं कि अपने आप को हमारे सामर्थ्य के अनुसार ढाले। हमें यह देखना उचित है कि हमें स्वयं क्या करना चाहिए। ऐसा कौन है जो आगे बढ़कर यह कहने का साहस करे कि उसे अपने सारे मन से परमेश्वर से प्रेम नहीं रखना चाहिए? क्योंकि जब हम उसके हैं, तो क्या यह उचित नहीं कि हम पूरी तरह उसे समर्पित हों? तो तुम देखते हो कि हम उस सिद्ध प्रेम के ऋणी हैं जिसकी वह माँग करता है।

फिर, यदि हम अपने बल की बात करें, तो यह नहीं कहा जा सकता कि हम अपने परमेश्वर के प्रति उस प्रेम के विषय में, जो हम पर उसका ऋण है, अपना कर्तव्य निभाने में समर्थ हैं। उदाहरण के लिए, यदि कोई मनुष्य अपनी सारी सम्पत्ति अय्याशी में उड़ा चुका हो, और अपने लेनदारों को चुकाने के लिए उसके पास कुछ न बचा हो, तो क्या इससे वह अपने ऋणों से छूट जाएगा? यदि कोई कहे, कि यह हमारे अपने दोष से नहीं है: हाँ, निश्चय है। क्योंकि जब हम आदम में भ्रष्ट हो चुके हैं, तो मूल पाप हमें परमेश्वर के सामने पर्याप्त रूप से दोषी और अपराधी ठहराए रखता है, इसलिए यह कहना कोई बहाना नहीं कि मैं निर्बल हूँ, या यों कहें कि पूरी तरह हठीला हूँ, और एक भी भला विचार नहीं सोच सकता, जैसा सन्त पौलुस बताता है। यह सच है कि हम एक भी भला विचार नहीं सोच सकते, और हमारे हृदय हठ और बैर से भरे हैं, यहाँ तक कि हमारी सारी भावनाएँ परमेश्वर की बैरी हैं। पवित्रशास्त्र यही कहता है: परन्तु संसार चाहे जैसा चले, हम अपने कर्तव्य से बँधे रहना नहीं छोड़ते। इसलिए आओ हम ध्यान दें कि व्यवस्था हमें दी गई है, चाहे उसे पूरा करना हमारे लिए असम्भव हो। और यदि ऐसा न होता, तो सन्त पौलुस रोमियों के आठवें अध्याय में यह न कहता कि परमेश्वर ने हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा वह काम किया, जो व्यवस्था के लिए असम्भव था। ऐसा कहकर वह भली-भाँति दिखाता है कि हम वह सब पूरा करने में समर्थ नहीं जिसकी परमेश्वर हमें आज्ञा देता है। क्योंकि यदि हम उसे पूरा कर सकते, तो निश्चय ही उसी से धर्मी ठहरते। क्योंकि कहा गया है कि जितने व्यवस्था को पूरा करते हैं वे उसी से जीवित रहेंगे। यदि कोई ऐसा मिलता जिसने उसे पूरा किया हो, तो वह जीवित रहता। परन्तु सन्त पौलुस आगे वही तर्क लेकर दिखाता है कि व्यवस्था के पालन से धार्मिकता पाने का विचार करना मूर्खता है: क्योंकि कोई मनुष्य उसे वैसा पूरा नहीं कर सकता जैसा अपेक्षित है।

अब, इस पाठ के विषय में, आओ हम समझें कि सन्त पौलुस यह पहले से मानकर चलता है कि कोई मनुष्य व्यवस्था को पूरा करने में समर्थ नहीं, चाहे वह अपने आप को कितना ही खींचे: यहाँ तक कि यद्यपि वह पवित्र आत्मा की अगुवाई में हो, तौभी वह इस पापमय जीवन में कभी उसे पूरा नहीं कर सकेगा, क्योंकि परमेश्वर हमें अपना अनुग्रह नाप-नापकर देता है। यह सच है कि वह हमें ऐसी सिद्धता दे सकता था कि हमारे सारे जीवन में कुछ भी चूक न होती, वरन् उसकी सब आज्ञाओं के साथ हमारा पूरा और स्वर्गदूतों से भी बढ़कर मेल होता। तथापि, यद्यपि वह हमें अपने भय में रखता है, यद्यपि वह हमें बदलता है और हमें नए सिरे से गढ़ता है, यद्यपि वह हमें अपनी इच्छा की आज्ञाकारिता की ओर लगाम से खींचता है: तौभी हम में पूरी सिद्धता नहीं है। और क्यों? क्योंकि वह हमें दीनता की लगाम के नीचे रखना चाहता है, वह चाहता है कि हम अपनी निर्बलता को जानें, और उसके सामने उसके कारण कराहें: और वह चाहता है कि हम स्वयं पर निर्णय दें, और जानें कि हम सदा उसके ऋणी हैं। क्योंकि परमेश्वर इस वर्तमान जीवन में हमें वह सिद्धता नहीं देता जो उसकी सारी व्यवस्था के पूरे पालन के लिए आवश्यक होती: इसलिए जो कुछ वह हमें आज्ञा देता है उसे हम कभी पूरी तरह नहीं कर सकते। और क्योंकि हम उसे पूरा करने में समर्थ नहीं हैं, इसलिए यह दण्डाज्ञा हमारे सिरों पर आ पड़ती है, कि वह शापित है जो सब बातों को पूरा नहीं करता।

हमें उस वचन को भली-भाँति ध्यान में रखना चाहिए: क्योंकि यह नहीं कहा गया, "शापित है वह जो व्यवस्था को ठुकराए, या जो उसकी एक बात भी न माने: वरन्, शापित है वह जो अपने आप को उससे बात-बात में और टाँके-टाँके तक नहीं निभाता," जैसा मैंने पहले कहा। और इसी कारण सन्त याकूब ने भी (मनुष्यों के घमण्ड को गिराने के लिए) कहा कि जो कोई एक ही बात में चूकता है वह सब का दोषी ठहरता है। पहली दृष्टि में हम इसे बहुत कठोर व्यवहार समझेंगे। हम कहते हैं, क्या? क्या परमेश्वर किसी एक ही दोष के करने के कारण उस सारी भलाई को भुला देगा जो मनुष्य ने की है? यह मनुष्यों में क्रूरता गिनी जाएगी। हाँ, परन्तु सन्त याकूब एक कारण जोड़ता है, कहता है: "जिसने हत्या करने को मना किया, उसी ने व्यभिचार करने को भी मना किया: और जिसने चोरी करने को मना किया, उसी ने बाकी सब को भी मना किया।" तब यदि मैं चोरी से बचकर यह समझूँ कि मैंने परमेश्वर को सन्तुष्ट कर दिया, और इसी बीच व्यभिचारी रहूँ: तो क्या मैंने परमेश्वर की महिमा का अपराध नहीं किया? इसलिए हमें ये सब थिगड़े छोड़ देने चाहिए: क्योंकि यदि हम परमेश्वर के पास कोई एक टुकड़ा ले आएँ, और बाकी सब को वैसा ही छोड़ दें, तो यह कैसा व्यवहार होगा? हम देखते हैं कि एक मनुष्य एक दोष में पड़ा है, और दूसरा किसी दूसरे में, और इस प्रकार हर मनुष्य यह कहकर छूट और छुटकारा चाहेगा कि उसने यह या वह किया है, चाहे वह किसी और बात में चूक गया हो। परन्तु परमेश्वर ने अपनी आज्ञाओं को अलग-अलग नहीं बाँटा। उसने एक मनुष्य से यह नहीं कहा, "तू चोरी न करना," और दूसरे से, "तू व्यभिचार न करना": वरन् वह सब मनुष्यों से बिना अपवाद के कहता है, "व्यभिचार से दूर रहो; चोरी से दूर रहो, हत्या से दूर रहो।" इसलिए हमें अपने जीवन को किसी एक आज्ञा से नहीं, वरन् सारी व्यवस्था से एक साथ जाँचना चाहिए।

परन्तु अब आओ देखें कि क्या हम कोई ऐसा मनुष्य पा सकते हैं जो निर्दोष हो। तो तुम देखते हो कि जब तक हम व्यवस्था से जाँचे जाएँगे, तब तक हमारा लज्जित होना अनिवार्य है। क्योंकि यदि अब्राहम, जो मनुष्यों में से चुना जा सकनेवाला सबसे उत्कृष्ट था, उसके द्वारा लेखा देने को विवश किया जाए: तो यह निश्चित है कि वह दण्डित होने से न बचेगा। जब ऐसा है, तो आओ भली-भाँति स्मरण रखें कि अब हमारे लिए तर्क-वितर्क करना उचित नहीं: क्योंकि जब पोपवादी विश्वास की धार्मिकता की बात करते हैं, तो वे परमेश्वर के साथ केवल खिलवाड़ और ठट्ठा करते हैं, मानो वह कोई नन्हा बच्चा हो। आओ हम ऐसी तिरस्कारपूर्ण वृत्ति से अपने आप को बचाए रखें: और जब परमेश्वर यह भयंकर दण्डाज्ञा सुनाता है कि वे सब शापित हैं जो जो कुछ लिखा है उस सब को पूरा नहीं करते, तो आओ हम उससे ऐसा भय खाएँ कि उसकी महिमा के सामने काँप उठें, हाँ, और हम में से हर एक अपना ही न्यायी बने, और स्वेच्छा से अपने आप को दोषी माने, और अपनी अभागी दशा से इस प्रकार दोषी ठहराए जाने पर सब बातों में अपनी पूरी असफलता पर विलाप करे, और तब उस धार्मिकता को गले लगाए जो हमारे प्रभु यीशु मसीह में हमें दी जाती है, और वहीं अपना सारा सन्तोष और विश्राम पाए।

अब आओ हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने दोषों को मानते हुए गिर पड़ें, और उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उन्हें ऐसा अनुभव कराए कि हम सच्चे पश्चाताप के साथ उससे क्षमा ही न माँगें, वरन् उससे यह भी प्रार्थना करें कि वह हमारे जीवन भर हमें थामे रहे, जब तक कि वह हमें यहाँ से उठाकर अपने राज्य में न ले ले, और इसी बीच अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें अधिकाधिक सुधारता रहे, कि हमें इस बात का पक्का प्रमाण मिले कि हम उसकी सन्तानों की गिनती में हैं, इस रीति से भय के साथ अपने आप को चलाते हुए, और अपने आप को पूरी तरह उसे सौंप देने के सिवाय और कुछ न चाहते हुए। और इस प्रकार हम सब कहें, "हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, स्वर्गीय पिता," इत्यादि।

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