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परम माननीय सर विलियम सेसिल के नाम
नाइट, बर्लीघ के बैरन, इंग्लैंड के लॉर्ड हाई ट्रेज़रर, महारानी महोदया के वार्ड्स एवं लिवरीज़ न्यायालयों के स्वामी, परमश्रेष्ठ गार्टर राजसी सम्मान-मण्डल के नाइट, और उनकी महामहिम के अत्यन्त माननीय प्रिवी काउन्सिल के एक सदस्य को, निरन्तर स्वास्थ्य के साथ समृद्धि और सम्मान की वृद्धि की शुभकामना।
आपकी प्रभुता की वह बड़ी भलाई, जो आपने मुझ पर कई बार प्रकट की, मेरी स्मृति में अब भी ताज़ा बनी हुई है और मेरे लिए कुछ कम सान्त्वना का कारण नहीं है; वही मुझे निरन्तर उसके लिए कृतज्ञता का कोई चिह्न दिखाने को प्रेरित करती है। क्योंकि मुझे मानना ही पड़ेगा कि वह भलाई अनेक और भाँति-भाँति के रूपों में प्रकट हुई है, और (यदि आपकी प्रभुता की कृपापूर्ण अनुमति से मैं वैसा कह सकूँ जैसा मैं सोचता हूँ) उसमें मेरे कुशल-क्षेम के लिए एक प्रकार की मित्रवत्, बल्कि पितृवत् चिन्ता भी थी; विशेषकर राजकोष-न्यायालय में चलने वाले मेरे उस लम्बे मुकद्दमे में, जहाँ आपकी न्यायसंगत कृपा ने (मेरा तात्पर्य मुकद्दमे के न्यायसंगत होने के कारण है, मेरी किसी योग्यता के कारण नहीं) मेरे लिए साख और सहायता जुटाकर मेरे मामले को आगे बढ़ाया, और वही मेरे अधिकार की रक्षा और सुरक्षा का आधार बनी, जो अन्यथा मेरे विरोधियों के अत्यधिक बल से पैरों तले रौंद दी जाती। और यहाँ मुझे यह भी स्वीकार करना उचित है कि इतने उलझे हुए मामले में न्यायाधीशों और चान्सलर ने तथा उस न्यायालय के महारानी महोदया के अन्य सब अधिकारियों ने भी कृपा के साथ खरे न्याय का निर्वाह किया। क्योंकि मामले की अनेक सुनवाइयों के बाद, बड़े धीरज और सूझ-बूझ के साथ, और दोनों पक्षों के ऐसे अभिलेख प्रस्तुत किए जाने पर जो मामले को स्पष्ट करने में सहायक ज्ञात या समझे गए थे, अन्त में जब कुछ कठिनाइयों और बीच में आ पड़ी घटनाओं के कारण मामला शीघ्र समाप्त न हो सका, तब आपकी प्रभुता के लॉर्ड हाई ट्रेज़रर के पद पर प्रथम बार आसीन होने के लगभग समय, न्यायालय की सहमति से वह मामला ऐसे व्यक्तियों के पंच-निर्णय में सौंप दिया गया जिनसे दोनों पक्ष भली-भाँति सन्तुष्ट थे। इसके फलस्वरूप, अपनी पिछली निरन्तर चिन्ताओं, परिश्रमों, खर्चों और झंझटों से मुक्त होकर, मुझे अपने इस अभ्यस्त अनुवाद-कार्य को करने की अधिक स्वतंत्रता मिली, जो मुझे एक अनुपम लाभ जान पड़ा। और इन बातों को दोहराने का उद्देश्य, दूसरों के कार्यों को बीच में लाकर, आपकी प्रभुता के प्रति जो धन्यवाद मुझ पर बाकी है उसे घटाना नहीं है, परन्तु यह दिखाना है कि आपकी भलाई के द्वारा मैं कितनों का ऋणी हूँ, और यह कि जहाँ तक अवसर इसकी गवाही देने में सहायक हो, मैं आपके प्रति या उनके प्रति अपने कर्तव्य को भूलना नहीं चाहता।
अब, आपकी प्रभुता के प्रति अपनी इस इच्छा को भली-भाँति पूरा कर सकूँ, इसलिए मैंने बुद्धिमान दार्शनिक सेनेका की उस सम्मति पर विचार किया जो उसने अपनी उपकार-विषयक पुस्तकों में दी है, जिसका सार मुख्यतः इन तीन बातों में है: अर्थात् जो वस्तु पूर्ण कृतज्ञता प्रकट करने के लिए दी या अर्पित की जाए, वह अति उत्तम, अति टिकाऊ और पानेवाले के लिए अति स्वीकार्य होनी चाहिए। इनमें से पहली दो बातें इस कार्य में हैं, जिसे मैं (आपकी प्रभुता की पिछली भलाई और अभ्यस्त कृपा के भरोसे) आपके नाम समर्पित करने का साहस करता हूँ, और तीसरी बात भी इसके साथ रहेगी; इसके लिए मुझे जो कारण समझाते हैं वे ये हैं। जो वस्तुएँ अपने स्वभाव से केवल मनुष्य के कल्याण और लाभ की ओर ले जाती हैं, वे अवश्य ही अति उत्तम होंगी; और भली वस्तुओं में वे सदा सर्वोत्तम हैं जो अधिकांश लोगों के हित में काम आ सकें, और जो एक बार प्राप्त हो जाने पर स्वामी की इच्छा के विरुद्ध छीनी न जा सकें। अब जबकि इस कार्य की नींव पवित्रशास्त्र का एक अंश है, और (जैसा सन्त पौलुस कहता है) सारा पवित्रशास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है और सिखाने, समझाने, सुधारने और धार्मिकता की शिक्षा के लिए लाभदायक है, ताकि मनुष्य सिद्ध बने और हर एक भले काम के लिए तत्पर हो जाए; यहाँ तक कि वह परमेश्वर की सामर्थ्य है जो हर एक विश्वास करनेवाले, क्या यहूदी क्या अन्यजाति, के कल्याण की ओर ले जाती है; और साथ ही उसमें न केवल इस वर्तमान जीवन की, वरन् आनेवाले जीवन की भी प्रतिज्ञाएँ हैं: तो यह अवश्य ही उसी स्वभाव, गुण और प्रभाव का होगा जो शेष पवित्रशास्त्र का है, क्योंकि (जैसा सन्त पतरस कहता है) पवित्रशास्त्र मनुष्य की इच्छा से कभी नहीं आया, परन्तु परमेश्वर के पवित्र लोग पवित्र आत्मा के प्रेरित किए जाने पर बोलते थे। और इसी से इस कार्य की भलाई के प्रमाण में एक और प्रशंसा उत्पन्न होती है, कि इसका रचयिता परमेश्वर है जो स्वयं परम भलाई है, मनुष्य नहीं। संक्षेप में, यही कारण इसके टिकाऊपन को भी सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं। क्योंकि इसके अतिरिक्त कि परमेश्वर स्वयं घोषणा करता है कि उसका वचन सदा बना रहेगा, और यह कि आकाश टल जाएगा परन्तु उसके वचनों में से एक मात्रा भी बिना पूरी हुए नहीं रहेगी; और इसलिए भी कि इस पुस्तक में संसारी, अनिश्चित और नाशमान नहीं, परन्तु स्वर्गीय, निश्चित और अनन्त लाभ हैं; और ऐसी बातें नहीं जो थोड़ों के काम आएँ, परन्तु जो सब के लिए लाभदायक हैं, यदि वे स्वयं दोषी न ठहरें; और फिर यह कि परमेश्वर इसका रचयिता है: इसलिए सब सम्भावना के अनुसार इसे इसी प्रकार की अन्य बातों के साथ अवश्य बना रहना चाहिए, कम से कम भक्तों के बीच, एक-दो दिन के लिए नहीं, वरन् जब तक मनुष्यों को मसीह में उन्नति पाने और दृढ़ किए जाने की आवश्यकता रहेगी।
यह बात और भी स्पष्ट दिखाई देगी यदि इन सामान्य बातों के अतिरिक्त, जो इसमें शेष सारे पवित्रशास्त्र के साथ समान हैं, हम इस कार्य को विशेष रूप से और निकट से स्वयं में देखें, जो दो भागों से बना है, अर्थात् मूल-पाठ और मूल-पाठ की व्याख्या से। गलातियों के नाम इस सारी पत्री के मूल-पाठ का सार यह है: कि जब परमेश्वर ने एक बार मनुष्यों को अपने सुसमाचार के सच्चे ज्ञान से प्रकाशित करने की कृपा की है, तब उन्हें उस सत्य में, जिसे उन्होंने ग्रहण किया है, दृढ़ बने रहना और अपने भक्तिपूर्ण चाल-चलन से दिखाना चाहिए कि वे ज्योति की सन्तान हैं; ऐसा न हो कि वे धर्म-त्यागियों की नाईं या सूअरों की नाईं फिर कीचड़ में लौट जाएँ, और न शिक्षा की हर एक हवा से डगमगाते नरकटों की नाईं, या उन छोटे बच्चों की नाईं इधर-उधर उड़ाए जाएँ जो अपने पास की वस्तुओं से शीघ्र ऊब जाते हैं और जो नई वस्तु देखते हैं उसी पर रीझ जाते हैं। इसी से और अधिक विशिष्ट बातें निकलती हैं: विश्वास के द्वारा सेंत-मेंत धर्मी ठहराए जाने के विषय में, मसीही स्वतंत्रता के विषय में, रीतियों के उठा दिए जाने के विषय में, व्यवस्था के बल और प्रभाव के विषय में, और मसीही जीवन के शुद्ध चाल-चलन के विषय में। क्योंकि पवित्रशास्त्र के लेखक अपने लगभग सब प्रचारों और उपदेशों में जिस क्रम का पालन करते हैं, वह यह है कि पहले हमारे प्रभु यीशु मसीह में विश्वास की नींव डालें, और फिर प्रेम के कामों और जीवन की सच्ची पवित्रता को उस पर रचें, जिसके बिना विश्वास न केवल नंगा है, वरन् मरा हुआ भी है। मूल-पाठ और उसकी विषय-वस्तु के विषय में इतना ही। उसकी व्याख्या मसीह के उस विद्वान् और भक्त सेवक श्री कैल्विन द्वारा उपदेशों में प्रस्तुत की गई है (जिनके अपने कार्य, जो सदा परमेश्वर की कलीसिया के लाभ की ओर लक्षित रहे, उन्हें मेरी किसी भी प्रशंसा से कहीं अधिक प्रतिष्ठा दे सकते हैं); उसमें कोई भिन्न या विरोधी विषय नहीं है, वरन् वही बातें अधिक विस्तृत और सरल रीति से कही गई हैं, जो साधारण समझ के अनुकूल हैं, उनके लिए भी जो सबसे कम समझ रखते हैं; जिसके कारण अधिक लोग उनसे लाभ और हित उठा सकते हैं। इसी कारण वे हमारी आँखों के सामने रखे जाने और हर समय हमारे मन में बैठाए जाने के योग्य हैं, और विशेषकर इन दिनों में, जब देखा जाता है कि बहुतेरे, वरन् खेद की बात यह है कि बहुत अधिक लोग, स्वर्गीय मन्ना के लम्बे समय तक बने रहने से मानो अघा गए हैं, और अपने प्राणों के उस मधुर भोजन से घृणा करने लगे हैं, और फिर मिस्र की माँस की हाँडियों और लहसुन के लिए तरसने लगे हैं। यहाँ तक कि कुछ लोग, केवल सुननेवाले या निठल्ले अंगीकार करनेवाले और सुसमाचार पर वाद-विवाद करनेवाले बने रहना ही पर्याप्त समझकर, अपने अंगीकार के योग्य कोई फल नहीं लाते, और यशायाह भविष्यद्वक्ता के उस वचन को सच ठहराते हैं कि वे अपने होठों से तो परमेश्वर का आदर करते हैं, परन्तु उनका मन उससे दूर रहता है; और अपने आप को केवल विनाश के लिए बोनेवाले प्रकट करते हैं, जैसा सन्त पौलुस इसी पत्री में कहता है। कुछ लोग पोपवाद को, जो सब पाप और दुष्टता का गन्दा नाला है, केवल मानते ही नहीं वरन् उस पर घमण्ड भी करते हैं, और समझते हैं कि वे भली-भाँति सन्तुष्ट हैं कि वे मन और धर्म में परमेश्वर के, और सब भक्ति और भक्त लोगों के शत्रु हो सकते हैं। और कुछ लोग मानो किसी धर्म के ही नहीं हैं, और इसलिए जो कुछ उन्हें भाता है उसे वैध मानकर अपनी अन्धी और बेलगाम लालसाओं के द्वारा हर प्रकार के उच्छृंखलपन में सिर के बल गिरे जाते हैं, और पशुओं की नाईं अपने मन में चाहते हैं कि मन और देह की सारी पवित्रता (जिसके बिना कोई भी परमेश्वर को कभी न देखेगा) ऐसी पूरी तरह मिटा दी जाए कि उसका नाम तक कभी सुनाई न दे; जबकि इसी बीच वे थोड़े से लोग जिन्हें परमेश्वर का भय और स्वर्गीय अमरता की अभिलाषा उन बातों से बचने की अधिक सावधानी की ओर खींचती है जो परमेश्वर की महिमा और उसके सुसमाचार की स्वतंत्र प्रगति में बाधा डाल सकती हैं, या उनके पड़ोसी को रोकें और ठोकर खिलाएँ, कुछ लोगों की दृष्टि में न केवल तुच्छ समझे जाते, वरन् दोषी भी ठहराए जाते हैं: मानो निर्दोष होने का यत्न करना ही कोई दोष हो।
इसलिए, जैसे इसी लेखक के अन्य सब कार्य, वैसे ही यह कार्य भी मसीही राष्ट्र-हित की ओर लक्षित है, क्योंकि यह हमें परमेश्वर और मनुष्य दोनों के प्रति हमारे कर्तव्य का स्मरण दिलाता है, जिसका निरन्तर ध्यान और पालन सब उत्तम व्यवस्था की नींव और सिद्ध सुख का ही सच्चा मार्ग है: इसलिए मुझे सन्देह न रहा कि आपकी प्रभुता इसे और भी अच्छी रीति से स्वीकार करेंगे, जिनकी सारी चिन्ता और परिश्रम निरन्तर इस राज्य के कल्याण में लगा रहता है, खरे धर्म को बनाए रखने और सार्वजनिक शान्ति की रक्षा के द्वारा, हमारी परम कृपालु सम्प्रभु महारानी एलिज़ाबेथ के संरक्षण और नियुक्ति से; जिन्हें परमेश्वर ने हमारे बीच अपनी कलीसिया की माता, समस्त मसीही जगत् की सान्त्वना, और हमारे इंग्लैंड-राष्ट्र का सच्चा स्तम्भ, प्राण और आत्मा ठहराया है: इसलिए मैं उससे विनती करता हूँ कि हम और हमारी सन्तान चिरकाल तक उनके धन्य राज्य का सुख भोगें। इन्हीं बातों की उन्नति के लिए मैंने यहाँ इस समय अपना विश्वासयोग्य परिश्रम अर्पित किया है (और परमेश्वर के अनुग्रह से आगे भी अर्पित करने से न थकूँगा), ताकि डगमगानेवाले सब भलाई में दृढ़ किए जाएँ, निर्बल सामर्थी बनाए जाएँ, अज्ञानी सिखाए जाएँ, असावधान चेताए जाएँ, उत्साही प्रोत्साहित किए जाएँ, आलसी उभारे जाएँ, सुधरनेवाले सुधारे जाएँ, और हठीले और अड़ियल लोग पूरी तरह निरुत्तर छोड़ दिए जाएँ। और इस प्रकार आपकी प्रभुता के चिरकालीन और समृद्ध बने रहने के लिए, और उन सब अन्य कुलीन सलाहकारों और सम्मानित पुरुषों के लिए भी परमेश्वर से प्रार्थना करते हुए, जिनके द्वारा परमेश्वर हमारे बीच अपने सुसमाचार की महिमा को बढ़ाता है, मैं अपने इस परिश्रम को पूरी दीनता के साथ आपकी कृपापूर्ण स्वीकृति के लिए सौंपता हूँ।
क्रिप्पलगेट के बाहर फोरस्ट्रीट में अपने निवास पर लिखा गया, 14 नवम्बर, 1574 को।
आपकी प्रभुता का सदा आज्ञाकारी परम विनम्र सेवक, आर्थर गोल्डिंग।
