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पहले अध्याय पर चौथा उपदेश - गलातियों 1:8-9
8 परन्तु यदि हम, या स्वर्ग से कोई दूत भी उस सुसमाचार को छोड़ जो हमने तुम को सुनाया, कोई और सुसमाचार तुम्हें सुनाए, तो वह श्रापित हो।
9 जैसा हम पहले कह चुके हैं, वैसा ही मैं अब फिर कहता हूँ, कि उस सुसमाचार को छोड़ जो तुम ने ग्रहण किया है, यदि कोई और सुसमाचार सुनाए, तो वह श्रापित हो, इत्यादि।
हम पहले देख चुके हैं कि हमें सुसमाचार की सच्चाई के विषय में निश्चित होना चाहिए, नहीं तो हमारा विश्वास विश्वास नहीं, वरन् एक मत-मात्र है, यदि हम इधर-उधर डगमगाने को तैयार रहते हैं। तो अब अपने विश्वास की सच्ची परख यही है कि हम अपने भीतर पूरी तरह स्थिर और निश्चित हों कि परमेश्वर ने हमें सिखाया है, और उसने अपनी इच्छा हम पर ऐसी प्रकट की है कि यदि हम उससे किसी भी ओर हटें, तो यह वैसा ही है मानो हमने जान-बूझकर अपने आप को नाश कर लिया। और इसी कारण हमें परमेश्वर के वचन को केवल भला और पवित्र जानकर ग्रहण ही नहीं करना है, वरन् उसका ऐसा आदर करना है कि जो कुछ उसके विरुद्ध हो, वरन् जो उससे पूरी तरह मेल न खाता हो, उससे घृणा करें। क्योंकि जब सन्त पौलुस यहाँ किसी और सुसमाचार की बात करता है, तो उसका अर्थ यह है कि यदि लोग उस शुद्ध सरलता पर पर्दा डाल दें जो उन्होंने उससे सीखी थी, तो फिर असत्य और भ्रष्टता के सिवा कुछ नहीं बचता। इसलिए आओ हम परमेश्वर की शिक्षा को ऐसा मूल्यवान समझना सीखें कि हम उसे केवल अपने आप में आदरणीय ही न मानें, वरन् जो कुछ उसके विरुद्ध या उससे असंगत लाया जाए, उसे शैतानी जानकर ठुकरा दें। और सचमुच सन्त पौलुस मनुष्यों की बात करना पर्याप्त नहीं समझता, वरन् स्वर्ग के दूतों तक चढ़ जाता है, और कहता है कि सुसमाचार का जो विश्वास हमें मिला है उसमें रत्ती भर भी फेरबदल करने की अपेक्षा हमें उन्हें भी श्रापित ठहराना चाहिए। वह पहले अपनी चर्चा करता है, और ऐसा इसलिए करता है कि दिखाए कि उसे अपने व्यक्तित्व का कोई ध्यान नहीं, वरन् उसका अभिप्राय केवल यह है कि परमेश्वर का आदर हो, और उसका वचन सारे संसार में बिना किसी विरोध के ग्रहण किया जाए।
इसलिए सन्त पौलुस के लिए यह घोषणा करना आवश्यक था: क्योंकि यदि कोई अपनी शिक्षा को विशेषाधिकार देकर उसे सब से अलग कर ले, तो वह उसे अपना निजी मामला बना देता है। परन्तु जो सिखाता है उसे सब के साथ एक ही पंक्ति में खड़ा होना और अपने आप को आज्ञाकारिता के साथ हमारे प्रभु यीशु मसीह के सुसमाचार के अधीन करना चाहिए, ताकि इस संसार में हमारा कोई और गुरु न हो जिससे हम अपना विश्वास पाएँ, वरन् परमेश्वर के पुत्र को हम पर पूरा प्रभुत्व मिले जैसा उसका अधिकार है। और सन्त पौलुस जान-बूझकर दूतों की चर्चा करता है, क्योंकि जो झूठे प्रेरित और छलिए गलातिया देश में आ गए थे, वे पतरस, यूहन्ना और याकूब के नाम की आड़ लेते थे; इसलिए वह उनके मार्ग में रोक खड़ी करता है, यह कहकर कि जब उनके पक्ष में वह सब कुछ हो जो हो सकता है, वरन् सारा संसार उनका साथ दे, तो भी वह सब कुछ नहीं है। और फिर, यदि स्वर्ग के दूत भी उनके साथ होते, तब भी परमेश्वर अपने वचन से उन पर प्रबल होगा और सारी सृष्टि नीचे गिरा दी जाएगी। क्योंकि यदि कोई भी वस्तु परमेश्वर की सच्चाई के विरुद्ध सिर उठाती है, जिसमें उसका स्वरूप चमकता है और जिसमें उसकी महिमा और प्रताप पहचाना जाना चाहिए, तो वह भी दोषी ठहराई जानी चाहिए और श्रापित मानी जानी चाहिए। पहली दृष्टि में शायद ऐसा लगे कि सन्त पौलुस ने अति की बात कही। क्योंकि वह दूतों को किस प्रयोजन से बीच में लाता है, जबकि हम जानते हैं कि वे पूरी तरह परमेश्वर की इच्छा पूरी करने में लगे रहते हैं? जैसा भजन संहिता के 103वें भजन में स्पष्ट कहा गया है, और जैसा हम सारे पवित्र शास्त्र में देखते हैं, उनका और कोई ध्यान नहीं सिवाय इसके कि सीधे परमेश्वर की आज्ञा मानें। तो जब यह असम्भव है कि दूत शुद्ध सच्चाई को बिगाड़ें, तब सन्त पौलुस को उन्हें बीच में नहीं लाना चाहिए था। वरन् यह भी सोचा जा सकता है कि वह उनके साथ अन्याय और अपमान करता है, क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें यह अनुग्रह दिया है कि वे उसकी आज्ञाकारिता में बने रहें और जैसा उसने ठहराया है वैसा शान्ति से चलें।
परन्तु सन्त पौलुस का ऐसा कहना अकारण नहीं है, क्योंकि शैतान सदा ऐसी बातों को लाने का यत्न करता है जो लोगों को भली लगें, ताकि उनसे शुद्ध शिक्षा को उलट दे। और हम देखते हैं कि परमेश्वर का नाम भी सब समयों में छलियों द्वारा आड़ बनाया गया है, और यद्यपि वे भ्रम और ठट्ठे के सिवा कुछ नहीं लाए, तो भी वे खुले मुँह से घोषणा करते रहे कि हमें परमेश्वर ने भेजा है। इसी कारण भविष्यद्वक्ताओं को उनसे लड़ने में बहुत कठिनाई उठानी पड़ी जो ऐसे आवरण के नीचे संसार को धोखा देने का परिश्रम करते थे, यहाँ तक कि उन्हें परख तक पहुँचना पड़ा कि परमेश्वर उनके मुँह से बोलता है या नहीं। और हम यह भी जानते हैं कि सन्त पतरस कैसे कहता है कि जैसे प्राचीन काल के लोगों में बहुत से छलिए थे जिन्होंने कलीसिया को सताया और सब कुछ उलट-पुलट कर दिया, वैसे ही हमें भी इन दिनों शैतान के चेलों की बाट जोहनी चाहिए जो हमारे बीच जंगली बीज बोने का परिश्रम करेंगे, और कलीसिया को सदा इसी असुविधा के अधीन रहना है, क्योंकि परमेश्वर प्रकट करना और परखना चाहता है कि हम सचमुच उसके हैं या नहीं। क्योंकि कपटी लोग तो तुरन्त झड़ जाते हैं, जब उन्हें बदलने का अवसर मिलता है। वे ऐसे हल्के और चंचल हैं कि उन्हें इधर-उधर भागना ही पड़ता है।
परन्तु परमेश्वर की सन्तान, जिन्होंने सुसमाचार में जीवित और गहरी जड़ पकड़ ली है, कभी न हटेंगी। और इसी कारण परमेश्वर शैतान को भी लगाम ढीली देता है, जो झूठे भविष्यद्वक्ता उठाता है, जैसा व्यवस्थाविवरण के तेरहवें अध्याय में कहा गया है, क्योंकि परमेश्वर अनुभव से जानना चाहता है कि हम उससे प्रेम रखते हैं या नहीं, अर्थात् उसका जो आदर उसे मिलना चाहिए वह हम उसे देते हैं या नहीं, उस पर भरोसा रखकर, वरन् सच्ची और अटल स्थिरता के साथ उस पर भरोसा रखकर। अब जब शैतान ने कलीसिया को इस प्रकार सताया है, और अपनी भ्रान्तियाँ ऐसे बोई हैं कि उसने परमेश्वर के नाम की आड़ ले ली है, तो इस बात को थामे रखने के लिए यह आवश्यक है कि परमेश्वर का वचन अपनी पूरी और सिद्ध अवस्था में बना रहे। क्योंकि जब अन्यजाति अपनी मूरतों को पूजते थे, तब वे सदा परमेश्वर के नाम का दुरुपयोग करते थे, और जो कुछ वे करते थे वह उनके कथनानुसार धर्म था, और (उनकी अपनी समझ में) संसार में अपनी मूर्खतापूर्ण कल्पनाओं के पीछे चलने के सिवा और कोई पवित्रता नहीं थी। परन्तु इसके विपरीत पवित्र शास्त्र हमें बताता है कि उनके सब देवता दुष्टात्माओं के सिवा कुछ न थे। और इन दोनों कथनों में क्या मेल है? हाँ, परन्तु जो काम अन्यजाति के लोग हाथ में लेते थे वह परमेश्वर के नाम को अपवित्र करने और उसे अपनी मूरतों को सौंप देने का एक स्वाँग ही था, इसलिए आवश्यक है कि उस मूर्खतापूर्ण धारणा को काट दिया जाए। और हम आज देखते हैं कि पोप और उसके पादरियों का सारा गन्दा कीचड़ हमें यह जताता है कि वे मसीह के प्रतिनिधि हैं, और कलीसिया का प्रतिनिधित्व करते हैं, और प्रेरितों के उत्तराधिकारी हैं। यह सारा सामान गिरा दिया जाना चाहिए, नहीं तो हम कभी न जान पाएँगे कि हमें किस विश्वास से चिपके रहना है। तो देखो कि सन्त पौलुस यहाँ दूतों का उल्लेख किस रीति से करता है। मानो वह कहता हो कि मनुष्यों का चाहे जो अधिकार दिखाया जाए, वह परमेश्वर या उसके वचन पर किसी प्रकार हानि नहीं पहुँचा सकता। क्योंकि उसके वचन की ही प्रधानता होनी चाहिए, और इस संसार की सब ऊँची और उत्तम वस्तुओं को झुकना और नीचा होना पड़ेगा: और केवल नश्वर प्राणियों को ही नहीं, वरन् दूतों को भी, यहाँ तक कि यदि ऐसा हो सकता (जो असम्भव है) कि कोई दूत परमेश्वर के विरुद्ध खड़ा हो, तो वह घृणित ठहराया जाना चाहिए। और हम यह न सोचें कि इसमें दूतों के साथ अन्याय होता है। क्योंकि उनकी सारी महिमा और प्रतिष्ठा क्या है? यही कि वे अपने सृजनहार की, और हमारे प्रभु यीशु मसीह की सेवा करें, जो उनका भी सिर है और हमारा भी। इसलिए यदि कोई उनके नाम का साहस के साथ उपयोग करे ताकि यीशु मसीह की महिमा हो और उसका सुसमाचार पूर्ण निर्दोषता में अक्षुण्ण बना रहे, तो इसमें दूत सहर्ष झुकने को तैयार हैं, यदि उनका नाम ऐसे काम आए, क्योंकि यही उनकी मुख्य अभिलाषा है।
इस प्रकार तुम देखते हो कि सन्त पौलुस दूतों के नाम का साहस के साथ उपयोग क्यों करता है, यद्यपि उसका यह अर्थ नहीं कि वे कभी परमेश्वर की आज्ञाकारिता से पीछे हट सकते हैं। और वह वही वाक्य फिर दोहराता है, कि जो कोई कोई नया सुसमाचार लाए, वह श्रापित माना जाए। अब सबसे पहले हम यहाँ देखते हैं कि परमेश्वर हमारे हाथों से किस रीति से अपना आदर और सेवा चाहता है: अर्थात् विचित्र रीतियों और विधियों से नहीं जैसा मनुष्य करते आए हैं: वरन् हमारी मुख्य सेवा उसकी सुनना है, और मानो कहें तो अपने आप को लगाम देना, जब वह हमसे बोलता है तब अपनी सब इन्द्रियों को उसके वचन के अधीन बन्दी रखना, जैसा वह स्वयं अपने भविष्यद्वक्ता यिर्मयाह में घोषणा करता है। वह कहता है, "क्या मैंने तेरे पुरखाओं से बलिदान माँगा? नहीं, परन्तु जो मैंने उनसे चाहा, और जो अब भी तुम से चाहता हूँ, उस श्रद्धांजलि के रूप में जो तुम पर मेरा ऋण है, वह यह है कि तुम मेरी बात सुनो।" उस पद में परमेश्वर दिखाता है कि मनुष्य अपनी ही भक्ति उसके पास लाने में, इस आशा से कि उससे उसे प्रसन्न करेंगे, बहुत अधिक परिश्रम कर सकते हैं, परन्तु जब तक हम उसकी वाणी सुनना और उसकी आज्ञा मानना न सीख लें, तब तक सब कुछ मलिनता ही रहेगा। इस बात को भली-भाँति ध्यान में रखो, जो अत्यन्त उल्लेखनीय है, ऐसा न हो कि हम व्यर्थ परिश्रम करें जैसा हम बेचारे पोप-भक्तों को करते देखते हैं। क्योंकि संसार में यह सदा से एक सामान्य रोग रहा है कि मनुष्य यह भली-भाँति जानते हुए कि वे परमेश्वर की सेवा के लिए सृजे गए हैं, अपने आप को सताते और [उसे करने के लिए] बहुत कष्ट उठाते रहे हैं, फिर भी सब व्यर्थ और निष्फल रहा, क्योंकि उन्होंने उस ठीक स्थान से आरम्भ नहीं किया कि अपना जीवन परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलाएँ और अपने आप को पूरी तरह इस पर स्थिर करें कि कोई काम हाथ में न लें सिवाय उसके जिसकी आज्ञा उसने उन्हें दी है।
तो तुम देखते हो कि आज हमारी सेवा परमेश्वर को ग्रहणयोग्य हो, इसका उपाय यह है कि हम उसकी ओर कान लगाएँ, उसके वचन से सिखाए जाने दें, पूरी तरह उसी से शासित हों, और अपना जीवन तथा अपने सब कर्म और विचार पूरी तरह उसी के अनुसार ढालें। और इसी में हम वह उपकार देखते हैं जो परमेश्वर ने हमें अपने सुसमाचार के ज्ञान में बुलाकर किया है। दूसरी ओर, हम देखते हैं (जैसा मैंने पहले कहा) कि बेचारे पोप-भक्त कैसे सवेरे उठते हैं, और इस-उस में लगे रहते हैं, उनकी दौड़-धूप का न कोई अन्त है न विराम: और फिर भी इस बीच न केवल समय खोया जाता है, और उनका परिश्रम व्यर्थ और निष्फल होता है, वरन् वे स्वयं भी परमेश्वर के सम्मुख घृणित ठहरते हैं। तो जब बात ऐसी है, तब आओ हम उस अनुग्रह का मूल्य जानें जो परमेश्वर ने हमें अपनी इच्छा प्रकट करके दिया है, और समझें कि हमें अन्धाधुन्ध नहीं चलना है, वरन् भले और बुरे में भेद करना है, परन्तु अपनी बुद्धि और कल्पना के अनुसार नहीं, वरन् परमेश्वर की पाठशाला में जाकर, और उन बातों को सीखकर जिन्हें वह स्वीकार करता है, यह निश्चय रखते हुए कि कोई वस्तु मूल्यवान गिनी जाने योग्य नहीं सिवाय इसके कि हम अपने आप को उस नियम के अनुसार ढालें जो उसने अपने वचन में हमें दिया है। इसे एक सिद्धान्त जानो। और इसके साथ हम यह भी देखते हैं कि सुसमाचार की महिमा क्या है, और यह कि हमारे लिए उस विषय में मनुष्यों की राय लाकर अपने आप को किसी सन्देह में लपेट लेना उचित नहीं, जैसा आजकल पोप-भक्त करते हैं, जिनके पास हमारे विरुद्ध कलीसिया की परम्पराओं, महासभाओं और प्राचीनता के सिवा कोई ढाल नहीं। तो भी जब वे सारे संसार को इकट्ठा कर लें, तब क्या वह स्वर्ग के दूतों के बराबर तौल सकेगा? निश्चय नहीं।
अब सन्त पौलुस के उदाहरण पर हम उनकी मूर्खता की हँसी उड़ा सकते हैं, और कह सकते हैं कि यदि पोप और उसके दुर्गन्धयुक्त पादरियों की सारी भीड़ के पक्ष में दूत भी होते, तो हमारे प्रभु यीशु मसीह की तुलना में वह कुछ भी न होता, जिसे सर्वोच्च सामर्थ्य प्राप्त है, और जिसके आगे हर एक घुटना झुकना चाहिए, न केवल नश्वर प्राणियों का, वरन् स्वर्ग में ऊँचे स्थानों की वस्तुओं का भी, जैसा फिलिप्पियों की पत्री में कहा गया है, जहाँ यह वचन उसी के व्यक्तित्व पर लागू किया गया है, क्योंकि परमेश्वर शपथ खाता है कि हर एक घुटना उसके आगे झुकेगा, और हर एक जीभ मान लेगी कि केवल वही महिमा के योग्य है।
तो तुम देखते हो कि सुसमाचार की शिक्षा की सिफ़ारिश करने का हमारा मार्ग यह है कि हम मनुष्यों के अधिकार से अविचलित रहें, और (जब हमें बताया जाए कि अमुक व्यक्ति इस मत का है या उस मत का,) यह निश्चय रखें कि जब परमेश्वर ने हमें यह अनुग्रह दिया है कि हम अपने मन में पूरी तरह निश्चित हों, तो हमें सदा उसी से बिना बदले लगे रहना चाहिए। यह सार रूप में वह बात है जो हमें इस वाक्य में विचारनी है: अब इस पर सन्त पौलुस दिखाता है कि अपने प्रचार किए हुए सुसमाचार के विषय में उसका ऐसा कहना अकारण नहीं था। क्योंकि वह कहता है कि वह मनुष्यों की रीति पर नहीं सिखाता, अर्थात् वह मनुष्यों को नहीं ठहराता, न मनुष्यों की रीति पर [उन्हें] सम्मति देता है, वरन् परमेश्वर को ठहराता है, और मनुष्यों को नहीं, यीशु मसीह को प्रसन्न करना चाहता है। फिर वह आगे कहता है कि उसका सुसमाचार मनुष्यों की ओर से नहीं है, वरन् ऊपर से उस पर प्रकट हुआ, जैसा मैं पहले बता चुका हूँ।
सन्त पौलुस के लिए सामान्य रूप से सुसमाचार की चर्चा कर देना पर्याप्त न था, जब तक वह साथ ही यह न दिखाता कि वह उसका सच्चा और विश्वासयोग्य सेवक रहा है। क्योंकि शैतान को इससे कोई आपत्ति नहीं कि सुसमाचार का नाम हमारे बीच बहुत ऊँचा माना जाए: परन्तु इस बीच वह नहीं चाहता कि हम जानें कि इसका अर्थ क्या है, और न यह कि हम अनेक भ्रान्तियों में उलझे रहना और हमारी बुद्धि का इधर-उधर भटकना छोड़ें। इसलिए यह पर्याप्त नहीं कि संसार में सुसमाचार के नाम का आदर हो: वरन् हमें यह भी जानना चाहिए कि सुसमाचार किस प्रकार की वस्तु है, और उसमें क्या समाया है।
और इसी कारण सन्त पौलुस सुसमाचार की शिक्षा में उस विश्वासयोग्यता का दावा करता है, यहाँ तक कि यदि उसका रत्ती भर भी बदला जाए, तो वह श्रापित हो। और यह भी फिर ध्यान देने योग्य है। क्योंकि जब पोप-भक्त इस स्थान को पढ़ते हैं, तो वे इसका उपहास ही करते हैं: और परमेश्वर ने भी उन्हें कुंद कर दिया है, यहाँ तक कि उनमें छोटे बच्चों से भी कम बुद्धि है। क्योंकि वे इसे [इस प्रकार] समझते हैं: कि पौलुस का अर्थ था कि यदि कोई मनुष्य कोई और सुसमाचार रचे, जैसे कोई पुस्तक लिखे, और वह वह सुसमाचार न हो जो उसने लिखा, तो वे उसे पूरी तरह अस्वीकार कर दें, क्योंकि सुसमाचार पहले ही यथेष्ट प्रमाणित हो चुका है। परन्तु इस बीच उन्होंने यह न सोचा कि जो कुछ पौलुस की पत्रियों में है वह सब का सब सुसमाचार ही है: वरन् उन्होंने यह कल्पना की कि उसने सुसमाचार का कोई वृत्तान्त लिखा है, और यदि उसके अस्वीकार किए जाने पर कोई और वृत्तान्त लाया जाता, तो जो इस प्रकार लाया जाता उसका कोई विश्वास या प्रतिष्ठा न होती।
परन्तु हम देखते हैं कि इस विषय में इन अभागे पशुओं में न विवेक है, न समझ, न कोई स्वाद ही। इसलिए हमारे लिए और भी आवश्यक है कि ध्यान दें कि सन्त पौलुस के पास अपने प्रचार किए हुए सुसमाचार की चर्चा करने का पूरा कारण था, मानो उँगली से उस शिक्षा को दिखाने के लिए जिसके विषय में हमें पूरी तरह निश्चित होना चाहिए। क्या हम अपने प्रभु यीशु मसीह के झुण्ड के होना चाहते हैं? तो हमारे लिए यह पर्याप्त नहीं कि जो कुछ हमें उसके नाम से बताया जाए उसे स्वीकार कर लें: वरन् हमें वह बात व्यवहार में लानी है जो यूहन्ना के दसवें अध्याय में कही गई है, अर्थात् उसकी वाणी सुनकर उसकी वाणी को परायों की वाणी से अलग पहचान सकें, और सदा पूरी तरह निश्चित रहें कि उसके सिवा कोई और नहीं जिसके आगे हमें झुकना है।
तो तुम देखते हो कि हमारे भले चरवाहे के मार्गदर्शन में रहने का मार्ग यह है कि जब मनुष्य हम पर आक्रमण करें तब हम न इधर हटें न उधर, वरन् हम में से हर एक अपने आप को घर की ओर खींचने का यत्न करे, ताकि हम डोलते नरकटों के समान न बनें, वरन् जो शिक्षा हमने पाई हो उसमें दृढ़ खड़े रहें। ऐसा करने से हमारा प्रभु यीशु मसीह हमें अपनी भेड़ों की मण्डली और गिनती में से स्वीकार करेगा, और सदा हमारे प्रति चरवाहे का कर्तव्य निभाता रहेगा।
परन्तु यदि हम उन लोगों जैसा व्यवहार करें जिन्हें परवाह नहीं कि कौन सा सिरा आगे जाता है, यहाँ तक कि यदि कोई उन से कहे कि यीशु मसीह ही एकमात्र है जिस पर उद्धार की आशा के लिए हमें भरोसा रखना है, तो ठीक है, उन्हें वह शिक्षा भली लगती है: और इसके विपरीत यदि कोई उनके सामने कूड़ा-करकट रखे, और इस-उस से उनकी बुद्धि को घबराने लगे, [तो वे उसे भी सह लेते हैं] और उनके लिए सब बराबर है: यदि हम में विवेक नहीं, तो यह इस बात का चिह्न है कि हमें विश्वास की कोई निश्चयता नहीं। क्योंकि हमें सब सन्देह से दूर होकर जानना चाहिए कि यीशु मसीह ही एकमात्र गुरु है, क्योंकि यह कार्य परमेश्वर पिता ने उसे सौंपा है, और उसने उसे पूरी तरह निभाया भी है। यदि हम इस स्थिति में नहीं हैं, तो निश्चय है कि हम सदा मत और कल्पना के साथ बह जाएँगे, और हम में कोई विश्वास न होगा।
और इसी कारण सन्त पौलुस घोषित करता है कि जो सुसमाचार उसने सुनाया वही है जिसका प्रचार और प्रकाशन हमारे प्रभु यीशु मसीह ने आज्ञा दी, और जिसका वह अपने पिता परमेश्वर के नाम से रचयिता है। जब यह ऐसा है, तो हमें उसी से लगे रहना चाहिए: और इसलिए जब सन्त पौलुस किसी और सुसमाचार की बात करता है, तो उसका अर्थ वह मिलावट और बिगाड़ है जो उसमें डाला जा सके: मानो वह कहता हो, जो कुछ सुसमाचार की शिक्षा में मनुष्य की युक्ति से जोड़ा या थिगड़ा जाए, ताकि वे उसकी सादगी से सन्तुष्ट न रह सकें, वरन् उससे भिन्न हो जाएँ: वह सब का सब निरा झूठ है। इसलिए हम उससे विष की नाईं बचें, क्योंकि निश्चय कोई विष झूठी शिक्षा जितना घातक नहीं हो सकता।
और यदि मनुष्य स्वभाव से उन वस्तुओं से बचते हैं जो इस क्षणिक जीवन को हानि पहुँचा सकती हैं, तो क्या हमारी आत्माएँ हमारे लिए कहीं अधिक मूल्यवान न होनी चाहिए? हमें कितनी चिन्ता होनी चाहिए कि मनुष्यों के किसी कूड़े-करकट से वे विषैली न हो जाएँ? संक्षेप में, आओ निश्चय जानें कि जैसे ही हमारे प्रभु यीशु मसीह की शुद्ध शिक्षा में कोई बाहरी वस्तु मिलाई जाती है, वह प्रत्यक्ष झूठ है। क्योंकि वह केवल प्रधान माना जाना नहीं चाहता, वरन् उसे बिना किसी साझी के अकेला बने रहना है, और जितने सिखाते हैं उन्हें पहले उसके चेले बनना चाहिए, ताकि जो कलीसिया में बोलता है वह अपनी ओर से कुछ न ठहराए, या जो मनुष्यों के भण्डारों में गढ़ा गया हो, वरन् अपने आप को हमारे प्रभु यीशु मसीह का सच्चा चेला दिखाए, और उसी के अधिकार से हम सब को सिखाए। इसे एक बात जानो।
और दूसरी बात के लिए, हमें जानना चाहिए कि सुसमाचार में क्या समाया है। क्योंकि यदि सुसमाचार शब्द हर एक के मुँह पर तो घूमता रहे, और इस बीच लोग हमें विश्वास दिला दें कि चूना ही पनीर है, जैसा कहावत में कहते हैं: तो यह कैसी बात होगी? सुसमाचार की ऐसी आदरपूर्ण गवाही देने से कि वह परमेश्वर की शुद्ध सच्चाई है जिसके अधीन सारी सृष्टि को होना चाहिए, हमें क्या लाभ होगा? हमारे लिए आवश्यक है कि उसका सार जानें, ताकि हम निश्चित हों कि परमेश्वर का पुत्र यहाँ नीचे इसलिए आया कि हमें अपने पिता परमेश्वर तक पहुँचाए, जिससे हम समझें कि वह हमसे किस रीति से अपनी आराधना चाहता है, और फिर परमेश्वर की इच्छा के भेद में भागी बनें, ताकि अपना सारा जीवन उसी के अनुसार ढालें, और अपनी ही इच्छा और रुचि के अनुसार कोई सेवा न गढ़ें, वरन् उसे वह आज्ञाकारिता दें जो वह सब वस्तुओं से बढ़कर माँगता और स्वीकार करता है।
फिर, हमें [जानना] सीखना चाहिए कि यदि हम अपने उद्धार को अपने ही में खोजना चाहें तो हमारी दशा कितनी दयनीय है। क्योंकि हम में अज्ञानता, निर्बलता, दुर्बलता, वरन् हठ और बुरी अभिलाषाओं के सिवा कुछ नहीं: और संक्षेप में हम शैतान के बन्धनों में जकड़े हैं, ऐसे कि वह हमें भोले पशुओं की नाईं, बिकने वाले गधों और बैलों की नाईं खींचता है: और यदि हम ऐसी भयंकर दासता और अत्याचार से छूटना चाहें, तो परमेश्वर को छोड़ किसी के पास न जाएँ, यह निश्चय रखते हुए कि वही सब कल्याण का सोता है। फिर, क्योंकि हम परमेश्वर के पास नहीं आ सकते जब तक पहले अपने प्रभु यीशु मसीह के पास न आएँ, जो हमारे पास उतर आया है: इसलिए हमें जो कुछ चाहिए वह सब उसकी परिपूर्णता में खोजना और अपना सारा भरोसा वहीं रखना है, और उसके सिवा और कोई तैयारी, धार्मिकता, पवित्रता या सिद्धता न रखनी है, वरन् अपने आप में पूरी तरह रिक्त होना है, और तो भी इस भरोसे से न हटना है कि वह हमें अपने पिता परमेश्वर तक पहुँचाएगा।
हमें यह भी समझना चाहिए कि हम किस उपाय से धर्मी ठहराए जाते हैं, अर्थात् उसकी मृत्यु और दुःखभोग के बलिदान से। इसके अतिरिक्त, जब हम परमेश्वर से प्रार्थना करने आएँ, तो उसी की शरण लें जो हमारा सहायक है, ताकि वह हमारे लिए बोले। तो तुम देखते हो कि सुसमाचार के विषय में हमें जो जानना चाहिए वह यह है कि हमारे जीवन को चलाने की एक ही व्यवस्था है: कि हमारा विश्वास एक ही निश्चित हो, ताकि हम उस परमेश्वर को जानें जिसकी हमें सेवा और आराधना करनी है: कि हम उसे अपने प्रभु यीशु मसीह के व्यक्तित्व में देखें जो उसका सच्चा स्वरूप है: कि यीशु मसीह के सिवा हमारे पास टेकने को और कुछ न हो: और हमारे सब विचार उसी की ओर लगे हों, यह निश्चय रखते हुए कि पिता ने हमारे उद्धार के लिए आवश्यक सब कुछ उसी में रखा है, और यह कि वह अपने पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से हमें ऐसे चलाता और शासित करता है, कि उसकी सुरक्षा में रहते हुए हम निश्चित हों कि शैतान और उसके सब योद्धा हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते, जब हम उसकी सामर्थ्य से यों बचाए रखे जाते हैं।
सुसमाचार का सार यही है, जिसे हमें जानना चाहिए, नहीं तो यहाँ कही गई बातें हमें कुछ भी लाभ न देंगी। फिर, सन्त पौलुस यह दिखाने के लिए कि वह अकारण अपने आप को उन लोगों से बढ़कर नहीं ठहराता जो कुछ मिलावट और जोड़ घुसाकर सुसमाचार की शिक्षा पर पर्दा डालने चले थे, दो तर्क देता है। एक यह कि उसने गलातियों और सब अन्य लोगों को सिखाने में विश्वासयोग्यता और शुद्ध और सीधे मन से व्यवहार किया। दूसरा यह कि उसने अपनी ओर से कुछ नहीं ठहराया, वरन् अपनी बातें स्वर्गीय प्रकाशन से हमारे प्रभु यीशु मसीह से पाईं। अब हमें इन दोनों तर्कों को भली-भाँति ध्यान में रखना चाहिए, ताकि हम समझें कि सन्त पौलुस ने पहले जो घोषित किया कि उसकी यह शिक्षा विश्वास के योग्य होनी चाहिए, और किसी जीवित प्राणी को उसके विरुद्ध लड़ना उचित नहीं, वह अकारण नहीं था। इस पर से हम एक सामान्य नियम निकाल सकते हैं कि हमें अपने विश्वास के विषय में कैसे निश्चित होना चाहिए। क्योंकि दूत दृश्य रीति से हम से बोलने नहीं उतरेंगे, वरन् हमें मनुष्यों के मुखों से सिखाया जाना है। तो भी इस सब के बावजूद (जैसा मैं कह चुका हूँ) हमें इसे अचूक निष्कर्ष मानना चाहिए कि जिस शिक्षा पर हमारा विश्वास टिका और स्थिर है वह हमें परमेश्वर और हमारे प्रभु यीशु मसीह से मिली है। और हम यह कैसे जानेंगे? यहाँ दिए गए इन दो कारणों से। जिनमें एक यह है कि जो हमें सिखाते हैं उनमें हमें परमेश्वर तक पहुँचाने की अभिलाषा और धुन हो, और वे मनुष्यों की पदवी और नाम से अपने को सज्जित न करें, न उनमें मनुष्य का कुछ भी हो, वरन् उस पदचिह्न पर चलें जिस पर चलने की आज्ञा परमेश्वर ने अपने सब लोगों को दी है, अर्थात् यह कि वे संसार को उसकी आज्ञाकारिता में जीत लाएँ। यह एक बात हुई।
दूसरे, उनके उत्तम उत्साह के अतिरिक्त उनमें [शिक्षा की] निश्चयता भी होनी चाहिए, ताकि जो बोलता है वह अपने ऊपर कुछ न ले, न अपनी सीमा लाँघे, वरन् जो आज्ञा उसे मिली है वह हाथों-हाथ सौंपे, ऐसी रीति से कि यीशु मसीह सदा सुना जाए, और उसे बोलने दिया जाए, और बाकी सब मुँह बन्द हों, सिवाय सुनने के रूप में, ताकि उसकी शिक्षा हम पर प्रकट हो। अब पहली बात के विषय में, जहाँ सन्त पौलुस अपने उत्तम मन की घोषणा करता है: वह कहता है कि वह मनुष्यों के अनुसार नहीं, परन्तु परमेश्वर के अनुसार सम्मति [या मनाता] देता है। और इससे उसका अर्थ यह है कि वह संसारी भावना से काम करने नहीं गया, वरन् सीधे परमेश्वर के प्रति अपने आप को लगाने का परिश्रम किया, क्योंकि उसे उसी ने बुलाया था: और यह भी कि उसने यीशु मसीह को अपना गुरु ठहराया था, ऐसे कि उसने उसके सिवा कुछ आगे न रखा, न मनुष्यों की कोई ओट ली, जैसे वे लेते हैं जो भोले और अनजान लोगों को अपनी ओर लुभाना चाहते हैं, जो यहाँ-वहाँ साख खोजते फिरते हैं, कहते हैं: अजी, अमुक मनुष्य ऐसा कहता है। परन्तु केवल परमेश्वर की ही सुननी चाहिए। क्योंकि यदि सब मनुष्य एक मन होकर हमें उससे फेरना चाहें: तो निश्चय वही अकेला दस लाख संसारों के बराबर भारी पड़ना चाहिए, यदि इतने हों भी। तो जब बात ऐसी है, तब आओ हम उस शिक्षा को भली-भाँति ध्यान में रखें जो यहाँ दी गई है, जहाँ सन्त पौलुस अपनी भावना बताता है, जो हमें एक सामान्य नियम देने के काम आती है: जिसके अनुसार वह तुरन्त आगे जोड़ता है कि उसने मनुष्यों को प्रसन्न करने का परिश्रम नहीं किया। क्योंकि जैसे ही लोग मनुष्यों की अभिलाषा के अनुसार बोलते हैं, परमेश्वर की सच्चाई का बिगड़ना अनिवार्य है। और वह यह भी जोड़ता है कि यदि वह मनुष्यों को प्रसन्न करता, तो वह मसीह का दास न होता। परन्तु शैतान के पास परमेश्वर की सच्चाई को धुँधला करने के बहुत से उपाय और चालें हैं, ऐसी रीति से कि हमें लग सकता है कि हम अब भी परमेश्वर के साथ हैं, और इस बीच हम उससे बहुत दूर होंगे, जब तक हम में वह बुद्धि और विवेक न हो जो हमें यहाँ दिया गया है। इसलिए हम में परमेश्वर को मनुष्यों से अलग पहचानने की कुशलता हो, ताकि जब हम बहुत सी विरोधी बातें, मतों की बड़ी विविधता, और बहुत से टकराव और वाद-विवाद देखें, तब हम न घबराएँ न चकराएँ। इन सब बातों में से कोई हमारा विश्वास न बदलवाए। और क्यों? बस यही देखें कि क्या हम परमेश्वर में निश्चित हो सकते हैं: यदि यह एक बार हमें मिल जाए, तो हम साहस से सारे संसार को तुच्छ जानें। परन्तु यदि हम अपने विश्वास में भली-भाँति स्थिर नहीं हैं: तो निश्चय है कि हवा का हर झोंका उसे गिरा देगा, या कम से कम उसे इधर-उधर डगमगा देगा। इसलिए हम ऐसा स्वाद पाएँ कि जान सकें कि परमेश्वर ने सचमुच हम पर तरस खाया है, कि हमें अपनी इच्छा दिखाए: और हम भली-भाँति देखें कि जो हमें सिखाते हैं वे किस मन से चलाए और शासित किए जाते हैं, और [ध्यान दें] कि क्या वे अपनी ओर से परमेश्वर की आज्ञा मानना चाहते हैं, और अपने उदाहरण से हमें भी उसी मार्ग पर ले चलना चाहते हैं। फिर, जब सन्त पौलुस कहता है कि यदि वह मनुष्यों को प्रसन्न करता तो वह यीशु मसीह का दास न होता: यह शिक्षा बहुत कुछ समेटे है। क्योंकि हम भली-भाँति जानते हैं कि मनुष्य अपने स्वभाव से कैसे हैं, कि उनमें परमेश्वर के विरुद्ध अधर्म और हठ के सिवा कुछ नहीं। तो यदि हम उन्हें प्रसन्न करना चाहें: तो हमें परमेश्वर को छोड़ देना और उससे कुछ वास्ता न रखना पड़ेगा। क्योंकि मनुष्य सदा पीछे ही हटते हैं यदि उन्हें परमेश्वर के पास आने को विवश न किया जाए, और वे जंगली पशुओं की नाईं उसके विरुद्ध लात मारते हैं। इसलिए हम उन्हें परमेश्वर से भटकाकर ही, और उन्हें लगाम ढीली देकर ही प्रसन्न कर सकते हैं जो इधर-उधर कूदते फिरते हैं: वरन् भले मनुष्य भी कभी-कभी चाह सकते हैं कि परमेश्वर उनकी अभिलाषाओं के अनुसार चले। क्योंकि यद्यपि उनका मन अब भी उसकी सेवा करने का हो: तो भी वे सब समयों में और सब बातों में इतने अनुशासित नहीं होते कि अपनी सब राय, रुचियाँ और अभिलाषाएँ त्याग चुके हों, वरन् कभी-कभी उनमें से हर एक को कोई न कोई काम करने का प्रलोभन होता है, ऐसा कि यदि हमें थामकर न रखा जाए और तुरन्त पीछे न हटाया जाए, तो हम अपने विनाश की ओर दौड़ पड़ें। संक्षेप में, हम में से कोई नहीं जो प्रसन्न किया जाना न चाहता हो, ऐसे कि जिन पर कलीसिया को बनाने और सिखाने का भार है, यदि वे मनुष्यों को प्रसन्न करना चाहें: तो उन्हें हमारे प्रभु यीशु मसीह का इनकार करना पड़ेगा। और इससे परमेश्वर के वचन के सब सेवकों को यह सिखाया जाता है कि जब वे अपना कर्तव्य विश्वासयोग्यता से निभाना चाहें तब अपनी आँखें बन्द कर लें, ताकि वे मनुष्यों की उन अनियन्त्रित अभिलाषाओं की ओर, जो वे देखते हैं, न ताकें, वरन् उनकी प्रसन्नता और कृपा की सब चाह एक ओर रख दें। और यदि वे उन्हें परमेश्वर तक ले जाना चाहें जो नहीं तो हठीले मन के रहते, तो चाहे जो हो जाए वे ऐसा करें कि परमेश्वर को उसका अधिकार मिले, और हमारे प्रभु यीशु मसीह को उसका अधिकार मिले। क्योंकि (जैसा मैं कह चुका हूँ) जब हम उसके नाम से बोलते हैं, तब क्या करना है? हमें केवल सामान्य रूप से अपने स्वभाव की सब बातों को दोषी ठहराना ही नहीं, वरन् मनुष्यों के विवेकों को ऐसा छानना भी है कि उनमें से हर एक अनुभव करे कि परमेश्वर वहाँ अपना अधिकार चला रहा है, और यह कि सुसमाचार केवल चुभाने वाला नश्तर ही नहीं, वरन् ऐसी तलवार भी है जो अस्थि-मज्जा तक छेदती है
जैसा प्रेरित इब्रानियों की पत्री में कहता है।* तब कोई विचार या भावना ऐसी न रहे जिसे सुसमाचार न खोजे। निश्चय यह अनिवार्य है कि जो इस प्रकार घायल होते हैं वे कराहें और उन्हें कुछ पीड़ा और हृदय-दंश हो। तो भी हमें इस सब पर आँखें मूँद लेनी हैं, और यह न देखना है कि मनुष्य क्या चाहते या लालसा करते हैं, वरन् सीधे आगे बढ़ते जाना है। फिर, यह चेतावनी केवल परमेश्वर के वचन के सेवकों के लिए ही नहीं, वरन् सब मनुष्यों के लिए सामान्य है। इसलिए यदि हम मसीही होना चाहें, तो परमेश्वर के पुत्र का इतना आदर करना सीखें कि यद्यपि उसका वचन हमें बहुत रुचिकर न लगे, और हमारी स्वाभाविक बुद्धि के अनुसार हमें उसमें अनुग्रह न दिखे: तो भी हम उसे आज्ञाकारिता से ग्रहण करना न छोड़ें। और इसलिए जब कोई मनुष्य उपदेश सुनने आए, तो पहले-पहल वह यह हिसाब लगा ले कि उसे जैसा उचित है वैसी डाँट मिलेगी, और समझे कि यह उसके लाभ के लिए है कि उसे सहलाया नहीं जाता। और यदि उसके कान खुजलाने वाले हैं, तो उन्हें अपने से दूर कर दे, यह निश्चय रखकर कि नहीं तो वह बन्द कर दिया गया है, ऐसे कि वह उस शिक्षा को कभी अपने लाभ और सुधार के लिए ग्रहण न करेगा। इसलिए हम सब अपने घावों को रगड़े जाने दें, और अपने आप को दोषी ठहराए जाने दें, और अपनी रुचि से बिलकुल उलटा व्यवहार पाने दें। तो देखो कि यदि हम परमेश्वर के पुत्र के चेले होना और उसे वह प्रभुता देना चाहें जो उसका अधिकार है, तो हम में से हर एक को कैसे तैयार होना चाहिए। और हमें यह यत्न और भी अधिक करना चाहिए, क्योंकि हम देखते हैं कि हमारा स्वभाव हमें उलटी ओर धकेलता है। क्योंकि हम आत्म-प्रेम से अन्धे हैं, और हम में से हर एक आदर पाना चाहता है: परन्तु आदर हम पा नहीं सकते, सिवाय चापलूसी और झूठ के। क्योंकि हम में कौन है जो सराहे जाने के योग्य है? परमेश्वर के सम्मुख हम में मलिनता और संक्रमण के सिवा कुछ नहीं। क्योंकि जितने भले गुण हमारे पास बाहरी दिखावे के लिए हैं, वे सब तब तक भ्रष्टता ही हैं जब तक परमेश्वर हमें सुधार न दे।
इसलिए निश्चय है कि जो कुछ हमारे पास हमारे स्वभाव से है वह सब शुद्ध किया जाना चाहिए, नहीं तो हम अपनी ही दुर्दशा में सड़ जाएँगे। और इसलिए, क्योंकि हमें उद्धार की ओर खींचने का और कोई उपाय नहीं सिवाय हमें हमारे सब दोषों से शुद्ध करने के, और वह शुद्धि बलपूर्वक ही हो सकती है: जब सुसमाचार की शिक्षा से हमें चेताया जाए, कि हमारे अपने विवेक हमें डाँटें, तो यद्यपि हमें कभी-कभी चापलूसी और सहलाया जाना भला लगता है, तो भी हम चाहें कि हम से गम्भीरता से बात की जाए, और हमारे दोष हमें बताए जाएँ, और हम उनसे लज्जित किए जाएँ, और हमारी निर्लज्जता खोली जाए, और प्रसन्न किए जाने की चाह न करें: क्योंकि यदि हम उसे यों छिपाए रखें तो यही हमें अपनी ही दुष्टता में सड़ाने का निकटतम मार्ग होगा: और यदि हमें मनुष्यों से ऐसी चापलूसी मिले, और इस बीच स्वर्गीय न्यायी हम पर गरज पड़े, तो उसका मूल्य हमें बहुत महँगा चुकाना पड़ेगा। तो देखो कि जो कुछ सन्त पौलुस यहाँ कहता है उससे हम में से हर एक को कैसे लाभ उठाना चाहिए, अर्थात् यह कि यदि प्रचारक मनुष्यों को खुश और प्रसन्न करें, तो ऐसा करने में वे परमेश्वर का इनकार करते हैं: और यदि वे उसका इनकार करें, तो शेष लोगों का क्या होगा? वे कहाँ ले जाए जाएँगे सिवाय शैतान के पास? इसलिए जब कोई मनुष्य उपदेश सुनने आए, तो वह भली-भाँति मन में रखे कि जो प्रचार करता है वह अपने अधिकार से नहीं, वरन् हमारे प्रभु यीशु मसीह की ओर से बोलता है, जिसे उसके पिता परमेश्वर ने हमारा न्यायी ठहराया है। और यीशु मसीह हमारा न्यायी किस लिए है? इसलिए कि हम में से हर एक अपने आप को दोषी ठहराए, और यों दण्ड-आज्ञा पारित करके हम छुटकारा पाने को उसकी शरण में आएँ। तो अब यदि कोई नश्वर मनुष्य मुझ पर अपने प्रेम के कारण मेरे पापों को ढाँपे: तो क्या स्वर्गीय न्यायी इसलिए मुझे छोड़ देगा कि वह मुझे छोड़ता है? क्या यह अच्छा न होगा कि जिस पर मुझे सिखाने का भार है वह मुझे दोषी ठहराए, और मेरे दोष मुझे दिखाए, ताकि मैं उनके लिए खेदित हूँ, और उस वस्तु से घृणा करना सीखूँ जो मुझे विनाश तक पहुँचाती? क्या मुझे वह प्रस्ताव न लेना चाहिए, जब तक परमेश्वर मुझे ग्रहण करने को अपनी बाँहें फैलाए है, और जब तक यीशु मसीह मेरे सामने आकर मुझे परमेश्वर पिता के सम्मुख सुखदायक सुगन्ध का ग्रहणयोग्य बलिदान करके चढ़ाता है? और इसलिए क्या यह अनिवार्य नहीं कि हम पागल और शैतान से मोहित के बराबर हैं, यदि हम अपने घावों का रगड़ा जाना और उघाड़ा जाना न सह सकें, जिससे हम उस तक पहुँचाए जाएँ जो हमारे कल्याण के लिए है? यदि कोई रोगी को प्रसन्न करे, तो उसका क्या होगा? क्या वह उसे घड़ी-घड़ी पानी पिलाता रहेगा? क्या वह उसे जहाँ पानी देना चाहिए वहाँ दाखमधु देगा? क्या वह उसे सलाद खिलाएगा? यह तो उसे विष देने का निकटतम मार्ग होगा। संक्षेप में, निश्चय है कि मनुष्य सदा अपनी ही मृत्यु चाहता है जब वह चाहता है कि लोग उसे सहलाएँ। परन्तु अब कौन सा उत्तम है, यह कि जिसे रोगी की देखभाल सौंपी गई है वह उसकी सब अभिलाषाओं के आगे झुक जाए, या यह कि वह उसे लगाम दे, चाहे वह चिढ़े और दाँत पीसे, और इसलिए बिगड़े कि उसे अपनी अभिलाषाओं में अपनी इच्छा नहीं मिलती?
परन्तु निश्चय है कि यदि रोगियों में अनुचित अभिलाषाएँ हैं, तो हम में कहीं अधिक अनुचित अभिलाषाएँ हैं। तो हमारा क्या होता, यदि जिन पर परमेश्वर के वचन को दूर-दूर तक ले जाने का भार है, और जिन्हें वैद्य का काम करना चाहिए, उन्हें हमें उन बातों से रोके रखने की चिन्ता न होती जिन्हें वे जानते हैं कि हमारे लिए हानिकारक हैं, और हमें वे बातें न देते जिन्हें वे जानते हैं कि हमारे कल्याण की हैं? क्योंकि निश्चय यदि वे हमारी भावनाओं को सहलाएँ, तो यही हमें बिलकुल गिरा देने का मार्ग होगा। सार रूप में यही बात है जो हमें विचारनी है, जब सन्त पौलुस अपनी भावना की बात करता है। अब वह दूसरा तर्क जोड़ता है: अर्थात् यह कि उसका सुसमाचार उसे मनुष्यों से नहीं, वरन् स्वर्ग से प्रकाशन के द्वारा मिला। वह अपनी बात को और पक्का करता है, यह कहकर कि न पतरस और न यूहन्ना अपने व्यक्तित्व में ऐसा कोई आदर पा सकते हैं कि मनुष्य उनकी बात उन्हीं के कारण सुनने को बाध्य हों, क्योंकि यह केवल परमेश्वर और हमारे प्रभु यीशु मसीह के लिए सुरक्षित है, और उनका कोई साझी नहीं हो सकता। तो जब बात ऐसी है, तब आओ सीखें कि जब हमारे विश्वास की निश्चयता का प्रश्न हो, तो ऊपर देखें, और इस संसार की सब वस्तुओं के ऊपर चढ़ जाएँ, और मनुष्यों को पूरी तरह छोड़ दें। और चाहे वे कितने ही उत्कृष्ट हों, तो भी हमारा विश्वास यहाँ नीचे न टिके, न किसी सृष्टि पर, वरन् परमेश्वर पर आधारित हो।
पोप-भक्त कहेंगे कि हम अभिमान और घमण्ड से भरे हैं, क्योंकि हम सारे संसार से बढ़कर बुद्धिमान बनना चाहते हैं। निश्चय यदि हम अपनी ही बुद्धि और सोच, या अपने ही मत पर टिकते, तो यह बहुत बड़ा अभिमान होता। परन्तु क्योंकि हम दीनता से चलते हैं, अपनी सब बुद्धि और ज्ञान से सिकुड़ते हैं, और मानते हैं कि यदि हमें परमेश्वर की बुद्धि पानी है तो इस संसार में मूर्ख बनना ही पड़ेगा: जब (मैं कहता हूँ) हम में ऐसी नम्रता और संयम है, और जो जानना हमारे लिए उचित है उससे अधिक जानने का यत्न नहीं करते, पर इस बीच परमेश्वर की शिक्षा को ऐसा बड़ा मानते हैं कि संसार की हर वस्तु को चुनौती दे सकते हैं: तो वह ऊँचाई अच्छी ही होगी, क्योंकि यही वह बात है जिसमें परमेश्वर की महिमा होगी। इसलिए हम संसार के क्रूसों, टोपों और चमक-दमक को, और पोप के सब सींगों को, जिनसे वह परमेश्वर के विरुद्ध अपने को ऊँचा करता है, चुनौती दे सकते हैं: मैं कहता हूँ हम उन्हें चुनौती दे सकते हैं, वरन् उन्हें मलिनता और संक्रमण से भरी वस्तुएँ जानकर घृणा कर सकते हैं, जिनके द्वारा हमारा प्राणघातक शत्रु शैतान हमें विष देना चाहता है। और इसके साथ हम परमेश्वर की सच्चाई पर ऐसे स्थिर हों कि उसके विरुद्ध जो कुछ हो उस पर जयवन्त हों, यह निश्चय रखते हुए कि हमारे विश्वास को हर उस वस्तु पर प्रबल होना है जो उसे गिराने और पटकने को उसके विरुद्ध खड़ी होती है : जिसे करने के लिए शैतान हमें यथासम्भव सताना कभी नहीं भूलता। परन्तु यदि हम अपने परमेश्वर में एक बार दृढ़ हो जाएँ, तो हम न डरें कि उसके सब प्रलोभनों से हम हार जाएँगे: क्योंकि हम निश्चित हैं कि जब तक परमेश्वर हमारी ओर है, हम सृष्टि की ओर से जो कुछ आए उसे धुएँ से अधिक कुछ न समझें।
अब आओ हम अपने भले परमेश्वर के प्रताप के सम्मुख अपने दोषों को मानकर गिरें, और उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उन्हें और अधिक अनुभव कराए, जब तक हम उनसे पूरी तरह छूट न जाएँ, और जब तक इस संसार में हमें जीना है, वह हमारी निर्बलता में हमें सँभाले रखे, जब तक वह उसका उपाय न कर दे, और हम उसकी धार्मिकता की सिद्धता के अनुसार, जिसके लिए वह हमें बुलाता है, पूरी तरह सुधर न जाएँ। और इसलिए हम सब कहें, हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, हमारे स्वर्गीय पिता, इत्यादि।
