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पच्चीसवाँ उपदेश, जो चौथे अध्याय पर दूसरा भी है — गलातियों 4:4-7
जो चौथे अध्याय पर दूसरा भी है।
4 परन्तु जब समय पूरा हो गया, तो परमेश्वर ने अपने पुत्र को भेजा, जो स्त्री से जन्मा और व्यवस्था के अधीन उत्पन्न हुआ।
5 ताकि व्यवस्था के अधीनों को छुड़ा ले, और हम लेपालक पुत्र होने का पद पाएँ।
6 और इसलिये कि तुम पुत्र हो, परमेश्वर ने अपने पुत्र के आत्मा को तुम्हारे हृदयों में भेजा है, जो "अब्बा", अर्थात् पिता, कहकर पुकारता है।
7 इसलिये अब तू दास नहीं, परन्तु पुत्र है; और यदि पुत्र है, तो मसीह के साथ वारिस भी है।
मैं तुम्हें पहले बता चुका हूँ कि सन्त पौलुस यहाँ समय की पूर्णता की बात क्यों करता है: अर्थात् मनुष्यों की उस जिज्ञासा को घटाने के लिये, जो अपनी इच्छा से परमेश्वर के भेदों में बहुत दूर तक झाँकना चाहती है, वरन् इतना साहस भी कर बैठती है कि यदि परमेश्वर उनकी कल्पना के अनुसार व्यवहार न करे तो उसके विरुद्ध उत्तर देने लगे। इसलिये कि विश्वासी उस क्रम से सन्तुष्ट रहें जिसे परमेश्वर ने हमारे प्रभु यीशु मसीह के भेजने में रखा, वह कहता है कि उचित समय इससे पहले नहीं था, क्योंकि यह बात केवल परमेश्वर की भली इच्छा और उसके अटल संकल्प पर निर्भर है, जिसके आगे हमें झुक जाना उचित है। और अब सन्त पौलुस कहता है कि हमारा प्रभु यीशु मसीह स्त्री से जन्मा और व्यवस्था के अधीन किया गया, ताकि व्यवस्था के अधीनों को छुड़ाए। पहले वह कहता है कि उसने हमारा स्वभाव धारण किया, क्योंकि नहीं तो वह हमारी ओर से परमेश्वर की आज्ञाकारिता न निभा सकता, कि हम स्वतन्त्र किए जाएँ।
फिर भी, क्योंकि वह आश्चर्यजनक रीति से गर्भ में आया, इसलिये सन्त पौलुस कहता है कि वह स्त्री से बना या उत्पन्न हुआ। यह सच है कि वह दाऊद के वंश से था; तौभी मैं तुम्हें पहले बता चुका हूँ कि उसके गर्भ-धारण में पवित्र आत्मा का एक गुप्त कार्य था। पर चाहे जैसा भी हो, हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमारा स्वभाव अपने ऊपर ले लिया, ताकि वह मानो हमारे स्थान पर अपने पिता परमेश्वर की आज्ञाकारिता निभाए। और उसने हमारा स्वभाव इसी कारण धारण किया। और यह अधीनता, जिसकी वह बात करता है, विवशता से नहीं, वरन् अपनी इच्छा से थी। क्योंकि हम जानते हैं कि परमेश्वर के पुत्र को सब प्रभुता और अधिकार प्राप्त है, यहाँ तक कि स्वर्गदूत और सब प्रधानताएँ भी उसका आदर करने को उसके आगे घुटने टेकती हैं। तब वह व्यवस्था के अधीन कैसे हो सकता था, जबकि व्यवस्था ऐसी दासता है? इससे परमेश्वर के पुत्र की महिमा में कोई कमी नहीं आती, क्योंकि उसने अपनी ही इच्छा से अपने आप को दीन किया। इसलिये (जैसा फिलिप्पियों के दूसरे अध्याय में कहा गया है) इसमें कोई विरोध नहीं कि वह परमेश्वर के तुल्य होने को अपने अधिकार में रखी जानेवाली वस्तु न समझता था, और फिर भी उसने अपने आप को दीन किया। सो, क्योंकि उसका यह कार्य उसकी अपनी ही निरी और अविवश भलाई से हुआ, वह सदा अपनी ही दशा में बना रहा, यद्यपि मनुष्यों के सामने उसका रूप और आकार दास का सा था, जैसा सन्त पौलुस उसी स्थान पर बताता है। बात चाहे जैसी हो, हम भली भाँति ध्यान दें कि जो स्वर्ग और पृथ्वी का प्रभु था, उसने वह अधीनता अपने ऊपर इसलिये ली कि हमें उससे स्वतन्त्र करे। क्योंकि हम देखते हैं कि हमारे प्रभु यीशु मसीह का खतना हुआ, और जब वह पूरी आयु का हुआ तो उसने मूसा की व्यवस्था की सब बातों का यत्न से पालन किया: इसलिये नहीं कि वह ऐसा करने को बाध्य था, वरन् इसलिये कि दासता को दूर करे और उस बन्धन को तोड़ दे जिससे हम मानो जकड़े और बेड़ियों में डाले हुए थे।
इसलिये जब-जब सुसमाचार हमसे स्वतन्त्रता की बात करे (जिसकी चर्चा सन्त पौलुस भी इसी पाठ में करता है), तब-तब हम अपने प्रभु यीशु मसीह की ओर लौट आएँ, और निश्चय जानें कि वह उस रीति से व्यर्थ ही बन्धन में नहीं पड़ा। अब उसमें ऐसी कोई बात नहीं जिसमें हमारे उद्धार की पूर्ति न समाई हो। तब हमें अवश्य यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि हम अब व्यवस्था की दासता के अधीन नहीं हैं, नहीं तो यह हमारे प्रभु यीशु मसीह का अनादर ठहरेगा। क्योंकि यदि उसके हमारे लिये अपने आप को अधीनता में दे देने के बाद भी हम स्वतन्त्रता को तुच्छ जानें, तो यह कैसी बात होगी? इससे तो यही अधिक उचित होता कि आकाश और पृथ्वी अपना स्वभाव बदल लें, बजाय इसके कि यह कहा जाए कि परमेश्वर का पुत्र यहाँ नीचे उतर आया और पहले कही रीति से अपने आप को दीन किया, और फिर भी हम इसे खेल या तुच्छ बात ही समझें। क्योंकि यह कैसा व्यवहार होगा? सो अब हम सीखें कि हम अब अपने परमेश्वर की सेवा स्वतन्त्रता से करें, और सीधे उसके पास आएँ और प्राचीन पूर्वजों के समान अब व्यवस्था के जूए के नीचे इतनी कठोरता से न रखे जाएँ, क्योंकि यीशु मसीह आ गया है और उसने हमें स्वतन्त्र कर दिया है। मैं तुम्हें पहले ही बता चुका हूँ कि हम किस रीति से व्यवस्था से छुड़ाए गए हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि वह अब भी हमारे जीवन को ढालने का नियम न रही, ताकि परमेश्वर हम पर शासन करे और हम पर उसका पूरा अधिकार रहे। क्योंकि यदि हम अन्यजातियों और अविश्वासियों से भी बुरे हों तो यह कैसी बात होगी? पर यह निश्चित है कि जैसा सन्त पौलुस कहता है, उनके हृदयों में व्यवस्था खुदी हुई है। जो कभी पाठशाला नहीं गया, जिसने कोई शिक्षा नहीं पाई, जिसने कभी कुछ सुना या पढ़ा नहीं, वह भी भले और बुरे में भेद कर सकता है। इसलिये नहीं कि उसे पूर्ण ज्ञान है, परन्तु इसलिये कि संसार की दशा चाहे जैसी हो, परमेश्वर ने अज्ञानता का सब बहाना दूर करने के लिये चाहा कि मनुष्यों के हृदयों में यह साक्षी छपी रहे कि चोरी, व्यभिचार, अन्याय से धन ऐंठना, छल, झूठी शपथ, मतवालापन और ऐसी ही अन्य बातें निन्दनीय पाप हैं। और उसकी यह भी इच्छा थी कि मनुष्य जानें कि उसके नाम की निन्दा करना घृणित बात है। अन्यजाति के लोग बिना किसी शिक्षा के यह सब जानते थे। तब यदि हम इस बहाने से व्यवस्थाहीन हो जाएँ कि हमारा प्रभु यीशु मसीह हम पर राज्य करता और उसने हमें स्वतन्त्र कर दिया है, तो यह कैसी बात होगी? कलीसिया में उससे भी बड़ी गड़बड़ी हो जाएगी जो वहाँ होती है जहाँ शैतान ने सब कुछ गड्डमड्ड करके हर वस्तु को अस्त-व्यस्त कर दिया है, जिससे कोई लगाम ही नहीं रहती। परन्तु जब कहा जाता है कि हम अब व्यवस्था के अधीन नहीं हैं, तो यह उसी अर्थ में है जिसकी चर्चा पहले हो चुकी है; अर्थात् यह कि व्यवस्था अब हम पर यह तीखापन और कठोरता नहीं चलाएगी कि हमसे कहे, "श्रापित हो वह जो सब बातों को पूरा नहीं करता।" क्योंकि जब तक यह धमकी बनी रहती और अपने बल में खड़ी रहती है, तब तक हमें अवश्य ऐसे मनुष्यों के समान होना पड़ेगा जो होश खो बैठे हों, और ऐसे लोगों के समान जो यातना-यन्त्र पर टुकड़े-टुकड़े किए जाने को तैयार हों। संक्षेप में, जब तक व्यवस्था का वह दण्ड-आदेश रद्द न हो जाए, हमें कभी चैन नहीं मिल सकता, जो यह है कि जो व्यवस्था में लिखी सब बातों को पूरा नहीं करते वे श्रापित ठहरेंगे।
परन्तु इसके विपरीत, हमारे विवेक हमें यह साक्षी दें कि परमेश्वर हम पर दया करता है और जैसे पिता अपने बच्चों के प्रति करता है वैसे ही हमारी निर्बलताओं को सह लेता है, और हममें जो दोष हैं उनका लेखा नहीं लेता, वरन् उन्हें ढाँप देता और गाड़ देता है, यहाँ तक कि हमारी सेवा उसे ग्रहणयोग्य होती है, चाहे उसमें बहुत सी कमियाँ हों: और तब हम अब व्यवस्था के अधीन नहीं रहते।
इसका अर्थ यह नहीं कि हम बिलकुल बिना नियम के हों, या यह कि आज्ञाओं का हमें निरन्तर प्रचार न किया जाए, ताकि हम जानें कि परमेश्वर ने क्या ठहराया है और उससे भय में रखे जाएँ: परन्तु यह कि यदि हम गिर पड़ें, या लँगड़ाएँ, या कोई चूक कर बैठें तो हम हियाव न छोड़ें: या यदि हम सब बातों को वैसी पूर्णता से निभा न सकें जैसी आवश्यक थी, तो भी हम पूरी तरह निराश न हों, यह भली भाँति जानते हुए कि परमेश्वर सदा हमारा हाथ थामे रहेगा, और हमारे जीवन को कठोरता से छानने के लिये हमारे साथ लेखा नहीं करेगा।
फिर, क्योंकि हमारे प्रभु यीशु मसीह के आने से पहले की रीतियाँ अब उस रूप में प्रचलित नहीं हैं जिसमें वे प्राचीन काल के पूर्वजों के लिये थीं, जो उनके द्वारा मानो बाल्यावस्था में सिखाए जाते थे। क्योंकि जब पशु बलि चढ़ाए जाते थे, तब हर मनुष्य वहाँ अपनी ही मृत्यु को देखता था, मानो नरक का अथाह गड्ढा सारे संसार को निगलने के लिये खुल गया हो। आज हम जानते हैं कि परमेश्वर के पुत्र ने अपने आप को बलिदान करके और हमारे लिये अपना लहू बहाकर हमारे लिये अनन्त छुटकारा मोल ले लिया है, ताकि हम सिर ऊँचा करके परमेश्वर के सामने आएँ, इसमें कुछ भी सन्देह न रखते हुए कि हम उसकी मृत्यु से जीवन पाते हैं, जो उसके अधीन न था, परन्तु अपनी ही इच्छा से हमारा जमानती बनकर उसके अधीन हो गया, ताकि हम उसकी मृत्यु और दुःखभोग के द्वारा मुक्त और छूटे हुए ठहरें।
इस प्रकार तुम देखते हो कि आज के दिन व्यवस्था हमारे लिये रद्द हो गई है, और हम उससे छुड़ाए गए हैं, यहाँ तक कि लेपालकपन पाएँ। फिर भी ऐसा कहने में सन्त पौलुस का यह अर्थ नहीं कि पूर्वज, राजा, भविष्यद्वक्ता और पुरानी वाचा के अधीन जीनेवाले अन्य विश्वासी लोग हमारे समान परमेश्वर की सन्तान न थे, या वे अपने आप को हमारे समान विश्वास से लेपालक न जानते थे: परन्तु यह कि वह लेपालकपन अब तक वैसा प्रकट न हुआ था जैसा आजकल है।
क्योंकि (जैसा हम देख चुके हैं) व्यवस्था छोटे बच्चों को सँभालने के लिये एक शिक्षक थी। परन्तु हम पूरी आयु के हो गए हैं, क्योंकि परमेश्वर के पुत्र ने अपने आप को प्रकट किया और अपने आने से हम सब के लिये सब कुछ पूर्ण कर दिया। तब ऐसा होने के कारण हम अब उस लेपालकपन का आनन्द लेते हैं जिसका पूर्वजों ने मानो केवल स्वाद ही चखा था, क्योंकि अभी समय नहीं आया था। इसलिये नहीं कि परमेश्वर ने उनमें अपने आत्मा के उतने माप से कार्य न किया जितना उसने उचित समझा: परन्तु इसलिये कि बात उस शासन-व्यवस्था की है जो परमेश्वर ने रखी थी, न कि स्वयं उन व्यक्तियों की, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ।
क्योंकि उन दिनों छायाएँ और प्रतिरूप थे, इसलिये वह दासता की एक जंजीर के समान था: परन्तु अब जब हमारा प्रभु यीशु मसीह हमें अपने पास बुलाता है, और मन्दिर का परदा फटकर दो टुकड़े हो गया है: उसने हमारे लिये एक पवित्रस्थान तैयार किया है, जो मनुष्य के हाथ का बनाया हुआ नहीं, परन्तु स्वर्गीय रचना का है, जिसमें हम निडर होकर प्रवेश कर सकते हैं, क्योंकि वह हमसे पहले वहाँ प्रवेश कर चुका है।
तुम देखते हो कि हम इस लेपालकपन में पूरी रीति से ग्रहण किए गए हैं, क्योंकि व्यवस्था का अब हम पर वह अधिकार नहीं रहा जो छायाओं और प्रतिरूपों के समय था। अब इस बात को पक्का करने के लिये सन्त पौलुस जोड़ता है कि परमेश्वर यह प्रकट करता है कि वह हमें अपनी सन्तान मानता है, क्योंकि उसके पुत्र का आत्मा हममें है, जो "हे पिता" कहकर पुकारता है: पवित्र आत्मा की चर्चा करते हुए वह एक परिस्थिति के कारण उसे हमारे प्रभु यीशु मसीह का आत्मा कहता है। क्योंकि हम परमेश्वर की सन्तान किस अधिकार से हो सकते हैं, सिवाय इसके कि हम उसके एकलौते पुत्र के अंग हैं, जिसका वह उचित आदर और गौरव स्वभाव से है?
क्योंकि जब हमारे प्रभु यीशु मसीह को परमेश्वर का एकलौता पुत्र कहा जाता है, तो न केवल मनुष्य, वरन् स्वर्ग के स्वर्गदूत भी उस गौरव से बाहर कर दिए जाते हैं, ताकि वह यीशु मसीह को छोड़ और किसी का न हो। तौभी क्योंकि हम उससे जुड़े हैं, और वह हमसे अलग होना नहीं चाहता, वरन् अपने आप को हमारा सिर दिखाता है, और हमारा उससे ऐसा मेल है जैसा अंगों का सिर से होता है: इसलिये वह कहता है कि या तो हम में हमारे प्रभु यीशु मसीह का आत्मा होना चाहिए, नहीं तो हमारी अपने परमेश्वर तक कोई सहज पहुँच नहीं हो सकती कि उसे अपना पिता कहकर पुकारें: और यह हमारी बड़ी ढिठाई होगी कि हम वह आदर अपने ऊपर ले लें।
क्योंकि यदि कोई भिखारी अपने आप को किसी धनी का पुत्र बनाना चाहे, तो लोग उसकी हँसी उड़ाएँगे, और वह पूरी लज्जा के साथ दुत्कार दिया जाएगा। तब हम पृथ्वी के तुच्छ कीड़े, वरन् सब प्रकार की सड़ाँध और मलिनता से भरे हुए, स्वर्ग के स्वर्गदूतों की बराबरी कैसे करने जाएँ, कि कहें परमेश्वर हमारा पिता है? सच तो यह है कि स्वयं स्वर्गदूत भी ऐसी कुलीनता का दावा नहीं कर सकते, सिवाय हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा, क्योंकि वही उनका सिर है।
तब यह हमारा बड़ा अहंकार होगा यदि हम हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम में आए बिना, या उसका आत्मा पाए बिना, स्वर्गदूतों से भी ऊपर होड़ करने का साहस करें, कि हम उसकी देह के अंग ठहराकर ग्रहण किए जाएँ और मानो उसी में होकर आदर पाएँ। और इसी कारण यह भी कहा गया है कि वह हमारे लिये मध्यस्थता करता है, और हम उसके नाम से परमेश्वर को पुकारते हैं।
क्योंकि यदि वह हमारा प्रवक्ता न होता, तो हम अपनी बिनतियों के ग्रहण होने की आशा कैसे कर सकते? आओ, थोड़ा विचार करें कि जब हम परमेश्वर से प्रार्थना करना चाहते हैं तब हममें कितनी दुर्बलता होती है। यद्यपि हम सच्चे मन से आहें भरते हैं, और यद्यपि हममें हमें उठानेवाली भली प्रेरणाएँ होती हैं: तौभी हम मूर्छित हो जाते हैं, और जो समझते हैं कि वे पूर्ण उत्साह के साथ परमेश्वर के पास आ रहे हैं वे अपने आप को छलते हैं, वरन् बहुत भारी रीति से छलते हैं।
परन्तु जो नम्रता से अपने आप को जैसे हैं वैसा ही स्वीकार करते हैं: वे जान लेते हैं कि जो सद्गुण और बल उन्हें दिया गया है उसी में भी वे लँगड़ाते और ठोकर खाते हैं। फिर भी क्योंकि हमारा प्रभु यीशु मसीह बीच में है, और हमारी ओर से वहाँ खड़ा है, और हमें निकट लाता है: इसलिये हम निडर होकर प्रार्थना कर सकते हैं।
और इसी कारण व्यवस्था के समय में महायाजक अपनी छाती पर बारह बहुमूल्य पत्थर, और पीठ की ओर कन्धों पर अन्य बारह पत्थर पहनता था, जिन पर इस्राएल के बारह गोत्रों के नाम लिखे थे। क्योंकि यद्यपि लोग ओसारे में [अर्थात् बाहरी तम्बू में] उपस्थित रहते थे, तौभी उसके और उनके बीच एक परदा था, जिससे पवित्रस्थान छिपा रहता था, और भीतर जो कुछ किया जाता था, परमेश्वर की उपस्थिति की साक्षी के रूप में उसमें से कुछ भी दिखाई नहीं देता था।
इतना ही बहुत था कि महायाजक उन सब के नाम से भीतर जाता था, हाथ में वह लहू लिये हुए जिससे परमेश्वर का क्रोध शान्त होना था। फिर उसकी छाती पर वह पटिया था, जिसमें बारह गोत्रों (अर्थात् परमेश्वर की प्रजा) के नाम खुदे हुए थे। और वे उसके कन्धों पर भी थे, ताकि कहा जा सके कि वह वहाँ सारी कलीसिया के नाम से है।
इस प्रकार तुम देखते हो कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के आत्मा ही के द्वारा उसके पिता परमेश्वर को पुकारते हैं, इस पूरे निश्चय के साथ कि वह हमें अपने पुत्र के अंग जानता और मानता है, जिसके द्वारा वह हमें अपने स्वर्गीय राज्य में ग्रहण करता और हमारे लिये द्वार खोल देता है, ताकि हमारी उस तक सहज पहुँच हो। और "पुकारना" शब्द से यह और भी अच्छी रीति से प्रकट होता है।
सन्त पौलुस यह कह सकता था कि हम कहते हैं: परन्तु वह जैसी आवश्यकता थी, उससे आगे बढ़ता है। क्योंकि (जैसा मैं पहले छू चुका हूँ) यहाँ वह प्राचीन पूर्वजों की हमसे तुलना करता है, और दिखाता है कि हमारी दशा उनसे उत्तम है, क्योंकि परमेश्वर ने हम पर उन लोगों से अधिक उदारता दिखाई है जो व्यवस्था के अधीन थे। इसी कारण वह कहता है कि हम इन दिनों पुकारते हैं कि परमेश्वर हमारा पिता है, वरन् खुले मुँह और पूरी स्वतन्त्रता से, और हम निडर होकर उसके पास आते हैं, और इस पर गर्व करते हैं कि हम उसकी सन्तान गिने जाते हैं।
यह सच है कि व्यवस्था के अधीन पूर्वज भी यही बोली बोलते थे, जैसे जब वे कहते थे, "हे प्रभु, यदि तू हम पर दया करके हमें ग्रहण न करे तो हमारा क्या होगा? अब्राहम हमें नहीं जानता, और न याकूब ही। हम शरीर के अनुसार उनसे उत्पन्न हुए हैं: तौभी यह सारा स्वाभाविक नाता उस आत्मिक नाते के सामने कुछ भी नहीं, जिसमें तूने हमें अपने पुत्र के द्वारा कलम लगाया है। इसलिये तू ही हमारा पिता है?" जैसा यशायाह बताता है, उसी रीति से सारी कलीसिया परमेश्वर से प्रार्थना करती थी। और ऐसे बहुत से पाठ हैं। और निःसन्देह पूर्वजों के लिये उस आधार के बिना परमेश्वर के सम्मुख भली बिनती और प्रार्थना चढ़ाना असम्भव होता: अर्थात् जब तक वे पूरी रीति से निश्चय न रखते कि परमेश्वर उन्हें अपनी सन्तान मानता है। क्योंकि इसी बात में विश्वासी सब युगों में अन्यजातियों और अविश्वासियों से भिन्न रहे हैं। अन्यजाति के लोग तो परमेश्वर से प्रार्थना करते थे, परन्तु वह केवल अटकल से होती थी, यह जाने बिना कि वे सुने जाएँगे या नहीं। परन्तु हमारी प्रार्थना की नींव विश्वास पर होनी चाहिए।
और सन्त पौलुस का यह कथन सदा सत्य रहेगा: कि हम परमेश्वर से प्रार्थना नहीं कर सकते, जब तक पहले उसकी हमारे प्रति भली इच्छा को जान और समझ न लें। इसलिये अवश्य ही यह निष्कर्ष निकलता है कि जो व्यवस्था के अधीन जीते थे उनके विवेक में पूरा निश्चय था कि परमेश्वर उन्हें अपनी सन्तान मानकर ग्रहण करता है। फिर भी यह उन्हें, जैसा कहा जाए, आधे मुख से दिखाया गया था, इसलिये वे बहुत सी छायाओं और प्रतिरूपों में लिपटे हुए प्रार्थना करते थे, जो उन्हें मोटे ढंग से सिखाते थे। यह सच है कि वे बिना विश्वास के अपने आप को प्रस्तुत नहीं करते थे (क्योंकि तब उन्हें बहुत ही कम लाभ होता), और उनके लिये आवश्यक था कि जो बाधाएँ उनकी आँखों के सामने खड़ी की गई थीं उन सब पर जय पाएँ: पर तौभी वे उस पूरे निश्चय के साथ परमेश्वर को नहीं पुकार सकते थे जो सुसमाचार के अधीन हमें दिया गया है। और यह रोमियों के आठवें अध्याय में और भी अच्छी रीति से प्रकट किया गया है, जहाँ सन्त पौलुस कहता है कि हमने अब भय और दासत्व की आत्मा नहीं पाई, परन्तु हियाव की आत्मा पाई है, जिससे हम "अब्बा, हे पिता" कहकर पुकार सकते हैं। और विपरीत पद के द्वारा वह उस बात को प्रकाशित करता है जो इस पाठ के संक्षिप्त होने के कारण अस्पष्ट हो सकती थी। क्योंकि वह दासत्व की आत्मा का उल्लेख करता है, इसलिये कि व्यवस्था बड़ी भयानकता के साथ दी गई थी, और प्राचीन पूर्वज यह अनुभव करने को विवश हुए कि वे उसके अधीन भय में रखे गए हैं और उन्हें अब तक वह स्वतन्त्रता नहीं मिली थी जो आज हमारे प्रभु यीशु मसीह के आने से हमारे लिये मोल ली गई है। वे छोटे बच्चों के समान थे: जो यद्यपि उनके पिता उनके लिये परिश्रम करते हैं, तौभी नहीं जानते कि उनके लिये क्या संचित है। क्योंकि यद्यपि उनके पिता उनसे प्रेम रखते हैं: तौभी छड़ी को समय-समय पर चलना ही पड़ता है, और वे सदा भय में रहते हैं। और क्योंकि उनमें अपने आप को सँभालने का विवेक नहीं, वे नहीं जानते कि उनके पिता उनसे कैसा व्यवहार करेंगे। व्यवस्था के समय में भी ऐसा ही था: एक प्रकार का भय था, यहाँ तक कि जो परमेश्वर की सन्तान थे वे भी पूर्वोक्त कठोर दासता के अधीन थे।
परन्तु सन्त पौलुस कहता है कि हम अब मानो सीनै पर्वत पर नहीं हैं, जहाँ परमेश्वर गरजा, जहाँ बिजलियाँ चमकीं, जहाँ तुरहियाँ फूँकी गईं, और जहाँ आकाश ऐसा गूँजा कि सब मनुष्य इतने चकित हुए कि परमेश्वर के निकट आने का साहस न कर सके, जैसा कहा गया है, "परमेश्वर हमसे बातें न करे, नहीं तो हम सब मर जाएँगे और नष्ट हो जाएँगे।" सन्त पौलुस कहता है, हम अब उस भय में नहीं हैं: परन्तु परमेश्वर ने हमें पूरी स्वतन्त्रता दी है, क्योंकि हमारा प्रभु यीशु मसीह आ गया है। और हम जानते हैं कि वह स्वर्ग पर चढ़ गया है, इसलिये कि स्वर्गीय प्राणी आगे से ऐसी भयंकर महिमा न रखें कि हम उससे पीछे हट जाएँ: और हम अपने परमेश्वर से सहज बातचीत करने के लिये अनुग्रह और कृपा पाएँ।
इस प्रकार तुम देखते हो कि "पुकारना" शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है। अब यह सच है कि विश्वासी बहुधा अपने आप में ऐसा खुला और स्वतन्त्र मन नहीं पाएँगे, वरन् जब वे मुँह खोलेंगे तो व्यथित होंगे, मन में कचोटे जाएँगे, और सन्देह करेंगे कि परमेश्वर उनकी सुनेगा या नहीं। उदासी हमें इतना दबा देगी कि हम मुश्किल से जानेंगे कि अपनी प्रार्थनाओं को कैसे सजाएँ, या कहाँ से आरम्भ करें। तो यह एक ऐसी बात है जो उस बात के विपरीत प्रतीत हो सकती है जो सन्त पौलुस यहाँ कहता है, और उस पाठ के भी जिसका मैं हवाला देने वाला हूँ। क्योंकि इससे यह निकलेगा कि हम विश्वासियों की पाँति से काट दिए गए, यदि हम अपने मन में सन्देह करें कि हम परमेश्वर से प्रार्थना कर सकते हैं या नहीं, और हमारे हृदय मानो उन सन्देहों में बन्द हो जाएँ। यदि हम उस दशा में हों तो हमारी क्या स्थिति है? सन्त पौलुस जिस भरोसे की बात यहाँ करता है वह कहाँ है? वह उस सन्देह को तुरन्त दूर कर देता है, यह कहकर कि परमेश्वर का आत्मा हमारी घटियों और निर्बलताओं की पूर्ति करता है। क्योंकि कुछ अवर्णनीय आहें हैं जिन्हें परमेश्वर सुनता है, यद्यपि मनुष्य उन्हें नहीं जान पाते: इसलिये पहले यह ध्यान में रखें कि यदि हमने सुसमाचार में उन्नति की है, तो हमें निश्चय मानना चाहिए कि परमेश्वर हमें अपनी सन्तान जानता है, और वह हमें कोमलता से अपने पास बुलाता है, और हम निडर होकर उसके पास आ सकते हैं। इसी के अनुसार वह इफिसियों के तीसरे अध्याय में कहता है कि यीशु मसीह पर विश्वास करने के द्वारा हम तुरन्त परमेश्वर के सामने उपस्थित होने का भरोसा और हियाव पा लेते हैं। तब यदि हममें भरोसा और हियाव नहीं, तो प्रकट है कि हममें विश्वास नहीं। तौभी, क्योंकि हमारा विश्वास कभी सिद्ध नहीं होता, वरन् ऐसे झोंके सहता है जिनसे वह बाहरी रूप में मानो गिरा दिया जाता है: कभी-कभी हम अपनी विपत्तियों और क्लेशों के अत्यधिक दबाव से ऐसे घबरा जाते हैं कि परमेश्वर हमसे अनजान सा लगता है, और हम परमेश्वर से प्रार्थना का एक शब्द भी नहीं कह पाते।
और इसलिये आओ, हम वह बात ग्रहण करें जो सन्त पौलुस कहता है: अर्थात् यह कि आत्मा हमारी निर्बलताओं में सहायता करता है। और इसलिये हम डटे रहें और परमेश्वर से निरन्तर प्रार्थना करते रहें, और यदि हम गूँगे हो जाएँ, या हकलाएँ, और अपने मन की एक बात भी ठीक से कह न सकें, वरन् बहुत सी रुकावटों में उलझ जाएँ: तो भी, हमारी दशा जैसी भी हो, परमेश्वर का आत्मा हमें सदा आगे धकेलता रहे, और हम इस नींव पर दृढ़ रहें कि परमेश्वर फिर भी हमारा पिता है, और हम उसकी शरण में भागें, और यद्यपि हम वह इतनी स्वतन्त्रता से न करें जितनी आवश्यक थी, वरन् अपने दुःखों के बोझ से दबे हों, तौभी जो कुछ भी हो, हम आगे बढ़ते रहें, और अपनी ही चूक से अपने आप को द्वार से बाहर न कर लें, वरन् अपने परमेश्वर से प्रार्थना में लगे रहें, अपने आप को निश्चय दिलाते हुए कि वह अन्त में हम पर तरस खाएगा।
इस प्रकार तुम देखते हो कि जब हियाव या भरोसे की उस आत्मा का उल्लेख होता है, जिसके द्वारा हम [परमेश्वर को] पुकार सकते हैं क्योंकि हमें अपने लेपालकपन का निश्चय है, तो हमें यहाँ क्या विचारना है। हम यह न सोचें कि यह हममें पूरी रीति से हो सकता है, क्योंकि बहुत से दोष हैं जिनसे हम अब तक छूटे नहीं हैं। फिर अविश्वास भी बना हुआ है, जो यदि हममें जड़ से उखाड़ा न गया हो तो भी हमें पीछे खींचने के लिये उसके पास बहुत सी डोरियाँ हैं, इसलिये हमें उनसे लड़ना पड़ता है। परन्तु इस बीच हमें पूरी रीति से निश्चय रखना चाहिए कि परमेश्वर हमारा पिता है: और फिर अपनी सामर्थ्य और क्षमता के अनुसार हम उस लक्ष्य की ओर बढ़ते रहें जो यहाँ हमारे सामने रखा गया है। और आज पोप के अनुयायियों के साथ हमारे सबसे बड़े विवादों में से यह एक है। क्योंकि वे कहते हैं कि हम निश्चित नहीं हो सकते कि परमेश्वर हमसे प्रेम रखता है, और यह ऐसी बात है जो अधर में लटकी रहनी चाहिए कि वह हमसे प्रेम रखता है या घृणा। परन्तु इस रीति से वे प्रार्थना की सच्ची विधि और रीति को पूरी तरह बिगाड़ देते हैं। क्योंकि हम जानते हैं कि पवित्रशास्त्र कैसा कहता है, कि हम बिना विश्वास के प्रार्थना नहीं कर सकते, और सन्त याकूब कहता है, ऐसा मनुष्य यह न समझे कि वह कभी सुना जाएगा, अर्थात् वह जो डाँवाडोल सरकण्डे के समान आता है जिसे हर हवा इधर-उधर हिलाती है। क्योंकि हमें विश्वास करना चाहिए कि परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं में विश्वासयोग्य है, और उसके पास आने में हम निराश न होंगे, क्योंकि उसी ने हमें आने को कहा है। अपनी सब प्रार्थनाओं और बिनतियों में हमारा मन ऐसा ही होना चाहिए, नहीं तो सब व्यर्थ है।
फिर यदि हममें परमेश्वर का आत्मा नहीं, जैसा सन्त पौलुस रोमियों के आठवें अध्याय में कहता है, तो हममें कैसी मसीहियत है? और इसी कारण वह पाँचवें अध्याय में भी कहता है कि हम अपनी आशा के विषय में कभी लज्जित न होंगे, क्योंकि परमेश्वर का प्रेम पवित्र आत्मा के द्वारा, जो हमें दिया गया है, हमारे हृदयों में उंडेला गया है। क्योंकि यदि हममें आशा नहीं, तो निश्चय ही हम परमेश्वर के राज्य से निकाल दिए गए हैं, और मसीही नहीं कहला सकते। और वह कैसी आशा है? वह (सन्त पौलुस कहता है) यह है कि परमेश्वर का प्रेम हमारे हृदयों में उंडेला गया है: अर्थात् हम पूरी रीति से स्थिर और सन्तुष्ट हों क्योंकि हम जानते हैं कि हम परमेश्वर की कृपा में हैं। और यह हम कैसे जानते हैं? आत्मा के द्वारा। और वह जान-बूझकर "उंडेला गया" शब्द रखता है, हमें समझाने के लिये कि परमेश्वर का हमें अपनी पितृवत् भलाई और प्रेम का अनुभव कराना कोई ऊपरी, हल्की छुअन भर नहीं है (जैसा कहा जाता है), कि फिर वह हमें भूखा और अभावग्रस्त छोड़ दे: परन्तु वह उसे हम पर उंडेलता या बहाता है, अर्थात् वह हमें यह पर्याप्त और पूरा प्रमाण देता है कि वह हमें अपना जानता और मानता है, क्योंकि उसने अपनी दया के सब भण्डार हमारे प्रभु यीशु मसीह में खोलकर रख दिए हैं। अब यह अवश्य परमेश्वर के आत्मा से आना चाहिए, जैसा 1 कुरिन्थियों में कहा गया है, कि हम अपनी स्वाभाविक बुद्धि से यह नहीं समझ सकते कि परमेश्वर हमसे प्रेम रखता है: क्योंकि यह मनुष्य की सारी सामर्थ्य से परे है। इसलिये परमेश्वर को हमें संसार से ऊपर उठाना पड़ता है: क्योंकि परमेश्वर के प्रेम का निश्चय अपने आप को दिलाना हमारे अपने वश में नहीं। इसलिये आत्मा हमें यह देता है: अर्थात् यह हमें स्वभाव से नहीं मिलता, न विरासत में, और न हम इसे अपनी योग्यता से मोल लेते हैं: परन्तु परमेश्वर अपनी ही निरी भलाई से हमें इसका निश्चय दिलाता है, ताकि हम अपनी सब आवश्यकताओं में सहज रूप से उसकी ओर फिरें।
परन्तु इसके विपरीत, पोप के अनुयायी अपनी ही कल्पना के अनुसार समझते हैं कि हम परमेश्वर के प्रेम के विषय में निश्चित नहीं हो सकते। और ये अभागे ऐसे अन्धे हैं कि कहते हैं कि यदि हम उसका कुछ भी निश्चय चाहें तो यह ढिठाई है: हाँ [और वह है भी], यदि हम उसे अपने ही से चाहें। क्योंकि यदि कोई अपनी ही धारणा पर अपने आप को समझाए कि परमेश्वर उसका पिता है, तो वह केवल एक सनकी बालक, और हर परख में उन मूर्खों में से किसी के समान मूर्ख ठहरेगा जो गलियों में भटकते हुए राजा और राजकुमार का स्वाँग भरते हैं।
परन्तु यदि हमारे परमेश्वर की ओर से हमें वही साक्षी मिली है: तो क्या हम अब भी उसमें सन्देह करें? क्या परमेश्वर को इतना आदर देना, कि उसे विश्वासयोग्य मानें और उसके वचन पर टिके रहें, ढिठाई है? फिर दूसरी ओर, जब हम प्रार्थना करने जाते हैं, तो क्या यह एक भली तत्परता नहीं जो वह हमें देता है जब वह कहता है, मेरे पास आओ? यदि हमें परमेश्वर से प्रार्थना करने की आज्ञा न होती, तो निश्चय उसकी उपस्थिति में घुस पड़ना बड़ी धृष्टता होती। परन्तु जब वह हमें बुलाता है, वरन् इसकी बाट भी नहीं जोहता कि हम उसे ढूँढ़ें, वरन् हमसे पहले आ जाता है, और हमसे कहता है कि वह और कुछ नहीं चाहता सिवाय इसके कि हम उसके पास आएँ, और हमें उससे प्रार्थना करने की प्रेरणा और मन दोनों देता है: यदि हम उसे अपना परमेश्वर मानते हैं, तो अपनी सब भलाई उसी के हाथ से ढूँढ़ते हुए उसे उसकी योग्य स्तुति दें। जब (मैं कहता हूँ) वह हमसे इस प्रकार पहले आ चुका है: तो क्या हम इस पर विवाद करें कि हमें उसके पीछे चलना चाहिए या नहीं? क्या यह ऐसी निन्दा नहीं जो परमेश्वर की सब प्रतिज्ञाओं को बिगाड़ने की ओर ले जाती है? इस प्रकार तुम देखते हो कि जब इस शब्द "पुकारना" का उल्लेख होता है तो हमें क्या स्मरण रखना है। पर इतने पर भी, हमारी दशा चाहे जैसी हो, यद्यपि हमें उन लोगों के समान टूट-फूटकर बोलना पड़े जिनकी वाणी आधी खो गई हो, और इतनी पराजयों से हम ऐसे दब जाएँ कि एक अक्षर या बिन्दु भी ठीक से न गढ़ सकें: तौभी जो कुछ भी हो, हम परमेश्वर के पास जाना न छोड़ें, इस आधार पर कि वह हमारी आवश्यकता में हमारी सहायता करेगा, और उन निर्बलताओं का निवारण करेगा जो हमें पीछे खींचती हैं। संक्षेप में, जब आत्मा हममें कार्य करके हमें उन आहों के लिये उभारता है जिनकी मैंने चर्चा की है: तब हम परमेश्वर को ढूँढ़ें, और यद्यपि हम हक्के-बक्के हों और न जानें कि कहाँ से आरम्भ करें: तो भी हम सदा उस लक्ष्य की ओर बढ़ते रहें जो यहाँ हमारे सामने रखा गया है। और सन्त पौलुस जान-बूझकर कहता है कि हम "अब्बा, पिता" कहकर पुकारते हैं, यह जताने के लिये कि आज परमेश्वर केवल यहूदियों से ही यह नहीं चाहता कि वे उसे पुकारें और सहायता के लिये उसकी शरण लें: वरन् वह चाहता है कि सारा संसार ऐसा करे। और क्योंकि सुसमाचार, जो हमारे लिये परादीस का द्वार खोलने की कुंजी है, सब जगह प्रचारित किया जाता है: अब वह चाहता है कि सब मनुष्य उस अधिकार का आनन्द लें जो पहले अब्राहम के वंश का विशेष विशेषाधिकार था। इस प्रकार तुम देखते हो कि हम किस रीति से "अब्बा, पिता" कहकर पुकारते हैं। अब पहला शब्द "अब्बा" का अर्थ पिता है: फिर भी सन्त पौलुस वह भाषा काम में लाता है जो यहूदियों में तब भी सबसे अधिक प्रचलित मानी जाती थी। क्योंकि बाबुल की बन्धुआई के बाद इब्रानी भाषा उतनी शुद्ध न रही जितनी पहले थी, वरन् कसदियों की भाषा से मिल गई थी। तौभी सन्त पौलुस का आशय यहाँ यह दिखाना है कि सुसमाचार के अधीन सब मनुष्यों को सामान्य रूप से खुले मुँह परमेश्वर को पुकारना चाहिए, क्योंकि उसका लेपालकपन सब जातियों को दिया गया था, और वह दीवार गिरा दी गई जो यहूदियों और अन्यजातियों को अलग करती थी, ताकि आगे से वह हमें बराबर और एक सी दशा में चाहे। तुम देखते हो कि हम सब भाषाओं में, मानो एक ही मुँह से, परमेश्वर को पुकार सकते हैं, और हमें सन्देह न करना चाहिए कि परमेश्वर हमें ग्रहण करता और हमें अपनी ओर बढ़ने की आज्ञा देता है, क्योंकि हमारे पास सुसमाचार की शिक्षा है जो हमारी अगुवाई करती है, और जो हमारे लिये अचूक पथ-प्रदर्शक है।
अब इस रीति से हम देखते हैं कि हर मनुष्य की परमेश्वर से प्रार्थना समझ के साथ होनी चाहिए। क्योंकि यदि कोई मनुष्य जो अपनी मातृभाषा के सिवाय और कुछ नहीं समझता, यूनानी या इब्रानी में परमेश्वर से प्रार्थना करे, तो निश्चय वह केवल खिलवाड़ होगा, और ठीक प्रार्थना करने के नियम का सर्वथा बिगाड़ और नाश, और उसमें कपट और बनावटी भक्ति के सिवाय कुछ न होगा। मैं तुम्हें बता चुका हूँ कि हम विश्वास के बिना परमेश्वर से प्रार्थना नहीं कर सकते, ताकि निश्चित रहें कि वह हमारी सुनेगा। और यदि हम यही न जानें कि हमें उससे क्या माँगना है, तो यह कैसी बात होगी? क्या यह प्रार्थना जैसी पवित्र वस्तु को अशुद्ध करना नहीं? हम जानते हैं कि परमेश्वर को पुकारना और सहायता के लिये केवल उसी की शरण लेना वह बलिदान है जो वह हमसे चाहता है, क्योंकि उसमें हम उसे अपना पिता और सारी भलाई का वास्तविक सोता मानकर स्वीकार करते हैं। अब उचित है कि हम उसके पास जाएँ जो प्रतिफल देनेवाला है, जैसा प्रेरित इब्रानियों के ग्यारहवें अध्याय में कहता है, कि वह अपने खोजनेवालों को निराश नहीं करता, वरन् वे सदा पाएँगे कि उसकी शरण में जाने से उत्तम कुछ नहीं। इसलिये जब हम परमेश्वर से प्रार्थना करें, तो हममें समझ होनी चाहिए कि हम उससे क्या माँग रहे हैं। इसे एक बात के रूप में ध्यान में रखो। फिर जो यह कहा गया है कि हम "अब्बा, पिता" कहकर पुकारते हैं: इससे हमें यह समझाया जाता है कि भाषाओं की विविधता विश्वास की एकता में बाधा नहीं डालती। यशायाह इसके सर्वथा विपरीत बात कहता प्रतीत होता है, जब वह कहता है कि सब मनुष्य कनान की भाषा बोलेंगे, अर्थात् इब्रानी भाषा। अब मसीही और विश्वासी होने के लिये यह आवश्यक नहीं कि हमें उस भाषा का ज्ञान हो: परन्तु उसका अर्थ यह है कि परमेश्वर की आराधना सब भाषाओं में की जाएगी। और वह कनान की भाषा की चर्चा इसलिये करता है कि इब्रानी एक पवित्र भाषा थी जिसमें परमेश्वर के भेद समाए हुए थे। सो, क्योंकि वह भाषा एक प्रकार से परमेश्वर के लिये पवित्र ठहराई गई थी: वह कहता है कि परमेश्वर का आदर सब मनुष्य करेंगे, और सब मनुष्य अपनी निन्दाओं, अन्धविश्वासों और कुरीतियों को त्याग देंगे, और मनुष्यों में विश्वास की एकरूपता होगी, और व्यवस्था और सुसमाचार दोनों की शिक्षा पाकर वे सब एक ही सी स्वीकारोक्ति करेंगे, ताकि सब मनुष्यों में एक सुर और भला मेल हो। तौभी सन्त पौलुस का आशय यहाँ और स्पष्टता से बताना था कि हम किस रीति से परमेश्वर को पुकारते हैं: अर्थात् हर मनुष्य अब अपनी ही भाषा में उससे प्रार्थना करता है, और वह हम सब की सुनता है। क्योंकि परमेश्वर को इसके लिये पाठशाला जाने की आवश्यकता नहीं कि इस या उस मनुष्य की भाषा सीखे। और हम जानते हैं कि प्रार्थना में वाणी का और कोई काम नहीं, सिवाय इसके कि हमें उसके लिये और अधिक उभारे। साथ ही यह हमें मनुष्यों के सामने अपने मुँह से साक्षी देने में काम आती है कि हम अपना सारा भरोसा परमेश्वर पर रखते हैं। फिर यह हमारी निर्बलता में सहायता करती है, और क्योंकि हम आलसी और ठण्डे हैं, हमारी जीभ को हमारे हृदय को आगे ठेलना चाहिए, और हमारी उस दुर्बलता और सुस्ती की सहायता करनी चाहिए जो हममें बहुत अधिक है।
परन्तु परमेश्वर को इनमें से किसी की भी आवश्यकता नहीं, हमें ऊँचे स्वर से पुकारने की आवश्यकता नहीं जब हम उससे सुने जाना चाहें: क्योंकि वह हमारे हृदयों के गुप्त विचारों को जानता है। इस प्रकार तुम देखते हो कि सार रूप में हमें क्या ध्यान देना है।
और इसमें हम देखते हैं कि पोप-मत में शैतान का कितना बड़ा प्रभाव है, कि वहाँ न प्रार्थना है न विश्वास। उनके विचार में कोई भक्ति या पवित्रता तब तक नहीं, जब तक मनुष्य किसी अनजानी भाषा में बड़बड़ाएँ और बिना जाने कि क्या कह रहे हैं उसे बुदबुदाते रहें।
और यद्यपि याजक, भिक्षु और कपटी लोग कहते हैं कि हम लातीनी समझते हैं: मनुष्य भली भाँति जानते हैं कि उनकी समझ कैसी है। इसके सिवाय वे बिना जाने कि क्या कह रहे हैं अपनी बकवास को नियम ही बना लेते हैं, और उनके यहाँ एक अन्तिम मनसा (जैसा वे उसे कहते हैं) रखना ही बहुत है: सो वे अपना Domine labia बड़बड़ाने से पहले वह अन्तिम मनसा रख लेते हैं, यह कहने के लिये कि हम प्रार्थना करने और परमेश्वर की सेवा करने जाते हैं, चाहे उनका मन अपनी रसोई पर हो, या उससे कहीं बुरी और कहीं अधिक लज्जाजनक बातों पर: वे अपने आप को समझाते हैं कि उनकी सब प्रार्थनाएँ और बिनतियाँ परमेश्वर को ग्रहणयोग्य हैं।
बेचारे लोगों की आँखों में इससे धूल झोंकी जाती है: क्योंकि उन्हें विश्वास दिलाया गया है कि उनके लिये साधारण भाषा में प्रार्थना करना उचित नहीं, और इसलिये वे उससे हौवे के समान दूर भागते हैं। तब हम देखते हैं कि शैतान ने इन अभागों को बुद्धिहीन बना दिया है, वरन् उन पर पूरा जादू कर दिया है, क्योंकि वे जीवन का भोजन ग्रहण करने से इतने हिचकते हैं कि अच्छी रोटी और पौष्टिक भोजन के बदले वे विष खाते और उससे फट जाते हैं।
परन्तु हम अपनी ओर से वह नियम देखते हैं जो हमें यहाँ दिया गया है और जिसका हमें पालन करना चाहिए: कि जब हम परमेश्वर से प्रार्थना करें तो बिना सोचे-विचारे उसमें न कूद पड़ें, यह विचारे बिना कि हमें क्या माँगना है, या यह जाने बिना कि हमें उसके सम्मुख कैसा व्यवहार करना है।
और जब हम उसे अपना पिता कहें, तो भली भाँति विचार करें कि यह हमारे अपने व्यक्तियों की किसी योग्यता के कारण नहीं, न हमारे अपने किसी गुण या काम के कारण: परन्तु इसलिये कि उसने हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह से एक कर दिया है, और हम सब को उसी में इकट्ठा करता है, और इसलिये कि हम उसकी देह हैं, और परमेश्वर उसी के व्यक्तित्व में हमें कृपापूर्वक ग्रहण करता है।
और इसी कारण सन्त पौलुस यह भी जोड़ता है कि यदि हम सन्तान हैं तो वारिस भी हैं। मानो वह यह कहता है कि हम अपनी विरासत का आनन्द अभी से लेते हैं: इसलिये नहीं कि हम उसके अधिकार में प्रवेश कर चुके हैं, कि जो महिमा हमसे प्रतिज्ञा की गई है उसके सहभागी हों, परन्तु प्राचीन काल के पूर्वजों की तुलना में, जो मन्दिर के बाहरी भाग में रोक दिए गए थे, और जिनके आगे एक परदा या पर्दा खींचा हुआ था, और अन्य प्रतिरूप और छायाएँ भी थीं।
अब हम उस विषय में उनके समान नहीं हैं: परन्तु हम परमेश्वर के पास ऐसी रीति से जाते हैं कि स्पष्ट और स्वतन्त्र हैं। और इस प्रकार आजकल हमारे हृदयों में लेपालकपन उससे भिन्न है जो व्यवस्था के समय उनके हृदयों में था। क्योंकि हम ऐसी रीति से वारिस हैं कि तौभी इस जगत में परदेशी के समान भी हैं, और (जैसा सन्त पौलुस 2 कुरिन्थियों में कहता है) हमें परमेश्वर से दूर रहना पड़ता है, जब तक वह हमें इस नश्वर देह से छुड़ाकर इस पार्थिव प्रवास और क्षणभंगुर जीवन से निकाल न ले।
बात चाहे जैसी हो, हमें परमेश्वर के अनुग्रह की बड़ाई करनी चाहिए: और क्योंकि उसने हमें अपनी सन्तान होने के लिये लेपालक बना लिया है, हम समझें कि इसी में हमारा सारा सुख और आनन्द है। इसलिये हम इसी पर गर्व करें, वरन् यहाँ तक कि उन संकटों और विपत्तियों के बीच भी आनन्द करें जो हमें सहनी पड़ती हैं।
आओ हम अपने भीतर निरन्तर आन्तरिक आनन्द रखना न छोड़ें, क्योंकि परमेश्वर हमें बुलाता है, और उसने हमें बता दिया है कि जितनी विपत्तियाँ हम सहते हैं वे सब हमारी भलाई और उद्धार में बदल जाएँगी, यदि हम उस लक्ष्य की ओर बढ़ते रहें जो हमारे सामने रखा गया है, अर्थात् यदि हम अपने प्रभु यीशु मसीह की ओर आगे ही आगे बढ़ते जाएँ, और अन्य सब बातों को छोड़ दें।
अब आओ हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने गिरें, अपने पापों को मानते हुए, उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उनका ऐसा अनुभव कराए कि वह हमें उसके सामने दीन करे, और फिर भी हम हियाव न हारें, क्योंकि वह हमें भली रीति से ग्रहण करना स्वीकार करता है, और जब हम उस पर पक्के भरोसे के साथ उसके पास आएँ तो हमारी बिनतियाँ सुनने के लिये अपनी ही इच्छा से हमारे प्रति बँध भी गया है: वह हमें यह अनुग्रह दे कि हम सब संकटों और बाधाओं, और उन सब विवादों और झगड़ों पर जय पाएँ जो शैतान हमारे हृदयों में डाल सकता है, ताकि हम अनुभव से इस प्रतिज्ञा की सामर्थ्य को जानें कि जो कोई प्रभु का नाम लेगा वह सुरक्षित रहेगा। और इसलिये हम सब कहें, हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, स्वर्गीय पिता। इत्यादि।
