अध्याय 8

गलातियों 1:15-18 पर पहली अध्याय का छठा उपदेश

Sermons upon Galatians · John Calvin

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गलातियों 1:15-18 पर पहली अध्याय का छठा उपदेश

15 परन्तु जब परमेश्वर को, जिसने मुझे मेरी माता के गर्भ ही से चुन लिया और अपने अनुग्रह से बुला लिया, यह अच्छा लगा,

16 कि मुझ में अपने पुत्र को प्रकट करे, ताकि मैं अन्यजातियों में उसका प्रचार करूँ, तो मैंने तुरन्त मांस और लहू से सलाह नहीं ली;

17 और न यरूशलेम में उनके पास गया जो मुझसे पहले प्रेरित थे, परन्तु तुरन्त अरब को चला गया और फिर दमिश्क को लौट आया।

18 फिर तीन वर्ष के बाद मैं पतरस से भेंट करने को यरूशलेम गया और उसके पास पन्द्रह दिन तक रहा, इत्यादि।

हमने देखा कि यहाँ सन्त पौलुस किस विषय को उठा रहा है: अर्थात् यह कि मनुष्यों को इतना ऊँचा नहीं उठाना चाहिए कि उनके कारण, या उनके व्यक्तित्व के विषय में हमारी बनी हुई प्रतिष्ठा के कारण, परमेश्वर की महिमा धूमिल हो जाए या घट जाए। क्योंकि प्रायः हम सृष्ट प्राणियों की प्रशंसा आवश्यकता से अधिक करने लगते हैं, और इससे परमेश्वर के वचन को हानि पहुँचती है। और यद्यपि सन्त पौलुस यहाँ अपनी तुलना अन्य प्रेरितों से करता है, तौभी उसे अपने व्यक्तित्व की कोई चिन्ता नहीं, वह तो बस यह चाहता है कि जो सुसमाचार उसे सौंपा गया है वह पूरे आदर के साथ ग्रहण किया जाए। और इसे सिद्ध करने के लिए वह यहाँ अपने गुणों की नहीं, वरन् परमेश्वर के अनुग्रहों की चर्चा करता है। क्योंकि वह यहाँ यह नहीं बताता कि उसने स्वयं अपने बल से क्या किया, परन्तु यह बताता है कि उस परिवर्तन के द्वारा, जो उस पर घटित हुआ, उसने क्या किया; वह परिवर्तन ऐसा था जिसे मनुष्य स्वर्ग की ओर से जान सकते थे, न कि उसके अपने प्रयत्न से। हाँ, और हम देखते हैं कि वह खुलकर घोषणा करता है कि उसके इस प्रकार बदल जाने का सारा श्रेय केवल परमेश्वर की भलाई को देना चाहिए; क्योंकि वह “भली इच्छा” शब्द का प्रयोग करता है। इसके द्वारा वह वह सब कुछ निकाल देता है जो मनुष्य की ओर से है, ताकि कोई यह न समझे कि वह अपने लिए कुछ बचाए रखना चाहता था।

फिर, वह यह नहीं कहता कि उसने सुसमाचार को ढूँढ़ा था, परन्तु यह कि उसे वह प्रकाशन के द्वारा मिला था। तीसरे, वह कहता है कि यह परमेश्वर ही था जिसने उसे बुलाया। और अन्त में वह कहता है कि यह उस किसी तत्परता के कारण नहीं था जो पहले से उसमें थी (जैसे कोई मनुष्य हममें से किसी को, जब वह उसे किसी काम के योग्य पाता है, किसी सेवा में लगा लेता है), परन्तु वह कहता है कि परमेश्वर ने उसे उसकी माता के गर्भ ही से पहले से अलग कर रखा था। तो हम देखते हैं कि सन्त पौलुस अपने आपको ऊँचा करना नहीं चाहता, वरन् केवल अपने द्वारा यीशु मसीह को प्रकट करना चाहता है, और सुसमाचार की शिक्षा को इस बहाने से दोषारोपण से बचाना चाहता है कि दूसरे मनुष्यों ने सारे संसार में बड़ी प्रतिष्ठा पा ली थी। और (जैसा हम देखते हैं) गलातिया देश में जो उपद्रवी आ गए थे, उन्होंने प्रेरितों के नाम की आड़ में छल का आश्रय लिया था। इसलिए सन्त पौलुस दिखाता है कि जो शिक्षा वह रखता था, वह उसे मनुष्यों से नहीं मिली थी। और वह इसी प्रकार यह डींग भी नहीं मारता कि उसने कुछ जीता या कमाया था, परन्तु कम से कम यह कि सब जान लें कि परमेश्वर ने उसमें अपना अनुग्रह ऐसा प्रकट किया था कि उससे उस शिक्षा का अधिकार और बढ़ गया जो वह चारों ओर पहुँचाता था। परन्तु साथ ही, इसमें कोई सन्देह नहीं कि सन्त पौलुस के व्यक्तित्व में हमारे सामने परमेश्वर की भलाई का एक दर्पण है, जैसी वह हमारे प्रति प्रकट होती है और जिसके हम भागी हैं, ताकि छोटे से लेकर बड़े तक सब मनुष्य दीन होना सीखें।

इसलिए जब हम सुसमाचार के ज्ञान तक पहुँचते हैं, तो यद्यपि हमारे पास वैसे प्रकाशन नहीं होते जैसे पौलुस के पास थे, तौभी यह बात सदा बनी रहती और निरन्तर चलती रहती है, अर्थात् यह कि यह हमारी ओर से नहीं है, और न मनुष्य अपने आप उसकी ओर बढ़ सकते हैं, परन्तु सब कुछ परमेश्वर की केवल भलाई से होता है, क्योंकि उसने ऐसा ही ठहराया है। क्योंकि सन्त पौलुस जो शब्द प्रयोग करता है वे सब ऐसे विचारों को निकाल देते हैं जो हो सकते हैं, जैसे जब एक मनुष्य किसी दूसरे मनुष्य की किसी योग्यता के कारण, या उसके व्यक्तित्व में पाई जानेवाली किसी और बात के कारण, उसका भला करता है। वह यहाँ इससे अधिक कुछ नहीं करता, केवल सीधे-सीधे यह बताता है कि चूँकि परमेश्वर हममें कोई योग्यता नहीं पाता, इसलिए जब उसे भाता है कि हमें अपनी सन्तान करके ग्रहण करे और अपने सुसमाचार के ज्ञान की ओर हमें खींचे, तो वह दिखाता है कि ऐसा करना उसके अपने ही संकल्प और इच्छा से होता है। तो जो बात हमें यहाँ सिखाई जाती है वह यह है कि विश्वास इस प्रकार केवल परमेश्वर का दान है कि मनुष्य सुसमाचार की ज्योति में आने का, जिसमें उनका सुख और कल्याण निहित है, श्रेय अपने लिए नहीं ले सकते, वरन् उन्हें परमेश्वर की महिमा करनी चाहिए, क्योंकि उसने उन्हें चुनकर और बुलाकर उन्हें अपने साथ बाँध लिया है कि उन्हें उस ओर ले जाए: क्योंकि इसका कारण वह अपने ही में और अपनी केवल दया में ढूँढ़ता है। यही बात उन सब कामों के विषय में कहनी चाहिए जिनमें परमेश्वर हमें लगाता है। यह सच है कि मनुष्य एक-दूसरे को इस आधार पर चुनते हैं कि उनमें किसी कार्य के लिए योग्यता दिखाई देती है: इसलिए एक को देश पर शासन करने के लिए, दूसरे को परमेश्वर का वचन सुनाने के लिए, और तीसरे को इस या उस काम के लिए ठहराया जाता है। ऐसा करने में हम उन बातों पर दृष्टि रखते हैं जो परमेश्वर ने हर एक मनुष्य में रखी हैं, और ऐसा करना उचित भी है।

तौभी, बात चाहे जैसी हो, जो इस प्रकार चुना जाता है (अपना कर्त्तव्य निभाने के लिए उसमें चाहे जितनी सुघड़ता और क्षमता हो), उसे समझना चाहिए कि परमेश्वर ने पहले से उसे चिह्नित कर रखा था, और वह अपनी किसी चतुराई से इसके योग्य नहीं बना, परन्तु परमेश्वर ने उसमें यह कार्य किया है। इसलिए हम यह न समझें कि जिसकी बुद्धि दूसरों से अच्छी और तेज़ है, उसने वह अपने आप से पाई है। क्योंकि हम उन अनेक प्राणियों के समान, जिन्हें हम बुद्धि और विवेक से रहित देखते हैं, जड़ क्यों नहीं हैं? मनुष्यों के बीच ऐसा भेद किसने डाला है? निश्चय है कि अनिवार्य रूप से परमेश्वर ने हमारे जन्म से भी पहले हमें चिह्नित किया होगा और ठहराया होगा कि हम क्या होंगे। और इसलिए जिस किसी के पास दूसरे मनुष्यों से बढ़कर बुद्धि या कोई और उत्तम वरदान है, वह निश्चय जाने कि परमेश्वर ही ने उसे इसके लिए रचा है।

फिर, जब हम वयस्क होते हैं, तब भी परमेश्वर को हमें आगे बढ़ाते रहना और हमारी अगुवाई करनी पड़ती है, चाहे वह किसी गुप्त सामर्थ्य से ही क्यों न हो। हम देखते हैं कि अन्यजातियाँ भी अपने बच्चों के पालन-पोषण की कुछ चिन्ता करती हैं, और उनमें से कुछ का मन अपनी पढ़ाई में औरों से अच्छा लगता है। परन्तु फिर भी वे जैसे भी निकलें, ऊपर से उनकी अगुवाई और संचालन परमेश्वर ही करता है, इसलिए सब कुछ उसी का माना जाना चाहिए। और यहाँ आप देखते हैं कि सन्त पौलुस ने यह कहकर कि परमेश्वर ने अपना पुत्र उस पर प्रकट किया, यह क्यों जोड़ा कि जैसे उसने उसे प्रचार करने को बुलाया, वैसे ही उसने पहले से उसे औरों में से अलग भी कर रखा था: अर्थात् उसने उसे दृढ़ता से थामे रखा था, जैसे वह जो भली-भाँति जानता हो कि उसे किस सेवा में लगाना सबसे उचित होगा। तो जब ऐसा है, तो हमारे पास दीनता से चलने का कारण है, यह निश्चय करके कि यदि हम में कोई उत्तमता हो, तो हम में से हर एक उस पर अपनी निज की वस्तु के समान घमण्ड न करे, वरन् यह स्वीकार करे कि जो कुछ उसने हमें दिया है उस सब का कर्ता परमेश्वर है, और उसकी केवल भलाई वह सोता है जिससे हम पीते हैं। अब यदि यह अनुग्रह के उन छोटे-से-छोटे दानों तक पहुँचता है जो हम उससे पाते हैं: तो उस अनमोल उपकार के विषय में क्या कहें जो वह हम पर करता है, जब वह हमें अपने सुसमाचार के ज्ञान में बुलाता है, जब वह हमारे लिए स्वर्ग का द्वार खोलता है, यह दिखाने के लिए कि वह हम सब को अपनी सन्तान गिनता है और वह हमारा पिता है, और जब हमारा प्रभु यीशु मसीह हमसे ऐसा जुड़ गया है कि उसके द्वारा हम अनन्त जीवन के विषय में अभी से निश्चिन्त हो गए हैं? क्या हम कह सकते हैं कि हमारा अपना कुछ है, जब परमेश्वर हमें ऐसे धन का भागी बनाता है? तो आप देखते हैं कि इस प्रसंग से हमें यह निष्कर्ष निकालना है कि परमेश्वर ने मनुष्य के जीवन का प्रबन्ध इस प्रकार अपने ही पास रखा है कि हमारे कदमों को चलाना उसी का अपना विशेष कार्य है: और वह जानता है कि उसने हमें किसलिए ठहराया है। और इसलिए हमारा कर्त्तव्य है कि उसकी दया की बड़ाई करें, क्योंकि उसने कृपा करके हमें अपने सुसमाचार पर विश्वास करने के द्वारा प्रकाशित किया, ताकि हम जानें कि वह हमारा पिता है, उस पर भरोसा रखें, और पूर्ण विश्वास के साथ उससे प्रार्थना करें। आइए हम निश्चय जानें कि इसका होना हमारी अपनी स्वतन्त्र इच्छा से नहीं, परन्तु उसके हमें अपने पवित्र आत्मा के द्वारा मर्म तक छू लेने से है। क्योंकि हमारा प्रभु यीशु मसीह, जिसमें सारी बुद्धि है, हमसे तब तक नहीं जाना जा सकता जब तक वह प्रकट न किया जाए, जैसा वह स्वयं कहता है कि कोई मनुष्य उसके पास नहीं आ सकता जब तक पिता उसे न खींचे। देखिए, यीशु मसीह उस समय संसार में विचरता था: वह सुसमाचार का प्रचार करता और खुले मुँह से उसकी घोषणा करता था: तौभी वह कहता है कि कोई मनुष्य उसके पास नहीं आएगा, अर्थात् कोई मनुष्य अपने आपको उसकी आज्ञाकारिता में नहीं ढालेगा, जब तक पिता ने अपने पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से उसके हृदय में कार्य न किया हो। अब जब कि यीशु मसीह स्थान की दूरी के कारण और मानव स्वभाव के कारण हमसे अलग है, यहाँ तक कि हम उसे यहाँ नीचे नहीं देखते कि उसका कोई प्रत्यक्ष ज्ञान हमें हो: तो यदि हम उस अनुग्रह से न खिंचें जिसकी चर्चा यहाँ हो रही है, तो हम उसके पास कैसे पहुँचेंगे? और यदि विश्वास परमेश्वर का विशेष दान है, और हम अपने प्रभु यीशु मसीह के पास तब तक नहीं आ सकते जब तक उसका पिता परमेश्वर अपने हाथ से हमें उसके पास न ले जाए: तो जिन्हें दूसरों को खींचना है वे यह अपनी सामर्थ्य से कैसे कर सकते हैं? तब परमेश्वर को अनिवार्य रूप से एक दूसरा कार्य भी करना होगा। और यही कारण है कि सन्त पौलुस दोनों को बताता है: अर्थात् पहला, कि वह स्वयं प्रकाशित किया गया था, और दूसरा, कि वह दूसरे मनुष्यों को उद्धार के उस भले मार्ग पर, जिसमें परमेश्वर ने उसे रखा था, खींचने के लिए गुरु और शिक्षक ठहराया और स्थापित किया गया था।

इसलिए हम निश्चय जानें कि जिन्हें सुसमाचार का प्रचार करने का भार सौंपा गया है, उन्हें परमेश्वर एक अनोखा अनुग्रह देता है, जब वह कृपा करके उन्हें इस काम में लगाता है। और यह केवल इसलिए नहीं कि हम, जो उस दशा और पद में हैं, परमेश्वर के भय में चलें और अपने लिए कुछ न जताएँ, परन्तु इसलिए भी कि हर मनुष्य इस विषय में उस प्रेम का प्रमाण पाए जो परमेश्वर अपनी कलीसिया से रखता है। यदि मनुष्य अपनी ही सनक से आगे धँस पड़ें, तो कहा जा सकता था कि हमें अन्धाधुन्ध सिखाया गया। परन्तु जब हम जानते हैं कि कोई मनुष्य इतना समर्थ नहीं कि यीशु मसीह के विषय में वैसा मुँह खोले जैसा उसके विषय में बोलना चाहिए, वरन् परमेश्वर ही उन्हें भेजता है जिनसे हमें सीखना उचित है: तो इससे हम उस चिन्ता को जान लेते हैं जो वह हमारे लिए रखता है, और कहीं अधिक अच्छी तरह पाते हैं कि वह हमारा पिता है और उसने हमें भुलाया नहीं।

और इसके अतिरिक्त, यह सुसमाचार की सच्चाई को हमारे हृदयों में अंकित करने के काम आता है, ताकि हम जानें कि यह ऐसी शिक्षा नहीं जो मनुष्यों से निकली हो, वरन् परमेश्वर की भेजी हुई है। और यद्यपि उसकी सेवा उसके सृजे हुए प्राणियों के द्वारा होती है, तौभी वह उन्हें अपने आत्मा के यन्त्र बनाता है, और वह स्वयं उनका संचालन करता है। इस प्रकार आप वास्तव में देखते हैं कि हम इस शिक्षा से कैसे लाभ उठा सकते हैं। परन्तु हम परमेश्वर के अनुग्रह को और भी भली-भाँति तब समझते हैं जब यह कहा जाता है कि उसने हमें अपनी माताओं के गर्भ ही से चुना और अपने लिए रख छोड़ा है। तौभी इससे यह बाधा नहीं होती कि उसने हमें जगत की सृष्टि से पहले ही अलग कर रखा था, जैसा सन्त पौलुस अन्य पदों में कहता है: यद्यपि यही बहुत है कि इस स्थान में वह उस सब को निकाल देता है जो कभी मनुष्यों से आता है। जब कोई बच्चा अपनी माता के गर्भ से निकलता है, तो वह अपने साथ क्या लाता है? [उसमें] कौन-सी योग्यता है? निश्चय वह तो मैल और अशुद्धता से भरा एक बेचारा शव है।

तो अब, यदि परमेश्वर हमें उस समय चिह्नित करता है जब हम में ऐसा कुछ नहीं जो उसके ग्रहण करने के योग्य हो, या जो किसी प्रेम या प्रसन्नता के योग्य ठहरे: तो इससे हम जान सकते हैं कि यदि वह बाद में हमें किसी आदरणीय सेवा में लगाता है, तो वह उसकी अपनी दया के कारण है, ठीक वैसे ही जैसे वे लोग जिन्हें परमेश्वर अपने झुण्ड में इकट्ठा करता है, उसकी भलाई के यन्त्र कहलाते हैं। तो आप देखते हैं कि सन्त पौलुस अपने जन्म की चर्चा जान-बूझकर क्यों करता है: यह दिखाने के लिए कि जब परमेश्वर ने उसे खींचा, तब उसकी ओर से कोई तैयारी नहीं थी, परन्तु परमेश्वर ने अपने ही अनन्त चुनाव को देखा, जिसे उसने इस रीति से निभाया कि उसकी इच्छा थी कि वही प्राणी संसार में आए, और उसने उसे सदा उसी लक्ष्य की ओर चलाया।

तो आइए हम निश्चय जानें कि जब कभी परमेश्वर हमें अपनी कोई भी आशीष देता है, तो हमें सदा इसी सिद्धान्त की ओर लौटना चाहिए, अर्थात् उसके सनातन संकल्प तक चढ़ना चाहिए। इसलिए नहीं कि हम समझ सकें कि उसने हमें कैसे या क्यों चुना (क्योंकि यह मनुष्य की सारी समझ से परे है), परन्तु इसलिए कि हमें यह निष्कर्ष निकालना है कि परमेश्वर का हमें उन लोगों के आगे प्राथमिकता देना, जिन्हें वह त्यागे हुओं के समान छोड़ देता है, इस कारण नहीं कि उसने हमें ऐसे उपकार के योग्य या पात्र पाया, वरन् इसलिए कि उसने हमें रचने और संसार में रखने से पहले, बल्कि आकाश और पृथ्वी के होने से भी पहले, ऐसा ठहराया था। और यही कारण है कि कहा जाता है कि हमारे प्रभु यीशु मसीह के पास आने से पहले हमारा उसे दिया जाना आवश्यक है। और यह दान कौन करता है? यह ऐसा नहीं कि हर मनुष्य अपनी ही स्वतन्त्र प्रेरणा से अपने आपको अर्पित कर दे।

यह सच है कि हमें ऐसा करना चाहिए: क्योंकि हमारे विश्वास में आज्ञाकारिता और बलिदान सम्मिलित है, इसलिए हमें उचित है कि अपने आपको स्वेच्छा से परमेश्वर को समर्पित करें, और अपने शरीर और अपनी आत्मा दोनों को अपने प्रभु यीशु मसीह को भेंट कर दें, क्योंकि उसने हमें मोल लिया है। तथापि यह (जैसा मैंने कहा) हमारी अपनी स्वतन्त्र प्रेरणा से नहीं है, परन्तु परमेश्वर को हमें इसके लिए झुकाना पड़ता है। और ऐसा क्यों? इसलिए कि हम पहले ही से उसके थे। और हम उसके कैसे हुए? विरासत से नहीं, और न किसी ऐसे अधिकार से जो हम अपनी ओर से जता सकें, परन्तु केवल इसलिए कि उसने हमें चुना। तो अब हम देखते हैं कि इस पद का अर्थ क्या है। परन्तु आइए उस मुख्य बात की ओर लौटें जिसकी चर्चा सन्त पौलुस यहाँ करता है। क्योंकि जो बातें मैंने अब तक कही हैं, वे केवल यह दिखाने के लिए हैं कि हमारा गोद लिया जाना परमेश्वर को उसकी महिमा से वंचित करने के लिए नहीं है, जो काम वे करते हैं जो अपनी स्वतन्त्र इच्छा, गुणों और पुण्यों की डींग मारते हैं।

इसलिए आइए हम ऐसा सारा अभिमान दूर करें, और मानें कि हम सब बातों के लिए परमेश्वर के ऋणी हैं। तथापि, आइए इसके साथ यह भी सोचें कि सन्त पौलुस का इस परिवर्तन का वर्णन करना इसलिए है कि हमें पूरी तरह निश्चय हो जाए कि जो शिक्षा उसने अपने जीवन-काल में हमें दी, और जो अब भी हमारे पास लिखित रूप में है, वह इस संसार की नहीं, न उसके अपने मस्तिष्क की गढ़ी हुई है, परन्तु ऐसी बात है जिसके लिए परमेश्वर ने उसे तैयार किया था। और हमें ऐसे निश्चय पर स्थिर होने की आवश्यकता है, क्योंकि नहीं तो, जब कि हमारे विश्वास को शैतान और उन सब बातों पर जो हमारे उद्धार के विरुद्ध हैं, प्रबल होना चाहिए, वह सदा डगमगाता रहेगा, बल्कि एक डाँवाडोल मत ही रह जाएगा।

परन्तु अब आइए थोड़ा देखें कि हमें कैसी लड़ाइयाँ सहनी पड़ती हैं। यदि हम मनुष्यों पर टेक लगाएँ, तो हमारा क्या होगा? हम में कौन-सी स्थिरता होगी? क्योंकि हम प्रतिदिन इतनी परीक्षाओं से घिरते हैं कि सब सम्भावना के अनुसार हम दब जाएँ और नष्ट हो जाएँ: उदाहरण के लिए, इसमें कि हमारा स्वभाव सर्वथा अविश्वास, झूठ, व्यर्थता और छल की ओर झुका हुआ है: और फिर इसमें कि हम में इतनी अभिलाषाएँ हैं, जो आँधियों और बवण्डरों के समान हमारे सारे विश्वास को उलट देने को हैं: यदि हम परमेश्वर पर आधारित न होते और यह न जानते कि जिस शिक्षा पर हम चलते हैं वह उसके मुँह से निकला हुआ शुद्ध सत्य है, तो क्या हमारे लिए खड़े रहना या कोई दृढ़ता रखना सम्भव होता?

इसलिए सबसे पहले हमारे लिए यही होना आवश्यक है। यह सच है कि पोप-मतवादियों में लोग किसी कल्पना से ही सन्तुष्ट हो जाते हैं। क्योंकि उनके यहाँ इतना ही बहुत है कि जैसा कलीसिया विश्वास करती है, वैसा ही विश्वास करें, जैसा वे कहते हैं। तथापि इसी बीच शैतान उन्हें अपने जालों में रखता है, और वे भोले पशुओं के समान हैं जो पूरी तरह अन्धे हैं। परन्तु हमारे लिए आवश्यक है कि हमें सब सन्देहों से परे यह निश्चय हो कि हमें परमेश्वर ने सिखाया है, और जिस वचन पर हम चलते हैं वह उसी का है। इसलिए हमारा कर्त्तव्य है कि सन्त पौलुस की लाई हुई शिक्षा के प्रचार को ध्यान से सुनें, और साथ ही यह भी सोचें कि सन्त पौलुस अपनी सनक से आगे नहीं धँसा, परन्तु परमेश्वर ने उसके द्वारा, उस यन्त्र के रूप में जिसे उसने इसी उद्देश्य से ठहराया था, अपना प्रयोजन पूरा किया।

तो आप देखते हैं कि यहाँ जो कहा गया है उसे हमें किस ओर लगाना चाहिए। क्योंकि यदि सन्त पौलुस बचपन से मसीही धर्म पर चलता, या उसने उसे पाठशाला में सीखा होता, तो निश्चय वह परमेश्वर का दान होता: परन्तु तब हमारे पास वैसा खुला प्रमाण और प्रत्यक्ष साक्षी न होता जैसा उसके परिवर्तन से हमारे पास है, कि वह फाड़ खानेवाले भेड़िए से न केवल भेड़ बन गया, वरन् चरवाहा भी: और जो सुसमाचार का प्राणघातक शत्रु था, वह अब हमारे प्रभु यीशु मसीह का दास बन गया है: और जिसमें पहले निन्दा, क्रूरता, घमण्ड और विद्रोह के सिवा कुछ न था, उसमें हम देखते हैं कि अब परमेश्वर के आत्मा की धुन है, उसमें सारी दीनता और नम्रता है। जब हम इतना बड़ा और अचानक परिवर्तन देखते हैं, तो यह ऐसा ही है मानो परमेश्वर ने जान-बूझकर अपनी सामर्थ्य दिखाई कि सन्त पौलुस नश्वर मनुष्य न समझा जाए।

और इसी कारण वास्तव में परमेश्वर ने मूसा को पर्वत पर उठा लिया और चालीस दिन तक वहीं रखा, जब वह अपनी व्यवस्था का प्रचार करवाना चाहता था। क्योंकि यदि मूसा तुरन्त उन बातों का प्रचार कर देता जो उसने प्रकाशन से जानी थीं, तो निश्चय वह परमेश्वर के सच्चे दास के रूप में अपने कर्त्तव्य से मुक्त हो जाता: परन्तु वह बात उतनी उत्कृष्ट न जानी जाती जितनी वह थी, क्योंकि परमेश्वर ने उसे चालीस दिन पर्वत पर रखा, और फिर चमकते हुए मुख के साथ उतारा, यहाँ तक कि मनुष्य सूर्य के तेज को देखने के समान उसे भी बिना आँखें चौंधियाए नहीं देख सकते थे, और उसे अपने आगे परदा डालना पड़ा।

इसलिए ये सब बातें यह प्रमाणित करती हैं कि उसने व्यवस्था अपने मन से नहीं गढ़ी, परन्तु वह स्वर्ग के एक दूत के समान था, बल्कि दूत से भी कहीं उत्कृष्ट, क्योंकि परमेश्वर ने उसे इसके लिए ठहराया था। प्रेरितों का भी यही हाल है, क्योंकि यीशु मसीह ऐसे लोगों को भली-भाँति चुन सकता था जो बहुत समय पहले से व्यवस्था और पवित्रशास्त्र में अभ्यस्त रहे हों, और संसार की दृष्टि में कुछ मान रखते हों, और मनुष्यों के बीच कुछ प्रतिष्ठा और पद पा चुके हों: परन्तु उसने बेचारे भोले लोगों और कारीगरों को चुना जिन्हें कोई विद्या न थी, और फिर भी उनसे ऐसी अनोखी रीति से बुलवाया कि उनमें जो वाक्पटुता और ज्ञान की उच्चता थी, उसके द्वारा उन्होंने उन सब को पार कर लिया जो संसार में सबसे कुशल और तीक्ष्ण-बुद्धि माने जाते थे।

तो हम देखते हैं कि परमेश्वर के उन्हें इतने अचानक बदल देने से उनकी शिक्षा हमारे लिए और भी अधिकार की ठहरी। सन्त पौलुस के विषय में भी यही बात है। इसलिए यह वह बात है जो हमें दृढ़ करनी चाहिए, और जब कभी हम उस शिक्षा से सिखाए जाएँ जो वह लिखित रूप में छोड़ गया है, तो हम निश्चय जानें कि परमेश्वर हमसे बोलता है, और वह हमारे प्रभु यीशु मसीह का यन्त्र था। वह आगे यह भी कहता है कि उसने तब मांस और लहू से, अर्थात् किसी नश्वर मनुष्य से, परामर्श नहीं किया, परन्तु सीधा अरब को चला गया, जहाँ वह तीन वर्ष रहा, और वहाँ से यरूशलेम को लौटा कि पतरस से भेंट करे, और उसके और याकूब के सिवा चेलों में से और किसी को नहीं देखा।

इसमें पहली दृष्टि में ऐसा लग सकता है कि सन्त पौलुस ने बाकी प्रेरितों की बहुत अधिक उपेक्षा की। क्योंकि यद्यपि उसे सुसमाचार का ज्ञान था, तौभी वह और भी दृढ़ किया जा सकता था, और जो मेल और एकता परमेश्वर की सन्तानों में आपस में होती है, वह उन्हें और बल देती है, जैसा हम अनुभव से पाते हैं। तब तो ऐसा लगता है कि सन्त पौलुस ने ऐसे साधन की उपेक्षा की जो उसके अपने लिए उचित था और सारी कलीसिया के बहुत काम आ सकता था। परन्तु उसे दूसरी ओर खींचनेवाला एक विशेष कारण था: वह यह कि मनुष्य यह न सोचें कि यह सांसारिक साधनों से हुआ, क्योंकि यह अभी भली-भाँति जाना नहीं गया था। तब यदि वह यरूशलेम जाता और प्रेरितों से बातचीत करता, तो लोग कहते कि यह मनुष्य किसी सन्देह में है, इसलिए वहाँ विवाद करने गया था और अन्त में हार गया। और इस प्रकार यह समझा जाता कि यह मनुष्य का काम था, और परमेश्वर की महिमा इससे उतनी ही धूमिल हो जाती।

परन्तु जब सन्त पौलुस ऐसा मनुष्य था जो क्रूरता से भरा था, जो सुसमाचार की स्मृति तक को मिटा देने के सिवा और कुछ नहीं चाहता था, शहीदों का लहू बहानेवाला, परमेश्वर का निन्दक, और बेचारे निर्बलों को यीशु मसीह का इनकार करने पर विवश करनेवाला: जब लोग उसे ऐसा ही देखते थे, अर्थात् ऐसे क्रोध में आपे से बाहर मनुष्य के रूप में जो जब तक सुसमाचार को गिरा न दे तब तक न रुकता: और फिर भी उन्होंने उसे पल भर में ऐसा बदला हुआ देखा, और किसी मनुष्य ने उससे बात भी न की: हाँ, और वह अन्धा होकर भूमि पर पटक दिया गया, यहाँ तक कि वहाँ एक बेचारे मृतक के समान पड़ा रहा, और फिर मानो कब्र से जिला उठाया गया, और चमत्कार से उसकी आँखें खुल गईं, ऐसे कि परमेश्वर ने हनन्याह नामक एक अल्प-ख्यात मनुष्य को उसके पास भेजा, जिसने उसे बपतिस्मा दिया, उसे दृढ़ किया, और पवित्र आत्मा के प्रत्यक्ष चिह्न पाने दिए: और उसके बाद वह अरब को चला गया, ऐसा देश जहाँ यीशु मसीह की चर्चा पहले कभी न हुई थी (क्योंकि यद्यपि यहूदी कुछ बिखरे हुए थे, तौभी सुसमाचार सर्वथा अज्ञात था): मैं कहता हूँ, जब हम देखते हैं कि सन्त पौलुस ने किस प्रकार वह मार्ग अपनाया: तो कौन कह सकता है कि उसने मनुष्यों से कुछ सीखा, या कि वह विवाद से, या तर्क से, या किसी और [सांसारिक] साधन से उसमें जीत लिया गया था? वरन् हमें मानना पड़ेगा कि जो कुछ उसमें पाया जाता था, वह परमेश्वर का उसमें डाला हुआ था। तो यही वह विशेष कारण था कि सन्त पौलुस ने प्रेरितों से बातचीत नहीं की। और सच तो यह है कि यहाँ वह उनके विषय में मानो तिरस्कार के ढंग से बोलता है, उन्हें मांस और लहू कहकर।

तथापि, जब हम अपने प्रभु यीशु मसीह की तुलना उनसे करते हैं, तो इससे उन वरदानों का अनादर नहीं होता जो उन्होंने परमेश्वर से पाए थे। और हमें इसे भली-भाँति ध्यान में रखना चाहिए। क्योंकि जब हम मनुष्यों के विषय में बोलते हैं, तो निश्चय उन्हें मांस और लहू कहा जा सकता है, जैसा हम यूहन्ना के पहले अध्याय में देखते हैं कि वे कहलाते हैं। तो आप देखते हैं कि मनुष्य अपने स्वभाव से भ्रष्टता के सिवा कुछ नहीं हैं। और क्योंकि वे अपनी बुद्धि और सामर्थ्य पर, या अपनी धार्मिकता और साहस पर बहुत घमण्ड करना चाहते हैं, इसलिए वह सारा अभिमान और मूर्खतापूर्ण अहंकार दूर करने के लिए परमेश्वर कहता है, “तुम क्या हो? मांस और लहू।” हाँ, और कभी-कभी इस कथन “मांस और लहू” से पवित्रशास्त्र का आशय हमारे इस पापमय स्वभाव से होता है जो हमें आदम के पतन के बाद से मिला है। क्योंकि हम में वह निर्दोषता अब नहीं रही जो हम में थी, वरन् इसके विपरीत हम सर्वथा अज्ञानी, या कहें पशु-तुल्य हैं, और हम में मलिनता के सिवा कुछ नहीं, ऐसे कि हम कोई भी मूल्यवान काम करने के योग्य नहीं, उतनी दूर तक जितनी दूर तक परमेश्वर हमारा संचालन न करे। देखिए, हम किस रीति से मांस और लहू कहलाते हैं। और इसलिए कहा जाता है कि हमारे प्रभु यीशु मसीह के ज्ञान में हमारा प्रकाशित होना हमें विरासत में नहीं मिलता, और न मांस और लहू से प्राप्त होता है, परन्तु हम परमेश्वर की सन्तान इसलिए बनाए जाते हैं कि वह हमें अपने पवित्र आत्मा के द्वारा नए सिरे से जन्म देता है, हाँ एक विशेष रीति से। क्योंकि यदि वह हमें अपने आप पर छोड़ दे, तो हम सर्वथा संसार ही के साथ रहेंगे।

फिर, सन्त मत्ती के सोलहवें अध्याय में कहा गया है कि पतरस और उसके साथियों को मांस और लहू ने नहीं बताया था कि यीशु मसीह परमेश्वर का पुत्र है: परन्तु स्वर्गीय पिता ने। तो आप देखते हैं कि मनुष्य मांस और लहू कैसे कहलाते हैं: अर्थात् जब उनकी तुलना परमेश्वर से की जाती है, यह दिखाने के लिए कि हम में भ्रष्टता के सिवा कुछ नहीं। यह सच है कि हमारी आत्माएँ अमर हैं: तथापि पवित्रशास्त्र हमारे विषय में तिरस्कार के ढंग से ऐसा बोलता है, ताकि हम घमण्ड से रहित हों।

परन्तु प्रेरितों के विषय में, वे तो परमेश्वर के आत्मा से पहले ही नया जन्म पा चुके थे: और इसलिए उन में मांस और लहू से अधिक कुछ था, जैसा हमने अभी उद्धृत पाठ से देखा। तथापि जब कभी उनकी तुलना परमेश्वर से की जाती है, तब हमारे अपने स्वभाव का सारा अंश मांस और लहू के शब्दों में समझा जाना चाहिए। और क्यों? क्योंकि नहीं तो यह प्रश्न उठता कि क्या प्रेरित अपनी योग्यता और उत्कृष्टता से सुसमाचार को हानि पहुँचा सकते हैं, जैसा पहले कहे गए उपद्रवी उसकी आड़ लेने का दिखावा करते थे। परन्तु सन्त पौलुस दिखाता है कि यदि परमेश्वर वह खींच ले जो उसका है, तो पतरस, यूहन्ना या याकूब में कुछ भी न रहेगा, वरन् वे औरों के समान आदम की सन्तान ही रहेंगे, ऐसे कि उनमें भ्रष्टता के सिवा कुछ नहीं। इसलिए जो अनुग्रह-दान परमेश्वर ने उनमें रखे हैं, उनका दुरुपयोग हम उसकी और सुसमाचार की महिमा को घटाने के लिए न करें। तो आप देखते हैं कि सन्त पौलुस यहाँ प्रेरितों के विषय में किस रीति से बोलता है।

क्योंकि हमने सुना है कि उसने पहले क्या कहा था, कि यदि स्वर्ग से कोई दूत सुसमाचार का विरोध करे, तो वह शैतान के समान घृणित और शापित ठहरना चाहिए। और ऐसा कैसे? क्या यह उचित है कि मनुष्य दूतों के विषय में इतने निन्दाभरे ढंग से बोलें, जो इतने श्रेष्ठ सृष्ट प्राणी हैं, और जो परमेश्वर की स्वर्गीय प्रधानताएँ और शक्तियाँ कहलाते हैं? उनके साथ ऐसा करना कोई अन्याय नहीं, जब बात हमारे प्रभु यीशु मसीह को, जो उनका सिर है, सर्वोच्च प्रभुता देने की आती है, क्योंकि उनके लिए उचित है कि वे उसके अधीन रखे जाएँ।

इसलिए हम यह न समझें कि हमारे साथ कोई अन्याय हो रहा है, चाहे हम सौ बार पैरों तले रौंदे जाएँ, यदि वह परमेश्वर के नाम की बड़ाई के लिए हो, और हमारे प्रभु यीशु मसीह को उसका प्राप्य और सर्वोच्चता सुरक्षित रहे, ताकि वह क्या बड़े क्या छोटे, सब से सुना जाए, और सब मनुष्य विश्वास की सच्ची आज्ञाकारिता में उसके अधीन हो जाएँ।

अब इस पर से हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि अभागे पोप-मतवादी प्रेरितों और शहीदों का आदर करने में कितने अन्धे हैं, इस रीति से कि परमेश्वर अपने आदर और सेवा से लूट लिया जाता है, यहाँ तक कि ऐसा प्रतीत होता है कि जो कुछ उसका है और उसके लिए रखा गया है वह सब [उनके बीच] लूट और शिकार बना दिया गया है। क्योंकि वे उसमें और उसके सृजे हुए प्राणियों में क्या भेद करते हैं? और इसके अतिरिक्त, हमारा प्रभु यीशु मसीह लगभग गाड़ दिया गया है, क्योंकि वे उससे वह पद छीन लेते हैं जो उसे दिया गया था।

क्योंकि हमारा पक्षसमर्थक बनकर हमें अपने पिता परमेश्वर तक पहुँचाने के बदले, और यह कि यदि हम चाहते हैं कि हमारी प्रार्थनाएँ और विनतियाँ सुनी जाएँ तो हम सीधे उसी के पास जाएँ: उन्होंने पक्षसमर्थकों, संरक्षकों और मध्यस्थों की अनगिनत भीड़ खड़ी कर दी है, और यीशु मसीह बिना काम का नौकर बन गया है।

अब जब हम देखते हैं कि सृजे हुए प्राणियों ने मनुष्यों के बीच ऐसा आदर पा लिया है कि उसके द्वारा परमेश्वर मानो पीछे धकेल दिया गया है और उसका वचन दबा दिया गया है: तो इससे हम जान लेते हैं कि शैतान ने सब कुछ उलट-पुलट कर दिया है। इसलिए संसार चाहे जैसा चले, मनुष्यों के विषय में हमारा मूल्यांकन ऐसा हो कि परमेश्वर जो उसका अपना है उसे थामे रहे: और यदि हम उसकी तुलना उसके सृजे हुए प्राणियों से करें, तो सोचें कि सब कुछ व्यर्थ है, और जो प्रशंसा उन्हें यहाँ मिलती है, वह परमेश्वर का हमें दिया हुआ अपने प्रेम का साक्षी है, ताकि हम उसकी ओर बढ़ते जाएँ और वह ऊँचा किया जाए।

हाँ, और आइए हम यह भी सोचें कि हम परमेश्वर का आदर वैसा नहीं कर सकते जैसा वह योग्य है, सिवा इसके कि हम अपने आपको उसके वचन के अधीन करें। क्योंकि वे सब जो बहुत-सी रीतियाँ बनाते हैं ताकि मनुष्यों को विश्वास दिलाएँ कि वे परमेश्वर की सेवा करना चाहते हैं, उसे अप्रिय हैं, जब तक कि वे उसके और उसके वचन के भी अधीन न हो जाएँ। और यही कारण है कि सन्त पौलुस सुसमाचार के अधिकार के लिए संघर्ष करता है। क्योंकि वह यही बहुत नहीं समझता कि परमेश्वर और यीशु मसीह की चर्चा हो: परन्तु वह चाहता है कि हर मनुष्य सुसमाचार में निहित शिक्षा को बिना विरोध के ग्रहण करे।

और इससे हम देखते हैं कि आजकल सारा धर्म कैसे बिगड़ गया है, और पोप-मत में नारकीय गड़बड़ी के सिवा कुछ नहीं। क्योंकि हमारे प्रभु यीशु मसीह की चर्चा तो बहुत होती है, परन्तु किस प्रकार? क्या वे उसकी सामर्थ्य को जानते हैं? क्या वे बता सकते हैं कि उसे उसके पिता परमेश्वर ने किस उद्देश्य से भेजा, और वह हमारे लिए कौन-से उपकार लाता है? बिलकुल नहीं। वह जगत का उद्धारकर्ता कहलाएगा, और इसी बीच हर मनुष्य अपना उद्धार अपने ही में खोजता है, या किसी ऐसे सन्त के हाथ से जो उसने स्वयं गढ़ लिया है।

देखिए वे किस दशा में हैं। और इसलिए हमारे लिए और भी आवश्यक है कि जो बात यहाँ हमें दिखाई गई है उसे स्मरण रखें: वह यह कि जब कभी परमेश्वर की बात होती है, तो सूर्य और चन्द्रमा तक को अनिवार्य रूप से अँधेरा हो जाना चाहिए (जैसा भविष्यद्वक्ता में कहा गया है), और ऐसा कोई नहीं जो पैरों तले न रौंदा जाए, ताकि परमेश्वर को सब में प्रमुखता मिले। और क्योंकि परमेश्वर हमारा किया हुआ कोई आदर या सेवा तब तक ग्रहण नहीं करता जब तक हम उसके वचन के अधीन न हों: इसलिए आइए हम सुसमाचार की सारी शिक्षा को ग्रहण करें और कोई बात हमें उसके प्रति ऐसा आदर देने से न रोके कि जो कुछ उसमें निहित है उस सब के अधीन हो जाएँ। इस स्थान से, जहाँ प्रेरित मांस और लहू कहलाए हैं, हमें सार रूप में यही बात ग्रहण करनी है।

इसके अतिरिक्त, जहाँ सन्त पौलुस यह जोड़ता है कि वह पतरस से भेंट करने यरूशलेम गया: यह एक पक्का प्रमाण है कि अरब जाने की उसकी पहले की चर्चा किसी अभिमान या तिरस्कार से नहीं थी, परन्तु इसलिए थी कि परमेश्वर का अनुग्रह जाना जाए, और कोई सांसारिक साधन परदे का काम न करे जिससे मनुष्य यह जानने से रुक जाएँ कि यीशु मसीह ने अनोखे चमत्कार से कार्य किया, कि जो मनुष्य पहले ऐसा हठीला था, वह बुलावे पर आ गया। तो आप देखते हैं कि एक ओर सन्त पौलुस परमेश्वर का प्राप्य उसी के लिए सुरक्षित रखना चाहता था: और दूसरी ओर फिर भी वह दिखाना चाहता था कि उसके और अन्य प्रेरितों के बीच भली एकता थी। और हमें भी ऐसा ही करना चाहिए। क्योंकि इस विषय में बहुत से मनुष्यों में सदा दो बुरी अतियाँ पाई जाती हैं।

कुछ ठट्ठा करनेवाले हैं जो परमेश्वर के अनुग्रह की बड़ाई करने का दिखावा करते हैं, और इसी बीच परमेश्वर के विश्वासघाती हैं, विष और घमण्ड से भरे हुए, अपने सपनों और सनकों को उससे बढ़कर मानते हैं। यदि कोई उनसे कहे, यह क्या बात है? जब परमेश्वर ने बहुत से मनुष्यों को अनुग्रह दिया है, और वे पवित्रशास्त्र में निपुण जाने जाते हैं, और विश्वासयोग्यता से हमें सुसमाचार सुनाने में लगे हैं: तो आप उनसे सहमत क्यों नहीं होते? वे कहते हैं, ओह! मुझे पृथ्वी पर जीवित किसी मनुष्य से कुछ लेना-देना नहीं, मैं परमेश्वर को छोड़ किसी पर आधारित नहीं। ये घमण्डी और अकड़वाले हैं, जो दिखावा करते हैं कि पवित्र आत्मा उनके सिर में है, और पवित्र आत्मा के कुछ प्रकाशन उनके पास हैं, और फिर भी वे कलीसिया की एकता तोड़ते हैं, और परमेश्वर के अनुग्रह-दानों को तुच्छ जानते हैं।

इसलिए हमारे लिए और भी आवश्यक है कि जो मर्यादा हम यहाँ देखते हैं उसे बनाए रखें। क्योंकि यद्यपि सन्त पौलुस ने एक ओर यह घोषित किया है कि वह मन फिराते ही सीधा अरब चला गया, ताकि यह जाना जाए कि यीशु मसीह ही उसका एकमात्र गुरु और शिक्षक था, जैसा वास्तव में वही सदा हम पर प्रमुखता रखे: तथापि उसने [दूसरी ओर] यह भी भली-भाँति दिखाया है कि वह बाकी प्रेरितों के साथ भली सहमति की एकता में रहना चाहता था, और सारे संसार को यह जनाना चाहता था कि उसका मन उनके साथ सहमत होने का था, और कि वे पवित्र आत्मा के यन्त्र थे। क्योंकि जैसा मैं पहले दिखा चुका हूँ, हमारे विश्वास की दृढ़ता के लिए यह कोई छोटी सहायता नहीं, जब हम आपस में ऐसे जुड़े हों, और परमेश्वर किसी एक ही मनुष्य को नहीं बुलाता, वरन् बहुतों को रखता है जो अपने आपको उसके अधीन करते हैं, ऐसे कि दिखाई दे कि वे सब एक ही आत्मा से चलाए जाते हैं, कि वे सब एक मन के हैं, कि वे सब एक ही लक्ष्य पर निशाना लगाते हैं, और कि वे स्वर्गीय जीवन की मीरास की ओर बढ़ते हुए अपने आपको परमेश्वर की सन्तान दिखाते हैं।

तो यह सहायता हमारे विश्वास की दृढ़ता के लिए उपयुक्त है: और सन्त पौलुस के लिए यह दिखाना आवश्यक था कि वह प्रेरितों के साथ ठीक रीति से जुड़ा था, और उनसे अलग होना नहीं चाहता था। इसलिए आइए हम यहाँ दिखाए गए व्यवहार के ढंग को ध्यान में रखें, ताकि हम किसी एक अति की ओर न भटकें, न दूसरी की ओर।

परन्तु कुछ ऐसे हलके मन के हैं कि वे सुसमाचार की शिक्षा को यों ही छोड़ देते हैं, और जैसे ही किसी को बोलते सुनते हैं, तुरन्त वह जो कुछ कहे उसे ग्रहण कर लेना चाहते हैं। तथापि यदि हम इससे अधिक स्थिर नहीं हैं, तो क्या हम उन सब चेतावनियों के सामने टिक सकेंगे जो शैतान, हमारा प्राणघातक शत्रु, हमें देगा? तब मनुष्यों को अपने काम पर दृढ़ खड़ा रहना चाहिए, और हम सब, बड़े से छोटे तक, अपने प्रभु यीशु मसीह से जुड़े रहें। क्योंकि जैसे वह हमारा सिर है, वैसे ही उसे ऊँचा भी किया जाना चाहिए, और (जैसा यशायाह भविष्यद्वक्ता कहता है) वह वह निशाना है जिस पर सब मनुष्यों को दृष्टि रखनी है।

चूँकि ऐसा है, इसलिए आइए हम सीखें कि मनुष्यों के बाहरी रूप पर इस प्रकार न टिकें कि वह परमेश्वर के पुत्र की महिमा में बाधा बने। परन्तु फिर भी, जब हम उस बात पर पूरी तरह स्थिर हो जाएँ: तो हम सब उस से सिखाए जाने में सन्तुष्ट हों जो हमारे शिक्षक होने के लिए हमें दिया गया है, और इतने घमण्डी न हों कि हर एक अपनी ही धारणा पर अड़ा रहे, (क्योंकि इस प्रकार हम कलीसिया में फूट ही डालेंगे:) परन्तु साथ मिलकर सहमत होना चाहें, और हम में से हर एक वह आगे रखे जो उसे दिया गया है, ताकि हमारे विश्वास की एकता हमें आपस में [एक बन्धन के रूप में] जोड़े, कि हम परमेश्वर का एक ही मन्दिर बनें।

क्योंकि यह व्यर्थ नहीं कहा गया कि हम वे जीवित पत्थर हैं जिनसे परमेश्वर का मन्दिर बनाया जाता है। अब यदि हम में से हर एक दूसरे से अलग होकर अकेला छोड़ दिया जाए: तो उसका क्या होगा? क्या कोई भवन बनेगा? नहीं: वरन् इसके विपरीत पूरा उजाड़ हो जाएगा। यदि हम चाहते हैं कि परमेश्वर हमारे बीच बसे और हमारे घराने का बने, तो हमें उसकी सच्ची उपासना करनी चाहिए, और हम में से हर एक जितना सम्भव हो अपने पड़ोसियों से मेल रखे। इसका यह अर्थ नहीं कि हम परमेश्वर से हटकर मनुष्यों से चिपक जाएँ (क्योंकि इससे तो यह अच्छा होगा कि हम सब आपस में फूट रखें और आग की तरह तपकर एक-दूसरे से गुँथे रहें:) परन्तु जब हम परमेश्वर से जुड़े हों, तब वही अच्छा मेल है: और यही वह साधन है जिससे हम उस मार्ग पर बने रहें जिस पर सन्त पौलुस रहा, जिसने परमेश्वर की महिमा को धूमिल करने या सुसमाचार की शिक्षा में बाधा डालने के लिए अपने को प्रेरितों के बराबर न ठहराया, और फिर भी परदेश से उन्हें ढूँढ़ने आने में चूका नहीं, हाँ बड़े परिश्रम से और बहुत कठिन परीक्षा सहकर: क्योंकि (जैसा हम देखते हैं) उन्होंने उस पर यह दोष लगाया कि वह परमेश्वर और उसकी सच्चाई का सतानेवाला रहा था।

चूँकि सन्त पौलुस इस रीति से यह दिखाने आया कि वह बाकी प्रेरितों के कितना अनुरूप है, और इसकी साक्षी सारी कलीसिया को दे: इससे हम देखते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने की जो इच्छा उसमें थी, और परमेश्वर के वचन को सब सृजे हुए प्राणियों से ऊपर बढ़ाने की उसकी दृढ़ता, उसे शिष्टता और नम्रता से भरे होने से न रोक सकी। और हमें भी ऐसा ही करना चाहिए। अर्थात्, हमें अपने भाइयों की सहमति को ग्रहण करना और अपने आपको उनके अनुरूप ढालने का यत्न करना चाहिए, इस प्रकार कि हम सब एक देह के अंग हों, और यीशु मसीह हमारा सिर हो, और हम बिखर न जाएँ, और न हर एक अकेला अपनी राह चले, परन्तु इस रीति से एक-दूसरे से संगति रखें कि हर एक अपने पड़ोसी की अगुवाई करे, और सब एक ही लक्ष्य की ओर बढ़ें, और हम में से हर एक दूसरे को हियाव दे, ताकि हम में भली सहमति दिखाई दे।

यह सच है कि हम सब मनुष्यों के साथ मेल नहीं रख सकते: इसमें हम बहुत चूकेंगे। और इसलिए सन्त पौलुस दूसरे स्थान में कहता है कि हमें सब मनुष्यों के साथ मेल रखने का यत्न करना चाहिए, कम से कम जहाँ तक हमारा वश चले: जिससे वह दिखाता है कि हमें बहुतों से विरोध रखने पर विवश होना पड़ेगा। क्योंकि शैतान के बहुत अधीनस्थ हैं, और वे सब परमेश्वर के वचन के विरुद्ध ठने हुए हैं: और यदि हम चाहते हैं कि सुसमाचार की शुद्ध शिक्षा हमारे पक्ष में हो, तो हमें भी उनके विरुद्ध खड़ा होना होगा। परन्तु बात चाहे जैसी हो, यदि हम किसी को अपने प्रभु यीशु मसीह के अधीन होने को तैयार देखें, तो उसे ग्रहण करें, उससे आगे बढ़कर मिलें, पूरी तरह साथ सहमत होना चाहें, और यह न चाहें कि हमारा आदर औरों से बढ़कर हो, और न यह कहें कि अजी! यदि मैं ऐसे मनुष्य से सहमत हो जाऊँ, तो लगेगा कि मैं उसका अधीनस्थ बन गया। यदि हम में ऐसा घमण्ड हो तो हम पर हाय। परन्तु हमारी एकमात्र खोज यह हो कि यीशु मसीह हमारा सिर हो, और हम इस रीति से उसकी देह के अंग बनें कि हम सब उसकी उपासना करें और विश्वास की एकता में एक ही मुँह से उसे पुकारें।

और अब आइए हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सम्मुख अपने दोषों को मानकर गिर पड़ें, उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उन्हें अधिकाधिक अनुभव कराए, ताकि हम उनसे घृणा करें, और उससे विनती करें कि वह अपने पवित्र आत्मा से उन्हें सुधारे, ताकि अपने पापों और दुर्दशा से पूरी तरह छूटकर हम उसके स्वरूप के अनुसार नए बनाए जाएँ, कि हमारे सारे जीवन में उसकी महिमा हो, और इसी बीच वह हमारी निर्बलता में हमें सहे, जब तक कि वह हमें उस सिद्धता तक न पहुँचा दे जिससे हम सब भटक गए हैं। और इसलिए आइए हम सब कहें, सर्वशक्तिमान परमेश्वर, स्वर्गीय पिता। इत्यादि।

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