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चौबीसवाँ उपदेश, जो चौथे अध्याय पर पहला उपदेश है - गलातियों 4:1-4
जो चौथे अध्याय पर पहला उपदेश है।
1 मैं यह कहता हूँ कि जब तक वारिस बालक है, तब तक यद्यपि वह सब वस्तुओं का स्वामी है, तौभी उसमें और दास में कुछ भेद नहीं:
2 परन्तु पिता के ठहराए हुए समय तक वह रखवालों और भण्डारियों के वश में रहता है।
3 वैसे ही हम भी, जब बालक थे, तो संसार की आदि शिक्षा के वश में होकर दास बने हुए थे।
4 परन्तु जब समय पूरा हुआ, तो परमेश्वर ने अपने पुत्र को भेजा, जो स्त्री से जन्मा और व्यवस्था के अधीन उत्पन्न हुआ।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि मनुष्यों के उद्धार पाने का एक ही उपाय रहा है, इससे अधिक कभी कोई उपाय नहीं हुआ। और जो बहुत लोग अपने मन में यह समझते हैं कि वे अपने ही पुण्य से उस वस्तु को पा लेंगे जिसकी वे आशा रखते हैं, वह केवल एक उपहास है और अपने आप को छलना है। क्योंकि (जैसा पहले दिखाया जा चुका है) हम सब के सब परमेश्वर की ओर से त्यागे हुए, शापित और क्रोध की सन्तान हैं। अपनी ओर से हम उसे फिर पाने में समर्थ नहीं जो हमने आदम में खो दिया, परन्तु परमेश्वर को अपनी असीम भलाई के कारण इस विषय में स्वयं कार्य करना पड़ा: क्योंकि और सब सहारे व्यर्थ और निष्फल हैं। परन्तु अब परमेश्वर ने एक ही उपाय ठहराया है जिससे मनुष्य शापग्रस्तता के उस अन्धकूप से निकल सकें जिसमें हम सब बन्द पड़े हैं। इसलिए अवश्य है कि प्राचीन काल के पुरखे परमेश्वर के केवल अनुग्रह से उद्धार पाए, जैसे हम पाते हैं, जो आज के दिन वैसे ही उद्धार की आशा रखते हैं। क्योंकि 2 कुरिन्थियों में देखा जा सकता है कि परमेश्वर ने सब युगों में जितनी प्रतिज्ञाएँ दी हैं, वे सब हमारे प्रभु यीशु मसीह पर आधारित थीं, और वही उनकी गारंटी है, जिससे वे प्रभावशाली होती हैं और हमारे प्रति सामर्थ्य और बल पाती हैं। सो संक्षेप में, अवश्य है कि सब विश्वासियों के लिए, चाहे वे आज के हों, चाहे जगत के आरम्भ से किसी भी समय जीवित रहे हों, एक ही उद्धार सबमें साझा हो: और यह भी अवश्य है कि परमेश्वर ने हमें एक मन करके इसलिए इकट्ठा किया है कि हम हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह से उसके साथ मेल-मिलाप पाएँ, और इस रीति से धर्मी ठहराए जाएँ और स्वर्ग की मीरास का आनन्द उठाएँ।
तौभी हम आज की कलीसिया में और व्यवस्था के अधीन रही कलीसिया में बड़ा भेद देखते हैं। क्योंकि पुरखे बहुत सी रीतियों के अधीन थे। उनका खतना बचपन से ही होता था। इसके अतिरिक्त उनके बलिदान, धुलाइयाँ और ऐसी ही और बातें थीं। आज वे सब बातें रद्द हो गई हैं, और उनमें से कोई भी प्रचलन में नहीं। तब हम कैसे कहें कि विश्वास का सार हम में और पुरखों में एक ही है, फिर भी शासन-विधि भिन्न थी और परमेश्वर ने उसे बिलकुल बदल डाला? यदि यह कहा जाए कि यह भिन्नता परमेश्वर की ओर से है, तो ऐसा प्रतीत होगा कि वह परिवर्तनशील है। और यदि कहा जाए कि यह मनुष्यों से हुई है, तो हमें यह निष्कर्ष निकालना पड़ेगा कि हम दो अलग-अलग मार्गों पर चलते हैं, और उनमें और हममें बड़ा अन्तर था।
पहली आपत्ति का उत्तर, जो उठाई जा सकती है, मैं पहले ही दे चुका हूँ: अर्थात् यह कि परमेश्वर में कोई परिवर्तन नहीं, चाहे उसने अपनी कलीसिया में शासन-क्रम को बदल दिया हो। क्योंकि जब वह अच्छा मौसम या बुरा मौसम भेजता है, गर्मी या सर्दी देता है, और वर्ष की ऋतुओं को भिन्न-भिन्न रीति से ठहराता है, तो क्या हम इस कारण कहें कि उसने अपना मन बदल लिया, और वह अपने आप में परिवर्तनशील है? नहीं, वरन् इसके विपरीत हमें कहना चाहिए कि उसने मनुष्य जाति के लिए उचित बातें ठहराई हैं, और तौभी इन परिवर्तनों और फेरबदलों के द्वारा हमें चिताता है कि हमें यहाँ नीचे अपना विश्राम नहीं ढूँढ़ना चाहिए, परन्तु मुसाफिरों की नाईं, और उन लोगों की नाईं जो स्वर्ग के राज्य तक पहुँचने के लिए लम्बी यात्रा पर निकलते हैं, यहाँ से आगे बढ़ जाना चाहिए। दूसरी आपत्ति के विषय में सन्त पौलुस दिखाता है कि यदि हममें और व्यवस्था के अधीन जीनेवाले पुरखों में कोई भेद है, तो वह इस कारण नहीं कि हमारा धर्म एक नहीं है, इस कारण नहीं कि हमारा परमेश्वर एक नहीं है, इस कारण नहीं कि जो प्रतिज्ञाएँ हम पाते हैं वे आज हम पर लागू नहीं होतीं, या इस कारण नहीं कि हमारे प्रभु यीशु मसीह में हाबिल से लेकर जगत के अन्तिम छोर पर पाए जानेवाले लोगों तक, सब मनुष्यों के बीच प्रायश्चित करने की सामर्थ्य सदा नहीं रही: परन्तु वह कहता है कि भिन्नता बाहरी शासन-विधि में है। और इसे भली-भाँति समझाने के लिए वह एक उपमा देता है, जिससे हमें अच्छी तरह परिचित होना चाहिए। क्योंकि यदि कोई पिता अपने बच्चों को अनाथ और समझ की अवस्था से कम आयु का छोड़ जाता है, तो वह उनके लिए रखवाले और भण्डारी ठहराएगा, जब तक वे पूरी आयु के न हो जाएँ। पिता के मर जाने पर उसके बच्चे रखवालों और भण्डारियों के अधीन होंगे, और जो सम्पत्ति उनका पिता उनके लिए छोड़ गया है उसका भोग नहीं करेंगे, तौभी वह सम्पत्ति उन्हीं की है: फिर भी उनका अपने ऊपर अधिकार नहीं होता, परन्तु उनकी मनमानी इच्छा के पीछे चलने देने के बदले लोग उन्हें छड़ी के साथ पाठशाला का भोजन खिलाते हैं। सो तुम देखते हो कि यद्यपि बच्चे वारिस हैं, तौभी पहले दिन उन्हें स्वतंत्रता नहीं मिलती, क्योंकि वे बहुत निर्बल हैं, और उनमें न बुद्धि है न विवेक। अब इसी उपमा के अनुसार सन्त पौलुस कहता है कि पुरखे, (अर्थात् वे यहूदी जो व्यवस्था के अधीन जीए) हमारी नाईं परमेश्वर की सन्तान और वारिस थे: परन्तु कलीसिया तब मानो छोटे बच्चे की नाईं अवयस्क थी, और उसे लगाम की आवश्यकता थी, इसी कारण वे व्यवस्था की दासता और अधीनता में थे।
सन्त पौलुस तब परमेश्वर की व्यवस्था की, जिसके द्वारा यहूदी रीतियों के जुए के नीचे कड़े भय में रखे जाते थे, एक संरक्षकता से तुलना करता है, मैं कहता हूँ कि वह उसकी तुलना संरक्षकता से करता है। परन्तु अब वह समय बीत चुका और जाता रहा, वह कहता है: क्योंकि परमेश्वर ने अपना एकलौता पुत्र भेज दिया है, यहाँ तक कि हम अपने प्रभु में सयाने हो गए हैं और ऐसी पूर्ण आयु को पहुँच गए हैं कि जो शासन व्यवस्था के अधीन था वह अब अनावश्यक और निष्फल है, वरन् वह परमेश्वर की इच्छा और उस क्रम के बिलकुल विपरीत होगा जो उसने ठहराया है। और इस प्रकार हम देखते हैं कि सन्त पौलुस का लक्ष्य क्या था। क्योंकि यह जानना बड़े महत्त्व की बात है कि हमारा प्रभु यीशु मसीह कोई नया आनेवाला नहीं है, मानो परमेश्वर को अचानक यह सूझा हो कि मनुष्य जाति के विनाश का उपाय करे। क्योंकि मसीह के पास वह सामर्थ्य आरम्भ से थी, और सब मनुष्यों के लिए अवश्य था कि वे अपना उद्धार उसी में ढूँढ़ें, क्योंकि विश्वास सदा एक ही रहा है, जैसा प्रेरित इब्रानियों की पत्री में कहता है। और सचमुच हाबिल के बलिदान उसके अपने व्यक्तित्व की किसी योग्यता के कारण, या उसमें के किसी मूल्य के कारण ग्रहण नहीं हुए: परन्तु केवल विश्वास के द्वारा: विश्वास को ही उसकी नींव और टेक बनना पड़ा। इसी कारण प्रेरित यह भी कहता है कि हमारा प्रभु यीशु मसीह जो कल था, वही आज भी है, और अन्त तक वैसा ही रहेगा। इसलिए हमें इस बात में भली-भाँति निश्चित होना चाहिए, एक ऐसी बात के रूप में जिस पर कोई सन्देह और कोई प्रश्न नहीं: अर्थात् यह कि हमें आज के दिनों में उद्धार पाने की कोई नई आशा नहीं मिली, परन्तु वही आशा जो पहले सब समयों में रही है, और यह कि सुसमाचार कोई नया गढ़ा हुआ सिद्धान्त नहीं जो इन थोड़े वर्षों के भीतर रचा गया हो, परन्तु वही शिक्षा है जिसमें वे सब धर्मी जन, जो कभी हुए हैं, सिखाए गए हैं।
और सचमुच पहले कहा जा चुका है कि जब हमें हमारा प्रभु यीशु मसीह मिल जाता है, तब हम लेपालक सन्तान बनाए जाते हैं। क्योंकि सन्त पौलुस यहूदियों की उस मूर्खता और ढिठाई को डाँटना चाहता था कि वे सदा अपनी सांसारिक वंशावली पर घमण्ड करते थे। वह दिखाता है कि इस विषय में हमें परमेश्वर के वचन के उस अविनाशी बीज को छोड़ किसी और बात का ध्यान नहीं करना चाहिए, जिसके द्वारा हम नए सिरे से जन्मे हैं। अब जब परमेश्वर हमें गोद लेता है और हमें अपनी सन्तान करके ग्रहण करता है, तब वह हमें इब्राहीम की आत्मिक सन्तान ठहराता है। तब हम इब्राहीम की सन्तान कैसे हो सकते हैं, जब तक हम विश्वास में उसके साथ एकमत न हों? सो तुम देखते हो कि इस विषय में पौलुस का यहाँ का विवेचन भले उद्देश्य से है: अर्थात् हमें यह समझाने के लिए कि अनादि काल से मनुष्यों को उद्धार के लिए नया करने और उन्हें परमेश्वर की कृपा और प्रेम में लाने का कोई और उपाय नहीं रहा, सिवा इसके कि यीशु मसीह पर भरोसा रखा जाए, और पूर्ण रूप से उसी की शरण में भागा जाए।
सो तुम देखते हो कि क्यों कहा जाता है कि छोटे बच्चे घर के स्वामी हैं और मीरास उन्हीं की है, चाहे आयु के कारण वे अभी उसका भोग नहीं करते। और यहाँ हमें यह भी ध्यान देना है कि प्राचीन काल के पुरखों को उस विश्वास की सहभागिता और एकता से बाहर रखना, जो सन्त पौलुस यहाँ दिखाता है, उनके साथ बड़ा अन्याय होगा। क्योंकि उनका जीवन सब मनुष्यों में सबसे अधिक दुःख का था, इसलिए कि परमेश्वर ने उन्हें बहुत से क्लेशों में लगाए रखा: और पुरखों के जीवन (विशेषकर उनके जिन्हें परमेश्वर ने उत्तम बनाने के लिए चिह्नित किया) सब के सब अजेय धीरज के दर्पण थे। क्योंकि इब्राहीम ने क्या-क्या सहा? कैसी कठिन और बड़ी-बड़ी भिड़न्तें उसने झेलीं? इसहाक और याकूब ने कैसी परीक्षाएँ सहीं? फिर दाऊद में हम कैसे-कैसे गुण देखते हैं? अब यदि वे अपना मन इस जगत पर लगाते, तो वे पशुओं से भी बुरी दशा में होते। इसलिए (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) अवश्य है कि उन्होंने और ऊँचे की ओर दृष्टि की: और इसकी उन्होंने पर्याप्त साक्षी दी, न केवल मुँह की बात से, वरन् कर्म से भी।
तो आओ, यहाँ बताई गई बात को भली-भाँति ध्यान में रखें: कि पुरखे उसी मीरास की आशा रखते थे जिसकी हम बाट जोहते हैं, और वह भी हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा। और क्योंकि हम विश्वास में इब्राहीम, दाऊद और अन्य पवित्र राजाओं और भविष्यद्वक्ताओं से एकमत हैं, इसलिए हम उनके साथ स्वर्गीय जीवन में इकट्ठे किए जाएँगे, और उनके साथ उद्धार का वही मुकुट पाएँगे, जो विश्वास का प्रतिफल है, जैसा सन्त पतरस अपनी पहली पत्री में उसे कहता है। फिर जब सन्त पौलुस कहता है कि बालक दास से कुछ भिन्न नहीं, तो वह यह सदा हमारे प्रति परमेश्वर के अनुग्रह को, और उस विशेषाधिकार को जो हमें सुसमाचार के द्वारा मिलता है, बड़ा दिखाने के लिए करता है। हमारा इब्राहीम की सन्तान कहलाना बड़ी बात है: परन्तु इससे भी बड़ी बात यह है जब हमारे विषय में कहा जाता है कि परमेश्वर ने हमें सुसमाचार के द्वारा उससे ऊँचे पद पर चढ़ाया है, जहाँ तक इब्राहीम कभी पहुँचा। क्योंकि जब तक हमारा प्रभु यीशु मसीह आया नहीं था, वह व्यवस्था के जुए के नीचे था। परन्तु हम आज उससे स्वतंत्र हैं: और इस प्रकार तुम देखते हो कि परमेश्वर ने हमें सब कुलपतियों और भविष्यद्वक्ताओं से ऊँचा उठाया है। और हमें इस अनुग्रह को भली-भाँति पहचानना और जैसा उसका मूल्य है वैसा उसे आँकना चाहिए, कि हम गम्भीर लालसा और उत्साह के साथ अपने आप को परमेश्वर की सेवा में लगा दें।
परन्तु (जैसा मैं पहले छू चुका हूँ) हमें ध्यान देना चाहिए कि सन्त पौलुस यहाँ किसी एक-एक व्यक्ति के विषय में नहीं कहता। क्योंकि हम सब में कोई ऐसा नहीं जिसे यह मानना न पड़े कि वह विश्वास में भविष्यद्वक्ताओं और कुलपतियों से कहीं अधिक कच्चा और निर्बल है: और उनके जीवन यह भली-भाँति दिखाते हैं। तो यदि हम उनके समान पूर्णता को नहीं पहुँचे, तो यह कैसे कहा जाता है कि वे छोटे बच्चों के समान थे, और हम आज मानो सयानों की अवस्था में हैं? मैंने तुम्हें पहले बताया, कि सन्त पौलुस किसी एक या दूसरे मनुष्य के विषय में नहीं, परन्तु कलीसिया के सामान्य शासन के विषय में कहता है। क्योंकि वह स्वयं मनुष्यों के विषय में नहीं कहता, परन्तु उस रीति के विषय में जो परमेश्वर अपने लोगों की अगुवाई में अपनाता था। यह विपरीत बातों से और अच्छी तरह दिखाया जाएगा। सन्त पौलुस कुरिन्थियों को उलाहना देता है कि उसे उन्हें छोटे बच्चों की नाईं दूध पिलाना पड़ा, क्योंकि वे अभी ठोस भोजन सहने के योग्य न थे, और वह उन्हें उनकी मन्दता से, और अपनी बिगड़ी हुई भावनाओं में लोटते रहने से लज्जित करता है, कि उन्होंने विश्वास में उतनी उन्नति नहीं की थी जितनी समय माँगता था। इसलिए उनका सदा नए सिरे से आरम्भ करना एक प्रकार का लड़कपन था। हाँ, और हम देखते हैं कि यशायाह भविष्यद्वक्ता यहूदियों को और भी कठोरता से दोषी ठहराता है जब वह कहता है कि वे छोटे बच्चे थे, जिनसे लोग कहते हैं क, क, ख, ख, यहाँ तक कि वे सदा नए सिरे से आरम्भ करने को रहते हैं, और जो आज सीखते हैं वह कल भूल जाते हैं, इसलिए वे कभी आगे नहीं बढ़ते, और बढ़ते भी हैं तो बड़ी कठिनाई से। यह दोष जगत में बहुत ही सामान्य है।
फिर सन्त पौलुस इफिसियों के चौथे अध्याय में सब विश्वासियों को, और उन सब को जो भली-भाँति दृढ़ हैं और दूसरों के शिक्षक होने के योग्य हैं, जो मानो झण्डा उठानेवाले हैं कि उद्धार का मार्ग दिखाएँ, सामान्य रूप से उपदेश देता है: मैं कहता हूँ, वह उन्हें उपदेश देता है कि जब तक वे पूरे पुरुषार्थ की आयु को न पहुँच जाएँ तब तक बढ़ते रहें। पहली दृष्टि में ऐसा प्रतीत होगा कि कुछ विरोध है। क्योंकि वह यहाँ कहता है कि वे सब जिन्हें परमेश्वर ने अपनी कलीसिया में ग्रहण किया और विश्वास के घराने का बनाया, पहले ही पूरी आयु को पहुँच चुके हैं, हाँ, वे निपट मूर्ख भी जो विश्वास के तीन शब्द मुश्किल से समझते हैं, यदि उनके पास हमारे प्रभु यीशु मसीह की सामर्थ्य के आरम्भिक सिद्धान्त और, जैसा तुम कहोगे, मोटी सी झलक हो। सन्त पौलुस कहता है कि वे पहले ही सयानों के बराबर हैं, और परमेश्वर उन्हें अब और छोटे बच्चों की नाईं किसी गुरु के अधीन, या रखवालों और भण्डारियों के अधीन नहीं रखेगा। और दूसरे स्थान पर वह कहता है कि न केवल वे जो निर्बल और अज्ञानी हैं, वरन् उत्तम श्रेणी के लोग भी, जिन्हें दूसरों के आगे मशाल लेकर चलना चाहिए कि उन्हें उजियाला दें, बढ़ते ही रहें। और कब तक? एक या दो वर्ष नहीं, परन्तु अपने जीवन भर: ताकि जब तक वे इस जगत में जीते हैं, तब तक नित्य अपने आप को निर्बल ही मानें, और उन्हें आवश्यकता है कि अपने आप पर बल डालें और जोर लगाएँ कि और आगे बढ़ते जाएँ।
परन्तु यह सब बहुत भली-भाँति एक साथ मेल खाता है। क्योंकि यदि हर एक मनुष्य अपने आप को जाँचे कि वह क्या है, तो निश्चय सबसे आगे बढ़े हुए भी अपने आप को अब भी छोटे बच्चों के समान पाएँगे। क्योंकि यद्यपि हम परमेश्वर के पास आने का यत्न करते हैं, तौभी हम अपने पाँव घसीटते हैं: और हमारी अपनी मनोदशा चाहे जैसी हो, बहुत सी रुकावटें हमारे आगे आ खड़ी होती हैं, और हर एक तिनका हमें रोक देता है: नहीं तो यदि कोई मक्खी भी हमारी आँखों के आगे से निकल जाए, तो हम तुरन्त मुड़ जाने को तैयार हो जाते हैं। और चाहे हममें कितना ही साहस क्यों न हो, तौभी हमें बहुत से दोषों से लड़ना है, और हमारा ज्ञान ऐसा नहीं कि हमें प्रतिदिन परमेश्वर से प्रार्थना न करनी पड़े कि वह हमारा विश्वास बढ़ाए, और हममें अविश्वास का जो शेष है उसे सुधारे। सो तुम देखते हो कि हर एक मनुष्य अपनी ओर से क्या पाएगा।
परन्तु यदि हम उस रीति को देखें जो परमेश्वर अपनी कलीसिया की अगुवाई और शासन में अपनाता है, तो निश्चय है कि हम पूरे सयाने हैं। और क्यों? क्योंकि हम व्यवस्था की ऐसी कड़ी अधीनता में नहीं रखे जाते जैसे पुरखे थे: परन्तु क्योंकि हमारे पास हमारा प्रभु यीशु मसीह है, इसलिए जब हम पाप करते हैं तब हम उसी के पास जाते हैं। हम भली-भाँति देखते हैं कि हम परमेश्वर के सामने कैसे दागों और धब्बों से भरे हैं: परन्तु हमारा धोना तैयार है, इसलिए कि विश्वास के द्वारा पवित्र आत्मा के कार्य से हमारे प्रभु यीशु मसीह के लहू में डुबकी लेने से हम शुद्ध और निर्मल हो जाते हैं, और परमेश्वर हमें कृपा में ग्रहण करता है। फिर हम उन दोषों के कारण, जो हम प्रतिदिन उसके विरुद्ध करते हैं, अनन्त मृत्यु के बन्धन में हैं: परन्तु उनका प्रायश्चित हमारे प्रभु यीशु मसीह में मिलता है, क्योंकि वह हमें छुड़ाने के लिए छुड़ौती ठहराया गया है। सो तुम देखते हो कि हम अब उस लगाम के नीचे नहीं जिसके अधीन पुरखे थे, अर्थात् परमेश्वर के सम्बन्ध में और उसके हमारे शासन के सम्बन्ध में। इसलिए यद्यपि हम अपनी निर्बलताओं को अनुभव करते हैं, तौभी वह हमें सयाने होने से नहीं रोकता: अर्थात् वह इसमें बाधा नहीं बनता कि परमेश्वर हमें उन लोगों से अधिक स्वतंत्रता और विशेषाधिकार दे जो व्यवस्था के अधीन जीए। सो सार यह है कि वह प्रश्न सुलझ गया। और यह हमें उसी बात पर लौटा लाने के काम आता है जो मैं पहले छू चुका हूँ, अर्थात् कि हमें हमारे प्रति परमेश्वर के अनुग्रह को बड़ा मानना चाहिए, कि उसने हमें ऐसी प्रतिष्ठा तक पहुँचाया है।
परन्तु इसके साथ ही हम यह भी देखते हैं कि मनुष्यों के लिए यह उचित नहीं कि इस बहाने से कि लोग कच्चे हैं, या बहुत से लोग अभी इस योग्य नहीं कि ऊँची और अधिक बुद्धिमानी की रीति से उनकी अगुवाई की जाए, वे अपनी इच्छा से कोई नया शासन गढ़ लें। और हमें इसे भली-भाँति ध्यान में रखना चाहिए। क्योंकि जब पोपवाद में आज राज करनेवाले अन्धविश्वास पहले-पहल जगत में घुसे, तब वे ऐसी शैतानी निन्दा से आरम्भ नहीं हुए थे जैसी से अब वे बनाए रखे जाते हैं। क्योंकि पोपवाद में जितनी रीतियाँ हैं जिन्हें परमेश्वर की सेवा का नाम दिया जाता है: उतनी ही उनकी मूर्तिपूजाएँ और शैतान के छल हैं: और संक्षेप में, सब कुछ परमेश्वर के सामने घृणित है। क्यों? क्योंकि वे कल्पना करते हैं कि वे उद्धार के लिए आवश्यक बातें हैं, कि उनके द्वारा वे अपने आप को छुड़ा सकते हैं, और अपने पापों की क्षमा पा सकते हैं। फिर वे हमारे प्रभु यीशु मसीह को और उस अनुग्रह को जो उसके द्वारा हमें मिलता है कलंकित करते हैं, क्योंकि वे अपने ही प्रायश्चित्तों से अपने आप को छुड़ाने की आशा रखते हैं, और इस रीति से उस वस्तु को हड़प लेते और अपनी ओर खींच लेते हैं जो परमेश्वर के पुत्र की है। सो तुम देखते हो कि वे शापित दुष्ट हैं। तौभी जब उनके वे सब खिलौने पहले-पहल कलीसिया में लाए गए, तब वे इतनी मोटी सनकों से भरे नहीं थे: परन्तु वे कुछ अधिक अनुकूल बहाने के साथ घुस आए: अर्थात् यह कि मनुष्य असभ्य और मन्द थे, और यदि छोटे बच्चों की रीति से उन्हें पुचकारा और बहलाया न जाता तो वे स्वर्ग के राज्य के भेद समझने में असमर्थ होते।
(जैसा मैं पहले छू चुका हूँ) यह सच है कि हर मनुष्य को, जब वह अपनी निर्बलता जान ले, अपने आप को दीन करना चाहिए: परन्तु इससे यह नहीं निकलता कि हम अपनी कल्पनाओं के अनुसार नई रीतियाँ निकालें। जो कुछ परमेश्वर ने ठहराया है उसी से हमें सन्तुष्ट रहना चाहिए। एक छोटा बालक अपने मन से अपना रखवाला नहीं चुन सकता: नहीं, उसे ऐसा करने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए: परन्तु उसका पिता उसके लिए एक ठहराएगा। यह सच है कि व्यवस्थाओं से और उपाय भी ठहराए गए हैं: परन्तु यहाँ सन्त पौलुस ने ऐसी उपमा ली है जो उसके विषय के अनुकूल है। तो यदि सांसारिक पिता को अपने बच्चों के लिए रखवाले ठहराने का अधिकार है, तो परमेश्वर को वही सामर्थ्य क्यों न हो? बालक को अपनी रुचि के अनुसार रखवाला चुनने की न तो छूट दी जाएगी न अनुमति। जब ऐसा है: तो हम किस अधिकार या दावे से यह या वह गढ़ेंगे, कि हम छोटे बच्चे हैं, और इसलिए हमें अपनी दुर्बलता के योग्य और अनुकूल कोई रीति चाहिए? हाँ, और परमेश्वर ने हमारे लिए एक रीति पहले ही ठहरा दी है: अब क्या हम उससे अधिक बुद्धिमान होंगे?
जैसा भी हो, मसीही कलीसिया में रीतियों का भण्डार गढ़ने में मनुष्यों की बुद्धि के इतने उतावले होने का असल कारण यह था कि उन्होंने साधारण लोगों में इतनी अनगढ़ता देखी। हाँ, वे कहते हैं, यह उचित है कि यह और वह हो। बपतिस्मा बहुत सादी बात होती यदि उसमें पानी के सिवाय और कुछ देखने को न होता, और वह पानी पर्याप्त न होता। क्योंकि साधारण लोगों की बड़ी संख्या ऐसी मन्द है कि वे उस भेद का अर्थ नहीं समझते, अर्थात् यह कि हम हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा नया किए जाते हैं। इसलिए तेल और चिकना लेप चाहिए जो पवित्र आत्मा को मानो दिखाई देनेवाली आकृति में दर्शाए। इसके अतिरिक्त ज्योति चाहिए थी, और उजला बपतिस्मा-वस्त्र, और नमक, और एक के बाद दूसरी बात। बहुत अच्छा: इस प्रकार बपतिस्मा प्रतिदिन सजाया गया, हाँ मनुष्यों की दृष्टि में: परन्तु ये सब अपवित्र करने की बातें हैं: क्योंकि क्या हमारा प्रभु यीशु मसीह, जो अपने पिता परमेश्वर की अगम्य बुद्धि है, भली-भाँति नहीं जानता था कि हमारे लाभ के लिए क्या होना चाहिए? क्या मनुष्य छोटे मेंढकों की नाईं रेंगते हुए आएँ, और न जाने क्या-क्या ढूँढ़ें, और अपने मन में समझें कि जो बातें हमारे प्रभु यीशु मसीह ने ठहराई हैं वे अधूरी हैं, और वे उन्हें पूरा करने का बीड़ा उठाएँगे?
शेष सब बातों के विषय में भी यही कहना चाहिए। विशेषकर हमारे प्रभु यीशु मसीह का भोज न केवल बिगाड़ा और अंग-भंग किया गया है: वरन् नारकीय मिस्सा की शैतानी घृणित प्रथा से पूरी तरह विकृत कर दिया गया है। क्योंकि वे इसे एक साधारण बात बना देते हैं कि रोटी का एक टुकड़ा लें और दाखमधु की तीन घूँट पी लें। परमेश्वर का वचन हमसे चाहता है कि हम उस प्रतिज्ञा पर दृष्टि रखें [अर्थात्] कि जब हम सच्चे विश्वास और आज्ञाकारिता के साथ उसका पवित्र भोज लेते हैं तब हम हमारे प्रभु यीशु मसीह की देह और लहू के सहभागी बनाए जाते हैं, और हमारे प्राणों का भोजन केवल उसी में है। परन्तु इसके विपरीत मनुष्यों को नाटक के अभिनेताओं की नाईं वेश धारण करना पड़ा, और साथ ही इतने स्वाँग रचने पड़े कि उन्हें देखना लज्जा की बात थी: और अन्त में क्या हुआ? हाँ महाशय, वह जीवितों और मृतकों दोनों के पापों की क्षमा के लिए बलिदान ठहरा। इसमें तुम देखते हो कि हमारे प्रभु यीशु मसीह से उसकी याजकीय प्रतिष्ठा छीन ली गई, जो उसे उसके पिता परमेश्वर से गम्भीर शपथ के साथ दी गई थी कि उसका कभी कोई उत्तराधिकारी न होगा: तौभी इस सब पर भी पोपवादी उसके हज़ारों हज़ार उत्तराधिकारी बना देते हैं। और कैसे मनुष्य, मैं तुमसे पूछता हूँ? निश्चय यदि वे स्वर्ग के स्वर्गदूत भी होते, तौभी उन्हें शैतान ही समझना चाहिए।
परन्तु उनका चुनाव जगत के सब कीड़े-मकोड़ों में से, सब लुच्चों और सब निकम्मों में से होता है: और क्या हम कहें कि ऐसा झुण्ड हमारे प्रभु यीशु मसीह का उत्तराधिकारी है। और तौभी तुम देखते हो कि पोपवादी अपने आड़ के लिए क्या कहते हैं: अर्थात् यह कि मनुष्यों की निर्बलता के कारण उन्हें कुछ सहारे अवश्य चाहिए। और इसी से उनके शेष सारे अन्धविश्वास निकले: उदाहरणार्थ, जब उन्होंने अपनी मूरतें और गुड़ियाँ खड़ी कीं, तो उन्हें साधारण जनों की पुस्तकें कहा। परन्तु हम देखते हैं कि उनकी सारी ढिठाई यहाँ भंग हो जाती है, जब सन्त पौलुस हमें उस क्रम की ओर लौटा लाता है जो परमेश्वर ने ठहराया है, क्योंकि हमें सब को पूरी तरह उसी को थामे रहना और उसी में विश्राम पाना चाहिए। तो क्या हम स्वर्ग की उस मीरास को त्याग देंगे जो हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमारे लिए मोल ली है? आओ उस शासन का अनुसरण करें जो परमेश्वर ने अपनी कलीसिया में ठहराया है, और अपने आप को निश्चय दिलाएँ कि परमेश्वर सब अभाव पूरे करेगा। हम चाहे कितने ही अनगढ़ या कच्चे हों, वह भली-भाँति जानता है कि हमें अपनी ओर कैसे खींचे। हाँ, यदि हम चलती सड़क पर बने रहें, क्योंकि जिन्होंने चीज़ों को इतना घालमेल और उथल-पुथल किया, और रीतियों का ऐसा ढेर लगा दिया: उन्होंने उनके द्वारा अपनी निर्बलताओं का इतना कम उपचार किया कि वे उलटे हमारे प्रभु यीशु मसीह से बिलकुल ही दूर हो गए।
क्योंकि हम जानते हैं कि मनुष्य अपने स्वभाव से दिखाई देनेवाली वस्तुओं की ओर बहुत झुके हुए हैं। इसलिए बहुत सी रीतियाँ अपनाने से मनुष्य उनमें ऐसे उलझ जाते हैं, ऐसे फँस जाते हैं, और ऐसे गहरे डूब जाते हैं कि फिर वे परमेश्वर और हमारे प्रभु यीशु मसीह को त्याग देते हैं। यदि कोई कहे, क्यों? क्या प्राचीन काल के पुरखों के पास भी अपनी निर्बलता की सहायता के लिए बहुत सी रीतियाँ न थीं? हाँ थीं: परन्तु वे सब उन पर परमेश्वर की ओर से प्रगट की गई थीं। क्योंकि पहले उन्हें बताया गया कि उन सब वस्तुओं का नमूना स्वर्गीय है, जैसा निर्गमन के 25वें अध्याय में कहा गया है। और वह मूसा को पहाड़ पर दिखाया गया, इसलिए कि वे इन वर्तमान और नाशमान वस्तुओं पर चित्त न लगाएँ। और जब परमेश्वर ने देखा कि वे उनमें बहुत लग गए हैं, तो हम देखते हैं कि उसने अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा उन्हें कैसी कड़ी डाँट दी, यह कहकर: अपने बलिदानों को दूर करो, उन पर थू, क्या तुम समझते हो कि पशुओं का गला काटने में, इस आशा से कि उससे मुझे शान्त कर लो, मुझे प्रसन्नता होती है, मानो मैं भूखा या प्यासा हूँ? क्या तुम समझते हो कि मुझे ऐसे सहारों की आवश्यकता है? सो तुम देखते हो कि परमेश्वर अपने लोगों को सदा अन्धविश्वास से खींचता रहा, यद्यपि बहुत सी रीतियाँ ठहराई गई थीं, जो उस समय की आवश्यकता के कारण हुआ। क्योंकि हमारे प्रभु यीशु मसीह की अनुपस्थिति में प्रतिरूपों और छायाओं का होना आवश्यक था, सन्त पौलुस के कथन के अनुसार, जो हमें बताता है कि प्राचीन काल के पुरखे उसी के द्वारा मसीह को ढूँढ़ने की ओर निर्देशित किए जाते थे: परन्तु अब जब वह आ गया है, तो हमें ऐसी किसी बात की और आवश्यकता नहीं।
उदाहरणार्थ, यदि कोई मनुष्य मुझसे दूर हो, ऐसा कि मैं उसे देख न पाऊँ, और मैं उसकी कोई प्रतिमूर्ति पाना चाहूँ कि उससे उसे पहचानूँ, तो मेरे पास कम से कम कोई मूर्ति तो होनी चाहिए जो उससे मिलती हो: परन्तु यदि मैं उसकी देह को उपस्थित देखूँ, और उसे आमने-सामने निहार सकूँ, तो मुझे उसे और जीवन्त रूप से मुझे चित्रित करने या प्रकट करने के लिए किसी मूर्ति या नकल की और आवश्यकता नहीं। ठीक इसी रीति से प्राचीन काल के पुरखों के पास बहुत से प्रतिरूप और छायाएँ थीं, क्योंकि हमारा प्रभु यीशु मसीह अभी प्रगट नहीं हुआ था। परन्तु अब जब वह हम पर चमकता है, और धार्मिकता के सूर्य के रूप में हमें इतने तेज के साथ अपने आप को दिखाता है: तो क्या यह उसे जान-बूझकर फिर गाड़ देना न होगा, यदि हम फिर भी प्रतिरूप ही चाहें? और इसी कारण उसकी मृत्यु के समय मन्दिर का परदा ऊपर से नीचे तक फट गया। क्योंकि आज हम परमेश्वर के पास निकटता से जा सकते हैं, और उसे अपने आत्मिक बलिदान चढ़ा सकते हैं, अर्थात् अपनी प्रार्थनाएँ और विनतियाँ, और यह इसलिए कि हमारे पास असल देह और सार है, जैसा सन्त पौलुस कुलुस्सियों को एक और स्थान पर कहता है। अब हम देखते हैं कि वे सब जिन्होंने इस प्रकार नई-नई युक्तियाँ गढ़ीं, उन्होंने सुसमाचार को पूरी तरह बिगाड़ा और झुठलाया है, और मनुष्यों की आँखों के आगे तौलिए और रूमाल बाँध दिए हैं, कि वे यीशु मसीह को देखने और जानने से रुके रहें, जैसा उन्हें करना चाहिए था और जैसा उनके उद्धार के लिए आवश्यक था। और इसलिए यह निश्चय है कि वे सब जो ऐसे खिलौनों में व्यस्त रहते हैं, मसीह को ढूँढ़ने के बदले अपनी ही बुद्धि के पीछे चलकर अपने आप को सिर के बल विनाश में गिराते हैं। वे उसमें ऐसे लगे हैं कि उससे खींचे नहीं जा सकते: वे उन छोटे बच्चों का खेल खेलते हैं जो सीपियों का घर बना रहे होते हैं, जो अपने काम में इतने तल्लीन होते हैं कि खाना-पीना भूल जाते हैं, और गर्मी और सर्दी, भूख और प्यास सहने में सन्तुष्ट रहते हैं। और क्यों? क्योंकि उनकी मूढ़ता उन्हें बहा ले जाती है।
फिर वे अपना सामान इधर-उधर हटाते हैं, और यह और वह भीतर लाते हैं, और जब एक बार उसमें लग जाते हैं तो कभी उसका अन्त नहीं कर सकते। ठीक ऐसा ही मनुष्यों के साथ होता है जब वे परमेश्वर की सेवा अपनी रुचि के अनुसार करना चाहते हैं। सो तुम देखते हो कि इस विषय में हमें संयमी होना चाहिए, और उन सहायताओं और साधनों से सन्तुष्ट रहना चाहिए जो हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह तक पहुँचाने के लिए पहले ही ठहराए जा चुके हैं। हमारे पास बपतिस्मा और प्रभु भोज है: हम उन्हीं से सन्तुष्ट रहें, क्योंकि हमारी जिज्ञासा हमें सदा बुराई की ओर खींचेगी, जब तक हम परमेश्वर के ठहराव के आगे झुक न जाएँ, और अपने सब कल्पना-विचारों और मनगढ़न्त बातों को छोड़ न दें।
हाँ, और हम समझ लें कि जब मनुष्य [अपने मन से] कहते हैं कि यह या वह हमारे लिए अच्छा है, तो यह परमेश्वर के विरुद्ध निन्दा है। मैं तुमसे साफ कहता हूँ, जब कभी मनुष्य कहते हैं कि हमारे लिए यह चाहिए, और वह चाहिए, या हमारी कलीसिया या धर्म इस या उस रीति का होना चाहिए: तो यह उतना ही है मानो वह कहे कि परमेश्वर ने ठीक से विचार नहीं किया था कि हमारा शासन कैसे हो, वह नहीं जानता था कि हमारे लिए क्या उचित है। उदाहरणार्थ, उन्हें यह बहुत तुच्छ बात लगती है कि बपतिस्मा में पानी के सिवाय और कुछ न हो: और उन्हें उसे अधिक शोभा और गरिमा देने के लिए कुछ और चाहिए। इसलिए उनके पास मोमबत्तियाँ, और नमक, और चिकना लेप, और अपनी बनाई हुई सारी धूमधाम है। देखो, मनुष्य परमेश्वर की आज्ञा में सदा कुछ न कुछ जोड़ते रहते हैं: जो करना शापित निन्दा है, जैसा मैंने पहले कहा। और यह इसी से उठता है कि उन्होंने मुख्य वस्तु पर दृष्टि नहीं रखी, परन्तु सदा उसके साथ की वस्तुओं को ताकते रहे। मुख्य वस्तु प्रतिज्ञाएँ हैं: क्योंकि जगत की सारी रीतियाँ न केवल व्यर्थ और निकम्मी हैं, वरन् शैतानी छल हैं, जब तक कि परमेश्वर का वचन उन पर अंकित न हो, और वही वह वस्तु न हो जिस पर वे दृष्टि रखें, और वह लक्ष्य न हो जिसे वे साधें। कैसे? यदि बपतिस्मा के लिए हमारे पास प्रतिज्ञा न होती, और हम न जानते कि वह किस उद्देश्य से ठहराया गया है: तो वह कैसा खिलौना होता? हमारे लिए उससे दूर रहना कहीं अच्छा होता। फिर यदि हम न जानते कि प्रभु भोज का क्या अर्थ है, तो अच्छा होता कि उसकी स्मृति पूरी तरह गाड़ दी जाती। परन्तु जब परमेश्वर का वचन उसके साथ चलता है, ऐसा कि हमारे पास प्रतिज्ञाएँ हैं जो हमें विश्वास दिलाती हैं कि हम अपने सब दागों से हमारे प्रभु यीशु मसीह के लहू के द्वारा धोए और शुद्ध किए गए हैं: तब हमारा सारा भरोसा वहीं टिकता है। और फिर यह कहा गया है कि वहाँ हम पवित्र आत्मा के द्वारा नए किए जाते हैं। देखो, बपतिस्मा हमें प्रतिज्ञाओं तक कैसे पहुँचाता है, और प्रतिज्ञाएँ हमें मसीह तक, उस पक्ष के रूप में जो उनमें समाया है। सो तुम देखते हो कि जब सन्त पौलुस हमें सब कुलपतियों से, और उनसे जो व्यवस्था के अधीन जीए, पद में ऊँचा उठाता है, तब हमें क्या ध्यान में रखना है: अर्थात् यह कि इस कारण नहीं कि उनमें आज हममें से अधिक पूर्णता, दृढ़ता और विश्वास न था।
और इसके साथ ही (जैसा मैंने पहले कहा) हम इस बात में और दृढ़ किए जाते हैं कि हमारे सामने उद्धार का कोई नया उपाय नहीं रखा गया, परन्तु परमेश्वर हमारे प्रभु यीशु मसीह के निमित्त हमें अपने पास इकट्ठा करता है, ठीक वैसे ही जैसे उसने सब युगों में अपने चुने हुओं को बुलाया, और उन्हें जिन्हें उसने छाँटना चाहा, और जिन्हें उसने उस लेपालकपन का सहभागी बनाना स्वीकार किया जो आज हमें दिया जाता है। क्योंकि यदि यह कहा जा सकता कि मनुष्यों को धर्मी ठहराए जाने और परमेश्वर की कृपा पाने का साधन केवल तब से मिला जब से यीशु मसीह जगत में आया: तो जो पहले जीए उनका क्या होता? हमारा विश्वास निर्बल ही होता, और वह हमें ऐसी भूलभुलैया में डाल देता कि हमें न सूझता कि कहाँ जाएँ। तब हम क्या कहते? क्या परमेश्वर सब युगों में अपने प्राणियों का पिता नहीं रहा? क्या जब तक यीशु मसीह जगत में न आया तब तक कोई उद्धार न था? हाँ था, परन्तु जहाँ यह कहा गया है कि उद्धार हम पर सुसमाचार के द्वारा प्रगट हुआ है, वहाँ भी वह पहले से था: और यद्यपि मन्दिर में परदा और अन्य छायाएँ थीं, तौभी पुरखों की दृष्टि सदा यीशु मसीह पर रहती थी, जिसकी ओर आज हम पहुँचाए जाते हैं। सो तुम देखते हो कि वे कैसे स्वतंत्रता से और बिना सन्देह के चल सकते थे, और आज भी कोई ऐसी बात नहीं जो हमें हिला सके, यदि हम अपने प्रभु यीशु मसीह की ओर अपने मार्ग पर बने रहें, यह जानते हुए कि उसके द्वारा हम सब उस मीरास के लिए बुलाए गए हैं जो उसने हमारे लिए मोल ली है।
और इसलिए हमें इन शैतानों से और भी अधिक घृणा करनी चाहिए, जो हमें समझाने की धुन में लगे हैं और अपना पूरा ज़ोर लगाते हैं कि प्राचीन काल के पुरखे पशुओं के समान थे, मानो वे आत्मिक जीवन के विषय में कुछ नहीं जानते थे। देखो, यह ऐसी निन्दा है जो जगत के सारे धर्म को कलंकित कर दे। इन्हीं में से वह शापित प्राणी था जो यहाँ अपने कर्मों के अनुसार दण्ड पाया, मेरा अर्थ उस कुत्ते से है जिसने यह लिखने का दुस्साहस किया कि इब्राहीम ने कभी स्वर्गीय जीवन का स्वाद नहीं चखा, न उसे जाना, और न कभी परमेश्वर की उपासना की सिवाय कल्पना में, और यह कि उसे विश्वासियों का पिता कहना केवल उपहास है, और कि उसका विश्वास केवल विश्वास की छाया था, और अन्त में यह कि वह यीशु मसीह को और उसके आने को कभी नहीं जानता था। देखो (मैं तुमसे विनती करता हूँ) वे निन्दाएँ जिनसे उसकी पुस्तकें भरी थीं। परन्तु आओ हम इन दिनों में शैतान की ऐसी महामारियों से घृणा करें। क्योंकि यह निश्चय है कि शैतान का वह कथित योद्धा जान-बूझकर इसी पर तुला था कि जगत में और विश्वास न रहे। क्योंकि जब शैतान ने अपना रूप बदला, और आरम्भ में अपने सींग न दिखाए, तो जब वह इस रीति से आया, तब यह बहुत खतरनाक था, मानो हमारे विश्वास की नींव को भूमि के नीचे से खोद डालना। और सन्त पौलुस इसकी स्पष्ट चेतावनी हमें देता है, कि हम चौकसी में रहें, और अच्छा पहरा दें कि हम अचानक पकड़े न जाएँ।
तो भली-भाँति ध्यान में रखें कि यहाँ जो कहा गया है कि परमेश्वर के वारिस होने के लिए हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह के अंग बनाया जाना है: उससे पवित्र आत्मा हमें दृढ़ करना चाहता है, कि हम और भी अच्छी तरह निरन्तर परमेश्वर की ओर बढ़ते रहने को और आशा में तब तक डटे रहने को तैयार हों जब तक हम इस जगत की सब लड़ाइयाँ जीतकर उस आत्मिक विश्राम में न पहुँचाए जाएँ जिसकी हम बाट जोहते हैं। साथ ही हमें यह भी भली-भाँति ध्यान देना है कि समय की पूर्णता के विषय में क्या कहा गया है। क्योंकि मनुष्यों की असीम जिज्ञासा के अनुसार यहाँ पूछा जा सकता है कि क्यों और कैसे? परमेश्वर ने इसे इतने समय तक क्यों टाला, जबकि हम आदम के पतन में खोए हुए और दोषी ठहरे थे? ऐसा क्यों हुआ कि उसने पहले ही इसका उपचार नहीं किया? निश्चय सन्त पौलुस मनुष्यों की भूख को पूरी तरह तृप्त नहीं करता, परन्तु उसे बीच में ही काट देता है। और सच पूछो तो यदि परमेश्वर हमें सन्तुष्ट करना चाहता, तो उसे हमें बहुत सी अनावश्यक बातें खिलानी पड़तीं: परन्तु वह हमारे विश्वास की आज्ञाकारिता को परखना चाहता है। और सन्त पौलुस भी हमें उस बात से रोकता है, यह कहकर कि समय की पूर्णता अभी नहीं आई थी।
और समय की पूर्णता से उसका क्या अर्थ है? उसका अर्थ वह समय है जो परमेश्वर ने अपने ही संकल्प में ठहराया है, और उस रीति से नहीं जैसा मनुष्य उसका निर्णय करते: क्योंकि वे इस विषय के योग्य न्यायी नहीं हैं, परन्तु उन्हें अपने आप को परमेश्वर के अधीन करना चाहिए, और जो उसने ठहराया है उसे मान लेना चाहिए। सो तुम देखते हो कि सन्त पौलुस का यह कहने से क्या अर्थ था कि पूरा समय तब आया जब परमेश्वर ने अपने एकलौते पुत्र को जगत में भेजा। इसलिए आओ सीखें कि हमारी मुख्य बुद्धि यही संयम है कि हम अपने आप को परमेश्वर के अधीन करें, और जो कुछ वह करता है उसे भला और उचित मानकर स्वीकार करें, यह जानते हुए कि अपनी ओर से हम चाहे कितनी ही समझ रखें, अपने आप को कुछ मूल्यवान समझना या किसी बात की जानकारी का दावा करना हमारे लिए मूर्खता ही है: और यह कि हमें अपने परमेश्वर के आगे दीन होना सीखना चाहिए, और वैसा नहीं करना चाहिए जैसा बहुत से मनुष्य करते हैं, जो इतने उतावले हैं कि कहते हैं, क्या? मैं तो ऐसा सोचता हूँ, और यह मेरी राय है। क्योंकि परमेश्वर की शिक्षा के इससे अधिक विपरीत कुछ नहीं, जब मनुष्य अपने ऊपर इतना भरोसा करके कहते हैं, बात ऐसे ही चलनी चाहिए, और मैं ऐसा और ऐसा सोचता या मानता हूँ। सचमुच हमें बन्दियों की नाईं देखना शोभा देता है,* जैसा सन्त पौलुस 2 कुरिन्थियों में कहता है। हम अपने आप को ऐसे भय में रखें कि परमेश्वर के विरुद्ध विवाद करने को सिर तक न उठाएँ, और न अपना कुछ मूल्य आँकें मानो हम में कोई सामर्थ्य हो। जो स्वतंत्रता उसने हमें दी है उसी से सन्तुष्ट रहें, और जो अनुग्रह उसने हम पर किया है उसका दुरुपयोग न करें, जिसमें उसने हमें उनसे आगे बढ़ाया जो इस जगत में स्वर्गदूतों के समान थे, और तौभी उस स्वतंत्रता तक नहीं पहुँचाए गए जो हमें सुसमाचार के द्वारा मिली है।
फिर सन्त पौलुस यहाँ हमें उस बात की ओर लौटा लाता है जिस पर हमें सब से बढ़कर विचार करना चाहिए: यह कि आज हमारा पूरी आयु के समय में होना हम में किसी गुण के कारण नहीं, परन्तु हमारे प्रभु यीशु मसीह के कारण है। हममें और प्राचीन काल के पुरखों में भेद यह है (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) कि वे मानो भय के अधीन चलाए जाते थे, और हम अब स्वतंत्र किए गए हैं—हम ऐसे क्यों हैं? क्या इसलिए कि हम उनसे अधिक मूल्यवान हैं—या हम में कोई योग्यता है? नहीं: परन्तु इसलिए कि परमेश्वर को यह भाया कि अपने एकलौते पुत्र की उपस्थिति से हमें आदर दे। तो क्या हम सुसमाचार की स्वतंत्रता का आनन्द लेंगे? आओ हम सीधे अपने प्रभु यीशु मसीह के पास जाएँ, जो जैसे अपने आप में महिमा पा चुका है, वैसे ही हमें भी उस स्वर्गीय महिमा में पहुँचाएगा जिसमें वह हमसे आगे जा चुका है। यही वह बात है जो सन्त पौलुस जान-बूझकर हमें बताना चाहता था। जो यह जोड़ा गया है कि वह स्त्री से जन्मा और व्यवस्था के अधीन किया गया: उसका निपटारा इस समय नहीं हो सकता, इसलिए हम उसे किसी और समय के लिए रख छोड़ेंगे।
और अब आओ हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के आगे गिरें, अपने दोषों को मानते हुए, और उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उन्हें ऐसा अनुभव कराए कि हम सच्चे पश्चाताप के साथ उन पर शोक और खेद करें, और वहाँ जाएँ जहाँ वह हमें बुलाता है, अर्थात् अपने शरीर और उसकी सब भ्रष्टताओं से ऐसे सच्चे रूप से वंचित हो जाएँ कि उस आनन्द तक पहुँचें जिसके लिए वह प्रतिदिन हमें बुलाता है, और उस निर्मलता में जिसमें हमें अपने जीवन भर आगे बढ़ना है। कि वह यह अनुग्रह न केवल हम पर, वरन् पृथ्वी के सब लोगों और जातियों पर भी करे, इत्यादि।
