यिर्मयाह और विलापगीत पर टीका · खण्ड 2 · विलापगीत पर कैल्विन की प्रस्तावना

विलापगीत पर कैल्विन की प्रस्तावना

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विलापगीत पर कैल्विन की प्रस्तावना

टीका

विलापगीत पर

विलापगीत पर कैल्विन की प्रस्तावना

जॉन कैल्विन के व्याख्यान

यिर्मयाह का विलापगीत

प्रस्तावना

अब मैं यिर्मयाह के विलापगीत की व्याख्या करने का कार्य आरम्भ करता हूँ। हमें यह जाँचना चाहिए कि भविष्यद्वक्ता ने यह पुस्तक कब रची, और यह भी कि लेखक का उद्देश्य क्या था।

जेरोम बड़ी भूल में था, जिसने यह समझा कि यह वही शोकगीत है जिसे यिर्मयाह ने योशिय्याह की मृत्यु पर रचा था; क्योंकि हमें यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं दिखाई देता जो उस घटना से मेल खाता हो।

यह सच है कि एक स्थान पर एक राजा का उल्लेख किया गया है, परन्तु वहाँ जो कहा गया है वह योशिय्याह पर लागू नहीं किया जा सकता; क्योंकि वह कभी बँधुआई में नहीं ले जाया गया, वरन् यरूशलेम में अपने पुरखाओं के संग मिट्टी दिया गया। पुस्तक की सम्पूर्ण विषय-वस्तु से हम उचित रूप से यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि यह तब लिखी गई जब नगर नष्ट कर दिया गया था और लोग बँधुआई में ले जाए गए थे।

कुछ लोग समझते हैं कि यिर्मयाह ने इस विपत्ति के घटने से पहले ही उसका ऐतिहासिक वर्णन कर दिया था, और इस प्रकार उसने उस बात की भविष्यद्वाणी की जो भविष्य की थी और अभी तक अज्ञात थी। परन्तु यह किसी भी प्रकार सम्भव नहीं जान पड़ता; क्योंकि यिर्मयाह यहाँ सब की आँखों के सामने वे बातें रखता है जिन्हें वे घटी हुई बातों के रूप में जानते थे; और हम सहज ही पाएँगे कि उसकी बातें कहने की रीति भविष्यद्वाणी के लेखों में प्रयुक्त रीति से सर्वथा भिन्न है। अतः इसमें कोई सन्देह नहीं कि यिर्मयाह ने, नगर के नष्ट होने और मन्दिर के जलाए जाने के पश्चात्, अपनी जाति की दयनीय दशा पर विलाप किया—अन्यजातियों की रीति पर नहीं, वरन् इसलिए कि वह दिखाए कि ऐसी विपत्तिपूर्ण दशा में भी उसकी कही हुई बातों से कुछ लाभ प्राप्त किया जा सकता है। और यही बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है; क्योंकि यदि हम इसे स्मरण न रखें तो यह पुस्तक अपनी विशेष रोचकता खो देगी; परन्तु यदि हम अपने मन को उस उजाड़ की ओर लगाएँ, जिसने न केवल सामान्य लोगों को, वरन् स्वयं भविष्यद्वक्ता को भी पूरी तरह निराश कर दिया था, यहाँ तक कि उसकी सारी आशा जाती रही, तो निश्चय ही हम इससे कोई छोटा लाभ नहीं पाएँगे।

समृद्धि के समय परमेश्वर के अनुग्रह की ऊँचे शब्दों में प्रशंसा करना सहज बात है, और उसी प्रकार उन लोगों को भरोसा रखने के लिए उत्साहित करना भी सहज है जिनके पास अच्छी आशा रखने के कारण हैं, और परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को सामने लाना भी, ताकि भक्तों के मन उन पर टिक सकें; परन्तु जब बातें निराशा की दशा में हों, और परमेश्वर ऐसा जान पड़े मानो उसने अपनी कलीसिया को त्याग दिया है, तब—क्योंकि भविष्यद्वाणी फिर भी अपने बल में बनी रहती है, और परमेश्वर दुखियों की ओर, और उनकी ओर जो लगभग आशाहीन दशा में हैं, अपना हाथ बढ़ाता हुआ दिखाई देता है—हम इससे बहुत लाभ पाते हैं; और यहाँ सिखाई गई बातों का मुख्य उपयोग यही है। परन्तु हम देखते हैं कि यिर्मयाह, जब राज्य गिर चुका था, जब राजा अपनी सब सन्तानों समेत घोर अपमान के लिए खुला छोड़ दिया गया था, संक्षेप में जब परमेश्वर की वाचा पूरी तरह मिट गई सी जान पड़ती थी, तब भी अपने पद का कार्य निरन्तर करता रहा, जिसे उसने निश्चय ही व्यर्थ नहीं किया।

इसलिए जब उसने समझ लिया कि उसकी शिक्षा निष्फल न होगी, तो वह इस प्रकार प्रेरित हुआ कि पहले परमेश्वर के न्यायदण्डों के विषय में बोले; दूसरे, लोगों को पश्चाताप के लिए उपदेश दे; तीसरे, उन्हें आशा रखने के लिए प्रोत्साहित करे; और अन्त में, परमेश्वर से प्रार्थना करने का द्वार खोल दे, ताकि लोग अपनी घोर विपत्ति में परमेश्वर की दया की शरण में भागने का साहस कर सकें; और यह विश्वास के बिना नहीं हो सकता था।

अब हम कुछ हद तक समझते हैं कि यिर्मयाह ने यह पुस्तक किस प्रयोजन से लिखी: उसका उद्देश्य यह दिखाना था कि यद्यपि देश में उजाड़ के सिवा और कुछ दिखाई नहीं देता था, और मन्दिर के नष्ट हो जाने से परमेश्वर की वाचा व्यर्थ हुई सी जान पड़ती थी, और इस प्रकार उद्धार की सारी आशा कट गई थी, तौभी आशा अब भी बनी हुई थी, यदि लोग सच्चे पश्चाताप और विश्वास के साथ परमेश्वर को खोजें; और इस प्रकार वह अपनी बुलाहट के मार्ग पर आगे बढ़ता रहा, और उसने यह प्रकट कर दिया कि उसकी शिक्षा लाभहीन न होगी।

जैसा मैं कह चुका हूँ, वह अपनी प्रजा की घोर विपत्ति पर विलाप तो करता है; परन्तु वह अपने विलाप के साथ पश्चाताप और विश्वास की शिक्षा भी मिला देता है। क्योंकि एक ओर तो वह दिखाता है कि लोगों ने उन अनेक अधर्मों के कारण उचित दण्ड भोगा, जिनसे वे चंगे नहीं किए जा सकते थे; और फिर दूसरी ओर वह उन्हें परमेश्वर की दया के कुछ संकेत देता है, ताकि यहूदी मृत्यु में भी जीवन को खोजें, वरन् सबसे गहरी गहराइयों में भी यह जानें कि परमेश्वर उन पर कृपालु होगा। अन्त में वह अपने ही उदाहरण से उन्हें प्रार्थना करने के लिए उभारता है; परन्तु प्रार्थना विश्वास पर आधारित है।

तो इससे यह निकलता है कि यिर्मयाह ने, जब लोग परमेश्वर की उपासना से पूरी तरह फिर गए थे, तब भी बचे हुओं को इकट्ठा करने में अपना परिश्रम लगाया। अतः यद्यपि सारी कलीसिया न केवल अत्यन्त अव्यवस्था में थी, वरन् मानो लगभग शून्य के समान घटा दी गई थी, तौभी यिर्मयाह ने खण्डहरों में से किसी प्रकार का एक भवन खड़ा किया। इस पुस्तक का सार यही है।

यूनानी अनुवादक इस पुस्तक को {Θρήνους} अर्थात् विलापगीत कहते हैं, और यह बहुत उचित है, जैसे इब्रानी लोग भी इसे {,}קינוהkinut कहते हैं; यद्यपि इसका सामान्य नाम या शीर्षक {,}אכה aike है, जो इसके पहले शब्द से लिया गया है। परन्तु जब वे यह व्यक्त करना चाहते हैं कि पुस्तक में क्या है, तो वे इसे {,}קינותkinut अर्थात् विलापगीत कहते हैं।

आइए, अब हम शब्दों की ओर बढ़ें; क्योंकि जिन बातों को मैंने अभी संक्षेप में छुआ है, उन्हें आगे बढ़ते हुए अधिक पूर्णता से समझाया जा सकता है।

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