यिर्मयाह और विलापगीत पर टीका · खण्ड 2 · यिर्मयाह 34

यिर्मयाह 34

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यिर्मयाह 34

एक सौ छत्तीसवाँ व्याख्यान

यिर्मयाह 34:1-2

1. जब बाबुल का राजा नबूकदनेस्सर अपनी सारी सेना समेत, और पृथ्वी के जितने राज्य उसके वश में थे, उन सभों के लोगों समेत यरूशलेम और उसके सब नगरों से लड़ रहा था, तब यहोवा की ओर से यह वचन यिर्मयाह के पास पहुँचा, कि

1. Sermo qui fuit ad Jeremiam a Jehova, cum Nebuchadnezer rex Babylonis et totus excreitus ejus et omnia regna terrae, quae sub dominatione marius ejus erant, et omnes populi pugnarent contra Jerusalem (hoc est, oppugnarent Jerosolymam) et cunctas urbes, dicendo,

2. इस्राएल का परमेश्वर यहोवा यों कहता है, जाकर यहूदा के राजा सिदकिय्याह से कह, और उसे बता, यहोवा यों कहता है, देख, मैं इस नगर को बाबुल के राजा के वश में कर देने पर हूँ, और वह इसे आग लगाकर फुँकवा देगा;

2. Sic dicit Jehova, Deus Israel, Vade et dices Zedechiae regi Jehudah, dices, inquam, illi, Sic dicit Jehova, Ecce ego trado urbem hanc in manum regis Babylonis, et incendet eam igni.

इसमें कोई आश्चर्य नहीं, और न इसे व्यर्थ समझना चाहिए, कि भविष्यद्वक्ता इतनी बार एक ही बातों को दोहराता है, क्योंकि हम जानते हैं कि जिस प्रजा से उसका काम पड़ा था उसकी कठोरता कितनी बड़ी थी। सो यहाँ वह हमें बताता है कि जब नबूकदनेस्सर और उसकी सारी सेना ने नगर को घेर रखा था, तब वह राजा सिदकिय्याह के पास भेजा गया। भविष्यद्वक्ता उन परिस्थितियों का उल्लेख करता है जिनसे हम समझ सकें कि वह घेराबन्दी कितनी भयानक थी, क्योंकि नबूकदनेस्सर कोई छोटी सेना लेकर नहीं आया था, वरन् उसने बहुत सी और भाँति-भाँति की जातियों को शस्त्र-सज्जित किया था। इसी कारण भविष्यद्वक्ता यहाँ स्पष्ट रूप से पृथ्वी के उन राज्यों और जातियों का उल्लेख करता है जो उसके अधीन थीं

उस समय यरूशलेम में सिदकिय्याह राजा था, और दो अन्य नगर अब तक सुरक्षित बचे थे, जैसा हम आगे देखेंगे; परन्तु यह स्पष्ट है कि इतनी बड़ी और सामर्थी सेना से लड़ने के लिये वह कितना असमर्थ रहा होगा। नबूकदनेस्सर एक महाराजाधिराज था; इस्राएल का राज्य, जो गिनती में यहूदा के राज्य से कहीं बढ़कर था, नाश हो चुका था; और उसने आस-पास की सब जातियों को अपने अधीन कर लिया था। सो ऐसी घेराबन्दी को तुरन्त ही यहूदियों से छुटकारे की हर आशा छीन लेनी चाहिए थी; तौभी भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि राजा अब भी अपनी हठ पर अड़ा था, और प्रजा में तो उससे भी बड़ी ढिठाई थी। परन्तु सिदकिय्याह उद्दण्ड नहीं था; हम पाते हैं कि वह ऐसा घमण्डी और ऐसा क्रूर नहीं था जैसे अत्याचारी प्रायः होते हैं: सो जब उसका स्वभाव उग्र नहीं था, तो इससे हम देखते हैं कि सारी प्रजा का घमण्ड, और परमेश्वर के विरुद्ध उनकी कुटिलता भी, कितनी बड़ी रही होगी, जब उन्होंने राजा को भविष्यद्वक्ता पर इतना क्रोधित कर दिया। तौभी जिस दशा का वर्णन किया गया है, उसे उसके आवेग को दबा देना चाहिए था; क्योंकि जैसे अभक्त मनुष्य समृद्धि से फूल उठते हैं, वैसे ही विपत्ति से दबाए जाने पर उन्हें दीन हो जाना चाहिए। राजा स्वयं, और प्रजा भी, अत्यन्त संकट की दशा में पहुँचा दिए गए थे, तौभी वे परमेश्वर के भविष्यद्वक्ता की चेतावनी नहीं मानते थे; और इसी कारण 2 इतिहास 36:16 में स्पष्ट कहा गया है कि सिदकिय्याह ने भविष्यद्वक्ता के वचन पर ध्यान नहीं दिया, यद्यपि वह प्रभु के मुख से बोलता था, जिसके द्वारा वह भेजा गया था।

इस भविष्यद्वाणी का सारांश यह है: — पहले वह कहता है कि यह वचन उसे यहोवा की ओर से दिया गया; और दूसरे, वह समय बताता है, जिसका कारण हम पहले ही बता चुके हैं। क्योंकि यदि वह सिदकिय्याह को उस समय डाँटता जब शान्ति और चैन था, और किसी संकट का भय न था, तो राजा, जैसा प्रायः होता है, सहज ही भविष्यद्वक्ता के विरुद्ध भड़क सकता था। परन्तु जब उसने देखा कि नगर चारों ओर से इतनी बड़ी और सामर्थी सेना से घिरा है, — जब उसने पृथ्वी के राज्यों में से इतने लोगों को, — इतनी जातियों को इकट्ठा देखा, कि वह अपने शत्रुओं की सेना का हज़ारवाँ भाग भी कठिनता से जुटा सकता था, तब भी, इन सब के होते हुए, वह परमेश्वर के अधीन होना और उसके पलटे को न्यायसंगत मानना न तो कर सका और न चाहा, — यह घोर अन्धेपन का उदाहरण था, और इस बात का प्रमाण कि उसकी बुद्धि मानो भ्रष्ट हो गई थी।

परन्तु परमेश्वर ने उसे इस प्रकार अन्धा कर दिया था, क्योंकि उसका अभिप्राय, जैसा अन्यत्र कहा गया है, प्रजा पर चरम दण्ड लाना था। सो राजा का अन्धापन और उसका पागलपन सारी प्रजा पर परमेश्वर के क्रोध का प्रमाण था; क्योंकि यदि सिदकिय्याह मन फिराता तो परमेश्वर को शान्त कर सकता था। सो परमेश्वर की यही इच्छा थी कि वह हठीले स्वभाव का हो, ताकि ऐसी कुटिलता और हठ के द्वारा वह अपने ऊपर पूर्ण विनाश ले आए।

वह नबूकदनेस्सर और उसकी सारी सेना का उल्लेख करता है; फिर वह उस सेना का और भी विस्तार से वर्णन करता है, अर्थात् उसके अधीन सब राज्यों, और सब जातियों समेत

जब यरूशलेम की यह दशा थी, तब भविष्यद्वक्ता राजा के पास भेजा गया। सन्देश का सार आगे आता है, अर्थात् यह कि नगर विनाश के लिये ठहराया जा चुका था, क्योंकि परमेश्वर ने उसे शत्रु के हाथ में सौंप देने का निश्चय कर लिया था। सिदकिय्याह के लिये यह बहुत ही दुःखद सन्देश था। हम जानते हैं कि कपटी लोग अपनी विपत्तियों में चापलूसी ढूँढ़ते हैं; जब तक परमेश्वर उन्हें छोड़े रहता है तब तक वे डाँट सहना नहीं चाहते, और बुद्धिमानी की सम्मतियों को ठुकरा देते हैं, और जब परमेश्वर के भविष्यद्वक्ता उन्हें मन फिराने का उपदेश देते हैं तब वे चिढ़ भी जाते हैं। परन्तु जब परमेश्वर उन्हें मारने लगता है, तब वे चाहते हैं कि सब लोग उनके दुर्भाग्य में सहभागी हों; और तब वे परमेश्वर के सेवकों पर क्रूरता का दोष भी लगाते हैं, मानो वे उनके पाप उनके सामने रखकर उनके दुःख का उपहास करते हों।

यही बात हमें प्रतिदिन का अनुभव सिखाता है। जब साधारण लोगों में से किसी को, उस समय जब परमेश्वर उन्हें न तो रोग से, न दरिद्रता से, न किसी और विपत्ति से ताड़ना दे रहा हो, चेतावनी दी जाती है, तो चिड़चिड़ा उत्तर यह होता है, “तुम्हारा क्या मतलब है? मैं किस बात में दोषी हूँ? मुझे तो अपनी कोई बुराई मालूम नहीं।” इस प्रकार कपटी लोग तब तक घमण्ड करते हैं जब तक परमेश्वर उन्हें सहता रहता है, और जब तक उसकी कृपा उन्हें छोड़े रहती है। परन्तु जब उन पर कोई विपत्ति आ पड़ती है, जब कोई अपनी खाट पर पड़ा होता है, जब किसी दूसरे का पुत्र या पत्नी छिन जाती है, या वह किसी भी रीति से दुःख से घिर जाता है, — यदि तब परमेश्वर का न्याय उनके सामने रखा जाए, तो वे समझते हैं कि उनके साथ घोर अन्याय किया जा रहा है: “क्या! क्या मेरे पास पहले ही पर्याप्त दुःख नहीं हैं कि और जोड़े जाएँ? मुझे परमेश्वर के सेवकों से शान्ति की आशा थी, परन्तु वे तो मेरी विपत्तियों को और बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं।” संक्षेप में, कपटी लोग कभी भी परमेश्वर की डाँट ग्रहण करने की उचित दशा में नहीं होते।

सो इसमें कोई सन्देह नहीं कि यिर्मयाह जानता था कि उसका सन्देश राजा सिदकिय्याह और उसकी प्रजा के लिये असहनीय होगा। तौभी, जैसा हम देखेंगे, उसने जो कुछ परमेश्वर ने उसे सौंपा था उसे निडर होकर सुना दिया। और हम यह भी देखते हैं कि सिदकिय्याह कितना मूढ़ और कठोर रहा होगा, क्योंकि उसने परमेश्वर के भविष्यद्वक्ता को बन्दीगृह में डालने में संकोच नहीं किया, ठीक उसी समय जब बातें चरम सीमा तक पहुँच चुकी थीं। यह ऐसा ही था मानो परमेश्वर ने बढ़ाई हुई भुजा और खींची हुई तलवार से अपने आप को उसका शत्रु प्रगट किया हो; तौभी वह परमेश्वर के विरुद्ध अपना क्रोध प्रगट करने से न रुका; और जब वह इससे बुरा कुछ न कर सका, तो उसने परमेश्वर के सेवक को बन्दीगृह में डाल दिया; और यद्यपि उसने यह काम अपने मन की प्रेरणा से उतना नहीं जितना दूसरों की प्रेरणा से किया, तौभी वह दोष से बचाया नहीं जा सकता था।

अब भविष्यद्वक्ता कहता है, देख, मैं इस नगर को बाबुल के राजा के हाथ में कर दूँगा। यदि वह केवल इतना कहता कि नगर थोड़े ही समय में ले लिया जाएगा, तो यह एक साधारण सत्य होता, जो प्रभावशाली नहीं वरन् फीका होता। इसलिये यह जोड़ना आवश्यक था, — कि नगर का विनाश परमेश्वर का दिया हुआ न्यायपूर्ण दण्ड था। और इस प्रकार सिदकिय्याह को यह भी स्मरण दिलाया गया कि यद्यपि वह अपने शत्रु से अधिक बलवन्त भी होता, तौभी वह उसका प्रभावशाली रूप से सामना नहीं कर सकता था, क्योंकि यह युद्ध परमेश्वर के अधिकार से चलाया जा रहा था, मानो वह कहता, “तू समझता है कि तू मनुष्यों से लड़ रहा है; पूर्व के महाराज्य से और इतनी जातियों और राज्यों से लड़ना ही तेरे लिये पर्याप्त से अधिक कठिन होता; परन्तु इससे बढ़कर, स्वयं परमेश्वर तेरा शत्रु है; उसी की ओर ध्यान दे, कि तू उसके न्याय से डरना सीखे।” और इसलिये कि ये वचन और भी प्रबल हों, परमेश्वर स्वयं अपने ही नाम से बोलता है, देख, वह कहता है, मैं इस नगर को बाबुल के राजा के हाथ में कर दूँगा, और वह इसे आग से जला देगा। यह अन्तिम वाक्य एक भयानक वृद्धि था; क्योंकि प्रायः ऐसा होता है कि नगर ले लिये जाते हैं, और विजेता लूट से ही सन्तुष्ट हो जाते हैं। इसलिये जब नबूकदनेस्सर यरूशलेम नगर पर इतने क्रोध के साथ चढ़ आया कि उसने उसे जला दिया, तो यह परमेश्वर के भयानक पलटे का प्रमाण था। अब आगे लिखा है —

यिर्मयाह 34:3

3. और तू उसके हाथ से न बचेगा, निश्चय पकड़ा जाएगा और उसके वश में कर दिया जाएगा; और तेरी आँखें बाबुल के राजा की आँखों को देखेंगी, और वह तुझ से आमने-सामने बातें करेगा; और तू बाबुल को जाएगा।

3. Et tu non liberaberis e manu ejus, quia comprehendendo comprehenderis et in manum ejus traderis; et oculi tui videbunt oculos regis Babylonii, et os ejus loquetur ad os tuum (vel, eum ore tuo) et Babylonem migrabis.

जब सिदकिय्याह ने देखा कि प्रजा अब भी अपना कर्तव्य निभा रही है, तब उसने अपने शत्रु को तुच्छ जाना; क्योंकि नगर बहुत ही दृढ़ता से गढ़बन्द था, इसलिये उसे आशा थी कि वह उसे कुछ समय और बचाए रख सकेगा। इसी से छुटकारे की झूठी आशा उत्पन्न हुई; क्योंकि वह सोचता था कि शत्रु थककर कसदियों के देश को लौट जाएगा। वह इसी आशा से धोखा खा गया। परन्तु भविष्यद्वक्ता ने तुरन्त उस पर प्रहार किया, और घोषणा की कि वह बँधुआ हो जाएगा, जिसके योग्य सिदकिय्याह अपनी कृतघ्नता के कारण सचमुच था: क्योंकि जब यकोन्याह बाबुल को ले जाया गया, तब नबूकदनेस्सर ने उसे उसके भतीजे के स्थान पर बैठाकर राजा बनाया था। बाद में उसने बाबुल के राजा से, जिसे उसने वचन दिया था, और जिसका वह करदाता बन गया था, बलवा किया। परन्तु भविष्यद्वक्ता ने इन बीच के कारणों पर नहीं, वरन् मूल कारण पर, अर्थात् सोते पर ध्यान दिया, कि प्रजा पाप पर पाप जोड़ने से नहीं रुकी थी, कि वे पूरी रीति से अवश हो गए थे और सब प्रतिज्ञाओं को ठुकरा चुके थे, और सब बुद्धिमानी की सम्मतियों के प्रति अपने कान भी बन्द कर चुके थे। तब परमेश्वर ने ऐसी कुटिल और निराश प्रजा पर चरम दण्ड लाने का निश्चय करके, उनके राजा को अन्धा कर दिया, जैसा हम पहले कह चुके हैं, कि उसने बाबुल के राजा से बलवा किया, और इस प्रकार अपने ऊपर, और नगर पर, और सारे देश पर विनाश ले आया। इस प्रकार परमेश्वर ने उन बीच के कारणों पर, जो हमें दिखाई देते हैं, प्रभुता की; परन्तु उसका अपना गुप्त अभिप्राय था जिसे उसने बाहरी साधनों के द्वारा पूरा किया।

फिर वह कहता है, तू उसके हाथ से छुड़ाया न जाएगा, क्योंकि तू पकड़ा जाएगा; और फिर वह जोड़ता है, तू उसके हाथ में सौंप दिया जाएगा। जो बात वह बहुत से शब्दों में कहता है, वह एक ही वाक्य में कही जा सकती थी: परन्तु राजा की उस मूढ़ता को झकझोरना आवश्यक था, जिससे वह मानो मतवाला हो गया था, कि वह जगाया जाए और निकट आनेवाले दण्ड से डरे, जो कि फिर भी नहीं हुआ; परन्तु इसके द्वारा वह और भी निरुत्तर ठहराया गया। इस प्रकार वे धमकियाँ जिन्हें परमेश्वर अपने सेवकों के द्वारा दोहराता है, कभी व्यर्थ नहीं होतीं; क्योंकि यदि डाँटे जानेवालों के कान बहरे भी हों, तौभी जो कुछ परमेश्वर घोषित करता है वह उनके विरुद्ध साक्षी ठहरेगा, जिससे अज्ञानता के आधार पर हर बहाना दूर हो जाता है।

इसके बाद वह कहता है, तेरी आँखें बाबुल के राजा की आँखों को देखेंगी। और ऐसा ही हुआ; परन्तु बाद में उसकी आँखें निकाल ली गईं। सचमुच उसका असाधारण अपमान हुआ, क्योंकि वह रिबला को ले जाया गया और एक अपराधी के समान उसका न्याय किया गया। उसके साथ राजा का सा व्यवहार नहीं किया गया, और न उसकी पहली प्रतिष्ठा में से कुछ भी उसके पास रहा; वरन् वह एक चोर या दुष्ट के समान बाबुल के राजा के न्यायासन के सामने लाया गया। फिर जब वह कृतघ्नता और विश्वासघात का दोषी ठहराया गया, तब कसदी राजा ने आज्ञा दी कि उसके बच्चे उसकी आँखों के सामने घात किए जाएँ, और उसके प्रधान पुरुष और मन्त्री भी, और वह स्वयं बेड़ियों से जकड़ा जाए और उसकी आँखें निकाल ली जाएँ; और वह उसे बाबुल को ले गया। सो बाबुल के राजा ने सिदकिय्याह को अत्यन्त क्रूर दण्ड दिया। और ऐसा प्रतीत होता है कि भविष्यद्वक्ता ने परोक्ष रूप से उस घटना की ओर संकेत किया, तेरी आँखें, वह कहता है, बाबुल के राजा की आँखों को देखेंगी: वह अपनी आँखों से उस घमण्डी विजेता को देखने के लिये विवश किया गया, और फिर उसकी आँखें निकाल ली गईं; परन्तु पहले उसने अपने बच्चों को घात होते देख लिया था।

वह आगे कहता है, और उसका मुँह तेरे मुँह से बातें करेगा, अर्थात्, “जब तू प्राणदण्ड के योग्य अपराध का दोषी ठहराया जाएगा, तब तू अपने विरुद्ध सुनाया गया भयानक दण्ड-आदेश सुनेगा; राजा स्वयं हर सम्भव अपमान के साथ तुझे पद से गिराएगा।” अब यह दशा उससे भी कठोर थी कि सिदकिय्याह चुपके से मार डाला जाता। वह उजियाले में घसीटा गया; फिर जब वह अपने शत्रु के सामने लाया गया तब उसने बहुत सी भयानक बातें सहीं। सो भविष्यद्वक्ता ने यह बात इसलिये बताई कि सिदकिय्याह समझ ले कि वह व्यर्थ ही नगर की रक्षा कर रहा था, क्योंकि उसका दुःखद अन्त निकट आ पहुँचा था। इसके बाद वह आगे कहता है —

यिर्मयाह 34:4-5

4. तौभी हे यहूदा के राजा सिदकिय्याह, यहोवा का वचन सुन! यहोवा तेरे विषय में यों कहता है, तू तलवार से मारा न जाएगा:

4. Tamen audi sermonum Jehovae, Zedechia rex Jehudah, sic dicit Jehova de to, Non morieris gladio; 5. परन्तु तू शान्ति के साथ मरेगा; और जैसे तेरे पितरों के लिये, अर्थात् तुझ से पहले के राजाओं के लिये सुगन्ध-द्रव्य जलाया गया, वैसे ही तेरे लिये भी जलाया जाएगा; और वे यह कहकर, हाय मेरे प्रभु! तेरे लिये विलाप करेंगे; क्योंकि यह वचन मैं ही ने कहा है, यहोवा की यही वाणी है।

5. In pace morieris, et combustionibus patrum tuorum regum superiorum, qui ruerunt ante re, sic comburent to, et, Heus domine, plangent super to, quia sermonum ego locutus sum, dicit Jehova.

यहाँ यिर्मयाह कुछ शान्ति की बात जोड़ता है, अर्थात् यह कि सिदकिय्याह स्वयं तलवार से घात न किया जाएगा, वरन् अपनी खाट पर मरेगा, और जैसा लोग प्रायः कहते हैं, अपनी नियति के आगे झुकेगा। सचमुच यह दण्ड में कुछ कमी थी, कि परमेश्वर ने उसका जीवन बढ़ाया और उसे तुरन्त तलवार से मारे जाने न दिया। तौभी यदि हम सब परिस्थितियों पर विचार करें, तो इस शर्त पर जीवन को लम्बा करने की अपेक्षा कि निरन्तर दुःख में घुलते रहने के लिये ठहराया जाए, एक ही बार में मार डाला जाना कम बुरा होता।

जब आँखें निकाल ली जाती हैं, तो हम जानते हैं कि जीवन का मुख्य भाग खो जाता है। सो जब सिदकिय्याह को यह दण्ड दिया गया, तो क्या मृत्यु वांछनीय न थी? और फिर वह न केवल अपनी राजकीय प्रतिष्ठा से वंचित किया गया, वरन् अपनी सारी सन्तान से भी रहित कर दिया गया, और बाद में बेड़ियों से जकड़ा गया। इससे हम देखते हैं कि जो कुछ उसके पास शेष रहा वह इतनी चाहने योग्य वस्तु न थी; वह दस बार या सौ बार मरना अधिक पसन्द कर सकता था। तौभी परमेश्वर ने इसे एक कृपा के रूप में ठहराया कि वह तलवार से मारा न गया।

यहाँ एक प्रश्न उठाया जा सकता है, क्या हिंसक मृत्यु से इतना अधिक डरना चाहिए? हम जानते हैं कि कुछ अन्यजातियों ने तो उसकी कामना भी की है। वे हमें जूलियस सीज़र के विषय में बताते हैं कि जिस दिन वह मारा गया उससे एक दिन पहले, उसने भोजन के समय इस पर वाद-विवाद किया कि सबसे उत्तम मृत्यु कौन सी है, और उसने उसे सबसे सहज मृत्यु ({εὐθανασίαν}) समझा जब कोई अचानक जीवन से वंचित हो जाए, — ठीक वही बात जो अगले दिन उसके साथ हुई। इस प्रकार ऐसा प्रतीत हुआ कि उसकी इच्छा पूरी हो गई, क्योंकि उसने कहा था कि अचानक बुझ जाना एक सुखद प्रकार की मृत्यु है। तौभी इसमें कोई सन्देह नहीं कि स्वाभाविक मृत्यु, जैसा कहते हैं, अन्य बातें समान होने पर, सदा अधिक सहज रीति से सही जाती है; क्योंकि प्रकृति की भावना यही है कि मनुष्य सदा रक्तपातपूर्ण मृत्यु से डरते हैं, और जब मनुष्य का लोहू बहाया जाता है तो यह एक भयानक बात समझी जाती है; परन्तु जब कोई रोग के कारण शान्ति से मरता है, तो क्योंकि यह एक साधारण बात है, हमें उतनी घबराहट नहीं होती। फिर रोगी को समय मिलता है कि वह परमेश्वर के हाथ पर विचार करे, एक उत्तम जीवन की आशा पर मनन करे, और परमेश्वर की दया की शरण में भी भागे, जो हिंसक मृत्यु में नहीं हो सकता। इसलिये जब इन सब बातों को ठीक-ठीक तौला जाए, तो इसे विचित्र नहीं समझना चाहिए कि परमेश्वर ने सिदकिय्याह के दण्ड को हलका करने की इच्छा से कहा, तू तलवार से मारा न जाएगा, परन्तु तू शान्ति के साथ मरेगा। शान्ति के साथ मरना स्वाभाविक मृत्यु मरना है, जब कोई हिंसा नहीं की जाती, वरन् जब परमेश्वर स्वयं मनुष्यों को बुलाता है, मानो वह उनकी ओर अपना हाथ बढ़ाता हो। यह सचमुच निश्चित है कि कुछ लोगों के लिये रोग से घुल-घुलकर मरने की अपेक्षा तलवार से मारा जाना कहीं अच्छा है: क्योंकि हम देखते हैं कि बहुत से लोग या तो अपनी खाट पर उन्माद से ग्रस्त हो जाते हैं, या परमेश्वर के विरुद्ध भड़क उठते हैं, या हठीले बने रहते हैं: संक्षेप में, भयानक उदाहरण हैं, जो प्रतिदिन सामने आते हैं, जहाँ परमेश्वर का आत्मा कार्य नहीं करता और न प्रभुता करता है। क्योंकि तब मनुष्य में कोई कोमलता नहीं रहती, विशेषकर जब उस पर मृत्यु का भय छाया हो; तब वह मानो परमेश्वर के विरुद्ध क्रोध में जल उठता है। परन्तु दूसरी ओर, बहुत से लोग जो क्लेश में डाले जाते हैं, स्वीकार करते हैं कि वे न्याय से दोषी ठहराए गए हैं, और साथ ही यह भी स्वीकार करते हैं कि जो दण्ड दिया गया है वह औषधि है, ताकि वे परमेश्वर के सामने दया पाएँ। सो बहुतों के लिये शान्ति से मरने की अपेक्षा हिंसक मृत्यु मरना अच्छा है; परन्तु यह मनुष्यों के दोष के कारण होता है: साथ ही, स्वाभाविक मृत्यु, जैसा मैं कह चुका हूँ, हिंसक और रक्तपातपूर्ण मृत्यु से कहीं बढ़कर पसन्द किए जाने के योग्य है, और मैंने संक्षेप में इसके कारण बता दिए हैं। यह विषय सचमुच और भी विस्तार से समझाया जा सकता है, परन्तु इतना पर्याप्त है कि जैसा यह खण्ड चाहता है, मुख्य बात को संक्षेप में छू लिया जाए।

शान्ति के साथ, वह कहता है, तू मरेगा, और फिर जोड़ता है, तेरे पितरों के समान जलाकर वे तेरे लिये भी जलाएँगे, और तेरे लिये विलाप करेंगे, “हाय! प्रभु।” यहाँ एक और शान्ति जोड़ी गई है, — कि जब सिदकिय्याह मरेगा, तब कुछ लोग होंगे जो उसे न केवल मानवीय रीति से, वरन् आदरपूर्वक भी गाड़ेंगे। और बहुत से स्थानों में मिट्टी दिया जाना परमेश्वर की कृपाओं में से एक गिना गया है, जैसे जीवन में, जब हम स्वस्थ और बलवन्त होते हैं, परमेश्वर अपने आप को हमारे प्रति कृपालु और उदार प्रगट करता है। क्योंकि जैसे स्वास्थ्य और जीवन की आवश्यकताओं के लिये पर्याप्त भोजन परमेश्वर के प्रेम के प्रमाण हैं, वैसे ही मृत्यु के बाद मिट्टी दिया जाना भी है; क्योंकि मिट्टी दिया जाना मनुष्यों को पशुओं से अलग करता है। जब कोई वनपशु मरता है, तो उसकी लोथ सड़ने के लिये छोड़ दी जाती है।

मनुष्यों को क्यों गाड़ा जाता है, सिवाय पुनरुत्थान की आशा में, मानो वे पुनःस्थापना के समय तक किसी सुरक्षित स्थान में रख दिए गए हों? सो मिट्टी दिया जाना, क्योंकि वह हमारी अमरता का प्रतीक है, मृत्यु के बाद हम में और पशुओं में भेद करता है। स्वयं मृत्यु में कोई भेद नहीं; मनुष्य की मृत्यु और कुत्ते की मृत्यु में ऐसे कोई निश्चित चिह्न नहीं जो एक को दूसरे से अलग करें। इसलिये परमेश्वर की यह इच्छा है कि कोई स्मारक हो, जिससे मनुष्य समझें कि उनकी दशा पशुओं की दशा से कितनी अधिक उत्तम है। सो इसी कारण, जब परमेश्वर हमें मिट्टी दिए जाने का अनुग्रह देता है, तब वह हमारे प्रति अपनी पितृवत् चिन्ता प्रगट करता है। इसके विपरीत, जब किसी का शव फेंक दिया जाता है, तो वह अपने आप में परमेश्वर की अप्रसन्नता का चिह्न है, जैसा पहले प्रगट हुआ, जब भविष्यद्वक्ता ने यहोयाकीम के विषय में कहा कि उसको गदहे के समान मिट्टी दी जाएगी (यिर्मयाह 22:19)। सो जैसे यहोयाकीम को गदहे की सी गाड़े जाने की धमकी दी गई थी, वैसे ही अब वह सिदकिय्याह को आदरपूर्ण रीति से मिट्टी दिए जाने की प्रतिज्ञा करता है।

मैंने कहा कि यह बात तब सत्य है, जब वस्तु पर अपने आप में विचार किया जाए। क्योंकि कभी-कभी ऐसा होता है कि अत्यन्त दुष्ट लोग आदर और बड़ी धूमधाम के साथ गाड़े जाते हैं, जब कि परमेश्वर की सन्तान या तो जला दी जाती है या वनपशुओं द्वारा फाड़ी जाती है। भजनकार की वह शिकायत प्रसिद्ध है, कि पवित्र लोगों के शव फेंक दिए गए और पक्षियों और वनपशुओं का आहार बन गए (भजन संहिता 79:2)। और उस धनवान के विषय में, जो ठाट-बाट से रहता था, कहा गया है कि वह मरा और गाड़ा गया, परन्तु लाज़र के गाड़े जाने का कोई उल्लेख नहीं (लूका 16:22)। सो हमें केवल इतने से यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि जो गाड़े नहीं जाते वे अभागे हैं, और जो मिट्टी दिए जाने का आदर पाते हैं वे धन्य हैं। जैसे कहा गया है कि सूर्य परमेश्वर की सन्तानों पर और परदेशियों पर उदय होता है, वैसे ही मृत्यु के बाद भी, क्योंकि मिट्टी दिया जाना एक सांसारिक लाभ है, उसे भलों और बुरों दोनों का बिना भेदभाव समझा जा सकता है। इसके विपरीत ऐसा हो सकता है कि परमेश्वर अपनी सन्तानों को मिट्टी दिए जाने से वंचित कर दे; तौभी यह सत्य अटल बना रहता है, कि मिट्टी दिया जाना अपने आप में परमेश्वर की कृपा का प्रमाण है; और यह कि जब किसी को फेंक दिया जाता है और मिट्टी दिए जाने से वंचित किया जाता है, तो यह परमेश्वर की अप्रसन्नता का चिह्न है। फिर भी जब हम व्यक्तियों पर आते हैं, तो प्रभु अपने लोगों के लिये सांसारिक दण्ड को लाभ में बदल देता है; और अपनी सांसारिक आशीषों को सब त्यागे हुए और अभक्त लोगों के लिये और भारी दण्ड का कारण बना देता है; इसलिये वे बर्बर थे जिन्होंने मिट्टी दिए जाने का उपहास करने का साहस किया, जैसे कुत्तावादी (सिनिक) दार्शनिकों ने किया, जो मिट्टी दिए जाने को तुच्छ समझते थे। यह निर्दयता थी।

परन्तु हमें इन बातों को दृढ़ता से थामे रहना चाहिए, — कि जैसे परमेश्वर हमें पालने, और स्वास्थ्य और बल में बनाए रखने के लिये रोटी, दाखमधु और जल, और जीवन की अन्य आवश्यक वस्तुएँ देता है, वैसे ही हमें मिट्टी दिए जाने को भी समझना चाहिए; परन्तु जब विश्वासी भूख के अधीन छोड़े जाते हैं, जब वे ठण्ड या नंगेपन से मरते हैं, या जब वे अन्य बुराइयों के अधीन किए जाते हैं, और जब मृत्यु के बाद उनके साथ अपमानजनक व्यवहार किया जाता है, तो यह सब उनके उद्धार के लिये होता है, क्योंकि प्रभु उनकी भलाई का ध्यान तब भी रखता है जब वह उन्हें विपत्तियों से दुःख देता हुआ प्रतीत होता है।

सो यही कारण है कि भविष्यद्वक्ता अब यह कहकर सिदकिय्याह के शोक को कुछ हद तक हलका करता है, वे तुझे मिट्टी देंगे, और तेरे पितरों के समान जलाकर तेरे लिये भी जलाएँगे। यह साधारण नहीं, वरन् राजकीय रीति से मिट्टी दिया जाना था। सो वह प्रतिज्ञा करता है कि बहुत से अपमानों और निन्दाओं के बाद, परमेश्वर अन्त में, उसके मरने पर, उस पर कुछ कृपा प्रगट करेगा। परन्तु कोई कह सकता है, इससे सिदकिय्याह को क्या लाभ होता? क्योंकि तब तो उसका शरीर बिना समझ और बिना अनुभूति के होता। परन्तु परमेश्वर की इस कृपा के विषय में सुनना अच्छा था, क्योंकि इससे वह यह निष्कर्ष निकाल सकता था कि यदि वह सचमुच अपने आप को दीन करे, तो परमेश्वर अन्त में उस पर दया करेगा। सो इसमें कोई सन्देह नहीं कि उसे क्षमा की आशा दी गई थी, यद्यपि उसे मृत्यु तक तीखी और कठोर ताड़ना मिलनी थी। सो परमेश्वर का अभिप्राय यह था कि यह चिह्न उसे सदा स्मरण रहे, ताकि वह पूरी रीति से निराश न हो जाए। अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने सिदकिय्याह से यह प्रतिज्ञा क्यों की, इसलिये नहीं कि आदर के साथ मिट्टी दिया जाना उसके लिये कोई महत्व की बात हो, वरन् इसलिये कि उसे परमेश्वर की कृपा और दया का कुछ बोध हो।

अब हम जानते हैं कि राजाओं के शव बड़े व्यय से जलाए जाते थे; बहुत से बहुमूल्य सुगन्ध-द्रव्य मँगवाए जाते थे, आग जलाई जाती थी, और शव झुलसाए जाते थे; इसलिये नहीं कि वे भस्म कर दिए जाएँ, (क्योंकि यह रीति न थी, जैसी रोमियों और अन्य जातियों में थी, जो मृतकों के शव जलाते और राख इकट्ठी करते थे) परन्तु यहूदियों में शव कभी जलाया नहीं जाता था; वे केवल मृत शरीर के चारों ओर आग जलाते थे, कि वह सड़ न जाए। मृतकों के शव धीमी आग से सुखाए जाते थे। यह सचमुच साधारण रीति से नहीं किया जाता था, वरन् केवल राजाओं के मिट्टी दिए जाने पर, जैसा आसा और अन्य राजाओं के उदाहरण से प्रगट होता है (2 इतिहास 16:14)।

फिर वह कहता है, तेरे पितरों के समान जलाकर वे तेरे लिये भी जलाएँगे, और तेरे लिये विलाप करेंगे, “हाय! प्रभु,” तो यह पूछा जा सकता है कि क्या ये विलाप परमेश्वर को स्वीकार थे? इसका उत्तर सहज है, — कि जब भविष्यद्वक्ता कहता है, वे तेरे लिये विलाप करेंगे, तो वह यहाँ अत्यधिक शोक, और रोने-चिल्लाने और आर्तनादों की प्रशंसा नहीं करता, वरन् उसने यह कथन उस बात से लिया जो साधारणतः की जाती थी, मानो वह कहता, “वे तेरे लिये मानवता का यह कर्तव्य पूरा करेंगे, जैसा पूर्ण सामर्थ वाले राजाओं के शवों पर, उनकी समृद्धि के दिनों में, प्रायः किया जाता है।”

सो परमेश्वर यहाँ विलाप और शोक की चर्चा करते हुए उन्हें सद्गुणों के रूप में, या प्रशंसा के योग्य कहकर सराहता नहीं, वरन् केवल उसी की ओर संकेत करता है जो उस समय साधारणतः किया जाता था।

परन्तु हम जानते हैं कि पौलुस विशेष रूप से हमें क्या सिखाता है, — कि हमें अपने शोक को ऐसा संयमित रखना चाहिए कि हम उन अविश्वासियों के समान न हों जिन्हें आशा नहीं (1 थिस्सलुनीकियों 4:13), क्योंकि वे सोचते हैं कि मृत्यु शरीर के समान आत्मा की भी मृत्यु है: इसलिये वे अपने मृतकों के लिये ऐसे विलाप करते हैं मानो वे सदा के लिये खो गए हों; और वे परमेश्वर के विरुद्ध कुड़कुड़ाते भी हैं, और कभी-कभी भयानक निन्दा की बातें बकते हैं। सो पौलुस चाहता है कि हम अपने शोक में संयमी रहें। वह शोक की पूरी तरह निन्दा नहीं करता, परन्तु केवल यह माँगता है कि वह संयमित हो, ताकि हम दिखा सकें कि पुनरुत्थान की आशा का हम पर कितना प्रभाव है।

तौभी इसमें कोई सन्देह नहीं कि इस विषय में मनुष्य संयम की सीमा लाँघ जाते हैं। लगभग सब युगों में यही होता आया है कि मृतकों के लिये शोक करने में दिखावा किया जाए। क्योंकि वे न केवल अपने मित्रों या सम्बन्धियों के लिये विलाप करने में सच्ची भावना से रहित होते हैं, वरन् एक प्रकार की महत्वाकांक्षा में बह जाते हैं, और बड़े कोलाहल और विलाप के साथ मृतकों को गाड़ते हैं। जब वे अकेले होते हैं तब अपने आप को रोके रहते हैं, कि कम से कम कोई शोर न करें; परन्तु जब वे दूसरों के सामने निकलते हैं, तब वे ऊँचे स्वर से विलाप करने लगते हैं। इससे प्रगट होता है कि, जैसा मैं कह चुका हूँ, शोक प्रायः दिखावटी होता है। परन्तु क्योंकि मनुष्य आरम्भ ही से इस विषय में भटकते आए हैं, इसलिये हमें और भी अधिक सावधानी रखनी चाहिए, कि हम में से हर एक अपने आप को रोके और वश में रखे।

फिर भी, जैसा मैं कह चुका हूँ, मृतकों के लिये रोना स्वाभाविक है; परन्तु निःसन्देह कहा जा सकता है कि भविष्यद्वक्ता के बताए हुए आर्तनाद उचित नहीं ठहराए जा सकते; क्योंकि यह चिल्लाने से क्या प्रयोजन था, “हाय! प्रभु; हमारा राजा मर गया,” और इसी प्रकार की बातें? परन्तु हमें स्मरण रखना चाहिए कि पूर्वी जातियाँ इस विषय में सदा अति करती थीं, और आज के दिन भी हम उन्हें ऐसा ही पाते हैं। जलवायु जितनी गर्म होती है, लोग उतने ही अधिक हाव-भाव और रीति-रस्मों में लगे रहते हैं। इन ठण्डे प्रदेशों में हाव-भाव करना और चिल्लाना, “हाय! प्रभु, हाय! पिता,” अनुचित और मूर्खतापूर्ण समझा जाएगा।

परन्तु जहाँ वे अपने बाल नोचते हैं, और अपने आप को घायल भी करते हैं, और अपने गालों को न केवल नाखूनों से, वरन् छुरियों से भी चीरते हैं, — जहाँ वे ये काम करते हैं, वहाँ वे भविष्यद्वक्ता के बताए हुए ये आर्तनाद भी करते हैं।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह अनुग्रह कर कि, जैसे हमारे लिये सदा यह हितकर है कि हम तेरे हाथ से बार-बार ताड़ना पाएँ, — वैसे ही यह अनुग्रह कर कि हम तेरे कोड़ों को धीरज से और शान्त मन से सहना सीखें, और अपने पापों को ऐसा मान लें कि साथ ही हम इस बात में सन्देह न करें कि तू हम पर दयालु होगा, और कि हम इसी भरोसे के साथ सदा क्षमा माँगने को तेरी शरण में भागें, और कि यह हमारे मन फिराव को बढ़ाने में भी सहायक हो, जिससे हम शरीर के सब दुर्गुणों को उतार फेंकने और नए मनुष्यत्व को पहिन लेने का अधिकाधिक यत्न करें, यहाँ तक कि तेरा स्वरूप हम में नया होता जाए, जब तक कि हम अन्त में उस अनन्त महिमा के सहभागी न हो जाएँ, जो तू ने स्वर्ग में हमारे लिये तेरे पुत्र मसीह के द्वारा तैयार की है। — आमीन।

एक सौ सैंतीसवाँ व्याख्यान

यिर्मयाह 34:6-7

6. ये सब वचन यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता ने यहूदा के राजा सिदकिय्याह से यरूशलेम में कहे,

6. Et loquutus est Jeremias Propheta ad Zedechiam, regem Jehudah, omnes sermones istos in Jerusalem.

7. जब बाबुल के राजा की सेना यरूशलेम से और यहूदा के जितने नगर बच रहे थे, उनसे, अर्थात् लाकीश और अजेका से लड़ रही थी; क्योंकि यहूदा के गढ़वाले नगरों में से केवल ये ही रह गए थे।

7. Et exercitus regis Babylonii pugnabant (hoc est, oppugnabant) Jerusalem et onmes urbes Jehudah quae residuae erant, nempe Lachis et Azekah, quoniam ipsae restabant in urbibus Jehudah urbes munitionis (id est, minutiae)

यहाँ यिर्मयाह केवल यह बताता है कि उसने वह सन्देश जो उसे सौंपा गया था पहुँचा दिया; और यहाँ भविष्यद्वक्ता की उदारचित्तता दिखाई देती है, क्योंकि जैसा कल प्रगट हुआ, वह एक अप्रिय सन्देशवाहक था; और यद्यपि संकट था, तौभी यिर्मयाह ने अपना पद-कार्य पूरा किया, क्योंकि वह जानता था कि परमेश्वर राजा को उसके साथ कुछ भी करने न देगा जब तक कि उसमें कोई भलाई न हो। सो इसमें कोई सन्देह नहीं कि उसने अपना प्राण परमेश्वर के हाथ में सौंप दिया, और मानो अपने आप को बलिदान के रूप में अर्पित कर दिया, जब उसने खुलकर राजा को धमकाने का साहस किया, जो उसे अप्रसन्न किए बिना नहीं हो सकता था; और सुलैमान के कहने के अनुसार, “राजा का क्रोध मृत्यु का दूत है।” (नीतिवचन 16:14)

अतः यहाँ भविष्यद्वक्ता की दृढ़ता प्रशंसा के योग्य है; क्योंकि जब उसने देखा कि परमेश्वर ने उस पर यह आवश्यकता रख दी है, तब वह किसी संकट से नहीं डरा।

वह फिर दोहराता है कि उस समय यरूशलेम बाबुल के राजा की सेना से घिरा हुआ था, और यहूदा के अन्य नगर भी, जिनके नाम वह लेता है, अर्थात् लाकीश और अजेका। इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि वह परोक्ष रूप से सिदकिय्याह के अहंकार को डाँटता है, क्योंकि वह इतनी सकेती में पड़ जाने पर भी अपना ऊँचा मन बनाए हुए था। यहूदा के सब नगर—वे कितने थे? दो, भविष्यद्वक्ता कहता है। अतः राजा के व्यर्थ भरोसे का परोक्ष रूप से उपहास करने का यह कोई अनुचित ढंग न था, जो अब भी यह सोचता था कि वह शत्रु पर जय पा सकता है, यद्यपि वह केवल तीन नगरों का स्वामी था, अर्थात् यरूशलेम, लाकीश और अजेका का। परन्तु भविष्यद्वक्ता इसका कारण बताता है कि ये नगर तुरन्त बाबुल के राजा के हाथ में क्यों नहीं पड़े, अर्थात् इसलिए कि वे गढ़वाले थे। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि अन्य नगर बिना कठिनाई के ले लिए गए, या उन्होंने अपनी इच्छा से आत्मसमर्पण कर दिया। इस प्रकार राजा सिदकिय्याह अपनी शक्ति से वंचित हो चुका था, तौभी उसने अपने मन की उग्रता नहीं छोड़ी थी, और न भविष्यद्वक्ता की धमकियों से वह भयभीत हुआ; और यह घोर पागलपन का प्रमाण था। क्योंकि इससे प्रकट होता है कि उसकी बुद्धि फिर गई थी; क्योंकि परमेश्वर का भयानक हाथ उसके विरुद्ध बढ़ाया गया था, तौभी वह बुद्धिहीन वनपशु के समान अपने ही विनाश की ओर सिर के बल दौड़ा। आइए, हम आगे बढ़ें,—

यिर्मयाह 34:8-17

8 यहोवा की ओर से यह वचन यिर्मयाह के पास उस समय आया जब सिदकिय्याह राजा ने सारी प्रजा से जो यरूशलेम में थी यह वाचा बाँधी कि उनमें स्वतन्त्रता का प्रचार किया जाए;

8. Sermo qui factus est ad Jeremiam a Jehova, postquam percussit rex Zedechias foedus cum toto popalo, qui erant in Jerusalem, ad promulgandum ipsis (hoc est, inter ipsos) libertatem;

9. कि सब कोई अपने अपने दास और दासी को जो इब्री वा इब्रिन हों स्वतन्त्र करके जाने दें, और कोई अपने यहूदी भाई से फिर अपनी सेवा न कराए।

9. Ut dimitteret quisque servum suum, et quisque ancillam suam (vir, vir, ad verbum, sed significat quisque indefinite) Hebraeum vel Hebraeum liberos, ut ne ultra servirent ipsis (vel, transitive, ut alii malunt et bene quadrat, ut non haberent cos servos) inter Judaeos vir fratrem suum.

10. तब सब हाकिमों और सारी प्रजा ने जिन्होंने यह वाचा बाँधी थी, यह सुना कि हम अपने अपने दास दासियों को स्वतन्त्र कर दें और फिर उनसे अपनी सेवा न कराएँ; सो उन्होंने उस वाचा के अनुसार किया और उनको स्वतन्त्र करके जाने दिया।

10. Et audierunt omnes principes et torus populus, qui venerant ad foedus, ut dimitteret servum suum et ancillam suam liberos, ut ne servirent amplius ipsis (vel, ut ne dominarentur) et obedierunt et dimiserunt.

11. परन्तु इसके बाद वे फिर गए और जिन दास दासियों को उन्होंने स्वतन्त्र करके जाने दिया था उनको फिर लौटाकर अपने अधीन दास और दासियाँ बना लिया।

11. Et reversi aunt (hoc est, mutarunt concilium) postea, et reduxerunt servos suos et ancillas suas quos dimiserant liberos et subegerunt cos in servos et ancillas.

12. तब यहोवा की ओर से यह वचन यिर्मयाह के पास पहुँचा,

12. Et fuit sermo Jehovae ad Jeremiam a Jehova, dicendo, (hoec necessario contexere oportet)

13. इस्राएल का परमेश्वर यहोवा तुमसे यों कहता है, जिस समय मैं तुम्हारे पुरखाओं को दासत्व के घर अर्थात् मिस्र देश से निकाल ले आया, उस समय मैंने आप उनसे यह कहकर वाचा बाँधी,

13. Sic dicit Jehova, Deus Israel, Ego percussi foedus cum pattibus vestris die quo eduxi ipsos e terra Egypti, e domo servorum, dicendo,

14. कि सात वर्ष के बीतने पर तुम अपने अपने इब्री भाई को जो तेरे हाथ में बेचा गया हो छोड़ देना; छः वर्ष तो वह तेरी सेवा करे परन्तु इसके बाद तू उसको स्वतन्त्र करके अपने पास से जाने देना। परन्तु तुम्हारे पुरखाओं ने मेरी न सुनी, न मेरी ओर कान लगाया।

14. A fine septem annorum dimittetis quisque fratrem suum Hebraeum, qui venditus tibi fuerit et serviret tibi sex annis, et dimittes liberum abesse tecum (hoc est, ut non sit amplius tecum, vel apud to) et non audierunt patres vestri me, et non inclinarunt aurem suam.

15. तुम अभी फिरे तो थे और अपने अपने भाई को स्वतन्त्र कर देने का प्रचार कराके जो काम मेरी दृष्टि में भला है उसे तुमने किया था, और जो भवन मेरा कहलाता है उसमें मेरे साम्हने वाचा भी बाँधी थी;

15. Et conversi estis vos hodie, et fecistis quod rectum erat in oculis meis, promulgando libertatem quisque proximo suo, et pepigistis foedus coram facie mea in domo super quam invocatum est nomen meum:

16. पर तुम भटक गए और मेरा नाम इस रीति से अशुद्ध किया कि जिन दास दासियों को तुम स्वतन्त्र करके उनकी इच्छा पर छोड़ चुके थे उन्हें तुमने फिर अपने वश में कर लिया है, और वे फिर तुम्हारे दास दासियाँ बन गए हैं।

16. Et reversi estis (hoc est, mutastis consilium) et profanastis nomen meum, et reduxistis quisque servum suum, et quisque ancillam suam, quos dimiseratis liberos animae suae, (hoc est, ad arbitrium suum) et subegistis ipsos ut essent vobis in servos et ancillas.

17. इस कारण यहोवा यों कहता है कि तुमने जो मेरी आज्ञा के अनुसार अपने अपने भाई और पड़ोसी को स्वतन्त्र करने का प्रचार नहीं किया, सो यहोवा का यह वचन है, सुनो, मैं तुम्हारे इस प्रकार से स्वतन्त्र होने का प्रचार करता हूँ कि तुम तलवार, मरी और महँगी में पड़ोगे; और मैं ऐसा करूँगा कि तुम पृथ्वी के राज्य राज्य में मारे मारे फिरोगे।

17. Propterea sic dicit Jehova, Vos non audistis ad promulgandum libertatem quisque fratri suo, et quisque proximo suo, ecce ego pro-mulgo contra vos libertatem, dicit Jehova, gladio et pesti et fatal, et dabo vos in commotionum (vel, concussionem) cunctis regnis terrae.

यद्यपि हम यह नहीं पढ़ते कि जो कुछ भविष्यद्वक्ता यहाँ बताता है वह परमेश्वर की आज्ञा से किया गया था, तौभी हम सहज ही यह समझ सकते हैं कि राजा सिदकिय्याह को चेतावनी दी गई थी कि वह व्यवस्था के अनुसार दासों को स्वतन्त्र करे, जैसा निर्गमन 21:2 में लिखा है। परमेश्वर की यह इच्छा थी कि जिस प्रजा को उसने लेपालक बनाया था उसमें और अन्य जातियों में कुछ भेद हो; क्योंकि परमेश्वर ने अब्राहम के वंश को अपनी निज सम्पत्ति के रूप में चुना था, और अन्य जातियाँ इस विषय में पराई थीं। इसलिए उसकी यह इच्छा थी कि इस्राएल की प्रजा में यह व्यवस्था स्थापित करे कि दासत्व सदा का न हो, सिवाय इसके कि कोई अपनी इच्छा से, स्वेच्छापूर्वक, जीवन भर के लिए अपने आपको बाँध ले, जैसा हम व्यवस्थाविवरण 15:16, 17 में पढ़ते हैं; क्योंकि जब कोई नीच मन का मनुष्य अपने आपको इस व्यवस्था के लाभ से वंचित करता था, तब उसका स्वामी सुतारी से उसका कान छेदता था; और यह चिह्न पाकर वह फिर स्वतन्त्र नहीं हो सकता था, सिवाय इसके कि वह कदाचित् जुबली के वर्ष तक जीवित रहे।

भविष्यद्वक्ता के वचनों से हम सीखते हैं कि व्यवस्था की इस आज्ञा की उपेक्षा की गई थी, क्योंकि सातवें वर्ष के अन्त में दास स्वतन्त्र नहीं किए जाते थे। इसलिए राजा सिदकिय्याह ने, इस विषय में चेतावनी पाकर, प्रजा को इकट्ठा किया, और सबकी सहमति से, जैसा परमेश्वर ने आज्ञा दी थी उसके अनुसार, स्वतन्त्रता का प्रचार किया गया। परन्तु यह कपट से किया गया, क्योंकि शीघ्र ही दास फिर लौटा लिए गए, और इस प्रकार क्रूरता में विश्वासघात भी जोड़ दिया गया। उन्होंने पहले अपने भाइयों पर अन्यायपूर्वक अत्याचार किया था, परन्तु अब दुष्टता के ऊपर झूठी शपथ का ढेर लगा दिया गया। इससे हम देखते हैं कि उन्होंने न केवल अपने ही भाइयों पर सदा का दासत्व लादकर उनके साथ अन्याय किया, वरन् इस प्रकार एक गम्भीर शपथ तोड़कर उन्होंने परमेश्वर के पवित्र नाम को भी दुष्टता से अपवित्र किया।

अब यिर्मयाह कहता है कि वह उस समय भेजा गया जब प्रजा ने दुष्ट झूठी शपथ खाकर फिर से अपने दासों और दासियों पर अत्याचार करना आरम्भ किया। इसलिए वह कहता है कि वाचा बाँधे जाने के बाद यहोवा का वचन उसके पास आया। वह उस गम्भीर प्रतिज्ञा को वाचा कहता है जब परमेश्वर की व्यवस्था फिर से जीवित की गई, कि इस्राएल की प्रजा में दासत्व सदा का न हो। और वही बात वह तब व्यक्त करता है जब कहता है कि यरूशलेम में रहनेवाली सारी प्रजा से वाचा बाँधी गई, कि उनमें स्वतन्त्रता का प्रचार किया जाए। कुछ लोग "उनके लिए," {,}להםlaem, को दासों और दासियों से सम्बन्धित मानते हैं, परन्तु हम इसका अर्थ "उनके बीच" ले सकते हैं, ताकि व्यवस्था न केवल वर्तमान के लिए, वरन् सदा के लिए प्रभावी रहे। फिर यह आता है कि वह स्वतन्त्रता किस प्रकार की होनी थी, अर्थात् यह कि हर एक अपने दास को स्वतन्त्र करे, और हर एक अपनी दासी को स्वतन्त्र करे, चाहे वह इब्री हो या इब्रिन, ताकि वे सेवा न करें

कुछ लोग {}עברober क्रिया को अकर्मक अर्थ में लेते हैं, और कुछ सकर्मक अर्थ में, जैसा हम फ्रांसीसी में कहते हैं, Qu'ils ne leur fussent plus serfs, ou, Qu'ils ne se servissent plus d'eux (कि वे फिर उनके दास न रहें, या, कि वे फिर उनसे सेवा न लें)। मुख्य बात के विषय में अधिक अन्तर नहीं है। यदि हम {}עברober को सेवा करने के अर्थ में लें, तो हमें इस प्रकार पढ़ना होगा, "कि वे सेवा न करें," या, "कि वे उनके दास न हों।" परन्तु यदि हम {}עברober को शासन करने के अर्थ में लें, तो इसे इस प्रकार पढ़ना होगा, कि कोई मनुष्य, अर्थात् कोई भी, उन पर, अर्थात् अपने यहूदी भाई पर, शासन न करे; या, कि उनमें से कोई मनुष्य सेवा न कराए, अर्थात् अपने यहूदी भाई से।

यहाँ एक प्रश्न उठता है, क्या सदा का दासत्व परमेश्वर को इतना अप्रिय है कि उसे उचित न समझा जाए? इसका उत्तर सरल है,—अब्राहम और अन्य पूर्वजों के पास सामान्य और प्रचलित रीति के अनुसार सेवक या दास थे, और उनमें यह अनुचित नहीं समझा गया। व्यवस्था दिए जाने से पहले ऐसा कुछ न था जो उस व्यक्ति को, जिसके पास दास या दासियाँ थीं, जीवन भर उन पर अधिकार चलाने से रोकता; और फिर, यहाँ जिस व्यवस्था का उल्लेख है वह बिना भेद के और सर्वसाधारण रूप से नहीं दी गई थी, वरन् वह चुनी हुई प्रजा के पक्ष में एक विशेष अधिकार थी। इसलिए यदि कोई यह निष्कर्ष निकाले कि दासों और दासियों पर अधिकार चलाना उचित नहीं, तो वह अकारण है; क्योंकि इसके विपरीत हम इस प्रकार तर्क कर सकते हैं, कि जब परमेश्वर ने पूर्वजों को दास और दासियाँ रखने की अनुमति दी, तो यह उचित बात है; और फिर, जब परमेश्वर ने व्यवस्था के अधीन यहूदियों को भी परदेशियों पर प्रभुता करने और उन्हें सदा के लिए दास बनाए रखने की अनुमति दी, तो इसका निष्कर्ष यह है कि इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता। और इससे भी स्पष्ट प्रमाण दिया जा सकता है; क्योंकि जब से अन्यजाति उद्धार की आशा के लिए बुलाए गए हैं, तब से इस विषय में कोई परिवर्तन नहीं किया गया। क्योंकि प्रेरितों ने स्वामियों को अपने दासों को स्वतन्त्र करने के लिए विवश नहीं किया, वरन् केवल यह उपदेश दिया कि वे उनके प्रति दया का व्यवहार करें, और उनके साथ अपने संगी-दासों के समान मनुष्यता से बर्ताव करें। (इफिसियों 6:9; कुलुस्सियों 4:1) यदि दासत्व अनुचित होता, तो प्रेरित उसे कभी सहन न करते; वरन् यदि ऐसा होता तो वे ऐसी अपवित्र प्रथा की निडर होकर निन्दा करते। अब, जबकि उन्होंने स्वामियों को केवल यह आज्ञा दी कि वे अपने दासों के प्रति मनुष्यता रखें, और उनके साथ हिंसा और अपमान का बर्ताव न करें, तो इसका निष्कर्ष यह है कि जिसका निषेध नहीं किया गया वह अनुमत था, अर्थात् अपने दासों को रखना। हम यह भी देखते हैं कि पौलुस ने उनेसिमुस को फिलेमोन के पास लौटा दिया। (फिलेमोन 1:12) फिलेमोन न केवल विश्वासियों में से एक था, वरन् कलीसिया का पासबान भी था।

इसलिए उसे दूसरों के लिए आदर्श होना चाहिए था। उसका दास उसके पास से भाग गया था; पौलुस ने उसे लौटा दिया, और उसे उसके स्वामी को सौंपा, और उसके स्वामी से विनती की कि वह उसकी चोरी क्षमा करे। इससे हम देखते हैं कि यह बात अपने आप में अनुचित नहीं है।

हमारे यहाँ का दासत्व समाप्त कर दिया गया है, अर्थात् वह दयनीय दशा जब किसी का अपना कोई अधिकार न था, वरन् स्वामी को उसके जीवन और मृत्यु पर अधिकार था; वह प्रथा समाप्त हो गई है, और उसके उन्मूलन को दोष नहीं दिया जा सकता। आरम्भ में कुछ अन्धविश्वास रहा होगा; और मैं निश्चय ही यह समझता हूँ कि इस परिवर्तन का आरम्भ अन्धविश्वास से हुआ। तौभी यह कदापि वांछनीय नहीं कि हमारे बीच दास हों, जैसे पहले सब जातियों में थे, और जैसे अब बर्बर लोगों में हैं। स्पेनी लोग जानते हैं कि दासत्व क्या है, क्योंकि वे अफ़्रीकियों और तुर्कों के निकट पड़ोसी हैं; और फिर जिन्हें वे युद्ध में पकड़ते हैं उन्हें बेच देते हैं; और जैसे एक बुराई से दूसरी बुराई निकलती है, वैसे ही वे दयनीय मनुष्यों को जीवन भर दास बनाए रखते हैं। परन्तु चूँकि कोई आवश्यकता हमें विवश नहीं करती, इसलिए हमारी दशा, जैसा मैंने कहा है, उत्तम है, अर्थात् इसमें कि हमारे पास भाड़े के सेवक हैं, दास नहीं; क्योंकि आजकल जिन्हें सेवक कहा जाता है वे केवल भाड़े के सेवक हैं।

जब अन्यजातियों ने दासों के प्रति मनुष्यता और दया की सराहना की, तो उन्होंने कहा, उनके साथ दासों के समान नहीं, वरन् भाड़े पर रखे गए लोगों के समान व्यवहार किया जाए। सिसरो ने भी ऐसा ही कहा (Off. 1); उसने दासों और भाड़े पर रखे गए लोगों में भेद किया, वह पहलों को दास कहता है, अर्थात् वे जो दूसरे के अधिकार में थे, और भाड़े के सेवक उन्हें जो मज़दूरी पर काम करना स्वीकार करते थे, जैसा हमारे यहाँ होता है।

319 टारगुम और अनुवाद, सेप्टुआजिन्ट को छोड़कर, प्रभुता करने या शासन करने का भाव देते हैं; और जब इस क्रिया के बाद {{ב आता है, तो सर्वत्र इसका यही अर्थ होता है।— विदा करने को, हर एक अपने दास को, और हर एक अपनी दासी को, इब्री और इब्रिन को, स्वतन्त्र करके; ताकि उन पर प्रभुता न करे, कोई मनुष्य अपने यहूदी भाई पर। यह इस पद का शाब्दिक अनुवाद है। परन्तु कदाचित् "सेवक" के स्थान पर बन्धुआ दास, और "दासी" के स्थान पर बन्धुआ दासी कहना उत्तम होगा, क्योंकि वे विवाहित भी थे और अविवाहित भी। — सं.

परन्तु जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, चुनी हुई प्रजा में यह प्रथा विशेष थी।

क्योंकि प्रभु की यह इच्छा थी कि जिन्हें उसने छुड़ाया था वे स्वतन्त्र रहें और इस विषय में स्वतन्त्रता के लाभों का आनन्द लें। अतः इस्राएल की प्रजा में परमेश्वर के अनुग्रह का एक स्मारक बना रहे, इसलिए प्रभु की यह इच्छा थी कि उनमें दासत्व अस्थायी हो, अर्थात् केवल छः वर्ष का। और जब व्यवस्था की उपेक्षा की गई थी, तब सिदकिय्याह ने प्रजा को उपदेश दिया कि वे अपने दासों को स्वतन्त्र करें। परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि परमेश्वर ने उसी समय यह भी प्रकट किया कि बाहरी शत्रु न्यायपूर्वक प्रजा पर क्रूरता करते थे, क्योंकि उन्होंने स्वयं अपने ही भाइयों पर कोई दया नहीं दिखाई। क्योंकि जब वे अपनी स्वेच्छाचारिता के अनुसार अपने दासों पर प्रभुता करते थे, तब कसदियों या अश्शूरियों के विषय में उनकी शिकायत व्यर्थ थी, उनका यह घोषित करना व्यर्थ था कि उन पर अन्याय से अत्याचार हो रहा है, या कि परमेश्वर की प्रजा एक अत्याचारी शक्ति की हिंसा से सताई जा रही है; क्योंकि क्रूरता के पहले आरम्भ करनेवाले वे स्वयं थे, न कि कसदी या अश्शूरी। अतः इसी कारण सिदकिय्याह प्रजा को इकट्ठा करने के लिए प्रेरित हुआ, और एक सार्वजनिक कार्य के द्वारा सब दास स्वतन्त्र किए गए।

वह कहता है कि सब हाकिमों और सारी प्रजा ने, जो वाचा में सम्मिलित हुए थे, यह सुना कि हर एक अपने दास को स्वतन्त्र करे, इत्यादि; और फिर वह जोड़ता है, और उन्होंने आज्ञा मानी। क्रिया {,}שמעshemo, को दोहरे अर्थ में लेना चाहिए; पद के आरम्भ में यह केवल सुनने के कार्य से सम्बन्धित है, और पद के अन्त में आज्ञापालन से। फिर वह कहता है कि उन्होंने आज्ञा मानी, और हर एक ने अपने दास को स्वतन्त्र कर दिया।

यह कहकर कि हाकिमों ने, और सारी प्रजा ने भी, सुना, उसने अज्ञानता का हर बहाना छीन लिया; ताकि वे यह बहाना न बना सकें कि वे ज्ञान की कमी या असावधानी के कारण फिर पीछे हट गए। ऐसा कैसे? क्योंकि उन्होंने सुना था; और इसमें सन्देह नहीं किया जा सकता कि परमेश्वर की वह व्यवस्था, जिसका हमने उल्लेख किया है, उनके सामने रखी गई थी, ताकि वे उस अधर्म और अत्याचारी हिंसा से लज्जित हों जो उन्होंने अपने दासों पर की थी। अतः यहाँ जिस सुनने का उल्लेख है, वह सिद्ध करता है कि यहूदी पूर्णतः निरुत्तर थे, क्योंकि उन्होंने देखा कि परमेश्वर की व्यवस्था की उन्होंने बहुत समय से उपेक्षा की थी। और इससे हम सीखते हैं कि उनमें से हर एक ने और भी अधिक गम्भीर पाप किया था, क्योंकि उसे सिखाया गया था कि उचित क्या है, और उसने मानो जानबूझकर जूआ उतार फेंका था। इसी प्रकार मसीह भी हमें सिखाता है कि जो दास अपने स्वामी की इच्छा जानता है और उसके अनुसार नहीं करता, वह उसकी अपेक्षा अधिक मार खाएगा जो अज्ञानता से अपराध करता है। (लूका 12:47)

फिर वह जोड़ता है, और बाद में वे फिर गए, अर्थात् सुनने और आज्ञा मानने के बाद। फिर जाना उद्देश्य के परिवर्तन से सम्बन्धित है, क्योंकि उन्होंने जो किया था उस पर वे तुरन्त पछताए। उन्होंने परमेश्वर का कुछ भय अनुभव किया था, और तब न्याय और दया प्रबल हुई थी; परन्तु वे शीघ्र ही फिर गए या बदल गए। यह शब्द कभी अच्छे और कभी बुरे अर्थ में लिया जाता है। वह कहता है कि वे फिर गए, या लौट गए, क्योंकि उचित मार्ग आरम्भ करने के बाद वे पीछे हट गए या लौट गए। और उन्होंने लौटा लिया; क्रियाओं {}ישובוishibu, वे फिर गए, और {}ישיבו ishibu, उन्होंने लौटा लिया, में एक समानता है; अर्थात् उन्होंने उन दासों और दासियों को, जिन्हें उन्होंने स्वतन्त्र करके जाने दिया था, लौटवा लिया, और उन्हें फिर दास और दासियाँ बनाकर अपने अधीन कर लिया। इसमें कोई सन्देह नहीं कि जब यहूदियों ने इस प्रकार अपने दासों को लौटा लिया और उन्हें स्वतन्त्रता के अधिकार से वंचित किया, तब उन्होंने कोई बहाना प्रस्तुत किया: परन्तु परमेश्वर चाहता था कि वे सच्चाई से और बिना छल के व्यवहार करें। अतः दीनों पर अत्याचार करने के लिए चतुर मनुष्य चाहे जो भी बहाना गढ़ें, और मनुष्यों के सामने वे बातों को चाहे जैसे छिपाएँ, तौभी परमेश्वर, जो खराई चाहता है, ऐसे छलों को स्वीकार नहीं करता, क्योंकि वह चाहता है कि हम अपने पड़ोसियों के साथ ईमानदारी से व्यवहार करें, क्योंकि वह सब प्रकार की धूर्तता को दोषी ठहराता है।

अब सन्देश आता है: भविष्यद्वक्ता ने वास्तव में कहा था कि परमेश्वर का वचन उसे सौंपा गया था, परन्तु उसने बीच में यह वृत्तान्त रखा, ताकि हम जान सकें कि परमेश्वर ने किस कारण यहूदियों के पास यह सन्देश भेजा था। क्योंकि यदि वह इस प्रकार आरम्भ करता, "यहोवा की ओर से यिर्मयाह के पास वचन आया," और फिर जोड़ता, "इस्राएल का परमेश्वर यहोवा यों कहता है, मैंने वाचा बाँधी," इत्यादि, तो यह अंश और भी अस्पष्ट होता। इसलिए आवश्यक था कि वृत्तान्त पहले आए, और इसके साथ भविष्यद्वक्ता का सन्देश जोड़ा गया, अर्थात् यह कि यहूदियों ने क्रूरता में झूठी शपथ भी जोड़ दी थी, और इस प्रकार घोर अधर्म किया था। अतः अब भविष्यद्वक्ता उनसे आमने-सामने भिड़ता है, और परमेश्वर को वक्ता के रूप में प्रस्तुत करता है, जिस दिन मैं तुम्हारे पुरखाओं को मिस्र देश से, दासों के घर से, निकाल लाया, उस दिन मैंने उनसे वाचा बाँधी।

परमेश्वर ने यहूदियों को उनकी अपनी व्यवस्था का स्मरण दिलाया; और यद्यपि वह जो चाहता उसकी माँग न्यायपूर्वक कर सकता था, तौभी उसने सिद्ध किया कि इस्राएली उसके प्रति बँधे हुए थे, क्योंकि वह उन्हें दासों के घर से निकाल लाया था। जो स्वयं दास है, वह दूसरों पर प्रभुता का दावा करने का साहस कैसे कर सकता है? क्योंकि जहाँ स्वतन्त्रता नहीं, वहाँ प्रभुता नहीं हो सकती। कोई दास के बिना भी स्वतन्त्र हो सकता है; परन्तु कोई स्वामी नहीं हो सकता जब तक वह स्वतन्त्र न हो। इस प्रकार परमेश्वर घोषित करता है कि इस्राएली एक समय स्वतन्त्र नहीं थे, क्योंकि जब उसने उनकी ओर अपना हाथ बढ़ाया, तब वे दासत्व की दयनीय दशा में थे। तो फिर इस्राएलियों को स्वतन्त्रता कहाँ से मिली? परमेश्वर की सेंतमेंत की दया से, जिसने उन्हें स्वतन्त्र किया, जो उन्हें मिस्र के अत्याचार से निकाल लाया। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि वे दूसरों पर स्वामी नहीं हो सकते थे, क्योंकि वे स्वयं दास थे। यही कारण है कि वह कहता है कि जिस दिन वह उन्हें दासों के घर से निकाल लाया, उस दिन उसने वाचा बाँधी, मानो वह कहता हो कि वे अपने बन्दीगृहों से इसलिए निकले क्योंकि उसे उन्हें निकाल लाना भाया, इसलिए नहीं कि वे सदा अपने भाइयों पर प्रभुता करें, वरन् केवल कुछ समय के लिए। वह यहाँ मूसा के द्वारा दी गई उस व्यवस्था का वर्णन करता है जो निर्गमन 21 में है, जैसा हमने कहा है। सात वर्ष के अन्त में हर एक अपने भाई, इब्री, को जो उसके हाथ बेचा गया हो, स्वतन्त्र करे, और जिसने छः वर्ष उसकी सेवा की हो उसे वह अपने पास से स्वतन्त्र करके जाने दे, अर्थात् कि वह उसके साथ न रहे; परन्तु तुम्हारे पुरखाओं ने मेरी न सुनी, न अपना कान लगाया। इसमें सन्देह नहीं कि आरम्भ में इस्राएलियों ने परमेश्वर की आज्ञा का पालन किया, परन्तु थोड़े ही समय बाद व्यवस्था की उपेक्षा की गई। इसलिए जब वह यहाँ शिकायत करता है कि उसकी वाणी नहीं सुनी गई, तो इसे इतने सामान्य रूप से नहीं समझना चाहिए मानो व्यवस्था की हर समय उपेक्षा की गई हो; वरन् यह ऐसा ही है मानो वह कहता हो, "तुम्हारे पुरखा पहले आज्ञा न माननेवाले थे, क्योंकि उन्होंने ठहराए हुए समय के भीतर, अर्थात् छठे वर्ष के अन्त में, अपने दासों को स्वतन्त्र नहीं किया।" 320 आगे कहा गया है कि दासत्व छः वर्ष का होना था, तौभी यहाँ कथन यह है, "सात वर्ष के अन्त में।" यदि दो अन्य स्थान न होते, (व्यवस्थाविवरण 15:1; 31:10,) जहाँ हमें वही शब्द मिलते हैं, तो हम सेप्टुआजिन्ट और अरबी अनुवाद का अनुसरण करके सात के स्थान पर छः पढ़ सकते थे। रब्बी इस कठिनाई को यह कहकर दूर करते हैं कि शब्द {,{קף का अर्थ आरम्भ करनेवाला सिरा भी है और समाप्त करनेवाला सिरा या छोर भी; तब अर्थ यह होगा, "सात वर्षों के आरम्भ में;" और यह आगे उल्लिखित छः वर्षों से मेल खाएगा। और इस अंश की यही सर्वोत्तम व्याख्या है। — सं.

यह अंश, अन्य बहुत से अंशों के समान, प्रजा की बड़ी हठीली दुष्टता को स्पष्ट दिखाता है।

निश्चय ही यहाँ जिस व्यवस्था की चर्चा है, उसे यहूदियों को भली भाँति स्वीकार करना चाहिए था, क्योंकि उन्होंने पाया कि वे एक विशेष अधिकार के द्वारा मनुष्यों की सामान्य दशा से मुक्त किए गए थे, और सब जातियों से बढ़कर ठहराए गए थे। अतः जब उन्होंने देखा कि यह अब्राहम के वंश के प्रति परमेश्वर की उदारता का एक विशिष्ट प्रमाण है, तो इसे उन्हें व्यवस्था का पालन करने के लिए आकर्षित करना चाहिए था, क्योंकि उन्होंने उसमें वह पाया जो विशेष रूप से उनके लिए उपयुक्त था; परन्तु जब हर एक अपने निजी लाभ में लिप्त हो गया, तब कंगालों पर अत्याचार हुआ, और अस्थायी दासत्व सदा के दासत्व में बदल दिया गया।

तो फिर इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि मनुष्य शीघ्र ही उचित बात को भूल गए, यद्यपि ऐसा प्रतीत होता था कि उन्होंने थोड़े समय के लिए परमेश्वर की सुनी। हर युग का यह सामान्य दोष रहा है कि परमेश्वर की व्यवस्थाएँ शीघ्र ही भुला दी गईं और उनकी उपेक्षा की गई; इसी प्रकार स्वतन्त्रता की व्यवस्था, यद्यपि वह विशेष रूप से उत्तम थी, जैसा हम देखते हैं, उपेक्षित हो गई।

वह जोड़ता है, न उन्होंने अपना कान लगाया। हम अन्यत्र कह चुके हैं कि जब यह मुहावरा न सुनने की अभिव्यक्ति के साथ जोड़ा जाता है, तो यह बलपूर्ण होता है; क्योंकि जब मनुष्य अपने कान बन्द कर लेते हैं, और उचित बात नहीं सुनते, तो यह जानबूझकर की गई दुष्टता का प्रमाण है। यह सम्भव है कि कोई कही गई बात की उपेक्षा करे, या उसे न समझे; परन्तु जब कोई जानबूझकर अपने कान बन्द कर लेता है, तो यह निराशाजनक हठ का प्रमाण है। अतः परमेश्वर इस प्रकार के कथन से उस हठीलेपन और कठोरता को व्यक्त करता है जो प्राचीन प्रजा में प्रबल थी, जिसके द्वारा उन्होंने सारी खरी शिक्षा को ठुकरा दिया। और इस पर ध्यानपूर्वक विचार करना चाहिए; क्योंकि जहाँ परमेश्वर का वचन स्पष्ट रूप से प्रकट किया जाता है, वहाँ उसकी आज्ञा का अनुसरण न करने के लिए अपने आपको निर्दोष ठहराना व्यर्थ है, क्योंकि वह अस्पष्ट रीति से नहीं बोलता, जैसा वह यशायाह के द्वारा कहता है। (यशायाह 45:19) तो फिर ऐसा क्यों होता है कि शिक्षा हममें फल उत्पन्न नहीं करती? इसलिए कि हम जानबूझकर उसे ठुकराते हैं, अपने कान बन्द करते हैं और जब परमेश्वर स्वयं बोलता है तब उसकी उपेक्षा करते हैं। अब परमेश्वर जो पुरखाओं पर दोष लगाता है उसका कारण यह है, कि यह तुलना उनकी सन्तानों की दुष्टता को और बढ़ाकर दिखाए, जिन्होंने यह अंगीकार करने के बाद कि उन्हें धर्म का कुछ आदर और दया का कुछ भाव है, शीघ्र ही अपनी पुरानी चाल पर लौट गए, जैसा आगे आता है—

और तुम अब फिरे थे, और अपने अपने पड़ोसी के लिए स्वतन्त्रता का प्रचार करके जो मेरी दृष्टि में उचित है वही किया था: पहले तो ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर प्रजा की सराहना करता है; और निःसन्देह इसे प्रशंसनीय समझा जाना चाहिए था, कि प्रजा ने, यह स्मरण दिलाए जाने के बाद कि उन्होंने हठपूर्वक परमेश्वर की व्यवस्था की उपेक्षा की थी, अपनी इच्छा से अपना कर्तव्य करना स्वीकार किया; परन्तु जब उन्होंने पश्चाताप का केवल झूठा प्रमाण दिया, और जो प्रतिज्ञा की थी उसे वास्तव में पूरा नहीं किया, तो यह, जैसा मैंने कहा है, उनके अपराध को बहुत बढ़ानेवाली बात थी। अतः परमेश्वर ने प्रजा के पश्चाताप की सराहना इसलिए की कि यह दिखाए कि कपट कितना घृणित है; क्योंकि उन्होंने थोड़े समय के लिए मनुष्यता का कुछ भाव दिखाया, परन्तु शीघ्र ही सिद्ध कर दिया कि वह ढोंग के सिवाय और कुछ न था। इसलिए वह कहता है कि उन्होंने स्वतन्त्रता का प्रचार करके उचित किया। और इससे यह भी प्रकट होता है कि वे अज्ञानता के कारण नहीं भटके थे, क्योंकि परमेश्वर ने उनसे यह दया माँगी थी, अर्थात् जो कुछ दासों और दासियों से दुष्टता से छीन लिया गया था उसे लौटा दें, और उन्हें फिर स्वतन्त्र करें: यदि व्यवस्था की स्पष्ट गवाही ने उन्हें विवश न किया होता, तो वे कभी इस प्रकार अपने निजी लाभ न छोड़ते। परन्तु यह दिखावा करने के बाद कि वे परमेश्वर की आज्ञा मानना चाहते हैं, उन्होंने शीघ्र ही फिर अपने दासों और दासियों को लौटा लिया। इससे स्पष्ट प्रकट होता है कि उन्होंने परमेश्वर से ठट्ठा किया, और अपने दासों को केवल थोड़े समय के लिए स्वतन्त्र करना निरा छल था।

वह कहता है कि उन्होंने उस भवन में वाचा बाँधी जिस पर उसका नाम पुकारा गया था, और यह भी कि उन्होंने उसके नाम को अपवित्र किया था। यह सब उनकी दुष्टता को बढ़ानेवाला था; क्योंकि न केवल स्वतन्त्रता का प्रचार किया गया था और शपथ से उसकी पुष्टि की गई थी, वरन् यह मन्दिर में भी किया गया था। इसलिए वह इस परिस्थिति के द्वारा प्रजा के पाप को और भारी ठहराता है,—कि उन्होंने वह वाचा, जिसे बाद में उन्होंने तोड़ दिया, परमेश्वर की उपस्थिति में बाँधी थी। क्योंकि यद्यपि परमेश्वर की आँखें सबसे गुप्त स्थानों तक भी पहुँचती हैं, तौभी प्रजा की दुष्टता और बड़ी हो गई, और यह उन मनुष्यों का प्रमाण था जो सारी लज्जा खो चुके थे, कि उन्होंने अपने दिए हुए वचन को तोड़ने का साहस किया, और इस प्रकार मन्दिर का कोई आदर नहीं दिखाया, मानो उन्होंने परमेश्वर के प्रति सारी श्रद्धा और सारा भय खो दिया हो। इससे स्पष्ट है कि वे कितने अधर्मी हो गए थे, कि उन्होंने मन्दिर में आकर परमेश्वर के सामने शपथ खाने और फिर तुरन्त अपना वचन तोड़ देने का साहस किया।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे, कि जबकि हम तेरे एकलौते पुत्र के द्वारा न केवल सांसारिक दासत्व से, वरन् शैतान और मृत्यु के दयनीय अत्याचार से भी छुड़ाए गए हैं,—तो यह वरदान दे, कि हम तुझे अपना छुड़ानेवाला मानें, और अपने आपको पूर्णतः तुझे ऐसा समर्पित करें, कि हम एक दूसरे की सेवा करने का भी परिश्रम करें, और परस्पर दया के कार्यों के द्वारा अपने बीच भाईचारे के प्रेम को ऐसा पोषित करें, कि यह प्रकट हो कि तू सचमुच हमारे बीच राज्य करता है, और कि हम उसी तेरे पुत्र के द्वारा तेरे अधीन हैं।—आमीन।

एक सौ अड़तीसवाँ व्याख्यान

यिर्मयाह 34:16

16. पर तुम भटक गए और मेरा नाम इस रीति से अशुद्ध किया कि जिन दास दासियों को तुम स्वतन्त्र करके उनकी इच्छा पर छोड़ चुके थे उन्हें तुमने फिर अपने वश में कर लिया है, और वे फिर तुम्हारे दास दासियाँ बन गए हैं।

16. Et reversi estis et polluistis nomen meum, et reduxistis quisque servum suum, et quisque ancillam suam, quos dimiseratis liberas animae suae (id est, arbitrio suo) et subegistis eos, ut essent vobis in servos et in ancillas.

भविष्यद्वक्ता यहाँ यहूदियों से उनकी झूठी शपथ के विषय में वाद-विवाद करता है, जैसा हमने पिछले व्याख्यान में कहा था; क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के मन्दिर में गम्भीर रीति से वाचा बाँधी थी कि व्यवस्था के निर्देश के अनुसार अपने दासों को स्वतन्त्र करेंगे। यदि उन्होंने व्यवस्था से सीखी हुई बात का पालन किया होता, तो ऐसे किसी अनुष्ठान की आवश्यकता न होती; परन्तु न उन्होंने और न उनके पुरखाओं ने उस न्याय का पालन किया जो परमेश्वर ने उनके लिए ठहराया था। इसलिए बलिदान के द्वारा पुष्ट की गई एक नई प्रतिज्ञा की आवश्यकता पड़ी। भविष्यद्वक्ता ने परमेश्वर की आज्ञा मानने के लिए उनकी सराहना की थी। परन्तु अब वह दिखाता है कि वे और भी अधिक निरुत्तर थे, क्योंकि वे शीघ्र ही अपनी पुरानी चाल पर लौट गए। परन्तु तुम फिर गए, वह कहता है, अर्थात् जिस आज्ञाकारिता की उन्होंने परमेश्वर से प्रतिज्ञा की थी, उस पर वे शीघ्र ही पछताए। उनकी तत्परता प्रशंसा के योग्य थी, जब उन्होंने प्रतिज्ञा की कि वे अपनी इच्छा से आज्ञा मानेंगे; परन्तु यह कपट से करके उन्होंने परमेश्वर से ठट्ठा किया।

वह जोड़ता है कि परमेश्वर का नाम अशुद्ध किया गया। इससे हम सीखते हैं कि जब कभी हम परमेश्वर के नाम का दुरुपयोग करते हैं, तो यह एक प्रकार का पवित्र वस्तु का अपहरण है; क्योंकि परमेश्वर की दृष्टि में सत्य से अधिक बहुमूल्य कुछ नहीं समझा जाता; वरन् जबकि वह स्वयं सत्य है, और ऐसा ही कहलाता है, (यूहन्ना 14:6) तो झूठ से बढ़कर उसके स्वभाव के विरुद्ध और कुछ नहीं। अतः जब कभी उसके नाम की झूठी दुहाई दी जाती है, तो यह परमेश्वर के नाम का असहनीय अपवित्रीकरण है; और इस प्रकार झूठी शपथ पवित्र वस्तु के अपहरण से जुड़ी हुई है।

परमेश्वर का नाम झूठी शपथ के अतिरिक्त अन्य रीतियों से भी अवश्य अपवित्र किया जाता है, अर्थात् जब परमेश्वर का नाम उतावली से, बिना सोचे-समझे और बिना श्रद्धा के व्यर्थ लिया जाता है। परन्तु उसका सबसे घोर अपवित्रीकरण तब होता है, जब सत्य को झूठ में बदल दिया जाता है। अतः यह खण्ड एक उपयोगी शिक्षा रखता है, जो हमें सिखाती है कि हम सच्चाई से व्यवहार करें, विशेषकर तब जब बीच में परमेश्वर का नाम लिया गया हो।

इसके बाद वह आगे कहता है, तुम ने अपने अपने दास और अपनी अपनी दासी को, जिन्हें तुम ने स्वतंत्र कर दिया था, फिर लौटा लिया, इत्यादि। इस परिस्थिति से अपराध दुगुना हो गया, — कि उन्होंने अपने दासों को स्वतंत्र किया, और फिर उन्हें वापस बुला लिया। क्योंकि यदि उन्होंने कपट न किया होता, तो भी उनका हठ किसी प्रकार सहा नहीं जा सकता था; परन्तु उनका विद्रोह और भी अधिक नीच हो गया, जब उन्होंने परमेश्वर की आज्ञा मानने का दिखावा किया, और थोड़े ही समय में यह प्रकट हो गया कि उन्होंने विश्वासघात से अपने दासों को स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा दी थी। वह कहता है कि वे अपने ही प्राण के लिए स्वतंत्र किए गए थे, अर्थात् अपनी ही इच्छा के लिए; क्योंकि हम मनुष्यों को तब स्वतंत्र कहते हैं जब यह उनके वश में हो कि जो चाहें उसे चुनें, क्योंकि जब वे किसी दूसरे के अधिकार में होते हैं, तब उनकी अपनी न कोई इच्छा होती है, न कोई चुनाव। और जब स्वतंत्र किए गए दास बाद में इतने बड़े विशेषाधिकार से वंचित कर दिए जाते हैं, तब अपमान और बढ़ जाता है; क्योंकि स्वतंत्रता से बढ़कर कोई वस्तु वांछनीय नहीं, जैसा कि अन्यजातियों ने भी घोषित किया है। वह आगे कहता है कि यह बलपूर्वक किया गया, तुम ने उन्हें अधीन कर दिया। क्रिया {}כבשcabesh का अर्थ है अधीन करना और दबाना। अतः भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि जो स्वतंत्र किए गए थे, वे अपनी दयनीय दशा में लौटना नहीं चाहते थे, और उन्हें जूआ उठाने के लिए अत्याचार के सिवा किसी और रीति से विवश नहीं किया गया। इससे प्रकट होता है कि उनके स्वामियों ने न केवल छल का, वरन् क्रूर और अत्याचारी बल का भी प्रयोग किया; यहाँ तक कि उन्होंने झूठी शपथ में निर्दयता भी जोड़ दी, जिसने उनके अपराध को और भी बढ़ा दिया। अब आगे लिखा है, —

यिर्मयाह 34:17

17. इस कारण यहोवा यों कहता है: तुम ने जो मेरी आज्ञा के अनुसार अपने अपने भाई और अपने अपने पड़ोसी को स्वतंत्र होने का प्रचार नहीं किया, इसलिये यहोवा की यह वाणी है, देखो, मैं तुम्हारे लिये ऐसी स्वतंत्रता का प्रचार करता हूँ कि तुम तलवार, मरी और अकाल के वश में पड़ोगे; और मैं ऐसा करूँगा कि तुम पृथ्वी के सब राज्यों में मारे मारे फिरोगे।

17. Propterea sic dicit Jehova, Vos non audistis me ad promulgandam (hoc est, ut promulgaretis) libertatem quisque fratri suo, et quisque proximo suo (vel, propinquo, vel, sodali suo) ecce promulgo contra vos libertatem, dicit Jehova, gladio, pesti et fami, et dabo vos in commotionum cunctis regnis terrae (alii vertunt, ecce promulgo vobis libertatem ad gladium et ad pestera et ad famem; quantum ad summam rei pertinet, non multum est discriminis utrumvis legamus, nempe, promulgo vobis libertatem ad, etc., vel, promulgo contra vos libertatem gladio, etc., ut videbimus)

यहाँ भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि उन यहूदियों के लिए उचित प्रतिफल तैयार था, जिन्होंने अपने भाइयों से स्वतंत्रता का विशेषाधिकार छीन लिया था; क्योंकि जब प्रभु ने उन्हें स्वतंत्र कर दिया, तो उन्हें भी अपनी बारी में दासत्व करना पड़ता। परन्तु वह उस रीति की ओर संकेत करता है जो उस समय उनमें प्रचलित थी, जिसके द्वारा उन्होंने स्वतंत्रता दी थी, और कहता है, तुम ने स्वतंत्रता का प्रचार नहीं किया। उन्होंने उसका प्रचार तो अवश्य किया था, जैसा हम देख चुके हैं; परन्तु सच्चाई से नहीं, क्योंकि जो थोड़े समय के लिए स्वतंत्र किए गए थे, वे शीघ्र ही फिर दासत्व के लिए विवश किए गए। अतः परमेश्वर यहाँ उस बाहरी कार्य की चर्चा नहीं करता जो यहूदियों ने किया था, परन्तु यह दिखाता है कि सच्चाई और खराई उसे इतनी प्रिय हैं कि जो कुछ केवल बाहरी रूप से किया जाता है, उसका वह कुछ भी लेखा नहीं करता। इसलिए परमेश्वर के सामने स्वतंत्रता का प्रचार वह नहीं जो केवल शब्दों में हो, परन्तु वह है जो कार्य में पूरा किया जाए। मनुष्यों के लिए किसी बात का अंगीकार कर लेना ही पर्याप्त है, परन्तु परमेश्वर सब झूठे अंगीकारों को कुछ नहीं समझता। अतः वह शिकायत करता है कि यहूदियों ने उसके वचन को नहीं माना। हम पहले कह चुके हैं कि व्यवस्था के अनुसार दासों को छः वर्ष से अधिक रखना उचित नहीं था; क्योंकि सातवें वर्ष में व्यवस्था यह आज्ञा देती थी कि जिन्होंने अपने आप को दासत्व में सौंप दिया था, वे स्वतंत्र कर दिए जाएँ। परन्तु परमेश्वर ने इस व्यवस्था को मानो पुनःस्थापना के रूप में फिर से लागू किया, क्योंकि वह लगभग लुप्त हो चुकी थी।

321 हमारा अनुवाद, "उनकी इच्छा पर," सबसे अच्छा है, अथवा हम इसे "अपने लिए" भी अनुवाद कर सकते हैं, क्योंकि {{נפש का प्रायः यही अर्थ होता है। — सं. 322 यहाँ क्रिया का अर्थ स्पष्टतः विवश करना या बलपूर्वक करना है, — और तुम ने उन्हें बलपूर्वक अपने दास और दासियाँ बनाया। अच्छा होता कि पूरे खण्ड में "दास" और "दासियाँ" शब्द ही बनाए रखे जाते — सं.

और यही कारण है कि वह कहता है कि उन्होंने नहीं सुना; क्योंकि उसने न केवल मूसा के द्वारा यह सिखाया था कि क्या उचित है, वरन् यिर्मयाह के द्वारा यह भी दिखाया था कि यहूदियों ने अधर्म और दुष्टता से इस दयापूर्ण आज्ञा की उपेक्षा की थी। इससे हम सीखते हैं कि परमेश्वर के वचन को मानना क्या है, अर्थात् तब, जब हम न केवल उसकी घोषणा को ग्रहण करते हैं, वरन् उसकी आज्ञाकारिता में स्थिर भी बने रहते हैं: क्योंकि थोड़े समय के लिए किसी प्रकार की सही भावना दिखा देना पर्याप्त नहीं, जब तक कि हम परमेश्वर की आज्ञा मानते न रहें। यहूदियों ने अपने मुँह से अंगीकार किया था, और आज्ञा मानने की इच्छा का कुछ प्रमाण भी दिया था; दासों को उनकी स्वतंत्रता दी गई थी; परन्तु जब स्वामी थोड़े ही समय बाद अपने पहले अन्याय की ओर लौट गए, तो हम देखते हैं कि परमेश्वर क्यों कहता है कि उन्होंने उसकी नहीं सुनी।

आगे कहा गया है कि वह उनके लिए, अर्थात् उनके विरुद्ध, स्वतंत्रता का प्रचार करेगा। यदि हम पढ़ें, "देखो, मैं तुम्हारे लिए स्वतंत्रता का प्रचार करता हूँ," तो अर्थ यह है, "मैं तुम्हें मुक्त कर दूँगा," अर्थात् "अब मेरा तुम से कोई सम्बन्ध न रहेगा; जाओ और अपनी स्वतंत्रता का भोग करो; परन्तु तुम तुरन्त दूसरे स्वामियों के, अर्थात् तलवार, मरी और अकाल के, शिकार बन जाओगे।" यह अर्थ अनुचित नहीं है; क्योंकि केवल प्राचीन प्रजा का ही यह सौभाग्य था कि वह परमेश्वर की सुरक्षा के अधीन रहे: परन्तु जब वे आज्ञा न माननेवाले हो गए, तब उसने उन्हें छोड़ दिया, और उन्हें अपनी रखवाली में रखना न चाहा। परन्तु ऐसी मुक्ति से बढ़कर कोई बात दयनीय नहीं हो सकती, अर्थात् जब परमेश्वर उन्हें त्याग देता है जिन पर शासन करना उसे भाया था, और जिनका वह कुछ समय तक संरक्षक रहा था; क्योंकि तब हर प्रकार की विपत्तियाँ शीघ्र ही उन पर आ पड़ेंगी, और परमेश्वर अपना हाथ बीच में न डालेगा। अतः जो लोग, जैसा उन्हें उचित है, परमेश्वर की आज्ञाकारिता का जूआ उठाना नहीं चाहते, उनकी स्वतंत्रता यही है, कि वे सब विपत्तियों के सामने खुले छोड़ दिए जाएँ, क्योंकि केवल उसी के द्वारा हमारी रक्षा हो सकती है। इसलिए हम देखते हैं कि जब हम पढ़ते हैं, "देखो, मैं तुम्हारे लिए स्वतंत्रता का प्रचार करता हूँ, परन्तु वह तलवार, मरी और अकाल के लिए है," तो अर्थ बहुत उपयुक्त ठहरता है।

तौभी हम एक दूसरा दृष्टिकोण भी ले सकते हैं, "देखो, मैं तुम्हारे लिए स्वतंत्रता का प्रचार करता हूँ," अर्थात् तुम्हारे विरुद्ध; क्योंकि {,}לlamed का यह अर्थ भी होता है: "मैं तुम्हारे विरुद्ध स्वतंत्रता का प्रचार करता हूँ," — कैसे? तलवार के लिए, इत्यादि, अर्थात् "मैं तलवार को आज्ञा देता हूँ कि वह तुम पर अधिकार चलाए, और मैं मरी को भी वही अधिकार दूँगा, और अकाल को भी वैसा ही प्रभुत्व दूँगा: अतः तलवार, मरी और अकाल तुम पर शासन करेंगे, क्योंकि तुम मेरा अधिकार सह नहीं सकते।" क्योंकि यद्यपि यहूदी इस बात पर घमण्ड करते थे कि वे परमेश्वर की चुनी हुई प्रजा हैं, तौभी जब वे इतने हठीले थे कि व्यवस्था और भविष्यद्वक्ता को तुच्छ जानते थे, तो यह बिलकुल स्पष्ट है कि वे जो चाहते थे वह निरंकुश स्वेच्छाचार था। अतः परमेश्वर यहाँ अपना अधिकार त्याग देता है, और कहता है कि यह उन्हीं का दोष था कि वे स्वतंत्र नहीं थे, क्योंकि वह अब उनकी रक्षा न करेगा, जैसे कोई वकील अपने मुवक्किलों की, या कोई स्वामी अपने दासों की रक्षा करता है। इसी प्रकार भजन संहिता में भी कहा गया है, "देख, जैसे दासों की आँखें अपने स्वामियों के हाथ की ओर, और जैसे दासी की आँखें अपनी स्वामिनी के हाथ की ओर लगी रहती हैं, वैसे ही हमारी आँखें परमेश्वर की ओर लगी रहती हैं।"

हम निश्चय जानते हैं कि प्राचीन काल में दास हर प्रकार के अन्याय के सामने खुले रहते थे; जब उनके साथ कठोर व्यवहार किया जाता, तब वे उँगली तक हिलाने का साहस नहीं करते थे; परन्तु यदि किसी दास के साथ कोई दूसरा मनुष्य अन्याय करता, तो उसका स्वामी उसका पक्ष लेकर उसकी रक्षा करता था। इसलिए भजनकार प्रजा की तुलना सेवकों और दासों से करता है, और कहता है कि उनकी सारी सुरक्षा परमेश्वर की सहायता पर निर्भर थी। परन्तु अब परमेश्वर घोषित करता है कि वह आगे को उनका रक्षक न रहेगा; और जब उसने उन्हें छोड़ दिया, तब, जैसा हम कह चुके हैं, हर प्रकार की विपत्तियाँ, अर्थात् तलवार, मरी और अकाल, उन पर आ पड़ेंगी।

अन्त में वह आगे कहता है, और मैं तुम्हें पृथ्वी के सब राज्यों के लिए हलचल का कारण बना दूँगा। इन शब्दों के दो अर्थ हो सकते हैं। कुछ लोग इन्हें ऐसे समझते हैं मानो परमेश्वर धमकी दे रहा था कि वे अस्थिर हो जाएँगे, और संसार के सब राज्यों में मारे मारे फिरेंगे; और अन्य लोग यह कि वे हलचल का कारण होंगे, क्योंकि जो कोई उनकी दयनीय दशा को देखेगा या उसके विषय में सुनेगा, वह काँप उठेगा। यह खण्ड व्यवस्थाविवरण 28:25 से लिया गया है, जहाँ हम पढ़ते हैं, "मैं तुझे हलचल का कारण बना दूँगा।"

दूसरा अर्थ ही वह है जिसे मैं अधिकतर स्वीकार करता हूँ, — कि यहूदी हलचल का कारण होंगे; क्योंकि जो पलटा परमेश्वर उनसे लेगा वह इतना भयानक होगा कि सब लोग अत्यन्त विचलित या प्रभावित होंगे, जैसा कि यशायाह के द्वारा कहा गया है, "वह हलचल विस्मय का कारण होगी।" (यशायाह 28:19)

अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता का क्या अभिप्राय है, — कि परमेश्वर झूठी शपथ और विश्वासघात को इतनी कठोरता से दण्ड देगा कि यहूदी सब लोगों के लिए एक दृष्टान्त बन जाएँगे; क्योंकि सब जातियों के लिए यह एक दुःखद दृश्य होगा कि अब्राहम की सन्तान, जिसे परमेश्वर ने गोद लिया था, मनुष्यों में सबसे अधिक दयनीय हो गई है। अतः उनकी दशा भय का विषय बन जाएगी; और यही बात भविष्यद्वक्ता अब घोषित करता और धमकी के रूप में कहता है। आगे लिखा है, —

यिर्मयाह 34:18-19

18. और जो लोग मेरी वाचा का उल्लंघन करते हैं, और जिन्होंने उस वाचा के वचनों को पूरा नहीं किया जो उन्होंने मेरे सामने बाँधी थी, जब उन्होंने बछड़े को दो भाग करके उसके भागों के बीच होकर गए थे,

18. Et dabo viros qui transgressi sunt foedus meum, qui non stabilierunt sermones foederis, quod inciderunt coram me, vitulo quem conciderunt in duo, et transierunt inter partes ejus,

19. अर्थात् यहूदा के हाकिम, और यरूशलेम के हाकिम, खोजे, और याजक, और देश के सब साधारण लोग, जो बछड़े के भागों के बीच होकर गए थे;

19. Principes Jehudah et principes Jerusalem, proceres (eunuchos) et sacerdotes, et totum populum terrae, qui transierunt inter partes vituli.

वह उसी विषय को आगे बढ़ाता है, — कि झूठी शपथ बिना दण्ड के न रहेगी। परन्तु यहाँ शपथ खाने की रीति का वर्णन किया गया है, अर्थात् कि उन्होंने बछड़े को दो भाग किया, और उन भागों के बीच होकर गए। अब हम जानते हैं कि अब्राहम के समय में यह प्रथा थी, क्योंकि कहा गया है कि उसने वाचा के चिह्न के रूप में परमेश्वर को बलिदान चढ़ाया, और बलि-पशु को काटा, और उसके भागों के बीच होकर गया। इतिहासकार भी बताते हैं कि मकिदुनी लोग सेना एकत्र करते समय यही विधि मानते थे; और सम्भवतः यह एक ऐसी प्रथा थी जो सब जातियों में प्रचलित थी। जब रोमी लोग वाचा बाँधते थे, तो वे एक सूअरी का बलिदान करते थे; वे उसे भागों में नहीं बाँटते थे, परन्तु पत्थर से मार डालते थे; और शाप का रूप यह था, — "जो इस वाचा को तोड़े, उसे जूपिटर इसी प्रकार मारे; यदि मैं इस वाचा को तोड़ूँ, तो जूपिटर मुझे इसी प्रकार मारे, जैसे मैं अब इस सूअरी को मारता हूँ।"

परन्तु हम देखते हैं कि पूर्वी लोगों में बलि-पशु दो भागों में काटे जाते थे, और शाप का एक दूसरा रूप था, अर्थात् कि जो कोई अन्याय से और बुरी नीयत से दी हुई प्रतिज्ञा या वचन को तोड़े, वह भी इसी प्रकार काट डाला जाए।

इसी प्रथा की ओर भविष्यद्वक्ता यहाँ संकेत करता है, और कहता है, मैं उन मनुष्यों को, जिन्होंने मेरी वाचा का उल्लंघन किया है, जो उन्होंने मेरे सामने उस बछड़े के द्वारा बाँधी थी जिसे उन्होंने दो भागों में काटा, और उन भागों के बीच होकर गए, इत्यादि, सौंप दूँगा। परन्तु परमेश्वर एक कारण बताता है कि उसने झूठी शपथ पर इतना भयानक दण्ड देने का निश्चय क्यों किया: उसने पहले कहा था कि उसका नाम अपवित्र किया गया, और अब वह आगे कहता है कि उसकी वाचा तोड़ी गई। वह यहाँ व्यवस्था की चर्चा नहीं करता; पवित्रशास्त्र में अधिकतर व्यवस्था को परमेश्वर की वाचा कहा गया है; परन्तु यिर्मयाह यहाँ इसे एक भिन्न अर्थ में लेता है, अर्थात् वह वाचा जिसमें परमेश्वर का नाम बीच में लाया गया, अथवा जो परमेश्वर की दुहाई देकर पक्की की गई; जैसे सुलैमान ने विवाह को विशेष रूप से परमेश्वर की वाचा कहा है, क्योंकि वह मनुष्यों के बीच प्रमुख अनुबन्ध है। परन्तु क्योंकि यहूदियों ने परमेश्वर की उपस्थिति में प्रतिज्ञा की थी कि जब यिर्मयाह ने दासों को स्वतंत्र करने की आज्ञा दी, तब वे आज्ञा मानने को तैयार थे, और क्योंकि यह समझौता एक गम्भीर विधि से पक्का किया गया था, इसलिए मनुष्यों को दी गई प्रतिज्ञा परमेश्वर की वाचा कहलाती है, अर्थात् उसी पुष्टि के कारण जिसका हमने उल्लेख किया है।

अतः हम स्मरण रखें कि जब कभी हम वह पूरा नहीं करते जिसका हमने वचन दिया है, तब न केवल मनुष्यों के साथ, वरन् स्वयं परमेश्वर के साथ भी अन्याय होता है, और यह पवित्र वस्तु का अपहरण है, और चोरी, या धोखे, या क्रूरता से कहीं अधिक घोर अपराध है। इसलिए आओ, हम इस खण्ड से सीखें कि सच्चाई से व्यवहार करें, विशेषकर जब परमेश्वर का नाम पुकारा जाता है, जब उसे साक्षी और न्यायी ठहराकर उसकी दुहाई दी जाती है।

इसके बाद वह आगे कहता है कि उन्होंने उसकी वाचा का उल्लंघन किया था; और वह तुरन्त अपनी बात स्पष्ट करता है, क्योंकि उन्होंने उस वाचा के वचनों को पक्का नहीं किया जो उन्होंने उसके सामने बाँधी थी। वचनों को पक्का या स्थिर करने का अर्थ था, जो कुछ उन्होंने प्रतिज्ञा की थी उसमें स्थिर बने रहना। क्योंकि यहूदियों ने थोड़े समय के लिए दया का प्रमाण दिया; परन्तु वह केवल एक धोखा देनेवाला दिखावा और बहाना था। इसी कारण भविष्यद्वक्ता कहता है कि उन्होंने उस वाचा के वचनों को पक्का या दृढ़ नहीं किया जो उन्होंने बाँधी थी। फिर बाहरी विधि आती है, अर्थात् वह बछड़ा जिसे उन्होंने दो भागों में काटा था; और वे उनके बीच होकर गए, ताकि यही बीच से होकर जाना उनके हृदयों पर गहरी छाप छोड़े, और उन्हें अपने वचन को तोड़ने से डराए। क्योंकि हम जानते हैं कि बाहरी चिह्न इसी उद्देश्य के लिए ठहराए गए हैं, — कि मनुष्य जागते रहें, जो अन्यथा ढीले और आलसी हो जाते। पवित्र चिह्नों का भी यही उपयोग है, जिनके द्वारा परमेश्वर हमारी सब इन्द्रियों को छूना और प्रेरित करना चाहता है। इससे प्रकट होता है कि उन लोगों की संवेदनहीनता कितनी बड़ी रही होगी, जब उन्होंने बाद में उस भयानक साक्ष्य की उपेक्षा की, क्योंकि वे भागों के बीच होकर गए थे, और यदि वे अपनी प्रतिज्ञा में चूकें तो अपने ऊपर ऐसी ही मृत्यु का शाप लिया था।

इसके बाद भी उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा तोड़ने में संकोच न किया। इससे हम देखते हैं कि जब उन्होंने परमेश्वर के न्याय की उपेक्षा की, तब वे शैतानी पागलपन के वश में थे।

वह आगे कहता है, यहूदा के हाकिम और यरूशलेम के हाकिम, इत्यादि। वह यहाँ उनका नाम ऐसे नहीं लेता मानो वे भिन्न-भिन्न व्यक्ति हों, परन्तु वह बात को विस्तार देने के लिए ऐसा कहता है। फिर वह कहता है कि वह इन प्रमुख पुरुषों को दण्ड देगा, कहीं ऐसा न हो कि वे अपने आप को छूटा हुआ समझें, क्योंकि वे पद और प्रतिष्ठा में दूसरों से बढ़कर थे; क्योंकि हम जानते हैं कि जो संसार में ऊँचे पद पर पहुँचते हैं, वे इतने घमण्ड से भर जाते हैं कि अपने आप को सब नियमों से मुक्त समझते हैं। अतः यही कारण है कि परमेश्वर स्पष्ट रूप से हाकिमों और खोजों का नाम लेता है। परन्तु खोजों से उसका अभिप्राय उन लोगों से नहीं है जो नपुंसक बनाए गए थे, जैसा हम कई स्थानों पर पहले कह चुके हैं। प्रमुख पुरुष इसी नाम से, {}סרסיםserasim, पुकारे जाते थे।

वह यरूशलेम के हाकिमों का उल्लेख करता है, क्योंकि वे नागरिकों के रूप में अपने विशेषाधिकारों के कारण विशेष रूप से घमण्डी थे; क्योंकि यरूशलेम में राजा का निवास और परमेश्वर का पवित्रस्थान था। परन्तु भविष्यद्वक्ता घोषित करता है कि उनका भाग साधारण लोगों के भाग से कुछ भी अच्छा न होगा, क्योंकि परमेश्वर यह सहन न करेगा कि उसका पवित्र नाम उपहास का विषय बने और सारा न्याय भंग किया जाए, और विशेषकर उसके नाम में बाँधी गई वाचा को कुछ न समझा जाए और पूरी रीति से व्यर्थ ठहरा दिया जाए। अन्त में वह सारी प्रजा का नाम लेता है; वह कहता है, जो कोई बछड़े के भागों के बीच होकर गया है, वह दण्ड पाएगा। आगे लिखा है —

यिर्मयाह 34:20

20. मैं उनको उनके शत्रुओं के हाथ में, और उनके प्राण के खोजियों के हाथ में कर दूँगा: और उनकी लोथें आकाश के पक्षियों और पृथ्वी के पशुओं का आहार हो जाएँगी।

20. Et dabo illos in manum inimicorum ipsorum, et in manum quaerentium animam ipsorum: et erit cadaver ipsorum in cibum avi (hoc est, avibus) coelorum, (est heterosis numeri) et bestiae (hoc est, bestiis) terrae.

वह जो पहले कह चुका था उसकी पुष्टि करता और उसे स्पष्ट करता है, और बताता है कि दण्ड किस प्रकार दिया जाएगा, — कि वह उन्हें उनके शत्रुओं के हाथ में कर देगा; और वह आगे कहता है, जो उनके प्राण के खोजी हैं, यह दिखाने के लिए कि उनके शत्रु लूट से, या किसी साधारण दण्ड से सन्तुष्ट न होंगे, परन्तु उनके कट्टर शत्रु होंगे, जो उन्हें नष्ट किए बिना सन्तुष्ट न होंगे। अब यह खण्ड हमें यह भी सिखाता है कि दुष्ट लोग परमेश्वर के कोड़े हैं, क्योंकि जो दण्ड उसने अपनी व्यवस्था के उल्लंघन करनेवालों पर देने का निश्चय किया, उसे उसने उन्हीं के द्वारा पूरा किया।

अतः यद्यपि कसदियों का उद्देश्य यहूदियों को दण्ड देने में परमेश्वर के सेवक बनने से भिन्न था, तौभी उन्होंने परमेश्वर का कार्य ऐसे पूरा किया मानो वे उसके मजदूरी पर रखे गए सेवक हों, जो उसकी अपनी इच्छा और प्रसन्नता के अधीन हों। और इसमें कोई सन्देह नहीं कि उनके मन यहूदियों के विरुद्ध अत्यन्त भड़का दिए गए थे, यहाँ तक कि उन्होंने बिना भेदभाव के और बिना दया के लहू बहाया: क्योंकि जैसे परमेश्वर प्रायः कहता है, "मैं तुम्हें तुम्हारे शत्रुओं की दृष्टि में अनुग्रह दिलाऊँगा," (निर्गमन 3:21; 11:3) वैसे ही दूसरी ओर वह घोषित करता है कि जब शत्रु उनके विरुद्ध क्रूरता से भड़के, तो यह उसके गुप्त प्रभाव से हुआ, क्योंकि उसने उन्हें कठोर दण्ड देने का निश्चय किया था। यही कारण है कि वह अब कहता है कि वह यहूदियों को उनके हाथ में कर देगा जो उनके प्राण के खोजी थे, अर्थात् जो शिकार या लूट पर मन नहीं लगाए हुए थे, और किसी साधारण दण्ड से सन्तुष्ट न होते, परन्तु जब तक प्रजा को नष्ट न कर दें तब तक कभी शान्त न होनेवाले शत्रु बने रहते।

323 "बछड़े" के विषय में इस पद की वाक्य-रचना भिन्न-भिन्न प्रकार से समझी गई है। हमारा अनुवाद जूनियस और ट्रेमेलियस का है। Sept., Targ. और Vulg. को समझना कठिन है। Syr. सार रूप में इस प्रकार है, — 18. और मैं उन मनुष्यों को जिन्होंने मेरी वाचा का उल्लंघन किया है, जिन्होंने उस वाचा के वचनों को पूरा नहीं किया, जो उन्होंने मेरे सामने बाँधी थी, उस बछड़े के समान कर दूँगा, जिसे उन्होंने दो भाग किया और उसके भागों के बीच होकर गए, — 19. यहूदा के हाकिम, इत्यादि इत्यादि। यह इस खण्ड का सबसे शब्दशः अनुवाद है: {,{כ, "समान" या "जैसे", का छूट जाना असामान्य नहीं है। — सं.

324 Sept. में इसका अनुवाद "{δυνάστας}, शासक," Vulg. और Syr. में "खोजे," और Targ. में "हाकिम" किया गया है। वे राजदरबार के सेवक थे, आवश्यक नहीं कि नपुंसक ही हों, क्योंकि पोतीपर, जिसकी पत्नी थी, इसी नाम से पुकारा गया। (उत्पत्ति 39:7।) सम्भव है कि वे न्यायियों का कार्य करते रहे हों; और कदाचित् इसी कारण उनका नाम यहाँ "याजकों" के साथ लिया गया है। — सं.

दूसरे प्रकार का दण्ड आगे आता है, उनकी लोथें आकाश के पक्षियों और पृथ्वी के पशुओं का आहार होंगी, मानो उसने कहा हो कि यहूदियों पर परमेश्वर का पलटा मृत्यु के बाद भी प्रकट होगा। हमने पिछले सप्ताह कहा था कि यदि हम बिना गाड़े रह जाएँ तो इसमें हमारी कोई हानि न होगी, क्योंकि गाड़े जाने से हमें कोई लाभ नहीं होता; तौभी यह परमेश्वर के पलटे का चिह्न है। अतः जैसे अकाल, और नंगापन, और ठंड, और रोग, और अन्य विपत्तियाँ मनुष्यों पर परमेश्वर के क्रोध के प्रमाण हैं, वैसे ही यह भी है जब किसी मरे हुए मनुष्य की देह बाहर फेंक दी जाती है, और या तो जंगली पशुओं द्वारा फाड़ी जाती है, या पक्षियों द्वारा खाई जाती है। यदि कोई आपत्ति करके कहे कि ऐसा कभी-कभी परमेश्वर के सर्वश्रेष्ठ और सबसे पवित्र सेवकों के साथ भी हुआ है; तो इसका हमारा उत्तर यह है कि सांसारिक दण्ड भले और बुरे दोनों पर समान रूप से आता है; परन्तु जब परमेश्वर अकाल और अभाव से, रोगों से भी, या निर्वासन से, या बन्दीगृह से, या किसी अन्य विपत्ति से अपने सेवकों को परखता और ताड़ना देता है, तो यह सब उनके लिए उनके उद्धार में सहायता के समान होता है। तौभी विश्वासियों के प्रति परमेश्वर की यह विशेष दया, जो एक अनोखा विशेषाधिकार है, इस बात का कोई कारण नहीं कि सब दुःख अपने आप में परमेश्वर के क्रोध के प्रमाण न समझे जाएँ, क्योंकि वे सर्वत्र शाप कहलाते हैं।

और हम यह भी जानते हैं कि मनुष्य इस जीवन में जितनी विपत्तियाँ सहते हैं, वे सब एक ही सोते से, अर्थात् परमेश्वर के न्याय से बहती हैं, जो इसी रीति से दण्ड देता है। अतः भविष्यद्वक्ता अकारण यहाँ यह घोषित नहीं करता कि यहूदियों के प्रति परमेश्वर का न्याय इतना कठोर और भयानक होगा कि वह मृत्यु से भी आगे तक पहुँचेगा, क्योंकि वे आकाश के पक्षियों और पृथ्वी के पशुओं का आहार बन जाएँगे।

आगे लिखा है —

यिर्मयाह 34:21

21. और यहूदा के राजा सिदकिय्याह और उसके हाकिमों को मैं उनके शत्रुओं के हाथ में, और उनके प्राण के खोजियों के हाथ में, और बाबुल के राजा की सेना के हाथ में कर दूँगा, जो तुम्हारे पास से चली गई है।

21. Et Zedechiam regem Jehudah, et principes ejus dabo in manum inimicorum ipsorum, et in manum quaerentium animam eorum, et in manum exercitus regis Babylonii, qui ascenderunt e vobis.

वह लगभग वही शब्द दोहराता है, तौभी वह विषय के और निकट आता है, क्योंकि वह उन शत्रुओं का नाम लेता है जिनके विषय में उसने पहले अनिश्चित रूप से कहा था। उसने निश्चय कहा था कि वे क्रूर होंगे, और उनकी मृत्यु के खोजी होंगे, और किसी और बात से सन्तुष्ट न होंगे। वह पुष्टि के लिए वही बात फिर दोहराता है; परन्तु इसके बाद वह आगे कहता है कि ये शत्रु बाबुल के राजा के सैनिक, अर्थात् कसदी होंगे। अतः वह यहूदियों को मानो उँगली से उनकी विपत्ति दिखाता है, कहीं ऐसा न हो कि वे अपनी रीति के अनुसार सुरक्षा की आशा में अपने आप को बहलाते रहें। अतः वह केवल सामान्य रूप से यह घोषित नहीं करता कि वे दण्ड पाएँगे, और कि शत्रु क्रूरता से उन्हें नष्ट करने आएँगे; परन्तु वह बाबुल के राजा की सेना की ओर संकेत करता है, और कहता है कि कसदी परमेश्वर द्वारा शस्त्रों से सुसज्जित होकर और उसके झण्डे के नीचे लड़ते हुए आएँगे, और नगर को ले लेंगे, और सारे राज्य को नष्ट कर देंगे।

परन्तु जब कसदी चले गए थे, तब यहूदियों का भरोसा और निश्चिन्तता बढ़ गई थी, क्योंकि वे सोचते थे कि अब वे संकट से मुक्त हो गए हैं। इस प्रस्थान का कारण यह था कि मिस्रियों ने यहूदियों की सहायता के लिए, या यों कहें कि पहले से ही अपनी सुरक्षा का प्रबन्ध करने के लिए, एक सेना एकत्र की थी। हम जानते हैं कि उस समय यहूदियों और मिस्रियों के बीच एक सन्धि थी; और दोनों का उद्देश्य बाबुल के राजा के विरुद्ध अपने आप को दृढ़ करना था। मिस्रियों को यहूदियों की बहुत चिन्ता न थी, परन्तु एक दूसरा कारण उन्हें प्रेरित कर रहा था; क्योंकि यह भली-भाँति ज्ञात था कि ज्यों ही कसदी यहूदी युद्ध समाप्त करेंगे, वे मिस्र पर आक्रमण करेंगे। अब उन्होंने सोचा कि यहूदियों के साथ मिलकर बाबुली सेना से लड़ना उनके लिए लाभदायक होगा; क्योंकि यदि नबूकदनेस्सर विजय पा लेता, तो उन्हें अकेले ही लड़ना पड़ता; वरन् स्वयं यहूदियों को भी मिस्र को अधीन करने में सहायता देने के लिए विवश किया जाता। इसलिए मिस्रियों ने इन बातों को भली-भाँति तौलकर एक बड़ी सेना एकत्र की। बाबुली लोग यह समाचार सुनकर उनका सामना करने निकल पड़े। इस प्रकार नगर का घेरा छोड़ दिया गया। यहूदी ऐसे आनन्दित हुए मानो वे सब संकट से बच निकले हों। इसलिए भविष्यद्वक्ता उनकी इस मूर्खता का उपहास करता है कि वे सोचते थे कि अब वे शान्ति और चैन से रहेंगे, क्योंकि कसदी उनके पास से चढ़ गए थे, क्योंकि उन्होंने कुछ समय के लिए नगर को छोड़ दिया था, और मिस्र की ओर चढ़ गए थे। अतः वह कहता है, यद्यपि (इस अव्यय को विरोधसूचक अर्थ में लेना चाहिए) वे तुम्हारे पास से चढ़ गए हैं, तौभी परमेश्वर तुम्हें उनके हाथ में कर देगा।

अब हम देखते हैं कि यिर्मयाह ने न राजा को छोड़ा, न हाकिमों को; और इस प्रकार हमें पवित्र आत्मा की उस सामर्थ्य पर ध्यान देना चाहिए जो भविष्यद्वक्ताओं के हृदयों में प्रबल थी, क्योंकि उन्होंने न केवल साधारण लोगों को, वरन् राजाओं और हाकिमों को भी साहस के साथ सम्बोधित किया। अतः जब हम भविष्यद्वक्ता को इतने साहस के साथ राजा और प्रमुख पुरुषों पर परमेश्वर के न्याय की घोषणा करते पाते हैं, तो हम जान लें कि कलीसिया में शासन करने के योग्य कोई नहीं, जब तक वह इतनी दृढ़ता से सम्पन्न न हो कि किसी से न डरे, और किसी की शक्ति से हताश न हो, ताकि वह छोटे से लेकर बड़े तक सब को साहस से डाँट सके। आगे लिखा है —

यिर्मयाह 34:22

22. यहोवा की यह वाणी है कि देखो, मैं आज्ञा दूँगा, और उनको इस नगर की ओर लौटा ले आऊँगा; और वे इससे लड़ेंगे, और इसे ले लेंगे, और आग लगाकर फूँक देंगे: और मैं यहूदा के नगरों को ऐसा उजाड़ दूँगा कि उनमें कोई निवासी न रहेगा।

22. Ecce ego praecipio, dicit Jehova, et reducam cos ad urbem hanc, et expugnabunt cam, et capient eam (vel, oppugnabunt eam, et capient eam) et comburent eam igni; et urbes Jehudah ponent vastitatem absque habitatore.

वह वही बात दूसरे शब्दों में दिखाता है, परन्तु यह दोहराना व्यर्थ न था, क्योंकि जो हम यहाँ पढ़ते हैं वह यहूदियों को अविश्वसनीय लगता था। क्योंकि जब उन्होंने राजा नबूकदनेस्सर को नगर से जाते देखा, तब उन्होंने अपने सींग ऊँचे किए। अतः कहीं ऐसा न हो कि यह व्यर्थ भरोसा उन्हें धोखा दे, उसने उनसे फिर घोषित किया कि युद्ध का संचालन परमेश्वर करता है, मानो उसने कहा हो कि कसदियों ने बिना सोचे-समझे शस्त्र नहीं उठाए थे, परन्तु जैसा परमेश्वर ने ठहराया था, और जैसी उसने उन्हें आज्ञा दी थी। वह निश्चय किसी प्रकट आज्ञा की बात नहीं करता, क्योंकि कसदियों का उद्देश्य परमेश्वर की आज्ञा मानना या उसकी सेवा करना न था; परन्तु वह अपने गुप्त विधान की बात करता है।

परमेश्वर के विषय में कहा जाता है कि वह आज्ञा देता है, जब दुष्ट लोग उसकी गुप्त प्रेरणा से चलाए जाते हैं, क्योंकि वह उन्हें जैसे चाहे वैसे फेर सकता है, जैसा कि अन्य स्थानों में कहा गया है, "मैं मिस्रियों के लिए सीटी बजाऊँगा," अथवा अश्शूरियों के लिए, अथवा कसदियों के लिए। यहाँ भी यही अर्थ है, जब वह कहता है, देखो, मैं आज्ञा दूँगा, इत्यादि। संक्षेप में, परमेश्वर दुष्टों को आज्ञा देता है, वह रोगों को आज्ञा देता है, वह तलवार को आज्ञा देता है, वह अकाल और मरी को आज्ञा देता है; और फिर भी तलवार में, मरी में, या अकाल में न कोई विवेक है न समझ: परन्तु पवित्रशास्त्र हमें इस प्रकार सिखाता है कि सब वस्तुएँ उसके नियंत्रण में हैं, यहाँ तक कि कोई भी बात हमें छू नहीं सकती, सिवाय उतने के जितना परमेश्वर इनके द्वारा हमें ताड़ना देना या नम्र करना चाहता है।

और इसी उद्देश्य के लिए ये शब्द हैं, देखो, मैं, {,}הנניenni, इत्यादि। परमेश्वर दिखाता है कि वह उपस्थित था, यद्यपि कसदी अब यहूदा देश में दिखाई नहीं देते थे।

अपनी उपस्थिति की रीति को वह यह कहकर प्रकट करता है, मैं उनको इस नगर की ओर लौटा ले आऊँगा, और वे इस पर आक्रमण करेंगे, और इसे ले लेंगे, और आग लगाकर फूँक देंगे। इन बातों की व्याख्या अन्यत्र की जा चुकी है, इसलिए मैं अब इन्हें छोड़ देता हूँ।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जैसे हम निरन्तर अपने विरुद्ध तेरे क्रोध को भड़काने से नहीं रुकते, — हाँ, यह वरदान दे कि हम तेरी चेतावनियों से भयभीत होकर तेरी बुद्धिमान सम्मतियों को मानें, और इस प्रकार तेरे उस पलटे से पहले ही, जो अन्यथा हम पर बना रहता, सचेत होकर, हम तुझ से ऐसा मेल करने का यत्न करें, कि हम सचमुच तुझे अपना पिता और अपने उद्धार का रक्षक पाएँ, जब तक कि हम अन्त में यहाँ अपनी दौड़ पूरी करके उस धन्य विश्राम में न पहुँचें, जो तूने स्वर्ग में हमारे लिए तैयार किया है, हमारे प्रभु मसीह के द्वारा। — आमीन।

एक सौ उनतालीसवाँ व्याख्यान

हमने पिछले व्याख्यान में देखा कि भविष्यद्वक्ता ने यहूदियों के विरुद्ध क्या घोषणा की, — कि जैसे उन्होंने अपने दासों के साथ विश्वासघात किया था, वैसे ही परमेश्वर उन्हें सदा के लिए दास बनाकर दण्ड देगा। जब नबूकदनेस्सर मिस्रियों का सामना करने निकला, तब स्वतंत्रता दिए जाने का कुछ आभास हुआ; क्योंकि यहूदियों ने सोचा कि अब वे आगे को स्वतंत्र रहेंगे: परन्तु जैसे उन्होंने अपने दासों को धोखा दिया था, वैसे ही भविष्यद्वक्ता कहता है कि वे यह सोचने में बड़ी भूल कर रहे थे कि वे सदा स्वतंत्र रहेंगे, क्योंकि नबूकदनेस्सर शीघ्र ही लौट आएगा। इसलिए वह घोषित करता है कि उनके लिए दासत्व ठहराया जा चुका था, यहाँ तक कि जिस स्वतंत्रता पर वे घमण्ड करते थे वह भ्रम सिद्ध होगी। अब आगे लिखा है, —

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