यिर्मयाह और विलापगीत पर टीका · खण्ड 2 · यिर्मयाह 43

यिर्मयाह 43

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यिर्मयाह 43

यिर्मयाह 43:1-3

1. जब यिर्मयाह उन सब लोगों से उनके परमेश्वर यहोवा के वे सब वचन कह चुका, जिनके कहने के लिये उनके परमेश्वर यहोवा ने उसको उनके पास भेजा था, अर्थात् ये सब वचन,

1. Et factum est quum finiisset Jeremias loqui ad totum populum cunctos sermones Jehovae Dei ipsorum, pro quibus miserat ipsum Jehova Deus ipsorum ad ipsos omnes (inquam) hos sermones;

2. तब होशायाह का पुत्र अजर्याह और कारेह का पुत्र योहानान और सब अभिमानी पुरुष यिर्मयाह से कहने लगे, तू झूठ बोलता है; हमारे परमेश्वर यहोवा ने तुझे यह कहने के लिये नहीं भेजा कि मिस्र में रहने के लिये मत जाओ;

2. Tune dixit Azarias filius Ozaiae, et Joannes filius Kareae, et omnes duces, et omnes viri superbi, dicentes Jeremiae, Mendacium tu loqueris, non misit to Jehova

Deus noster ad dicendum, Ne eatis in Aegyptum ad peregrinandum illic:

3. परन्तु नेरिय्याह का पुत्र बारूक तुझ को हमारे विरुद्ध उकसाता है कि हम कसदियों के हाथ में पड़ें, और वे हम को मार डालें या बन्दी बनाकर बाबुल को ले जाएँ।

3. Sed Baruch filius Neriae incitat to contra nos, ut tradat nos in manum Chaldaeorum ad interficiendum nos et transferendum nos Babylonem.

यहाँ भविष्यद्वक्ता वृत्तान्त का शेष भाग आगे बढ़ाता है। वह कहता है कि सारे लोग हठपूर्वक अपनी दुष्ट युक्ति पर अड़े रहे, यहाँ तक कि उसकी चेतावनी और गम्भीर साक्षी से कुछ भी सिद्ध न हुआ। लोगों की यह जड़ता तो अत्यन्त भयानक थी; क्योंकि वे बहुत वर्षों से अनुभव के द्वारा भविष्यद्वक्ता की विश्वासयोग्यता को जान चुके थे; और फिर, वे उसके पास इसी कारण गए थे कि वे विश्वास करते थे कि वह परमेश्वर का विश्वासयोग्य और प्रमाणित दास है। उसने उन्हें केवल परमेश्वर के नाम से उत्तर ही नहीं दिया था, वरन् उनकी कठोरता को जानकर उसने ऐसी गम्भीर चेतावनियाँ भी जोड़ी थीं जो पत्थरों को भी पिघला सकती थीं। परन्तु उसने बहरों से बातें कीं; और इससे प्रकट होता है कि वे पूरी रीति से शैतान के वश में मोहित हो गए थे। अतः हम यह सीखें कि परमेश्वर से ठट्ठा न करें, और जब उसकी इच्छा के विषय में पूछें तो दोहरा मन लेकर न आएँ, वरन् अपने आप को उसके वचन के द्वारा चलाए जाने दें।

अब वह कहता है कि जब वह परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार सारे लोगों से बातें कर चुका, तब कारेह का पुत्र योहानान और होशायाह का पुत्र अजर्याह, जो उनमें प्रमुख थे, उसके विरुद्ध बोले। अजर्याह के विषय में हम किसी निश्चय के साथ नहीं जान सकते कि वह कैसा मनुष्य था। परन्तु कारेह के पुत्र योहानान में हमारे सामने एक ऐसा उदाहरण है जो ध्यान देने योग्य है। हम देख चुके हैं कि वह साहसी, बुद्धिमान और विवेकी मनुष्य था, और सीधे मन का भी था। संक्षेप में, जब हम विचार करते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने पहले उसके विषय में क्या कहा है, तो हम यह सोचे बिना नहीं रह सकते कि वह स्वभाव से ही एक वीर पुरुष था; वरन् जब उसकी तुलना गदल्याह से की जाती है, जो उसी समय एक उत्तम पुरुष था और जिसे भविष्यद्वक्ता ने बड़ी प्रशंसा से सुशोभित किया है, तब भी वह उससे कहीं बढ़कर था। गदल्याह का स्वभाव निस्सन्देह कोमल था, वह लोगों की रक्षा करने में साहसी था, वह खरा मनुष्य था; और इसके अतिरिक्त वह लोगों का पिता था, और जब दशा निराशाजनक थी तब उसने ऐसा आचरण किया कि सबकी आशा के विपरीत उसने लोगों के बचे हुओं को इकट्ठा किया; और हम यह भी देख चुके हैं कि उसी के प्रयत्न से भविष्यद्वक्ता तत्काल मृत्यु से छुड़ाया गया था। परन्तु कारेह का पुत्र योहानान उसका एक विशेष सहायक रहा था, क्योंकि वह अपनी ही इच्छा से उसके पास आया और उसे अपनी सहायता अर्पित की; और फिर उसने विश्वासयोग्यता और विवेक के साथ उसे चिताया कि वह उस सिद्धान्तहीन मनुष्य के विश्वासघात से चौकस रहे, जिसके हाथों वह बाद में मारा गया। गदल्याह अपनी अत्यधिक भोली विश्वासशीलता के कारण गिरा। अतः कारेह का पुत्र योहानान गदल्याह की अपेक्षा श्रेष्ठता का अधिक बड़ा रूप दिखाता था। परन्तु अब परमेश्वर का आत्मा उसके और उसके साथियों के विषय में क्या घोषित करता है? उनके विषय में कहा गया है कि वे अभिमानी और हठीले थे। इससे हम देखते हैं कि कुछ मनुष्य मन की महानता में श्रेष्ठ होते हैं, और फिर भी उनका स्वभाव अड़ियल होता है; और अधिकतर ऐसा उथल-पुथल के समय में होता है। क्योंकि कुछ लोग अद्भुत साहसी होकर सामने आते हैं; परन्तु जब बातें उनकी इच्छाओं के अनुसार नहीं होतीं, तब वे उग्र हो जाते हैं और परमेश्वर और मनुष्यों के विरुद्ध विद्रोह करते हैं, और इसके अतिरिक्त वे कभी भी अधीनता में लाए जाना सहन नहीं करते। ऐसा ही कारेह का पुत्र योहानान था: एक समय उसने असाधारण सद्गुण प्रकट किया, परन्तु अन्त में यह प्रकट हो गया कि वह वास्तव में कैसा था।

भविष्यद्वक्ता न्यायी के अधिकार के साथ घोषित करता है कि वह और उसके साथी अभिमानी थे: तब होशायाह का पुत्र अजर्याह और कारेह का पुत्र योहानान और सब अभिमानी पुरुष कहने लगे, तू झूठ बोलता है। यह अत्यन्त धृष्ट और निन्दापूर्ण था; क्योंकि उन्होंने हाल ही में साक्षी दी थी कि वे यिर्मयाह को परमेश्वर का विश्वासयोग्य दास मानते हैं, और जो कुछ भी वह लाए उसे वे परमेश्वर की सच्ची वाणी के रूप में ग्रहण करेंगे; परन्तु अब वे उस पर झूठ का दोष लगाते हैं! यह कितनी बड़ी ढिठाई थी! परन्तु इससे प्रकट होता है कि मनुष्यों के हृदयों में जो गुप्त कोने हैं, वे कितने गहरे, कितने विविध और कितने टेढ़े-मेढ़े हैं; क्योंकि एक समय वे मधु-से मीठे वचन कहते हैं, और बाद में विष के सिवा कुछ नहीं उगलते। इस प्रकार मानो एक ही मुँह से, लगभग उसी क्षण, मीठा भी निकलता है और कड़वा भी।

अतः हम इससे सीखें कि मनुष्य का हृदय, जब तक परमेश्वर का आत्मा उसे शुद्ध न करे, हर प्रकार के छल से भरा रहता है। हम यह भी देखते हैं कि जब एक बार अभक्ति उबल पड़ती है, तो वह किस सीमा तक पहुँच जाती है; क्योंकि ये लोग न केवल यिर्मयाह के प्रति, वरन् स्वयं परमेश्वर के प्रति भी धृष्ट और निन्दक थे। और अब उन्होंने पहले के समान टालमटोल नहीं की, न ही आपत्तियाँ उठाईं; वरन् वे खुलकर भविष्यद्वक्ता के विरुद्ध बकने लगे।

इस प्रकार कपट के पास कुछ समय तक तो अपने आवरण रहते हैं, परन्तु जब परमेश्वर दुष्टों पर दबाव डालता है, तब वे कोई सीमा नहीं मानते: तू झूठ बोलता है।

इसके बाद वे दोष बारूक पर डालते हैं, जो भविष्यद्वक्ता का विश्वासयोग्य सेवक रहा था। जब वे कोई ऐसा कारण न ढूँढ़ सके कि यिर्मयाह क्यों झूठ बोले, तो उन्होंने अपना क्रोध बारूक की ओर मोड़ दिया। तो उन्होंने आदर के कारण यिर्मयाह को नहीं छोड़ा, परन्तु इसलिए कि उनके पास उसकी बुराई करने का कोई भी कारण न था, उन्होंने दोष बारूक पर मढ़ दिया, जो फिर भी यिर्मयाह के समान ही निर्दोष था। उन्होंने कहा, बारूक तुझे हमारे विरुद्ध उकसाता है। यदि यिर्मयाह ने किसी दूसरे के प्रभाव में आकर ऐसी भविष्यद्वाणी की होती, तो भी उसका अपराध कम से कम कुछ हल्का ठहर सकता था। अब उन्होंने कहा कि वह झूठा है, और छल के सिवा कुछ प्रस्तुत नहीं करता; परन्तु दुष्ट इस बात पर ध्यान नहीं देते कि वे क्या कहते हैं, क्योंकि शैतान उन्हें सिर के बल आगे धकेलता है। और उन्होंने बारूक पर एक बहुत बड़ा अपराध लगाया, कि वह उन्हें कसदियों के हाथ में पकड़वाना, और फिर उन्हें घात के लिये सौंपना, और उन्हें ऐसे हवाले करना चाहता है कि वे निर्वासन में भगा दिए जाएँ। यह सब सबसे बड़ी क्रूरता होती। परन्तु यदि हम विचार करें कि बारूक कैसा मनुष्य रहा था, और उसने कैसी निर्दोषता से आचरण किया था, और परमेश्वर की सच्ची आराधना और भविष्यद्वाणी की शिक्षा की रक्षा करने में उसने कैसे अपने प्राण को जोखिम में डाला था, तो निश्चय ही उस पर इतनी बड़ी निन्दा लादने का कोई कारण न था।

परन्तु हम देखते हैं कि परमेश्वर के दास सदा अत्यधिक निन्दाओं के शिकार होते रहे हैं, तब भी जब उन्होंने सबसे बड़ी खराई दिखाई। सो यदि आज के दिन, सीधाई से आचरण करने का परिश्रम करने के बाद भी, हम अपने विषय में बुरी बातें सुनें, तो उन्हें धीरज से सहना हमें कठिन या नई बात न लगनी चाहिए। निस्सन्देह हमें जो कुछ हम कर सकते हैं, करना चाहिए कि द्वेषियों और दुष्टों का मुँह बन्द हो; और जैसा पौलुस हमें चिताता है, हमें विरोधियों को कोई अवसर न देना चाहिए। परन्तु जब हम विश्वासयोग्यता से अपना कर्तव्य पूरा कर चुके हों, और फिर भी कुत्ते हम पर भौंकें, और हम पर बहुत सी निन्दाएँ और अपराध लादे जाएँ, तो हम उन्हें धीरज से सहना सीखें। अतः हमें यही करना चाहिए, क्योंकि हम देखते हैं कि बारूक पर अत्यधिक विश्वासघात और क्रूरता का दोष लगाया गया।

अब बारूक का कसदियों से क्या लेना-देना था? क्या वह भागकर उनके पास गया था? क्या वह अपने लिये प्रभाव पाने को उत्सुक था? या अपने लिये कृपा प्राप्त करने को? ऐसी कोई बात न थी; वह जहाँ कहीं यिर्मयाह गया, सदा उसके पीछे चलता रहा। यिर्मयाह को निस्सन्देह कुछ कृपा मिली थी; परन्तु इसका श्रेय परमेश्वर की सेंतमेंत करुणा को दिया जाना था।

अतः बारूक को कसदियों से भविष्यद्वक्ता के साथ रहने की अनुमति मिली थी; क्योंकि दोनों की दशा एक ही थी। फिर भी जब उसे चुनने का अवसर दिया गया, तब वह कसदियों के पीछे नहीं गया। क्योंकि जब कसदियों ने यिर्मयाह को चैन और विश्राम देने का प्रस्ताव रखा, तब बारूक भी उस उपजाऊ देश को जा सकता था; परन्तु उसने इसी देश में रहना चुना। इससे हम देखते हैं कि उसने अपने ऊपर से हर सन्देह दूर कर दिया था, और फिर भी वह द्वेषियों का मुँह बन्द न कर सका, वरन् वे उसकी निन्दा करते और उस पर झूठे दोष लगाते रहे। सो हम जान लें कि परमेश्वर के दास अपनी दृढ़ता और स्थिरता तब प्रमाणित करते हैं, जब मनुष्यों की निन्दाएँ उन पर चारों ओर से आक्रमण करती हैं, और फिर भी वे अपने विवेक की साक्षी से सन्तुष्ट रहते हैं, और अपने मार्ग पर आगे बढ़ते रहते हैं, और परमेश्वर के न्याय की ओर दृष्टि लगाए रहते हैं, और इस बात की चिन्ता नहीं करते कि मनुष्य क्या सोचते या कहते हैं, बशर्ते कि परमेश्वर उन्हें स्वीकार करे और स्वर्ग में उनका न्यायी हो।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह अनुग्रह कर कि हम, यह देखकर कि तूने प्राचीन काल में अपने वचन के सब तुच्छ जाननेवालों को कैसी धमकियाँ दीं, अपने आप को तेरे द्वारा चलाए जाने देना सीखें, और अपनी सारी शक्तियाँ और योग्यताएँ तेरी इच्छा के ऐसे अधीन कर दें कि जो कुछ तू आज्ञा दे, उसे हम बिना किसी विवाद के तुरन्त ग्रहण करें; और अपनी सच्चाई को ऐसा प्रमाणित करें कि हमारे काम हमारे वचनों के अनुरूप हों, और हमारा जीवन यह दिखाए कि हम तेरे पवित्र नाम का झूठा अंगीकार नहीं करते, वरन् वही प्रकट करते हैं जो हमारे मन में है और जिसे तू स्वयं जानता है; जब तक कि अन्तिम दिन अन्ततः प्रकट न हो, जब पुस्तकें खोली जाएँगी और मनुष्यों के सब विचार प्रकट किए जाएँगे, ताकि हम तब तेरी दृष्टि में खरे ठहरें, हमारे प्रभु मसीह के द्वारा। — आमीन।

एक सौ उनसठवाँ व्याख्यान

यिर्मयाह 43:4

4. तब कारेह के पुत्र योहानान और दलों के सब प्रधानों और सब लोगों ने यहोवा की यह आज्ञा न मानी कि वे यहूदा के देश ही में रहें।

4. Et non audivit Joannes filius Kareah, neque omnes principes (duces) copiarum, neque torus popu-lus, vocem Jehovae, ut habitarent in terra Jehudah.

भविष्यद्वक्ता पर्याप्त रूप से दिखा चुका था कि कारेह के पुत्र योहानान और शेष लोगों ने सच्चे मन से भविष्यद्वक्ता से यह नहीं पूछा था कि परमेश्वर की इच्छा क्या है; क्योंकि जब उन्होंने देखा कि परमेश्वर की युक्ति उनकी दुष्ट और मूर्ख अभिलाषा से मेल नहीं खाती, तब वे भविष्यद्वक्ता के विरुद्ध उठ खड़े हुए। परन्तु अब वह परमेश्वर की आज्ञा न मानने में उनके हठ को और भी स्पष्टता से दोषी ठहराता है; और यह बल देकर कहा गया है कि उन्होंने परमेश्वर की वाणी को नहीं माना, क्योंकि उन्होंने इस बात से इनकार किया कि परमेश्वर ने बात की थी। यद्यपि वे टालने का प्रयत्न करते थे, तो भी यिर्मयाह दूसरी ओर घोषित करता है कि वह परमेश्वर की इच्छा का सच्चा व्याख्याता था, कि उसने ऐसी कोई बात प्रचार नहीं की जो परमेश्वर की ओर से न आई हो। फिर वह उन सबको दोषी ठहराता है, प्रधानों को भी और सारे लोगों को भी, ताकि कोई यह अनोखा न समझे कि निर्दोष लोग, जो परमेश्वर के अधीन होना चाहते थे, मिस्र में खदेड़ दिए गए। इसलिए भविष्यद्वक्ता यहाँ दिखाता है कि वे सब एक ही पाप में फँसे हुए थे, क्योंकि केवल प्रधानों ने ही नहीं, वरन् सारे लोगों ने भी ईश्वरीय वाणी का विरोध किया। अब आगे यह आता है, यिर्मयाह 43:5-7

5. और कारेह के पुत्र योहानान और दलों के सब प्रधानों ने यहूदा के सब बचे हुओं को, जो उन सब जातियों में से, जिनमें वे तितर-बितर कर दिए गए थे, यहूदा देश में रहने के लिये लौट आए थे, साथ ले लिया;

5. Et assumpsit Joannes filius Kareah et cuncti duces copiarum reliquias Jehudah, quae reversae fuerant e cunctis gentibus, ad quas illuc expulsae fuerant (sed abundat illuc) ad habitandum in terra Jehudah;

6. अर्थात् पुरुषों, स्त्रियों, बालकों और राजकुमारियों को, और जितने प्राणियों को अंगरक्षकों के प्रधान नबूजरदान ने गदल्याह के पास जो अहीकाम का पुत्र और शापान का पोता था छोड़ा था, उनको, और यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता और नेरिय्याह के पुत्र बारूक को भी;

6. Nempe viros et mulieres (assumpsit tam viros quam mulieres,) et pueritiam et filias Regis, et omnem animam, quam reliquerat Nabuzardan, princeps interfectorum, apud Godoliam filium Achikaro, filii Saphan, et apud Jeremiam Prophetam, et apud Baruch filium Neriae:

7. और वे यहोवा की वाणी न मानकर मिस्र देश में आए; और तहपन्हेस तक पहुँच गए।

7. Et venerunt in terram Aegypti, quia non obedierunt voci Jehovae, et venerunt usque ad Taphnees.

भविष्यद्वक्ता अब हमें उस बात का वृत्तान्त देता है जिसका उसने संक्षेप में उल्लेख किया था। तब वह कहता है कि योहानान और शेष प्रधानों ने लोगों के बचे हुओं को, जो वहाँ जीवित थे, और उनको भी जो विभिन्न देशों से लौट आए थे, साथ ले लिया; क्योंकि जब बहुतों ने देखा कि नगर राजा नबूकदनेस्सर की सेनाओं से घिर गया है, तब वे मोआबियों और एदोमियों के बीच भगोड़े हो गए थे। तब वे इधर-उधर भाग गए, जैसा प्रायः होता है, और युद्ध के परिणाम की बाट जोहते रहे। परन्तु जब नबूकदनेस्सर चला गया, और गदल्याह को अनुमति दी गई कि वह लोगों में से जो बचे थे उन्हें इकट्ठा करे और नगरों और कस्बों में बसाए, तब बहुत से लोग उस देश में, जो अब उजाड़ हो चुका था, लौट आए; क्योंकि वे परदेशियों के बीच रहे थे और उनके साथ बुरा व्यवहार हुआ था। सो जब वे अपने देश के बाहर बस न सके और न कोई शान्त निवास पा सके, तो वे लौट आए, जैसा अभाव में पड़े उन मनुष्यों के साथ प्रायः होता है जिनका कोई स्थिर निवास नहीं होता।

सो वे इसलिए लौटे कि गदल्याह की छत्रछाया में रहें।

अब भविष्यद्वक्ता कहता है कि योहानान उन्हें ले गया और मिस्र में पहुँचा दिया।

सो इसी रीति से उन्होंने अपना हठ प्रकट किया। इससे हम देखते हैं कि ये प्रधान कितने दुस्साहसी रहे होंगे, कि वे मिस्र जाने से नहीं हिचकिचाए, यद्यपि यह दिखा दिया गया था कि यह एक घातक कदम है। उस समय यहूदिया में नबूकदनेस्सर की कोई सेना तो न थी, तो भी उसके पलटा लेने का भय किया जा सकता था।

और फिर, मिस्र को भाग जाने पर, वहाँ उनके साथ बुरा व्यवहार हो सकता था और उनका आतिथ्यपूर्वक स्वागत न होता। परन्तु इससे हम समझते हैं कि जब मनुष्य एक बार परमेश्वर का जूआ उतार फेंकते हैं, तब वे शैतानी उन्माद से ऐसे खिंचे चले जाते हैं कि उनके लिये कुछ भी दुर्गम नहीं रहता। यदि उनसे पूछा जाता कि क्या वे ठीक कर रहे हैं, तो वे बहाने के रूप में हज़ार तर्क खड़े कर सकते थे; परन्तु जब वे अपनी ही प्रवृत्ति के पीछे चले, तब वे, यों कहें, मानो बादलों के ऊपर से छलाँग लगा गए। अतः अभक्ति सदा उतावलेपन और दुस्साहस से भरी रहती है। परन्तु जैसे हम देखते हैं कि दुष्ट इस प्रकार सिर के बल विनाश में कूद पड़ते हैं, तब भी जब परमेश्वर उनकी युक्तियों और कार्यों पर शाप सुनाता है, वैसे ही हम सदा परमेश्वर की आज्ञा मानने के लिये प्रोत्साहन लेना सीखें; क्योंकि जब हम उसके दिखाए हुए मार्गों पर चलते हैं, तब वह सदा आनन्दमय और धन्य परिणाम की प्रतिज्ञा करता है।

तब योहानान और दलों के अन्य प्रधानों ने लोगों के बचे हुओं को साथ ले लिया।

और फिर वह दिखाता है कि उन निर्वासितों ने, जो यहूदिया देश में बसने को लौट आए थे, अपनी भलाई का कितना कम विचार किया; क्योंकि वे अब भी उन जातियों के बीच सुरक्षित रह सकते थे जिन्होंने दया करके उन्हें ग्रहण किया था; परन्तु मिस्र में परमेश्वर ने शीघ्र ही वहाँ के निवासियों पर भी और परदेशियों पर भी अपने न्याय-दण्ड पूरे किए। परन्तु वे ऐसे ही प्रतिफल के योग्य थे, क्योंकि उन्होंने अपने भविष्यद्वक्ता के द्वारा बोलनेवाले परमेश्वर की वाणी मानने की अपेक्षा टेढ़े और हठीले लोगों की आज्ञा मानना अधिक पसन्द किया।

भविष्यद्वक्ता यह भी विशेष रूप से बताता है कि वे कौन थे; वे पुरुष, स्त्रियाँ और बालक थे। कुछ लोग अन्तिम शब्द का अनुवाद "यौवनावस्था" करते हैं, जिसे मैं ठीक नहीं मानता, क्योंकि पवित्रशास्त्र बालकों के विषय में इसी प्रकार बोलता है। सो योहानान और उसके साथी बचपन को, अर्थात् बालकों को, ले गए; और वह आगे कहता है, राजकुमारियों को। हम पहले इस पर विचार कर चुके हैं कि राजा की ये बेटियाँ कौन थीं: सम्भावना यह है कि वे उसकी रखेलियों से उत्पन्न बेटियाँ थीं; और उन्हें किसी सुरक्षित स्थान में रखा गया था, ताकि यदि कोई बड़ी विपत्ति आ पड़े, तो वे शत्रुओं के हाथ न पड़ें। तब राजा की ये बेटियाँ दूसरे निर्वासितों के साथ लौट आई थीं, परन्तु बाद में मिस्र में ले जाई गईं।

अन्त में वह आगे कहता है, सब प्राणी जिन्हें नबूजरदान ने गदल्याह के पास, यिर्मयाह के पास और बारूक के पास छोड़ा था। यह बात और कहीं स्पष्ट रूप से नहीं कही गई थी, अर्थात् यह कि यिर्मयाह और बारूक लोगों के बचे हुओं पर शासकों के रूप में गदल्याह के साथ जोड़े गए थे। परन्तु यिर्मयाह का उद्देश्य यह नहीं था कि जो कुछ उस समय हुआ उस सबका वर्णन करे। सो अब, जब अवसर आया, वह कहता है कि वह और बारूक भी गदल्याह के साथ मिलकर अधिपति ठहराए गए थे। फिर वह आगे कहता है कि वे सब मिस्र में आए, या कि वे मिस्र में प्रवेश कर गए। क्योंकि पहले प्रयुक्त शब्द, {,}ויבאוvaibau, का अनुवाद यों हो सकता है, "और* वे मिस्र में प्रवेश कर गए;" और फिर वह आगे कहता है, -{}ויבאו{ }עד,}תחפנחס{vaibau od-tachephnuches, "और* वे तहपन्हेस तक प्रवेश कर गए (या भीतर पहुँच गए)।" यह प्राचीन काल में मिस्र के प्रमुख नगरों में से एक था; परन्तु इसका नाम इसके धन के साथ ही मिट गया है; क्योंकि अन्यजाति लेखकों में इस नगर का नाम मुश्किल से ही मिलता है। वे तफ़्नीम नगर का उल्लेख तो करते हैं, परन्तु तफ़्नीस की चर्चा नहीं करते। अतः सम्भव है कि, जैसे किसी देश में परिवर्तन होते रहते हैं, यह नगर धीरे-धीरे उजड़ता गया, यहाँ तक कि अप्रसिद्ध और तुच्छ हो गया, और दूसरे नगर बसाए गए जो धन में उससे बढ़ गए। सो वह कहता है कि वे तफ़्नीस तक पहुँचे। अब आगे यह आता है,—

यिर्मयाह 43:8-10

8. तब यहोवा का यह वचन तहपन्हेस में यिर्मयाह के पास पहुँचा,

8. Et fuit sermo Jehovae ad Jeremiam in Taphnees, dicendo,

9. अपने हाथ से बड़े पत्थर ले, और यहूदी पुरुषों के देखते तहपन्हेस में फ़िरौन के भवन के द्वार के पास ईंट के भट्ठे में चूने से छिपा दे,

9. Sume in manu tua (accipe in manu tua) lapides grandes (vel, magnas,) et absconde eos in luto (vel, caemento,) in fornace laterum, (vel, lacuna, unde sumitur materia ad formandos lapides,) qui locus (vel, quae fornax) est in porta domus Pharaonis in Taphnees, in oculis hominum Judaeorum;

10. और उन से कह, इस्राएल का परमेश्वर, सेनाओं का यहोवा यों कहता है, देखो, मैं बाबुल के राजा अपने सेवक नबूकदनेस्सर को बुलवा भेजूँगा, और वह अपना सिंहासन इन पत्थरों के ऊपर जो मैं ने छिपा रखे हैं रखेगा; और अपना राजकीय मण्डप इनके ऊपर तनवाएगा।

10. Et dices ad eos, Sic dicit Jehova exercituum, Deus Israel, Ecce ego mitto (mittam,) et assumam Nabuchadnezer regem Babylonis, servum meum, et ponam solium ejus super lapides istos, quos abscondi, et extendet tenterium suum super ipsos.

यह खण्ड दिखाता है कि भविष्यद्वक्ता को दूसरों के साथ बलपूर्वक घसीट ले जाया गया, यहाँ तक कि वह अपनी इच्छा के विरुद्ध मिस्र में निर्वासित हो गया; क्योंकि वह अपनी इच्छा से वहाँ नहीं गया, क्योंकि हम देख चुके हैं कि उसने उन सबको मिस्र में उतरने से कितनी कड़ाई से मना किया था। तो भी उसे वहाँ जाने को विवश किया गया, मानो वह ज़ंजीरों से बँधा हो। अतः वह जान-बूझकर वहाँ नहीं गया, न ही निराश होकर उन अभागे लोगों के पीछे हो लिया; क्योंकि वह इस रीति से अपने जीवन को लम्बा करने का यत्न करने की अपेक्षा यहूदा देश में भूख और अभाव से सौ बार मरना अधिक पसन्द करता। अतः प्रकट होता है कि उसे मानो शत्रुओं के द्वारा वहाँ खदेड़ा गया।

परन्तु जैसे कोई बात परमेश्वर के अभिप्राय के बिना नहीं होती, वैसे ही इस भविष्यद्वाणी से प्रकट होता है कि परमेश्वर ने ही अपने दास का नीचे उतरना ठहराया था, और कि वह दुष्टों की इच्छा के ऐसे अधीन नहीं किया गया था कि परमेश्वर के गुप्त प्रभाव से सदा उसकी अगुवाई न होती रहे; क्योंकि परमेश्वर की इच्छा थी कि मिस्र के बीच में भी उसका अपना दूत रहे, ताकि वह यहूदियों को बताए कि क्या होनेवाला है। उसकी शिक्षा से उन्हें कोई लाभ तो नहीं हुआ; परन्तु परमेश्वर का अभिप्राय यह था कि उन्हें मानो पागलपन में धकेल दे, क्योंकि उनकी दुष्टता पूरी रीति से असाध्य थी; क्योंकि दुष्टों के लिये परमेश्वर का हाथ अनुभव करने की अपेक्षा उसकी वाणी सुनना, जब वह पलटा लेने की धमकी देता है, अधिक कठिन बात है।

इसलिए जब अविश्वासी परमेश्वर के वचन से बचते हैं, तब भी वे चाहे-अनचाहे वह सुनने को विवश किए जाते हैं जिसे वे जान-बूझकर ठुकराते हैं, अर्थात् यह कि परमेश्वर उनका न्यायी होगा। अतः भविष्यद्वक्ता परमेश्वर के गुप्त अभिप्राय के अनुसार मिस्र में भेजा गया, ताकि वह वहाँ अपनी सामान्य बुलाहट पूरी करे, और अपने पद के कर्तव्य को निभाने में आगे बढ़ता रहे, और वहाँ अपना भविष्यद्वक्ता का कार्य जारी रखे।

परन्तु यह भविष्यद्वाणी अत्यन्त अप्रिय लगी; क्योंकि यहूदी तो पहले ही बहुत चिढ़े हुए थे, और यह धमकी उनके क्रोध को और भी भड़काने वाली थी; और यिर्मयाह ने मिस्रियों की ओर से भी अपने ऊपर संकट मोल लिया, क्योंकि उसने केवल यहूदियों को ही नहीं, वरन् मिस्र के सारे राज्य को भी धमकी दी। इससे हम देखते हैं कि उसका साहस कैसा अजेय था, क्योंकि वह निश्चित मृत्युओं के बीच से होकर चला, और फिर भी किसी संकट से भयभीत न हुआ, वरन् परमेश्वर के सौंपे हुए पद का निर्वाह करता रहा। कुछ लोग सोचते हैं कि इसी कारण यहूदियों ने उसे पत्थरवाह किया; परन्तु यह सम्भव नहीं जान पड़ता, वरन् अन्य स्थानों से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उसकी मृत्यु स्वाभाविक रूप से हुई। चाहे जो हो, उसकी दृढ़ता और स्थिरता अद्भुत थी, क्योंकि वह अन्त तक, और बिना थके, उन वनपशुओं से जूझता रहा, जिनकी क्रूरता का उसने आवश्यकता से अधिक अनुभव किया था।

अब हम देखें कि यह भविष्यद्वाणी क्या है: यहोवा का वचन यिर्मयाह के पास पहुँचा; और इसका सार यह है कि भविष्यद्वक्ता को केवल परमेश्वर के पलटे का प्रचार करने की ही नहीं, वरन् उसे एक दृश्य चिह्न के द्वारा पुष्ट करने की भी आज्ञा दी गई, क्योंकि अविश्वासी मनुष्यों को जगाना आवश्यक था। क्योंकि उनकी जड़ता इतनी बड़ी थी कि यदि परमेश्वर उनकी सब इन्द्रियों को न जगाता, तो वे कभी ध्यान न देते; वे बहरे थे। इसलिए प्रभु ने जो कुछ वे सुनना नहीं चाहते थे और जिसे सुनने से इनकार करते थे, उसे उनकी आँखों के सामने रख दिया। इसी कारण भविष्यद्वक्ता को आज्ञा दी गई कि वह अपनी भविष्यद्वाणी के साथ एक बाहरी चिह्न जोड़े; जैसा हम अन्य स्थानों में कह चुके हैं, मनुष्यों की मन्दता, वरन् उनकी जड़ता के कारण, चिह्न प्रायः शिक्षा के साथ जोड़े जाते थे।

तब उसे आज्ञा दी गई कि बड़े-बड़े पत्थर लेकर उन्हें ईंट के भट्ठे में गारे या चूने में छिपा दे, अर्थात् ऐसे भट्ठे में जहाँ ईंटें पकाई जाती थीं, या ऐसे स्थान में जहाँ वे प्रायः बनाई जाती थीं, या जहाँ उन्हें बनाने के लिए सामग्री ले जाई जाती थी। और यह स्थान तहपन्हेस नगर में राजा के भवन से दूर नहीं था, जैसा भविष्यद्वक्ता स्पष्ट रूप से कहता है; वरन् वह कहता है कि वह फाटक के निकट था। तो क्योंकि यह स्थान भवन के निकट था, भविष्यद्वक्ता को आज्ञा दी गई कि वह वहाँ, और यहूदियों के देखते, पत्थरों को छिपा दे। यही चिह्न था। अब यह दिखाया जाता है कि परमेश्वर किस उद्देश्य से चाहता था कि पत्थर गारे या चूने में जमाए जाएँ; क्योंकि यदि भविष्यद्वक्ता बड़े परिश्रम से केवल पत्थरों को वहाँ लुढ़का ही देता, तो उससे कोई शिक्षा न मिलती; और हम जानते हैं कि वचन के बिना सब चिह्न निरर्थक और महत्त्वहीन हैं। तो परमेश्वर का वचन ही, एक प्रकार से, चिह्नों को जीवन देता है, और उन्हें मनुष्यों के लाभ और शिक्षा के लिए लागू करता है। इसलिए परमेश्वर की यह आज्ञा जोड़ी गई है कि वह यहूदियों से कहे: तू उनसे कहना, यहोवा यों कहता है। वह परमेश्वर को वक्ता के रूप में प्रस्तुत करता है, ताकि धमकी अधिक प्रभावशाली हो, जैसा अन्यत्र कहा जा चुका है; क्योंकि यदि वह केवल परमेश्वर के वचनों का वर्णन करता, तो वह उनका ध्यान, जो अत्यन्त मन्द था, इस प्रकार आकर्षित न कर पाता। तो यही कारण है कि वह स्वयं परमेश्वर के व्यक्तित्व में बोलता है।

देख, मैं, — निर्देशक अव्यय और सर्वनाम दोनों ही बलसूचक हैं, {,}הנניenni; देख, मैं भेजता हूँ, वह कहता है, कि बाबुल के राजा नबूकदनेस्सर को, अपने दास को, बुलवा लूँ, और उसका सिंहासन इन पत्थरों पर रखूँगा। अब हम पूरे वचन का आशय समझते हैं, अर्थात् यह कि ये पत्थर चूने में इसलिए डाले गए कि परमेश्वर नबूकदनेस्सर के लिए एक सिंहासन बनाए। सिंहासन बनाने का समय तो अभी नहीं आया था; परन्तु परमेश्वर का उद्देश्य नींव डालना था, ताकि वे समय आने तक छिपी रहें। तो जब भविष्यद्वक्ता ने ईंट के भट्ठे के स्थान में ये पत्थर डाले, तब उसने नबूकदनेस्सर के लिए एक सिंहासन बनाया।

अब हमें एक-एक बात को क्रम से जाँचना चाहिए। परमेश्वर कहता है कि वह बाबुल के राजा नबूकदनेस्सर को बुलवा भेजेगा। इस भेजने को परमेश्वर के गुप्त विधान के सिवा और किसी अर्थ में नहीं समझना चाहिए; क्योंकि उसके पास कोई सेवक न थे जिनके द्वारा वह नबूकदनेस्सर को बुलवा भेजता, परन्तु उसने मानो केवल अपने संकेत से उसे बुलाया। इसके अतिरिक्त, बोलने की यह रीति उधार ली गई है, मनुष्यों से ली गई है, जो कुछ करवाना चाहते हैं तो अपना अभिप्राय प्रकट करते हैं; और फिर जब आदेश देते हैं, तो अपनी आज्ञाएँ जारी करते हैं। पृथ्वी के राजा ऐसा ही करते हैं, क्योंकि वे केवल एक संकेत से जो कुछ उनके मन में आता है पूरा कर सकते हैं। परन्तु परमेश्वर, जिसे किसी बाहरी सहायता की आवश्यकता नहीं, तब भेजता हुआ कहा जाता है जब वह अपने उद्देश्य को, और वह भी अपनी अगम्य सामर्थ्य से, पूरा करता है। और फिर, परमेश्वर यह संकेत करता है कि जब नबूकदनेस्सर आएगा, तो वह किसी प्रकार संयोग से नहीं होगा, वरन् उन हठीले यहूदियों से पलटा लेने के लिए होगा, जो मिस्र में सुरक्षित शरण की आशा रखते थे, जबकि परमेश्वर ने उनसे प्रतिज्ञा की थी कि यदि वे यहूदा देश में बने रहते तो उन्हें वहाँ शान्त निवास मिलता। फिर परमेश्वर घोषणा करता है कि जब नबूकदनेस्सर मिस्र में आएगा, तब उस कूच का अगुवा वह स्वयं होगा, मानो उसने कहा हो कि वह युद्ध उसकी ध्वजा के नीचे लड़ा जाएगा। नबूकदनेस्सर ने जान-बूझकर परमेश्वर की आज्ञा का पालन नहीं किया; क्योंकि जब वह आया तब महत्त्वाकांक्षा और घमण्ड उसे मिस्र तक ले गए, और इस कारण कि मिस्रियों ने उसे इतनी बार उकसाया था कि वह अपना अपमान कराए बिना पलटा लेने में और विलम्ब नहीं कर सकता था। यदि हम उसके उद्देश्य को देखें, तो वह इसी कारण आया। परन्तु परमेश्वर घोषणा करता है कि उसने राजा पर और सब बाबुलियों पर भी प्रभुता की, यहाँ तक कि जब वह चाहता तब उन्हें शस्त्र-सज्जित करता, और उन्हें मिस्र में ले आता, और उनके द्वारा मिस्रियों से युद्ध करता।

इसी कारण वह उसे अपना दास कहता है; इसलिए नहीं कि नबूकदनेस्सर ऐसे आदरणीय नाम के योग्य था, क्योंकि, जैसा हम कह चुके हैं, परमेश्वर की सेवा करने का अभिप्राय उसमें सबसे कम था; परन्तु वह परमेश्वर का दास इसलिए कहलाता है कि उसने वह पूरा किया जो स्वयं परमेश्वर ने ठहराया था: क्योंकि पवित्रशास्त्र कभी-कभी दुष्टात्माओं को भी परमेश्वर के दास कहता है; परन्तु ठीक-ठीक भाषा में केवल स्वर्गदूत और विश्वासी ही उसके दास हैं। राजा और भविष्यद्वक्ता भी, एक विशेष कारण से, परमेश्वर के दास कहलाते हैं, जिन्हें शासन करने या सिखाने का अधिकार सौंपा गया है। परन्तु इस स्थान में, जैसा बहुत से अन्य स्थानों में, पवित्रशास्त्र उन्हें परमेश्वर के दास कहता है जिन्हें वह अपना उद्देश्य पूरा करने के लिए काम में लाता है, चाहे स्वयं उनका ऐसा कोई अभिप्राय न हो। परन्तु निःसन्देह भविष्यद्वक्ता के ध्यान में यहूदी भी थे, ताकि वे जान लें कि यह युद्ध परमेश्वर द्वारा अनुमोदित था; क्योंकि यदि परमेश्वर उसे वहाँ न लाता तो नबूकदनेस्सर न आता।

फिर आगे लिखा है, और मैं उसका सिंहासन रखूँगा। यह भी परमेश्वर अपने लिए ठहराता है, अर्थात् मिस्र के राजा के भवन के सामने राजा नबूकदनेस्सर का सिंहासन खड़ा करना। बाबुल के राजा ने निःसन्देह यही सोचा कि युद्ध उसके अपने प्रयत्नों और पराक्रम से, और उसके सैनिकों के साहस से लड़ा जा रहा है; इसके अतिरिक्त, जैसा अन्यजाति किया करते हैं, उसने अपने ही भाग्य के आगे बलि चढ़ाई; और इसी कारण यशायाह में अश्शूरी के विषय में कहा गया है, "उसकी ऐसी कल्पना नहीं होती।" (यशायाह 10:7)

परन्तु परमेश्वर की इच्छा यह थी कि यह बात समय से पहले यहूदियों को बता दी जाए, ताकि वे तब जान लें कि उनके हठ का उचित प्रतिफल उन्हें दिया जाएगा, क्योंकि, जैसा हम कह चुके हैं, उन्हें उनकी भलाई और लाभ के लिए सिखाया जाना था। परन्तु क्योंकि वे पहले ही निरुत्तर थे, परमेश्वर का उद्देश्य उन्हें अधिकाधिक लज्जित करना था, ताकि वे जान लें कि उन पर उचित दण्ड पड़ेगा, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर की सारी युक्ति को इतने हठ से ठुकरा दिया था।

तो मैं उसका सिंहासन इन पत्थरों पर, जिन्हें मैंने छिपा रखा है, खड़ा करूँगा। भविष्यद्वक्ता यहाँ अनियमित रीति से बोलता है, कभी परमेश्वर के नाम से, कभी अपने नाम से; परन्तु यह अकारण नहीं किया गया। हम बता चुके हैं कि उसने परमेश्वर को वक्ता के रूप में क्यों प्रस्तुत किया, अर्थात् इसलिए कि वह यहूदियों को अधिक ध्यान देनेवाला बनाए; क्योंकि वह जानता था कि जब तक परमेश्वर का प्रताप उनके सामने न रखा जाए, उसकी सब धमकियों का ठट्ठा उड़ाया जाएगा: परन्तु अब वह अपने आप को परमेश्वर के साथ जोड़ता है, मानो उसने कहा हो कि परमेश्वर से अलग उसके पास कुछ भी नहीं। यही कारण है कि उसने कहा, इन पत्थरों पर जिन्हें मैंने छिपा रखा है। परमेश्वर ने पत्थर नहीं छिपाए थे, फिर भी भविष्यद्वक्ता परमेश्वर के व्यक्तित्व में बोलता है। परन्तु, जैसा मैं कह चुका हूँ, यह सम्बन्ध दिखाता है कि भविष्यद्वाणी का वचन परमेश्वर के हाथ और सामर्थ्य से ऐसा जुड़ा हुआ है कि जब भविष्यद्वक्ता बोलता है, तो उसे ऐसा ही समझना चाहिए मानो परमेश्वर ने स्वर्ग से खुलकर गर्जन किया हो। और बोलने की इस रीति पर ध्यानपूर्वक विचार करना चाहिए, ताकि हम सीखें कि विश्वासयोग्य शिक्षक अपने पद के कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए जो कुछ उसके नाम से घोषित करते हैं, उसे हम श्रद्धा से ग्रहण करें; क्योंकि उन्हें मनुष्य के रूप में नहीं देखना चाहिए, नहीं तो जो कुछ उनसे निकलता है उसकी उपेक्षा की जा सकती है; वरन् उनके मुँह से प्रचारित शिक्षा को हमें ऐसे ग्रहण करना चाहिए मानो स्वयं परमेश्वर हमसे बात करने के लिए स्वर्ग से उतर आया हो।

इसके बाद वह जोड़ता है, और वह अपना मण्डप या अपना तम्बू तानेगा; क्योंकि {,}שפריר shepherir, एक ऐसे शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ सौन्दर्य है, और यहाँ इसका ठीक अर्थ राजकीय तम्बू है। इब्रानी लोग यह नाम चरवाहों के तम्बुओं को नहीं देते, वरन् केवल उन तम्बुओं को देते हैं जो भव्यता और वैभव में श्रेष्ठ होते हैं, जैसा हम फ्रांसीसी में कहते हैं, Le pavillon du Roy। अब आगे लिखा है —

यिर्मयाह 43:11

11. वह आकर मिस्र देश को मारेगा, और जो मरनेवाले हों वे मृत्यु के वश में, जो बन्दी होनेवाले हों वे बन्धुआई में, और जो तलवार के लिए हों वे तलवार के वश में कर दिए जाएँगे।

11. Et veniet et percutiet terram Aegypti; qui ad mortem, ad mortem; et qui ad exilium, ad exilium; et qui ad gladium, ad gladium.

वह यहाँ जो कहता है, और अध्याय के अन्त तक अगले दो पदों में जो कहता है, उसके द्वारा वह पिछले पद की पुष्टि करता है। क्योंकि मिस्र के नगर भली-भाँति गढ़वाले थे और अजेय समझे जाते थे, इसलिए यहूदियों ने कभी नहीं सोचा था कि कसदी इतनी सहजता से उनमें घुस सकेंगे। क्योंकि, पहले तो, वह देश एक मैदान में बसा है; और दूसरे, झीलों के बीच में: और वह कुछ अंश तक नील नदी और लाल समुद्र से घिरा है। तो क्योंकि मिस्र हर ओर से इतनी अच्छी रीति से सुरक्षित था, उन्होंने सोचा कि वहाँ उनके लिए एक शान्त घोंसला होगा। परन्तु परमेश्वर घोषणा करता है कि राजा नबूकदनेस्सर सारे देश का विजेता बन जाएगा; और वह सब आपत्तियों को यह कहकर दूर कर देता है, —

356 सेप्टुआजिंट और सीरियाई अनुवाद में इसका अनुवाद "हथियार" किया गया है; वल्गेट में "सिंहासन"; टार्गम में "तम्बू"। आश्चर्य की बात है कि इतना अन्तर होना चाहिए। यह कोई ऐसी वस्तु थी जिसे फैलाया या ताना जाना था, क्योंकि क्रिया का यही अर्थ है; और यह कोई सुन्दर वस्तु थी, क्योंकि शब्द का यही अर्थ है। सम्भवतः यह एक चँदोवा था जो उस सिंहासन के ऊपर खड़ा किया गया, जिसे पत्थरों पर रखा जाना था। — सं.

जो मरनेवाले हों वे मृत्यु के वश में; जो बन्दी होनेवाले हों वे बन्धुआई में; जो तलवार के लिए हों वे तलवार के वश में; मानो उसने कहा हो, "चाहे मिस्र कितना ही घनी आबादीवाला क्यों न हो, तौभी मनुष्यों की अपार भीड़ किसी काम न आएगी, क्योंकि वे अपने शत्रु से पराजित होंगे; क्योंकि कुछ तलवार से नाश होंगे, और कुछ भाँति-भाँति की मृत्यु से, और कुछ निर्वासन में खदेड़ दिए जाएँगे; और मिस्र ऐसे नष्ट किया जाएगा मानो उसकी रक्षा के लिए कोई खड़ा ही न हुआ हो।" इससे हम देखते हैं कि यह इसलिए जोड़ा गया कि भविष्यद्वक्ता यहूदियों के झूठे भरोसे को झाड़ दे। अगले दो पद भी इसी उद्देश्य से हैं।

यिर्मयाह 43:12

12. और मैं मिस्र के देवालयों में आग लगाऊँगा; और वह उन्हें फूँक देगा और बन्धुआई में ले जाएगा; और जैसा कोई चरवाहा अपना वस्त्र ओढ़ता है, वैसा ही वह मिस्र देश को लपेट लेगा; और वहाँ से कुशल से चला जाएगा।

12. Et accendam ignem in aedibus deorum Aegypti; et comburet eas (vel, ipsos deos) et captivos abducet et involvet terram Aegypti, quemadmodum involvere solet pastor vestem suam; et egredietur illinc in pace.

वह उसी विषय को आगे बढ़ाता है; और आग लगाने का काम परमेश्वर को सौंपता है, ताकि यहूदी जान लें कि युद्ध ईश्वरीय सामर्थ्य से चलाया जाएगा, और कि नबूकदनेस्सर परमेश्वर के विधान के बिना नहीं आएगा। क्योंकि यद्यपि, जैसा कहा जा चुका है, उसके अपने कारण थे, तौभी परमेश्वर अपनी अद्भुत सामर्थ्य से, मानो हाथ पकड़कर, उसे मिस्रियों को दण्ड देने के लिए ले चला। वे सचमुच ऐसे विनाश के योग्य थे, क्योंकि उन्होंने अपनी चापलूसियों से अभागे यहूदियों को धोखा दिया था, और उन्हें भ्रष्ट कर दिया था। इसके अतिरिक्त, उनके प्रलोभन अत्यन्त विनाशकारी सिद्ध हुए थे, क्योंकि उन्हीं के कारण परमेश्वर की सहायता तुच्छ जानी गई थी, और सब भविष्यद्वाणियाँ ठुकरा दी गई थीं। तो क्योंकि वे यहूदियों के लिए सब प्रकार की बुराइयों के कारण बने थे, इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि वे भयानक पलटे के योग्य थे; और यह उचित समय पर यहूदियों को बताया गया था, परन्तु उन्होंने इस पर विश्वास नहीं किया। तब भविष्यद्वक्ता उस बात की पूरी रीति से पुष्टि करता है जो उसकी पिछली भविष्यद्वाणियों में घोषित की गई थी।

मैं मिस्र के देवताओं के मन्दिरों में आग लगाऊँगा, परमेश्वर कहता है। और वह मन्दिरों का उल्लेख इसलिए करता है कि यहूदी समझ लें कि देश का कोई भाग विनाश से सुरक्षित या निश्चिन्त न रहेगा: क्योंकि प्रायः ऐसा होता है कि जब शत्रुओं की क्रूरता बहुत भड़कती है, तब भी मन्दिर बच जाते हैं; क्योंकि धर्म आदर की माँग करता है, और मूर्तियों को भी सम्मान दिया गया है, यहाँ तक कि जब शत्रुओं ने अन्य सब वस्तुओं को पूरी रीति से उलट दिया, तब भी उनके मन्दिर प्रायः अछूते रह गए। परन्तु सम्भव है कि कसदियों में इतना बड़ा अहंकार और घमण्ड था कि वे सब मन्दिरों को नष्ट करना चाहते थे, ताकि उनके अपने यहाँ के सिवा कहीं भी कोई धर्म न रहे। और फारसियों में से भी कुछ में यह बर्बरता थी, जैसे ज़र्कसीज़ में, जिसने यूनान और एशिया के कुछ भागों में प्रवेश करके सब मन्दिरों को जला और नष्ट कर दिया, और ठट्ठे में यह भी कहा कि यूनान के सब देवता बन्दी बना लिए गए हैं और मन्दिरों में बन्द कर दिए गए हैं, और कि उसने सब कुछ अपने ही पराक्रम से सिद्ध किया। इसमें सचमुच कोई सन्देह नहीं कि ज़र्कसीज़ ने इस प्रकार यूनानियों के देवताओं पर घमण्ड से विजय मनाई; और सम्भवतः कसदियों ने भी ऐसी ही उद्दण्डता दिखाई। चाहे जो हो, तौभी परमेश्वर दिखाता है कि मिस्र में कोई भी स्थान पवित्र नहीं माना जाएगा: क्योंकि कसदी उनके मन्दिरों को भी जला देंगे। परन्तु साथ ही उसका अभिप्राय यहूदियों के हठ पर कलंक लगाना भी था, क्योंकि वे मिस्र को उतर गए, जिसकी सुरक्षा मूर्तियों पर निर्भर थी। तो परमेश्वर दिखाता है कि वे अन्धों से भी बढ़कर थे, और पूरी रीति से अपनी सुध-बुध खो बैठे थे, मानो वे पशु हों, जब उन्होंने मिस्र में, जो झूठे देवताओं के संरक्षण में था, एक शान्त बन्दरगाह की आशा की। तो परमेश्वर कहता है कि वह ऐसी आग लगाएगा जिससे मिस्र के देवताओं के मन्दिर जल जाएँगे।

और वह आगे कहता है, और वह (आग) या वह (राजा) उन्हें जला देगा। इसे आग पर लागू किया जा सकता है; परन्तु निःसन्देह वह राजा नबूकदनेस्सर के विषय में बोलता है, क्योंकि तुरन्त आगे लिखा है, और उन्हें बन्धुआई में ले जाएगा, और मिस्र देश को ऐसे लपेट लेगा, जैसे चरवाहा अपना वस्त्र।

क्रिया का ठीक अर्थ ढाँपना है, परन्तु कभी-कभी इसका अर्थ समेटना भी होता है। यहाँ इसका अनुवाद लपेट लेना किया जा सकता है, जैसा हम फ्रांसीसी में कहते हैं, trousser et entortiller। वह संकेत करता है कि नबूकदनेस्सर अपनी इच्छा के अनुसार मिस्र में ऐसा राज्य करेगा कि वह सारे देश का सारा धन बटोर लेगा: और जैसे चरवाहा जब अपने झुण्ड को दूसरे स्थान पर ले जाता है, तब अपने सामान को इकट्ठा करता है, और अपने वस्त्रों को लपेट लेता है, या उनमें अपने आप को लपेट लेता है; वैसे ही, भविष्यद्वक्ता कहता है, नबूकदनेस्सर सारे मिस्र देश को समेट लेगा, या लपेट लेगा। वह देश का उल्लेख उस धन के अर्थ में करता है जिसे नबूकदनेस्सर ने बटोरा। अन्त में वह जोड़ता है, और वहाँ से कुशल से चला जाएगा। वह दिखाता है कि विजय पूर्ण होगी, क्योंकि मिस्री कुड़कुड़ाने का साहस न करेंगे, और न उसके लौटते समय अपने शत्रु का पीछा करने का साहस करेंगे; क्योंकि वह ऐसा होगा मानो किसी शान्त स्थान में, और अपने ही राज्य में हो।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अनुग्रह कर कि जैसे तू ने केवल एक ही बार हमें वह मार्ग नहीं दिखाया जिसमें हमें चलना है, वरन् प्रतिदिन हमें उसमें बने रहने, और सदा सही लक्ष्य की ओर आगे बढ़ते जाने का उपदेश भी देता है, — हाँ, अनुग्रह कर कि हम कभी भटककर अलग न हों, वरन् अपने आप को तेरी वाणी के द्वारा चलाए जाने दें; और यद्यपि परीक्षाएँ हमें इधर-उधर ढकेलें, तौभी हम सदा तेरी आज्ञा के पीछे चलें, और तेरी आज्ञाकारिता में ऐसे स्थिर बने रहें कि अन्त में अनुभव से यह पाएँ कि अपने आप को तुझे सौंप देना, और तुझे अपना अगुवा मानकर तेरे पीछे चलना ही हमारा सुख है, जब तक कि तू हमें उस स्वर्गीय राज्य में न पहुँचा दे, जो तेरे एकलौते पुत्र के द्वारा हमारे लिए तैयार किया गया है। — आमीन।

एक सौ साठवाँ व्याख्यान

यिर्मयाह 43:13

13. और वह मिस्र देश में स्थित बेतशेमेश के खम्भों को तुड़वा डालेगा; और मिस्र के देवालयों को आग लगाकर फुँकवा देगा।

13. Et conteret statuas Beth-semes (vel, Heliopolios) quae est in terra Aegypti, et domos deorum.Aegypti (hoc est, templa) exuret igni.

357 पहली क्रिया का अनुवाद सेप्टुआजिंट, वल्गेट और सीरियाई अनुवाद में अन्य पुरुष में किया गया है, "वह आग लगाएगा;" परन्तु टार्गम में उत्तम पुरुष में, "मैं आग लगाऊँगा।" अन्य पुरुष सन्दर्भ के साथ अधिक अच्छी रीति से मेल खाता है; परन्तु यदि क्रिया को प्रेरणार्थक अर्थ दिया जाए, तो बात वही रहेगी, "और मैं उससे मिस्र के देवताओं के घरों में आग लगवाऊँगा, और वह उन्हें जला देगा, और उन्हें बन्धुआई में ले जाएगा; अर्थात् वह लकड़ी से बने भागों को जला देगा, और सोना और चाँदी ले जाएगा; "और वह मिस्र देश को ऐसे ओढ़ लेगा जैसे चरवाहा अपना अंगरखा ओढ़ता है," अर्थात् वह देश की लूट को उसी सहजता और सुगमता से ओढ़ लेगा जिससे चरवाहा अपना अंगरखा ओढ़ता है, और उसे ले जाएगा, और कोई उसे न सताएगा और न रोकेगा। — सं.

कल हमने बताया था कि यिर्मयाह ने विशेष रूप से देवताओं के मन्दिरों की चर्चा क्यों की, अर्थात् इसलिए कि यहूदी समझ लें कि कुछ भी विनाश से न बचेगा: क्योंकि अत्यन्त क्रूर शत्रुओं ने भी प्रायः देवताओं के मन्दिरों से अपने हाथ रोके रखे हैं। यदि पवित्रता और धर्म मन्दिरों की रक्षा न कर सकें, तो फिर निजी घरों का क्या होगा? संक्षेप में, वह संकेत करता है कि मिस्र का विनाश ऐसा होगा कि उसका कोई भाग न बचेगा।

परन्तु क्योंकि उस समय हेलियोपोलिस सबसे अधिक प्रसिद्ध था, वह कहता है कि उस नगर के सब देवताओं की मूर्तियाँ तोड़ दी जाएँगी, क्योंकि वहाँ देवताओं की विशेष रूप से उपासना होती थी। सब अन्यजाति लेखक उसे हेलियोपोलिस कहते हैं, जिससे इब्रानी शब्द मेल खाता है; क्योंकि बेतशेमेश का अर्थ सूर्य का नगर है; और हेलियोपोलिस का भी यही अर्थ है। तो क्योंकि यह वह मुख्य स्थान था जहाँ मिस्र के देवता पाए जाते थे, भविष्यद्वक्ता यह दिखाने के लिए कि सारे देश का विनाश चरम होगा, कहता है कि वहाँ कोई मन्दिर अछूता न रहेगा। इसी प्रकार यशायाह भी, मिस्र के विनाश के विषय में बोलते हुए, कहता है, "देखो, परमेश्वर मिस्र में आएगा, और अपने सामने सब मूरतों को काट डालेगा।" (यशायाह 19:1)

उसने परमेश्वर के आने की बात इसलिए कही, क्योंकि, जैसा कहा जा चुका है, उसी के मार्गदर्शन में नबूकदनेस्सर अपनी सेना वहाँ ले गया। परमेश्वर सचमुच स्वर्ग से प्रकट नहीं हुआ, परन्तु जब उसने मिस्रियों को दण्ड दिया, तब नबूकदनेस्सर की सेना परमेश्वर की सामर्थ्य का एक जीवित प्रतिरूप थी। अब वह कहता है कि जब परमेश्वर शस्त्र-सज्जित होकर वहाँ आया और युद्ध-अभियान चलाया, तब सब मूर्तियाँ नष्ट कर दी जाएँगी; क्योंकि परमेश्वर इस प्रकार दिखाएगा कि जिन देवताओं पर मिस्री भरोसा रखते थे वे झूठे थे, कि वे केवल कल्पनाएँ थीं, जो संकट की चरम घड़ी में कोई सहायता नहीं दे सकती थीं। अब आगे लिखा है, —

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