यिर्मयाह और विलापगीत पर टीका · खण्ड 2 · यिर्मयाह 45

यिर्मयाह 45

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यिर्मयाह 45

एक सौ चौंसठवाँ व्याख्यान

यिर्मयाह 45:1-5

1. योशिय्याह के पुत्र यहूदा के राजा यहोयाकीम के राज्य के चौथे वर्ष में, जब नेरिय्याह का पुत्र बारूक यिर्मयाह के मुख से ये वचन सुनकर पुस्तक में लिख चुका था, तब यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता ने उससे यह वचन कहा,

1. Sermo quem loquutus est Jeremias Propheta ad Baruch filium Neriae cum scriberet sermones istos in libro ex ore Jeremiae anno quarto Joiakim filii Josiae regis

Jehudah, dicendo,

2. हे बारूक, इस्राएल का परमेश्वर यहोवा तुझ से यों कहता है;

2. Sic dicit Jehova, Deus Israel ad to (vel, de to) Baruch,

3. तू ने कहा, हाय मुझ पर! क्योंकि यहोवा ने मेरे दुःख पर शोक बढ़ा दिया है; मैं कराहते कराहते थक गया और मुझे कुछ चैन नहीं मिला।

3. Dixisti, Vae nunc mihi, quia addidit Jehova moerorem super dolorem meum, laboravi (vel, defessus sum) in gemitu meo et requiem non inveni:

4. तू उससे इस प्रकार कहना, यहोवा यों कहता है, देख, जो मैं ने बनाया था उसे मैं आप ढा देता हूँ, और जो मैं ने रोपा था उसे मैं आप उखाड़ फेंकता हूँ, अर्थात् इस सारे देश को।

4. Sic dices ad eum, Sic dicit Jehova, Ecce quae aedificavi ego diruo, et quae plantavi evello, nempe totam terram hanc;

5. और क्या तू अपने लिये बड़ी बड़ी बातें खोजता है? उन्हें मत खोज; क्योंकि देख, यहोवा की यह वाणी है, कि मैं सारे प्राणियों पर विपत्ति डालूँगा; परन्तु जहाँ कहीं तू जाएगा वहाँ मैं तेरा प्राण लूट के समान तुझे दूँगा।

5. Et tu quaeres tibi magnifica? Ne quaesieris; quia ego adducam malum super universam carnem, dicit Jehova; et dabo tibi animam tuam in spolium omnibus locis quocunque tu veneris.

हम कह चुके हैं कि भविष्यद्वाणी की पुस्तकें उनके लेखकों द्वारा उस क्रम में नहीं लिखी गईं जिस क्रम में वे अब पढ़ी जाती हैं। परन्तु जब कोई भविष्यद्वक्ता प्रचार कर चुकता था, और अपनी शिक्षा का सार लिख लेता था, तो वह उसे मन्दिर के द्वारों पर लगा देता था। और ऐसे शास्त्री थे जो उन सारांशों को एकत्र करते थे, और जो ग्रन्थ अब विद्यमान हैं वे इन्हीं से बनाए गए। यही बात मैं अब फिर दोहराता हूँ, क्योंकि कोई आश्चर्य कर सकता है कि यिर्मयाह ने समय के क्रम का पालन नहीं किया; क्योंकि आगे चलकर वह अन्यजातियों के विषय में भविष्यद्वाणी करेगा; और यह निश्चित है कि ये भविष्यद्वाणियाँ कुछ तो यहोयाकीम के राज्य के आरम्भ से पहले, कुछ उसके राज्यकाल में, और कुछ सिदकिय्याह के समय में सुनाई गई थीं। परन्तु जो कारण मैं ने बताया है उसे स्मरण रखना चाहिए, कि यह पुस्तक जो अब हमारे हाथों में है, स्वयं यिर्मयाह ने नहीं लिखी, परन्तु उसमें एकत्र किए गए सारांश हैं, जो बाद में एक ग्रन्थ के रूप में संकलित किए गए।

यहाँ हमें बारूक के विषय में एक विशेष भविष्यद्वाणी बताई गई है, जो, जैसा हम जानते हैं, भविष्यद्वक्ता का लेखक था, और केवल उसका लेखक या लिपिक ही नहीं, वरन् उसका शिष्य भी था।

और यहाँ यिर्मयाह बताता है कि उसे गम्भीरता और कठोरता से डाँटा गया, क्योंकि जब छत्तीसवें अध्याय में वर्णित पुस्तक लिखी जानी थी, तब उसने पर्याप्त दृढ़ मन नहीं दिखाया। कुछ लोग सोचते हैं कि उसके शोक का उचित कारण था, क्योंकि यिर्मयाह ने घोषित किया था कि नगर और प्रजा का विनाश निकट आ पहुँचा है। तब वे सोचते हैं कि बारूक व्याकुल, वरन् शोक से दबा हुआ था, जब उसने सुना कि परमेश्वर का ऐसा भयानक न्याय निकट है; क्योंकि इसमें कोई सन्देह नहीं कि वह अपने देश के प्रति उचित भक्ति रखता था, और परमेश्वर की आराधना के विषय में, और उस प्रजा के कल्याण के विषय में चिन्तित था जिसे परमेश्वर ने सब जातियों में से चुनकर गोद लिया था। परन्तु जैसा हम आगे देखेंगे, वह अधिकतर अपनी ही ओर देखता था, और अपने ही कारण शोक और दुःख में पड़ गया था; और इसी के लिये भविष्यद्वक्ता ने उसे कठोरता से डाँटा। दूसरे लोग एक ऐसी व्याख्या प्रस्तुत करते हैं जो किसी प्रकार सन्तोषजनक नहीं, कि वह भविष्यद्वाणी के वरदान का लालच करता था, जब उसने देखा कि यिर्मयाह मानो ऊपर से ऐसे भारी वचन सुनाता था, और पवित्र आत्मा का साधन था, मानो वह स्वर्गीय न्याय चला रहा हो। इसलिये वे सोचते हैं कि बारूक भविष्यद्वक्ता के पद की व्यर्थ अभिलाषा से उकसाया गया था, और उसे इसलिये डाँटा गया कि उसने उचित से अधिक अपने ऊपर ले लिया। परन्तु यह कल्पना, जैसा मैं कह चुका हूँ, किसी आधार पर टिकी नहीं है।

इसलिये मुझे कोई सन्देह नहीं कि उसे अपने लिये खतरे की आशंका थी, क्योंकि जो सन्देश भविष्यद्वक्ता ने उसे सौंपा था वह अत्यन्त अप्रिय था। क्योंकि जिस अध्याय का मैं ने उल्लेख किया है उसमें हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता राजा के पास नहीं गया, परन्तु उसने पुस्तक की बातें बोलकर लिखवाईं और उसे बारूक को सौंप दिया। इसलिये जब उसने देखा कि वह बिना खतरे के अपना कर्तव्य पूरा नहीं कर सकता, तो वह शिकायत करने और कुड़कुड़ाने लगा; और इसी कारण भविष्यद्वक्ता ने परमेश्वर की आज्ञा से उसकी निर्बलता को डाँटा। तो अर्थ यह है कि बारूक, क्योंकि वह अपने प्राण के लिये डरता था, अत्यधिक शोक से ग्रस्त हो गया, यहाँ तक कि वह सब कष्ट से छुटकारा चाहता था; और परमेश्वर इस अत्यधिक भय से अप्रसन्न हुआ, और उसने अपने भविष्यद्वक्ता को आज्ञा दी कि बारूक को, जैसा वह योग्य था, डाँटे। अब हम शब्दों पर आएँ।

वह वचन जो यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता ने नेरिय्याह के पुत्र बारूक से कहा। हमें ध्यान देना चाहिए कि उस पवित्र जन ने अपने ही शिष्य को नहीं छोड़ा, जिससे वह निस्सन्देह प्रेम करता था; क्योंकि उसने उसे काम में लगाया था, और बारूक ने न केवल उसके लेखक के रूप में, वरन् उसके सहकर्मी के रूप में भी विश्वासयोग्यता से काम किया था। इसलिये जब यिर्मयाह ने बहुत सी बातों में बारूक की विश्वासयोग्यता, सावधानी और परिश्रम को परख लिया था, तो वह निस्सन्देह उसके साथ कृपा से व्यवहार करना चाहता था; परन्तु क्योंकि परमेश्वर चाहता था कि बारूक का यह दोष सुधारा जाए, इसलिये भविष्यद्वक्ता ने यह कर्तव्य पूरा किया जो उसके पद से सम्बन्धित था। इससे हम देखते हैं कि जब उसे परमेश्वर का काम करना था, तब वह मांस और लोहू को भूल गया। समय की परिस्थिति भी जोड़ी गई है: और इससे हम वह निष्कर्ष निकाल सकते हैं जो मैं पहले कह चुका हूँ, कि बारूक जब अपने प्राण के खतरे में था, तब व्याकुल था, और अपनी दशा पर शिकायत करता था, मानो परमेश्वर ने उस पर ऐसा बोझ डाल दिया हो जो उठाने के लिये बहुत भारी और कठिन था; क्योंकि भविष्यद्वक्ता कहता है कि उसे यह आज्ञा तब मिली जब बारूक ने यहोयाकीम के चौथे वर्ष में उन वचनों को पुस्तक में लिखा।

हम संक्षेप में बता चुके हैं कि यह कैसे हुआ; परन्तु यह जोड़ना आवश्यक है कि बारूक बिना कारण नहीं डरा, क्योंकि राजा पहले से ही यिर्मयाह से अप्रसन्न था।

वह वास्तव में पूर्ण रूप से क्रूर तो नहीं था, परन्तु उसके बुरे सलाहकार थे, जो धौंकनी के समान उसके क्रोध को भड़काने के लिये तैयार रहते थे; और परिणाम ने सिद्ध कर दिया कि यह भय निराधार नहीं था; क्योंकि राजा ने चाकू लेकर पुस्तक के टुकड़े टुकड़े कर दिए, और फिर उसे आग में डाल दिया: और यदि उस समय यिर्मयाह मिल जाता, तो निस्सन्देह उसके प्राण का अन्त हो जाता। परन्तु बारूक को कृपालु लोगों ने चेतावनी दी थी कि वह भविष्यद्वक्ता के साथ छिप जाए। इससे हम देखते हैं कि बारूक भयभीत हो गया था, क्योंकि उसका सन्देश ऐसा अप्रिय था, और राजा को चरम सीमा तक भड़काने वाला था, जैसा कि हुआ भी। साथ ही, वह अपनी चिन्ता में अत्यधिक लगा हुआ था, क्योंकि उसे अपना प्राण परमेश्वर के सामने बलिदान के रूप में अर्पित करना चाहिए था। क्योंकि वे सब जो ऐसे पद के लिये बुलाए गए हैं, इस कर्तव्य से बँधे हैं कि साहस के साथ सब खतरों को सहें, यहाँ तक कि आवश्यकता पड़ने पर प्राण की भी परवाह न करें, या कम से कम उसे परमेश्वर की देखरेख में सौंप दें; और जब वे खतरों को निकट देखें, तब भी उन्हें अपने पद के मार्ग पर आगे बढ़ते रहना चाहिए। इसलिये यद्यपि बारूक विश्वासयोग्यता से परमेश्वर की सेवा करना चाहता था, तौभी संघर्ष में वह परीक्षा से पराजित हो गया, यहाँ तक कि वह अपने मार्ग पर आगे बढ़ने के लिये उत्साहित होने की अपेक्षा अपने प्राण के लिये अधिक चिन्तित था। भविष्यद्वक्ता द्वारा बताया गया समय इसी बात से सम्बन्धित है, जब वह कहता है कि बारूक को तब डाँटा गया जब वह उन वचनों को पुस्तक में लिख रहा था।

इसके बाद भविष्यद्वाणी और अधिक स्पष्टता से व्यक्त की गई है, यहोवा बारूक के विषय में यों कहता है।

भविष्यद्वक्ता उस पर टूट पड़ता है और उसे सम्बोधित करता है, ताकि वह उसके मन को पवित्र भय से भर दे, और इस प्रकार उस पापपूर्ण भय को सुधारे जिसके द्वारा वह परमेश्वर की सेवा पूरे उत्साह से करने में रुकावट पाता था। तू ने कहा, डाँट का कारण व्यक्त किया गया है --- तू ने कहा, हाय मुझ पर अब! क्योंकि यहोवा ने मेरे दुःख पर शोक बढ़ा दिया है। बारूक निस्सन्देह अपने पद से हट जाना चाहता था, जैसा उन लोगों के साथ होता है जो बहुत अधिक दबाए जाते हैं, जब वे पाते हैं कि वे अपने काम के योग्य नहीं हैं; वे छिपने के स्थान खोजते हैं और भगोड़े बन जाते हैं। तो बारूक की भावना ऐसी ही थी जब उसने कहा, हाय मुझ पर अब!

किसी भविष्यद्वक्ता का लेखक होना अत्यन्त आदर की बात थी, क्योंकि यह ऐसा ही था मानो वह किसी स्वर्गदूत के मुख से वचन ग्रहण करता हो। इसलिये परमेश्वर के पवित्र सेवक के लिये अपनी दुर्दशा की शिकायत करना अनुचित और लज्जाजनक था, जबकि यह अनोखी कृपा का प्रमाण था कि परमेश्वर ने उसे ऐसे पद के लिये चुनना उचित समझा। तो यहाँ बारूक की कृतघ्नता दोषी ठहराई गई है, जब उसने पुकारकर कहा कि वह दुःखी है, जबकि उसे इसे एक अनोखा सौभाग्य समझना चाहिए था कि परमेश्वर ने उसे उस काम के लिये बुलाया था।

वह कहता है, यहोवा ने मेरे दुःख पर शोक बढ़ा दिया है। यहाँ बारूक की कृतघ्नता और भी अधिक प्रकट होती है; क्योंकि उसने परमेश्वर से विवाद किया, मानो वह कह रहा हो कि उसके साथ कृपा का व्यवहार नहीं किया गया। और इस शिकायत में एक छिपा हुआ उलाहना है; क्योंकि यह ऐसा ही है मानो वह परमेश्वर के न्याय पर प्रश्न उठाता हो, और उस पर अत्यधिक कठोरता का दोष लगाता हो। साथ ही वह शिकायत करता है कि इसका कोई अन्त नहीं था, मानो वह कह रहा हो कि वह पहले ही बहुत कुछ सह चुका है, और परमेश्वर उसके साथ कृपा का व्यवहार नहीं कर रहा, क्योंकि वह विपत्तियों पर विपत्तियाँ बढ़ाता जाता है, यहोवा ने, वह कहता है, मेरे दुःख पर शोक बढ़ा दिया है। ऐसा प्रतीत होता है कि {,}יגוןigun, {,}מכאבmecab से बढ़कर है, क्योंकि बारूक संकेत करता है कि वह पहले ही दुःख सह चुका था, जिसका कारण भी था; परन्तु अब इतने दुःखों पर शोक या विलाप और जोड़ दिया गया था।

इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि बारूक पहले ही संघर्ष में तुरन्त पीछे नहीं हटा, जैसा आलसी लोग करते हैं; परन्तु वह अपने मार्ग के बीच में डगमगा गया। और इस पर सावधानी से ध्यान देना चाहिए; क्योंकि जिन्होंने एक बार साहस के साथ अपना कर्तव्य पूरा किया है, वे अपने को मानो स्वर्गदूतों के समान दृढ़ता से सम्पन्न समझते हैं। इसी से ऐसा होता है कि वे निडर होकर सब खतरों की उपेक्षा करते हैं, क्योंकि वे अपने को अजेय मानते हैं। परन्तु हम देखते हैं कि बारूक कुछ समय तक परमेश्वर का उत्साही और साहसी सेवक रहा; परन्तु जब कोई अन्त दिखाई न दिया, तो वह शिथिल होने लगा। तो आइए, हम निरन्तर परमेश्वर की शरण लेना और उससे अनुग्रह की नई वृद्धि माँगना सीखें, कि वह अपने आत्मा की सामर्थ्य से हमें सम्भाले, और गिर जाने पर हमें उठाए; क्योंकि नहीं तो हम हर क्षण गिरे बिना नहीं रह सकते, तब भी जब हमारी दौड़ गौरवपूर्ण प्रतीत होती है; परन्तु आइए, हम अपनी निर्बलताओं को स्मरण रखते हुए यह सीखें कि प्रभु से प्रतिदिन माँगें कि वह हमें थामे रहे और हमारी ओर अपना हाथ बढ़ाए। बारूक के उदाहरण में हमें यही ध्यान देना है, जब वह कहता है कि उसके दुःख पर शोक बढ़ा दिया गया।

परन्तु इसके बाद वह यही बात और अधिक स्पष्टता से व्यक्त करता है; मैं अपने कराहने में थक गया, वह कहता है, और मुझे कुछ चैन नहीं मिला। इन शब्दों से भी वह गवाही देता है कि वह नाना प्रकार की विपत्तियों के सामने खुला पड़ा था, कि उसके कष्ट अब तक हल्के नहीं हुए थे, या वह खतरों से छुटकारा नहीं पा सका था, और अन्त में वह हार गया, क्योंकि उसे कोई विश्राम नहीं दिया गया। इससे हम वह देखते हैं जो मैं पहले कह चुका हूँ, कि बारूक आरम्भ में ही तुरन्त हठीला नहीं हुआ, परन्तु जब वह पहले ही आगे बढ़ चुका था, और दौड़ का एक भाग पूरा कर चुका था, तब लक्ष्य तक पहुँचने से पहले ही वह परीक्षाओं से पराजित होकर दब गया।

इसके बाद वह जोड़ता है, तू उससे इस प्रकार कहना, इत्यादि। यहाँ भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि वह किसी निजी अप्रसन्नता के कारण बारूक के विरुद्ध नहीं भड़का था, परन्तु उसने केवल परमेश्वर का सन्देश उस तक पहुँचाया था। देख, जो मैं ने बनाया है उसे मैं ढा देता हूँ, और जो मैं ने रोपा है उसे मैं उखाड़ देता हूँ। यहाँ स्पष्ट है कि डाँट का कारण यह था कि बारूक अपने आप से बहुत अधिक प्रेम करता था, और जब परमेश्वर ने उसे संघर्ष में उतरने की आज्ञा दी, तब वह खतरों से बचना चाहता था। यिर्मयाह बताता है कि सारी प्रजा का क्या होने वाला था। यह तुलना वही दिखाती है जो मैं कह चुका हूँ, कि बारूक सार्वजनिक कल्याण की उपेक्षा करके अत्यधिक सावधान था, और इस प्रकार अपने प्राण के विषय में डरपोक और कोमल था। यही कारण है कि परमेश्वर सारी प्रजा का उल्लेख करता है, मानो वह कह रहा हो, "क्या तू चाहता है कि तुझे सारी प्रजा से अधिक महत्त्वपूर्ण समझा जाए? क्या तेरा प्राण सारे समाज के कल्याण से अधिक मूल्यवान है?" बारूक के लिये यह लज्जा की बात थी कि वह अपने आप को सारी प्रजा से, वरन् मन्दिर और परमेश्वर की आराधना से भी बढ़कर समझे। इसलिये जब परमेश्वर की कठोरता अब सारी प्रजा पर पड़ने को तैयार थी, तो चाहे बारूक ने सौ बार भी अपने प्राण को खतरे में डाला होता, तौभी उसे अपने प्राण का इतना अधिक मोल नहीं करना चाहिए था। तो भविष्यद्वक्ता यहाँ दिखाता है कि बारूक अपने विषय में बहुत कोमल था; और क्योंकि वह आत्म-प्रेम से अन्धा हो गया था, इसलिये उसने न तो प्रजा के सार्वजनिक कल्याण पर विचार किया, न मन्दिर और पवित्र देश का ध्यान रखा।

निर्माण करने और रोपने के ये रूपक पवित्रशास्त्र में प्रायः आते हैं, इसलिये मैं यहाँ उन पर अधिक नहीं ठहरूँगा। परन्तु हमें ध्यान देना चाहिए कि यद्यपि परमेश्वर सारे जगत का सृजनहार है, तौभी इस्राएल की प्रजा विशेष रूप से उसकी रचना थी, और इस्राएल का देश भी। क्योंकि परमेश्वर ने उस देश को अपने लिये पवित्र ठहराया था कि उसमें उसकी सेवा की जाए, और उसने उस प्रजा को गोद लिया था। इसलिये वह प्रायः उस प्रजा की तुलना दाख की बारी से करता है: "...मेरी दाख की बारी, मैं ने तुझे रोपा था।" (यिर्मयाह 2:21; यशायाह 5:1-7।)

मैं उद्धरणों को नहीं बढ़ाऊँगा, क्योंकि ऐसी सरल बात में बहुत से पद एकत्र करना मूर्खतापूर्ण दिखावा होगा। तो परमेश्वर ने अपनी प्रजा को बनाया था, क्योंकि वे वहाँ मानो अपने ही निवासस्थानों में रहते थे, और वह देश उसका विश्रामस्थान कहलाता था। उसने अपनी प्रजा को रोपा भी था। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि यहाँ जिस निर्माण और रोपण का उल्लेख है, वे उन विशेष उपकारों से सम्बन्धित हैं जो परमेश्वर ने उस प्रजा को प्रदान किए थे। क्योंकि यद्यपि उसने सारे जगत और सब जातियों को रोपा था, तौभी इस्राएल की प्रजा विशेष रूप से उसका रोपा हुआ पौधा थी, जैसा यशायाह कहता है, "यहोवा का लगाया हुआ, जिससे उसकी महिमा प्रगट हो," अर्थात् यह प्रजा इसलिये रोपी गई थी कि परमेश्वर उनके द्वारा अपनी महिमा प्रगट करे। (यशायाह 61:3)

अब हम उस बात पर आएँ जो यहाँ घोषित की गई है; वह कहता है, जो मैं ने बनाया है उसे मैं ढा देता हूँ, जो मैं ने रोपा है उसे मैं उखाड़ देता हूँ; मानो वह कह रहा हो, "मैं ने अब तक इस प्रजा को अनोखे वरदानों से सुशोभित किया है; क्योंकि मैं ने उन्हें अपने निज भाग के लिये चुना, यह एक पवित्र वंश है, यह याजकों का राज्य है, मैं उनके बीच में वास करता हूँ, मैं ने उनकी रक्षा का भार अपने ऊपर लिया है, मैं उनका पिता हूँ, वे मेरे लिये न केवल पुत्र के समान, वरन् पहिलौठे के समान भी हैं; और फिर यह देश पवित्र है, क्योंकि मैं ने इसमें अपना नाम रखा है: इसलिये मैं ने इस प्रजा को और इस देश को बनाया और रोपा है; परन्तु अब, वह कहता है, मैं ढा रहा हूँ और उखाड़ रहा हूँ।"

इसके बाद आता है, और क्या तू अपने लिये बड़ी बड़ी बातें खोजता है? अब हम भली-भाँति स्पष्ट देखते हैं कि उसने बारूक को क्यों डाँटा; यह इसलिये था कि वह अपने विषय में बहुत अधिक चिन्तित और बहुत डरपोक था; और इसी प्रकार वह अपने कर्तव्य में रुकावट पाता था। तब वह कहता है, और क्या तू अपने लिये खोजता है? निपात {,}לךlac, अपने लिये, यहाँ बल देकर रखा गया है; क्योंकि यहाँ परमेश्वर बारूक को तराजू में रखता है, और साथ ही सारी प्रजा को, मन्दिर और ईश्वरीय आराधना समेत। "क्या तू," वह कहता है, "उन सब से अधिक भारी है? क्या तेरा प्राण मन्दिर से, प्रजा के कल्याण से, और मेरे उन सब वरदानों से जो इतने श्रेष्ठ हैं, अधिक मूल्यवान है?" तो परमेश्वर का अभिप्राय यह था कि इस रीति से बारूक को अपने आप पर लज्जित करे, क्योंकि उसने एक नश्वर जीवन को इतनी अधिक और ऐसी गौरवपूर्ण बातों से बढ़कर समझा। तो वह कहता है, क्या तू अपने लिये बड़ी बड़ी बातें, {,}גדלותgidalut, खोजता है? अर्थात्, "क्या तेरी दशा ऊँची बनी रहे, जब मन्दिर आग से जलाया जा रहा है, जब देश उजाड़ा जा रहा है, जब अधिकांश लोग नाश हो रहे हैं, और बचे हुए लोग देश-निकाले और बन्धुआई में खदेड़े जा रहे हैं? क्या तू ही अकेला पवित्र समझा जाए? क्या तू ही अकेला हानि और कष्ट से मुक्त रहे? देख, क्या यह सब उचित है?" तो यहाँ उसने स्वयं बारूक को ही न्यायी बना दिया।

परन्तु क्योंकि बारूक अब भी अपने आप को बहला सकता था, इसलिये वह तुरन्त उसे रोकता है; मत खोज, वह कहता है, क्योंकि हम जानते हैं कि मनुष्य आत्म-प्रेम के कारण किस प्रकार अपनी ही सुख-सुविधा खोजते हैं। इसलिये कि बारूक अपने मार्ग पर अड़ा न रहे, परमेश्वर उसकी सब महत्त्वाकांक्षी भावनाओं पर अंकुश लगाता है; मत खोज, वह कहता है। इसके बाद वह सान्त्वना का एक आधार जोड़ता है। बारूक को अब तक अपनी आत्म-तुष्टि के कारण, जैसा वह योग्य था, कठोरता से डाँटा गया है; परन्तु अब परमेश्वर उसे क्षमा करता है, और ऐसी शान्ति जोड़ता है जो कुछ अंश तक उसके शोक को हल्का कर सके; क्योंकि देख, वह कहता है, मैं सारे प्राणियों पर विपत्ति डालूँगा, और जहाँ कहीं तू जाएगा वहाँ मैं तेरा प्राण लूट के समान तुझे दूँगा। यहाँ परमेश्वर बारूक को उस कष्टदायक भय से मुक्त करता है जिससे वह ऐसा निर्बल हो गया था कि अपने काम के लिये उचित दृढ़ता नहीं रखता था। तब वह कहता है, "मत डर, क्योंकि जब तेरे चारों ओर सब नाश किए जाएँगे, तब भी तेरा प्राण तेरे लिये सुरक्षित रहेगा।" बारूक सोचता था कि जब प्रजा सुरक्षित और निश्चिन्त रहेगी तब वह नाश हो जाएगा; परन्तु परमेश्वर घोषित करता है कि प्रजा में से कोई सुरक्षित न रहेगा, और जब बाकी सब नाश हो रहे होंगे तब वह सुरक्षित बचाया जाएगा।

मैं सारे प्राणियों पर विपत्ति डालूँगा, वह कहता है। वह वास्तव में संक्षेप में बोलता है, परन्तु बारूक ने अवश्य भली-भाँति विचार किया होगा कि उसने भविष्यद्वक्ता के मुख से क्या ग्रहण किया था, क्योंकि उसे परमेश्वर की सच्चाई और अटल अभिप्राय के विषय में पूरी तरह निश्चय होना चाहिए था। तो परमेश्वर इस तथ्य को मानकर चलता है कि सारी प्रजा और अन्य जातियों का विनाश निकट था। इसके बाद वह जोड़ता है, मैं तेरा प्राण लूट के समान तुझे दूँगा। इस प्रकार की भाषा के विषय में हम पहले बोल चुके हैं। किसी को उसका प्राण लूट के समान देना, मानो उसे तत्काल मृत्यु से छुड़ाना था। जैसे जब सब वस्तुएँ लूट के लिये खुली पड़ी हों, यदि कोई यह या वह छीनकर बच निकले, तो उसके पास कुछ बचा रहेगा; या जैसे यदि कोई जलती हुई आग में से कोई वस्तु खींच ले, तो वह उसके पास सुरक्षित रहेगी; वैसे ही जब सब कुछ ऐसी गड़बड़ी में डाल दिया गया था कि मृत्यु मनुष्यों को चारों ओर से घेर लेती, तो जो सुरक्षित बच निकल सकता था, वह सब खतरे से दूर होकर अपने प्राण को लूट के समान पाता। तो परमेश्वर बारूक को आज्ञा देता है कि वह सुरक्षित रहने के उपकार से सन्तुष्ट रहे, जबकि दूसरे, जैसा मैं कह चुका हूँ, नाश हो रहे थे। अब आगे आता है, ---

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