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यिर्मयाह 44
यिर्मयाह 44:1-7
1. जितने यहूदी मिस्र देश में रहते थे, अर्थात् जो मिग्दोल, तहपन्हेस और नोप में, और पत्रोस देश में रहते थे, उन सब के विषय यिर्मयाह के पास यह वचन पहुँचा,
1. Sermo qui fuit ad Jeremiam ad omnes Judaeos qui habitabant in terra Aegypti, qui habitabant Magdali et in Taphneis et Memphi et in terra Pathros, dicendo,
2. इस्राएल का परमेश्वर, सेनाओं का यहोवा यों कहता है: जो विपत्ति मैं यरूशलेम और यहूदा के सब नगरों पर डाल चुका हूँ, वह सब तुम ने देखी है; और देखो, वे आज के दिन उजाड़ पड़े हैं, और उन में कोई नहीं बसता;
2. Sic dicit Jehova exercituum, Deus Israel, Vos vidistis omne malum quod adduxi super Jerusalem et super omnes urbes Jehudah; et ecce sunt (ipsae) vastitas hodie, et nullus in illis habitans,
3. यह उनकी उस बुराई के कारण हुआ जो उन्होंने मुझे रिस दिलाने के लिये की थी, कि वे जाकर दूसरे देवताओं के लिये धूप जलाते और उनकी उपासना करते थे, जिन्हें न तो वे, न तुम, और न तुम्हारे पुरखा जानते थे।
3. Propter malitiam quam perpetrarunt ad irritandum me ut proficiscerentur ad offerendum suffitum et ad serviendum diis alienis, quos non cognoverant ipsi, neque vos, neque patres vestri.
4. तौभी मैं अपने सब दास नबियों को बड़े तड़के उठकर तुम्हारे पास यह कहने को भेजता रहा, कि हाय, यह घृणित काम मत करो, जिस से मैं घृणा रखता हूँ।
4. Et misi ad vos omnes servos meos, Prophetas, mane surgens et mittens, dicendo, Agedum ne feceritis rem abominationis hujus quam odi:
5. पर उन्होंने न सुना और न अपना कान लगाया कि अपनी बुराई से फिरें और दूसरे देवताओं के लिये धूप न जलाएँ।
5. Et non audierunt et non inclinarunt aurem suam, ut reverterentur a malitia sua, et non offerrent suffitum diis alienis:
6. इस कारण मेरी जलजलाहट और मेरा कोप उण्डेला गया, और यहूदा के नगरों और यरूशलेम की सड़कों पर भड़क उठा; और वे उजाड़ और सुनसान हो गए, जैसे आज के दिन हैं।
6. Et effusa est excandescentia mea et iracundia mea, et exarsit in urbibus Jehudah et in compitis Jerusalem, et fuerunt in vastitatem et in desolationem (sicuti) secundum diem hunc.
7. इसलिये अब यहोवा, सेनाओं का परमेश्वर, इस्राएल का परमेश्वर यों कहता है: तुम क्यों अपने प्राणों के विरुद्ध यह बड़ी बुराई करते हो, कि यहूदा में से क्या पुरुष, क्या स्त्री, क्या बालक, क्या दूधपीता बच्चा, सब को अपने में से नाश करो, यहाँ तक कि तुम्हारा कोई भी बचा न रहे;
7. Et nunc dicit Jehova exercituum, Deus Israel, Quare vos facitis malum hoc grande contra animas vestras ad excidendum vobis virum et mulierem et parvulum et lactantem e medio Jehudah, ut non faciatis residuas vobis reliquias.
यिर्मयाह उन यहूदियों के विरुद्ध पहले ही भविष्यद्वाणी कर चुका था जिन्होंने मिस्र में यह सोचकर शरण ली थी कि उस धनी और प्रायः अजेय देश में उन्हें सुरक्षित और शान्त आश्रय मिलेगा। परन्तु अब वह एक और कारण से उनके विरुद्ध बोलता है, और उन पर पहले से भी अधिक भारी दण्ड की घोषणा करता है; क्योंकि वे न केवल परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध मिस्र में गए थे, वरन् वहाँ पहुँचकर उन्होंने अपने आप को हर प्रकार के अन्धविश्वास से अशुद्ध कर लिया था। इसमें सन्देह नहीं कि परमेश्वर ने समय रहते इसे रोकना चाहा था, जब उसने उन्हें मिस्र जाने से मना किया; क्योंकि वह जानता था कि वे मूर्तिपूजा की ओर, और झूठी तथा व्यभिचारिणी आराधना-विधियों की ओर कितने झुके हुए थे। इसलिये वह नहीं चाहता था कि वे उस देश में बसें, जहाँ वे उसकी आराधना को बिगाड़ना सीख सकते थे। और यही हुआ भी, जैसा कि इस भविष्यद्वाणी से प्रकट होता है। अतः जब उन्होंने सारी लज्जा को त्याग दिया था और अपने आप को अन्यजातियों के अन्धविश्वासों के हवाले कर दिया था, तब नबी ने फिर से गवाही दी कि परमेश्वर उनसे पलटा लेगा।
परन्तु हम देखेंगे कि उसका पाला हठीले मनुष्यों से पड़ा था; क्योंकि उन्होंने उसका कुछ भी आदर न करके प्रचण्ड क्रोध के साथ उस पर आक्रमण किया। अतः जो कुछ कहा गया है उसका सार यह है कि मिस्र में रहनेवाले यहूदी किसी भी क्षमा के योग्य न थे, क्योंकि उन्होंने मानो जान-बूझकर परमेश्वर के अनुग्रह को ठुकरा दिया था, और उनका हठ सर्वथा असाध्य हो गया था। अब हम शब्दों पर विचार करेंगे: कहा गया है कि यिर्मयाह को सब यहूदियों के लिये एक वचन दिया गया। परन्तु परमेश्वर ने यिर्मयाह से उस रीति से बात नहीं की जिस रीति से यहूदियों से; क्योंकि उसने उसे वे वचन सौंपे जिन्हें दूसरों तक पहुँचाने की उसने उसे आज्ञा दी। तो वचन सीधे केवल यिर्मयाह को दिया गया; परन्तु क्योंकि यिर्मयाह लोगों के लिये परमेश्वर का व्याख्याकार था, इसलिये कहा गया है कि वचन सब को समान रूप से दिया गया, यद्यपि वह आरम्भ में, जैसा कहा गया है, केवल यिर्मयाह को सौंपा गया था। क्योंकि परमेश्वर ने यहूदियों को ऐसा आदर नहीं दिया कि वह स्वयं उनसे बात करे, वरन् उसने नबी को अपना दूत बनाकर भेजा। अतः उसने मिस्र में रहनेवाले यहूदियों से कहा, और आगे वह कुछ स्थानों का उल्लेख करता है: पहले मिग्दोल, फिर तहपन्हेस, और तीसरे नोप। पहले नाम का अनुवाद कुछ लोगों ने मग्दल किया है। वह नगर उस समय, जब मिस्र समृद्ध था, बहुत प्रसिद्ध न था, परन्तु अन्यजाति लेखकों ने उसका उल्लेख किया है। तहपन्हेस के विषय में हम कल बोल चुके हैं। नोप को मेम्फिस कहा गया है; और प्रायः सब इस बात पर सहमत हैं कि जिसे इब्री नोप कहते थे वह वही उत्कृष्ट और विख्यात नगर मेम्फिस था, जिसे, जैसा वे समझते हैं, आज के दिन काहिरा (Le Caire) कहा जाता है। अन्त में वह पत्रोस देश का उल्लेख करता है, जिसके विषय में कुछ लोगों का अनुमान है कि वह पेलूसियम के निकट था। परन्तु ऐसे विषय पर मैं अधिक परिश्रम नहीं करता; क्योंकि अन्यजाति लेखकों ने भी इसे एक अप्रसिद्ध और महत्त्वहीन देश माना है। अन्यत्र पत्रोस का उल्लेख एक नगर के रूप में हुआ है, और कुछ लोग समझते हैं कि वह अरब का पेत्रा था। परन्तु इसमें सन्देह नहीं कि नबी यहाँ उस देश की ओर संकेत करता है जिसमें मेम्फिस और अन्य नगर स्थित थे, और जिनमें यहूदी रहते थे।
परन्तु वह ये बातें इस कारण कहता है कि यह प्रश्न उठाया जा सकता था, “यहूदी तो मिस्र में बसे हुए थे, और वह देश इतना विशाल था कि नबी परमेश्वर की आज्ञाएँ सब तक नहीं पहुँचा सकता था।” अतः इसी कारण वह संकेत करता है कि वे मिस्र भर में एक छोर से दूसरे छोर तक सब जगह बिखरे हुए न थे, वरन् केवल एक ही भाग में थे, और ऐसे एकत्र थे कि उसका वचन सब तक पहुँच सके। तो यही कारण था कि उसने उन स्थानों का उल्लेख किया जहाँ यहूदी परदेशी होकर रहते थे।
अब वह डाँट से आरम्भ करता है, क्योंकि वे इतने मूढ़ थे कि उस पलटे को स्मरण न करते थे जो परमेश्वर ने उन पर और सारी जाति पर लिया था।
वे इसी उद्देश्य से जीवित छोड़े गए थे कि परमेश्वर के न्याय को स्वीकार करें, और इस प्रकार सही बुद्धि की ओर लौट आएँ। अतः यहाँ नबी उनकी संवेदनहीनता के लिये उन्हें उलाहना देता है, कि परमेश्वर की कोड़ों की मार के नीचे भी उन्हें कुछ लाभ न हुआ। लोग प्रायः कहते हैं कि मूर्ख मार खाकर बुद्धिमान हो जाते हैं। अतः जब यहूदियों ने इतनी कड़ी ताड़ना पाने के बाद भी मन न फिराया, तो यह चरम कुटिलता का प्रमाण था; क्योंकि यदि बचे हुओं में स्वस्थ बुद्धि का एक कण भी होता, तो वे कम से कम अपनी जाति के अन्तिम विनाश से, और जब नगर और मन्दिर ढा दिए गए, तब तो दीन हो जाते। अतः जब वे उन्हीं दुष्ट चालों पर चलते रहे जिनके कारण परमेश्वर ने इतना भारी दण्ड दिया था, तो यह स्पष्ट था कि वे सर्वथा असुधार्य, और विवेक तथा समझ से रहित थे। नबी के जो वचन हमने पढ़े हैं, उन सब का यही आशय है।
वह पहले कहता है, तुम ने देखा है कि मैं तुम पर और इस देश पर कैसी बड़ी विपत्तियाँ लाया। “तो तुम जानते हो कि जो विपत्तियाँ तुम पर पड़ी हैं, वे सब तुम ने न्याय के अनुसार भोगी हैं; क्योंकि तुम ने ज्ञान के अभाव में पाप नहीं किया, वरन् जब मैंने अपने नबियों के द्वारा तुम्हें यत्न से चिताया, तब भी तुम सदा हठीले बने रहे; इसलिये तुम ऐसे दण्डों के पूरे योग्य ठहरे। अब जब परमेश्वर ने तुम्हें छोड़ दिया, और चाहा कि मानो एक बीज बचा रखने के लिये थोड़े से लोग बचे रहें, तो यह कैसे है कि ये विपत्तियाँ, जो अब भी मानो तुम्हारी आँखों के सामने हैं, तुम्हें स्मरण नहीं रहतीं?” तो अब हम नबी का अभिप्राय समझते हैं।
परन्तु प्रत्येक भाग की जाँच करना उचित होगा; वह कहता है, तुम ने वह सारी विपत्ति देखी है जो मैं (यहाँ बुराई का अर्थ विपत्ति है) यरूशलेम पर और यहूदा के सब नगरों पर लाया हूँ; और देखो, वे अब उजाड़ हैं, और वहाँ कोई नहीं बसता। यहाँ यरूशलेम और मेम्फिस के बीच, यहूदा के नगरों और हेलियोपोलिस तथा सारे पत्रोस देश के बीच एक बलपूर्ण तुलना है। यदि परमेश्वर ने उस पवित्र नगर को नहीं छोड़ा जिसे उसने चुना था, यदि उसने यहूदा के उन नगरों को नहीं छोड़ा जो उसकी रक्षा में थे, तो यहूदियों का यह सोचना कितनी मूर्खता थी कि वे मिस्र के नगरों में सुरक्षित रहेंगे? जब यहूदा के नगर उजाड़ कर दिए गए थे, तो ये किस विशेषाधिकार से सुरक्षित रह सकते थे? तो अब हम समझते हैं कि नबी ने यरूशलेम और यहूदा के नगरों का उल्लेख क्यों किया; यह इसलिये था कि वह यहूदियों की मूढ़ता को प्रकट करे, क्योंकि वे अपने आप को मिस्र में सुरक्षित समझते थे, उस देश में जिससे परमेश्वर सदा घृणा करता आया था।
इसके बाद वह जोड़ता है, उस बुराई के कारण जो उन्होंने मुझे रिस दिलाने के लिये की। वह उन पापों की ओर संकेत करता है जिनके द्वारा यहूदियों ने परमेश्वर का कोप भड़काया था; क्योंकि जिन लोगों से यिर्मयाह बात कर रहा था, वे फिर उन्हीं अन्धविश्वासों में जा पड़े थे जो उनके विनाश का कारण बने थे। यदि नबी सामान्य रूप से बोलता और कहता कि यह विचित्र बात है कि यहूदी उस दण्ड को भूल गए जो परमेश्वर ने सारी जाति पर दिया था, तो उसकी शिक्षा इतनी प्रभावशाली न होती। परन्तु जब वह अब मानो उँगली से दिखाता है कि उन्होंने किस प्रकार अपने ऊपर ऐसी विपत्तियाँ बुला ली थीं, तब वह उन पर और अधिक बल से दबाव डालता है कि वे अपने पागलपन को स्वीकार करें, क्योंकि वे इस प्रकार निरन्तर परमेश्वर को रिस दिलाते थे, और अज्ञानता से पाप नहीं करते थे, वरन् उन्हीं पापों के द्वारा उसे अप्रसन्न करते थे जिनके लिये वे इतना भारी और भयानक दण्ड भोग चुके थे।
यही कारण है कि नबी कहता है, उस बुराई के कारण जो उन्होंने मुझे रिस दिलाने के लिये की, अर्थात्, वह कहता है, जाकर धूप जलाने और पराए देवताओं की उपासना करने के द्वारा। यहाँ जाना उस चिन्ता और परिश्रम को सूचित करता है जो वे झूठी आराधना में लगाते थे। परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था में यहूदियों को एक निश्चित मार्ग दिखाया था जिस पर उन्हें चलना चाहिए था: यदि वे व्यवस्था की शिक्षा में बने रहते, तो वे सही मार्ग पर बने रहते और सही लक्ष्य की ओर आगे बढ़ते। परन्तु कहा गया है कि वे गए, क्योंकि उन्होंने व्यवस्था की उपेक्षा की और इधर-उधर भटकते फिरे, उन लोगों के समान जो बिना उद्देश्य घूमते हैं और नहीं जानते कि कहाँ जा रहे हैं।
अतः यहाँ जाने और व्यवस्था की शिक्षा के अधीन बने रहने के बीच एक विरोध समझना चाहिए। संक्षेप में, जाना यह है कि जब परमेश्वर के वचन की उपेक्षा की जाती है और उसके दिखाए हुए मार्ग को त्याग दिया जाता है, तब मनुष्य भटकती हुई चाल से अपने आप को थका डालता है। यह एक बात है।
फिर वह जोड़ता है, धूप जलाने और पराए देवताओं की उपासना करने को। यहाँ धूप का उल्लेख एक विशेष बात के रूप में हुआ है, फिर जो सामान्य है वह जोड़ा गया है; क्योंकि धूप, जैसा सर्वविदित है, आराधना का प्रमाण था। अतः नबी एक बात के द्वारा अपनी जाति की मूर्तिपूजा को दोषी ठहराता है। परन्तु अन्त में वह दिखाता है कि वे अन्य घृणित कामों में भी लगे हुए थे, कि उन्होंने अपने आप को पराए देवताओं की झूठी आराधना में अर्पित कर दिया था।
यह स्थल, और इसके समान अन्य स्थल, विशेष ध्यान के योग्य हैं; क्योंकि इनसे हम सीखते हैं कि जब कभी मनुष्य परमेश्वर की सच्ची आराधना में अपनी ओर से कुछ मिला देते हैं, और अपनी इच्छा के अनुसार यह-वह कल्पना करते हैं, तब वे परमेश्वर से दूर हो जाते हैं और उसकी सच्ची आराधना से अपने आप को अलग कर लेते हैं; जैसा हमने कहा है, नबी के प्रयुक्त जाने शब्द का ठीक यही आशय है। अतः ज्योंही मनुष्य अपने लिये आराधना की कोई नई विधियाँ गढ़ लेते हैं, यह वैसा ही है मानो वे पीछे की ओर मुड़ गए हों या जान-बूझकर भटक गए हों, क्योंकि वे सही और उचित मार्ग पर नहीं बने रहते। हम दूसरे भाग से यह भी सीखते हैं कि मूर्तिपूजक अपने बचाव में व्यर्थ ही बहाने प्रस्तुत करते हैं। क्योंकि यदि वे जो कुछ विशेष रूप से परमेश्वर का है, और जिसे वह अपने लिये माँगता है, किसी दूसरे को दे देते हैं, तो यह मूर्तिपूजा का पर्याप्त से भी अधिक प्रमाण है; और धूप, जैसा मैंने कहा है, ईश्वरीय आराधना का प्रतीक थी। अतः जब उन्होंने अपनी मूर्तियों के लिये धूप जलाया, तब उन्होंने सच्चे परमेश्वर से उसका आदर छीन लिया, और नए देवता चुन लिए, और उन्हें एकमात्र सच्चे परमेश्वर के अधिकारों से विभूषित किया।
अतः आज के दिन पोप के अनुयायी व्यर्थ और मूर्खता से बच निकलने के मार्ग ढूँढ़ते हैं, जब हम उन पर आरोप लगाते और कहते हैं कि उनके बीच घोर मूर्तिपूजा प्रचलित है: “अरे! हमारा यह अभिप्राय नहीं कि जो आराधना विशेष रूप से एकमात्र सच्चे परमेश्वर की है, उसे सन्तों को, मूर्तियों को दे दें; वरन् हम यह सब परमेश्वर ही पर लागू करते हैं।” जब वे सन्तों, मूर्तियों और चित्रों के लिये धूप जलाते हैं, जब वे मरे हुओं को भी धूप चढ़ाते हैं, तो निश्चय ही इस विषय पर और विवाद करने की कोई आवश्यकता नहीं; और जब वे बचने का प्रयत्न करते हैं, तो जो कुछ भी वे प्रस्तुत कर सकें, उसका खण्डन नबी के इसी एक वचन से हो जाता है, क्योंकि जब वह धूप की बात करता है, तब वह यहूदियों को उनकी मूर्तिपूजा के लिये दोषी ठहराता है।
परन्तु जैसा मैंने कहा है, इसके बाद वह सामान्य रूप से बोलता है और कहता है, और पराए देवताओं की उपासना करने को। फिर आगे आता है, जिन्हें न तो वे जानते थे, न तुम, न तुम्हारे पुरखा। यहाँ नबी अपनी जाति के पाप को और बढ़ाकर दिखाता है, क्योंकि उन्होंने अपना ध्यान अनजाने देवताओं में लगाया था। यहाँ फिर एक विरोध समझना चाहिए, अर्थात् उस परमेश्वर के बीच, जिसने अपनी व्यवस्था के द्वारा, अपने नबियों के द्वारा, इतने आश्चर्यकर्मों और आशीषों के द्वारा अपने आप को प्रकट किया था, और उन कल्पित देवताओं के बीच, जिन्हें यहूदियों ने बिना सोचे और बिना विवेक के गढ़ और रच लिया था। अब यह एक नीच और असहनीय कृतघ्नता का प्रमाण था कि यहूदियों ने सच्चे परमेश्वर को, उसके अपने आप को उन पर प्रकट करने के बाद, त्याग दिया। क्योंकि यदि व्यवस्था कभी दी ही न गई होती, यदि परमेश्वर ने उन्हें अन्य जातियों के समान अपनी ही भूलों में उलझे रहने दिया होता, तो उनका अपराध हल्का होता। परन्तु परमेश्वर ने अपने आप को उन पर इतनी घनिष्ठता से प्रकट किया था कि उसने उन्हें धर्म का एक निश्चित नियम होने के लिये अपनी व्यवस्था देना उचित समझा; उसने उनके बीच अपने आश्चर्यजनक सामर्थ्य के काम भी किए थे। अतः जब सच्चे परमेश्वर का ज्ञान उन पर इतनी अद्भुत रीति से स्पष्ट किया गया था, तो उसे अस्वीकार करना और मूर्तियों के पीछे दौड़ने के लिये उससे दूर हो जाना कितनी बड़ी और कितनी नीच कृतघ्नता थी! जब उन्होंने अपने लिये व्यर्थ देवता और केवल कल्पनाएँ गढ़ लीं! यदि कोई पूछता कि बाल कैसा देवता था, या उनके बाल देवता क्या थे, तो वे कहते कि बाल देवता उनके संरक्षक हैं, जो सर्वोच्च परमेश्वर के पास उनके लिये अनुग्रह प्राप्त करते हैं। परन्तु उन्होंने यह व्यर्थ धारणा कहाँ से पाई थी? यह किसी भी तर्क पर आधारित न होनेवाले अन्धविश्वास के सिवाय कुछ न था।
इस बात पर ध्यान से विचार करना चाहिए; क्योंकि आज के दिन यदि कोई पोप के अनुयायियों से पूछे कि उन्होंने किस अधिकार से अपने लिये आराधना की इतनी भिन्न-भिन्न और इतनी अधिक विधियाँ गढ़ ली हैं, तो वे कहते हैं कि केवल भक्ति, या अच्छा अभिप्राय ही पर्याप्त होगा। तो हम जान लें कि ज्ञान से अलग किया गया धर्म शैतान के खेल और छल के सिवाय और कुछ नहीं। इसलिये यह आवश्यक है कि मनुष्य निश्चय के साथ जानें कि वे किस परमेश्वर की आराधना करते हैं। और मसीह इसी प्रकार परमेश्वर की सच्ची आराधना को व्यर्थ मूर्तियों की आराधना से अलग करता है; वह यहूदियों के विषय में बोलते हुए कहता है, “हम जिसे जानते हैं उसकी आराधना करते हैं।” (यूहन्ना 4:22)
अतः वह कहता है कि यहूदी, अर्थात् वे जो व्यवस्था के निर्देश के अनुसार परमेश्वर की आराधना करते थे, — वह कहता है कि वे जानते थे कि वे किसकी आराधना करते हैं। इस प्रकार वह उन सब अच्छे अभिप्रायों को दोषी ठहराता है जिनमें अन्धविश्वासी लोग आनन्द मनाते हैं, क्योंकि वे नहीं जानते कि वे किसकी आराधना करते हैं। और मैंने कहा है कि धर्म को ज्ञान से अलग नहीं किया जाना चाहिए; परन्तु मैं उसे ज्ञान नहीं कहता जो मनुष्य में जन्मजात है, या जो परिश्रम से प्राप्त किया जाता है, वरन् वह जो व्यवस्था और नबियों के द्वारा हमें सौंपा गया है।
तो अब हम समझते हैं कि नबी क्यों कहता है कि यहूदियों ने अपने आप को उन पराए देवताओं को अर्पित कर दिया था जिन्हें न तो वे और न उनके पुरखा जानते थे।
अब एक ऐसी परिस्थिति आती है जिससे उनकी अभक्ति और भी बढ़ गई, कि परमेश्वर ने उनके पास नबी भेजे थे जिन्होंने उन्हें उनकी भूलों से खींच निकालने के लिये उनकी ओर अपने हाथ बढ़ाए। क्योंकि यदि उन्हें कभी चिताया न भी गया होता, तौभी उनका दोषी ठहराया जाना न्यायसंगत होता; क्योंकि परमेश्वर ने एक बार अपनी व्यवस्था के द्वारा उन्हें दिखा दिया था कि उचित क्या है। अतः व्यवस्था की शिक्षा सब युगों के लिये पर्याप्त होनी चाहिए थी। परन्तु जब परमेश्वर ने एक के बाद एक नबी भेजना कभी बन्द नहीं किया, तो इतनी अधिक और इतनी निरन्तर चेतावनियों को ठुकराना असाध्य हठ का चिह्न था। अतः परमेश्वर ने यह परिस्थिति इसलिये जोड़ी कि यह प्रकट हो जाए कि यहूदी सर्वथा निरुत्तर थे, और सौ और हज़ार मृत्युओं के योग्य थे, क्योंकि उन्होंने उद्धार के सब साधनों को इतनी कुटिलता से तुच्छ जाना था।
परन्तु परमेश्वर कहता है कि उसने अपने सब दासों को उनके पास भेजा था। इस सार्वभौमिक शब्द का अपना विशेष महत्त्व है; क्योंकि यदि एक या दो नबी भी भेजे गए होते, तो यहूदी दोषी सिद्ध हो जाते; क्योंकि व्यवस्था बुरा काम करनेवालों को दोषी ठहराने के लिये दो या तीन से अधिक गवाहों की माँग नहीं करती। (व्यवस्थाविवरण 17:6) परन्तु परमेश्वर यहाँ दिखाता है कि ऐसे लोगों की एक बड़ी संख्या थी, जिनके द्वारा, यदि उनकी बात मानी जाती, तो यहूदी सुरक्षित बचाए जा सकते थे। अतः वे न केवल तीन या चार गवाहों के द्वारा, वरन् एक बड़ी संख्या के द्वारा भी दोषी सिद्ध किए जा सकते थे; क्योंकि नबी निरन्तर एक के बाद एक आते रहे थे। और इस प्रकार वह पूरा हुआ था जिसकी प्रतिज्ञा परमेश्वर ने व्यवस्था में की थी, “मैं तेरे भाइयों के बीच में से एक नबी उठाऊँगा, तू उसी की सुनना; और जो कोई उस नबी की न सुनेगा, वह अपने लोगों में से नाश किया जाएगा।” (व्यवस्थाविवरण 18:18, 19)
क्योंकि परमेश्वर अपनी घोषित व्यवस्था में दिखाता है कि यह उसकी मुख्य आशीषों में से एक होगी, कि वह यहूदियों को कभी नबियों और विश्वासयोग्य शिक्षकों से रहित न छोड़कर उन्हें सदा उनके कर्तव्य के ज्ञान में बनाए रखेगा; अतः यहाँ वह दिखाता है कि उसने जो प्रतिज्ञा मूसा के द्वारा की थी, उसे उसने सचमुच सदा पूरा किया था; क्योंकि वह यह नहीं कहता कि उसने केवल थोड़े से भेजे थे, वरन्, जैसा मैंने कहा है, कि उनकी भरपूर बहुतायत थी; क्योंकि हर युग में कई नबी थे, और आवश्यकता पड़ने पर कुछ दूसरों के उत्तराधिकारी होते थे। परन्तु इसका फल क्या हुआ? इसके बाद वह शिकायत करता है कि सब नबियों को ठुकरा दिया गया था।
परन्तु उनके पाप को और भी जघन्य दिखाने के लिये वह कहता है, बड़े तड़के उठकर और भेजकर।
इस प्रकार की बोली की व्याख्या अन्यत्र दी जा चुकी है। (यिर्मयाह 7:13; यिर्मयाह 11:7) यह रूपकात्मक भाषा है; क्योंकि परमेश्वर न तो उठता है और न स्थान बदलता है; परन्तु यहाँ वह अपने ऊपर वह बात लागू करता है जो विशेष रूप से मनुष्यों की है। क्योंकि जो अपने काम में लगा रहता है, वह सूर्य के उगने की बाट नहीं जोहता, वरन् भोर के उजाले से पहले ही उठ जाता है। इसी प्रकार नबी भी कहता है कि परमेश्वर जागरूक रहा था, क्योंकि वह लोगों के कल्याण के विषय में चिन्तित रहा था।
इस बोलने की रीति से हम आगे यह भी सीखते हैं कि जब परमेश्वर सच्चे और विश्वासयोग्य शिक्षकों को खड़ा करता है, तब वह कितना अमूल्य उपकार करता है; क्योंकि यह वैसा ही है जैसे परिवार का मुखिया तड़के अपने बिछौने से उठता है, अपने बच्चों को जगाता है, और उनकी देखभाल करता है। अतः हम जान लें कि शिक्षा, जब वह हमें दी जाती है, परमेश्वर की पितृ-सुलभ चिन्ता का प्रमाण है, क्योंकि वह नहीं चाहता कि हम नाश हों, वरन् हमारे पास उतर आता है और देखता है कि क्या आवश्यक है, मानो वह हमारे साथ उपस्थित हो, और जैसे पिता अपने बच्चों के प्रति करता है, वैसे ही वह हमारी और हमारे कामों की चिन्ता करता है। यही अर्थ है।
अब वह अपने सन्देश का सार जोड़ता है, इस घृणित काम को मत करो जिससे मैं घृणा रखता हूँ। संक्षेप में परमेश्वर संकेत करता है कि यहूदियों का अपनी भूलों से सही मार्ग पर न लौटना उसके कारण नहीं हुआ था, क्योंकि उसने उनकी ओर अपना हाथ बढ़ाया था, और मानो गिड़गिड़ाकर उनसे विनती की थी कि वे अपने लिये भलाई का उपाय करें, और जान-बूझकर तथा इच्छापूर्वक अपना ही विनाश न ढूँढ़ें; उसने ऐसा व्यवहार किया मानो वह एक पति हो, जो अपनी पत्नी की विश्वासयोग्यता को बनाए रखने की चिन्ता में उससे यों कहे, — “देख, तू जानती है कि मैं अपवित्रता को सहन नहीं कर सकता; इसलिये चौकस रह, कहीं ऐसा न हो कि तू अपने आप को व्यभिचारियों के हाथ बेच दे।”
इसी प्रकार परमेश्वर यहाँ दिखाता है कि उसने अपने सब दासों के द्वारा गवाही दी थी कि हर प्रकार की मूर्तिपूजा उसे अप्रिय है, ताकि यहूदी अपने आप को मूर्तिपूजा से बचाए रखें।
और वह जोड़ता है, पर उन्होंने न सुना, और न अपना कान लगाया कि अपनी बुराई से फिरें और पराए देवताओं के लिये धूप न जलाएँ। यहाँ परमेश्वर यहूदियों पर असाध्य हठ का दोष लगाता है, क्योंकि व्यवस्था की शिक्षा ने उन्हें आज्ञाकारिता में नहीं थामे रखा, और न उन्होंने उस पर ध्यान दिया, यद्यपि नबियों के द्वारा उन्हें बार-बार और भिन्न-भिन्न समयों पर चिताया और समझाया गया था। और उनकी कुटिलता को वह दूसरे भाग के द्वारा और भी स्पष्ट रूप से प्रकट करता है, जब वह कहता है कि उन्होंने अपना कान नहीं लगाया। यदि वह कहता, “उन्होंने नहीं सुना,” तो इतना ही पर्याप्त होता; परन्तु जब वह जोड़ता है, “उन्होंने अपना कान नहीं लगाया,” तब वह, जैसा मैंने कहा है, तिरस्कार से भी बुरी बात प्रकट करता है, अर्थात् यह कि उन्होंने जान-बूझकर नबियों की शिक्षा को ठुकराया, कि उन्होंने नबियों को सुनना या उनकी चेतावनियों पर कान देना तुच्छ जाना, वरन् स्वेच्छा से बहरे बन गए, हाँ, अपने कान बन्द कर लिए, जैसे विद्रोही करते हैं, जिनके विषय में अन्यत्र कहा गया है कि वे अपना मन कठोर कर लेते हैं। तो अब हम इस पद का आशय समझते हैं।
अब वह जोड़ता है, इस कारण मेरा कोप और मेरी जलजलाहट उण्डेली गई, और यहूदा के नगरों में और यरूशलेम की सड़कों में भड़क उठी; और आज के दिन वे उजाड़ और सुनसान हैं। {,}שממהshimme शब्द का अर्थ कभी-कभी विस्मय होता है, जैसा पहले बताया जा चुका है; परन्तु जब वह {,}חרבהcherebe के साथ जुड़ा हो, जैसा यहाँ है, तब उसका अर्थ सुनसानी होता है। जैसे आज के दिन; उस समय एक भयानक उजाड़ प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा था, इसलिये वह फिर इस सत्य की ओर संकेत करता है कि यहूदियों को परमेश्वर की अप्रसन्नता के उस उल्लेखनीय और स्मरणीय उदाहरण से इतना प्रभावित होना चाहिए था कि वे इसके बाद नई मूर्तिपूजाओं में अपने आप को न झोंकते; उन्हें दण्ड के इतने हाल के उदाहरण को स्मरण रखना चाहिए था। अतः जब वे फिर भी अपनी कठोरता में बने रहे, तो यह चरम अभक्ति का प्रमाण था। नबी कहता है कि यहूदियों की कुटिलता बिना दण्ड के नहीं रही थी, क्योंकि परमेश्वर का कोप यहूदा के नगरों पर, वरन् स्वयं यरूशलेम पर, जो परमेश्वर का पवित्रस्थान था, उण्डेला गया था, यहाँ तक कि सब कुछ उजाड़ कर दिया गया था। अतः यहूदियों को एक ओर तो गम्भीरता से विचार करना चाहिए था कि परमेश्वर को इतनी कुटिलता से तुच्छ जानने में उनकी अभक्ति कितनी अक्षम्य थी; और दूसरी ओर उन्हें भय और त्रास रखना चाहिए था, क्योंकि उन्होंने देखा था कि परमेश्वर ने उन लोगों से कैसा पलटा लिया जिन्होंने उसकी शिक्षा को तुच्छ जाना और उसकी आराधना को भ्रष्ट किया था।
फिर वह जोड़ता है, तो तुम अब अपने ही प्राणों के विरुद्ध यह बड़ी बुराई क्यों करते हो, कि यहूदा के मध्य में से क्या पुरुष, क्या स्त्री, क्या बालक, क्या दूधपीता बच्चा, सब को अपने में से नाश करो, यहाँ तक कि तुम्हारा कुछ भी बचा न रहे? यहाँ अन्ततः वाक्य पूरा होता है; क्योंकि जो कुछ हमने अब तक पढ़ा है, वह पाठक को असमंजस में छोड़ देता, यदि यह न जोड़ा गया होता। तब वह कहता है, “जब तुम्हें अपने पुरखाओं के पाप से घृणा करनी चाहिए थी, और जब परमेश्वर का न्याय भयानक रहा था, और वह दण्ड आज के दिन तुम्हें भय से भर देना चाहिए था, तो यह कैसे है कि तुम अपने ऊपर फिर से परमेश्वर का पलटा बुलाना चाहते हो?” वह कहता है, तो अब तुम क्यों, इत्यादि। यह अब बलपूर्ण है, अर्थात् इतने अधिक और इतने उल्लेखनीय उदाहरणों के बाद, इतनी चेतावनियों के बाद, हठीलों पर अत्यन्त भारी दण्ड पड़ने के बाद। वह कहता है, अपने ही प्राणों के विरुद्ध; और इसके द्वारा उसने उन्हें बहुत तीखेपन से चुभाया, उन्हें स्मरण दिलाते हुए कि जो कुछ वे कर रहे थे वह उनके ही विनाश का कारण होगा, मानो वह कहता कि परमेश्वर को उनकी दुष्टता से कोई हानि न होगी, वरन् वे अपने ही विनाश के कर्ता बनेंगे। वह निश्चय ही संकेत करता है, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, कि उनकी अभक्ति बिना दण्ड के न रहेगी; परन्तु साथ ही वह दिखाता है कि परमेश्वर, यदि उचित समझे, तो उनकी अभक्ति को उदासीनता से देख सकता था; क्योंकि वे चाहे सबसे बुरे हों, तौभी वह सिद्ध बना रहेगा। क्योंकि जब मनुष्य परमेश्वर से उसकी न्यायोचित और उचित आराधना छीन लेते हैं, तब उसकी महानता में से कुछ भी कम नहीं होता; क्योंकि वह सदा एक-सा बना रहता है, और मनुष्यों की इच्छा से न बढ़ता है न घटता है। तब नबी दिखाता है कि यहूदी पागलपन से अपने ही विनाश के लिये काम कर रहे थे, जब वह कहता है कि वे अपने ही प्राणों के विरुद्ध बुराई करते थे।
और इसे वह यह जोड़कर और भी पूर्ण रूप से समझाता है, कि यहूदा के मध्य में से क्या पुरुष, क्या स्त्री, क्या बालक, क्या दूधपीता बच्चा, सब नाश किए जाएँ। वह संकेत करता है कि जब तक कोई भी बचा हुआ भाग था, तब तक परमेश्वर अपनी दया प्रकट कर ही रहा था। वे यहूदिया में, हाँ, अपने ही निज भाग में बने रह सकते थे; और वह देश तब तक बसा रह सकता था जब तक सत्तर वर्ष का वह समय पूरा न हो जाता जिसे परमेश्वर ने बँधुआई के लिये ठहराया था। अब नबी दिखाता है कि वे मानो परमेश्वर की भलाई के विरुद्ध लड़ रहे थे, क्योंकि वे अपना ही नाम मिटा देना चाहते थे, कि उन लोगों में से कुछ भी शेष न रहे जिनके लिये परमेश्वर ने अब भी कुछ बीज छोड़ रखा था, कि वे पूरी रीति से नाश न हों।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अनुग्रह कर कि जब तू हम पर अपना पितृ-प्रेम और अपनी चिन्ता निरन्तर प्रकट करना नहीं छोड़ता, — तो अनुग्रह कर कि हम ऐसे संवेदनहीन न हों कि तेरी शिक्षा और तेरी चेतावनियों की ओर से कान बन्द कर लें; वरन् जैसे तू हमारे उद्धार के लिये जागता रहता है, वैसे ही हमारे विश्वास और आज्ञाकारिता की दृढ़ता तुझे ऐसा प्रत्युत्तर दे कि हम तेरे वचन को श्रद्धा से ग्रहण करें, अपने आप को उसके द्वारा चलाए जाने दें, और उस मार्ग पर चलें जो तू ने हमारे सामने रखा है, जब तक कि हम पूर्ण उद्धार तक न पहुँच जाएँ, और उस धन्य मीरास का आनन्द न लें जो हमारे प्रभु मसीह के द्वारा स्वर्ग में हमारे लिये तैयार की गई है। — आमीन।
एक सौ इकसठवाँ व्याख्यान
यिर्मयाह 44:8
8. क्योंकि इस मिस्र देश में, जहाँ तुम रहने के लिये गए हो, तुम अपने हाथों के कामों के द्वारा, अर्थात् दूसरे देवताओं के लिये धूप जलाकर मुझे रिस दिलाते हो, जिस से तुम अपने आप को नाश करो, और पृथ्वी की सब जातियों के बीच शाप और नामधराई का कारण बनो?
8. Ad provocandum me in operibus manuum vestrarum, ad offerendum suffitum diis alienis in terra Aegypti, ad quam vos profecti estis, ut habitetis illic, ut excidium paretis vobis (vel, ut excidatis vos,) et ut sitis in maledictum et probrum inter cunctas gentes terrae.
पिछले व्याख्यान में मुझे नबी के विषय को बीच में ही रोकना पड़ा था; क्योंकि यह पद पिछले पद पर निर्भर है, और उसके साथ मिलाकर पढ़ा जाना चाहिए। नबी ने पूछा था कि यहूदी क्यों स्वेच्छा से अपने आप से सुरक्षा की हर आशा काट रहे थे, और अपना ही विनाश ढूँढ़ रहे थे। अब वह इस बात को और भी पूर्ण रूप से प्रकट करता है, अर्थात् यह कि वे अपने अन्धविश्वासों के द्वारा परमेश्वर का कोप भड़का रहे थे। फिर वह सब विपत्तियों का कारण बताता है, — मूर्तिपूजाओं के द्वारा परमेश्वर की सच्ची आराधना का अशुद्ध किया जाना।
हम यहाँ देखते हैं कि जब मनुष्य परमेश्वर को तुच्छ जानते हैं और बुराई करने में अपने को हर प्रकार की छूट दे देते हैं, तब पाप करने का कोई अन्त नहीं रहता। परमेश्वर नहीं चाहता था कि यहूदी मिस्र को जाएँ; क्योंकि उसने प्रतिज्ञा की थी कि वह मानो अपने ही पंखों के तले उनका पालन-पोषण करेगा; और इस प्रकार वह उन पर दया दिखाना चाहता था, कि वे उस देश में भी, जो उस समय दुःखी और उजाड़ था, सुरक्षित बने रहें। परन्तु उसकी आज्ञा के विरुद्ध वे मिस्र में चले गए। जब वे वहाँ पहुँचे, तो मिस्रियों की कृपा पाने के लिए उन्होंने व्यर्थ अन्धविश्वासों से अपने आप को अशुद्ध कर लिया। यहूदा देश में वे बिना किसी जोखिम के शुद्धता से परमेश्वर की आराधना कर सकते थे। परमेश्वर की कृपा पर अविश्वास करके वे मिस्र को भाग गए; और मनुष्यों के भय ने उन्हें अपने धर्म का इन्कार करने तक पहुँचा दिया। इस से हम देखते हैं कि एक बुराई से दूसरी बुराई कैसे उत्पन्न होती है; जब यहूदियों ने उस अन्यजाति राष्ट्र की कृपा की लालसा की, तब उन्होंने बहुत-से अभक्तिपूर्ण अन्धविश्वासों से अपने आप को अशुद्ध कर लिया।
यही वह पाप है जिसकी ओर भविष्यद्वक्ता अब संकेत करता है, — अपने हाथों के कामों के द्वारा मुझे रिस दिलाने को, वह कहता है। यहाँ उन कामों के बीच, जिनकी आज्ञा परमेश्वर ने दी थी, और उन कामों के बीच, जिन्हें मनुष्यों ने अपने लिए गढ़ लिया था, एक विरोध समझना चाहिए। वेदी और सारा मन्दिर वास्तव में मनुष्यों के हाथ और कारीगरी से बने काम थे; परन्तु जब कि परमेश्वर ने वेदी बनाने और मन्दिर बनवाने की आज्ञा दी थी, इसलिए मन्दिर ठीक-ठीक कहें तो मानवीय नहीं, वरन् ईश्वरीय काम था, क्योंकि उसकी आज्ञा दी गई थी।
परन्तु परमेश्वर की आराधना के लिए मनुष्य अपनी ओर से जो कुछ गढ़ लेते हैं, वही उनके हाथों का काम कहलाता है; क्योंकि वे बातें स्वयं आविष्कार करते हैं, और केवल अपनी ही कल्पनाओं के पीछे चलते हैं; वे इस पर ध्यान नहीं देते कि परमेश्वर को क्या भाता है, वरन् अपनी कल्पनाओं को खुली छूट देते हैं, यहाँ तक कि अपनी ही इच्छा के अनुसार जैसी आराधना उन्हें अच्छी लगे, उसे मिला-जुला देते हैं। तो यही कारण है, और इसी अर्थ में भविष्यद्वक्ता कहता है कि यहूदियों ने अपने हाथों के कामों से परमेश्वर को रिस दिलाई: जब वे अन्यजातियों के आचरणों और भ्रष्टताओं से जुड़ गए, तब उन्होंने उसकी उचित आराधना को भ्रष्ट कर दिया और सच्चे धर्म से फिर गए।
फिर वह आगे कहता है, पराए देवताओं के लिए धूप जलाने को। जैसा पहले कहा जा चुका है, भविष्यद्वक्ता एक विशेष बात के अन्तर्गत सामान्य बात को सम्मिलित करता है, क्योंकि यहूदियों ने केवल धूप जलाने से ही नहीं, वरन् और भी नाना प्रकार के अन्धविश्वासों के द्वारा पाप किया था। परन्तु अंश को सम्पूर्ण के स्थान पर रखकर वह स्पष्ट रूप से जताता है कि जब उन्होंने मूर्तियों की पूजा की, तब उन्होंने सच्चे परमेश्वर का इन्कार किया। और फिर वह कहता है, मिस्र देश में, जिसमें तुम रहने के लिए आए हो। वह उनके उस बहाने को छीन लेता है जो वे बना सकते थे, कि वे भय के कारण विवश हुए, क्योंकि वे अभागे निर्वासित थे, और देखते थे कि वह घमण्डी जाति उनके अपने धर्म को सहन नहीं करेगी। भविष्यद्वक्ता कहता है कि वे मिस्र में तब आए जब परमेश्वर ने उन्हें यहूदा देश में बने रहने की आज्ञा दी थी। अतः यह बहाना स्वीकार नहीं किया जा सकता था कि संकट से भयभीत होकर उन्होंने मिस्रियों को प्रसन्न करना चाहा, क्योंकि उन्होंने स्वयं अपने को उस दासत्व में डाला, जबकि वे यहूदा देश में शुद्धता से परमेश्वर की आराधना करने के लिए स्वतन्त्र रह सकते थे।
यही कारण है कि वह कहता है कि वे वहाँ परदेशी होकर रहने के लिए मिस्र में आए।
अन्त में वह कहता है, कि तुम नाश किए जाओ। वाक्य-रचना तो भिन्न है, परन्तु अर्थ स्पष्ट है। संक्षेप में वह जताता है, जैसा उसने पिछले पद में कहा था, कि वे स्वेच्छा से, और मानो जान-बूझकर, सिर के बल अपने ही विनाश में कूद पड़े। फिर वह कहता है, और तुम सब जातियों के बीच शाप और नामधराई का कारण बनोगे। इन शब्दों से उसका अभिप्राय यह है कि उनका विनाश स्मरणीय होगा; और यह इससे भी अधिक कठोर था कि उनका स्मरण उनके जीवन के साथ ही गाड़ दिया जाए। परन्तु भविष्यद्वक्ता कहता है कि उनकी मृत्यु ऐसा दृष्टान्त होगी कि सब लोग उन्हें घृणित समझेंगे। संक्षेप में, वह घोषणा करता है कि अपनी मृत्यु के बाद भी वे हर प्रकार की निन्दा के पात्र बने रहेंगे। आगे लिखा है, यिर्मयाह 44:9-10
9. जो जो बुराइयाँ तुम्हारे पुरखाओं ने, और यहूदा के राजाओं ने, और उनकी स्त्रियों ने, और तुम ने स्वयं, और तुम्हारी स्त्रियों ने यहूदा देश में और यरूशलेम की सड़कों में की थीं, क्या तुम उन्हें भूल गए हो?
9. An obliti estis malorum patrum vestrorum, et malorum regum Jehudah, et malorum uxorum ejus, et malorum vestrorum, et malorum uxorum vestrarum, quae fecerunt in terra Jehudah et in cornpitis Jerusalem?
10. आज के दिन तक उनका मन दीन नहीं हुआ, और न वे डरे, और न मेरी उस व्यवस्था और उन विधियों पर चले जो मैं ने तुम्हारे और तुम्हारे पुरखाओं के सामने रखी थीं।
10. Et non humiliati sunt (vel, attriti) usque ad hunc diem, et non timuerunt, et non ambulaverunt in lege mea et in statutis meis, quae posueram coram facie vestra, et coram facie patrum vestrorum.
भविष्यद्वक्ता अब यह दिखाता है कि यहूदियों की संवेदनहीनता कितनी अत्यन्त लज्जाजनक थी, कि उन्होंने यह स्वीकार नहीं किया कि परमेश्वर ने उन अन्धविश्वासों का, जिनमें वे पहले लिप्त रहे थे, अत्यन्त कठोरता और भारी रीति से दण्ड दिया था। साथ ही, यदि हम प्रयुक्त शब्द पर ध्यान दें, तो ऐसा लगता है कि "बुराइयों" से वह दण्डों को नहीं, वरन् उन दुष्ट कामों को समझता है जिनके द्वारा उन्होंने परमेश्वर को रिस दिलाई थी। और इस पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि कुछ व्याख्याकार इसका अनुवाद यों करते हैं, "क्या तुम अपनी और अपने पुरखाओं की विपत्तियों को भूल गए हो?" अर्थात् परमेश्वर ने तुम्हें कितनी कठोरता से दुःख दिया? परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता {,}רעותrout से उनके पापों को समझता है, जिनके द्वारा उन्होंने अपने आप को परमेश्वर के न्याय के अधीन कर दिया था; क्योंकि तुरन्त आगे लिखा है, जो उन्होंने यहूदा देश में और यरूशलेम की सड़कों में किए, या उनसे हुए। परन्तु यद्यपि इस शब्द से उसका अभिप्राय लोगों के पापों से है, तौभी इसमें कोई सन्देह नहीं कि वह उन दण्डों को भी सम्मिलित करता है जिनके द्वारा उन्हें जान लेना चाहिए था कि जिस अभक्ति में वे अत्यन्त हठपूर्वक बने रहे, वह परमेश्वर को अप्रिय लगी थी।
अतः जब भविष्यद्वक्ता कहता है, क्या तुम अपनी और अपने पुरखाओं की बुराइयों को भूल गए हो? तो वह यह मानकर चलता है कि यह भली भाँति ज्ञात था कि परमेश्वर ने उनके पापों का बदला उनसे लिया था; क्योंकि वह यहूदियों को उनकी समृद्धि में सम्बोधित नहीं करता, वरन् उस समय जब वे अपने देश से भागे हुए थे और स्वर्ग के शाप के अधीन थे। तो जब कि वे प्रत्यक्ष रूप से परमेश्वर के द्वारा दोषी ठहराए गए थे, भविष्यद्वक्ता उचित ही उनसे पूछता है, "क्या तुम भूल गए हो कि तुम अपने पुरखाओं और अपने राजाओं के पापों के कारण, अर्थात् उन पापों के कारण जो उन्होंने किए थे, दोषी ठहराए गए हो?" यह उसने इसलिए पूछा, क्योंकि यह एक भयानक जड़ता थी कि यद्यपि नगर उलट दिया गया था और मन्दिर जला दिया गया था, तौभी उन्होंने अपने अन्धविश्वासों को नहीं छोड़ा, विशेषकर जब परमेश्वर का इतना असाधारण पलटा उनके वंशजों को दस युगों तक भी भय और आज्ञाकारिता में बनाए रखने के लिए पर्याप्त होना चाहिए था। इस प्रकार हम देखते हैं कि दण्ड पापों के साथ जुड़ा हुआ है।
वह कहता है, यहूदा के राजाओं की और उनकी स्त्रियों की। सम्बन्धवाचक शब्द एकवचन है, "उसकी स्त्रियाँ"; परन्तु निःसन्देह इसका सम्बन्ध प्रजा से है। कुछ लोग पढ़ते हैं, "उनमें से हर एक की"; परन्तु इसकी कोई आवश्यकता नहीं, क्योंकि यह एकवचन है, जो एक समूहवाचक संज्ञा, अर्थात् यहूदा, की ओर संकेत करता है। फिर वह कहता है, जो उन्होंने किए। इसे केवल स्त्रियों तक सीमित नहीं करना चाहिए, (न यह उपयुक्त ही है,) वरन् इसका सम्बन्ध सब यहूदियों से, यहूदा के राजाओं से, और स्त्रियों से भी है, — जो उन्होंने तब यहूदा देश में और यरूशलेम की सड़कों में किए।
जब वह यरूशलेम की सड़कों का उल्लेख करता है, तो वह उनकी दुष्टता को और बढ़ाकर दिखाता है।
क्योंकि हम जानते हैं कि वह नगर मानो परमेश्वर का पार्थिव पवित्रस्थान था। अतः उस स्थान को अशुद्ध करना, जिसे परमेश्वर ने अपने लिए पवित्र किया था, अत्यन्त लज्जाजनक अभक्ति थी। सारा यहूदा देश वास्तव में उसके अधिकार और सामर्थ्य के अधीन था, परन्तु उसने उस नगर पर, और विशेषकर सिय्योन पर्वत पर, असाधारण विशेषाधिकारों के साथ अनुग्रह किया था। अतः जब भविष्यद्वक्ता कहता है कि यरूशलेम उनके अन्धविश्वासों से अशुद्ध किया गया था, तो वह उनके पाप की गम्भीरता को और बढ़ाकर दिखाता है।
इसके बाद वह बताता है कि उन लोगों का हठ कितना बड़ा था, वे आज के दिन तक दीन नहीं हुए, वह कहता है, यद्यपि वे परमेश्वर की छड़ियों से अत्यन्त कठोरता से मारे गए थे। जैसा पुरानी कहावत है, मूर्ख भी मार खाकर बुद्धिमान हो जाते हैं। तो जब यहूदियों को परमेश्वर के हाथ से इतनी भारी ताड़ना मिली थी, और उन्होंने अत्यन्त कठोरता का अनुभव किया था, तो क्या उन्हें यह विचार नहीं करना चाहिए था कि वे किस योग्य थे? परन्तु भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि उनकी दुष्टता का कोई उपचार नहीं रहा था, क्योंकि यद्यपि वे कुचले गए थे, तौभी वे दीन नहीं हुए, उन लोगों के समान जो टेढ़े स्वभाव के होते हैं, जो सौ बार कुचले जाने पर भी सुधारे नहीं जा सकते।
फिर भविष्यद्वक्ता यहूदियों को उनके हठ के लिए उलाहना देता है, क्योंकि बड़ी से बड़ी विपत्ति भी उन्हें आज्ञाकारिता तक नहीं ला सकी थी।
अतः वे उस दिन तक दीन नहीं हुए, और न वे डरे। यहाँ भय का सम्बन्ध भी उन विपत्तियों से जोड़ना चाहिए जिनका उन्होंने अनुभव किया था, क्योंकि परमेश्वर ने भली भाँति दिखा दिया था कि वह उनकी अभक्ति से अत्यन्त अप्रसन्न हुआ था। तो जब परमेश्वर का भयानक न्याय सब पर प्रकट हो चुका था, भविष्यद्वक्ता यहाँ उनकी मन्दबुद्धि को दोषी ठहराता है, क्योंकि वे ऐसे सचेत मन में वापस नहीं लाए गए थे कि परमेश्वर का भय मानें।
अब वह हठ का एक और उदाहरण जोड़ता है, कि वे परमेश्वर की व्यवस्था और उसकी आज्ञाओं पर नहीं चले थे। इस प्रकार वह दिखाता है कि उनका हठ दोहरा था, कि उन्होंने न तो उसकी शिक्षा से कोई लाभ उठाया था, और न उसके दण्डों की परवाह की थी। स्वयं व्यवस्था ही उनके लिए वह नियम थी जिसके अनुसार उन्हें परमेश्वर की आराधना करनी थी, और उन्हें यह कहीं और नहीं खोजना चाहिए था कि उन्हें क्या करना है। तो जब व्यवस्था में उनके पास सच्चे धर्म के विषय में प्रकाशन था, तो अपनी ही इच्छा से उससे फिर जाना और अपने आप को हर प्रकार के भ्रमों के हवाले कर देना असहनीय तिरस्कार था। परन्तु भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि वे अत्यन्त अशिक्षणीय थे, क्योंकि उन्होंने न केवल व्यवस्था का सारा आदर त्याग दिया था, वरन् परमेश्वर के हाथ को भी तुच्छ जाना था, और किसी भी दण्ड के द्वारा सुधारे जाने से इन्कार किया था।
और अधिक दिखाने के लिए कि उन्होंने निरी दुष्टता के कारण पाप किया था, वह कहता है, वे न मेरी व्यवस्था पर चले और न मेरी विधियों पर। यह दूसरा वाक्यांश अनावश्यक-सा लगता है; परन्तु भविष्यद्वक्ता यहाँ व्यवस्था की स्पष्ट शिक्षा की प्रशंसा करता है, मानो परमेश्वर ने कहा हो कि उसने केवल संक्षेप में ही यह नहीं दिखाया था कि क्या सत्य और उचित है, वरन् बहुत-सी विधियों के द्वारा यहूदियों को सिखाया भी था, जिससे उनके पास अपनी अज्ञानता का कोई बहाना न रहे। और वह दूसरे शब्दों में यही बात पुष्ट करता है, जब वह कहता है कि उसने ये विधियाँ उनके सामने रखी थीं; क्योंकि इन शब्दों से वह जताता है कि व्यवस्था में कुछ भी अस्पष्ट नहीं है, और इसलिए यहूदी ज्ञान के अभाव से भटके नहीं थे; क्योंकि जब मनुष्यों की अभक्ति दोषी ठहराई जाती है, तब वे सदा टालमटोल के द्वारा अपने पापों को हलका करते हैं। अतः भविष्यद्वक्ता कहता है कि यहूदी निरुत्तर थे, क्योंकि सच्चे धर्म का नियम उनकी आँखों के सामने रखा गया था।
अब यह खण्ड इस बात की गवाही देता है कि व्यवस्था की शिक्षा सन्दिग्ध नहीं है, जैसा कुछ अधर्मी मनुष्य कहते हैं, जो मानते हैं कि पवित्रशास्त्र को मोम की नाक के समान किसी भी ओर मोड़ा जा सकता है।
परन्तु परमेश्वर घोषणा करता है कि उसने दोअर्थी बात नहीं कही थी। तो जब भविष्यद्वक्ता दृढ़ता से कहता है कि व्यवस्था यहूदियों की आँखों के सामने रखी गई थी, जिससे वे निश्चय ही परमेश्वर की इच्छा को जान लें, तो हमें आज के दिन यह दृढ़ता से मानना चाहिए कि सुसमाचार में, जो मसीह के आगमन के द्वारा हम पर स्पष्ट रूप से प्रकट किया गया है, कुछ भी अस्पष्ट नहीं है, वरन् जहाँ तक आवश्यक है, समस्त ज्ञान के भण्डार हम पर प्रकट कर दिए गए हैं; इसलिए जो लोग अब भटकते हैं, वे व्यर्थ ही यह बहाना करते हैं कि वे इसलिए भटकते हैं क्योंकि परमेश्वर की इच्छा उनसे छिपी है; क्योंकि वे किसी और रीति से नहीं, केवल कपट करके और जान-बूझकर अपनी आँखें बन्द करके ही भटक सकते हैं, कहीं ऐसा न हो कि सूर्य का प्रकाश उन तक पहुँच जाए। तौभी हम यह जान लें कि परमेश्वर हम पर जितनी अधिक स्पष्टता से प्रकट किया गया है, उतना ही अधिक भारी पाप हम तब करते हैं जब हम उसकी सच्ची आराधना और सेवा से फिर जाते हैं; क्योंकि उसने अपने वचन में ऐसी कोई बात नहीं छोड़ी जो उसकी ग्रहणयोग्य आराधना करने के लिए आवश्यक हो। तो जब भक्तिपूर्ण जीवन का नियम हमारी आँखों के सामने है, यदि हम उसका पालन न करें, तो यह उलाहना हम पर लागू होता है कि परमेश्वर ने अपनी विधियाँ हमारी आँखों के सामने रखी हैं। अब आगे लिखा है, —
यिर्मयाह 44:11-12
11. इस कारण इस्राएल का परमेश्वर, सेनाओं का यहोवा यों कहता है, देखो, मैं तुम्हारी हानि करने के लिए, और सारे यहूदा का अन्त कर डालने के लिए तुम्हारे विरुद्ध अपना मुख किए हुए हूँ।
11. Propterea sic dicit Jehova exercituum, Deus Israel, Ecce ego pono faciem meam contra vos in malum et ad excidendum totum Jehudah;
12. और बचे हुए यहूदियों को, जिन्होंने मिस्र देश में जाकर वहाँ परदेशी होकर रहने का हठ किया है, मैं ले लूँगा, और वे सब मिट जाएँगे, और मिस्र देश में गिरेंगे; वे तलवार और महँगी से मिट जाएँगे; छोटे से लेकर बड़े तक वे तलवार और महँगी से मरेंगे; और वे शाप, और विस्मय, और कोसने, और नामधराई का कारण बनेंगे।
12. Et tollam reliquias Jehudah, quae posuerunt faciem suam ut venirent in terrain
Aegypti ad peregrinandum illic, et consumentur omnes in terra Aegypti, cadent in gladio, fame consumentur a parvo usque ad magnum; in gladio et fame morientur, et erunt in execrationem et stuporem et in maledictum et in opprobrium.
वह फिर हठीलों पर दण्ड की घोषणा करता है; और यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि ये धमकियाँ इतनी बार दोहराई गईं, क्योंकि उसका काम ऐसे क्रूर और विद्रोही मनुष्यों से पड़ा था। अतः उसने उन पर परमेश्वर के न्याय की घोषणा इसलिए की, क्योंकि वे ढिठाई से उसका उपहास करते थे; और आगे जो कुछ आता है उससे और भी स्पष्ट हो जाएगा कि ऐसी प्रचण्डता कितनी आवश्यक थी।
और पहले तो भविष्यद्वक्ता संक्षेप में दिखाता है कि वे सब नाश होंगे जिन्होंने फिर भी झूठी कल्पना की थी कि मिस्र को भागे बिना वे किसी और रीति से सुरक्षित नहीं रह सकते।
अतः यिर्मयाह यहाँ उनके झूठे और व्यर्थ भरोसे को डाँटता और दोषी ठहराता है। और फिर वह रीति बताता है जब वह कहता है, मैं यहूदा के सब बचे हुओं को, जिन्होंने मिस्र में आने का हठ किया है, उठा ले जाऊँगा, इत्यादि। इन और आगे के शब्दों से परमेश्वर जताता है कि यहूदियों ने मिस्र में छिपने के स्थान व्यर्थ ही खोजे थे, क्योंकि वहाँ वह उन पर वह दण्ड डालेगा जिसके वे योग्य थे। वह तलवार और महँगी का नाम लेता है; तीसरे प्रकार को वह यहाँ छोड़ देता है, परन्तु शीघ्र ही उसका उल्लेख करेगा। फिर वह कहता है कि वे कुछ तो तलवार से और कुछ महँगी से नाश होनेवाले थे, और अधिक बल देकर बोलने के लिए वह भिन्न-भिन्न शब्दों का प्रयोग करता है, वे महँगी से मिट जाएँगे, वे तलवार से गिरेंगे, वे सब मिट जाएँगे, और फिर वह कहता है, छोटे से लेकर बड़े तक।
अन्त में वह कहता है, और वे शाप का कारण बनेंगे। हम अन्यत्र कह चुके हैं कि {,}אלהale शब्द कभी-कभी शाप का अर्थ देता है, यद्यपि इसका ठीक अर्थ शपथ है; और इसका कारण यह है कि मनुष्य शपथ खाते समय प्रायः एक शाप जोड़ देते हैं, "परमेश्वर मुझे शाप दे," — "मैं नाश हो जाऊँ।" फिर वह कहता है कि यहूदी शाप का एक दृष्टान्त बन जाएँगे; क्योंकि शपथ खाते समय यह सामान्य रूप होगा, "परमेश्वर मुझे वैसे ही नाश करे जैसे उसने यहूदियों को नाश किया।" इसके बाद वह कहता है, विस्मय, क्योंकि उनकी विपत्ति को देखते ही सब भयभीत हो जाएँगे। अन्त में आता है, कोसना और नामधराई, जिनके विषय में हम पहले कह चुके हैं। अब हम आगे बढ़ें, —
यिर्मयाह 44:13
13. क्योंकि जैसा मैं ने यरूशलेम को तलवार, महँगी और मरी के द्वारा दण्ड दिया है, वैसा ही मिस्र देश में रहनेवालों को भी दण्ड दूँगा:
13. Et visitabo super eos qui habitant in terra Aegypti, quemadmodum visitavi super Jerusalem, in gladio et fame et peste (hic exprimitur tertia species.)
वह इस पद में उस बात की पुष्टि करता है जो उसने पिछले पद में कही थी, कि वह फिर से अभक्ति का बदला लेगा, जैसा उसने पहले लिया था। जब यहूदी समृद्धि से मतवाले हो गए थे, तब उन पर पहले भी अत्यन्त भारी विपत्ति आई थी; परन्तु अब, जब परमेश्वर उनकी जड़ता को उनसे झाड़ देना चाहता था, भविष्यद्वक्ता उचित ही उन्हें उन विपत्तियों का स्मरण दिलाता है जो उन्होंने सही थीं: तो जैसे मैं ने यरूशलेम को दण्ड दिया, वैसे ही मैं उन्हें दण्ड दूँगा जो मिस्र में रहते हैं। परन्तु यह तर्क बड़े से छोटे की ओर भी है; क्योंकि यदि परमेश्वर ने उस पवित्र नगर को नहीं छोड़ा, जिसमें उसने निवासस्थान चुना था, तो वह मिस्र को कैसे छोड़ेगा? क्योंकि मिस्र इस योग्य नहीं था कि परमेश्वर उसकी सुधि ले। हम जानते हैं कि वह एक अपवित्र और शापित देश था। अतः यहूदियों के लिए यह सबसे बड़ा पागलपन था कि वे मिस्र में सुरक्षित रहने की आशा करें, जबकि वे उस पवित्र देश में सुरक्षित नहीं रह सके, जो परमेश्वर का पवित्रस्थान था, जो उनका निज भाग था, वरन् जो परमेश्वर का विश्रामस्थान भी था।
अब हम भविष्यद्वक्ता का उद्देश्य देखते हैं; क्योंकि उसने नगर और यहूदा देश का विनाश उनके सामने रखा, जिससे वे जान लें कि जब तक वे उसकी आज्ञा के विरुद्ध मिस्र में रहते हैं, तब तक वे परमेश्वर के हाथ से नहीं बच सकते, क्योंकि परमेश्वर वहाँ उनके लिए उससे भी कठोर न्यायी होगा जैसा वह पहले यहूदा देश में रहा था। आगे लिखा है, यिर्मयाह 44:14
14. जिससे बचे हुए यहूदियों में से, जो मिस्र देश में परदेशी होकर रहने के लिए आए हैं, कोई भी न बचेगा और न रह जाएगा कि यहूदा देश में लौट जाए, जहाँ लौटकर रहने की वे लालसा करते हैं: क्योंकि जो बचकर भागेंगे उनको छोड़ कोई भी न लौटेगा।
14. Et non erit qui evadat (qui sit residuus) inter reliquias Jehudah quae venerunt ad peregrinandum hic (nam erat Propheta in Aegypto) nempe in terra Aegypti, et ad revertendum in terram Jehudah, ad quam ipsi elevant animam suam (vel, elevant animas suas) ad revertendum ut habitent illic, quia non revertentur nisi qui evaserint.
ऐसा लगता है कि भविष्यद्वक्ता अपनी ही बात से असंगत है; क्योंकि पद के आरम्भ में वह कहता है कि कोई भी शेष न रहेगा, परन्तु अन्त में वह एक अपवाद जोड़ता है, कि थोड़े-से लोग जीवित रहेंगे, जो भागेंगे, और किसी चमत्कार के द्वारा मृत्यु से बच निकलेंगे। कुछ लोग यह विचार रखते हैं कि अभक्त तिरस्कार करनेवालों में से कोई भी शेष न रहेगा, परन्तु फिर भी कुछ लोग जीवित बचाए जाएँगे, अर्थात् वे जो अपनी इच्छा के विरुद्ध वहाँ खींच ले जाए गए थे, जैसे यिर्मयाह, बारूक, और उनके समान अन्य लोग। परन्तु यह व्याख्या पहली दृष्टि में खींच-तान की लग सकती है; तौभी यदि भविष्यद्वक्ता उन यहूदियों के विषय में बोल रहा है जो मिस्र को भाग गए थे, तो इसे इसी प्रकार लेना आवश्यक है; अन्यथा प्रत्यक्ष असंगति और विरोधाभास होगा। परन्तु हम पद के अन्त में कही गई बात को बाबुल के निर्वासितों से भी जोड़ सकते हैं; क्योंकि जो लोग मिस्र में छिप गए थे, उन्होंने सोचा कि बाकी सब का तो अन्त हो चुका, क्योंकि वे एक दूर देश में ले जाए गए थे। तो जब उनके लिए अपने देश लौटने का मार्ग बन्द हो गया था, उन्होंने सोचा कि वे स्वयं ही उस देश के एकमात्र उत्तराधिकारी बन जाएँगे; क्योंकि मिस्र यहूदा देश से दूर नहीं था, इसलिए लौटना सरल था, और स्वतन्त्र भी, क्योंकि उन्होंने मिस्रियों से सन्धि कर ली थी; और फिर, वे उनके पास मित्रों के रूप में उनके आतिथ्य का भागी होने के लिए गए थे। अतः जो मिस्र में रहते थे, उन्होंने सोचा कि यहूदा देश उनका अपना हो जाएगा।
परन्तु परमेश्वर कहता है कि उस देश में कोई न लौटेगा सिवाय उनके जो बच निकलेंगे, अर्थात् वे जिन्हें उनकी बन्धुआई और निर्वासन के अन्त में लौटने की अनुमति दी जाएगी। अतः मैं पद के अन्त में आए {,}פלטיםpelethim शब्द को उन बचे हुओं से सम्बन्धित मानता हूँ जिन्हें परमेश्वर अन्त में इकट्ठा करेगा, जब सत्तर वर्षों के अन्त में, जिनका उल्लेख भविष्यद्वक्ता पहले कर चुका था, कुस्रू की राजाज्ञा के द्वारा यहूदियों को लौटने की स्वतन्त्रता दी गई। और मुझे यह अर्थ अधिक सरल लगता है, अर्थात् कि उन बचे हुओं में से, जो मिस्र को उतर गए थे, कोई भी शेष न रहेगा, जो, जैसा कहा गया है, मिस्र देश में परदेशी होकर रहने और फिर यहूदा देश को लौटने के लिए आए थे, क्योंकि यही उनका उद्देश्य था।
फिर वह कहता है, जहाँ लौटने के लिए वे अपने प्राणों को ऊपर उठाते हैं। भविष्यद्वक्ता यहाँ उस भरोसे को उघाड़ता है जिसके द्वारा यहूदी अब भी अपने आप को धोखा दे रहे थे; क्योंकि जिस ऊपर उठाने की वह बात करता है, उसका अर्थ है अभिलाषा करना या आशा करना, और यह घमण्ड और ढिठाई को सूचित करता है।
अतः यह कहकर कि वे अपने प्राणों को ऊपर उठाते थे, वह उन्हें डाँटता है, क्योंकि वे अब भी एक मूर्खतापूर्ण आशा से फूले हुए थे, और अपने आप को यह विश्वास दिला रहे थे कि लौटने का मार्ग उनके लिए शीघ्र खुल जाएगा, क्योंकि देश का कोई अधिकारी नहीं था। तो जब वे ऐसे भ्रमों से अपने आप को बहला रहे थे, उन्हें जानना था कि वे वहाँ कभी न लौटेंगे, वे न लौटेंगे, वह कहता है। और फिर एक अपवाद आता है, केवल वे जो बच निकलेंगे, अर्थात् वे ही जिनके विषय में मिस्र के यहूदी निराश हो चुके थे, जो सोचते थे कि उन्होंने ठीक किया है, और बुद्धिमानी की युक्ति अपनाई है, क्योंकि कुछ समय के लिए उन्हें मिस्र में एक शान्त छिपने का स्थान मिल गया था। अब आगे लिखा है, —
यिर्मयाह 44:15-16
15. तब मिस्र देश के पत्रोस में रहनेवाले जितने पुरुष जानते थे कि उनकी स्त्रियाँ दूसरे देवताओं के लिए धूप जलाती हैं, और जितनी स्त्रियाँ बड़ी मण्डली में पास खड़ी थीं, अर्थात् मिस्र देश के पत्रोस में रहनेवाले सब लोगों ने यिर्मयाह को यह उत्तर दिया,
15. Et responderunt Jeremiae om-nes viri, qui sciebant quod suffitum offerrent
358 इस प्रतीत होनेवाली असंगति का मेल बिठाने का सबसे सरल मार्ग यह है: वह मिस्र को भागनेवालों को तलवार की धमकी देता है; यह तलवार नबूकदनेस्सर की थी, जैसा वह यिर्मयाह 46:15 इत्यादि में पहले से बताता है। इस तलवार से कोई न बचेगा सिवाय उनके जो इस बीच यहूदा देश को भाग निकले हों। यही बात हम यिर्मयाह 46:28 में भी देखते हैं; और उस पद का अनुवाद यों किया जा सकता है, — और जो तलवार से बच निकलेंगे (जो मिस्र देश से यहूदा देश को लौट आए होंगे) वे गिनती में थोड़े होंगे; परन्तु यहूदा के सब बचे हुए, जो मिस्र देश में परदेशी होकर रहने के लिए गए हैं, उस वचन को जान लेंगे, जो स्थिर रहेगा, कि वह मेरी ओर से है या उनकी ओर से। — सं.
uxores ipsorum diis alienis, et omnes mulieres quae adstabant, coetus magnus, et totus populus qui habitabant in terra Aegypti, in Pathros, dicendo,
16. जो वचन तू ने हम से यहोवा के नाम से कहा है, उसको हम तेरी नहीं सुनेंगे।
16. In sermone (subaudiendum est in, vel, quoad sermonem) quem locutus es ad nos in nomine Jehovae, nos audivimus to.
यहाँ उस जाति का असुधारणीय हठ और भी पूर्ण रूप से दिखाई देता है; क्योंकि यिर्मयाह ने उन्हें अपनी खराई के पर्याप्त से भी अधिक प्रमाण दिए थे। अतः उन्हें पूरी तरह से आश्वस्त हो जाना चाहिए था कि वह परमेश्वर का सच्चा भविष्यद्वक्ता है। यद्यपि उन्होंने चालीस वर्ष और उससे अधिक समय तक उसकी उपेक्षा की थी, तौभी उसने अपने दूतपद का पूरा प्रमाण दिया था, जब उसने निरन्तर, अन्त तक, नगर और मन्दिर के विनाश की भविष्यद्वाणी की थी। अतः उन्होंने अपनी ही विपत्तियों से सीख लिया था कि यिर्मयाह पवित्र आत्मा का एक साधन, और परमेश्वर की इच्छा का सच्चा व्याख्याता था। और इससे प्रकट होता है कि वे कितने अन्धे थे जब उन्होंने उसकी सारी चेतावनियों को ठुकरा दिया, और उसकी धमकियों को कहानियाँ समझा। इस प्रकार, मानो दर्पण में, परमेश्वर का पवित्र आत्मा हमारे सामने रखता है कि जब शैतान एक बार मनुष्यों के मनों पर अधिकार कर लेता है, तब उनका पागलपन कितना बड़ा होता है। परन्तु साथ ही हम यह भी सीखें कि जब परमेश्वर के भविष्यद्वक्ता तुच्छ जाने जाते हैं, तब हठ को यही प्रतिफल दिया जाता है। यह वास्तव में एक भयानक और अत्यन्त लज्जाजनक बात थी कि उन्होंने पवित्र भविष्यद्वक्ता को इतनी ढिठाई से ठुकराने का साहस किया, जबकि उसी समय वे अत्यन्त दुर्दशा में पहुँच चुके थे, और सब कुछ लुट जाने पर मिस्र को भाग गए थे, और वहाँ, जैसा हम देख चुके हैं, दासों जैसी और दयनीय दशा में रह रहे थे। अतः जब कि वे अब भी परमेश्वर के भविष्यद्वक्ता के प्रति क्रूर और अहंकारी बने हुए थे, इससे प्रकट होता है कि वे वश में न आनेवाले थे।
फिर वह कहता है कि वे सब पुरुष जिन्हें अपनी स्त्रियों की अभक्ति ज्ञात थी, यिर्मयाह को उत्तर देने लगे। इन शब्दों से भविष्यद्वक्ता जताता है कि मूर्तिपूजा का आरम्भ स्त्रियों से हुआ था। अतः बात अभी इतनी आगे नहीं बढ़ी थी कि सब पुरुष खुले तौर पर मूर्तियों की पूजा करते थे; परन्तु स्त्रियों ने यह छूट ले ली थी, और पुरुषों ने तुरन्त उन्हें यह करने दिया। परन्तु तब भविष्यद्वक्ता ने पहले उन्हें ऐसे क्यों डाँटा, मानो वे सब मूर्तियों के लिए धूप जलाते हों? निःसन्देह हम इस खण्ड से सीखते हैं कि परमेश्वर के सामने केवल वे ही दोषी नहीं हैं जो खुले तौर पर दुष्टता करते हैं, वरन् वे भी जो आँख मूँदकर उन्हें सहन करते हैं; क्योंकि पुरुषों को बीच में पड़ना चाहिए था कि अपनी स्त्रियों को अभक्तिपूर्ण अन्धविश्वासों से अपने आप को अशुद्ध करने से रोकें; परन्तु यह उन्होंने धैर्य से सह लिया। अतः उनकी सहमति कार्य के बराबर थी, जैसा हम भविष्यद्वक्ता के शब्दों से उचित ही निष्कर्ष निकाल सकते हैं। फिर वह कहता है कि पुरुषों ने धूप जलाई, वास्तव में खुले तौर पर और अपने हाथों से नहीं, परन्तु यह कि वे अपनी स्त्रियों के विषय में जानते थे, और यह अभक्ति स्त्रियों के द्वारा उनकी सहमति से की गई थी। शेष भाग मैं अभी पूरा नहीं कर सकता, कल मैं इसे आगे बढ़ाऊँगा।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जब तू बहुत-सी परीक्षाओं के द्वारा हमारे विश्वास को परखना चाहता है, तब हम तेरे नाम की शुद्ध आराधना में, और सीधाई और सच्चाई से तुझे पुकारने में निरन्तर स्थिर बने रहें; और जब कि हम हर ओर से बहुत-सी अशुद्धताओं से घिरे और दबे हुए हैं, तो हम देह और प्राण दोनों में अपने आप को शुद्ध और तुझे समर्पित बनाए रखें, और इस प्रकार अपने जीवन की सारी यात्रा में आगे बढ़ते रहें, कि अन्त में हम अपने प्रभु मसीह के द्वारा तेरे सम्मुख निष्कलंक उपस्थित हो सकें। — आमीन।
एक सौ बासठवाँ व्याख्यान
कल हमने उस बात की व्याख्या आरम्भ की थी जो भविष्यद्वक्ता उस उत्तर के विषय में कहता है जो पुरुषों और स्त्रियों ने उसे दिया। उसका सार यह था कि वे वह नहीं करेंगे जिसकी आज्ञा भविष्यद्वक्ता ने उन्हें दी थी, यद्यपि वह उनसे परमेश्वर के नाम से बोला था। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में यह उत्तर नहीं दिया कि परमेश्वर का वचन या उसकी वाणी उनके लिए कुछ मूल्य नहीं रखती, परन्तु उन्होंने यिर्मयाह की विश्वासयोग्यता पर दोष लगाया, मानो उसने झूठमूठ परमेश्वर के नाम का प्रयोग किया हो।
परन्तु वह कहता है कि जो पुरुष जानते थे कि उनकी स्त्रियाँ पराए देवताओं के लिए धूप जलाती थीं, उन्होंने उसे उत्तर दिया; और फिर वह जोड़ता है, और वे स्त्रियाँ जो पास खड़ी थीं; कुछ लोग पढ़ते हैं, "बड़ी सभा में।" परन्तु मुझे कोई सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय यह है कि उत्तर पुरुषों और स्त्रियों दोनों ने मिलकर दिया। अतः वह कहता है कि स्त्रियाँ भी उसी समय उपस्थित थीं। फिर वह जोड़ता है, एक बड़ी सभा।
इसके बाद एक व्याख्या आती है, अर्थात् वे सारे लोग जो मिस्र देश में रहते थे, जो मिस्र देश के पत्रोस में रहते थे, और विशेषकर उस भाग में। पत्रोस के विषय में हम अन्यत्र बात कर चुके हैं।
संक्षेप में हम देखते हैं कि परमेश्वर का भविष्यद्वक्ता ठुकरा दिया गया; और फिर भी इसमें कोई सन्देह नहीं कि यहूदी किसी न किसी धर्म का दिखावा करते थे, परन्तु वे यह नहीं समझते थे कि वे किसी मनुष्य की आज्ञा मानने के लिए बँधे हुए हैं। और यह तिरस्कार कहाँ से आया? केवल हठीलेपन से; क्योंकि कपटी लोग चाहे कितना ही छल करें और कहें कि वे परमेश्वर और उसके वचन को तुच्छ नहीं जानते, और अपनी बातें सेवकों को सम्बोधित करें, तौभी उनकी अभक्ति उन्हें प्रकट कर देती है, जब एक ओर तो वे परमेश्वर की आराधना करने का दिखावा करते हैं, और दूसरी ओर उन लोगों को ठुकरा देते हैं जो उसकी आज्ञाओं से सुसज्जित हैं और जिनकी वह चाहता है कि वे सुनें। परन्तु परमेश्वर न तो चाहता है और न यह हो सकता है कि वह अपने वचन से अलग कर दिया जाए।
अब हम आगे चलें —
यिर्मयाह 44:17
17. परन्तु जो कोई बात हमारे मुँह से निकली है, उसे हम निश्चय पूरा करेंगे, कि स्वर्ग की रानी के लिये धूप जलाएँ और उसके लिये तपावन दें, जैसे हम और हमारे पुरखा, हमारे राजा और हमारे हाकिम यहूदा के नगरों में और यरूशलेम की सड़कों में करते थे; क्योंकि उस समय हम पेट भर रोटी खाते, और भले चंगे रहते, और कोई विपत्ति नहीं देखते थे।
17. Quirt potius (vel, quia, est par-ticula causalis, sed accipitur interdum adversative) faciemus quicquid (ad verbum, omnem sermonem) qui egredietur ab ore nostro, ut suffitum offeramus reginae (vel, machinae) coelorum, et libemus ei libamina, quemadmodum fecimus nos, et patres nostri, reges nostri et duces nostri in urbibus Jehudah, et in compitis Jerusalem, et saturati sumus panibus, et fuimus boni (hoc est, hilares, feelices,) et malum non vidimus.
यहाँ वे अपना हठ और भी खुलकर दिखाते हैं; क्योंकि यह कहकर कि उन्हें यिर्मयाह पर कोई भरोसा नहीं, क्योंकि वह परमेश्वर की ओर से भेजा नहीं गया था, अब वे यह जोड़ते हैं कि वे परमेश्वर के उपासक तो अवश्य होंगे, परन्तु अपनी ही इच्छा के अनुसार। यहाँ हमारे सामने सब अन्धविश्वासों का सोता खोल दिया गया है। यह खण्ड भली-भाँति प्रमाणित करता है कि वे कहाँ से बहते हैं, और वे सब भ्रष्टताएँ, जिनके द्वारा हर युग में धर्म दूषित किया गया है, किस स्रोत से निकलती हैं, अर्थात् मनुष्यों की मनमानी और घमण्ड से। इसलिए जब मनुष्य अपने आप पर इतना अधिकार जताते हैं कि परमेश्वर की आराधना के विषय में व्यवस्था बनाने लगें, तब सब कुछ अवश्य ही बिगड़ जाता है। इसी कारण मैंने कहा कि यही सब भ्रमों का मूल है। तो फिर धर्म शुद्ध कैसे बना रह सकता है? परमेश्वर के मुँह पर निर्भर रहने से, अपने आप को उसके वचन के अधीन करने से, और अपने ऊपर लगाम लगाने से, ताकि हम ऐसी कोई बात न लाएँ जिसकी वह आज्ञा न देता हो और जिसे वह स्वीकार न करता हो। अतः परमेश्वर की आराधना के विषय में ठीक नियम यह है कि उसके ठहराए हुए को छोड़ और कुछ भी ग्रहण न करें। इसके विपरीत, ज्योंही मनुष्य अपने लिए आप ही व्यवस्था देनेवाले बनना चाहते हैं, जब वे कहते हैं, जो कोई बात हमारे मुँह से निकलती है उसे हम करते हुए करेंगे, त्योंही धर्म दूषित हो जाता है और अन्धविश्वास में बदल जाता है।
नम्र लोग, यदि केवल सामान्य बुद्धि से ही परामर्श लें, तो इस मनमानी को अवश्य दोषी ठहराएँगे; परन्तु यह सब में जन्मजात बुराई है कि वे परमेश्वर की आराधना वैसे करना चाहते हैं जैसा उन्हें अच्छा लगे। परन्तु यिर्मयाह यहाँ मानो एक पटिया पर हमारे लिए सब अन्धविश्वासों का आरम्भ चित्रित करता है: मनुष्य परमेश्वर की आज्ञाओं के विरोध में अपनी ही इच्छा और कल्पनाएँ खड़ी कर देते हैं।
इसके बाद वह जोड़ता है, आकाश के ढाँचे के लिए धूप जलाना। इस वाक्यांश के अर्थ के विषय में व्याख्याकारों में मतभेद है। हम सातवें अध्याय में कुछ बातें पहले ही कह चुके हैं; परन्तु क्योंकि तुम में से बहुत से लोग उस समय उपस्थित नहीं थे, इसलिए जो तब कहा गया था उसे दोहराना आवश्यक है। कुछ लोग अन्तिम से पहले वाले शब्द को {,}מלך melek से निकालते हैं, जिसका अर्थ है राज्य करना; और इसलिए वे यह अनुवाद देते हैं, “आकाश की रानी के लिए;” और यही जेरोम की व्याख्या है। परन्तु अन्य लोग इस शब्द को {,}לאךlak से निकालते हैं, और उसका अनुवाद “कार्य” करते हैं; और कुछ लोग और भी उतावली से “सेवकाई” करते हैं; और अन्य “ढाँचा,” अथवा रचना, (machina.) ऐसे भी लोग हैं जो इस शब्द को {,}הלךelek से निकालते हैं, जिसका अर्थ है चलना; और वे समझते हैं कि इस शब्द में सब तारे या ग्रह सम्मिलित हैं; और हम सचमुच देखते हैं कि चलना या गति सब तारों का गुण है। परन्तु यदि यह शब्द राज्य करने की क्रिया से आता है, तो “आकाश की रानी” को प्रधान तारा समझना होगा, जैसा कसदी भावानुवाद (Chaldee paraphrase) उसे मानता है।
परन्तु कुछ लोग समझते हैं कि इससे सूर्य अभिप्रेत है, और कुछ चन्द्रमा। इब्रानी में सूर्य स्त्रीलिंग है; इसलिए उस भाषा में सूर्य को उचित रूप से रानी कहा जा सकता है। परन्तु यदि हम इसे ढाँचे के अर्थ में लें, तो एक मूल अक्षर का अभाव है, जैसा सातवें अध्याय में है। तौभी भविष्यद्वक्ता यहाँ आकाश के सम्पूर्ण यन्त्र-विन्यास का उल्लेख करता प्रतीत होता है, मानो अविश्वासियों ने कहा हो कि जब वहाँ अद्भुत महिमा प्रकट होती है, तो उनकी आराधना निस्सन्देह परमेश्वर को भाती है, जब तारों में और आकाश के सारे ढाँचे में उसके प्रताप की उपासना की जाती है। इसलिए मैं नहीं समझता कि किसी एक तारे से अभिप्राय है, वरन् स्वयं आकाश से या सब तारों से; और यद्यपि शब्द एकवचन में है, तौभी उसका अर्थ वही है जिसे सामान्यतः आकाश की सेना कहा जाता है।
तब उन्होंने कहा, “हम अपनी सामान्य रीति पर चलते रहेंगे; क्योंकि अब तक हम आकाश की रचना (या ढाँचे) के लिए धूप जलाते और तपावन देते आए हैं; इसलिए जो हम सामान्यतः करते आए हैं उससे हम नहीं रुकेंगे:” और उन्होंने आगे कहा, “हम ने ऐसा ही किया है, हम ने, और हमारे पुरखाओं ने, और हमारे राजाओं ने, और हमारे हाकिमों ने।” यहाँ वे पुरखाओं के अधिकार को परमेश्वर के अधिकार के विरोध में खड़ा करते हैं, जैसा सामान्यतः किया जाता था।
हम अपने समय में भी देखते हैं कि जब स्पष्ट सत्य सामने लाया जाता है, तब पोप के अनुयायी घमण्ड से प्राचीन पिताओं और कैथोलिक कलीसिया की डींग मारते हैं। वे समझते हैं कि परमेश्वर के वचन पर अन्धकार छा जाता है, और जो कुछ व्यवस्था से, भविष्यद्वक्ताओं से, और सुसमाचार से प्रस्तुत किया जाता है, वह सब शून्य हो जाता है, जब वे आपत्ति करके कहते हैं कि बात ऐसी नहीं है, कि प्राचीन पिताओं ने कुछ और कहा है, कि प्राचीन समय में इसे कुछ और ही समझा जाता था। इससे हम देखते हैं कि आज के पोप के अनुयायी उन्हीं हथियारों से लड़ते हैं जिन्हें पहले मूर्तिपूजक काम में लाते थे; और यद्यपि शैतान अपने आप को अनेक प्रकार से बदल लेता है, तौभी अन्धविश्वासी लोग सदा इसी सिद्धान्त को अपनाते हैं, कि जो कुछ हमारे पूर्वजों से हमें सौंपा गया है उसे पवित्र मानना चाहिए; और कपटी लोग विशेषकर इस भ्रम में तब और भी कठोर हो जाते हैं, जब वे राजाओं और हाकिमों की डींग मार सकते हैं, जैसा इस घटना में हुआ; क्योंकि उन्होंने कहा कि वे उस बात का अनुसरण करते थे जो न केवल साधारण लोगों ने, वरन् राजाओं और हाकिमों ने भी की थी। उन्होंने यह मान लिया कि राजा और हाकिम अज्ञानता में नहीं पड़ सकते थे। सच तो यह है कि बड़प्पन और वैभव राजाओं की अज्ञानता और मूर्खता को ढाँप देते हैं। इसलिए जब भोले लोग राजाओं की चर्चा करते हैं, तो प्रदर्शित ठाट-बाट से उनकी आँखें अन्धी या चौंधिया जाती हैं, यहाँ तक कि वे राजाओं को निर्विवाद रूप से बुद्धिमान और उत्तम समझ से सम्पन्न मानते हैं। इसी कारण शैतान मनुष्यों को धोखा देने के लिए प्रायः ऐसे मुखौटों का उपयोग किया करता है। इसलिए हम यह सीखें कि अपने वचन के द्वारा धर्म के विषय में व्यवस्था ठहराने का आदर पूरी रीति से परमेश्वर को ही दें; और इस प्रकार कोई ऊँचाई या प्रतिष्ठा परमेश्वर के अधिकार पर छाया डालने न पाए; वरन् इसके विपरीत, जब परमेश्वर प्रकट हो, तब राजाओं और हाकिमों को भी अधीन होने के लिए विवश किया जाए।
इसके बाद उन्होंने जोड़ा, यहूदा के नगरों में, और यरूशलेम की सड़कों में।
और उन्होंने इन स्थानों का उल्लेख अपने अन्धविश्वासों को मान्यता देने के लिए किया; क्योंकि यरूशलेम की पवित्रता उनके लिए सब दुर्गुणों का आवरण थी, जैसा हम आज के दिन रोम के विषय में देखते हैं, जिसकी पोप के अनुयायी घमण्ड के साथ प्रशंसा करते हैं, मानो वह कपट, जो सारे संसार में अत्यन्त घिनौनी गन्दगी फैलाता है, सबसे सिद्ध पवित्रता हो। इसलिए जो कुछ रोम से आता है, वे चाहते हैं कि उसे स्वर्गीय वाणी माना जाए। उसी प्रकार अभागे यहूदियों ने परमेश्वर के विरोध में यरूशलेम को खड़ा करने का साहस किया। निश्चय ही उस नगर की प्रतिष्ठा बड़ी थी, आज के रोम की प्रतिष्ठा वैसी नहीं है; क्योंकि पोप के अनुयायियों ने वे प्रशंसा-वचन परमेश्वर के वचन से नहीं लिए हैं, जिनके द्वारा वे उस नगर की बड़ाई करते हैं, जो वास्तव में एक दुर्गन्धपूर्ण और घृणित वेश्यालय है। यरूशलेम को उसकी प्रतिष्ठा स्वयं परमेश्वर से मिली थी; परन्तु यहूदियों ने अपनी मूर्खता में यरूशलेम को तब नीचा कर दिया जब उन्होंने व्यवस्था को भ्रष्ट किया और अपनी ही इच्छा के अनुसार कल्पित आराधना स्थापित की। और फिर भी हम देखते हैं कि उन्होंने भविष्यद्वक्ता के विरुद्ध इसी नाम को हथियार बनाकर अपने आप को सुसज्जित किया, मानो वे परमेश्वर को स्वयं अपने ही विरुद्ध लड़ने के लिए ले आए हों। यरूशलेम की कोई प्रतिष्ठा नहीं थी सिवाय उसके जिससे स्वयं परमेश्वर ने उस पर अनुग्रह किया था; परन्तु वे डींग मारते थे कि वह पवित्र नगर है, कि जो कुछ उसमें किया जाता है उसे पवित्र और उचित माना जाना चाहिए, और उस पर विवाद नहीं किया जाना चाहिए, मानो परमेश्वर की व्यवस्था नगर की प्रतिष्ठा के नीचे गड़ी पड़ी हो। अब यरूशलेम ने अपना वैभव और अपनी सारी प्रतिष्ठा केवल व्यवस्था से ही पाई थी। परन्तु जैसा मैं कह चुका हूँ, यह मनुष्यों की दुष्टता थी, कि उन्होंने परमेश्वर के उपकारों को भ्रष्ट और विकृत कर दिया।
तब उन्होंने जोड़ा कि जब वे आकाश के कार्य या कारीगरी के लिए धूप जलाते थे, तब वे रोटी से तृप्त रहते थे। परमेश्वर का तिरस्कार करनेवालों में यह सदा से एक सामान्य बात रही है कि वे पार्थिव वस्तुओं से ऐसे मतवाले हो जाते हैं कि स्वयं परमेश्वर की उपेक्षा करते हैं, और सोचते हैं कि उनके सारे अन्धविश्वास दण्ड से बचे रहेंगे।
परन्तु यह भ्रम कहाँ से आता है? इसी से कि जब परमेश्वर धीरज के साथ मनुष्यों को सहता है, तब वे अपने आप को धोखा देते हैं। परमेश्वर अपने नाम के अपवित्र किए जाने का पलटा तुरन्त नहीं लेता, वह कपटियों और मूर्तिपूजकों को तुरन्त दण्ड नहीं देता, वह अभक्त और नकली आराधना-रीतियों पर तुरन्त वज्रपात नहीं करता: तब उसकी सहनशीलता को मानो पाप करने का प्रलोभन, स्वच्छन्दता का उकसावा समझ लिया जाता है। इसलिए जब यहूदियों ने यह बचाव प्रस्तुत किया कि वे रोटी से तृप्त रहते थे, तो यह ऐसा ही था मानो उन्होंने कहा हो, “जब तक परमेश्वर ने हमें छोड़े रखा, और अपना न्याय रोके रखा, तब तक हमारा भला होता रहा।” परन्तु उन्हें परमेश्वर की सहनशीलता का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए था, और इस प्रकार अपने ऊपर न्याय का ढेर नहीं लगाना चाहिए था, जैसा पौलुस कहता है। अब भ्रम का एक और कारण भी था, क्योंकि जब परमेश्वर ने मनुष्यों को, जैसे वे योग्य थे, अधिक कड़ाई से ताड़ना देकर भ्रम से लौटाना चाहा, और देखा कि वे अब भी हठीले हैं, तब वे परमेश्वर के न्याय को ऐसा समझने लगे कि मूर्खता से यह सोचने लगे कि उसका कारण धर्म के बदल दिए जाने से उत्पन्न हुआ है। इसी प्रकार सुसमाचार के आरम्भ में हम देखते हैं कि सब अभक्त लोगों में ऐसी ही शिकायतें थीं, जैसा प्राचीन लेखकों ने, और विशेषकर तर्तुल्लियन ने, अपने बचाव-ग्रन्थों में लिखा है: “यदि तिबर नदी में बाढ़ आई, यदि कोई विपत्ति हुई, यदि ओले पड़े या पाला पड़ा, तो दोष मसीह के नाम और उसकी शिक्षा पर डाला जाता था। जब से धर्म बदला गया है, तब से हम दुखी होते ही रहे हैं।” परन्तु उन्होंने जैसा विचार करना चाहिए था वैसा विचार नहीं किया, कि जब वे अन्धे थे और भ्रमों में डूबे हुए थे, तब परमेश्वर ने बहुत समय तक उन्हें सहा, और सुसमाचार की शिक्षा के चमकने के बाद भी वे दुष्टता से अपनी उसी अभ्यस्त अभक्ति के पीछे चलते रहे, जो पहले अज्ञानता के आधार पर क्षमा की जा सकती थी: जब से परमेश्वर ने उन्हें उद्धार का मार्ग दिखाया था, तब से उन्होंने मानो जान-बूझकर और मनमानी से उसका विरोध किया था, यहाँ तक कि वे और भी भारी दण्ड के योग्य हुए।
इस उत्तर के अनुसार प्राचीन प्रजा की अभक्ति ऐसी ही थी, जब हम आकाश के ढाँचे के लिए तपावन देते थे, तब हम रोटी से तृप्त रहते थे; अर्थात्, क्योंकि परमेश्वर ने उनकी अभक्ति का दण्ड तुरन्त नहीं दिया, इसलिए वे सुखी थे और कोई विपत्ति नहीं देखते थे। और फिर भी यह निश्चित है कि उन्होंने असत्य कहा, क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें बार-बार ताड़ना दी थी, और उसी समय वे अपनी झूठी आराधना में तत्पर और लीन थे।
वे यिर्मयाह के जन्म से पहले ही मूर्तिपूजा की ओर भटक चुके थे; वरन् यशायाह के भविष्यद्वक्ता के रूप में अपना पद आरम्भ करने से भी पहले: और हम जानते हैं कि उस समय परमेश्वर ने उनकी दुष्टता के कारण उन्हें कितना कठोर दण्ड दिया; क्योंकि यशायाह के समय में इस्राएल का राज्य संकट में पड़ा, और फिर पूर्ण रूप से नष्ट कर दिया गया। यरूशलेम, जैसा यशायाह कहता है, एक झोंपड़ी के समान हो गया, और सारा देश उजाड़ दिया गया; और उस समय वे आकाश की कारीगरी के लिए तपावन देते और धूप जलाते थे। हम जानते हैं कि आहाज और अन्य दुष्ट राजाओं का उत्साह कितना बड़ा था। हिजकिय्याह और योशिय्याह ने तो परमेश्वर की शुद्ध आराधना को फिर से स्थापित करने का परिश्रम किया; परन्तु हिजकिय्याह के पुत्र और उत्तराधिकारी मनश्शे ने तुरन्त सब कुछ उलट दिया। तो जब वे अपने अन्धविश्वासों में इतने उत्साही थे, तब क्या सब बातें उनकी इच्छा के अनुसार सफल हुईं, जैसी वे अब डींग मार रहे थे? कदापि नहीं, क्योंकि परमेश्वर ने तलवार, अकाल और मरी के द्वारा उनका पीछा किया।
तो इस डींग का क्या अर्थ था, कि जब वे तपावन देते थे, उस समय वे रोटी से तृप्त थे, और सुखी थे, और कोई विपत्ति नहीं देखते थे? सच तो यह है कि उन्माद अभक्तों को ऐसा सिर के बल हाँक ले जाता है कि जब परमेश्वर का हाथ उनके विरुद्ध बढ़ाया गया, तब भी उन्होंने उसे नहीं पहचाना। परन्तु यदि उन्होंने सच भी कहा होता कि जिस समय वे मूर्तियों के आगे व्यभिचार करते थे उस समय वे सुखी थे, तौभी वे इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकते थे कि उनकी झूठी आराधना परमेश्वर को स्वीकार्य थी; क्योंकि जब वह कुछ समय तक मनुष्यों को सहता है, तब भी वह उनका न्यायी होना नहीं छोड़ता; क्योंकि वह अन्त में, अपने ठहराए हुए समय पर, उन अभक्तों को अपने न्यायासन के सामने बुलाएगा जिन्हें उसने बहुत समय तक छोड़े रखा है।
संक्षेप में, कपटी लोग पहले तो परमेश्वर के साथ खिलवाड़ करते हैं, और इस प्रकार उसकी दया को पाप करने का अवसर बना लेते हैं, मानो कोई दण्ड है ही नहीं; यह एक बात है: और दूसरी बात यह कि वे परमेश्वर के कोड़ों से नहीं जागते, वरन् जब परमेश्वर उन्हें ताड़ना देता है तब भी जड़ बने रहते हैं। इसके बाद आता है —
यिर्मयाह 44:18
18. परन्तु जब से हम ने स्वर्ग की रानी के लिये धूप जलाना और उसके लिये तपावन देना छोड़ दिया, तब से हम को सब वस्तुओं की घटी हुई है, और हम तलवार और महँगी के द्वारा मिट चले हैं।
18. Ex quo autem desiimus suffitum offerre artificio coelo-rum et libare ei libamina, desti-tuti (vel, privati) fuimus omnibus, et gladio et fame sumus consumpti.
यहाँ वह उनकी कृतघ्नता को और बढ़ाकर दिखाता है, कि उन्होंने अपनी सारी विपत्तियों का दोष परमेश्वर पर लगाया, जबकि, जैसा भविष्यद्वक्ता आगे हमें बताएगा, यदि वे सुधरने योग्य होते तो परमेश्वर उन्हें मानो अन्धकार से निकालकर ज्योति में ले आता। उन्हें दण्डों के द्वारा सही बुद्धि में लौट आना चाहिए था। परन्तु ऐसा होना तो दूर रहा, परमेश्वर के कोड़ों का प्रभाव यह हुआ कि वे और भी अधिक हठीले होते गए।
तब उन्होंने कहा कि जब से उन्होंने मूर्तियों की उपासना करना छोड़ा, तब से वे दुखी रहे हैं, कि उन्हें सब वस्तुओं की घटी झेलनी पड़ी है, और वे अकाल और तलवार से मिट गए हैं। जैसा भली-भाँति ज्ञात है, वे पहले भी अकाल और तलवार से मिट चुके थे, और जैसा हम कह चुके हैं, वे पहले भी अनेक विपत्तियाँ भुगत चुके थे। तो फिर उन्होंने उन दण्डों का उल्लेख क्यों नहीं किया जो उन्होंने इसलिए भुगते थे कि वे इतनी बार और इतने लम्बे समय तक परमेश्वर से बलवा करते रहे थे? परन्तु उन्होंने जान-बूझकर परमेश्वर के न्याय-कर्मों को ढाँप दिया: और फिर भी उन्होंने कहा कि जब से उन्होंने झूठी आराधना करना छोड़ा, तब से वे हर प्रकार से दुखी रहे हैं। परन्तु क्या वे इस कारण दुखी हुए कि वे अब तारों और मूर्तियों के लिए तपावन नहीं देते थे? नहीं, कारण बिलकुल भिन्न था, जैसा भविष्यद्वक्ता अभी उन्हें उत्तर देगा। परन्तु हमें उनकी सब बातें दोहरानी चाहिए; भविष्यद्वक्ता द्वारा दिए गए खण्डन पर हम बाद में आएँगे।
यिर्मयाह 44:19
19. और जब हम स्वर्ग की रानी के लिये धूप जलाते और उसके लिये तपावन देते थे, तब क्या हम ने अपने पुरुषों के बिना उसकी उपासना करने के लिये उसकी टिकियाँ बनाईं, और उसके लिये तपावन दिया?
19. Et quando nos suffitum fecimus artificio coelorum, et libavimus ei libamina, an absque viris nostris fecimus ei placentas ad exhilarandum illud (aliivertunt, simulaehrum,) et etiam libando ei libamina?
उन्होंने एक और तर्क प्रस्तुत किया, कि वे कोई छोटा-सा भाग नहीं, वरन् सारी प्रजा थी जो उस समय समृद्धि में फूलती-फलती थी, जब वे मूर्तियों के लिए धूप जलाते थे। हम जानते हैं कि उस बड़ी भीड़ में से, जो उस समय जीवित थी जब राज्य अभी बना हुआ था, थोड़े ही बचे रह गए थे। तब उन्होंने कहा कि इस अन्धविश्वास के रचनेवाले केवल वे ही नहीं थे, वरन् इसका पालन बहुत बड़ी संख्या में लोगों ने, यहाँ तक कि सारी प्रजा ने किया था, जब यरूशलेम निवासियों से भरा हुआ था, और सारा देश भी।
कुछ लोग इसकी व्याख्या स्त्रियों के विषय में करते हैं, परन्तु मेरी समझ में यह अनुचित है। पुल्लिंग कभी-कभी स्त्रियों के लिए भी प्रयुक्त होता है, परन्तु बहुत कम, और वह खटकनेवाला होता है, और फिर वह इस खण्ड से मेल नहीं खाता, जहाँ सारा प्रसंग दिखाता है कि पुरुषों की बात हो रही है; परन्तु केवल एक ही कारण उन्हें ऐसा सोचने पर ले जाता है, और वह तुच्छ है। कहा गया है, क्या हम ने यह अपने पुरुषों के बिना किया? इसलिए जब उन्होंने कहा कि उन्होंने पुरुषों के बिना काम नहीं किया, तो व्याख्याकारों के मन में तुरन्त यह बात आई कि स्त्रियाँ बोल रही थीं; परन्तु शब्द पुल्लिंग में है। यह भली-भाँति ज्ञात है कि {,}אנשיםanushim, का अर्थ कभी-कभी वृद्ध जन होता है, और वे हाकिम भी जो शासन करते हैं, जैसा अन्य खण्डों से स्पष्ट है। परन्तु यहाँ वह छोटी-सी टोली, जो बची रह गई थी, एक बड़ी भीड़ की सहमति को सामने लाई, मानो उन्होंने कहा हो, “हम यहाँ तेरे विरुद्ध बहुत हैं, और तू अकेला खड़ा है; परन्तु यदि तू नगर और देश की प्राचीन दशा की तुलना हमारी दयनीय दशा से करे, जब राज्य फलता-फूलता था, जब नगर सुरक्षित बना हुआ था, जब सारा देश निवासियों से भरा हुआ था, तो क्या उस समय वे सब एक मन होकर तारों और आकाश की कारीगरी की उपासना नहीं करते थे? इसलिए जब इस धर्म को इतने लोगों की सहमति से स्वीकृति मिली है, तो तू इसे हम से छीन लेने का प्रयत्न करके क्या चाहता है?”
अब हम भविष्यद्वक्ता के अभिप्राय को समझते हैं, या यों कहें कि हम उन लोगों का अर्थ समझते हैं जिन्हें उसने बोलनेवालों के रूप में प्रस्तुत किया है। तब उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने पुरुषों के बिना, अर्थात् उस बड़ी भीड़ के बिना, जो बाद में नष्ट हो गई या मिट गई, धूप नहीं जलाया और तपावन नहीं दिया; और इस प्रकार उन्होंने उसके विरुद्ध बादल के समान बहुत बड़ी संख्या में लोगों को खड़ा किया, जैसा आज के दिन पोप के अनुयायी करते हैं, जो सहमति के सहारे केवल परमेश्वर के सत्य को दबा देने के उद्देश्य से उसके विरुद्ध लड़ते हैं। इसी प्रकार ये अभागे लोग यिर्मयाह से झगड़ते थे; और यही बहाना उनकी ढाल था, कि नगर के ढाए जाने से पहले सारी प्रजा इन अन्धविश्वासों के पीछे चलती थी: इसलिए हम ने तपावन देते और धूप जलाते हुए यह अपने पुरुषों के बिना नहीं किया। अब इसके बाद आता है —
यिर्मयाह 44:20-23
20. तब यिर्मयाह ने सब लोगों से, अर्थात् पुरुषों और स्त्रियों से, और उन सब लोगों से जिन्होंने उसे यह उत्तर दिया था, कहा,
20. Et dixit Jeremias ad totum populum, ad viros et mulieres, et ad totum populum, qui responderant ipsi sermonem, dicendo,
21. जो धूप तुम ने, और तुम्हारे पुरखाओं, तुम्हारे राजाओं, और तुम्हारे हाकिमों ने, और देश के लोगों ने यहूदा के नगरों और यरूशलेम की सड़कों में जलाया, क्या यहोवा ने उसको स्मरण न किया, और क्या वह उसके मन में न आया?
21. An non suffitus quem vos suffiebatis (vel, adolebatis) in urbibus Jehudah et compitis Jerusalem, vos et patres vestri, reges vestri et duces vestri, et populus terre, eorum (hoc est, ejus suffumigationis, vel, harum omnium superstitionum) recordatus est Jehova, et ascenderunt in cor ejus?
22. यहाँ तक कि यहोवा तुम्हारे बुरे कामों और तुम्हारे किए हुए घृणित कामों के कारण फिर सह न सका; इस कारण तुम्हारा देश उजाड़ और विस्मय और शाप का विषय हो गया है, और उसमें कोई बसनेवाला नहीं रहा, जैसा आज के दिन है।
22. Et non potuit Jehova amplius ferre propter malitiam operum vestrorum, propter abominationes quas fecistis, et redacta est terra vestra in vastitatem et in stuporem et in maledictum (vel, execrationem,) ita ut nemo sit habitator, sicut dies haec (hoc est, sicut hodie apparet.)
23. क्योंकि तुम ने धूप जलाया, और यहोवा के विरुद्ध पाप किया, और यहोवा की बात नहीं मानी, और न उसकी व्यवस्था और विधियों और चितौनियों के अनुसार चले, इस कारण यह विपत्ति तुम पर आ पड़ी है, जैसा आज के दिन है।
23. Propterea quod suffitum fecis-tis et peccastis Jehovae (vel, impie gessistis contra Jehovam,) et non audivistis vocem Jehovae, et in lege ejus et statutis et testimoniis non ambulastis, propterea accedit vobis malum hoc, sicut dies haec (hoc est, sicut hodie apparet.)
भविष्यद्वक्ता उन अभक्तिपूर्ण आपत्तियों का खण्डन करता है जिनके द्वारा यहूदियों ने उसकी शिक्षा को उलटने और तुच्छ ठहराने का प्रयत्न किया था; फिर वह उन सब बातों को, जिनकी उन्होंने झूठी डींग मारी थी, उन्हीं के विरुद्ध मोड़ देता है। उन्होंने आरम्भ में कहा था, “हमारे राजा, हमारे हाकिम, और हमारे पुरखा पहले से इन रीतियों का पालन करते आए थे; और वे मानो उन्हीं के हाथों से हमें सौंपी गई हैं।” इसका यिर्मयाह यह उत्तर देता है, “यह निश्चय ही सत्य है, और इसी कारण परमेश्वर उनकी अभक्ति का ऐसा कठोर न्यायी बना, जब उसने तुम्हारे पुरखाओं को संसार से उठा लिया, जब उसने स्वयं राज्य को पूर्ण रूप से नष्ट कर दिया, जब उसने नगर को ढा दिया, और जब अन्त में उसने तुम्हें हर प्रकार की विपत्तियों से दुःख दिया: क्योंकि यदि तुम्हारे राजा, और तुम्हारे पुरखा, और तुम्हारे हाकिम परमेश्वर के प्रति अभक्त न होते, तो वह उनके साथ कभी इतनी कठोरता से व्यवहार न करता; क्योंकि उसने अब्राहम की सन्तान का पिता होने की प्रतिज्ञा की है। इसलिए परमेश्वर तुम से, और तुम्हारे पुरखाओं से, और तुम्हारे राजाओं से अवश्य ही अत्यन्त अप्रसन्न हुआ होगा, जब उसका क्रोध उनके विरुद्ध इस प्रकार भड़का।”
इसलिए यहाँ एक प्रत्युत्तर है; क्योंकि हम देखते हैं कि जो कुछ उन्होंने भविष्यद्वक्ता के विरुद्ध प्रस्तुत किया था, उसे वह उन्हीं के विरुद्ध मोड़ देता है। जो कहा गया है उसका सार यही है।
वह कहता है कि उसने सारी प्रजा से, पुरुषों और स्त्रियों दोनों से, बात की, और वह “सारी प्रजा” को दोहराता है, क्योंकि सब ने उस अभक्तिपूर्ण झूठे आरोप पर अपनी सहमति दी थी। तब परमेश्वर कहता है, “इसी कारण मैं ने तुम्हारे नगर को और तुम्हें नष्ट किया है, अर्थात् इसलिए कि तुम ने अपनी मूर्तियों के लिए धूप जलाया।” जिस बात की उन्होंने डींग मारी थी उसकी सच्चाई स्वीकार की जाती है, परन्तु उसे उनके सोचे हुए अर्थ से भिन्न अर्थ में मोड़ दिया जाता है। क्योंकि जब उनके पुरखाओं और उनके राजाओं ने अन्धविश्वासों को अपना लिया था, तो उन्होंने समझा कि उनके पीछे चलकर वे ठीक कर रहे हैं; क्योंकि, जैसा हम कह चुके हैं, कपटी लोग प्रचलन और रीति को व्यवस्था की उपेक्षा करने के लिए पर्याप्त कारण समझते हैं। फिर, जहाँ तक स्वयं घटना का सम्बन्ध है, भविष्यद्वक्ता मान लेता है कि उन्होंने जो कहा वह बिलकुल सच था, कि यही उनकी सारी विपत्तियों का कारण रहा था; क्योंकि यदि राजाओं और सारी प्रजा ने परमेश्वर का क्रोध न भड़काया होता, तो मन्दिर न ढाया जाता, और न राज्य नष्ट किया जाता; संक्षेप में, परमेश्वर अपनी उस प्रजा से, जिसे उसने लेपालक बनाया था, अपने आप को अलग न कर लेता। यही अर्थ है।
वह कहता है, जो धूप तुम ने यहूदा के नगरों और यरूशलेम की सड़कों में जलाया, तुम ने और तुम्हारे पुरखाओं ने, तुम्हारे राजाओं ने, और तुम्हारे हाकिमों ने, और देश की सारी प्रजा ने, क्या यहोवा ने उसको स्मरण नहीं किया? वह कहता है, यह भयानक विपत्ति, जिसने तुम्हारी सारी जाति को नष्ट कर दिया है, कहाँ से आई है? परमेश्वर के क्रोध से ही, क्योंकि यह तुम पर संयोग से नहीं आ पड़ी, क्योंकि परमेश्वर ने अपने दासों के द्वारा वह पहले से बता दिया था जो बाद में सचमुच पूरा हुआ है। इसलिए यह निष्कर्ष निकलता है कि तुम्हारा नगर परमेश्वर के धर्ममय न्याय के द्वारा नष्ट किया गया है। और इतने बड़े और इतने भारी पलटे का कारण क्या रहा है? तुम्हारी धूप ही।
और इसलिए वह जोड़ता है, यहोवा तुम्हारे कामों की दुष्टता और तुम्हारे किए हुए घृणित कामों को सह न सका: इसलिए, वह कहता है, तुम्हारा देश उजाड़ कर दिया गया है। संक्षेप में, भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि यदि वे उचित रूप से परमेश्वर के न्याय के भागी न होते, तो वे नष्ट न किए जाते। क्योंकि वह यह सिद्धान्त मानकर चलता है कि परमेश्वर अकारण क्रोध नहीं करता; और फिर वह एक और सिद्धान्त मानता है, कि क्योंकि परमेश्वर ने अब्राहम के वंश को चुना था, और अयोग्यों पर भी सदा कृपालु रहा था, इसलिए यदि परमेश्वर उनसे पूरी रीति से अलग न हो गया होता, तो वे उसकी कृपा के भागी बनाए जाते। इसलिए यह निष्कर्ष निकलता है कि परमेश्वर का पलटा किसी छोटे-से अपराध से इस प्रकार नहीं भड़का था, वरन् अनेक और प्रतिदिन के अपराधों से, यहाँ तक कि वह और अधिक टाला न जा सका: क्योंकि दण्ड की भयंकरता पाप की भयंकरता को दिखाती है; और इसलिए वह कहता है, यहोवा तुम्हारे कामों की दुष्टता, और तुम्हारे किए हुए घृणित कामों को सह न सका: इसलिए, वह आगे कहता है, तुम्हारा देश उजाड़, विस्मय, और शाप, या धिक्कार का विषय बना दिया गया है, यहाँ तक कि उसमें कोई बसनेवाला नहीं रहा।
अन्त में वह वही बात दूसरे शब्दों में और भी स्पष्ट रूप से समझाता है, वह कहता है, तुम्हारी धूप के कारण, और इसलिए कि तुम ने दुष्टता की है, इत्यादि। विशेष रूप से धूप का नाम लेकर, अर्थात् अंश को सम्पूर्ण के स्थान पर रखकर, वह सब झूठी और भ्रष्ट आराधना-रीतियों की ओर संकेत करता है, जैसा कल कहा गया था; परन्तु वह उन सब को घृणित घोषित करता है। फिर वह कहता है, तुम ने परमेश्वर के विरुद्ध अभक्ति का काम किया है। अब वह उनके पाप को और बढ़ाकर दिखाता है, क्योंकि उन्होंने सब भक्तिपूर्ण चितौनियों को तुच्छ जाना था; वह कहता है, तुम ने यहोवा की बात नहीं सुनी। मैं इसे भविष्यद्वक्ताओं के प्रवचनों पर लागू करता हूँ, जिनके द्वारा परमेश्वर उन्हें लगातार मन फिराने के लिए समझाता रहा; क्योंकि वह उन्हें उद्धार के मार्ग पर लौटा लाने के लिए प्रतिदिन और निरन्तर उन्हें सम्बोधित करता रहा। इसलिए भविष्यद्वक्ता उन्हें दोषी ठहराता है, क्योंकि उन्होंने भविष्यद्वक्ताओं की बातें नहीं सुनीं।
फिर वह जोड़ता है, न उसकी व्यवस्था पर, न उसकी विधियों पर, न उसकी चितौनियों पर चले; इन शब्दों के द्वारा वह दिखाता है कि यदि भविष्यद्वक्ता एक के बाद एक न भी भेजे गए होते, तौभी व्यवस्था उनके लिए पर्याप्त होनी चाहिए थी। परन्तु वह केवल व्यवस्था का उल्लेख करके सन्तुष्ट नहीं हुआ, वरन् उसने विधियाँ और चितौनियाँ भी जोड़ीं: इन शब्दों के द्वारा वह संकेत करता है, जैसा हम ने कल कहा था, कि व्यवस्था की शिक्षा स्पष्ट और सरल थी। अन्त में वह जोड़ता है, इसलिए यह सारी विपत्ति तुम पर आ पड़ी है, जैसा आज के दिन प्रकट है। संक्षेप में, भविष्यद्वक्ता संकेत करता है कि उनका दोष पर्याप्त रूप से प्रमाणित हो चुका था, क्योंकि परमेश्वर उनसे इतना क्रोधित हुआ था, और वे इतनी कठोरता से दुःख पाए थे; क्योंकि यदि उसके न्याय ठीक हैं, तो यह निष्कर्ष निकलता है कि जो दण्ड उसने यहूदियों पर डाला वह ठीक था। इससे यह भी निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वे बलवा करनेवाले रहे थे, क्योंकि उन्होंने उसकी सच्ची आराधना को विकृत और भ्रष्ट कर दिया था।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, ऐसा अनुग्रह कर कि जैसे तू ने न केवल अपनी व्यवस्था में हमारे लिए ठहराया है कि क्या उचित है, और हमें भक्तिमय जीवन का मार्ग दिखाया है, वरन् अपने सुसमाचार की ज्योति के द्वारा, जहाँ तेरा पुत्र मसीह धार्मिकता के सूर्य के रूप में चमकता है, अपनी इच्छा हम पर और भी स्पष्ट रूप से प्रकट की है, — हे प्रभु, ऐसा अनुग्रह कर कि हम अपने आप को पूर्ण रूप से तेरे अधीन कर दें, और हृदय से तेरी आज्ञा मानें, और इसी में अपने सारे प्रयत्न लगाएँ और अपने सारे कामों को इसी की ओर लगाएँ, कि इस जीवन की दौड़ पूरी करके हम अन्त में उस धन्य विश्राम में पहुँचें जो हमारे प्रभु मसीह के द्वारा स्वर्ग में हमारे लिए तैयार किया गया है। —
आमीन।
एक सौ तिरसठवाँ व्याख्यान
यिर्मयाह 44:24-26
24. फिर यिर्मयाह ने सब लोगों से और सब स्त्रियों से कहा, हे मिस्र देश में रहनेवाले सारे यहूदियो, यहोवा का वचन सुनो:
24. Et dixit Jeremias ad totum populum et ad mulieres, Audite ser-monem Jehovae, omnis Jehudah, qui estis in terra Aegypti,
25. इस्राएल का परमेश्वर, सेनाओं का यहोवा, यों कहता है, कि तुम ने और तुम्हारी स्त्रियों ने अपने मुँह से कहा और अपने हाथों से पूरा भी किया, कि जो मन्नतें हम ने आकाश की रानी के लिये धूप जलाने और तपावन देने की मानी हैं, उन्हें हम अवश्य ही पूरी करेंगे; इसलिये अब तुम अपनी मन्नतों को अवश्य ही दृढ़ करो और पूरी भी करो।
25. Sic dicit Jehova exercituum, Dells Israel, dicendo, Vos et uxores vestrae locuti estis ore vestro, et im-plevistis manibus vestris, dicendo, Faciendo faciemus vota vestra, quae vovinus ad suffitum adolendum arti-ficio coeli et ad fundendum ei libamina, stabihendo stabilietis vota vestra, et faciendo facietis vota vestra:
26. परन्तु हे मिस्र देश में रहनेवाले सारे यहूदियो, यहोवा का वचन सुनो: सुनो, मैं ने अपने बड़े नाम की शपथ खाई है, यहोवा का यह वचन है, कि अब पूरे मिस्र देश में कोई यहूदी मनुष्य मेरा नाम लेकर फिर कभी न कहने पाएगा कि “प्रभु यहोवा के जीवन की सौगन्ध।”
26. Propterea audite sermonem Jehovae, totus Jehudah, qui habita-tis in terra
Aegypti, Ecce juravi per nomen meum magnum, dicit Jehova, si erit posthac nomen meum invoea-tum in ore (per os) viri Judaei dicen-tis, Vivit Adohai Jehova in tota terra
Aegypti.
यिर्मयाह उसी विषय को आगे बढ़ाता है, और न केवल उन अधर्मी मनुष्यों को कड़ी फटकार देता है जिन्होंने इतने हठ के साथ उसकी शिक्षा को तुच्छ जाना, वरन् यह भी दिखाता है कि अपने इस दुस्साहस से वे कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकते थे, क्योंकि अन्त में वे बलपूर्वक तोड़ डाले जाएँगे; और चूँकि वे सुधारे जाना सह नहीं सकते थे, इसलिये वह आरम्भ में कहता है, तुम ने और तुम्हारी स्त्रियों ने कहा है; पुरुष भी इसमें सम्मिलित हैं: तुम ने, पुरुषों और स्त्रियों दोनों ने, कहा है, और अपने हाथों से उसे पूरा भी किया है; अर्थात् तुम्हारा हठ पूर्ण हो चुका है, क्योंकि जैसे तुम ने परमेश्वर के विरुद्ध ढिठाई से बातें कीं, वैसे ही उनका पालन भी हुआ है; क्योंकि हाथों से वह किए गए काम को सूचित करता है। फिर वह दिखाता है कि वे अधर्म की चरम सीमा तक पहुँच चुके थे, क्योंकि वे ये अधर्मी शब्द उगलने में तनिक भी नहीं हिचकिचाए, “हम परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानेंगे,” और उन्होंने अपने हाथों को अपने मुँह के साथ जोड़ दिया, क्योंकि जो कुछ उन्होंने कहा था उसे उन्होंने पूरे उत्साह से कर दिखाया। केवल वह विचार ही उन्हें दोषी ठहराने के लिये पर्याप्त था; परन्तु जब उन्होंने इस प्रकार अपनी जीभ से बातें कीं, और फिर अपने हाथों को परमेश्वर के विरुद्ध लगाया, तो यह निराश दुस्साहस का प्रमाण था, मानो वे जान-बूझकर उसे क्रोध दिलाना चाहते थे।
परन्तु वह दिखाता है कि इन अधर्मी मनुष्यों का, जो इतनी ढिठाई से परमेश्वर के विरुद्ध बलवा करते थे, क्या परिणाम होनेवाला था। जब वह उन्हें आज्ञा देता है कि सुनो, परमेश्वर ने दूसरी ओर से क्या शपथ खाई है, तो वह परमेश्वर की तुलना उन्हीं से करता है, मानो वह कहता हो, “तुम अपने पागलपन को सौ गुना भी बढ़ा लो, तौभी परमेश्वर ही विजयी होगा; क्योंकि वह ऐसा विरोधी है जो निश्चय ही सब युक्तियों और प्रयत्नों को उलट देगा।” परन्तु इससे पहले कि वह इस पर आए, वह बताता है कि उन्होंने क्या कहा था, करते हुए हम अपनी उन मन्नतों को पूरा करेंगे जो हम ने मानी हैं, धूप जलाने की, इत्यादि। यहाँ यिर्मयाह वही बताता है जो हम पहले देख चुके हैं, कि यहूदी इस बहाने से कि वे वही कर रहे हैं जो पहले किया गया था, इसी प्रकार परमेश्वर के विरुद्ध बलवा करते रहे। यह हम मन्नतों शब्द से समझते हैं; और अन्धविश्वासी लोग, जब उन पर दबाव डाला जाता है, तो सदा इसी बहाने की शरण लेते हैं, कि अपने संकल्प पर डटे रहना बड़ा सद्गुण है। इस प्रकार जब वे चंचलता के दोष से बचना चाहते हैं, तब वे अपने आप को परमेश्वर के विरुद्ध कठोर कर लेते हैं।
यही बात हम आज पोपतन्त्र में देखते हैं: जो जितना अधिक वृद्ध होता है, वह उतना ही अधिक हठीला होता है। “क्या! क्या मैं ने चालीस या पचास वर्षों में यह नहीं सीखा कि धर्म क्या है, और परमेश्वर की आराधना कैसे करनी चाहिए? मुझे बचपन से यही सिखाया गया है, और लम्बे अभ्यास से मैं इसी मार्ग पर चलता आया हूँ: अब मेरे लिये यह लज्जा की बात होगी कि मैं अपना मार्ग बदलूँ और उस विश्वास को छोड़ दूँ जिसका अंगीकार मैं इतने वर्षों से करता आया हूँ।”
तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि जब यहूदियों ने कहा कि उन्होंने मन्नत मानी है, तब वे यिर्मयाह के विरुद्ध इसी प्रकार का बहाना कर रहे थे। क्योंकि कपटी लोग जब कोई मन्नत मानते हैं तो कोई भेद नहीं करते, वरन् जो कुछ उनके मन में आता है उसे बिना विचारे परमेश्वर पर थोप देते हैं; फिर वे अपनी मूर्खतापूर्ण कल्पनाओं पर अटल खड़े रहते हैं, और कहते हैं कि मन्नत अटूट है, एक पवित्र वस्तु है। लोगों का बहाना ऐसा ही था। परन्तु भविष्यद्वक्ता के उत्तर से हम देखते हैं कि वे अपनी उन मन्नतों को, जो बिना विवेक और बिना कारण मानी गई थीं, परमेश्वर के विरोध में कितना व्यर्थ आगे रखते थे।
और इस स्थल पर ध्यानपूर्वक विचार करना चाहिए; ताकि हम विशेष रूप से यह जान लें कि जब मनुष्य अपनी ही कल्पनाओं के अनुसार जो कुछ स्वप्न में देखें उसकी बिना विचारे मन्नत मान लेते हैं, तो यह ऐसी मूर्खता है जो परमेश्वर को किसी भी प्रकार से प्रिय नहीं। अतः परमेश्वर चाहता है कि मन्नतों के विषय में संयम और उसकी इच्छा का ध्यान रखा जाए। परन्तु जब किसी ने बिना सोचे-समझे मन्नत मान ली हो, तो उस पर हठपूर्वक अड़े रहना परमेश्वर को उतना ही अप्रिय है जितनी वह मन्नत स्वयं। यहूदियों ने मन्नत मानी थी; भविष्यद्वक्ता की चेतावनी को उन्हें अपना संकल्प बदलने के लिये विवश करना चाहिए था। परन्तु जब वे हर प्रकार की चंचलता से बचते रहे, तो हम देखते हैं कि स्थिरता के स्थान पर उन्होंने अपनी कुटिलता और शैतानी हठ को परमेश्वर के विरोध में खड़ा कर दिया। इसलिये जब हम उतावली में ऐसी मन्नतें मानते हैं जिन्हें परमेश्वर अस्वीकार करता है, तो उन्हें तुरन्त वापस ले लेने से उत्तम कुछ नहीं; क्योंकि परमेश्वर के पवित्र नाम का दुरुपयोग करके हम पहले ही आवश्यकता से अधिक पाप कर चुके हैं। इसी कारण भविष्यद्वक्ता कहता है कि यहूदियों ने इस प्रकार कहा, करते हुए हम उन मन्नतों को पूरा करेंगे जो हम ने मानी हैं; और वे क्या थीं? तारों और आकाश की सेनाओं के लिये धूप जलाना।
यदि उन्होंने परमेश्वर के लिये कोई मन्नत मानी होती, तो उन्हें अपने दिए हुए वचन को तोड़ना नहीं चाहिए था; परन्तु उन्होंने तो शैतान के लिये मन्नतें मानी थीं; इसलिये उन्हें तुरन्त अपना संकल्प बदल देना चाहिए था। जब मैं कहता हूँ कि परमेश्वर के लिये मानी गई मन्नतें पूरी की जानी चाहिए, तो मेरा अभिप्राय उचित मन्नतों से है; क्योंकि जो बिना विवेक के मन्नत मानता है, वह परमेश्वर के लिये मन्नत नहीं मानता; परन्तु जिन मन्नतों को परमेश्वर स्वीकृति देता है, वे पवित्र मानी जानी चाहिए; और जिन मन्नतों को परमेश्वर ठुकराता है, उन्हें कुछ भी नहीं समझना चाहिए। इससे हम देखते हैं कि यहूदी न्यायपूर्वक दोषी ठहराए गए, क्योंकि वे हठपूर्वक अपनी मूर्तियों के लिये अपनी मन्नतें पूरी करते थे।
वह व्यंग्य के रूप में आगे कहता है, दृढ़ करते हुए तुम अपनी मन्नतों को दृढ़ करोगे, करते हुए तुम अपनी मन्नतों को पूरा करोगे। यहाँ भविष्यद्वक्ता उनकी ढिठाई को तीखेपन से रोकता है, क्योंकि वे इस प्रकार अपने आप को परमेश्वर के विरुद्ध खड़ा करते थे, मानो अपने दुष्ट संकल्प पर डटे रहना कोई बड़ा सद्गुण हो; वह कहता है, तुम बदल नहीं सकते, वरन् दृढ़ करते हुए तुम अपनी मन्नतों को दृढ़ करोगे!
अब तुम यहोवा का वचन सुनो, वह कहता है, इत्यादि। इन शब्दों से, जैसा मैं संकेत कर चुका हूँ, वह सूचित करता है कि अपनी ढिठाई से वे कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकते थे, सिवाय इसके कि वे इससे परमेश्वर को क्रोध दिलाएँ, जिसने दूसरी ओर अपनी शक्ति को उनके विरुद्ध खड़ा किया। सो यहोवा यों कहता है, सुनो, मैं ने अपने बड़े नाम की शपथ खाई है, इत्यादि। चूँकि उन्होंने बार-बार अपने से बोलनेवाले परमेश्वर की उपेक्षा की थी, इसलिये जो कुछ वह कहने पर था उसे उसने शपथ से पक्का किया। यदि वह केवल धमकी देता, तो वे सदा की भाँति उसकी उपेक्षा कर सकते थे, मानो भविष्यद्वक्ता कोई व्यर्थ बात कह रहा हो। यही कारण है कि वह अब परमेश्वर को शपथ खाते हुए प्रस्तुत करता है। और यह ध्यान देने योग्य है कि जब कभी परमेश्वर अपने वचनों को शपथ से पक्का करता है, तो वह ऐसा या तो इसलिये करता है कि वह देखता है कि उसका काम ऐसे मनुष्यों से है जो पत्थरों के समान हैं, जिन्हें सीधे सत्य से कुछ अनुभव नहीं कराया जा सकता; या तब, जब वह हमारी दुर्बलता और आलस्य की सहायता करना चाहता है: क्योंकि परमेश्वर धमकियों और प्रतिज्ञाओं दोनों को शपथ से पक्का करता है। जब वह इस प्रकार धमकियों को पक्का करता है, तब वह परोक्ष रूप से उन लोगों की हठीली दुष्टता को दोषी ठहराता है जिनसे वह बात करता है।
परन्तु जब वह शपथ के साथ कोई प्रतिज्ञा करता है, तो वह दिखाता है कि सन्देह करने की हमारी प्रवृत्ति कितनी बड़ी है, और हमारे विश्वास में कितनी दुर्बलता है; क्योंकि यदि हम में वैसा विश्वास होता जैसा होना चाहिए, तो हम एक छोटे से वचन से ही सन्तुष्ट रहते। अतः जब परमेश्वर अपने नाम को बन्धक के रूप में बीच में रखता है, तो इससे प्रकट होता है कि हम स्वभाव से अविश्वासी हैं, या हमारे विश्वास की दुर्बलता ऐसी है कि उसे इस सहारे की आवश्यकता है। परन्तु यहाँ, चूँकि परमेश्वर धमकी देता है, वह दिखाता है कि यहूदी अपनी दुष्टता में इतने हठीले थे कि उन्हें भय से झकझोरना आवश्यक था।
अब परमेश्वर अपने बड़े नाम की शपथ खाता है। मनुष्य, जैसा प्रेरित कहता है, परमेश्वर की शपथ खाते हैं (इब्रानियों 6:16); क्योंकि जब उसका नाम बीच में लाया जाता है, तब उसे साक्षी और न्यायी के रूप में पुकारा जाता है। परन्तु जब परमेश्वर न केवल अपनी ही शपथ खाता है, वरन् अपने बड़े नाम की, तो यह कोई निरर्थक जोड़ नहीं है। क्योंकि इस प्रकार उसने सूचित किया कि यदि यहूदी यह सोचते थे कि परमेश्वर उनसे पलटा नहीं लेगा, क्योंकि वे अपनी मनमानी करते थे, तो वे बड़े धोखे में थे। क्योंकि कपटियों में यह सामान्य बात है कि वे परमेश्वर को अपनी ही बुद्धि से नापते हैं; और जब वे उसकी सामर्थ्य को घटाते हैं, तो वे उसके विषय में ऐसे सोचते हैं मानो वह कोई बालक हो। अतः यहूदियों से इस झूठी कल्पना को दूर करने के लिये वह कहता है, अपने बड़े नाम की। तो यहाँ परमेश्वर के नाम की उस महानता के बीच, जो मनुष्य की इच्छा से घटाई नहीं जा सकती, और उस प्राचीन प्रजा की ढिठाई के बीच, जिसने परमेश्वर के नाम को तुच्छ बना दिया था, एक विरोध निहित है।
फिर वह आगे कहता है, यदि मेरा नाम, इत्यादि। यह एक अधूरा वाक्य है, जिसका प्रयोग, जैसा हम प्रायः कह चुके हैं, बहुधा इसलिये किया जाता था कि जब हम परमेश्वर के नाम की शपथ खाएँ तो हम अधिक श्रद्धा रखें। अब हमें उस बात पर आना चाहिए जो कही गई है, कोई ऐसा यहूदी न रहेगा जो फिर मेरे नाम की शपथ खाए। परमेश्वर स्वयं शपथ खाता है, और वह कौन सी शपथ खाता है? यह कि कोई उसके नाम को अपवित्र न करने पाएगा; क्योंकि वे सोचते थे कि जब वे यहोवा की शपथ खाते थे तो यह धर्म का कुछ प्रमाण था। तौभी यह परमेश्वर के नाम की एक भयानक अपवित्रता के सिवाय और कुछ न था। जैसा प्रतीत होता है, उन्होंने अपने आप को मिस्री अन्धविश्वासों से अशुद्ध कर लिया था; परन्तु इसलिये कि वे स्वयं मिस्रियों से भिन्न दिखें और उनके पास कोई विशेष बात हो, अर्थात् संक्षेप में, वे एक पवित्र जाति प्रतीत हों, उन्होंने अब भी शपथ खाने का एक ऐसा रूप बनाए रखा जो अन्यजातियों में प्रचलित रूप से भिन्न था। परमेश्वर घोषणा करता है कि वह मिस्र में अपने नाम का और अधिक अनादर से प्रयोग होना सहन नहीं करेगा। वह कहता है, अब से किसी यहूदी के मुँह से मेरा नाम पुकारा न जाएगा। और कि वह शपथों के विषय में बोलता है, यह हम अगले शब्दों से जानते हैं, जब वह कहता है, पूरे मिस्र देश में, यहोवा जीवित है। क्योंकि, जैसा कहा जा चुका है, यहूदी अब भी घमण्ड करते थे कि वे व्यवस्था का पालन करते हैं, क्योंकि परमेश्वर का नाम अब भी उनके मुँह में और उनकी जीभ पर था। परन्तु परमेश्वर कहता है कि वह उनसे छीन लिया जाएगा, क्योंकि जब वे हर प्रकार के अन्धविश्वासों में मिस्रियों के साथ घुल-मिल जाते थे, और तौभी घमण्ड करते थे कि वे परमेश्वर की प्रजा हैं, तो यह उसके नाम का लज्जाजनक अपवित्रीकरण था। आगे लिखा है, —
यिर्मयाह 44:27
27. सुनो, मैं अब उनकी भलाई नहीं, हानि ही की चिन्ता करूँगा; और मिस्र देश में रहनेवाले सब यहूदी, तलवार और महंगी के द्वारा मिटकर नाश हो जाएँगे, जब तक कि उनका सर्वनाश न हो जाए।
27. Ecce ego vigilo super eos in malum, et non in bonum; et consumentur omnes viri (omnis vir, ad verbum) Jehudah, quicunque sunt in terra Aegypti gladio et fame usque dum consumantur (est quidem, aliud verbum, sed ejusdem significationis.)
यहाँ वह और भी स्पष्ट रूप से वह बात व्यक्त करता है जो उसने पिछले पद में कही थी, कि मिस्र में यहूदियों में से कोई भी जीवित न बचेगा। अब वह इसकी रीति बताता है, अर्थात् यह कि जब तक वे पूरी रीति से नाश होकर अन्तिम विनाश तक न पहुँच जाएँ, तब तक वह उन्हें मिटाना बन्द नहीं करेगा। उसने कहा था, अब से मेरा नाम न पुकारा जाएगा, और न मिस्र में यहूदी यह शपथ खाएँगे, “यहोवा जीवित है”; और क्यों? क्योंकि मैं उन सब को नष्ट कर दूँगा, यहाँ तक कि मिस्र में कोई ऐसा न बचेगा जो झूठे बहाने से मेरे नाम को अपवित्र करे।
वह कहता है, मैं उन पर हानि के लिये जागता रहूँगा, भलाई के लिये नहीं। यह कहने की रीति हम अन्यत्र देख चुके हैं, और समझा चुके हैं कि भविष्यद्वक्ता इस प्रकार क्यों बोलते थे; अर्थात् इसलिये कि कपटी लोग, यद्यपि वे सोचते हैं कि परमेश्वर मनुष्यों के कार्यों की चिन्ता नहीं करता, और कल्पना करते हैं कि वह स्वर्ग में सोया पड़ा है, और इसलिये दुस्साहस से उसे क्रोध दिलाते हैं, मानो वे भगोड़े हों और उनका उद्देश्य परमेश्वर से छिपा हो, तौभी परमेश्वर के विधान पर घमण्ड करते हैं, और दिखावा करते हैं कि वे भरोसे के साथ उसी में विश्राम करते हैं। इसी कारण भविष्यद्वक्ता ने उत्तर दिया कि परमेश्वर जागता तो है, परन्तु भलाई के लिये नहीं। तो हम भविष्यद्वक्ता का उद्देश्य समझते हैं; उसने लोगों की उस ढिठाई का उपहास किया जो सोचते थे कि परमेश्वर को उनकी कुशल की चिन्ता है। फिर वह कहता है कि परमेश्वर सचमुच सोता नहीं, परन्तु इससे कपटियों को कोई लाभ न होगा; क्योंकि यद्यपि परमेश्वर अपनी प्रजा की रक्षा करने के लिये पिता के समान जागता है, तौभी वह सब अधर्मियों को नष्ट करने के लिये न्यायी के समान भी जागता है। आगे लिखा है, —
यिर्मयाह 44:28
28. और जो तलवार से बचकर और मिस्र देश से लौटकर यहूदा देश में पहुँचेंगे, वे थोड़े ही होंगे; और मिस्र देश में रहने के लिये आए हुए सब यहूदियों में से जो बच रहे हैं, वे जान लेंगे कि किसका वचन पूरा हुआ, मेरा या उनका।
28. Et qui evaserint e gladio re-vertentur e terra Aegypti in terram Jehudah pauci numero; et cognoscent omnes reliquiae Jehudah, quae ingressi sunt terram Aegypti, ut habitarent illic, sermo quis stabit a me, an ab ipsis.
अन्त में वह यह जोड़ता है कि थोड़े लोग बच निकलेंगे। उसने पहले (यिर्मयाह 44:14) कहा था कि कोई न बचेगा, परन्तु पद के अन्त में जोड़ा था, “केवल वे जो बच निकलेंगे।” हम कह चुके हैं कि इस दूसरे वाक्यांश को उन यहूदियों के विषय में समझाना चाहिए जो बाबुल में बंधुआई में भेजे गए थे। परन्तु यदि इसे मिस्र के निर्वासितों पर लागू किया जाए, तो अर्थ भिन्न होगा। क्योंकि तब भविष्यद्वक्ता ने कहा था कि कोई न बचेगा, कोई जीवित न रहेगा: इस प्रकार उसने निस्सन्देह मिस्र में रहनेवालों के विषय में छुटकारे की हर आशा छीन ली। परन्तु उसने जोड़ा, “केवल वे जो बच निकलेंगे,” अर्थात् वे जो चुपके से तलवार से बच निकलेंगे, मानो वे कभी मिस्र गए ही न हों। और फिर इसी भिन्न अर्थ में आवश्यक रूप से वह बात ली जानी चाहिए जो भविष्यद्वक्ता अब जोड़ता है, जो बच निकलेंगे वे लौटेंगे। परन्तु हमें स्मरण रखना चाहिए कि जो जीवित बचेंगे वे निर्वासितों में गिने न जाएँगे, क्योंकि उन्होंने अपने आप को ऐसा अलग कर लिया होगा कि वे अब उस प्रजा का भाग न रहें। वे पहले भगोड़े बन चुके थे, परन्तु जब वे मिस्र से निकल गए, तो उस दूसरे पलायन ने उन्हें उस देश में अब बचे हुओं में न रहने दिया।
इसलिये जब भविष्यद्वक्ता घोषणा करता है कि बचे हुओं में से कोई न बच निकलेगा, तो हमें इन शब्दों का अर्थ यह समझना चाहिए कि मिस्र में फिर यहूदी न रहेंगे, क्योंकि उनका स्मरण तक मिटा दिया जाएगा। परन्तु जब दूसरे स्थान पर वह बच निकलनेवालों का, {,}פליטיםpelithim, उल्लेख करता है (यह वह शब्द है जिसका अनुवाद हम ने “जो बच निकलेंगे” किया है), तो उसका अभिप्राय यह है कि जो बच निकले थे वे अब बचे हुओं में गिने जाना बन्द हो गए थे, क्योंकि उन्होंने एक प्रकार से अपनी ही इच्छा से अपने आप को उनसे अलग कर लिया था, यहाँ तक कि वे अब मिस्र में भगोड़े निर्वासितों में न गिने जाने को थे।
फिर वह कहता है कि जो तलवार से बच निकलेंगे वे यहूदा देश में लौटेंगे; यह घटना उनकी आशा से सर्वथा भिन्न थी, क्योंकि वे विजयी रीति से अपने देश को लौटने की आशा रखते थे। वे तो मिस्र में केवल कुछ समय के लिये रहना चाहते थे; और उन्हें आशा थी कि जब कसदी दूर चले जाएँगे, तब वे बाद में आकर देश पर स्वतन्त्र अधिकार कर लेंगे। इस प्रकार उन्होंने अपने लिये एक नए राज्य की कल्पना कर ली थी, और वे बड़ी धूमधाम के बिना लौटने को तैयार न थे।
अतः जब उन्होंने ऐसी पुनःस्थापना की कल्पना कर ली थी, तो भविष्यद्वक्ता कहता है कि केवल थोड़े ही लोग यहूदा देश में लौटेंगे; और फिर यह कि वे देश पर अधिकार करने और उसे अपने निज भाग के रूप में भोगने के लिये नहीं लौटेंगे, वरन् इसलिये लौटेंगे कि कोई सुरक्षित कोना न रहेगा जहाँ वे छिप सकें। इससे हम देखते हैं कि यह लौटना उस झूठी कल्पना के विरोध में रखा गया है जिसमें यहूदी मग्न थे; और वह कहता है कि केवल थोड़े ही लौटेंगे।
और अन्त में वह जोड़ता है, यहूदा के सब बचे हुए लोग जो मिस्र देश में आए थे, जान लेंगे कि किसका वचन स्थिर रहेगा, मेरा या उनका। यहाँ अन्त में वाक्य पूरा होता है, क्योंकि मैं कह चुका हूँ कि भविष्यद्वक्ता का उद्देश्य यहूदियों को उनकी मूर्खतापूर्ण और अधर्मी ढिठाई का दोषी ठहराना था, जब वे अपनी कुटिलता में परमेश्वर से झगड़ते थे, मानो वह कहता हो, “हे अभागो, तुम्हारा क्या अभिप्राय है? क्या परमेश्वर की सच्चाई को झुकना पड़ेगा, या क्या तुम अपने पागलपन और हठ से उसकी युक्ति को निष्फल कर सकते हो? निश्चय ही परमेश्वर तुम से अधिक बलवन्त सिद्ध होगा।” अब वह अपना अभिप्राय पूर्ण रूप से समझाता है। सब जान लेंगे, यह कहकर वह सच्चे और निष्कपट ज्ञान की ओर नहीं, वरन् अनुभव की ओर संकेत करता है; अर्थात् अन्त में वे सचमुच जान लेंगे कि किसका वचन दृढ़ है, मेरा या उनका।
यह स्थल विशेष ध्यान के योग्य है; इससे हम सीखते हैं कि हमें परमेश्वर के वचन में सन्तुष्ट रहना और उसे पूरी रीति से ग्रहण करना चाहिए, और विशेषकर उस शैतानी हठ से सावधान रहना चाहिए जिसे भविष्यद्वक्ता यहाँ दोषी ठहराता है; क्योंकि जब हम अन्त तक लड़ते रहते हैं, तो अन्त में हमें अवश्य गिरना पड़ेगा; चाहे हम सौ बार शिकायत करें और चिल्लाएँ, तौभी परमेश्वर का वचन दृढ़ खड़ा रहेगा और हमारे आगे कभी न झुकेगा। आगे लिखा है, —
यिर्मयाह 44:29-30
29. और इस बात का मैं यह चिन्ह देता हूँ, यहोवा की यह वाणी है, कि मैं तुम्हें इसी स्थान में दण्ड दूँगा, जिस से तुम जान लो कि तुम्हारी हानि करने में मेरे वचन निश्चय पूरे होंगे।
29. Et hoc vobis signum, dicit Jehovah, quod visitabo ego super vos in hoc loco, ut sciatis quod stando stabunt sermones mei super vos in malum.
30. यहोवा यों कहता है, देखो, जैसा मैं ने यहूदा के राजा सिदकिय्याह को उसके शत्रु और उसके प्राण के खोजी बाबुल के राजा नबूकदनेस्सर के हाथ में कर दिया, वैसे ही मैं मिस्र के राजा फ़िरौन होप्रा को भी उसके शत्रुओं के, अर्थात् उसके प्राण के खोजियों के हाथ में कर दूँगा।
30. Sic dicit Jehova, Ecce ego trado Pharaonem Ophra regem Aegypti in manum inimicorum ejus, et in manum quaerentium animam ejus; quemadmodum tradidi
Zedechiam regem Jehudah in manum Nabuchadnezer regis Babylonis, inimici ejus et quaerentis animam ejus.
यिर्मयाह अपनी भविष्यद्वाणी पर एक चिन्ह जोड़कर मुहर लगाता है, जो फिर भी उसके साथ-साथ ही घटित होनेवाला था। अतः यह, जैसा वे कहते हैं, कोई पूर्वसूचक चिन्ह न था। और निस्सन्देह यहूदी इस योग्य बिलकुल न थे कि परमेश्वर उन्हें कोई असाधारण बात दिखाए; परन्तु यह चिन्ह केवल इसलिये जोड़ा गया कि वे जान लें कि मिस्र की रक्षा पर उनका भरोसा व्यर्थ था, और यह भी कि हर बहाना छीन लिया जाए।
यह संक्षिप्त टिप्पणी कदाचित् अस्पष्ट हो। इसलिये हम एक भेद का उल्लेख करेंगे जो विद्यमान है: कुछ चिन्ह बातों के समय और क्रम से पहले आते हैं, परन्तु अन्य स्वयं घटनाओं से जुड़े होते हैं। जो चिन्ह घटनाओं से पहले आते हैं, वे विश्वासियों के मनों को तैयार करने में सहायक होते हैं, ताकि वे सन्देह न करें कि परमेश्वर वही करेगा जिसकी उसने प्रतिज्ञा की है; जैसे जब गिदोन ने परमेश्वर से चिन्ह माँगा, और वह उसे दिया गया; भूमि ओस से भीगी थी, जबकि ऊन सूखा रहा; और फिर ऊन सूखा रहा जबकि भूमि भीगी थी। (न्यायियों 6:36-40।) इस चिन्ह से गिदोन को अपने मार्ग पर आगे बढ़ने का साहस मिला, जबकि पहले सन्देह ने उसे निष्क्रिय बना रखा था; गिदोन सुस्त पड़ा था, परन्तु जब उसने इस आश्चर्यकर्म से देखा कि उसे विजय दी जाएगी, तब उसने साहसपूर्वक उस कार्य को हाथ में लिया जो उसे सौंपा गया था। अधिकतर चिन्ह इसी प्रकार के होते हैं। परन्तु कुछ अन्य चिन्ह हैं जो घटनाओं से पहले नहीं आते, परन्तु यह दिखाते हैं कि जब समय पूरा हुआ तो वे घटनाएँ सचमुच पहले से बताई गई थीं; जैसे जब परमेश्वर ने मूसा से कहा, “मैं तुझे यह चिन्ह देता हूँ, कि मिस्र से निकलने के बाद तुम इसी पहाड़ पर मेरे लिये बलि चढ़ाओगे।” (निर्गमन 3:12)
न तो मूसा और न लोग मिस्र से निकलने से पहले उस चिन्ह से कुछ जान सकते थे। परन्तु छुटकारा पाने के बाद उन्होंने वहाँ तीसरे दिन अपने छुड़ानेवाले परमेश्वर का धन्यवाद किया।
अतः चिन्ह कभी तो बीते समय से सम्बन्ध रखते हैं, और कभी आनेवाले समय से। जो आनेवाले समय से सम्बन्ध रखते हैं, वे ऐसे हैं जिन्हें हम पूर्वसूचक कहते हैं, जैसा गिदोन के विषय में हुआ, जिसने तत्परता से हथियार उठाए, क्योंकि वह जानता था कि वह परमेश्वर के झण्डे के नीचे लड़ रहा है; और जब उसने समझ लिया कि परमेश्वर उसका अगुवा होगा, तब उसे विजय का पूरा निश्चय हो गया।
तो इस चिन्ह का सम्बन्ध आनेवाले समय से था। परन्तु मूसा को दिया गया चिन्ह पीछे की ओर देखनेवाला था, क्योंकि लोगों ने और भी स्पष्ट रूप से देखा कि परमेश्वर ही उनका छुड़ानेवाला रहा है, क्योंकि मूसा से, जब वह अभी जंगल में ही था, पहले से कह दिया गया था कि इस्राएली वहाँ आएँगे; और वह स्थान, अर्थात् सीनै पर्वत, पहले से ही उस आराधना के लिये ठहराया गया था जो बाद में परमेश्वर को अर्पित की गई। उस समय लोगों ने इस पर विचार किया, और जो पहले से कहा गया था उसे स्मरण करके वे परमेश्वर के अनुग्रह पर अपने विश्वास में और भी अधिक दृढ़ होते गए। यहाँ उल्लिखित चिन्ह भी ऐसा ही था; यिर्मयाह कहता है, यह एक चिन्ह होगा, अर्थात् यह कि परमेश्वर फ़िरौन होप्रा को उसके शत्रु नबूकदनेस्सर के हाथ में कर देगा।
यदि उस समय किसी ने भविष्यद्वक्ता से पूछा होता कि वह मिस्र के राजा के विषय में क्यों बोलता है, तो वह कहता, “अभी तो यह चिन्ह मानो गड़ा हुआ पड़ा है, उसका उपयोग दिखाई नहीं देता; परन्तु परमेश्वर उचित समय पर दिखा देगा कि उसकी आज्ञाएँ मुझे सौंपी गई हैं, क्योंकि जो कुछ मैं मिस्र के राजा के विषय में भविष्यद्वाणी करता हूँ वह पूरा होगा।” यह चिन्ह इसलिये भी जोड़ा गया, क्योंकि यह बात अविश्वसनीय प्रतीत होती थी, अर्थात् यह कि मिस्र, जो हर ओर से दृढ़ता से गढ़बन्द था, जीता जा सकता है। अतः जब शत्रुओं के लिये, विशेषकर पेलूसियम की ओर से, कोई प्रवेश-द्वार खुला न था, तो यहूदी सोचते थे कि वे, जैसा कहा जाता है, चन्द्रमा के घेरे के भीतर रहते हैं, और संकट की पहुँच से परे रखे गए हैं। अतः जब वे मिस्र की रक्षा पर भरोसा करते थे, और उस देश को अजेय समझते थे, तो उनके इस भरोसे का उपहास किया गया।
और भविष्यद्वक्ता स्पष्ट रूप से फ़िरौन के उपनाम का उल्लेख करता है, जो होप्रा था, जिसका अर्थ मुझे ज्ञात नहीं; और सम्भवतः यह कोई मिस्री शब्द है, क्योंकि इब्रानी में ऐसा कोई शब्द नहीं है: और यह भी ज्ञात नहीं कि फ़िरौन शब्द कहाँ से आया है। हम जानते हैं कि मिस्र के सब राजाओं का यही नाम था, जैसे रोम के सम्राट जूलियस सीज़र की स्मृति में सीज़र कहलाते थे। मिस्र के राजा इसी प्रकार फ़िरौन कहलाते थे। परन्तु हर एक का अपना नाम होता था जिससे वह औरों से अलग पहचाना जाए; और यह राजा होप्रा कहलाता था।
अब जो भविष्यद्वक्ता ने पहले से कहा, वह, यदि हम योसेफ़स का विश्वास करें, उनके मिस्र जाने के लगभग चौथे वर्ष में पूरा हुआ। क्योंकि नबूकदनेस्सर मोआबियों और अम्मोनियों को लूटने के बाद फिर मिस्र में उतरा, और अन्त में उस राज्य पर अधिकार कर लिया। परन्तु जब यिर्मयाह ने राज्य के विनाश की भविष्यद्वाणी की, तो यह एक घृणित सन्देश था। और इसमें कोई सन्देह नहीं कि संकट उसकी आँखों के सामने था, जब उसने देखा कि वह ऐसे अधर्मी मनुष्यों से बात कर रहा है जो सौ बार उसका नाश चाहते थे। अतः जब उसने राजा, सारी प्रजा और देश के विरुद्ध भविष्यद्वाणी करने का साहस किया, तो इससे हम देखते हैं कि उसकी दृढ़ता और उसका साहस कितना बड़ा रहा होगा, कि वह फिर भी निडरता से अपना पद निभाता रहा; क्योंकि वह संकट से भयभीत न हुआ, वरन् जो कुछ परमेश्वर ने उसे सौंपा था उसे प्रचार करता रहा। तो यहाँ हमारे सामने उदारचित्त साहस का एक अनोखा उदाहरण है; क्योंकि भविष्यद्वक्ता परमेश्वर की आज्ञा मानते हुए अपने प्राण को जोखिम में डालने से न हिचकिचाया।
यह कहकर, मैं मिस्र के राजा को उसके शत्रुओं के हाथ में, और उसके प्राण के खोजियों के हाथ में कर दूँगा, वह सूचित करता है कि प्राणघातक शत्रु होंगे, यद्यपि वह केवल एक ही शत्रु की बात करता है, परन्तु वह सेना को उसके प्रधान के साथ जोड़ देता है: मैं फिर फ़िरौन को बाबुल के राजा नबूकदनेस्सर के हाथ में कर दूँगा, जैसे मैं ने सिदकिय्याह को उसके शत्रु के, और उसके प्राण के खोजी के हाथ में कर दिया; मानो वह कहता हो, “मिस्र के राजा की दशा सिदकिय्याह की दशा से अच्छी न होगी।” क्योंकि सिदकिय्याह उस पवित्र सिंहासन पर बैठा था जिसके विषय में परमेश्वर ने साक्षी दी थी, “यहाँ मैं वास करूँगा;” और फिर, “दाऊद के सिंहासन पर उसके वंश में से कोई सदा बना रहेगा।”
इससे हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता बड़े से छोटे की ओर तर्क करता है; क्योंकि यदि परमेश्वर ने राजा सिदकिय्याह को, जो मानो एक पवित्र व्यक्ति था, नहीं छोड़ा, तो मिस्र के राजा के विषय में, जो केवल सामान्य और साधारण रीति से राज्य करता था, कुछ भी अच्छे की आशा नहीं की जा सकती थी। तो जो कहा गया है उसका सार यह है कि यहूदी घटनाओं के द्वारा पहले ही भली-भाँति सिखाए जा चुके थे कि उसकी भविष्यद्वाणियाँ कितनी सच्ची थीं; क्योंकि उसने वह बात पहले से कही थी जो अन्त में सिदकिय्याह पर बीती; परन्तु उसके वचन का विश्वास नहीं किया गया। वह कहता है, “अब वह समय है जब यहूदियों को जान लेना चाहिए कि मैं परमेश्वर का विश्वासयोग्य दास हूँ, क्योंकि परमेश्वर ने सिदकिय्याह के विषय में एक प्रमाण दे दिया था, जो उनकी स्मृति में स्थिर बना रहना चाहिए था।”
अब यदि वे सोचते थे कि मिस्र का राजा संकट से परे है, तो वे परमेश्वर पर बड़ा अन्याय आरोपित करते थे, जिसने सिदकिय्याह को भी, जो उसके नाम से और उसकी आज्ञा से अभिषिक्त किया गया था, नहीं छोड़ा था। तो इस स्थल का अभिप्राय यही है।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जब तू ने हमें लेपालक बनाकर यह आदर दिया है कि हम तेरे नाम को पुकार सकें, — तो हमें यह अनुग्रह दे कि हम शुद्ध मुँह से तुझे पुकारें, जिस से हमारे जीवन के सम्पूर्ण काल में हमारे बीच तेरी महिमा हो; और जब हम तुझे वह सच्ची आज्ञाकारिता अर्पित करने का परिश्रम करें जिसकी तू माँग करता है, तब तेरी सच्चाई हमारे बीच अधिकाधिक फैलती जाए, और तेरे नाम का स्मरण अधिकाधिक फलता-फूलता रहे, जब तक कि हम अन्त में उस महिमा में न पहुँच जाएँ, जिसके विषय में हम जानते हैं कि वह हमारे प्रभु मसीह के द्वारा स्वर्ग में हमारे लिये रखी हुई है। — आमीन।
