यिर्मयाह और विलापगीत पर टीका · खण्ड 2 · यिर्मयाह 39

यिर्मयाह 39

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यिर्मयाह 39

यिर्मयाह 39:1-2

1. यहूदा के राजा सिदकिय्याह के राज्य के नौवें वर्ष के दसवें महीने में बाबुल के राजा नबूकदनेस्सर ने अपनी सारी सेना समेत यरूशलेम पर चढ़ाई की, और उन्होंने उसे घेर लिया।

1. Anno nono Zedechiae regis Jehudah, mense decimo venit Nebuchadnezer rex Babylonis et totus exercitus ejus Jerosolymam, et obsiderunt eam.

2 और सिदकिय्याह के राज्य के ग्यारहवें वर्ष के चौथे महीने के नौवें दिन को नगर तोड़ा गया।

2. In undecimo anno Zedechiae, mense quarto, nona mensis, disrupta fuit urbs.

यहाँ यिर्मयाह सचमुच भविष्यद्वक्ता का नहीं, वरन् इतिहासकार का कार्य करता हुआ प्रतीत होता है; परन्तु वह अपनी पिछली भविष्यद्वाणियों पर मुहर लगाता है, और साथ ही यह दिखाता है कि उसने कोई भी बात उतावली से या बिना सोचे-समझे नहीं कही थी। अतः यहाँ उसकी समस्त पूर्व शिक्षा का प्रमाण है; वह वास्तविक घटना को हमारे सामने रखता है, और दिखाता है कि जो कुछ उसने पहले से कहा था वह सब परमेश्वर के हाथ से, और लगभग अविश्वसनीय रीति से, पूरा हुआ। अब हम समझते हैं कि इस अध्याय में क्या है। वह कहता है कि राजा नबूकदनेस्सर आया, यद्यपि वह शीघ्र ही घेराबन्दी से चला गया; क्योंकि, जैसा हम अभी देखेंगे, वह रिबला को गया, जो, जैसा कुछ लोग समझते हैं, सीरिया का अन्ताकिया था; परन्तु इसके विषय में हम उचित स्थान पर बात करेंगे। इसलिए जब राजा अपनी सेना के साथ आया, तो वह शीघ्र ही चला गया, और उसका अभिप्राय यह था कि जब तक नगर घिरा रहे तब तक वह आराम से और सुख-विलास का आनन्द लेता हुआ रहे; वह लम्बे युद्ध का कष्ट और थकान उठाने को तैयार न था; तौभी अधिक भय फैलाने के लिये वह स्वयं नगर तक आया और अपनी सेना को निर्देश दिए।

हमें समय पर ध्यान देना चाहिए: वह नौवें वर्ष के दसवें महीने में आया, अर्थात् लगभग वर्ष के अन्त में। इसमें सन्देह नहीं कि सिदकिय्याह अच्छी आशा बाँधे हुए था, यद्यपि कसदी सेना के आने के विषय में समाचार उड़ रहे थे; क्योंकि राजा ने युद्ध के लिये उतनी शीघ्रता से तैयारी नहीं की थी जितनी उसे करनी चाहिए थी। उसने सोचा कि बाबुल के राजा से उसका विद्रोह बिना दण्ड के छूट जाएगा। परन्तु भविष्यद्वक्ता यहाँ हमें स्मरण दिलाता है कि वह झूठा भरोसा था; क्योंकि यद्यपि परमेश्वर ने कुछ समय तक उसे छोड़े रखा और अपने न्याय को रोके रखा, तौभी अन्त में उसने उसके विद्रोह की अभक्ति का दण्ड दिया, जिसके साथ कृतघ्नता भी जुड़ी थी, जैसा पहले कहा जा चुका है। नौवें वर्ष और दसवें महीने के विषय में इतना ही।

फिर आगे आता है, ग्यारहवें वर्ष के चौथे महीने में नगर तोड़ा गया

इससे हम देखते हैं कि नगर डेढ़ वर्ष तक घिरा रहा; क्योंकि पूरा दसवाँ वर्ष था, और फिर उसमें नौवें वर्ष के दो महीने और ग्यारहवें वर्ष के चार महीने जोड़ने होंगे; और इस प्रकार पूरा समय डेढ़ वर्ष हुआ। यहाँ हमें यह भी स्मरण रखना चाहिए कि यहूदियों ने कितना कष्ट सहा होगा; क्योंकि यदि आज के दिन कोई नगर कुछ महीनों तक घेराबन्दी सह ले, तो वह वीरता का एक दुर्लभ उदाहरण समझा जाएगा; परन्तु यरूशलेम डेढ़ वर्ष तक घिरा रहा। अब हम विचार करें कि वहाँ कितने लोग रहे होंगे; और हम देख चुके हैं कि भविष्यद्वक्ता ने उन्हें अकाल की धमकी दी थी। और नगर में कितनी तंगी थी, इसकी साक्षी भविष्यद्वक्ता ने न केवल अन्य स्थानों पर दी है, वरन् विलापगीत की पुस्तक में उसने इसे सबसे पूर्ण रूप से दिखाया है। (विलापगीत 4:10।) और केवल अकाल ही नहीं था, वरन् उसके पीछे मरी भी आई। इससे हम जानते हैं कि राजा का स्वभाव कितना क्रूर रहा होगा, कि वह अभागे मनुष्यों को झुण्ड के झुण्ड मरते देख सकता था, और फिर भी अपने हठ पर अड़ा रहा।

न इसमें कोई सन्देह है कि प्रजा भी अपनी ओर से हठीली थी, और अन्त में अपने कष्टों के कारण जड़ हो गई थी; क्योंकि छोटे से लेकर बड़े तक कदाचित् ही कोई ऐसा था जिसने भविष्यद्वक्ता की शिक्षा को तुच्छ न जाना हो; और इस प्रकार वे सब उन्माद और मूर्खता से अन्धे हो गए थे।

यह ध्यान देने योग्य है कि उन्होंने एक वर्ष और छः महीने तक घेराबन्दी सही, और तब भी वे आत्मसमर्पण के लिये राजी न हुए, जब तक कि नगर तोड़ा न गया, अर्थात् जब तक दीवारें युद्ध-मेढ़ों और अन्य युद्ध-यन्त्रों से गिरा न दी गईं; क्योंकि नगर तब तोड़ा गया जब यन्त्रों की मार खाकर शहरपनाह गिर पड़ी। संक्षेप में, नगर धावा बोलकर जीता गया; यही अभिप्राय है, और आगे इसे और अधिक स्पष्ट रूप से कहा जाएगा। परन्तु अब मैं इससे आगे नहीं बढ़ सकता।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, हमें यह अनुग्रह दे कि जब हम इतने संकटों से घिरे हैं, और अपने पापों के द्वारा प्रतिदिन अपने ऊपर इतनी विपत्तियाँ लाते हैं, — तो हम कम से कम तेरी धमकियों के आगे झुक जाएँ, और समय रहते तेरी कृपा को खोजना और तेरे न्याय से पहले ही सचेत होना सीखें, और तेरे सामर्थी हाथ के नीचे अपने आप को ऐसा दीन करें कि हम दीन-हीन पापी, जो तेरी दया की शरण लेते हैं, तुझे अपने प्रति अनुग्रहकारी पाएँ, यहाँ तक कि अन्त में अपने सब पापों से छुटकारा पाकर हम तेरे न्यायासन के सामने उपस्थित हों, और वहाँ अपने विश्वास का प्रतिफल पाएँ, अर्थात् वह धन्य अमरता, जिसे तेरे एकलौते पुत्र, हमारे प्रभु ने अपने ही लहू से हमारे लिये प्राप्त किया है। — आमीन।

एक सौ इक्यावनवाँ व्याख्यान

यिर्मयाह 39:3-4

3. और बाबुल के राजा के सब हाकिम भीतर आकर बीच के फाटक में बैठ गए, अर्थात् नेर्गलसरेसेर, समगर्नबो, सर्सकीम, रबसारीस, नेर्गलसरेसेर, रबमाग, और बाबुल के राजा के और सब बचे हुए हाकिम।

3. Et ingressi sunt omnes duces regis Babylonis, et sederunt in porta media, Neregal, Sarezer, Samegar, Nebusarzechin Rabsaris, Neregal, Sarezer, Rabmag, et residuum ducum (hoc est, et alii duces) regis Babylonis.

4. और ऐसा हुआ कि जब यहूदा के राजा सिदकिय्याह और सब योद्धाओं ने उन्हें देखा, तब वे भाग चले, और रात ही रात राजा की बारी के मार्ग से, दोनों दीवारों के बीच के फाटक से होकर नगर से निकल गए; और वह अराबा के मार्ग से चला गया।

4. Et factum est cum vidisset eos Zedechias rex Jehudah, et omnes viri militares, tunc aufugerunt, et egressi sunt ex urbe noctu per viam horti regis ad portam inter duos muros, et egressus est per viam deserti.

यहाँ यह प्रमाणित होता है कि यिर्मयाह की भविष्यद्वाणी पूरी हुई; यहाँ तक कि यह वास्तव में प्रकट हो गया कि उसने बिना सोचे-समझे नहीं, वरन् परमेश्वर के मुख से बात कही थी। और इस प्रकार वह बात भी पूरी हुई जो एक प्रचलित कहावत के रूप में कही जाती है, कि मूर्ख बहुत देर से बुद्धिमान होते हैं; क्योंकि जब तक अवसर रहता है तब तक वे अच्छी और बुद्धिमानी की सम्मतियों को कभी नहीं मानते, परन्तु अन्त में अपनी ही विपत्तियों के द्वारा, और अनुभव रूपी अपने शिक्षक के द्वारा, उन्हें यह जानना पड़ता है कि जिसे उन्होंने तुच्छ जाना था वह सत्य है, परन्तु तब उससे कोई लाभ नहीं होता। यही सिदकिय्याह के साथ हुआ, जिसे भविष्यद्वक्ता ने बार-बार समझाया था कि वह अपने आप को राजा नबूकदनेस्सर के हाथ सौंप दे।

अतः जब उसने हठ करके जूए को अस्वीकार किया था, तो अन्त में उसे विवश होकर अपने हठ का फल काटना पड़ा।

अब यिर्मयाह कहता है कि राजा नबूकदनेस्सर के हाकिम, अर्थात् वे जिन्हें उसने अपनी सेनाओं पर नियुक्त किया था, शहरपनाह के टूट जाने पर नगर में घुस आए, और बीच के फाटक में बैठ गए; क्योंकि उन्हें सावधान रहना आवश्यक था, कि कहीं घात में बैठे लोग न हों; और विजेता भी किसी नगर के ले लिए जाने पर तुरन्त उसके हर भाग में नहीं घुस जाते, वरन् पहले जाँचते हैं कि सब स्थान शत्रुओं से खाली हैं या नहीं। सो सेना के नायकों ने यही किया, क्योंकि वे बीच के फाटक में ठहरे, ताकि नगर पर अधिकार चला सकें और फिर भी हर प्रकार की घात से सुरक्षित रहें। यिर्मयाह उनमें से कुछ का नाम लेकर उल्लेख करता है, परन्तु यह निश्चित नहीं कि वह उनमें से कुछ के साथ उपनाम भी जोड़ता है या नहीं। परन्तु चूँकि यह सन्दिग्ध है और इसका कोई बड़ा महत्त्व नहीं, हमारे लिये इतना पर्याप्त है कि वृत्तान्त को विश्वसनीय ठहराने के लिये नायकों में से मुख्य लोगों के नाम दिए गए हैं। फिर वह आगे कहता है, जब सिदकिय्याह ने उन्हें देखा, इत्यादि; इसका अर्थ यह नहीं कि वह उस भाग तक आया, वरन् यह कि जब उसने समझ लिया कि नगर का वह भाग शत्रुओं के अधिकार में आ गया है; क्योंकि तब तक बात अन्तिम सीमा तक पहुँच चुकी थी। तब वह अपने योद्धाओं के साथ भाग गया। और यहाँ हमारे सामने एक दुःखद दृश्य रखा गया है: जो पुरुष युद्ध में किसी भी प्रकार प्रशिक्षित न थे वे नगर में छोड़ दिए गए, स्त्रियाँ और बच्चे भी वहाँ छोड़ दिए गए, जबकि योद्धा भाग निकले, क्योंकि उनकी दशा और भी बुरी थी, इस कारण कि उन्होंने नगर के ले लिए जाने में विलम्ब कराया था। अतः उन्होंने वैसा ही किया जैसा सामान्यतः किया जाता है, अर्थात् वे भाग गए। तौभी हम देखते हैं कि अभक्त मनुष्य स्वर्गीय सत्य को बहुत समय तक तुच्छ जानने के बाद संकट के समय भागते हैं, और ऐसे भय से भर जाते हैं कि वे अपने आप को सिर के बल अनेक संकटों में झोंक देते हैं। यह उन लोगों का उचित प्रतिफल है जो परमेश्वर की धमकियों से नहीं डरते, वरन् ऐसे कठोर हो जाते हैं कि वे बहुत देर से मानते हैं कि उन्हें डरना चाहिए था; और मानो स्तब्ध होकर वे यह नहीं देखते कि क्या हितकर है, और किसी निश्चित मार्ग पर नहीं चल सकते।

भविष्यद्वक्ता आगे कहता है कि वे रात को भागे, और राजा की बारी के मार्ग से निकले, और अन्त में उस फाटक पर पहुँचे जो दोनों दीवारों के बीच था। इस वाक्य में कुछ भी व्यर्थ नहीं है; क्योंकि वह हमें यह दिखाना चाहता था कि यद्यपि राजा ने सोचा कि वह अपने शत्रुओं के हाथ से बच निकल सकता है, तौभी वह पकड़ा गया, जैसा परमेश्वर ने पहले से कहा था। क्योंकि यदि नगर के ले लिए जाने के बाद वह अपनी इच्छा से एक विनती करनेवाले के रूप में आता, तो सम्भवतः उसे दया मिल जाती; और हम जानते हैं कि यह सम्मति उस समय दी गई थी जब स्थिति अभी निराशाजनक नहीं हुई थी; परन्तु उसने परमेश्वर के वचन पर कुछ भी विश्वास नहीं किया। इस बीच उसने सोचा कि यदि वह किसी गुप्त मार्ग से शीघ्र भाग निकले तो अपने शत्रुओं को निराश कर सकता है। कुछ लोग समझते हैं कि वहाँ एक भूमिगत मार्ग था, जिसका एक द्वार बारी के बीच में था, और दूसरे छोर पर यरीहो के अराबा में उसका निकास था, जैसा हम आगे देखेंगे। और वह प्रदेश बंजर था, और इसलिए सुनसान था। इसी कारण राजा को भरोसा हुआ; परन्तु अन्त में उसने जान लिया कि भविष्यद्वाणी का सत्य कितना निश्चित था; क्योंकि आगे कहा गया है कि कसदियों ने पीछा करके उसे पकड़ लिया। परन्तु, जैसा मैंने कहा, इस बात पर सावधानी से ध्यान देना चाहिए कि राजा, जैसा भविष्यद्वक्ता हमें बताता है, रात के अन्धकार में एक गुप्त मार्ग से भागा और निकल गया। अब आगे आता है —

यिर्मयाह 39:5

5. परन्तु कसदियों की सेना ने उनका पीछा किया, और सिदकिय्याह को यरीहो के अराबा में जा लिया; और उसे पकड़कर वे हमात देश के रिबला में बाबुल के राजा नबूकदनेस्सर के पास ले गए, और वहाँ उसने उसके विषय में न्याय की आज्ञा दी।

5. Et persecuti sunt exercitus Chaldaeorum ipsos, et apprehenderunt Zedechiam in desertis Jericho (alii vertunt, in planicie, et fuit planicies; coeterum ut dixi, inculta, et squalida et vacua etiam incolis;) et tulerunt ipsum, et adduxerunt ad Nebuchadnezer regem Babylonis Riblathah (urbem) in terra Chemath, qui locutus est cum ipso judicia.

कसदियों ने भागते हुए राजा का पीछा किया, निःसन्देह ऊपर से मिली एक गुप्त प्रेरणा के द्वारा। यह सचमुच सम्भव है कि उसके अपने ही लोगों ने उसके साथ विश्वासघात किया हो; और अशान्त परिस्थितियों में ऐसा प्रायः होता है; परन्तु फिर भी, यदि परमेश्वर के हाथ ने उसे सौंप न दिया होता, तो वह बच निकल सकता था। इसलिए ये बातें इसलिये वर्णन की गई हैं कि हम जान लें कि अभक्त लोग अपने बच निकलने के उपायों से इसके अतिरिक्त और कुछ प्राप्त नहीं करते कि वे वास्तव में यह मान लें कि परमेश्वर अपनी धमकियों में भी वैसा ही सच्चा है जैसा अपनी प्रतिज्ञाओं में।

वे उसके वचन पर विश्वास नहीं करते, इसलिए आवश्यक है कि वे प्रत्यक्ष अनुभव के द्वारा कायल किए जाएँ। अतः सिदकिय्याह यहाँ एक उदाहरण के रूप में हमारे सामने रखा गया है, ताकि हम जानें कि ज्योंही परमेश्वर किसी विपत्ति की घोषणा करे, त्योंही हमें काँपना और उसके सामर्थी हाथ के नीचे अपने आप को दीन करना चाहिए; क्योंकि वह हमें हर ओर से पूरी तरह घेरे हुए है, यहाँ तक कि यदि छिपने के स्थान और शरणस्थान हमारे सामने खुले भी हों, तौभी वे हमारे किसी काम के नहीं हो सकते।

फिर भविष्यद्वक्ता हमें बताता है कि वह यरीहो के जंगल में पकड़ा गया। यह बात भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि वह मनुष्यों की दृष्टि से परे, यहाँ तक कि सुनसान स्थान में चला गया था; क्योंकि वह मैदान इतना उपजाऊ न था कि बहुत से निवासियों का पालन कर सके, वरन् वह मानो एक जंगल था। अतः यह आश्चर्य की बात है कि कसदियों ने उसे उस सुनसान स्थान में कैसे पा लिया; परन्तु मानो परमेश्वर उनका मार्गदर्शक था। इसी कारण सिदकिय्याह कसदी सेना के हाथ में पड़ गया। भविष्यद्वक्ता आगे कहता है कि वे उसे रिबला में ले गए, जिसे अन्ताकिया समझा जाता है। उसे हमात भी कहा जाता है; परन्तु यह नाम देश को सूचित करता था, नगर को नहीं। तौभी आमोस 6:2 में इसका अर्थ नगर है, जहाँ कहा गया है, “कलने नगर को जाओ, और हमात नामक बड़े नगर को जाओ।”

परन्तु हो सकता है कि नगर की प्रतिष्ठा ही इस बात का कारण रही हो कि देश का यह नाम पड़ा; और निःसन्देह प्लिनी अपनी पाँचवीं पुस्तक में सीरिया के उस भाग को अन्ताकियाई कहता है; और जहाँ तक उसके उस कथन का सम्बन्ध है जो वह थोड़ा पहले कहता है, कि अन्ताकिया सीरिया का वह भाग था जो किलिकिया की ओर है, वह स्थान मुझे बिगड़ा हुआ प्रतीत होता है। मैं उसे इस प्रकार पढ़ना अधिक उचित समझता हूँ कि वह सीरिया का एक भाग था, क्योंकि, जैसा मैंने कहा, वह उसे अन्ताकियाई कहता है। और यह अनुचित न था कि नगर को हमात और रिबला कहा जाए, और नगर का नाम देश को दे दिया जाए। व्याख्याकार सचमुच इस बात पर सहमत हैं कि रिबला अन्ताकिया था। जेरोम कहता है कि उसके समय में कसदिया की ओर का पहला पड़ाव अब भी अपना प्राचीन नाम बनाए हुए था, यद्यपि कुछ अक्षरों को बदलकर वे उसे इम्माऊस कहते थे। परन्तु उसे सन्देह नहीं कि वह अन्ताकिया था, जिसे पहले एपिडाफ्ने कहा जाता था, और जिसका नाम हमात भी था। सो वहाँ सिदकिय्याह नबूकदनेस्सर के पास लाया गया, जिसने उसके साथ न्याय की बातें कीं, अर्थात् जिसने उसे एक अपराधी के रूप में अपने न्यायासन के सामने खड़ा किया, ताकि उस पर दण्ड-आज्ञा सुनाए; क्योंकि न्याय की बातें करने का अर्थ वही है जो न्याय करना या निर्णय सुनाना है।

अब यह राजकीय प्रतिष्ठा के बिलकुल विपरीत था; क्योंकि यद्यपि विजेता होने के नाते वह अपने शत्रु पर क्रोधित था, तौभी वह केवल उसकी मृत्यु से ही सन्तुष्ट हो सकता था।

राजा लोग राजाओं के साथ इस रीति से व्यवहार नहीं किया करते, क्योंकि वे अपने आप का आदर करते हैं, और राजकीय प्रतिष्ठा को नीचा करने के इच्छुक नहीं होते। परन्तु यिर्मयाह कहता है कि सिदकिय्याह के साथ किसी भी प्रकार राजा का सा व्यवहार नहीं किया गया; क्योंकि उसे विवश होकर अपना दोष मानना पड़ा, और एक औपचारिक दण्ड-आज्ञा के द्वारा वह दोषी ठहराया गया। अतः न्याय की बातें करना वही है जिसे हम फ्रांसीसी में former proces criminel (फ़ौजदारी मुकदमा चलाना) कहते हैं। और इस अपमान ने उसकी विपत्ति और उसके दण्ड के भार को और बढ़ा दिया; क्योंकि सिदकिय्याह को न केवल बहुत सी भर्त्सनाएँ सहनी पड़ीं, जबकि बाबुल का राजा उससे विवाद करता था, वरन् उसे न्याय के लिये भी लाया गया, ताकि सामान्य रीति के अनुसार उसे दण्ड दिया जाए।

क्योंकि नबूकदनेस्सर ने ही उसे राजा बनाया था, और उस पर कर लगाया था। इसलिए उसने उसे विश्वासघात और झूठी शपथ का दोषी ठहराया। यही वह अपमान है जिसकी ओर भविष्यद्वक्ता संकेत करता है जब वह कहता है कि उसने उसके साथ न्याय की बातें कीं, अर्थात् उसके साथ न्यायिक रीति से व्यवहार किया; और वह अन्तिम अध्याय में यही वाक्यांश दोहराता है। आगे आता है —

यिर्मयाह 39:6

6. तब बाबुल के राजा ने सिदकिय्याह के पुत्रों को उसकी आँखों के सामने रिबला में घात किया; और बाबुल के राजा ने यहूदा के सब कुलीन पुरुषों को भी घात किया।

6. Et occidit rex Babylonis filios Zedechiae in Riblathah coram oculis ejus; et omnes nobiles Jehudah occidit rex Babylonis.

सम्भव है कि जब यरूशलेम पर आक्रमण हो रहा था तब नबूकदनेस्सर उस मनोहर नगर में ठहरा रहा, क्योंकि वह लम्बी घेराबन्दी की थकान सहना नहीं चाहता था, और वह संकट से दूर भी रहना चाहता था। उसके लिये इतना पर्याप्त था कि उसके सेनापति, जिनका उल्लेख किया गया है, उसके झण्डे के नीचे लड़ें। अतः नबूकदनेस्सर संकट की पहुँच से परे था, तौभी उसने यहूदियों को भय से भर दिया, क्योंकि वह अपने घर, या शासन के मुख्य स्थान को नहीं लौटा, वरन् आस-पास ही ठहरा रहा; क्योंकि सीरिया का अन्ताकिया यहूदिया से दूर न था।

अब भविष्यद्वक्ता हमें बताता है कि नबूकदनेस्सर ने सिदकिय्याह के साथ कितनी क्रूरता से व्यवहार किया। निश्चय ही यह एक दुःखद दृश्य था कि एक राजा को, जो पहले प्रतिष्ठित था, जो एक कुलीन वंश का था, जो मसीह का प्रतिरूप था, एक घमण्डी विजेता के पाँवों पर औंधे मुँह पड़ा देखा जाए। परन्तु उसके लिये इससे कहीं अधिक कड़वी बात यह थी कि उसे अपनी आँखों के सामने अपने ही पुत्रों को घात होते देखना पड़ा। उस हत्याकाण्ड को देखने के लिये विवश किए जाने से तो उसके लिये सौ बार मरना भला होता। तौभी उसे ऐसा करने के लिये विवश किया गया। और फिर, कि सारी आशा कट जाए, वे सब भी जो प्रतिष्ठा और सामर्थ्य में बढ़कर थे घात किए गए। क्योंकि कुलीनों के नाम के अन्तर्गत यिर्मयाह साधारणतः प्रधान पुरुषों को सम्मिलित करता है; सो प्रजा में जिनका भी कुछ नाम था वे सब मार डाले गए। वह भयानक नरसंहार था! न केवल राजा के पुत्र मारे गए, वरन् वे सब भी जो नगर और देश को फिर से अच्छी दशा में ला सकते थे। इस प्रकार नबूकदनेस्सर ने राजवंश और सब कुलीनों को मृत्यु-दण्ड देकर हर आशा को मिटा देना चाहा। इसके बाद आगे आता है —

यिर्मयाह 39:7

7. फिर उसने सिदकिय्याह की आँखें निकलवा डालीं, और उसे बाबुल ले जाने के लिये बेड़ियों से जकड़वाया।

7. Et oculos Zedechiae excaecavit, et vinxit eum cathenis (in duali numero, duabus cathenis,) ut adduceret ipsum Babylonem.

यहाँ दुर्दशा पर दुर्दशा का ढेर था: अपने ही पुत्रों के वध का दर्शक बनने के बाद राजा की आँखें निकाल ली गईं! तब उसने अपनी ही सन्तान और अपने सब कुलीनों की लोथों को एक साथ ढेर किया हुआ देखा। उस हत्याकाण्ड के बाद वह अन्धा कर दिया गया। निःसन्देह उसका जीवन इसलिये बढ़ाया गया कि वह मानो धीरे-धीरे मरे, उस बात के अनुसार जो एक कुख्यात अत्याचारी ने कही थी। और इस प्रकार नबूकदनेस्सर का अभिप्राय यह था कि उसे सौ और हज़ार बार मारे, और एक ही बार में मृत्यु-दण्ड न दे; क्योंकि मृत्यु मनुष्य को वर्तमान जीवन की सब दुर्दशाओं से हटा देती है।

अतः सिदकिय्याह का जीवित रहना कहीं अधिक कठोर दशा थी।

और यह इसलिये लिखा गया है कि हम जान लें कि चूँकि वह इतने लम्बे समय तक परमेश्वर के विरुद्ध हठीला बना रहा, इसलिए उस पर डाला गया दण्ड भी लम्बा खींचा गया; क्योंकि उसने हल्केपन से, या बिना सोचे-समझे, या किसी गुप्त आवेग से पाप नहीं किया था, वरन् हर सत्य और सब सम्मतियों के विरुद्ध अपने आप को कठोर कर लिया था। इसलिए यह उचित था कि वह धीरे-धीरे मरे, और एक ही बार में न मारा जाए। यही कारण था कि बाबुल के राजा ने उसकी आँखें निकाल लीं।

अन्त में भविष्यद्वक्ता कहता है कि वह बेड़ियों से जकड़ा गया, और इसी दयनीय दशा में बाबुल ले जाया गया। यह निन्दा उसके अन्धेपन के अतिरिक्त थी: वह एक अपराधी के समान बेड़ियों से जकड़ा गया। उसके लिये भला होता कि उसे तुरन्त फाँसी पर ले जाया जाता, या किसी भी रीति से मार डाला जाता; परन्तु नबूकदनेस्सर का अभिप्राय यह था कि वह इस अपमानित दशा में दयनीय जीवन बिताए, और सबके सामने इस बात का उदाहरण बने कि विश्वासघात किस योग्य है। आगे आता है, यिर्मयाह 39:8

8. और कसदियों ने राजभवन और प्रजा के घरों को आग से फूँक दिया, और यरूशलेम की शहरपनाह को ढा दिया।

8. Et domum regis et domum populi combusserunt Chaldaei igni, et muros Jerusalem diruerunt.

343 आँखें निकाल लेने की बात वल्गेट से ली गई है; अन्य अनुवाद और तर्गुम इब्रानी को शब्दशः व्यक्त करते हैं, “और उसने सिदकिय्याह की आँखें अन्धी कर दीं।” और प्रथा यह थी कि उनके सामने लाल तपा हुआ लोहा रखा जाता था। ऐसा भी प्रतीत होता है कि पूर्व में आँखें निकाल लेने की भयानक प्रथा प्रचलित थी। परन्तु आँखों को अन्धा करना बर्बरता का कोई भिन्न रूप रहा होगा। — सं.

यहाँ भी भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि जो कुछ उसने पहले से कहा था वह सब पूरा हुआ, यहाँ तक कि विश्वास को निश्चित और दृढ़ करने के लिये किसी बात की घटी न रही। उसने कहा था, जैसा हम देख चुके हैं, कि यदि सिदकिय्याह अपनी इच्छा से आत्मसमर्पण कर दे, तो नगर के घर जलाए न जाएँगे। सिदकिय्याह ने यह सब व्यर्थ समझा, या कम से कम उसने अपने कान बन्द कर लिए। अब उसने, यद्यपि वह अन्धा था, सुन लिया कि परमेश्वर ने यिर्मयाह के मुख से कोई भी बात व्यर्थ नहीं कही थी; क्योंकि उसका राजभवन जला दिया गया, और साथ ही अन्य सब घर भी।

दूसरे वाक्यांश में उसने {,}ביתbith, अर्थात् बहुवचन के स्थान पर एकवचन रखा है; और इस प्रकार यहाँ वचन-परिवर्तन (enallage) है, क्योंकि प्रजा का केवल एक ही घर नहीं जलाया गया, वरन् आग ने सब घरों को भस्म कर दिया। अन्त में हम शहरपनाह पर आते हैं, जो गिरा दी गई; और इस प्रकार नगर नष्ट हो गया, जैसा यिर्मयाह ने पहले से कहा था। आगे आता है, —

यिर्मयाह 39:9

9. तब अंगरक्षकों का प्रधान नबूजरदान प्रजा के बचे हुओं को, जो नगर में रह गए थे, और उन भगोड़ों को जो उसके पास भाग आए थे, और प्रजा के शेष लोगों को जो रह गए थे, बन्दी बनाकर बाबुल को ले गया।

9. Residuum vero populi qui superstites erant in urbe, et elapsos (hoc est, defectores,) qui defecerant ad ipsum (nempe, ad Nebuchadnezer,) et residuum populi qui relicti fuerant (qui fuerant superstites, idem nomen repetitur) transtulit Nabuzardan princeps interfectorum Babylonem.

अब भविष्यद्वक्ता यह भी बताता है कि दूसरों के साथ क्या हुआ, अर्थात् उनके साथ जो नगर में रह गए थे, और जिन्हें नबूकदनेस्सर और उसकी सेना ने छोड़ दिया था: वह कहता है कि वे बाबुल को ले जाए गए। कुछ ऐसे लोग थे जो नगर के ले लिए जाने से पहले भागकर कसदियों से जा मिले थे; क्योंकि हम देख चुके हैं कि बहुतों की निराशा इतनी बड़ी थी कि उन्होंने विद्रोह किया, और ये वही थे जिनसे सिदकिय्याह सबसे अधिक डरता था, कि कहीं, जैसा हम देख चुके हैं, यदि वह कसदियों के पास जाकर स्वेच्छा से आत्मसमर्पण करे, तो वह उनके उपहास का पात्र न बन जाए। अब यिर्मयाह कहता है कि वे भी कसदिया को ले जाए गए। सम्भव है कि नबूकदनेस्सर ने उन्हें इस कारण हटा दिया हो कि वह विश्वासघातियों पर भरोसा नहीं कर सकता था। उसने उनकी अस्थिरता को पहचान लिया था, क्योंकि उन्होंने अपने ही सच्चे और वैध राजा से विद्रोह किया था। अतः जब उन्होंने इस प्रकार एक बार अपनी निष्ठा तोड़ दी थी, तो वह उन्हें सन्देह की दृष्टि से देखे बिना नहीं रह सकता था, और इसलिए उसने उन्हें हटा दिया, कहीं ऐसा न हो कि वे आगे चलकर कोई नया षड्यन्त्र रचें और उपद्रव खड़ा करें; या, हो सकता है कि यह उनकी विनती के अनुसार किया गया हो, क्योंकि वे डरते थे कि कसदियों के चले जाने के बाद साधारण लोग उन पर टूट पड़ेंगे, क्योंकि उन्होंने शत्रुओं की सहायता की थी, और इस प्रकार अपने ही देश के प्रति विश्वासघाती और कृतघ्न बन गए थे। अतः हो सकता है कि उन्होंने स्वयं यह विनती की हो, और वह उन्हें दे दी गई हो: तब वे किसी दूर देश में चैन से रह सकते थे, परन्तु यहूदिया में वे सुरक्षित नहीं रह सकते थे। जो भी हो, कारण चाहे कुछ भी रहा हो, यिर्मयाह हमें बताता है कि वे शेष लोगों के साथ बाबुल और कसदिया को ले जाए गए। इसके बाद वह सेना के मुखिया या सेनापति का नाम लेता है, अर्थात् नबूजरदान, जिसे वह घात करनेवालों का प्रधान, या रसोइयों का प्रधान कहता है। यूनानी अनुवादकों ने इसका अनुवाद {ἀρχιμάγειρον}, अर्थात् रसोइयों का प्रधान, किया है, जिसे आज के दिन राजाओं के दरबारों में ग्रैंड मास्टर (Grand Master) कहा जाता है। परन्तु उनका मत अधिक सम्भव है जो इन शब्दों का अनुवाद घात करनेवालों का प्रधान करते हैं। क्रिया {,}טבחthebech का अर्थ है घात करना, वध करना, और मनुष्यों को मार डालना तथा पशुओं को काटना दोनों; और इसी कारण कुछ लोगों ने इसे रसोई के काम पर लागू किया है। परन्तु चूँकि यहाँ नबूजरदान का उल्लेख सैनिकों में प्रधान के रूप में किया गया है, इसलिए सम्भावना यह है कि वह सेना में सब प्राणदण्ड-योग्य अपराधों का न्यायी था। इसलिए जब यिर्मयाह कहता है कि जो नगर में रह गए थे वे ले जाए गए, तब वह उसका नाम लेता है।

परन्तु यहाँ एक अनावश्यक दोहराव प्रतीत होता है, क्योंकि वह दो बार उन बचे हुए लोगों का उल्लेख करता है जो रह गए थे। तौभी इनमें अन्तर है, क्योंकि पहले वाक्यांश में वह कहता है, नगर में; अतः उसका अभिप्राय उन लोगों से है जो घेरे में पड़े थे, और जिन्हें नबूकदनेस्सर ने इतनी क्षमा दी थी कि उन्हें मार न डाला। अन्तिम वाक्यांश में और अधिक लोग आ जाते हैं, अर्थात् देश के सब निवासी; क्योंकि बहुत से लोग इधर-उधर तितर-बितर थे, जिन पर नबूकदनेस्सर अपना क्रोध उण्डेल सकता था, परन्तु उसने उन्हें दास बनाकर कसदियों के देश में पहुँचा दिया। अतः हमारा भविष्यद्वक्ता यहाँ इन दोनों दलों की चर्चा करता है, क्योंकि वह कहता है कि कुछ लोग नगर में बचे रह गए थे, और दूसरे भी बचे रह गए थे, अर्थात् वे जो देश के विभिन्न भागों में तितर-बितर पाए गए, और जो कसदी सेना के घेरे में नहीं पड़े थे। इसके पश्चात् वह आगे कहता है,—

यिर्मयाह 39:10

10. परन्तु अंगरक्षकों का प्रधान नबूजरदान प्रजा में से उन कंगालों को जिनका कुछ न था, यहूदा देश में छोड़ गया, और उसी समय उनको दाख की बारियाँ और खेत दे दिए।

10. Et ex populo pauperes, quibus nihil quicquam erat, reliquos fecit Nabuzardan, princeps interfectorum, in terra Jehudah, et dedit illis vites et agros in die isto.

अब वह आगे कहता है कि कुछ लोग देश में बसने के लिये छोड़ दिए गए, अर्थात् कंगाल और वे जिनके पास कुछ न था। वह कहता है कि जब कसदी अपने देश को लौट गए, तब ये लोग मानो देश के स्वामी बना दिए गए। यहाँ हम देखते हैं कि दरिद्रता प्रायः लाभदायक होती है; क्योंकि, जैसा हम देख चुके हैं, कुलीन लोग मार डाले गए, और मध्यम वर्ग के भी बहुत से लोग नगर के घेरे में मारे गए, और उनमें से कुछ के साथ थोड़ा अधिक मानवीय व्यवहार किया गया। तौभी बँधुए दुखी थे, और लौटने की किसी आशा के बिना दूर देश में खदेड़ दिए गए। अब देश केवल कंगालों के लिये छोड़ दिया गया; और जिनके पास पहले पाँव रखने भर की भी भूमि न थी, वे अब बड़े सुख से रहने लगे; क्योंकि वे इतनी बड़ी संख्या में न थे कि उनमें से प्रत्येक को कुछ भूमि न मिलती, जैसा हम आगे देखेंगे। अतः जब ये दीन मनुष्य, जो पहले बड़ी तंगी से जीवन बिताते थे, और कदाचित् रोटी के लिये भीख माँगते थे—जब ये यहूदा देश में निश्चिन्त बने रहे, तब देश के स्वामी उखाड़कर बँधुआई में खदेड़ दिए गए; और जब नबूजरदान ने इनमें से प्रत्येक को दाख की बारियाँ और खेत बाँट दिए, तो इससे प्रकट होता है कि उनके लिये यह कितना अच्छा था कि वे कुछ समय तक भूख सहें, नीच दशा में रहें, और मानो दूसरों के पाँवों तले रौंदे जाएँ, बजाय इसके कि वे ठाट-बाट और वैभव में जीवन बिताते। इस प्रकार परमेश्वर प्रायः हमारे प्रति अपनी चिन्ता प्रकट करता है, जब वह हमें ऊँचा उठने नहीं देता, वरन् हमें गुमनाम और दीन दशा में रखता है; और अन्त में परिणाम यह सिद्ध करता है कि ऐसा करने में उसने हमारे उद्धार का ध्यान रखा था।

साथ ही यहाँ हमारी आँखों के सामने एक शोकजनक परिवर्तन रखा गया है। राजा जंजीरों में बँधा हुआ ले जाया जाता है, और वह अन्धा भी है; और शेष सब लोग अपना सब कुछ छोड़कर बँधुआई में खदेड़े जाते हैं; और दूसरी ओर केवल कंगाल, और वे दरिद्र मनुष्य जिनके पास कुछ न था, मानो अपनी ही सम्पत्ति में खुले हाथों बसते हैं। अतः जब उनके पास शान्त निवास और बड़े-बड़े खेत थे, और वे ऐसे उपजाऊ और समृद्ध देश का सुख भोगते थे, तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि नबूजरदान का अभिप्राय इस रीति से बँधुओं की ईर्ष्या भड़काना था; क्योंकि वे देखते थे कि दरिद्र और तुच्छ मनुष्य उस देश में बसे हुए हैं जिससे वे स्वयं निकाल दिए गए थे।

344 Vulg. में है, "सैनिकों का प्रधान — magister militum;" Targum. में, "घात करनेवालों का प्रधान;" Syriac. में, "सेवकों, या पहरुओं का प्रधान।" सबसे अच्छा अनुवाद यह होगा, "प्राणदण्ड देनेवालों का प्रधान।" पहरुए, अर्थात् राजा के सेवक, सामान्यतः प्राणदण्ड देनेवाले भी होते थे। देखिए 1 शमूएल 22:17; मरकुस 6:27। — सं.

इसलिये जब उन्होंने देखा कि उनके साथ उन अति नीच मनुष्यों की अपेक्षा अधिक कठोरता और क्रूरता का व्यवहार किया गया है, तब उनका रोष और भी बढ़ गया। इसके बाद यह आता है,—

यिर्मयाह 39:11-12

11. बाबुल के राजा नबूकदनेस्सर ने अंगरक्षकों के प्रधान नबूजरदान को यिर्मयाह के विषय में यह आज्ञा दी,

11. Praecepit autem Nabuchad-nezer rex Babylonis de Jeremia per manum

Nabuzardan principis interfectorum, dicendo,

12. कि उसको लेकर उस पर कृपादृष्टि बनाए रखना, और उसकी कुछ हानि न करना; जैसा वह तुझ से कहे वैसा ही उससे व्यवहार करना।

12. Tolle ipsum et oculos tuos pone super eum, et ne facias ei quiequam mali; sed prout loquutus fuerit tecum fac cum eo.

भविष्यद्वक्ता अब परमेश्वर की उस पितृवत् चिन्ता का वर्णन करता है, जिसका अनुभव उसने अपने प्राण और कुशल की रक्षा में किया था। हम जानते हैं कि उपद्रव में प्रायः निर्दोष लोग मारे जाते हैं, और नगरों पर धावा बोलने में ऐसी अव्यवस्था होती है कि बहुत से काम बिना किसी विचार के किए जाते हैं; वरन् सेनापति भी विजयी सैनिकों के उत्पात को रोक नहीं पाते। अतः जब कसदियों ने राजभवन को जला दिया, तब यिर्मयाह भी उसी समय आग के धुएँ ही से दम घुटकर नष्ट हो सकता था। हम जानते हैं कि सिराकूज़ नगर के जीते जाने के समय क्या हुआ था। मार्सेलस नहीं चाहता था कि आर्किमिडीज़ नष्ट हो, वरन् उसने आज्ञा दी थी कि उसे बचाया जाए; क्योंकि वह उस मनुष्य को उसके अनोखे परिश्रम और उत्कृष्ट प्रतिभा के कारण बचाना चाहता था। तौभी जब वह भूमि पर वृत्त खींच रहा था, तब एक साधारण सैनिक ने उसे मार डाला। यदि कोई यिर्मयाह के पास न आता, तो, जैसा मैं कह चुका हूँ, जब राजा का दरबार जला दिया गया, तब वह राजभवन के खण्डहरों के नीचे दब सकता था। परन्तु वह कहता है कि उसकी अद्भुत रीति से रक्षा हुई, क्योंकि नबूकदनेस्सर ने उसके विषय में आज्ञा दी थी कि उस पर कोई विपत्ति न आने पाए, वरन् नबूजरदान और सारी सेना भी उसकी सुरक्षा का प्रबन्ध करें।

यह सचमुच सम्भव है कि बाबुल के राजा ने यिर्मयाह के विषय में सुना था; और यद्यपि वह बन्दीगृह में था, तौभी परमेश्वर का वचन, जिसका वह साहस के साथ प्रचार करता था, बँधा हुआ न था।

तब इसकी चर्चा बाबुल के राजा तक पहुँची होगी; और इसी कारण वह उसकी रक्षा करने को तत्पर हुआ; क्योंकि उसने सिदकिय्याह को सच्ची सम्मति दी थी।

परन्तु इसमें सन्देह नहीं कि नबूकदनेस्सर ने केवल अपने ही लाभ का ध्यान रखा; और इसलिये हमें परमेश्वर की उस अद्भुत भलाई को स्मरण रखना चाहिए, जिससे उसने मानो अपने ही हाथ से भविष्यद्वक्ता के प्राण की रक्षा की; यहाँ तक कि घोर संकट में भी किसी ने उसे छुआ तक नहीं, वरन् वह स्वतन्त्र और शान्त बना रहा, जैसा हम आगे देखेंगे। परन्तु शेष बातें हमें कल तक के लिये टालनी होंगी।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, तू ने उस नगर के विनाश में, जिसे तू ने चुना था और जिसमें तेरा पवित्र निवास था, एक बार हमें अपने क्रोध का ऐसा भयानक प्रमाण दिया है,—इसलिये ऐसा अनुग्रह कर कि हम सच्ची दीनता और आज्ञाकारिता के साथ तेरे अधीन होना सीखें, कि हम तेरी परम अप्रसन्नता को न भड़काएँ, वरन् सच्चे पश्चाताप के द्वारा पहले ही से उसे टाल दें; और तेरी धमकियों से भयभीत होकर हम अपने आप को तेरे ऐसे अधीन कर दें कि तेरी दया प्राप्त करें, और इस प्रकार तुझे ऐसा पिता जानें जो उन सब पर सदा कृपालु रहता है जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा तेरी शरण में भागकर आते हैं।—आमीन।

एक सौ बावनवाँ व्याख्यान

यिर्मयाह 39:13-14

13. अतः अंगरक्षकों के प्रधान नबूजरदान, और नबूशजबान रबसारीस, और नेर्गलसरेसेर रबमाग, और बाबुल के राजा के सब प्रधानों ने भेजा;

13. Et misit Nabuzardan, princeps interfectorum, et Nebusazban, Rabsaris (diximus quosdam has voces interpretari, quod sit princeps eunuchus, sed aliis magis placere esse proprium nomen, quos ego sequor) et Neregal, Sarezer, Rabmag, et alii principes Regis Babel (Babylonis:)

14. हाँ, उन्होंने भेजकर यिर्मयाह को पहरे के आँगन में से निकलवा लिया, और गदल्याह को जो अहीकाम का पुत्र और शापान का पोता था सौंप दिया कि वह उसे घर पहुँचाए; सो वह लोगों के बीच रहने लगा।

14 Miserunt (inquam) et tulerunt Jeremiam ex atrio custodiae, et dederunt eum (hoc est, commiserunt eum) Godoliae filio Achikam, filii Saphan, ut deduceret eum domum; et ita habitavit in medio populi.

यहाँ यिर्मयाह उस बात को पूरा करता है जिसकी व्याख्या हमने कल आरम्भ की थी, अर्थात् यह कि राजा नबूकदनेस्सर की आज्ञा से वह बन्दीगृह से छुड़ाया गया। परन्तु हम कह चुके हैं कि यद्यपि उस अन्यजाति राजा ने अपने ही हित का ध्यान रखा, तौभी उसका मन परमेश्वर की गुप्त सामर्थ्य से संचालित था, जिसने इसी रीति से अपने दास को मृत्यु से छुड़ाने की ठानी थी; क्योंकि परमेश्वर की यह रीति है कि वह दुष्टों के द्वारा भी इसी प्रकार कार्य करता है, जिनकी दृष्टि में कोई और ही बात होती है। मनुष्य सदा अपनी इच्छा से परमेश्वर की सेवा नहीं करते, क्योंकि बहुत से लोग, जिनका ऐसा करने का कोई अभिप्राय नहीं होता, वही पूरा करते हैं जो परमेश्वर ने ठहराया है: और वह उन्हें ऐसा इधर-उधर मोड़ता और हाँकता है कि वे चाहें या न चाहें, उसके अधिकार के आगे झुकने को विवश होते हैं।

इसी प्रकार नबूकदनेस्सर ने यिर्मयाह को छुड़ाया।

तौभी भविष्यद्वक्ता का पूरा विश्वास था कि वह अपने प्राण के लिये राजा नबूकदनेस्सर का ऋणी नहीं था, वरन् परमेश्वर की कृपा से अद्भुत रीति से बचाया गया था; और यही दिखाना इस सारे वृत्तान्त का उद्देश्य है।

वह कहता है कि राजा ने कसदी सेना के सब प्रधानों को उसे पहरे के आँगन में से निकालने के लिये भेजा था, और तब वह गदल्याह की देखरेख में सौंप दिया गया; इसलिये नहीं कि सामान्य रीति के अनुसार उस पर पहरा रखा जाए, वरन् इसलिये कि प्रधान जानते थे कि लोग उस पवित्र भविष्यद्वक्ता से बैर रखते थे, और इस कारण वे चाहते थे कि वह सब प्रकार के उपद्रव से सुरक्षित रखा जाए। अतः यही कारण था कि उन्होंने उसे गदल्याह के संरक्षण में सौंपा, जो, जैसा हम आगे देखेंगे, कसदियों का कृपापात्र और उनमें बड़ा सम्मानित था।

अन्त में वह यह जोड़ता है कि वह लोगों के बीच रहने लगा: इस कथन के द्वारा पूर्ण स्वतन्त्रता प्रकट की गई है, जैसा हम अपनी भाषा में कहते हैं, aller et venir (आना-जाना)। अतः वह कहता है कि वह लोगों के बीच था, क्योंकि पहले वह बन्दीगृह में बन्द रखा गया था। अब यह आता है,—

यिर्मयाह 39:15-18

15. जब यिर्मयाह पहरे के आँगन में बन्द था, तब यहोवा का यह वचन उसके पास पहुँचा,

15. Ad Jeremiam vero fuit sermo Jehovae, quum adhuc esset clausus in atrio custodiae, dicendo,

16. जाकर एबेदमेलेक कूशी से कह, इस्राएल का परमेश्वर सेनाओं का यहोवा तुझ से यों कहता है: देख, मैं अपने वचन इस नगर पर भलाई के लिये नहीं, वरन् हानि ही के लिये पूरे करूँगा, और उस दिन वे तेरे सामने पूरे होंगे।

16. Vade et dic Ebedmelech Aethiopi (hoc est, alloquere Ebed-melech, dicendo,)

Sic dicit Jehova exercituum, Deus Israel, Ecce adduco sermones meos super urbem hanc in malum, et non in bonum; et erunt coram facie tua in die illo:

17. परन्तु यहोवा की यह वाणी है कि उस दिन मैं तुझे बचाऊँगा, और जिन मनुष्यों से तू भय खाता है, तू उनके वश में न किया जाएगा।

17. Et eripiam te in die illo, dicit Jehova, et non traderis in manum hominum, a quorum facie tu expavescis (ad verbum est, quos tu expavescis ab eorum facie;)

18. क्योंकि मैं तुझे निश्चय बचाऊँगा, और तू तलवार से न मरेगा, वरन् तेरा प्राण तेरे लिये लूट ठहरेगा; क्योंकि तू ने मुझ पर भरोसा रखा है, यहोवा की यही वाणी है।

18. Quia liberando liberabo te, in gladium non cades, et erit tibi anima tua in spolium, quia sperasti in me, dicit Jehova.

भविष्यद्वक्ता यहाँ हमें बताता है कि परमेश्वर उस कूशी को नहीं भूला, जिसके द्वारा उसकी रक्षा हुई थी, यद्यपि वह परदेशी था और एक असभ्य जाति का था। फिर भी हम देख चुके हैं कि केवल उसी ने भविष्यद्वक्ता का पक्ष लिया, जब दूसरे लोग भय से घबराकर कुछ यत्न न करते थे, या खुले रूप से परमेश्वर के दास के शत्रु थे। अतः केवल एबेदमेलेक ने ऐसी निराशाजनक दशा में आगे बढ़ने का साहस किया, और उस पवित्र जन की रक्षा का भार उठाया। भविष्यद्वक्ता अब कहता है कि यह सेवा ऐसी ग्रहणयोग्य थी कि वह अपने प्रतिफल से वंचित न रहेगी। हम कह चुके हैं कि एबेदमेलेक ने इस प्रकार भविष्यद्वक्ता के प्राण के लिये अपनी चिन्ता प्रकट की थी, परन्तु प्रत्यक्ष संकट उठाए बिना नहीं; क्योंकि वह जानता था कि प्रधान उसके विरुद्ध एक हो गए थे, और इन दुष्ट मनुष्यों ने दरबार के तथा साधारण लोगों के भी अधिकांश भाग को अपनी ओर कर लिया था। अतः एबेदमेलेक ने छोटे-बड़े सब को अपने विरुद्ध भड़का लिया; परन्तु परमेश्वर ने उसकी सहायता की, जिससे वह अपने विरोधियों से दबाया न गया। अपने उसी संकट में उसने परमेश्वर की कृपा का अनुभव किया, और वह सुरक्षित रखा गया और संकट से छुड़ाया गया।

परन्तु अब वह पाता है कि उसने अपना परिश्रम व्यर्थ नहीं लगाया था; क्योंकि उसने न केवल एक नश्वर मनुष्य के प्रति मानवता और दया दिखाई थी, वरन् परमेश्वर की भी सेवा की थी; क्योंकि जो कुछ हम परमेश्वर के दासों के लिये करते हैं, उसे वह अपने लिये किया हुआ मानता है, और चाहता है कि वह उसके लेखे में गिना जाए, जैसा मसीह कहता है, "जो कोई मेरे इन छोटों में से किसी एक चेले को एक कटोरा ठण्डा पानी पिलाए, वह अपना प्रतिफल कभी नहीं खोएगा।" (मत्ती 10:42)

अतः इसमें कोई सन्देह नहीं कि परमेश्वर के आत्मा का अभिप्राय एबेदमेलेक के उदाहरण के द्वारा हमें मानवता के कर्तव्यों के लिये उभारना था, अर्थात् हमें यह सिखाना कि हम दुखियों की सुधि लें, और जहाँ तक हो सके उनकी सहायता करें, और मनुष्यों के बैर से या किसी भी संकट से, जो इसके कारण हम पर आ पड़े, पीछे न हटें। और क्योंकि हम भलाई करने में सुस्त और लापरवाह हैं, इसलिये उस कूशी को दिया गया प्रतिफल हमारे सामने रखा गया है, ताकि हम जानें कि यद्यपि जब हम दयालु और उदार होते हैं तब मनुष्यों से कोई आशा नहीं रखी जा सकती, तौभी हमारा परिश्रम व्यर्थ न जाएगा, क्योंकि परमेश्वर पर्याप्त धनी है, जो हमें उससे भी अधिक दे सकता है जिसकी सारे संसार से आशा की जा सकती है। अतः यही शिक्षा यहाँ दी गई है।

परन्तु परिस्थितियों पर ध्यान देना आवश्यक है: भविष्यद्वक्ता कहता है कि उसे एबेदमेलेक से छुटकारे की प्रतिज्ञा करने की आज्ञा उस समय दी गई, जब वह अभी बन्दीगृह में बन्द था।

यह पहली दृष्टि में विचित्र प्रतीत होता है; क्योंकि भविष्यद्वक्ता आपत्ति करके कह सकता था, "तू मुझे बाहर जाने की आज्ञा देता है; तो फिर बन्दीगृह के फाटक मेरे लिये क्यों नहीं खोले जाते? और फिर तू चाहता है कि मैं तेरी कृपा का दूत बनूँ; परन्तु मेरी वर्तमान दुर्दशा के कारण मेरी बातों पर कोई विश्वास न करेगा: क्योंकि एबेदमेलेक कैसे विश्वास करेगा कि मुझे तू ने भेजा है? क्योंकि मैं तो यहाँ बन्द हूँ और अनेक मृत्युओं से घिरा हूँ।" परन्तु आओ, हम इससे यह सीखें कि जब कोई बात हमारी आशा से और हमारी सब कल्पनाओं से परे प्रतिज्ञा की जाए, तब हम परमेश्वर के वचन को अपनी बुद्धि के स्तर पर न उतारें। यद्यपि सचमुच ऐसा प्रतीत होता था मानो परमेश्वर अपने दास से ठट्ठा कर रहा हो, जब उसने उसे, जो बन्दी था, एबेदमेलेक के पास जाने की आज्ञा दी; तौभी भविष्यद्वक्ता ने इस आज्ञा को ग्रहण किया और अपनाया, और निःसन्देह उसे पूरा भी किया, यद्यपि इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया।

यही कारण है कि वह कहता है कि जब वह पहरे के आँगन में था, तब यहोवा का वचन उसके पास पहुँचा।

कूशी शब्द अब दोहराया गया है, क्योंकि परमेश्वर का अभिप्राय एक परदेशी के व्यक्तित्व में परोक्ष रूप से यहूदियों को डाँटना था; क्योंकि निःसन्देह वे उसे तुच्छ जानते थे, इसलिये कि वह अब्राहम के पवित्र वंश का न था। परन्तु परमेश्वर दिखाता है कि उसने उस पर विशेष ध्यान दिया, जबकि उसने अब्राहम की उन कपटी और ढोंगी सन्तानों को ठुकरा दिया, जो केवल शरीर के अनुसार उससे उत्पन्न हुई थीं, परन्तु अपनी अभक्ति के द्वारा उसे त्याग चुकी थीं, यहाँ तक कि वे ऐसे ऊँचे सम्मान के सर्वथा अयोग्य थीं।

और वह कहता है, जाकर कह, देख, मैं अपने वचन इस नगर पर भलाई के लिये नहीं, वरन् हानि के लिये ला रहा हूँ; और उस दिन वे तेरे सामने होंगे। इन शब्दों से हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि यह बात एबेदमेलेक से नगर के कसदियों के हाथ में पड़ने से पहले कही गई थी, ताकि वह चुपचाप घर में बना रहे, और राजा के साथ भाग न जाए, जिसने, जैसा हम देख चुके हैं, बच निकलने का यत्न किया था। अतः परमेश्वर का अभिप्राय एबेदमेलेक के भरोसे को दृढ़ करना था, ताकि वह दूसरों के समान न डरे और न काँपे, और अपनी सुरक्षा का यत्न करते हुए अपने आप को मृत्यु के मुँह में न डाल दे। क्योंकि परमेश्वर की सब प्रतिज्ञाओं का यही उद्देश्य है, अर्थात् हमें व्याकुल होने से बचाना, हमें मन की शान्ति देना, और हमें उस सहायता की बाट जोहने के योग्य बनाना जिसकी प्रतिज्ञा हम से की गई है। क्योंकि हम जानते हैं कि जब भय हमारे मनों को जकड़ लेता है, तब कोई स्थिर संकल्प नहीं रहता, वरन् हम व्याकुलता से सताए जाते हैं, और मानो इधर-उधर उछाले जाते हैं। इसलिये परमेश्वर का अभिप्राय पहले ही से सहायता पहुँचाना था, ताकि एबेदमेलेक दूसरों के साथ निराशा में न बह जाए। वह कहता है, देख, मैं ला रहा हूँ, इत्यादि। परमेश्वर यहाँ एबेदमेलेक को इस सत्य में दृढ़ करता है कि वह स्वयं उस विपत्ति का कर्ता होगा; क्योंकि यदि यरूशलेम संयोग से ले लिया जाता, तो एबेदमेलेक का डरना उचित होता; परन्तु जब उसे यह सिखाया गया कि यह परमेश्वर के धर्ममय न्याय के द्वारा होनेवाला है, तब वह अपनी सुरक्षा के विषय में निश्चिन्त रहता; क्योंकि वही परमेश्वर, जब सारी प्रजा को नष्ट कर रहा हो, एक मनुष्य को, वरन् बहुतों को भी बचाने की सामर्थ्य रखता है। अतः यही कारण है कि परमेश्वर ने घोषणा की कि वह अपने वचनों को भलाई के लिये नहीं, वरन् हानि के लिये ला रहा है; क्योंकि यदि एबेदमेलेक को यह निश्चय न होता कि नगर और उसके निवासी परमेश्वर के हाथ और अधिकार में हैं, तो वह कभी अच्छी आशा रखने की ओर प्रेरित न हो सकता था; परन्तु जब उसने जान लिया कि नगर परमेश्वर के धर्ममय पलटे के द्वारा नष्ट होगा, तब वह अपनी सुरक्षा के विषय में पूर्ण रूप से निश्चिन्त हो जाता; क्योंकि परमेश्वर ने सर्वसाधारण विनाश के बीच उसकी रक्षा करने की प्रतिज्ञा की थी।

वह कहता है, तू देखेगा, मेरे वचन तेरे सामने होंगे, मानो उसने कहा हो, "तू मेरी सामर्थ्य का प्रत्यक्षदर्शी होगा।" जैसा मैं कह चुका हूँ, यह सचमुच आवश्यक था कि एबेदमेलेक नगर और प्रजा के विनाश में परमेश्वर का हाथ देखे; क्योंकि यदि परमेश्वर का हाथ और उसका पलटा उसकी आँखों के सामने न होता, तो वह सदा डगमगाता रहता, और उसे कोई चैन न मिलता। यह एक बात है। परन्तु जहाँ तक इन शब्दों का प्रश्न है, मैं अपने वचन भलाई के लिये नहीं, वरन् हानि के लिये ला रहा हूँ, हम उनकी व्याख्या अन्यत्र कर चुके हैं।

हानि (बुराई) शब्द का अर्थ यहाँ पाप नहीं है, वरन् सामान्य प्रयोग के अनुसार जो कुछ मनुष्य अपने लिये प्रतिकूल समझते हैं उसे बुराई कहा जाता है; इसी प्रकार परमेश्वर के द्वारा दिए गए सब दण्ड विपत्तियाँ कहलाते हैं, जैसा हम यशायाह में पाते हैं, "मैं परमेश्वर हूँ, जो उजियाले और अन्धियारे का, जीवन और मृत्यु का, भलाई और विपत्ति का सृजनहार हूँ।" (यशायाह 45:7)

फिर वह आगे कहता है, परन्तु उस दिन मैं तुझे बचाऊँगा, और जिन मनुष्यों के मुख से तू भय खाता है, तू उनके हाथ में न सौंपा जाएगा। यहाँ परमेश्वर प्रतिज्ञा करता है कि एबेदमेलेक एक विशेष अधिकार के द्वारा बचाया जाएगा; और भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि यह भविष्यद्वाणी अकारण नहीं सुनाई गई थी। क्योंकि यद्यपि एबेदमेलेक ने निडर मन से यिर्मयाह का पक्ष लिया था, और साहस तथा दृढ़ता के साथ सब निन्दाओं का सामना किया था, तौभी वह स्वभाव की सब भावनाओं से रहित न था, वरन् उसे भी भय होता था, विशेषकर जब वह भय का कारण अपने सामने देखता था। इसलिये भविष्यद्वक्ता कहता है कि वह शत्रुओं के मुख से डरता था: और साथ ही यह बात उसे उभारने में भी सहायक हो सकती थी कि वह उस प्रतिज्ञा को, जो उसे दी गई थी, अधिक तत्परता से ग्रहण करे; क्योंकि हम जानते हैं कि जब तक हम यह नहीं जानते कि परमेश्वर की आशीषें हमारे लिये कितनी आवश्यक हैं, तब तक हम उन्हें एक प्रकार से तुच्छ समझते हैं। वे भविष्यद्वाणियाँ और प्रतिज्ञाएँ, जिनके द्वारा परमेश्वर हमें शान्ति देता है और धीरज के लिये उत्साहित करता है, अधिकतर निकम्मी समझी जाती हैं, जब तक कि परमेश्वर हमें वास्तव में यह न दिखाए कि यदि वह इस प्रकार हमारी सहायता न करे तो हम कितने दुखी होंगे। अतः भविष्यद्वक्ता एबेदमेलेक को यह स्मरण दिलाना चाहता था, जब उसने कहा कि वह डरता था। वह कहता है, तू भय खाता है। क्योंकि यदि एबेदमेलेक को कोई भय न होता, तो वह इस भविष्यद्वाणी को अनावश्यक समझकर उसकी उपेक्षा कर सकता था। परन्तु अपने भय और चिन्ता का स्मरण दिलाए जाने पर, वह उस बात को ग्रहण करने के लिये अधिक तत्पर हो गया जिसकी प्रतिज्ञा परमेश्वर ने उससे की थी।

फिर वह कहता है कि वह सुरक्षित रहेगा, क्योंकि प्रभु उस दिन उसे छुड़ाएगा। और वह फिर उसी बात की पुष्टि करता है, क्योंकि छुड़ाते हुए मैं तुझे छुड़ाऊँगा, और तू तलवार से न गिरेगा। भविष्यद्वक्ता फिर एबेदमेलेक का ध्यान स्वयं परमेश्वर की ओर लगाता है; क्योंकि हम जानते हैं कि जब नगरों पर धावा बोलकर उन्हें ले लिया जाता है, तब सब कुछ कैसा अस्त-व्यस्त हो जाता है। अतः यदि एबेदमेलेक का मन परमेश्वर पर स्थिर न होता, तो वह छुटकारे की कोई आशा कभी बनाए न रख सकता था। इसलिये भविष्यद्वक्ता उसे फिर निश्चय दिलाता है कि परमेश्वर उसका छुड़ानेवाला होगा। और वह आगे कहता है, तेरा प्राण लूट ठहरेगा। इस कहावत की व्याख्या अन्यत्र की जा चुकी है। यह तुलना उन लोगों से ली गई है जो किसी छोटी सी वस्तु को भी बड़ा लाभ समझते हैं, यदि वह उन्हें आशा से परे मिल जाए; जैसे जब किसी मनुष्य को ऐसी लूट मिल जाती है जिसकी उसने कदापि आशा न की थी: वह अचानक धनी हो जाता है, या उसकी सम्पत्ति बढ़ जाती है; और यद्यपि लाभ बड़ा न भी हो, तौभी वह बहुत आनन्दित होता है। उसी प्रकार जो लोग उपस्थित मृत्यु से जीवित बच निकलते हैं, उनके पास आनन्दित होने का कम कारण नहीं होता, क्योंकि उनका जीवन बचा रहा। इस बीच परमेश्वर उन लोगों की ओर संकेत करता है जो मृत्यु से बच निकलना ही पर्याप्त समझते हैं, चाहे वे और सब वस्तुओं से वंचित हो जाएँ। जैसे वे लोग जो जहाज़ टूटने पर अपना माल, अपना धन और अपना सब कुछ समुद्र में फेंक देते हैं, और यदि बन्दरगाह तक पहुँच जाएँ तो इसी को पर्याप्त समझते हैं, और समुद्र के बीच डूबने के बजाय जीवन भर भीख माँगकर रोटी खाना अधिक पसन्द करते हैं; वैसे ही वह जो अपना प्राण लेकर बच निकलता है—यद्यपि दरिद्रता कड़वी होती है, तौभी मृत्यु का भय इतना बड़ा है कि वह अपने जीवन को बड़ा लाभ समझता है, चाहे उसका सब कुछ छिन गया हो।

इसके बाद कारण दिया गया है, क्योंकि उसने परमेश्वर पर भरोसा रखा था। एक और कारण भी बताया जा सकता था, अर्थात् यह कि उसने एक पवित्र जन के प्रति दया दिखाने में कोई कमी नहीं की, वरन् उसकी घोर विपत्ति में उसकी ओर अपना हाथ बढ़ाया; परन्तु क्योंकि मानवता का वह कार्य विश्वास और भक्ति से उत्पन्न हुआ था, इसलिये परमेश्वर यहाँ मुख्य कारण प्रकट करता है। अतः जैसे वह दया, जो एबेदमेलेक ने भविष्यद्वक्ता के प्रति दिखाई, उसकी भक्ति और विश्वास का प्रमाण थी, वैसे ही यहाँ फल अपने ही वृक्ष में, या अपनी जड़ में पाया जाता है: और यह निश्चित है कि यदि एबेदमेलेक परमेश्वर और उसकी सहायता पर भरोसा न रखता, तो वह भविष्यद्वक्ता के प्रति कभी ऐसा दयालु न होता; क्योंकि अविश्वास सदा डरपोक होता है। अतः इसमें कोई सन्देह नहीं कि वह साहस, जो एबेदमेलेक में उस समय दिखाई दिया जब उसने भविष्यद्वक्ता की सहायता करने में अपने प्राण की चिन्ता न की, उसी विश्वास को प्रकट करता था जिसकी अब सराहना की गई है: क्योंकि तू ने मुझ पर भरोसा रखा है, इसलिये छुड़ाते हुए मैं तुझे छुड़ाऊँगा, परमेश्वर कहता है। अतः अब इसमें कोई सन्देह नहीं कि एबेदमेलेक में विश्वास और भक्ति के कुछ आरम्भिक तत्त्व थे।

अतः यदि परमेश्वर ने हमें और आगे बढ़ने दिया है, तो हम और भी अधिक निश्चय रख सकते हैं कि वह हमारा छुड़ानेवाला होगा; क्योंकि उसका अनुग्रह और उसकी सामर्थ्य सदा हमारे विश्वास से बढ़कर रहेंगे, चाहे वह विश्वास कितना ही बड़ा क्यों न हो। अब यह आता है,—

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