यिर्मयाह और विलापगीत पर टीका · खण्ड 2 · यिर्मयाह 21

यिर्मयाह 21

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यिर्मयाह 21

अध्याय

यिर्मयाह 21:1-4 1. यह वचन यहोवा की ओर से यिर्मयाह के पास उस समय पहुँचा, जब सिदकिय्याह राजा ने उसके पास मल्कियाह के पुत्र पशहूर और मासेयाह याजक के पुत्र सपन्याह के हाथ से यह कहला भेजा,

1. Sermo qui datus fuit Jeremiae (factus fuit ad Jeremiam) a Jehova, cum misisset ad eum rex Zedekias Phassur filium Malchiah et Zephaniam filiam Maassiah sacerdotem (vel, sacerdotis) dicendo,

2. हमारे लिये यहोवा से पूछ, क्योंकि बाबुल का राजा नबूकदनेस्सर हमारे विरुद्ध युद्ध कर रहा है; कदाचित् यहोवा हम से अपने सब आश्चर्यकर्मों के अनुसार ऐसा व्यवहार करे कि वह हमारे पास से चला जाए।

2. Interroga (inquire) nunc pro nobis (aut, consule pro nobis) Jehovam; quia Nebuchadnezer rex Babylonis praeliatur contra nos, si faciat Jehova nobiscum secundum omnia mirabilia sua, et ascendat a notis.

3. तब यिर्मयाह ने उन से कहा, तुम सिदकिय्याह से यों कहो: 3. Et dixit Jeremias illis, Sic dicetis Zedekiae, 4. इस्राएल का परमेश्वर यहोवा यों कहता है, देखो, युद्ध के जो हथियार तुम्हारे हाथों में हैं, जिन से तुम बाबुल के राजा और शहरपनाह के बाहर तुम्हें घेरनेवाले कसदियों से लड़ रहे हो, उनको मैं लौटाकर इस नगर के बीच में इकट्ठा करूँगा।

4. Sic dicit Jehovah Deus Israel, Ecce ego reduco (alii vertunt, convertam; quidam minus apte, congregabo; bene vertetur, contraham, vel, prohibebo) onmia vasa (id est, instrumenta) bellica (belli) quae sunt in manibus vestris, quibus yes praeliamini (in ipsis, sed abundat) adversus regem Babylonis et Chaldaeos, qui obsident vos ab extra murum (hoc est, foris extra murum,) et colligam ipsos in medium urbis hujus.

यिर्मयाह बताता है कि उसने राजा के उन दूतों का किस प्रकार स्वागत किया, जो उससे यह उत्तर चाहते थे कि क्या वह ऐसी उलझी हुई और लगभग निराशाजनक दशा में कोई सान्त्वना दे सकता है; फिर वह कहता है कि उसके पास दो जन भेजे गए थे: एक पशहूर था, वह याजक नहीं जिसका उल्लेख पिछले अध्याय में हुआ, क्योंकि वह इम्मेर का पुत्र था, परन्तु यह मल्कियाह का पुत्र था; और दूसरा मासेयाह का पुत्र सपन्याह याजक था। परन्तु वह दिखाता है कि राजा और उसके मन्त्रियों की आशा व्यर्थ ठहरी, क्योंकि वे अनुकूल उत्तर की आशा रखते थे, मानो परमेश्वर यरूशलेम पर कृपालु होगा; परन्तु भविष्यद्वक्ता ने वैसा ही उत्तर दिया जैसी परमेश्वर ने उसे आज्ञा दी थी, कि नगर, राज्य और सारी जाति का अन्त हो चुका है।

हम दूसरे स्थलों से भी देखेंगे कि सिदकिय्याह सबसे बुरे राजाओं में से नहीं था; यद्यपि वह सचमुच परमेश्वर का भय नहीं मानता था और झूठी सम्मतियों के बहकावे में आ जाता था, तौभी उसमें धर्म के प्रति कुछ आदर था, जिससे वह इपिकूरियों के समान खुल्लमखुल्ला परमेश्वर का तिरस्कार नहीं करता था। ऐसे बहुत से लोग आज भी संसार में पाए जाते हैं, जो यह पर्याप्त समझते हैं कि परमेश्वर का एक अधदबा-सा भय मन में पालें और धर्म के प्रति थोड़ा-बहुत आदर बनाए रखें; परन्तु वह बहुत क्षणभंगुर होता है, और छोटे से छोटे अवसर पर भी लुप्त हो जाता है। सिदकिय्याह के साथ भी ऐसा ही था; वह मानो तटस्थ था, क्योंकि न तो वह गम्भीरता से परमेश्वर की उपासना करता था और न ही उसका तिरस्कार करता था।

इसी कारण उसने यिर्मयाह के पास दूत भेजे। वह जानता था कि जब तक परमेश्वर उनसे अप्रसन्न है तब तक किसी कुशल की आशा नहीं की जा सकती; परन्तु वह परमेश्वर को शान्त करने का मार्ग नहीं समझता था, और न उसके मन में उससे मेल-मिलाप करने की कोई सच्ची इच्छा थी; जैसा कपटियों के साथ होता है, जो यद्यपि चाहते हैं कि परमेश्वर उन पर दयालु रहे, तौभी जब परमेश्वर की दया उनके सामने रखी जाती है, तो या तो खुले तौर पर उसे ठुकरा देते हैं, या उसे ग्रहण करने को तैयार नहीं होते, क्योंकि वे अपने आप को परमेश्वर के हाथ सौंप देना सह नहीं सकते। सिदकिय्याह के मन की दशा ऐसी ही थी; और इसी कारण उसने भविष्यद्वक्ता से विनती की कि वह परमेश्वर से पूछे। परन्तु हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि यह एक सम्मानपूर्ण दूतकार्य था; और इससे और भी स्पष्ट होता है कि सिदकिय्याह उन प्रचण्ड अत्याचारियों में से नहीं था, जो दानवों के समान परमेश्वर से लड़ना चाहते हैं। क्योंकि भविष्यद्वक्ता के पास दो दूत भेजकर, और परमेश्वर से कुछ अनुग्रह माँगने के लिए उसे मध्यस्थ ठहराकर, उसने प्रमाणित किया कि उसमें धर्म पूर्णतः दबा और बुझा नहीं था।

और इससे यह भी देखा जा सकता है कि भविष्यद्वक्ता कितना निडर और साहसी था; क्योंकि उसे दिए गए सम्मान से वह नरम नहीं पड़ा, वरन् उसने ऐसा उत्तर दिया जो राजा को भड़काने और उसे बड़े क्रोध में डालने के योग्य था। परन्तु हमें विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए कि उन्होंने भविष्यद्वक्ता की चापलूसी इसलिए नहीं की कि उससे झूठा उत्तर दिलवाएँ, वरन् वे चाहते थे कि परमेश्वर से पूछा जाए। इससे प्रकट होता है कि वे यिर्मयाह की खराई के विषय में निश्चित थे, कि वह बिना सोचे-समझे या अपनी ओर से कुछ न कहेगा, वरन् स्वर्गीय वाणियों का विश्वासयोग्य व्याख्याता और दूत ठहरेगा। तौभी हम देखते हैं, और आगे कई स्थलों में देखेंगे, कि राजा परमेश्वर के भविष्यद्वक्ता पर अत्यन्त क्रोधित था। परन्तु कपटी लोग, यद्यपि परमेश्वर का आदर करने को विवश होते हैं, तौभी इधर-उधर बहाए जाते हैं और कोई स्थिरता नहीं रखते, विशेषकर जब वे देखते हैं कि परमेश्वर उनके विरुद्ध है; क्योंकि धमकियों से वे फिरते नहीं। इसलिए वे उपद्रव मचाए बिना नहीं रह सकते, और हठीले घोड़ों के समान अपने सवार को गिरा देने का यत्न करते हैं। ऐसा ही उदाहरण हमें सिदकिय्याह में मिलता है; क्योंकि उसने यिर्मयाह को परमेश्वर का विश्वासयोग्य दास माना; क्योंकि उसने यह नहीं कहा, “हमारे लिये, या हमारे पक्ष में, कोई झूठ बोल,” वरन् यह कि, “हमारे लिये परमेश्वर से पूछ।”

फिर वह आगे कहता है, कदाचित् यहोवा हम से अपने सब आश्चर्यकर्मों के अनुसार व्यवहार करे। हम फिर देखते हैं कि सिदकिय्याह में धर्म का कुछ बोध था; परन्तु वह अत्यन्त क्षणिक था; क्योंकि वह किसी सच्ची छाप से प्रेरित नहीं था, वरन् उन कपटियों के समान था जो, जैसा कहा जा चुका है, परमेश्वर से मेल रखना चाहते हैं, बशर्ते वह उनकी अपनी शर्तों पर हो। परन्तु क्योंकि वे अपने आप को पूर्णतः परमेश्वर के हाथ सौंपना नहीं चाहते, वे घुमावदार मार्ग अपनाते हैं, और परमेश्वर को अपनी ओर लुभाने का यत्न करते हैं; कम से कम वे उसके पास सीधे मार्ग से नहीं, वरन् अनेक टेढ़े-मेढ़े रास्तों से होकर आते हैं। इसलिए सिदकिय्याह यहाँ परमेश्वर के उन आश्चर्यकर्मों का उल्लेख करता है जो हर युग में इस्राएलियों के हित में किए गए थे; मानो वह कहता, “परमेश्वर अब तक अपनी चुनी हुई प्रजा के साथ अद्भुत रीति से व्यवहार करता आया है, और जब कभी उसने हमारे पुरखाओं की सहायता की, उसने अपनी सामर्थ्य के अद्भुत प्रमाण प्रकट किए; क्या वह आज हमारे साथ भी उसी रीति से व्यवहार न करेगा?” वह यह सिद्धान्त मान लेता है कि परमेश्वर की वाचा अटल बनी रही; और यह बिलकुल सत्य था, परन्तु उसका प्रयोग झूठा था; क्योंकि सिदकिय्याह और सारी प्रजा को परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य रहना चाहिए था। क्योंकि यदि वे चाहते थे कि परमेश्वर उन पर कृपालु रहे, तो उन्होंने बदले में उसे अपना परमेश्वर मानकर उसकी उपासना और सेवा क्यों नहीं की? परन्तु जब वे वाचा तोड़नेवाले थे, तो उन्होंने परमेश्वर की उस वाचा की दुहाई कितनी मूर्खता और व्यर्थता से दी, जिसे उन्होंने स्वयं निष्फल कर दिया था? परन्तु कपटियों की यह रीति है कि परमेश्वर अपनी सन्तानों पर जो भी अनुग्रह करता है, उसे वे अपने ऊपर लागू कर लेते हैं; क्योंकि वे झूठमूठ उस नाम को आवरण के रूप में ओढ़ लेते हैं, और कहते हैं कि वे कलीसिया के अंग हैं क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें लेपालक बनाया था। यही कारण था कि सिदकिय्याह ने पूछा कि क्या परमेश्वर अपने आश्चर्यकर्मों के अनुसार करेगा, मानो वह कहता, “निश्चय परमेश्वर सदा अपने समान ही रहता है, और हम उसकी प्रजा हैं; और जैसे उसने इतनी बार और इतनी भिन्न-भिन्न रीतियों से अपनी कलीसिया को छुड़ाया है, उसकी सामर्थ्य सदा अद्भुत रीति से प्रकट हुई है; तो फिर वह हमारे साथ उसी रीति से व्यवहार क्यों न करेगा?”

अन्त में वह यह जोड़ता है, कि वह हमारे पास से चढ़ जाए, अर्थात् राजा नबूकदनेस्सर घेरा उठा ले और हमें स्वतन्त्र छोड़ दे।

अब यिर्मयाह का उत्तर आता है, तुम सिदकिय्याह से कहो, इत्यादि; वह स्वयं राजा के पास नहीं गया, वरन् तिरस्कार के रूप में उसने वह सन्देश दूतों के हाथ भेजने के लिए सौंप दिया। निःसन्देह भविष्यद्वक्ता ने यह जानबूझकर और पवित्र आत्मा की प्रेरणा से किया। वह अपने राजा का घमण्ड से तिरस्कार नहीं कर रहा था; परन्तु उसके लिए आवश्यक था कि अपनी उदारचित्त निर्भीकता से राजा के अहंकार को गिरा दे, ताकि वह जान ले कि उसका काम जीवित परमेश्वर से है, जिसके साथ उसने बड़ी ढिठाई का व्यवहार किया था। तुम सिदकिय्याह से कहो, इस्राएल का परमेश्वर यहोवा यों कहता है, इत्यादि। वह इस्राएल का परमेश्वर शब्द इसलिए जोड़ता है कि सिदकिय्याह जान ले कि वे आश्चर्यकर्म, जिन पर भरोसा रखकर वह अब भी यह समझता था कि उनकी दशा सुरक्षित है, उससे और प्रजा से सम्बन्ध नहीं रखते थे; मानो भविष्यद्वक्ता कहता, “यद्यपि परमेश्वर तेरी और तेरी प्रजा की सहायता न करे, तौभी वह अपने आप से असंगत न होगा, और न अपनी वाचा से हटेगा; वरन् वह सदा इस्राएल का परमेश्वर बना रहेगा, चाहे वह तुझे और तेरी सारी प्रजा को नष्ट कर दे।”

19 “कदाचित्” (if) का अनुवाद अधिक उचित रूप से “हो सकता है” किया जा सकता है, {;{אוליइसका यही अनुवाद Vulg., Syr., और Targ. में किया गया है। ---

20 Syr. “चढ़ जाए” क्रिया को हिफ़ईल के रूप में लेता है; और इस स्थल से अधिक संगत रूप में, “और उसे हमारे पास से भगा दे।” Arab. को छोड़, अन्य अनुवाद और Targ. इस पद की पहली क्रिया का अनुवाद “पूछ” नहीं, वरन् “माँग,” या “हमारे लिये प्रभु से प्रार्थना कर” करते हैं। तब यह पद इस प्रकार होगा: — 2. अब हमारे लिये यहोवा से प्रार्थना कर; क्योंकि बाबुल का राजा नबूकदनेस्सर हमारे विरुद्ध युद्ध कर रहा है: कदाचित् यहोवा अपने सब आश्चर्यकर्मों के अनुसार हम से व्यवहार करे, और उसे हमारे पास से चला जाने दे। क्रिया {,{דרשयहाँ के समान सकर्मक रूप में आकर ढूँढ़ने का अर्थ देती है: देखिए भजन संहिता 34:5। और यहोवा का अनुग्रह ढूँढ़ना, या उससे प्रार्थना करना, पद के उत्तरार्ध से सबसे अधिक संगत प्रतीत होता है। Blayney का अनुवाद है, “हम तुझ से विनती करते हैं, हमारे लिये यहोवा से विनती कर;” और यही अर्थ Venema और Gataker ने लिया है। --- सं.

वह कहता है, देखो, मैं, इत्यादि; पहले कहा गया था, नबूकदनेस्सर हमसे युद्ध करने आया है: अब वह कहता है, “मैं परमेश्वर हूँ;” मानो वह कहता, “नबूकदनेस्सर पराजित हो सकता है, वह अपनी युक्ति बदल सकता है, वह थककर तुम्हें छोड़ सकता है; परन्तु तुम जान लो कि नबूकदनेस्सर मेरे अधिकार के अधीन लड़ रहा है।” देखो, वह कहता है, मैं रोकता हूँ (क्योंकि {}מסכका यही अनुवाद होना चाहिए) युद्ध के वे सब हथियार जो तुम्हारे हाथों में हैं, और जिनसे तुम बाबुल के राजा और कसदियों के विरुद्ध लड़ते हो; मानो वह कहता, “तुम हथियारों और सेनाओं से चाहे कितने ही सुसज्जित हो, और नगर की रक्षा के लिए जो कुछ आवश्यक हो, मैं इन हथियारों के उपयोग को रोकता हूँ, अर्थात् मैं ऐसा करूँगा कि वे तुम्हारे कुछ काम न आएँगे।” जैसा मैंने कहा है, कुछ लोग इस शब्द का अनुवाद करते हैं, “मैं उन्हें तुम्हारे ही विरुद्ध फेर दूँगा।” परन्तु शब्द की व्युत्पत्ति से यह अर्थ अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है, जब हम कहते हैं कि यहूदियों के पास जो हथियार थे वे उनके कुछ काम न आएँगे, क्योंकि परमेश्वर उन्हें कोई प्रभाव उत्पन्न करने से रोक देगा।

फिर वह आगे कहता है, कसदी, जो शहरपनाह के बाहर तुम्हारे विरुद्ध लड़ते हैं। उसने उनकी उस समय की दशा का वर्णन किया, क्योंकि नगर कसदियों से घिरा हुआ था; उनके बीच शहरपनाह थी, और यहूदी समझते थे कि वे अपने शत्रुओं के आक्रमणों को पीछे हटा सकते हैं। परन्तु परमेश्वर कहता है, “कसदी आज शहरपनाह के द्वारा बाहर रोके हुए हैं, परन्तु मैं उन्हें,” वह कहता है, “इस नगर के बीच में इकट्ठा करूँगा; अर्थात् मैं दरार कर दूँगा, जिससे शहरपनाह कसदियों को नगर के ठीक हृदय पर अधिकार करने से रोकने में बाधा न बने।” आगे लिखा है, — यिर्मयाह 21:5 5. और मैं स्वयं बढ़ाए हुए हाथ और बलवन्त भुजा से, कोप और जलजलाहट और बड़े क्रोध में आकर तुम्हारे विरुद्ध लड़ूँगा।

5. Et praeliabor ego contra vos in manu extenta et brachio robusto, et in ira et furore et excandescentia magna.

वह उसी विषय को आगे बढ़ाता है; और यद्यपि आगे चलकर वह अधिक विस्तार से कहता है, तौभी यहाँ वह उसी बात की पुष्टि करता है जो हमने अभी देखी, — अर्थात् कि परमेश्वर उस युद्ध का अगुवा था, और कसदी मानो उसके भाड़े के सैनिक थे, जिन्हें वह अपने ही हाथ से चलाता था, और जिन्हें वह लड़ने का संकेत देनेवाला था।

मैं स्वयं, वह कहता है, तुम्हारे विरुद्ध लड़ूँगा। उसने इसे उन आश्चर्यकर्मों के विरोध में रखा जिनका उल्लेख सिदकिय्याह ने किया था। निःसन्देह परमेश्वर पहले अद्भुत रीति से अपनी कलीसिया के साथ उपस्थित रहा था, केवल एक बार नहीं, वरन् हज़ार बार; परन्तु अब वह कहता है, “मेरे पास जो भी सामर्थ्य है, वह अब तुम्हारे विरुद्ध काम में लाई जाएगी; इसलिए मुझ से कोई सहायता की आशा न रखो, वरन् जान लो कि मैं शस्त्र धारण किए हुए हूँ, और तुम्हें पूरी रीति से नष्ट कर दूँगा।” वह आगे कहता है, बढ़ाए हुए हाथ और बलवन्त भुजा से; मानो वह कहता, “तुम्हारे पुरखाओं ने अपनी रक्षा के लिए किए गए आश्चर्यकर्मों का अनुभव किया; परन्तु तुम अनुभव से सीखोगे कि तुम्हें नष्ट करने में मेरी सामर्थ्य कितनी बड़ी है।” संक्षेप में, उसका अभिप्राय यह है कि परमेश्वर की सारी सामर्थ्य यहूदियों के लिए भय का कारण होगी, और इसलिए वे बच न सकेंगे, क्योंकि परमेश्वर के हाथ का अपने विरुद्ध होना, इससे अधिक भयानक कुछ नहीं। इसी अभिप्राय से आगे के शब्द हैं, कोप में, और जलजलाहट में, और बड़े क्रोध में।

21 क्रिया {{סכका अर्थ है फेरना, एक ओर मोड़ना, घुमाना, बदलना; यहाँ इसका अर्थ विपरीत उद्देश्य की ओर फेरना, उचित उपयोग से हटा देना, मोड़ देना, उलट देना प्रतीत होता है, “देखो, जो युद्ध के हथियार तुम्हारे हाथों में हैं, उन्हें मैं उलट दूँगा;” {μετάστρεφω} --- “मैं बदलता हूँ,” अर्थात् विपरीत में, यह Sept. का अनुवाद है; Blayney पढ़ता है, “देखो, मैं एक ओर फेर दूँगा,” इत्यादि।

इन शब्दों में परमेश्वर संकेत करता है कि वह किसी रीति से शान्त न होगा, और इसलिए सिदकिय्याह भूल में था जब उसने सोचा कि उनकी विपत्तियों का अन्त निकट आ पहुँचा है।

वह संक्षेप में भी कह सकता था, “मैं बढ़ाए हुए हाथ से और क्रोध से लड़ूँगा;” परन्तु उसने भिन्न-भिन्न शब्दों में तीन बार क्रोध का उल्लेख किया। इससे जो मैंने कहा है वह स्पष्ट दिखाई देता है, कि सिदकिय्याह से हर आशा छीन ली गई, ताकि वह अपने आप को यह सोचकर धोखा न दे कि वह किसी न किसी रीति से परमेश्वर को मना लेगा, जिसने नगर को पहले ही अन्तिम विनाश के लिए सौंप दिया था। परन्तु हम देखेंगे कि भविष्यद्वक्ता ने अपने पद का कर्तव्य निभाना नहीं छोड़ा था, और उसने पश्चाताप के लिए कुछ स्थान रहने दिया था। परन्तु उसने जानबूझकर यह उत्तर दिया, क्योंकि राजा अन्यथा जगाया नहीं जा सकता था। हम देखेंगे कि उसने अपनी बात कैसे स्पष्ट की; परन्तु यह आरम्भ मानो राजा और प्रजा के अहंकार को धूल में मिलाने के लिए एक वज्रपात था। पहले तो वे अपनी बुराइयों में सुन्न हो गए थे, और फिर उनका हठ ऐसा था कि वे परमेश्वर को अपने अधीन करना चाहते थे। इसलिए जब उनकी मूढ़ता और उनका हठ इतना बड़ा था, तो भविष्यद्वक्ता सफलता की किसी आशा के साथ उन्हें पश्चाताप करने का उपदेश नहीं दे सकता था और न परमेश्वर की दया उनके सामने रख सकता था; इसलिए यह आवश्यक था कि वे ऐसे मारे जाएँ कि जान लें कि वे पूरी रीति से नाश हो चुके हैं, और कि परमेश्वर उनसे इतना क्रुद्ध है कि किसी मानवीय उपाय से उनका बचाव नहीं हो सकता। परन्तु शेष बातें हमें कल तक के लिए छोड़नी होंगी।

प्रार्थना हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जैसे हम तेरे क्रोध को भड़काना नहीं छोड़ते, और पश्चाताप करने में भी इतने धीमे हैं, — हाँ, यह वरदान दे कि हम कम से कम तेरी धमकियों और तेरे न्याय के प्रकटीकरणों के अधीन ऐसा लाभ उठाएँ कि अपने आप को पूर्णतः तुझे सौंप दें, और तेरे उस अनुग्रह की भी आशा रखें जो कुछ समय के लिए हम से छिपा रहा है, जब तक कि हम अधीन मन से निडर होकर तुझे पुकार न सकें, और इस प्रकार अपनी स्थिरता प्रमाणित करें कि तेरा नाम हम में महिमा पाए, जिससे हम भी हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा तुझ में महिमा पाएँ। — आमीन।

उन्यासीवाँ व्याख्यान

22 इन शब्दों में एक क्रमिक चढ़ाव प्रतीत होता है, — “कोप में, और प्रचण्ड अप्रसन्नता में, और बड़े उफनते क्रोध में।” पहला शब्द साधारणतः कोप या क्रोध का अर्थ देता है; दूसरा, तपा हुआ क्रोध; और तीसरा, उफनता हुआ क्रोध, और उसके साथ “बड़ा” जोड़ा गया है। Arab. को छोड़ कोई भी अनुवाद यह चरम चढ़ाव प्रस्तुत नहीं करता; Sept. और Syr. में केवल दो हैं, “कोप और बड़ा क्रोध;” Vulg. में, “रोष, कोप, और बड़ा क्रोध;” और Arab. में, “क्रोध, कोप, और अत्यन्त भारी रोष।” Targ. में वही है जो Vulg. में है। ये शब्द स्पष्टतः उन उत्तेजनाओं की ओर संकेत करते हैं जो यहूदियों के द्वारा दी गई थीं। उनका आचरण ऐसा था कि उससे क्रोध, और तपा हुआ क्रोध, वरन् बड़ा उफनता क्रोध भी भड़क उठे। — सं.

यिर्मयाह 21:6-7 6. और मैं इस नगर के रहनेवालों को, क्या मनुष्य क्या पशु, सब को मारूँगा; वे बड़ी मरी से मरेंगे।

6. Et percutiam habitatores urbis hujus, tam hominem quam bestliam; peste magna morientur.

7. और उसके बाद, यहोवा की यह वाणी है, मैं यहूदा के राजा सिदकिय्याह और उसके कर्मचारियों और लोगों को, वरन् जो लोग इस नगर में मरी, तलवार और भूख से बचे रहेंगे उनको, बाबुल के राजा नबूकदनेस्सर के, और उनके शत्रुओं के, और उनके प्राण के खोजियों के वश में कर दूँगा; और वह उनको तलवार की धार से मार डालेगा; उन पर न तो वह तरस खाएगा, न कुछ कोमलता दिखाएगा और न कुछ दया करेगा।

7 Et post sic (postea) dicit Jehova, Tradam Zedekiam, regem Jehudah, et servos ejus, et populum, et qui residui erunt in urbe hae a peste, a gladio, et a fame, in manum Nebuehadrezer, regis Babylonis, et in manum inimieorum ipsorum, et in manum quaerentium animam ipsorum; et percuitet eos ore gladii; non parcet illis, neque ignoscet, neque miserabitur.

यिर्मयाह उसी प्रवचन को आगे बढ़ाता है, अर्थात् कि परमेश्वर ने ठान लिया था कि यरूशलेम और प्रजा को, कम से कम कुछ समय के लिए, नष्ट करे। परन्तु वह यहाँ बताता है कि परमेश्वर क्या करना चाहता था, अर्थात् कि जब तक वे नगर में बने रहेंगे, वह उन्हें मरी और भूख से भस्म कर देगा; मानो वह कहता, “यद्यपि ये कसदी घेरा डालकर तुरन्त नगर को न ले सकें, तौभी उसका विनाश और भी बुरा होगा, क्योंकि भीतर भूख का प्रकोप होगा और वह उन्हें भस्म कर देगी।” अब हम भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय समझ गए।

परन्तु हमें वह बात स्मरण रखनी चाहिए जो मैंने कल तुम्हें स्मरण दिलाई थी, — कि परमेश्वर उस बात को अपने ऊपर लेता है जो कसदियों से सम्बन्धित ठहराई जा सकती थी, क्योंकि वह अपने आप को इन सब विपत्तियों का कर्ता बताता है; मैं मारूँगा, वह कहता है, इस नगर के रहनेवालों को, क्या मनुष्य क्या पशु; वे बड़ी मरी से मरेंगे। यह दण्ड का पहला प्रकार था; शत्रु के नगर में घुस आने से पहले ही मरी ने प्रजा में से बहुतों को भस्म कर दिया था। अब एक ऐसी परिस्थिति का उल्लेख है जो दिखाती है कि उनकी दशा कितनी भयानक होगी, क्योंकि केवल मनुष्य ही नहीं, वरन् पशु भी नाश होंगे। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं थी कि परमेश्वर का पलटा घोड़ों, बैलों और गदहों तक पहुँचा; क्योंकि हम जानते हैं कि ये सब मनुष्य के उपयोग के लिए सृजे गए थे। इसलिए जब परमेश्वर ने इन पशुओं के विषय में अपना क्रोध प्रकट किया, तो उसका उद्देश्य मनुष्यों को और भी अधिक भय से भरना था; क्योंकि इस प्रकार उन्होंने बैलों और गदहों को, यद्यपि वे निर्दोष थे, अपने साथ उसी दण्ड में फँसा हुआ देखा। क्योंकि हम कैसे मान सकते हैं कि घोड़े और गदहे रोगों से, या प्रतिदिन के भोजन के अभाव में, नाश होने के योग्य थे? परन्तु परमेश्वर ऐसा दृश्य इसलिए सामने रखता है कि वह मनुष्यों को और भी प्रभावशाली रीति से छू सके; क्योंकि इस प्रकार वे देखते हैं कि उनके पापों के कारण सारा संसार शाप के अधीन है। निःसन्देह वे यह जानने को विवश होते हैं कि उनकी पापमयता कितनी बड़ी है; क्योंकि इसी कारण पृथ्वी सूखी और बंजर हो जाती है, ऊपर और नीचे के तत्व अपना काम नहीं करते, जिससे भूमि की बंजरता पशुओं से उनका भोजन छीन लेती है, और वायु का दूषण उन्हें मार डालता है। परन्तु इस विषय पर हम अन्यत्र बोल चुके हैं।

फिर वह आगे कहता है, और उसके बाद, अर्थात् जब मरी उन्हें बड़ी मात्रा में भस्म कर चुकी होगी; मैं दूँगा, या सौंप दूँगा, वह कहता है, यहूदा के राजा सिदकिय्याह को, और उसके कर्मचारियों को, नबूकदनेस्सर के हाथ में। वह संकेत करता है कि यद्यपि वे साहस के साथ अपने अभावों को सह लें, तौभी इससे उन्हें कुछ लाभ न होगा। प्रायः ऐसा होता है कि घेरा उठा लिया जाता है, जब घिरे हुए लोगों का हठ इतना बड़ा होता है कि वे भूख और प्यास पर जय पाते हैं, और घोर अभाव से जूझते रहते हैं; क्योंकि जो उन्हें घेरे हुए होते हैं वे यह सोचने लगते हैं कि वे प्रचण्ड जंगली पशुओं से लड़ रहे हैं, और इसलिए उन्हें छोड़कर चले जाते हैं। परन्तु परमेश्वर यहाँ घोषणा करता है कि यहूदियों के विषय में परिणाम भिन्न होगा, क्योंकि लगभग भस्म हो जाने के बाद भी वे अपने शत्रुओं के वश में कर दिए जाएँगे। इस प्रकार वह दिखाता है कि उनका धीरज व्यर्थ होगा। निःसन्देह यह अत्यन्त शोचनीय बात है कि जब हम बहुत सी भारी और दुःखदायी विपत्तियाँ सह चुके हों, तब अन्त में शत्रु प्रबल हो जाए, और हम पर जीवन और मृत्यु का अधिकार पा ले। परन्तु परमेश्वर यहाँ दिखाता है कि ऐसी ही विपत्ति यहूदियों की बाट जोह रही थी; मैं सौंप दूँगा, वह कहता है, यहूदा के राजा सिदकिय्याह को, इत्यादि। निःसन्देह वह यह दिखाना चाहता था कि उनका भरोसा कितना मूर्खतापूर्ण था, जब वे समझते थे कि वे अपने राजा की छाया में सुरक्षित हैं: “स्वयं राजा भी,” वह कहता है, “अपने आप को संकट से न बचा सकेगा; तो फिर राजा होने से तुम्हें क्या लाभ होगा?” और राजा का स्पष्ट उल्लेख इसलिए किया गया है कि यहूदी इस मूर्खतापूर्ण धारणा से अपने आप को धोखा न दें कि उनके राजा में उनके लिए पर्याप्त सुरक्षा है।

फिर वह आगे कहता है, और उसके कर्मचारियों को, अर्थात् उसके मन्त्रियों या दरबारियों को; क्योंकि वे लोग दास (कर्मचारी) कहलाते थे जो राजा के प्रधान पुरुष और सेवक थे, “और उसके सेवक।” इन दरबारियों में बहुत घमण्ड था, और वे भविष्यद्वक्ताओं के घोर विरोधी थे; क्योंकि अपनी ही मूर्खतापूर्ण बुद्धि से अन्धे होकर वे भविष्यद्वक्ताओं की शिक्षा और उनकी सब चेतावनियों का तिरस्कार करते थे। इसी कारण भविष्यद्वक्ता कहता है कि वे बाबुल के राजा के हाथ में सौंप दिए जाएँगे।

आगे कहा गया है, और लोगों को। अन्तिम संयोजक शब्द व्याख्यात्मक रूप में लिया जाना चाहिए, अर्थात् “वरन्,” {}הנשארים-{,}ואתveat enesharim, “वरन् बचे हुओं को;” क्योंकि वह प्रजा के सिवा किसी और की ओर संकेत नहीं करता, परन्तु यह बताता है कि प्रजा कैसी होगी, अर्थात् थोड़ी सी संख्या, एक बचा हुआ भाग। तब शब्दों का अनुवाद इस प्रकार होना चाहिए, “वरन् वे जो नगर में बचे रहेंगे।” परन्तु जब यह प्रवचन दिया गया, तब यरूशलेम समृद्ध दशा में था, और उसमें बहुत से निवासी थे; इसलिए वह दिखाता है कि परमेश्वर के द्वारा प्रजा को घटाकर थोड़ी सी संख्या में कर देने के बाद भी उनकी विपत्तियों का अन्त न होगा, वरन् उन पर इससे भी बुरी बात आ पड़ेगी, क्योंकि उनका जीवन उनके शत्रुओं के वश में कर दिया जाएगा; इसलिए वह कहता है, वरन् वे जो नगर में बचे रहेंगे; और वह पिछले पद की ओर संकेत करता है, क्योंकि उसने कहा था कि बहुत से लोग अभाव से नाश होंगे; और वह केवल भूख की ओर नहीं, वरन् तलवार और मरी की ओर भी संकेत करता है, क्योंकि वह कहता है, वरन् वे जो मरी से, और तलवार से, और भूख से बचे रहेंगे। जैसा सामान्यतः होता है, भूख ने मरी उत्पन्न की; और फिर जब उनके शत्रुओं ने अपने युद्ध के हथियारों से नगर पर आक्रमण किया, तो बहुत से अवश्य मारे गए होंगे, क्योंकि वे बिना लड़ाई के अपने शत्रुओं को शहरपनाह से पीछे नहीं हटा सकते थे। तब परमेश्वर दिखाता है कि यहूदियों को अभाव, मरी और तलवार से तब तक जूझना पड़ेगा जब तक वे पराजित न हो जाएँ, और नगर कसदियों के हाथ न लग जाए।

आगे यह जोड़ा गया है, उनके शत्रुओं के हाथ में, उनके प्राण के खोजियों के हाथ में। यह दोहराव अनावश्यक नहीं है, क्योंकि परमेश्वर वह बात संकेत करता है जो यशायाह के द्वारा अधिक पूर्णता और स्पष्टता से व्यक्त की गई है, — कि कसदी लूट से सन्तुष्ट न होंगे, कि वे चाँदी और सोने को कुछ न गिनेंगे, क्योंकि वे रोष से जलते होंगे, और उनका उद्देश्य लहू बहाना होगा। (यशायाह 13:17।) सो यहाँ भी यही अर्थ है, जब वह उनका उल्लेख करता है जो उनके प्राण के खोजी होंगे; क्योंकि वे प्राणघातक बैर से प्रेरित होंगे, जिससे उनका क्रोध और उनकी क्रूरता तब तक शान्त न होगी जब तक वे उन्हें नष्ट न कर दें। इस प्रकार वह दिखाता है कि यह एक रक्तरंजित विजय होगी, क्योंकि यहूदी केवल बन्दी बनाकर ही न ले जाए जाएँगे, क्योंकि उनके विजेता उन्हें निकम्मे दासों के समान घसीट ले जाना भी उचित न समझेंगे, वरन् उनका उद्देश्य उन्हें पूरी रीति से नष्ट करना होगा।

इसलिए वह कहता है, वह उनको मारेगा। यहाँ वचन का परिवर्तन है, और संकेत राजा की ओर किया गया है, तौभी सारी सेना उसमें सम्मिलित है, वह उनको तलवार के मुँह से मारेगा, वह तरस न खाएगा, वह क्षमा न करेगा, (ये शब्द समानार्थी हैं,) और कोई दया न दिखाएगा। इस प्रकार परमेश्वर ने अपना अटल क्रोध कसदियों पर डाल दिया, जो उसके सेवक थे, मानो वह कहता, “तुम्हारे शत्रु शान्त न किए जा सकेंगे, वे दया की ओर न फिरेंगे; क्योंकि मैंने ऐसी ही आज्ञा दी है, और मैं उन्हें अपना न्याय पूरा करने के लिए उभारूँगा।” और इसे विचित्र नहीं समझा जा सकता, क्योंकि परमेश्वर ने अपने अटल क्रोध में ठान लिया था कि प्रजा को मिटाकर कुछ न रहने दे। क्योंकि हम जानते हैं कि अपने पापों में उनकी हठधर्मिता कितनी बड़ी थी।

इसलिए जब उन्होंने इतनी बार परमेश्वर की दया को ठुकराया था, तो उन्होंने मानो क्षमा का द्वार स्वयं बन्द कर लिया था। इसी कारण परमेश्वर ने ठान लिया कि कसदी बिना किसी मानवीय भावना के उन पर इस प्रकार टूट पड़ें। आगे लिखा है, — यिर्मयाह 21:8-9 8. और इस प्रजा के लोगों से कह कि यहोवा यों कहता है, देखो, मैं तुम्हारे सामने जीवन का मार्ग और मृत्यु का मार्ग भी बताता हूँ।

8. Et ad populum hunc dices, sic dicit Jehova, Ecce ego propono coram vobis (coram faciebus vestris) viam vitae (vitarum, ad verbum) et viam mortis:

9. जो कोई इस नगर में रहे वह तलवार, भूख और मरी से मरेगा; परन्तु जो कोई निकलकर उन कसदियों के पास जो तुम को घेर रहे हैं भाग जाए वह जीवित रहेगा, और उसका प्राण बचा रहेगा मानो लूट में मिला हो।

9. Qui habitabit in urbe hac morietur gladio et fame et peste; qui autem egressus fuerit et habitaverit (vertunt quidam, qui ceciderit; sed dicemus de hoc verbo postea) apud Chaldeos, qui obsident vos, vivet et anima illi erit in spolium.

23 सभी अनुवाद और Targum इन तीनों क्रियाओं के विषय में भिन्न हैं, और उनमें से कोई भी उनका पृथक् अर्थ नहीं देता। पहली का अर्थ है तरस खाना (छोड़ देना), दूसरी का मन बदलना (नरम पड़ना), और तीसरी का करुणा या दया अनुभव करना। अन्तिम कार्य, अर्थात् छोड़ देना, पहले उल्लिखित है, फिर उससे पहले का कार्य, मन बदलना, और तीसरे स्थान पर वह जो मन बदलने का कारण बनता है, अर्थात् दया या करुणा। यही क्रियाएँ अध्याय 13:14 में भी एक साथ आती हैं, परन्तु भिन्न क्रम में: मन बदलना, छोड़ देना, दया करना। — सं.

परमेश्वर यहाँ घोषणा करता है कि उसने प्रजा के सामने जीवन का मार्ग और मृत्यु का मार्ग रखा, ताकि वे निश्चय जान लें कि जो कोई नगर में बना रहेगा वह शीघ्र मृत्यु का सामना करेगा, और जो अपनी इच्छा से अपने शत्रुओं के हाथ में आत्मसमर्पण करेंगे उनका प्राण बचा रहेगा। मूसा एक दूसरे अर्थ में कहता है कि उसने उनके सामने जीवन का मार्ग और मृत्यु का मार्ग रखा; वह व्यवस्था के विषय में बोल रहा था, जिसमें परमेश्वर के अनुग्रह की प्रतिज्ञाएँ और अपराधियों के लिए धमकियाँ हैं। परन्तु भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय यहाँ दूसरी बात है, अर्थात् कि यहूदियों के लिए बचाव की कोई आशा नहीं थी, सिवाय इसके कि वे अपनी गर्दन जूए के नीचे कर दें, और स्वयं अपने शत्रुओं के हाथ में आत्मसमर्पण कर दें; क्योंकि यदि वे हठपूर्वक अपनी रक्षा करते, तो परमेश्वर उनका शत्रु होता, क्योंकि उसी ने कसदियों को उन पर आक्रमण करने के लिए ले आया था, और उनकी युक्तियों और उनकी सेनाओं का संचालन किया था। निःसन्देह वह उसी की पुष्टि करता है जो उसने पहले कहा था, परन्तु साथ ही वह अधिक विशेष रूप से वर्णन करता है कि क्या होनेवाला था, ताकि यहूदी अपनी हठधर्मिता को छोड़ दें, और मान लें कि वे उस ताड़ना से बच नहीं सकते जिसके वे योग्य थे।

जो कहा गया है उसका आशय यह है कि जैसे कसदी परमेश्वर के अधिकार के अधीन लड़ रहे थे, वैसे ही वे विजयी होंगे; तब यहूदियों का विरोध करना व्यर्थ था, क्योंकि वे बच नहीं सकते थे, जब तक कि वे स्वयं परमेश्वर पर जय न पाते, जो असम्भव था। इसलिए वह उनके लिए केवल एक ही आशा छोड़ता है, अर्थात् कि वे दीनता से परमेश्वर के धर्मी न्याय को स्वीकार करें, स्वयं एक सांसारिक दण्ड के अधीन होकर, और अधीन मन से बंधुआई को सहकर। सो यही अर्थ है, और यह कोई भिन्न प्रवचन नहीं, वरन् भविष्यद्वक्ता उसी की पुष्टि करता है जो उसने पहले कहा था, और साथ ही परमेश्वर की धमकियों को प्रजा की दशा पर लागू करता है, ताकि वे अपने आप को दीन करें, और यह न समझें कि अपने हठ में परमेश्वर का विरोध करने से कुछ लाभ है, क्योंकि अन्त में उन्हें झुकना ही पड़ेगा।

तू इस प्रजा से कह, यहोवा यों कहता है, देखो, मैं तुम्हारे सामने जीवन का मार्ग और मृत्यु का मार्ग रखता हूँ। मृत्यु का मार्ग कौन-सा था? वह कहता है, जो कोई इस नगर में रहेगा, वह तलवार, या अकाल, या मरी से मरेगा। यह बात यहूदियों के लिए अविश्वसनीय थी, और जब उन्होंने सुना कि वे उस पवित्र नगर में नाश होंगे जिसकी रक्षा परमेश्वर करता था, तो वे निःसन्देह क्रोध से भड़क उठे; क्योंकि वहीं उसका पवित्रस्थान था, और वहीं उसका विश्रामस्थान था। परन्तु भविष्यद्वक्ता इन सब भ्रमों को पहले ही दूर कर चुका था; इसलिए वह निर्भय होकर उन्हें धमका सकता था, यद्यपि वे अब भी अपने व्यर्थ बहाने आगे रखते थे: उसने पर्याप्त कारण दिखा दिए थे कि वे परमेश्वर से बँधुआई के अतिरिक्त और किसी बात की आशा नहीं कर सकते थे, क्योंकि उन्होंने इतनी बार, इतने हठ से, और इतने भिन्न-भिन्न प्रकार से उसे क्रोध दिलाया था। अतः वह कहता है, मृत्यु का मार्ग यह है, अर्थात् नगर में बने रहना। और वह कई प्रकार की विपत्तियों का उल्लेख करता है, और दिखाता है कि परमेश्वर केवल शत्रु की तलवार से ही सुसज्जित नहीं था, वरन् वह अकाल और मरी को भी काम में लाएगा, जिससे वह कुछ को तलवार से मारे, कुछ को अकाल से भस्म करे, और कुछ को मरी से नाश करे। इस प्रकार वह दिखाता है कि उन पर चारों ओर से ऐसा आक्रमण होगा कि बच निकलने का प्रयत्न व्यर्थ होगा; क्योंकि जब वे तलवार से बचेंगे, तो मरी उनसे आ मिलेगी; और जब वे मरी से बचाए जाएँगे, तो अकाल उन्हें भस्म कर डालेगा।

फिर वह आगे कहता है, परन्तु जो निकलकर उन कसदियों के पास चला जाए जिन्होंने नगर को घेर रखा है, इत्यादि, अर्थात् जो स्वेच्छा से अपने आप को सौंप दे; क्योंकि जब यहूदी नम्र मन से ताड़ना ग्रहण करते, तो यह आज्ञाकारिता का चिह्न था; और यह पश्चाताप का भी प्रमाण था, क्योंकि इस प्रकार वे मान लेते थे कि वे सबसे भारी दण्ड के योग्य हैं। यही कारण है कि भविष्यद्वक्ता स्वेच्छा से बाहर निकल जाने को, और अपनी ही इच्छा से अपने आप को शत्रुओं के हाथ सौंप देने को, जीवन का मार्ग बताता है। और यह कहकर कि, जो तुम्हें घेरे हुए हैं, {}הצרים,}עליכם{etserim olicam, वह उन आपत्तियों का पहले से उत्तर देना चाहता था जो प्रजा में से कोई भी उठा सकता था,— "मैं इस प्रकार अपने आप को जोखिम में डालने का साहस कैसे करूँ? क्योंकि कसदी हमें घेरे हुए हैं, और यदि मैं विनती करनेवाले के रूप में उनके पास निकल जाऊँ, तो मेरे प्राण का अन्त हो जाएगा।" कदापि नहीं, भविष्यद्वक्ता कहता है, क्योंकि यद्यपि वे नगर से प्राणघातक युद्ध कर रहे हैं, तौभी जो कोई अपनी इच्छा से उनके पास निकल जाएगा वह सुरक्षित रहेगा, और उन्हें दया दिखाने को तैयार पाएगा। यदि कसदी परमेश्वर के अपने वश में न होते, जिससे वह उनके मनों को जिधर चाहे फेर सके, तो वह यह प्रतिज्ञा कभी न करता।

जहाँ तक क्रिया {,}נפלnuphel का प्रश्न है, उसका ठीक अर्थ गिरना है; परन्तु मेरी समझ में यहाँ उसका अर्थ बसना है, जैसे उत्पत्ति 25:27 में, जहाँ कहा गया है कि इश्माएल अपने भाइयों के सामने, या उनके सम्मुख बसा। जो इसका अनुवाद "मर गया" करते हैं, वे न आकाश को छूते हैं न पृथ्वी को। कुछ लोग पढ़ते हैं, "उसका भाग उसके भाइयों के बीच पड़ा;" परन्तु यह अस्वाभाविक अनुवाद है। तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि इस क्रिया का अर्थ प्रायः लेटना, और इसी से बसना है; तौभी मैं मानता हूँ कि भविष्यद्वक्ता अधीनता की ओर संकेत करता है; क्योंकि हमें स्मरण रखना चाहिए कि जब वे कसदियों की ओर चले जाते, तब उनकी दशा कैसी रही होगी; उन्हें बड़ी निन्दा सहनी पड़ी होगी। सो यह कोई छोटी दीनता न थी; तौभी हम इस क्रिया का अनुवाद ठीक ही "बसना" कर सकते हैं। अतः जो कसदियों के पास निकल जाए और उनके साथ बस जाए, अर्थात् जो अपने आप को बँधुआई में ले जाए जाने दे, या जो उनकी इच्छा के अनुसार अपने देश से पराए देश को चला जाए—वह, वह कहता है, जीवित रहेगा, और उसका प्राण लूट के समान ठहरेगा, अर्थात् वह अपना प्राण बचा लेगा, जैसे कोई लूट का माल पाकर उसे चुपके से अपना करके ले लेता है; क्योंकि यहाँ लूट का अर्थ आकस्मिक लाभ समझना चाहिए। अतः वह कहता है, जो कोई कसदियों के अधीन होना अत्यन्त कठिन बात न समझेगा, वह कम से कम अपना प्राण बचा लेगा।

संक्षेप में, परमेश्वर संकेत करता है कि प्रजा की दुष्टता इतनी बढ़ गई थी कि उन्हें क्षमा करना उचित न था। तो फिर उन्हें क्या करना था? यही कि वे धीरज और नम्रता से सांसारिक दण्ड के अधीन हो जाएँ, और इस प्रकार परमेश्वर की दया का द्वार बन्द करना छोड़ दें। तौभी वह साथ ही उन्हें यह भी सिखाता है कि जब तक उनकी ताड़ना न हो जाए, तब तक वे किसी उद्धार की आशा नहीं कर सकते थे। और इससे हम एक उपयोगी शिक्षा सीख सकते हैं, अर्थात् यह कि जब कभी हम अपनी हठीली चाल से परमेश्वर के क्रोध को भड़काते हैं, तब हम सब दण्ड से छूटे नहीं रह सकते; और हमें अधीर न होना चाहिए, विशेषकर जब वह हमें संयम से दण्ड देता है; और यदि हम अनन्त दया प्राप्त करें, तो हमें पिता-सरीखी ताड़नाओं को अधीनता से सह लेना चाहिए। आगे लिखा है,— यिर्मयाह 21:10 10. क्योंकि यहोवा की यह वाणी है कि मैं ने इस नगर की ओर अपना मुख भलाई के लिये नहीं, वरन् बुराई ही के लिये किया है; यह बाबुल के राजा के वश में पड़ जाएगा, और वह इसको फुँकवा देगा। 24 "पास जाएगा," यह सेप्टुआजिन्ट है; "भाग जाएगा," वल्गेट; "आज्ञा मानेगा," तर्गुम; सुरियानी में यह छोड़ दिया गया है। ब्लेनी का अनुवाद है, "अपने आप को सौंप देता है।" यह क्रिया, जब इसके बाद {,{על आता है जैसा यहाँ है, तब इसका अर्थ किसी की ओर फिर जाना, या किसी से जा मिलना होता है। देखिए 2 राजा 25:11। "परन्तु जो निकलकर उन कसदियों से जा मिले जो तुम्हें घेरे हुए हैं, वह जीवित रहेगा," इत्यादि। — सं.

10. Quia faciem meam contra urbem hanc in malum, et non in bonum, dicit Jehova; in manum regis Babylonis tradetur et exuret eam igni.

वह फिर उसी बात की पुष्टि करता है जो उसने कही थी, कि यदि यहूदी नगर में जमे रहें तो यह मृत्यु का मार्ग होगा, क्योंकि यह परमेश्वर से संघर्ष करना होता; क्योंकि कहा गया है कि परमेश्वर बुराई के लिए अपना मुख करता है, क्योंकि उसने उस जाति को दण्ड देने का पूरा निश्चय कर लिया था। मुख करना दृढ़ संकल्प करने के समान है। फिर परमेश्वर कहता है कि यरूशलेम के विनाश के विषय में उसने जो निश्चय किया था वह बदला नहीं जा सकता। अब, जब कोई सोचता है कि वह परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध मृत्यु से बच सकता है, तो अन्त में उसका परिणाम क्या होगा? जैसे जो लोग बलपूर्वक किसी पत्थर से ठोकर खाते हैं, वे अपनी टाँगें, और भुजाएँ, और सिर भी तोड़ बैठते हैं; वैसे ही जो क्रोध में भरकर परमेश्वर से टकराते हैं, वे अपने ऊपर अन्तिम विनाश ले आते हैं।

इससे हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने यह पद क्यों जोड़ा: यह इसलिए था कि यहूदी अपनी सामान्य रीति के अनुसार व्यर्थ आशाएँ न पालें; क्योंकि किसी भलाई की आशा करना स्वयं परमेश्वर से झगड़ना था। वह कहता है, यह नगर बाबुल के राजा के वश में कर दिया जाएगा, और वह इसे आग से फूँक देगा। वह संकेत करता है कि नबूकदनेस्सर न केवल प्रजा को जीतेगा और जीते हुए नगर पर विजय मनाएगा, वरन् स्वयं नगर भी विनाश के लिए ठहराया गया था। सचमुच यह अत्यन्त दुःखदायी बात है जब कोई नगर पूरी रीति से ढा दिया जाता है: नगर प्रायः ले लिए जाते हैं, और विजेता निवासियों को इधर-उधर ले जाता है, जबकि वह स्थान फिर भी बसने योग्य बना रहता है; परन्तु परमेश्वर यहाँ घोषणा करता है कि वह यरूशलेम नगर के साथ और भी कठोरता से व्यवहार करेगा, क्योंकि उसे आग से नाश होना था। आगे लिखा है,— यिर्मयाह 21:11-12 11. और यहूदा के राजा के घराने से कह, यहोवा का वचन सुनो;

11. Et ad domum (vel, palatium) regis Jehudah, Audite sermonem Jehovae:

12. हे दाऊद के घराने! यहोवा यों कहता है, भोर को न्याय चुकाओ, और लुटे हुए को अन्धेर करनेवाले के हाथ से छुड़ाओ, नहीं तो तुम्हारे बुरे कामों के कारण मेरे क्रोध की आग भड़केगी, और ऐसी जलती रहेगी कि कोई उसे बुझा न सकेगा।

12. Domus David, sic dicit Jehova, judicate mane judicium (sunt quidemt duo verba, sed utrunque significat judicare; sensus antem est, judicare mature, et proferre rectum et oequum judicium; postea adjungit speciem unam,) liberate spoliatum e manu oppressoris, ne exeat, tamquam ignis, indignatio mea, et ardeat, et non sit extinguens, a facie malitiae studiorum ipsorum (hoc est, propter malitiam scelerum ipsorum).

25 वाक्यांश "इस नगर के विरुद्ध" नहीं, वरन् "इस नगर पर" है; और सेप्टुआजिन्ट तथा वल्गेट का अनुवाद भी यही है, यद्यपि सुरियानी में "विरुद्ध" है। उसका मुख उसके विरुद्ध, भलाई के लिए नहीं, कैसे किया जा सकता था? कहा गया है कि परमेश्वर ने अपना मुख नगर पर लगाया या टिकाया, और वह उसकी बुराई करने के लिए था, न कि उसकी भलाई करने के लिए। — सं.

अब भविष्यद्वक्ता हमें बताता है कि वह राजा और उसके मन्त्रियों के पास भेजा गया था। अब तक वह राजा और सारी प्रजा को बिना भेद के सम्बोधित करता आया है; परन्तु यहाँ उसे एक विशेष सन्देश सौंपा गया है जिसे राजा के महल में सुनाना था; और उसे यह कहना था कि न्याय उसके और उसके मन्त्रियों के निकट है। परन्तु अब उसे पहले की नाईं धमकाया नहीं जाता, क्योंकि बीच में एक शर्त रखी गई है: वह उन्हें पश्चाताप करने का उपदेश देता है, और परोक्ष रूप से उन्हें क्षमा की प्रतिज्ञा देता है, क्योंकि यदि उसने उन्हें क्षमा और छुटकारे की कुछ आशा न दी होती, तो उनसे पश्चाताप की बात कहना व्यर्थ होता। तौभी वह अपने आप से असंगत नहीं है, क्योंकि यद्यपि राजा को बँधुआई में खदेड़ा जाना था, फिर भी पिता-सरीखी ताड़ना के अधीन हो जाने के बाद वह कुछ अनुग्रह पा सकता था। अतः यद्यपि भविष्यद्वक्ता यहाँ राजा और उसके मन्त्रियों को पश्चाताप करने का उपदेश देता है, तौभी वह दिखाता है कि वे दण्ड से पूरी रीति से मुक्त न होंगे, और फिर भी वह कुछ नरमी की प्रतिज्ञा करता है।

और यह खण्ड हमें स्मरण दिलाता है कि जब कोई बड़ी विपत्ति हमारे ऊपर लटकी हो, और जब परमेश्वर दिखाए कि हम दण्ड से पूरी रीति से बच नहीं सकते, तब हमें निराशा में सिर के बल न गिरना चाहिए। क्योंकि इससे अधिक अनुचित कुछ नहीं कि जिस भय के द्वारा परमेश्वर हमें अपनी ओर लौटा लाता है, वही निराशा का कारण बन जाए, यहाँ तक कि हम पश्चाताप ही न करें; क्योंकि यद्यपि परमेश्वर का क्रोध पूरी रीति से दूर न हो, तौभी यह बड़ी बात है कि वह कम किया जाता है, और यह उस विपत्ति के साथ ही आनेवाली एक राहत है।

संक्षेप में, भविष्यद्वक्ता संकेत करता है कि परमेश्वर का क्रोध हल्का किया जा सकता था, यद्यपि पूरी रीति से शान्त नहीं, यदि राजा और उसके मन्त्री उचित और न्याय से काम करना आरम्भ करें। परन्तु वह दाऊद के घराने का उल्लेख आदर के लिए नहीं, वरन् इसके विपरीत, उलाहने के रूप में करता है; और न वह दाऊद का उल्लेख इसलिए करता है, जैसा कुछ लोग निरर्थक रूप से कहते हैं, कि उसने न्याय से राज्य किया और वह एक अति उत्तम और खरा राजा था; परन्तु भविष्यद्वक्ता ने परमेश्वर की वाचा पर ध्यान दिया। क्योंकि हम जानते हैं कि वे अपने आप को धोखा देते थे जब वे सोचते थे कि एक विशेष अधिकार के द्वारा वे संकट से छूटे रहेंगे, क्योंकि परमेश्वर ने उस कुल को चुन लिया था, और प्रतिज्ञा की थी कि राज्य सदा बना रहेगा। इसी प्रकार कपटी लोग, जो कुछ परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की है, उसे अपने लाभ के लिए हथिया लेते हैं; और साथ ही वे घमण्ड करते हैं, यद्यपि विश्वास और पश्चाताप के बिना, कि परमेश्वर उनसे बँधा हुआ है। राजा और उसके मन्त्रियों का ढिठाई-भरा भरोसा ऐसा ही था; क्योंकि जो दाऊद के वंशज थे, उन्हें कोई सन्देह न था कि वे मनुष्यों की सामान्य दशा से छूटे हुए हैं, और कि वे, जैसा वे कहते हैं, पवित्र प्राणी हैं। इसलिए भविष्यद्वक्ता तिरस्कार से कहता है, दाऊद का घराना! अर्थात् "अब ये व्यर्थ डींगें बन्द हों, क्योंकि परमेश्वर तुम्हें न छोड़ेगा, चाहे तुम सौ बार घमण्ड करो कि तुम दाऊद के वंशज हो।" और साथ ही वह उन्हें उलाहना देता है कि वे पूरी रीति से भ्रष्ट हो गए थे, क्योंकि परमेश्वर ने दाऊद से इस शर्त पर वाचा बाँधी थी कि वह विश्वासयोग्यता से उसकी सेवा करे; परन्तु उसके वंशज विश्वासघाती और धर्मत्यागी हो गए थे। इसलिए भविष्यद्वक्ता ने दाऊद का नाम उनके सामने रखा, ताकि वह उन्हें और भी अधिक उलाहना दे, क्योंकि वे अपने पिता से पूरी रीति से भिन्न हो गए थे, और उसकी भक्ति से हट गए थे।

26 पद 8 के आरम्भ में आनेवाली क्रिया "तू कहना," या "कह," यहाँ समझी जानी चाहिए, "घराने से भी कह," इत्यादि। वल्गेट इस वाक्य को इसी प्रकार जोड़ता है, और तर्गुम भी। परन्तु सेप्टुआजिन्ट, सुरियानी और अरबी "घराना" शब्द को सम्बोधन कारक में रखते हैं—"हे यहूदा के राजा के घराने, प्रभु का वचन सुन।" मूल पाठ से पहली रचना अधिक मेल खाती है। — सं.

वह आगे कहता है, यहोवा यों कहता है, न्याय चुकाओ। निःसन्देह राजा और उसके दरबारी लूटपाट करने में बड़ी स्वच्छन्दता बरतते थे, क्योंकि यदि उन्होंने जो उचित और ठीक है उसकी पूरी उपेक्षा न की होती, तो भविष्यद्वक्ता यहाँ उनसे न्याय करने का आग्रह न करता। अतः जब न्याय चलाने की कोई चिन्ता न थी, तो भविष्यद्वक्ता ने उन्हें आज्ञा दी कि वे पहचानें कि परमेश्वर और उसकी प्रजा के प्रति उनका क्या कर्तव्य है। परन्तु सब भक्तों के लिए यह अत्यन्त कठिन परीक्षा थी कि वे देखें कि वह पवित्र घराना, जिसमें परमेश्वर का जीवित स्वरूप उज्ज्वल रूप से चमकना चाहिए था, लूट का घर बन गया था, जहाँ डाकू रहते थे, जो बिना दण्ड के अपने चारों ओर सब को लूटते थे। इसलिए जब बातों की दशा ऐसी अव्यवस्था में हो कि वे न्यायी ही, जिन्हें परमेश्वर ने अपनी कलीसिया पर ठहराया है, डाकुओं के समान हों, तब हम जान लें कि ऐसा पहले भी हुआ था; और इसमें कोई सन्देह नहीं कि परमेश्वर ने इस प्रकार प्रजा की अभक्ति और दुष्टता का पलटा लिया, क्योंकि यदि प्रजा एक भले और विश्वासयोग्य राजा तथा खरे मन्त्रियों के अयोग्य न होती, तो वह उस घराने को कभी इस प्रकार अशुद्ध और इतने अपराधों से भरा हुआ न होने देता। तो हम जान लें कि भविष्यद्वक्ता ने राजा और उसके मन्त्रियों को न्याय करने का उपदेश इसलिए दिया, क्योंकि वे अपना पद भूल गए थे, और फाड़नेवाले भेड़ियों के समान हो गए थे।

वह एक काम का विशेष उल्लेख करता है, लुटे हुए को उसके अन्धेर करनेवाले के हाथ से छुड़ाओ। कुछ लोग पढ़ते हैं, "छली के हाथ से," मानो {,}עשקoshek का अर्थ निन्दा और द्वेष से, या छल के उपायों से अन्धेर करना हो; परन्तु यहाँ इसे दूसरे अर्थ में लेना चाहिए। कुछ लोग इन दो शब्दों में, और {,}גזלgesal में, भेद करते हैं, और कहते हैं कि पहले का अर्थ धरोहर या मजदूरी, या दूसरे की किसी भी वस्तु को रोक रखना है, और दूसरे का अर्थ किसी वस्तु को बलपूर्वक ले लेना, लूटना है। परन्तु जैसा प्रतीत होता है, भविष्यद्वक्ता इस भेद का ध्यान नहीं रखता, क्योंकि वह कहता है, "लूटे गए या लुटे हुए को छुड़ाओ।" किसके हाथ से? "अन्धेर करनेवाले के हाथ से।" अतः जब ये दोनों शब्द एक-दूसरे के अनुरूप हैं, तो मुझे सन्देह नहीं कि {,}גזלgesal का अर्थ बलपूर्वक लेना और लूटना दोनों है; और यद्यपि {,}עשקoshek का अर्थ प्रायः छल से अन्धेर करना है, तौभी सदा नहीं। चाहे जो हो, परमेश्वर संकेत करता है कि न तो राजा को और न उसके मन्त्रियों को कंगालों की कोई चिन्ता थी, कि वे उपद्रव, और डकैती, और लूट को दबाएँ। तब तो न्यायी स्वयं डाकुओं के साथी थे, क्योंकि वे उन्हें बिना दण्ड के लूटने और छीनने देते थे, और जब असहाय लोग इस प्रकार दुष्टता से सताए जाते थे तब उन्हें कोई सहायता न देते थे। तौभी इसमें कोई सन्देह नहीं कि परमेश्वर चाहता था कि वे सब के प्रति, धनी और कंगाल दोनों के प्रति, बिना भेदभाव अपने कर्तव्य पूरे करें; परन्तु इस विषय में अन्याय विशेष रूप से दिखाई देता था, इसी कारण उसने भाग को पूरे के स्थान पर रखकर केवल एक ही बात का उल्लेख किया।

27 ठीक अनुवाद यह है, "भोर को न्याय की रक्षा करो।" {{דון का सामान्य अर्थ रक्षा करना, निर्दोष ठहराना, पक्ष लेना, या किसी के लिए वाद करना है: इसका अर्थ अधिकार से शासन करना भी है। हमारे अनुवाद में इसे प्रायः न्याय करना लिखा गया है, जबकि यह रक्षा करना होना चाहिए। देखिए उत्पत्ति 30:6; भजन संहिता 1:4; भजन संहिता 135:14। "भोर को" शब्दशः या आलंकारिक रूप में लिया जा सकता है। भोर वह समय था जिसे भले न्यायी न्याय के मामलों का निर्णय करने के लिए मानते थे: भ्रष्ट समयों में न्यायी या हाकिम भोर का समय पीने में बिताते थे। देखिए सभोपदेशक 10:16। अतः यहाँ न्यायियों से माँग की गई है कि वे भोर को मुकद्दमों का निर्णय करने की प्राचीन रीति को फिर से अपनाएँ। देखिए निर्गमन 18:13। "भोर को" वाक्यांश का अर्थ किसी काम को तत्परता से, पूरी रीति से और परिश्रम से करना भी है। ठीक यही शब्द भजन संहिता 101:8 में आए हैं, और हमारे अनुवाद में उनका अनुवाद "सवेरे" किया गया है, केवल भोर के लिए शब्द बहुवचन में है—शब्दशः "भोरों में।" तो यदि इसे आलंकारिक रूप में लिया जाए, तो इस वाक्यांश का अर्थ है—तत्परता से, सावधानी से, परिश्रम से—"सावधानी से न्याय की रक्षा करो।" ब्लेनी का अनुवाद अनोखा, परन्तु अस्वीकार्य है—"न्याय करो, ठीक बात की खोज करते हुए।" क्रिया {}דון के अकर्मक रूप में प्रयुक्त होने का कोई उदाहरण नहीं है, और "भोर को" सब अनुवादों और तर्गुम में दिया गया है। — सं.

फिर वह आगे कहता है, नहीं तो मेरा क्रोध आग के समान भड़केगा, और जलता रहेगा, और कोई उसे बुझानेवाला न होगा। यहाँ भविष्यद्वक्ता संकेत करता है कि यदि राजा और उसके दरबारी पश्चाताप न करें, तो उनका अन्त हो चुका। अतः यहाँ उस पिता-सरीखी ताड़ना के बीच, जिसकी चर्चा उसने की थी, और उस विनाश के बीच, जिसकी चर्चा भविष्यद्वक्ता अब करता है, एक विरोध समझना चाहिए। परमेश्वर का क्रोध पहले ही भड़क चुका था, और वह तुरन्त बुझाया नहीं जा सकता था; और यद्यपि उन्हें दुःख उठाना था, तौभी परिणाम सुखद और उनकी इच्छा के अनुसार होता: परन्तु यहाँ वह घोषणा करता है कि यदि वे उसके अनुग्रह में लौटने का प्रयत्न न करें, तो परमेश्वर के साथ ऐसा युद्ध होगा जिसमें कभी मेल न होगा। वह आगे कहता है, उनके कामों की दुष्टता के कारण। यहाँ पुरुष का परिवर्तन है, जब तक हम {,}כםcam, "तुम्हारे," न पढ़ें; परन्तु इस प्रकार का परिवर्तन पवित्रशास्त्र में प्रायः होता है। भविष्यद्वक्ता उन्हें सम्बोधित करने के बाद अब कहता है, "उनके कामों की दुष्टता के कारण," मानो अपना भाषण समाप्त करके वह उनके विषय में ऐसे बोलता है जैसे वे उपस्थित न हों, या मानो परमेश्वर ने अपने भविष्यद्वक्ता को आज्ञा देने के बाद फिर यह जोड़ा, "मैं यह उन पर घोषित करता हूँ, क्योंकि वे इसी के योग्य हैं।"

प्रार्थना हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जैसे हम नित्य नये-नये अपराधों के द्वारा तेरे क्रोध को भड़काना नहीं छोड़ते, वैसे ही हम हठ या तिरस्कार तक न बढ़ जाएँ; और जब कि तेरे हाथ से ताड़ना पाना हमारे लिए भला है, तो यह वरदान दे कि हम तेरे कोड़ों के अधीन धीरज से झुक जाएँ, और तुझे अपने प्रति पिता का काम करने दें, कि तू हमें सीधे मार्ग पर लौटा लाए; और हम तुझ पर आशा रखना कभी न छोड़ें, उस समय भी जब तू हम पर क्रोधित प्रतीत होता है; वरन् हमारी आशा उस परिणाम पर लगी रहे जिसकी तू प्रतिज्ञा करता है, अर्थात् यह कि विपत्तियाँ भी हमारे उद्धार में सहायक होंगी, जब तक कि हम इस वर्तमान जीवन के सब क्लेशों से होकर उस धन्य विश्राम में न पहुँच जाएँ जिसे तेरे एकलौते पुत्र ने हमारे लिए प्राप्त किया है।— आमीन।

अस्सीवाँ व्याख्यान यिर्मयाह 21:13-14 13. हे तराई में रहनेवाली और समथर देश की चट्टान, यहोवा की यह वाणी है कि मैं तेरे विरुद्ध हूँ; तुम जो कहते हो कि हम पर कौन चढ़ाई कर सकेगा, और हमारे वासस्थान में कौन प्रवेश कर सकेगा?

13. Ecce ego contra to, quae habitas in valle, petra in planitie (vel, patrae planitiei, alii vertunt) dicit Jehova; qui dicitis, Quis descendet contra nos? et quis ingrediatur habitacula nostra? 14. और यहोवा की यह वाणी है कि मैं तुम्हें तुम्हारे कामों के फल के अनुसार दण्ड दूँगा; मैं उसके वन में आग लगाऊँगा, और उसके चारों ओर सब कुछ भस्म हो जाएगा।

28 यह वाक्य इस प्रकार है,— "और लूटे हुए को उपद्रवी के हाथ से," या जो उपद्रव करता है उसके हाथ से, "छुड़ाओ।" केवल वल्गेट में अन्तिम शब्द के लिए "calumniator" (निन्दक) है, जो पूरी रीति से अनुचित है; सेप्टुआजिन्ट में "जो उस पर अन्याय करता है" है; सुरियानी और अरबी में "जो उस पर अन्धेर करता है" है। इस शब्द का अर्थ बल या उपद्रव से अन्धेर करना है। — सं.

14. Et visitabo super vos secundum fructum studiorum vestrorum, dicit Jehova; et accendam ignem in sylva ejus, et consumet quiequid est in circuitu ejus.

यद्यपि भविष्यद्वक्ता के समय में सारी जाति भ्रष्ट थी, तौभी यरूशलेम सब बुराइयों का सिर और गढ़ था, विशेषकर इसलिए कि वहाँ अधिक स्वच्छन्दता थी; और फिर वे सोचते थे कि वहाँ भविष्यद्वक्ताओं को कोई स्वतन्त्रता नहीं है, मानो नगर के निवासी एक विशेष अधिकार से सब प्रकार की ताड़ना से छूटे हुए हों; और अन्त में, नगर की स्थिति ही उन्हें साहस देती थी, क्योंकि जब वे अपनी शहरपनाह की ऊँचाई, अपने गुम्मटों और गढ़ों को देखते थे, तो अपने आप को संकट की पहुँच से बाहर समझते थे। यही वह निश्चिन्तता थी जिसकी भविष्यद्वक्ता अब निन्दा करता है; और इसलिए वह उसे तराई में रहनेवाली कहता है।

हम जानते हैं कि यरूशलेम छोटी पहाड़ियों पर बसा था: सिय्योन पर्वत की दो चोटियाँ थीं; और फिर उससे सटी हुई पहाड़ियाँ थीं, विशेषकर लबानोन की ओर; तौभी हर ओर एक समथर भूमि थी। और फिर यदि हम सिय्योन पर्वत को छोड़ दें, तो यरूशलेम एक तराई में था; क्योंकि हम जानते हैं कि वह पहाड़ों से घिरा हुआ था। उसके चारों ओर पहाड़ थे, जैसा भजन संहिता 125:2 में कहा गया है। अब, उसकी स्थिति ही नगरवासियों को भरोसा देती थी, क्योंकि उस तक पहुँचना कठिन था। इसलिए वे सोचते थे कि शत्रु उस तराई में नहीं आ सकते, जो उन्हें एक गढ़वाले स्थान के समान घेरे रखती थी। यही कारण है कि भविष्यद्वक्ता ने नगर को उसके अपने नाम से नहीं पुकारा, वरन् कहा कि वह तराई में रहती है; और उसके बाद उसने उसे समथर भूमि की चट्टान कहा; क्योंकि {,}ישרisher का अर्थ सीधा है, और इसी से {,}מישורmishur का अर्थ समतल भूमि है। तो सारा प्रदेश पहाड़ों तक एक लगातार समथर भूमि था। स्वयं यरूशलेम की भी, जैसा हम कह चुके हैं, अपनी छोटी पहाड़ियाँ थीं; इसलिए वह मानो समथर भूमि में एक चट्टान था।

अब हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने यह घुमावदार भाषा किस उद्देश्य से प्रयोग की, अर्थात् इसलिए कि यहूदी अपने नगर की स्थिति पर घमण्ड करते थे, मानो वह अजेय हो; और इसलिए भी कि पहाड़ों का सामीप्य, और समथर भूमि भी, उन्हें बड़े लाभ देते थे। और हम जानते हैं कि जब प्रत्यक्ष रूप से कोई संकट नहीं होता, तब मनुष्य कितनी सहजता से झूठी निश्चिन्तता में पड़ जाते हैं; वरन् इसके विपरीत, वे नाना प्रकार के बचावों और सहायताओं की कल्पना करते हैं जिनसे वे सहायता पाने की आशा रखते हैं। इसलिए भविष्यद्वक्ता इसी झूठे घमण्ड की निन्दा करता है, जब वह यरूशलेम को तराई में रहनेवाली कहता है, और फिर कहता है कि वह समथर भूमि की चट्टान थी। 29 इस खण्ड की सब व्याख्याओं में से यही सबसे सन्तोषजनक है। सिय्योन पर्वत एक तराई से घिरा था, और वह तराई सटे हुए पहाड़ों से। अतः नगर एक तराई था जिसके बीच में एक चट्टान या पहाड़ था, जिसे यहाँ समथर भूमि की चट्टान कहा गया है। वास्तव में इस वाक्य का अनुवाद यों भी किया जा सकता है, "समथर भूमि की चट्टान की तराई में रहनेवाली।" इस दशा में "चट्टान की तराई" का अर्थ चट्टान या पहाड़ के चारों ओर की तराई है; फिर उस तराई को आगे समथर भूमि कहकर बताया गया है। अनुवादों में भिन्नता है; सेप्टुआजिन्ट का अनुवाद है, "जो सोर की तराई, समथर भूमि, में रहती है;" वल्गेट का, "ठोस तराई और समथर भूमि की निवासिनी;" सुरियानी का, "जो तराइयों में रहती है, जिसके पास एक बड़ी समथर भूमि है;" और तर्गुम का, "जो दृढ़ता में, गढ़वाले नगरों में रहती है।" मूल के सबसे निकट सेप्टुआजिन्ट का अनुवाद है; जिसका अनुसरण वेनेमा ने किया है, जो सोचता था कि यरूशलेम में सोर नाम की एक तराई थी, जो अपनी स्थिति के कारण नगर का सबसे सुरक्षित भाग थी: इसी से आगे के वाक्य में "उतरना" शब्द आया है। ब्लेनी का अनुवाद है, "हे चट्टान के समतल किए हुए खोखले स्थान के निवासी।" उसका विचार था कि इससे सिय्योन पर्वत अभिप्रेत है, जो दाऊद के घराने का निवास था, और उसे ऐसा इसलिए कहा गया क्योंकि उसकी चोटी समतल की गई थी। फिर उसने आगे के वाक्य का अनुवाद किया, "कौन हम में दरार करेगा?" परन्तु कठिनाई यह है कि "समतल किए हुए खोखले स्थान" को कैसे समझा जाए, और मूल पाठ से ऐसा अनुवाद कैसे निकाला जाए। निःसन्देह कैल्विन का अनुवाद, या वेनेमा का, जो बहुत भिन्न नहीं है, सबसे उत्तम है। — सं.

आगे जो लिखा है वह इसे और स्पष्ट करता है, जो कहते हैं, हम पर कौन चढ़ाई करेगा? और, हमारे वासस्थानों में कौन प्रवेश करेगा? क्रिया {,}יחת ichet को कुछ लोग फाड़ने के अर्थ में लेते हैं, "कौन हम में दरार करेगा?" वे इस शब्द को {,}חתתchetat से निकालते हैं; परन्तु यह अधिक सम्भव है कि यह {,}נחתnechat, उतरना, से है; क्योंकि पहला अर्थ अत्यन्त खींचतान वाला होगा। भविष्यद्वक्ता प्रजा की धारणा के अनुसार बोलता है, जो अपने आप को अपने शत्रुओं के सब आक्रमणों के विरुद्ध पर्याप्त रूप से सुरक्षित समझते थे। सम्भव है कि वे सचमुच इस प्रकार खुलकर न बोलते हों; परन्तु भविष्यद्वक्ता ने उनके मनों के छिपे विचारों पर ध्यान दिया, जब उसने उन पर यह घमण्ड लगाया,— कि वे एक अजेय स्थान में रहते थे, क्योंकि उस तक पहुँचना भयानक था; क्योंकि वे निडर होकर कहते थे, "हम तक कौन उतरेगा? हमारे घरों में कौन घुसेगा?" मानो उनका घोंसला बादलों में हो। वे संकेत करते थे कि उनकी दशा सुरक्षित रहेगी, क्योंकि उनके शत्रु उनके निकट आने का साहस न करेंगे, या यदि साहस करें तो लज्जित होकर खदेड़ दिए जाएँगे, क्योंकि उनके लिए अपने फाटक बन्द कर लेना ही पर्याप्त होगा।

परन्तु परमेश्वर, इसके विपरीत, कहता है, देख, मैं तेरे पास, या तेरे विरुद्ध, आऊँगा, और तुझे दण्ड दूँगा। यहाँ वचन का परिवर्तन अवश्य है; क्योंकि वह कहता है, मैं तुम्हें दण्ड दूँगा, क्योंकि उसने यह कहकर आरम्भ किया था, "तुम जो कहते हो," {,}האמריםeamrim। वह कहता है, मैं तुम पर तुम्हारे कामों का फल लाऊँगा; अर्थात् "जैसा तुमने किया है, जैसे तुम्हारे काम योग्य हैं, वैसा ही मैं तुम्हारे साथ व्यवहार करूँगा।" यहाँ योग्यता का अर्थ प्रतिफल समझना चाहिए। तब परमेश्वर धमकाता है कि वह यहूदियों को वही लौटाएगा जिसके वे योग्य थे, क्योंकि उन्होंने उसके क्रोध को भड़काना नहीं छोड़ा था।

अन्त में वह आगे कहता है, मैं उसके वन में आग लगाऊँगा। कुछ लोग "वन" को आलंकारिक रूप में आसपास के नगरों के लिए लेते हैं; परन्तु यह भविष्यद्वक्ता के अभिप्राय से दूर प्रतीत होता है। मैं सचमुच इनकार नहीं करता कि इन शब्दों में रूपक है; परन्तु वन शब्द को नगरों और गाँवों पर नहीं, वरन् स्वयं नगर के भवनों पर लागू करना चाहिए, बोलने की उस रीति के अनुसार जो भविष्यद्वक्ताओं ने अन्यत्र प्रयोग की है। चूँकि उनके घर बहुत-सी लकड़ी से, ऊँचे और अति उत्तम वृक्षों से बने थे, इसलिए भविष्यद्वक्ता लकड़ी के इस ढेर की तुलना वन से करता है। तौभी हम एक सरल व्याख्या दे सकते हैं, और मैं नहीं जानता कि क्या यह अधिक उपयुक्त है कि भविष्यद्वक्ता लबानोन की ओर संकेत करता है। तब नगर के वन से उसका अभिप्राय लबानोन के वृक्षों से है, जो, हम जानते हैं, विशेष रूप से उत्तम थे, क्योंकि उनकी ऊँचाई सर्वत्र प्रसिद्ध थी; और हम यह भी जानते हैं कि वे बहुत विशाल थे। अतः जब उनकी झूठी महिमा का एक भाग लबानोन पर्वत था, तो भविष्यद्वक्ता स्पष्ट संकेत करता है कि वही स्वयं नगर को जलाने में सहायक होगा; क्योंकि जब परमेश्वर यरूशलेम को जलाएगा, तब वह इस काम के लिए आसपास से ही सामग्री लेगा।

30 सेप्टुआजिन्ट और अरबी में है, "कौन हमें डराएगा?" वल्गेट में, "कौन हमें मारेगा?" सुरियानी में, "कौन हमारे विरुद्ध आ सकता है?" और तर्गुम में, "कौन हमारे विरुद्ध उतरेगा?" क्रिया {,{חתת अकर्मक है, और यदि यह यहाँ हिफ़िल में हो, तो यह उस सम्बन्धबोधक ,{}על को स्वीकार नहीं करेगी, जो यहाँ इसके बाद आता है। इससे पर्याप्त रूप से सिद्ध होता है कि यह ,{}נחת, नीचे आना, उतरना, है, जिसके लिए ठीक यही सम्बन्धबोधक आवश्यक है। देखिए भजन संहिता 38:2। जब बात स्पष्ट रूप से ऐसी है, तो "चट्टान के समतल किए हुए खोखले स्थान" के विषय में ब्लेनी का मत अवश्य गलत होगा, क्योंकि सिय्योन पर्वत में "उतरना" कोई उपयुक्त अभिव्यक्ति न होती। — सं.

अब जब हम भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय समझ गए, तो आइए सीखें कि इस खण्ड को कैसे लागू करें। हम अन्यत्र कह चुके हैं कि परमेश्वर को झूठे भरोसे से बढ़कर कोई बात घृणित नहीं; जब मनुष्य अपने ही साधनों पर भरोसा रखकर अपने आप को सुखी और सुरक्षित दशा की प्रतिज्ञा देते हैं, तब वे अपनी निश्चिन्तता में सुस्त हो जाते हैं। इसी से ऐसा होता है कि वे परमेश्वर को तुच्छ जानते हैं, और कभी उसकी शरण में नहीं भागते; वे उसके न्याय-दण्डों का उपहास करते हैं, और अन्त में एक पागल आवेग से हर प्रकार की ढिठाई की ओर बह जाते हैं। यही कारण है कि भविष्यद्वक्ता इतनी बार और इतनी कठोरता से निश्चिन्त मनुष्यों को डाँटते हैं, क्योंकि जब वे उसके प्रति किसी आदर से और उसके किसी भय से प्रभावित नहीं होते, तब वे परमेश्वर के प्रति ढीठ हो जाते हैं। तब वे न केवल अपने उद्धार की आशा को केवल साधनों पर, या ऐसी सहायताओं पर जिन पर वे मूर्खता से निर्भर रहते हैं, लगाकर परमेश्वर का अनादर करते हैं, वरन् वे यह भी सोचते हैं कि वे परमेश्वर के अधिकार के अधीन नहीं हैं। इसी से वे अपने आप को दण्ड से छूट जाने की प्रतिज्ञा देते हैं, और इस प्रकार अपने पापों में पूरी रीति से कठोर हो जाते हैं। अब आगे लिखा है— 31 "भविष्यद्वाणी के लेखों में 'वन' शब्द प्रायः आलंकारिक रूप में नगर के लिए लिया जाता है, क्योंकि उसके भव्य भवन, या उसके प्रमुख निवासी, अपनी-अपनी पंक्तियों में खड़े ऊँचे देवदारों के समान होते हैं। देखिए यिर्मयाह 22:7; यशायाह 37:24; यहेजकेल 20:46; जकर्याह 11:1।" — लाउथ।

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