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यिर्मयाह 49
यिर्मयाह 49:1
1. अम्मोनियों के विषय में यहोवा यों कहता है: क्या इस्राएल के पुत्र नहीं हैं? क्या उसका कोई वारिस नहीं रहा? फिर उनका राजा क्यों गाद का अधिकारी हुआ, और उसकी प्रजा क्यों उसके नगरों में बसती है?
1. Ad filios Ammon: Sic dicit Jehova, An filii non sunt Israeli? An haeres non est ei? quare haereditate possidet rex eorum Gad et populus ejus in urbibus ejus habitat?
हम कह चुके हैं कि अम्मोनी न केवल मोआबियों के पड़ोसी थे, वरन् उनकी उत्पत्ति भी लूत से हुई थी, और इस प्रकार वे लहू के नाते उनसे जुड़े हुए थे।
उनकी उत्पत्ति सचमुच नीच और लज्जाजनक थी, क्योंकि, जैसा सब जानते हैं, वे कुकर्म की सन्तान थे। तौभी उनके बीच भाईचारे का बन्धन था, क्योंकि दोनों जातियों का पिता एक ही था। जब परमेश्वर अपनी प्रजा को मिस्र से निकाल लाया, तब उसने उन्हें छोड़ दिया था; क्योंकि पवित्र जन लूत के स्मरण में वह चाहता था कि दोनों जातियाँ अछूती बनी रहें। परन्तु कृतघ्नता ने उनके अपराध को दुगना कर दिया, क्योंकि ये अधर्मी लोग नाना प्रकार से अब्राहम की सन्तान को सताने से कभी नहीं रुके। इसी कारण यिर्मयाह अब उनके विरुद्ध भविष्यद्वाणी करता है।
और यहाँ हम फिर से इस भविष्यद्वाणी का उद्देश्य और इसे प्रकट करने में पवित्र आत्मा का अभिप्राय देखते हैं, अर्थात् यह कि इस्राएली जान लें कि परमेश्वर ने उन्हें पूरी रीति से त्याग नहीं दिया, वरन् उसकी पितृवत् कृपा के कुछ अवशेष अब भी बने हुए थे; क्योंकि यदि मोआबी और अम्मोनी सब विपत्तियों से बचे रहते, तो यह अत्यन्त कठोर परीक्षा होती; दुर्बल मनों को कुचल डालने के लिए इतना ही पर्याप्त होता कि वे देखें कि जिस प्रजा को परमेश्वर ने लेपालक बनाया था वह दुर्दशा में दबाई जा रही है और कड़ी ताड़ना सह रही है, जबकि अन्यजातियाँ चैन से अपने सुख-विलास का आनन्द ले रही हैं, और दूसरों की विपत्तियों पर आनन्द भी मना रही हैं। इसलिए परमेश्वर, उस दुःख और शोक को हल्का करने के लिए जो इस्राएलियों को अपने क्लेशों और विपत्तियों से हुआ था, यह दिखाता है कि वह अब भी उन पर कृपा करेगा, क्योंकि वह उनके शत्रुओं से युद्ध करेगा, और उन सब अन्यायों का पलटा लेनेवाला बनेगा जो उन्होंने सहे थे। इस्राएलियों के लिए यह सुनना कोई साधारण सान्त्वना न थी कि वे अब भी परमेश्वर की चिन्ता के पात्र हैं, यद्यपि ऐसा प्रतीत होता था कि उसने नाना प्रकार से अपना क्रोध उन पर पूरी धारा के साथ उण्डेल दिया है। अब हम समझते हैं कि यिर्मयाह ने अम्मोनियों पर विनाश की घोषणा क्यों की, जैसे उसने पहले मोआबियों पर की थी।
फिर वह कहता है, अम्मोन की सन्तान के विषय में: क्या इस्राएल के कोई सन्तान नहीं? क्या उसका कोई वारिस नहीं? दुःखी इस्राएलियों के लिए यह अत्यन्त कठोर परीक्षा थी कि वे देखें कि परमेश्वर ने जो निज भाग उन्हें देने की प्रतिज्ञा की थी, उसका एक अंश अम्मोनियों ने बलपूर्वक उनसे छीन लिया है; क्योंकि उनके मन में इसके सिवाय और क्या आता कि वे व्यर्थ प्रतिज्ञाओं से धोखा खा गए हैं? परन्तु ऐसा हुआ था कि अम्मोनियों ने इस्राएलियों को उनके निज भाग के एक अंश से वंचित कर दिया था। इसलिए भविष्यद्वक्ता यहाँ हमें सिखाता है कि यद्यपि परमेश्वर ने कुछ समय तक आँख मूँद ली और इस लूट को अनदेखा किया, तौभी वह अम्मोनियों को इसके लिए बिना दण्ड के न छोड़ेगा कि उन्होंने उस वस्तु को अपना लिया जो न्याय से दूसरों की थी। इसलिए आगे कहा गया है, उनका राजा क्यों गाद का अधिकारी हुआ?
मैं नहीं जानता कि जेरोम ने {,}מלכםmelkam का अनुवाद ऐसे क्यों किया मानो यह किसी मूर्ति का नाम हो, जैसा यह शब्द आमोस भविष्यद्वक्ता में पाया जाता है। परन्तु यह स्पष्ट है कि यिर्मयाह यहाँ राजा के विषय में बोलता है, क्योंकि तुरन्त बाद वह जोड़ता है, उसकी प्रजा। तो वह कहता है कि उनका राजा गाद का अधिकारी हुआ। गाद किसी स्थान का नाम नहीं है, जैसा कुछ लोग सोचते हैं, वरन् इसका अर्थ गिलाद पर्वत है, जो उस गोत्र को दिया गया था। भविष्यद्वक्ता कहता है कि उन्होंने गादियों के देश पर अधिकार कर लिया था; क्योंकि वे अपने भाग से निकाल दिए गए थे, और जो कुछ परमेश्वर ने उन्हें दिया था उस पर अम्मोन की सन्तान ने कब्ज़ा कर लिया था। और इसकी पुष्टि आमोस भविष्यद्वक्ता करता है, जब वह कहता है, “अम्मोन की सन्तान के तीन, वरन् चार अपराधों के कारण मैं उन पर दया न करूँगा, क्योंकि उन्होंने गिलाद के पर्वत को काट लिया है।” (आमोस 1:13)
वहाँ वह रूपक में बोलता है, क्योंकि परमेश्वर ने गाद के गोत्र और अम्मोन की सन्तान के बीच सीमाएँ ठहरा दी थीं, ताकि दोनों अपने-अपने निज भाग से सन्तुष्ट रहें। परन्तु अम्मोन की सन्तान ने सीमा तोड़कर गाद के गोत्र को गिलाद पर्वत के नगरों से निकाल दिया था। तो हमारा भविष्यद्वक्ता अब यही कहना चाहता है, अर्थात् यह कि उन्होंने देश के उस भाग को अपना लिया था जो गाद की सन्तान को चिट्ठी द्वारा बाँटा गया था; क्योंकि तुरन्त आगे आता है, और उसकी प्रजा उसके नगरों में बसती है, अर्थात् उन नगरों में जो चिट्ठी डालकर उस गोत्र को दिए गए थे; क्योंकि हम जानते हैं कि गाद की सन्तान को यरदन के पार एक भूमि-भाग दिया गया था। अब हम इन शब्दों का अर्थ समझ गए हैं।
तो परमेश्वर दिखाता है कि वह अपनी वाचा को भूला नहीं था, यद्यपि उसने कुछ समय तक अम्मोनियों को उस निज भाग पर चढ़ आने दिया था जो उसने इस्राएल की सन्तान को प्रदान किया था; तौभी गादी अन्ततः वह सब फिर पा लेंगे जो उनसे अन्यायपूर्वक छीन लिया गया था। क्योंकि यह असहनीय लूट थी कि अम्मोनियों ने उस देश को अपना लेने का साहस किया, जो मनुष्यों की सम्पत्ति नहीं, वरन् स्वयं परमेश्वर की थी, क्योंकि उसने उसे अपना विश्रामस्थान कहा था, इसलिए कि वह चाहता था कि उसकी प्रजा वहाँ बसे। और यद्यपि परमेश्वर ने गादियों को उनके निज भाग से निकालकर उन पर उचित दण्ड डाला, तौभी बाद में उसने अम्मोन की सन्तान को दण्ड दिया, जैसे वह अपनी सन्तान को दुष्टों के हाथ से ताड़ना देता है, और अन्त में उन्हें भी उनका उचित बदला देता है। अब आगे आता है —
388 शब्दशः यह है, “अम्मोन की सन्तान के विषय में यहोवा यों कहता है:” ऐसा ही सेप्टुआजिंट, वल्गेट और तर्गुम में है। अम्मोन के विषय में भविष्यद्वाणियाँ यहेजकेल 21:28-32; 25:2-7; आमोस 1:13-15; और सपन्याह 2:8-11 में हैं। — सं.
389 सेप्टुआजिंट, वल्गेट और सीरियाई में “मिल्कोम” दिया गया है; परन्तु तर्गुम में “उनका राजा।” आमोस 1:15 में वल्गेट और सीरियाई ऐसे ही हैं; परन्तु सेप्टुआजिंट में “राजा” (बहुवचन) है, और तर्गुम वैसा ही है जैसा यहाँ। अम्मोन का एक राजा था, यिर्मयाह 27:3; और एक ऐसा पद है जिसमें किसी देश का अधिकार एक अन्यजाति देवता, अर्थात् कमोश, को सौंपा गया है, देखिए न्यायियों 11:24। परन्तु “अधिकारी होना” किसी मूर्ति की अपेक्षा राजा पर अधिक उपयुक्त रीति से लागू होता है; और अगले पद में विरोध इस्राएल से है, परमेश्वर से नहीं, “इस्राएल वारिस होगा,” इत्यादि। इसलिए अधिक सम्भावना यही है कि यहाँ राजा अभिप्रेत है, मूर्ति नहीं। — सं.
390 यह उद्धरण शब्दशः नहीं दिया गया है, वरन् उस पद का अर्थ दिया गया है। — सं.
यिर्मयाह 49:2
2. इस कारण देख, यहोवा की यह वाणी है, ऐसे दिन आते हैं कि मैं अम्मोनियों के रब्बा में युद्ध की ललकार सुनवाऊँगा; और वह उजड़कर खण्डहर का ढेर हो जाएगा, और उसकी बेटियाँ आग से फूँक दी जाएँगी; तब जो इस्राएल के वारिस बन बैठे थे, उनका वारिस इस्राएल होगा, यहोवा का यही वचन है।
2. Propterea ecce dies veniunt, dicit Jehova, et audire faciam (vel, faciam resonare) super Rabbath filiorum (vel, super filios) Ammon clangorem praelii, et erit in acervum vastitatis, et filiae ejus igne comburentur, et possidebit Israel possessores suos, dicit Jehova.
परमेश्वर यहाँ स्पष्ट रूप से साक्षी देता है कि वह अम्मोनियों को सदा के लिए अपनी अन्यायपूर्ण लूट का आनन्द भोगने न देगा। वह कहता है कि दिन आएँगे, ताकि अपनी सन्तान के मनों को आशा से सम्भाले रखे; क्योंकि भविष्यद्वक्ता ने अपनी भविष्यद्वाणी ऐसे समय सुनाई जब अम्मोनी निश्चिन्त दशा में थे; और फिर कई वर्ष बीत गए जबकि वह जाति अपनी लूट का आनन्द लेती रही। इसलिए वह यहाँ विश्वासयोग्य लोगों के मनों को प्रतीक्षा में रखता है, ताकि वे धीरज से तब तक बाट जोहना सीखें जब तक परमेश्वर के पलटा लेने का ठहराया हुआ समय न आ जाए। तो इसी कारण वह कहता है कि वे दिन आएँगे जब परमेश्वर रब्बा में युद्ध की तुरही फुँकवाएगा। वह मानो किसी असाधारण बात के विषय में बोलता है, क्योंकि अम्मोनी सोचते थे, जैसा हम देखेंगे, कि वे कभी किसी संकट में न पड़ेंगे। तो जब वे घमण्ड से अपने ही बल पर भरोसा रखते थे, भविष्यद्वक्ता यहाँ रब्बा में युद्ध की तुरही की बात करता है, जो सारे देश की राजधानी थी। कुछ लोग सोचते हैं कि यह फिलाडेल्फिया था, एक नाम जो टॉलेमी ने उसे दिया था। तौभी व्याख्याकार सहमत नहीं हैं; परन्तु सबसे अधिक माना जानेवाला मत यही है कि यह फिलाडेल्फिया था।
अब, मुख्य बात के विषय में कोई सन्देह नहीं कि उस समय यह शासन का प्रमुख केन्द्र और राज्य की राजधानी था, क्योंकि भविष्यद्वक्ता, अंश को पूर्ण के स्थान पर रखकर, इस नगर का उल्लेख करते हुए सारे देश को सम्मिलित करता है।
वह कहता है कि वह उजाड़ का ढेर हो जाएगी। परन्तु उस समय यह पूर्णतः अविश्वसनीय था, क्योंकि रब्बा इतना सुदृढ़ किया गया था कि कोई नहीं सोचता था कि वह नष्ट किया जा सकता है। परन्तु भविष्यद्वक्ता अब घोषणा करता है कि सारा नगर ढा दिया जाएगा, यहाँ तक कि न शहरपनाह बचेगी न निजी घर, वरन् वह खण्डहरों का एक कुरूप ढेर बन जाएगा। वह आगे कहता है, उसकी बेटियाँ आग से फूँक दी जाएँगी। बेटियों से निस्सन्देह उसका तात्पर्य कस्बों और गाँवों से है; और इससे वह बात पुष्ट होती है जो मैंने कही है, कि रब्बा उस समय अम्मोन के सारे देश का प्रमुख नगर था। पद के अन्त में वह कहता है, इस्राएल उन सब का अधिकारी होगा जो उसके अधिकारी बने थे। इन शब्दों से यिर्मयाह फिर उस बात की पुष्टि करता है जिसकी ओर मैंने संक्षेप में संकेत किया है, कि अम्मोनियों की विपत्ति अपनी चुनी हुई प्रजा के प्रति परमेश्वर की पितृवत् करुणा की साक्षी होगी, क्योंकि उसने उन पर किए गए अन्यायों का पलटा लेने का निश्चय किया था। तो जब परमेश्वर ने इस्राएलियों के मुकद्दमे को अपना ही मुकद्दमा मानकर उठाया, तब उसने भली-भाँति प्रकट कर दिया कि उसने अपनी प्रजा के लिए कैसी कृपा ठहराई थी, और इसका कोई और कारण नहीं था, सिवाय इसके कि उसने उन्हें सेंतमेंत चुन लिया था।
391 शब्दशः यह है, “और इस्राएल अपने वारिसों का वारिस होगा।” अम्मोनी वारिस होने का दावा करते थे, और इस्राएल सच्चे वारिस के रूप में उनका उत्तराधिकारी हुआ। यह भविष्यद्वाणी पूरी हुई, जैसा 1 मक्काबियों 5:6, 7, 28-36 में लिखा है। — सं.
यह पूछा जा सकता है कि यह भविष्यद्वाणी कब पूरी हुई? परमेश्वर ने दाऊद के अधीन उनकी आनेवाली अधीनता का कुछ संकेत अवश्य दिया, परन्तु इस्राएल ने उस देश पर कभी अधिकार नहीं किया।
वास्तव में उस समय से इस्राएल के पतन के बाद तक अम्मोन नीचा नहीं किया गया। तो इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि जो कुछ यिर्मयाह ने यहाँ भविष्यद्वाणी की, वह मसीह के राज्य के अधीन ही पूरी रीति से पूरा हुआ। दाऊद ने उस जाति को नीचा किया, क्योंकि अम्मोन के राजा ने उसका बड़ा अपमान किया था; और उसने रब्बा को भी ले लिया, जैसा पवित्र इतिहास से स्पष्ट है। (2 शमूएल 12:29 इत्यादि; 1 इतिहास 20:1, 2।) तौभी वह उस जाति को कर देनेवाली बनाकर ही सन्तुष्ट रहा। उस समय से उन्होंने न केवल जूआ उतार फेंका, वरन् इस्राएल की सीमाओं के भीतर अधिकार भी चलाया; और यह कि इस्राएलियों ने जो कुछ खोया था उसे फिर पा लिया, ऐसा हम कहीं नहीं पढ़ते। तब इस्राएल ने अम्मोनियों पर प्रभुता पानी आरम्भ की जब मसीह का राज्य स्थापित हुआ; जिसके द्वारा सब अन्यजातियाँ न केवल अधीनता में और जूए के नीचे लाई गईं, वरन् जितने दया के अयोग्य थे वे सब मिटा भी दिए गए। पद के अन्त में जो जोड़ा गया है वह व्यर्थ नहीं है; क्योंकि भविष्यद्वक्ता परमेश्वर को वक्ता के रूप में प्रस्तुत करता है, क्योंकि वह बड़ी बातों के विषय में बोलता है, जिनका पूरा विश्वास करना कठिन था। अब आगे आता है —
यिर्मयाह 49:3
3. हे हेशबोन, हाय हाय कर, क्योंकि ऐ नाश हो गया! हे रब्बा की बेटियो, चिल्लाओ! कमर में टाट बाँधो, छाती पीटो, और बाड़ों में इधर-उधर दौड़ो! क्योंकि उनका राजा अपने याजकों और हाकिमों समेत बँधुआई में जाएगा।
3. Ulula Chesbon, quoniam vastata est Hai; vociferamini filiae Rabbath, accingite vos saccis, plangite, discurrite per sepes, quoniam rex eorum in captivitatem profectus est, et sacerdotes ejus et principes cum ipso.
भविष्यद्वक्ता अब मानो अम्मोन के देश पर विजय-गान करता है, और अपनी अभ्यस्त रीति के अनुसार, जैसा हम पहले देख चुके हैं; क्योंकि यदि भविष्यद्वक्ता बिना रूपकों के बोलते, और जिन बातों का वे वर्णन करते थे उन्हें सीधे-सादे ढंग से कह देते, तो उनके शब्द ठण्डे और निष्प्रभावी होते, और मनुष्यों के हृदयों में न पैठते। तो यही कारण है कि भविष्यद्वक्ताओं ने ऊँची शैली अपनाई, और अपनी भविष्यद्वाणियों को भव्यता से सजाया; क्योंकि उन्होंने वक्ताओं के समान कभी वाक्पटुता का दिखावा नहीं किया, वरन् आवश्यकता ने उन्हें ऐसा विवश किया कि वे उन बातों को आँखों के सामने चित्रित करें जिनकी मनुष्य अन्यथा अपने मन में कल्पना नहीं कर सकते थे। इस विषय पर हम बहुत बार बोल चुके हैं; परन्तु मैं फिर इसे संक्षेप में छूने को विवश हूँ, क्योंकि जो पवित्रशास्त्र से भली-भाँति परिचित नहीं हैं, और पवित्र आत्मा के अभिप्राय को नहीं समझते, वे सोच सकते हैं कि यहाँ केवल शब्द ही उण्डेले गए हैं। परन्तु जब हम मेरी कही हुई बात को ठीक से तौलेंगे, तब हम सहज ही मान लेंगे कि भविष्यद्वक्ता ने जो कुछ पहले कहा था, उसका विस्तार उसने अकारण नहीं किया।
हे हेशबोन, हाय हाय कर, वह कहता है, क्योंकि ऐ उजाड़ दिया गया है। ये दो पड़ोसी नगर थे: इसलिए वह हेशबोन को उपदेश देता है कि दूसरे नगर का विनाश देखकर हाय हाय करे।
फिर वह आगे कहता है, चिल्लाओ, या ऊँचे स्वर से पुकारो, हे रब्बा की बेटियो। वह फिर वही दोहराता है जो उसने पहले रब्बा नगर के विषय में कहा था। टाट से अपनी कमर बाँधो, वह कहता है, या टाट ओढ़ो। वह यहाँ रब्बा के नागरिकों को पश्चाताप का उपदेश नहीं देता, वरन् लोगों की रीतियों के अनुसार बोलता है, जैसा अन्यत्र बताया जा चुका है। टाट सचमुच पश्चाताप का चिह्न था; जब दुःखी लोग दीनता से परमेश्वर की दया की शरण लेना और अपने पापों को मान लेना चाहते थे, तब वे टाट ओढ़ते थे। परन्तु अविश्वासी बिना विवेक या समझ के विश्वासियों की नकल करते थे। 392 केवल 1 मक्काबियों 5:6-8 को छोड़कर। मक्काबियों की विजयें निस्सन्देह इस भविष्यद्वाणी की अक्षरशः पूर्ति थीं। पद 33, 34 देखिए; जहाँ “तुरहियों” के शब्द का स्पष्ट उल्लेख है। — सं.
इसी कारण वे अपने सिरों पर राख डालते थे, और बिना किसी कारण के टाट ओढ़ते थे। जो उस समय सामान्यतः किया जाता था, उसी का उल्लेख अब यिर्मयाह करता है; टाट ओढ़ो, वह कहता है, विलाप करो और बाड़ों के पास इधर-उधर दौड़ो।
इसके बाद वह अन्य पुरुष में जोड़ता है, क्योंकि उनका राजा बँधुआई में चला गया है। उसने यह इसलिए कहा कि इस्राएली जान लें कि यद्यपि वह राज्य कुछ समय तक फलता-फूलता रहा, तौभी वह दिन आएगा जिसके विषय में भविष्यद्वक्ता ने कहा था, जब अम्मोनियों की दशा इस्राएलियों की दशा से कुछ भी अच्छी न होगी; जिनका राजा, जैसा सब जानते थे, याजकों और हाकिमों समेत निर्वासन में भेज दिया गया था। भविष्यद्वक्ता अब अम्मोनियों पर वही दण्ड घोषित करता है, कि न केवल उनका राजा बन्दी होकर दूसरे देश में ले जाया जाएगा, वरन् उनके हाकिम और उनके याजक भी। आगे आता है —
यिर्मयाह 49:4
4. हे भटकनेवाली बेटी, तू तराइयों पर, अपनी बहती हुई तराई पर, क्यों फूलती है? तू जो अपने रखे हुए धन पर भरोसा रखकर कहती थी, कि मेरे पास कौन आ सकेगा?
4. Quid gloriaris reconditis tuis? defluxit profunditas tua (ad verbum, vallis tua; sed quoniam {}קמעsignificat prfundum esse ideo {}םיקמעsunt profunditates; cur ergo gloriaris in tuis profunditatibus? sed non repugno quin transferamus, quid gloriaris in vallibus tuis? defluvit vallis tua, est idem nomen,) filia aversatrix, quae confidit in reconditis suis (in thesauris suis,) Quis veniet ad me?
क्योंकि मनुष्यों के मन निरन्तर डगमगाते रहते हैं, इसलिए कि वे परमेश्वर की असीम सामर्थ पर पर्याप्त विचार नहीं करते, भविष्यद्वक्ता, ताकि वह उन सब बाधाओं को दूर कर दे जो उसकी भविष्यद्वाणी को सन्दिग्ध बना सकती थीं, अब घोषणा करता है कि अम्मोनी अपनी तराइयों पर व्यर्थ घमण्ड करते थे। कुछ लोग तराइयों से उपजाऊ और भली-भाँति सींची हुई भूमि समझते हैं।
परन्तु भविष्यद्वक्ता, जैसा मैं समझता हूँ, गढ़वाले स्थानों की ओर अधिक संकेत करता है। तो वह कहता है कि वे अपनी गहरी तराइयों पर व्यर्थ घमण्ड करते थे; क्योंकि वे पहाड़ों से घिरे हुए थे, इसलिए वे सोचते थे कि उन तक कोई पहुँच नहीं सकता। वह इस व्यर्थ भरोसे का उपहास करता है, तू क्यों, वह कहता है, अपनी तराइयों पर, या गहराइयों पर, घमण्ड करती है? बह गई है तेरी तराई।
यह कहकर कि तराई, या गहराई, बह गई है, वह उसकी स्थिति की ओर संकेत करता है: क्योंकि जब कोई पहाड़ों के बीच बसे किसी प्रदेश को देखता है, तो वह भूमि बहती हुई सी दिखाई देती है, जैसे कोई नदी अपने किनारों के बीच सरकती हुई बहती है। तो जब वह कहता है कि तराई बह गई, तो यह किसी गहरे स्थान की ओर एक मार्मिक संकेत है। यह ऐसा ही था मानो उसने कहा हो, “तेरी गहराई लुप्त हो गई है,” या, “वह तेरे लिए वैसी रक्षा न होगी जैसी तू सोचती है।” परन्तु अर्थ यह है कि यद्यपि अम्मोनी अपने गढ़ों पर भरोसा रखकर शत्रुओं के सब आक्रमणों की उपेक्षा करते थे, तौभी वे लूट के लिए खुले छोड़ दिए जाएँगे; क्योंकि उनके पहाड़ और तराइयाँ उनके कुछ काम न आएँगी, इस धारणा के होते हुए भी कि वे ऐसे सुदृढ़ हैं कि उन पर आक्रमण नहीं किया जा सकता।
393 इस क्रिया का अर्थ है बाहर बहना, और बह जाना, नष्ट होना। यहाँ पिछला अर्थ प्रतीत होता है, “नष्ट हो गई है तेरी तराई।” (देखिए विलापगीत 4:9।) जब इसका अर्थ भरपूर होने के भाव में बाहर बहना होता है, तब इसके बाद एक संज्ञा आती है; परन्तु जब यह अकर्मक रूप में प्रयुक्त होता है, तब इसका अर्थ नष्ट होने के भाव में बह जाना होता है, — तू गहरी तराइयों पर क्यों घमण्ड करती है! बह गई है तेरी गहरी तराई, हे बेटी, जो फिर गई है, जिसने अपने धन पर भरोसा रखा है, जिसने अपने मन में कहा है, “मेरे पास कौन आ सकता है?” कृदन्त {,{`` השובבה“जो फिर गई है,” या भटक गई है, का अनुवाद वल्गेट ने किया है, और सीरियाई ने “प्रिय,” और सेप्टुआजिंट तथा तर्गुम ढिठाई या मूर्खता का भाव व्यक्त करते हैं। यह शब्द इस प्रकार कैसे अनूदित किया जा सका, यह कहना कठिन है। इस क्रिया का अर्थ है किसी की ओर या किसी से मुड़ना। यहाँ द्विरुक्त रूप में होने से इसका अर्थ है दृढ़ता से मुँह फेर लेना; इसलिए “विद्रोही” अनुचित अनुवाद न होगा। “धन” से पहले “उसके” शब्द “बेटी” की ओर संकेत करता है, परन्तु हमारी भाषा में “तेरे” अधिक अच्छा पढ़ा जाता है, जैसा वल्गेट और सीरियाई ने अपनाया है। कई प्रतियों में ये शब्द अतिरिक्त हैं, “जिसने अपने मन में कहा है,” और सब अनुवादों में इनके अनुरूप शब्द हैं। — सं.
वह अम्मोन को विद्रोही, या भटकनेवाली बेटी कहता है, यद्यपि वह कोई विवरण नहीं देता। परन्तु यहेजकेल और आमोस और सपन्याह भी, ये तीनों, स्पष्ट दिखाते हैं कि परमेश्वर अम्मोनियों के प्रति इतना कठोर क्यों था, (यहेजकेल 25; आमोस 1:13; सपन्याह 2:9;) इसका कारण यह था कि उन्होंने उसके और उसकी प्रजा के विरुद्ध निन्दा की बातें कही थीं, चुनी हुई प्रजा के दुःखों और विपत्तियों पर आनन्द मनाया था, और जब उन्होंने देखा कि वे अपने शत्रुओं से पराजित हो गए हैं, तब उन्हें लूट लिया था। तो इन्हीं कारणों से हमारा भविष्यद्वक्ता अब उन्हें विद्रोही जाति कहता है: उन्होंने घमण्ड से परमेश्वर के विरुद्ध अपने आप को ऊँचा किया था, और दुःखी इस्राएलियों पर क्रूर अत्याचार किया था, जो, जैसा बताया जा चुका है, लहू के नाते उनसे जुड़े हुए थे।
जो अपने गुप्त स्थानों, या छिपने के स्थानों पर भरोसा रखती है: कुछ लोग इसका अनुवाद करते हैं, “अपने धन पर।” परन्तु क्योंकि {,}אצרatser का अर्थ है छिपाना, इसलिए, जैसा मैं समझता हूँ, संकेत गढ़ों की ओर है; क्योंकि भविष्यद्वक्ता अगले शब्दों में स्वयं अपना अर्थ स्पष्ट करता है, मेरे पास कौन आ सकता है? तो ऐसा प्रतीत होता है कि अम्मोनी अपने आप को इसलिए सुरक्षित समझते थे कि वे अपने शत्रुओं के सामने खुले न थे, वरन् अपने पहाड़ों से सुरक्षित थे, मानो वे छिपने के स्थानों में हों। यह घमण्ड भली-भाँति दिखाता है कि वे अपने धन पर उतना भरोसा नहीं रखते थे जितना अपने छिपने के स्थानों पर, क्योंकि वे एकान्त गुफाओं-सी जगहों में रहते थे। अर्थ यह है कि यद्यपि अम्मोनी घमण्ड करते थे कि वे संकट की पहुँच से बाहर हैं, तौभी परमेश्वर उस क्रूरता का पलटा लेनेवाला बनेगा जो उन्होंने अपने कुटुम्बियों, अर्थात् इस्राएलियों, के प्रति की थी। आगे आता है —
यिर्मयाह 49:5
5. प्रभु सेनाओं के यहोवा की यह वाणी है, देख, मैं तेरे चारों ओर के सब रहनेवालों की ओर से तुझ पर भय डालूँगा; और तुम में से हर एक सीधा आगे की ओर ढकेल दिया जाएगा; और जो मारा मारा फिरता है, उसे कोई इकट्ठा न करेगा।
5. Ecce ego adduco super to terrorem, dicit Dominator, Jehova exercituum, ab omnibus circuitibus tuis, et expellemini, quisque coram facie sua, et nullus erit qui colligat dispersos.
यिर्मयाह अन्त में अपनी भविष्यद्वाणी यह कहकर समाप्त करता है कि परमेश्वर उस मूर्खतापूर्ण भरोसे को छिन्न-भिन्न कर देगा जिससे अम्मोनी घमण्ड से भरे हुए थे, क्योंकि वह उन पर भय लाएगा। वह भय को उस निश्चिन्तता के विरोध में खड़ा करता है जिसमें अम्मोनी सुस्त पड़े हुए थे; क्योंकि वे मानो अपने सुख-विलास से मतवाले हो गए थे। और फिर जिन गढ़ों से वे अपने आप को सुरक्षित समझते थे, उन्होंने उनके हृदयों को ऐसा कठोर कर दिया था कि वे किसी संकट से नहीं डरते थे। तो परमेश्वर इस भय को उस झूठे अहंकार के विरोध में खड़ा करता है जिससे वे फूले हुए थे: तो मैं तेरे चारों ओर से भय लाता हूँ। और यह अकारण नहीं जोड़ा गया, क्योंकि अम्मोनी सोचते थे कि यदि शत्रु उन पर कठिनता से दबाव डालें, तो वे किसी न किसी ओर से बच निकल सकते हैं; और क्योंकि निकलने के बहुत से मार्ग थे, वे सोचते थे कि उनका शत्रुओं के हाथ में पड़ना असम्भव है। परन्तु परमेश्वर घोषणा करता है कि वे हर प्रकार से भय से भर जाएँगे, क्योंकि भय उन्हें घेर लेगा और उन्हें घेराबन्दी में डाल देगा, यहाँ तक कि वे बच न सकेंगे।
फिर वह आगे कहता है, तुम निकाल दिए जाओगे, हर एक अपने मुँह की ओर, या, अपने मुँह के सामने।
यह भय का परिणाम होगा, क्योंकि परमेश्वर उनसे सारा विचार छीन लेगा; क्योंकि जब हम हड़बड़ी में भागते हैं, और केवल उसी मार्ग पर ध्यान देते हैं जो सामने आ जाए, तो यह स्पष्ट है कि हम भय से हाँके जा रहे हैं। जैसे हम फ्रांसीसी भाषा में कहते हैं, Il court devant soi; वैसे ही भविष्यद्वक्ता यहाँ कहता है, तुम निकाल दिए जाओगे, हर एक अपने मुँह के सामने, अर्थात्, “जहाँ कहीं तुम्हारे लिए कोई स्थान खुला होगा वहीं तुम भागोगे।” वह दिखाता है कि वे ऐसे भय से भर जाएँगे कि वे न यह विचार करेंगे कि सबसे अच्छा मार्ग कौन सा होगा, न किसी सुरक्षित शरणस्थान के विषय में सोचेंगे; सारांश यह कि वे भागने के सिवाय और कुछ न सोचेंगे। और इसी अभिप्राय से आगे का वचन है: बिखरे हुओं को इकट्ठा करनेवाला कोई न होगा: क्योंकि जब भीड़ के हृदयों पर कँपकँपी छा जाती है, तब भी उन्हें वापस बुलाया जा सकता है, जब कोई ऐसा व्यक्ति जिसमें दूसरों से अधिक साहस हो उन्हें रुकने के लिए उत्साहित करता है, जैसा हम जानते हैं कि बहुत सी सेनाएँ इसी रीति से बचाई गई हैं; क्योंकि जहाँ तक सैनिकों की बात है, जब वे अचानक भय से घिर जाते हैं, तब किसी नायक ने बहुधा उन्हें फिर इकट्ठा कर लिया है। परन्तु भविष्यद्वक्ता, जब वह कहता है कि उन्हें भागने से लौटा लानेवाला कोई न होगा, तो वह उनके विनाश का संकेत देता है। अन्त में वह यह जोड़ता है —
यिर्मयाह 49:6
6. परन्तु उसके बाद मैं अम्मोनियों को बँधुआई से लौटा लाऊँगा, यहोवा की यही वाणी है।
6. Et postea reducam captivitatem filiorum Ammon, dicit Jehova.
वह अब अम्मोन की सन्तान के विषय में वही बात कहता है जो उसने पहले मोआबियों के विषय में कही थी, कि उनके लिए भी अब तक कुछ आशा शेष थी, क्योंकि परमेश्वर अन्त में उस जाति पर दया करेगा। परन्तु, जैसा हम कह चुके हैं, ये प्रतिज्ञाएँ केवल आनुषंगिक थीं, क्योंकि परमेश्वर ने केवल एक ही प्रजा को चुना था कि वह उनका पिता हो; और अब्राहम की सन्तान को अन्य सब जातियों से अलग देखा जाना चाहिए। परन्तु यद्यपि परमेश्वर ने मानो अपनी प्रजा को परदेशियों से अलग करने के लिए एक दीवार खड़ी कर दी थी, तौभी उसकी इच्छा थी कि वह अपनी कृपा के, और अन्यजातियों की बुलाहट के, कुछ पूर्व-संकेत दे। तो भविष्यद्वक्ता ने यहाँ मसीह के राज्य पर ध्यान रखा। निस्सन्देह यह प्रतिज्ञा उसके आगमन तक फैली हुई थी; क्योंकि वह अन्यजातियों की बुलाहट के विषय में बोलता है, जिसे परमेश्वर ने तब तक टाले रखा जब तक उसने अपने पुत्र को जगत पर प्रकट न किया। तो यह ऐसा ही है मानो भविष्यद्वक्ता ने कहा हो कि अन्त में परमेश्वर की दया दूसरों के साथ-साथ अम्मोनियों पर भी प्रकट की जाएगी; अर्थात् जब परमेश्वर सारे जगत से अपनी कलीसिया को इकट्ठा करेगा, और उन्हें जो पहले बिखरे हुए थे एक देह में जोड़ देगा। और इसमें कोई सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता ने अम्मोन की सन्तान के विषय में बोलते हुए यह दिखाना चाहा कि जगत के सब भागों में क्या प्रकट किया जानेवाला था। और इसी प्रकार हमारी बुलाहट पर हमारा उद्धार आधारित है, क्योंकि हम देखते हैं कि सुसमाचार बिना किसी उद्देश्य के जगत में प्रचार नहीं किया गया; वरन् जैसे परमेश्वर ने आरम्भ ही से इसे ठहराया और निश्चित किया था, वैसे ही हम देखते हैं कि यिर्मयाह हमारे लेपालकपन का अग्रदूत था। तो जो कहा गया है उसका आशय यही है। इसके बाद वह एदोम की सन्तान की ओर बढ़ता है। परन्तु अब मैं आगे नहीं बढ़ सकता।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, ऐसा अनुग्रह कर कि जैसे तू ने प्राचीन काल में अब्राहम की सन्तान के प्रति, जिन्हें अपनी प्रजा होने के लिए चुनना तुझे भाया, इतने प्रमाण दिए कि तेरा प्रेम कितना महान और अनुपम था, — हाँ, ऐसा अनुग्रह कर कि हम भी आज के दिन उसी कृपा का आनन्द उठाएँ, क्योंकि हम उसी एकता की सहभागिता में ग्रहण किए गए हैं, और कि हमारी ताड़ना ऐसी हो कि हम तेरी दया की आशा कभी न खोएँ, वरन् उसका ऐसा स्वाद चखें कि उस स्वर्गीय राज्य पर ध्यान करते रहें जो तेरे एकलौते पुत्र के लहू के द्वारा हमारे लिए प्राप्त किया गया है। — आमीन।
एक सौ चौहत्तरवाँ व्याख्यान
यिर्मयाह 49:7
7. एदोम के विषय में सेनाओं का यहोवा यों कहता है: क्या तेमान में अब कुछ बुद्धि नहीं रही? क्या समझदारों की युक्ति नष्ट हो गई? क्या उनकी बुद्धि जाती रही है?
7. Ad Edom (contra Edom) sic dicit Jehova exercituum, An non amplius sapientia in Theman? periitne consilium ab intelligentibus? computruit (vel, supervacua facta est) sapientia ipsorum?
यहाँ यिर्मयाह एदोमियों की ओर मुड़ता है, जो चुनी हुई प्रजा के सबसे कट्टर शत्रु थे, यद्यपि उनकी उत्पत्ति के कारण उन्हें उसके प्रति कृपालु होना चाहिए था, क्योंकि वे एक ही पिता, अर्थात् अब्राहम, के वंशज थे। एदोमी भी अपने पवित्र वंश पर गर्व करते थे, और खतना उनमें और यहूदियों में एक समान था। तो यह अत्यन्त अधर्मी क्रूरता थी कि एदोमी अपने ही लहू के प्रति ऐसा कड़वा बैर रखते थे। इसलिए हमारे भविष्यद्वक्ता ने उन्हें अत्यन्त कठोरता से डाँटा, जैसा यहेजकेल और ओबद्याह ने भी किया। (यहेजकेल 25:12-14; ओबद्याह 1:1, 8।)
वह पहले कहता है, क्या तेमान में अब कुछ बुद्धि नहीं रही? इन शब्दों से वह संकेत देता है कि यद्यपि एदोमी अपनी ही युक्तियों के द्वारा अपने आप को सुरक्षित समझते थे, क्योंकि वे तीक्ष्ण बुद्धि में श्रेष्ठ थे, तौभी इससे उन्हें कुछ लाभ न होगा, क्योंकि प्रभु उन्हें अन्धा कर देगा और उनसे स्वस्थ बुद्धि छीन लेगा; क्योंकि जो बात यहाँ प्रश्न के रूप में रखी गई है, वह ओबद्याह द्वारा स्पष्ट रूप से घोषित की गई है, (ओबद्याह 1:8,) वह भी परमेश्वर के नाम से, “मैं तेमान में से बुद्धि को दूर करूँगा, और एसाव के पहाड़ पर समझ न रहेगी।”
परन्तु क्योंकि ओबद्याह यिर्मयाह से पहले हुआ था, इसलिए आवश्यक था कि वह इसके विषय में भविष्य की बात के समान बोले। परन्तु हमारा भविष्यद्वक्ता, क्योंकि वह न्याय, जिसका ओबद्याह साक्षी और अग्रदूत था, निकट आ पहुँचा था, एदोमियों पर निर्भीकता से विजय-गान करता है, और उनकी नामधराई पर हँसता है, क्योंकि जब उन्हें युक्ति और समझ की सबसे अधिक आवश्यकता थी, तभी वे उससे वंचित कर दिए गए। तेमान निस्सन्देह किसी पर्वत या प्रदेश का नाम था; और यह हम हबक्कूक भविष्यद्वक्ता से सीखते हैं, “परमेश्वर तेमान से आया, और पवित्र जन पारान पर्वत से आ रहा है।” (हबक्कूक 3:3)
यह एक प्रमुख नगर भी था, जैसा हम अन्य स्थानों से सीखते हैं; और हमारा भविष्यद्वक्ता इसे राज्य के केन्द्र के रूप में प्रस्तुत करता है, जब वह कहता है, क्या तेमान में बुद्धि नहीं रही? और फिर, क्या समझदारों की युक्ति नष्ट हो गई?
मुझे आश्चर्य है कि भाषा में निपुण और उससे भली-भाँति परिचित व्याख्याकार अन्तिम शब्द का अनुवाद “पुत्र” करते हैं, क्योंकि यह इस स्थान के लिए अनुपयुक्त है। यह शब्द निस्सन्देह {,}בוםbun, समझना, से निकला है, न कि {,}בנהbene, बनाना, से, जिससे {,}בניםbenim, पुत्र, शब्द आता है। क्योंकि इस पद में यह कहना कैसे उपयुक्त हो सकता है, क्या तेमान में अब बुद्धि नहीं रही? क्या पुत्रों से युक्ति नष्ट हो गई? अर्थात्, जैसा वे इसे समझते हैं, “एसाव के पुत्रों से।” परन्तु यह नीरस और खींच-तानकर निकाला गया अर्थ है; और दोनों वाक्यांश कहीं अधिक अच्छी तरह मेल खाते हैं जब इस प्रकार पढ़े जाएँ, “क्या तेमान में अब बुद्धि नहीं रही? क्या समझदारों की युक्ति नष्ट हो गई?” अर्थात् उनकी, जो अब तक अपनी समझ और तीक्ष्ण बुद्धि पर घमण्ड करते आए थे।
394 ऐसा ही वल्गेट और तर्गुम में है, जबकि सेप्टुआजिंट और सीरियाई में “विवेकी,” या समझदार है। यह शब्द अपने नियमित रूप में नहीं है, क्योंकि इसमें {{יiod नहीं है, और उससे पहले का {}מmem छोड़ दिया गया है, जो असामान्य नहीं है। “विवेकी” या “समझदार” की अपेक्षा “परखनेवाले” इसका अर्थ है। — सं.
फिर वह आगे कहता है, सड़ गई है उनकी बुद्धि। क्रिया {,}סרחsarech का अर्थ है अनावश्यक होना, परन्तु कुछ लोग यहाँ इसका अनुवाद सड़ जाना करते हैं, क्योंकि यह निफ़ल में है। मैं नहीं जानता कि उन्होंने ऐसा इसलिए किया या नहीं कि वे प्रसंग के अनुकूल कोई दूसरा अर्थ नहीं जानते थे; परन्तु हम इसका उपयुक्त अनुवाद इस प्रकार कर सकते हैं, कि उनकी बुद्धि अनावश्यक, अर्थात् व्यर्थ, हो गई थी। हम एक और अर्थ भी ग्रहण कर सकते हैं, कि उनकी बुद्धि अब तक उमड़ती रही थी, अर्थात् अत्यधिक भरपूर रही थी; क्योंकि उनमें ऐसी बुद्धि थी कि वे न केवल अपने लिए बुद्धिमानी से काम करते थे, वरन् दूसरों को भी दिखाते थे कि क्या उचित और लाभदायक है। तो क्योंकि एदोमियों में इतनी बुद्धि थी कि वे दूसरों का मार्गदर्शन करते थे, और केवल अपने लिए ही बुद्धिमान न थे, इसलिए यदि शब्दों का अनुवाद यह किया जाए कि उनकी बुद्धि भरपूर रही थी, तो वे भली-भाँति पढ़े जाएँगे। परन्तु उस दशा में शब्द व्यंग्यात्मक होंगे; क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है कि भविष्यद्वक्ता अपने आश्चर्य का कारण बताता है।
तो मैं यह व्याख्या देता हूँ: वह पहले कहता है, क्या तेमान में अब बुद्धि नहीं रही?
वह ऐसे पुकार उठता है मानो यह बात बहुत विचित्र हो, “यह कैसे हो सकता है! क्या बुद्धि का सोता ही सूख गया है? कौन सोच सकता था कि बुद्धि के लिए इतना प्रसिद्ध नगर ऐसा मूढ़ हो जाएगा कि अपनी निकट आती विपत्ति को न पहचाने, ताकि उसका सामना करे, और समय रहते उसका उपचार करे?” और इसी अभिप्राय से वह आगे कहता है, क्या समझदारों की युक्ति नष्ट हो गई? अन्त में वह यह जोड़ता है, भरपूर थी उनकी बुद्धि; और यह वह अपने आश्चर्य का कारण दिखाने के लिए कहता है।
परन्तु हमें अपने भविष्यद्वक्ता और ओबद्याह के बीच की समानता और भिन्नता पर ध्यान देना चाहिए। ओबद्याह ने उस जाति के अन्धेपन की भविष्यद्वाणी की थी; परन्तु हमारा भविष्यद्वक्ता, मानो उन लोगों को उनकी सुस्ती से जगाना चाहता हो जिन्होंने ओबद्याह की भविष्यद्वाणी पर ध्यान नहीं दिया था, पुकार उठता है, “तेमान से बुद्धि, और समझदारों से युक्ति, कैसे नष्ट हो गई?” हमें आगे यह भी देखना चाहिए कि यह दण्ड परमेश्वर ने एदोमियों पर इसलिए डाला कि उन्होंने अपने सारे विचार छल-कपट और षड्यन्त्रों में लगा दिए थे; और ऐसा कम ही होता है कि जो तीक्ष्ण बुद्धि में श्रेष्ठ होते हैं वे बहुत चालाक और कपटी न बन जाएँ। तो क्योंकि मनुष्य प्रायः अपने ज्ञान का इस प्रकार दुरुपयोग किया करते हैं, परमेश्वर उन्हें अन्धा कर देता है, और दिखाता है कि मनुष्य अपने आप से बुद्धिमान नहीं हो सकते, केवल उतना ही जितना उन्हें ऊपर से दिया जाता है। जैसा मैं कह चुका हूँ, भविष्यद्वक्ता इस न्याय का विस्तार इसलिए करता है कि वह मनुष्यों के मनों को और अधिक प्रभावशाली रीति से जगा सके। क्योंकि यदि एदोमी गँवार होते, जैसे पहाड़ों के बीच रहनेवाले लोग होते हैं, और उनकी बुद्धि की कोई चर्चा न फैली होती, तो किसी को आश्चर्य न होता कि वे पकड़े गए और अधीन कर लिए गए; क्योंकि सीधे-सादे और असावधान लोग अपने शत्रुओं के षड्यन्त्रों के आगे खुले रहते हैं, और उनसे बच नहीं सकते। परन्तु भविष्यद्वक्ता, परमेश्वर के इस न्याय को अद्भुत रूप में प्रस्तुत करने के लिए, कहता है कि उनकी बुद्धि मानो उमड़ रही थी, अर्थात् एक भरपूर भण्डार के समान थी, क्योंकि वे दूसरों को सम्मति देते थे। तो जब एदोमी, विशेषकर वे जो तेमान नगर में रहते थे, समझ में इतने श्रेष्ठ थे, तो भविष्यद्वक्ता इसी परिस्थिति के द्वारा दिखाता है कि उनका अन्धापन परमेश्वर के प्रत्यक्ष प्रतिशोध से उत्पन्न हुआ, और ऐसा परिवर्तन संयोग से नहीं हुआ। आगे आता है —
395 कुछ लोग कहते हैं कि केवल पहला वाक्यांश ही प्रश्न है, क्योंकि अन्य वाक्यांशों से पहले कोई प्रश्नवाचक निपात नहीं लगा है, — क्या तेमान में अब बुद्धि नहीं रही? परखनेवालों से युक्ति नष्ट हो गई है, लुप्त हो गई है उनकी बुद्धि। न तो प्राचीन अनुवाद और न तर्गुम अन्तिम दो पंक्तियों को प्रश्न के रूप में रखते हैं; और न सेप्टुआजिंट तथा सीरियाई पहली पंक्ति को। क्रिया {{סרח का अनुवाद भिन्न-भिन्न प्रकार से किया गया है, — सेप्टुआजिंट ने “चली गई;” वल्गेट ने “व्यर्थ हो गई;” सीरियाई ने “छीन ली गई;” तर्गुम ने “बिगड़ गई,” या भ्रष्ट हो गई। इस क्रिया का अर्थ है फैलाना, पसारना; और यहाँ फैलाना छितराने या बिखेरने के भाव में है, और यहाँ क्रिया कर्मवाच्य है। इसलिए “लुप्त हो गई” से अर्थ प्रकट होगा। पहली पंक्ति प्रश्न है, और अगली दो पंक्तियों में उत्तर है। अन्यथा पुनरुक्ति से बचा नहीं जा सकता। — सं.
यिर्मयाह 49:8
8. हे ददान के रहनेवालो, भागो, लौट जाओ, गहरे स्थानों में जा बसो! क्योंकि मैं एसाव पर उसकी विपत्ति, अर्थात् उसके दण्ड का समय, ले आऊँगा।
8. Fugite, conversi sunt, profundaverunt habitationem incolae Dedan, quia interitum Esau adduxi super ipsum tempore visitationis ejus.
भविष्यद्वक्ता यहाँ दिखाता है कि उस जाति का घमण्ड कितना बड़ा था, और मानो उसे उनकी आँखों के सामने रख देता है। वह कहता है, भागो; भाषा तो अचानक टूटी हुई है, फिर भी उसका अर्थ सन्दिग्ध नहीं है। अर्थ यह है कि जब कोई एदोमियों को भागने की चेतावनी देता, तब उनमें से कोई भी न हिलता; वरन् वे अपने ही देश में जमे रहते, क्योंकि वे सोचते थे कि वहाँ उन्हें सदा का चैन मिलेगा। ददान के निवासियों ने अपना निवास गहरा बना लिया है। वह एक और नगर का नाम लेता है जो तेमान से दूर नहीं था। फिर वह परमेश्वर के नाम से आगे कहता है, परन्तु मैं एसाव पर उसके दण्ड के समय विनाश लाऊँगा।
अब हम भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय समझते हैं,—कि वह हमारी आँखों के सामने यह रखना चाहता था कि एदोमी अपने गढ़ों पर कितने घमण्ड से भरोसा रखते थे, यहाँ तक कि उन्हें भागने के लिए कभी राज़ी नहीं किया जा सकता था। तब भविष्यद्वक्ता, परमेश्वर के दूत के रूप में, घोषणा करता है कि उन्हें भागना ही पड़ेगा। परन्तु उन्होंने क्या किया? उन्होंने अपना निवास गहरा बना लिया, अर्थात् वे अपने देश में ऐसे निश्चिन्त बने रहते मानो वे पृथ्वी के केन्द्र में गड़े हुए हों, और इस कारण उन पर कोई आक्रमण न हो सकता हो। सो जब वह कहता है कि उन्होंने गहरा बना लिया, तो वह उनके हठ को प्रकट करता है, कि कोई उन्हें डरा न सकता था, चाहे वह अत्यन्त बड़े संकटों की घोषणा ही क्यों न करता। परन्तु उसका उद्देश्य इस प्रकार अपनी भविष्यद्वाणी पर भरोसा दृढ़ करना था, क्योंकि विश्वासियों में से अधिकांश केवल वर्तमान दशा के अनुसार ही विचार कर सकते थे; और एदोमी घमण्ड के साथ सब धमकियों पर हँसते थे।
इसलिए कि विश्वासी यह न सोचें कि एदोमी सुरक्षित रहेंगे, वह आगे परमेश्वर के नाम से कहता है, “देखो, मैं एसाव पर विनाश लाऊँगा।” वह उनके पिता का नाम लेता है; और हम जानते हैं कि एदोमी इसहाक के पहिलौठे एसाव के वंश से निकले थे; और इसलिए वे इस्राएलियों के साथ एक ही लहू के थे। परन्तु भविष्यद्वक्ता ने एक निकम्मे ठहराए गए मनुष्य का नाम सामने लाकर निःसन्देह एक शाप की स्मृति को नया करना चाहा, क्योंकि एसाव तुच्छ ठहराया गया था, और उसका छोटा भाई याकूब उसके स्थान पर आया।
इसलिए भविष्यद्वक्ता ने, अपने वचनों को अधिक विश्वसनीय बनाने के लिए, लोगों के सामने वह बात रखी जो उन्हें भली-भाँति ज्ञात थी, अर्थात् यह कि एसाव परमेश्वर द्वारा तुच्छ ठहराया गया था; क्योंकि एसाव के त्यागे जाने पर ही उनका सेंतमेंत चुनाव और लेपालकपन निर्भर था।
और वह कहता है कि परमेश्वर दण्ड के समय उस जाति से पलटा लेनेवाला होगा; क्योंकि जैसा मैं पहले तुम्हें स्मरण दिला चुका हूँ, जो कुछ हमने पढ़ा वह तुरन्त पूरा नहीं हुआ। इसलिए जब इस्राएली अत्यन्त विपत्तियाँ सह रहे थे, तब यह देखकर कि एदोमी मानो अपने सुख-विलास में सोए पड़े हैं, और परमेश्वर के ये न्याय मानो गाड़ दिए गए हैं, उनकी आशा सौ बार टूट सकती थी; क्योंकि उनके मन में यह आ सकता था कि जो कुछ यिर्मयाह ने घोषित किया था वह सब धुएँ के समान उड़ गया। इसलिए उनकी आशा और धीरज को सम्भालने के लिए वह यहाँ उनके सामने दण्ड का समय रखता है; मानो वह कहता हो कि जब परमेश्वर बहुत समय तक धीरज से उनकी अभक्ति को सह चुका और उन्हें छोड़ता रहा, तब एदोमियों की भी बारी आएगी।
परन्तु इसके विषय में हम आगे देखेंगे। अब, जैसा मैं अन्यत्र दिखा चुका हूँ, वे शब्द जो हमें परमेश्वर के दण्ड के समय का स्मरण दिलाते हैं, ध्यान देने योग्य हैं, ताकि हम उतावली करके औंधे मुँह न गिरें, जैसा प्रायः होता है; क्योंकि जो जल्दी में होते हैं, वे पहले ही पग पर गिर पड़ते हैं। सो इसलिए कि हम पके हुए समय की बाट जोहना सीखें, यह बात हमारे मन में दृढ़ बनी रहे कि परमेश्वर के दण्ड के लिए उसके ठहराए हुए समय हैं। अब आगे लिखा है— 396 प्राचीन अनुवादों में (सिरियाई और तर्गुम को छोड़कर) यहाँ क्रियाएँ आज्ञार्थक रूप में हैं; और अधिकांश समीक्षक भी उन्हें ऐसा ही मानते हैं, “भागो, लौट जाओ, गहरे में बसो,” इत्यादि। इसके बाद आनेवाले {,{כי “क्योंकि” के कारण यह आवश्यक है।—सं.
यिर्मयाह 49:9
9. यदि दाख तोड़नेवाले तेरे पास आते, तो क्या वे कहीं-कहीं दाख न छोड़ जाते? यदि चोर रात को आते तो क्या वे जितना चाहते उतना ही नाश करके न चले जाते?
9. Si vindemiatores venissent contra to, non reliquissent uvas? si fures in nocte, nonne perdidissent quod sufficeret ipsis?
व्याख्याकारों ने इस पद को केवल धुँधला ही नहीं, बल्कि बिगाड़ भी दिया है, और केवल व्यर्थ की बातें कही हैं, और भविष्यद्वक्ता के अर्थ से बहुत दूर चले गए हैं। ऐसा क्यों? क्योंकि उन्हें इसकी तुलना ओबद्याह के एक स्थल से करने की बात सूझी ही नहीं।
ओबद्याह ही सच्चा व्याख्याकार है; वरन् जो कुछ हम यहाँ पढ़ते हैं, उसे हमारे भविष्यद्वक्ता ने उसी से लिया है। क्योंकि वहाँ यह प्रश्न पूछा गया है, “यदि चोर तेरे पास आते, यदि डाकू ({,}שדדיshaddi, वहाँ जोड़ा गया है, परन्तु यिर्मयाह ने उसे छोड़ दिया है)—यदि रात को डाकू आते, तो तू कैसे मिट्टी में मिल जाता?” परन्तु पहले तो अनुवाद यह होना चाहिए, “यदि चोर तेरे पास आए होते, तो तू कैसे मिट्टी में मिल गया होता?” फिर वह आगे कहता है, “क्या वे उतना ही न चुरा लेते जितना उनके लिए बहुत होता?” इसके बाद वह दूसरा वाक्यांश जोड़ता है, “यदि दाख तोड़नेवाले तेरे पास आए होते, तो क्या वे दाख न छोड़ जाते?” सो यदि हम भविष्यद्वक्ता के वचनों को प्रश्न के रूप में पढ़ें, तो उनमें कोई सन्देह नहीं रहता। परन्तु इसमें लोगों पर धमकाई गई विपत्ति और दूसरे उजाड़ों के बीच एक निहित विरोध है। यदि रात का कोई चोर किसी दूसरे का घर लूटता, तो वह अपनी लूट से लदकर चला जाता, और कुछ न कुछ पीछे छोड़ जाता; क्योंकि हर लूट में कुछ वस्तुएँ बच ही जाती हैं: इसी प्रकार दाख तोड़नेवालों के विषय में भी, कुछ दाख बच जाती हैं, जो तोड़नेवालों की दृष्टि से छूट जाती हैं।
तब भविष्यद्वक्ता यहाँ दिखाता है कि उस जाति का विनाश इतना बड़ा होगा कि वह सब प्रकार की लूट से बढ़कर होगा; क्योंकि जब कोई अपनी दाखलताओं को तोड़कर खाली करता है, तब भी वह कुछ दाख छोड़ देता है; और जब कोई चोर किसी घर में घुसता है, तो वह अपनी लूट से सन्तुष्ट होकर सब वस्तुएँ अपने साथ नहीं ले जाता। परन्तु वह कहता है कि एदोमियों के पास कुछ भी शेष न छोड़ा जाएगा। इससे हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता ये दो उपमाएँ, अर्थात् दाख तोड़नेवालों की और चोरों की, क्यों सामने लाता है।
साथ ही हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि जब परमेश्वर इस्राएलियों के विरुद्ध अपने पलटे की घोषणा करता है, तो वह प्रायः ये उपमाएँ प्रस्तुत करता है, यह दिखाने के लिए कि उनके पास कुछ भी न बचेगा, “जब जैतून झाड़े जाते हैं, तब भी पेड़ों की फुनगी पर कुछ फल बचे रहते हैं; परन्तु तू पूरी रीति से खाली कर दिया जाएगा।” क्योंकि परमेश्वर ने ये बातें कही थीं, इस्राएली आपत्ति उठाकर कह सकते थे, “हमारी दशा कैसी है, और कितनी दयनीय! क्योंकि हम अत्यन्त पीड़ित हैं; यद्यपि परमेश्वर एदोमियों को भी दुःख देता है, तौभी वह उनके साथ नरमी से व्यवहार करता है, क्योंकि परमेश्वर का क्रोध हमारी अपेक्षा उनके विरुद्ध कम भड़कता है।” सो इसलिए कि विश्वासी इस प्रकार निराशा में न डूब जाएँ, हमारा भविष्यद्वक्ता घोषणा करता है कि एदोमी पूरी रीति से नष्ट कर दिए जाएँगे, यहाँ तक कि उनके लिए न एक दाख बचेगी, न उनका कोई सामान, क्योंकि उनके शत्रु सारे देश को उजाड़ देंगे। अब इस पद की पुष्टि आगे आती है—
397 सम्भवतः जिन व्याख्याकारों की ओर संकेत है वे सेप्टुआजिन्ट और वल्गेट हैं, जिनमें प्रश्नवाचक रूप का प्रयोग नहीं हुआ है; सिरियाई और तर्गुम में ऐसा नहीं है।—सं.
यिर्मयाह 49:10-11
10. परन्तु मैं ने एसाव को उघाड़ा है, मैं ने उसके छिपने के स्थानों को प्रगट किया है; यहाँ तक कि वह छिप न सकेगा। उसके वंश और भाई और पड़ोसी सब नष्ट हो गए हैं और उसका अन्त हो गया।
10. Quia ego discooperio Esau, retego abscondita ejus, et occultari non poterit; vastatum est semen ejus (aut, vastabitur) et fratres ejus, et vicini, et non ipse (quanquam alii vertunt, et nemo erit, et contexunt proximum versum,)
11. अपने अनाथ बालकों को छोड़ जाओ, मैं उनको जिलाऊँगा; और तुम्हारी विधवाएँ मुझ पर भरोसा रखें।
11. Relinque pupillos tuos; ego vivificabo (hoc est, alam ipsos;) et viduae tuae in me sperent.
पद के आरम्भ के विषय में भविष्यद्वक्ता का अर्थ अस्पष्ट नहीं है; क्योंकि उसका तात्पर्य यह है कि एदोम के लोगों का विनाश ऐसा होगा कि वे शत्रुओं द्वारा लूट लिए जाएँगे, कि वे पूरी रीति से नंगे हो जाएँगे। परन्तु वह परमेश्वर के नाम से बोलता है: देखो, मैं एसाव को उघाड़ता हूँ, और उसकी छिपी हुई वस्तुओं को खोल देता हूँ। छिपी हुई वस्तुओं से उसका अभिप्राय धन-भण्डार है, जैसा ओबद्याह से स्पष्ट है। तब वह कहता है कि वह एदोमियों को लूट के लिए ऐसा खोल देगा कि कोई छिपी वस्तु न बचेगी जिसे उनके शत्रु पकड़कर लूट न लें। यही अर्थ है।
फिर वह उस बात की पुष्टि करता है जो मैंने कही है, कि यह लूट दाख तोड़ने, या चोरी, या साधारण डकैती के समान न होगी, क्योंकि परमेश्वर एदोमियों को उनकी सारी सम्पत्ति से, यहाँ तक कि जो कुछ उन्होंने भूमि में छिपा रखा था उस सब से भी, पूरी रीति से खाली कर देगा।
पद के अन्त के विषय में कुछ लोग यह व्याख्या देते हैं, “कोई कहनेवाला न होगा:” अर्थात् एक शब्द समझ लेना है,—“कोई यह कहनेवाला न होगा, अपने अनाथों को मेरे पास छोड़ दे, मैं उनका पालन-पोषण या सँभाल करूँगा, या मैं उनका पिता बनूँगा; और तेरी विधवाएँ मुझ पर आशा या भरोसा रखें, या मुझ पर टिकी रहें।” क्योंकि माता-पिता के लिए यह कोई छोटी सान्त्वना नहीं होती जब वे जानते हैं कि उनकी विधवाओं के पास और उनके अनाथों के पास भी शरण लेने के लिए कोई होगा। जब कोई मरता है और देखता है कि उसकी विधवा हर सहायता से वंचित है, और देखता है कि उसके अनाथ दुखी और कंगाल हैं, तो उसका पिता-स्नेह और पति-प्रेम गहरा घायल होता है। क्योंकि जब पति अपनी विधवा के लिए कोई सहायता न जुटा सके, जब वह अपने अनाथों के लिए कोई राहत न दे सके, तो यह स्वयं मृत्यु से भी अधिक कड़वा है। इसलिए कुछ व्याख्याकार सोचते हैं कि इस प्रकार इस जाति के विनाश को बढ़ाकर बताया गया है; अर्थात् इसलिए कि माता-पिता को सान्त्वना देनेवाला और मानो मृतकों का स्थान लेनेवाला कोई न मिलेगा।
परन्तु यदि इन वचनों को व्यंग्यात्मक माना जाए तो अर्थ अनुपयुक्त न होगा, कि भविष्यद्वक्ता ने परमेश्वर के व्यक्तित्व में कहा, अपने अनाथों को मेरे पास छोड़ दे, मैं उनका पालन करूँगा, और तेरी विधवाएँ मुझ पर टिकी रहें, या मुझ पर भरोसा रखें: क्योंकि इसके बाद आता है, देखो, जिनका न्याय यह न था, उन्होंने कटोरा पिया है, इत्यादि। सो यदि हम यह समझें कि परमेश्वर एदोमियों को ताना मारता है, और व्यंग्य से घोषणा करता है कि वह उनके मरने के बाद भी उनके विरुद्ध न्यायी होगा, तो यह स्थल अनुचित न पढ़ा जाएगा; क्योंकि हम जानते हैं कि परमेश्वर का पलटा तीसरी और चौथी पीढ़ी तक पहुँचता है। सो जैसे उसने पहले घोषणा की थी कि एदोमी, उनका वंश, उनके भाई और उनके पड़ोसी नष्ट किए जाएँगे, वैसे ही वह अब उसी बात की पुष्टि करता है,—“क्या! क्या तू आशा करता है कि मैं तेरे अनाथों का पिता या रक्षक बनूँगा? कि मैं तेरी विधवा की सहायता करूँगा? यह आशा तू मुझसे व्यर्थ रखता है।”
भविष्यद्वक्ता थोड़े से शब्दों में एदोमियों के मन को बहुत तीखेपन से कोंचता है, जब परमेश्वर इस प्रकार स्वयं को प्रस्तुत करता है, और उपहास के रूप में कहता है कि वह उनके अनाथों और विधवाओं का रक्षक होगा; क्योंकि उन्होंने बिना भेद अनाथों और स्त्रियों पर अपना क्रोध उण्डेला था, और न किसी लिंग को छोड़ा न किसी आयु को। तब परमेश्वर यहाँ दिखाता है कि उनके पास अपनी सन्तान के विषय में किसी सान्त्वना की आशा करने का कोई कारण न था, क्योंकि वह तीसरी और चौथी पीढ़ी तक उनसे पलटा लेनेवाला होगा। और निःसन्देह जो कुछ कुछ लोग कहते हैं वह खींचतान है; कम से कम मैं यह नहीं देखता कि मैं उनका पालन करूँगा, ये शब्द शेष प्रसंग से कैसे मेल खा सकते हैं। सो इस वाक्यांश को मैं स्वयं परमेश्वर पर लागू करता हूँ, क्योंकि उसका पलटा उन्हें उनके भाइयों, उनके पड़ोसियों और उनके वंश समेत भस्म कर देगा।
और व्यंग्य ही पूरे स्थल के लिए सबसे उपयुक्त है; अर्थात् परमेश्वर यह दिखाना चाहता था कि वह अनाथों को कोई सहायता या विधवाओं को कोई सहारा नहीं दे सकता था, क्योंकि वे स्वयं अनाथों और विधवाओं दोनों के प्रति इतने क्रूर रहे थे। फिर इसकी पुष्टि आगे आती है—
यिर्मयाह 49:12
12. क्योंकि यहोवा यों कहता है, देख, जो इसके योग्य न थे कि कटोरे में से पीएँ, उनको तो निश्चय पीना पड़ेगा; फिर क्या तू किसी प्रकार निर्दोष ठहरकर बच जाएगा? तू निर्दोष ठहरकर न बचेगा, तुझे अवश्य ही पीना पड़ेगा।
12. Quia sic dicit Jehova, Ecce, quibus non erat judicium (ad verbum, quibus non judicium ipsorum,) ad bibendum calicem bibendo bibent; --- tu vero ipse immunis eris? vel, immunis immunitatem adipisceris? vel tu, vero immunis evades?) non evades immunis, quia bibendo bibes.
जैसा मैं समझता हूँ, वह पिछले पद की पुष्टि करता है,—कि परमेश्वर का पलटा एसाव के सारे वंश की बाट जोह रहा था, क्योंकि यह अनुचित होता कि परमेश्वर अपनी प्रजा के साथ उन परदेशियों की अपेक्षा अधिक कठोरता से व्यवहार करे जिन्होंने उसका जूआ पूरी रीति से उतार फेंका था। क्योंकि जो कुछ यहाँ कहा गया है, उसे मैं कलीसिया के विषय में समझाता हूँ, जिनका न्याय यह न था कि कटोरा पिएँ, वे निश्चय पिएँगे। कुछ लोग इसे उन पड़ोसी जातियों पर लागू करते हैं जो एदोमियों के समान इतनी दुष्ट नहीं हुई थीं। परन्तु यह व्याख्या फीकी है, और जैसा हम अन्यत्र कह चुके हैं, हमें सदा भविष्यद्वक्ता के अभिप्राय पर ध्यान देना चाहिए। तब उसका उद्देश्य इसके सिवा और क्या था कि विश्वासियों को दिखाए कि उनके लिए हियाव छोड़ने का कोई कारण न था, चाहे परमेश्वर उन्हें कितना ही कठोर दुःख क्यों न दे, क्योंकि जो दण्ड वह एदोमियों पर डालेगा वह किसी रीति से हल्का न होगा; क्योंकि हम जानते हैं कि जब हम देखते हैं कि अधर्मियों और निकम्मे ठहराए गए लोगों की दशा परमेश्वर की सन्तानों की दशा से अच्छी है, तब हम डाह की बड़ी परीक्षा में पड़ते हैं। और इसी उद्देश्य से भजन 37 रचा गया, “कुकर्मियों के कारण मत कुढ़, और न उनकी समृद्धि से चिढ़, क्योंकि वे शीघ्र नाश हो जाएँगे।”
398 यहाँ दी गई दोनों व्याख्याओं में से कोई भी सन्तोषजनक नहीं है, यद्यपि पहली को विशेष रूप से बहुतों ने अपनाया है, जैसे हेनरी और स्कॉट ने। सेप्टुआजिन्ट का अर्थ जानना कठिन है; वल्गेट और सिरियाई शब्दशः हमारे अनुवाद के समान हैं। तर्गुम बहुत भटक जाता है, और इस पद को इस्राएल की प्रजा को सम्बोधित बताता है, जिनका यहाँ कोई उल्लेख नहीं है। ब्लेनी एक छपाई की भूल मानता है, {{עזבको पिछले पद से जोड़ता है, और ,{}הको अगले शब्द के साथ रखता है, और यह अनुवाद देता है,—और उसका कुछ भी शेष न रहा। 11. क्या मैं तेरे अनाथ बालकों के प्राण बचाऊँ? या क्या तेरी विधवाएँ मुझ पर भरोसा रखें? इन प्रश्नों को वह दृढ़ निषेध मानता है। अधिक सरल दृष्टिकोण यह प्रतीत होता है: पिछले पद में न केवल एसाव का, बल्कि उसके भाइयों और पड़ोसियों का भी विनाश घोषित किया गया है। उसके “वंश” का अर्थ है उसकी सन्तान, अर्थात् वह जाति, और वह न रहनेवाला था, अर्थात् एक राज्य के रूप में। फिर भी कुछ “अनाथ” और “विधवाएँ” बची रहेंगी; और क्योंकि “भाई” और “पड़ोसी” भी स्वयं एसाव के समान नष्ट किए जाएँगे, अर्थात् जाति को बनानेवाले सब वयस्क लोग, और इस प्रकार अनाथ और विधवाएँ असहाय छोड़ी जाएँगी, इसलिए परमेश्वर को यहाँ कही गई प्रतिज्ञा देना भाया: अपने अनाथों को छोड़ जा, मैं उनको जीवित रखूँगा; तेरी विधवाएँ भी मुझ पर भरोसा रखें। अन्तिम क्रिया पुल्लिंग और स्त्रीलिंग दोनों है, और अनाथों और विधवाओं दोनों की ओर संकेत करती है। सार रूप में यही व्याख्या वेनेमा ने दी है, और यही सबसे सन्तोषजनक है।—सं.
और दाऊद भी, भजन 73:2, 3 में, मान लेता है कि जब उसने दुष्टों को उनके सुख-विलास में मग्न देखा, जबकि परमेश्वर की सन्तान के साथ दुःखदायी व्यवहार होता था, तो वह एक प्रकार से डगमगा गया। तब हमारा भविष्यद्वक्ता इस स्थान में, जैसा अन्यत्र भी प्रायः, विश्वासियों का ध्यान रखता था, और उन्हें सम्भालना चाहता था, कि जब परमेश्वर एदोमियों के समान उन्हें भी दुःख दे, तब वे अपने बोझ के नीचे दब न जाएँ। इसलिए वह एदोमियों के विषय में बोलते हुए कहता है, जिनका न्याय पीना न था, वे पीते-पीते कटोरा पिएँगे, और क्या तू छूट जाएगा? अर्थात् “मैं अपनी प्रजा को नहीं छोड़ूँगा, तो क्या मैं परदेशियों को छोड़ दूँ? ऐसा नहीं हो सकता।”
तब हम देखते हैं कि जब विश्वासियों ने सुना कि दुष्ट, जो खुले और प्रकट रूप से परमेश्वर की उपेक्षा करते थे, उसके न्याय से बच नहीं सकते, तो यह उनके लिए सान्त्वना का एक फलदायी स्रोत था।
परन्तु अब यह पूछा जा सकता है कि वह कैसे कह सका कि परमेश्वर के क्रोध के कटोरे में से पीना कलीसिया का न्याय न था? वह तुलनात्मक रूप से बोलता है, और यह उत्तर हमारे लिए पर्याप्त होना चाहिए। यह निश्चित है कि इस्राएली उन सब विपत्तियों के योग्य थे जो उन्होंने सहीं। तब परमेश्वर ने उन्हें न्याय से ताड़ना दी; उसने बिना कारण या अचानक क्रोध में आकर काम नहीं किया, बल्कि वही पूरा किया जो उसने पहले से ठहरा रखा था। सो यह परमेश्वर का न्याय था, अर्थात् वही जो उसने निश्चित और स्थिर किया था; क्योंकि यहाँ न्याय को परमेश्वर की आज्ञप्ति के अर्थ में लेना है, जिसके द्वारा वह हर एक को उसका भाग बाँटता है। तब जब कोई इस्राएलियों की तुलना एदोमियों से करता, तो कटोरे में से पीना इस्राएलियों का न्याय न था,—ऐसा क्यों? यहाँ एक नया प्रश्न उठता है, क्योंकि इस्राएली अन्य सब से बुरे रहे थे। एदोमी परमेश्वर से पूरी रीति से फिर गए थे; उनके बीच सारी ज्योति बुझ गई थी; और फिर व्यवस्था उन्हें दी ही नहीं गई थी: याकूब के मिस्र में उतरने से पहले—जिसे अब्राहम को बताए गए ठहराए हुए समय के अनुसार वहाँ से छुड़ाया जाना था—वे कनान देश से अलग पहाड़ों में रहते थे। इसलिए परमेश्वर की व्यवस्था का कोई भाग उनके पास न था, सिवाय इसके कि उनके पास खतने का खोखला चिह्न था। परन्तु इस्राएली, जिन पर व्यवस्था की शिक्षा सदा चमकती रही थी, पूरी रीति से निरुत्तर थे। तब भविष्यद्वक्ता क्यों कहता है कि उनका कोई न्याय न था? मेरा उत्तर यह है कि यहाँ मनुष्यों के व्यक्तित्व की ओर नहीं, वरन् इसके विपरीत परमेश्वर के उस अनुग्रह की ओर संकेत है, जिसके द्वारा उसे इस्राएल की सन्तान को अपनाना भाया था। सो क्योंकि परमेश्वर ने उस जाति को चुना था, यहाँ जिस बात का ध्यान रखा गया है वह विशेष लेपालकपन है; क्योंकि परमेश्वर के लिए यह उचित है कि वह अपनी सन्तान पर कृपा करे, और यह भी उचित है कि वह परदेशियों की अपेक्षा उन्हें क्षमा करे। जब कोई अपने ही पुत्र से अप्रसन्न होता है, तो वह उससे मेल कर लेगा; परन्तु किसी परदेशी को क्षमा न मिलेगी।
सो अब हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता इस बात पर ध्यान नहीं देता कि लोग किस योग्य थे, न यह विचार करता है कि उनकी अभक्ति कितनी घृणित रही थी, और वे कितने भारी दण्ड के योग्य थे; वरन् इसके विपरीत वह परमेश्वर के उस अनुग्रह की ओर संकेत करता है जिसके द्वारा उसने याकूब के वंश को चुना था। उसने निश्चय पहले अब्राहम के सारे वंश को चुना था; परन्तु एसाव का त्यागा जाना उसके बाद हुआ, जिससे वंश के रूप में केवल याकूब ही रह गया। सो क्योंकि परमेश्वर ने याकूब की सन्तान पर स्वयं को पिता के रूप में प्रकट किया था, भविष्यद्वक्ता कहता है कि कटोरे में से पीना उनका न्याय न था, क्योंकि तर्क और सामान्य बुद्धि के अनुसार यही था कि परमेश्वर परदेशियों की अपेक्षा उन्हें क्षमा करे—उन परदेशियों की अपेक्षा जिन्हें वह पहले ही त्याग चुका था, और जो सड़े हुए अंगों के समान थे: तब जिनका न्याय कटोरा पीना न था, वे पीते-पीते पिएँगे, और क्या तू बेदण्ड छूट जाएगा? अर्थ यह है कि यदि हरी लकड़ी जलाई जाती है, तो सूखी का क्या होगा? जैसा मसीह ने कहा (लूका 23:31)। ऐसी ही एक सान्त्वना 1 पतरस 4:17, 18 में बताई गई है, जहाँ उन क्लेशों का उल्लेख है जिनके सामने परमेश्वर की कलीसिया अब खुली है। अब, क्योंकि हम कोमल और नाज़ुक हैं, और बहुतों के मन व्याकुल हो सकते हैं, पतरस कहता है कि यदि परमेश्वर अपनों के प्रति, अपने ही घराने के लोगों के प्रति, इतना कठोर है, तो दुष्टों का क्या होगा? कैसा भयानक पलटा उनकी बाट जोह रहा है?
इससे हम भविष्यद्वक्ता के वचनों का आशय समझते हैं, और यह भी कि इससे कौन-सी शिक्षा निकाली जा सकती है, अर्थात् यह कि जब हम देखते हैं कि परमेश्वर का न्याय परमेश्वर के घर से आरम्भ होता है, जैसा भविष्यद्वक्ता अन्यत्र कहता है (यिर्मयाह 25:29), और जैसा पतरस भी कहता है; अर्थात् जब परमेश्वर अपनी ही सन्तान को ताड़ना देता है, और इस बीच दुष्टों को अनदेखा करता प्रतीत होता है, तब हमें धीरज से पहले बताए गए दण्ड के समय की बाट जोहनी चाहिए; और यह बात हमें सदा स्मरण रखनी चाहिए, “जब हरे पेड़ के साथ ऐसा किया जाता है, तो सूखे के साथ क्या कुछ न किया जाएगा?” तब जब परमेश्वर अपने न्याय को टालता है और तुरन्त पूरा नहीं करता, तो हम दुष्टों से डाह न करेंगे; क्योंकि परमेश्वर द्वारा अपने दासों पर डाले गए दण्ड केवल अस्थायी और सीमित होते हैं, और औषधि के रूप में ठहराए गए हैं, क्योंकि जो कुछ हम सहते हैं वह सब हमारे उद्धार में सहायक है, जैसा पौलुस हमें सिखाता है (रोमियों 8:28)। सो जबकि परमेश्वर पिता के समान हमें ताड़ना देता है, तो हम उसके पितृ-हाथ से न भागें; और न हम यह सोचें कि परमेश्वर दुष्टों के साथ अधिक कृपा से व्यवहार करता है क्योंकि वह अपने न्याय को रोके रखता है, क्योंकि अन्त में वे अपने ही विनाश में घसीटे जाएँगे, जैसा भविष्यद्वक्ता यहाँ कहता है।
कटोरे की चर्चा करते हुए भविष्यद्वक्ता पवित्रशास्त्र में प्रचलित एक मुहावरे का प्रयोग करता है, क्योंकि पवित्रशास्त्र रूपक के द्वारा मनुष्यों पर उनके पापों के कारण डाले गए दण्ड को कटोरा कहता है; क्योंकि परमेश्वर हर एक को उसका उचित माप बाँटता है। तब यह मान लिया गया है कि विपत्तियाँ संयोग से नहीं आतीं, बल्कि परमेश्वर के हाथ से निकलती हैं, मानो वह पीने के लिए कटोरा देता हो। अब जब वह अपनों को दुःख देता है, तो उन्हें मानो उसका क्रोध पीने के लिए विवश किया जाता है; इसलिए वह खट्टा और कड़वा कटोरा है। परन्तु दुष्ट आगे चलकर विष पिएँगे। औषधि भी, यद्यपि अपनी कड़वाहट के कारण स्वाद में अप्रिय होती है, तौभी लाभदायक होती है; परन्तु विष मनुष्यों को मार डालता है, यद्यपि उसका स्वाद औषधि के समान हो। तो यही वह तुलना है जिसका प्रयोग यिर्मयाह यहाँ करता है; वे पीते-पीते कटोरा पिएँगे, अर्थात् परमेश्वर के दास, जिन्हें फिर भी एक विशेष अधिकार के कारण छूट मिलनी चाहिए थी, क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें अपनी निज प्रजा होने के लिए चुना था; वह कहता है, क्या तू पीने से छूट जाएगा? वह सब परदेशियों को सम्बोधित करता है।
हम पहले बोलने का एक और ढंग देख चुके हैं, “वे तलछट तक पिएँगे,” मानो वह कहता हो, “परमेश्वर तुझे केवल कड़वा कटोरा ही पीने को न देगा, बल्कि उसकी कड़वाहट तुझे मार डालेगी और नष्ट कर देगी, क्योंकि परमेश्वर तुझे उसकी तलछट तक पीने के लिए विवश करेगा।” तौभी अर्थ वही है, यद्यपि मुहावरा भिन्न है। तब वह दृढ़ता से कहता है कि एदोमी परमेश्वर के न्याय से छूटे न रहेंगे, और क्यों? क्योंकि परमेश्वर अपनी सन्तान को भी नहीं छोड़ता। सो यहाँ हमें सबसे उत्तम सान्त्वना सुझाई गई है जब परमेश्वर हमें नाना प्रकार से दुःख देता है: हम जान लें कि इसके सिवा और कुछ नहीं हो सकता कि यह अन्तिम न्याय की भूमिका है, जब उद्धार निश्चय हमारा भाग होगा, क्योंकि परमेश्वर अब हमें सांसारिक दण्डों के द्वारा शुद्ध करता है, ताकि हम तब अन्तिम पलटे से मुक्त रहें। परन्तु जब अभक्त निश्चिन्त हों, तो हम जान लें कि परमेश्वर का न्याय निश्चय छिपा हुआ है, परन्तु फिर भी निश्चित है, और शीघ्र ही उन्हें आ पकड़ेगा; क्योंकि जब वे कहते हैं, “कुशल है, और कुछ भय नहीं, तो उन पर एकाएक विनाश आ पड़ेगा।” (1 थिस्सलुनीकियों 5:3)
परन्तु घड़ी बज रही है।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जैसे तू ने न केवल अपनी अनन्त युक्ति में हमें अपनी सन्तान होने के लिए लेपालक बनाया है, वरन् हमारे हृदयों पर हमारे प्रति अपने पितृ-अनुग्रह का एक निश्चित चिह्न और बयाना भी अंकित किया है,—हाँ, यह वरदान दे कि हम तेरी ताड़नाओं को सहने के अभ्यस्त हो जाएँ, और बिना कुड़कुड़ाए या शिकायत किए धीरज से उन्हें ग्रहण करें, वरन् सदा ऊपर के धन्य विश्राम और मीरास की ओर आँख लगाए रहें, और साथ ही उस दण्ड से डरते रहें जो दुष्टों की बाट जोहता है, और इस प्रकार हम अपने युद्ध में साहस के साथ स्थिर बने रहें, जब तक कि तू अन्त में हमें उस स्वर्गीय राज्य में इकट्ठा न कर ले, जिसे तेरे एकलौते पुत्र ने अपने ही लहू से हमारे लिए प्राप्त किया है।—आमीन।
एक सौ पचहत्तरवाँ व्याख्यान
यिर्मयाह 49:13
13. क्योंकि यहोवा की यह वाणी है, मैं ने अपनी ही शपथ खाई है कि बोस्रा ऐसा उजड़ जाएगा कि लोग चकित होंगे, और उसकी उपमा देकर निन्दा किया करेंगे और शाप दिया करेंगे; और उसके सारे गाँव सदा के लिये उजाड़ हो जाएँगे।
13. Quia per me ipsum juravi, dicit Jehova, quod in vastitatem, in opprobrium, in desertum, et in maledictionem erit Bosra; et omnes urbes ejus erunt in vastitates seeuli (id est, perpetuas.)
यहाँ भविष्यद्वक्ता उस बात की पुष्टि करता है जो वह एदोमियों के विषय में पहले भविष्यद्वाणी कर चुका था; परन्तु हर सन्देह को दूर करने के लिए वह कहता है कि परमेश्वर ने शपथ खाई थी; और वह परमेश्वर को बोलनेवाले के रूप में प्रस्तुत करता है, ताकि उसका वचन अधिक प्रभावशाली हो। तब वह घोषणा करता है कि परमेश्वर ने बोस्रा के विनाश के विषय में शपथ खाई थी।
विशेष को सामान्य के स्थान पर रखा गया है; क्योंकि वह इस नगर के नाम के अन्तर्गत सारी जाति को सम्मिलित करता है। और वह केवल यह घोषणा नहीं करता कि एदोमी उजाड़े और नष्ट किए जाएँगे, बल्कि वह शब्दों का ढेर लगा देता है: वह कहता है, बोस्रा एक उजाड़ होगा; दूसरे, एक निन्दा; तीसरे, एक सुनसान, या मरुभूमि; और चौथे, एक शाप।
जो कुछ भविष्यद्वक्ता ने कहा, वह निःसन्देह विश्वास करने में कठिन बात थी; क्योंकि परमेश्वर ने बिना कारण अपने नाम को सामने नहीं रखा। क्योंकि जैसे वह चाहता है कि हम उसका प्रयोग गम्भीरता और श्रद्धा से करें, वैसे ही वह इतनी अनमोल ज़मानत को अत्यन्त बड़ी आवश्यकता के बिना बीच में नहीं डालता। तब यह निश्चित है कि एक भारी कारण था कि परमेश्वर ने शपथ के द्वारा उस बात की साक्षी दी जो हम यहाँ एदोम के लोगों के विनाश के विषय में पढ़ते हैं।
अब मैंने कहा है कि जो कुछ यिर्मयाह ने घोषित किया, वह कठिनाई से विश्वास-योग्य था; और ऐसा इसलिए था कि युद्ध का कोई कारण न था; और इसके अतिरिक्त वह देश अपने ही घेरों से दृढ़ किया हुआ था; क्योंकि जैसा प्रतीत होता है, एदोमी सोचते थे कि उन्हें कोई जीत नहीं सकता।
तब यही कारण था कि परमेश्वर ने शपथ को बीच में डाला। साथ ही उसका उद्देश्य, जैसा मैं पहले तुम्हें स्मरण दिला चुका हूँ, विश्वासियों के हित का ध्यान रखना था; क्योंकि परमेश्वर शपथ इसलिए खाता है कि हमारे विश्वास की निर्बलता का उपचार करे; क्योंकि हम लगभग सदा डगमगाते रहते हैं, इसलिए शपथ से पुष्ट किए बिना एक साधारण साक्षी हमारे लिए पर्याप्त न होती। तब शपथ खाने का यही कारण है।
कहा गया है कि परमेश्वर अपनी ही शपथ खाता है, क्योंकि उससे बड़ा कोई नहीं; जैसा प्रेरित कहता है, जिसकी वह शपथ खा सके (इब्रानियों 6:13)। मनुष्य सन्दिग्ध और छिपी बातों में परमेश्वर की शरण लेते हैं, जो हृदय को जानता है, जो स्वयं सत्य है, और जिससे कुछ भी छिपा नहीं। और शपथ, जैसा हम पवित्रशास्त्र के बहुत से स्थानों से सीखते हैं, ईश्वरीय आराधना का एक अंग है। सो जबकि यह आदर विशेष रूप से उसी का है, अर्थात् यह कि हम उसके नाम की शपथ खाएँ, तो जब वह स्वयं शपथ खाता है, तो वह किसी दूसरे से अधिकार नहीं ले सकता जो उसके वचनों की पुष्टि करे: इसलिए वह अपनी ही शपथ खाता है। और हमने सुना है कि वह यशायाह के द्वारा क्या घोषणा करता है, “मैं अपनी महिमा दूसरे को न दूँगा।” (यशायाह 42:8)
399 सिरियाई के अनुसार इसका अनुवाद “विस्मय” करना अधिक अच्छा है; तब “निन्दा” उसके बाद आती है; और अगला शब्द, {,{חרבठीक-ठीक “उजाड़” है, और बहुवचन में पद के अन्त में “उजाड़ों” अनुवादित हुआ है। बोस्रा नाम के दो नगर थे, एक मोआब में, यिर्मयाह 48:24, और एक एदोम में, यशायाह 63:1।—सं.
तब परमेश्वर जब अपनी ही शपथ खाता है, तो वह हमारे लिए शपथ खाने का ढंग ठहराता है। कहा जाता है कि परमेश्वर कभी-कभी अपने प्राण की, या अपने जीवन की शपथ खाता है, और कभी-कभी कहा जाता है कि वह अपना हाथ उठाता है। ये अभिव्यक्तियाँ ठीक-ठीक उसके योग्य नहीं हैं, बल्कि मनुष्यों से परमेश्वर पर लागू की गई हैं। परन्तु यिर्मयाह द्वारा प्रयुक्त बोलने के ढंग पर विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए, क्योंकि हम देखते हैं कि शपथ ठीक रीति से कैसे खाई जानी चाहिए, अर्थात् तब जब वह परमेश्वर के नाम की दुहाई देकर खाई जाती है, क्योंकि सन्दिग्ध और छिपी बातों में वही अकेला उचित साक्षी और न्यायी है।
इसलिए पोपतन्त्र के अधीन एक नीच और असहनीय मूर्तिपूजा है, क्योंकि पोपवादी मरे हुए सन्तों की शपथ खाते हैं। यह परमेश्वर से उसका अधिकार छीनने के सिवा और कुछ नहीं; क्योंकि जैसा कहा जा चुका है, वह अकेला ही सत्य है, इसलिए जब बातें छिपी हों और मानवीय साक्षी से निश्चित न की जा सकें, तब वही अकेला उचित न्यायी है। और हमें शपथ खाने में प्रयुक्त शब्दों पर ध्यान देना चाहिए, अर्थात् जब मनुष्य स्वयं को परमेश्वर के न्याय के अधीन करते हैं, और न्यायी के रूप में उससे विनती करते हैं। तब जो कोई सन्तों की शपथ खाता है, वह उन्हें परमेश्वर के स्थान पर बैठाने के समान है, मानो उन्हें जगत का न्यायी बना दे, और सारी सामर्थ्य उन्हें सौंप दे।
“...मेरे प्राण का साक्षी है,” पौलुस कहता है (2 कुरिन्थियों 1:23); और फिर हमें ऐसे शब्द मिलते हैं, “परमेश्वर मुझ से ऐसा ही करे, वरन् इससे भी अधिक करे।” (रूत 1:17; 1 शमूएल 14:44; 2 शमूएल 3:35, इत्यादि)
जैसा मैंने कहा है, ऐसी अभिव्यक्तियों के द्वारा शपथ का अधिकार और स्वरूप प्रकट किया गया है। संक्षेप में, हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि जब आवश्यकता हमें शपथ खाने के लिए विवश करती है, तब परमेश्वर ही सदा एकमात्र न्यायी है, और इसलिए जब हम किसी दूसरे की शपथ खाते हैं, तो उसका नाम अपवित्र किया जाता है।
अब निन्दा और शाप होने का क्या अर्थ है, यह अन्य स्थानों से स्पष्ट है, अर्थात् जब कोई मानो रंगमंच पर खड़ा किया जाता है, कि वह अपमान का उदाहरण बने, या जब कोई विपत्ति कोसने और शाप देने का अवसर बन जाती है, “परमेश्वर तुझे वैसे ही नष्ट करे जैसे उसने एदोमियों को नष्ट किया:” यही शाप होना है, जैसा हम अन्यत्र देख चुके हैं।
वह नगरों को जोड़ता है, और इस प्रकार संकेत करता है कि यह उजाड़ एक ही भाग तक सीमित न रहेगा, वरन् सब भागों तक फैल जाएगा। वह यह भी कहता है कि वे सदा के लिए उजाड़ रहेंगे; और इस प्रकार उसने पुनःस्थापना की हर आशा छीन ली। जब उसने पहले मोआबियों और अम्मोनियों के विरुद्ध भविष्यद्वाणी की, तब उसने कुछ सान्त्वना भी मिला दी थी, परन्तु एदोम के विषय में हर आशा काट दी गई है। निःसन्देह वह जाति अधिक भारी पलटे के योग्य थी, क्योंकि उसका इस्राएलियों से अधिक निकट सम्बन्ध था—इसलिए उसकी क्रूरता और भी असहनीय थी। इसके अतिरिक्त, प्रतीत होता है कि वह अपनी बर्बरता में अन्य सब जातियों से बढ़कर थी; क्योंकि भजन संहिता में बिना कारण नहीं कहा गया है, “हे यहोवा, यरूशलेम के गिराए जाने के दिन को एदोमियों के विरुद्ध स्मरण कर, जो कहते थे, ढा दो! उसको नेव से ढा दो!” (भजन संहिता 137:7)
इससे हम सीखते हैं कि एदोमी अपने ही लहू के विरुद्ध अत्यन्त क्रूरता से भड़के: और यही कारण था कि परमेश्वर ने घोषणा की कि उनके नगर सदा के लिए उजाड़ हो जाएँगे; क्योंकि {,}עולםoulam शब्द, जिसका अनुवाद कुछ लोग “युग” करते हैं, प्रायः सदाकाल का अर्थ देता है। आगे लिखा है—
यिर्मयाह 49:14
14. मैं ने यहोवा की ओर से समाचार सुना है, वरन् जाति जाति में यह कहने को एक दूत भी भेजा गया है, इकट्ठे होकर एदोम पर चढ़ाई करो; और उससे लड़ने के लिये उठो।
14. Auditum (hoc est, sermonem) audivimus a Jehova, et nuntius ad gentes missus est, Congregamini (vel, congregate vos,) et venite super eam, surgite ad praelium.
भविष्यद्वक्ता फिर दिखाता है कि जिस विपत्ति की वह चर्चा करता है उसका कर्ता परमेश्वर होगा; क्योंकि यदि मनुष्य बातों को अपनी दृष्टि से देखते, तो कोई यह न सोच सकता था कि एदोमी इतने थोड़े समय में नष्ट किए जा सकते हैं। इसलिए विश्वासियों के लिए आवश्यक था कि वे अपने मन ऊपर उठाएँ। और भविष्यद्वक्ता के ध्यान में यही बात थी जब उसने कहा कि यह सब परमेश्वर की ओर से होगा।
परन्तु उसके शब्द अत्यन्त प्रबल हैं जब वह कहता है, हमने एक सुनवाई सुनी है; कुछ लोग कहते हैं, “एक समाचार,” परन्तु मेरी समझ में यह अनुचित है; क्योंकि यद्यपि {,}שמועהshemuoe का अर्थ प्रायः समाचार या अफ़वाह होता है, तौभी यहाँ इसे एक घोषणा के अर्थ में लेना चाहिए, जिसे परमेश्वर ने मानो अपने ही दूतों के द्वारा प्रकाशित किया। क्योंकि यह उपमा मनुष्यों से ली गई है, जो एक विधिवत् रीति से अपने शत्रुओं के विरुद्ध युद्ध की घोषणा करते हैं। तब यिर्मयाह कहता है कि ऊपर से भेजी गई एक वाणी सुनी गई, क्योंकि परमेश्वर का उद्देश्य सार्वजनिक और खुले रूप से यह साक्षी देना था कि जो कुछ हम यहाँ एदोम के विनाश के विषय में पढ़ते हैं, वह घटित होगा। सो अब हम भविष्यद्वक्ता का अर्थ समझते हैं, जब वह कहता है, हमने यहोवा की ओर से एक सुनवाई सुनी है।
फिर तुरन्त एक पुष्टि आती है, एक सन्देशवाहक, या एक दूत, जातियों के पास भेजा गया है। निश्चय परमेश्वर के पास एदोमियों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा करने, या अश्शूरियों और कसदियों को उभारने के लिए कोई सन्देशवाहक या दूत न था; परन्तु भविष्यद्वक्ता प्रायः इसी प्रकार बोलते थे, ताकि मनुष्य, मानो ठीक घटना-स्थल पर लाए जाकर, जान लें कि जो कहा गया था वह वास्तविक है, और निष्फल न होगा, क्योंकि भविष्यद्वाणियाँ मानो इतने सारे दूत-कार्य थीं।
और इसी दृष्टिकोण के अनुसार भविष्यद्वक्ताओं ने, जैसा हम अन्यत्र कह चुके हैं, कभी-कभी नगरों को घेरा और उन पर धावा किया, कभी-कभी तुरही फूँकी, और यह इसी उद्देश्य से कि दिखाएँ कि उनकी शिक्षा उसके पूरे होने के साथ जुड़ी हुई थी, क्योंकि परमेश्वर ने उनके द्वारा कभी व्यर्थ या निष्फल नहीं बोला। साथ ही भविष्यद्वक्ता हमें स्मरण दिलाता है कि कसदी और अश्शूरी परमेश्वर के हाथ में थे, यहाँ तक कि वह एक संकेत या एक सीटी से उन्हें युद्ध के लिए उभार सकता था, जैसा अन्यत्र कहा गया है, “यहोवा मिस्र की मक्खियों को सीटी बजाकर बुलाएगा।” (यशायाह 7:18)
तब भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय यह है कि कसदी और अश्शूरी परमेश्वर की आज्ञा मानने को ऐसे तत्पर होंगे मानो वे भाड़े के सैनिक हों और उसके झण्डे के नीचे भरती किए गए हों।
अब हम देखते हैं कि बोलने का यह ढंग कितना प्रबल था; क्योंकि विश्वासी इससे यह सीख सकते थे कि जो कुछ परमेश्वर ने अपने दास के द्वारा प्रचार करवाया, उसे पूरा करना उसी के सामर्थ्य में था, क्योंकि वह एक ही वचन से अश्शूरियों और कसदियों को उभार सकता, खींच ला सकता, शस्त्रों से सुसज्जित कर सकता और युद्ध में ले जा सकता था, जैसा वह यह भी कहता है, इकट्ठे होकर उस पर चढ़ाई करो, और युद्ध के लिये उठो। और वह बहुत सी जातियों की चर्चा इसलिए करता है कि कोई यह न सोचे कि एदोमी सामना कर सकेंगे, क्योंकि जिस पर शत्रु आक्रमण करते हैं वह तुरन्त जीत नहीं लिया जाता। परन्तु भविष्यद्वक्ता इस सन्देह का उत्तर देता है और कहता है कि बहुत सी जातियाँ होंगी जो अपनी मिली हुई शक्ति से एदोम के लोगों पर चढ़ आएँगी, यहाँ तक कि उनमें सामना करने की कोई शक्ति न रहेगी। लगभग यही शब्द ओबद्याह में भी पाए जाते हैं। अब आगे लिखा है —
यिर्मयाह 49:15
15. क्योंकि देख, मैं तुझे जातियों में छोटा, और मनुष्यों में तुच्छ कर दूँगा।
15. Quia ecce parvum posui to inter gentes, contemptum inter homines.
अधिकांश व्याख्याकार इसका यह अर्थ बताते हैं कि एदोम के लोग तुच्छ हो जाएँगे, क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें उनकी उस प्रतिष्ठा से गिरा देने का निश्चय किया था जो कुछ समय तक उनके पास रही; और फिर वे अगले पद को इससे जोड़ते हैं, जिसमें इसका कारण बताया गया है, "तेरे भयानक रूप ने, तेरे मन के अभिमान ने तुझे धोखा दिया है," इत्यादि। परन्तु इस वचन को दूसरी रीति से भी समझा जा सकता है, — कि परमेश्वर उस जाति के घमण्ड का उपहास करता है, जिसे अपने आप को रोके रखना चाहिए था, क्योंकि जब वह अपने आप को इतना ऊँचा उठाना चाहती थी, तब वह प्रकृति से ही लड़ रही थी। और मुझे यही भविष्यद्वक्ता का वास्तविक अर्थ जान पड़ता है। मैं दूसरे मत को गलत तो नहीं ठहराता, तौभी मेरे लिए उचित है कि जो मुझे अधिक अच्छा लगता है उसे बताऊँ। अतः मैं समझता हूँ कि यहाँ इस्राएलियों और एदोम की सन्तान के बीच एक निहित तुलना समझनी चाहिए, जो मलाकी में अधिक स्पष्ट रूप से व्यक्त की गई है (मलाकी 1:2, 3); क्योंकि वहाँ परमेश्वर इस्राएलियों के प्रति अपनी कृपा की बड़ाई करता है, कि उसने उन्हें एक धनी और उपजाऊ देश दिया, और एसाव के वंश को दूर भेजकर उबड़-खाबड़ पहाड़ों के भीतर सीमित कर दिया। तो जैसे एदोमी उस मनोहर और वांछनीय निज भाग से, जो अब्राहम की सन्तान को दिया गया था, निकाले जाकर मानो ऊबड़-खाबड़ पहाड़ों में बन्द कर दिए गए थे, वैसे ही भविष्यद्वक्ता उनके घमण्ड का उपहास करता है, क्योंकि उन्होंने प्रकृति के विपरीत और उसके विरुद्ध रीति से अपने आप को ऊँचा उठाने का प्रयत्न किया: वह कहता है, मैं ने तुझे जातियों में छोटा, और मनुष्यों में तुच्छ बनाया है। और हम जानते हैं कि जहाँ घमण्ड करने का कोई कारण नहीं होता, वहाँ वह घमण्ड और भी कम सहा जाता है। जब निम्नतम श्रेणी का कोई अज्ञात मनुष्य अपने आप को सबसे कुलीन लोगों से ऊपर उठाता है, तो सब उसे तुच्छ दृष्टि से देखते हैं, क्योंकि यह एक विचित्र और भद्दी बात है। इसी कारण भविष्यद्वक्ता अब कहता है, "हे एदोमियो, तुम्हारे पास ऐसा क्या है कि तुम इतने घमण्डी हो! तुम्हारे पास क्या धन है? तुम्हारी महिमा क्या है? क्योंकि परमेश्वर ने तुम्हें नीचा किया है। यह तो वैसा ही है मानो कोई मक्खी डील-डौल में हाथी से भी बढ़ जाना चाहे।"
परन्तु यदि दूसरी व्याख्या को अधिक पसन्द किया जाए, तो अर्थ यह होगा, "देख, मैं तुझे जातियों में छोटा और तुच्छ कर दूँगा, क्योंकि तू बहुत घमण्डी रहा है।" परन्तु जो मुझे ठीक लगता है वह मैं बता चुका हूँ, अर्थात् यह कि परमेश्वर यहाँ एदोमियों पर उनकी मूर्खता का दोष लगाता है, क्योंकि उन्हें बिना कारण घमण्ड नहीं करना चाहिए था। वह कहता है, "देख"; वह मानो उँगली से दिखाता है कि उनकी दशा कितनी हीन और दीन थी; मैं ने तुझे जातियों में छोटा, और मनुष्यों में तुच्छ बनाया है। और निःसन्देह, यदि यह धमकी होती, तो पर्याप्त प्रबल न होती; क्योंकि भविष्यद्वक्ता अब तक एदोमियों के विरुद्ध गरजता रहा है, और उसी स्वर में आगे बढ़ता है। तो यदि वह अब, उनके छोटेपन के विषय में, वह बात डाल देता जो हम पढ़ते हैं, तो वह फीकी होती। अतः मुझे सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता उस जाति की उस दशा का वर्णन करता है जो चुनी हुई प्रजा की, वरन् अन्य जातियों की भी तुलना में थी; क्योंकि यद्यपि वे धनी थे, सदा उपद्रव से मुक्त रहे थे, और उन्होंने कोई हानि नहीं उठाई थी, तौभी, जैसा कहा जा चुका है, वे ऐसे पहाड़ों में रहते थे जो किसी प्रकार उपजाऊ न थे। अब आगे लिखा है —
यिर्मयाह 49:16
16. हे चट्टान की दरारों में बसनेवाले, हे पहाड़ी की चोटी को अपने अधिकार में रखनेवाले! तेरे भयानक रूप ने और तेरे मन के अभिमान ने तुझे धोखा दिया है; चाहे तू उकाब के समान अपना घोंसला ऊँचे पर बनाए, तौभी मैं वहाँ से तुझे उतार लाऊँगा, यहोवा की यही वाणी है।
16. Superbia cordis tui, terror tuus, decepit to, quae habitas in fissuris petrae (vel, rupis,) quae occupas altitudinem collis (id est, collium, mutatio est numeri, sicur etiam in ,{}עלסham significat rupes, plurali numero;) quamvis extollas tanquam aquila nidum tuum, illinc detraham to (descendere faciam, ad verbum,) dicit Jehova.
कुछ लोग पहले शब्दों का अनुवाद यों करते हैं, "तेरी मूरत ने तुझे धोखा दिया है;" और दूसरे, "तेरी मूर्खता ने तुझे धोखा दिया है।" इस क्रिया का यह अर्थ होता तो है, यद्यपि इसका पाठ भिन्न भी है, क्योंकि कुछ लोग अक्षर की दाहिनी ओर बिन्दु लगाते हैं और कुछ बाईं ओर। परन्तु सबसे उपयुक्त अर्थ यों प्रकट होता है, तुझे धोखा दिया है तेरे भय ने, तेरे मन के अभिमान ने। जो लोग पहले शब्द का अनुवाद "मूरत" करते हैं, वे समझते हैं कि यहाँ अन्धविश्वास की ओर संकेत है, अर्थात् एदोमियों ने अपनी मूरतों पर जो झूठा भरोसा रखा था उसने उन्हें धोखा दिया था। परन्तु यह खींच-तान कर की गई व्याख्या जान पड़ती है। दूसरों ने इस शब्द का अनुवाद "मूर्खता" क्यों किया है, यह मैं नहीं जानता। इस शब्द का ठीक अर्थ भय है।
क्रिया {,}פלףpelets का अर्थ है भयभीत करना, और इसी से यह संज्ञा बनी है। और जब यह शब्द मूरत के लिए लिया जाता है, तो वह लाक्षणिक रूप से होता है, क्योंकि मूरतें मनुष्यों को भयभीत करती हैं, या इसलिए कि उनके उपासकों का अन्त भयानक होता है। परन्तु मैं इस शब्द का ठीक अर्थ ही रखता हूँ। साथ ही यहाँ भय को सक्रिय अर्थ में लेना चाहिए, क्योंकि एदोमी अन्य जातियों के लिए भय का कारण थे, और इस प्रकार अपने सामर्थ्य के विषय में अपनी धारणा के कारण घमण्ड से अन्धे हो गए थे।
और आगे के शब्द इसकी व्याख्या करते हैं, तेरे मन का अभिमान; क्योंकि जो दूसरों को तुच्छ जानते हैं, वे अपने आप को खोखले घमण्ड से भर लेते हैं, और इस प्रकार अपने मन को ऊँचा कर लेते हैं। तो जैसे एदोमियों ने अपने लिए एक युद्धप्रिय जाति होने की ख्याति प्राप्त कर ली थी, वैसे ही दूसरों के मन में उनका जो भय था उसने उनके अपने मन को घमण्ड से फुला दिया: परन्तु भविष्यद्वक्ता कहता है कि वे धोखा खा गए, क्योंकि उन्होंने अपने लिए बहुत अधिक सामर्थ्य का दावा किया।
साथ ही वह उसी विषय को आगे बढ़ाता है जिसे मैंने बताया है, मानो उसने कहा हो, "यह कैसे होता है कि जब परमेश्वर ने तुझे तुच्छ होने के लिए ठहराया है, तब तू जातियों के बीच इतना अधिकार अपने ऊपर ले लेता है? तू प्रकृति से लड़ता है, क्योंकि तू अब तक व्यर्थ ही अपने पड़ोसियों को डराता रहा है: इसी से तू घमण्ड से फूल गया है; परन्तु यह केवल भ्रम है; तू बड़ी भूल में है, और अपने बल के विषय में ऐसा सोचकर अपने आप को धोखा देता है, जबकि इसके विपरीत तेरी दशा तुझे दीन बना देनेवाली होनी चाहिए थी।" अब हम देखते हैं कि सारा वचन कितनी अच्छी रीति से चलता है, और शब्द आपस में कितने उपयुक्त रूप से मेल खाते हैं। तो वह कहता है कि यह एक मूर्खतापूर्ण भरोसा था, जिससे एदोम के लोग, जिन्हें परमेश्वर ने तुच्छ बनाया था, धोखा खा गए।
अब वह मानो कुछ मान लेने के रूप में जोड़ता है, हे चट्टानों की दरारों में बसनेवाले, और पहाड़ों की ऊँचाइयों को अपने अधिकार में रखनेवाले। इन शब्दों में भविष्यद्वक्ता एदोमियों के लिए कुछ बात मान लेता है; परन्तु बाद में वह जोड़ता है कि वे गढ़, जिनके द्वारा वे अपने आप को सुरक्षित समझते थे, किसी काम के न रहेंगे; चाहे तू उकाब के समान अपना घोंसला ऊँचा करे, तौभी परमेश्वर कहता है, मैं वहाँ से तुझे नीचे खींच लाऊँगा। इससे हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता एदोमियों के लिए उनके पहाड़ों के कारण घमण्ड करने का कुछ कारण मान लेता है, क्योंकि वे चारों ओर शत्रुओं से बचाव का साधन थे; तौभी वह दिखाता है कि यह सब उनके किसी काम का न होगा; क्योंकि वह कहता है, चाहे तू उकाब के समान अपना घोंसला ऊँचा करे, अर्थात् चाहे तू, जैसा लोग प्रायः कहते हैं, बादलों से भी ऊपर चढ़ जाए, तौभी मैं वहाँ से तुझे नीचे खींच लाऊँगा।
अब यह वचन हमें पहले यह सिखाता है कि जो कोई अपने पार्थिव बचाव के साधनों पर भरोसा रखते हैं वे अपने आप को धोखा देते हैं; और दूसरे, कि जो कोई अपने लिए उससे अधिक का दावा करते हैं जो न्यायसंगत और उचित है, वे मानो परमेश्वर से लड़ते हैं, और इसलिए यह हो ही नहीं सकता कि परमेश्वर उन्हें औंधे मुँह न गिरा दे। तो इस शिक्षा के द्वारा हमें नम्रता का अभ्यास करना सिखाया जाता है। नम्रता की जड़ें भीतर गहराई तक जमी रहती हैं; इसलिए जो लोग स्वेच्छा से अपने आप को अधीन करते हैं, उनकी दशा दृढ़ और स्थायी हो जाती है; क्योंकि वह जड़, जो ऊपर दिखाई नहीं देती, पेड़ को सम्भाले रखती है। इसी प्रकार वह नम्रता भी, जिसे मनुष्य नहीं जानते, हमारा वास्तविक और ठोस आधार और सहारा है। जो कोई पंख लगाकर उड़ता है, और अपनी ढिठाई से अपने आप को ऊँचा उठाना चाहता है, वह मानो जान-बूझकर परमेश्वर को क्रोध दिलाता है: और यहाँ भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि उन सब का क्या अन्त होनेवाला है जो इस प्रकार अपने आप को ऊँचा उठाते हैं, और उकाब के समान अपना घोंसला चोटी पर बनाना चाहते हैं; क्योंकि परमेश्वर उन्हें नीचे खींच लाएगा और औंधे मुँह गिरा देगा, जैसा उसने एदोमियों के साथ किया। अब आगे लिखा है —
यिर्मयाह 49:17
17. एदोम भी उजाड़ हो जाएगा; जो कोई उसके पास से होकर जाएगा वह चकित होगा, और उसकी सब विपत्तियों पर सीटी बजाएगा।
17. Et erit Edom in vastitatem, quisquis transierit super ipsam obstupescet, et sibilabit super omnes plagas ejus.
यहाँ भविष्यद्वक्ता फिर से उस बात की पुष्टि करता है जो वह कह चुका था। हम पहले बता चुके हैं कि ऐसी पुनरावृत्ति कितनी आवश्यक थी, क्योंकि कोई सोच भी नहीं सकता था कि एदोमियों का विनाश इतना निकट है। तो उसने जो कहा था उसे इसलिए नहीं दोहराया कि जो बात अन्यथा अस्पष्ट रह जाती उसे और स्पष्ट करे, वरन् इसलिए कि जो बात अविश्वसनीय जान पड़ती थी उसे विश्वासियों के हृदयों में और भी पूरी रीति से जमा दे।
तब वह कहता है कि एदोम उजाड़ हो जाएगा; और फिर, कि जो कोई उसके पास से होकर जाएगा वह चकित होगा और उसके सब घावों या प्रहारों के कारण सीटी बजाएगा। सीटी बजाना उपहास की ओर, या विस्मय की ओर, या कम से कम आश्चर्य की ओर संकेत कर सकता है: क्योंकि बहुत से लोग ठट्ठे के कारण सीटी बजाते या सिर हिलाते हैं; और दूसरे, जब कोई असाधारण बात घटती है, तो आश्चर्य के कारण सीटी बजाते हैं। और क्योंकि वह पहले कह चुका था, जो कोई उसके पास से होकर जाएगा वह चकित होगा, इसलिए मेरा झुकाव इसे भी उसी ओर लगाने का है जो आश्चर्य या विस्मय से उत्पन्न होता है। इसके बाद लिखा है —
यिर्मयाह 49:18
18. यहोवा का यह वचन है, कि जैसे सदोम और अमोरा और उनके आसपास के नगरों के उलट जाने में हुआ, वैसे ही वहाँ कोई मनुष्य न रहेगा, और न कोई आदमी उसमें बसेगा।
18. Secundum subversionem Sodomae et Gomorrae et vicinarum ejus, dicit Jehova, non habitabit illie vir, et non manebit in ea filius hominis.
जो बात उसने एक ही शब्द में संक्षेप से कह दी थी, उसे वह अब अधिक विस्तार से व्यक्त करता है: उसने कहा था कि एदोम उजाड़ हो जाएगा; परन्तु अब वह दिखाता है कि वह उजाड़ किस प्रकार का होगा, अर्थात् सदोम और अमोरा तथा अन्य नगरों के समान; क्योंकि, जैसा सर्वविदित है, परमेश्वर ने उन पाँचों नगरों को नष्ट कर दिया जिन पर उसने अपना वज्र गिराया।
और इससे हम फिर सीखते हैं कि एदोमियों के लिए कोई आशा नहीं बची थी; मानो भविष्यद्वक्ता ने कहा हो कि उनका अन्तिम विनाश अटल था, क्योंकि परमेश्वर चाहता था कि वे पूरी रीति से नष्ट कर दिए जाएँ और उनका स्मरण तक मिटा दिया जाए। तौभी यह सम्भव है कि उस जाति के कुछ बचे हुए लोग रहे हों; परन्तु यह इस भविष्यद्वाणी के विपरीत न था, क्योंकि जो जीवित बचे वे ऐसे तितर-बितर हो गए कि वे फिर कभी एक प्रजा न बने, और न उनका कोई नाम रहा। और यद्यपि परमेश्वर ने उस जाति में से कुछ लोगों को चुना भी हो, तौभी यह अनुग्रह छिपा रहा, और क्योंकि वह मनुष्यों को ज्ञात न था, इसलिए उसे शायद ही गिनती में लिया जा सकता है। चाहे जो हो, हमें वह बात स्मरण रखनी चाहिए जिसकी ओर मैं पहले संक्षेप में संकेत कर चुका हूँ, — कि एदोमी ऐसे शापित थे कि उनकी विपत्ति अन्य जातियों की विपत्ति से कहीं अधिक कठोर थी; और यह उन्होंने अपने अस्वाभाविक क्रूरता और दुःखी इस्राएलियों के प्रति, जो उनके अपने कुटुम्बी थे, अनेक अपमानों के द्वारा कमाया था। तो यही कारण था कि यिर्मयाह ने उस देश की तुलना सदोम और अमोरा और अन्य नगरों से की; वहाँ कोई मनुष्य न बसेगा, अर्थात् वह देश उजाड़ हो जाएगा।
तौभी इतिहास से प्रकट होता है कि वह देश बाद में बसाया गया, क्योंकि रोमियों ने भी वहाँ एक सैनिक चौकी रखी थी। परन्तु भविष्यद्वक्ता का, जैसा मैं कह चुका हूँ, यह अभिप्राय था कि एदोमियों में से कोई ऐसा न बचेगा जो उस देश का अधिकारी होकर एक जाति बन जाए। तो यद्यपि बाद में अन्य निवासी उस देश के अधिकारी हुए हों, तौभी इससे एदोमियों को कुछ लाभ न था; क्योंकि वह प्रजा नष्ट हो चुकी थी, और उस समय से कोई पुनःस्थापना नहीं हुई: इस भविष्यद्वाणी की पूर्ति के लिए यही पर्याप्त था। वरन् यह तो और भी कठिन बात थी कि उनका देश परदेशियों और अजनबियों को ग्रहण करे, बजाय इसके कि वह उजाड़ छोड़ दिया जाता।
परन्तु हमें भविष्यद्वक्ताओं द्वारा अपनाए गए सामान्य कथन-ढंग को भी स्मरण रखना चाहिए; क्योंकि जब वे सदोम और अमोरा को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं, तो वे अतिशयोक्ति में बोलते हैं; और इसे सिद्ध करने के लिए यहाँ वचनों का ढेर लगाने की आवश्यकता नहीं; क्योंकि जो पवित्रशास्त्र से थोड़ा भी परिचित हैं, वे अवश्य जानते होंगे कि जब कभी सदोम और अमोरा का उल्लेख होता है, तो सब क्षमा और दण्ड में सब प्रकार की कमी का निषेध कर दिया जाता है। यशायाह, अपनी चुनी हुई प्रजा के प्रति परमेश्वर की दया की बड़ाई करते हुए, कहता है, "यदि परमेश्वर हमारे लिए थोड़े से लोगों को न बचा रखता, तो हम सदोम के समान हो जाते, और अमोरा के सदृश ठहरते।" (यशायाह 1:9)
और बोलने का यह ढंग, जैसा मैंने कहा है, पवित्रशास्त्र में प्रायः पाया जाता है; हाँ, हमारे भविष्यद्वक्ता ने भी इस्राएलियों को सदोम और अमोरा के विनाश की धमकी दी थी (यिर्मयाह 23:14)। निःसन्देह ये शब्द अतिशयोक्ति में प्रयुक्त हुए हैं; क्योंकि परमेश्वर ने अन्य देशों या जातियों पर वज्र गिराकर उन्हें गहराई में नहीं डुबा दिया था, जैसा उसने सदोम और अमोरा के साथ किया था। परन्तु तुलनाओं में सब अंग एक दूसरे से मेल नहीं खाते।
अब कोई पूछ सकता है, परमेश्वर बोलने में इस प्रकार उचित सीमाओं से आगे क्यों बढ़ जाता है? इसका मैं यह उत्तर देता हूँ कि यह बिना उचित कारण और आवश्यकता के नहीं किया जाता। हम तो देखते हैं कि मनुष्य परमेश्वर के न्यायों के प्रति उदासीन हैं; क्योंकि उनका आलस्य और जड़ता ऐसी है कि परमेश्वर जिस बात की धमकी देता है, उसे वे हल्की बात समझकर अनदेखा कर देते हैं, या कुछ भी नहीं समझते। तो जब मनुष्य इतने पशु-समान हैं कि परमेश्वर की धमकियों से उन पर कुछ प्रभाव नहीं पड़ता, तो आवश्यक है कि ऐसी उदासीनता को झकझोरा और जगाया जाए। इसलिए वह सदोम और अमोरा को उनकी आँखों के सामने रखता है; और जैसा यहूदा भी कहता है, वहाँ उन सब दण्डों का एक उदाहरण दिखाया गया है जो त्यागे हुए लोगों की बाट जोहते हैं (यहूदा 7)। इसलिए परमेश्वर ने चाहा कि एक ही बार सदा के लिए, मानो दर्पण में, दिखा दे कि सब दुष्टों पर उसका पलटा कितना भयानक होगा। जब ऐसा है, तो इस धमकी का भी यही उद्देश्य है, कि परमेश्वर एदोमियों को और उनके समान सब को वैसे ही नष्ट करेगा जैसे उसने सदोम और अमोरा को किया, यहाँ तक कि कोई न बचेगा, चाहे परदेशी आकर एदोमियों के स्थान पर आ जाएँ और उनके निज भाग पर अधिकार कर लें। मैं अभी समाप्त नहीं कर सकता; दूसरी तुलना हम छोड़ देंगे।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, ऐसा अनुग्रह कर कि जैसे तुझे हमारी ओर अपना हाथ बढ़ाना भाया है, वैसे ही हम विश्वास के द्वारा संसार से ऊपर उठाए जाएँ, और सच्ची नम्रता में तेरे अधीन होना सीखें, और यह जानें कि यदि हम पूरी रीति से केवल तुझ ही पर निर्भर न रहें तो हमारी दशा और हमारा जीवन कितना दयनीय होगा, ताकि हम उस महिमा के सहभागी बनाए जाएँ जिसे तू ने स्वर्ग में हमारे लिए मोल लिया है, और जिसे तेरे एकलौते पुत्र, हमारे प्रभु, ने हमारे लिए प्राप्त किया है। — आमीन।
एक सौ छिहत्तरवाँ व्याख्यान
यिर्मयाह 49:19
19. देख, वह यरदन की बाढ़ से सिंह के समान बलवन्तों के निवास पर चढ़ आएगा; परन्तु मैं उसे अचानक उसके पास से भगा दूँगा; और कौन चुना हुआ पुरुष है जिसे मैं उस पर ठहराऊँ? क्योंकि मेरे तुल्य कौन है? और कौन मेरे लिए समय ठहराएगा? और वह कौन सा चरवाहा है जो मेरे सामने खड़ा रह सकेगा?
19. Ecce tanquam leo ascendet ab elevatione Jordanis ad tabernaculum fortitudinis; postquam quiescere fecero, faciam currere ab ea; et quis electus super eam praeficiam? nam quis sicut ego? et quis contestabitur mecum? et quis hic pastor qui stet coram facie mea (vel, contra faciem meam.)
यहाँ भविष्यद्वक्ता उस बात की पुष्टि करता है जो वह कह चुका था, कि कसदी सेना का वेग ऐसा होगा कि एदोमी उसका सामना न कर सकेंगे। तब वह कहता है कि कसदी उन सिंहों के समान आएँगे जो अपने निवास-स्थान को बदलने के लिए विवश होने पर बड़े क्रोध से ऊपर चढ़ते हैं; क्योंकि यरदन की उठान के विषय में जो कहा गया है उसकी मैं यही व्याख्या करता हूँ। व्याख्याएँ अनेक हैं; परन्तु जिसे मैं ठीक मानता हूँ वह यह है कि यिर्मयाह कसदियों की तुलना उन सिंहों से करता है जो हर वर्ष, या कम से कम जब बड़ी बाढ़ आती थी, पहाड़ों पर या ऊँचे स्थानों पर छिपने के स्थान ढूँढ़ते थे, क्योंकि वे मैदानों में नहीं लेट सकते थे। अतः यरदन की उठान को उसकी बाढ़ समझना चाहिए, अर्थात् जब वह उमड़ जाती थी। बहुत से वचनों से हम जानते हैं कि सिंह यरदन के आसपास वास करते थे। तो जैसे वे नीचे के मैदानों में रहते थे, वैसे ही जब नदी चढ़ जाती थी तब वे अपना निवास-स्थान बदल लेते थे। परन्तु यह उनके क्रोध के भड़के बिना नहीं हो सकता था; क्योंकि हम जानते हैं कि ये वन-पशु कितने क्रूर होते हैं। यिर्मयाह ने एदोम की स्थिति का भी ध्यान रखा, जो यरदन और उसके आसपास के देश से अधिक ऊँचा था। अगले अध्याय में वह बाबुलियों के विषय में भी यही बात कहता है।
परन्तु हो सकता है कि उसने यहाँ उस बात की ओर संकेत किया हो जो एदोमियों में सामान्य थी, और यह सम्भव जान पड़ता है।
तो अर्थ, जैसा मैं समझता हूँ, यह है कि जैसे यरदन के चढ़ने और उमड़ने पर सिंह ऊँचे स्थानों पर चढ़ जाते थे, वैसे ही कसदी एदोमियों पर चढ़ आएँगे, और क्रोधित वन-पशुओं के समान उस देश पर आक्रमण करेंगे। यह एक बात है। फिर वह जोड़ता है, बल के निवास पर। जेरोम का अनुवाद है, "वीर सौन्दर्य पर;" यह शब्द लगभग सर्वत्र इसी प्रकार समझाया जाता है, परन्तु यहाँ इसे एक दृढ़ निवास-स्थान के अर्थ में लेना चाहिए।
वह उस देश की स्थिति की ओर संकेत करता है, क्योंकि वह अजेय जान पड़ता था, क्योंकि, जैसा अन्यत्र प्रकट हो चुका है, वह पहाड़ों से घिरा हुआ था। बाबुल की स्थिति भिन्न थी, क्योंकि वह फरात की विभिन्न धाराओं से घिरा हुआ था।
जो आगे है वह अस्पष्ट है, जब मैं उसे विश्राम दे चुकूँगा, तब मैं उसे उसके पास से भगा दूँगा। कुछ लोग अव्यय {,}כיki की व्याख्या भिन्न रीति से करते हैं। यह वास्तव में कारणवाचक है, परन्तु, जैसा सर्वविदित है, प्रायः समयवाचक क्रियाविशेषण के रूप में भी लिया जाता है। परन्तु भविष्यद्वक्ता का अर्थ अस्पष्ट है, और कुछ लोगों ने कल्पना की है कि यहाँ चुनी हुई प्रजा की चर्चा है, मानो भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय यह हो कि जब प्रभु अपनी प्रजा को विश्राम देगा, तब वह उन्हें एदोम के देश से भगा देगा। परन्तु यह व्याख्या पूर्णतः अस्वीकार्य है; और मुझे आश्चर्य है कि वे ऐसी भूल कैसे कर बैठे; क्योंकि मुझे कोई सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता का यहाँ यह अर्थ है कि एदोमी बहुत समय से निश्चिन्त रहे थे, परन्तु एक अचानक विपत्ति आएगी जो उन्हें इधर-उधर तितर-बितर कर देगी, और उन्हें भागकर अपनी रक्षा ढूँढ़ने के लिए विवश करेगी; और यही सबसे अच्छा अर्थ है जो हम निकाल सकते हैं: इसलिए जब मैं उसे विश्राम दे चुकूँगा, या, जिस समय से मैं उसे विश्राम दे चुकूँगा, मैं उसे उसके पास से भगा दूँगा; मानो उसने कहा हो, "मैंने अब तक इस जाति को उसकी बहुतायत में विश्राम करने, और इस प्रकार शान्त बने रहने दिया है; परन्तु मैं अचानक उसके निवासियों को इधर-उधर तितर-बितर कर दूँगा, और वे अपने ही देश को अपने शत्रुओं के अधिकार में देखेंगे।" संक्षेप में, यहाँ दो दशाओं के बीच तुलना है; क्योंकि एदोमी बहुत समय से अपनी ही तलछट पर जमे रहे थे, क्योंकि कोई ऐसा न था जो उन्हें कुछ कष्ट देता। परमेश्वर ने तब उन्हें निरन्तर शान्ति दी थी; परन्तु अब वह घोषणा करता है कि वह उन सब को, और वह भी अचानक, भगा देगा। और यह आवश्यक था कि यह बात स्पष्ट रूप से व्यक्त की जाए, ताकि एदोमी आगे को अपनी शान्त दशा पर भरोसा न रखें, जैसा कपटी करते हैं, जो प्रायः परमेश्वर की सहनशीलता का दुरुपयोग करते हैं, और जब वह उन्हें बहुत समय तक सहता है तो सोचते हैं कि वे हर संकट से बच निकले हैं। तो ऐसा न हो कि ऐसा भरोसा एदोमियों को धोखा दे, इसलिए भविष्यद्वक्ता कहता है कि बहुत समय तक शान्ति की दशा में रहने के बाद उन्हें भागना पड़ेगा।
साथ ही इन शब्दों की दूसरी रीति से भी व्याख्या की जा सकती है; क्योंकि {,}רגעrego का अर्थ है फाड़ना, काटना, तोड़ना; और यहाँ इसे यों लिया जा सकता है, "जब मैं दरार कर दूँगा;" क्योंकि, जैसा कहा जा चुका है, एदोमी चारों ओर से बचाव के साधनों द्वारा दृढ़ किए गए थे। परमेश्वर अब संकेत करता है कि वह धावा बोलेगा, जिसकी तुलना वह फाड़ने से करता है; और यह व्याख्या अनुपयुक्त नहीं है।
इसके बाद लिखा है, और वह चुना हुआ कौन है, कि मैं उसे उस पर ठहराऊँ?
परमेश्वर अब सब बलवन्तों को बुलाता है, कि उन्हें एदोम पर ठहराए, चरवाहों के रूप में या ऐसे लोगों के रूप में नहीं जो देश के कल्याण की चिन्ता करें और उसकी सुरक्षा का प्रबन्ध करें, वरन् ऐसे लोगों के रूप में जो उस पर अत्याचारी क्रूरता से अन्धेर करें: तो वह चुना हुआ कौन है?
साथ ही परमेश्वर दिखाता है कि सब योद्धा उसके हाथ में और उसके अधीन हैं; मानो उसने कहा हो, "यदि एदोमी सोचते हैं कि वे साहस और बल में अन्य सब से बढ़कर हैं, तो वे बड़ी भूल में हैं; क्योंकि मैं ऐसे लोगों को ढूँढ़ निकालूँगा जिनमें अधिक साहस है, क्योंकि मेरे पास चुने हुए पुरुष तैयार हैं, जिन्हें मैं जब चाहूँ उन पर ठहरा दूँ, और वे एदोमियों को सहज ही वश में कर लेंगे, चाहे वे युद्ध-पराक्रम में अपने आप को कितना ही श्रेष्ठ क्यों न समझें।" तो परमेश्वर यहाँ किसी सन्दिग्ध बात के समान यह प्रश्न नहीं करता, वह चुना हुआ कौन है, कि मैं उसे उस पर ठहराऊँ? वरन् वह दिखाता है कि एदोमियों को नष्ट करना उसके लिए कोई कठिन बात न होगी, क्योंकि वह संसार के किसी भी भाग से, जहाँ से चाहे, चुने हुए को बुला भेजेगा, और उसे एदोम पर ठहराएगा, चरवाहे के रूप में नहीं, जैसा मैंने कहा है, वरन् एक क्रूर अत्याचारी के रूप में।
फिर वह जोड़ता है, क्योंकि मेरे तुल्य कौन है? वह पिछले वाक्यांश की पुष्टि करता है; क्योंकि परमेश्वर अपने उस सामर्थ्य की बड़ाई करता है, जिसे अविश्वासी प्रायः तुच्छ जानते हैं। यह वाक्य वास्तव में एक साधारण सत्य जान पड़ता है, मेरे तुल्य कौन है? क्योंकि छोटे से लेकर बड़े तक सब इसे मानते हैं। तो ऐसा जान पड़ता है कि भविष्यद्वक्ता ने यह कहकर कि परमेश्वर के तुल्य कोई नहीं, कोई घिसी-पिटी और साधारण बात घोषित की; क्योंकि सबसे बुरे मनुष्य भी इसे स्वीकार करते हैं, और सबसे छोटा बालक भी इसे मान लेता है, और यह प्रकृति की ही शिक्षा है। परन्तु यदि कोई ठीक-ठीक विचार करे कि मनुष्यों का घमण्ड कितना बड़ा है, तो वह पाएगा कि यह सत्य इतना साधारण नहीं है; क्योंकि सौ में से शायद ही कोई एक ऐसा होगा जो परमेश्वर को वह दे जो न्याय से उसी का है।
क्योंकि जब वह या तो उद्धार की प्रतिज्ञा करने या दण्ड की घोषणा करने को आगे आता है, तो कोई कितना कम प्रभावित होता है? वरन् जो लोग इस सिद्धान्त को मानते हैं कि परमेश्वर सब कुछ कर सकता है, वे भी थोड़ी सी बाधा आते ही व्यर्थ कल्पनाओं में बह जाते हैं, और अन्त में पूरी रीति से भटक जाते हैं। जब किसी को यह निश्चय हो जाता है कि परमेश्वर का भय मानना चाहिए, तो यदि झूठे भरोसे का कोई अवसर सामने आ जाए, तो जो विचार उसने पहले अपने मन में रखा था वह दब जाएगा, और फिर पूरी रीति से बुझ जाएगा। संक्षेप में, यदि हम ध्यान से विचार करें कि मनुष्य परमेश्वर के विषय में कितने तुच्छ विचार रखते हैं, तो हम समझेंगे कि यह सत्य पवित्रशास्त्र में व्यर्थ ही बार-बार नहीं दोहराया गया, कि परमेश्वर के तुल्य कोई नहीं। क्योंकि जब कोई परमेश्वर के विरुद्ध अपने आप को ऊँचा उठाने का साहस करता है, तो वह तुरन्त सब को भय से भर देता है; और तौभी परमेश्वर का सामर्थ्य कुछ भी नहीं समझा जाता। हम देखते हैं कि विश्वासी भी स्वयं छोटी से छोटी वस्तु को परमेश्वर से अधिक बलवान समझते हैं; वरन् वे, यों कहें, मक्खियों और कीड़ों को परमेश्वर के विरोध में खड़ा करने, और उन्हें उसके बराबर ठहराने में भी नहीं हिचकिचाते। यह निश्चय ही बड़ी लज्जा की बात है, और तौभी यही बात सब युगों में निरन्तर प्रचलित रही है।
तो अब हम समझते हैं कि परमेश्वर यहाँ इसे एक बड़ी और मानो अविश्वसनीय बात के रूप में क्यों घोषित करता है, कि उसके तुल्य कोई नहीं। और इससे हम यह भी सीखते हैं कि पिछले वाक्यांश का क्या अर्थ है, जब यह पूछा जाता है, वह चुना हुआ कहाँ है जिसे मैं उस पर ठहराऊँ? क्योंकि वह यह कहकर उस विषय को आगे बढ़ाता है, मेरे तुल्य कोई नहीं। इन शब्दों से वह दिखाता है कि सारा संसार उसके अधिकार में है।
अब वह जोड़ता है, और कौन मेरे विरुद्ध प्रतिवाद करेगा? कुछ लोग पढ़ते हैं, "कौन मेरे लिए समय ठहराएगा?" परन्तु जो लोग इन शब्दों का ऐसा अनुवाद करते हैं, वे भविष्यद्वक्ता के अर्थ को धुँधला कर देते हैं। मुझे सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता का अर्थ यह है कि कोई ऐसा नहीं जो परमेश्वर से विवाद करने का साहस करे; या यदि कोई ऐसा करने का प्रयत्न करे, तो वह हास्यास्पद होगा, क्योंकि परमेश्वर एक ही फूँक से उन सब विवादों को उड़ा सकता था जो मनुष्य उठाएँ। इसलिए जब वह कहता है, कौन मेरे विरुद्ध प्रतिवाद करेगा? तो यह वैसा ही है मानो उसने कहा हो, "कौन मेरे विरुद्ध पक्षकार बनेगा?" जैसा प्रायः कहा जाता है। तो कौन अपने आप को मेरे विरोध में खड़ा करेगा? या, कौन मुझसे लड़ने का साहस करेगा? या, कौन न्याय में मुझसे वाद-विवाद करने का साहस करेगा? इसलिए मैंने यह अनुवाद दिया है, और कौन मेरे विरुद्ध प्रतिवाद करेगा? और यह भविष्यद्वक्ता के अर्थ को स्पष्ट रूप से व्यक्त करता जान पड़ता है।
इसके बाद वह कहता है, और यह कौन सा चरवाहा है जो मेरे सामने खड़ा रहता है? चरवाहा शब्द के द्वारा वह सिंह की तुलना की ओर संकेत करता है; क्योंकि इस प्रकार वह एदोमियों की तुलना भेड़ों से करता है। यद्यपि वे बहुत उग्र थे, तौभी यहाँ उनकी निर्बलता की ओर संकेत है। तो जैसे भेड़ सिंह से अपनी रक्षा नहीं कर सकती, वैसे ही भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि एदोमियों में कसदियों के आक्रमणों का सामना करने के लिए पर्याप्त साहस न होगा। संक्षेप में, भविष्यद्वक्ता का अर्थ यह है कि यद्यपि एदोमियों के बहुत से रक्षक थे, तौभी जब परमेश्वर उस जाति को नष्ट करने के लिए शस्त्र धारण करके निकलेगा, तब कोई उसके सामने खड़ा न रह सकेगा। जो कहा गया है उसका सार यह है कि अधिकार में या बल में परमेश्वर के बराबर कोई ऐसा न होगा जो एदोमियों की रक्षा करे; क्योंकि उसने पहले कहा, कौन मेरे विरुद्ध प्रतिवाद करेगा? और फिर, कौन सा चरवाहा मेरे सामने खड़ा रहेगा? अब हम भविष्यद्वक्ता का अर्थ समझते हैं, कि क्योंकि एदोमियों को परमेश्वर से युद्ध करना था, इसलिए यह किसी रीति से हो ही नहीं सकता था कि वे नष्ट न हों, क्योंकि यद्यपि उन्हें चारों ओर से सहायता मिल जाए, तौभी वे न अधिकार से और न बल से परमेश्वर का सामना कर सकते थे। आगे लिखा है —
यिर्मयाह 49:20
20. इसलिए यहोवा की वह युक्ति सुनो जो उसने एदोम के विरुद्ध की है, और उसकी वे कल्पनाएँ जो उसने तेमान के निवासियों के विरुद्ध की हैं: निश्चय भेड़-बकरियों में से सबसे छोटे भी उन्हें घसीट ले जाएँगे; निश्चय वह उनके निवास-स्थानों को उनके साथ उजाड़ कर देगा।
20. Propterea audite consilium Jehovae, quod consultavit contra Edom, et cogitationes ejus, quas cogitavit contra habitatores Theman; Si non minores gregiseos dejecerint, si non perdiderint super eos habitacula ipsorum (vel, si non perdant super ipsos habitacula ipsorum.)
भविष्यद्वक्ता एदोमियों और उनके विनाश के विषय में अपना विषय आगे बढ़ाता है; परन्तु वह अपने वचनों पर विश्वास दिलाने के लिए एक भूमिका बाँधता है। तब वह कहता है कि यह परमेश्वर की युक्ति और उसकी कल्पनाएँ थीं। वह मनुष्यों की रीति पर बोलता है; क्योंकि वह परमेश्वर पर वह बात आरोपित करता है जो ठीक-ठीक उसके स्वभाव की नहीं है; क्योंकि परमेश्वर विचार-विमर्श या परामर्श नहीं करता, वरन् उसने संसार की सृष्टि से पहले ही एक बार सदा के लिए ठहरा दिया है कि वह क्या करेगा; और न वह मनुष्यों के समान अपने विचारों को सब ओर उछालता रहता है, जो तुरन्त नहीं देख पाते कि क्या उचित है या क्या करना चाहिए। इस प्रकार की कोई बात परमेश्वर की नहीं है। परन्तु बोलने का यह ढंग पर्याप्त सामान्य है, जब वह बात जो ठीक-ठीक मनुष्य पर लागू होती है, परमेश्वर पर आरोपित की जाती है। साथ ही यह ध्यान देना चाहिए कि यह बिना कारण नहीं किया जाता, क्योंकि जब परमेश्वर अपने दासों के द्वारा बोलता है, तो हम सदा सन्देह उठाते हैं, "क्या यह सच्चे मन से कहा गया है — क्या यह बदला जा सकता है — क्या यह वापस लिया जा सकता है?" संक्षेप में, जो बात हल्की और तुच्छ होती है उसे हम ग्रहण कर लेते हैं और तुरन्त उस पर विश्वास कर लेते हैं; परन्तु जब परमेश्वर कुछ घोषित करता है, तो हम उस पर टीका-टिप्पणी करने लगते हैं, और हर विषय पर सौ विवाद खड़े कर देते हैं, "अजी, परन्तु यह या वह हो सकता है; और हो सकता है कि परमेश्वर सच्चे मन से न बोल रहा हो।" तो क्योंकि मनुष्य कभी परमेश्वर के वचन पर वैसा सन्तोष नहीं करते जैसा उन्हें करना चाहिए, इसलिए भविष्यद्वक्ता सामान्य प्रयोग से बोलने के ये ढंग उधार लेते हैं, कि परमेश्वर ने ऐसा सोचा था, कि उसने ऐसा ठहराया था।
अर्थ यह है कि यिर्मयाह ने अब तक एदोमियों के विषय में जो कुछ भविष्यद्वाणी की थी, वह वापस नहीं ली जा सकती थी, क्योंकि वह एक निश्चित आज्ञप्ति थी, ऐसी अटल मानो परमेश्वर ने सौ या हज़ार वर्ष तक उस पर विचार किया हो।
अब वह जोड़ता है, तेमान के निवासी; जिनसे उसका अभिप्राय एदोमियों से है। परन्तु यह पुनरावृत्ति ध्यान देने योग्य है: वह पहले एदोम का उल्लेख करता है, और फिर तेमान के निवासियों का। और तेमान और सेईर कभी-कभी एक ही होते हैं। यदि नहीं, उन्हें गिरा दें, इत्यादि; इस क्रिया का ठीक अर्थ है खींचना, और निन्दा और अपमान के साथ खींचना, जैसे किसी लोथ को कीचड़ में घसीटा जाता है। तो यहाँ भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय निन्दा के साथ नीचे गिराए जाने से है। और वह कहता है, यदि नहीं, भेड़-बकरियों में से सबसे छोटे उन्हें घसीट ले जाएँ। यहाँ वह पहले से भिन्न रीति से बोलता है; क्योंकि उसने कसदियों को चुने हुए कहा था, और उनके बल की बड़ाई की थी, ताकि एदोमियों से उनका व्यर्थ भरोसा छीन ले; परन्तु अब वह और आगे बढ़कर कहता है कि उस जाति को भगाने के लिए बड़े पराक्रम की आवश्यकता न थी, क्योंकि सबसे छोटे भी उन्हें भूमि पर औंधे मुँह गिरा सकते थे, और देश भर में अपमान के साथ घसीट भी सकते थे। अब यद्यपि बोलने का ढंग भिन्न है, तौभी अर्थ वही रहता है, अर्थात् यह कि परमेश्वर कसदियों को साहस से सुसज्जित करेगा, ताकि वे एदोम के देश को सहज ही नष्ट कर दें; और फिर, यह कि यद्यपि कसदी मनुष्यों के अनुमान के अनुसार पराक्रम में श्रेष्ठ न भी हों, तौभी वे एदोमियों से बढ़कर होंगे, क्योंकि विजय परमेश्वर के हाथ में थी, और वह मनुष्यों के द्वारा जैसे वैसे ही मक्खियों के द्वारा भी, और दानवों के द्वारा जैसे वैसे ही बालकों के द्वारा भी कार्य कर सकता था। 400 यह पद अनुवादों में और तर्गूम में, और व्याख्याकारों द्वारा भी, विभिन्न रीतियों से अनूदित किया गया है। निम्नलिखित अनुवाद को मैं सरल और शाब्दिक समझता हूँ, — देख, यरदन की बाढ़ में से सिंह के समान, वह दृढ़ निवास पर चढ़ेगा; क्योंकि मैं अचानक उसे उसके पास से भगा दूँगा: और जो चुना हुआ है उसे मैं उस पर ठहराऊँगा; क्योंकि मेरे तुल्य कौन है? और कौन मेरा सामना कर सकता है? और वह कौन है, वह चरवाहा, जो मेरे सामने खड़ा रह सके? शब्द {,{ארגיעה, जैसा नीतिवचन 12:19 में है, "अचानक," या पल भर में, है। "उसे" से अभिप्राय सिंह है, और "उसके पास से" से अभिप्राय यरदन की बाढ़ है। "उस पर" से अभिप्राय एदोम है। "कौन मेरा सामना कर सकता है?" अर्थात्, मुझसे लड़ने, या मेरा विरोध करने के लिए, जैसा सेप्टुआजिंट में है। क्रिया ,{}יעד है, यद्यपि कैल्विन ने इसे .{}עוד से व्युत्पन्न किया। "चरवाहे" का उल्लेख "सिंह" के कारण किया गया है, जिसका सामना कोई चरवाहा नहीं कर सकता जब वह झुण्ड पर आक्रमण करता है। परमेश्वर अपने विषय में ऐसे बोलता है मानो वह अपने चुने हुए के साथ एक हो — सं.
शपथ का सूत्र अपनाया गया है, जब वह कहता है, यदि नहीं, वे उन्हें घसीट ले जाएँ, इत्यादि। यह एक अपूर्ण (लुप्तपद) वाक्यांश है, जैसा प्रायः देखा गया है; इसमें इस प्रकार की दुहाई समझी जाती है, "आगे से मेरा विश्वास न करना," या, "मुझे परमेश्वर न मानना।" संक्षेप में, यह शपथ का एक रूप है, जो उससे अधिक दृढ़ पुष्टि है जितना यदि वह केवल इतना कहता, "भेड़-बकरियों में से सबसे छोटे उन्हें घसीट ले जाएँगे।"
कुछ लोग अन्तिम वाक्यांश का अनुवाद करते हैं, "यदि नहीं, वे रखेंगे," इत्यादि; मानो यह क्रिया {,}שוםshum से आई हो, जिसका अर्थ है रखना, स्थापित करना; परन्तु यह {,}שמםshemem से है, या, जैसा कुछ लोग सोचते हैं, {,}ימם imem से, यद्यपि अधिक सम्भव है कि {,}שמםshemem से। मुझे सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता का अर्थ यह है कि वे उनके ऊपर उनके निवास-स्थानों को नष्ट या उजाड़ कर देंगे। आगे लिखा है —
यिर्मयाह 49:21
21. उनके गिरने के शब्द से पृथ्वी काँप उठी है; उनकी चिल्लाहट का शब्द लाल समुद्र तक सुनाई पड़ा।
21. A voce ruinae ipsorum contremuit terra; clamor vocis eorum in mari rubro auditus est.
भविष्यद्वक्ता बहुत से शब्दों में उसी बात पर ठहरा रहता है जो अपने आप में पर्याप्त रूप से स्पष्ट है; परन्तु क्योंकि एदोमियों के विनाश के विषय में जो कुछ पहले कहा जा चुका था, उसका यहूदियों को निश्चय दिलाना सहज न था, इसलिए भविष्यद्वक्ता उसी विषय को आगे बढ़ाता है। तब वह कहता है कि उनके गिरने के शब्द से पृथ्वी काँप उठी। इन शब्दों से उसका अभिप्राय यह है कि विपत्ति ऐसी होगी कि वह आसपास के सब देशों को भयभीत कर देगी: जैसे जब कोई बड़ा ढेर गिरता है तो पृथ्वी हिल जाती है, वैसे ही एदोमियों का पतन, जो बहुत समय से अपने धन पर घमण्ड करते आए थे, अपने सब पड़ोसियों को आतंक से भरे बिना नहीं रह सकता था। कहीं ऐसा न हो कि यहूदी जो कुछ कहा गया था उसे अविश्वसनीय समझें, इसलिए भविष्यद्वक्ता कहता है कि चाहे पृथ्वी काँप उठे, तौभी परमेश्वर उस जाति को उलट देगा।
फिर वह आगे कहता है, उनके चिल्लाने का शब्द लाल समुद्र तक सुनाई दिया। यह समुद्र, जो अब लाल कहलाता है, कुछ दूरी पर था। {,}סוףsuph शब्द का ठीक अर्थ है घास-पातवाला; यह नाम उसे उन सरकण्डों के कारण दिया गया जो उसमें उपजते थे; परन्तु जिस समुद्र से अभिप्राय है, वह वही है जो अब लाल समुद्र कहलाता है। मैं कह चुका हूँ कि इन स्थानों के बीच की दूरी बहुत थी, और भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय यह है कि एदोम देश का कम्पन इतना बड़ा और इतना भयानक होगा कि उसका कोलाहल इस समुद्र को भी, यद्यपि वह कुछ दूरी पर था, कँपा देगा। इसके बाद आता है ---
401 शाब्दिक अनुवाद यह है, — चिल्लाहट — लाल समुद्र तक सुनाई दिया उसका शब्द। यह स्वतन्त्र कर्ता-कारक (nominative absolute) का एक उदाहरण है। — सं.
यिर्मयाह 49:22
22. देख, वह उकाब की नाईं निकलकर उड़ आएगा, और बोस्रा पर अपने पंख फैलाएगा, और उस दिन एदोमी शूरवीरों का मन जच्चा स्त्री का सा हो जाएगा।
22. Ecce tanquam aquila ascendet, et volabit et expander alas suas super Bosra, et erit cor fortium Edom die illo sicuti cor mulieris anxiae.
वह फिर कसदियों के शीघ्र आने के विषय में बोलता है, मानो उसने कहा हो, “जब उस जाति की दशा शान्त प्रतीत होगी, जब वे अपने ही घोंसले में निश्चिन्त विश्राम कर रहे होंगे, तब कसदी अचानक आ पहुँचेंगे, वरन् उड़ आएँगे।” क्योंकि वह उनकी तुलना उकाबों से करता है, ताकि यह दिखाए कि वह एक अत्यन्त शीघ्र और विनाशकारी चढ़ाई होगी।
जिस समय भविष्यद्वक्ता ने यह भविष्यद्वाणी सुनाई, उस समय कोई सन्देह भी नहीं कर सकता था कि कसदी एदोमियों के शत्रु बन जाएँगे, क्योंकि वे आपस में अत्यन्त मेल से रहते थे; वरन् हम जानते हैं कि वे कसदियों का अनुग्रह पाने के लिए हर प्रकार का ध्यान रखते थे। इसी कारण भजन संहिता में कहा गया है, “हे यहोवा, यरूशलेम के गिराए जाने के दिन को एदोमियों के विरुद्ध स्मरण कर, कि वे कैसे कहते थे, ढाओ! उसको नेव से ढा दो!”
(भजन संहिता 137:7)
इन शब्दों से उस जाति का कसदियों के साथ दुष्टतापूर्ण षड्यन्त्र सूचित किया गया है। और इसमें कोई सन्देह नहीं कि उन्होंने अपने ही हित के लिए हर उपाय से कसदियों को प्रसन्न करने का यत्न किया। इसलिए भविष्यद्वक्ता यहाँ एक अचानक परिवर्तन की ओर संकेत करता है, जब वह कहता है कि कसदी उकाबों के समान होंगे, जो बोस्रा पर अपने पंख फैलाएँगे। हम अन्यत्र देख चुके हैं कि यह उस जाति का प्रमुख नगर था।
वह कहता है, एदोम के वीर पुरुषों का मन शोकित स्त्री के मन के समान होगा। हम देख चुके हैं कि एदोमियों का घमण्ड कितना बड़ा था। सो क्योंकि वे अपने आप को पराक्रम और युक्ति और अन्य सब बातों में श्रेष्ठ समझते थे, इसलिए भविष्यद्वक्ता यहाँ दिखाता है कि उनके वीर पुरुषों का मन स्त्रियों का सा निर्बल हो जाएगा; क्योंकि ऐसा हो ही नहीं सकता कि मनुष्यों के मन परमेश्वर के हाथ में न हों। सो केवल परमेश्वर ही है जो हमें सम्भाल सकता, उत्साहित कर सकता और दृढ़ता दे सकता है; और वह भी, जब चाहे, हमारी आत्माओं को निर्बल कर सकता है; और ये काम वह हर क्षण करता है: इसलिए उस दिन बिना कारण नहीं कहा गया; क्योंकि परमेश्वर न केवल हम में से हर एक को जितना चाहे उतना पराक्रम देता है, वरन् जब चाहे, जो साहस उसने दिया था उसे छीन भी लेता है। इसी कारण ऐसा होता है कि वीरों के मन कायर हो जाते हैं, और यह भी कि सबसे डरपोक लोग कभी-कभी सिंहों से भी अधिक साहसी हो जाते हैं, अर्थात् जब परमेश्वर को मनुष्यों के मनों को निर्बल करना या दृढ़ करना भाता है।
परन्तु यह ध्यान देने योग्य है कि यहाँ एदोमियों को किसी बचे हुए भाग की कोई आशा नहीं दी गई। जब भविष्यद्वक्ता ने पहले दूसरी जातियों के विषय में कहा, तब उसने उन्हें कुछ सान्त्वना दी; परन्तु यहाँ वह परमेश्वर के पलटे को कुछ भी हलका नहीं करता: वह एदोमियों को कोई आशा दिए बिना अन्तिम विनाश के लिए ठहरा देता है; और इसका कारण यह है कि परमेश्वर ने बहुत समय तक उन्हें सहा था, और उन्होंने उसकी सहनशीलता का अत्यन्त दुष्टता से दुरुपयोग किया था।
उसने उस समय से उन्हें छोड़ रखा था जब इस्राएली मिस्र से निकलकर आए थे; और जब उन्होंने उन्हें मार्ग देने से इनकार किया, तब इस्राएलियों ने बड़ी कठिनाई सहकर लम्बा चक्कर लगाया, ताकि उनके देश को छूएँ भी नहीं। यह उन पर दिखाया गया एक अनोखा अनुग्रह था। और यदि उनमें मनुष्यता की एक बूँद भी होती, तो उन्हें ऐसी कृपा को स्वीकार करना चाहिए था; इसके विपरीत, उन्होंने अपने ही भाइयों के साथ सदा क्रूरता का व्यवहार किया, और बार-बार चेतावनी पाकर भी ऐसा करना कभी न छोड़ा। सो इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि परमेश्वर अब उन्हें विनाश के लिए सौंप दे, और निराशा से भरी भविष्यद्वाणियाँ सुनाए। इस बात पर सावधानी से ध्यान देना चाहिए, ताकि हम सीखें कि जब परमेश्वर हमारे साथ बहुत समय तक धीरज धरता है, तब उसकी सहनशीलता को हलका न समझें, वरन् समय रहते मन फिराएँ, कहीं ऐसा न हो कि जब वह न्याय के लिए उठे तब हमें पूरी रीति से नष्ट कर दे। अब आगे आता है ---
यिर्मयाह 49:23
23. दमिश्क के विषय में। हमात और अर्पाद की आशा टूटी है, क्योंकि उन्होंने बुरा समाचार सुना है, वे गल गए हैं; समुद्र पर चिन्ता है, वह शान्त नहीं हो सकता।
23. Ad Damascum: Pudefacta est Chemath, et Arphad, quia rumorem malum audierunt, liquefacti sunt; in mari pavoris ad quiescendum non potest (hoc est, quod quiescere non potest.)
यिर्मयाह यहाँ अराम के राज्य के विषय में बोलता है, जिसे वह दमिश्क से सूचित करता है, जहाँ, जैसा भली भाँति विदित है, राजा निवास करते थे। अरामी आरम्भ ही से इस्राएलियों के अत्यन्त विरोधी रहे थे; और प्रसिद्ध इतिहास बताते हैं कि बहुत वर्षों तक उनके बीच लगातार युद्ध होते रहे। अन्त में इस्राएल के राजाओं ने अपने भाई यहूदियों पर आक्रमण करने के लिए अरामियों से सन्धि कर ली। इसी कारण अरामियों ने यहूदियों को बड़े कष्ट दिए, और वे इस्राएलियों के मित्र बने रहे, जब तक कि दोनों राज्य कसदियों के द्वारा उलट न दिए गए। इसलिए सम्भव है कि यह भविष्यद्वाणी उस समय सुनाई गई जब वह राज्य अभी स्थिर था, या कम से कम उसके अन्तिम पतन से पहले; क्योंकि जैसा अन्यत्र कहा जा चुका है, पूरी रीति से मिटाए जाने से पहले ही वह बहुत निर्बल हो चुका था।
यह भूमिका बाँधना आवश्यक था, ताकि हम अरामियों के विरुद्ध यह भविष्यद्वाणी सुनाने में परमेश्वर का अभिप्राय जानें, अर्थात् इसलिए कि वे आरम्भ ही से इस्राएलियों के शत्रु रहे थे, और इसलिए भी कि उन्होंने यहूदियों पर अत्याचार करने के लिए उनके साथ अपनी शक्ति मिला दी थी। सो वे परमेश्वर की कलीसिया को भस्म करने के काम में सदा शैतान की धौंकनियों के समान रहे थे।
सो परमेश्वर यहाँ दिखाता है कि जो विपत्ति उनकी बाट जोह रही थी, वह उस दुष्ट क्रूरता का न्यायसंगत प्रतिफल थी जो उन्होंने चुनी हुई प्रजा के प्रति की थी। यह बात हमें स्मरण रखनी चाहिए।
अब वह कहता है कि हमात लज्जित है; इसे अराम का अन्ताकिया माना जाता है। इस नाम के बहुत से प्रसिद्ध नगर थे; परन्तु किलिकिया की ओर का हमात सबसे अधिक प्रसिद्ध था। तब वह कहता है कि हमात नगर, अर्थात् अन्ताकिया, लज्जित हुआ, और अर्पाद भी, जो एक धनी नगर था। वह आगे कहता है, क्योंकि उन्होंने बुरा समाचार सुना है, अथवा कोई प्रतिकूल अफवाह। इन शब्दों से वह सूचित करता है कि अराम का राज्य केवल एक समाचार से ही भयभीत हो जाएगा। कोई ऐसी बात सोच भी नहीं सकता था, क्योंकि जब उन्होंने इस्राएलियों के साथ मेल कर लिया था, तब वे समझते थे कि उनके पास अपने शत्रुओं को खदेड़ देने के लिए पर्याप्त शक्ति है। सो क्योंकि वे अपने आप को इतना बलवन्त समझते थे कि मानो संकट से परे हों, इसलिए भविष्यद्वक्ता उनके भरोसे का उपहास करता है, और कहता है कि वे केवल समाचार से इतने भयभीत होंगे कि ऐसे लज्जित होंगे मानो शत्रुओं से पराजित हो गए हों।
फिर वह आगे कहता है कि वे गल जाएँगे; क्योंकि {,}מוגmug का अर्थ है घुल जाना या गल जाना। परन्तु यहाँ एक भिन्न पाठ है; बहुत सी प्रतियों में इसके साथ {,}בים{ }דאגהbeim dage जुड़ा हुआ है; और जो लोग इस प्रकार पढ़ते हैं, वे भविष्यद्वक्ता के शब्दों को तोड़-मरोड़ने पर विवश होते हैं। यह पाठ शाब्दिक रूप से यह है, “वे समुद्र में लज्जित हैं, भय विश्राम करने को,” या विश्राम कराने को, “वह नहीं सकता,” या नहीं सका। हम देखते हैं कि यह अभिव्यक्ति कितनी कठोर है; तौभी वे इससे यह अर्थ निकालते हैं कि ये नगर उस मनुष्य के समान घुल जाएँगे जो समुद्र पर नाव चलाता है और भय के कारण अपने मन को शान्त नहीं कर पाता। परन्तु, जैसा मैं कह चुका हूँ, इस प्रकार भविष्यद्वक्ता के शब्द विकृत कर दिए जाते हैं। अब यदि हम {,}ב beth के स्थान पर {,}כcaph पढ़ें, जो समानता को सूचित करता है, तो अर्थ अत्यन्त उपयुक्त होगा, अर्थात् भय का समुद्र, या अशान्त समुद्र (विशेषण के स्थान पर सम्बन्ध-कारक में संज्ञा, जो पवित्रशास्त्र में एक सामान्य बात है) जो विश्राम नहीं कर सकता या शान्त नहीं रह सकता।
जहाँ तक इस खण्ड के सामान्य अर्थ का प्रश्न है, उसमें अधिक अन्तर नहीं है; क्योंकि भविष्यद्वक्ता यह दिखाना चाहता है कि अरामी अशान्त समुद्र के समान होंगे, जो इधर-उधर उछाला जाता है, यहाँ तक कि लहरें आपस में टकराती हैं। यदि कोई इसे नाविकों पर लागू करना अधिक पसन्द करे, तो भी अर्थ मूल रूप से वही रहेगा। सो जो कहा गया है उसका सार यह है कि जैसे अरामी सब के लिए भयानक रहे थे, वैसे ही वे युद्ध के केवल समाचार से भयभीत हो जाएँगे, और यहाँ तक कि गल जाएँगे और अपने स्थान पर टिक न सकेंगे, उस समुद्र के समान जो आँधी के प्रचण्ड होने पर विश्राम नहीं पाता, वरन् सब दिशाओं में उछाला जाता है। इसके बाद वह आगे कहता है, ---
यिर्मयाह 49:24
24. दमिश्क बलहीन होकर भागने को फिरा है, और कँपकँपी ने उसे पकड़ लिया है; जच्चा की सी पीड़ा और शोक उसे लगे हैं।
24. Remissa est (vel, debilitata) Damascus; convertit se ad fugam; et tremor apprehendit eam; angustia et dolores tenuerunt eam tanquam parturientem.
क्योंकि घड़ी बज रही है, मैं आगे नहीं बढ़ूँगा।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अनुग्रह कर कि जैसे तू हमारी आँखों के सामने स्मरणीय न्याय-दण्ड रखता है, जिन्हें आज के दिन हमारे लाभ के लिए होना चाहिए, ताकि हम तेरे जूए के नीचे और तेरी व्यवस्था के भय में रखे जाएँ, --- हाँ, अनुग्रह कर कि हम ऐसी धमकियों के सामने कठोर न हो जाएँ, वरन् तेरे क्रोध से पहले ही चेत जाएँ, और तेरे अधीन ऐसे हो जाएँ कि जो कुछ तू दुष्टों के विरुद्ध घोषित करता है, वह हमारी सान्त्वना और आनन्द का कारण बने, जब हम जानें कि इस प्रकार तेरी कलीसिया का उद्धार बढ़ाया जाता है, जिसके अंग होने के लिए तूने अपने पुत्र हमारे प्रभु में हमें मानना और स्वीकार करना चाहा है। --- आमीन।
एक सौ सतहत्तरवाँ व्याख्यान
यिर्मयाह 49:24
24. दमिश्क बलहीन होकर भागने को फिरा है, और कँपकँपी ने उसे पकड़ लिया है; जच्चा की सी पीड़ा और शोक उसे लगे हैं।
24. Remissa est (vel, debilitata) Damascus; convertit se ad fugam; et tremor apprehendit eam; angustia et dolores tenuerunt eam tanquam parturientem.
भविष्यद्वक्ता उसी विषय को आगे बढ़ाता है, क्योंकि अराम का राज्य फला-फूला था, और धन और शक्ति में प्रमुख रहा था, इसलिए यह विश्वास करना कठिन था कि वह इतनी शीघ्र उलट दिया जा सकता है। सो यही कारण है कि भविष्यद्वक्ता अपनी सामान्य रीति के अनुसार उस राज्य के विनाश का विस्तार से वर्णन करता है, ताकि जो उसने कहा था उसकी पुष्टि करे।
402 बहुत सी प्रतियाँ हैं जिनमें {,{כcaph पाया जाता है, और स्पष्टतः यही सबसे उपयुक्त पाठ है, --- लज्जित हैं हमात और अर्पाद; क्योंकि बुरा समाचार उन्होंने सुना है, --- वे गल जाते हैं; समुद्र के समान है व्याकुलता, शान्त करना कोई नहीं कर सकता। गल जाना भय के कारण था। वे हिलाए या व्याकुल किए गए थे, और समुद्र के समान वे विश्राम नहीं कर सकते थे या शान्त नहीं रह सकते थे। {}אלका अनुवाद प्रायः “कोई नहीं” या “कुछ नहीं” किया जा सकता है। --- सं.
फिर वह कहता है, ढीला, या निर्बल, हो गया है दमिश्क। यह क्रिया वास्तव में कभी-कभी थम जाने का अर्थ रखती है: उसका अभिप्राय यह है कि उसकी शक्ति टूट गई। परन्तु इस नगर के नाम के अन्तर्गत, जैसा कल कहा गया था, वह अराम के पूरे राज्य को सम्मिलित करता है, जो अपने धन, विस्तार और जनसंख्या के लिए प्रसिद्ध था। वह कहता है, वह भागने को फिरती है। इन शब्दों से वह सूचित करता है कि अरामियों के लिए दूसरे देशों में भाग जाने के सिवाय कोई बचाव शेष न रहा। और वह बचाव दयनीय है जब मनुष्य उसे स्वेच्छा से निर्वासन के सिवाय और किसी रीति से प्राप्त न कर सकें। वह कारण बताता है, कँपकँपी ने उसे पकड़ लिया है, जच्चा स्त्री की सी वेदना और पीड़ाओं ने उसे घेर लिया है। जब कभी पवित्रशास्त्र में यह उपमा आती है, तब किसी अचानक और अनपेक्षित विपत्ति से अभिप्राय होता है। सो निःसन्देह भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय यह है कि अराम का विनाश अचानक होगा; और वह यह इसलिए कहता है कि वह अपनी शक्ति पर भरोसा न करे, और दूसरे लोग उसे संकट से परे न समझें, क्योंकि वे देखते थे कि वह अपने पुरुषों की संख्या से और अन्य सब वस्तुओं की बहुतायत से दृढ़ किया गया था। अब आगे आता है, ---
यिर्मयाह 49:25
25. हाय, वह प्रशंसा का नगर, मेरे आनन्द का नगर कैसा नहीं छोड़ा गया!
25. Quomodo non est relicta urbs laudis? civitas gaudii mei?
कुछ लोग “मेरे” को अनावश्यक समझते हैं, और इसलिए इसका अनुवाद “आनन्द का नगर” करते हैं; परन्तु प्रतीत होता है कि वे किसी अच्छे कारण से प्रेरित नहीं हुए; क्योंकि वे इसे बेतुका समझते हैं कि उसे भविष्यद्वक्ता के लिए आनन्द का नगर कहा जाए, क्योंकि उसे दमिश्क को किसी प्रेम या कृपा की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए था। परन्तु हम जानते हैं कि भविष्यद्वक्ता सदा अपनी ही भावनाओं के अनुसार नहीं बोलते, वरन् दूसरों का रूप धारण कर लेते हैं। सो हम शब्दों को जैसे वे हैं वैसे ही उचित रीति से पढ़ सकते हैं, मेरे आनन्द का नगर! इसके अतिरिक्त, यिर्मयाह दमिश्क पर बड़े तीखेपन से विजय-हर्ष प्रकट करता है, जब वह इस प्रकार उसके विनाश पर अपना आश्चर्य व्यक्त करता है: वह कहता है, “यह कैसे हो सकता है कि प्रशंसा का नगर, अर्थात् एक प्रसिद्ध नगर, और मेरे आनन्द का नगर, अर्थात् ऐसा उत्तम दृश्य जो सब को आनन्द दे, --- यह कैसे हो सकता है कि यह नगर छोड़ा न जाए, अर्थात् बख्शा न जाए?” क्योंकि “छोड़ा गया” से उसका अभिप्राय अपने निवासियों द्वारा त्यागा जाना, या उजाड़ बना दिया जाना नहीं है; क्योंकि “छोड़ा गया” से उसका अभिप्राय अछूता या सुरक्षित है।
परन्तु हमें सदा वह बात स्मरण रखनी चाहिए जो हम अक्सर कह चुके हैं, कि भविष्यद्वक्ता जब इस प्रकार आश्चर्य में बोलते हैं, तब वे अपनी वाक्पटुता दिखाने के लिए वक्ताओं के समान ऊँची शैली नहीं अपनाते, वरन् सदा उस बात का ध्यान रखते हैं जो लाभदायक है। जब भविष्यद्वक्ता इतने बड़े नगर के विनाश के विषय में बोल रहा था, तब मनुष्यों के मनों पर प्रबल प्रभाव डालना आवश्यक था। सो इस आश्चर्य में वह बात सम्मिलित है जिसे वे पूर्वाभास (anticipation) कहते हैं; क्योंकि इसने उस सन्देह को पहले ही दूर कर दिया जो इस भविष्यद्वाणी पर विश्वास किए जाने में बाधा बन सकता था। यह बात तुरन्त हर एक के मन में आ सकती थी, “यह कैसे हो सकता है कि दमिश्क नष्ट हो जाए?” सो भविष्यद्वक्ता इसका पहले से ही उत्तर देता है, और दिखाता है कि यद्यपि यह साधारण रूप से बनाई गई धारणा के विपरीत था, तौभी क्योंकि प्रभु ने ऐसा ठहराया था, उस नगर का विनाश निश्चित था। सो अब हम भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय समझ लेते हैं। इसके बाद आता है, ---
403 इसी प्रकार अनुवाद (Sept. को छोड़कर) और Targ. भी पढ़ते हैं, {{יiod को अधिक-वर्ण (paragogic) माना गया है। Grotius भी ऐसा ही मानता है। --- सं. 404 Syr. ने इसका अनुवाद “बख्शा गया” किया है; Vulg. ने निषेधवाचक “नहीं” छोड़ दिया है। यहाँ दो कठिनाइयाँ हैं: {{עזבक्रिया बख्शने के अर्थ में प्रयुक्त नहीं होती, यद्यपि Gataker इसे दिखाने का परिश्रम करता है; फिर सम्बन्ध की कठिनाई है: अगला पद “इसलिए” से आरम्भ होता है। यहाँ क्रिया को उसके सामान्य अर्थ में लें, तो “इसलिए” का पूरा बल बना रहेगा। वह पूछता है, पहले बताई गई परिस्थितियों में यह नगर, प्रसिद्ध और आनन्दमय नगर होने पर भी, क्यों नहीं छोड़ा या त्यागा गया? परन्तु क्योंकि वह त्यागा नहीं गया, “इसलिए,” वह कहता है, “उसके जवान उसके चौकों में गिरेंगे,” इत्यादि। Venema का मत भिन्न है; उसका अनुवाद यह है, --- क्यों नहीं? त्यागा गया है प्रशंसा का नगर, मेरे आनन्द का नगर। अर्थात्, दमिश्क भागने पर विवश क्यों न किया जाए, जब कि यरूशलेम, प्रशंसा का और उसके आनन्द का नगर, त्याग दिया गया था। इस अर्थ में “इसलिए” का सम्बन्ध उन लोगों के वध से है जो भागना न चाहेंगे। --- सं.
यिर्मयाह 49:26
26. इसलिए उसके जवान उसके चौकों में गिरेंगे, और सब योद्धाओं का बोल बन्द हो जाएगा, सेनाओं के यहोवा की यही वाणी है।
26. Propterea cadent electi ejus (aut, robusti juvenes, ,{}םירוחבenim propria sunt electi, sed transfertur hoc nomen ad eos qui sunt in pleno vigore aut flore oetatis) in compitis ejus; et omnes viri militares silebunt (alii vertunt, excidentur, to metaphorice accipitur illo sensu hoc verbum) in die illo, inquit Jehova exercituum.
यहाँ भविष्यद्वक्ता मानो अपने आप को सुधारता है, और घोषणा करता है कि यद्यपि दमिश्क का विनाश सब को चकित कर देगा, तौभी वह निश्चित था; और इसी प्रकार मैं {,}לכן lacen अव्यय की व्याख्या करता हूँ। इब्रानी लोग इसे कारण बतानेवाला अव्यय मानते हैं --- इसलिए, इस कारण से। तब वे समझते हैं कि यहाँ यह कारण व्यक्त किया गया है कि परमेश्वर ने उस नगर को नष्ट करने की आज्ञा क्यों ठहराई थी, अर्थात् इसलिए कि उसने पहले इस्राएलियों से, और फिर यहूदियों से युद्ध किया था, और इस प्रकार वह परमेश्वर की कलीसिया को सताना कभी न छोड़ता था। परन्तु यहाँ इसे अधिक सरल रीति से, एक दृढ़तासूचक शब्द के रूप में लेना चाहिए, जैसा कि बहुत से अन्य स्थानों में उसका अर्थ है। सो भविष्यद्वक्ता यहाँ उस आश्चर्य को रोकता है जो उसने व्यक्त किया था, मानो उसने कहा हो, “चाहे यह कैसा भी हो, तौभी परमेश्वर ने ऐसा ही ठहराया है; चाहे सब लोग दमिश्क के विनाश पर चकित हों, तौभी उसके जवान गिरेंगे, इत्यादि।” अर्थ यह है कि आकाश के नीचे कोई ऐसी शक्ति न थी जो परमेश्वर का सामना कर सके। सो दमिश्क, क्योंकि वह विनाश के लिए अर्पित था, उस न्याय-दण्ड से बच न सका, यद्यपि मनुष्यों की सम्मति के अनुसार वह अजेय था।
और यह खण्ड विशेष ध्यान के योग्य है, क्योंकि जब बाधाएँ हमारे मनों को घेर लेती हैं और हमारे विचारों के सामने आती हैं, तब हमें सदा इसे अपनी ढाल बनाकर खड़ा करना चाहिए, “जो कुछ परमेश्वर ने ठहराया है, वह अवश्य पूरा होगा।” सो चाहे आकाश और पृथ्वी स्वर्गीय आज्ञा में बाधा डालने के लिए एक हुए दिखाई दें, तौभी हम जानें कि हमें परमेश्वर के वचन में सन्तुष्ट रहना चाहिए, और यह अव्यय “तौभी,” या फिर भी, {,}לכןlacen, सदा हमें स्मरण रहना चाहिए। क्योंकि हम कह चुके हैं कि यिर्मयाह का उद्देश्य मानो यह था कि जो कुछ मनुष्य अपने मनों में योजना बाँधें, उसे अधीन कर दे; क्योंकि केवल यही पर्याप्त है कि जो कुछ परमेश्वर घोषित करता है, उसे उसने ठहरा दिया है। आगे आता है, ---
यिर्मयाह 49:27
27. और मैं दमिश्क की शहरपनाह में आग लगाऊँगा जिस से बेन्हदद के राजभवन भस्म हो जाएँगे।
27. Et accendam ignem in muro Damasci, et consumet palatia Benhadad.
यहाँ परमेश्वर स्वयं बोलता है, और घोषणा करता है कि जिस विनाश की यिर्मयाह ने भविष्यद्वाणी की थी, उसका कर्ता वह स्वयं होगा। और वह आग की उपमा काम में लाता है, क्योंकि जलने से अधिक प्रचण्ड या अधिक भयानक कुछ नहीं; क्योंकि हम जानते हैं कि जब आग धधकने लगती है, तब बड़े से बड़े नगर भी शीघ्र भस्म होकर राख हो जाते हैं।
सो परमेश्वर नगर के विनाश की तुलना जलने से करता है, यद्यपि शहरपनाह और राजा के महलों को नष्ट करने के लिए कोई आग नहीं लगाई गई; परन्तु भविष्यद्वक्ता इस रूपक से यह अभिप्राय रखता है कि नगर का विनाश ऐसा होगा मानो वह आग से भस्म हो गया हो। साथ ही वह विश्वासयोग्य लोगों को परमेश्वर के न्याय-दण्ड का स्मरण दिलाता है, ताकि वे जानें कि जो कुछ अरामियों पर पड़ा वह उसी के हाथ से आया; क्योंकि ऐसी विपत्तियों से बहुत कम लाभ होता, यदि साथ में यह शिक्षा भी न जोड़ी जाती कि परमेश्वर मनुष्यों की दुष्टता पर न्यायसंगत दण्ड देता है।
परन्तु जब वह बेन्हदद के राजभवनों की चर्चा करता है, तब वह संक्षेप में उस कारण की ओर संकेत करता है जिसके लिए परमेश्वर अरामियों के साथ इतनी कठोरता से व्यवहार करेगा। हम पहले ही कह चुके हैं कि वे परमेश्वर की चुनी हुई प्रजा के सदा शत्रु रहे थे। पहले उन्होंने इस्राएल के राज्य को उलट देने का यत्न किया; बाद में उन्होंने इस्राएल के राजाओं के साथ सन्धि की, परन्तु वह यहूदा के राज्य को उलट देने के उद्देश्य से थी; और इस उद्देश्य के लिए बहुत सी सन्धियाँ हुईं। परन्तु बेन्हदद ने, जैसा हम राजाओं की पहली पुस्तक में पढ़ते हैं, इस्राएलियों को बहुत दुःख दिया। वास्तव में हम उस समय के इतिहास से सीखते हैं कि अराम के बहुत से राजा थे जो यह नाम रखते थे, क्योंकि यह एक सामान्य नाम था, जैसे मिस्र के राजा फ़िरौन कहलाते थे; और अन्य राजाओं ने भी एक प्रचलित नाम अपनाया, जैसे रोम के सम्राट अपने आप को कैसर कहते थे। परन्तु हम पढ़ते हैं कि अन्तिम बेन्हदद हजाएल का पुत्र था, जो स्वयं भी अराम का राजा था; और जैसा मैंने कहा है, यह कोई व्यक्तिगत नाम न था। सो जब पवित्र इतिहास स्पष्ट दिखाता है कि बहुत से लोग बेन्हदद कहलाते थे, तो मुझे कोई सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता उस पहले की ओर संकेत करता है जिसने इस्राएलियों को व्याकुल करना और सताना आरम्भ किया। तब वह उस कारण की ओर संकेत करता है कि परमेश्वर ने दमिश्क को नष्ट करने का निश्चय क्यों किया था, क्योंकि उसने अपनी सहनशीलता में बहुत समय तक अरामियों को सहा था। परन्तु जब उसने देखा कि वे मन नहीं फिराते, वरन् इसके विपरीत पाप पर पाप बढ़ाते जाते हैं, तब अन्त में अपने न्यायासन पर चढ़कर वह कहता है कि जो आग वह दमिश्क की शहरपनाह में लगाएगा, वह बेन्हदद के राजभवनों को भी भस्म कर देगी, अर्थात् उन भवनों को जिनसे इतनी बुराइयाँ निकली थीं, और इतनी क्रूरता, जिससे दीन कलीसिया को दुःख दिया गया था। यही अर्थ है। अब आगे आता है, ---
यिर्मयाह 49:28
28. केदार और हासोर के राज्यों के विषय में, जिन्हें बाबुल के राजा नबूकदनेस्सर ने मार लिया। यहोवा यों कहता है: उठकर केदार पर चढ़ाई करो! पूर्वियों को नाश करो!
28. Ad Kedar, et regna Hazor, quae percussit Nabuchadrezar, rex Babylonis, sic dicit Jehova, Surgite, ascendite adversus Kedar, et perdite filios Kedem (vel, orientis).
यहाँ केदारियों के विषय में एक और भविष्यद्वाणी जोड़ी गई है, जो अरब के एक भाग में बसते थे। अन्यत्र भी उनका उल्लेख किया गया है, और सम्भव है कि वे अरामियों के पड़ोसी थे और यहूदिया से दूर न थे; क्योंकि दाऊद ने शिकायत की (यदि वह उस भजन का रचयिता था) कि वह केदार के सन्तानों के बीच रहता है, “हाय मुझ पर, क्योंकि मुझे मेशेक में परदेशी होकर और केदार के सन्तानों के साथ रहना पड़ा है,” (भजन संहिता 120:5)
सो उस भजन का रचयिता चाहे कोई भी हो, यह एक सम्भावित अनुमान है कि केदारी, यद्यपि यहूदिया से सटे हुए न थे, तौभी बहुत दूर भी न थे; और हम कह चुके हैं कि वे अरब के निवासी थे। और भविष्यद्वक्ता आगे कहता है, केदेम के सन्तान; कुछ लोग इस शब्द का अनुवाद ऐसे करते हैं मानो यह किसी जाति का नाम हो; और मूसा हमें बताता है कि केदेम इश्माएल के पुत्रों में से एक था। हो सकता है कि इसी कारण यिर्मयाह ने इस प्रजा को केदारियों के साथ जोड़ा हो, (उत्पत्ति 25:13-15.) तौभी मेरा झुकाव इस मत की ओर है कि वह यहाँ पूर्व के सन्तानों का उल्लेख करता है, अर्थात् यहूदिया की अपेक्षा से; इसलिए नहीं कि वे फ़ारसियों या अन्य पूर्वी जातियों के निकट थे, वरन् वह केवल यहूदिया के पूर्व में स्थित एक देश की ओर संकेत करता है।
परन्तु परमेश्वर ने उस प्रजा से पलटा क्यों लिया, इसका कारण व्यक्त नहीं किया गया। तौभी हो सकता है कि उन्होंने पहले इस्राएलियों की बहुत हानि की हो; इसलिए परमेश्वर, बहुत समय तक उन्हें छोड़ रखने के पश्चात्, अन्त में उनका कठोर न्यायी बनकर प्रकट हुआ। और यद्यपि कारण अज्ञात था, तौभी यहूदियों के लिए यह जानना लाभदायक था कि परमेश्वर का हाथ पलटा लेने के लिए संसार के हर भाग तक बढ़ा हुआ है; क्योंकि वे इससे यह निष्कर्ष निकाल सकते थे कि उन्हें न्यायसंगत दण्ड मिला, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर से बलवा किया था; क्योंकि हम जानते हैं कि जो दास जान-बूझकर और तिरस्कार के साथ अपने स्वामी की आज्ञा नहीं मानता, वह दुगुने दण्ड के योग्य है। (लूका 12:47) सो जब यहूदियों ने देखा कि ये बर्बर लोग, जो जंगली पशुओं के समान थे, परमेश्वर के पलटे से बच नहीं सके, तब वे अपने मन में सोच सकते थे कि परमेश्वर के वे न्याय-दण्ड कितने न्यायसंगत रहे होंगे जो उन पर पूरे किए गए जिन्होंने जानते-बूझते और स्वेच्छा से उसका तिरस्कार किया था। सो इस भविष्यद्वाणी से मिलनेवाले लाभों में से यह एक था।
और फिर, जैसा हम अन्यत्र कह चुके हैं, यह सामान्य नियम स्मरण रखना चाहिए कि जब संसार में परिवर्तन होते हैं, तब, क्योंकि मनुष्यों के विचार और भावनाएँ क्षणभंगुर हैं, यह चेतावनी देना आवश्यक है कि परमेश्वर इन सब परिवर्तनों में ऐसा शासन करता है कि उनमें संयोग का कोई स्थान नहीं। क्योंकि जब विपत्तियाँ जल-प्रलय के समान सारे संसार पर फैल जाती हैं, तब, जैसा कहा जा चुका है, हम समझते हैं कि ऐसी गड़बड़ी संयोग से और बिना किसी कारण के होती है। क्योंकि जब परमेश्वर किसी एक भाग को दुःख देता है, तब यह अन्तर हमें कुछ विचार करने की ओर ले जा सकता है, --- “एक भाग दुःख पाता है और दूसरा बच जाता है;” परन्तु जब विपत्तियाँ सारे संसार को डुबो देती हैं, तब कोई अन्तर न रहने के कारण हम समझते हैं कि सब कुछ अव्यवस्था की दशा में है, और न हम अपने विचारों को ऐसा सम्भाल पाते हैं कि यह जान सकें कि परमेश्वर सब से ऐसा पलटा लेता है कि फिर भी वह अपने न्याय-दण्डों को, जैसा उचित है, अपनी अनन्त और अगम्य बुद्धि और न्याय के अनुसार नियन्त्रित करता है। सो क्योंकि परमेश्वर अपने न्याय-दण्डों के विषय में जो यह सामंजस्य करता है, वह मनुष्यों की बुद्धि और समझ पर प्रकट नहीं होता, इसलिए जब परमेश्वर एक ही समय में सारे संसार पर वज्र बरसा रहा था, तब यह आवश्यक था कि यहूदियों को स्मरण दिलाया जाए कि वे उसके हाथ के कामों पर सदा ध्यान दें। उन्होंने अपने आप को नष्ट होते देखा, उन्होंने वही बात मिस्रियों और अन्य सब निकटवर्ती जातियों पर होते देखी; अन्त में अश्शूर की बारी आनेवाली थी, फिर कसदिया की, और उसके बाद मादियों और फ़ारसियों की। सो जब कोई भाग अछूता रहनेवाला न था, तो कौन ऐसा न सोचता कि सब कुछ मानो अन्धे और अनिश्चित भाग्य के द्वारा घूम रहा है?
इसलिए परमेश्वर ने बिना कारण विश्वासयोग्य लोगों को पहले से चेतावनी नहीं दी, कहीं ऐसा न हो कि वे सोचें कि इतने बड़े उलट-फेर और प्रचण्ड परिवर्तनों में सब कुछ बिना भेद के आपस में मिला हुआ है, वरन् इसलिए कि वे जानें कि परमेश्वर स्वर्ग से इन सब गड़बड़ियों को नियन्त्रित करता और उन पर प्रभुता करता है। यही कारण है कि भविष्यद्वक्ताओं ने सब जातियों की विपत्तियों के विषय में इतने विस्तार से कहा।
अब हम केदारियों की ओर आएँ: वह कहता है, केदार के और हासोर के राज्यों के विषय में
निःसन्देह इन राज्यों में एक बड़ा देश सम्मिलित था, क्योंकि यह विश्वास करना कठिन है कि हासोर किसी नगर का नाम था; क्योंकि यदि यह केवल एक नगर का नाम होता, तो कौन हासोर के राज्य कहता? यह तो निश्चित है कि इस नाम का एक नगर था, क्योंकि यहोशू में उसका उल्लेख है। परन्तु यहाँ इसका अर्थ केदारियों से सटा हुआ एक बड़ा प्रदेश है। और वह कहता है कि ये सब जातियाँ नबूकदनेस्सर के द्वारा मारी गई थीं, क्योंकि ये बर्बर लोग सम्भवतः यहूदियों को बहुत कम ज्ञात थे। तौभी यह ध्यान देना चाहिए कि वे अब तक नबूकदनेस्सर के द्वारा मारे नहीं गए थे, अर्थात् उस समय जब भविष्यद्वक्ता ने उनके विनाश के विषय में कहा। परन्तु यिर्मयाह ने अपनी भविष्यद्वाणी की पुष्टि करने के लिए ऐसा कहा, मानो उसने कहा हो कि जिस बात की बहुतों ने उपेक्षा की, वरन् तिरस्कार भी किया, वह अन्त में सचमुच पूरी हुई। क्योंकि जब उसने इन दूर की जातियों को विनाश की धमकी दी, तब सम्भव है कि उसके अपने लोगों ने उसका उपहास किया हो; और इसलिए वह कहता है कि उसने व्यर्थ नहीं कहा था, वरन् घटना ही से उसकी बुलाहट प्रमाणित हुई, क्योंकि ये उसी प्रकार मारे गए जैसा उसने पहले से कहा था।
और भविष्यद्वाणी यह है, उठो, केदार पर चढ़ाई करो, और पूर्व के सन्तानों को नाश करो। यहाँ भविष्यद्वक्ता बाबुलियों से बोलता है, और परमेश्वर के रूप में, उसके दूत के समान। और हम कह चुके हैं कि परमेश्वर के सेवकों ने जो कुछ होनेवाला था, उसकी परम अधिकार के साथ आज्ञा दी और उसे ठहराया, ताकि उनके शब्दों या शिक्षा को अधिक आदर और सम्मान मिले। क्योंकि अधर्मी मनुष्य भविष्यद्वाणियों का तिरस्कार करते थे, और अपमान के साथ कहते थे कि वे केवल शब्द हैं। इसलिए परमेश्वर के सेवकों ने, यह दिखाने के लिए कि उनके शब्दों के साथ उनकी पूर्ति जुड़ी हुई है, परमेश्वर का रूप धारण किया।
इस प्रकार उन्होंने साहस के साथ बड़े से बड़े राजाओं को आज्ञा दी, जैसा यिर्मयाह यहाँ करता है, उठो; क्योंकि वह यहाँ किसे सम्बोधित करता है? बाबुल के राजा को, उस सबसे बड़े सम्राट को, और अश्शूरियों को भी और कसदियों को भी: और उसने उन्हें उठने और चढ़ाई करने की आज्ञा दी, मानो वे उसकी सेवा के लिए तैयार हों, अर्थात् इसलिए कि वह परमेश्वर की आज्ञा के बिना नहीं बोलता था।
और बोलने की इस रीति पर विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए, ताकि हम सीखें कि जो कुछ परमेश्वर के नाम से घोषित किया जाता है, उसे ऐसे ग्रहण करें मानो वह बात पहले ही हमारी आँखों के सामने हो, और यह भी जानें कि सारे संसार की शक्ति परमेश्वर के अधीन इस प्रकार है कि पृथ्वी के सब राज्य उसके वचन को पूरा करने के लिए तैयार हैं। इसलिए जब परमेश्वर स्वयं बोलता है, तब हमें उसके वचन की सामर्थ्य को ऐसा समझना चाहिए मानो आकाश और पृथ्वी उसकी आज्ञा मानने और जो कुछ उसने आज्ञा दी है उसे पूरा करने के लिए तैयार हों। आगे आता है, ---
यिर्मयाह 49:29
29. वे उनके डेरे और भेड़-बकरियाँ ले जाएँगे, उनके तम्बू और सब बरतन उठाकर ऊँटों को भी हाँक ले जाएँगे, और उन लोगों से पुकारकर कहेंगे, चारों ओर भय ही भय है।
29. Tentoria ejus (tabernacula ejus) et greges ejus tollent, et cortinas ejus, et omnia vasa ejus, et camelos ejus sument sibi, et clamabunt contra eos, Terror undique.
भविष्यद्वक्ता ने डेरों और परदों की चर्चा करते समय उस जाति के जीवन-ढंग का ध्यान रखा; क्योंकि हम जानते हैं कि अरबी लोग झोंपड़ियों और डेरों में रहते थे, जैसा वे आज भी करते हैं, और वे चरवाहे भी थे। उनके पास जोते हुए खेत न थे, वरन् वे अपने झुण्डों को जंगलों में से ले जाते थे; और उनके पास बहुत से ऊँट थे। यही कारण है कि भविष्यद्वक्ता केदारियों के विषय में बोलते हुए डेरों, परदों, ऊँटों और झुण्डों का उल्लेख करता है; क्योंकि वे किसी उपजाऊ देश में नहीं रहते थे, उनके पास कोई कृषि-योग्य भूमि न थी, और न उनके पास कोई अन्य बड़ा धन था, न नगर, न महल। जो कहा गया है उसका सार यह है कि केदारी विनाश के लिए ठहराए गए थे, और इसलिए अपने शत्रुओं के लिए अहेर के रूप में खुले छोड़ दिए गए थे।
405 Sept. में यह “केदेम” है, और अन्य अनुवादों तथा Targum में “पूर्व”। — सं.
परन्तु क्योंकि इस पर विश्वास करना कठिन था, वह आगे कहता है, वे उनसे पुकारकर कहेंगे, चारों ओर आतंक। इन शब्दों से भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय यह है कि ऐसा भय छा जाएगा कि सब लोग बिना कोई प्रतिरोध करने का साहस किए अपनी सम्पत्ति लुटने देंगे, क्योंकि चारों ओर का आतंक उन्हें पकड़ लेगा। जो लोग यह पढ़ते हैं, “वे उन्हें चारों ओर का आतंक कहेंगे,” वे समझते हैं कि यह सैनिकों के विषय में रूपक के रूप में कहा गया है, क्योंकि वे भयानक थे। कुछ लोग यह भी कहते हैं, “बाबुल का राजा उनके विरुद्ध चारों ओर से आतंक को बुलाएगा” या एकत्र करेगा। परन्तु पहली व्याख्या सबसे सम्भावित है, कि जब शत्रु विजेताओं के रूप में पुकारेंगे या चिल्लाएँगे, आतंक, आतंक, तब वे केवल अपने शब्द ही से उन पर विजय पा लेंगे। मेरी समझ में भविष्यद्वक्ता का वास्तविक अभिप्राय यही है। अब आगे आता है, ---
यिर्मयाह 49:30
30. यहोवा की यह वाणी है, हे हासोर के निवासियो, भागो! दूर दूर मारे मारे फिरो, कहीं जाकर गहिरे स्थान में बसो! क्योंकि बाबुल के राजा नबूकदनेस्सर ने तुम्हारे विरुद्ध युक्ति और कल्पना की है।
30. Fugite, abite procul valde (profundaverunt ad habitandum incolae Hasor, dicit Jehova); quia consultavit super vos Nabuchadnezar rex Babylonis consilium, et cogitavit contra vos cogitationem.
यिर्मयाह यहाँ उसी विषय को आगे बढ़ाता है, परन्तु जो उसने कहा था उसे अधिक स्पष्टता से व्यक्त करता है। वह कहता है, भागो, दूर चले जाओ। जो आगे है उसे मैं कोष्ठक के रूप में पढ़ता हूँ, गहरे में उन्होंने बसाया है, हासोर के निवासियों ने। फिर यिर्मयाह अपने विषय पर आगे बढ़ता है, क्योंकि तुम्हारे विरुद्ध युक्ति की है नबूकदनेस्सर ने, बाबुल के राजा ने, इत्यादि। तब वह उन्हें दूर भाग जाने की आज्ञा देता है, क्योंकि नबूकदनेस्सर ने उन्हें नष्ट करने का निश्चय कर लिया था। युक्ति और विचार या कल्पना से भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय उन गुप्त उपायों से है जिनके द्वारा उसने उस प्रजा को अधीन किया जब वे ऐसी किसी बात से डरते न थे। सो जब ये चरवाहे अपने पहाड़ों पर निश्चिन्त रहते थे, तब नबूकदनेस्सर ने अपनी सेनाएँ तैयार कीं और उन्हें बाँट दिया; और इस प्रकार ये लोग बल की अपेक्षा उसकी युक्ति और चतुराई से अधिक पकड़े गए। भविष्यद्वक्ता यहाँ नबूकदनेस्सर की युक्ति और योजना के विषय में जो कहता है वह अनावश्यक नहीं, क्योंकि वह परोक्ष रूप से उस जाति के आलस्य को छूता है, जो कोई चौकसी और विचार नहीं करती थी, यह समझकर कि उनका जंगल उनके लिए पर्याप्त आड़ है। सो क्योंकि वे इस प्रकार निश्चिन्त रहते थे, भविष्यद्वक्ता यहाँ उन्हें स्मरण दिलाता है कि उनका काम एक धूर्त शत्रु से पड़ेगा, जो घर बैठे अपनी युक्तियाँ गढ़ेगा और बनाएगा, और फिर ठीक समय पर उसे पूरा करेगा जिस पर वह बहुत समय से विचार करता आया था।
परन्तु इसके बाद एक कोष्ठक-वाक्य आता है, उन्होंने गहरा किया है; अर्थ को अधिक स्पष्ट करने के लिए एक विरोधसूचक अव्यय को निहित समझना चाहिए, यद्यपि उन्होंने गहरे में बसना ठाना है; क्योंकि इस अपवाद के बिना यह भविष्यद्वाणी कम विश्वसनीय होती। क्योंकि केदारी चारों ओर से सुरक्षित थे, इसलिए कि कोई उनसे डाह नहीं करता था, क्योंकि वे न केवल मितव्ययी लोग थे, वरन् असभ्य भी थे और कठोर तथा दीन-हीन जीवन से सन्तुष्ट रहते थे। सो जब वे अपने आप को इस प्रकार सुरक्षित समझते थे, तो कोई यह आपत्ति उठा सकता था और कह सकता था, “तू उन्हें भागने को क्यों कहता है? वे क्यों भागें? क्योंकि कोई ऐसा मूर्ख नहीं जो उन पर आक्रमण करे।” इसी प्रकार स्कूती लोगों ने भी सिकन्दर की हँसी उड़ाई थी जब उसने उन पर आक्रमण किया: “तेरा उद्देश्य क्या है? तू समझता है कि तेरा सामना मनुष्यों से है; हम तो जंगली पशु हैं: और फिर यदि तू धन और सम्पत्ति ढूँढ़ता है, तो वह तुझे हमारे पास न मिलेगी।” तो यहाँ जिन जातियों का उल्लेख है उनकी दशा ऐसी ही थी। इसलिए जब भविष्यद्वक्ता उन्हें भागने को कहता है, क्योंकि नबूकदनेस्सर अचानक उन पर आक्रमण करेगा, तो वह साथ ही यह भी जोड़ता है, यद्यपि उन्होंने गहरे में बसना ठाना है। वह पहले भी इस बोलचाल का प्रयोग कर चुका था: गहरे में बसना, इसका अर्थ है सब संकट से दूर, सुरक्षित और छिपा हुआ ठिकाना रखना। सो जो गढ़वाले नगरों में रहते हैं, या जो जंगलों में बसते हैं, या जो किसी कंगाल देश में छिपे रहते हैं, जैसे केदारी और उनके पड़ोसी, उनके विषय में कहा जाता है कि वे अपने निवासों में गहरे बसे हैं।
परन्तु भविष्यद्वक्ता कहता है कि यह बात बाबुलियों को उनके देश पर चढ़ाई करने और उस पर अधिकार कर लेने से न रोकेगी। आगे लिखा है —
यिर्मयाह 49:31
31. उठकर उस चैन से रहनेवाली जाति के लोगों पर चढ़ाई करो, जो निडर रहते हैं, यहोवा की यह वाणी है, जिनके न किवाड़ और न बेंड़े हैं, और जो अकेले रहते हैं।
31. Surgite, ascendite contra gentem securam, habitatorem (eum qui habitat) in fiducia, dicit Jehova; non portae nec vectes ei, solus habitat.
वह पिछले पद की पुष्टि करता है, और जो वह पहले कह चुका था उसे दोहराता है, उठो, चढ़ाई करो; परन्तु वह यह जोड़ता है, एक शान्त जाति के विरुद्ध। यही वह गहरा निवास था जिसकी उसने चर्चा की थी; क्योंकि केदारी, अपने आप को मानो किसी दूसरे संसार में रहनेवाले समझकर, निश्चिन्त थे; और इसलिए वह कहता है, एक निश्चिन्त जाति के विरुद्ध। शब्द {,}שליוsheliu, का अर्थ कोमल या सुकुमार है, जैसा हम अन्यत्र देख चुके हैं, परन्तु इस स्थान में उसका अर्थ निश्चिन्त है।
क्योंकि यद्यपि वहाँ कोई सुख-विलास न रहे हों, तौभी उसे निश्चिन्त जाति कहा गया है, {}גוי,}שליו{gui sheliu, अर्थात् ऐसी जाति जो किसी बात से नहीं डरती थी। और फिर वह स्वयं इसकी व्याख्या करता है, भरोसे में रहनेवाली, अर्थात् जो भय और चिन्ता से रहित है।
और वह इसका कारण बताता है, क्योंकि उन्हें किवाड़ों और बेंड़ों की कोई आवश्यकता न थी, और वे अकेले रहते थे। कुछ व्याख्याकार समझते हैं कि यहाँ केदारियों के अहंकार की ओर संकेत है, क्योंकि वे सामान्य रीति से अपनी रक्षा नहीं करना चाहते थे, और किवाड़ों और बेंड़ों को कुछ भी नहीं समझते थे। परन्तु भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय दूसरा है, अर्थात् यह कि क्योंकि वे असभ्य और चरवाहे थे और डाह की पहुँच से परे थे, इसलिए वे सोचते थे कि कोई शत्रु कभी उन तक न आएगा। क्योंकि युद्धों के कारण लोभ और महत्वाकांक्षा के सिवा और क्या हैं? और कौन ऐसा होगा जो अपने पहाड़ों पर रहनेवाली असभ्य जातियों पर प्रभुता करना चाहे? और फिर किसी जंगली और बिन जोते देश में धन तो मिल ही नहीं सकता। सो जब केदारी ऐसे थे, तो भविष्यद्वक्ता कहता है कि वे निश्चिन्त होकर रहते थे, यद्यपि वे किवाड़ों और बेंड़ों से सुरक्षित न थे, वरन् अकेले रहते थे। फिर वह कहता है कि वे अकेले रहते थे, इसलिए नहीं कि वे अकेले होने के कारण अपने आप को बड़ा समझते थे, और अपने को राजाओं से भी ऊपर मानते थे — क्योंकि एकान्त प्रायः अहंकार और हठ उत्पन्न करता है; परन्तु भविष्यद्वक्ता का अर्थ, जैसा मैंने कहा, बिलकुल भिन्न है, अर्थात् यह कि केदारी समझते थे कि उन्हें मित्रों और सहायकों की कोई आवश्यकता नहीं, क्योंकि वे सहायता के लिए अपने पड़ोसियों पर निर्भर न थे, वरन् अपने जंगलों से ही सन्तुष्ट थे। और साथ ही वे यह नहीं सोचते थे कि कोई शत्रु उन्हें सताएगा, क्योंकि न कोई कारण था और न कोई अवसर।
406 अधिकांश लोग इस क्रिया को आज्ञार्थ में मानते हैं, पहले की दो क्रियाओं के समान; और सेप्टुआजिन्ट, वल्गेट और तरगुम में भी ऐसा ही दिया गया है। सीरियाई अनुवाद में सब क्रियाएँ भूतकाल में हैं, जो प्रसंग से मेल नहीं खाता। ब्लेनी का अनुवाद यह है, — भागो, शीघ्र हट जाओ, बसने के लिए गहरे में चले जाओ, इत्यादि। जैसा वह कहता है, इसका अर्थ यह है कि वे अपने शत्रुओं से छिपने के लिए गहरी गुफाओं में चले जाएँ। देखिए न्यायियों 6:2; 1 शमूएल 13:6। — सं.
तो अब हम फिर समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता क्यों कहता है कि उन्होंने गहरे में बसना ठाना, अर्थात् उनका निवास गहरे में था, क्योंकि कंगाली और सब धन-सम्पत्ति का अभाव उनके लिए मानो एक सुरक्षित गढ़ था: क्योंकि उनके पास न कोई वैभव था और न कोई प्रतिष्ठा, इसलिए वे अपने आप को अन्य मनुष्यों की सामान्य दशा से मुक्त समझते थे। परन्तु तौभी वह कहता है कि कसदी आएँगे और जो कुछ उनके पास था उसे लूट लेंगे। आगे लिखा है —
यिर्मयाह 49:32
32. उनके ऊँट और अनगिनत गाय-बैल और भेड़-बकरियाँ लूट में जाएँगी, और जो छोर के कोनों में रहते हैं उन्हें मैं सब दिशाओं की हवा में तितर-बितर करूँगा; और चारों ओर से उन पर विपत्ति लाकर डालूँगा, यहोवा की यह वाणी है।
32. Et erunt cameli eorum in direptionem, et copia pecorum ipsorum in praedam; et dispergam eos ad omnem ventum, extremos anguli, et ab omnibus lateribus ejus adducam perditionem ipsorum, dicit Jehova.
इसकी व्याख्या कल की जाएगी।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यद्यपि जो बातें आज तेरे भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा प्राचीन जातियों के विषय में हमें सुनाई गई हैं, वे मानो प्रचलन से बाहर हो गई जान पड़ें, तौभी ऐसा अनुग्रह कर कि जब कभी हम संसार के किसी भी भाग पर तेरे न्याय-दण्डों के पूरे किए जाने के विषय में पढ़ें, तब हम पर उसका गम्भीर प्रभाव पड़े, जिससे हम आज के दिन पूर्ण रीति से तेरे अधीन होना और तेरी दया की शरण लेना सीखें; और हम पर चाहे जो कुछ भी बीते, हम कभी सन्देह न करें कि यदि हम सच्चे हृदय से, और हमारे प्रभु मसीह यीशु में निष्कपट विश्वास के साथ तुझे खोजें, तो तू हम पर अनुग्रहकारी होगा। — आमीन।
एक सौ अठहत्तरवाँ व्याख्यान
जो पद हमने कल पढ़ा, उसमें यिर्मयाह ने फिर दोहराया कि केदारी अपने शत्रुओं के द्वारा ऐसे लूटे जाएँगे कि उनके पास कुछ भी न बचेगा। इसलिए वह फिर ऊँटों और पशुओं की चर्चा करता है: वह कहता है कि पशुओं की बहुतायत और ऊँट लूट और अहेर बनेंगे। परन्तु वह खेतों और दाख की बारियों के बदले ऊँटों और पशुओं का नाम क्यों लेता है, यह मैंने कल संक्षेप में समझा दिया था। क्योंकि जब किसी उपजाऊ देश की चर्चा होती है, चाहे वह अन्न से भरपूर हो या दाखलताओं से, तब भविष्यद्वक्ता ऐसी ही सम्पत्ति का उल्लेख करते थे; परन्तु जब, जैसा अभी, किसी ऐसे देश का उल्लेख किया जाता है जो पशुओं से भरपूर है और पहाड़ी भी है, तब भविष्यद्वक्ता केवल ऊँटों और पशुओं की चर्चा करता है; क्योंकि उस जाति के जीवन की रीति, जैसा बताया जा चुका है, कठोर और कष्टमय थी, और लगभग मनुष्य की दशा से भी नीचे थी। जब उनके पशुओं के लिए चारा समाप्त हो जाता, तो वे कहीं और चले जाते थे, और अपनी गाड़ियों में अपना सारा सामान ले जाते थे।
अब आगे लिखा है, मैं उन्हें हर एक हवा की ओर तितर-बितर करूँगा। यहाँ यिर्मयाह उस जाति के तितर-बितर होने की भविष्यद्वाणी करता है। कभी-कभी ऐसा होता है कि शत्रु किसी देश को लूट लेते हैं, तौभी वहाँ के निवासी, अपनी सम्पत्ति से वंचित होकर, वहीं बने रहते हैं और कंगाली में जीवन बिताते हैं।
परन्तु यिर्मयाह घोषणा करता है कि कंगाली के साथ-साथ कोई साधारण निर्वासन भी न होगा, क्योंकि ये शब्द बलपूर्वक कहे गए हैं, मैं उन्हें हर एक हवा की ओर तितर-बितर करूँगा। यहाँ उस प्रजा और भूसी के बीच एक निहित तुलना है; क्योंकि जैसे भूसी हवा के झोंकों से सब दिशाओं में उड़ा दी जाती है, वैसे ही, जैसा यिर्मयाह दिखाता है, उस प्रजा का तितर-बितर होना होगा। और वह छोर के कोनों में रहनेवालों का भी उल्लेख करता है, {,}קצוצי{ }פאהkotsutsi pae जेरोम इन शब्दों का अनुवाद प्रायः “बाल मुँड़ाए हुए” करता है, परन्तु यह बहुत अनुचित है; क्योंकि पहले उल्लिखित अन्य लोगों को इस प्रकार पुकारे जाने का कोई कारण नहीं; क्योंकि यिर्मयाह 7 और यिर्मयाह 25 में यिर्मयाह ने केदारियों की चर्चा नहीं की, तौभी उसने बहुत सी जातियों को {}קצוצי{ }פאהkotsutsi pae कहा। क्रिया {}קצףkotsets, जिससे यह शब्द निकला है, का अर्थ काट डालना है; और {}פאהpae, का अर्थ किसी वस्तु का छोर है।
तो यह वाक्यांश ऐसा ही है मानो वह उन लोगों का उल्लेख करता है जिनकी सीमा किसी छोर या कोने से लगी है। और यह इस स्थान के लिए सबसे उपयुक्त है; क्योंकि यह सम्भाव्य नहीं था कि जो लोग एकान्त कोनों में रहते थे वे इस प्रकार तितर-बितर किए जाएँ। जब शत्रु किसी धनी देश को लूटते हैं, तो लोग सब दिशाओं में इधर-उधर भागते हैं; उदाहरण के लिए, यदि इटली का कोई भाग उजाड़ा जाए, तो लोग उन भागों की ओर भागेंगे जो शरणार्थियों को ग्रहण कर सकें; परन्तु जब कोई जाति किसी दूर के कोने में रहती है, तो शत्रुओं द्वारा खदेड़े जाने पर वह कहाँ जा सकती है? इसलिए भविष्यद्वक्ता निर्वासन के दुःख को और बढ़ाकर बताता है जब वह कहता है कि छोरों पर रहनेवाले लोग भगोड़े हो जाएँगे, यहाँ तक कि वे संसार के सब भागों में तितर-बितर हो जाएँगे।
वह आगे कहता है, और मैं उसकी सब ओर से उनका विनाश ले आऊँगा। वह इसी बात की पुष्टि करता है; क्योंकि जब कोई विपत्ति एक ओर से आती है, तो पड़ोसी सहायता कर सकते हैं; परन्तु जब विपत्ति हर ओर से दबाती है, तब अभागे मनुष्यों का तितर-बितर होना अनिवार्य हो जाता है; और उन्हें कोई दूर का निर्वासन ढूँढ़ना पड़ता है, क्योंकि कोई भाग ऐसा नहीं जो उनका आतिथ्य कर सके। तो यह सब उनके तितर-बितर होने से सम्बन्ध रखता है। इसके बाद लिखा है —
यिर्मयाह 49:33
33. हासोर गीदड़ों का वासस्थान होगा और सदा के लिए उजाड़ हो जाएगा; वहाँ न कोई मनुष्य रहेगा, और न कोई आदमी उसमें टिकेगा।
33. Et erit Hazor in habitationem draconum, vastitas usque in perpetuum (in seculum;) non habitabit illic vir, et non manebit illic (aut, peregrinabitur in ea) filius hominis.
यहाँ यिर्मयाह केदारियों के विषय में अपनी भविष्यद्वाणी समाप्त करता है; वह कहता है कि उनका देश उजाड़ हो जाएगा। भविष्यद्वक्ता प्रायः बोलने की इस रीति का प्रयोग करते हैं, कि निवासियों से छोड़ा हुआ देश अजगरों का वासस्थान बन जाएगा।
और यह इससे भी अधिक दुःखदायी है कि देश खाली पड़ा रहे; क्योंकि जब मनुष्यों के स्थान पर अजगर आ बसते हैं, तो यह भयानक बात है। इसलिए, कि परमेश्वर का न्याय मनुष्यों के मन पर अधिक प्रभाव डाले, भविष्यद्वक्ता प्रायः घोषणा करते हैं कि उजाड़ स्थान अजगरों का निवास बन जाएगा। वह इसी आशय की बात जोड़ता है, वह युग भर के लिए उजाड़ रहेगा: परन्तु {,}עולםoulam, का अर्थ सदाकाल है। और यह जोड़ा गया है, वहाँ कोई पुरुष न बसेगा, और न कोई मनुष्य का सन्तान वहाँ रहेगा। यहाँ सचमुच शब्दों की अधिकता जान पड़ती है, क्योंकि एक ही वाक्य में यह कहना पर्याप्त होता कि देश उजाड़ होगा और उसमें कोई न बसेगा। परन्तु वह पहले उसे अजगरों को सौंपता है: फिर वह जोड़ता है कि वह उजाड़ या सुनसान होगा; और अन्त में वह कहता है कि वहाँ कोई न बसेगा, और इतना ही नहीं, वरन् पुरुष का उल्लेख करके वह मनुष्य का सन्तान भी जोड़ता है। कुछ लोग सचमुच समझते हैं कि पुरुष से कुलीनों की ओर संकेत है, और मनुष्य के सन्तान, अर्थात् आदम के सन्तान, से हमें साधारण लोगों, अर्थात् भीड़, को समझना चाहिए।
परन्तु जैसा हम अन्यत्र कह चुके हैं, यह बहुत अधिक बारीक व्याख्या है। यह एक ऐसा दोहराव है जो प्रभाव को बढ़ाता है, यद्यपि दूसरे वाक्यांश में वह अधिक व्यापक रूप से बोलता है और बात को अधिक स्पष्टता से व्यक्त करता है, मानो उसने कहा हो कि मानव जाति में से कोई भी उस देश का निवासी न बनेगा। अब आगे लिखा है —
यिर्मयाह 49:34-35
34. यहूदा के राजा सिदकिय्याह के राज्य के आरम्भ में यहोवा का यह वचन यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता के पास एलाम के विषय में पहुँचा: 407 दोनों वाक्यांशों के अन्तर को ब्लेनी ने अपने अनुवाद में उचित रीति से भिन्न किया है, — वहाँ कोई पुरुष न बसेगा, और न कोई मनुष्य का सन्तान उसमें परदेशी होकर टिकेगा। — सं.
34. Qui fuit sermo Jehovae ad Jeremiam, prophetam, contra Elam, principio regni Zedechiae, regis Jehudah, dicendo,
35. सेनाओं का यहोवा यों कहता है: मैं एलाम के धनुष को जो उनके पराक्रम का मुख्य कारण है, तोड़ूँगा।
35. Sic dicit Jehova exercituum, Ecce ego frango arcum Elam, principium fortitudinis ipsorum.
एलाम से कुछ व्याख्याकार फारस को समझते हैं, और यही सबसे प्रचलित मत है।
परन्तु मैं समझता हूँ कि एलामी वही लोग नहीं थे जो फारसी थे; मैं तो यह कहना अधिक पसन्द करता कि वे पार्थी थे, यदि लूका, प्रेरितों के काम 2:9 में, उन्हें पार्थियों से भिन्न जाति न ठहराता। साथ ही, जैसा मुझे जान पड़ता है, यह मानना उचित नहीं कि एलाम से सामान्य रूप से फारसियों का बोध होता है; क्योंकि फारसी यहूदियों से दूर थे, और यहूदियों को उस जाति से कभी कोई हानि नहीं पहुँची थी। इसलिए भविष्यद्वक्ता के पास उन पर दण्ड की घोषणा करने का कोई कारण न था। एलिमाइस देश मादियों की सीमा से लगा हुआ और फारसियों से सटा हुआ जाना जाता था। परन्तु उस जाति ने अवश्य यहूदियों के विरुद्ध अश्शूरियों और कसदियों का साथ दिया होगा। सो जब बाबुलियों ने उन्हें सहायकों के रूप में रखा था, तो परमेश्वर का अभिप्राय था कि अपनी प्रजा के प्रति किए गए अन्याय का पलटा ले। इसके अतिरिक्त, प्लिनी भी एलामियों के विषय में कहता है कि वे नबातियों से सटे हुए थे; परन्तु वे मानो फारस और यहूदिया के बीच के स्थान में रहते थे। वे सचमुच, जैसा वह अन्यत्र दिखाता है, समुद्रतटवासी जाति थे; क्योंकि वह एलिमाइस की चर्चा तो प्रायः करता है, परन्तु एलामियों का नाम केवल एक बार लेता है। चाहे जो हो, वे फारसियों के समान पूर्वी लोग थे, परन्तु यहूदिया से उतने दूर नहीं थे; और क्योंकि वे, जैसा कहा गया है, मादियों के निकट थे, इसलिए सम्भावना यही है कि वे कलीसिया के शत्रुओं के साथ मिल गए, जब नबूकदनेस्सर अपने साथ वे विशाल सेनाएँ लेकर चला जो उसने हर स्थान से इकट्ठी की थीं, ताकि वह अपना राज्य दूर-दूर तक फैलाए; क्योंकि हम आगे देखेंगे कि परमेश्वर एलामियों से अत्यन्त अप्रसन्न था। इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि वे चुनी हुई प्रजा के, जिसका पक्ष परमेश्वर यहाँ लेता है, घोर विरोधी थे।
नाम के विषय में इतना ही: इसलिए जब यिर्मयाह यहाँ एलामियों की चर्चा करता है, तो हम जान लें कि एक विशेष जाति की ओर संकेत है, जो फारसियों से भिन्न है, और फिर यह कि इस जाति ने यहूदियों पर अत्याचार करने में कसदियों की सहायता की। अब हम देखें कि भविष्यद्वक्ता उनके विषय में क्या घोषणा करता है।
वह पहले कहता है कि यह वचन उसके पास सिदकिय्याह के राज्य के आरम्भ में पहुँचा।
तो नबूकदनेस्सर ने यहूदियों को बहुत सताया, जबकि वे तब भी अपने हठ में बने रहे; और सम्भव है कि एलामी कसदी सेना का एक भाग थे।
इसलिए जब यहूदियों ने विचार किया कि उनके शत्रु कितने प्रकार के थे, और जब उन्हें यह आशा न थी कि उन्हें कभी दण्ड मिलेगा, तो यह एक ऐसी परीक्षा थी जिसने भक्तों के मन को अवश्य बहुत व्याकुल किया होगा। तो जो बात यिर्मयाह ने घोषित की, उसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था, अर्थात् यह कि एलामी दण्ड से न बचेंगे, क्योंकि उन्होंने राजा नबूकदनेस्सर के झण्डे तले चुनी हुई प्रजा पर ऐसे क्रोध से आक्रमण किया था। तो यही कारण था कि भविष्यद्वक्ता ने समय का उल्लेख किया: अर्थात् यह वचन सिदकिय्याह के राज्य के आरम्भ में आया।
408 वे शेम के पुत्र एलाम के वंशज थे, उत्पत्ति 10:22। अब्राम के दिनों में वे एक शक्तिशाली राज्य थे, उत्पत्ति 14:1। यशायाह उनके विषय में इस्राएल की प्रजा के शत्रुओं के रूप में कहता है, यशायाह 22:6। कहा गया है कि शूशन एलाम प्रान्त में था, दानिय्येल 8:2 — सं.
तब परमेश्वर पहले घोषणा करता है कि वह एलाम का धनुष तोड़ देगा। हम जानते हैं कि पार्थी और अन्य पूर्वी लोग बहुत निपुण धनुर्धारी थे; क्योंकि हर एक जाति युद्ध के सम्बन्ध में अपनी विशेष श्रेष्ठता रखती है। कुछ लोग एक प्रकार के शस्त्रों के प्रयोग में निपुण होते हैं, और कुछ दूसरे प्रकार के। प्राचीन काल में इतालवियों में हल्की पैदल सेना की बड़ी प्रतिष्ठा थी; गॉल लोग कवचधारी घुड़सवारों में श्रेष्ठ थे।
यद्यपि अब सब बातें बदल गई हैं, तौभी हर एक जाति युद्ध की अपनी विशेष कला में दूसरों से भिन्न है। इतिहासकार साक्षी देते हैं कि पूर्वी लोग धनुष और तीर के प्रयोग में बहुत निपुण थे। तो कोई आश्चर्य नहीं कि भविष्यद्वक्ता इस जाति के धनुष की चर्चा करता है, और उसे उनके पराक्रम का मुख्य भाग कहता है, क्योंकि वे इस प्रकार की लड़ाई में श्रेष्ठ थे। पार्थियों से रोमी सचमुच बहुत डरते थे; वे भागने का बहाना करते थे, और फिर लौटकर अपने शत्रुओं पर प्रचण्ड आक्रमण करते थे।
उनके पास विष में बुझे हुए तीर भी थे। इन्हीं साधनों से उन्होंने बड़ी-बड़ी सेनाओं को जीत लिया।
क्योंकि रोमी अपने भाले रख देते थे और आमने-सामने हाथों-हाथ लड़ते थे, और, यों कहें, डटकर युद्ध करते थे; परन्तु जब पार्थी लगातार तीर चलाते रहते थे, तो रोमी उनसे लड़ने में लगभग सदा असफल रहते थे। मैं इसका उल्लेख इसलिए करता हूँ कि हम जान लें कि धनुष को अकारण उनके पराक्रम का मुख्य भाग नहीं कहा गया, क्योंकि इसी के द्वारा वे अन्य जातियों से श्रेष्ठ थे, यद्यपि वे न तो हाथों-हाथ और न खींची हुई तलवारों से लड़ सकते थे। इसके बाद लिखा है —
यिर्मयाह 49:36
36. और मैं आकाश के चारों ओर से वायु बहाकर एलामियों पर लाऊँगा, और उन्हें इन चारों दिशाओं की वायु की ओर तितर-बितर करूँगा; और ऐसी कोई जाति न रहेगी जिसमें एलामी भगोड़े न पहुँचें।
36. Et adducam contra Elam quatuor ventos a quatuor finibus coelorum, et dispergam eos ad omnes ventos istos; et non erit gens ad quem non veniat quispiam profugus (est mutatio numeri, sed quae sensum non obscurat, quispiam ex iis qui expulsi fuerint) ab Elam.
अब वह जोड़ता है कि चार हवाएँ आएँगी, जो सारी प्रजा को छिन्न-भिन्न कर देंगी।
परमेश्वर स्वयं बोलता है, ताकि वचन अधिक प्रबल हो और उसका अधिक भार हो। वह कहता है, मैं चार हवाओं को उभारूँगा। और हम जानते हैं कि जब कभी परमेश्वर को भाता है, वायु क्षण भर में गतिमान हो जाती है; और जब पवित्रशास्त्र परमेश्वर के सामर्थ्य की महिमा करता है, तो वह अकारण हवाओं का उल्लेख नहीं करता; क्योंकि यह कोई छोटा आश्चर्यकर्म नहीं कि सारा संसार अचानक गतिमान हो जाए। अभी तो शान्ति है, और फिर आधे घण्टे में हवाएँ उठती हैं और आकाश के बीच में आपस में टकराती हैं। और परमेश्वर प्रकृति में होनेवाली सामान्य बात की ओर संकेत करता है: जैसे वह अचानक ऐसी हवाएँ उभारता है जो मानो सारे संसार को हिला और कँपा देती हैं, वैसे ही वह कहता है कि वह संसार के चारों छोरों से हवाएँ उठाएगा। परन्तु वह लाक्षणिक रूप में बोलता है; हवाओं से उसका अभिप्राय शत्रुओं से है, जो एलामियों को कुचलने के लिए सब ओर से अपनी शक्तियाँ मिलाएँगे। वह कहता है, मैं संसार के चारों कोनों से एलाम पर चारों हवाएँ लाऊँगा। अन्तिम शब्दों से वह उस बात को अधिक स्पष्ट करता है जो मैंने अभी कही है, कि परमेश्वर उस भयानक सामर्थ्य की ओर संकेत करता है जो प्रतिदिन प्रकृति में हमारी आँखों के सामने प्रकट होता है। सो जैसे हवाओं के उठने पर अचानक परिवर्तन सारी पृथ्वी को अस्त-व्यस्त कर देता है, वैसे ही परमेश्वर घोषणा करता है कि वह आकाश के चारों कोनों से चार हवाओं को उभारेगा। और वह उन्हें आकाश के कोने कहता है; क्योंकि यद्यपि हवाएँ पृथ्वी से उठती हैं, तौभी उनका बहना तब तक अनुभव नहीं होता जब तक वे आकाश के बीच में नहीं चढ़तीं: और यद्यपि कभी-कभी वे बादलों के ऊपर बनती हुई जान पड़ती हैं, तौभी वे पृथ्वी से ही उठती हैं; क्योंकि हवा का मूल ठण्डा और सूखा वाष्प है।
अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता हवाओं की चर्चा क्यों करता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि चार हवाओं से वह कुछ शत्रुओं का बोध कराता है; परन्तु जब तक फारसी साम्राज्य शासन करता और फलता-फूलता रहा, तब तक यह भविष्यद्वाणी पूरी नहीं हुई। तो सम्भव है कि भविष्यद्वक्ता द्वारा घोषित विनाश बहुत युगों के बाद हुआ, अर्थात् तब जब सिकन्दर के सेनापति प्रभुता के लिए आपस में लड़ रहे थे; क्योंकि हम जानते हैं कि जब सिकन्दर ने उन देशों पर धावा किया तब सब पूर्वी लोग कितने भारी संकट में पड़े थे। वह सचमुच एक भयानक आँधी थी। परन्तु क्योंकि उसने पूर्व के साम्राज्य का भोग थोड़े ही समय तक किया, इसलिए जो बात यहाँ भविष्यद्वक्ता ने कही है वह तब पूरी नहीं हुई।
परन्तु बाद में वे देश गृह-युद्धों से फटकर ऐसे दुःखी हो गए कि भविष्यद्वक्ता उन परस्पर विरोधी और उलटी गतियों की तुलना अकारण चार हवाओं से नहीं करता; क्योंकि शत्रुओं के बीच इससे अधिक प्रचण्ड प्रतिस्पर्धा कभी नहीं हुई, और उनमें से हर एक के पास बलवन्त सेनाएँ थीं। तो इसी कारण वह देश एक ही शत्रु से नहीं दबाया गया, वरन् नाना प्रकार की और लगभग अनगिनत विपत्तियों के अधीन कर दिया गया। यही कारण है जो मुझे इस भविष्यद्वाणी की व्याख्या उन विपत्तियों में पूरी हुई के रूप में करने को प्रेरित करता है जो महान सिकन्दर की मृत्यु के बाद आईं।
वह कहता है, मैं उन्हें इन चारों हवाओं की ओर तितर-बितर करूँगा; अर्थात् जैसे एक हवा एक समय फूट निकलती है, और दूसरी दूसरे समय, वैसे ही एलामी इधर-उधर भागेंगे। क्योंकि पूर्व में किसी ने बहुत समय तक शान्तिपूर्वक राज्य नहीं किया, जब तक कि सिकन्दर के लगभग सब सेनापति आपसी मार-काट से नष्ट न हो गए। तब सेल्यूकस ने सीरिया प्राप्त किया, और अत्यन्त क्रूर अत्याचार किया। परन्तु, जैसा मैंने कहा, सेल्यूकस को शान्ति और सुरक्षा प्राप्त होने से पहले, संसार का वह सारा भाग लहू से भर गया था। यही कारण है कि भविष्यद्वक्ता कहता है कि एलामी इन चारों हवाओं की ओर तितर-बितर किए जाएँगे।
पद का अन्त शेष है: और ऐसी कोई जाति न होगी जिसमें एलाम के भगोड़ों में से कुछ न पहुँचें। निश्चय ही हम इतिहासों से यह नहीं दिखा सकते कि जो बात भविष्यद्वक्ता अब कहता है वह कब पूरी हुई; परन्तु सम्भव है कि वह जाति उस समय तितर-बितर हुई जब प्रधान लोग, अर्थात् वे जिन्होंने सिकन्दर के अधीन अधिकार पाया था, प्रभुता के लिए आपस में लड़ रहे थे। साथ ही, यदि हम कहें कि भविष्यद्वक्ता ने अतिशयोक्ति में बात कही, तो इसमें कुछ भी अनुचित न होगा; और निःसन्देह वह उचित सीमा से आगे बढ़ जाता है जब वह कहता है, “ऐसी कोई जाति न होगी जिसमें एलाम के भगोड़ों में से कुछ न पहुँचें।” वह वास्तव में सब पड़ोसी जातियों को समझता है। परन्तु यह भी हो सकता है कि वे आसिया के लोगों के पास न भागे हों, वरन् फारस की खाड़ी की ओर या भारत की ओर चले गए हों। हम पहले ही बता चुके हैं कि परमेश्वर के दास कभी-कभी अपनी शिक्षा में अतिशयोक्तिपूर्ण कथन क्यों लाते थे, अर्थात् इसलिए कि उनका सामना ऐसे मनुष्यों से था जो मन्द और मूर्ख थे, जो परमेश्वर की न सुनते जब वह सरल रीति से बोलता, और जब वह गरजता तब भी कठिनाई से विचलित होते थे। अब आगे लिखा है —
यिर्मयाह 49:37
37. मैं एलामियों को उनके शत्रुओं और उनके प्राण के खोजियों के सामने विस्मित करूँगा, और उन पर अपना कोप भड़काकर विपत्ति डालूँगा, यहोवा की यह वाणी है; और तलवार को उनके पीछे लगा दूँगा, यहाँ तक कि मैं उनका अन्त कर डालूँगा।
37. Et expavefaciam Elam coram hostibus ipsorum, et coram his qui quaerunt animam ipsorum; et adducam super eos malum excandescentiae irae meae, dicit Jehova; et emittam post eos gladium usque dum consumpsero ipsos.
यह पद विशेष रूप से दिखाता है कि एलामी उन लोगों में से थे जिन्होंने परमेश्वर की प्रजा पर निर्दयता से क्रोध भड़काया था, क्योंकि उसने अकारण उनके प्रति अपने पलटे की कठोरता प्रकट नहीं की। तो हमें स्मरण रखना चाहिए कि एलामी परमेश्वर के मुख्य शत्रुओं में से थे, या कम से कम असाधारण रूप से क्रूर थे और मार-काट में आनन्द लेते थे। इसलिए वह कहता है, मैं विस्मित करूँगा, या भयभीत करूँगा, इत्यादि। क्रिया {,}חתתchetat, का अर्थ टुकड़े-टुकड़े करना, या तोड़ना है; इसलिए इसका अनुवाद यह भी किया जा सकता है, “मैं तोड़ूँगा।” जो इसका अनुवाद “मैं गिरा दूँगा” करते हैं, वे consternere, अर्थात् गिरा देना, और consternare, अर्थात् घबरा देना, के बीच का अन्तर जानते हुए नहीं जान पड़ते। परन्तु सबसे उपयुक्त अर्थ यह है कि परमेश्वर एलामियों को भयभीत करेगा, क्योंकि वह पहले उनके भागने और निर्वासन की चर्चा कर चुका था।
फिर वह उनके भय का कारण बताता है, अर्थात् यह कि परमेश्वर उन्हें उनके शत्रुओं के सामने विस्मित और भयभीत करेगा, यहाँ तक कि वे उनके सामने खड़े न रह सकेंगे। इन शब्दों से वह संकेत करता है कि एलामी चाहे कितने ही युद्धप्रिय क्यों न हों, तौभी जब परमेश्वर को उन्हें उनका प्रतिफल देना भला लगेगा, तब वे डटे न रह सकेंगे, क्योंकि मनुष्यों के हृदय उसके हाथ में हैं। सो यद्यपि एलामी वीर थे, तौभी भविष्यद्वक्ता घोषणा करता है कि वे शत्रुओं को देखकर ऐसे कायर हो जाएँगे कि तुरन्त भाग जाएँगे, क्योंकि परमेश्वर उन्हें भयभीत करेगा।
वह आगे जोड़ता है, मैं उनके पीछे तलवार भेजूँगा। इस वाक्यांश से उसका अभिप्राय यह है कि वह उन्हें भयभीत करके ही सन्तुष्ट न होगा, वरन् जब वे भागने लगेंगे, तब वह उन्हें पकड़ लेगा, क्योंकि वह उनका पीछा करेगा, अर्थात् उनके शत्रुओं को उकसाएगा।
और यह बात सदा ध्यान देने योग्य है कि जो कुछ मनुष्यों से होता है उसे परमेश्वर से जोड़ा जाता है, क्योंकि मनुष्य, चाहे वे इसके विषय में कितना ही कम सोचें, तौभी उसके अभिप्राय को पूरा करते हैं, और वे न केवल उसके क्रोध के घोषक, वरन् उसके साधन भी हैं।
परन्तु वह अपने क्रोध की जलजलाहट की विपत्ति का उल्लेख करता है। बोलने की यह रीति सचमुच कठोर जान पड़ती है; परन्तु हम अन्यत्र कह चुके हैं कि भविष्यद्वक्ताओं ने अकारण इन शब्दों को एक साथ नहीं जोड़ा, जो कुछ कठोर जान पड़ते हैं। अब ठीक-ठीक अर्थ में क्रोध परमेश्वर का गुण नहीं है, क्योंकि इस प्रकार की कोई भावना उस पर लागू नहीं होती।
परन्तु जब क्रोध की आग या जलजलाहट का उल्लेख किया जाता है, तो वह मनुष्यों की जड़ता को झकझोरने के लिए उसकी प्रचण्डता को दुगना कर देता है, क्योंकि वे अन्यथा, जैसा मैंने अभी कहा, पूर्ण रूप से संवेदनहीन और उदासीन रहते। संक्षेप में, जलजलाहट से भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय इसके सिवा और कुछ नहीं कि पलटा भयानक है, और सब नश्वर मनुष्यों को चकित कर देना चाहिए, यहाँ तक कि जैसे ही वे सुनें कि परमेश्वर उनसे अप्रसन्न है, वे तुरन्त मानो निर्जीव होकर गिर पड़ें। इस बीच वह वही दिखाता है जो मैंने कहा है, कि परमेश्वर उस प्रजा से अत्यन्त क्रुद्ध था जिसे वह चरम दण्ड की धमकी देता है, क्योंकि वह कहता है, जब तक मैं उनका अन्त न कर डालूँ। हम वही देखते हैं जो मैंने कहा है, कि इस प्रजा को, जैसा दूसरों के विषय में कहा गया है, हल्की ताड़ना नहीं दी गई: इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि उनकी दुष्टता बहुत ही घोर रही थी। तौभी ये दो वाक्यांश परस्पर असंगत जान पड़ते हैं, — कि परमेश्वर एलामियों को सब जातियों में तितर-बितर करेगा, — और कि वह उनका अन्त कर डालेगा, क्योंकि तितर-बितर करना और अन्त कर डालना बहुत भिन्न बातें हैं। परन्तु अन्त कर डालना जाति के समूह या उसके नाम से सम्बन्ध रखता है, मानो उसने कहा हो कि कोई एलामी जीवित न बचेगा, क्योंकि वे दूसरी जातियों में विलीन हो जाएँगे, और भूसी के समान लुप्त हो जाएँगे। आगे लिखा है —
409 “उसके क्रोध की जलजलाहट,” यह “विपत्ति” का समानाधिकरण है। वल्गेट, सीरियाई अनुवाद और तरगुम में भी ऐसा ही है। और मैं उन पर विपत्ति, अर्थात् अपने क्रोध की जलन, लाऊँगा, यहोवा की यह वाणी है। वह विपत्ति परमेश्वर की घोर अप्रसन्नता का फल थी। — सं.
यिर्मयाह 49:38
38. और मैं एलाम में अपना सिंहासन रखकर उनके राजा और हाकिमों को नाश करूँगा, यहोवा की यही वाणी है।
38. Et statuam solium meum in Elam; et perdam illinc regem et principes, dicit Jehova.
वह उस बात की पुष्टि करता है जिसका मैंने अभी उनके अन्त के विषय में उल्लेख किया; परन्तु साथ ही वह यह भी जोड़ता है कि परमेश्वर इस रीति से पलटा लेनेवाला होगा मानो उस देश में उसका न्यायासन स्थापित किया गया हो। वह धमकी देता है कि वह राजा और हाकिमों को नाश करेगा; और, जैसा मैंने समझाया है, यही वह अन्त था; क्योंकि यद्यपि कुछ व्यक्ति जीवित बचे रहें, तौभी उस प्रजा का नाम न बचेगा, और वह सारा वंश, एक जाति के रूप में, लुप्त हो जाएगा।
परन्तु इन शब्दों पर ध्यान देना चाहिए — कि परमेश्वर अपना सिंहासन स्थापित करेगा। परमेश्वर के विषय में कहा जाता है कि वह अपना सिंहासन स्थापित करता है जब वह शासन करता है; परन्तु उसके राज्य को सदा अच्छे अर्थ में नहीं लेना चाहिए। उचित रूप से परमेश्वर के विषय में कहा जाता है कि वह विश्वासियों के बीच शासन या राज्य करता है, जिनका वह अपने आत्मा के द्वारा संचालन करता है। सो परमेश्वर का राज्य तब आरम्भ होता है और उसका उद्गम तब होता है जब नया जन्म होता है। परन्तु कभी-कभी, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, परमेश्वर के विषय में कहा जाता है कि वह अपने शत्रुओं के बीच राज्य करता है, जैसा हम मिस्रियों के विषय में देख चुके हैं। तो उसने तब अपना सिंहासन स्थापित किया जब उसने एलामियों पर अपना लिखित न्याय पूरा किया, क्योंकि यद्यपि एलामी अन्धे थे, तौभी परमेश्वर का सामर्थ्य वास्तव में प्रकट हुआ, और परिणाम के द्वारा उसने सिद्ध किया कि वह उस प्रजा का राजा था जिसकी दुष्टता को उसने इतनी कठोरता से दण्डित किया। संक्षेप में, जैसे परमेश्वर के विषय में कहा जाता है कि वह चुप रहता है, सोता है, या लेटा रहता है, जब वह अपना पलटा नहीं लेता; वैसे ही इस स्थान में उसके विषय में कहा गया है कि वह अपना सिंहासन स्थापित करता है जब वह न्यायी का पद निभाता है। आगे लिखा है —
यिर्मयाह 49:39
39. परन्तु यहोवा की यह भी वाणी है, कि अन्त के दिनों में मैं एलाम को बँधुआई से लौटा ले आऊँगा।
39. Et erit in posteritate dierum (hoc est, diebus sequentibus, vel successu dierum) convertam (vel, reducam) captivitatem Elam, dicit Jehova.
यहाँ परमेश्वर भविष्यद्वाणी की कठोरता को कम करता है, क्योंकि वह अन्त में कुछ एलामियों को इकट्ठा करके पुनः स्थापित करेगा, ताकि वे फिर से कुछ स्थान या प्रतिष्ठा प्राप्त करें। वह यह नहीं कहता कि दिनों के अन्त में, वरन् बहुत दिनों के बाद, समय बीतने पर ऐसा होगा कि मैं एलाम की बँधुआई को लौटा लाऊँगा। यदि पूछा जाए कि यह कब पूरा हुआ, तो निःसन्देह इतिहास में उस जाति के पुनःस्थापन का कोई वृत्तान्त नहीं मिलता।
परन्तु निःसन्देह भविष्यद्वक्ता यहाँ एलामियों को वही आशा देता है जो उसने पहले अन्य जातियों को दी थी, अर्थात् यह कि वे मसीह को अपना सिर मानकर उसके अधीन फिर से एक किए जाएँगे।
सो यद्यपि बाद में एलामी प्रसिद्ध न रहे, तौभी उन्होंने जान लिया कि यह बात व्यर्थ नहीं कही गई थी; और न पवित्र आत्मा अकारण लूका के मुख से उनका उल्लेख उन अन्य लोगों के बीच करता है जो मसीह की ओर फिरे थे। (प्रेरितों के काम 2:9।) क्योंकि यद्यपि एलामी लगभग अज्ञात थे, तौभी वह उन्हें मादियों और पार्थियों के साथ जोड़ता है, “पार्थी और मादी और एलामी।” तो यही वह समय था जिसकी भविष्यद्वाणी यिर्मयाह ने की थी, जब उसने कहा था कि एलामी फिर से इकट्ठे किए जाएँगे, ताकि वे सदा के लिए बन्धुए न रहें। और यद्यपि वे उस समय अपने देश को न लौटे हों, तौभी जब उन्हें कलीसिया में नाम और स्थान मिला, तो वह दशा संसार की हर दूसरी आशीष के भोगने से कहीं उत्तम और अधिक वांछनीय थी। और हम जानते हैं कि मसीह के विषय में कहा गया है कि परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी दोनों में बिखरी हुई सब वस्तुओं को उसके हाथ के अधीन इकट्ठा करेगा। (कुलुस्सियों 1:20।) इस बिखराव का एक भाग एलामियों पर परमेश्वर का पलटा था।
तो दूसरों के साथ एलामी भी इकट्ठे किए गए हैं; और इस प्रकार परमेश्वर ने उस समय मानो मध्यस्थ मसीह के द्वारा उनकी ओर अपना हाथ बढ़ाया, और उनके लिए अनन्त जीवन की आशा का द्वार खोल दिया।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, जैसे तू ने निराश मनुष्यों को, जब तू उन पर न्यायपूर्वक और अत्यन्त क्रुद्ध था, कुछ शान्ति प्रदान करके अनुग्रह किया, — वैसे ही ऐसा अनुग्रह कर कि जब कभी हम आज के दिन तेरे क्रोध को भड़काएँ, तब हम साथ ही तेरी पितृतुल्य दया का स्वाद भी चखें, और तेरी शरण लेना, और तेरे एकलौते पुत्र पर अपनी आशा रखना सीखें, जिससे हम कभी निराश न हों, वरन् सदा उस एकत्रीकरण की बाट जोहते रहें, जिसका आरम्भ अब दिखाई देता है, और जिसकी अन्तिम और पूर्ण सिद्धि स्वर्ग में हमारी बाट जोह रही है, उसी मसीह हमारे प्रभु के द्वारा। — आमीन।
