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यिर्मयाह 20
पचहत्तरवाँ व्याख्यान
अध्याय 20 यिर्मयाह 20:1-2 1. जब इम्मेर का पुत्र पशहूर, जो याजक और यहोवा के भवन का प्रधान अधिकारी भी था, उसने यिर्मयाह को ये भविष्यद्वाणियाँ करते सुना,
1. Et audivit Phassur filius Immer sacerdos et ipse praefeetus erat (dux) in Templo (in aede) Jehovae, Jeremiam vaticinantem (prophetantem) hos sermones:
2. तब पशहूर ने यिर्मयाह नबी को मारा, और उसे उस काठ में डाल दिया जो बिन्यामीन के ऊपरवाले फाटक में था, जो यहोवा के भवन के पास था।
2. Et percussit Phassur Jeremiam Prophetam, et posuit eum in cippum (vel, in carcerem; sed mihi magis placet nomen carceris) qui erat in porta
Benjamin superiore, quae spectabat ad aedem Jehovae.
यिर्मयाह यहाँ बताता है कि उसे अपनी भविष्यद्वाणी का कैसा प्रतिफल मिला था, — अर्थात् उसे मारा गया और बन्दीगृह में डाला गया, और यह न राजा ने किया, न उसके दरबारियों ने, वरन् एक याजक ने जिसके हाथ में मन्दिर का प्रबन्ध था। यह एक भारी और कड़वी परीक्षा थी जब परमेश्वर के दास ने देखा कि पवित्र पद के एक व्यक्ति के द्वारा, जो उसी के गोत्र का और उसका सहकर्मी था, उसके साथ ऐसी निर्दयता का व्यवहार किया गया; क्योंकि जो याजक उस समय पद पर थे वे बिना अधिकार के नियुक्त नहीं हुए थे, क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें चुना था। इसलिए जब उनका अधिकार व्यवस्था पर और परमेश्वर की अटल आज्ञा पर आधारित था, तो यिर्मयाह का बहुत भयभीत हो जाना स्वाभाविक था; क्योंकि उसके मन में यह विचार आ सकता था, — “परमेश्वर का अभिप्राय क्या हो सकता है? उसने लेवी के गोत्र के याजकों को अपने मन्दिर पर और अपनी सारी प्रजा पर ठहराया है। तो फिर वह अपने आत्मा के द्वारा उन पर शासन क्यों नहीं करता? वह उन्हें उनके पद के योग्य क्यों नहीं बनाता?
वह अपने मन्दिर को, और उस पवित्र पद को जिसकी वह अपनी व्यवस्था में हमसे इतनी अधिक सराहना करता है, इस प्रकार अपवित्र क्यों होने देता है? या कम से कम वह मेरी रक्षा के लिए अपना हाथ क्यों नहीं बढ़ाता, जो मैं भी एक याजक हूँ और सच्चे मन से अपनी बुलाहट में लगा हुआ हूँ?” क्योंकि हम जानते हैं कि परमेश्वर अपनी व्यवस्था में, इस बात के प्रमाणस्वरूप कि याजकों के पास सर्वोच्च अधिकार था, यह आज्ञा देता है कि जो कोई उनकी बात न माने वह मार डाला जाए।
(व्यवस्थाविवरण 17:12।) “तो जब परमेश्वर की यह इच्छा थी कि याजकों को इतना अधिकार और सामर्थ्य दिया जाए, तो उसने अपने अनुग्रह के द्वारा उनकी अगुवाई क्यों नहीं की, ताकि वे उन्हें सौंपे गए पद को विश्वासयोग्यता से पूरा करें?”
और इस परीक्षा से केवल यिर्मयाह ही विचलित और डाँवाडोल नहीं हुआ, वरन् वे सब भी जो उस समय सच्चाई से परमेश्वर की उपासना करते थे। भक्तों की संख्या सचमुच थोड़ी थी; परन्तु निश्चय ही ऐसा कोई न था जो ऐसे दृश्य को देखकर चकित न हुआ हो।
पशहूर महायाजक नहीं था, यद्यपि वह याजकों की पहली श्रेणी का था; और सम्भव है कि उसका पिता इम्मेर महायाजक था, और वह उसका प्रतिनिधि था, जो उसके स्थान पर मन्दिर के शासक के रूप में काम करता था। चाहे जो हो, इसमें सन्देह नहीं कि वह न केवल लेवियों से, वरन् अपनी श्रेणी के अन्य याजकों से भी बड़ा था। अब यह व्यक्ति, जो उसी श्रेणी और उसी कुल का था, यिर्मयाह के विरुद्ध उठ खड़ा हुआ, और उसने एक सहयाजक को न केवल शब्दों से दोषी ठहराया, वरन् उसके साथ घोर दुर्व्यवहार किया, क्योंकि उसने नबी को मारा। यह उसके पद के अयोग्य था, और पवित्र सहभागिता के अधिकारों के विरुद्ध था; क्योंकि यदि यिर्मयाह का पक्ष बुरा भी होता, तौभी एक याजक को अधिक नम्र मार्ग अपनाना चाहिए था; वह उसे बन्दीगृह में डाल सकता था, ताकि यदि वह दोषी पाया जाए तो बाद में उसे दण्ड की आज्ञा दी जाए। परन्तु उसे मारना किसी याजक का काम नहीं था, वरन् किसी अत्याचारी, किसी गुण्डे, या किसी उन्मत्त मनुष्य का काम था।
इससे हम सीख सकते हैं कि उस समय बातें कितनी अव्यवस्था में थीं; क्योंकि एक सुव्यवस्थित समाज में न्यायी किसी मनुष्य को मारने के लिए अपने न्यायासन से कूद नहीं पड़ता, चाहे वह सौ मृत्युदण्डों के योग्य ही क्यों न हो, क्योंकि जो विधिसम्मत है उसका ध्यान रखा जाना चाहिए। अब यदि एक न्यायी, जिसे परमेश्वर ने तलवार से सुसज्जित किया है, इस प्रकार अपने क्रोध को खुली छूट नहीं दे सकता और बिना विवेक के तलवार नहीं चला सकता, तो निश्चय ही यह याजक के पद से सर्वथा असंगत बात है। तब उस समय बातों की दशा अवश्य ही अत्यन्त अव्यवस्थित रही होगी, जब एक याजक ने इस प्रकार अपने आप को कलंकित किया। और उसके उतावले क्रोध से हम यह भी समझ सकते हैं कि उस समय भले मनुष्य बहुत थोड़े थे। वह मन्दिर का अध्यक्ष होने के लिए चुना गया था; तो वह न केवल अपने पद में, वरन् लोगों की प्रतिष्ठा में और किसी प्रकार के सद्गुणों के होने में भी दूसरों से बढ़कर रहा होगा। परन्तु हम देखते हैं कि वह दुष्ट आत्मा के द्वारा किस प्रकार बहका दिया गया।
इन बातों पर हमें ध्यानपूर्वक विचार करना चाहिए, क्योंकि कभी-कभी ऐसा होता है कि परमेश्वर की कलीसिया में बड़े उपद्रव उठ खड़े होते हैं, और जिन्हें संचालक होना चाहिए वे प्रायः एक अन्धे और, मानो, उन्मत्त जोश में बह जाते हैं। तब हम ठोकर खा सकते हैं, और हमारा विश्वास पूरी रीति से हमें छोड़ सकता है, जब तक कि ऐसा उदाहरण हमारी सहायता न करे, जो स्पष्ट दिखाता है कि पहले के समय में भी विश्वासयोग्य लोग परखे गए थे और ऐसे ही संघर्षों के द्वारा उनके विश्वास का अभ्यास कराया गया था। इसलिए यह व्यर्थ नहीं कहा गया कि पशहूर ने यिर्मयाह को मारा। यदि उसने साधारण लोगों में से किसी को मारा होता, तो यह अधिक सहने योग्य होता, यद्यपि उस दशा में भी यह उसके पद के सर्वथा अयोग्य कार्य होता; परन्तु जब उसने परमेश्वर के दास के साथ, और ऐसे व्यक्ति के साथ जो लम्बे समय से भविष्यद्वक्ता का पद निभा रहा था, उद्दण्डता का व्यवहार किया, तो यह कहीं कम क्षमा योग्य था। इसलिए इस बात पर हमें ध्यान देना चाहिए कि याजक ने परमेश्वर के नबी को मारने का दुस्साहस किया।
4 ब्लेनी जो विवरण देता है वही सबसे सम्भावित है: कि वह अपनी श्रेणी में प्रथम था। याजकों के चौबीस दल थे, जैसा दाऊद ने ठहराया था, 1 इतिहास 24; और प्रत्येक दल का मुखिया अपनी बारी के समय मन्दिर का शासक या अधिकारी होता था। दलों के ये मुखिया निस्सन्देह वे “प्रधान याजक” थे जिनका उल्लेख नये नियम में है, क्योंकि वास्तव में महायाजक केवल एक ही था। उन्हें मन्दिर के “सरदार” भी कहा जाता था। “यहोवा के भवन में प्रधान निरीक्षक” सबसे उपयुक्त अनुवाद है। पूरे पद का अनुवाद इस प्रकार किया जा सकता है, — “जब इम्मेर का पुत्र याजक पशहूर, जब वह यहोवा के भवन में प्रधान निरीक्षक था, यिर्मयाह को ये वचन भविष्यद्वाणी करते सुना, तब पशहूर ने यिर्मयाह को मारा,” इत्यादि। सीरियाई अनुवाद ऐसा ही करता है, और ब्लेनी भी पहले पद को दूसरे पद से इसी प्रकार जोड़ता है। “इम्मेर” का कुल सोलहवाँ दल था। देखिए 1 इतिहास 24:14। “याजक” पशहूर के लिए है, “इम्मेर” के लिए नहीं; और सेप्टुआजिंट, वुल्गेट और अरबी अनुवाद में भी ऐसा ही अनुवाद है, यद्यपि सीरियाई में नहीं। इम्मेर कुल का नाम था। — सं.
फिर आगे यह आता है कि उसके द्वारा यिर्मयाह बन्दीगृह में डाला गया। परन्तु हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि उसने यिर्मयाह पर क्रोधित होने से पहले उसके वचन सुन लिए थे। निस्सन्देह उसे ऐसी भविष्यद्वाणी से प्रभावित होना चाहिए था; परन्तु वह पागल हो गया और इतना ढीठ हो गया कि उसने परमेश्वर के नबी को मारा। इससे प्रकट होता है कि उन लोगों की मूर्खता कितनी बड़ी है जो एक बार इतने कठोर हो गए हैं कि परमेश्वर को तुच्छ जानते हैं; क्योंकि जब परमेश्वर के न्याय की घोषणा की जाती है तो बुरे से बुरे मनुष्य भी भयभीत हो जाते हैं। परन्तु पशहूर ने यिर्मयाह को उस विपत्ति की घोषणा करते सुना जो निकट थी; और तौभी उस चेतावनी का उस पर इसके सिवा और कोई प्रभाव न हुआ कि वह और भी बुरा हो गया। इसलिए जब उसने उसके वचन सुनने के बाद परमेश्वर के नबी पर इस प्रकार हिंसक आक्रमण किया, तो स्पष्ट है कि वह सर्वथा शैतानी क्रोध से अन्धा हो गया था। हम यह भी देखते हैं कि परमेश्वर का तिरस्कार करनेवाले प्रकाश को अन्धकार के साथ मिला देते हैं, क्योंकि पशहूर ने अपनी अभक्ति को एक आवरण से ढाँप लिया, और इसी कारण यिर्मयाह को बन्दीगृह में डाला; क्योंकि इस रीति से उसने दिखाया कि वह मामले की वास्तविकता जानना चाहता है, क्योंकि उसने अगले दिन उसे बन्दीगृह से बाहर निकाला। इस प्रकार अभक्त लोग अपनी अभक्ति के लिए सदा आड़ बनाने का प्रयत्न करते हैं; परन्तु वे कभी सफल नहीं होते। पशहूर का कपट बहुत ही भद्दा था जब उसने यिर्मयाह को बन्दीगृह में डाला, कि बाद में उसे अपना पक्ष रखने के लिए बुलाए, क्योंकि वह उसे पहले ही मार चुका था। इसलिए इस बड़ी उद्दण्डता ने न्याय का हर बहाना छीन लिया। अतः पशहूर का बाद में मामले का निर्णय करने के लिए किसी प्रकार की न्यायिक प्रक्रिया का सहारा लेना अत्यन्त ओछी बात थी।
शब्द {,}מהפכתmephicat का अनुवाद कुछ लोग बेड़ी करते हैं, और कुछ लोग काठ; और वे सोचते हैं कि यह लकड़ी का एक टुकड़ा था, जिसमें एक छेद गर्दन को जकड़ने के लिए और दूसरा पाँवों के लिए होता था। परन्तु मैं नहीं जानता कि यह यहाँ उपयुक्त है या नहीं, क्योंकि यिर्मयाह कहता है कि वह बिन्यामीन के ऊपरवाले फाटक में था। यह बात बेड़ियों, या जंजीरों, या काठ के विषय में ठीक-ठीक नहीं कही जा सकती थी। अतः इससे यह निकलता है कि वह एक बन्दीगृह था। वह बिन्यामीन के फाटक का उल्लेख करता है, क्योंकि वह उस गोत्र का था; क्योंकि हम जानते हैं कि यरूशलेम के एक भाग में बिन्यामीनी रहते थे। उनके दो फाटक थे, और यह पूर्व की ओर का ऊपरवाला फाटक था। वह कहता है कि वह यहोवा के भवन के सामने था; क्योंकि, जैसा भली-भाँति ज्ञात है, मन्दिर के चारों ओर आँगन के अतिरिक्त बहुत से छोटे आँगन भी थे।
5 अनुवादों में भिन्नता है — सेप्टुआजिंट में “काल-कोठरी” है; वुल्गेट में “काठ — nervum”; और सीरियाई में “घेरा” या “परिधि”; परन्तु तर्गुम में “बन्दीगृह” है। यह शब्द दो अन्य स्थानों में आता है, 1 इतिहास 29:26 में, और 2 इतिहास 16:10 में, और वहाँ इसका अनुवाद “बन्दीगृह” किया गया है। वेनेमा इसका अनुवाद “यातना देनेवाला बन्दीगृह” करता है, और जिस क्रिया से यह शब्द निकला है उसे बुरे अर्थ में लेता है, अर्थात् मरोड़ना, और इसलिए यातना देना। सिम्मैकस इस विचार का समर्थन करता है, क्योंकि वह इसका अनुवाद “यातना का स्थान — {ζασανιστήριον}” और “शिकंजा — {στρεζλωτήριον}” करता है। अभिव्यक्ति का रूप इसी विचार के पक्ष में है, “और उसे काठ में डाल दिया,” या शिकंजे पर। और इसी प्रकार यिर्मयाह 29:26 में अनुवाद यह होना चाहिए — “कि तू उसे काठ (या शिकंजे) पर और बन्दीगृह में डाल दे।” यातना का यह यन्त्र किस प्रकार का था, यह ज्ञात नहीं है। बन्दीगृहों के विशेषकर तीन नाम थे — “गोलाई का घर”;({`` )}הסהר“बन्दी रखने का घर”;({)}הכלאऔर “शिकंजे, या काठ, का घर”।({)}המהפכתदेखिए उत्पत्ति 39:20; 1 राजा 22:27; और 2 इतिहास 16:10। परन्तु यहाँ “घर” स्वयं यातना नहीं है। यदि बन्दीगृह अभिप्रेत होता, तो “घर” शब्द, जैसा 2 इतिहास 16:10 में है, उसके पहले रखा जाता। साथ ही यह सम्भव है कि बन्दीगृह वह स्थान था जहाँ शिकंजा या काठ रखा जाता था। — सं.
आगे लिखा है: — यिर्मयाह 20:3 3. दूसरे दिन जब पशहूर ने यिर्मयाह को काठ में से निकाला, तब यिर्मयाह ने उससे कहा, यहोवा ने तेरा नाम पशहूर नहीं, मागोर्मिस्साबीब रखा है।
3. Et accidit postridie (die crastino) ut educeret Phassur Jeremiam e carcere; et dixit ei Jeremias, Non Phassur vocavit Jehova nomen tuum, sed potius terrorem undique.
निस्सन्देह पशहूर ने मामले की जाँच करने के लिए अन्य याजकों को बुलाया। यह सचमुच एक दिखावटी बहाना था, क्योंकि वह ऐसा प्रतीत होता था मानो वह पवित्र नबी को जल्दबाज़ी में, या उसका पक्ष सुने बिना, दोषी ठहराना नहीं चाहता। परन्तु यिर्मयाह केवल संक्षेप में कहता है कि वह बन्दीगृह से बाहर निकाला गया: साथ ही हम यह समझते हैं कि वह छोड़ा नहीं गया था, क्योंकि उसे अपनी भविष्यद्वाणी का कारण बताने के लिए पशहूर के सामने बुलाया गया था।
परन्तु यहाँ नबी दिखाता है कि वह गिराया या निरुत्साहित नहीं हुआ, यद्यपि उसके साथ अत्यन्त अपमानजनक व्यवहार किया गया था; उसने जो घूँसे और कोड़े खाए थे, और अपने बन्दी बनाए जाने को भी, धीरज से सह लिया। हम जानते हैं कि ऐसे अत्याचार सरल और खरे मन के लोगों को इतने कड़वे लगते हैं कि वे उन्हें कठिनाई से सह पाते हैं। परन्तु यिर्मयाह अपने उदाहरण से हमें सिखाता है कि हमारी स्थिरता और दृढ़ता कमज़ोर नहीं होनी चाहिए, चाहे सारा संसार हम पर निन्दा का बोझ लाद दे या हमें लगभग उससे दबा दे। अतः हमें समझना चाहिए कि परमेश्वर के दासों में मन का साहस न घटना चाहिए न कमज़ोर होना चाहिए, चाहे संसार उनके साथ कितनी ही दुष्टता और अपमान से व्यवहार करे। क्योंकि यिर्मयाह जब बन्दीगृह से बाहर आया, तो पहले से अधिक साहस के साथ बोला; और वह संकट की पहुँच से बाहर भी नहीं था। जब कोई विजय पा लेता है तब साहस बढ़ता है, और तब वह सुरक्षित और निश्चिन्त होकर अपने शत्रुओं का उपहास कर सकता है; परन्तु यिर्मयाह अब भी बन्दी था, यद्यपि उसे बन्दीगृह से बाहर लाया गया था, और बाद में उसे फिर वहाँ डाला जा सकता था और पहले से अधिक क्रूरता से उसके साथ व्यवहार किया जा सकता था। परन्तु न तो उस अन्याय ने जो उसने सहा था, और न नये अपमान के भय ने, उसे उस अभक्त याजक पर परमेश्वर के न्याय की घोषणा करने से रोका। ऐसी उदारचित्तता परमेश्वर के सब दासों को शोभा देती है, कि जब संसार उनके साथ अनादर और निन्दा का व्यवहार करे तब वे न लज्जित हों, न ढीले पड़ें, न निरुत्साहित हों; और न उन्हें किसी संकट से डरना चाहिए, वरन् अपने पद के कर्तव्य को पूरा करने में साहसपूर्वक आगे बढ़ते रहना चाहिए।
दूसरी बात यह ध्यान देने योग्य है, — कि परमेश्वर का नबी यहाँ याजकीय पद के उस वैभव की ओर से अपनी आँखें मूँद लेता है, जो अन्यथा उसे परमेश्वर के न्याय की घोषणा करने से रोक सकता था। और इस बात पर ध्यानपूर्वक विचार किया जाना चाहिए; क्योंकि हम जानते हैं कि अभक्त लोग मुखौटों के पीछे छिपते हैं, जैसा आज के समय में पोप और उसके सारे घृणित पादरी-वर्ग के साथ है: क्योंकि वे कैथोलिक कलीसिया के नाम, और सदा के याजकपद, और प्रेरितीय प्रतिष्ठा के सिवा और क्या प्रस्तुत करते हैं? निस्सन्देह पशहूर याजकीय श्रेणी का था; परन्तु पोप-तन्त्र क्या है, इसका पवित्रशास्त्र न तो उल्लेख करता है और न शिक्षा देता है, सिवाय इसके कि वह उसे सर्वथा घृणित और घिनौना ठहराकर दोषी ठहराता है। और लेवीय याजकपद, जैसा मैं कह चुका हूँ, परमेश्वर की व्यवस्था पर आधारित था; तौभी यिर्मयाह ने परमेश्वर की आज्ञा से अगुवाई पाकर याजक को कड़ाई से डाँटने और उसके साथ उसके योग्य व्यवहार करने में संकोच नहीं किया। इसलिए हम भविष्यद्वक्ता के पद को ठीक और विश्वासयोग्यता से तभी पूरा करते हैं, जब हम किसी का पक्षपात नहीं करते, और उन बाहरी मुखौटों की परवाह नहीं करते जिनके द्वारा अभक्त लोग भोले लोगों को धोखा देते हैं, और परमेश्वर के नाम का झूठा दिखावा करते हुए उसके प्रति अहंकारी रहते हैं।
6 मैं इस पद का अनुवाद इस प्रकार करूँगा: — 3. और दूसरे दिन ऐसा हुआ कि पशहूर ने यिर्मयाह को काठ में से निकाला; और यिर्मयाह ने उससे कहा, — पशहूर नहीं यहोवा तेरा नाम पुकारता है, वरन्, चारों ओर भय। मैं {{קראको एक कृदन्त मानता हूँ, न कि भूतकाल की क्रिया। — सं.
अब वह कहता है, यहोवा ने तेरा नाम पशहूर नहीं, वरन् चारों ओर भय रखा है। कुछ लोग इन शब्दों का अनुवाद यों करते हैं, “क्योंकि तेरे लिए चारों ओर भय होगा;” परन्तु यह गलत है, क्योंकि अगले पद में एक कारण दिया गया है जो स्पष्ट करता है कि नबी का अभिप्राय क्या है। निस्सन्देह यिर्मयाह ने पशहूर शब्द के अर्थ का ध्यान रखा, अन्यथा यह कहना निरर्थक और मूर्खतापूर्ण भी होता, “तेरा नाम पशहूर नहीं, वरन् चारों ओर भय कहलाएगा।” व्याख्याकारों ने पशहूर शब्द का अर्थ बढ़ता हुआ प्रधान, या सामर्थ्य फैलानेवाला बताया है, और इसे {,}פשהpeshe से निकाला है, जिसका अर्थ बढ़ना, और सकर्मक रूप में फैलाना है; और वे इसके साथ {,}שר sher शब्द जोड़ते हैं, जिसका अर्थ प्रधान है; और इस प्रकार वे इसका अनुवाद करते हैं, सामर्थ्य फैलानेवाला प्रधान, या बढ़नेवाला प्रधान। परन्तु क्योंकि स्वर-चिह्नों के विषय में कुछ सन्देह है, मैं नहीं जानता कि यह व्युत्पत्ति टिक सकती है या नहीं। मेरा झुकाव इस शब्द को {,}פשחpeshech से निकालने की ओर अधिक है, जिसका अर्थ काटना या तोड़ना है। पवित्रशास्त्र में यह इस अर्थ में केवल एक बार पाया जाता है, परन्तु कसदी भाषा में प्रायः। चाहे जो हो, यिर्मयाह विलापगीत के तीसरे अध्याय में इसे एक बार इसी अर्थ में लेता है। और इसलिए एक रूपक के द्वारा इसका अर्थ खोलना होता है; और {,}א aleph को दूसरे शब्द में मौन माना जा सकता है, ताकि इसका अर्थ हो, वह जो प्रकाश को तोड़ता या खोलता है। जो शब्द आगे आते हैं — “चारों ओर भय” — वे मुझे यही व्याख्या करने के लिए प्रेरित और विवश करते हैं। वह यह नहीं कहता कि वह चारों ओर भय होगा; वरन् यह कि भय उसे घेर लेंगे, {,}מסביבmesabib, यहाँ तक कि बचने का कोई मार्ग न रहेगा। अतः जब पशहूर का नाम सम्मानजनक था, जिसका अर्थ प्रकाश खोलना था, तो वह इसका उल्लेख करता है, (यह वास्तव में एक रूपक है, जिसमें तोड़ने का अर्थ खोलना है:) अतः जब उसका यह नाम था, जिसका अर्थ प्रकाश लाना है, तो यिर्मयाह कहता है, “तू चारों ओर भय कहलाएगा;” अर्थात् ऐसा भय जो सब को इस प्रकार घेर लेता है कि बचना असम्भव है। हम देखते हैं कि प्रकाश के खुलने और उस भय के बीच, जो चारों ओर फैल गया यहाँ तक कि कोई द्वार और कोई बचाव न रहा, यह विरोध अत्यन्त उपयुक्त है; और इसका स्पष्टीकरण आगे आता है:
7 यह शब्द {,{ה से नहीं, वरन् ;{}ח से लिखा गया है; यह “पशहूर (Pashchur)” है। इसलिए पहली व्युत्पत्ति स्वीकार नहीं की जा सकती। वेनेमा इसे ,{}פוש से निकालता है, जिसका अर्थ घमण्डी या उग्र होना है, और ,{}חור से, जिसका अर्थ “श्वेत” या तेजस्वी है; तब इसका अर्थ है, “तेजस्वी प्रधान।” गेटेकर उन लोगों की राय को अधिक पसन्द करता प्रतीत होता है जो इस शब्द को ,{}פש से, अर्थात् फैलाव, और ,{}חור से, अर्थात् पीलापन, निकालते हैं, क्योंकि वह भय फैलाता था, जो अपने चारों ओर के सब लोगों में पीलापन उत्पन्न करता है। इसके स्थान पर, एक भय, जो पीलेपन का कारण है, उसके लिए और उसके सब मित्रों के लिए होगा, जैसा अगले पद में कहा गया है। — सं.
8 केवल वुल्गेट ही इस वाक्यांश को यह अर्थ देता है; सेप्टुआजिंट में “{μέτοικον} — प्रवासी” है, और सीरियाई में “परदेशी और भटकनेवाला।” और फिर चौथे पद में ये दोनों अनुवाद इसके अनुरूप अर्थ देते हैं, “मैं तुझे तेरे सब मित्रों समेत प्रवास (या बँधुआई) में सौंप दूँगा।” यह निर्विवाद है कि “भय” अनूदित यह शब्द ,{}גור से निकला हो सकता है, जिसका अर्थ प्रवास करना, परदेश में घूमना है; हिफिल से बने कृदन्तीय संज्ञा के रूप में इसका अर्थ प्रवासी या परदेशी हो सकता है। इस अर्थ में यह शब्द प्रायः बहुवचन में पाया जाता है। देखिए उत्पत्ति 47:9; निर्गमन 6:4। परन्तु यह वाक्यांश, जैसा यहाँ पाया जाता है, इस पुस्तक में चार बार आता है, जहाँ इसका “चारों ओर भय (या डर)” के सिवा और कोई अर्थ नहीं हो सकता, यिर्मयाह 6:25; यिर्मयाह 20:10; यिर्मयाह 46:5; यिर्मयाह 49:29; और अन्यत्र एक बार आता है, भजन संहिता 31:13 में; जहाँ भी इसका अर्थ प्रसंग से स्पष्ट है।
यिर्मयाह 20:4 4. क्योंकि यहोवा यों कहता है, देख, मैं तुझे तेरे लिए और तेरे सब मित्रों के लिए भय का कारण बनाऊँगा; और वे अपने शत्रुओं की तलवार से गिरेंगे, और तेरी आँखें यह देखेंगी; और मैं सारे यहूदा को बाबुल के राजा के हाथ में कर दूँगा, और वह उन्हें बँधुआ करके बाबुल में ले जाएगा, और उन्हें तलवार से मार डालेगा।
4. Quia sic dicit Jehova, Ecce ego pono to in terrorem tibi et omnibus amicis tuis; et cadent per gladium hostium tuorum, oculi tui videntes, (id est, oculis tuis videntibus,) et totum Jehudah tradam in manum regis Babylonis, et transferet eos (vel, traducet) Babylonem, et percutiet eos gladio.
यहाँ यिर्मयाह और विस्तार से बताता है कि उसने क्यों कहा था कि पशहूर चारों ओर भय होगा, अर्थात् इसलिए कि वह और उसके मित्र भय में पड़ेंगे; क्योंकि वह अपने आप को परमेश्वर के पलटा लेने से दबा हुआ पाएगा, और अन्य सब के लिए एक तमाशा बन जाएगा। संक्षेप में, यिर्मयाह का अभिप्राय यह है कि परमेश्वर का पलटा ऐसा होगा कि वह पशहूर को और अन्य सब को भय से भर देगा; क्योंकि पशहूर स्वयं बच निकलने में असमर्थ होकर परमेश्वर के हाथ को स्वीकार करने के लिए विवश होगा, और अन्य सब भी यही बात देखेंगे। तब वह अपने लिए और दूसरों के लिए एक तमाशा बन गया, क्योंकि वह, चाहे कितना ही कठोर क्यों न हो गया हो, परमेश्वर के पलटे का अनुभव किए बिना नहीं रह सकता था; और यह अन्य सब पर भी प्रकट हो गया।
देख, वह कहता है, मैं तुझे तेरे लिए और तेरे सब मित्रों के लिए भय बनाऊँगा; और वे अपने शत्रुओं की तलवार से गिरेंगे, और तेरी आँखें यह देखेंगी; और सारे यहूदा को मैं हाथ में कर दूँगा, इत्यादि। वह वही दोहराता है जो वह कह चुका था; क्योंकि पशहूर चाहता था कि वह सारे देश का, और विशेषकर यरूशलेम नगर का, संरक्षक समझा जाए। अतः जब उसने लोगों का पक्ष लिया था, मानो वह उन सब का संरक्षक और रक्षक हो, तो यिर्मयाह कहता है कि सब यहूदी बँधुआई में ले जाए जाएँगे, और केवल इतना ही नहीं, वरन् इससे भी अधिक भारी विपत्ति निकट है, क्योंकि जब बाबुल का राजा उन्हें निर्वासन में ले जाएगा, तो वह उन्हें तलवार से भी मारेगा, सचमुच सब को नहीं; परन्तु हम जानते हैं कि उसने राजा को, उसके बच्चों को, और प्रधान लोगों को कड़ा दण्ड दिया, यहाँ तक कि निचली श्रेणी के लोग केवल अपनी अप्रसिद्धि के कारण बच गए; और इस वर्ग के जो लोग बच निकले, क्योंकि वे न कुलीन थे न प्रसिद्ध, वे अपनी दीन दशा के ऋणी थे। आगे लिखा है, — यिर्मयाह 20:5 5. फिर मैं इस नगर के सारे बल को, और उसकी सारी कमाई को, और उसकी सब अनमोल वस्तुओं को, और यहूदा के राजाओं के सारे भण्डार को उनके शत्रुओं के हाथ में कर दूँगा, जो उन्हें लूटेंगे, और उन्हें ले लेंगे, और बाबुल को ले जाएँगे।
5. Et ponam totam fortitudinem urbis hujus, et omnem laborem ejus, et omnem pretiousum ejus, (vel, omnem gloriam,) et omnes thesauros regum Jehudah ponam in manum inimicorum ipsorum, et spoliabunt ipsos et tollent eos et abducent eos Babylonem.
वह उसी विषय को आगे बढ़ाता है, परन्तु जो कुछ उसने कहा था उसकी पुष्टि करने के लिए उसे विस्तार देता है। साथ ही इसमें कोई सन्देह नहीं कि जब पशहूर ने ये भारी धमकियाँ सुनीं तो वह और भी अधिक क्रुद्ध हुआ; परन्तु इस प्रकार सब अभक्तों के रोष को और अधिक भड़काना उचित था। इसलिए चाहे वे सौ बार कोलाहल मचाएँ, हमें स्वतन्त्रता और साहस के साथ सत्य की घोषणा करने से रुकना नहीं चाहिए। यही कारण है कि नबी अब नगर की आनेवाली विपत्ति का और भी पूरा वर्णन करता है।
मैं, वह कहता है, इस नगर का सारा बल सौंप दूँगा, इत्यादि। यह शब्द “बल” कभी-कभी रूपक के रूप में धन या सम्पत्ति के लिए लिया जाता है। तब इस नगर का सारा बल, या सम्पत्ति, और उसका सारा परिश्रम मैं सौंप दूँगा, इत्यादि। यह दूसरा वाक्यांश और भी अधिक भारी है, क्योंकि जो कुछ बड़े परिश्रम से कमाया गया था वह लूट के लिए दिया जाना था; क्योंकि जब कोई बिना परिश्रम के धनी हो जाता है, अर्थात् जब किसी को बिना किसी कष्ट या मेहनत के उत्तराधिकार में धन मिलता है, तो जब संयोग से वह अपने धन से वंचित हो जाता है तो उसे इतना दुःख नहीं होता; परन्तु जिसने जीवन भर के परिश्रम से वह कमाया है जिससे वह जीवन-निर्वाह की आशा रखता है, वह व्यक्ति कहीं अधिक दुःखी होता है और सचमुच वेदना से व्याकुल हो जाता है, जब शत्रु आकर उसकी सारी सम्पत्ति छीन लेते और लूट लेते हैं। इसलिए इसमें कोई सन्देह नहीं कि यहाँ, पवित्रशास्त्र के अन्य भागों की भाँति, “परिश्रम” का उल्लेख विपत्ति को बढ़ाकर दिखाने के लिए किया गया है। फिर वह आगे कहता है, उसकी सब अनमोल वस्तुएँ और यहूदा के राजाओं के सारे भण्डार मैं उनके शत्रुओं के हाथ में कर दूँगा; जो न केवल धन, परिश्रम और भण्डार ले जाएँगे, वरन् स्वयं मनुष्यों को भी, और उन्हें बाबुल ले जाएँगे। शेष कल।
प्रार्थना हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, ऐसा अनुग्रह कर कि हम अपनी हठीली टेढ़ाई से तेरे क्रोध को उत्तरोत्तर न भड़काएँ, वरन् जब कभी तू हमें धमकाए, हम तुरन्त तेरे वचन से डरें और थरथराएँ, और नम्रता की सच्ची आत्मा में तेरी आज्ञा भी मानें, और तेरी धमकियों से ऐसा डरें कि सच्चे पश्चात्ताप के द्वारा तेरे न्याय से पहले ही सचेत हो जाएँ, और इस प्रकार तेरे नाम की महिमा करने का प्रयत्न करें, कि तू हमारा बल और हमारी महिमा ठहरे, और हम न केवल संसार के सामने, वरन् तेरे और तेरे स्वर्गदूतों के सामने भी सचमुच यह घमण्ड कर सकें कि हम वह निज प्रजा हैं जिस पर तू ने अपने लेपालकपन का अनुग्रह किया है, ताकि तू अन्त तक हम में अपने अनुग्रह के कार्य को आगे बढ़ाता रहे, हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा।
9 जिसे कैल्विन और हमारा अनुवाद “बल” कहते हैं, उसका अनुवाद सेप्टुआजिंट भी वैसा ही करता है, {ἰσχὺν}, — वुल्गेट “सम्पत्ति,” — सीरियाई “गढ़,” — और तर्गुम धन। इस शब्द का मूल अर्थ बलवान या दृढ़ होना है; और फिर जो कुछ बलपूर्वक या दृढ़ता से सुरक्षित रखा गया हो — संचित धन, या भण्डार, यहाँ; और जो दो बातें आगे आती हैं वे इस संचित धन की व्याख्या करती हैं, — परिश्रम, या परिश्रम का फल, — उनके वस्त्र; और अनमोल वस्तुएँ, — उनका सोना, चाँदी, और बहुमूल्य रत्न और सामग्री: — 5. और मैं इस नगर का सारा संचित धन, अर्थात् उसके परिश्रम का सारा फल, और उसमें की हर अनमोल वस्तु, — हाँ, यहूदा के राजाओं के सारे भण्डार, उनके शत्रुओं के हाथ में कर दूँगा: और वे उन्हें लूटेंगे और ले लेंगे, और उन्हें बाबुल में पहुँचाएँगे। सब अनुवाद अन्तिम दो पंक्तियों में “उन्हें” को लोगों से जोड़ते हैं, परन्तु तर्गुम उसे पिछली पंक्तियों में बताई गई वस्तुओं से जोड़ता है; परन्तु पहला मत ही ठीक है। अन्तिम क्रिया का अनुवाद “ले जाना” करना, जैसा हमारे अनुवाद में है, ठीक नहीं है; क्योंकि इसका अर्थ आने देना, और इसलिए पहुँचाना है; और यह स्पष्ट रूप से अनुवादों का समर्थन करता है। ब्लेनी की व्याख्या यह है कि “बल” से सेना, “परिश्रम” से कारीगर, और “अनमोल” से समाज का प्रतिष्ठित वर्ग अभिप्रेत है। तब उसे आगे बढ़कर यह भी कहना चाहिए था कि “भण्डारों” से यहूदा के राजा अभिप्रेत थे! परन्तु यह सब कल्पना है, और इस खण्ड के आशय से सर्वथा असंगत है। वे उन्हें “लूटनेवाले” थे; और यदि उनके संचित धन की ओर संकेत नहीं था, तो यह बात कैसे कही जा सकती थी कि उनके शत्रु क्या करेंगे? और फिर, इस मत के अनुसार, राजाओं के भण्डार लूट बनने थे, न कि नगर का संचित धन। लोगों को उनकी सम्पत्ति से वंचित करना भविष्यद्वक्ताओं की सबसे सामान्य धमकियों में से एक था। — सं.
छिहत्तरवाँ व्याख्यान यिर्मयाह 20:6 6. और हे पशहूर, तू और तेरे घर में रहनेवाले सब बँधुआई में जाएँगे; और तू बाबुल में पहुँचेगा, और वहीं मरेगा, और वहीं मिट्टी दिया जाएगा, तू और तेरे सब मित्र भी, जिनसे तू ने झूठी भविष्यद्वाणी की है।
6. Et tu Phashur et omnes habitatores domus tuae (hoc est omnes domestici tui) venietis captivitatem; tu venies Babylonem, et illic morieris, et illic sepeheris, et omnes amici tui, quibus vaticinatus es in mendacio.
अब यिर्मयाह घोषणा करता है कि पशहूर स्वयं इस बात का प्रमाण होगा कि उसने नगर के विनाश और सारे देश के उजड़ने की भविष्यद्वाणी सच्चाई से की थी। उसने पहले ही उसके खोखलेपन को प्रकट कर दिया था; परन्तु अब वह उस मनुष्य को ही सब लोगों के सामने ले आता है; क्योंकि एक उल्लेखनीय उदाहरण प्रस्तुत करना आवश्यक था, ताकि सब जान लें कि परमेश्वर के न्याय से डरना चाहिए था।
यद्यपि उस धोखेबाज़ ने लोगों की चापलूसी की, तौभी यिर्मयाह कहता है कि वह और उसके सब घराने के लोग बँधुआई में ले जाए जाएँगे; अर्थात् सारा परिवार मानो एक तमाशा बन जाएगा, ताकि सब यहूदी देख सकें कि पशहूर मिट्टी में मिला दिया जाएगा। मानो वह कह रहा था, “तो सब यहूदी जान लें कि वह झूठा भविष्यद्वक्ता है।”
परन्तु जो आगे आता है उससे एक प्रश्न उठ सकता था; क्योंकि यिर्मयाह दण्ड के रूप में घोषणा करता है कि पशहूर बाबुल में मरकर वहीं मिट्टी दिया जाएगा; परन्तु उसने पहले कहा था, “मैं उनकी लोथों को आकाश के पक्षियों और पृथ्वी के पशुओं का आहार कर दूँगा;” और अब नबी का उस बात को दण्ड के रूप में प्रस्तुत करना संगत नहीं लगता जो परमेश्वर के उपकारों में गिनी जाती है। इसके उत्तर में, विशेष रूप से यह ध्यान दिया जाए कि परमेश्वर अभक्तों को सदा एक समान, या एक ही रीति से दण्ड नहीं देता। वह चाहता था कि कुछ लोग बिना गाड़े फेंक दिए जाएँ, क्योंकि वे मानवता के उस सामान्य भाग के भी योग्य न थे; परन्तु वह चाहता था कि दूसरे गाड़े जाएँ, परन्तु एक भिन्न उद्देश्य से; क्योंकि वहीं शब्द में बल है, क्योंकि बाबुल को पवित्र देश के विपरीत रखा गया है। जो कोई कनान देश में गाड़े जाते थे, उनके पास अपनी मृत्यु में भी अनन्त निज भाग की एक प्रतिज्ञा-चिह्न थी; क्योंकि, जैसा भली-भाँति ज्ञात है, परमेश्वर चाहता था कि वे जीते जी उस देश का ऐसा आनन्द लें कि स्वर्ग की ओर आशा से देखें। इसलिए कनान देश में गाड़ा जाना मानो परमेश्वर के लेपालकपन का एक दृश्य चिह्न या प्रतीक था, मानो अब्राहम की सब सन्तान उसकी गोद में इकट्ठी की जाती थीं, जब तक कि वे एक धन्य और अमर जीवन में न जी उठें। इसलिए पशहूर बाबुल में गाड़े जाने के द्वारा परमेश्वर की कलीसिया से निकाला हुआ बन गया; क्योंकि यह एक प्रकार का त्याग था, मानो परमेश्वर इस प्रकार खुले रूप में उस पर अपमान का चिह्न लगाता।
यदि यह आपत्ति की जाए और कहा जाए कि यही बात दानिय्येल के साथ, और परमेश्वर के कुछ उत्तम दासों के साथ भी हुई, और कि स्वयं यिर्मयाह मिस्र में गाड़ा गया, जो कहीं अधिक बुरा था; तो हम यह उत्तर देते हैं, — कि जो सांसारिक दण्ड चुने हुए लोगों और परमेश्वर की सन्तानों पर उनकी भलाई के लिए आते हैं, वे उनके विषय में एक प्रकार से अपना स्वभाव बदल देते हैं; यद्यपि, निश्चय ही, यह माना जाना चाहिए कि सब दण्ड परमेश्वर के क्रोध और शाप के प्रमाण हैं। इसलिए इस जीवन में जो भी विपत्तियाँ हम पर आती हैं, उन्हें पाप के फल समझा जाना चाहिए, मानो परमेश्वर उनके द्वारा खुले रूप में दिखाता है कि वह हमसे अप्रसन्न है। यह एक बात है। फिर, जब दरिद्रता, अकाल, रोग, और निर्वासन, और स्वयं मृत्यु भी, अपने आप में देखे जाते हैं, तो हमें सदा कहना चाहिए कि वे परमेश्वर के शाप हैं, अर्थात् जब, जैसा मैं कह चुका हूँ, वे अपने स्वभाव में देखे जाते हैं। परन्तु परमेश्वर इन दण्डों को अपनी सन्तानों के लिए पवित्र कर देता है, जिससे वे उनके लाभ में बदल जाते हैं, और इस प्रकार शाप नहीं रहते। इसलिए जब कभी परमेश्वर घोषणा करता है, “तू बिना गाड़ा रहेगा,” तो कोई आश्चर्य नहीं कि यह अनादर उसके क्रोध का प्रमाण और उसके शाप का सबूत समझा जाए। और फिर, जब कभी उसने पहले यों कहा, “तू पवित्र देश के बाहर गाड़ा जाएगा,” तो यह भी उसके शाप का प्रमाण था, अर्थात् तिरस्कृत लोगों के विषय में। साथ ही परमेश्वर ने अपने चुने हुए लोगों के लिए उस सब को भलाई में बदल दिया जो अन्यथा उनके लिए शाप होता; और इसलिए पौलुस कहता है कि जो विश्वासयोग्य लोग परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उनके लिए सब बातें मिलकर भलाई और लाभ ही उत्पन्न करती हैं। (रोमियों 8:28।)
तो अब हम समझते हैं कि नबी क्यों कहता है कि पशहूर बाबुल में गाड़ा जाएगा; और इसमें कोई सन्देह नहीं कि उस गाड़े जाने में इससे अधिक अपमान था कि उसकी लोथ बाहर फेंक दी जाती और जंगली पशु उसे खा जाते; क्योंकि परमेश्वर उसे ऐसा प्रत्यक्ष बनाना चाहता था कि सब लोग बहुत समय तक उसकी ओर आँखें लगाएँ, जैसा भजन संहिता 59:12 में कहा गया है, “उन्हें घात न कर, हे परमेश्वर, ऐसा न हो कि तेरी प्रजा उन्हें भूल जाए।” अतः परमेश्वर चाहता था कि पशहूर का जीवन और मृत्यु एक स्मारक ठहरे, ताकि लोगों के मन पर अधिक प्रभाव पड़े। साथ ही, यदि गाड़े जाने शब्द को व्यापक अर्थ में लिया जाए, तो इसमें कुछ गलत न होगा, मानो यह कहा गया हो, “वहीं उसकी लोथ पड़ी रहेगी जब तक कि वह सड़ न जाए।”
फिर यिर्मयाह आगे कहता है, तू और तेरे मित्र, जिनसे तू ने झूठी भविष्यद्वाणी की है। यह खण्ड हमें सिखाता है कि जो अभक्त लोग धोखा खाना चाहते हैं, उन्हें उचित प्रतिफल मिलता है, जब वे परमेश्वर की ओर से दोहरा न्याय सहते हैं। तो देखो, वे सब दुष्ट लोग जो ऐसे चापलूसों को ढूँढ़ते हैं जो उनसे अद्भुत बातों की प्रतिज्ञा करते हैं, अपने लिए क्या कमाते हैं! वे इस प्रकार अपने लिए और भी भारी पलटा कमाते हैं। जितना अधिक वे परमेश्वर के न्याय को दूर टालने का प्रयत्न करते हैं, उतना ही अधिक, निस्सन्देह, वे उसे बढ़ाते और भड़काते हैं। यही कारण है कि नबी पशहूर के उन मित्रों पर, जिनसे उसने भविष्यद्वाणी की थी, एक विशेष न्याय की घोषणा करता है; उन्होंने जान-बूझकर उन झूठी प्रतिज्ञाओं को पकड़ लिया था जिनसे उसने उनकी चापलूसी की थी, यहाँ तक कि वे ढिठाई से परमेश्वर का तिरस्कार करने लगे। अतः जब वे अपनी इच्छा से इस प्रकार धोखा खाना चाहते थे, तो यह उचित था कि ये धोखे, जिनके द्वारा वे भविष्यद्वाणी की धमकियों की निन्दा करते थे, और जिन्हें वे प्रायः उनके विरुद्ध ढाल के रूप में खड़ा करते थे, उन पर और भी भारी दण्ड ले आएँ। फिर आगे लिखा है — यिर्मयाह 20:7 7. हे यहोवा, तू ने मुझे धोखा दिया, और मैं ने धोखा खाया; तू मुझ से बलवन्त है, और तू प्रबल हुआ; दिन भर मेरी हँसी होती है, हर कोई मुझे ठट्ठों में उड़ाता है।
10 इस पद को इस प्रकार व्यवस्थित किया जाना चाहिए, — 6. और हे पशहूर, तू और तेरे घर में रहनेवाले सब, तुम बँधुआई में जाओगे: हाँ, तू बाबुल को जाएगा, और वहीं तू मरेगा, और वहीं गाड़ा जाएगा — तू और तेरे सब मित्र, जिनसे तू ने झूठी भविष्यद्वाणी की है। यहाँ इस बात का एक उदाहरण है कि पवित्रशास्त्र में कथन प्रायः कितनी स्वतन्त्र और बिना किसी परिसीमा के ढंग से किए जाते हैं। यिर्मयाह 20:4 में कहा गया है कि “उसके मित्र” तलवार से गिरेंगे; परन्तु यहाँ यह कि वे बाबुल में ले जाए जाएँगे, मरेंगे, और वहीं गाड़े जाएँगे। निस्सन्देह यिर्मयाह के श्रोताओं ने उसकी बात समझी, यद्यपि कोई छिद्रान्वेषी श्रोता उसके विरुद्ध कोई विरोधाभास निकाल सकता था। परन्तु अभिप्राय यह है कि उनमें से बहुत से तलवार से मारे जाएँगे, और उनमें से बहुत से, या जो बचे रहेंगे उनमें से अधिकांश, बँधुआई में ले जाए जाएँगे। एक बड़ी संख्या मारी जानी थी, और एक बड़ी संख्या बन्दी बनाई जानी थी। — सं.
7. Decepisti me, Jehova, et deceptus sum; vim intulisti mihi, itfuisti superior; fui in ludibrium toto die, (vel, quotidie, hoc est, assidue;) omnes subsannant me.
कुछ लोग सोचते हैं कि ये वचन भविष्यद्वाणी के आत्मा के द्वारा नहीं कहे गए, वरन् यिर्मयाह ने इन्हें किसी उतावले आवेग के प्रभाव में बिना सोचे-समझे कह डाला था; जैसे कि अत्यन्त श्रेष्ठ जन भी कभी-कभी उतावले स्वभाव के वश में बह जाते हैं। तब वे यह मानते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने इस प्रकार की परीक्षा से पराजित होकर परमेश्वर से यह शिकायत की, "क्या! हे प्रभु, मैं ने तुझे अगुवा मानकर तेरे पीछे चला; परन्तु तू ने मुझ से वह प्रतिज्ञा की जो मुझे मिलती नहीं: अतः मुझे स्वयं ऐसा लगता है कि मैं धोखा खा गया हूँ।" दूसरे इससे भी कठोर व्याख्या देते हैं, — कि भविष्यद्वक्ता सचमुच धोखा खा गया था, उस वचन के अनुसार जो अन्यत्र कहा गया है, "मुझ यहोवा ने उस भविष्यद्वक्ता को धोखा दिया है।" (यहेजकेल 14:9।) परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि जब वह कहता है कि उसने धोखा खाया, तब उसकी भाषा व्यंग्यपूर्ण है। वह अपने शत्रुओं का रूप धारण करता है, जो यह डींग मारते थे कि वह ढिठाई से नगर की विपत्ति और विनाश की भविष्यद्वाणी करता है, मानो ऐसा कुछ भी होनेवाला न था। भविष्यद्वक्ता यहाँ घोषित करता है कि उसकी शिक्षा का रचयिता परमेश्वर था, और उसके विरुद्ध ऐसा कुछ भी नहीं कहा जा सकता था जो स्वयं परमेश्वर के विरुद्ध न हो; मानो वह कहता हो कि यहूदी व्यर्थ ही संघर्ष कर रहे थे, इस भ्रम में कि वे किसी नश्वर मनुष्य से लड़ रहे हैं; क्योंकि वे खुलेआम परमेश्वर से युद्ध कर रहे थे, और दानवों के समान क्रोध में भरकर स्वयं स्वर्ग पर आक्रमण कर रहे थे। तब वह कहता है कि उसने धोखा खाया, इसलिए नहीं कि वह ऐसा सोचता था; क्योंकि अपने विषय में वह पूर्णतः निश्चिन्त था; और न केवल परमेश्वर का आत्मा उसकी बुलाहट का साक्षी था, वरन् जिस सत्य को वह सुनाता था उसका दृढ़ निश्चय भी उसके हृदय में था। परन्तु जैसा मैं कह चुका हूँ, वह उन लोगों के शब्दों को दोहराता है जो उसकी शिक्षा का विरोध करके इस बात से इनकार करते थे कि वह परमेश्वर का दास है, और उस पर कुछ भी भरोसा नहीं करते थे, मानो वह केवल एक कपटी हो।
परन्तु बोलने का यह ढंग उससे कहीं अधिक प्रभावशाली है जितना यदि वह स्पष्ट शब्दों में कहता, "हे प्रभु, मैं ने धोखा नहीं खाया, क्योंकि मैं ने केवल तेरी आज्ञा का पालन किया है, और जो कुछ मैं ने प्रकट किया है वह सब तुझ ही से पाया है; और न मैं ने ढिठाई से अपने आप को आगे धकेला, और न उस सत्य में मिलावट की जिसका तू ने मुझे प्रचारक ठहराया: इसलिए मैं ने अपना पद विश्वासयोग्यता से निभाया है।" यदि भविष्यद्वक्ता इस प्रकार बोलता, तो उसके शब्दों में उससे बहुत कम बल होता जितना इस बात में है कि वह यहाँ अपनी रीति से उन लोगों की निन्दाओं को उघाड़ देता है जिन्होंने परमेश्वर पर दोष लगाने का साहस किया, और उसके दास को झूठा भविष्यद्वक्ता ठहराकर उसे दोषी बनाया।
अब हम समझते हैं कि उसने क्यों व्यंग्य से बात की, और क्यों स्वतन्त्रता से परमेश्वर से वाद-विवाद किया, कि उसने उसके द्वारा धोखा खाया था; यह इसलिए था कि यहूदी जान लें कि वे अपनी निन्दाएँ किसी नश्वर मनुष्य के विरुद्ध नहीं, वरन् स्वयं परमेश्वर के विरुद्ध उगल रहे थे, जो इतने बड़े अपमान का पलटा लेनेवाला होगा।
यदि कोई पूछे कि क्या भविष्यद्वक्ता को यह शोभा देता था कि वह इस प्रकार परमेश्वर को अपना सहभागी बनाए, तो उत्तर यह होगा, — कि उसका पक्ष परमेश्वर के पक्ष से ऐसा जुड़ा हुआ था कि वह मेल अविभाज्य था; क्योंकि यिर्मयाह यहाँ किसी निजी व्यक्ति के रूप में नहीं बोलता, और साधारण लोगों में से एक के रूप में तो और भी नहीं; परन्तु क्योंकि वह जानता था कि उसकी बुलाहट परमेश्वर की ओर से स्वीकृत है, इसलिए उसने परमेश्वर को अपने साथ जोड़ने में संकोच नहीं किया, जिससे वह निन्दा दोनों की हो। निश्चय ही परमेश्वर को उसके अपने सत्य से अलग नहीं किया जा सकता था; क्योंकि यदि उसे उसके वचन से अलग करके देखा जाए तो उसके पास कुछ भी शेष न रहेगा। इसलिए मनुष्य अपने मन में परमेश्वर का जो भी विचार गढ़ते हैं, जब वे उस दर्पण की उपेक्षा करते हैं जिसमें उसने स्वयं को प्रकट किया है, वह कोरी कल्पना है। इतना ही नहीं, हमें यह जानना चाहिए कि परमेश्वर में जो भी सामर्थ्य, प्रताप और महिमा है, वह उसके वचन में ऐसी चमकती है कि जब तक उसका वचन सुरक्षित और अभ्रष्ट न रहे, तब तक वह परमेश्वर के रूप में प्रकट नहीं होता। अतः जब भविष्यद्वक्ता को निश्चित आज्ञा-पत्र दिया गया था, तो कोई आश्चर्य नहीं कि वह इतने साहस से अपने शत्रुओं का उपहास करता है और कहता है कि यदि उसने धोखा खाया है तो परमेश्वर धोखा देनेवाला था। इसी आशय का वह वचन है जो पौलुस कहता है, "यदि स्वर्ग से कोई दूत उतरकर तुम्हें कोई दूसरा सुसमाचार सुनाए, तो वह स्रापित हो।" (गलातियों 1:8)
निश्चय ही पौलुस स्वर्गदूतों से छोटा था, और हम जानते हैं कि वह इतना ढीठ न था कि स्वर्गदूतों को स्वर्ग से नीचे खींच लाए और उन्हें अपने अधीन कर ले; नहीं, कदापि नहीं; परन्तु उसने इस पर ध्यान नहीं दिया कि वे क्या हो सकते हैं; वरन् क्योंकि सुसमाचार का सत्य, जिसका वह प्रचारक था, उसके हृदय पर मुहर के समान अंकित था, इसलिए उसने उस वचन को सब स्वर्गदूतों से ऊपर उठाने में संकोच नहीं किया। इसी प्रकार अब यिर्मयाह कहता है कि यदि उसने धोखा खाया है, तो परमेश्वर धोखा देनेवाला था: यह कैसे? क्योंकि यदि परमेश्वर अपने वचन के सत्य को नष्ट करे, तो वह अपने आप का इनकार करेगा।
अतः अब हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने उचित सीमा का उल्लंघन नहीं किया, जब उसने अपने आप को इतना ऊँचा उठाने का साहस किया कि वह एक प्रकार से परमेश्वर का सहभागी बन गया, अर्थात् उस सत्य के विषय में जिसका रचयिता परमेश्वर था और वह उसका सेवक।
परन्तु इस खण्ड से एक उपयोगी शिक्षा प्राप्त की जा सकती है। जितने लोग शिक्षा देने निकलते हैं, उन्हें अपनी बुलाहट के विषय में ऐसा निश्चित होना चाहिए कि जब कभी कोई विवाद उठे, तो वे परमेश्वर के न्यायासन के सामने दोहाई देने में संकोच न करें। यह सच है कि परमेश्वर के सर्वोत्तम दास भी कुछ बातों में भूल कर सकते हैं, या अपने निर्णय में सन्देह में पड़ सकते हैं; परन्तु अपनी बुलाहट और शिक्षा के विषय में उनमें वह निश्चयता होनी चाहिए जो यिर्मयाह यहाँ अपने उदाहरण के द्वारा हमें दिखाता है।
इसके बाद वह जोड़ता है, तू ने मुझ पर बल किया। यह कहकर कि उसने धोखा खाया था, उसका अभिप्राय यह था, — "हे परमेश्वर, यदि मैं कपटी हूँ, तो तू ने मुझे ऐसा बनाया है; यदि मैं ने धोखा दिया है, तो तू ने मेरी अगुवाई की है; क्योंकि जो कुछ मेरे पास है, वह सब मैं ने तुझ ही से पाया है; इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यदि मुझ में कुछ भी अनुचित है, तो दोष तेरा है, और तू मुझ से कम निर्दोष ठहरता है।" फिर, जैसा मैं ने कहा, वह इसी बात को विस्तार देता है, — कि परमेश्वर ने उस पर बल किया; क्योंकि उसने भविष्यद्वक्ता के पद का लोभ नहीं किया था, परन्तु विवश होकर उसे ग्रहण किया; क्योंकि जो बोझ उस पर रखा गया था, उसे वह न तो अस्वीकार कर सकता था और न उतार फेंक सकता था। अतः वह दो बातें व्यक्त करता है, — कि वह अपनी कोई कल्पनाएँ नहीं लाया, और न उसने अपनी कही हुई बातों में से कुछ भी गढ़ा, वरन् वह परमेश्वर के आत्मा का साधन रहा, और जो उसने पाया था उसे मानो हाथों-हाथ सौंप दिया: यह एक बात है। और फिर वह जोड़ता है, — कि यदि उसे अपनी स्वतन्त्र इच्छा से चुनने का अवसर होता, तो वह भविष्यद्वक्ता का पद ग्रहण न करता; क्योंकि इस विषय में परमेश्वर की आज्ञा मानने के लिए वह मानो विवशता से खींचा गया था। अब हम यिर्मयाह का अभिप्राय समझते हैं।
यदि कोई पूछे कि क्या भविष्यद्वक्ता का इस प्रकार विवश होकर अपना पद ग्रहण करना प्रशंसनीय समझा जा सकता था; तो इसका सीधा उत्तर यह है, — कि यहाँ कोई सामान्य नियम नहीं ठहराया गया है, मानो सब के लिए इसी प्रकार अनिच्छा से खींचा जाना आवश्यक हो। परन्तु यद्यपि यिर्मयाह इस विषय में निर्दोष न रहा हो, तौभी वह मनुष्यों के सामने उचित रूप से इसकी गवाही दे सकता था। और हम आरम्भ में देख चुके हैं कि जब परमेश्वर ने उसे अपनी कलीसिया का शिक्षक ठहराया, तब उसने यथासम्भव उस सम्मान को अस्वीकार किया; उसने कहा, "हाय, प्रभु! मैं तो बोलना ही नहीं जानता।" (यिर्मयाह 1:6)
अतः यद्यपि वह परमेश्वर के अधिकार से विवश किया गया, और मानो बलपूर्वक ले जाया गया, और यद्यपि इस विषय में उसने यह दिखाया हो कि वह दोष या दुर्बलता से मुक्त न था; तौभी वह अपने शत्रुओं के विरुद्ध उचित रूप से यह तर्क दे सकता था।
फिर वह कहता है कि दिन भर उसकी हँसी होती थी, और सब उसका ठट्ठा करते थे। निस्सन्देह भविष्यद्वक्ता यहाँ यह परखने का प्रयत्न कर रहा था कि क्या लोगों में से कोई भाग अब भी सुधारा जा सकता है; क्योंकि यह सुनना कि परमेश्वर पर झूठ का दोष लगाया गया, कि मनुष्यों की हठ और ढिठाई के कारण भविष्यद्वक्ता का पद व्यर्थ ठहराया गया, उनके मनों को झकझोरने के लिए बहुत उपयुक्त था। इसलिए जब उन्होंने यह सुना, तो यदि उनमें सच्चे धर्म या सही ज्ञान का एक कण भी होता, तो वे निश्चय ही भयभीत हो जाते। अतः भविष्यद्वक्ता यह परखना चाहता था कि क्या कोई ऐसे बचे हैं जो सुधारे जा सकते हों। परन्तु उसका उद्देश्य यह भी दिखाना था कि यदि वे दुष्टता और घमण्ड से उसकी शिक्षा का विरोध करते रहें, तो उनकी दुष्टता का कोई प्रायश्चित नहीं हो सकता।
11 मैं किसी को भी इस पद के विषय में कैल्विन के मत से सहमत नहीं पाता; और न बहुतों को हमारे अनुवाद से सहमत पाता हूँ, जो पहली क्रिया का अनुवाद "धोखा दिया" करता है। सेप्टुआजिंट में भी ऐसा ही है, परन्तु वल्गेट, सुरियानी अनुवाद और तारगुम में "फुसलाया" है। अन्य स्थानों में हमारे अनुवाद में इसका अनुवाद "फुसलाया," "लुभाया," और "मनाया" किया गया है। ब्लेनी में "लुभाया" है, परन्तु गैटेकर और लाउथ "मनाया" को उत्तम मानते हैं; और यह पूर्णतः उस दृष्टिकोण से मेल खाता है जो भविष्यद्वक्ता पहले अध्याय में अपनी बुलाहट के विषय में देता है, जिसकी ओर वह स्पष्टतः संकेत करता है, और इस पद में आगे आनेवाली बात से भी। वह यह पद ग्रहण करने को अनिच्छुक था, परन्तु परमेश्वर ने उससे जो कहा, उसके द्वारा वह ऐसा करने को प्रेरित किया गया। इस विषय में धोखे जैसी कोई बात न थी; क्योंकि परमेश्वर ने उसे पहले ही उन कठिनाइयों के विषय में बता दिया था जिनका उसे सामना करना पड़ेगा। और फिर वह जोड़ता है कि उस पर "बल किया गया," जिसे मैं अगली क्रिया का अर्थ मानता हूँ। तर्कों और प्रतिज्ञाओं के द्वारा उसे मनाया गया था, और अधिकार के द्वारा विवश किया गया था। मैं इस पद का अनुवाद इस प्रकार करूँगा, — 7. हे यहोवा, तू ने मुझे मनाया, और मैं मान गया; तू ने मुझ पर बल किया, और प्रबल हुआ: मैं दिन भर हँसी का पात्र बन गया हूँ; उसके सब लोग मेरा ठट्ठा कर रहे हैं। "उसके" का संकेत उस नगर की ओर है जहाँ वह था, और जिसके विषय में वह पिछले अध्याय के अन्त में बोलता है; क्योंकि यह अध्याय उसी वृत्तान्त का क्रम मात्र है। नगर के भाग्य के विषय में जो वह वहाँ बताता है, उसने पशहूर का ध्यान खींचा और उसके क्रोध को भड़काया। पशहूर ने जो किया उसका वर्णन करने के बाद, यिर्मयाह यहाँ अपनी शिकायतें प्रकट करता है। ब्लेनी अन्तिम पंक्ति का अनुवाद इस प्रकार करता है, और हॉर्सली उसका समर्थन करता है, — उपहास ने अपना सारा बल मुझ पर लगा दिया है। सब अनुवाद और तारगुम {,{כלה को क्रिया नहीं, वरन् ``सब,'' अर्थात् हर एक, का बोधक मानते हैं; और प्रस्तावित अनुवाद अति-सूक्ष्म है। — सं.
और हमें इस पर ध्यानपूर्वक विचार करना चाहिए; क्योंकि यह खण्ड केवल इसलिए नहीं लिखा गया कि हम परमेश्वर के भय की शिक्षा पाएँ; वरन् पवित्र आत्मा सब तिरस्कार करनेवालों के विरुद्ध निरन्तर घोषणा करता है, और खुलेआम उन पर दोष लगाता है कि वे परमेश्वर पर झूठ और छल का दोष लगाकर उसका घोर अपमान करते हैं। तो आइए हम जान लें कि यहाँ उन सब अधर्मी मनुष्यों पर भयानक दण्ड की घोषणा की गई है जो परमेश्वर के वचन को तुच्छ जानते और उसका ठट्ठा करते हैं; क्योंकि पवित्र आत्मा यिर्मयाह के मुख से, जैसा मैं कह चुका हूँ, परमेश्वर के न्यायासन के सामने खुलेआम घोषित करता है कि वे परमेश्वर को झूठा ठहराते हैं। इसके बाद यह आता है, — यिर्मयाह 20:8-9 8. क्योंकि जब से मैं बोला, तब से मैं चिल्लाता रहा, मैं ने उपद्रव और लूट की दोहाई दी; क्योंकि यहोवा का वचन दिन भर मेरे लिए निन्दा और ठट्ठे का कारण हुआ।
8. Quia ex quo locuutus sum, vociferor violentiam et vastationem clamo; quia fuit sermo Jehovae mihi in opprobrium et in contumeliam toto die (vel, quotidie, assiduè, ut dictum est.)
9. तब मैं ने कहा, मैं उसकी चर्चा न करूँगा, और न फिर उसके नाम से बोलूँगा। परन्तु उसका वचन मेरे हृदय में ऐसा हुआ मानो मेरी हड्डियों में बन्द की हुई धधकती आग हो, और मैं सहते-सहते थक गया, और मुझ से रहा न गया।
9. Et dixi (itaque dixi, copula enim illativam valet) non recordabor et non loquar amplius in nomine ejus; et fuit in corde meo quasi ignis ardens, clausus in ossibus meis, et fatigatus sum ferendo et non potui.
भविष्यद्वक्ता यहाँ कहता है कि उसे अपने परिश्रम का कोई फल नहीं मिला, वरन् इसके विपरीत उसने देखा कि उसके सारे प्रयत्नों और चेष्टाओं का उलटा परिणाम हुआ; क्योंकि उन्होंने सब यहूदियों को चिढ़ा दिया, उनके क्रोध को भड़का दिया, और उन्हें पाप करने में और भी अधिक स्वच्छन्दता की ओर धकेल दिया। इसलिए वह कहता है कि उसने अपने को सौंपा गया पद छोड़ देने का विचार किया, परन्तु एक गुप्त प्रेरणा के द्वारा वह दृढ़ बने रहने को विवश किया गया, और इस प्रकार वह उस मार्ग से हटने के लिए स्वतन्त्र न था जिस पर वह चल पड़ा था।
परन्तु इस पद की व्याख्या विभिन्न प्रकार से की जाती है; जब से मैं बोला, तब से मैं ने ऊँचे स्वर से उपद्रव की दोहाई दी और विनाश का प्रचार किया। कुछ लोग इन शब्दों को इस प्रकार लेते हैं, मानो यिर्मयाह कहता हो कि जब से उसने शिक्षा देना आरम्भ किया, तब से वह शिकायतें करता रहा; क्योंकि उसने देखा कि उस पर हिंसा से आक्रमण किया गया और वह सब प्रकार के अन्याय का शिकार बना: परन्तु यह दृष्टिकोण मुझे बहुत फीका प्रतीत होता है। दूसरे लोग सत्य के अधिक निकट आते हैं जो उसे यह कहते हुए मानते हैं कि जब उसने देखा कि लोगों में सब प्रकार की दुष्टता प्रबल है, तब वह अत्याचारों और लूटमार के विरुद्ध पुकारना बन्द न कर सका; मानो वह कहता हो, "मैं उन्हें नम्रता और शान्ति से शिक्षा न दे सका, क्योंकि उनके स्वभाव और मनोवृत्ति ने मुझे रोका, परन्तु उनकी दुष्टता ने मुझे उनसे कठोरता से व्यवहार करने को विवश किया, जैसे परमेश्वर के सब दासों को बुद्धिमानी से विचार करना चाहिए कि कलीसिया की दशा क्या माँगती है।" निश्चय ही यदि हम शान्त समय में ऊँचे स्वर से पुकारें, तो यह पागलपन-भरा दिखावा होगा; और बहुत से लोग यही करते हैं, जो बिना सोचे और बिना किसी कारण के सदा बड़ा शोर मचाते हैं; परन्तु जब हम शैतान को राज्य करते देखते हैं, तब हमें चुप नहीं रहना चाहिए और न ऐसे व्यवहार करना चाहिए मानो युद्धविराम हो; वरन् क्योंकि यह खुला युद्ध है, इसलिए ऊँचे स्वर से पुकारना आवश्यक है। अतः जो यह दृष्टिकोण अपनाते हैं, वे समझते हैं कि यिर्मयाह ने ऊँचे स्वर से इसलिए पुकारा, क्योंकि उसने देखा कि लोग हठीले हैं, और यह भी देखा कि स्थिति इतनी बिगड़ चुकी थी कि अत्यन्त तीक्ष्णता और प्रचण्डता के बिना उसे सही दशा में लौटाया नहीं जा सकता था।
परन्तु मैं यह अधिक उचित समझता हूँ कि भविष्यद्वक्ता की परीक्षा दूसरे प्रकार की थी, — कि वह अपनी पुकारों के द्वारा परमेश्वर के और भी बड़े पलटे को नीचे बुला रहा था; मानो वह कहता हो, "मैं अपने प्रचार के द्वारा परमेश्वर को हथियार क्यों दूँ? क्योंकि मैं उसके क्रोध को बढ़ाने के सिवा और कुछ नहीं करता, जो अन्त में गरज उठेगा और लोगों समेत सारे देश को भस्म कर देगा।" तब वह कहता है कि उसने ऊँचे स्वर से उपद्रव और विनाश की दोहाई दी, क्योंकि अधर्म स्वयं एक प्रकार की शत्रुतापूर्ण हिंसा है जिससे परमेश्वर को क्रोध दिलाया जाता है। अभिप्राय यह है कि भविष्यद्वक्ता ने अपने परिश्रम का और कोई फल नहीं देखा, केवल यह कि मनुष्य और भी उद्दण्ड हो गए, और चोर से डाकू बन गए, और तिरस्कार करनेवाले से उपद्रवी बन गए, यहाँ तक कि उन्होंने परमेश्वर के क्रोध को और अधिक भड़काया, और अपने आप को और भी पूर्णता से त्याग दिया। यह निश्चय ही अत्यन्त कठोर और खतरनाक परीक्षा थी; इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि भविष्यद्वक्ता कहता है कि उसके मन में शिक्षक के पद से हट जाने का विचार आया।
अब यह खण्ड विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है; क्योंकि केवल शिक्षक ही नहीं, वरन् बिना किसी अपवाद के सब भक्त जन इस भावना से प्रभावित होते हैं। क्योंकि जब हम देखते हैं कि मनुष्य परमेश्वर के वचन के द्वारा मानो और भी बुरे बनाए जाते हैं, तब हम सन्देह करने लगते हैं कि क्या यह उचित नहीं होगा कि परमेश्वर का सारा स्मरण गाड़ दिया जाए और उसका वचन बुझा दिया जाए, इसकी अपेक्षा कि मनुष्यों की स्वच्छन्दता बढ़ाई जाए, जो पहले ही पाप करने की ओर पर्याप्त झुके हुए हैं। निश्चय ही हम आज के दिन देखते हैं कि सुसमाचार की शिक्षा सब को आज्ञाकारिता में नहीं लौटाती; वरन् बहुत से लोग अपने आप को और भी बेलगाम स्वच्छन्दता दे देते हैं, मानो अनुशासन का जूआ पूरी तरह हटा दिया गया हो। पोप-तन्त्र के अधीन कुछ भय था, कुछ प्रकार की आज्ञाकारिता और अधीनता थी; और अब सुसमाचार की स्वतन्त्रता बहुतों के लिए पशुवत् स्वच्छन्दता के सिवा और क्या है, जिससे वे बेखटके पाप करते हैं और आकाश और पृथ्वी को एक में मिला देते हैं। कुछ और भी हैं जो इतने विवादों को देखकर, उसी बहाने से, धर्म की सारी चिन्ता और उस पर सारा ध्यान त्याग देते हैं। कुछ ऐसे उन्मादी हैं जो परमेश्वर के अस्तित्व पर सन्देह करने और यहाँ तक कि उसका इनकार करने की भी छूट ले लेते हैं। अतः जब हम देखते हैं कि सत्य का प्रभाव वैसा नहीं है जैसा चाहा जा सकता है, तो जो लोग अन्यथा दृढ़ हैं, वे भी अवश्य ही डगमगा जाते या लड़खड़ाने लगते हैं। इसलिए इस खण्ड पर और भी अधिक ध्यान देना चाहिए; क्योंकि यिर्मयाह स्वीकार करता है कि जब उसने देखा कि परमेश्वर का वचन ठट्ठे का विषय बन गया है, तब वह अत्यन्त व्याकुल हुआ, और इसलिए वह अपनी बुलाहट के मार्ग से हट जाना चाहता था। हम जान लें कि जब कभी ऐसी बात हमारे मन में आए, तो हमें वीरता से उसका सामना करना चाहिए; और इसलिए यहाँ कही गई दोनों बातों को जोड़ना चाहिए, क्योंकि जब उसने कहा, मैं फिर उसकी चर्चा न करूँगा, और न उसके नाम से बोलूँगा, तब उसने यह भी जोड़ा, परन्तु परमेश्वर का वचन धधकती आग के समान था।
इससे हम देखते हैं कि परमेश्वर ने अपने दास को कैसे थामे रखा, कहीं ऐसा न हो कि वह सिर के बल गिर पड़े, या अपनी परीक्षा के नीचे दब जाए; क्योंकि यदि परमेश्वर ने उसे सुरक्षित न रखा होता, तो वह मानो अचानक किसी गहरी खाई में खिंच जाता। इसलिए जब कभी इस प्रकार की परीक्षाएँ हमारे सामने आएँ, तो हम परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह हमें थामे और सम्भाले; या यदि हम पहले ही गिर चुके हों, तो उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उठाए और अपने आत्मा के द्वारा हमें दृढ़ करे।
परन्तु वह मार्ग दिखाया गया है जिसके द्वारा परमेश्वर ने अपने दास की सहायता की: परमेश्वर का वचन उसके हृदय में धधकती आग के समान हो गया; और वह उसकी हड्डियों में भी बन्द था, जिससे वह प्रचण्ड उत्साह से प्रेरित होता था, और अपने पद के मार्ग पर आगे बढ़े बिना वह अपने आप में न रह सकता था। वह यह कहकर समाप्त करता है कि वह रोकते-रोकते थक गया, अथवा कठिनाई से अपने आप को सह सकता था; मानो वह कहता हो कि न तो शिक्षा देने से रुके रहना उसके वश में था, और न वह करना जो परमेश्वर ने आज्ञा दी थी; क्योंकि एक धधकती उमंग उसे आगे बढ़ने को विवश करती थी; और फिर भी निस्सन्देह उसकी दृष्टि में वे तिरस्कार करनेवाले थे जिनसे उसका पाला पड़ा था। अतः यह वैसा ही है मानो वह कहता हो कि उसने अनुभव कर लिया था कि सारे संसार का अपने विरुद्ध होना क्या होता है, परन्तु परमेश्वर प्रबल हुआ। अब यह इसलिए कहा गया, क्योंकि अधर्मी मनुष्य निश्चिन्त और उदासीन होने का अवसर इस कल्पना से लेते हैं कि भविष्यद्वक्ता और शिक्षक भावनाहीन मनुष्य हैं, — "ओह, हमें उन उन्मादियों की क्या चिन्ता जिनमें साधारण भावनाएँ भी नहीं? और कोई आश्चर्य नहीं कि जब वे मूर्ख और संवेदनहीन हैं, तो वे इस प्रकार क्रोधी और उग्र होते हैं, सब दूसरों की अवहेलना करते हैं, और मानवीय कुछ भी अनुभव नहीं करते।" अतः जब वे परमेश्वर के दासों को विवेकहीन बताते हुए यह कल्पना करते हैं कि वे मनुष्य लकड़ी के ठूँठ हैं, तो भविष्यद्वक्ता मानो कहता है, "निश्चय ही तुम धोखे में हो, क्योंकि मैं ऐसा लोहा नहीं कि प्रबल और अनेक भावनाओं से प्रभावित न होऊँ; वरन् मैं ने सीखा है और मैं जानता हूँ कि मेरी दुर्बलता कितनी बड़ी है, और मैं इसे छिपाता नहीं कि मैं भय, शोक और अन्य मनोवेगों के अधीन हूँ; परन्तु परमेश्वर प्रबल हुआ है। अतः तुम्हारे लिए यह सोचने का कोई कारण नहीं कि मैं इतने साहस से इसलिए बोलता हूँ कि मैं कुछ भी मानवीय अनुभव नहीं करता; वरन् मैं ने ऐसा कठिन संघर्ष के बाद किया है, जब वे सब बातें मेरे मन में आईं जो मेरे हृदय के साहस को दुर्बल करने के योग्य हैं; तौभी परमेश्वर ने मेरी ओर अपना हाथ बढ़ाया, और केवल इतना ही नहीं, वरन् मुझ पर बल किया गया, कहीं ऐसा न हो कि मैं अपने लिए कुछ भी श्रेय लूँ, या अपने वीरोचित साहस पर घमण्ड करूँ। मैं प्रबल नहीं हुआ, वह कहता है, परन्तु जब मैं ने अपने आप को परमेश्वर के अधीन किया और अपनी बुलाहट को छोड़ देना चाहा, तब मुझ पर बल किया गया, और परमेश्वर ने मुझ से सामर्थ्य के साथ व्यवहार किया, क्योंकि उसका वचन मेरे हृदय में धधकती आग के समान हो गया, यहाँ तक कि अन्त में आत्मा के प्रबल प्रभाव से मैं अपने पद के निर्वाह में आगे बढ़ने को विवश हुआ।"
इसलिए मैं ने कहा, मैं फिर उसकी चर्चा न करूँगा, और न उसके नाम से बोलूँगा; इसलिए नहीं कि भविष्यद्वक्ता चाहता था कि वह स्वयं या दूसरे परमेश्वर को भूल जाएँ, परन्तु इसलिए कि उसने सोचा कि उसका सारा परिश्रम व्यर्थ जा रहा है, और वह व्यर्थ ही हलचल मचा रहा है, क्योंकि वह बिना किसी लाभ के ऊँचे स्वर से पुकारता था, और केवल इतना ही नहीं, वरन् वह दुष्टों को और भी अधिक चिढ़ाता था; जैसे फोड़े को जितना अधिक दबाया जाए, उतना ही अधिक पीप निकलता है; वैसे ही जब भविष्यद्वक्ता ने उन पापों को डाँटा जो पहले छिपे हुए थे, तब लोगों का अधर्म और भी अधिक प्रकट होता गया।
तो आइए, अब हम भविष्यद्वक्ता के उदाहरण से सीखें कि जब कभी शैतान या हमारा शरीर आपत्ति उठाए और कहे कि हमें स्वर्गीय सत्य का प्रचार करना छोड़ देना चाहिए क्योंकि वह अपने उचित और यथार्थ फल उत्पन्न नहीं करता, तौभी वह परमेश्वर के सामने सुगन्ध है, यद्यपि अधर्मियों के लिए घातक है। अतः यद्यपि सुसमाचार का सत्य बहुतों के लिए मृत्यु की गन्ध ठहरता है, तौभी इस कारण हमारा परिश्रम परमेश्वर के सामने निर्मूल्य नहीं है; क्योंकि हम जानते हैं कि हम परमेश्वर को ग्रहणयोग्य बलिदान चढ़ाते हैं; और यद्यपि हमारा परिश्रम मनुष्यों के लिए व्यर्थ हो, तौभी वह परमेश्वर की महिमा के लिए फलदायक है; और जब हम नाश होनेवालों के लिए मरने के निमित्त मृत्यु की गन्ध हैं, तब भी परमेश्वर के लिए, इस विषय में भी, हमारा परिश्रम ग्रहणयोग्य है। (2 कुरिन्थियों 2:16)
12 आठवें पद का आरम्भ सातवें पद के अन्त से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है। सुरियानी अनुवाद भी ऐसा ही प्रतीत होता है। तब आठवें पद का शेष भाग नौवें पद के साथ मिल जाएगा। इससे सारे खण्ड में संगति आ जाती है। मैं दिन भर हँसी का पात्र बन गया हूँ; उसके सब लोग मेरा ठट्ठा कर रहे हैं, 8. जब कभी मैं बोलता हूँ, तो उपद्रव के विरुद्ध पुकारता हूँ, या विनाश का प्रचार करता हूँ। क्योंकि यहोवा का वचन मेरे लिए दिन भर निन्दा और उपहास का कारण हुआ, 9. इसलिए मैं ने कहा, "मैं उसकी चर्चा न करूँगा, और न फिर उसके नाम से बोलूँगा;" परन्तु वह मेरे हृदय में ऐसा हो गया मानो मेरी हड्डियों में बन्द धधकती आग हो; और मैं रोकते-रोकते थक गया और मुझ से रहा न गया। — सं.
हम यह भी सावधान रहें कि कहीं हम अपने आप को परमेश्वर से अलग न कर लें; वरन् जब बहुत सी बातें हमारे मार्ग में बाधा डालने को आएँ, तब भी हम आत्मा की सामर्थ्य से उन पर विजय पाएँ। साथ ही हम डरते रहें कि कहीं अपने आलस्य से हम उस उत्साह को गाड़ न दें जिसकी चर्चा भविष्यद्वक्ता करता है। हम देखते हैं कि योना के साथ क्या हुआ; वह इतना गिर गया था कि उसने अपना पद पूरी तरह त्याग दिया, और जहाँ तक उससे हो सका, परमेश्वर के न्याय-वचन को बुझा दिया; और जब वह भगोड़ा बना, तब उसने सोचा कि वह खतरे से बाहर है, मानो वह परमेश्वर के सम्मुख से दूर हो गया हो। (योना 1:3।) निश्चय ही परमेश्वर ने उसे देखा, परन्तु तौभी उसका वचन उसमें धधकती आग के समान न था। अतः जब इतने बड़े मनुष्य ने अपने आलस्य से, जहाँ तक उससे हो सका, पवित्र आत्मा की ज्योति को बुझा दिया, तो हमें कितना अधिक डरना चाहिए कि कहीं वैसा ही हमारे साथ न हो? तो आइए, हम इस उत्साह की चिनगारियों को तब तक जगाते रहें जब तक वह हमें प्रज्वलित न कर दे, जिससे हम विश्वासयोग्यता से अपने आप को पूर्णतः परमेश्वर की सेवा में समर्पित करें; और यदि किसी समय हम आलसी हो जाएँ, तो अपने आप को उकसाएँ, और पवित्र आत्मा की सामर्थ्य ऐसी नई हो जाए कि हम अन्त तक अपने पद के मार्ग पर चलते रहें और कभी ठहर न जाएँ, वरन् सारे संसार का भी सामना करें, यह जानते हुए कि परमेश्वर हमें वह आज्ञा देता है और हम से वह माँगता है जिसे दूसरे अस्वीकार करते और दोषी ठहराते हैं।
प्रार्थना हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अनुग्रह कर कि जैसे आज के दिन किसी भी युग की अपेक्षा अधिक बड़ा और अधिक घृणित अधर्म फूट निकलता है, और तेरे पवित्र सत्य का शैतान के बहुत से दास ठट्ठा करते हैं, — हाँ, अनुग्रह कर कि हम तौभी निरन्तर उसमें स्थिर बने रहें, और सब अधर्मियों के प्रकोप का सामना करने में संकोच न करें, और तेरे आत्मा की सामर्थ्य पर भरोसा रखकर उनसे तब तक संघर्ष करते रहें जब तक वह सत्य, जिसे तू ने एक समय अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा, और अन्त में अपने एकलौते पुत्र के द्वारा प्रकट किया, और जिस पर उसके लहू से मुहर लगाई गई, अपना पूरा अधिकार प्राप्त न कर ले; कि जैसे वह बहुतों के लिए अनन्त मृत्यु की गन्ध ठहरता है, वैसे ही वह हमारे लिए अनन्त उद्धार का बयाना भी हो, जब तक कि हम उसी तेरे पुत्र यीशु मसीह के आगमन पर तेरे राज्य में इकट्ठे न किए जाएँ। — आमीन।
सतहत्तरवाँ व्याख्यान यिर्मयाह 20:10 10. क्योंकि मैं ने बहुतों के मुँह से अपनी निन्दा सुनी, चारों ओर भय ही भय है। वे कहते हैं, उसकी सूचना दो, और हम उसकी सूचना देंगे। मेरे सब जान-पहचानवाले मेरे लड़खड़ाने की बाट जोहते थे, और कहते थे, कदाचित् वह फुसलाया जाए, तब हम उस पर प्रबल होंगे, और उस से अपना पलटा लेंगे।
10. Quia audivi contumeliam multorum, terrorem undique, Nuntiate et nuntiabimus: omnis vir (id est, omnes homines, homo pacis, ad verbum, {}אנושomnes homines) pacis meae (id est, familiares mei, qui debuerant colere mecum amicitiam), observant latus meum (vel, claudicationem, metaphorice et melius,) si forte erret, et praevaleamus ei, et sumamus ultionem nostram ex eo.
यिर्मयाह उसी विषय को आगे बढ़ाता है, और परमेश्वर के सामने अपने शत्रुओं पर दोष लगाता है, — कि उन्होंने लज्जाजनक रीति से उसके साथ विवाद किया, यद्यपि वह ऐसे व्यवहार के योग्य न था, क्योंकि उसने यथासम्भव उनकी भलाई को सुरक्षित करने का प्रयत्न किया था। तब वह कहता है कि उसने बहुतों की, अथवा जैसा इसका अनुवाद भी किया जा सकता है, बड़े लोगों की निन्दा सुनी थी; परन्तु पहला अनुवाद अधिक उपयुक्त है, क्योंकि तुरन्त बाद यह आता है कि चारों ओर भय था, मानो सब ने एक मत होकर उस पर आक्रमण किया हो। तब वह कहता है कि वह चारों ओर भय से घिरा हुआ था, क्योंकि उसने देखा कि सारी भीड़ उसके विरोध और शत्रुता में खड़ी थी, और वह अकेला खड़ा था। वह यह भी कहता है कि उसके शत्रु उसकी घात में लगे थे, और उसे नष्ट करने के अवसर ढूँढ़ते थे।
सूचना दो, और हम उसे सूचना देंगे। यहाँ वह उनका रूप धारण करता है और बताता है कि उन्होंने क्या करने की सम्मति की। निस्सन्देह वह यहाँ प्रधानों और याजकों को बोलनेवालों के रूप में प्रस्तुत करता है, जो उस पवित्र जन पर दोष लगाने के उपाय रच रहे थे; क्योंकि हम जानते हैं कि इस प्रकार के षड्यन्त्रों में साधारणतः क्या किया जाता है; निकम्मे लोग इधर-उधर दौड़ते हैं और हर छोटी बात को खोज निकालते हैं; फिर वे अपनी सूचना लाते हैं, और उसी से दोषारोपण गढ़ा जाता है। अतः क्योंकि प्रधानों और याजकों की प्रतिष्ठा के यह अनुकूल न था कि वे इधर-उधर दौड़ें और जो भी मिले उससे पूछें कि यिर्मयाह ने क्या कहा था, इसलिए वे बैठे रहे और दूसरों को भेजा, और कहा, "जाओ और हमें सूचना दो, और तब हम राजा को सूचना देंगे।" क्योंकि यहाँ "राजा" शब्द को समझ लेना चाहिए, क्योंकि सर्वनाम बिना किसी पूर्ववर्ती संज्ञा के रखा गया है; तो आओ और सूचना दो, और हम उसे सूचना देंगे। अब हम समझते हैं कि यिर्मयाह किस बात की शिकायत करता था, अर्थात् यह कि उसके न केवल बहुत से शत्रु थे जो उस पर झूठे दोष लगाते थे, वरन् ऐसे लोग भी थे जो छल से उसे फँसाना चाहते थे।
और वह इससे भी बुरी बात जोड़ता है, — कि उसके साथ यह अन्यायपूर्ण व्यवहार न केवल परदेशियों या उन लोगों द्वारा किया गया जो खुलेआम उसके शत्रु थे, वरन् उसके अपने मित्रों या सम्बन्धियों द्वारा भी; क्योंकि इब्रानी लोग घर के लोगों और सम्बन्ध से जुड़े हुओं को मेल के मनुष्य कहते थे; "मेरा मेल का मनुष्य, जिस पर मैं भरोसा रखता था," यह अभिव्यक्ति भजन संहिता 41:9 में प्रयुक्त हुई है; परन्तु यह ऐसा मुहावरा है जो प्रायः आता है। संक्षेप में, यिर्मयाह का अभिप्राय यह है कि वह न केवल एक प्रकार से शत्रुओं की विशाल संख्या से दबा हुआ था, वरन् वह मित्रों से भी रहित था, क्योंकि उन्होंने विश्वासघात करके उसे पकड़वा दिया। वह कहता है कि वे उसकी पसली, अर्थात् उसके लड़खड़ाने की ताक में रहते थे। कुछ लोग इसका अनुवाद "टूटना" करते हैं; परन्तु लड़खड़ाना या दुर्बलता सबसे उपयुक्त है; और यह रूपक अत्यन्त सटीक है; यह पसली या बगल से लिया गया है, और जो लँगड़ाते हैं या दुर्बलता के कारण डगमगाते हैं, वे कभी इस ओर, तो कभी उस ओर झुकते हैं। अतः यिर्मयाह कहता है कि वे उसकी ताक में रहते थे; कदाचित् वह भटक जाए, वह फिर से उनके नाम से बोलता है, "आओ, हम देखते रहें कि क्या वह लड़खड़ाएगा या मार्ग से भटक जाएगा; और तब हम उस पर प्रबल होंगे।"
संक्षेप में, इन शब्दों से हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि परमेश्वर का यह पवित्र दास न केवल घोषित शत्रुओं द्वारा खुलेआम सताया गया, वरन् उन मनुष्यों द्वारा भी छल से और विश्वासघात के साथ उसकी ताक की गई जो उसके मित्र होने का दिखावा करते थे, जबकि वे उसके सबसे बुरे शत्रु थे। अतः यदि इस समय कपटी मनुष्य गुप्त साधनों से हम पर आक्रमण करें, और दूसरे खुलेआम हमारा विरोध करें, तो हम जान लें कि हमारे साथ कोई नई बात नहीं हुई; क्योंकि इन्हीं दो रीतियों से परमेश्वर ने यिर्मयाह को परखा। हम यह भी देखते हैं कि अधर्मियों के लिए झूठे दोष लगाने का कोई न कोई बहाना पकड़ लेना साधारण बात थी; क्योंकि ज्योंही भविष्यद्वक्ता अपना मुँह खोलते, वे कुछ भी ऐसा न कह पाते थे जिसका तुरन्त उलटा अर्थ न लगाया जाता; और इसी कारण मीका ने शिकायत की कि उस पर भी ऐसी ही चाल से आक्रमण किया गया, क्योंकि जब वह कठोरता से बोला, तब सब चिल्ला उठे कि वह लोगों में उपद्रव मचाता है, और नई-नई बातों के सिवा कुछ नहीं चाहता, जिससे नगर और राज्य की दशा को अस्त-व्यस्त करके वह सब कुछ विनाश में डाल देगा। (मीका 2:6।) अतः यदि परमेश्वर हमें ऐसे षड्यन्त्रों के द्वारा परखे जाने दे, तो हम ऐसे अपमान को अधीन और शान्त मन से सहें; क्योंकि कोई भी भविष्यद्वक्ता इस प्रकार के कष्ट और क्लेश से मुक्त नहीं रहा।
फिर उन्होंने कहा, आओ, हम उस से अपना पलटा लें, मानो सचमुच उनके पास पलटा लेने का कोई कारण हो! क्योंकि यिर्मयाह ने क्या किया था? उसने किस बात में उन्हें ठेस पहुँचाई थी? अतः यद्यपि उनके साथ कोई अन्याय नहीं हुआ था, तौभी वे पलटा लेना चाहते थे! परन्तु कोई आश्चर्य नहीं कि अधर्मी और परमेश्वर का तिरस्कार करनेवाले ऐसा बोलते थे; क्योंकि हम जानते हैं कि जब कभी उनके घावों को छुआ जाता, तब वे अपने आप को घोर रूप से आहत समझते थे; क्योंकि वे ताड़नाओं को, चाहे वे कितनी ही न्यायसंगत और आवश्यक क्यों न हों, निन्दा समझते थे। इसी कारण उनके क्रोध ने उनमें पलटा लेने की इच्छा भड़का दी, यद्यपि उनके साथ कोई अन्याय नहीं किया गया था। इसके बाद वह जोड़ता है, — यिर्मयाह 20:11 11. परन्तु यहोवा एक पराक्रमी और भयंकर वीर के समान मेरे साथ है: इस कारण मेरे सतानेवाले ठोकर खाएँगे, और प्रबल न होंगे: वे बहुत लज्जित होंगे; क्योंकि वे सफल न होंगे: उनका सदा का अपमान कभी भुलाया न जाएगा।
11. Atqui Jehova mecum tanquam gigas fortis (aut, terribilis;) propterea persecutores mei ruent, et non praevalebunt; pudefient valde, quia non prudenter agunt, (vel, non prospere succedet illis;) opprobrium seculi (id est, perpetuum, subaudiendum est, quod) non oblivioni tradetur.
13 इस पद के विषय में प्राचीन अनुवादों में अधिक सहमति नहीं है, और न तारगुम में; और आधुनिक व्याख्याकार भी कुछ भिन्न मत रखते हैं, यद्यपि सामान्य अर्थ स्पष्ट है, और कैल्विन ने उसे अत्यन्त स्पष्टता से दिया है। मैं वह अनुवाद दूँगा जिसे मैं सबसे शाब्दिक मानता हूँ, — सचमुच मैं ने बहुतों की बकवाद सुनी है, — "चारों ओर भय, इसका प्रचार करो, हम भी इसका प्रचार करेंगे:" वे सब मनुष्य जो मुझ से मेल रखते हैं, मेरे लड़खड़ाने की बाट जोहते हैं, — "कदाचित् वह फुसलाया जाए; तब हम उस पर प्रबल होंगे, और उस से अपना पलटा लेंगे।" ग्रोटियस और ब्लेनी दोनों {,{`` כי का अनुवाद ``सचमुच,'' अर्थात् निश्चय ही, करते हैं, और इस पद को अगले पद से जुड़ा हुआ मानते हैं। दूसरी पंक्ति में स्पष्टतः उस नाम की ओर संकेत है जो पशहूर को दिया गया था: भीड़ उपहास के रूप में उस नाम को दोहराती थी। कोक्सेयस और ब्लेनी इसी अर्थ के अनुसार इस पंक्ति का अनुवाद करते हैं। ``वे सब मनुष्य,'' इत्यादि, शब्दशः, ``मेरे मेल का हर एक मनुष्य,'' अर्थात् जो उससे मेल रखता है; ये वे लोग थे जो उसके मित्र प्रतीत होते थे, यद्यपि वास्तव में वे उसके शत्रु थे, और उसके पतन का षड्यन्त्र रच रहे थे, और वह भी उसे उसके मार्ग से फुसलाकर हटाने का प्रयत्न करके। — सं.
यहाँ भविष्यद्वक्ता अपने विरुद्ध रचे गए सब षड्यन्त्रों के सामने परमेश्वर की सहायता को खड़ा करता है। अतः चाहे एक ओर विश्वासघाती मित्र गुप्त रूप से उसे फँसाने का प्रयत्न करें, और दूसरी ओर खुले शत्रु सार्वजनिक रूप से उसका विरोध करें, तौभी उसे सन्देह न था कि परमेश्वर उसके लिए पर्याप्त रक्षा होगा। और हमें भी ठीक इसी प्रकार करना चाहिए, जब कभी शैतान दुष्टों को हमारे विरुद्ध उभारे कि वे या तो गुप्त चालों से या खुली क्रूरता से हमारा विरोध करें; जैसा कहा जाता है, केवल परमेश्वर ही हमारी पीतल की शहरपनाह होना चाहिए। परन्तु पहले हमें यह जानना चाहिए कि वह हमारे पक्ष में खड़ा है; क्योंकि जब तक हम इस सत्य पर दृढ़ता से निश्चित न हों कि वह हमारे पक्ष में है, तब तक परमेश्वर की सामर्थ्य हमें उत्साहित करने में कुछ भी काम न आएगी। और यह भरोसा कैसे प्राप्त किया जा सकता है, यह हम अभी देखेंगे।
वह कहता है कि उसके सतानेवाले गिर पड़ेंगे, यहाँ तक कि वे प्रबल न होंगे, वरन् लज्जित होंगे। हम देखते हैं कि कितने लोगों ने उस पवित्र जन को सताया, और यह भी कि वे किन हथियारों से सुसज्जित थे; क्योंकि उनके पास बड़ी शक्ति थी, और वे छल और षड्यन्त्रों से भी भरे थे। परन्तु भविष्यद्वक्ता केवल परमेश्वर की सहायता से सन्तुष्ट था, और उसने साहस के साथ यह निष्कर्ष निकाला कि वे गिर पड़ेंगे; क्योंकि यह हो ही नहीं सकता था कि परमेश्वर विजयी न ठहरे। अतः जब कभी हम संसार और शैतान और उसके दासों से लड़ें, तो सबसे पहले हमारे मन में यह बात आनी चाहिए कि परमेश्वर हमारे पक्ष की रक्षा करने और हमारी सुरक्षा को बचाए रखने के लिए हमारी ओर खड़ा है। यह निश्चित हो जाने पर हम सब शत्रुओं की चालों और हिंसा दोनों को साहस से ललकार सकते हैं; क्योंकि यह हो ही नहीं सकता कि परमेश्वर उन सब को तितर-बितर, धराशायी, अभिभूत और नाश न कर दे जो उसके विरुद्ध लड़ते हैं।
वह आगे कहता है कि उनकी नामधराई सदा बनी रहेगी और कभी भुलाई न जाएगी। हम पहले ही देख चुके हैं कि भविष्यद्वक्ता पर बहुत-सी निन्दाएँ लादी गई थीं; परन्तु जब कभी परमेश्वर अपने सेवकों को दुष्टों के शापों का निशाना बनने देता है, तो वह ठीक समय पर उनकी सहायता करता है; इसलिए हमें पूरी आशा रखनी चाहिए कि वह शीघ्र ही ऐसी झूठी निन्दाओं को कुहरे के समान छिन्न-भिन्न कर देगा। अतः जैसे परमेश्वर, भजन संहिता 37:6 के कथन के अनुसार, भक्तों की निर्दोषता को भोर के प्रकाश के समान प्रकट करता है, जो पल भर में उदय हो जाता है जबकि पृथ्वी अन्धकार में डूबी हुई प्रतीत होती है, वैसे ही भविष्यद्वक्ता अब कहता है कि इसके विपरीत, जिस नामधराई से परमेश्वर सब दुष्टों को ढाँप देगा, वह सदा बनी रहेगी। अब आगे लिखा है, — यिर्मयाह 20:12 12. हे सेनाओं के यहोवा, हे धर्मी के परखनेवाले, और हृदय और मन के देखनेवाले, जो बदला तू उन से लेगा उसे मैं देखूँ, क्योंकि मैं ने अपना मुक़द्दमा तेरे ही सामने खोल दिया है।
12. Et (vel, tu autem) Jehova exercituum, probans justum, videns renes et cor, videbo ultionem tuam ex ipsis, quia tibi patefeci litem meam (vel, jus meam, causam meam.)
14 पहली पंक्ति को छोड़कर, सेप्टुआजिन्ट और वल्गेट मूल पाठ से भी भिन्न हैं और एक-दूसरे से भी; दोनों अत्यन्त उलझे हुए हैं। थोड़े ही व्याख्याकारों ने क्रियाओं के उचित कालों को बनाए रखा है। भविष्यद्वक्ता न केवल यह बताता है कि उसके शत्रुओं के साथ क्या होगा, वरन् यह भी कि उनके साथ आंशिक रूप से क्या हो भी चुका था, — 11. परन्तु यहोवा भयंकर योद्धा के समान मेरे साथ है; इस कारण मेरे सतानेवाले ठोकर खाएँगे, और प्रबल न होंगे: वे अत्यन्त लज्जित हुए हैं, क्योंकि वे सफल नहीं हुए; सदा की लज्जा! वह भुलाई न जाएगी। अन्तिम दो पंक्तियाँ हॉर्सली के सुझाव के अनुसार हैं। "भयंकर योद्धा" का अनुवाद सेप्टुआजिन्ट में "एक बलवन्त लड़नेवाला, {μαχητὴς} {ἰσχύων}" है; वल्गेट में "एक वीर योद्धा, bellato fortis"; सिरियाई में "सबसे बलवन्त दानव"; और अरबी में "सबसे बलवन्त सहायता।" — सं.
भविष्यद्वक्ता यहाँ संक्षेप में दिखाता है कि उसने अपने शत्रुओं के विरुद्ध परमेश्वर के नाम और सहायता की दुहाई देने का साहस किस आधार पर किया; क्योंकि कपटी लोग प्रायः घमण्ड करते हैं कि परमेश्वर उनका सहायक है, परन्तु वे उसके नाम का झूठा ढोंग करते हैं। अतः जिस प्रमाण से भविष्यद्वक्ता यह दिखाता है कि जो कुछ उसने कहा था, — अर्थात् यह कि परमेश्वर उसके लिए एक बलवन्त दानव के समान था, जो सब दुष्टों को सहज ही पछाड़ सकता था, — उसका उसने झूठ-मूठ या ढिठाई से दावा नहीं किया, उस पर भली-भाँति विचार किया जाना चाहिए; और वह प्रमाण यह था कि उसने परमेश्वर को अपनी खराई का साक्षी और न्यायी ठहराने का साहस किया। इसलिए यदि हम चाहते हैं कि शैतान द्वारा हमारे विरुद्ध गढ़ी गई सब युक्तियों को दूर करने के लिए परमेश्वर का नाम हमारी ओर से पैरवी करे, तो हमें सीखना चाहिए कि हम स्वयं को उसके द्वारा परखे जाने के लिए सौंप दें, ताकि वह सचमुच हमारे विचारों और भावनाओं को जाँचे।
अब, पहले तो हमें स्मरण रखना चाहिए कि भविष्यद्वक्ता क्या सिखाता है, — कि परमेश्वर से कुछ भी छिपा नहीं है; क्योंकि कपटी लोग यहाँ तक जाने में भी संकोच न करेंगे कि स्वयं को परमेश्वर द्वारा परखे जाने के लिए प्रस्तुत करें; परन्तु वे उस बात पर उचित रीति से विचार नहीं करते जो यहाँ कही गई है, कि उससे कुछ भी छिपा नहीं है। मनुष्य के हृदय में बहुत-से गुप्त कोने हैं, और हम जानते हैं कि वहाँ सब बातों पर अनेक परदे और आवरण पड़े रहते हैं; परन्तु इस बीच परमेश्वर हृदय का जाननेवाला ({καρδιογνώστης}) है, जो हृदय और मन को परखता है। "मन" (गुर्दे) शब्द के अन्तर्गत इब्रानी लोग सब गुप्त विचारों और भावनाओं को सम्मिलित करते हैं। अतः हमें पहली बात यही स्मरण रखनी चाहिए कि भविष्यद्वक्ता स्वीकार करता है कि परमेश्वर के सामने कोई छल-कपट नहीं चल सकता, और मनुष्य कपट से काम करके कुछ नहीं पाते, क्योंकि वह अन्तरतम विचारों तक पैठ जाता है और विचारों तथा भावनाओं में भेद करता है।
वह आगे कहता है कि धर्मी परमेश्वर द्वारा परखे जाते हैं। यहाँ एक विरोधाभास समझना चाहिए, क्योंकि मनुष्यों का न्याय सामान्यतः ऊपरी होता है; क्योंकि जब खराई का दिखावा होता है, तो तुरन्त निर्दोष ठहरा दिया जाता है, चाहे हृदय कपटी और हर प्रकार के विश्वासघात से भरा हो। अतः भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय यह है कि जब हम परमेश्वर के न्याय-आसन के सामने आते हैं, तो वहाँ केवल वही निर्दोष ठहरता है जो शुद्ध हृदय और सच्ची खराई लेकर आता है। फिर वह और ऊँचे भरोसे तक उठता है, और कहता है कि वह परमेश्वर का पलटा देखेगा।
अब हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने अपना भरोसा कहाँ से पाया, अर्थात् इसलिए कि उसने अपने आप को भली-भाँति जाँचा था, और वह भी परमेश्वर के सामने; उसने केवल पार्थिव साक्षियों की दुहाई नहीं दी थी, और न वह मानो किसी सार्वजनिक रंगमंच पर चढ़कर लोगों की कृपा माँगता फिरा था; परन्तु वह जानता था कि वह परमेश्वर की दृष्टि में ग्रहणयोग्य है, क्योंकि वह निष्कपट और ईमानदार था।
और फिर वह उचित ही साथ-साथ यह भी जोड़ता है कि उसने अपना मुक़द्दमा या अपनी शिकायत परमेश्वर पर प्रकट कर दी थी। यहाँ फिर एक विरोधाभास समझना चाहिए; क्योंकि जो लोग जन-प्रशंसा की हवा में बह जाते हैं, वे परमेश्वर के न्याय से सन्तुष्ट नहीं होते। महत्वाकांक्षा एक प्रचण्ड आँधी के समान मनुष्यों को सदा बहा ले जाती है, यहाँ तक कि वे अपने आप को रोक नहीं सकते; इसी कारण न तो विवेक की गवाही और न परमेश्वर का न्याय उनके लिए अधिक महत्व रखता है। परन्तु भविष्यद्वक्ता कहता है कि उसने अपना मुक़द्दमा परमेश्वर पर प्रकट किया था।
यदि कोई आपत्ति करके कहे कि कपटी भी ऐसा ही करते हैं, तो मैं इसका उत्तर यह देता हूँ कि यद्यपि उनमें कुछ नकल दिखाई दे सकती है, तौभी उसमें कुछ भी सच्चा या खरा नहीं है; क्योंकि चाहे वे घमण्ड करें कि परमेश्वर उनका साक्षी है और वह उनके मुक़द्दमे को उचित ठहराता है, तौभी यह केवल वही है जो वे मनुष्यों के सामने व्यर्थ बोलते हैं; क्योंकि उनमें से एक भी ऐसा नहीं जो इस प्रकार एकान्त में परमेश्वर के साथ व्यवहार करता हो। अतः जब तक वे दिखावे में लगे रहते हैं, तब तक वे अपना मुक़द्दमा परमेश्वर पर प्रकट नहीं करते, चाहे वे कितनी ही उसकी दुहाई दें, उसके न्याय-आसन का हवाला दें, और यह घोषणा करें कि उसकी महिमा बढ़ाने के सिवाय उनका कोई और उद्देश्य नहीं है। अतः जो लोग अपने लाभ के लिए संसार के सामने घमण्ड के साथ इन बातों का ढिंढोरा पीटते हैं, वे फिर भी अपना मुक़द्दमा परमेश्वर पर प्रकट नहीं करते, वरन् ओछी और व्यर्थ डींग मारकर उसके नाम का ढोंग करते हैं।
तो फिर अपना मुक़द्दमा परमेश्वर पर प्रकट करने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है ऐसा तब करना जब कोई साक्षी न हो, और जब केवल परमेश्वर ही हमारे सामने उपस्थित हो। जब हम अपनी प्रार्थनाओं में परमेश्वर से इस प्रकार कहने का साहस करते हैं, — "हे प्रभु, तू मेरी खराई को जानता है, तू जानता है कि जो कुछ मैं अब तेरे सामने रखता हूँ उसमें कुछ भी छिपा नहीं है," तब हम सचमुच अपना मुक़द्दमा परमेश्वर पर प्रकट करते हैं; क्योंकि इस दशा में मनुष्यों का कोई ध्यान नहीं रखा जाता, वरन् हम केवल परमेश्वर के न्याय से सन्तुष्ट रहते हैं। भविष्यद्वक्ता के साथ भी ऐसा ही था जब उसने कहा कि उसने अपना मुक़द्दमा परमेश्वर पर प्रकट किया है; और ऐसा ही होना भी अवश्य था, क्योंकि हम देख चुके हैं कि मनुष्यों के सब वर्ग उसके विरोधी थे। अतः जब उसे विवश होकर एकमात्र सच्चे परमेश्वर की शरण में भागना पड़ा, तो वह उचित ही कहता है कि उसने अपना मुक़द्दमा उसी को सौंप दिया था।
यह कहकर कि वह परमेश्वर का पलटा देखेगा, वह उस मनचाहे बदले की ओर संकेत करता है जिसका उल्लेख पहले हुआ था, क्योंकि उसके शत्रुओं ने कहा था, "आओ, हम उससे पलटा लें।" भविष्यद्वक्ता कहता है, "हे प्रभु, मैं तेरा पलटा देखूँगा।" यह कहकर कि वह उसे देखेगा, वह ऐसे बोलता है मानो उसके हाथ बँधे हुए हों; क्योंकि विश्वासी इसी प्रकार अपनी इच्छा से अपने आप को रोकते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि परमेश्वर की आज्ञा उन्हें अपने शत्रुओं से स्वयं पलटा लेने से वर्जित करती है। अतः जैसे करने और देखने में अन्तर है, वैसे ही भविष्यद्वक्ता यहाँ अपने और ढीठ दुष्टों के बीच भेद करता है; क्योंकि वह अपने क्रोध की प्रचण्डता के अनुसार स्वयं पलटा नहीं लेना चाहता था, वरन् केवल उसे देखना चाहता था; और फिर वह उसे परमेश्वर का पलटा कहता है, क्योंकि जब कभी मनुष्य अपनी इच्छा के अनुसार स्वयं पलटा लेते हैं, तो वे परमेश्वर का अधिकार छीन लेते हैं। पौलुस कहता है, "क्रोध को अवसर दो।" (रोमियों 12:19) विश्वासियों को सहनशीलता के लिए समझाते हुए वह यह कारण देता है कि अन्यथा परमेश्वर के न्याय को कोई स्थान नहीं मिलता; क्योंकि जब कभी हम पलटा लेते हैं, तो हम परमेश्वर से आगे बढ़ जाते हैं, मानो हम में से हर एक परमेश्वर के न्याय-आसन पर चढ़ बैठा हो और उसके पद को अपने लिए हड़प लिया हो। अतः अब हम समझते हैं कि इस कथन-रीति का क्या अर्थ है।
15 इस पद में और 11वें अध्याय के 20वें पद (यिर्मयाह 11:20) में बहुत थोड़ा अन्तर है; भिन्नता पहली दो पंक्तियों में है। जबकि यहाँ हमारे पास है — परन्तु सेनाओं का यहोवा, जो धर्मी का परखनेवाला है, मन और हृदय का देखनेवाला; यिर्मयाह 11:20 में हमारे पास इस प्रकार है, — परन्तु सेनाओं का यहोवा, जो धर्मी न्यायी है, मन और हृदय का परखनेवाला। पहले स्थान के समान ही, प्राचीन अनुवाद आगे के शब्दों को शाप-वचन के रूप में प्रस्तुत करते हैं, — "मैं देखूँ," इत्यादि, जबकि टारगम कैल्विन के समान "मैं देखूँगा," इत्यादि कहता है; और यह इस स्थल से अधिक मेल खाता है। भविष्यद्वक्ता पहले परमेश्वर का धर्मी न्यायी के रूप में उल्लेख करता है, और फिर यह निष्कर्ष निकालता है कि वह अपने शत्रुओं पर परमेश्वर का पलटा देखेगा, क्योंकि उसने अपना मुक़द्दमा उस पर छोड़ दिया था, या उस पर प्रकट कर दिया था। उसने अपना मुक़द्दमा एक धर्मी न्यायी को सौंपा था, और इसलिए उसे निश्चय था कि पलटा उसके शत्रुओं पर आ पड़ेगा। — सं.
परन्तु साथ ही हमें यह ध्यान देना चाहिए कि परमेश्वर का पलटा केवल निकम्मे ठहराए हुए और न सुधरनेवाले लोगों पर ही माँगा जाना चाहिए। क्योंकि निःसन्देह भविष्यद्वक्ता को अपने शत्रुओं पर तरस आता था, और वह चाहता था कि यदि वे सुधर सकते हों तो परमेश्वर उन पर कृपालु और दयालु हो, जैसा हम पहले देख चुके हैं। अतः जिस पलटे की वह चर्चा करता है उससे यह सूचित होता है कि वह भविष्यद्वाणी के आत्मा के द्वारा जानता था कि वे पूर्णतः सुधरने के योग्य न थे; और क्योंकि उसका मन उचित जोश के प्रभाव में था, इसलिए वह उन पर परमेश्वर का पलटा माँग सकता था। यदि अब कोई भविष्यद्वक्ता के उदाहरण पर चलकर अपने सब शत्रुओं का नाश चाहे, और परमेश्वर को उनके विरुद्ध शस्त्र उठाए हुए देखना चाहे, तो वह बड़ी ढिठाई से काम करेगा; क्योंकि यह हमारा काम नहीं कि समय से पहले यह निर्धारित करें कि निकम्मे ठहराए हुए और न सुधरनेवाले कौन हैं; जब तक यह हम पर प्रकट न हो, हमें बिना किसी अपवाद के सब के लिए प्रार्थना करनी चाहिए; और हर एक को यह भी विचार करना चाहिए कि वह किस जोश से प्रेरित है, ऐसा न हो कि हम अशान्त भावनाओं के वश में हो जाएँ, जैसा सामान्यतः होता है, और ऐसा भी न हो कि हमारा जोश उतावला और बिना सोचा-समझा हो। संक्षेप में, जब तक हमें निश्चय न हो कि हमारा जोश सीधाई और बुद्धि के आत्मा से संचालित है, तब तक हमें अपने शत्रुओं पर पलटे के लिए कभी प्रार्थना नहीं करनी चाहिए। इसके बाद वह आगे कहता है, — यिर्मयाह 20:13 13. यहोवा के लिये गाओ; यहोवा की स्तुति करो! क्योंकि उसने दरिद्र जन के प्राण को कुकर्मियों के हाथ से बचाया है।
13. Canite Jehovae, celebrate Jehovam, quia eripuit animam miseri (vel, afflicti) e manu scleratorum.
यहाँ भविष्यद्वक्ता खुलकर आनन्द प्रकट करने लगता है, और न केवल स्वयं परमेश्वर का धन्यवाद करता है कि वह दुष्टों के षड्यन्त्रों और उपद्रव से छुड़ाया गया, वरन् दूसरों को भी बुलाता है, और उन्हें परमेश्वर का गुणगान करने के लिए उभारता है; मानो वह कहता हो कि उसका छुटकारा ऐसा अनुग्रह था कि न केवल उसे स्वयं उसके लिए परमेश्वर का आभारी होना चाहिए, वरन् सब को मिलकर उसका उत्सव मनाना चाहिए, जैसा पौलुस 2 कुरिन्थियों 1:11 में कहता है, कि बहुतों के द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद किया जाए। निःसन्देह भविष्यद्वक्ता ने परमेश्वर की सहायता का अनुभव किया था, हाँ, उसी सहायता का जिसकी उसने पहले इतनी बड़ाई की थी। अतः जब उसने सचमुच पाया कि परमेश्वर विजयी हुआ, और उसकी सुरक्षा परमेश्वर की अजेय सामर्थ्य के द्वारा सब भक्तिहीनों के विरुद्ध बनी रही, तो उसने पूरे भरोसे के साथ अपना धन्यवाद प्रकट किया, और चाहा कि परमेश्वर के सब सेवक उसके साथ सम्मिलित हों।
अतः जब कभी हम संकट में पड़ जाएँ, और मानो स्वयं परमेश्वर द्वारा ठुकराए हुए प्रतीत हों, तब भी हम धीरज से बाट जोहते रहें जब तक कि उसे हमें दुष्टों के हाथ से छुड़ाना अच्छा न लगे; बिना पहले दुःख और क्लेश के हम अपनी रक्षा में परमेश्वर की सामर्थ्य को कभी पर्याप्त रूप से स्वीकार न करते। इस प्रकार यिर्मयाह मान लेता है कि वह कुछ समय तक दुःखी और सताया हुआ था, परन्तु अन्त में छुड़ाया गया, ठीक उस समय जब भक्तिहीन और दुष्ट अपने आप को विजयी समझ रहे थे। अब एक ऐसी चिल्लाहट आती है जो बिलकुल भिन्न प्रकार की प्रतीत होती है, — यिर्मयाह 20:14-16 14. शापित हो वह दिन जिसमें मैं उत्पन्न हुआ! जिस दिन मेरी माता ने मुझ को जन्म दिया वह धन्य न हो!
14. Maledietus dies, quo natus sum (in eo, sed abundat;) dies quo peperit me mater mea, non sit benedictus: 16 यहाँ "दरिद्र" का अर्थ वह नहीं जो दीन अवस्था में हो, वरन् वह जो असहाय या रक्षाहीन हो; और अन्य स्थानों में, विशेषकर भजनों में, इस शब्द का प्रायः यही अर्थ है। "प्राण" शब्द का भी, यहाँ और अन्य स्थानों में, अर्थ जीवन है, — यहोवा के लिए गाओ, यहोवा की स्तुति करो, क्योंकि उसने असहाय के जीवन को दुष्कर्मियों के हाथ से छुड़ाया है। — सं.
15. शापित हो वह जन जिसने मेरे पिता को यह समाचार देकर उसको बहुत आनन्दित किया, कि तेरे लड़का उत्पन्न हुआ है।
15. Maledictus vir, qui nuntiavit patri meo, dicendo, Natus est tibi filius masculus; quoniam (vel, quando) laetificavit eum (hoc est, cum vellet exhilarare patrem meum.)
16. उस जन की दशा उन नगरों की सी हो जिन्हें यहोवा ने ढा दिया और पछताया नहीं; उसे सबेरे तो चिल्लाहट और दोपहर को कोलाहल सुनाई दिया करे;
16. Et sit vir ille quasi urbes quas perdidit Jehova, et non poenituit, et audiat clamorem mane, et tumultum tempore meridiano, (hoc est, in meridie ipsa.)
जैसा मैं कह चुका हूँ, ऐसा प्रतीत होता है कि भविष्यद्वक्ता अपने आप से असंगत था; आनन्द और धन्यवाद से वह तुरन्त शापों और कोसने में चला गया; इससे बढ़कर अनुचित और क्या हो सकता था? यदि हम कहें कि वह किसी नई परीक्षा से परखा गया, तौभी यह किसी भी प्रकार सन्तोषजनक नहीं जान पड़ता, यद्यपि व्याख्याकार सामान्यतः इसी रीति से यह गाँठ खोलते हैं। परन्तु मुझे यह उस पवित्र जन के अयोग्य चंचलता प्रतीत होती है कि वह परमेश्वर के धन्यवाद से अचानक शाप-वचनों में चला जाए, मानो वह अपने आप को भूल गया हो। इसलिए मुझे सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता यहाँ बताता है कि वह अपने ही विचारों से कितनी बुरी तरह सताया गया था। अतः यह सारा स्थल धन्यवाद से जुड़ा हुआ है, क्योंकि वह उस छुटकारे की महिमा को बढ़ाकर बताता है जिसका उल्लेख उसने अभी किया है, अर्थात् यह कि वह मानो अधोलोक से वापस लाया गया था। इस प्रकार वह इस पिछले स्थल में वह बताता है जो पहले उस पर बीता था, मानो वह कहता हो, "जब मैं अब यह घोषणा करता हूँ कि परमेश्वर ने मुझे दुष्टों के हाथ से छुड़ाया है, तो मैं उस अनुग्रह की महानता को पर्याप्त रूप से व्यक्त नहीं कर सकता, जब तक कि मैं सब भक्तों पर और स्पष्ट रूप से प्रकट न करूँ कि मैंने कैसी बड़ी और कैसी भयानक यातनाएँ सहीं, यहाँ तक कि मैंने अपने जन्म-दिन को शाप दिया, और उस हर बात से घृणा की जो मुझे परमेश्वर की स्तुति करने को उभारनी चाहिए थी।"
संक्षेप में, भविष्यद्वक्ता यहाँ हमें सिखाता है कि न केवल शत्रुओं ने उसका विरोध किया, वरन् वह भीतर अपने मन में भी व्याकुल था, यहाँ तक कि वह तर्क और विवेक के विरुद्ध अशान्त भावनाओं द्वारा बहा ले जाया गया, जिन्होंने उससे घृणित निन्दा-वचन भी कहलवा दिए। क्योंकि जो यहाँ कहा गया है उसे हल्का नहीं किया जा सकता; वरन् भविष्यद्वक्ता ने बड़ा भारी पाप किया जब वह इस प्रकार परमेश्वर के प्रति निन्दक बन गया; क्योंकि जो मनुष्य उस दिन को शाप देता है जिसमें वह उत्पन्न हुआ, वह अवश्य निराशा की दशा में होगा। मनुष्य तो अपना जन्म-दिन मनाया करते हैं; और प्राचीन काल में यह रीति प्रचलित थी कि वे प्रति वर्ष स्वीकार करें कि वे परमेश्वर की अमूल्य भलाई ही के कारण जीवन के प्रकाश में लाए गए। अतः जब यह धन्यवाद का कारण है, तो स्पष्ट है कि जब हम उस बात को शाप में बदल देते हैं जो हमें परमेश्वर की स्तुति के लिए उभारनी चाहिए, तो हम फिर सही मन में नहीं रहते, न विवेक हमारे पास रहता है, वरन् हम मानो एक अपवित्र उन्माद से ग्रसित हो जाते हैं; और फिर भी भविष्यद्वक्ता इसी दशा में गिर पड़ा था।
17 इस स्थल में सबसे बड़ी कठिनाई इसका सम्बन्ध है। यिर्मयाह ने अपने जन्म-दिन को शाप दिया, इसका कारण बताया जा सकता है, जैसा अय्यूब के विषय में। उत्तम से उत्तम मनुष्यों में भी स्वभाव कभी-कभी अपनी ही वाणी बोल उठता है। परन्तु उसने अपने छुटकारे के लिए परमेश्वर का धन्यवाद करने के तुरन्त बाद ऐसा कैसे किया, यह विचित्र प्रतीत होता है। कैल्विन की यह व्याख्या कि वह उस बात को बताता है जो पशहूर द्वारा बन्दी बनाए जाने के समय उसके मन में बीती थी, विश्वसनीय लगती है, और ग्रोटियस, गैटेकर, कॉक्सियस और हेनरी ने इसे अपनाया है। ग्रोटियस का विचार था कि चौदहवें पद के आरम्भ में "मैंने कहा था" समझा जाना चाहिए। एडम क्लार्क ने सोचा कि शब्दों का स्थान बदल गया है, और अन्तिम पाँच पद आठवें और नौवें पद के बीच आने चाहिए: और वह यह सच कहता है कि इस पुस्तक में बहुत-से स्थानान्तरण हैं। हूबिगां ने, जिसका हॉर्सली ने समर्थन किया, सोचा कि इन पदों का सही स्थान छठे और सातवें पद के बीच है। परन्तु ये स्थानान्तरण सन्तोषजनक नहीं हैं। वेनेमा की धारणा यह है कि यिर्मयाह अपने नाम से नहीं, वरन् पशहूर के नाम से बोलता है। पिछले पद में अपनी सुख-शान्ति, अर्थात् परमेश्वर से पाई हुई रक्षा का वर्णन करके, वह इन पदों में अपने सतानेवाले की दुर्दशा और दुःख का वर्णन करता है, और उसे अपने जन्म-दिन को शाप देते हुए प्रस्तुत करता है, इत्यादि। परन्तु यह बहुत दूर की कौड़ी और काल्पनिक है। स्कॉट स्वीकार करता है कि यह परिवर्तन बहुत असाधारण है, तौभी वह सोचता है कि भविष्यद्वक्ता उस बात का वर्णन करता है जो उसके अपने मन में से होकर गुज़री थी, और कहता है कि भले मनुष्यों का अनुभव प्रमाणित करता है कि ऐसे अचानक परिवर्तन होते हैं। वह कहता है, "अपने हृदयों का, और कठिन परीक्षाओं में, जब उत्साह बढ़ानेवाले या निरुत्साहित करनेवाले विचार हमारे मन में उठते हैं, अपनी भावनाओं के उतार-चढ़ाव का अनुभवजन्य ज्ञान हमें इसे समझने में सबसे अधिक समर्थ करेगा।" सम्भवतः इस विषय का यही सही दृष्टिकोण है। भविष्यद्वक्ता ने निश्चय ही अपना जीवन बचाने में परमेश्वर की कृपा को स्वीकार किया, और दूसरों को अपने साथ उसकी स्तुति करने के लिए आमन्त्रित किया: तौभी जब उसने अपनी परिस्थितियों पर विचार किया, तो वह अपनी स्वाभाविक भावनाओं के आगे झुक गया। — सं.
अतः हम यहाँ से सीख सकते हैं कि हम में से हर एक को अपने ऊपर कितनी सावधानी से चौकसी रखनी चाहिए, ऐसा न हो कि हम किसी प्रचण्ड भावना में बहकर असंयमी और उच्छृंखल हो जाएँ।
साथ ही मैं यह मानता हूँ, और यह वह बात है जिस पर हमें ध्यानपूर्वक विचार करना चाहिए, कि उसके जोश का मूल उचित था। क्योंकि यद्यपि भविष्यद्वक्ता ने परोक्ष रूप से परमेश्वर को दोष दिया, तौभी हमें उसकी शिकायत के स्रोत पर विचार करना चाहिए; उसने अपने जन्म-दिन को इसलिए शाप नहीं दिया कि वह रोगों से पीड़ित था, या इसलिए कि वह दरिद्रता और अभाव सह नहीं सकता था, या इसलिए कि वह कुछ निजी विपत्तियाँ भोग रहा था; नहीं, भविष्यद्वक्ता के साथ इस प्रकार की कोई बात न थी; परन्तु कारण यह था कि उसने देखा कि उसका सारा परिश्रम, जो उसने लोगों का कल्याण सुनिश्चित करने के लिए किया था, व्यर्थ गया; और फिर इसलिए कि उसने परमेश्वर की सच्चाई को झूठी निन्दाओं और नामधराई से लदा हुआ पाया। अतः जब उसने देखा कि भक्तिहीन लोग इस प्रकार ढिठाई से उसका विरोध कर रहे हैं, और सारे धर्म का उपहास किया जा रहा है, तो वह गहराई से विचलित हो उठा। इसी कारण वह पवित्र जन इतनी वेदना से भर गया। और इससे हम स्पष्ट देखते हैं कि उसके जोश का स्रोत उचित था।
परन्तु यहाँ हमें स्मरण दिलाया जाता है कि हमें अपने ऊपर कितनी चौकसी रखनी चाहिए; क्योंकि अधिकांश अवसरों पर, जब हम जीवन से ऊब जाते हैं, और मृत्यु की कामना करते हैं, और संसार से, प्रकाश से और परमेश्वर की सब आशीषों से घृणा करते हैं, तो हम इस प्रकार प्रभावित क्यों होते हैं, सिवाय इसके कि हमारे भीतर रोष राज्य करता है, या हम नम्रता से नामधराई सह नहीं सकते, या दरिद्रता हमें अत्यन्त कष्टदायक लगती है, या कुछ कष्ट हम पर बहुत भारी पड़ते हैं? ऐसा नहीं कि हम परमेश्वर के लिए जोश से प्रेरित होते हैं। अतः जब भविष्यद्वक्ता, जिसने न अपने आप का ध्यान रखा और न जिसका लाभ या हानि का कोई निजी कारण था, फिर भी इतना क्रुद्ध और इतना उग्र हो गया, वरन् ऐसी प्रचण्ड भावना से ग्रसित हो गया, तो निश्चय ही हमें अपनी भावनाओं को रोकने में और भी अधिक सावधानी बरतनी चाहिए; और यद्यपि प्रतिदिन हमारे साथ बहुत-सी ऐसी बातें हो सकती हैं जो थकान उत्पन्न करें, या हमें इतने रोष से भर दें कि सब बातें हमें घृणित लगने लगें, तौभी हमें ऐसी भावनाओं से संघर्ष करना चाहिए; और यदि हम पहले ही प्रयास में उन्हें दबा और वश में न कर सकें, तो कम से कम भविष्यद्वक्ता के उदाहरण के अनुसार हमें उन्हें धीरे-धीरे सुधारना सीखना चाहिए, जब तक कि परमेश्वर हमें हर्षित और शान्ति न दे, ताकि हम आनन्दित होकर धन्यवाद का गीत गा सकें।
प्रार्थना — हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, ऐसा अनुग्रह कर कि जब अब विषैली जीभें हमें घेरे हुए हैं, और शैतान के पास बहुत-से भाड़े के टट्टू हैं, जिनका और कोई उद्देश्य नहीं सिवाय इसके कि जो कुछ उचित रीति से तुझसे निकला है और तेरे मुख से निकला है, उसे कोलाहल मचाकर रोक दें, — हाँ, ऐसा अनुग्रह कर कि हम ऐसे षड्यन्त्रों का दृढ़ता से सामना करें, और उनकी सब हिंसक युक्तियों के विरुद्ध भी अटल मन से खड़े रहें, और तेरी पवित्र बुलाहट के मार्ग पर आगे बढ़ते रहें, जब तक कि हम अन्त में निश्चय से न जान लें कि जो तुझ पर भरोसा रखते हैं और विश्वासयोग्यता से अपने आप को तेरी सेवा में अर्पित करते हैं, वे तेरी सहायता के बिना कभी नहीं छोड़े जाते; और अन्त में अपना युद्ध समाप्त करके हम उस धन्य विश्राम में एकत्र किए जाएँ जो तेरे एकलौते पुत्र के लहू के द्वारा हमारे लिए प्राप्त किया गया है। — आमीन।
अठहत्तरवाँ व्याख्यान — हमने कल कहा था कि इस स्थल में भविष्यद्वक्ता के मन की व्याकुल दशा का वर्णन किया गया है; क्योंकि वह स्वयं निःसन्देह स्वीकार करता कि वह एक असंयमी भावना में ऐसा बह गया था कि अपने आपे में न रहा; क्योंकि जब कोई अपने जन्म-दिन को शाप देता है, तो वह परमेश्वर पर कलंक लगाता है। और वह इससे भी आगे बढ़ता है, क्योंकि वह जोड़ता है, शापित हो वह जन जिसने मेरे पिता को बताया कि एक लड़का उत्पन्न हुआ है। यहाँ वह न केवल परमेश्वर से लड़ता है, वरन् मनुष्यों के प्रति भी कृतघ्न है; क्योंकि जिसने पहले-पहल उसके पिता को बताया कि उसके एक पुत्र उत्पन्न हुआ है, वह धन्यवाद के सिवाय और किस बात का पात्र था? अतः यह ऐसी कृतघ्नता थी जो किसी प्रकार क्षमा के योग्य नहीं। और इससे हम यह भी सीखते हैं कि भविष्यद्वक्ता का अपनी भावनाओं पर कोई नियन्त्रण न था, वरन् वह पूर्णतः एक अन्धे आवेग में बहा जा रहा था, जिसने उससे अत्यन्त बिना सोचे-समझे शब्द कहलवाए; क्योंकि इस वाक्य में न भक्ति है न मानवता; परन्तु जैसा मैं कह चुका हूँ, भविष्यद्वक्ता परमेश्वर के प्रति और मनुष्यों के प्रति भी कृतघ्न था; और उसकी अतिशयोक्तिपूर्ण भाषा और भी पूरी रीति से प्रकट करती है कि उसकी भावनाएँ कितनी असंयमी थीं, जिसने मेरे पिता को बताया कि एक लड़का उत्पन्न हुआ है। यहाँ वह ऐसा प्रतीत होता है मानो उसने खुलकर परमेश्वर के अनुग्रह को तुच्छ जाना हो, क्योंकि हम जानते हैं कि पुत्रों को पुत्रियों से अधिक महत्व दिया जाता है। परन्तु भविष्यद्वक्ता यहाँ "लड़का" (नर) शब्द का उल्लेख ऐसे करता है मानो वह उस बात की शिकायत करना चाहता हो जिसके लिए उसे आभारी होना चाहिए था।
और वह जोड़ता है, जिसने आनन्द देकर उसे आनन्दित किया। हम देखते हैं, जैसा सामान्यतः कहा जाता है, कि वह आकाश और पृथ्वी को कैसे एक कर देता है; क्योंकि यदि उसके वश में होता, तो जब यह उन्माद उसके मन पर छाया हुआ था, वह निश्चय ही सब तत्वों को उथल-पुथल कर देता। परन्तु इससे भी अधिक भारी और अधिक अनुचित वह है जो आगे आता है, वह जन उन नगरों के समान हो जिन्हें परमेश्वर ने बिना पछताए नष्ट किया। उसने एक निर्दोष मनुष्य पर सदोम और अमोरा का विनाश क्यों माँगा? और फिर वह सांसारिक दण्ड की नहीं, वरन् उस मनुष्य को अनन्त विनाश के लिए अर्पित करता है, क्योंकि इन शब्दों का यही आशय है, और पछताया नहीं; मानो वह कहता हो, "परमेश्वर उस पर बिना कोई दया दिखाए क्रोधित हो, वरन् अपने आप को पूर्णतः अटल-कोपी प्रकट करे, जैसा उसने सदोम के साथ किया, जिसे उसने उसके लिए कोई आशा छोड़े बिना एक ही बार में नष्ट कर दिया।" यदि वह किसी कट्टर शत्रु की चर्चा करता, तब भी उसे उन सीमाओं के भीतर रहना चाहिए था जो परमेश्वर की सब सन्तानों के लिए ठहराई गई हैं; परन्तु उस मनुष्य से, जो उसके पिता के पास समाचार लाया था, उसे कोई बैर न था। इससे हम देखते हैं कि वह मानो एक पागलपन भरे आवेग में कैसे बह गया। परन्तु इससे हम सीखें कि अपनी भावनाओं को समय रहते रोकें, जो यदि हम उन्हें खुली छूट दें तो सब सीमाओं को लाँघ जाएँगी; क्योंकि तब वे मानो रोष में फूट पड़ेंगी, जैसा भविष्यद्वक्ता के साथ हुआ।
वह यह भी जोड़ता है, उसे सबेरे चिल्लाहट और दोपहर को कोलाहल सुनाई दे। यहाँ वह एक निर्दोष मनुष्य को सदा की अशान्ति के लिए अर्पित करता है। और भोर का उल्लेख किया गया है, क्योंकि हम जानते हैं कि भय रात के अन्धकार में होते हैं। यदि दिन में कुछ होता है, तो हम पूछताछ करते हैं कि क्या है, और इतना नहीं डरते; परन्तु जब रात में कोई शोर होता है, तो भय हम पर पूरी तरह छा जाता है। अतः भविष्यद्वक्ता जो यहाँ व्यक्त करता है उसमें कुछ भयावह बात है। इससे हम और भी पूरी रीति से सीखते हैं कि उसका रोष कितना प्रचण्ड था, कि उसने इस प्रकार एक निर्दोष मनुष्य के लिए सदा की यातनाएँ चाहीं। वह कहता है, सबेरे उसे चिल्लाहट और दोपहर को कोलाहल सुनाई दे। यदि उसने कहा होता, "उसे सदा चिल्लाहट सुनाई दे," तो यह इतना भारी न होता। अब आगे लिखा है, — यिर्मयाह 20:17-18 17. क्योंकि उसने मुझे गर्भ ही में न मार डाला कि मेरी माता का गर्भाशय ही मेरी कब्र होती, और वह सदा गर्भवती रहती।
17. Quare non occidisti me ab utero? et fuisset (hoc est, ut esset) mihi mater mea sepulchrum meum? et in utero ejus conceptus saeculi (id est, perpetuus, vel, uterus ejus fuisset in conceptu perpetuo; et hoec posterior expositio videtur reelins quadrare, ac si diceret, Fuisset uterus, matris meoe sterilis, ita ut non conciperet nisi post soeculum, id est, nunquam.)
18. मैं क्यों परिश्रम और शोक देखने के लिये गर्भ से निकला, कि अपने दिन नामधराई में व्यतीत करूँ?
18. Quare ex utero egressus sum ad videndum molestiam et dolorem, ut consumantur in opprobrio dies mei?
अपने जन्म-दिन पर और उस दूत पर, जो उसके पिता को आनन्द पहुँचाना चाहता था, अपने शाप-वचन सुनाने के बाद, यिर्मयाह अब परमेश्वर से वाद-विवाद करता है। इससे प्रकट होता है कि उसका पागलपन कितना बड़ा था; क्योंकि हमें ऐसा ही कहना पड़ता है। परन्तु यदि यिर्मयाह ने परमेश्वर को भी न छोड़ा, तो वह किसी नश्वर मनुष्य को कैसे छोड़ता? अतः इसमें सन्देह नहीं कि वह परमेश्वर के विरुद्ध प्रचण्ड रूप से भड़क उठा, क्योंकि उसका वाद-विवाद पूर्णतः निराश मनुष्य का सा है; वह पूछता है कि वह गर्भ ही में क्यों न मार डाला गया, मानो वह इसे कृपा न समझता हो कि वह जीवित ही प्रकाश में आया। परन्तु यह जीवन, यद्यपि अनेक दुःखों के अधीन है, तौभी परमेश्वर के अमूल्य अनुग्रह का प्रमाण गिना जाना चाहिए। अतः जब भविष्यद्वक्ता ने न केवल परमेश्वर की इस भलाई को तुच्छ जाना, वरन् स्वयं परमेश्वर से इस बात पर झगड़ा किया कि वह मनुष्य बनाया गया और प्रकाश में लाया गया, तो उसकी कृतघ्नता कितनी बड़ी थी!
18 हमारा अनुवाद इस वाक्य में {{ו का अनुवाद "या" करने में सही प्रतीत होता है; और पिछले पद में भी इसका अनुवाद ऐसा ही किया जाना चाहिए, नहीं तो एक मनुष्य को नष्ट किया हुआ और साथ ही चिल्लाहट इत्यादि सुनता हुआ दिखाने में असंगति होती है। दोनों पदों का अनुवाद इस प्रकार किया जा सकता है, — 16. और वह जन उन नगरों के समान हो जिन्हें यहोवा ने उलट दिया और पछताया नहीं; या भोर को चिल्लाहट का और दोपहर को कोलाहल का सुननेवाला हो। 17. उसने मुझे गर्भ ही से क्यों न मार डाला? या मेरी माता मेरे लिए मेरी कब्र क्यों न बनी, और उसका गर्भ सदा का गर्भधारण? अन्तिम शब्द अक्षरशः "सदाकाल का गर्भधारण" हैं, — वल्गेट में है, "अनन्त गर्भधारण," — सिरियाई में, "सदा का गर्भधारण।" फिर अगला पद इस प्रकार है, — 18. यह किस प्रयोजन से हुआ? गर्भ से मैं निकला परिश्रम और शोक देखने को, और नामधराई में मेरे दिन बीत गए हैं। — सं.
फिर वह जोड़ता है, मेरी माता मेरी कब्र होती; अर्थात्, "इस प्रकाश और जीवन का मैं कुछ मूल्य नहीं समझता; तो फिर मैं अपनी माता के गर्भ ही में क्यों न मर गया? और उसने मुझे गर्भ में क्यों धारण किया?" फिर वह कहता है, मैं गर्भ से क्यों निकला कि कष्ट और शोक देखूँ, और मेरे दिन नामधराई में नष्ट हों? यहाँ वह कारण बताता है कि वह जीवन से क्यों ऊब गया था; परन्तु इस कारण से न तो वह उस समय निर्दोष ठहराया जा सकता था, और न आज ठहराया जाना चाहिए; क्योंकि परमेश्वर से झगड़ने का हमारे पास कौन-सा उचित कारण हो सकता है? यिर्मयाह शोक और कष्ट के लिए सृजा गया था: यह तो सब की दशा है; तो फिर परमेश्वर को दोष क्यों दिया जाए? उसके दिन नामधराई में बीते: उसके विषय में इसमें कोई नई बात न थी; क्योंकि बहुतों ने, जिन्हें परमेश्वर से आदरपूर्ण गवाही मिली थी, अनेक अन्याय और नामधराई सही थीं। तो फिर उसने उदाहरण के रूप में उनकी ओर क्यों न देखा, कि जो अन्य पवित्र जनों पर बीता था उसे वह धीरज और नम्रता से सह लेता? परन्तु वह ऐसा प्रतीत होता था मानो वह मानो सार्वजनिक रूप से सामने आना चाहता हो, कि अपने अपमान का प्रचार न केवल अपने युग में, वरन् संसार के अन्त तक हर युग में करे।
साथ ही हमें वह उद्देश्य स्मरण रखना चाहिए जो उसके ध्यान में था; क्योंकि भविष्यद्वक्ता, जैसा हम कह चुके हैं, परमेश्वर का धन्यवाद करने और विजेता के समान आनन्द मनाने के बाद नहीं, वरन् पहले इस असंयमी आत्मा से ग्रसित हुआ था; और परमेश्वर के उस अनुग्रह की महिमा बढ़ाने के लिए, जिससे उसने उसे मानो स्वयं अधोलोक से छुड़ाया था, जिसमें वह स्वयं जा गिरा था, उसने वह बताया जो उसके मन में से होकर गुज़रा था। सारे वर्णन का आशय यह प्रतीत होता है, — "मैं खो गया था, और मेरा मन कड़वाहट के सिवाय कुछ सोच ही नहीं सकता था, और मैंने भरे मुँह से परमेश्वर के विरुद्ध विष और निन्दा-वचन उगल दिए।" अतः भविष्यद्वक्ता का यहाँ उद्देश्य यह था कि परमेश्वर की उस कृपा को और भी स्पष्ट करे जिसने उसे इतने गहरे अथाह गड्ढे से निकालकर प्रकाश में पहुँचाया।
ऐसी ही कथन-रीति अय्यूब के तीसरे अध्याय में पाई जाती है। परन्तु अय्यूब के पास वह कारण न था जो, जैसा हमने कहा, यिर्मयाह के पास था; क्योंकि जब यिर्मयाह एक पागलपन भरे आवेग में बहकर परमेश्वर के विरुद्ध बोला, तब वह किसी निजी दुःख से प्रेरित न था। तो फिर उसका बड़ा दुःख कहाँ से था? इसी से कि उसने देखा कि लोग उसे तुच्छ जानते हैं, और सारे धर्म को वे कुछ भी नहीं समझते: संक्षेप में, उसने देखा कि बातों की दशा बिलकुल आशाहीन है। अतः वह परमेश्वर की महिमा के लिए जोश से जल उठा था; और वह लोगों की न सुधरनेवाली दुष्टता से भी अत्यन्त दुःखी था; परन्तु अय्यूब का ध्यान केवल अपने ही कष्टों पर था। इसलिए अय्यूब और यिर्मयाह में बड़ा अन्तर था; और फिर भी हम जानते हैं कि दोनों मानो स्वर्गदूतों के से सद्गुण से सम्पन्न थे, क्योंकि अय्यूब का नाम उन तीन धर्मी जनों में लिया गया है, जो सारी मानवजाति से ऊपर उठाए हुए प्रतीत होते थे; और यदि तुलना की जाए, तो इस विषय में यिर्मयाह अय्यूब से अधिक क्षमा के योग्य था; और फिर भी हम देखते हैं कि दोनों ऐसे अनुचित दुःख से भड़क उठे कि उन्होंने न परमेश्वर को छोड़ा न मनुष्य को।
अतः हम अपनी भावनाओं को रोकना सीखें, ताकि वे इस प्रकार अनुचित रूप से फूट न पड़ें। साथ ही हम यह भी जानें कि परमेश्वर के सेवक, चाहे वे दृढ़ता में कितने ही बढ़कर हों, तौभी अपनी भ्रष्टताओं से पूर्णतः मुक्त नहीं हैं। और यदि किसी समय हमें अपने भीतर ऐसी भावनाओं का अनुभव हो, तो ऐसी परीक्षा हमें निरुत्साहित न करे; वरन् जहाँ तक हम कर सकें और जहाँ तक परमेश्वर हमें अनुग्रह दे, हम उसका सामना करने का प्रयत्न करें, जब तक कि अन्त में हमारे विश्वास की दृढ़ता प्रबल न हो जाए, जैसा हम यिर्मयाह के विषय में देखते हैं। क्योंकि जब वह मन की ऐसी व्याकुलता से दबा हुआ था कि मानो स्वयं अधोलोक में मृतक के समान पड़ा था, तौभी, जैसा हम देख चुके हैं, वह मन की ऐसी स्वस्थता में फिर लाया गया कि उसने बाद में साहस के साथ अपना पद-कार्य पूरा किया, और, जैसा हमने कल देखा, परमेश्वर की सहायता पर गर्व भी किया। आइए हम आगे बढ़ें, —
