यिर्मयाह और विलापगीत पर टीका · खण्ड 2 · यिर्मयाह 32

यिर्मयाह 32

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यिर्मयाह 32

यिर्मयाह 32:1-3

1. यहूदा के राजा सिदकिय्याह के राज्य के दसवें वर्ष में जो नबूकदनेस्सर के राज्य का अठारहवाँ वर्ष था, यहोवा की ओर से यह वचन यिर्मयाह के पास पहुँचा।

1. Sermo qui datus fait Jeremiae a Jehova anno decimo Zedechiae regis Jehudah; hic annus est decimus octavus Nabuchadnezer:

2. उस समय बाबुल के राजा की सेना ने यरूशलेम को घेर लिया था और यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता यहूदा के राजा के भवन वाले पहरे के आँगन में कैदी था।

2. Et tunc exercitus regis Babylonii obsidebat Jerosolymam, et Jeremias propheta erat indusus in atrio custodiae qum est in palatio regis Jehudah;

3. क्योंकि यहूदा के राजा सिदकिय्याह ने यह कहकर उसे कैद किया था, कि तू ऐसी भविष्यद्वाणी क्यों करता है कि यहोवा यों कहता है, देखो, मैं यह नगर बाबुल के राजा के वश में कर दूँगा, और वह इसको ले लेगा;

3. Quia incluserat ipsum Zedechias rex Jehudab, dicendo, Quare tu prophetizas dicendo, sic dicit Jehova, Ecce ego trado urbem hanc in manum regis Babylonii, et capiet eam.

भविष्यद्वक्ता यहाँ यह घोषित करता है कि यद्यपि वह बन्दीगृह में बन्द था, तौभी परमेश्वर का वचन बँधा नहीं था, और वह स्वयं अपने बन्धन में उससे कम स्वतन्त्र और मुक्त नहीं था जितना वह तब होता जब वह सारे नगर में घूमता और सब गलियों और सड़कों में फिरता। अतः बन्दीगृह में डाले जाने पर भी उसने भविष्यद्वक्ता के रूप में अपना पद-कार्य नहीं छोड़ा। और इस प्रकार हम देखते हैं कि स्वर्गीय सत्य की गति रोकी नहीं जा सकती, चाहे संसार उसके सब सेवकों के विरुद्ध कितना ही क्रोध से भड़के, और उन्हें गूँगा बनाने के लिए बाँध दे: और फिर हम यहाँ यह भी देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता की दृढ़ता अजेय थी, क्योंकि यद्यपि वह बन्दी था और संकट की पहुँच से बाहर न था, तौभी वह भय से गिरा नहीं; क्योंकि हम पाते हैं कि उस समय भी वह अपने पद के कर्तव्य को निभाता रहा।

अतः वह उस समय की परिस्थितियों को बताता है, और यह अकारण नहीं, जब वह कहता है कि वह उस समय बन्दीगृह में बन्द था, और वर्ष का भी उल्लेख करता है, अर्थात् सिदकिय्याह का दसवाँ और राजा नबूकदनेस्सर का अठारहवाँ वर्ष। नौवें वर्ष के अन्त के लगभग नबूकदनेस्सर की सेना यरूशलेम पर चढ़ आई थी; उस वर्ष नगर दो महीने तक घिरा रहा। फिर दसवाँ वर्ष आया, जिसमें भविष्यद्वक्ता को यह दर्शन दिया गया। घेराबन्दी डेढ़ वर्ष तक चलती रही; परन्तु बीच में कुछ विराम हुआ; क्योंकि मिस्री उसकी सहायता को आए। इस प्रकार थोड़े समय के लिए, जब कसदी उनका सामना करने गए, नगर को कुछ छुटकारा मिला। परन्तु मिस्री, जैसा हम आगे देखेंगे, लज्जित होकर लौटने को विवश हुए, और बाद में अपने दुस्साहस और उतावलेपन का दण्ड भी भोगा। तब, जैसा हम देखेंगे, घेराबन्दी के लगभग मध्य में परमेश्वर ने भविष्यद्वक्ता को प्रजा के भावी लौटने की बात पहले से बताई। परन्तु यद्यपि परमेश्वर ने उन दुःखी निर्वासितों पर ध्यान दिया, तौभी उसने साथ ही उस बात की पुष्टि की जो उसने अपने आनेवाले पलटे के विषय में पहले कही थी; क्योंकि प्रजा निर्वासन में खदेड़े जाने से पहले पुनःस्थापित नहीं की जा सकती थी। यह सचमुच कठोरता और हठ का एक भयानक उदाहरण था, कि इतनी बार कोड़े खाकर भी उन्हें कोई लाभ न हुआ। उन्होंने यहोयाकीम के अधीन, और यकोन्याह के अधीन भी, परमेश्वर के भारी न्याय का अनुभव किया था; परन्तु इन विपत्तियों की स्मृति शीघ्र ही मिट गई थी, और वे ऐसे निश्चिन्त होकर जीते रहे मानो उन्होंने यिर्मयाह के मुँह से कभी एक शब्द भी न सुना हो: और केवल वही उन्हें धमकी देनेवाला न था, वरन् उससे पहले यशायाह और अन्य लोग थे, और उसी के समय में यहेजकेल भी था, जो कसदियों के देश में निर्वासित किया गया था। अतः वर्षों की संख्या से हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि प्रजा का हठ कितना बड़ा रहा होगा।

साथ ही हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि भक्तों के मन को ढाढ़स देने के लिए यह भविष्यद्वाणी कितनी समयोचित थी, क्योंकि वे चरम विपत्ति से दूर न थे; क्योंकि सिदकिय्याह के ग्यारहवें वर्ष के चौथे महीने में नगर ले लिया गया और ढा दिया गया, प्रजा निर्वासन में खदेड़ दी गई, और मन्दिर जला दिया गया। तब उनके पूर्ण विनाश के समय तक कदाचित् छः या सात महीने से अधिक न रहे थे; यहाँ उस महीने का तो कोई उल्लेख नहीं है जिसमें भविष्यद्वक्ता को दर्शन मिला, केवल दसवें वर्ष का उल्लेख है। अब, जैसा हम कह चुके हैं, नगर ग्यारहवें वर्ष के आरम्भ में ले लिया गया। इसलिए यहाँ से प्रजा की चरम दुष्टता और भी पूर्ण रूप से प्रकट होती है; क्योंकि जब शत्रु ने नगर को घेर रखा था, तब वे यिर्मयाह को बन्दी बनाए हुए थे। उसने बहुत वर्ष पहले ही वह बात बता दी थी जिसकी सच्चाई अब अनुभव उन्हें सिखा रहा था। चालीस वर्ष तक वह पुकारने से और चेतावनी देकर, समझाकर और धमकाकर उन्हें मन फिराव की ओर ले जाने का प्रयत्न करने से नहीं रुका था। अतः जब उन पर कोई नई बात नहीं आई, और जब उन पर आई विपत्तियों से उन्होंने पाया कि यिर्मयाह परमेश्वर का सच्चा और विश्वासयोग्य दास रहा था, तब उसे बन्दीगृह में बन्द करने में उनका क्या उद्देश्य था? क्या यह परमेश्वर से युद्ध करना न था? क्योंकि यिर्मयाह से उनका क्या लेना-देना था? स्पष्टतः उसने कोई निजी भूमिका नहीं निभाई थी, और न उसने केवल उन बातों का स्वप्न देखा था जो उसने उन्हें इतनी बार पहले से बताई थीं। अतः वे किसी नश्वर मनुष्य से नहीं लड़ रहे थे, वरन् दानवों के समान उन्होंने स्वयं परमेश्वर के विरुद्ध अपने सींग उठाने का दुस्साहस किया।

285 दूसरे, तीसरे, चौथे और पाँचवें पद (यिर्मयाह 32:1-5) को कोष्ठक के रूप में रखा जाना चाहिए, क्योंकि वे केवल उन परिस्थितियों का वर्णन करते हैं जो यिर्मयाह से उस समय जुड़ी थीं जब उसे वह दर्शन मिला जिसका वर्णन वह छठे पद में करने लगता है। दूसरे पद में “क्योंकि उस समय” के स्थान पर “और उस समय” अधिक उचित होगा; और तीसरे पद के आरम्भ में “क्योंकि” की अपेक्षा “जहाँ” अधिक अच्छा होगा, “जहाँ सिदकिय्याह ने उसे बन्द कर रखा था,” इत्यादि। सेप्टुआजिंट में “जिसमें” है। — सं.

इसी कारण से वह अपने आप को भविष्यद्वक्ता भी कहता है। यह तो वह प्रायः करता था, परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि यहाँ उसके साथ किए गए अपमान की ओर संकेत किया गया है, कि उस समय भी जब कसदियों ने अपनी सेना से नगर को घेर रखा था, यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता पहरे के आँगन में बन्द था। वह केवल इतना कह सकता था कि यिर्मयाह बन्द था, परन्तु सम्मान के लिए उसने भविष्यद्वक्ता की उपाधि धारण की, जिससे प्रजा के हठ की नीचता और भी स्पष्ट रूप से प्रकट हो, कि यद्यपि उन्होंने अनुभव किया कि परमेश्वर उनसे क्रुद्ध है, तौभी वे अपनी ढिठाई से नहीं रुके; क्योंकि वे उस समय भविष्यद्वक्ता को बन्दीगृह में रखे हुए थे, मानो वे स्वयं परमेश्वर से लड़ रहे हों। हम जानते हैं कि पुरानी कहावत के अनुसार मूर्ख ताड़ना पाकर बुद्धिमान हो जाते हैं। अतः यदि यहूदियों में बुद्धि का एक कण या एक चिंगारी भी होती, तो वे विपत्तियों और आपदाओं से ऐसे वश में किए जा सकते थे कि अपना अहंकार और हठ त्याग देते।

परन्तु हम देखते हैं कि वे वश में न आनेवाले थे, और उन्मत्त प्रकोप के साथ अपनी दुष्टता में बने रहे; क्योंकि शत्रुओं से घिरे होने पर भी उन्होंने परमेश्वर को, मानो, उसके दास के व्यक्तित्व में बन्दी बनाकर रखने का प्रयत्न किया।

पहरे के आँगन के विषय में, मुझे सन्देह नहीं कि वह कैद का कुछ हल्का प्रकार था, क्योंकि हम आगे देखेंगे कि भविष्यद्वक्ता ने विनती की कि उसे वहाँ से उस अन्धेरे कारागार में न डाला जाए जहाँ वह पहले रहा था। उसने किसी बन्दीगृह में बने रहने को कोई साधारण कृपा नहीं समझकर माँगा; और फिर भी वह सब के ठट्ठों का पात्र बना हुआ था। जो भी हो, हम देखते हैं कि प्रजा तब भी कुछ अच्छी नहीं हुई थी, यद्यपि परमेश्वर ने उन्हें पहले ही ताड़ना दी थी और कोड़े लगाए थे।

साथ ही हमें वह बात स्मरण रखनी चाहिए जो मैं पहले कह चुका हूँ, कि यद्यपि दुष्टों ने हर प्रकार से परमेश्वर के वचन को पूरी तरह बुझा देने का प्रयत्न किया, तौभी वे अपनी इच्छा पूरी न कर सके; क्योंकि परमेश्वर ने सब बाधाओं को तोड़ दिया, और उनके सब प्रयत्नों के होते हुए भी अपने वचन की गति को जारी रखा। और इस बात पर ध्यानपूर्वक ध्यान देना चाहिए, क्योंकि आज के दिन हम देखते हैं कि दुष्ट लोग स्वर्गीय सत्य की गति को रोकने के लिए सब प्रकार की युक्तियाँ रचते हैं। अतः यह इतिहास स्मरण रखा जाए, कि यद्यपि यिर्मयाह बन्दी था, तौभी उसका वचन स्वतन्त्र था और उसकी जीभ मुक्त थी, जैसा पौलुस भी गर्व से कहता है कि यद्यपि वह जंजीरों से बँधा था, तौभी परमेश्वर का वचन बँधा नहीं था। (2 तीमुथियुस 2:9)

फिर यह कारण जोड़ा गया है कि वह बन्दीगृह में क्यों बन्द किया गया था, — उसने नगर के और स्वयं राजा के विरुद्ध भविष्यद्वाणी करने का साहस किया था। कोई आश्चर्य नहीं कि राजा का मन क्रोध से भड़क उठा जब यिर्मयाह ने निडर होकर कहा कि वह अपने शत्रुओं के हाथ में पड़ेगा, क्योंकि उसने न केवल नगर के विनाश की, वरन् राजा के पतन की भी बात कही थी; उसने कहा था कि वह राजा नबूकदनेस्सर के सामने लाया जाएगा, और बाबुल को ले जाया जाएगा, और जब तक परमेश्वर उसकी सुधि न ले, तब तक वहीं रहेगा। हम जानते हैं कि राजाओं के कान कितने कोमल होते हैं; अतः कोई आश्चर्य नहीं कि सिदकिय्याह यिर्मयाह के विरुद्ध भड़क उठा; परन्तु फिर भी जब उसने पाया कि यह वाणी परमेश्वर की ओर से आई है, तब उसे नरम और दीन हो जाना चाहिए था। उसका तब भी यिर्मयाह को बन्दी बनाए रखना उसके पागलपन और जड़ता को प्रमाणित करता है, क्योंकि उसे परमेश्वर का कुछ भी ध्यान न था। इस विषय को मैं कल आगे बढ़ाऊँगा।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जब हम प्रतिदिन अपने विरुद्ध तेरे क्रोध को भड़काने से नहीं रुकते, तब हम तेरे वचन के द्वारा चेतावनी पाकर मन फिराएँ, और तेरे सम्मुख अपने आप को ऐसा दीन करें कि तेरे न्याय की कठोरता से पहले ही बच निकलें; और तेरे हाथ से ताड़ना पाकर हम कठोर न हो जाएँ, वरन् तेरे अधीन और सिखाए जाने योग्य बनें, और तेरे अनुशासन के अधीन ऐसी उन्नति करें कि अन्त में पूर्णतः तुझे समर्पित होकर हमारा और कोई उद्देश्य न रहे सिवाय तेरे पवित्र नाम की महिमा करने के, जब तक कि हम उस महिमा के सहभागी न हो जाएँ जो तेरे एकलौते पुत्र ने हमारे लिए प्राप्त की है। — आमीन।

एक सौ छब्बीसवाँ व्याख्यान

कल हमने राजा सिदकिय्याह की ढिठाई और पागलपन के विषय में भी बोलना आरम्भ किया था, कि उसने भविष्यद्वक्ता को बन्दीगृह में रखा, जबकि वह स्वयं, जैसा पहले से बताया गया था, अपने शत्रुओं से घिरा हुआ था। उसने देखा कि यिर्मयाह ने मानो परमेश्वर के मुँह से बात कही थी, क्योंकि भविष्यद्वाणी की पूर्ति ने प्रमाणित कर दिया कि उसने उतावली से कुछ नहीं कहा था, वरन् वही जो ऊपर से उसे सौंपा गया था; तौभी उसने अपनी हठधर्मिता नहीं छोड़ी। स्वयं ये शब्द पर्याप्त रूप से दिखाते हैं कि वह पूरी तरह अन्धा हो गया था, क्योंकि उसने कहा, तू हमसे ऐसी भविष्यद्वाणी क्यों करता है कि कसदी आकर इस नगर को ले लेंगे? इस मूर्ख और उन्मत्त राजा का उद्देश्य वास्तव में यह न था कि भविष्यद्वक्ता का मुँह बन्द करे और साथ ही यह भी मान ले कि उसे परमेश्वर की ओर से आज्ञा मिली थी; परन्तु दुष्टों के साथ सामान्यतः ऐसा ही होता है, वे बिना किसी विवेक या भेद के, मानो अन्धे होकर, परमेश्वर के सेवकों पर टूट पड़ते हैं। यदि कोई उनसे पूछे कि क्या वे खुले और घोषित रूप से परमेश्वर का, जो उनका न्यायी है, विरोध करना चाहते हैं, तो वे इसका इन्कार करेंगे; परन्तु फिर भी वे चेतावनी और डाँट सह नहीं सकते। अतः यहाँ हम मानो एक दर्पण में देखते हैं कि सब दुष्ट कैसे पागलपन से परमेश्वर का विरोध करते हैं, और जहाँ तक हो सके उसके आत्मा को बुझाने का प्रयत्न करते हैं। संक्षेप में, वे परमेश्वर को कुछ अधिकार तो मान सकते हैं, बशर्ते उन्हें इस प्रकार जीने दिया जाए कि उसके भविष्यद्वक्ता उनकी अभिलाषाओं के विरुद्ध कुछ न कहें। तौभी इसमें कोई सन्देह नहीं कि राजा विशेषकर भविष्यद्वक्ता के इन आगे के शब्दों से क्रुद्ध हुआ था, —

यिर्मयाह 32:4

4. और यहूदा का राजा सिदकिय्याह कसदियों के हाथ से न बचेगा, वरन् वह बाबुल के राजा के वश में अवश्य ही पड़ेगा, और वह और बाबुल का राजा आपस में आमने-सामने बातें करेंगे; और अपनी-अपनी आँखों से एक दूसरे को देखेंगे;

4. Et Zedechia rex Jehudah not effugiet e manu Chaldeorum, quia tradendo tradam in manum regis Babel, et loquetur os ejus cum ore illius, et oculi ejus octrios ejus videbunt.

अतः जब राजा ने देखा कि वह सामान्य न्याय से छूटा नहीं रहेगा, तब वह यिर्मयाह से विशेष रूप से अप्रसन्न हुआ; क्योंकि राजा सब व्यवस्थाओं से छूटे रहना चाहते हैं, और जब वे प्रजा को डाँटे जाने देते हैं, तब भी चाहते हैं कि स्वयं वे पवित्र और अछूते समझे जाएँ। अतः जब यिर्मयाह ने राजा सिदकिय्याह को सब साधारण लोगों के साथ एक ही श्रेणी में रखा, तो यह एक घमण्डी राजा के लिए असहनीय बात थी। इसलिए उसका क्रोध ऐसा था कि उसने यिर्मयाह को बन्दीगृह में बन्द कर दिया; और वह तब भी शान्त न हुआ जब परमेश्वर का हाथ उस पर भारी पड़ रहा था। इसके बाद यह आता है, —

यिर्मयाह 32:5

5. और वह सिदकिय्याह को बाबुल में ले जाएगा, और जब तक मैं उसकी सुधि न लूँ, तब तक वह वहीं रहेगा, यहोवा की यही वाणी है; चाहे तुम लोग कसदियों से लड़ो भी, तौभी तुम्हारे लड़ने से कुछ बन न पड़ेगा।

5. Et Babylonem abducet Zedechiam, et illic erit usque dum visitavero ipsum, dicit Jehova; quando proeliati fueritis adversus Chaldeos, no, prospere vobis cedet?

वह उसी विषय को आगे बढ़ाता है, वह कहता है, राजा नबूकदनेस्सर सिदकिय्याह को बन्दी बनाकर ले जाएगा; और जब तक मैं उसकी सुधि न लूँ, तब तक वह निर्वासन में रहेगा। कुछ लोग सुधि लेने के इस समय को उसकी मृत्यु समझते हैं, क्योंकि यह निश्चित है कि वह बाबुल में मरा; और क्योंकि उसकी दशा यकोन्याह की दशा के समान नहीं सुधरी, जो बन्दीगृह की गन्दगी से निकालकर राजा की मेज़ पर लाया गया था, इसलिए यह व्याख्या पहली दृष्टि में सम्भावित लगती है, अर्थात् कि वह दरिद्रता और अपमान से घुलकर मर गया। तौभी ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ राहत की प्रतिज्ञा की गई थी, यदि किसी प्रकार की मृत्यु को सचमुच कृपा समझा जा सके; क्योंकि वह तलवार से नहीं मारा गया; और यद्यपि वह अपने देश को लौटाया नहीं गया, तौभी कहने की इस रीति में कुछ अनुचित नहीं कि वह तब तक निर्वासन में रहेगा जब तक उसकी सुधि न ली जाए, क्योंकि इससे कोई विशेष निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता; और हम आगे देखेंगे कि मरने पर वह आदर और विलाप के साथ गाड़ा गया। अतः कोई आश्चर्य नहीं कि परमेश्वर यहाँ कृपा के एक समय की ओर संकेत करता है, यद्यपि सिदकिय्याह अपने देश को कभी लौटाया नहीं गया, और हम जानते हैं कि राजा नबूकदनेस्सर ने उस पर मुकद्दमा चलाकर और उसे दोषी ठहराकर उसकी आँखें निकलवा डालीं। परन्तु फिर भी परमेश्वर की इस कृपा का यहाँ अकारण उल्लेख नहीं किया गया, क्योंकि अन्त में नबूकदनेस्सर ने उसके साथ अधिक दया का व्यवहार किया, कम से कम उसके गाड़े जाने के विषय में: अतः वह कहता है, नबूकदनेस्सर उसे बाबुल में ले जाएगा, और जब तक मैं उसकी सुधि न लूँ, तब तक वह वहीं रहेगा; अर्थात् वह एक गन्दे बन्दीगृह में निर्वासित बना रहेगा, और वहाँ वह घुलता जाएगा और सब सहायता से वंचित रहेगा; तब वह सबसे नीच लोगों में से एक के समान होगा, और संक्षेप में, मेरे सुधि लेने के समय तक अपमान के साथ अपना जीवन घसीटता रहेगा।

अन्त में वह जोड़ता है, जब तुम कसदियों से लड़ोगे, तो सफल न होगे। यहाँ भविष्यद्वक्ता उन मूर्खतापूर्ण धारणाओं का सामना करता है जो अब भी यहूदियों के मन में भरी हुई थीं, जिससे वे न परमेश्वर के अधीन हुए और न उसके बलवन्त हाथ के नीचे अपने आप को दीन किया; क्योंकि अब भी मनुष्यों की बड़ी संख्या थी, और नगर की किलाबन्दी दृढ़ थी। अतः जब उन्होंने देखा कि उनके पास मनुष्य और सेनाएँ हैं, तो वे अब भी निश्चिन्त थे; और फिर उस लम्बे समय के कारण जिस तक वे घेराबन्दी सह चुके थे, वे कठोर हो गए। जब शत्रु पहला आक्रमण करते हैं, तब सब के मन भय से भर जाते हैं; परन्तु जब परिणाम उनकी आशा को निष्फल कर देता है, तब वे जो पहले काँपते थे, साहस बटोर लेते हैं। यहूदियों के साथ ऐसा ही हुआ; क्योंकि जब नगर पहले-पहल कसदी सेना से घेरा गया, तब दुःखी निवासी निस्सन्देह बहुत भयभीत हुए; परन्तु जब उन्होंने देखा कि उनके शत्रु रुक गए हैं और अपने आक्रमणों से कुछ नहीं कर पा रहे, तब उन्होंने अपने मन को और भी अधिक कठोर कर लिया। क्योंकि हमें उस बात पर ध्यान देना चाहिए जो मैंने कल कही थी, कि जब यिर्मयाह को यह दर्शन दिया गया, तब तक वे कदाचित् छः या आठ महीने से घिरे हुए थे।

इसी कारण उनका भरोसा अधिक था। परन्तु भविष्यद्वक्ता यह कहकर इस मूर्खता को दूर करता है, “तुम कसदियों से लड़ते हो, परन्तु परिणाम विफल होगा; क्योंकि परमेश्वर तुम्हें तुम्हारे शत्रुओं के सामने गिरा देगा, क्योंकि तुम उसी से युद्ध कर रहे हो।”

इस भूमिका का सार यह है कि यिर्मयाह उस समय बन्दीगृह में बन्द था, और यद्यपि परमेश्वर का हाथ राजा पर भारी पड़ रहा था, तौभी वह अपने हठ में बना रहा; और फिर इसका कारण बताया गया है, अर्थात् यह कि उसने निडर होकर राजा और नगर को धमकी दी थी, और घोषित किया था कि परमेश्वर का पलटा उनके निकट है, जिससे राजा निर्वासन में ले जाया जाएगा और नगर उनके शत्रुओं द्वारा ले लिया और लूट लिया जाएगा। अब आगे यह आता है, यिर्मयाह 32:6-15

6. यिर्मयाह ने कहा, यहोवा का वचन मेरे पास पहुँचा,

6. Et dixit Jeremias, Fuit sermo Jehovae ad me dicendo,

7. देख, शल्लूम का पुत्र हनमेल जो तेरा चचेरा भाई है, वह तेरे पास यह कहने को आने पर है, कि मेरा खेत जो अनातोत में है उसे मोल ले, क्योंकि उसे मोल लेकर छुड़ाने का अधिकार तेरा ही है।

7. Ecce Chanameel filius Sellum patrui tui yenit ad to (aut, venturus est ad to) qui dicet, Eme tibi agrum meum qui est in Anathoth; quia tibi jus affinitatis (vertunt, jus redemptionis, sed redemptio illa refertur ad affinitatem, vel cognationem, jus ignitur cognationis) ad emendum.

8. सो यहोवा के वचन के अनुसार मेरा चचेरा भाई हनमेल पहरे के आँगन में मेरे पास आकर कहने लगा, मेरा जो खेत बिन्यामीन देश के अनातोत में है उसे मोल ले, क्योंकि उसके स्वामी होने और उसके छुड़ा लेने का अधिकार तेरा ही है; इसलिये तू उसे मोल ले। तब मैं ने जान लिया कि वह यहोवा का वचन था।

8. Et venit ad me Chanameel filius patrui mei, sicut loquutus fuerat Jehova, ad atrium custodiae, et dixit mihi, Eme agedum agrum meum qui est in Anathoth, quod oppidum est in terra Benjamin, quia tibi jus haereditatis (vel, possessionis; {}ירשsignificat proprie haereditario jure possidere) et tibi redemptio; eme tibi: tunc cognovi quod hic esset sermo Jehovae.

9. और मैं ने उस अनातोत के खेत को अपने चचेरे भाई हनमेल से मोल ले लिया, और उसका दाम सत्रह शेकेल रूपया तौलकर दे दिया।

9. Et emi agrum ab ChanameeI filio patrui mei qui erat in Anathoth, et appendi ei pecuniam, septem siclos et decem nunmxos argentcos.

10. और मैं ने दस्तावेज में दस्तखत और मुहर हो जाने पर, गवाहों के सामने वह रूपया काँटे में तौलकर उसे दे दिया।

10. Et scripsi in libro et obsignavi, et contestatus sum testes, et appendi pecuniam in statem (vel, in lancibus; est in auribus, sed metaphorice trutinam in duali numero vocant aures)

11. तब मैं ने मोल लेने की दोनों दस्तावेजें जिनमें सब शर्तें लिखी हुई थीं, और जिन में से एक पर मुहर थी और दूसरी खुली थी, उन्हें व्यवस्था और रीति के अनुसार लेकर,

11. Et sumpsi librum emptionis obsignatum ex praescripto et ritu (vel, more, vel, statuto) et apertum.

12. अपने चचेरे भाई हनमेल के और दस्तावेजों पर दस्तखत करनेवाले गवाहों के सामने, और उन सब यहूदियों के सामने भी जो पहरे के आँगन में बैठे हुए थे, नेरिय्याह के पुत्र बारूक को, जो महसेयाह का पोता था, सौंप दीं।

12. EL dedi librum emptionis Baruch filio Neriae filii Maassiae coram oculis Chanameel patruelis mei, et coram oculis testium qui scripti erant in libro emptionis, coram oculis omnium Judaeorum qui sedebant in atrio custodiae;

13. तब मैं ने उनके सामने बारूक को यह आज्ञा दी,

13. Et praecepi Baruch coram oculis ipsorum, dicendo,

14. इस्राएल का परमेश्वर, सेनाओं का यहोवा, यों कहता है, इन मोल लेने की दस्तावेजों को जिन पर मुहर की हुई है और जो खुली हुई है, इन्हें लेकर मिट्टी के बर्तन में रख, ताकि ये बहुत दिन तक रहें।

14. Sic dicit Jehova exercituum, Deus Israel, Sume Flbros istos, librum emptionis hunc et obsignatum et librum apertum (hoc est, tam obsignatum quam apertum hunt librum) et pone cos in vase testacco, ut perstent ad multos dies, (nunc sequitur applicatio visionis:)

15. क्योंकि इस्राएल का परमेश्वर, सेनाओं का यहोवा, यों कहता है, इस देश में घर और खेत और दाख की बारियाँ फिर बेची और मोल ली जाएँगी।

15. Quia sic elicit Jehova exercituum, Deus Israel, Adhuc ement domos et agros et vineas in terra hac.

यह सारा खण्ड एक साथ पढ़ा जाना चाहिए, क्योंकि भविष्यद्वक्ता विस्तार से समझाता है कि यह भविष्यद्वाणी किस प्रकार और किस चिह्न के द्वारा पुष्ट की गई थी। अब पूरे खण्ड का उद्देश्य यह दिखाना है कि बहुत समय के पश्चात् यहूदी अपने देश को लौटेंगे, क्योंकि परमेश्वर उन्हें पुनःस्थापित करेगा, और उनकी बन्धुआई का अन्त होगा। अतः परमेश्वर का अभिप्राय उन्हें छुटकारे की आशा देना था, परन्तु साथ ही उन्हें यह चेतावनी दी गई कि वे अपने निर्वासन के अन्त की धीरज से बाट जोहें।

अब हम बाहरी चिह्न पर आएँ। भविष्यद्वक्ता को आज्ञा दी गई कि वह अपने चचेरे भाई से एक खेत मोल ले। अब यह विचित्र लगता था, क्योंकि शत्रुओं ने देश के उस भाग पर अधिकार कर लिया था, और उस समय कोई भी यहूदी अपने खेतों में बाहर जाने का साहस न कर सकता था। अतः जब वे अपने खेतों को देखने तक से वंचित थे, तब भविष्यद्वक्ता, जब उसने शत्रुओं के अधिकार में पड़ा एक खेत मोल लिया, अवश्य ही ऐसा प्रतीत हुआ होगा मानो उसकी बुद्धि ठिकाने न हो। परन्तु इस रीति से परमेश्वर यह दिखाना चाहता था कि जब यहूदी कुछ समय तक देश के अधिकार से वंचित रहेंगे, उसके पश्चात् वे फिर उसमें लौटेंगे, जिससे हर एक अपना अधिकार फिर प्राप्त करेगा, और इस प्रकार सब कुछ पूर्ण रूप से फिर उनका हो जाएगा, अर्थात् जब परमेश्वर उन पर दया कर चुकेगा।

परन्तु पहले हम यह देखें कि क्या यह, जैसा वे कहते हैं, केवल एक दर्शन मात्र था, या एक वास्तविक घटना। कुछ लोग सोचते हैं कि यह भविष्यद्वाणी के आत्मा के द्वारा यिर्मयाह को दिखाया गया था; परन्तु प्रसंग से सहज ही समझा जा सकता है कि खेत सचमुच मोल लिया गया था। पहले यह कहा गया है कि वचन यिर्मयाह के पास पहुँचा; परन्तु थोड़ी ही देर बाद यह जोड़ा गया है कि जब उसका चचेरा भाई आया, तब यिर्मयाह को यह बताया गया कि यह सारा कार्य परमेश्वर के द्वारा निर्देशित था। अतः परमेश्वर ने भविष्यद्वक्ता को पहले से बताया कि क्या होनेवाला था, देख, शल्लूम का पुत्र हनमेल, जो तेरा चचेरा भाई है, तेरे पास आएगा, और अपना खेत तुझे बेचने का प्रस्ताव करेगा।

यह वह बात है जो परमेश्वर ने भविष्यद्वक्ता से कही; और यहाँ तक हम कह सकते हैं कि यिर्मयाह को स्वप्न या दर्शन के द्वारा बताया गया कि क्या होनेवाला था; परन्तु जब वह आगे जोड़ता है कि हनमेल स्वयं आया, और यिर्मयाह साक्षी देता है कि अब उसने जान लिया कि यह प्रभु की ओर से था, तब इसमें कोई सन्देह नहीं कि यह एक वास्तविक वृत्तान्त है। अतः परमेश्वर ने हनमेल को प्रेरित किया कि वह यिर्मयाह के पास आए और उसे खेत बेचने का प्रस्ताव करे, और उससे उसे मोल लेने को कहे, क्योंकि वह निकटतम उत्तराधिकारी था, और इसलिए उसे छुड़ाने का अधिकार उसी का था। अतः हम समझते हैं कि यह ऊपर से आया हुआ सन्देश था, परन्तु उसके साथ वास्तविकता भी जुड़ी हुई थी, क्योंकि हनमेल आया और उसने गवाहों के सामने खेत बेचा; और यह सब आवश्यक था, यिर्मयाह के कारण उतना नहीं जितना सारी प्रजा के कारण, और विशेषकर विश्वासियों के कारण, जिनके लिए यह भविष्यद्वाणी विशेष रूप से अभिप्रेत थी; क्योंकि परमेश्वर का अभिप्राय यह न था कि यह एक सामान्य निधि हो, वरन् उसने इसे अपने चुने हुए लोगों के लिए रख छोड़ा, जैसा हम निष्कर्ष से समझ सकते हैं।

अतः हनमेल के आने से पहले भविष्यद्वक्ता को सिखा दिया गया था कि कुछ भी बिना विचार के नहीं किया गया, वरन् परमेश्वर ने सब कुछ व्यवस्थित और नियोजित किया था। तब उसे आज्ञा दी गई कि वह खेत मोल ले, और मानो अपना धन फेंक दे; क्योंकि कौन यह न कहता कि यह उसे फेंक देने के समान ही था? और फिर हमें समय की एक परिस्थिति पर ध्यान देना है; क्योंकि भविष्यद्वक्ता उस समय अपने प्राण के संकट में था, तो फिर उस खेत से उसे क्या प्रयोजन था? हम यह भी कह चुके हैं कि यदि वह बन्दीगृह में बन्द न भी होता, तौभी वह उस तक स्वतन्त्रता से न पहुँच सकता था; क्योंकि वह नगर से बाहर जाने का साहस न कर सकता था। अतः शरीर के विचार के अनुसार यह अत्यन्त विचित्र और हास्यास्पद क्रय था; क्योंकि यिर्मयाह ने अपना धन उड़ा दिया, और खेत का अधिकार केवल काल्पनिक था। परन्तु फिर भी, क्योंकि परमेश्वर चाहता था कि वह उसे मोल ले, उसने अपने धन को नहीं बचाया, वरन् अपने चचेरे भाई से वह खेत मोल ले लिया।

फिर वह कहता है कि उसका चचेरा भाई हनमेल, जैसा यहोवा ने कहा था, आया, कि वह पहरे के आँगन में आया, और उसने उससे वैसे ही बातें कीं जैसा परमेश्वर ने पहले से बताया था। पद के अन्त के विषय में, यह विचित्र लग सकता है कि भविष्यद्वक्ता कहता है कि अब उसने जान लिया कि वचन परमेश्वर की ओर से आया था: क्योंकि यदि उसने पहले सन्देह किया, तो भविष्यद्वाणी के आत्मा के विषय में निश्चयता कहाँ रही? उसे पहले ही एक दर्शन मिल चुका था; उसे चाहिए था कि जिस बात के विषय में वह जानता था कि ऊपर से उसे पहले से बताई गई है, उसे बिना किसी हिचकिचाहट के ग्रहण कर ले: परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि वह असमंजस और उलझन में था। अतः यह अविश्वास का प्रमाण लगता है कि उसने परमेश्वर की गवाही पर पूर्ण और सम्पूर्ण भरोसा नहीं रखा, और स्वर्गीय वाणी के विषय में तब तक पूरी तरह आश्वस्त नहीं हुआ जब तक उसने सारी बात को वास्तव में पूरा होते न देख लिया। परन्तु आत्मा के प्रकाशन से प्राप्त ज्ञान और, जैसा वे कहते हैं, अनुभवजन्य ज्ञान के बीच भेद करना उचित है। अतः भविष्यद्वक्ता ने उस समय पहली बार यह नहीं सीखा कि परमेश्वर ने कहा था, परन्तु क्योंकि वह अपने विश्वास की निश्चयता में, और स्वयं उस बात में, पुष्ट किया गया, इसलिए इसमें कोई असंगति नहीं है; क्योंकि जब वास्तविकता और अनुभव हमें पुष्ट करते हैं, तब परमेश्वर के वचन की विश्वसनीयता और अधिकार में से कुछ भी घटाया नहीं जाता; और इस प्रकार परमेश्वर प्रायः अपने लोगों की निर्बलता का ध्यान रखता है। अतः यिर्मयाह ने परमेश्वर की वाणी पर भरोसा किया, और उसे पूर्ण निश्चय था कि उसे ऊपर से खेत मोल लेने का निर्देश दिया गया है; परन्तु बाद में, जब हनमेल उसके पास आया, तब वह घटना मानो दर्शन पर मुहर थी: तब परमेश्वर की सच्चाई भविष्यद्वक्ता के हृदय में और भी अधिक पुष्ट हुई। यह, जैसा मैं कह चुका हूँ, अनुभवजन्य ज्ञान था, जो वचन की विश्वसनीयता में से कुछ नहीं घटाता, वरन् मानवीय निर्बलता के लिए सहायता और सान्त्वना है। इसी अर्थ में उसने कहा कि अब उसने यह जान लिया; और इस प्रकार उसका अभिप्राय दूसरों को भी भविष्यद्वाणी पर विश्वास कराना था। क्योंकि जब विश्वासी किसी दर्शन की तुलना उसकी पूर्ति से करते हैं, तब यह मेल और, कहें तो, सामंजस्य उनके विश्वास को पुष्ट करने में थोड़ा नहीं, वरन् बहुत काम आता है, जैसे जब एक ओर वे सुनते हैं कि परमेश्वर ने कहा था, और दूसरी ओर देखते हैं कि जो कुछ भविष्यद्वक्ता को सिखाया गया था वह सचमुच पूरा हुआ।

आगे वह जोड़ता है कि उसने अपने चचेरे भाई हनमेल से वह खेत मोल लिया जो बिन्यामीन देश के अनातोत में था। इन शब्दों में कुछ भी व्यर्थ नहीं है, क्योंकि यद्यपि भविष्यद्वक्ता सुपरिचित स्थानों की बात करता है, तौभी उसने क्रय के समय का ध्यान रखा, क्योंकि बिन्यामीन का देश उस समय शत्रुओं के अधिकार में था: यहूदी ऐसी सकेती में पहुँच गए थे कि वे यरूशलेम में भी सुरक्षित न थे। अनातोत, जैसा भली-भाँति ज्ञात था, एक गाँव था, जो शत्रुओं की लूटमार के लिए खुला पड़ा था, और उनके पहले ही आगमन पर शिकार के रूप में पकड़ लिया गया था। और वह जोड़ता है, बिन्यामीन देश में, क्योंकि वह यहूदा की सीमाओं के निकट था, परन्तु उसके निवासी उसे छोड़ चुके थे, और सब भागकर यरूशलेम चले गए थे। अतः जब बिन्यामीन के देश में कोई निवासी न था, तब भविष्यद्वक्ता का वहाँ के किसी खेत के लिए छोटी से छोटी रकम चुकाना भी किसी प्रकार उचित न था। 286 गेटेकर और वेनेमा इस वाक्यांश का एक अन्य अर्थ देते हैं। जैसा हम सातवें पद (यिर्मयाह 32:7) से पाते हैं, प्रभु ने उससे खेत मोल लेने को नहीं कहा, वरन् केवल हनमेल के आने और उसके प्रस्ताव की सूचना दी। जब हनमेल आया, तब उसने जान लिया कि परमेश्वर की इच्छा यह है कि वह खेत मोल ले, और उसने तुरन्त उसके अनुसार कार्य किया। उसने उन परिस्थितियों से ही जान लिया कि यह परमेश्वर का सन्देश था, जो उसे खेत मोल लेने के लिए भेजा गया था। — सं.

अब यह पूछा जा सकता है कि हनमेल, जो लेवीय वर्ग का था, खेत कैसे बेच सकता था, क्योंकि हम जानते हैं कि खेत लेवियों के न थे, और दशमांश उनका निज भाग था। (गिनती 18:21) परन्तु इसे नगर के बाहर की चराई की भूमि का खेत समझना चाहिए, क्योंकि उनके पास नगरों के आस-पास की भूमि थी, और प्रत्येक के पास एक चरागाह था: वे न हल चलाते थे और न काटते थे, और व्यवस्था के अनुसार उनके लिए खेती का परिश्रम करना उचित भी न था, परन्तु वे गाय-बैल और भेड़-बकरियाँ चराते थे: और यह दी गई रकम की थोड़ाई से प्रमाणित होता है; क्योंकि खेत किस दाम पर बेचा गया? सात शेकेल और दस चाँदी के टुकड़ों पर। इससे हम देखते हैं कि वह कोई बड़ा खेत न था, वरन् केवल बगीचे के समान एक चरागाह था; क्योंकि यदि वह कई एकड़ भूमि होती, तो दाम अधिक होता। तब यहाँ की कठिनाई सहज ही दूर हो जाती है, क्योंकि हनमेल ने यिर्मयाह को एक छोटा-सा चरागाह बेचा, क्योंकि प्रत्येक लेवीय के पास नगर के आस-पास अपनी भेड़ों या पशुओं को चराने के लिए एक चरागाह होता था; साथ ही उनमें से किसी के पास बड़े झुण्ड न थे, वरन् प्रत्येक के पास एक या दो गायें होती थीं। अतः खेत से हमें यही समझना है।

भविष्यद्वक्ता जोड़ता है कि उसने एक पुस्तक लिखी, अर्थात् क्रय का लेख; क्योंकि {}ספרसेफ़ेर का अर्थ इब्रानी में केवल एक ग्रन्थ ही नहीं, वरन् वह भी है जिसे हम दस्तावेज कहते हैं, और लातीनी लोग पट्टिकाएँ (tabulas) कहते हैं। फिर वह कहता है कि क्रय का लेख बनाया गया, और फिर उस पर मुहर की गई, उस प्रकार नहीं जैसे हम उस पर मुहर लटकाकर करते हैं, वरन् उस समय की रीति के अनुसार वह बन्द कर दिया गया। वह यह भी जोड़ता है, व्यवस्था और रीति के अनुसार; और अन्त में वह कहता है कि एक दूसरा लेख बनाया गया जो खुला रहा; और यह समझा जाता है कि खुले लेख का अर्थ वह है जिसे हम प्रतिलिपि कहते हैं; और इस प्रकार मुहरबन्द लेख एक सन्दूक में रख दिया गया, और खुली प्रतिलिपि किसी भी समय देखी जा सकती थी।

यद्यपि भविष्यद्वक्ता एक सामान्य रीति की ओर संकेत करता है, तौभी मुझे सन्देह नहीं कि उसने यह भविष्यद्वाणी पत्रों पर लिखी, एक मुहरबन्द और दूसरी खुली, ताकि जो लोग उस समय जीवित थे वे उसकी शिक्षा से कुछ लाभ पाएँ, और यह भी कि प्रामाणिक प्रति, अर्थात् स्वयं मूल लेख, आनेवाली पीढ़ियों के लिए बना रहे, जैसा हम आगे देखेंगे।

और निस्सन्देह परमेश्वर का अभिप्राय केवल यही न था कि निर्वासन का समय पूरा होने के बाद विश्वासियों की आशा को दृढ़ करे, क्योंकि यह भविष्यद्वाणी सत्तर वर्ष तक सोई पड़ी रहती; वरन् उसका अभिप्राय यह भी था कि यह उस समय भी उपयोगी हो, जिससे उनके दुःखों में उन्हें सहारा मिले। इस भविष्यद्वाणी से एक और लाभ भी मिलना था, अर्थात् यह कि यहूदी निर्वासन में रहते हुए आशा रखने लगें, और इस दर्शन को स्मरण करके निश्चय जानें कि परमेश्वर, अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार, उनका छुड़ानेवाला होगा।

अतः यही कारण था कि क्रय के दो लेख बनाए गए, मुहरबन्द और खुला। खुले लेख का लाभ तत्काल था, क्योंकि वह विश्वासियों को और अधिक स्वेच्छा से निर्वासन में जाने, और परमेश्वर द्वारा उनके लिए ठहराई गई ताड़ना के अधीन शान्ति से रहने को प्रेरित करता; और इसी कारण भविष्यद्वाणी को सब के लिए खुला रहना था। वह मुहरबन्द भी किया गया, ताकि सत्तर वर्ष बीत जाने के पश्चात् वह भक्तों में जीवन फूँके, और उन्हें उनके प्रतिज्ञात छुटकारे की आशा से भर दे। अतः, जैसा मैं समझता हूँ, यही कारण है कि भविष्यद्वक्ता बताता है कि उसने एक लेख बनाया और उस पर मुहर की, और फिर एक दूसरा लेख बनाया जो खुला रहा।

287 हम इन शब्दों का अक्षरशः अनुवाद इस प्रकार कर सकते हैं, “और मैं ने उसके लिए रूपया तौला, सात शेकेल और दस, वह रूपया।” शब्द “चाँदी” है, परन्तु इसे प्रायः रूपये के अर्थ में लिया जाता है। लाउथ के अनुसार सत्रह शेकेल हमारे लगभग दो पाउण्ड के बराबर थे। — सं.

288 इसमें कोई सन्देह नहीं कि दो पत्र या लेख थे, जैसा यिर्मयाह 32:14 से स्पष्ट प्रकट होता है, जहाँ दोनों का अलग-अलग उल्लेख है, “इन पत्रों को, क्रय के इस पत्र को, अर्थात् मुहरबन्द को, और इस खुले पत्र को ले,” इत्यादि। {{ספר शब्द का अनुवाद, जब उसके पहले उपपद हो, सर्वत्र या तो पत्र, या पुस्तक, या लेख किया जाना चाहिए, न कि “साक्षी-पत्र,” जैसा हमारे अनुवाद में है। अधिकांश लोगों के अनुवाद के अनुसार दसवें पद (यिर्मयाह 32:10) में एक असंगति प्रतीत होती है; “गवाहों” के उल्लेख से पहले, और रूपया तौले जाने से पहले ही पत्र को “मुहरबन्द” बताया गया है। मेरी समझ में अनुवाद इस प्रकार होना चाहिए, “तब मैं ने एक पत्र में लिखा; और जब मैं ने गवाहों से उसकी साक्षी करा ली, और काँटे में रूपया तौल दिया, तब उस पर मुहर की।” {}ו का अनुवाद प्रायः “जब” और “तब” भी किया जा सकता है, जैसा हमारे अनुवाद में अगले पद में किया गया है, यद्यपि वहाँ “और” अधिक उपयुक्त होता। पद 12 (यिर्मयाह 32:12) में स्पष्ट कहा गया है कि “गवाहों” ने क्रय की उस पुस्तक या पत्र पर, जिस पर मुहर की गई थी, हस्ताक्षर किए, या उसमें लिखा। — सं.

इसके पश्चात् वह आगे कहता है कि उसने दोनों को अपने लेखक बारूक को, जो नेरिय्याह का पुत्र और महसेयाह का पोता था, हनमेल के सामने, और उन साक्षियों के सामने जिन्होंने लेखों पर हस्ताक्षर किए थे, और वहाँ खड़े सब लोगों के सामने, अर्थात् पहरे के आँगन में, सौंप दिया। इससे हम फिर स्पष्ट रूप से यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि वह एक वास्तविक इतिहास का वर्णन कर रहा है, न कि किसी ऐसे दर्शन का जो उसे दिखाया गया हो: बेचनेवाला हनमेल साक्षियों और अन्य यहूदियों के साथ वहाँ उपस्थित था; और वह कहता है कि उसने कुछ निश्चित आज्ञाओं के साथ वह लेख सौंपा, क्योंकि अन्यथा वह केवल एक पुस्तक का सौंप देना ही होता। यदि उसने उसे केवल बारूक के पास रख दिया होता, तो लोग कुछ भी न सीखते; परन्तु आज्ञाएँ भी जोड़ी गई हैं, मैंने बारूक को आज्ञा दी, कि इत्यादि। इससे हम यह भी निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि यह परमेश्वर-वाणी भविष्यद्वक्ता को केवल इसलिए नहीं दी गई कि वह बन्धुआई का समय पूरा हो जाने के बाद भी आनेवाली पीढ़ियों के लिए बनी रहे, वरन् इसलिए भी कि वह उसी समय प्रकाशित की जाए और सब यहूदियों पर प्रगट कर दी जाए। फिर वह कहता है, यहोवा यों कहता है

उसने अब तक भविष्यद्वाणी का उद्देश्य नहीं दिखाया था; परन्तु जब उसने कहा कि यह कार्य परमेश्वर की आज्ञा से किया गया, तब उसने उन सब को ध्यान देने के लिए तत्पर कर दिया। इन लेखों को लेकर, वह कहता है, मिट्टी के अर्थात् कुम्हार के बरतन में रख यह विचित्र प्रतीत होता है कि उसने उन्हें किसी दूसरे प्रकार के बरतन में रखने की आज्ञा नहीं दी, क्योंकि वह बरतन गल-सड़ सकता था, और इस प्रकार लेख भी नष्ट हो सकते थे। परन्तु हम जानते हैं कि सबसे बहुमूल्य धन भी मिट्टी के बरतनों में रखा जाता है। तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि परमेश्वर ने भविष्यद्वाणी को मिट्टी के बरतन में रखने की आज्ञा दी। यदि कोई इससे कुछ अधिक सूक्ष्म अर्थ समझना चाहे, तो कहा जा सकता है कि वह प्रतिज्ञा, जो देखने में बहुत दृढ़ नहीं थी, एक मिट्टी का बरतन थी; क्योंकि उस शब्द से अधिक क्षणभंगुर क्या है जो वायु में विलीन हो जाता है? यहूदी बन्धुआई में खदेड़ दिए गए; उन्होंने यिर्मयाह के मुँह से सुना था कि ठहराई हुई अवधि सत्तर वर्ष की है: परन्तु इस बीच वे निराश हो सकते थे, क्योंकि केवल शब्द की ध्वनि ही उनके कानों तक पहुँची थी। जो भी हो, क्योंकि वह परमेश्वर-वाणी, जो छुटकारे की बयाना थी, मिट्टी के बरतन में रख दी गई थी, इसलिए वह सुरक्षित और अक्षय बनी रही, क्योंकि वह धन परमेश्वर की आज्ञा से वहाँ रखा गया था।

289 ग्यारहवें पद (यिर्मयाह 32:11) का, जहाँ दोनों पत्रों का पहली बार उल्लेख हुआ है, अनुवाद करना कठिन है। मैं 11वें, 12वें, 13वें और 14वें पदों का निम्नलिखित शाब्दिक अनुवाद प्रस्तुत करता हूँ, — 11. और मैंने मोल लेने का लेख लिया, — वह जो मुहरबन्द था, आज्ञा और शर्तें, — और वह जो खुला था; और मैंने मोल लेने का लेख नेरिय्याह के पुत्र बारूक को दिया, 12. जो महसेयाह का पुत्र था, अपने चचेरे भाई हनमेल के देखते, और उन साक्षियों के देखते जिन्होंने मोल के पत्र में लिखा था, और उन सब यहूदियों के देखते जो 13. पहरे के आँगन में बैठे थे; और मैंने उनके देखते बारूक को आज्ञा दी, 14. कि, "सेनाओं का यहोवा, इस्राएल का परमेश्वर यों कहता है, 'इन पत्रों को, — मोल लेने के इस पत्र को, अर्थात् उस मुहरबन्द को, और इस खुले पत्र को, लेकर मिट्टी के बरतन में रख, जिससे वे बहुत दिनों तक बने रहें।' " दोनों पत्रों को पद 11 में "मोल लेने का लेख" कहा गया है, परन्तु उनमें भेद किया गया है, एक "मुहरबन्द" कहा गया है और दूसरा "खुला," अर्थात् बिना मुहर का। मुहरबन्द पत्र में "आज्ञा," अर्थात् मोल लेने की, और "शर्तें" थीं, जिसका शाब्दिक अर्थ "विधियाँ" है; जिसका अनुवाद ब्लेनी "हस्तान्तरण और सीमाएँ" करता है, और वल्गेट "अनुबन्ध और पुष्टियाँ"। परन्तु {{מצוהका अर्थ आज्ञा या उपदेश के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता, और {}חקיםवे बातें हैं जो निश्चित, स्थिर या ठहराई गई हों, और उनका अनुवाद "अनुबन्ध" किया जा सकता है। इस प्रकार मुहरबन्द पत्र की विषय-वस्तु का उल्लेख किया गया है, परन्तु खुले पत्र की विषय-वस्तु का स्पष्ट उल्लेख नहीं हुआ है। — सं.

वह कहता है, जिससे वे बहुत दिनों तक बने रहें इन शब्दों से वह संकेत करता है कि यह भविष्यद्वाणी न केवल उन यहूदियों के लिए लाभदायक होगी जो शीघ्र ही बन्धुआई में खदेड़े जानेवाले थे, वरन् उनके वंशजों के लिए भी जो अभी उत्पन्न नहीं हुए थे, और यह कि वे जान लें कि यह भविष्यद्वाणी उनकी मृत्यु के बाद भी अटल बनी रहेगी, क्योंकि हमें परमेश्वर की सच्चाई को अपने जीवन की अवधि से नहीं मापना चाहिए। तो यही कारण था कि यह वाक्यांश जोड़ा गया: भविष्यद्वाणी को मिट्टी के बरतनों में सुरक्षित रखा जाना था, जिससे वह बहुत दिनों तक, अर्थात् जब तक परमेश्वर अपनी प्रजा को छुड़ा न ले, सुरक्षित और सुनिश्चित बनी रहे।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जब आज के दिन अनन्त उद्धार की साक्षी मिट्टी के बरतनों में मुहरबन्द होकर हमारे पास है, और तू मनुष्यों के शब्द के द्वारा हमें उस धन्य मीरास की आशा की ओर बुलाता है, — तो यह वर दे कि हम तेरी सच्चाई की स्थिरता को उनके रूप-रंग से न आँकें जिन्हें तूने हमारे सेवक ठहराया है, वरन् तेरी अनन्तता पर भरोसा रखते हुए हम कभी सन्देह न करें कि वह जीवन, जो अब हर क्षण लुप्त होता हुआ प्रतीत होता है, हमारे लिए सुरक्षित रखा जाएगा, जब तक कि अन्त में हम हमारे प्रभु मसीह यीशु में उसके पूर्ण उपभोग तक न पहुँच जाएँ। — आमीन।

एक सौ सत्ताईसवाँ व्याख्यान

यद्यपि हम पिछली भविष्यद्वाणी का अर्थ भली-भाँति समझ चुके हैं, तौभी उसके अन्तिम भाग को, जो दर्शन का प्रयोग है, संक्षेप में छू लेना उचित होगा, इस देश में घर और खेत और दाख की बारियाँ फिर मोल ली जाएँगी तो परमेश्वर का उद्देश्य यह था कि उसका दास अपने निज लाभ का कुछ भी विचार किए बिना अपना धन लगाए, जिससे वह इस व्यय के द्वारा विश्वासयोग्य लोगों की आशा को पुनःस्थापना के समय तक पोषित करे। जो यहाँ कहा गया है वह अविश्वसनीय समझा जाता था, क्योंकि किसी को यह विचार भी न था कि ऐसा परिवर्तन होगा कि यहूदियों को अपने देश में लौटने की अनुमति दी जाएगी; क्योंकि कसदी साम्राज्य की शक्ति अजेय समझी जाती थी, और परमेश्वर की प्रजा के छुटकारे के लिए आवश्यक था कि वह पूर्णतः उलट दिया जाए। तो इसी कारण से यह दर्शन दिया गया, अर्थात् इसलिए कि यहूदी जान लें कि उनकी विपत्ति सदा की नहीं होगी, क्योंकि परमेश्वर ने प्रजा और देश को पुनःस्थापित करने का निश्चय कर लिया था। परन्तु खेत शब्द से सब प्रकार की सम्पत्ति सूचित की गई, क्योंकि वह केवल खेतों का ही नहीं, वरन् घरों और दाख की बारियों का भी नाम लेता है। अब आगे लिखा है, —

यिर्मयाह 32:16-18

16. जब मैंने मोल लेने की वह लिखत नेरिय्याह के पुत्र बारूक के हाथ में दी, तब मैंने यहोवा से यह प्रार्थना की,

16. Et prcatus sum Jehovam postquam dedi librum emptionis Baruch filio Neriae, dicendo,

17. हे प्रभु यहोवा! तूने बड़े सामर्थ्य और बढ़ाई हुई भुजा से आकाश और पृथ्वी को बनाया है; तेरे लिए कोई काम कठिन नहीं है:

17. Heu Domine Jehova! Ecce tu fecisti coelos et terram in potentia tua magna et brachio tuo extento; non est ulla res abscondita a to, (vel, mirabilis)

18. तू हज़ारों पर करुणा करता रहता है, और पूर्वजों के अधर्म का बदला उनके बाद उनके वंश के लोगों की गोद में भरता है: हे महान् और पराक्रमी परमेश्वर, जिसका नाम सेनाओं का यहोवा है,

18. Faciens (vel, tu facis) clementiam erga mille et rependis iniquitatem patrum in sinum filiorum eorum post ipsos; Deus fortis, potens, Jehova exercituum nomen ejus, (et quoe sequuntur)

यद्यपि भविष्यद्वक्ता अपना पद निभा रहा था, तौभी वह मान लेता है कि वह स्वयं उस दर्शन से उलझन में पड़ गया था। इससे प्रकट होता है कि परमेश्वर की युक्ति भविष्यद्वक्ताओं पर हर बात में सदा प्रगट नहीं की जाती थी, परन्तु उतनी ही जितनी उपयोगी थी। तौभी भविष्यद्वक्ता अन्यजाति शकुन-विचारकों के समान भावावेश में नहीं आ जाते थे, जो यह दिखावा करते थे कि वे अपनी सब इन्द्रियों से परे उठा लिए गए हैं। अतः भविष्यद्वक्ताओं में ऐसा उन्माद नहीं था कि वे ठनठनाते पीतल के समान, या बिलाम की गदही के समान बोलें; परन्तु प्रभु ने उन पर वह प्रगट किया जो वे सिखाते थे। तो वे शिष्य थे, कि जो कुछ उन्हें सौंपा गया था उसे वे विश्वासयोग्यता से, मानो हाथ से हाथ, लोगों तक पहुँचाएँ। परन्तु जिस ज्ञान से वे सम्पन्न किए गए थे, वह कुछ बातों के विषय में अज्ञानता से असंगत नहीं था; जैसे जब भविष्यद्वक्ता ने कहा, घर और खेत और दाख की बारियाँ फिर मोल ली जाएँगी, तब वह जानता था कि परमेश्वर ने देश और प्रजा की पुनःस्थापना की प्रतिज्ञा की है, और न वह दर्शन स्वयं कोई धुँधली पहेली था; तौभी उसका कारण उससे छिपा हुआ था, और इसी से वह उलझन उत्पन्न हुई जिसकी वह अब चर्चा करता है; क्योंकि ऐसी अद्भुत बात से चकित होकर उसने प्रार्थना की शरण ली, और मान लिया कि उसका मन उलझन में पड़ा है। तो भविष्यद्वक्ता का आश्चर्य उसकी अज्ञानता से उत्पन्न हुआ; परन्तु वह अज्ञानता भविष्यद्वाणी-सम्बन्धी ज्ञान से असंगत नहीं थी। क्योंकि जितना आवश्यक था, और जितना शिक्षक का पद माँगता था, उतना वह निस्सन्देह परमेश्वर की युक्ति को समझता था; परन्तु इस भेद की ऊँचाई या गहराई ऐसी थी कि उसे यह मानना पड़ा कि यह परमेश्वर का ऐसा कार्य है जो उसके सब विचारों से परे है।

तो अब हम समझते हैं कि ये दोनों बातें कैसे एक साथ ठहरती हैं, — वह भविष्यद्वाणी-सम्बन्धी ज्ञान जिससे यिर्मयाह सम्पन्न था, और वह अज्ञानता जिसने उसे यह पुकार उठाने को विवश किया। जो कुछ उसे दर्शन में दिखाया गया था उसे वह निश्चयपूर्वक जानता था, परन्तु उसका उद्देश्य क्या था और परमेश्वर यह कार्य कैसे कर सकता है, यह उसे अगम्य प्रतीत हुआ, और इसी से उसका विस्मय उत्पन्न हुआ। इसलिए वह कहता है कि उसने प्रार्थना की: और इससे हमें यह सिखाया जाता है कि जब कभी ऐसे विचार हमारे मन में घुस आएँ जो हमें इधर-उधर उछालते हैं, तब हमें प्रार्थना की शरण में भागना चाहिए। क्योंकि बहुत से लोग अपनी चिन्ताओं को पाल-पोसकर बढ़ा लेते हैं, जब वे चारों ओर मुड़ते हैं, और अपने ही विचारों में बहते रहते हैं, और बिना किसी लाभ के अपने आप को थका डालते हैं। इसलिए जब कभी कोई चिन्ता चुपके से हमारे मन को पकड़ ले, तो हम जान लें कि उचित समय पर उसका उपचार किया जाना चाहिए, अर्थात् परमेश्वर से प्रार्थना करना; जिससे वह हमें राहत दे, और हमें गहरे में डूबने न दे, जैसा कि प्रायः उन सब के साथ होता है जो जिज्ञासु हैं और अपनी कल्पनाओं की लगाम ढीली छोड़ देते हैं।

अब हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता अत्यन्त चकित हुआ, तौभी इस प्रकार कि उसने जो लाभदायक था उससे अधिक की खोज नहीं की; परन्तु उसने तुरन्त प्रार्थना की कि परमेश्वर उसे वह बात समझा दे जो उसके मन को दुःख दे रही थी। उसकी प्रार्थना आगे दी गई है, जो तौभी भविष्यद्वक्ता के मन को तुरन्त प्रगट नहीं करती, क्योंकि जब तक वह 25वें पद (यिर्मयाह 32:25) तक नहीं पहुँचता, तब तक वह अपनी प्रार्थना का उद्देश्य नहीं दिखाता।

परन्तु यहाँ वह ऐसी बहुत सी बातों की चर्चा करता प्रतीत होता है जिनका उसके विषय से कोई सम्बन्ध नहीं। उसका उद्देश्य उसकी प्रार्थना के निष्कर्ष से जाना जाना चाहिए, "हे प्रभु," वह कहता है, "तूने मुझे वह खेत मोल लेने की आज्ञा क्यों दी जो अब शत्रुओं के हाथ में है? कसदी उस पर अधिकार किए हुए हैं; और तूने मुझे अपना धन व्यर्थ फेंक देने की आज्ञा दी है।" सार रूप में यही उसकी प्रार्थना थी।

परन्तु यिर्मयाह भटकता हुआ और लम्बे चक्कर लगाता हुआ प्रतीत होता है जब वह कहता है, "तूने अपने बड़े सामर्थ्य और बढ़ाई हुई भुजा से आकाश और पृथ्वी को बनाया है; तेरे लिए कुछ भी अद्भुत नहीं है; तू हज़ार पीढ़ियों पर दया करता है; तू पूर्वजों के अधर्म का बदला उनके बच्चों को देता है; तेरा नाम सेनाओं का यहोवा है; तू युक्ति में महान् और कार्य में श्रेष्ठ है; तेरी आँखें खुली रहती हैं," इत्यादि। ये बातें वर्तमान विषय से तनिक भी सम्बन्ध रखती प्रतीत नहीं होतीं। परन्तु भविष्यद्वक्ता का उद्देश्य निस्सन्देह यह था कि वह मानो लगाम लगाकर अपने आप को रोके रखे, जिससे वह परमेश्वर की युक्ति में सन्तुष्ट रहे, यद्यपि वह उससे छिपी हुई और अगम्य थी: क्योंकि यदि वह तुरन्त प्रार्थना में टूट पड़ता, तो अपनी भावनाओं के पहले ही उफान में परमेश्वर से विवाद कर बैठता; क्योंकि मनुष्य का स्वभाव और चरित्र ऐसा ही है कि जब वह अचानक परमेश्वर को सम्बोधित करता है, तब वह सारी मर्यादा से परे उबल पड़ता है। तो भविष्यद्वक्ता ने, जो भली-भाँति समझता था कि मनुष्यों में ऐसा संयम नहीं है कि वे परमेश्वर के कार्यों के विषय में ठीक और शान्त भाव से निर्णय करें, अपने विरुद्ध ये बाड़े खड़े किए, और मानो अपने चारों ओर रोकें लगा दीं, जिससे वह उचित से अधिक स्वतन्त्रता न ले। तो हम जान लें कि जिन ऊँचे शब्दों में भविष्यद्वक्ता ने बात की, वे इसी उद्देश्य से थे, — कि वह अपने भीतर संयम और दीनता उत्पन्न करे, जिससे वह उन सब भटकते विचारों को रोक सके जिनसे मनुष्य प्रायः अपना मन बहलाया करते हैं।

अब हम शब्दों पर आएँ:

हे प्रभु यहोवा! वह कहता है; देख, तूने आकाश और पृथ्वी को बनाया है। यदि कोई इस स्थल की परिस्थितियों पर ध्यान न दे, तो वह सोच सकता है कि भविष्यद्वक्ता यहाँ इधर-उधर भटक रहा है, और अपने वाक्यों को जोड़ता नहीं, जिससे उसकी प्रार्थना असम्बद्ध प्रतीत होती है। परन्तु जैसा मैं कह चुका हूँ, क्योंकि भविष्यद्वक्ता जानता था कि जब मनुष्य परमेश्वर के कार्यों के विषय में बोलते हैं तब वे बहुत अधिक स्वतन्त्रता ले लेते हैं, इसलिए उसने अपने विषय पर आने से पहले ही उचित समय पर अपने आप पर लगाम लगा दी। तो उसने इस प्रकार की भूमिका बाँधी, "हे प्रभु, मुझे यह शोभा नहीं देता कि मैं तुझसे विवाद करूँ, और न मेरे लिए यह उचित है कि मैं तुझसे तेरे कार्यों का कारण माँगूँ, क्योंकि तूने अपने बड़े सामर्थ्य और बढ़ाई हुई भुजा से आकाश और पृथ्वी को बनाया है।" तो यहाँ परमेश्वर और नश्वर मनुष्य के बीच एक निहित विरोध है; "क्योंकि मैं कौन हूँ कि तुझे विवाद के लिए बुलाने का साहस करूँ! क्योंकि तेरी शक्ति से हमें उचित ही डरना चाहिए; जब हम अपनी आँखें आकाश की ओर उठाते हैं, जब हम पृथ्वी पर दृष्टि करते हैं, तो ऐसा कुछ भी नहीं है जो हमें तेरी शक्ति के प्रति विस्मय से न भर दे, क्योंकि उसकी अपारता ऊपर और नीचे प्रगट होती है।" इससे हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता परमेश्वर की शक्ति की ऊँचे शब्दों में बड़ाई करता है, जिससे वह अपने आप को नम्र और दीन मन की दशा में बनाए रखे, और परमेश्वर के विरुद्ध चिल्लाने का साहस न करे, और न ढिठाई से उसके कार्यों पर निर्णय सुनाने को आगे बढ़े। देख, वह कहता है; वह संसार की उस अद्भुत रचना को अपनी आँखों के सामने रखता है, जिसमें परमेश्वर की असीम शक्ति अत्यन्त स्पष्ट रूप से चमकती है।

फिर वह आगे कहता है, और तुझसे कोई बात छिपी नहीं है इस वाक्यांश के दो अर्थ हो सकते हैं; क्योंकि {,}פלאpala का अर्थ अद्भुत भी है और छिपा हुआ भी। अब अधिकांश व्याख्याकार यह व्याख्या देते हैं, — कि परमेश्वर से कुछ भी छिपा नहीं है, क्योंकि सब बातें उसकी आँखों के सामने हैं, क्योंकि उसका ज्ञान गहरी से गहरी गहराइयों तक पैठता है। तो यह परमेश्वर के ज्ञान की प्रशंसा हो सकती है, जैसे इससे पहले उसकी शक्ति की स्तुति की गई है; और यह अर्थ अनुपयुक्त नहीं है।

तौभी मैं जेरोम द्वारा दिए गए दूसरे अर्थ को भी अस्वीकार नहीं करता, कि परमेश्वर के लिए कुछ भी कठिन या अद्भुत नहीं है, क्योंकि सब बातें उसकी इच्छा के अधीन हैं। इस प्रकार भविष्यद्वक्ता उसी विचार को आगे बढ़ाते हुए यह कह सकता है कि परमेश्वर की शक्ति, जो आकाश और पृथ्वी में हमारी दृष्टि के सामने चमकती है, उसी समय संसार के निरन्तर शासन में भी देखी जा सकती है; क्योंकि जिसने आकाश और पृथ्वी को रचा है वह सब कुछ कर सकता है, यहाँ तक कि उसके लिए कुछ भी अद्भुत नहीं है, अर्थात् जैसे ही वह यह या वह ठहरा देता है, उसकी शक्ति के लिए कुछ भी कठिन नहीं रहता। तौभी भविष्यद्वक्ता का मुख्य उद्देश्य वही बना रहता है।

अब वह आगे कहता है, तू हज़ारों पर दया करता है, और पूर्वजों के अधर्म का बदला उनके बच्चों की गोद में भरता है यहाँ भविष्यद्वक्ता स्वीकार करता है कि परमेश्वर के न्याय उचित हैं, यद्यपि उनका कारण मानवीय मनों की पकड़ से बाहर है। ये दोनों बातें आवश्यक थीं, अर्थात् यह कि यिर्मयाह परमेश्वर की भयानक शक्ति को अपने सामने रखे, और यह भी कि वह परमेश्वर के न्यायों को उचित माने, यद्यपि मनुष्य प्रायः अन्यथा सोचते हैं। क्योंकि परमेश्वर के न्यायों के छिपे हुए कारण होते हैं; और इसलिए ऐसा होता है कि नाना प्रकार के विचार हमें व्याकुल करते हैं, और हर कोई परमेश्वर के विरुद्ध खड़ा होने को प्रवृत्त रहता है। इसलिए भविष्यद्वक्ता परमेश्वर की असीम शक्ति के विषय में बोलने के बाद अब यह भी घोषित करता है कि वह संसार का धर्मी न्यायी है; और वह फिर एक दूसरी लगाम से अपने आप को रोकता है, कहीं ऐसा न हो कि वह अपनी ही समझ के अनुसार परमेश्वर के कार्यों पर निर्णय सुना दे।

तू, वह कहता है, हज़ारों पर दया करता है यह मूसा की व्यवस्था से लिया गया है, (निर्गमन 20:6) क्योंकि भविष्यद्वक्ता प्रायः अपने मुख्य वचन मूसा से लेते थे, जिसके वे व्याख्याकार थे। तो जब परमेश्वर ने व्यवस्था के अधीन यह घोषित किया कि वह हज़ार पीढ़ियों पर दयालु है, यद्यपि यह हमें अबूझ प्रतीत होता है, तौभी हमारे लिए इसके सिवाय कुछ करने को नहीं रह जाता कि जिसे हम समझ नहीं सकते उसे श्रद्धापूर्वक ग्रहण करना सीखें। तो भविष्यद्वक्ता यहाँ स्वीकार करता है कि परमेश्वर अपनी दया के विषय में जिस रीति को अपनाता है, वह मानवीय मन से छिपी हुई है। परन्तु दूसरा वाक्यांश तौभी कम युक्तिसंगत प्रतीत होता है, — कि परमेश्वर पूर्वजों के अधर्म का बदला उनके बच्चों को दे थोड़ी ही देर पहले हमने देखा कि इसे एक अधर्मी निन्दा के रूप में प्रस्तुत किया गया था, (यिर्मयाह 31:29) जब उन्होंने कहा कि उनके पुरखाओं ने खट्टे अंगूर खाए, और उनके बच्चों के दाँत खट्टे हो गए; क्योंकि यह सदा सत्य है कि जो प्राणी पाप करे वही मरेगा।

(यहेजकेल 18:2, 20; व्यवस्थाविवरण 24:16) परन्तु यदि परमेश्वर पूर्वजों के अधर्म का बदला उनके बच्चों को देता है, तो वह निर्दोषों को दण्ड देता है, और जो उसे पूर्वजों को देना चाहिए था उसे बच्चों पर डाल देता है। परन्तु भविष्यद्वक्ता, उस बात का खण्डन करना दुष्टता समझकर जो परमेश्वर ने मूसा के द्वारा कही थी, यहाँ इस भेद की आराधना करता है, और इस प्रकार अपने आप को दीनता और नम्रता में ले आता है, जिससे परमेश्वर के छिपे हुए कार्यों के विषय में बोलते समय वह सीमा से बाहर न फूट पड़े।

साथ ही हमें संक्षेप में यह ध्यान देना चाहिए कि जब परमेश्वर बच्चों को उनके पूर्वजों के साथ सम्मिलित करता है, और पूर्वजों के अधर्म को उनके बच्चों की गोद में डालता है, तब निर्दोष दण्ड नहीं पाते, क्योंकि वह निर्दोषों और धर्मियों की नहीं, परन्तु दुष्टों की बात करता है। कुछ लोगों ने, जब उन्होंने देखा कि यह सत्य मनुष्यों की सामान्य भावनाओं के विरुद्ध पड़ता है, एक बहाना पकड़ लिया है, अर्थात् यह कि परमेश्वर एक सांसारिक दण्ड के द्वारा बच्चों को वह देता है जिसके योग्य उनके पूर्वज थे। परन्तु परमेश्वर बिना किसी अपवाद के कहता है कि वह पूर्वजों के योग्य प्रतिफल बच्चों की गोद में भरता है। परन्तु इसे कैसे समझा जाना चाहिए? इस दण्ड का एक भाग यह है कि परमेश्वर उनसे अपना आत्मा रोक लेता है। इसलिए जब उसका उद्देश्य पूर्वजों के दुर्गुणों का दण्ड उनके वंशजों में देना होता है, तब वह उनके वंशजों से अपने आत्मा की ज्योति और अनुग्रह रोक लेता है। तब ऐसा हो ही नहीं सकता कि वे बुराई पर बुराई न बढ़ाते जाएँ, और इस प्रकार वे अपने पूर्वजों के दोष में उलझ जाते हैं। तो परमेश्वर पापों को दण्ड देने के कार्य में क्रमशः आगे बढ़ता है; क्योंकि जब उसका उद्देश्य पुत्र को वह दण्ड क्षमा करना होता है जिसके योग्य वह अपने पिता के साथ ठहरा है, तब वह उसे अपने आत्मा के द्वारा अपनी ओर खींच लेता है, जिससे वह दण्ड से मुक्त हो जाता है; परन्तु यदि उसका उद्देश्य पुत्रों और पोतों से पलटा लेना होता है, तो जैसा मैं कह चुका हूँ, वह उनसे आत्मा का वरदान रोक लेता है, जिससे वे उसके क्रोध को अधिकाधिक भड़काने के सिवाय और कुछ नहीं करते, और इस प्रकार वे अपने पूर्वजों के साथ उसी दोष में फँस जाते हैं; इसलिए पूर्वज और बच्चे मिलकर एक ही दण्ड पाते हैं।

290 तर्गूम और अनुवाद, वल्गेट को छोड़कर, पहला अर्थ देते हैं; परन्तु दूसरा निस्सन्देह सच्चा अर्थ है, क्योंकि इस शब्द का ठीक-ठीक अर्थ छिपा होना कभी नहीं होता। यहाँ वाक्यांश का शाब्दिक अर्थ है, "तुझसे अधिक कठिन (या अधिक अद्भुत) कोई बात न होगी," अर्थात् जो तू कर सकता है उससे अधिक कठिन नहीं। ठीक यही वाक्यांश उत्पत्ति 18:14 में आता है। व्यवस्थाविवरण 30:11 में, एक मिलते-जुलते वाक्यांश में, इस शब्द का अनुवाद "छिपा" किया गया है; परन्तु वह वाक्यांश शाब्दिक रूप से यह है, "वह तुझसे अधिक कठिन नहीं है," अर्थात् जिसे तू प्राप्त कर सकता है या कर सकता है उससे अधिक कठिन नहीं, जैसा कि सन्दर्भ प्रमाणित करता है, देखिए यिर्मयाह 32:14। — सं.

यह सचमुच पहली दृष्टि में न्यायसंगत और उचित प्रतीत नहीं होता; परन्तु हम स्मरण रखें कि परमेश्वर के न्याय हमसे छिपे हुए हैं, और इस कारण से, — कि हम नम्रता और दीनता को बढ़ाएँ और संयम के साथ बुद्धिमान होना सीखें, और परमेश्वर को धर्मी न्यायी इस प्रकार स्वीकार करें कि यह जान लें कि हमारे मन इस गहरे अथाह कुण्ड में प्रवेश नहीं कर सकते। तौभी जो समाधान दिया गया है वह पर्याप्त स्पष्ट प्रतीत होता है, अर्थात् यह कि परमेश्वर निर्दोषों को कभी दण्ड नहीं देता।

क्योंकि जब वह पूर्वजों के पापों का दण्ड उनके बच्चों को देता है, तब जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, उस दण्ड का एक भाग यह होता है कि वह बच्चों से अपने आत्मा की ज्योति रोक लेता है; अन्धे होकर वे सदा अपने ही विनाश की ओर सिर के बल दौड़ते हैं, और इस प्रकार निरन्तर नए-नए पाप करते हुए वे परमेश्वर के पलटे को अपने ही विरुद्ध भड़काते हैं। इसलिए जब परमेश्वर उन्हें उनके पूर्वजों के योग्य प्रतिफल देता है, तब वह उसी समय उन्हें उस बात का भी दण्ड देता है जिसके योग्य वे स्वयं ठहरे हैं; और उनके पास शिकायत करने का कोई कारण नहीं, क्योंकि वे अपने पूर्वजों के साथ मिलकर दोषी रहे हैं: इसलिए इसमें कुछ भी विचित्र नहीं कि वे उनके दण्ड में भी उनके साझी हों। परन्तु तौभी यह परमेश्वर की छिपी हुई दया पर निर्भर है कि वह कुछ लोगों को क्षमा का अनुग्रह देता है, और इस प्रकार उन्हें विनाश से छुड़ाता है, जबकि दूसरों को त्याग देता है; और क्योंकि वे दुष्ट हैं, इसलिए वे उस सारे दण्ड के योग्य हैं जो वह उन पर डालता है: तो तू उनके बाद उनके पुत्रों की गोद में बदला भरता है, अर्थात् उनकी मृत्यु के पश्चात्।

इसके पश्चात् वह पुकार उठता है, हे सामर्थी और पराक्रमी परमेश्वर! सेनाओं का यहोवा उसका नाम है वह फिर परमेश्वर की शक्ति की महानता को घोषित करता है, जिससे वह अपने आप को रोके रखे, और उतावली से कोई नई खोज आरम्भ न करे, जैसा कि जिज्ञासु मनुष्यों के साथ होता है, जो अनुमानों में बहते रहते हैं, और इस प्रकार मानो परमेश्वर को लेखा देने के लिए बुलाते हैं, मानो कोई ऐसा न्यायासन ठहराया जा सकता हो जिसके सामने वह दोषी पाया जाए।

तो क्योंकि मानव स्वभाव की ढिठाई और अहंकार इतने बड़े हैं, भविष्यद्वक्ता यहाँ अपने चारों ओर रोकें लगाता है, जिससे वह दीनता और संयम की सीमाओं के भीतर बना रहे।

इसके पश्चात् वह पुरुष बदल देता है, जो प्रबलता और उत्साह का प्रमाण है; क्योंकि जैसा हम देख चुके हैं, यह एक प्रार्थना है। वह अब परमेश्वर को सीधे सम्बोधित नहीं करता, परन्तु अन्य पुरुष में बोलते हुए कहता है, सेनाओं का यहोवा उसका नाम है। यदि वह उसी शैली में बोलता रहता, तो वह कहता, "तू सामर्थी और पराक्रमी परमेश्वर है," इत्यादि, परन्तु वह कहता है, "सेनाओं का यहोवा उसका नाम है।" तो हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता मानो एक ओर मुड़ जाता है; और पुरुष का यह परिवर्तन, जैसा मैं कह चुका हूँ, उसके मन की प्रबलता और उत्साह से उत्पन्न हुआ। और विश्वासयोग्य लोगों के साथ प्रायः ऐसा होता है कि जब वे प्रार्थना करते हैं तब वे अपने सीधे सम्बोधन को तोड़ देते हैं, जब वे परमेश्वर के कार्यों पर ध्यान करते हैं, जो कभी उसकी शक्ति, फिर उसकी भलाई, या उसकी बुद्धि को प्रगट करते हैं। तो विश्वासयोग्य लोग सदा एक ही लगातार शैली में प्रार्थना नहीं करते; परन्तु जैसे भावना उनकी अगुवाई करती है, वैसे वे कभी परमेश्वर को सम्बोधित करते हैं, फिर एक ओर मुड़ जाते हैं और बीच-बीच में अन्य सम्बोधन मिला देते हैं। आगे लिखा है, —

291 पुरुष का परिवर्तन 18वें पद (यिर्मयाह 32:18) से आरम्भ होता प्रतीत होता है, और 19वें पद के पहले वाक्यांश को भी सम्मिलित करता है, — 18. जो हज़ारों पर दया करता है, और जो पूर्वजों के अधर्म का बदला उनके बाद उनके बच्चों की गोद में लौटाता है, वह परमेश्वर है, महान्, सामर्थी; यहोवा उसका नाम है, — 19. युक्ति में महान् और अपने कामों में पराक्रमी: जिसकी — तेरी आँखें मनुष्यों की सन्तानों की चालों पर खुली रहती हैं, कि हर एक को उसकी चाल के अनुसार, और उसके कामों के फल के अनुसार दे; 20. जिसने, इत्यादि, इत्यादि। "परमेश्वर, महान्," इत्यादि, दया दिखाने और अधर्म का बदला देने से जुड़ा हुआ है। उसकी महानता युक्ति या बुद्धि में है, और उसकी शक्ति या पराक्रम उसके कामों में प्रगट होता है। "कामों" के बाद आनेवाला {{ה, {}ו के स्थान पर कसदी रूप है। फिर उसकी सर्वज्ञता का उल्लेख है, जो उसके उद्देश्यों को पूरा करने और उसके कामों के संचालन के लिए आवश्यक है। यहाँ वह मध्यम पुरुष पर लौट आता है, और "जिसकी" एक मुहावरा है, और वेल्श भाषा में ठीक यही है, Yr hwn y mae dy lygaid, इत्यादि; और "जो" यिर्मयाह 32:20 में भी जारी रहता है। यह कहकर कि हर एक को "उसकी चाल के अनुसार" मिलेगा, वह वही संकेत करता है जो कैल्विन कहता है, कि बच्चे भी पूर्वजों के समान दोषी हैं। — सं.

यिर्मयाह 32:19

19. तू बड़ी युक्ति करनेवाला और सामर्थ्य के काम करनेवाला है; तेरी दृष्टि मनुष्यों के सारे चालचलन पर लगी रहती है, जिससे तू हर एक को उसके चालचलन और कर्म के फल के अनुसार दे:

19. Magnus consilio, excellens opere; cujus oculi (quandoquidem oculi) tui aperti sunt super vias filiorum hominum ad reddendum cuique secundum vias ejus, et secundum fructum operum ejus.

वह उसी विषय को आगे बढ़ाता है, क्योंकि वह परमेश्वर के न्यायों के विषय में अपना आश्चर्य और विस्मय प्रगट करता है। वह पहले घोषित करता है कि परमेश्वर युक्ति में महान् और कार्य में महान् है। युक्ति से वह परमेश्वर की बुद्धि को समझता है, जो न केवल हमारे सब विचारों से बढ़कर है, वरन् उन्हें निगल भी लेती है। और फिर वह उसकी युक्ति के कार्यान्वयन का उल्लेख करता है, जो उस बुद्धि के प्रमाण देता है जो हम पर प्रगट होती है। परमेश्वर के कार्यों से हम सीखते हैं कि उसकी बुद्धि कितनी महान् और कितनी अनुपम है: क्योंकि वह अपने आप में समझी नहीं जा सकती, वरन् यदि वह कार्यों के द्वारा स्पष्ट न की जाती, तो मनुष्य उसका तनिक भी ज्ञान न रख पाते। तो परमेश्वर के कार्य अपनी श्रेष्ठता के कारण उसकी असीम बुद्धि के प्रमाण हैं। इसी कारण और इसी अर्थ में भविष्यद्वक्ता परमेश्वर को युक्ति में महान् और कार्य में महान् कहता है।

वह आगे कहता है कि उसकी आँखें मनुष्यों की सब चालों पर खुली रहती हैं इन शब्दों से वह संकेत करता है कि वह सारे संसार का न्यायी है, और जो कुछ मनुष्य विचारें, बोलें या करें, उसका लेखा देना ही होगा। अर्थ यह है कि परमेश्वर का विधान संसार के सब भागों तक ऐसा फैला हुआ है कि मनुष्यों के कार्य किसी भी प्रकार उससे छिपे नहीं रह सकते, और कोई उसके हाथ से बच नहीं सकता; क्योंकि परमेश्वर की आँखों की बात कहने के बाद वह आगे कहता है, कि वह हर एक को उसकी चालों के अनुसार और उसके कामों के फल के अनुसार दे

तो भविष्यद्वक्ता यहाँ किसी ऐसे व्यर्थ अनुमान की बात नहीं करता जैसा भक्तिहीन मनुष्य रखते हैं; क्योंकि वे मानते तो हैं कि सब बातें परमेश्वर को दिखाई देती हैं, परन्तु कल्पना करते हैं कि वह केवल इस कोरे ज्ञान से सन्तुष्ट रहता है; और इस प्रकार वे उसे न्यायी की प्रतिष्ठा और पद से वंचित कर देते हैं। परन्तु भविष्यद्वक्ता यहाँ दिखाता है कि परमेश्वर के विधान का उद्देश्य क्या है, परमेश्वर की आँखें क्यों खुली रहती हैं, अर्थात् इसलिए कि अन्त में वह मनुष्यों के सब वचनों और कामों को, हाँ, उनके विचारों को भी, अपने न्यायासन के सामने ले आए। इसके अतिरिक्त इन शब्दों से हमें यह सिखाया जाता है कि हमारा जीवन तब तक ठीक रीति से गठित नहीं हो सकता जब तक हम परमेश्वर की उपस्थिति को मन में न रखें, जिससे हम जानें कि उसकी आँखें हम पर लगी हैं, और उससे कुछ भी छिपा नहीं है: क्योंकि पाप करने में इतनी स्वच्छन्दता कहाँ से आती है, सिवाय इसके कि मनुष्य भगोड़ों के समान उच्छृंखल हो जाते हैं? जैसे जब कोई विद्रोही पुत्र अपने पिता की आँखों से अपने आप को दूर कर लेता है, तब वह अपने आप को पूरी तरह पाप के हवाले कर सकता है, क्योंकि वह सब भय और लज्जा से मुक्त हो जाता है। वैसे ही हमारी लापरवाही एक प्रकार का भागना है, क्योंकि हम सोचते हैं कि हम परमेश्वर से बहुत दूर हैं। तो जैसा मैं कह चुका हूँ, यह बात सदा स्मरण रखनी चाहिए कि परमेश्वर की आँखें हमारी सब चालों पर खुली रहती हैं, और इस उद्देश्य से, — कि वह हर एक को उसकी चालों के अनुसार दे, और हर एक अपने ही कामों का फल बटोरे।

इसलिए यद्यपि परमेश्वर कुछ समय तक हमारे कामों को अनदेखा करे, और प्रगट रूप से यह न दिखाए कि वह मनुष्यों का न्यायी है, तौभी इसका कोई कारण नहीं कि हम पर उदासीनता छा जाए, मानो हम उसके हाथ से बच सकते हों; परन्तु हम जान लें कि हमारे सब काम और वचन अब उसके द्वारा देखे जा रहे हैं, जिससे वह आगे चलकर यह दिखाए कि वह कोई निठल्ला दर्शक नहीं है, जैसा कि कुछ भक्तिहीन मनुष्य स्वप्न देखते हैं, वरन् वह सब बातों का प्रत्यक्ष साक्षी है, जिससे अन्त में वह हमारा न्यायी होकर प्रगट हो।

पोपवादी इस स्थल को कर्मों के द्वारा पुण्य के समर्थन में मोड़ते हैं; परन्तु यह एक निरर्थक प्रयास है; क्योंकि जब पवित्रशास्त्र यह घोषित करता है कि हर एक को उसके कर्मों के अनुसार दिया जाएगा, तब वह परमेश्वर की सेंतमेंत दया को बाहर नहीं करता; और जब परमेश्वर विश्वासयोग्य लोगों को प्रतिफल देता है, तो वह सेंतमेंत क्षमा पर निर्भर होता है, क्योंकि वह उन्हें वह सब क्षमा कर देता है जो अन्यथा उनके भले कामों को दूषित कर देता: और अधिक ठीक-ठीक कहें तो, परमेश्वर विश्वासयोग्य लोगों को उनके कर्मों के अनुसार तभी प्रतिफल देता है जब वह उन्हें सेंतमेंत क्षमा करता है और जो कुछ उन्होंने अनुचित किया है उसे क्षमा कर देता है। तो प्रतिफल केवल परमेश्वर की मुफ़्त दया पर निर्भर है। रही दुष्टों की बात, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि उन्हें उचित प्रतिफल दिए जाने की बात कही गई है; क्योंकि हम जानते हैं कि वे अनन्त विनाश के योग्य हैं, और जब परमेश्वर उनके पापों का दण्ड देता है तब वह धर्मी न्यायी है। आगे लिखा है, —

यिर्मयाह 32:20

20. तूने मिस्र देश में चिह्न और चमत्कार किए, और आज तक इस्राएलियों और अन्य मनुष्यों के बीच में भी करता आया है, और इस प्रकार तूने अपना ऐसा नाम किया है जो आज के दिन तक बना है।

20. Qui edisti signa et portenta in terra Egypti usque ad diem hunc, et in Israel et in hominibus; et fecisti (hoc est, comparasti) tibi nomen secundum diem hunc.

भविष्यद्वक्ता यहाँ विशेष रूप से परमेश्वर की उस अनुपम कृपा का स्मरण करता है, जिसके द्वारा उसने अपनी कलीसिया के प्रति अपना पितृवत अनुग्रह प्रमाणित किया था। फिर वह कहता है कि उसके द्वारा मिस्र देश में चिह्न और चमत्कार किए गए थे, अर्थात् अपनी प्रजा के निमित्त। क्योंकि इतने सारे आश्चर्यकर्म और किस लिए किए गए, सिवाय इसके कि वह अपनी चुनी हुई प्रजा के लिए अपनी चिन्ता को प्रमाणित करे, और इस प्रकार अपनी वाचा को दृढ़ करे? अतः हम देखते हैं कि यहाँ अब्राहम की सन्तान के प्रति परमेश्वर का अनुग्रह प्रकट किया गया है, अर्थात् जब वह उन चिह्नों और चमत्कारों का उल्लेख करता है जो मिस्र देश में किए गए थे। और वह आगे कहता है, और इस्राएल में। वह न केवल आश्चर्यकर्मों में परमेश्वर की सामर्थ्य की, वरन् विशेष रूप से उस दया की महिमा करता है जिससे उसने अपनी चुनी हुई प्रजा पर अनुग्रह किया। वह यह भी कहता है, आज के दिन तक। इसका यह अर्थ नहीं कि परमेश्वर ने हर युग में आश्चर्यकर्म किए, परन्तु उसका आशय यह है कि वे सदा स्मरण किए जाने के योग्य थे, और सब युगों में भी। तो जब भविष्यद्वक्ता कहता है, आज के दिन तक, तब इसका सम्बन्ध परमेश्वर की सामर्थ्य के स्मरण और गुणगान से है। परमेश्वर ने आश्चर्यकर्म तो एक निश्चित समय पर ही किए, परन्तु उसने उन्हें इसलिए किया कि वे सब युगों में स्मरण किए जाएँ, और आनेवाली पीढ़ियाँ यह स्वीकार करें कि परमेश्वर उनके पूर्वजों के साथ कैसी अद्भुत रीति से रहा था।

अतः जब वह सामर्थ्य जो उसने मिस्र में प्रकट की, स्मरण किए जाने के योग्य थी, तो कहा गया है कि आश्चर्यकर्म आज के दिन तक किए गए हैं; और यह कहा गया है कि वे इस्राएल में किए गए, क्योंकि परमेश्वर का यह उद्देश्य था कि जब उसने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार अपनी प्रजा को छुड़ाया, तब वह अपनी सच्चाई की निश्चितता को प्रमाणित करे।

इसके पश्चात् वह आगे कहता है, और मनुष्यों के बीच। भविष्यद्वक्ता और भी आगे बढ़ता है। प्रजा के छुटकारे के विषय में कहने के बाद वह संकेत करता है कि जिधर भी उसने दृष्टि फेरी, उसने परमेश्वर की सामर्थ्य के प्रमाणों को देखा और उन पर विस्मित हुआ; मानो उसने कहा हो, "हे प्रभु, तू ने अपनी अद्भुत सामर्थ्य और भलाई के विशेष प्रमाण दिए हैं; तेरी प्रजा का छुटकारा एक अनुपम कार्य था, और सब युगों में उसका स्मरण किया जाना चाहिए; परन्तु हम जिधर भी मुड़ें, सारे संसार में ऐसा कोई कोना नहीं जहाँ कुछ ऐसे आश्चर्यकर्म दिखाई न दें जो हमें तेरी स्तुति करने की ओर ले जाएँ।" अतः हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता विशेष से सामान्य की ओर बढ़ता है: अपनी प्रजा के छुटकारे में परमेश्वर की सामर्थ्य और भलाई पर विचार करने के बाद उसने अपने विचारों को संसार के सब भागों तक फैलाया, और सर्वत्र परमेश्वर के आश्चर्यकर्मों पर ध्यान किया। और पवित्रशास्त्र में प्रायः ऐसा ही होता है; ईश्वरीय सामर्थ्य या अनुग्रह के किसी विशेष उदाहरण का स्मरण दिलाए जाने के बाद हम ऐसे खिंच जाते हैं कि सामान्य की ओर बढ़ जाते हैं। और वह आगे कहता है, और तू ने अपना नाम किया है, या अपने लिए प्राप्त किया है, आज के दिन के अनुसार; अर्थात् तू ने अपने नाम को चिरस्थायी बना दिया है, क्योंकि उसकी महिमा आज के दिन भी हमारी आँखों के सामने चमकती है। तो भविष्यद्वक्ता का आशय यह है कि परमेश्वर ने अपनी सामर्थ्य को ऐसी अद्भुत रीति से प्रकट किया था कि उसका ज्ञान चिरस्थायी रहेगा, और मनुष्यों की कृतघ्नता उसे कभी दफ़ना नहीं सकेगी।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जैसे हमारी सारी बुद्धि यही है कि हम अपने आप को तेरे अधीन करें, तेरे न्यायों पर विस्मित हों, उन्हें ग्रहण करें, और श्रद्धा से उनकी आराधना करें, —ओ यह वरदान दे कि हम अपने शरीर के कुटिल विचारों को बढ़ावा न दें, परन्तु अपने आप को रोकना और वश में रखना ऐसा सीखें कि तेरी बुद्धि, और धार्मिकता, और सामर्थ्य के योग्य स्तुति सदा तुझे अर्पित करें, और इस प्रकार जब तक हम इस संसार में परदेशी होकर रहते हैं, तब तक संयमी मन से चलें, जब तक कि अन्त में हम आमने-सामने तेरी महिमा का दर्शन न करें, और हमारे प्रभु मसीह यीशु में उसके सहभागी न बनाए जाएँ। —आमीन।

एक सौ अट्ठाईसवाँ व्याख्यान

यिर्मयाह 32:21

21. तू अपनी प्रजा इस्राएल को मिस्र देश में से चिह्नों और चमत्कारों और सामर्थी हाथ और बढ़ाई हुई भुजा के द्वारा, और बड़े भय के साथ निकाल लाया;

21. Et eduxisti populum tuum Israel a terra Egypti in signis et portentis, et in manu robusta, et in brachio extento, et in terrore magno; 292 यह इस पद का सामान्य रूप से दिया जानेवाला अर्थ है। इसका अनुवाद इस प्रकार किया जा सकता है, — 20. जिसने मिस्र देश में चिह्न और चमत्कार ठहराए, कि वे आज के दिन तक चिह्न और चमत्कार ठहरें, इस्राएल के लिए भी और मनुष्यजाति के लिए भी; और अपने लिए ऐसा नाम किया है, जैसा आज के दिन है। वे परमेश्वर की सामर्थ्य के "चिह्न" या प्रमाण थे, और अपने स्वरूप में "चमत्कार", अर्थात् अलौकिक थे। — सं.

यिर्मयाह अब प्रस्तुत विषय के और निकट आता है; क्योंकि परमेश्वर की अतुलनीय सामर्थ्य के विषय में कहने के बाद, अब वह एक अभक्त और दुष्ट प्रजा को दण्ड देने में उसके धर्ममय न्याय की महिमा करता है। इसी उद्देश्य से वह छुटकारे के अनुग्रह का उल्लेख करता है, और फिर आगे कहता है कि वह देश इस्राएल को दिया गया था जिसकी प्रतिज्ञा उनके पूर्वजों से की गई थी। इसके बाद वह बताता है कि यह अनुग्रह कृतघ्न लोगों पर किया गया था, क्योंकि उन्होंने तुरन्त जूआ उतार फेंका और अपने छुड़ानेवाले परमेश्वर को, उसकी व्यवस्था सहित, तुच्छ जाना।

फिर वह कहता है कि प्रजा चिह्नों और चमत्कारों के साथ मिस्र देश से निकाल लाई गई थी। यह एक विस्तार है, क्योंकि परमेश्वर ने असाधारण रीति से यह भली-भाँति प्रकट कर दिया था कि उसके अनुग्रह के बिना प्रजा मिस्र से छुड़ाई नहीं जा सकती थी। क्योंकि यदि आश्चर्यकर्मों और चमत्कारों में परमेश्वर की सामर्थ्य का प्रत्यक्ष प्रदर्शन न होता, तो इस्राएली परमेश्वर के अनुग्रह का श्रेय अपने आप को, या किसी सांसारिक साधन को दे सकते थे; परन्तु चिह्नों और चमत्कारों में परमेश्वर का अनुग्रह ऐसा देदीप्यमान दिखाई दिया कि प्रजा का छुटकारा न तो भाग्य को, न मनुष्यों के प्रयत्नों को, और न किसी अन्य साधन को दिया जा सकता था। और इसी उद्देश्य से वह सामर्थी हाथ और बढ़ाई हुई भुजा का उल्लेख करता है। इन शब्दों से वह संकेत करता है कि प्रजा ऐसे छुड़ाई गई थी कि परमेश्वर का हाथ, हाँ, उसकी बढ़ाई हुई भुजा खुलकर प्रकट हुई, अर्थात् उसकी सामर्थ्य, जैसा हम अन्यत्र समझा चुके हैं, दूर-दूर तक प्रकट की गई।

अन्त में वह बड़े भय का उल्लेख करता है: उनके शत्रुओं का अहंकार ऐसा था कि यदि वे बड़े भय से भर न दिए जाते, तो वे प्रजा को कभी जाने न देते। अतः जब मिस्री भय के द्वारा वश में किए गए थे, तो यिर्मयाह इस परिस्थिति के द्वारा छुटकारे के अनुग्रह को बढ़ाकर बताता है, मानो उसने कहा हो कि परमेश्वर का अनुग्रह छिपा हुआ नहीं था, क्योंकि इस्राएली इन असाधारण प्रमाणों से जान सकते थे कि वे ईश्वरीय सामर्थ्य के द्वारा छुड़ाए गए थे। क्योंकि उनके शत्रुओं की शक्ति, वीरता और क्रूरता इतनी बड़ी थी कि यदि परमेश्वर स्वर्ग से अपना हाथ न बढ़ाता, तो स्वतन्त्र रूप से निकल जाने की कोई आशा नहीं की जा सकती थी। इसके बाद आगे यह आता है, यिर्मयाह 32:22

22. फिर तू ने यह देश उन्हें दिया जिसके देने की शपथ तू ने उनके पूर्वजों से खाई थी, ऐसा देश जिसमें दूध और मधु की धाराएँ बहती हैं;

22. Et dedisti illis terram hanc quam juraveras patribus eorum ad dandum ipsis (hoc est, to daturum ipsis) terram fluentem lacte et melle; यहाँ देश की उपजाऊ-शक्ति की सराहना की गई है, ताकि अपने छुटकारे के प्रति प्रजा की कृतघ्नता और भी कम क्षमायोग्य दिखाई दे। परमेश्वर ने उन्हें पहले ही मानो आवश्यकता से अधिक अपने साथ बाँध लिया था; परन्तु जब देश का धन और उपजाऊपन भी जोड़ दिया गया, तब परमेश्वर की उदारता दुगुनी हो गई, जिसने एक और भी दृढ़ और पवित्र बन्धन से प्रजा को आज्ञाकारिता के लिए बाँध दिया। परन्तु जब उन्होंने मानो इन दोनों उपकारों को दफ़ना दिया, तब उनकी अभक्ति चरम सीमा पर थी, और उनकी कृतघ्नता उतनी ही अधिक नीच थी। अतः हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने क्यों कहा कि देश प्रजा को दिया गया था।

साथ ही वह इसका कारण भी बताता है, अर्थात् यह कि उसकी प्रतिज्ञा उनके पूर्वजों से की गई थी। तौभी यह मानना ठीक नहीं कि पूर्वजों के कोई गुण-कर्म थे, जैसा जेरोम कहता है, जो अज्ञानता से इस खण्ड को तोड़-मरोड़ देता है; क्योंकि वह कहता है कि गुण-कर्म के आधार पर प्रजा का कुछ भी हक़ नहीं बनता था, परन्तु पूर्वज अपने महान् सद्गुणों के कारण फिर भी योग्य थे। परन्तु हम जानते हैं कि परमेश्वर की वाचा आरम्भ ही से सेंतमेंत थी। तो भविष्यद्वक्ता का यहाँ आशय यह है कि देश प्रजा को उनके कामों के प्रतिफल के रूप में नहीं दिया गया था, परन्तु इसलिए दिया गया था कि उसकी प्रतिज्ञा सेंतमेंत की गई थी। और वह शपथ का उल्लेख करता है, क्योंकि परमेश्वर ने अब्राहम और पूर्वजों की दुर्बलता का ध्यान रखते हुए शपथ के द्वारा अपनी प्रतिज्ञा को दृढ़ किया। परन्तु चूँकि मैं इस विषय पर अन्यत्र विस्तार से कह चुका हूँ, इसलिए अब इसे केवल थोड़ा-सा छूता हूँ। तौभी जब कभी शपथ का उल्लेख हो, तो हम जान लें कि इसमें मनुष्यों की अस्थिरता को परोक्ष रूप से डाँटा गया है, जो सदा डगमगाते रहते हैं, और जब तक इस पुष्टि से उनकी सहायता न की जाए, परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर कभी टिक नहीं सकते।

जो भी हो, भविष्यद्वक्ता यहाँ हमें स्मरण दिलाता है कि जब प्रजा देश में प्रवेश कर गई, तब परमेश्वर ने उस वचन-बन्धक को पुष्ट किया जो उसने पूर्वजों को दिया था, क्योंकि वे अपनी वीरता से या किसी अन्य साधन से उसे प्राप्त नहीं कर सकते थे। संक्षेप में, यिर्मयाह प्रजा का ध्यान परमेश्वर की सेंतमेंत वाचा की ओर दिलाता है, ताकि वे समझें कि वे किसी और अधिकार से नहीं, केवल इसी से देश के अधिकारी बने, —कि परमेश्वर ने अपनी स्वतन्त्र इच्छा से अब्राहम और उसके वंश से प्रतिज्ञा की थी कि वह उन्हें वह देश देगा। जैसा मैं अभी कह चुका हूँ, वह देश के उपजाऊपन की बात करता है, क्योंकि परमेश्वर की यह योजना थी कि वह हर प्रकार से प्रजा को आकर्षित करे, ताकि वे उसकी सेवा में बने रहें। और जब प्रजा ने, जिसके साथ ऐसी उदारता से व्यवहार किया गया था, परमेश्वर के अनुग्रह को स्वीकार न किया, तो उनकी चरम और नीच मूढ़ता पूरी रीति से सिद्ध हो गई। तो भविष्यद्वक्ता का आशय यह है कि देश अत्यन्त उपजाऊ था, जिसमें प्रजा को सब कुछ भरपूर मिला, और फिर भी उन्होंने इतनी उदारता के दाता परमेश्वर को तुच्छ जाना, जैसा तुरन्त आगे आता है —

यिर्मयाह 32:23

23. और वे इसमें आकर इसके अधिकारी हुए, परन्तु तेरी बात नहीं मानी, और तेरी व्यवस्था पर नहीं चले; जो कुछ तू ने उनको करने की आज्ञा दी थी, उसमें से उन्होंने कुछ भी नहीं किया; इस कारण तू ने उन पर यह सब विपत्ति डाली है:

23. Et ingressi sunt, et haereditate adepti sunt cam; et non audierunt vocem tuam (ad verbum, in voce tua) et in lege tua non ambulaverunt (hoc est, secundum legera tuam) quaecunque illis praecepisti ut facerent, non fecerunt; ideo occurrere fecisti illis malum hoc.

भविष्यद्वक्ता इस पद में मान लेता है कि जब प्रजा देश से निकाल दी गई और बँधुआई में खदेड़ दी गई, तब परमेश्वर का पलटा लेना न्यायसंगत था, क्योंकि उन्होंने देश में प्रवेश करने के बाद परमेश्वर की बात नहीं मानी। देश का दर्शन ही प्रजा को परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी बना देने के लिए पर्याप्त होना चाहिए था; क्योंकि वे रोटी का एक टुकड़ा भी इस बात का स्मरण किए बिना नहीं खा सकते थे कि उनका भोजन कहाँ से आया, अर्थात् इसलिए कि परमेश्वर ने उस देश से अन्यजातियों को निकाल दिया था। अतः जब वे सब प्रकार की अच्छी वस्तुओं से तृप्त थे और साथ ही परमेश्वर को तुच्छ जानते थे, तो कोई बहाना नहीं बनाया जा सकता था; क्योंकि यदि वे अज्ञानता का बहाना करते, तो स्वयं वह देश उनकी आँखों के सामने था, जो उन्हें परमेश्वर के भय की ओर लौटा लाता था। तो यही कारण है कि भविष्यद्वक्ता इन दोनों बातों को साथ जोड़ता है, कि इस्राएली देश में प्रवेश कर गए, और कि उन्होंने परमेश्वर की बात नहीं मानी।

अब इस वाक्यांश से वह संकेत करता है कि वे अज्ञानता के कारण नहीं गिरे थे, क्योंकि परमेश्वर ने अपनी इच्छा भली-भाँति प्रकट कर दी थी। परमेश्वर ने बोला तो सही, परन्तु बहरों से बोला। तो भविष्यद्वक्ता यहाँ दिखाता है कि प्रजा के पाप का इसके अतिरिक्त और कोई कारण नहीं था कि उन्होंने हठपूर्वक परमेश्वर की वाणी पर ध्यान देने से इनकार किया।

फिर वह इसी उद्देश्य से आगे कहता है कि वे उसकी व्यवस्था पर नहीं चले थे। व्यवस्था की तुलना प्रायः मार्ग से की जाती है; क्योंकि यदि परमेश्वर हमें यह न बताए कि उसकी इच्छा क्या है, और हमारे जीवन के सब कार्यों को एक निश्चित नियम के अनुसार न चलाए, तो हम निरन्तर भटकते रहेंगे। अतः परमेश्वर की व्यवस्था को ठीक ही मार्ग के समान कहा गया है, जैसा मूसा भी कहता है, "मार्ग यही है, इसी पर चलो।"

(व्यवस्थाविवरण 5:33; यशायाह 30:21 भी देखें)

फिर यिर्मयाह, यह दिखाने के बाद कि प्रजा को शिक्षा दी गई थी, यह बात कहता है, —कि मार्ग उन्हें बता दिया गया था, इसलिए वे जान-बूझकर और स्वेच्छा से भटक गए; क्योंकि वे व्यवस्था की शिक्षा के द्वारा वापस बुलाए बिना न दाहिनी ओर मुड़ सकते थे और न बाईं ओर।

तीसरे स्थान पर वह कहता है, जो कुछ तू ने उनको करने की आज्ञा दी थी, वह उन्होंने नहीं किया। यहाँ वह उसी बात को और अधिक स्पष्टता से और बिना किसी अलंकारिक भाषा के समझाता है, अर्थात् यह कि वे परमेश्वर की आज्ञा मानने को तैयार नहीं थे, जबकि वे भली-भाँति समझते थे कि उचित क्या है; क्योंकि व्यवस्था उन्हें भटकने नहीं देती थी, और परमेश्वर ने उसमें वह सब कुछ सम्मिलित कर दिया था जो जानना आवश्यक था। तो भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि वे केवल हठीलेपन के कारण ही भटके थे, क्योंकि वे जानते थे कि परमेश्वर क्या चाहता है।

जैसे एक लाकेदैमोनी (स्पार्टावासी) ने कहा था कि एथेंसवासी जानते तो थे कि उचित क्या है, परन्तु उसे करना नहीं चाहते थे; वैसे ही भविष्यद्वक्ता इस स्थान पर प्रजा की खुली अभक्ति और तिरस्कार को अज्ञानता और असावधानी से अलग करता है, और उसका यह आशय नहीं है कि प्रजा ने व्यवस्था की सब आज्ञाओं को पूरा नहीं किया।

और इस खण्ड की भी व्याख्या जेरोम बहुत बेतुके ढंग से करता है; क्योंकि वह कहता है कि इस्राएली अपनी प्रतिज्ञाओं पर स्थिर नहीं रहे, क्योंकि उन्होंने कहा था कि परमेश्वर जो कुछ आज्ञा देगा, वे सब करेंगे। परन्तु भविष्यद्वक्ता यहाँ उन्हें केवल एक ही बात के विषय में दोषी नहीं ठहराता, मानो वह कह रहा हो कि कहीं कुछ कमी रह गई थी, परन्तु वह कहता है कि वे पूर्ण रूप से आज्ञा न माननेवाले थे, क्योंकि उन्होंने व्यवस्था की केवल एक ही आज्ञा को तुच्छ नहीं जाना था, परन्तु मानो जान-बूझकर सारी व्यवस्था को एक ओर फेंक दिया था, और परमेश्वर की किसी भी आज्ञा को नहीं माना। तो यह नकारात्मक कथन सारी व्यवस्था के विषय में, और उसकी हर एक आज्ञा के विषय में, प्रजा के धर्मत्याग को प्रकट करता है।

और यह खण्ड विशेष ध्यान देने योग्य है, क्योंकि भविष्यद्वक्ता सोच-समझकर एक ही बात को दोहराता है, —कि प्रजा व्यवस्था पर नहीं चली, —कि उन्होंने परमेश्वर की बात नहीं मानी, —कि जो कुछ आज्ञा दी गई थी, उसमें से उन्होंने कुछ भी नहीं किया; क्योंकि उन लोगों के लिए और भी भारी दण्डाज्ञा और पलटा रखा है जिन्हें विश्वासयोग्यता से सिखाया गया है कि परमेश्वर को क्या भाता है और उचित क्या है, और फिर भी वे अपनी ही इच्छा के पीछे चलते हैं, और शरीर की वासनाओं और अभिलाषाओं में बह जाते हैं। एक शब्द में, यिर्मयाह अभक्ति की चरम सीमा को दिखाता है, अर्थात् जब लोग स्पष्ट रूप से और भली-भाँति जानते हैं कि परमेश्वर की इच्छा क्या है, और फिर भी उसकी उपेक्षा करते और जूआ उतार फेंकते हैं, और इस प्रकार सारी व्यवस्था के प्रति खुला तिरस्कार दिखाते हैं।

आगे यह आता है, इस कारण तू ने उन पर यह सब विपत्ति डाली है। भविष्यद्वक्ता यहाँ गवाही देता है कि प्रजा पर जो कुछ भी बीता था, वह संयोग से नहीं हुआ था, परन्तु उनके पापों का बदला दिया गया था। मनुष्य कुछ मात्रा में परमेश्वर के न्यायों को स्वीकार तो करते हैं, परन्तु यह स्वीकृति तुरन्त लुप्त हो जाती है। अतः भविष्यद्वक्ता यहाँ बुद्धिमानी से दिखाता है कि विपत्तियों में परमेश्वर का पलटा स्पष्ट है, और इस प्रकार प्रजा ने वह बदला पाया जिसके वे योग्य थे। अब आगे यह आता है, —

293 इन तीनों बातों में यह अन्तर है: "वाणी" भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा परमेश्वर की वाणी थी, — "व्यवस्था" दस आज्ञाएँ थीं, — और "जो कुछ" "आज्ञा दी गई" थी, वह विधियाँ और नियम, अर्थात् नागरिक और धार्मिक-विधि सम्बन्धी ठहराव थे। यहाँ आशय उसकी वाणी को "मानने" से अधिक उसे "सुनने" से है: उसे मानना तो दूर, वे भविष्यद्वक्ताओं की सुनते तक न थे। यह आरम्भ से अन्त तक उनका पाप रहा था। — सं.

यिर्मयाह 32:24-25

24. देख, दमदमे नगर तक आ गए हैं कि उसे ले लें; और यह नगर तलवार, महँगी और मरी के कारण उन कसदियों के वश में कर दिया गया है जो उससे लड़ रहे हैं: और जो तू ने कहा था वह पूरा हुआ है; और देख, तू इसे देखता है।

24. Ecce aggeres (vel, catapultae, vel, arietes) venerunt ad urbem ad capiendum eam; et urbs tradita est in manum Chaldaeorum oppugnantium eam, propter gladium, famem et pestem; et quod tu loquutus es (quicquid loquutus es) evenit; et ecce tu vides.

25. और हे प्रभु यहोवा, तू ने मुझ से कहा है, गवाह बुलाकर उस खेत को रूपया देकर मोल ले; क्योंकि नगर कसदियों के वश में कर दिया गया है।

25. Et tu dixisti mihi, domine Jehova, eme tibi agrum pecunia et testare testes; cum tamen urbs tradita sit in manum Chaldaeorum.

तो यहाँ अन्ततः भविष्यद्वक्ता अपनी उलझन प्रकट करता है। हम पहले ही बता चुके हैं कि मुख्य बात पर आने से पहले उसने इतनी लम्बी भूमिका क्यों बाँधी: उसके लिए आवश्यक था कि वह मानो अपने ऊपर लगाम लगाए; क्योंकि यदि हम अपने विचारों को न रोकें, तो हम परमेश्वर के विरुद्ध ढीठ हो जाएँगे, और कोई संयम न रहेगा। अतः भविष्यद्वक्ता ने, ताकि वह चिड़चिड़ाकर परमेश्वर से विवाद न करे, उसकी अपरम्पार सामर्थ्य को अपने सामने रखा, और फिर यह जोड़ा कि उसके धर्ममय पलटे के बिना कुछ भी नहीं होता। परन्तु अब वह पूछता है कि यह कैसे हुआ कि जब नगर और सारा देश उनके शत्रुओं के हाथ सौंप दिया गया था, तब उसे खेत मोल लेने की आज्ञा दी गई। तो वह यहाँ इस असंगति का उल्लेख करता है, और मान लेता है कि उसका मन उलझन में था, क्योंकि वह यह नहीं समझ पा रहा था कि परमेश्वर ने उसे खेत मोल लेने की आज्ञा क्यों दी, जबकि उसने प्रजा को बँधुआई में खदेड़ने और उन्हें दूर देशों में तितर-बितर करने का निश्चय कर लिया था। परन्तु हम कह चुके हैं कि भविष्यद्वक्ता को परमेश्वर की सच्चाई पर पूरा भरोसा था; और इसी कारण वह आज्ञा मानने को ऐसा इच्छुक और तत्पर था; क्योंकि उसने खेत मोल लेने में कोई विलम्ब नहीं किया; और इसके बाद उसने मोल लेने के लेख बारूक के पास रख दिए। परन्तु यह सब करने के बाद उसने परमेश्वर के सामने शिकायत रखी; और चूँकि यह बात अनुचित-सी दिखाई देती थी, इसलिए उसने चाहा कि यह गाँठ खोली जाए।

फिर वह कहता है, देख, दमदमे, या युद्ध के यन्त्र, क्योंकि इस शब्द का अर्थ दोनों में से कोई भी हो सकता है। {}סללותsallut शब्द का अर्थ प्रायः दमदमे होता है; परन्तु चूँकि यहाँ घेराबन्दी का उल्लेख है, इसलिए भविष्यद्वक्ता, जैसा हम छठे अध्याय में कह चुके हैं, युद्ध के यन्त्रों या दीवार तोड़नेवाले यन्त्रों (मेढ़ों) की ओर संकेत करता प्रतीत होता है। और दीवारों को गिराने के लिए यन्त्र होते थे; बड़े पत्थर या बहुत-से पत्थर भी फेंके जाते थे। इसलिए मैं उन लोगों के मत की ओर झुकता हूँ जो मानते हैं कि वे या तो पत्थर और तीर फेंकने के यन्त्र थे, या दीवार तोड़नेवाले मेढ़े। तो वह कहता है, देख, नगर को ले लेने के लिए उसकी ओर दीवार तोड़नेवाले यन्त्र बढ़ाए गए हैं, और नगर कसदियों के हाथ सौंप दिया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि वह सिदकिय्याह का दसवाँ वर्ष था, और ग्यारहवें के आरम्भ में नगर ले लिया गया। परन्तु भविष्यद्वक्ता अपने शब्दों का सबसे अच्छा व्याख्याकार है, और उसका आशय प्रसंग से सहज ही समझा जा सकता है, क्योंकि वह कहता है कि नगर तलवार, महँगी और मरी के द्वारा ले लिया गया; मानो उसने कहा हो कि यद्यपि शत्रु अभी तक नगर में प्रवेश नहीं कर पाए थे, तौभी उसका अन्त हो चुका था, कोई आशा शेष नहीं रही थी, क्योंकि उस पर न केवल हथियारों और बलवन्त सेना से आक्रमण हो रहा था, वरन् उसके भीतर भी शत्रु थे जो उसे कठोरता से दबा रहे थे, अर्थात् महँगी और मरी।

अतः जब बहुत-से लोग मरी और महँगी से पहले ही नष्ट हो चुके थे, तो भविष्यद्वक्ता कहता है कि यद्यपि शत्रु उस पर आक्रमण करना छोड़ भी दें, और बलपूर्वक उसमें प्रवेश न करें, तौभी उसका अन्त हो चुका था, क्योंकि मरी और महँगी ऐसी प्रबल हो गई थीं कि छुटकारे की कोई आशा नहीं थी। इन शब्दों से वह निराशा की चरम सीमा का संकेत करता है; और इसी से वह विचार भी उत्पन्न हुआ जिसने भविष्यद्वक्ता के मन को व्याकुल किया, कि यह पूर्णतः अनुचित प्रतीत होता था कि जब नगर पहले ही शत्रुओं के अधिकार में सौंप दिया गया था, तब परमेश्वर उसे खेत मोल लेने की आज्ञा दे।

वह आगे कहता है, और जो तू ने कहा था वह पूरा हुआ है; और देख, तू इसे देखता है। वह उस बात की पुष्टि करता है जो उसने अभी कही थी, अर्थात् यह कि नगर का विनाश परमेश्वर के न्याय के अतिरिक्त और किसी प्रकार से नहीं हुआ। और वह इसकी पुष्टि इसलिए करता है कि उस समय जो कुछ भी हुआ, उसकी गवाही स्वयं भविष्यद्वक्ता के समय में पहले ही दी जा चुकी थी। और इसी से यह प्रकट हुआ कि नगर संयोग से संकट में नहीं पड़ा था, क्योंकि परमेश्वर ने अपने दासों के द्वारा कुछ भी ऐसा पहले से नहीं बताया था जिसे करने का उसने निश्चय और ठान न लिया हो। तो यरूशलेम का विनाश परमेश्वर का कार्य था, जिसके विषय में उसने अपने दासों के द्वारा पहले से बता दिया था।

क्योंकि इन दोनों बातों को साथ जोड़ना चाहिए —परमेश्वर का मुख और परमेश्वर का हाथ। और यह कल्पना करना उचित नहीं, जैसा कुछ कट्टरपन्थी करते हैं, कि परमेश्वर स्वर्ग से वह सब देखता तो है जो पृथ्वी पर किया जाता है, फिर भी निठल्ला बना रहता है। परन्तु वह जो उचित है उसे ठहराता है, और फिर जब आवश्यक होता है, तब अपने दासों भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा उसकी गवाही देता है। तौभी परमेश्वर के मुख को उसके हाथ से अलग नहीं करना चाहिए।

तो भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि नगर का विनाश परमेश्वर का धर्ममय न्याय था, क्योंकि भविष्यद्वक्ताओं ने उसके विषय में पहले से कहा था।

तू इसे देखता है, ये शब्द पिछले वाक्य से, या उससे सम्बन्ध रखते हैं जो तुरन्त आगे आता है, अर्थात् इसलिए कि यह असंगत या अनुचित प्रतीत होता था कि भविष्यद्वक्ता परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार खेत मोल ले, जबकि परमेश्वर जानता था कि देश शत्रुओं के अधिकार में है, और प्रजा बँधुआई में खदेड़ी जानेवाली है। तो जब परमेश्वर ने प्रजा को देश से निकाल देने का निश्चय कर लिया था, तो यह कैसे हुआ कि उसने अपने दास को खेत मोल लेने की आज्ञा दी? यदि यह सब परमेश्वर को अज्ञात होता, तो यह असंगति इतनी स्पष्ट न होती। परन्तु जब परमेश्वर भली-भाँति जानता था कि जो कुछ उसने अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा बँधुआई के विषय में इतनी बार घोषित किया था, वह बदला नहीं जा सकता, तो जब नगर शत्रुओं के हाथ सौंप दिया गया था, तब खेत मोल लेने और गवाहों के द्वारा उस मोल लेने की पुष्टि करने की आज्ञा देने में उसका क्या उद्देश्य हो सकता था? यिर्मयाह अपनी प्रार्थना का सार बताने के बाद, अब वह उत्तर जोड़ता है जो उसे परमेश्वर से मिला, जिसमें उसकी प्रार्थना का फल दिखाई देता है, अर्थात् यह कि उसे वह सिखाया गया जो प्रजा के छुटकारे और लौटने से सम्बन्ध रखता था, ताकि विश्वासयोग्य लोग आशा रखें, और प्रतिज्ञा पर भरोसा करके नियत समय आने तक अपनी बँधुआई को प्रसन्नता से सहें। शब्द ये हैं, —

यिर्मयाह 32:26-27

26. तब यहोवा का यह वचन यिर्मयाह के पास पहुँचा,

26. Et fuit sermo Jehovae ad Jeremiah, dicendo,

27. देख, मैं यहोवा, सब प्राणियों का परमेश्वर हूँ; क्या मेरे लिए कोई भी काम कठिन है?

27. Ecce ego Jehova Deus universae carnis, An a me abscondita erit ulla res (vel, An mihi difficilis erit ulla res)?

हम पहले ही कह चुके हैं कि क्रिया {}פלאpela के दो अर्थ हो सकते हैं; इसका अर्थ है छिपा होना और अद्भुत होना, और इसलिए रूपक के द्वारा इसका अर्थ होता है वह जो कठिन और असम्भव है। बहुत-से लोग यहाँ इसका यह अर्थ लेते हैं कि कोई भी बात परमेश्वर की दृष्टि से नहीं बचती।

परन्तु जैसा मैंने पिछले व्याख्यान में कहा था, मैं इसे परमेश्वर की सामर्थ्य से सम्बन्धित करने की ओर अधिक झुकता हूँ, अर्थात् यह कि सब वस्तुएँ परमेश्वर के हाथ में और उसकी इच्छा के अधीन हैं, इसलिए उसके मार्ग में कोई कठिनाई नहीं है। क्योंकि मनुष्यों में इतनी चिन्ता कहाँ से आती है, सिवाय इसके कि वे बाधाओं से रुक जाते हैं? परन्तु परमेश्वर बिना किसी परिश्रम के सब बाधाओं को पार कर सकता है।

अतः हमारे मन उलझन में न पड़ें, इसलिए परमेश्वर की सामर्थ्य को ठीक ही हमारे सामने रखा गया है।

और यह अर्थ इस खण्ड के लिए सबसे उपयुक्त है: क्योंकि यिर्मयाह, जब वह बात जो असंगत प्रतीत होती थी उसके मन में आई, तब इस बात के लिए विवश हुआ कि वह अपनी चिन्ता को मानो परमेश्वर की गोद में डाल दे। तब परमेश्वर, उसे राहत देने के लिए, कहता है कि उसके लिए कुछ भी कठिन नहीं, क्योंकि वह सब प्राणियों का परमेश्वर है। यद्यपि सब प्राणी (शब्दशः, सब देह) शब्दों से पवित्रशास्त्र प्रायः सब प्रकार के जीवों का अर्थ लेता है, तौभी अधिकतर केवल मनुष्यजाति का। तौभी मैं इस खण्ड की बारीकी से ऐसी व्याख्या नहीं करता, मानो परमेश्वर यहाँ अन्यजातियों को यहूदियों के विरोध में खड़ा कर रहा हो, और इस प्रकार इनकार कर रहा हो कि वह अब आगे अब्राहम की सन्तान का परमेश्वर रहेगा, क्योंकि उसने उन्हें उनके पापों के कारण त्याग दिया था; परन्तु वह कहता है कि वह विशेष रूप से सारी पृथ्वी का राजा है, और सारी मनुष्यजाति पर शासन करता है। तो वह कहता है, जब परमेश्वर सब प्राणियों का परमेश्वर है, तो क्या उसके लिए कोई बात असम्भव हो सकती है?

यिर्मयाह 32:28-29

28. इसलिए यहोवा यों कहता है, देख, मैं यह नगर कसदियों के हाथ में, और बाबुल के राजा नबूकदनेस्सर के हाथ में कर देने पर हूँ, और वह इसको ले लेगा:

28. Propterea sic dicit Jehova, Ecce ego trade urbem hanc in manum Chaldaeorum et in manum Nebuchadnezer regis Babylonis, et capiet eam;

29. और जो कसदी इस नगर से युद्ध कर रहे हैं, वे आकर इस नगर में आग लगाएँगे, और इसे उन घरों समेत फूँक देंगे जिनकी छतों पर उन्होंने बाल के लिए धूप जलाया, और दूसरे देवताओं को तपावन दिया, कि मुझे रिस दिलाएँ।

29. Et ingredientur Chaldaei, qui oppugnant urbem hanc, et succendent urbem hanc igne, et exurent eam, et domus in quibus suffitum fecerunt super tecta ipsarum Baal, et libamen libarunt diis alienis ad me provocandum.

इस उत्तर का आशय यह है कि यद्यपि परमेश्वर बँधुआई के सत्तर वर्षों का अन्त करनेवाला था, तौभी कपटियों के लिए उत्साहित होने का कोई कारण नहीं था, क्योंकि यह प्रतिज्ञा उनके लिए नहीं थी। तो परमेश्वर यहाँ पहले तो अपने पलटे की बात करता है, ताकि अपनी व्यवस्था के तुच्छ जाननेवालों को भय से भर दे, और यह संकेत करे कि वे छुटकारे के अनुग्रह से बाहर कर दिए गए हैं; इसके बाद वह आगे कहता है कि वह अन्त में बँधुओं पर दया करेगा; परन्तु यह अनुग्रह केवल चुने हुओं और विश्वासयोग्य लोगों तक ही सीमित है।

तो उत्तर के दोनों भागों पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर यहाँ दो परस्पर विरोधी बातों को एक-दूसरे के सामने रखता है। परन्तु जैसा मैंने कहा, पहले वाक्यांश में उसकी दृष्टि कपटियों पर है, जो बिना विश्वास और मन फिराव के उस बात को अपने ऊपर लागू करते थे जिसकी गवाही भविष्यद्वक्ता ने पुनःस्थापना के विषय में दी थी। तो परमेश्वर यहाँ अपनी चरम कठोरता प्रकट करता है, और फिर उस कठोरता को नरम करता है; परन्तु तब वह अपनी बात चुने हुओं की ओर मोड़ता है, क्योंकि केवल वे ही उसका अनुग्रह ग्रहण करने के योग्य थे।

अब हम शब्दों पर आएँ, मैं यह नगर कसदियों के हाथ में, और राजा नबूकदनेस्सर के हाथ में कर दूँगा, और वह इसको ले लेगा। इसका उद्देश्य यह था कि जो कुछ स्वयं यिर्मयाह ने उसकी आज्ञा से पहले से बताया था, वह अटल बना रहे, कि नगर छुड़ाया नहीं जा सकता। क्योंकि यदि यहूदी थोड़े ही समय बाद छुड़ाए जाते, और नगर की घेराबन्दी उठा ली जाती, तो इससे भविष्यद्वक्ता का मन व्याकुल हो सकता था: उस दशा में वह अपनी भविष्यद्वाणियों सहित उपहास का पात्र बन सकता था, और उस पर उतावलेपन का दोष लगाया जा सकता था, क्योंकि उसने परमेश्वर के नाम से वह घोषित करने का साहस किया था जिस पर हम पहले ध्यान दे चुके हैं। इसी कारण और इसी उद्देश्य से परमेश्वर घोषणा करता है कि कुछ भी बदला नहीं जा सकता, क्योंकि कसदी नगर को ले लेनेवाले थे; और इस प्रकार वह भविष्यद्वक्ता से कहता है कि वह अपना मन शान्त रखे, और अपने आप को व्याकुल न करे, मानो उसका यह इरादा हो कि उसकी भविष्यद्वाणियों को उपहास के लिए छोड़ दे; क्योंकि ऐसा होने से परमेश्वर का पवित्र नाम बहुत-सी निन्दाओं का पात्र बन जाता। यदि यिर्मयाह झूठा सिद्ध होता, तो इसका परिणाम इसके अतिरिक्त और क्या होता कि यहूदी ढिठाई से परमेश्वर पर विजय का उत्सव मनाते? तो परमेश्वर फिर से घोषणा करता है कि नगर विनाश के लिए सौंप दिया गया था।

और इसलिए वह आगे कहता है, जो कसदी नगर पर आक्रमण कर रहे हैं, वे भीतर घुस आएँगे; क्योंकि वह यह नहीं कहता कि वे आएँगे, परन्तु जो उसने कहा था उसकी अन्य शब्दों में पुष्टि करता है; तो कसदी नगर में घुस आएँगे, यद्यपि वह बन्द और गढ़ से सुरक्षित था; और इस नगर में आग लगाएँगे। उसने बिना उद्देश्य के नगर शब्द का इतनी बार उल्लेख नहीं किया; क्योंकि चूँकि वह परमेश्वर का पवित्रस्थान और राजसिंहासन का स्थान था, इसलिए यहूदी सोचते थे कि वह अजेय है, और कि शत्रुओं के उस पर अधिकार कर लेने से पहले सूर्य स्वर्ग से गिराया जा सकता है: तो इस झूठे भरोसे को उलट देने के लिए परमेश्वर ने बार-बार नगर शब्द का उल्लेख किया। अन्त में वह आगे कहता है कि कसदी उसे फूँक देंगे, मानो उसने कहा हो कि जो कुछ यिर्मयाह ने पहले से बताया था, वह निश्चय पूरा होगा, न केवल नगर पर आक्रमण के विषय में, वरन् उसके विनाश के विषय में भी, यहाँ तक कि पत्थर पर पत्थर भी न छोड़ा जाएगा, परन्तु उसकी पुनःस्थापना के समय तक भयानक उजाड़ रहेगा। शेष बातें कल।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जैसे तू प्रकट करता है कि तू सारे संसार पर ऐसे शासन करता है कि हम पर, जिन्हें तू ने अपनी कलीसिया की गोद में इकट्ठा करना चाहा है, विशेष चिन्ता रखता है, —ओ यह वरदान दे कि हम तेरी भययोग्य सामर्थ्य के द्वारा अपने कर्तव्य की सीमाओं के भीतर ऐसे रोके रहें कि फिर भी हमें सदा पूरा निश्चय रहे कि तू हमारा परमेश्वर और पिता है, और इस प्रकार हम स्वेच्छा से अपने आप को तेरे वचन के अधीन करें, और न केवल तेरी उस भलाई का स्वाद चखें जो तेरी सन्तान के लिए रखी हुई है, वरन् उससे पोषण भी पाएँ, जिससे हम अन्त में ऊपर के तेरे धन्य राज्य में पहुँचें, जहाँ पूर्ण तृप्ति और पूर्ण आनन्द-भोग होगा, हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा। —आमीन।

एक सौ उनतीसवाँ व्याख्यान

पिछले व्याख्यान में मैंने उस खण्ड की पूरी व्याख्या नहीं की थी जिसमें भविष्यद्वक्ता ने नगर के जलाए जाने की घोषणा की थी। नगर के विषय में कहने के बाद वह उन घरों का उल्लेख करता है जिन पर उन्होंने अपनी मूरतों के लिए धूप जलाया था, और तपावन उण्डेले थे। फिर वह इसका कारण बताता है कि परमेश्वर का इतना भारी पलटा उस पवित्र नगर के लिए क्यों रखा था, अर्थात् इसलिए कि उसके घर अन्धविश्वासों से अशुद्ध हो गए थे। और वह कहता है कि मूरतों के लिए उनकी चोटियों या छतों पर धूप जलाया गया था; क्योंकि छतें, जैसा पवित्रशास्त्र के बहुत-से स्थानों से प्रकट होता है, मानो टहलने के स्थान थीं; और हम जानते हैं कि मूर्तिपूजक सदा ऊँचे स्थानों को ढूँढ़ते थे, क्योंकि वे कल्पना करते थे कि इस प्रकार वे परमेश्वर के अधिक निकट हैं। तो आशय यह दिखाना है कि जिस दण्ड के विषय में भविष्यद्वक्ता ने कहा था, वह अत्यधिक कठोर नहीं था, क्योंकि सब घर बहुत-से अपवित्र कामों से दूषित हो चुके थे।

वह पहले बाल का, और फिर पराए देवताओं का उल्लेख करता है। हम जानते हैं कि बाल को कभी-कभी विशिष्ट अर्थ में लिया जाता है, और कभी-कभी उसमें सब प्रकार की मूरतें सम्मिलित होती हैं; फिर भी भविष्यद्वक्ता प्रायः बहुवचन का प्रयोग करते थे, और उन्हें बालीम कहते थे, अर्थात् संरक्षक; जिन्हें यहूदी सोचते थे कि पहले प्रसन्न करना चाहिए, ताकि वे उसी रीति से परमेश्वर को भी शान्त कर सकें। क्योंकि अन्धविश्वास एक ही सच्चे परमेश्वर से कभी सन्तुष्ट नहीं होता, परन्तु बहुत-से देवताओं को ढूँढ़ता है, जैसा हम आगे 35वें पद (यिर्मयाह 32:35) में देखेंगे, जहाँ बाल के साथ मोलेक का भी उल्लेख किया गया है। और भविष्यद्वक्ता यहाँ कहता है कि उन्होंने पराए देवताओं को तपावन उण्डेले थे। अतः हम देखते हैं कि बाल में हर प्रकार की मूरतें सम्मिलित हैं।

वह आगे कहता है, कि वे मुझे रिस दिलाएँ। इन शब्दों से परमेश्वर यह जताता है कि यहूदी किसी अज्ञानता का बहाना नहीं बना सकते थे, क्योंकि व्यवस्था से उन्हें आवश्यकता से कहीं अधिक सिखाया जा चुका था कि परमेश्वर की आराधना किस रीति से की जानी चाहिए; और उन्हें यह नियम भी दिया गया था कि वे केवल परमेश्वर ही की आराधना करें: परन्तु उन्होंने बहुत-से देवताओं की, और वह भी अपने ही गढ़े हुए अन्धविश्वासों के अनुसार, आराधना की। इसलिये परमेश्वर यहाँ उचित ही शिकायत करता है कि उन्होंने मानो जान-बूझकर उसे रिस दिलाई थी, क्योंकि अज्ञानता को बहाना नहीं बनाया जा सकता था, इसलिये कि व्यवस्था की शिक्षा उनका मार्गदर्शन करने के लिये पर्याप्त थी। अब आगे लिखा है —

यिर्मयाह 32:30

30. क्योंकि इस्राएली और यहूदी अपनी लड़कपन से ही मेरी दृष्टि में केवल बुराई ही करते आए हैं: क्योंकि इस्राएली अपने हाथों के काम से मुझे केवल क्रोध ही दिलाते आए हैं, यहोवा की यही वाणी है।

30. Quia fuerunt filii Israel et filii Jehudah tantummodo parrantes malum in oculis meis a pueritia sua; quia Israel tantummodo fuerunt provocantes me in opere manum suarum, dicit Jehova.

वह प्रजा के पाप को और बढ़ाकर दिखाता है, कि वे अपनी बुराइयों से कभी नहीं हटे। और वह दस गोत्रों का, और यहूदा के गोत्र का भी, उल्लेख करता है। हम जानते हैं कि दस गोत्र परमेश्वर की शुद्ध आराधना से उस समय हट चुके थे जब यरूशलेम में सच्चा धर्म अब भी बना हुआ था। इसलिये यहूदा की सन्तान का उल्लेख करके उसने निःसन्देह उनके दोष को और भारी कर दिया, यह जताते हुए कि वे भी इस्राएलियों के साथ गिर पड़े थे, यद्यपि कुछ समय तक वे बचाए रखे गए थे। पहले इस्राएली भ्रष्ट हो गए थे, फिर अब्राहम का सारा वंश उसी धर्मत्याग में फँस गया, यहाँ तक कि उन्होंने परमेश्वर की सच्ची आराधना को त्याग दिया। परन्तु इसके बाद वह केवल इस्राएल की सन्तान का उल्लेख करता है, फिर भी उसमें यहूदा के गोत्र को भी सम्मिलित करता है। क्योंकि यह ध्यान रखना चाहिए कि जब पवित्रशास्त्र इस्राएल को यहूदा के साथ जोड़ता है, तब इस्राएल का अर्थ दस गोत्र होता है, और आदर या निन्दा के कारण यहूदा के घराने का उल्लेख इस्राएल के राज्य से अलग किया जाता है; परन्तु जब केवल इस्राएल का उल्लेख होता है, तब उसमें बिना किसी अपवाद के अब्राहम की सारी सन्तान सामान्य रूप से सम्मिलित होती है। इस स्थान पर भी ऐसा ही है, जब वह कहता है कि इस्राएल की सन्तान और यहूदा की सन्तान ने परमेश्वर को रिस दिलाने के सिवा और कुछ नहीं किया।

इसके बाद वह केवल इस्राएल का उल्लेख करता है, और उसमें बारहों गोत्रों को सम्मिलित करता है।

परन्तु वह कहता है कि इस्राएल की और यहूदा की सन्तान ने अपनी लड़कपन से उसे केवल रिस ही दिलाई थी। अव्यय {}אךak कभी स्वीकारात्मक अर्थ में लिया जाता है, और कभी विरोधवाचक अर्थ में, अर्थात् "परन्तु" या "तौभी"; और यदि प्रसंग अनुमति देता तो यह पिछला अर्थ उपयुक्त होता। मेरा झुकाव उन लोगों से सहमत होने की ओर है जो इसका अनुवाद "केवल" करते हैं; और ऐसा जान पड़ता है कि भविष्यद्वक्ता ने सारी अस्पष्टता दूर कर दी है, क्योंकि वह केवल यह नहीं कहता कि उन्होंने बुराई की थी, वरन् यह कि वे बुराई करते आ रहे थे, जो बोलने की ऐसी रीति है जिससे निरन्तर होनेवाला कार्य सूचित होता है; अर्थात् वे बुराई करते ही रहे थे, यानी वे कभी नहीं रुके।

और वह {,}אךak, "केवल", कहकर इस घोषणा की पुष्टि करता है, अर्थात् उनका और कोई उद्देश्य नहीं था, या उनका सारा यत्न इसके सिवा और कुछ न था कि वे बिना अन्त और बिना सीमा के मुझे रिस दिलाएँ। इससे हम देखते हैं कि यहूदियों से शिकायत का हर आधार छीन लिया गया है, क्योंकि परमेश्वर ने बड़ी सहनशीलता से अपने पलटे को टाल रखा था, क्योंकि वह तो उन्हें कई युग पहले ही दण्ड दे सकता था। अतः जब वे परमेश्वर को रिस दिलाने से कभी नहीं रुके, तो उन पर दिखाई गई कठोरता बहुत अधिक नहीं लग सकती थी, क्योंकि उसने अपनी भलाई में उन्हें पश्चाताप के लिये बुलाया था, परन्तु कुछ फल न निकला।

और लड़कपन से — इसे यहाँ व्यक्तियों के विषय में नहीं समझना चाहिए, वरन् इसे सारी प्रजा पर लागू करना चाहिए; और इस प्रकार लड़कपन को उनके छुटकारे का समय समझना चाहिए, जैसा हम आगे देखेंगे। क्योंकि उस समय, जंगल में, कलीसिया का मानो जन्म हुआ था, जब वे नए-नए ज्योति में लाए गए थे, क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें मृत्यु के अन्धकार से छुड़ाया था। अपनी उसी बाल्यावस्था में वे परमेश्वर को रिस दिलाने लगे; उस समय से वे अपनी दुष्टता में सदा हठीले बने रहे।

तो अर्थ यह है कि इस्राएल की प्रजा का स्वभाव इतना टेढ़ा था कि अन्त में उन्हें कठोर दण्ड देना आवश्यक हो गया, क्योंकि वे बुराई पर बुराई जोड़ने से नहीं रुके। और अव्यय {}אךak उनके बढ़े हुए दोष को दिखाता है, क्योंकि उन्होंने अपना सारा मन परमेश्वर को रिस दिलाने में लगा दिया था, और वे ऐसे अन्धविश्वास गढ़ने में चतुर रहे थे जिनके द्वारा उन्होंने परमेश्वर की आराधना को अशुद्ध किया: वह कहता है, वे तो केवल बुराई ही करते आए हैं।

और वह आगे कहता है, अपने हाथों के काम से। यह व्याख्या इसलिये जोड़ी गई है क्योंकि इस्राएली कोलाहल मचा सकते थे और पूछ सकते थे कि वह बुराई क्या थी। परमेश्वर ने तो पर्याप्त रूप से दिखा दिया था कि बहाने ढूँढ़ने से उन्हें कुछ लाभ न होगा, क्योंकि जब उसने कहा, मेरी दृष्टि में, तब उसने अपने आप को उनका न्यायी ठहराया था; क्योंकि इन शब्दों से भविष्यद्वक्ता यह जताते हैं कि मनुष्यों के कामों का सही न्याय स्वयं मनुष्य नहीं कर सकते, क्योंकि चाहे वे चाहें या न चाहें, उन्हें परमेश्वर के न्याय के अनुसार ही खड़े रहना या गिरना है।

इसलिये जब कभी परमेश्वर यह घोषणा करता है कि मनुष्यों ने उसकी दृष्टि में पाप किया है, तब उसका अर्थ यह है कि उनके लिये अपनी भली मनसा की दुहाई देकर, जैसा वे प्रायः कहा करते हैं, बच निकलने के रास्ते ढूँढ़ना व्यर्थ है, क्योंकि न्याय करने का अधिकार उसी के पास है। और इस सत्य की वह तब पुष्टि करता है जब वह कहता है कि उन्होंने अपने हाथों के काम से उसे रिस दिलाई थी। उनके हाथों के काम से भविष्यद्वक्ता का अर्थ वे अन्धविश्वास हैं जिन्हें लोगों ने अपने लिये गढ़ लिया था। और हमें परमेश्वर की आज्ञाओं और अपने हाथों के कामों के बीच के विरोध को सदा स्मरण रखना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर की व्यवस्था के अतिरिक्त जो कुछ हम उस पर थोपते हैं, वह हमारे हाथों का काम है; परन्तु आज्ञा मानना बलिदान से उत्तम है।

294 अव्यय {{אך का अर्थ "सचमुच", "निश्चय", "अवश्य" भी है। सेप्टुआजिंट इसका अनुवाद "केवल" करता है, — वल्गेट "निरन्तर", — टार्गम "सचमुच", — और सीरियाई अनुवाद इसे छोड़ देता है; इसका सबसे उचित अर्थ "तौभी" है, परन्तु हमारे अनुवाद में इसे प्रायः "निश्चय" कहकर अनूदित किया गया है: और यहाँ इसका अनुवाद "निश्चय" या "निःसन्देह" किया जा सकता है। — सं.

295 यह स्पष्ट जान पड़ता है कि इसका अन्तिम वाक्यांश पहले की व्याख्या करता है, जैसा कैल्विन दिखाता है। "वह बुराई," क्योंकि उसके पहले उपपद है, "उनके हाथों का काम," अर्थात् मूर्तिपूजा थी: क्योंकि इस्राएल की सन्तान और यहूदा की सन्तान अपनी लड़कपन से निःसन्देह मेरी आँखों के सामने वह बुराई करती आई है; क्योंकि इस्राएल की सन्तान निःसन्देह अपने हाथों के काम से मुझे रिस दिलाती आई है, यहोवा की यही वाणी है। इस रीति से सम्बन्ध अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। — सं.

अतः परमेश्वर यहाँ मनुष्यों के सब आविष्कारों को स्पष्ट रूप से दोषी ठहराता है, मानो उसने कहा हो कि मनुष्य अपने अन्धविश्वासों में चाहे कितना ही आनन्द क्यों न मनाएँ, तौभी वे अधर्मी और घृणित हैं, क्योंकि कुछ भी गढ़ लेना उचित नहीं है। क्योंकि परमेश्वर ने हमें अपनी व्यवस्था देकर हमारे लिये करने को और कुछ नहीं छोड़ा, सिवाय इसके कि जो उसने आज्ञा दी है उसका पालन करें; और जब हम मुड़ जाते हैं और अपनी ओर से कुछ जोड़ देते हैं, तब हम पवित्र वस्तुओं के अपमान के सिवा और कुछ नहीं करते।

अब आगे लिखा है —

यिर्मयाह 32:31

31. क्योंकि यह नगर जिस दिन से उन्होंने इसे बनाया तब से आज के दिन तक मेरे कोप और मेरी जलजलाहट को भड़कानेवाला रहा है; इसलिये कि मैं इसे अपने सामने से दूर कर दूँ,

31. Quia ad tram meam et excandescentiam meam fuit mihi urbs ista ex quo die aedificarunt eam ad diem hunc usque, ad tollendum ipsam e conspectu meo; वह उस बात की पुष्टि करता है जो हमने अभी कही, अर्थात् यह कि परमेश्वर यहूदियों को चाहे कितना ही कठोर दण्ड क्यों न दे, तौभी वह अपने न्याय में उचित सीमा का उल्लंघन नहीं करेगा, क्योंकि उनका अधर्म चरम सीमा तक पहुँच गया था। यह एक भयानक न्याय था जब नगर आग से पूरी रीति से ढा दिया गया, और मन्दिर नष्ट कर दिया गया। इसलिये दण्ड की भयंकरता बहुतों को यह शिकायत करने पर विवश कर सकती थी कि परमेश्वर अत्यन्त कठोर है। यहाँ वह ऐसी सब शिकायतों को रोकता है, और कहता है कि यह नगर मानो इसी उद्देश्य से बनाया गया था, अर्थात् उसे रिस दिलाने के लिये, जैसा हम फ्रांसीसी में कहते हैं, Elle a este faite pour me depiter, pour me facher। कुछ लोग पढ़ते हैं, "यह नगर मेरे लिये घटा दिया गया है;" परन्तु वे अर्थ को बिगाड़ते और धुँधला कर देते हैं। इसका अनुवाद अधिक उचित रूप से यों किया जा सकता है, "यह नगर मेरे क्रोध और रोष के लिये मुझे ठहराया गया है।" परन्तु जो अर्थ मैंने दिया है वह अधिक सरल है। इस प्रकार {,}אפיaphi, और {}חמתיchemeti शब्दों को कर्मवाच्य अर्थ में लेना चाहिए, अर्थात् यह कि यरूशलेम नगर मानो इसी उन्माद के लिये अर्पित हो गया था, यहाँ तक कि वह अपने ही विरुद्ध परमेश्वर के पलटे को अधिकाधिक भड़काने से नहीं रुका। संक्षेप में, वह दूसरे शब्दों में उसी बात को दोहराता है जो उसने पहले कही थी, अर्थात् यह कि इस्राएल की सन्तान अपने कुकर्मों से परमेश्वर को रिस दिलाने के सिवा और कुछ नहीं करती थी।

तो यहाँ कोई नई बात नहीं कही गई, परन्तु क्योंकि यह ऐसी बात थी जिस पर विश्वास करना कठिन था, इसलिये भविष्यद्वक्ता इस पर ठहरता है, और कहता है कि यरूशलेम नगर जिस समय से उसकी नींव डाली गई थी, तब से परमेश्वर के क्रोध और रोष के लिये रहा है। और पद के अन्त से हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि सच्चा अर्थ यही है, क्योंकि वह कहता है, आज के दिन तक, इसलिये कि मैं इसे अपनी दृष्टि से दूर कर दूँ; मानो उसने कहा हो कि यहूदियों ने पाप करने का कोई अन्त न किया, इसलिये अब ऐसी दुष्ट प्रजा को, जिसकी अधर्मता असाध्य थी, दण्ड देने का ठीक समय आ गया था। और जब वह कहता है, आज के दिन तक, तब वह उनके हठ को दिखाता है। क्योंकि प्रजा ने केवल जंगल में ही पाप करना आरम्भ नहीं किया था, वरन् वे, यों कहें, एक नियमित क्रम में अपनी अधर्मता में लगे रहे, यहाँ तक कि किसी युग में, किसी वर्ष में, किसी दिन में वे अपनी बुराइयों से नहीं रुके। तो यहाँ उनके पाप करने की स्थायी आदत दिखाई गई है। आगे लिखा है —

296 इस पद का शब्दशः अनुवाद करना कठिन पाया गया है, यद्यपि सामान्य अर्थ स्पष्ट है, और वह हमारे अनुवाद में दिया गया है, जो सामान्य से अधिक व्याख्यात्मक है। यदि हम {{על को ,{}עלה के स्थान पर उसके कसदी अर्थ में लें, जैसा दानिय्येल 6:5, 6 में है, तो हम अनुवाद को सरल पाएँगे, — 31. क्योंकि मेरे क्रोध का कारण, और मेरे रोष का कारण, यह नगर मेरे लिये उस दिन से रहा है जब उन्होंने इसे बनाया, यहाँ तक कि 32. आज के दिन तक; इसलिये मैं इसे अपनी दृष्टि से दूर करूँगा, इस्राएल की सन्तान की सारी दुष्टता के कारण, इत्यादि इत्यादि। अतः यिर्मयाह 32:31 के पिछले भाग को अगले पद से जोड़ना चाहिए। "दूर करना" के लिये क्रिया .{}ל के बाद आनेवाले क्रियार्थक संज्ञा रूप में है। यह एक अधूरा (लुप्तपद) वाक्यांश है, जैसा कभी-कभी होता है, जहाँ कोई संकल्प, बाध्यता या कर्तव्य अभिप्रेत होता है। — सं.

यिर्मयाह 32:32

32. इस्राएल की सन्तान और यहूदा की सन्तान की उस सारी बुराई के कारण, जो उन्होंने मुझे रिस दिलाने के लिये की है — उन्होंने, उनके राजाओं ने, उनके हाकिमों ने, उनके याजकों ने, और उनके भविष्यद्वक्ताओं ने, और यहूदा के लोगों ने, और यरूशलेम के निवासियों ने।

32. Super omne malum (vel, propter omne malum) filiorum Israel et filiorum Jehudah, quod patrarunt ad provocandum me, ipsi, reges eorum, proceres eorum, sacerdotes eorum et prophetae eorum, et viri Jehudah et incolae Jerusalem.

यह पद पिछले पद से जुड़ा हुआ है: परमेश्वर ने शिकायत की थी कि वह नगर अपने स्वभाव में ऐसा टेढ़ा था कि मानो वह अपने पापों के द्वारा अपना ही विनाश ढूँढ़ने के उद्देश्य से स्थापित किया और बनाया गया था। वह इस घोषणा की पुष्टि यह जोड़कर करता है, इस्राएल की सन्तान और यहूदा की सन्तान की सारी दुष्टता के कारण। सारी दुष्टता या बुराई से उसका अर्थ वही है जो उसने पहले कहा था, कि वे केवल बुराई ही करते आए थे, क्योंकि उन्होंने केवल एक ही बात में अपराध नहीं किया था, वरन् अपने आप को अधर्मता के हवाले कर दिया था, यहाँ तक कि उनमें कुछ भी शुद्ध या सच्चा न रहा; क्योंकि उन्होंने अपने आप को अधर्मता को सौंप दिया था, यहाँ तक कि उन्होंने ऐसा कुछ भी न छोड़ा जो परमेश्वर को रिस दिलाने के योग्य हो। जीवन के हर भाग पर एक सर्वव्यापी कलंक फैला हुआ है, मानो उसने कहा हो कि वे इतनी दुष्टता से भरे हुए थे कि उनमें कोई भी भाग स्वस्थ नहीं रहा। यह सम्भव है कि मनुष्य का शरीर एक या दो रोगों से पीड़ित हो, जबकि कुछ अंगों में स्वास्थ्य बना रहे; परन्तु भविष्यद्वक्ता का यहाँ अर्थ यह है कि इस्राएली इतने भ्रष्ट हो गए थे, जैसा भजन संहिता 14:1 में कहा गया है, कि उनमें कुछ भी अखण्ड न रहा।

अब परमेश्वर यहाँ मनुष्यों के सब पदों और वर्गों को दोषी ठहराता है: पहले वह कहता है कि राजाओं ने पाप किया था; क्योंकि उन्होंने न केवल स्वयं परमेश्वर की सच्ची आराधना को त्याग दिया था, वरन् वे दूसरों के लिये भी पतन या धर्मत्याग का कारण बन गए थे। राजाओं के साथ वह हाकिमों, अर्थात् मन्त्रियों को, और फिर याजकों और भविष्यद्वक्ताओं को जोड़ता है। और निःसन्देह, राजाओं को अपने मन्त्रियों सहित एक आँख होना चाहिए था, और याजकों तथा भविष्यद्वक्ताओं को दूसरी; क्योंकि सच्चे और वैध शासन में दो आँखें न्यायी और कलीसिया के पासबान होते हैं। परन्तु भविष्यद्वक्ता कहता है कि राजा और उनके मन्त्री अधर्मी हो गए थे, और फिर यह कि याजक और भविष्यद्वक्ता भी वैसे ही अपराधों में फँस गए थे। और यह सचमुच एक विकट बात थी कि उन याजकों में ऐसा अन्धापन और उन्माद देखा जाए जिन्हें परमेश्वर ने वंशानुगत अधिकार से व्यवस्था के व्याख्याताओं के रूप में कलीसिया के ऊपर ठहराया था, उस वचन के अनुसार जो कहा गया है, "क्योंकि याजक को चाहिए कि वह अपने होंठों से ज्ञान की रक्षा करे, और लोग उसके मुँह से व्यवस्था पूछें, क्योंकि वह सेनाओं के यहोवा का दूत है।" (मलाकी 2:7)

और जब याजक अज्ञानता या आलस्य के कारण अपने पद के कर्तव्य में चूक गए, तब परमेश्वर ने उनके स्थान पर भविष्यद्वक्ता खड़े किए, और उसका उद्देश्य यह था कि ऐसी सहायता के द्वारा अपनी कलीसिया के विनाश को रोके। परन्तु यिर्मयाह कहता है कि भविष्यद्वक्ता भी याजकों के समान हो गए थे।

यह खण्ड ध्यानपूर्वक देखने योग्य है; क्योंकि हम देखते हैं कि जब कलीसिया फूटों से अशान्त होती है, तब बहुत-से लोग कितने प्रसन्न होते हैं; क्योंकि वे सोचते हैं कि इस प्रकार वे निर्दोष ठहरते हैं, जब वे धर्म के विषय में हर चिन्ता और हर सरोकार को त्याग देते हैं; और बहुत-से लोग इसी प्रकार की उदासीनता में लिप्त रहते हैं। परन्तु यदि उस समय विश्वासी ऐसे ही लापरवाह होते, तो क्या धर्म हज़ार बार लुप्त न हो जाता, और उनके हृदयों से पूरी रीति से बुझ और मिट न जाता? इसलिये आओ, हम यह सीखें कि चाहे झूठे भविष्यद्वक्ता उठ खड़े हों और अपने छल से शुद्ध शिक्षा को धुँधला कर दें, और चाहे बलि चढ़ानेवाले धर्मत्यागी हो जाएँ, और सारी कलीसिया को ढा देने के लिये मानो झण्डा खड़ा कर दें — तौभी हम दृढ़ रहना सीखें; क्योंकि हमारा विश्वास डगमगाना नहीं चाहिए, चाहे सारा संसार उलट-पुलट हो जाए, वरन् चाहे शैतान आकाश और पृथ्वी को आपस में मिला दे।

संक्षेप में, हमारे विश्वास की सच्ची परख यही है कि जिस समय शैतान सब बातों से बढ़कर हर वस्तु को गड़बड़ी में डालने का प्रयत्न करता है, उस समय हम परमेश्वर के सत्य में दृढ़ता से बने रहें। क्योंकि यिर्मयाह यहाँ मिस्रियों या अश्शूरियों के विषय में नहीं, वरन् चुनी हुई प्रजा के विषय में, अब्राहम की सन्तान के विषय में, परमेश्वर के पवित्र निज भाग के विषय में बोलता है; और फिर भी वह कहता है कि याजक और भविष्यद्वक्ता प्रजा को उसके पापमय मार्गों में ले चलनेवाले अगुवे बन गए थे, यहाँ तक कि उन्होंने परमेश्वर की सच्ची आराधना को त्याग दिया, व्यवस्था को बिगाड़ दिया, और संक्षेप में, धर्म से हट गए।

इसके बाद वह जोड़ता है, और यहूदा के लोग और यरूशलेम के निवासी। वह इस्राएलियों के विषय में नहीं बोलता, जो बहुत पहले ही अशुद्ध हो चुके थे, और अपने आप को अधर्मी अन्धविश्वासों के हवाले कर चुके थे, क्योंकि वे मानो परमेश्वर की प्रजा के लिये परदेशी हो गए थे; परन्तु वह केवल यहूदियों का नाम लेता है, जो जीवित बचे रहे थे, ताकि परमेश्वर की कलीसिया संसार में बनी रहे। वह क्रम से आगे बढ़ता है, क्योंकि वह यरूशलेम के निवासियों का उल्लेख सबसे अन्त में करता है। यह सचमुच कम सहने योग्य बात थी कि वे लोग, जिनके सामने मन्दिर था, जिन्हें परमेश्वर की सच्ची आराधना का निरन्तर स्मरण दिलाया जाता था, धर्मत्यागी हो जाएँ, बजाय इसके कि वे गाँवों में रहनेवाले होते; क्योंकि जो देहात में रहते थे, और वर्ष में तीन बार मन्दिर में आया करते थे, उनके पास प्रत्यक्षतः कुछ बहाना था।

परन्तु क्योंकि यरूशलेम के नागरिकों को धर्म के इतने साधन प्राप्त थे, क्योंकि परमेश्वर की व्यवस्था उनके कानों में निरन्तर गूँजती रहती थी, क्योंकि बलिदान मानो तुरहियाँ थे जिनके फूँके जाने से वे परमेश्वर की सेवा करने और उसका भय मानने के लिये बुलाए जाते थे, इसलिये, जैसा हम कह चुके हैं, यह उनके दोष को बहुत अधिक भारी करनेवाली बात थी। इसलिये भविष्यद्वक्ता अधिक निन्दा के लिये उन्हें यहूदा के लोगों के साथ जोड़ता है। आगे लिखा है —

यिर्मयाह 32:33

33. और उन्होंने मेरी ओर मुँह नहीं, वरन् पीठ फेर दी है: यद्यपि मैं उन्हें सिखाता रहा, तड़के उठकर सिखाता रहा, तौभी उन्होंने शिक्षा ग्रहण करने के लिये कान नहीं लगाया।

33. Et verterunt mihi cervicem et non faciem; et docendo eos, et mane surgendo et docendo, et non audierunt (et ipsi non audientes, ad verbum, sed, non audierunt) ut reciperent correctionum (vel, disciplinam)

यहाँ भविष्यद्वक्ता प्रजा के हठ को और अधिक स्पष्ट रूप से व्यक्त करता है, मानो उसने कहा हो कि उन्होंने जान-बूझकर हर शिक्षा को ठुकरा दिया था, और परमेश्वर की कुछ भी परवाह न दिखाई थी; क्योंकि जो हमारी ओर पीठ फेरता है, वह यह जानते-बूझते और अपनी इच्छा से करता है, और निश्चय ही तिरस्कार के बिना नहीं। जब कोई मुझसे बात करता है, और मैं दूसरी ओर देखता हूँ, तो क्या यह तिरस्कार या अवहेलना का प्रत्यक्ष चिह्न नहीं है? और जो बोलता है, क्या वह नहीं देखता कि उसकी उपेक्षा की जा रही है? इस प्रकार परमेश्वर शिकायत करता है कि यहूदी अज्ञानता के कारण नहीं, वरन् मानो पहले से सोचे-समझे हठ के कारण भटक गए थे: वह कहता है, उन्होंने तो मेरी ओर गर्दन फेर दी, जबकि उन्हें व्यवस्था की शिक्षा सुनने के लिये ध्यान लगाए रहना चाहिए था। क्योंकि जब कभी परमेश्वर को यह भाता है कि वह बताए कि क्या करना चाहिए, या उद्धार का मार्ग दिखाए, तब वह हमें अपना मुख दिखाता है। जब वह हमारी ओर देखता है, तब यदि हम भी बदले में उसकी ओर न देखें, तो हमारा घमण्ड कितना घृणित होगा! तो पहली बात यह है कि यहूदियों ने जान-बूझकर और अपनी इच्छा से परमेश्वर और उसकी व्यवस्था को तुच्छ जाना था।

297 मूल में ऐसा ही है; परन्तु हम "पीठ" कहते हैं। यही शब्द यिर्मयाह 2:27 में भी पाए जाते हैं। — सं.

फिर वह यह कहकर उनके दोष को बढ़ाता है, और मैं ने उन्हें सिखाया, मैं तड़के उठकर उन्हें सिखाता रहा, और उन्होंने न सुना। यदि व्यवस्था केवल एक ही बार घोषित की गई होती, तो यहूदी आपत्ति करके कह सकते थे कि वे अधिकांश अनपढ़ थे; परन्तु उनके लिये बहाने का कोई रंग शेष न रहा, क्योंकि भविष्यद्वक्ता निरन्तर व्यवस्था की व्याख्या करते रहते थे, जैसा परमेश्वर ने मूसा के द्वारा प्रतिज्ञा भी की थी, "मैं तेरे भाइयों के बीच में से तेरे लिये एक भविष्यद्वक्ता उठाऊँगा।" (व्यवस्थाविवरण 18:18)

क्योंकि वह यह जताता है कि यह उपकार कलीसिया में सदा बना रहेगा, यहाँ तक कि प्रजा को सही मार्ग दिखाने के लिये भविष्यद्वक्ताओं की कभी घटी न होगी। क्योंकि वह भविष्यद्वक्ताओं को शकुन विचारनेवालों, भावी कहनेवालों, भविष्य बतानेवालों और शैतान के अन्य सब सेवकों के विरोध में रखता है, मानो उसने कहा हो कि प्रजा के लिये शैतान के छल को ढूँढ़ने का कोई कारण नहीं था, क्योंकि भविष्यद्वक्ता पर्याप्त थे। इसलिये, कहीं ऐसा न हो कि यहूदी शिकायत करें कि उनके साथ कठोरता का व्यवहार किया गया, परमेश्वर यहाँ दिखाता है कि उसने उन्हें सिखाया था, क्योंकि जो कुछ उसने अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा किया था, उसे वह अपना ही काम ठहराता है: और निःसन्देह भविष्यद्वक्ता और शिक्षक पवित्र आत्मा के साधनों के सिवा और कुछ नहीं हैं; क्योंकि कोई भी सिखाने के योग्य नहीं, जब तक वह परमेश्वर के आत्मा के द्वारा न चलाया जाए। इसलिये परमेश्वर उचित ही इन कार्यों को अपना ठहराता है, ताकि अपनी कलीसिया के निर्माण की सारी प्रशंसा उसी को मिले, यद्यपि वह मनुष्यों के परिश्रम को काम में लाता है। इसी अर्थ में वह कहता है कि उसने उन्हें सिखाया था।

फिर वह जोड़ता है कि वह तड़के उठा, अर्थात् वह परिश्रमी रहा था। जैसे घर का स्वामी, जो अपने लोगों की चिन्ता करता है, तड़के ही पूछता है कि वे कैसे हैं, और सारे घर में चारों ओर देखता है; वैसे ही परमेश्वर यहाँ इस्राएलियों को सिखाने में अपनी चिन्ता के विषय में बोलते हुए अपने आप को प्रस्तुत करता है, मानो उसने कहा हो कि न केवल उसकी व्यवस्था उनकी आँखों के सामने रखी गई थी, जिससे वे सीख सकें कि क्या ठीक है, वरन् भविष्यद्वक्ता भी दिए गए थे जो उन्हें चिताने और समझाने से नहीं रुके।

अब बोलने की इस रीति पर विशेष ध्यान देना चाहिए, क्योंकि इससे हम सीखते हैं कि जो लोग भविष्यद्वक्ताओं की शिक्षा को ठुकराते हैं उनकी कृतघ्नता कितनी नीच है; क्योंकि उन्होंने केवल मनुष्यों की नहीं, वरन् स्वयं परमेश्वर की उपेक्षा की, जैसा मसीह भी घोषणा करता है, "जो तुम्हारी सुनता है, वह मेरी सुनता है; और जो तुम्हें तुच्छ जानता है, वह मुझे तुच्छ जानता है।" (लूका 10:16)

तो बोलने की यह रीति भविष्यद्वक्ताओं द्वारा सिखाई गई शिक्षा की सच्चाई की प्रशंसा करती है; क्योंकि परमेश्वर सामने आकर दिखाता है कि वह अपने दासों के द्वारा बोलता है। और दूसरी ओर, हम सीखते हैं कि विश्वासयोग्य और सच्चे शिक्षकों का होना कैसी अनुपम आशीष है; क्योंकि परमेश्वर उनके द्वारा और उनके परिश्रम के द्वारा निश्चयता के साथ घोषणा करता है कि उसे हमारे उद्धार की चिन्ता है, मानो वह हम पर दृष्टि रखता हो, मानो वह तड़के उठता हो, मानो वह हमारी सुधि लेने आता हो; और सुसमाचार के प्रचार को अकारण ही परमेश्वर का आगमन (सुधि लेना) नहीं कहा जाता। इसलिये जब परमेश्वर अपने वचन के द्वारा हमारे साथ उपस्थित है, तब हमारे लिये इससे उत्तम कुछ ढूँढ़ने का कोई कारण नहीं; क्योंकि जब कभी सच्चे और विश्वासयोग्य शिक्षक उठ खड़े होते हैं, तब हमें उसकी उपस्थिति की निश्चित गवाही मिलती है।

298 सिखाने और तड़के उठने के लिये प्रयुक्त शब्द कृदन्त हैं, जो पिछले वाक्यांश के "मेरी" पर निर्भर हैं, और शब्दों के क्रम में थोड़ा-सा परिवर्तन करने से अर्थ अधिक स्पष्ट हो जाएगा, — और जब मैं उन्हें सिखा रहा था, तड़के उठकर सिखा रहा था, तब उन्होंने मेरी ओर मुँह नहीं वरन् गर्दन फेर दी; तौभी उन्होंने शिक्षा ग्रहण करने के लिये कान न लगाया। जब परमेश्वर उन्हें सिखा रहा था, तब उन्होंने पीठ फेर ली! — सं.

वह जोड़ता है, ताड़ना ग्रहण करने के लिये। {}מוסרmusar शब्द से वह यह जताता है कि यहूदियों ने अज्ञानता के कारण पाप नहीं किया था, वरन् वे अड़ियल रहे थे, क्योंकि उन्होंने सुधारे जाने से इन्कार किया। यह शब्द कभी-कभी शिक्षा के अर्थ में भी लिया जाता है, परन्तु यहाँ इसका अर्थ ताड़ना या सुधार है, अर्थात् जब कोई, जो सामान्यतः सही मार्ग पर चलता है, सही रास्ते से भटक जाता है, परन्तु चिताए जाने पर पश्चाताप करता है। इससे हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता का क्या अर्थ है, अर्थात् यह कि यहूदियों ने न केवल व्यवस्था में चमकनेवाली स्पष्ट ज्योति के विरुद्ध अपनी आँखें मूँद ली थीं, वरन् वे पूरी रीति से हठीले हो गए थे, यहाँ तक कि जब परमेश्वर ने उन्हें पश्चाताप के लिये बुलाया तब वे वश में न किए जा सके, और जब उसने उनके रोगों को चंगा करना चाहा, तब उन्होंने ऐसा हठ दिखाया कि सारी ताड़ना और अनुशासन को फेंक दिया। इससे हम सीखते हैं कि पलटे का समय आ पहुँचा था, क्योंकि परमेश्वर ने उनके कल्याण के लिये सब उपाय करके देख लिए थे, और, जैसी लोक-कहावत है, परिश्रम और व्यय दोनों खो दिए थे। आगे लिखा है —

यिर्मयाह 32:34

34. परन्तु जो भवन मेरे नाम का कहलाता है, उसे अशुद्ध करने के लिये उन्होंने उसमें अपनी घृणित वस्तुएँ स्थापित कीं।

34. Et posueruut abominationes suas in domo super quam invocatum est nomen meum, ad poiluendum ipsam.

यहाँ मानो चरम दुष्टता थी, क्योंकि यहूदियों ने स्वयं मन्दिर को अपवित्र कर दिया था। यह एक भारी अपराध था जब, जैसा हम देख चुके हैं, हर एक के घर में निजी उपासनाएँ होती थीं, जहाँ वे छतों पर धूप जलाते थे, और पराए देवताओं के लिये अर्घ चढ़ाते थे; परन्तु जब अधर्मता इतनी आगे बढ़ गई कि स्वयं मन्दिर भी मूरतों से अशुद्ध कर दिया गया, तब पश्चाताप की क्या आशा रह गई?

वह कहता है कि उन्होंने मन्दिर में अपनी घृणित वस्तुएँ स्थापित की थीं। इब्रानियों की रीति के अनुसार इसे भवन तो कहा गया है, परन्तु बाद में जब वह कहता है, जिस पर मेरा नाम पुकारा जाता है, तब वह इसे निजी भवनों से अलग कर देता है; और फिर यह, कि वे उसे अशुद्ध करें। परमेश्वर यहाँ दिखाता है कि मन्दिर उसी को समर्पित किया गया था; इसलिये जब उन्होंने मूरतों को अपने बलिदान चढ़ाए, तब यह पवित्र वस्तु का घोर अपवित्रीकरण था। वे तो पहले ही धर्मत्यागी हो चुके थे; परन्तु ऐसा अपवित्र कार्य उनके निजी अन्धविश्वासों में उतना प्रकट न था जितना मन्दिर में; क्योंकि यह तो परमेश्वर से उसका अपना आदर छीन लेना था। यद्यपि उनके लिये यह उचित न था कि मन्दिर से बाहर निकलकर वे अपने आप को हर प्रकार की दुष्टता के हवाले कर दें; तौभी स्वयं मन्दिर को मानो हर अशुद्धता से सुरक्षित और मुक्त बना रहना चाहिए था। इसलिये इसी कारण वह कहता है कि वह उसके नाम से कहलाता था, और फिर यह कि स्वयं मन्दिर अशुद्ध कर दिया गया था, यहाँ तक कि उन्होंने उसके पवित्र नाम को भी न छोड़ा। शेष बातें मैं कल तक के लिये टालता हूँ।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जैसे तू प्रतिदिन हमारी ओर अपना हाथ बढ़ाता है, और निरन्तर उपदेशों के द्वारा हमें पश्चाताप के लिये बुलाता भी है, — हाँ, यह वरदान दे कि हम ऐसे कृतघ्न न हों कि अपने हठ से ऐसे और इतने बड़े उपकार को ठुकरा दें; वरन् यदि किसी समय हम सही मार्ग से फिर जाएँ, तो तुरन्त तेरी ओर लौट आएँ और तेरी इच्छा के आज्ञाकारी बन जाएँ, और इस प्रकार जो औषधि तू ने हमारे लिये ठहराई है वह हमारे उद्धार के लिये लाभदायक हो, जब तक कि हम अन्त में सब बुराइयों से शुद्ध होकर उस धन्य और अमर महिमा का आनन्द न उठाएँ जो तू ने अपने एकलौते पुत्र, हमारे प्रभु के द्वारा, स्वर्ग में हमारे लिये तैयार कर रखी है। — आमीन।

299 यह सच है कि इस शब्द का अर्थ शिक्षा के साथ-साथ ताड़ना भी है; परन्तु क्योंकि पहले "सिखाने" का ही उल्लेख हुआ है, इसलिये हमारा अनुवाद, जो पिछला शब्द (शिक्षा) देता है, यहाँ सच्चा अर्थ प्रस्तुत करता जान पड़ता है। ब्लेनी ने भी इसका अनुवाद ऐसा ही किया है। — सं.

300 वल्गेट और टार्गम इन शब्दों का अनुवाद बहुत ही अशुद्ध रूप से करते हैं, "जिसमें मेरा नाम पुकारा जाता है।" सेप्टुआजिंट और सीरियाई अनुवाद हमारे अनुवाद के समान हैं। निःसन्देह वह प्रार्थना का भवन था; परन्तु यहाँ अभिप्राय यह है कि वह परमेश्वर का भवन कहलाता था। — सं.

एक सौ तीसवाँ व्याख्यान

यिर्मयाह 32:35

35. और उन्होंने हिन्नोम के पुत्र की तराई में बाल के ऊँचे स्थान बनाए, ताकि अपने बेटे-बेटियों को मोलेक के लिये आग में से होकर पार कराएँ; जिसकी आज्ञा मैं ने उन्हें नहीं दी, और न यह मेरे मन में आया कि वे ऐसा घृणित काम करें, जिससे यहूदा पाप में पड़े।

35. Et adificarunt excelsa ipsi Baal, qui erat in valle filii Hinnom (vel, quae erant) ad trajiciendum filios suos et filias suas ipsi Moloch {}למלךidolo) quod non mandavi ipsis, et non ascendit in cor meum, ad faciendum abominationem hanc, ut peccaret Jehudah (vel, ut peccare facerent Jehudah)

अपने ही मन्दिर के अपवित्र किए जाने की शिकायत करने के बाद, परमेश्वर अब कहता है कि यहूदियों ने एक और अन्धविश्वास के द्वारा पाप किया था, अर्थात् इसलिये कि हिन्नोम के पुत्र की तराई सच्चे मन्दिर के स्थान पर उनके लिये मन्दिर बन गई थी। परमेश्वर ने व्यवस्था में मना किया था कि उसके ठहराए हुए स्थान को छोड़ कहीं और बलिदान चढ़ाए जाएँ, "तू अपने परमेश्वर के लिये ऐसा न करना, वरन् उस स्थान पर आना जहाँ उसने अपने नाम का स्मरण रखा है।" (व्यवस्थाविवरण 12:4, 5)

अतः जब परमेश्वर ने स्पष्ट रूप से गवाही दी थी कि एक ही मन्दिर और एक ही वेदी के सिवा बलिदान उसे ग्रहणयोग्य नहीं हैं, तो वह यहाँ दिखाता है कि यहूदियों ने वैध आराधना को भ्रष्ट कर दिया था, अर्थात् इसलिये कि उन्होंने मोलेक के आदर में अपने बेटे-बेटियों को आग में से होकर पार कराया। और फिर भी एक पिछले स्थल में वह उसे बाल कहता है। इससे प्रकट होता है, जैसा हमने कल कहा था, कि बाल शब्द में सब प्रकार की मूरतें सम्मिलित हैं। क्योंकि यहूदी, निःसन्देह, जब अपने बाल देवताओं की उपासना करते थे, तब सदा यह चाहते थे कि सर्वोच्च प्रभुता एकमात्र सच्चे परमेश्वर को ही दें, परन्तु साथ ही उन्होंने अपने लिये संरक्षक गढ़ लिए, और इसी से उनके देवताओं की भीड़ हुई। परन्तु मोलेक एक विशेष देवता था, जैसा हम पवित्रशास्त्र के अन्य भागों से सीखते हैं।

तो अब हम भविष्यद्वक्ता का अर्थ समझते हैं, — कि यहूदी एक ही प्रकार की मूर्तिपूजा से सन्तुष्ट नहीं हुए थे, वरन् उन्होंने अपने लिये ऊँचे स्थान या वेदियाँ बनाईं; क्योंकि कुछ लोग {,}במותbemut की ऐसी ही व्याख्या करते हैं: {}במהbeme का अर्थ ऊँचा स्थान है, और इसे सर्वत्र उन कुंजों के लिये लिया जाता है, जैसे वे कहलाते थे, अर्थात् ऊँचे वृक्षों के लिये। परन्तु क्योंकि यहाँ एक तराई का उल्लेख है, कुछ लोग सोचते हैं कि "ऊँचे स्थान" शब्द यहाँ उपयुक्त नहीं; इसलिये वे इस शब्द का अनुवाद "वेदियाँ" करते हैं। जहाँ तक मुख्य बात का सम्बन्ध है, परमेश्वर निःसन्देह यहाँ यहूदियों को इसलिये दोषी ठहराता है कि उन्होंने हिन्नोम की तराई में आराधना की एक पराई रीति स्थापित करने का दुस्साहस किया था, जबकि व्यवस्था ने उसे स्पष्ट रूप से मना किया था। सम्बन्धवाचक सर्वनाम, जैसा मैंने कहा है, वेदियों पर भी उतना ही लागू हो सकता है जितना बाल पर। परन्तु मुझे यह अर्थ अधिक उपयुक्त जान पड़ता है, यदि हम कहें कि स्वयं बाल, अर्थात् वह मूरत, हिन्नोम की तराई में थी। आग में से होकर पार कराने के विषय में मैं अन्यत्र बोल चुका हूँ — यह एक प्रकार का शुद्धिकरण-संस्कार था। तौभी इसमें कोई सन्देह नहीं कि कुछ लोग, जो अपने उत्साह की उग्रता में दूसरों से बढ़ जाना चाहते थे, उस संयम से आगे निकल गए जो सामान्यतः बरता जाता था; क्योंकि उन्होंने सचमुच अपने बेटे-बेटियों को जला दिया, जो अत्यन्त क्रूर कर्म था। फिर भी वे सोचते थे कि यह परमेश्वर को ग्रहणयोग्य सेवा है। अन्य लोग अपना अन्धविश्वास अधिक नरम रीति से पूरा करते थे, क्योंकि वे इतना ही पर्याप्त समझते थे कि उनके बच्चे शुद्धिकरण के प्रतीक के रूप में आग में से होकर पार हों, जैसे अन्यजाति भी अपने आप को शुद्ध किया करते थे।

301 यिर्मयाह 7:31 में हमें "तोपेत के ऊँचे स्थान," या ऊँचाइयाँ, मिलती हैं। ब्लेनी सोचता है कि वे कृत्रिम टीले थे जो उनके कुछ अन्धविश्वासी संस्कार करने के उद्देश्य से खड़े किए गए थे। निःसन्देह कुछ ऊँचे स्थानों पर वृक्ष लगाए गए थे; परन्तु बिना वृक्षों के भी टीले हो सकते थे। ये ऊँचे स्थान एक तराई में थे, यह बात इस विचार का समर्थन करती है कि वे बिना वृक्षों के कृत्रिम टीले थे। और वास्तव में इस पद से और यिर्मयाह 7:31 से प्रकट होता है कि मोलेक की मूरत कृत्रिम टीलों पर रखी जाती थी, क्योंकि कहा गया है कि उन्होंने इसी उद्देश्य से ये ऊँचे स्थान बनाए या खड़े किए, — कि वे अपने बच्चों को मोलेक के लिये जलाएँ। और सम्भवतः इस तराई में कई टीले थे, ताकि बड़ी संख्या में लोगों को स्थान मिल सके। — सं.

परन्तु भविष्यद्वक्ता बेटों और बेटियों का उल्लेख यह दिखाने के लिये करता है कि यहूदियों का असंयमित उत्साह इतना बड़ा था कि उन्होंने न केवल अपनी मूरतों के सामने अपने आप को व्यभिचारी बना दिया, वरन् अपनी सन्तान को भी इन अशुद्धताओं से दूषित किया।

अन्त में वह कहता है कि उसने ऐसी कोई आज्ञा नहीं दी थी, और यह कभी उसके मन में नहीं आया था। हम अन्यत्र कह चुके हैं कि जब कभी बोलने की यह रीति आती है, तब परमेश्वर आपत्ति करनेवालों से हर बहाना छीन लेता है, क्योंकि अन्धविश्वासी लोग जब लेखा देने के लिये बुलाए जाते हैं, तब उनके पास दिखावे के लिये सदा कुछ न कुछ कहने को रहता है। हम जानते हैं कि पोप के अनुयायी भली मनसा का बहाना करके परमेश्वर के विरुद्ध निडर होकर घमण्ड करते हैं; और वे सोचते हैं कि यह एक ही बहाना सब डाँटों के विरुद्ध उनकी रक्षा करने के लिये पर्याप्त है; और वे यह भी सोचते हैं कि जब परमेश्वर के दास और भविष्यद्वक्ता ऐसे बहाने से सन्तुष्ट नहीं होते, तब वे अत्यन्त रूखे और नुक्ताचीं हैं। परन्तु परमेश्वर, ताकि उसे अन्धविश्वासियों से लम्बा विवाद न करना पड़े, यह सिद्धान्त मान लेता है, — कि वे व्यवस्था से बाहर जो कुछ भी करने का प्रयत्न करते हैं वह खोटा है, और इसलिये मनुष्यों के आविष्कारों का किसी आवरण या बहाने से बचाव नहीं किया जा सकता। इसलिये हम यह जान लें कि सच्चा धर्म सदा परमेश्वर की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता पर आधारित होता है; और इसलिये मनुष्यों द्वारा गढ़ी गई हर वस्तु, जब परमेश्वर की कोई आज्ञा नहीं होती, न केवल व्यर्थ, वरन् घृणित भी है, उसके अनुसार जो कल हाथों के काम के विषय में कहा गया था; और इस प्रकार यहाँ परमेश्वर की आज्ञा मनुष्यों के सब आविष्कारों के विरोध में रखी गई है। परन्तु क्योंकि ऐसी घोषणाएँ बार-बार आती हैं, इसलिये अब मैं इस खण्ड को केवल हल्के से छूता हूँ।

परन्तु इस शिक्षा पर विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए, अर्थात् जब हम उन मनगढ़ंत उपासना-रीतियों का खण्डन करने बैठते हैं जिन्हें मनुष्य अपनी ही धारणाओं के अनुसार अपने लिए गढ़ लेते हैं, तब लम्बे खण्डन की कोई आवश्यकता नहीं; क्योंकि वे चाहे जो कुछ कहें, परमेश्वर एक ही शब्द में यह उत्तर देता है कि जो कुछ उसने अपनी व्यवस्था में आज्ञा नहीं दी, वह व्यर्थ और हानिकारक है। तब वह कहता है कि उसने इसकी आज्ञा नहीं दी थी, और न यह कभी उसके मन में आया था।

अन्तिम वाक्यांश में परमेश्वर उस बात को अपने ऊपर लागू करता है जो केवल मनुष्यों पर लागू होती है; क्योंकि परमेश्वर के विषय में ठीक-ठीक अर्थ में यह नहीं कहा जा सकता कि अमुक बात उसके मन में नहीं आई थी।

परन्तु यहाँ वह मनुष्यों के ढिठाई भरे साहस को डाँटता है, जो इस या उस बात को चलाने का दुस्साहस करते हैं, और जिस उपासना को उन्होंने स्वयं ढिठाई से गढ़ लिया है उसे परमेश्वर को ग्रहणयोग्य उपासना समझते हैं; क्योंकि इस प्रकार वे अपनी बुद्धि को स्वयं परमेश्वर की बुद्धि से ऊँचा उठाना चाहते हैं। और आज भी हम देखते हैं कि जब हम पोप के अनुयायियों को यह दिखाते हैं कि जिन रीतियों के ढेर में वे धर्म को स्थित मानते हैं, उनमें से कुछ भी परमेश्वर के मुख से नहीं निकला, तब वे सदा यही तर्क देते हैं कि जो कुछ पितरों ने आज्ञा दी है उसका पालन वे अकारण नहीं करते, मानो कुछ बातें मनुष्यों के मन में ऐसी आ गई हों जो स्वयं परमेश्वर से छूट गई थीं! तब हम देखते हैं कि परमेश्वर इस स्थान पर उन लोगों के पागलपन का उपहास करता है, जो अपनी ही आविष्कारशील बुद्धि पर भरोसा करके अपने लिए नाना प्रकार की उपासनाएँ गढ़ लेते हैं; क्योंकि, जैसा हमने कहा है, वे स्वयं परमेश्वर से अधिक बुद्धिमान बनना चाहते हैं। अतः अब हम इस कथन का बल समझते हैं, जब परमेश्वर कहता है कि यह कभी उसके मन में नहीं आया; क्योंकि मनुष्य डींग मारते हैं कि यह अकारण नहीं गढ़ा गया, और अपनी ही चतुराई पर घमण्ड करते हैं, मानो वे स्वयं परमेश्वर से कोई उत्तम बात ठहरा सकते हों।

302 तोपेत की रीति के विषय में इस अनुमान का कोई आधार नहीं; क्योंकि पवित्रशास्त्र के अन्य भागों में उनके कामों का स्पष्ट उल्लेख है। इसी पुस्तक में कहा गया है कि वे अपने बच्चों को आग में जलाते थे, यिर्मयाह 7:31, और कि वे उन्हें बाल के लिए होमबलि करके जलाते थे, यिर्मयाह 19:5। व्यवस्थाविवरण 12:31; यहेजकेल 23:37 भी देखें। — सं.

फिर वह कहता है, कि वे यह घृणित काम करें। परमेश्वर अब और आगे बढ़ता है, और जो कुछ उसने आज्ञा नहीं दी थी उस सब को घृणित काम कहता है। और यह वाक्यांश उस बात की पुष्टि करता है जो मैंने पहले कही है, कि जब प्रश्न मनुष्यों के आविष्कारों के विषय में हो तब लम्बे तर्कों की आवश्यकता नहीं, क्योंकि परमेश्वर की उपासना में उसके सिवाय कुछ भी स्वीकार्य नहीं हो सकता जिसकी आज्ञा उसने स्वयं दी है। इसलिए जो कुछ मनुष्यों की धारणाओं से निकला है, वह न केवल तुच्छ और निकम्मा है, वरन् घृणित भी है; क्योंकि परमेश्वर इस स्थान पर उसे ऐसा ही ठहराता है। अतः आज उन मनगढ़ंत उपासना-रीतियों को, जिन पर पोप के अनुयायी इतना घमण्ड करते हैं, अस्वीकार करना और तुच्छ जानना ही पर्याप्त नहीं; वरन् यदि हम यह प्रमाणित करना चाहते हैं कि हममें धर्म के लिए सच्चा उत्साह है, तो हमें इन सब मनगढ़ंत बातों से घृणा करनी चाहिए; क्योंकि परमेश्वर ने एक ही बार सदा के लिए उन्हें घृणित घोषित कर दिया है।

वह आगे कहता है, कि यहूदा पाप करे, या, कि वे यहूदा से पाप कराएँ: दोनों अर्थ ग्राह्य हैं, और पाठ भी दो प्रकार का है। जो भी हो, वह घोषित करता है कि जो लोग व्यवस्था पर नहीं बनाते, वे पाप के सिवाय और कुछ नहीं करते, चाहे वे यह समझें कि वे परमेश्वर की सर्वोत्तम सेवा कर रहे हैं; क्योंकि उन्हें इसी सिद्धान्त से आरम्भ करना चाहिए था, — कि जो कुछ व्यवस्था ठहराती है उसके सिवाय कुछ भी न करें। आगे लिखा है, यिर्मयाह 32:36-37

36. परन्तु अब इस्राएल का परमेश्वर यहोवा इस नगर के विषय में, जिसके विषय में तुम कहते हो कि वह तलवार, महँगी और मरी के द्वारा बाबुल के राजा के वश में पड़ा हुआ है, यों कहता है:

36. Et nunc propterea sic dicit Jehova, Deus Israel, ad urbem hanc (vel, de urbe hac) de qua vos dicitis, Tradita est in manum regis Babylonii in gladio et fame et peste;

37. देखो, मैं उनको उन सब देशों से जिन में मैं ने क्रोध और जलजलाहट में आकर और बड़े क्रोधित होकर उन्हें बरबस निकाल दिया है, लौटा ले आकर इसी नगर में इकट्ठे करूँगा, और निडर करके बसा दूँगा।

37. Ecce ego congrego cos ex omnibus terris, ad quas expulero eos in ira mea, et excandescentia mea, et indignatione magna; et reducam eos ad locum hunc, et habitare faciam secure.

परमेश्वर अब तक यह दिखाता आया है कि यहूदी उस घोर दण्ड के योग्य थे जो वह इस्राएल के राज्य पर पहले ही ला चुका था, और कि वे अत्यधिक कठोरता की शिकायत नहीं कर सकते थे, चाहे नगर और मन्दिर के विनाश के बाद वे बँधुआई में सड़ते रहें; क्योंकि उन्होंने उस देश को अशुद्ध कर दिया था जो परमेश्वर के लिए पवित्र होना चाहिए था, और अपने घृणित कामों को सब ओर फैला दिया था, यहाँ तक कि मन्दिर भी उनकी गन्दगी और अशुद्धताओं से अछूता न रहा; और उन्होंने थोड़े ही समय तक इस प्रकार अपराध नहीं किया था, वरन्, जैसा हम देख चुके हैं, उन्होंने सब चेतावनियों को तुच्छ जाना था; और यद्यपि परमेश्वर उनकी कुशलता के लिए चिन्तित रहा था, तौभी उन्होंने घमण्ड से उसके अनुग्रह को ठुकरा दिया, वरन् बुझा भी दिया था। अतः जब उनका स्वभाव इतना दुष्ट था, और इतनी कठोरता के कारण उनकी अभक्ति पूर्णतः असाध्य हो गई थी, तब परमेश्वर दिखाता है कि वह उन्हें पूरी रीति से त्याग कर उनके कामों का उचित प्रतिफल देगा। परन्तु अब वह अनुग्रह की प्रतिज्ञा जोड़ता है, ताकि यह दिखाए कि वह दुष्टता का पलटा इस प्रकार लेगा कि उस सेंतमेंत की वाचा का, जो उसने अब्राहम से बाँधी थी, सदा ध्यान रखेगा। 303 केरी, {{`` החטיאपाप कराना,'' निस्सन्देह सही पाठ है; यहूदा से पहले आया {}את भी इसका प्रमाण है, और अनुवादों तथा तर्गूम ने भी यही अर्थ दिया है। — सं.

हम पहले भी प्रायः कह चुके हैं कि जब कभी परमेश्वर दण्ड की कड़वाहट को दया की किसी आशा से कम करता है, तब वह विशेष रूप से अपनी चुनी हुई प्रजा का ध्यान रखता है।

अतः जब परमेश्वर घोषित करता है कि वह अन्त में दयालु और अनुग्रहकारी होगा, तब यह वचन बिना भेद के सब से नहीं कहा जाता; क्योंकि, जैसा मैंने कहा है, वह केवल अपनी चुनी हुई प्रजा को आशा रखने के लिए उत्साहित करता है। अतः जब प्रजा के बीच कुछ भक्त वंश बचा हुआ था, तब परमेश्वर ने उन्हें सहारा देना चाहा, ताकि वे पूरी तरह निराश न हो जाएँ।

अब हम भविष्यद्वक्ता का उद्देश्य देखते हैं; और इस सत्य पर सावधानी से ध्यान देना चाहिए; क्योंकि यदि हम यह न जानें कि भविष्यद्वक्ता दुष्टों और परमेश्वर का तिरस्कार करनेवालों को धमकाने के बाद अपना वचन चुने हुओं की ओर मोड़ते हैं, ताकि उन्हें उन पर डाले गए दण्ड को धीरज और शान्त मन से सहने के लिए उत्साहित करें, तो हम भविष्यद्वक्ताओं द्वारा सिखाई गई शिक्षा के विषय में भूल करेंगे; जैसा यिर्मयाह ने स्वयं अपने विषय में किया, जब उसने विश्वासियों को समझाया कि वे अपना मुँह धूल में रखें, और फिर धीरज से परमेश्वर की बाट जोहें, चाहे वह कुछ समय के लिए याकूब से, अर्थात् अपनी कलीसिया से, अपना मुँह छिपाए रहे। अतः यिर्मयाह यह दिखाने के बाद कि यहूदियों के साथ कितना भी कठोर व्यवहार किया जाए वह अधिक नहीं, क्योंकि वे पूर्णतः हठीले रहे थे, अब आगे कहता है,—

और अब इसलिए इस्राएल का परमेश्वर यहोवा इस नगर के विषय में, या, इस नगर से, यों कहता है। पूर्वसर्ग {}אלal दोनों अर्थ रखता है, परन्तु यहाँ इसे “के विषय में” के अर्थ में लेना अधिक उपयुक्त है: जिसके विषय में, आगे कहा गया है, तुम कहते हो कि वह बाबुल के राजा के हाथ में सौंप दिया गया है। यह तथ्यों से मेल खाता हुआ नहीं दिखता, क्योंकि यहूदियों ने स्वयं यरूशलेम के विषय में यह दण्डाज्ञा नहीं सुनाई थी, वरन् इसके विपरीत वे हठपूर्वक भविष्यद्वक्ताओं के विरुद्ध उठ खड़े होते थे, और जब कभी नगर के विनाश की घोषणा की जाती थी तब कोलाहल मचाते थे। तब इसका क्या अर्थ है कि परमेश्वर उन्हें इस प्रकार बोलने का दोष देता है? इसका मेरा उत्तर यह है कि यह बात वास्तव में परमेश्वर के आत्मा से निकली थी, और भविष्यद्वक्ता भी इस दण्ड के साक्षी और घोषणा करनेवाले रहे थे; परन्तु जब यहूदियों ने देखा कि वे बच नहीं सकते, तब परमेश्वर के न्याय का उन पर ऐसा भयानक भय छा गया कि वे डर के मारे पूरी तरह स्तब्ध हो गए; और परमेश्वर का तिरस्कार करनेवालों के साथ सदा ऐसा ही होता है, क्योंकि जब तक वह उन पर कड़ा दबाव न डाले, वे उसकी सब धमकियों का उपहास करते हैं; या जब परमेश्वर घोषित करता है कि वह उन पर अपना पलटा लेगा, तब वे समझते हैं कि उन्हें कहानियाँ सुनाई जा रही हैं। परन्तु जब वे संकट की चरम सीमा पर पहुँचते हैं, तब वे विस्मय से भर जाते हैं, और बिना किसी आशा के केवल यह मान लेते हैं कि परमेश्वर उन पर क्रोधित है; इसी से उनकी निराशा उत्पन्न होती है। 304 मूल में है, “तुम कह रहे हो,” जो उस समय की एक आदत को सूचित करता है; घेराबन्दी के समय वे निरन्तर यही कहते रहते थे। — सं.

अतः भविष्यद्वक्ता अकारण उन्हें यह दोष नहीं देता, — कि वे कहते थे कि नगर कसदी राजा के हाथ में सौंप दिया गया है, उस समय भी जब वह न केवल एक शक्तिशाली सेना के साथ उस पर आक्रमण कर रहा था, वरन् तलवार, महँगी और मरी भी उसके सहायक बनकर उसकी सहायता कर रहे थे। क्योंकि घेराबन्दी के उन पर कड़ा दबाव डालने से पहले, जैसा हम देख चुके हैं, जो कुछ यिर्मयाह ने उनसे कहा उस सब को वे कुछ भी नहीं समझते थे; क्योंकि लगभग चालीस वर्ष तक उसका सारा परिश्रम व्यर्थ गया, यद्यपि नगर के विनाश, बँधुआई, प्रजा के त्यागे जाने और सब पवित्र वस्तुओं के मिट जाने की भविष्यद्वाणी प्रतिदिन सुनाई जाती थी। परन्तु अब जब उन्होंने देखा कि मामला गम्भीर है, और कि वे परमेश्वर के पलटे से बच नहीं सकते, तब वे दूसरी सीमा पर जा पहुँचे, और कहने लगे कि परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं में झूठा है, कि उसकी वाचा व्यर्थ और निकम्मी है, कि उन्होंने उसकी उपासना व्यर्थ की, कि जब उसने प्रतिज्ञा की थी कि वह उनके बीच निवास करेगा, तब उसने उन्हें धोखा दिया और झूठी आशाएँ दीं। अतः इसी अर्थ में वे कहते थे कि नगर बाबुल के राजा के हाथ में सौंप दिया गया है; यह ऐसा ही था मानो वे कहते कि लौटने की आशा कट गई है। क्योंकि उन्होंने परमेश्वर द्वारा प्रस्तुत अनुग्रह को पूरी तरह फेंक दिया, और कहा कि जो कुछ यिर्मयाह ने प्रतिज्ञा की थी वह सब व्यर्थ है; क्योंकि भय ने उनके मनों और भावनाओं को ऐसा जकड़ लिया था कि वे परमेश्वर की दया की कोई आशा नहीं रख सकते थे।

मैंने कहा है कि सब त्यागे हुए लोगों की यही दशा होती है, कि जब तक परमेश्वर उन्हें छोड़ता और सहता रहता है, वे उसका उपहास करते हैं; परन्तु जब वे पाते हैं कि वह न्यायी है, तब वे उसकी दया की ओर नहीं ताकते, वरन् निराशा में ऐसे पड़े रहते हैं मानो निर्जीव हों।

अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय क्या था, जब उसने यहूदियों के विषय में कहा कि वे कहते हैं कि नगर कसदियों और बाबुलियों के हाथ सौंप दिया गया है; अर्थात् इसलिए कि प्रतिज्ञा किया हुआ छुटकारा उन्हें कोई शान्ति नहीं दे सकता था, क्योंकि वे पूरी तरह मान बैठे थे कि उनका उद्धार आशाहीन है। वह कहता है, तुम तो कहते हो कि नगर सौंप दिया गया है; परन्तु मैं, वह आगे कहता है, उन्हें उन सब देशों से इकट्ठा करूँगा जिनमें मैं उन्हें अपने क्रोध और जलजलाहट और बड़े कोप में खदेड़ दूँगा

यहाँ परमेश्वर प्रतिज्ञा करता है कि बँधुआई केवल अस्थायी होगी, क्योंकि वह अन्त में, जैसा भजन संहिता 147:2 में कहा गया है, इस्राएल के निकाले हुओं को इकट्ठा करेगा। यहाँ कोई नाम व्यक्त नहीं किया गया, केवल एक सर्वनाम है; तौभी कोई सन्देह नहीं, क्योंकि यह पर्याप्त रूप से स्पष्ट है कि जब वह कहता है, मैं उन्हें इकट्ठा करूँगा, तब वह यहूदियों के विषय में बोल रहा है। क्योंकि वे इधर-उधर तितर-बितर कर दिए गए थे, इसलिए उनका इकट्ठा किया जाना अविश्वसनीय प्रतीत हो सकता था; क्योंकि यदि वे केवल अपने देश से निकाले जाते, और उन्हें बँधुआई का ऐसा स्थान दिया जाता जहाँ वे एक साथ रह सकते, तो वे किसी समय लौटने की आशा कर सकते थे: परन्तु तितर-बितर किए जाने ने सारी आशा छीन ली, क्योंकि वे अलग-अलग देशों में, और एक दूसरे से बहुत दूर-दूर खदेड़ दिए गए थे। अतः इस कठिनाई को दूर करने के लिए परमेश्वर स्पष्ट रूप से कहता है कि वह उन्हें उन सब देशों से जिनमें उसने उन्हें खदेड़ा था लौटा लाएगा। और निस्सन्देह भविष्यद्वक्ता व्यवस्थाविवरण 30:4 के एक अंश की ओर संकेत करता है, ... चाहे वे संसार की चारों दिशाओं तक तितर-बितर कर दिए जाएँ, तौभी मैं उन्हें वहाँ से इकट्ठा करूँगा।”

अतः जैसे परमेश्वर ने मूसा के द्वारा प्रतिज्ञा की थी कि यद्यपि वे संसार के सबसे दूर के भागों तक निकाल दिए जाएँ, तौभी उनका लौटा लाना उसके लिए कठिन न होगा; वैसे ही भविष्यद्वक्ता मूसा की इस घोषणा को अपनी भविष्यद्वाणी पर लागू करता है, अर्थात् कि परमेश्वर उन लोगों को जो तितर-बितर कर दिए गए थे, सारे पूर्व देश से इकट्ठा करेगा। 305 यह प्रतिज्ञा स्पष्ट रूप से वह बात प्रकट करती है जो कैल्विन उनके इस कथन के अर्थ के विषय में कहता है कि “नगर सौंप दिया गया है,” इत्यादि, अर्थात् ऐसा सौंपा गया कि फिर कभी वापस न मिले। परमेश्वर कहता है, नहीं, मैं उसे फिर स्थापित करूँगा। — सं.

वह आगे कहता है, अपने क्रोध, जलजलाहट और बड़े कोप में। परमेश्वर यहाँ अपने क्रोध की चर्चा केवल इसलिए करता है कि यहूदी समझ लें कि वे इतने बड़े दण्ड के योग्य थे: क्योंकि हम जानते हैं कि परमेश्वर जगत का न्यायी है, इसलिए कोई भी अन्यायपूर्ण बात उसमें नहीं हो सकती। अतः जब परमेश्वर का क्रोध बड़ा कहा जाता है, तब हम निश्चय के साथ यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि मनुष्यों के दोष बड़े हैं; क्योंकि वह हम पर तभी क्रोधित होता है जब हमारे पापों की बहुतायत से वह अप्रसन्न होता है। इससे हम वह कारण समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता यहाँ परमेश्वर के क्रोध, जलजलाहट और बड़े कोप का उल्लेख क्यों करता है, अर्थात् इसलिए कि विश्वासी आश्वस्त हो जाएँ कि परमेश्वर उन पर अनुग्रहकारी होगा, यद्यपि वे अनन्त विनाश के योग्य थे। सारांश यह कि यिर्मयाह दिखाता है कि परमेश्वर की दया के लिए स्थान होगा, यद्यपि यहूदी अपने हठ के कारण सौ बार विनाश के योग्य ठहर चुके थे।

और वह आगे कहता है कि उसका अनुग्रह बना रहेगा, और मैं उन्हें निडर करके बसाऊँगा। उन्हें लौटा लाने की प्रतिज्ञा करने के बाद, अब वह शान्त दशा की प्रतिज्ञा करता है: क्योंकि यहूदियों के लिए अपने देश लौटकर वहाँ दुःख में जीने की अपेक्षा यह अच्छा होता कि वे सदा बँधुआई में और परदेशों में ही बने रहें। यही कारण था कि भविष्यद्वक्ता ने स्पष्ट रूप से यह जोड़ा कि उनके लिए एक शान्त निवास होगा।

परन्तु हम जानते हैं कि यह तब पूरा नहीं हुआ जब यहूदी अपने देश लौटे; क्योंकि उनके पड़ोसियों ने उन्हें बहुत सताया, और आरम्भ में मन्दिर के निर्माण में बाधा डाली गई, और उन्होंने चारों ओर से बहुत से क्लेश सहे, और अन्त में सीरिया के राजाओं के अत्याचार से वे दबाए गए, और ऐसी चरम दशा में पहुँचा दिए गए कि उन पर पड़े अनेक दुःखों की तुलना में बँधुआई न केवल अधिक सहनीय, वरन् अधिक सुखद और अधिक वांछनीय होती। परन्तु, जैसा अन्यत्र कहा गया है, जब कभी भविष्यद्वक्ताओं ने प्रजा के लौटने की भविष्यद्वाणी की, तब उन्होंने अपनी शिक्षा को मसीह के सम्पूर्ण राज्य तक फैलाया। क्योंकि बँधुआई से छुटकारा परमेश्वर के अनुग्रह का आरम्भ मात्र था: जब परमेश्वर ने अपनी प्रजा को उनके देश में लौटा दिया, तब उसने सच्चे और वास्तविक छुटकारे का कार्य आरम्भ किया; परन्तु उसने उन्हें अपनी दया का केवल थोड़ा-सा स्वाद दिया। अतः यह भविष्यद्वाणी, उसके समान अन्य भविष्यद्वाणियों के साथ, मसीह के राज्य तक फैलाई जानी चाहिए। इसके बाद वह आगे कहता है, —

यिर्मयाह 32:38

38. और वे मेरी प्रजा ठहरेंगे, और मैं उनका परमेश्वर ठहरूँगा।

38. Et erunt mihi in populum, et ego ero ipsis in Deum.

कलीसिया की पुनःस्थापना में यह प्रतिज्ञा पहला स्थान रखती थी; क्योंकि यदि यहूदी धन और बहुतायत और नाना प्रकार की आशीषों से तृप्त होकर भर भी जाते, तौभी यदि वे परमेश्वर की प्रजा न होते तो उनकी दशा किसी भी प्रकार श्रेष्ठ न होती; क्योंकि यदि मनुष्य केवल इस पार्थिव और नश्वर जीवन की अच्छी वस्तुओं पर, या उसके सुखों और आनन्दों पर जीते हैं, तो उनका कोई कल्याण नहीं। भजन संहिता में यह बात पूर्णतः सत्य कही गई है, “क्या ही धन्य है वह प्रजा जिसका परमेश्वर यहोवा है।” *

306 शब्दों में एक क्रमिक चढ़ाव है, — क्रोध, जलता हुआ क्रोध, उफनता हुआ क्रोध। जैसा कैल्विन संकेत करता है, चरम अप्रसन्नता चरम दुष्टता को सूचित करती है, और चरम दण्ड देती है। — सं.

*(भजन संहिता 144:15)

क्योंकि यद्यपि परमेश्वर अपनी आशीषों की आज्ञा देता है, और उन्हें भक्तों के प्रति अपने पितृ-अनुग्रह के साक्षी ठहराता है, तौभी वह नहीं चाहता कि वे मानो इन्हीं पर जीएँ; वरन् वह इन्हीं को मानो सीढ़ियाँ बनाकर उनके मनों को सच्चे आनन्द के मूल स्रोत, अर्थात् स्वयं उस सोते तक उठाता है, ताकि वे जान लें कि वे उसकी सुरक्षा के अधीन हैं, और कि वह सदा उनका पिता बना रहेगा।

इससे हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने, जब प्रजा की पुनःस्थापना की चर्चा की, तब उनके सामने सबसे मुख्य और सबसे वांछनीय बात रखी, अर्थात् यह जानना कि परमेश्वर का उनसे मेल हो गया है, और कि इस प्रकार वे उसकी प्रजा बन गए हैं।

इससे हम सीखते हैं कि यद्यपि परमेश्वर ने अपनी कृपा से अपनी प्राचीन प्रजा की दुर्बलताओं को सहा, और इसी कारण देश की उपज और अन्य बातों का उल्लेख किया, तौभी सब प्रतिज्ञाओं का अन्तिम लक्ष्य आत्मिक था; और यदि यह प्रतिज्ञा केवल परमेश्वर की सांसारिक आशीषों के विषय में समझाई जाती, तो यह सत्य न ठहरती। क्योंकि हमें भविष्यद्वक्ता का वह कथन स्मरण रखना चाहिए,

और निस्सन्देह भविष्यद्वक्ता ने उस भजन में, जिसे हमने अभी उद्धृत किया है, परमेश्वर की कलीसिया को सब अन्यजातियों से अलग करना चाहा, और कलीसिया के आनन्द को भी उन सब सुखों, सम्मानों और उन लाभों से अलग करना चाहा, जिनके विषय में मनुष्य अपने आप को समझा लेते हैं कि यदि वे उन्हें प्राप्त कर लें तो सुखी हो सकते हैं। अतः जब भविष्यद्वक्ता वहाँ कलीसिया के आनन्द और उन सब क्षणभंगुर और खोखली वस्तुओं के बीच का अन्तर दिखाता है, जिनकी लालसा वे लोग करते हैं जो इस संसार और वर्तमान जीवन से ऊपर नहीं ताकते, तो इससे यह निकलता है कि जब कभी ये शब्द कहे जाते हैं, “मैं तुम्हारा परमेश्वर ठहरूँगा,” तब अनन्त और स्वर्गीय जीवन की आशा हमारे सामने रखी जाती है।

एक और बात पर ध्यान देना चाहिए, — कि इस संसार की वस्तुओं के विषय में हम जो कुछ खोजते हैं, वह हमें कोई सच्ची भलाई नहीं दे सकता, जब तक परमेश्वर का हमसे मेल न हो। अतः जब हमारे पास सब वस्तुएँ बहुतायत से हों, जब किसी भी प्रकार के सुख की कोई कमी न हो, जब हम पर बड़ा धन बरसाया गया हो, जब हमें शान्ति और सुरक्षा दी गई हो, तौभी यह सब, जैसा मैंने कहा है, हमारे लिए विनाशकारी सिद्ध होगा, जब तक परमेश्वर हमें अपनी सन्तान न माने और हमारा पिता न बने। इसलिए जब हम सुखी होना चाहते हैं, तो हमें अपना मन मुख्य बात की ओर लगाना चाहिए, अर्थात् परमेश्वर से मेल-मिलाप की ओर, ताकि हम भरोसे के साथ उसे अपना पिता कह सकें, उससे उद्धार की आशा रख सकें, और सदा उसकी दया की शरण ले सकें। अभक्त मनुष्य अपनी लालसा के अनुसार यह और वह चाहते हैं: लोभी बहुत-सा धन, चौड़े खेत और बड़ी आय चाहता है; महत्वाकांक्षी सारे संसार को अपने वश में करना चाहता है; विलासी हर उस वस्तु की इच्छा करता है जो उसकी अभिलाषाओं को तृप्त करे; और वह भी जो संयमी प्रतीत होता है, अपने स्वभाव के अनुकूल वस्तुओं की इच्छा करता है; और इस प्रकार परमेश्वर की, और उसके अनुग्रह की भी, उपेक्षा की जाती है। अतः हम जान लें कि मनुष्यों की इच्छाएँ पूर्णतः अनुचित हैं, जब वे इस संसार में उसके सिवाय, जो इस सोते से, अर्थात् परमेश्वर के सेंतमेंत अनुग्रह से, बहता है, किसी और वस्तु को उत्सुकता से खोजते हैं, और जब वे इस अनुपम सौभाग्य को, अर्थात् इस बात को कि परमेश्वर का उनसे मेल हो जाए, सब आशीषों से बढ़कर नहीं मानते।

अब हम इन शब्दों का अर्थ समझते हैं, जब परमेश्वर घोषित करता है कि यहूदी अपने देश लौटने के बाद उसकी प्रजा बनेंगे, और कि वह उनका परमेश्वर होगा।

साथ ही हम यह भी ध्यान दें कि यद्यपि परमेश्वर सारे संसार पर प्रभुता रखता है, तौभी ठीक अर्थ में वह अपनी चुनी हुई प्रजा के सिवाय और किसी का परमेश्वर नहीं कहलाता; क्योंकि जैसे वह कलीसिया को अपने लिए निज धन के रूप में इकट्ठा करता है, जैसा वह सर्वत्र कहता है, वैसे ही यह विशेषाधिकार परस्पर सम्बन्ध के बिना नहीं रह सकता, अर्थात् जब तक मनुष्य यह न जानें कि परमेश्वर उनका परमेश्वर है, और पूर्ण निश्चय न रखें कि वह उन्हें अपनी निज प्रजा गिनता है। अब इस पद की व्याख्या आती है, जो अपनी संक्षिप्तता के कारण कुछ अस्पष्ट प्रतीत हो सकता था।

यिर्मयाह 32:39

39. और मैं उनको एक ही मन और एक ही चाल कर दूँगा कि वे सदा मेरा भय मानते रहें, जिससे उनका और उनके बाद उनके वंश का भी भला हो।

39. Et dabo illis cor unum et viam unam, nt timeant me cunctis diebus, ut bene sit illis et filius eorum post ipsos.

वह पिछले पद को अधिक स्पष्टता से समझाता है; क्योंकि वह उल्लिखित अनुग्रह के प्रभावों का वर्णन करता है। परमेश्वर वास्तव में एक ही शब्द में सब कुछ समेट लेता है, जब वह घोषित करता है कि वह हमारा परमेश्वर होगा, क्योंकि इस प्रकार वह हमें अपनी सन्तान के रूप में अपना लेता है। इसी से हमारे स्वर्गीय उत्तराधिकार की निश्चयता आती है, और उसकी दया की भी, जो जीवन से भी उत्तम है।

अतः इस उपकार से बढ़कर कुछ भी वांछनीय नहीं, अर्थात् जब परमेश्वर अपने आप को हमें अर्पित करता है, और हमें अपनी प्रजा के रूप में ग्रहण करने और गले लगाने की कृपा करता है।

परन्तु जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, हम इस शिक्षा के लाभ को पूरी तरह नहीं समझते; क्योंकि पहले तो हम बहुत मन्द और सुस्त हैं, और नहीं समझते कि इस कथन से परमेश्वर का क्या अभिप्राय है; और फिर हम जानते हैं कि हमारा स्वभाव अविश्वास की ओर कितना झुका हुआ है, हमारे और परमेश्वर के बीच इतनी बड़ी दूरी है। इसलिए इस शिक्षा को व्याख्या की आवश्यकता है।

अतः भविष्यद्वक्ता सब आशीषों का कारण और आरम्भ बताने के बाद अब उनके प्रभावों का उल्लेख करता है, जो उसकी कही हुई बात की और भी पूरी पुष्टि करते हैं।

इसलिए वह कहता है, मैं उन्हें एक ही मन और एक ही चाल दूँगा, कि वे सदा मेरा भय मानें: क्योंकि परमेश्वर हमें और किसी रीति से अपनी प्रजा नहीं मानता, और न वह हमारा पिता हो सकता है, जब तक वह अपने आत्मा के द्वारा हमें नया जन्म न दे; क्योंकि भविष्यद्वक्ता यहाँ नये जन्म के विषय में ही बोल रहा है। परन्तु शेष बात मुझे कल तक के लिए टालनी होगी।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जब हमारा पार्थिव जीवन युद्ध का जीवन ठहराया गया है, और जब तक हम यहाँ परदेशी होकर रहते हैं तब तक हमें अनिवार्य रूप से निरन्तर अशान्ति सहनी पड़ती है, — तो यह वरदान दे कि हम सदा उस धन्य विश्राम की बाट जोहते रहें जिसमें तू हमें बुलाता है, और इस बीच तेरी सुरक्षा पर निर्भर रहकर शान्त बने रहें, और अन्त तक साहस से लड़ते रहें, इस बात में सन्देह न करते हुए कि तेरे अनुग्रह से सब बातें भलाई ही के लिए होंगी, जब तक कि हम अन्त में उस अनन्त और महिमामय उत्तराधिकार का आनन्द न लें, जो स्वर्ग में हमारे लिए रखा हुआ है, हमारे प्रभु मसीह के द्वारा। — आमीन।

एक सौ इकतीसवाँ व्याख्यान

कल हमने यिर्मयाह के उन शब्दों की व्याख्या आरम्भ की थी, जिनमें प्रजा से नये मन और नई चाल की प्रतिज्ञा की गई है। अब जब परमेश्वर इनकी प्रतिज्ञा करता है, तो यह निश्चित है कि ये उसके अधिकार में हैं, मनुष्य के अधिकार में नहीं। इससे हम सीखते हैं कि अपने मन को परमेश्वर की सेवा के योग्य बनाना मनुष्य के वश में नहीं; क्योंकि यदि परमेश्वर कहता कि वह हमें ऐसा मन देगा जो पहले से ही हमारा है, या जिसे कोई भी स्वयं अपने आप को दे सकता है, तो यह एक व्यर्थ, वरन् बेतुकी प्रतिज्ञा होती। अतः ये प्रतिज्ञाएँ परमेश्वर के अनुग्रह के निश्चित प्रमाण हैं, न केवल अन्त और परिणाम के विषय में, वरन् इसलिए भी कि हम जान लें कि जिन सब बातों की परमेश्वर हमसे प्रतिज्ञा करता है, उनकी महिमा वह अपने ही लिए ठहराता है। और इसी तर्क से अगस्तीन प्रायः पेलागियुसवादियों से लड़ता है, और ठीक ही लड़ता है, क्योंकि, जैसा मैंने कहा है, यदि परमेश्वर किसी ऐसी बात की प्रतिज्ञा करता जो उसके अनुग्रह पर नहीं, वरन् मनुष्य की इच्छा और सामर्थ्य पर निर्भर होती, तो यह निरा उपहास होता।

अब जब वह एक ही मन की चर्चा करता है, तो वह एकता और सहमति की ओर संकेत करता है, परन्तु ऐसी कि वे सब परमेश्वर की आज्ञा मानें। मनुष्य प्रायः बुराई के लिए एक साथ मिल जाते हैं, और परमेश्वर की सन्तान को प्रायः अभक्तों से अलग होने के लिए विवश होना पड़ता है; और इसी से वे फूटें उत्पन्न होती हैं जो आज संसार में फैली हुई हैं, जिनका दोष हम पर मढ़ा जाता है। परन्तु जब यह आवश्यक है कि यदि हम परमेश्वर के पीछे चलना चाहते हैं तो पोप के अनुयायियों से अलग हों, तो उनसे मिलकर रहने और इस प्रकार परमेश्वर के विरुद्ध एक अभक्त और दुष्ट मेल बनाने की अपेक्षा उनसे अलग होना सौ गुना अच्छा है। सहमति या एकता वास्तव में एक अनुपम भली वस्तु है, क्योंकि शान्ति से बढ़कर उत्तम या वांछनीय कुछ भी नहीं। परन्तु हमें सदा यह स्मरण रखना चाहिए कि मनुष्य सुखपूर्वक एक साथ मिल सकें, इसके लिए परमेश्वर के वचन का पालन ही आरम्भ होना चाहिए। अतः हमारे बीच वैध सहमति का बन्धन यह है, — कि हम आदि से अन्त तक परमेश्वर की आज्ञा मानें; क्योंकि हर वह मेल शापित है जिसमें परमेश्वर और उसके वचन का कोई ध्यान नहीं।

हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि जब परमेश्वर एक ही मन की प्रतिज्ञा करता है, तो वह साथ में एक ही चाल भी जोड़ता है; और इसे बाहरी कामों के विषय में समझना चाहिए। और ऐसा प्रतीत होता है कि पौलुस ने यह बात इसी स्थान से ली है, जब वह कहता है कि परमेश्वर अपनी सुइच्छा निमित्त हमें इच्छा और काम दोनों देता है। (फिलिप्पियों 2:13) वह पहले “इच्छा” का उल्लेख करता है, और भविष्यद्वक्ता मन का नाम लेता है, और हम जानते हैं कि मन सब भावनाओं का आसन है। अतः एक ही मन से भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय एक-सी भावनाएँ है; और फिर चाल से उसका अभिप्राय वही है जिसे पौलुस “काम करना” कहकर व्यक्त करता है; क्योंकि जब तक “इच्छा” के साथ “काम करना” न जुड़े, केवल “इच्छा” पर्याप्त नहीं; तौभी बाहरी काम अपने आप में किसी मूल्य का नहीं, जब तक उसके पहले इच्छा और सच्ची भावना न हो।

अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय क्या है: पहले, वह दिखाता है कि परमेश्वर किस प्रकार इस्राएल का परमेश्वर बनेगा, अर्थात् इसलिए कि वह उन्हें एक ही मन और एक ही चाल देगा। इससे हम सीखते हैं, जैसा मैंने कहा है, कि मन को बदलना, भ्रष्ट भावनाओं को उतारना या दूर फेंकना, मनुष्य के वश में नहीं, क्योंकि यह एक ऐसा उपकार है जो परमेश्वर से आता है। परन्तु हमारे लिए आज्ञाकारिता के योग्य बनाए जाना पर्याप्त न होता, यदि परमेश्वर एक और अनुग्रह न जोड़ता, अर्थात् स्वयं इच्छा को कर्म में परिणत करना। सहमति या एकता के विषय में हमने कहा है कि उचित और वैध सहमति का सिद्धान्त यह है कि परमेश्वर का ध्यान रखा जाए, उसके वचन पर निर्भर रहा जाए, और एक मन होकर जो वह आज्ञा देता है उसका पालन किया जाए।

इसी अर्थ के अनुसार वह आगे कहता है, कि वे मेरा भय मानें। इससे यह भी प्रकट होता है कि परमेश्वर का भय आत्मा द्वारा नये जन्म के सिवाय और किसी रीति से उत्पन्न नहीं होता। क्योंकि यदि मनुष्य स्वभाव से परमेश्वर का भय मानने की ओर झुके होते, तो यह परमेश्वर और उसके अनुग्रह को न सौंपा जाता; और परमेश्वर अपने लिए उसके सिवाय कुछ नहीं माँगता जो उसका अपना है। अतः यह निष्कर्ष निकलता है कि परमेश्वर के भय का आरम्भ आत्मा द्वारा नया जन्म है। परन्तु हमें इन शब्दों पर ध्यान देना चाहिए, जब वह कहता है कि वह उन्हें एक ही मन और एक ही चाल देगा, कि वे उसका भय मानें; क्योंकि वह यह नहीं कहता, “कि वे मेरा भय मानने में समर्थ हों,” या, “कि उन्हें स्वतन्त्र विकल्प हो, और फिर भी एक लचीली इच्छा;” वरन् वह, मानो, परमेश्वर के वास्तविक भय का उल्लेख करता है, जो मनुष्यों के मनों को नये सिरे से गढ़ने का परिणाम है। मैंने कहा है कि इस पर सावधानी से ध्यान देना चाहिए, क्योंकि पोप के अनुयायी हमारे साथ यह मानते हैं कि भलाई के विषय में हम पूर्णतः दुर्बल हैं, और हमारी सब शक्तियाँ ऐसी भ्रष्ट हैं कि पवित्र आत्मा के अनुग्रह के निरन्तर सहयोग के बिना न तो इच्छा अपने आप को हिला सकती है, और न कोई परिणाम निकल सकता है; परन्तु साथ ही वे यह कल्पना करते हैं कि पवित्र आत्मा हममें कार्य का केवल आधा भाग करता है; और इसी कारण वे आत्मा के अनुग्रह को सहायता और सहयोग कहते हैं। इससे हम देखते हैं कि हम और पोप के अनुयायी कहाँ तक सहमत हैं; क्योंकि वे यह इनकार करने में लज्जित होते हैं कि मनुष्य का स्वभाव मूल पाप से ऐसा भ्रष्ट हो गया है कि उसे सदा पवित्र आत्मा के अनुग्रह की आवश्यकता रहती है। परन्तु जब परमेश्वर हममें जो कुछ भी भलाई है उस सब को पूर्णतः अपना ठहराता है, तब पोप के अनुयायी उसे केवल आधा भाग देते हैं, और परमेश्वर के दोहरे अनुग्रह की कल्पना करते हैं, एक आगे चलनेवाला अनुग्रह और एक पीछे चलनेवाला अनुग्रह। पोप के अनुयायी इस आगे चलनेवाले अनुग्रह से क्या अर्थ लेते हैं, या क्या समझते हैं? यही कि परमेश्वर हममें भली और भक्तिपूर्ण भावनाएँ डालता है, जिससे यदि हम चाहें तो जो उचित है उसके पीछे चलने के लिए स्वतन्त्र हों; क्योंकि, जैसा मैंने कहा है, पोप के अनुयायी मानते हैं कि हम शैतान के अत्याचार के अधीन और उसके दास हैं, और कि पवित्र आत्मा के पूर्वगामी (proeunte) अनुग्रह के बिना मनुष्यों में कोई सही इच्छा नहीं। परन्तु जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, वे आत्मा के अनुग्रह के विषय में व्यर्थ बातें करते हैं, और कहते हैं कि यह एक ऐसा प्रभाव है जिसके द्वारा परमेश्वर हमें, यदि हमारी इच्छा हो, उचित बात के पीछे चलने के योग्य बनाता है। इस प्रकार उनके अनुसार परमेश्वर का अनुग्रह मनुष्यों को अधर में छोड़ देता है, कि वे परमेश्वर के अनुग्रह को ग्रहण करने या ठुकराने के लिए स्वतन्त्र रहें। इसके बाद वे पीछे चलनेवाला अनुग्रह जोड़ते हैं, जो उनकी दृष्टि में एक प्रतिफल है; क्योंकि यदि मैं परमेश्वर की बात मान लूँ, अर्थात् यदि मैं अपने आप को उसके आत्मा के द्वारा चलाए जाने दूँ, और मुझे दिए गए अनुग्रह को ग्रहण करूँ, तो परमेश्वर मुझे मेरे उचित संकल्प में दृढ़ करने के लिए प्रतिफल में एक और अनुग्रह देगा। और इस प्रकार वे मानते हैं कि अन्त तक स्थिर रहना अंशतः परमेश्वर का दान है; परन्तु वे सदा उसे एक सहयोगी अनुग्रह ही की कल्पना करते हैं। और फिर, क्योंकि उनके अनुसार अन्त तक स्थिर रहना परमेश्वर का पीछे चलनेवाला अनुग्रह है, और मानो एक दासी है, इसलिए वह अनुग्रह नहीं रह जाता, क्योंकि वह तो पुण्य का प्रतिफल ही है। परन्तु भविष्यद्वक्ता क्या कहता है? मैं उन्हें एक ही मन और एक ही चाल दूँगा, कि वे मेरा भय मानें।

इससे हम देखते हैं कि परमेश्वर का अनुग्रह अपने आप में प्रभावकारी है; और फिर वह यह नहीं कहता कि वह उन्हें किसी भी ओर मुड़ने की सामर्थ्य देगा, वरन् यह कि वह उन्हें एक ही मन देगा, जैसा कि यही बात आगे और स्पष्टता से व्यक्त की गई है। अतः हम देखते हैं कि एक ही मन या इच्छा पवित्र आत्मा का कार्य, और परमेश्वर का निरा अनुग्रह है। इसे सबसे पहले स्मरण रखना चाहिए। फिर हम यह भी देखते हैं कि यह अनुग्रह मनुष्यों में प्रभावशाली रूप से कार्य करता है; यह उन्हें केवल स्वतन्त्र विकल्प ही नहीं देता, वरन्, जैसा लोग सामान्यतः कहते हैं, वास्तविक कार्य भी उसके पीछे आता है, कि वे मेरा भय मानें, और आगे जोड़ा गया है, जीवन भर। यहाँ परमेश्वर अन्त तक स्थिर रहने की भी, पवित्र आत्मा के अनुपम दान के रूप में, प्रतिज्ञा करता है; क्योंकि यह पर्याप्त न होता कि हमारे मन उसकी सेवा के योग्य बनाए जाएँ, यदि वह हमें उसमें सम्भाले न रखता; क्योंकि हमारी चंचलता और दुर्बलता ऐसी है कि हम हर क्षण उसके अनुग्रह से गिर सकते हैं। अतः हमें सम्भाले रखने के लिए अनुग्रह की आवश्यकता है। इससे प्रकट होता है कि न केवल भले कर्मों का आरम्भ उसके आत्मा से होता है, वरन् वही हमें अन्त तक आगे बढ़ते रहने के योग्य भी बनाता है; क्योंकि अन्यथा सही मार्ग में कोई स्थिरता न होती।

307 “एक ही मन” और “एक ही चाल” इस्राएल और यहूदा के बीच पहले के विभाजनों की ओर संकेत करते प्रतीत होते हैं। पहले वे परमेश्वर के विषय में अपने विचारों में और उसकी उपासना की रीति में बँटे हुए थे। यह विभाजन फिर न रहेगा। — सं.

वह आगे कहता है, कि उनका और उनके पीछे उनके वंश का भला हो। इन शब्दों के द्वारा वह संकेत करता है कि इस्राएली स्वयं ही अपनी सब विपत्तियों के कारण बने थे, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर का भय नहीं माना था; क्योंकि वे उसकी आज्ञाकारिता में बने रहे बिना सुखी नहीं हो सकते थे। और भविष्यद्वक्ता उस बात की पुष्टि करता है जो हमने कल कही थी, कि बाहरी समृद्धि अपने आप में क्षणभंगुर है; इसलिए हमें पहले परमेश्वर का अनुग्रह खोजना चाहिए। परन्तु परमेश्वर हम पर कब कृपालु होता है? तभी, जब हम उसे अपना पिता जानते हैं, और उसकी आज्ञाओं का पालन करते हैं; अर्थात्, जब हम अपने आप को उसके अधीन कर देते हैं, जैसा सन्तानों को उचित है। आगे लिखा है, —

यिर्मयाह 32:40

40. और मैं उनसे यह वाचा बाँधूँगा, कि मैं कभी उनका संग छोड़कर उनका भला करना न छोड़ूँगा; और अपना भय मैं उनके मन में ऐसा उपजाऊँगा कि वे कभी मुझ से अलग होना न चाहेंगे।

40. Et percutiam (vel, insculpam, feriam) cum ipsis foedus perpetuum, nempe qued non discedam ab ipsis (ad verbum, de post ipsis) ut benefaciam! psis, et timorem mei ponam in cordibus ipsorum, ut non discedant a me.

वह उसी विषय को आगे बढ़ाता है; परन्तु यह दोहराव इस उद्देश्य से है कि परमेश्वर के अनुग्रह की बलपूर्वक सराहना की जाए, क्योंकि हम जानते हैं कि मनुष्य अपने घमण्ड के कारण उसके अनुग्रह की उचित महिमा को रोक रखने का सदा प्रयत्न करते हैं। इसलिए परमेश्वर, दूसरी ओर, ऊँचे शब्दों में अपने अनुग्रह का गुणगान करता है, ऐसा न हो कि मनुष्य द्वेषपूर्वक उसे धुँधला कर दें।

पहले वह कहता है, मैं उनके साथ एक सदा की वाचा बाँधूँगा। हमें व्यवस्था की वाचा और उस वाचा के बीच के विरोध पर ध्यान देना चाहिए जिसके विषय में भविष्यद्वक्ता अब बोलता है। इकतीसवें अध्याय में उसने इसे नई वाचा कहा था, और इसका कारण भी दिया था, कि व्यवस्था के प्रचार के पश्चात् उनके पुरखा शीघ्र ही भटक गए थे, और कि उसकी शिक्षा अक्षर की, और घातक, और मृत्युदायी भी थी। परन्तु अब वह इसे सदा की वाचा कहता है। व्यवस्था की वाचा का स्थिर न रहना उसके लिए आकस्मिक बात थी; क्योंकि यदि हम उसका पालन करते तो व्यवस्था प्रभावी बनी रहती; परन्तु मनुष्यों के दोष से ऐसा हुआ कि व्यवस्था की वाचा व्यर्थ हो गई और तुरन्त लुप्त हो गई। इसलिए जब परमेश्वर कोई प्रतिज्ञा करता है, तो एक स्पष्ट अन्तर होता है; परन्तु वह क्या है? परमेश्वर संकेत करता है कि उसकी शिक्षा मनुष्यों के सामने निष्फल रखी जाती है, क्योंकि वह केवल उनके कानों में गूँजती है, उनके हृदयों में प्रवेश नहीं करती। अतः पवित्र आत्मा के अनुग्रह की आवश्यकता है; क्योंकि जब तक परमेश्वर भीतर से बात न करे और हमारे हृदयों को न छुए, तब तक वह ध्वनि व्यर्थ होगी, केवल हवा को पीटती रहेगी। अब हम देखते हैं कि जिस वाचा की प्रतिज्ञा परमेश्वर अब करता है उसे सदा की वाचा क्यों कहा गया है।

साथ ही हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि यह वाचा विशेष रूप से मसीह के राज्य से सम्बन्ध रखती है। क्योंकि यद्यपि यह परमेश्वर के उस अनुग्रह का एक भाग था जो उसकी प्रजा को बँधुआई से छुड़ाने में प्रकट हुआ, तौभी उसके अनुग्रह की निरन्तर धारा को मसीह के आगमन तक फैलाया जाना चाहिए। अतः निस्सन्देह भविष्यद्वक्ता नई वाचा के साथ-साथ मसीह को हमारे सामने लाता है; क्योंकि उसके बिना इस बात की तनिक भी आशा नहीं कि परमेश्वर कोई दूसरी वाचा बाँधेगा, जैसा कि सारी व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं की शिक्षा से स्पष्ट प्रकट होता है। तो यहाँ मसीह मूसा के, और सुसमाचार व्यवस्था के विपरीत रखा गया है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि व्यवस्था एक अस्थायी वाचा थी, क्योंकि उसमें कोई स्थिरता न थी, क्योंकि वह अक्षर की थी; परन्तु सुसमाचार एक सदा की वाचा है, क्योंकि वह हृदय पर लिखा जाता है। और इसी कारण उसे नई वाचा भी कहा गया है, क्योंकि व्यवस्था का पुराना हो जाना अवश्य था, क्योंकि वह स्थायित्व जिसके विषय में भविष्यद्वक्ता बोलता है, उसके स्थान पर आ गया है।

अब एक व्याख्या आती है, क्योंकि मैं अलग न होऊँगा, इत्यादि। यहाँ {}אשרasher, सम्बन्धवाचक नहीं, वरन् एक व्याख्यात्मक या स्पष्टीकरण करनेवाला अव्यय है। तो यह संक्षेप में वाचा के रूप या स्वभाव को बताता है, अर्थात् यह कि परमेश्वर उनके पीछे से कभी अलग न होगा। परमेश्वर के विषय में कभी-कभी कहा जाता है कि वह अपने विश्वासयोग्य लोगों के आगे-आगे चलता है, जब वह उन्हें सीधा मार्ग दिखाता है। उसके विषय में यह भी कहा जाता है कि वह पीछे से उनका मार्गदर्शन करता है, जैसा यशायाह कहता है, “तुम्हारे पीछे से यह वचन तुम्हारे कानों में पड़ेगा, ‘मार्ग यही है, इसी पर चलो।’” (यशायाह 30:21)

निस्सन्देह परमेश्वर यहाँ यह साक्षी देता है कि वह अपनी प्रजा के लिए सदा शिक्षक और गुरु बना रहेगा। और वह कहता है कि वह पीछे से बोलेगा, जैसे पाठशाला के शिक्षक अपनी देखरेख में सौंपे गए विद्यार्थियों के पीछे-पीछे चलते हैं, ताकि वे उनकी सब चेष्टाओं, चाल-ढाल, बातों और बाकी सब पर ध्यान रखें और दृष्टि रखें। इसी प्रकार परमेश्वर अपनी तुलना उन शिक्षकों से करता है जिन्हें बच्चे सिखाए और प्रशिक्षित किए जाने के लिए सौंपे जाते हैं; और वह कहता है कि वह पीछे से बोलता है। तो जो यहाँ कहा गया है उसकी व्याख्या हम इस अर्थ में कर सकते हैं, “मैं तेरे पीछे से अलग न होऊँगा;” परन्तु हम इसका एक सरल अर्थ भी ले सकते हैं, कि परमेश्वर उनसे अलग न होगा, क्योंकि वह उन पर सदा अनुग्रह और करुणा दिखाता रहेगा, उसके अनुसार जो तुरन्त आगे जोड़ा गया है, कि मैं उनका भला करूँ। संक्षेप में, परमेश्वर दिखाता है कि वह अपनी प्रजा का सनातन पिता होगा, जो उन्हें न कभी त्यागेगा और न कभी दूर फेंकेगा।

परन्तु रीति या विधि भी बताई गई है, कि वह अपना भय उनके हृदयों में डालेगा, कि वे कभी उससे अलग न हों। यह वही शिक्षा है जो हम पहले देख चुके हैं; अब वह दूसरे शब्दों में दोहराई गई है; और इस प्रकार परमेश्वर, जैसा मैंने कहा, अपने अनुग्रह को और भी पूर्णता से प्रकट करता है; तो वह कहता है कि वह अपना भय मनुष्यों के हृदयों में डालेगा। अब हम देखते हैं कि वह बचकानी कल्पना किस प्रकार खण्डित होती है, जिसके नशे में पोपवादी चूर हैं, जब वे कहते हैं कि परमेश्वर का अनुग्रह सहयोग करता है, क्योंकि आत्मा मनुष्यों की निर्बलता में सहायता करता है, मानो वे स्वयं अपनी ओर से कुछ लाते हों और सहकर्मी हों। परन्तु भविष्यद्वक्ता यहाँ साक्षी देता है कि परमेश्वर का भय पवित्र आत्मा का कार्य और वरदान है। वह यह नहीं कहता कि मैं उन्हें अपना भय मानने की शक्ति दूँगा, वरन् यह कि मैं अपना भय उनके हृदयों में डालूँगा। तो हम देखते हैं कि वह फिर दिखाता है कि आत्मा हम में प्रभावशाली रूप से कार्य करता है, यहाँ तक कि हमारी भावनाओं को नए सिरे से गढ़ता है, और हमें ऐसी अवस्था में नहीं छोड़ता कि हम किसी भी ओर मुड़ सकें या अधर में लटके रहें। यही बात यहेजकेल भी कहता है, “और मैं उनसे अपना भय मनवाऊँगा।” (यहेजकेल 36:27)

इस प्रकार वहाँ भी वही शिक्षा पुष्ट की गई है, क्योंकि कहा गया है कि परमेश्वर इस्राएल से अपना भय मनवाएगा, न कि यह कि वे उसका भय मानने के योग्य हो जाएँ।

वह फिर जोड़ता है, कि वे मुझ से अलग न हों। हम देखते हैं कि तटस्थ अनुग्रह के विषय में वे मूर्खतापूर्ण धारणाएँ स्पष्ट रूप से खण्डित हो जाती हैं, जो मनुष्यों को केवल शक्ति प्रदान करता है, जिसे वे बाद में चाहें तो ग्रहण करें; क्योंकि भविष्यद्वक्ता कहता है, “कि वे मुझ से अलग न हों।” इस प्रकार वह फिर दिखाता है कि अन्त तक बने रहना, ठीक काम करने के आरम्भ से कम नहीं, परमेश्वर का वरदान और पवित्र आत्मा का कार्य है: और जैसा मैं कह चुका हूँ, यदि परमेश्वर केवल एक बार हमारे हृदयों को गढ़ दे, कि हम ठीक काम करने को प्रवृत्त हों, तो शैतान किसी भी क्षण अपनी चालों से हमें सीधे मार्ग से बहका ले सकता है, या, क्योंकि वह अचानक और प्रचण्ड आक्रमण करता है, वह हमें अपनी इच्छा के अनुसार इधर-उधर हाँक सकता है। तो एक घड़ी के लिए हम पर शासन करना हमारे किसी काम का न होता, जब तक परमेश्वर हमारे जीवन के सारे मार्ग भर हमारी रक्षा न करता, और अन्त तक हमें आगे न ले चलता। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि हमारे जीवन का सारा मार्ग परमेश्वर के आत्मा के द्वारा निर्देशित होता है, यहाँ तक कि भले कामों का अन्त भी, उनके आरम्भ से कम नहीं, उसी के अनुग्रह को श्रेय दिया जाना चाहिए। तो मनुष्य जो कुछ भी योग्यता अपने लिए दावा करते हैं, वह परमेश्वर से छीन लेते हैं, और इस प्रकार वे पवित्र वस्तु के अपहारी बन जाते हैं।

308 {{אשר का अनुवाद “कि” या “क्योंकि” किया जा सकता है। यह एक सदा की वाचा होगी, क्योंकि वह “उनका भला करने के लिए उनके पीछे रहना न छोड़ेगा,” या, जैसा Syr. में है, “उनका भला करने के लिए उनके पीछे चलना न छोड़ेगा।” Vulg. {}אשר को छोड़ देता है और Targ. भी ऐसा ही करता है; Syr. इसे “कि” का अर्थ देता है, परन्तु Sept. इसका अनुवाद “जो” करता है, “जिसे (अर्थात् वाचा को) मैं उनके पीछे से न हटाऊँगा,” अर्थात्, जैसा प्रतीत होता है, उनके पीछे आनेवालों से, अर्थात् वंशजों से। और यही अर्थ Blayney ने अपनाया है, “जिसे मैं उनके वंशजों से न हटाऊँगा, कि उनका उपकारी बना रहूँ;” इन अन्तिम शब्दों को वह स्पष्टतः पहले वाक्यांश से जोड़ता है। इस अनुवाद के पक्ष में यह बात है कि पिछले पद में “सन्तान” का उल्लेख है। तौभी, अन्तिम वाक्यांश के कारण, सीरियाई अनुवाद सबसे उपयुक्त प्रतीत होता है। यहाँ दो उल्लेखनीय प्रतिज्ञाएँ हैं, — कि परमेश्वर उनसे विमुख न होगा, — और कि वह अपना भय उनमें डालेगा, जिससे वे उससे विमुख न हों। — सं.

तौभी यहाँ एक प्रश्न उठाया जा सकता है: हम देखते हैं कि विश्वासी प्रायः ठोकर खाते हैं, जीवन भर में दस बार नहीं, वरन् प्रतिदिन: तो यह कैसे है कि जहाँ परमेश्वर का आत्मा कार्य करता है, वहाँ उसकी प्रभावशीलता ऐसी है कि मनुष्य कभी सीधे मार्ग से नहीं मुड़ते? यदि कोई यह उत्तर दे कि विश्वासी ठोकर तो खाते हैं, परन्तु पूर्णतः गिर नहीं जाते, और कि परमेश्वर यहाँ उस धर्मत्याग की ओर संकेत करता है जो परमेश्वर के सारे भय को उतार फेंकता है, तो यह पूरा समाधान न होगा। क्योंकि हम देखते हैं कि चुने हुए लोग भी कभी-कभी धर्मत्यागियों के समान हो जाते हैं, क्योंकि परमेश्वर का भय और भक्ति, मानो, उनमें दब जाते हैं। भक्ति वास्तव में बुझ तो नहीं जाती, परन्तु उनमें आत्मा की एक चिनगारी भी दिखाई नहीं देती। परन्तु हमें ध्यान देना चाहिए कि विश्वासियों को अटल धीरज दिया गया है, जिससे जब वे गिरते हैं, तो शीघ्र मन फिराते हैं। इसलिए बीच के व्यवधान इसमें बाधक नहीं हैं कि परमेश्वर उन्हें आरम्भ-स्थान से लक्ष्य तक ले चले, जब तक वे अपनी सारी दौड़ पूरी न कर लें। और इस प्रकार ऑगस्टीन की यह बात सत्य है, कि आत्मा हम में ऐसा कार्य करता है कि हमारी इच्छा अचूक रूप से भली होती है। क्योंकि वह हमारी दशा की तुलना आदम की उस दशा से करता है जैसा वह अपनी पहली सृष्टि में था। हम जानते हैं कि आदम तब निष्कलंक था, क्योंकि वह परमेश्वर के स्वरूप में रचा गया था: तब वह सीधा और हर दोष से मुक्त था।

हम अभी तक अपूर्ण हैं; यद्यपि परमेश्वर ने अपने आत्मा के द्वारा हमें नया जन्म दिया है, तौभी हम में शरीर के कुछ अवशेष अब भी बने रहते हैं, और हम उतनी तत्परता से नहीं दौड़ते जितनी हमें दौड़नी चाहिए; वरन् हम पौलुस के साथ यह पुकारने को विवश होते हैं कि हम “अभागे” हैं, और यह मान लेने को कि जो भलाई हम चाहते हैं वह नहीं करते, परन्तु वह बुराई करते हैं जिससे हमें घृणा है। (रोमियों 7:15) तो आदम की दशा हमारी दशा से उत्तम प्रतीत होती है। इसका उत्तर ऑगस्टीन यह देता है, — कि परमेश्वर अब हमारे साथ उससे अधिक भला व्यवहार करता है जितना उसने हमारे आदिपिता आदम के साथ किया था; क्योंकि यद्यपि उसने उसे धर्मी और निर्दोष, और बिना किसी कलंक के रचा, तौभी उसने उसे ऐसा स्वभाव दिया जो परिवर्तनशील था; और इसलिए आदम, स्वतन्त्र इच्छा रखते हुए, तुरन्त गिर पड़ा। तो स्वतन्त्र इच्छा किस काम आई? केवल इसी काम कि मनुष्य तुरन्त गिर पड़ा और हमें भी अपने साथ उसी विनाश में ले आया। यही स्वतन्त्र इच्छा की प्रशंसा है! कि मनुष्य ने, उससे सम्पन्न होकर, अपने आप को सबसे नीचे के अथाह कुण्ड में गिरा दिया, जहाँ से वह अपने बल से कभी उठ न सकता था। परन्तु अब, हमारे विषय में, यद्यपि हम लँगड़ाते हैं, और सीधे मार्ग से भटक भी जाते हैं, और हमारी भ्रष्ट अभिलाषाएँ हमें बुराई की ओर लुभाती हैं, और हमारी भ्रष्टता हमें वैसे दौड़ने से रोकती है जैसा हम चाहते हैं, तौभी हमारी दशा कहीं उत्तम है, क्योंकि परमेश्वर हमारे सब संघर्षों के बीच हमें अपने आत्मा की सामर्थ्य से सम्पन्न करता है, जिससे हम कभी पराजित या अभिभूत नहीं होते। तो यह अचूक स्थिरता (indeclinabilis constantia), जैसा ऑगस्टीन इसे कहता है, उस श्रेष्ठता और सम्मान से कहीं बढ़कर है जो आदम को आरम्भ में प्राप्त था। यह बात भविष्यद्वक्ता के शब्दों से स्पष्ट रूप से निकाली जा सकती है जब वह कहता है कि परमेश्वर अपना भय अपनी प्रजा के हृदयों में डालेगा, ताकि वे उससे कभी अलग न हों।

फिर यह पूछा जा सकता है कि सेंतमेंत धर्मी ठहराए जाने का कोई उल्लेख क्यों नहीं किया गया? क्योंकि परमेश्वर की वाचा तब तक प्रभावी नहीं हो सकती जब तक वह हमें अपने साथ मेल न कराए, क्योंकि परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त करने के लिए नया जन्म पर्याप्त नहीं है, क्योंकि हम केवल आंशिक रूप से ही ठीक इच्छा करते और ठीक काम करते हैं। इसका हम यह उत्तर देते हैं कि इसमें कोई सन्देह नहीं कि परमेश्वर “भय” शब्द में विश्वास को सम्मिलित करता है; इसलिए पापों की क्षमा, जिसके द्वारा मनुष्य परमेश्वर के अनुग्रह में लौटते हैं, नए जन्म की चर्चा होने पर वर्जित नहीं होती। साथ ही इस खण्ड की व्याख्या इस प्रकार भी की जा सकती है, कि भविष्यद्वक्ता सम्पूर्ण के स्थान पर एक भाग का उल्लेख करता है। निस्सन्देह नई वाचा, जैसा हम पहले देख चुके हैं, दो भागों से बनी है, अर्थात् यह कि परमेश्वर, हमें अपनी सन्तान के रूप में गोद लेकर, हमें क्षमा करता है, और हमारी सब निर्बलताओं को माफ करता है, और फिर अपने आत्मा के द्वारा हम पर शासन करता है: परन्तु यहाँ वह केवल अन्तिम भाग की चर्चा करता है। अतः इस वाक्य को ऐसा माना जा सकता है जिसमें सम्पूर्ण के स्थान पर एक भाग सम्मिलित है। तौभी पवित्रशास्त्र, जैसा कहा जा चुका है, जब परमेश्वर के भय की चर्चा करता है, तो प्रायः विश्वास को भी सम्मिलित करता है, क्योंकि, जैसा भजनकार कहता है, परमेश्वर का भय तब तक नहीं माना जा सकता जब तक हम उसकी भलाई का स्वाद न चखें, “परन्तु तू क्षमा करनेवाला है, जिससे तेरा भय माना जाए।” (भजन संहिता 130:4)

क्योंकि परमेश्वर का आदरपूर्ण भय तब तक नहीं हो सकता जब तक उससे पहले उसके पितृतुल्य अनुग्रह का ज्ञान न हो।

यिर्मयाह 32:41

41. मैं बड़ी प्रसन्नता के साथ उनकी भलाई करता रहूँगा, और सचमुच उन्हें इस देश में अपने सारे मन और प्राण से बसा दूँगा।

41. Et laetabor super ipsos beneficiendo ipsis, et plantabo eos in terra hac, in veritate (id est, fideliter) in toto corde meo, et in tota anima men.

जब परमेश्वर कहता है कि वह अपनी प्रजा की भलाई करने में आनन्द पाएगा, तो वह मनुष्यों की भाषा अपनाता है, क्योंकि पिता तब आनन्दित होते हैं जब वे अपनी सन्तानों की भलाई कर पाते हैं।

तो परमेश्वर ने, क्योंकि वह पितृ-प्रेम जिससे वह अपनी प्रजा को देखता है अन्य किसी रीति से व्यक्त नहीं किया जा सकता था, इस उपमा का प्रयोग किया। फिर, इसके विरोध पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए, अर्थात् यह कि परमेश्वर आनन्दित हुआ था जब उसने अपनी प्रजा को उसकी दुष्टता के लिए दण्ड दिया। क्योंकि परमेश्वर दया के समान न्याय में भी आनन्दित होता है। तो परमेश्वर कुछ समय तक आनन्दित हुआ जब उसने प्रजा को दण्ड दिया; क्योंकि उसका न्याय उचित है, इसलिए वह उसमें आनन्दित होता है।

परन्तु अब वह कहता है कि वह अपना पितृ-स्नेह प्रकट करेगा, यहाँ तक कि उनकी भलाई करने में आनन्द पाएगा।

वह आगे कहता है, मैं उन्हें इस देश में रोपूँगा। उसने उन्हें वास्तव में तब रोपा था, जब यहोशू के द्वारा देश का अधिकार उन्हें दिया गया था, उसके अनुसार जो 80वें भजन में कहा गया है, जहाँ ऐसी ही अभिव्यक्ति प्रयुक्त है, अर्थात् यह कि परमेश्वर अपनी दाखलता को मिस्र से निकाल लाया, और उसे प्रतिज्ञा के निज भाग में रोप दिया। (भजन संहिता 80:8) परन्तु बाद में प्रजा जड़ से उखाड़ दी गई। इसलिए देश का पहला अधिकार, बँधुआई के समय तक, ठीक-ठीक कहें तो, रोपण न था, क्योंकि तब प्रजा ने दृढ़ जड़ नहीं पकड़ी थी। तो जब परमेश्वर यहाँ रोपण की बात करता है, तो वह किसी नई और असाधारण बात की प्रतिज्ञा करता है। और इसमें कोई सन्देह नहीं कि जिस स्थायित्व का उल्लेख किया गया है, वही अभिप्रेत है; क्योंकि प्रजा का यह रोपण वाचा पर निर्भर है, और वाचा बँधुआई से पहले के समान अस्थायी नहीं, वरन् अपनी अवधि में सदा की है।

तो अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता का क्या अभिप्राय है जब वह बँधुआई से लौटने के पश्चात् प्रजा की पुनर्स्थापना की तुलना रोपण से करता है। हम वास्तव में जानते हैं कि उस समय से प्रजा निर्वासित नहीं की गई थी, और कि मन्दिर सदा खड़ा रहा, यद्यपि विश्वासी बहुत सी विपत्तियों से दबाए गए थे; परन्तु यह केवल रोपण का एक प्रतिरूप था। इसलिए इस प्रतिज्ञा की पूर्ण पूर्ति पाने के लिए हमें अनिवार्य रूप से मसीह तक आगे बढ़ना होगा। आरम्भ, जैसा हमने कहा है, और जिसे दोहराने के लिए मैं प्रायः विवश होता हूँ, इसी वापसी से लिया जाना चाहिए; परन्तु मसीह को उस छुटकारे से अलग नहीं किया जाना चाहिए जो भोर के तारे के समान था, उससे पहले कि धार्मिकता का सूर्य स्वयं अपने तेज में प्रकट हुआ। जब मसीही लोग इस खण्ड और ऐसे ही अन्य खण्डों की व्याख्या करते हैं, तो वे बाबुल की बँधुआई से प्रजा के छुटकारे को छोड़ देते हैं, मानो ये भविष्यद्वाणियाँ उस समय से बिलकुल सम्बन्ध न रखती हों; इसमें वे भूल करते हैं। और यहूदी, जो मसीह को अस्वीकार करते हैं, उस सांसारिक छुटकारे पर ही रुक जाते हैं। परन्तु भविष्यद्वक्ता, जैसा मैंने कहा है, प्रजा की वापसी से आरम्भ करते हैं, परन्तु वे मसीह को भी बीच में रखते हैं, ताकि विश्वासी जान लें कि वह वापसी उस पूर्ण अनुग्रह का केवल हलका-सा स्वाद थी, जिसकी आशा केवल मसीह से की जानी थी; क्योंकि तभी, वास्तव में, परमेश्वर ने अपनी प्रजा को सचमुच रोपा।

फिर, जब यहूदी बाद में कनान देश से निकाल दिए गए, तो यह उनकी कृतघ्नता के कारण था; और यह पूर्ण परित्याग था। तौभी इस बीच परमेश्वर ने वहाँ अपनी दाखलता को रोपे रखा, जब तक यरूशलेम फैल न गया और उसकी सीमाएँ पृथ्वी के दूर-दूर के छोरों तक न पहुँच गईं: और हमारे विषय में कहा जाता है कि हम मसीह में साटे गए और रोपे गए हैं, जब परमेश्वर हमें अपनी कलीसिया में गोद लेता है; और इसी से मसीह का यह कथन है, “हर पौधा जो मेरे स्वर्गीय पिता ने नहीं लगाया, उखाड़ा जाएगा।” (मत्ती 15:13)

तो आइए हम जान लें कि कलीसिया यहूदिया में रोपी गई थी, क्योंकि वह मसीह के समय तक बनी रही। और क्योंकि मसीह ने बीच की दीवार को ढा दिया है, जिससे अब यहूदियों और अन्यजातियों में कोई भेद नहीं, इसलिए परमेश्वर अब हमें पवित्र देश में रोपता है, जब वह हमें मसीह की देह में साट देता है।

वह कहता है, सच्चाई से, अर्थात्, विश्वासयोग्यता से, ऐसा कि उन्हें फिर कभी न उखाड़े। और वह जोड़ता है, अपने सारे मन और अपने सारे प्राण से। ये शब्द वास्तव में अनोखे हैं, क्योंकि परमेश्वर मनुष्यों की भावनाओं और संवेदनाओं को अपने ऊपर लागू करता है; परन्तु यह आवश्यक है कि वह एक प्रकार से अपना रूप बदले, ताकि हम उसे समझ सकें; क्योंकि यदि वह तुतलाकर न बोलता, तो इतनी समझ कहाँ मिलती जो उसकी बुद्धि की असीम ऊँचाई तक पहुँच सके? तो क्योंकि वे भेद जिनसे वह हम पर अनुग्रह करता है अगम्य हैं, इसलिए यह आवश्यक है कि वह अपने आप को हमारी सीमित समझ के अनुकूल बनाए। अतः सारे मन और सारे प्राण से उसका अभिप्राय वह विश्वासयोग्यता और स्थिरता है जो तब तक सदा बनी रहेगी जब तक विश्वासी अनन्त जीवन प्राप्त न कर लें। मनुष्य में खराई को सारा मन कहा जाता है, क्योंकि दोहरा मन भी हो सकता है। यह सच है कि इस कारण से यह परमेश्वर पर या उसके स्वभाव पर लागू नहीं किया जा सकता।

परन्तु जैसा मैं कह चुका हूँ, वह एक उपमा के द्वारा कहता है कि वह यह काम सारे मन से करेगा, क्योंकि वह इसे इतनी पूर्णता से करेगा कि उद्धार को पूर्ण करने में कोई कमी न रहेगी, और “सच्चाई” से भी यही बात अभिप्रेत है; यद्यपि कुछ लोग इस शब्द के विषय में अधिक सूक्ष्म दार्शनिक विवेचन करते हैं, क्योंकि सच्चाई से वे प्रतिज्ञाओं की दृढ़ता या सत्यता समझते हैं। परन्तु हम जानते हैं कि इब्रानी भाषा के प्रयोग के अनुसार सच्चाई का अर्थ प्रायः वह होता है जो ठोस और स्थायी हो। तो उसका अभिप्राय यह है कि रोपण इतना दृढ़ और ठोस होगा कि इस बात का कोई भय न रहेगा कि प्रजा कभी कहीं और हटाई जाए, क्योंकि उसमें एक जीवित जड़ होगी, जैसा हमने समझाया है: कलीसिया मसीह के आगमन तक यहूदिया में स्थिर रही, जिसने इस रोपण की वास्तविक पूर्ति की; क्योंकि जब हम उसमें साटे जाते हैं, तो हम एक प्रकार से अनन्त जीवन के अधिकारी पहले से हो जाते हैं और स्वर्ग के नागरिक बन जाते हैं।

309 {{אמת शब्द का अर्थ सामान्यतः कपट या दिखावे के, या जो केवल ऊपरी हो उसके, विपरीत वास्तविकता है; असत्य के विपरीत सत्य है, और जो क्षणभंगुर और अस्थायी है उसके विपरीत स्थिरता है। रोपण को वास्तविक रोपण होना था, न कि छद्मवेश या दिखावे का। अगले शब्द अर्थ को स्पष्ट करते हैं, “अपने सारे मन और अपने सारे प्राण से,” अर्थात्, सच्चाई और लगन से, या, मन के पूरे संकल्प और इच्छा तथा भावनाओं की पूरी सहमति से।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अनुग्रह कर कि क्योंकि हम स्वभाव से पूर्णतः बुराई के अधीन हैं और गर्भ से भ्रष्टता के सिवा और कुछ नहीं लाते, — हाँ, अनुग्रह कर कि तेरे आत्मा के द्वारा नया जन्म पाकर हम तुझे प्रसन्न करने और तेरी आज्ञा मानने का यत्न करें; और क्योंकि हमारी दुर्बलता ऐसी है कि हम किसी भी क्षण भटक सकते हैं, तू हमें दृढ़ता और स्थिरता से सम्पन्न कर, कि हम अपनी दौड़ के बीच में कभी मूर्छित न हों, वरन् ऐसी निरन्तरता से तेरी आज्ञा मानें, कि अपना सांसारिक युद्ध पूरा करने के पश्चात् हम अन्त में उस धन्य विश्राम का आनन्द लें, जो हमारे लिए तैयार किया गया है, हमारे प्रभु मसीह यीशु में। — आमीन।

एक सौ बत्तीसवाँ व्याख्यान

यिर्मयाह 32:42

42. क्योंकि यहोवा यों कहता है, कि जैसे मैं ने अपनी इस प्रजा पर यह सब बड़ी विपत्ति डाल दी, वैसे ही निश्चय इन से वह सब भलाई भी करूँगा जिसके करने का वचन मैं ने दिया है।

42. Quia sic dicit Jehova, Quemadmodum venire feci super populum hunc omne malum hoc grande, sic ego reducam super eos bonum quod ego pronuntio super eos.

परमेश्वर यहाँ फिर अपने भविष्यद्वक्ता को दिखाता है कि बचे हुओं के लिए बँधुआई अस्थायी होगी; क्योंकि हम जानते हैं कि प्रजा का अधिकांश भाग पूर्णतः त्याग दिया गया था; परन्तु प्रभु को यह भाया कि उसकी कलीसिया बची रहे, यद्यपि संख्या में बहुत छोटी।

तो यह प्रतिज्ञा बिना भेद के सारे बारह गोत्रों पर लागू नहीं की जानी चाहिए, वरन् विशेष रूप से चुने हुओं से सम्बन्ध रखती है, जैसा घटना ने भली-भाँति प्रमाणित किया, और पौलुस भी इस सत्य का अत्यन्त विश्वसनीय व्याख्याकार है। और इस बात को सावधानी से स्मरण रखना चाहिए, क्योंकि कपटी लोग सदा वह सब कुछ अपने लिए चुरा लेते हैं जो परमेश्वर अपने विश्वासयोग्य लोगों से प्रतिज्ञा करता है, जबकि वे उसका नाम झूठमूठ लेते हैं। तो आइए हम परमेश्वर की योजना को समझें, अर्थात् यह कि उसका उद्देश्य अपने चुने हुओं को दृढ़ भरोसे से सम्भाले रखना था, ऐसा न हो कि निराशा प्रार्थना का द्वार बन्द कर दे। तो क्योंकि प्रजा का एक भाग बचा रहा, जिससे कलीसिया पूर्णतः नष्ट न हो, यह प्रतिज्ञा पूरी हुई; और क्योंकि हम दया की प्रतिज्ञा को तब तक कभी ग्रहण नहीं कर सकते जब तक मन फिराव और पाप का अंगीकार पहले न हो, इसलिए भविष्यद्वक्ता यहाँ इन दोनों बातों की चर्चा करता है।

वह कहता है कि परमेश्वर ने एक भयानक विपत्ति आने दी थी, या ले आया था; और फिर यह आता है कि वह उन पर वह सब भलाई लाएगा जिसकी उसने प्रतिज्ञा की थी। इन शब्दों के द्वारा परमेश्वर संकेत करता है कि जो कुछ उसने पहले प्रतिज्ञा की थी उसे पूरा करना उसके लिए कठिन न होगा, क्योंकि वह उस घाव को चंगा कर सकता था जो उसने स्वयं लगाया था। यदि कसदियों ने, जैसा अन्यत्र कहा गया था, अपनी इच्छा के अनुसार नगर को ले लिया होता, तो उपाय कठिन हो सकता था; परन्तु क्योंकि परमेश्वर ने कसदियों को काम में लगाया था, और क्योंकि वे, मानो, उसकी पताका के नीचे लड़े थे, इसलिए उसके लिए नगर को फिर से बसाना, और उन लोगों को बँधुआई से वापस बुलाना सरल बात थी जिन्हें उसके धर्मी पलटे ने निर्वासित किया था।

हमें विशेष रूप से इस कथन पर ध्यान देना चाहिए, मैं उनके लिए वह सब भलाई करूँगा जिसके विषय में मैं ने उनसे कहा है। क्योंकि परमेश्वर दिखाता है कि अपने छुटकारे की आशा रखने में विश्वासियों को किस आधार पर भरोसा रखना था; वह उन्हें अपने ही मुख पर निर्भर रहने की आज्ञा देता है; क्योंकि मनुष्य जो कुछ भी प्रतिज्ञा करें वह क्षणभंगुर और निष्फल है। तो यदि हम चाहते हैं कि हमारी आशा दृढ़ता से स्थिर रहे, कि वह हमें निराश न करे, तो आइए हम परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर भरोसा रखना सीखें, जिससे हम में से कोई ढिठाई से इस या उस बात का स्वप्न न देखे, जैसे हम इस प्रकार प्रायः अपने आप को धोखा देते हैं; वरन् आइए हम परमेश्वर के वचन में सन्तुष्ट रहें। परन्तु जब परमेश्वर के अनुग्रह का प्रमाण हमें प्राप्त न हो, तो हम बहुत से भरोसों का सहारा ले सकते हैं, परन्तु वह लाभ रहित होगा। अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने परमेश्वर के वचन के विषय में यह विशेष बात स्पष्ट रूप से क्यों जोड़ी। आगे लिखा है, —

यिर्मयाह 32:43-44

43. सो इस देश में जिसके विषय तुम कहते हो कि यह उजाड़ हो गया है, इस में न तो मनुष्य रह गए हैं और न पशु, यह तो कसदियों के वश में पड़ चुका है, खेत फिर मोल लिये जाएँगे,

43. Et acquiretur ager in terra hac de qua vos dicitis, Deserta est ab homine et jumento, tradita est in manum Chaldaeorum.

44. और बिन्यामीन के देश में, यरूशलेम के आस पास, और यहूदा देश के अर्थात् पहाड़ी देश, नीचे के देश और दक्खिन देश के नगरों में लोग गवाह बुलाकर खेत मोल लेंगे, और दस्तावेज़ में दस्तख़त और मुहर करेंगे; क्योंकि मैं उनके दिनों को लौटा ले आऊँगा; यहोवा की यही वाणी है।

44. Agros pecunia ement, scribendo in libro, et obsignando, et obtestando testes in terra Benjamin, et per circuitus Jerusalem, et in urbibus Jehudah, et in urbibus montanis, et in urbibus campestribus, (quanquam alii volunt esse proprium nomen, sed hoc non convenit) et in urbibus austri, (id est, quae respiciunt versus austrum) quia reduco captivitatem eorum, dicit Jehova.

वह प्रजा की वापसी के विषय में भविष्यद्वाणी की पुष्टि करता है, और उस दर्शन को लागू करता है जो भविष्यद्वक्ता को दिखाया गया था; क्योंकि उसे आज्ञा दी गई थी, जैसा हम देख चुके हैं, कि बिन्यामीन के देश में एक खेत मोल ले। तो अब परमेश्वर उस चिह्न को भविष्यद्वाणी से जोड़ता है; क्योंकि चिह्नों का उपयोग शिक्षा के प्रति विश्वास को दृढ़ करना है, जो फिर भी अपने आप में विश्वास के योग्य है, और पूर्णतः प्रामाणिक है, और अपने आप में भरोसे के योग्य है; तौभी हमारी दुर्बलता के कारण यह अनुमति दी गई है कि हमें चिह्न दिए जाएँ, ताकि प्रतिज्ञाएँ हमारे हृदयों में और भी दृढ़ और पक्की हो जाएँ।

इसी क्रम का परमेश्वर अब पालन करता है, और कहता है, तौभी इस देश में खेत मोल लिया जाएगा। क्रिया, {}קנהkone, का अर्थ है प्राप्त करना या मोल लेना और अधिकार में रखना; परन्तु क्योंकि अगले पद में वह कहता है, वे रूपये से खेत मोल लेंगे, इसलिए अर्थ को बदलना नहीं चाहिए।

तो इस देश में खेत मोल लिया जाएगा (बहुवचन के स्थान पर एकवचन), जिसके विषय में तुम कहते हो, यह मनुष्य और पशु से उजाड़ हो गया है। प्रधान लोगों ने यह बात नहीं कही थी, जैसा हमने अन्यत्र दिखाया है; वरन्, जब यिर्मयाह ने उनसे यह बात कही, तो उन्होंने उसके साथ दुर्व्यवहार और क्रूरता की; क्योंकि यह विश्वास करना कठिन बात थी कि वह देश, जो मानो परमेश्वर का पवित्र निवास था, कसदियों के द्वारा उजाड़ दिया जाएगा। परमेश्वर ने वास्तव में उसे अपना विश्रामस्थान कहा था, और वह अब्राहम की सन्तान को निज भाग के रूप में दिया गया था। तो यह कथन यहूदियों से नहीं निकला था; वरन्, यह स्वयं परमेश्वर का था। परन्तु इस प्रश्न का समाधान अन्यत्र किया जा चुका है; उन्होंने वास्तव में देश के उजाड़ होने की बात उस अर्थ में या उस रीति से नहीं कही जैसे परमेश्वर ने कही थी; क्योंकि जब भविष्यद्वक्ताओं ने उन्हें देश के उजाड़ होने की धमकी दी, तो उन्होंने सदा छुटकारे और वापसी की आशा भी जोड़ी; परन्तु उन्होंने, जब वह विपत्ति उन पर आई, सारी आशा फेंक दी, और अपने आप को पूर्णतः निराशा के हवाले कर दिया। और यह भक्तिहीनों की सामान्य रीति है कि जब तक परमेश्वर उन्हें छोड़े रखता है या उनका दण्ड टालता है, तब तक वे उसकी सब धमकियों का उपहास करते हैं; परन्तु जब परमेश्वर यह प्रकट करता है कि वह गम्भीरता से बोलता है, तब वे निराशा में डूब जाते हैं, और यह निष्कर्ष निकालते हैं कि उनके लिए कुछ भी शेष नहीं रहा।

310 यह इब्रानी का शाब्दिक अनुवाद नहीं है, वरन् यह है, — जिसके विषय में तुम कहते हो कि वह उजाड़ है, उसमें न मनुष्य है न पशु, वह कसदियों के हाथ में दे दिया गया है। यदि “जिसके” का सम्बन्ध “कहते हो” से होता, तो उसके बाद पूर्वसर्ग-युक्त एक सर्वनाम होता। Sept., Syr., और Arab. ने ठीक वाक्य-रचना को बनाए रखा है, यद्यपि Vulg. ने नहीं। “बिना,” अर्थात् “न के साथ,” या “साथ नहीं,” शब्दशः इब्रानी है, {{מאין — सं.

तो यही वह बात है जिसके लिए यिर्मयाह अपनी जाति को उलाहना देता है, अर्थात् यह कि उन्होंने सारी आशा अपने से दूर फेंक दी, जबकि परमेश्वर ने उनके लिए सत्तर वर्ष की अवधि ठहरा दी थी। तो जब परमेश्वर उनकी ओर अपना हाथ बढ़ा रहा था, तब उन्होंने इस प्रकार निराशा के अथाह कुण्ड में डूबना अधिक पसन्द किया, यहाँ तक कि कोई भी बात उनके मन को शान्ति न दे सकी। इस कृतघ्नता को भविष्यद्वक्ता उचित ही दोषी ठहराता है; क्योंकि वे अपने देश को सदा के विनाश के लिए अर्पित समझते थे, जबकि उसकी पुनर्स्थापना की प्रतिज्ञा उनसे की गई थी; मानो उसने कहा हो, “परमेश्वर की दया और उसकी सच्चाई तुम्हारी सारी दुष्टता से बढ़कर होगी; परन्तु तुम, जहाँ तक तुमसे हो सकता है, उसकी प्रतिज्ञाओं को बुझाते हो, उसके अनुग्रह को मिटाते हो, और उसकी प्रतिज्ञाओं को कोई स्थान नहीं देते: तौभी वह उसे पूरा करेगा जिसकी उसने प्रतिज्ञा की है; क्योंकि यद्यपि तुम झूठमूठ यह समझते हो कि देश सदा के लिए विनाश को सौंप दिया गया है, तौभी प्रभु उसे उसके अपने वैध उत्तराधिकारियों, अर्थात् अब्राहम की सन्तान, से फिर बसाएगा।”

यही कारण है कि वह संकेत करता है कि यहूदियों ने देश को सदा के उजाड़ के लिए सौंपा हुआ मान लिया था।

पिछले पद में जो कहा गया है उसे और पूर्णता से दिखाने के लिए, वह आगे कहता है, रूपये से खेत मोल लिए जाएँगे, और लिखकर (क्रियाएँ क्रियार्थक संज्ञा रूप में हैं) वे पट्टियों पर लिखेंगे और गवाहों के द्वारा मुहर करेंगे, बिन्यामीन के देश में भी। फिर भविष्यद्वक्ता उन सब सीमाओं का उल्लेख करता है जिनसे यरूशलेम घिरा हुआ था। हम जानते हैं कि नगर का एक भाग बिन्यामीन के भाग में था, और एक फाटक भी इसी नाम से कहलाता था: बिन्यामीन के देश में, वह कहता है, और यरूशलेम के चारों ओर भी, अर्थात् यहूदा के नगरों में, पहाड़ों पर के नगरों में, और तराई के नगरों में भी, और उन नगरों में जो दक्खिन की ओर स्थित हैं, अर्थात् मिस्र की ओर, क्योंकि दक्खिनी देश मिस्र की ओर था।

कारण जोड़ा गया है, क्योंकि परमेश्वर उनकी बँधुआई को लौटा लाएगा, अर्थात्, बँधुओं को लौटा लाएगा कि वे फिर देश के अधिकारी हों। आगे लिखा है, —

311 इब्रानी में क्रियार्थक रूप प्रायः, जैसे वेल्श में, क्रियावाचक संज्ञाएँ होते हैं। अनुवाद इस प्रकार किया जा सकता है, — वे रूपये से खेत मोल लेंगे; और पुस्तक में लिखा जाना, और मुहर लगाना, और गवाहों की गवाही होगी, बिन्यामीन के देश में, इत्यादि इत्यादि। हमारा अनुवाद Syr. का है और लगभग Targ. का। — सं.

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