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यिर्मयाह 29
एक सौ नौवाँ व्याख्यान
यिर्मयाह 29:1
1. यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता ने इस आशय की पत्री, उन पुरनियों में से जो बचे थे, और याजकों, भविष्यद्वक्ताओं और सब लोगों के पास भेजी, जिन्हें नबूकदनेस्सर यरूशलेम से बाबुल को बँधुआ करके ले गया था;
1. Hi sunt sermones libri (vel, epistolae) quem misit Jeremias propheta Jerusalem ad reliquias seniorum captivitatis, et ad sacerdotes et ad prophetas, et ad universum populum, quem captivum abduxerat Nebuchadnezer e Jerusalem in Babylonem; यहाँ भविष्यद्वक्ता एक नया प्रवचन आरम्भ करता है; अर्थात् वह न केवल यरूशलेम में निरन्तर पुकारता रहा कि जो यहूदी अब तक वहाँ बचे थे वे मन फिराएँ, वरन् उसने बँधुआई में गए लोगों के शोक को भी हलका किया, और उन्हें लौट आने की आशा रखने के लिए उभारा, इस शर्त पर कि वे अपने लिए ठहराए गए ताड़ना को धीरज से सह लें। साथ ही भविष्यद्वक्ता का उद्देश्य दोहरा था; क्योंकि वह न केवल सान्त्वना के द्वारा बँधुओं के दुःख को कम करना चाहता था, वरन् अपनी ही जाति के हठ को भी तोड़ना चाहता था, ताकि जो लोग अब तक यरूशलेम और यहूदिया में रह गए थे वे जान लें कि उनके लिए इससे बढ़कर भली बात कोई न होगी कि वे अपने दूसरे भाइयों के साथ जा मिलें। जैसा पहले ही प्रकट हो चुका है, और जैसा हम आगे अनेक स्थानों में देखेंगे, यहूदियों ने एक अनुचित छुटकारे पर मन लगा रखा था; परमेश्वर ने सत्तर वर्ष ठहराए थे, परन्तु वे तुरन्त ही अपने ऊपर रखे गए जूए को तोड़कर उससे निकल भागना चाहते थे। इसलिए यिर्मयाह ने बँधुओं और निर्वासितों को लिखते हुए यह चाहा कि जो कुछ वह कहे वह उन यहूदियों पर भी लागू हो जो अब तक यरूशलेम में रह गए थे, और जो अपनी दशा को बहुत सौभाग्यपूर्ण समझते थे, क्योंकि वे अपने राजा और शेष भीड़ के साथ निकाले नहीं गए थे। परन्तु साथ ही उसका उद्देश्य उन दुखी निर्वासितों को भी लाभ पहुँचाना था, जो निराशा में डूब जाते, यदि उनका शोक किसी सीमा तक हलका न किया जाता। जैसा हम देखेंगे, भविष्यद्वक्ता उन्हें अपनी बँधुआई के अन्त की ओर दृष्टि लगाने को कहता है, और इस बीच उन्हें धीरज धरने का उपदेश देता है, और चाहता है कि वे शान्त और मेल से रहें, और जब तक परमेश्वर का हाथ उनके छुटकारे के लिए न बढ़े तब तक कोई उपद्रव खड़ा न करें। वह कहता है कि उसने बचे हुए पुरनियों के पास एक पुस्तक लिखी; क्योंकि उस आयु के बहुत से लोग मर चुके थे; जैसा स्वभाव की माँग है, जो बूढ़े जीवन के अन्तिम छोर के निकट पहुँचते हैं वे पहले मरते हैं; इसलिए वह कहता है कि उसने उन्हें लिखा जो अब तक जीवित बचे थे। इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि उसकी भविष्यद्वाणी उन सब के लिए थी; और फिर भी वह आगे कहता है, “ब्याह करो और सन्तान उत्पन्न करो;” परन्तु यह बात, जैसा हम देखेंगे, उन्हीं तक सीमित रखी जानी चाहिए जो उस समय विवाह के योग्य आयु में थे। तौभी वह बूढ़ों को उस सान्त्वना से वंचित नहीं करना चाहता था जिसके भागी परमेश्वर उन्हें बनाना चाहता था, अर्थात् यह जानकर कि उनकी बँधुआई का अन्त सुखद होगा, यदि वे मन की अधीनता बनाए रखें और परमेश्वर के उस दण्ड को धीरज से सहें जो उन पर न्याय से इसलिए पड़ा था कि उन्होंने इतनी बार और इतने भिन्न-भिन्न प्रकार से उसको क्रोध दिलाया था। फिर वह आगे कहता है, याजकों, और भविष्यद्वक्ताओं, और फिर सारी प्रजा के पास।
परन्तु हमें ध्यान देना चाहिए कि वह केवल प्रजा को ही नहीं, वरन् याजकों और भविष्यद्वक्ताओं को भी धीरज धरने का उपदेश देता है। और यद्यपि, जैसा हम आगे देखेंगे, उनके बीच ऐसे छली भी थे जो झूठा घमण्ड करते थे कि वे भविष्यद्वक्ता हैं, तौभी यह सम्भव है कि यहाँ वे भी सम्मिलित हैं जो परमेश्वर के आत्मा से सम्पन्न थे; या तो इसलिए कि उनमें आत्मा शिथिल पड़ गया था, या इसलिए कि परमेश्वर ने उन्हें सदा हर बात का ज्ञान नहीं दिया था। अतः हो सकता है कि वे भविष्यद्वक्ता, जिन पर परमेश्वर ने यह बात प्रकट नहीं की थी, या जिनके मन विपत्तियों से दबे हुए थे, शिक्षा पाने के योग्य थे।
याजकों के विषय में, हम इससे यह निष्कर्ष निकालते हैं कि उन्होंने आरम्भ ही से अपने पद की उपेक्षा की थी; क्योंकि यदि वे विश्वासयोग्यता से अपना याजकीय पद निभाते, तो वे परमेश्वर के भविष्यद्वक्ता होते; और जब परमेश्वर ने दूसरे भविष्यद्वक्ता चुने, तो यह मानो एक असाधारण बात थी, और याजकों के लिए निन्दा से रहित न थी; क्योंकि जब वे केवल नाम पर घमण्ड करते थे और सत्य से रहित थे, तब वे अवश्य ही भ्रष्ट और आलसी या कपटी हो गए होंगे। अतः यही कारण था कि उन्हें भी प्रजा के साथ मिलकर शिक्षा दी जानी थी। अब आगे यह आता है, —
यिर्मयाह 29:2
2. यह पत्री उस समय भेजी गई जब यकोन्याह राजा और राजमाता और खोजे, और यहूदा और यरूशलेम के हाकिम, और कारीगर और लोहार यरूशलेम से चले गए थे।
2. Postquam egressus fuerat Jechaniah rex et domina (id est, regina, mater ejus,) et proceres, principes Jehudah et Jerusalem, et artifex et sculptor ex Jerusalem; 201 सेप्टुआजिन्ट, वल्गेट और टार्गुम में यही अनुवाद है; परन्तु सिरियक में “पत्री” या चिट्ठी है। इस शब्द का ठीक अर्थ एक वृत्तान्त है; परन्तु क्योंकि वह पुस्तक में या पत्र में समाया रहता है, इसलिए यह प्रायः दोनों के लिए प्रयुक्त होता है। हमारे अनुवाद में निर्गमन 24:7 में इसका अनुवाद “पुस्तक” और 2 शमूएल 11:14 में “चिट्ठी” किया गया है। — सं. 202 अधिक ठीक, “बूढ़े पुरुष;” शब्दशः यह है, “देशान्तरण के वृद्धों के बचे हुओं के पास।” यहाँ अधिकार नहीं, वरन् आयु अभिप्रेत प्रतीत होती है, यद्यपि ग्रोशियस समझता है कि वे महासभा (सन्हेद्रिन) के सदस्य थे। जिस शब्द का साधारणतः अनुवाद “बँधुआई” किया जाता है, और क्रिया के रूप में “बँधुआ करके ले जाना,” उसका ठीक अर्थ है हटाया जाना, देशान्तर करना, और सकर्मक रूप में, हटाना, ले जाना, स्थानान्तरित करना, एक स्थान से दूसरे स्थान में पहुँचाना। बँधुआई का विचार इसमें सम्मिलित नहीं है, यद्यपि कभी-कभी निहित रहता है। — सं.
203 मूल में पिछला व्याख्यान यहीं समाप्त होता है; परन्तु क्योंकि इस अध्याय का पिछले अध्याय से कोई सम्बन्ध नहीं है, इसलिए यहाँ आनेवाली प्रार्थना को पिछले अध्याय के अन्त में रख दिया गया है। — सं.
204 टार्गुम में “शास्त्री” है; सेप्टुआजिन्ट और सिरियक में “झूठे भविष्यद्वक्ता;” और वल्गेट में “भविष्यद्वक्ता।” सम्भवतः वे शिक्षक थे, न कि वे उच्चतर भविष्यद्वक्ता जिन पर दर्शनों का अनुग्रह होता था, और जिन्हें परमेश्वर विशेष सन्देश सुनाने के लिए भेजता था। — सं.
वह उस समय का उल्लेख करता है जब पुस्तक भेजी गई, अर्थात् उस विपत्ति के पश्चात् जो घटी थी, जब राजा यकोन्याह और उसकी माता निर्वासन में भेज दिए गए, और उसका उत्तराधिकारी सिदकिय्याह उसके स्थान पर शासक बनाया गया, जैसा हम अभी देखेंगे। अतः परिवर्तन के इन्हीं आरम्भिक दिनों में यिर्मयाह ने लिखा। उस समय सब बातें ऐसी उथल-पुथल में थीं कि कुछ लोग आवश्यकता से अधिक डरते थे, और दूसरे व्यर्थ आशाएँ बाँधते थे, जैसा अव्यवस्थित परिस्थितियों में प्रायः होता है। अतः इसी नई विपत्ति के पश्चात् यिर्मयाह ने लिखा, जैसा उसके शब्द विशेष रूप से दिखाते हैं। वह सचमुच, जैसा अन्य स्थानों में, वर्ष का उल्लेख कर सकता था; परन्तु क्योंकि वह स्पष्ट रूप से बताता है कि यह यकोन्याह के चले जाने के पश्चात् हुआ, इसलिए उसका उद्देश्य पर्याप्त रूप से प्रकट है, अर्थात् वह ठीक समय पर उन लोगों के शोक में कुछ राहत देना चाहता था, जो उसके नीचे दबकर गिर जाते, यदि परमेश्वर ने एक प्रकार से उनकी ओर अपना हाथ न बढ़ाया होता। क्योंकि हम जानते हैं कि नया शोक सहना कठिन होता है; और इसी कारण उसे कड़वा शोक कहा जाता है; क्योंकि यह एक भारी नई बात थी, जब वे अपने शान्त घोंसलों से बलपूर्वक और अचानक घसीटकर निकाले गए। अतः उस समय यिर्मयाह का उद्देश्य उन्हें कुछ सान्त्वना देना था; उसने यह भी देखा कि जो लोग यहूदिया में छोड़े गए थे वे बहुत व्याकुल थे और निरन्तर नई-नई युक्तियाँ सोचते रहते थे; क्योंकि सिदकिय्याह का राज्य अब तक स्थिर नहीं हुआ था, और वे उसे तुच्छ जानते थे और सदा अपने ही राजा की बाट जोहते रहते थे। अतः जब घर में बातें इस प्रकार अव्यवस्थित थीं, और विशेष करके दुखी निर्वासित आरम्भ में अत्यन्त भारी क्लेश में थे, तब यिर्मयाह ने उनके सामने समयोचित उपाय रखा। अतः यही कारण है कि वह समय बताता है।
हम जानते हैं कि यकोन्याह की माता उसके साथ बँधुआई में ले जाई गई; और वह {,}הגבירהegebire कहलाती है; क्योंकि यद्यपि वह ठीक-ठीक रानी नहीं थी, तौभी वह अपने पुत्र के साथ मिलकर शासन करती थी। कुछ लोग {,}סריסיםsarisim का अनुवाद खोजे करते हैं; परन्तु मैं “प्रधान” शब्द को अधिक उचित समझता हूँ; और इसी कारण {,}שריshari, अर्थात् हाकिम, शब्द जोड़ा गया है, अर्थात् दरबारी, जो न केवल यरूशलेम में, वरन् सारे यहूदिया में प्रजा पर शासन करते थे। वह कारीगरों और नक्काशों को भी जोड़ता है, क्योंकि नबूकदनेस्सर ने उनमें से सर्वोत्तम लोगों को चुन लिया था; उसने नगर को उसके कुलीनों से वंचित कर दिया था, ताकि यहूदियों में अधिकार रखनेवाला कोई न रहे जो कोई नया प्रयत्न करने का साहस करे; और फिर उसने उन लोगों को भी ले लिया था जो उपयोगी और निपुण थे, ताकि उनके पास न कोई नक्काश रहे न कोई कारीगर। अब आगे यह आता है, —
यिर्मयाह 29:3-6
3. यह पत्री शापान के पुत्र एलासा और हिल्किय्याह के पुत्र गमर्याह के हाथ भेजी गई, जिन्हें यहूदा के राजा सिदकिय्याह ने बाबुल में बाबुल के राजा नबूकदनेस्सर के पास भेजा था। उसमें यह लिखा था:
3. Per manum Eleasah filii Saphan et Gamariae filii Helchiae, quos miserat Zedechias rex Jehudah ad Nebhadnezer regem Babylonis Babylonem, dicendo,
4. सेनाओं का यहोवा, इस्राएल का परमेश्वर, उन सब बँधुओं से जिन्हें मैं ने यरूशलेम से बाबुल में बँधुआ करके ले जाने दिया है, यों कहता है:
4. Sic dicit Jehovah exercituum, Deus Israel, universae captivitati quam captivam adduxi e Jerusalem Babylonem,
205 वल्गेट में इसका अनुवाद “शासिका” या स्वामिनी — “domina” है; परन्तु सेप्टुआजिन्ट, सिरियक और टार्गुम में “रानी।” यह उपाधि सबसे अधिक राजमाता को दी जाती थी। — सं.
206 अनुवादों में “खोजे” है, परन्तु टार्गुम में “हाकिम।” इस शब्द का अर्थ है किसी राजा का अधिकारी या सेवक। उत्पत्ति 37:36 में इसका अनुवाद “हाकिम” और एस्तेर 2:3 में “खोजा” किया गया है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि ऐसे अधिकारी प्रायः खोजे होते थे, परन्तु यह शब्द ऐसी किसी बात का बोध नहीं कराता। — सं.
207 अध्याय 24:1 पर टिप्पणी देखिए।
5. घर बनाकर उनमें बस जाओ; बारियाँ लगाकर उनके फल खाओ।
5. AEdificate domos, et inhabitate; plantate hortos, et comedite fructus eorum;
6. ब्याह करके बेटे-बेटियाँ जन्माओ; और अपने बेटों के लिये स्त्रियाँ ब्याह लो और अपनी बेटियाँ पुरुषों को ब्याह दो, कि वे भी बेटे-बेटियाँ जन्माएँ; और वहाँ घटो नहीं, वरन् बढ़ते जाओ।
6. Accipite uxores et generate filios et filias; et accipite filiis vestris uxores, et filias vestras date nuptum viris, ut generent filios et filias; et crescite (aut, multiplicamini) illic, et ne minuamini.
यह सन्देश का सार है, जिसे भविष्यद्वक्ता ने निःसन्देह उन्हें विस्तार से समझाया; परन्तु यहाँ वह जो कुछ उसने बँधुओं को लिखा उसे संक्षेप में ही छूता है, अर्थात् यह कि वे अपने छुटकारे के समय तक धीरज से अपने निर्वासन को सहें, जो वैसा नहीं होनेवाला था जैसा बहुतेरे कल्पना करते थे, वरन् वैसा जैसा परमेश्वर ने ठहराया था। उस समय यिर्मयाह की यह भविष्यद्वाणी न केवल यहूदिया में, वरन् बँधुओं में भी भली-भाँति प्रसिद्ध थी, कि उनका निर्वासन सत्तर वर्ष से कम समय में पूरा नहीं हो सकता।
कहा गया है कि उसने अपनी पत्री राजा के राजदूतों के हाथ भेजी। सम्भव है कि यह सिदकिय्याह की अनुमति से हुआ; क्योंकि इसमें कोई सन्देह नहीं कि अपने राजदूत भेजने में उसका अभिप्राय राजा नबूकदनेस्सर का अनुग्रह पाना था, जिसके संकेत मात्र से वह सिंहासन पर आया था; क्योंकि यद्यपि वह राजवंश का था, तौभी वह इतनी प्रतिष्ठा का नहीं था कि राजा बनाया जाए, यदि नबूकदनेस्सर ने यह न सोचा होता कि यह उसके अपने लिए अधिक लाभदायक होगा। क्योंकि यदि वह यहूदियों पर किसी और को शासक ठहराता, तो सहज ही विद्रोह खड़ा हो सकता था; इसलिए उसने कुछ हद तक उन्हें शान्त करना चाहा, क्योंकि वह जानता था कि वे बहुत ही हठीले लोग थे। तौभी सिदकिय्याह केवल अनुमति से शासन करता था, न अपनी शक्ति से, न अपने धन के कारण, वरन् एक विजेता की प्रसन्नता से। इसलिए उसने अपने राजदूतों को हर प्रकार की अधीनता की प्रतिज्ञा करने के लिए, और यह जानने के लिए भेजा कि आगे क्या करना है। अतः क्योंकि वह यकोन्याह का लौटना नहीं चाहता था, इसलिए उसने अपने राजदूतों को यिर्मयाह की पत्री ले जाने की अनुमति दी, इसलिए नहीं कि वह परमेश्वर की आज्ञा मानना चाहता था। अतः यह धर्म के प्रति किसी सच्चे आदर के कारण नहीं था, वरन् इसलिए कि वह सोचता था कि यह उसके लिए लाभदायक होगा कि यहूदी यकोन्याह की मृत्यु तक कसदियों के देश में बने रहें; क्योंकि इस प्रकार उसे आशा थी कि उसका राज्य दृढ़ हो जाएगा, क्योंकि यकोन्याह मानो उसका प्रतिद्वन्द्वी था। इसमें भी कोई सन्देह नहीं कि नबूकदनेस्सर सिदकिय्याह को इसी बेड़ी से बाँधे रखना चाहता था; क्योंकि वह किसी भी दिन यकोन्याह को, जो उसका बँधुआ था, उसकी पहली दशा में लौटा सकता था।
अब हम समझते हैं कि सिदकिय्याह ने यिर्मयाह की पत्री को बँधुओं तक ले जाए जाने से क्यों नहीं रोका: उसने सोचा कि इससे उसके राज्य में शान्ति बनी रहेगी।
परन्तु पवित्र भविष्यद्वक्ता की दृष्टि में कुछ और ही बात थी; क्योंकि उसका उत्सुक उद्देश्य राजा का अनुग्रह पाना नहीं था, वरन्, जैसा परमेश्वर ने उसे आज्ञा दी थी, यह दिखाना था कि बँधुआई कितनी लम्बी होगी। सिदकिय्याह ने सचमुच यह चाहा होगा कि निर्वासितों को लौटने की अनुमति दी जाए; क्योंकि जो लोग यहूदिया में रह गए थे वे समाज का केवल तलछट और कूड़ा-करकट थे; यह प्रतिष्ठा की दशा न थी: और हो सकता है कि नबूकदनेस्सर के पास राजदूत भेजने में उसके मन में यह भी रहा हो कि यरूशलेम उजाड़ न पड़ा रहे, वरन् निर्वासितों में से कम से कम कुछ लौट आएँ, और कुछ लोग ऐसे भी हों जो उस भूमि को जोतें जो लगभग अपने निवासियों से खाली हो चुकी थी। परन्तु यिर्मयाह ने वह बात घोषित की जिसे वह जानता था कि राजा को कदापि प्रिय न थी, अर्थात् यह कि सत्तर वर्षों के पूरे होने से पहले लौटने की आशा व्यर्थ थी। इससे हम देखते हैं कि उसने राजा का अनुग्रह पाने के लिए कुछ नहीं कहा; और फिर भी राजा ने इसे बुरा नहीं माना कि वह पत्री सब उपद्रवों को शान्त करने के लिए, और उन लोगों के सारे उग्रपन को रोकने के लिए भेजी गई जो अन्यथा कोई नया प्रयत्न करने को बहुत ही प्रवृत्त होते। इसी से इस बात का कारण समझ में आता है कि पत्री एलासा और गमर्याह के हाथ भेजी गई।
वह साथ ही यह भी जोड़ता है कि वे सिदकिय्याह के द्वारा बाबुल को भेजे गए थे, अर्थात् राजा नबूकदनेस्सर का अनुग्रह पाने के लिए, या कम से कम उसकी मित्रता सुरक्षित रखने के लिए। अब मैं स्वयं सन्देश पर आता हूँ: परमेश्वर ने बँधुओं को आज्ञा दी कि वे कसदियों के देश में घर बनाएँ, दाख की बारियाँ लगाएँ, और ब्याह भी करें और सन्तान उत्पन्न करें, मानो वे अपने ही घर में हों। परमेश्वर का यह अभिप्राय सचमुच नहीं था कि वे कसदियों के देश पर अपना मन लगाएँ; इसके विपरीत, उन्हें सदा अपने लौटने का विचार करना था: परन्तु सत्तर वर्षों के अन्त तक परमेश्वर की यह इच्छा थी कि वे शान्त बने रहें, और यह या वह प्रयत्न न करें, वरन् जीवन के कामकाज ऐसे चलाते रहें मानो वे अपने ही देश में हों। अतः जहाँ तक उनकी आशा की बात है, परमेश्वर की इच्छा थी कि छुटकारे के समय तक उनके मन प्रतीक्षा की दशा में रहें।
पहली दृष्टि में ये दोनों बातें परस्पर विरोधी प्रतीत होती थीं, — कि यहूदी सत्तर वर्ष तक ऐसे रहें मानो वे उस स्थान के मूल निवासी हों, और उनके निवास बदले न जाएँ, — और फिर भी वे सदा लौटने की बाट जोहते रहें। परन्तु ये दोनों बातें भली-भाँति एक साथ मेल खा सकती हैं: यह आज्ञाकारिता का प्रमाण था जब उन्होंने स्वीकार किया कि वे परमेश्वर के हाथ से ताड़ना पा रहे हैं, और इस प्रकार सत्तर वर्षों के अन्त तक स्वेच्छा से अधीन बने रहे। परन्तु उनकी आशा, जैसा मैं अभी कह चुका हूँ, प्रतीक्षा में बनी रहनी थी, ताकि वे असन्तोष से व्याकुल न हों, न किसी उग्र भावना में बह जाएँ, वरन् अपना समय ऐसे बिताएँ कि अपना निर्वासन इस रीति से सहें जिससे परमेश्वर प्रसन्न हो; क्योंकि लौटने की निश्चित आशा थी, यदि वे परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सत्तर वर्षों के अन्त की बाट जोहते रहें। अतः यही वह विषय है जिस पर यिर्मयाह अब बोलता है, जब वह कहता है, घर बनाकर उनमें बस जाओ; दाख की बारियाँ लगाकर उनका फल खाओ। क्योंकि यह सारा प्रवचन निर्वासन के समय से सम्बन्ध रखता है, क्योंकि वह उनके लौटने के विषय में पहले ही कह चुका था; और यह हम उसके उचित स्थान पर देखेंगे।
परन्तु यहूदी किसी भली बात की आशा नहीं कर सकते थे, जब तक वे इतने अधीन न हों कि अपनी ताड़ना को सह लें, और इस प्रकार सचमुच प्रमाणित करें कि उन्होंने अपने ऊपर रखे गए दण्ड को अस्वीकार नहीं किया।
अब हम देखते हैं कि यिर्मयाह ने यहूदियों को भोग-विलास में लिप्त होने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया, न उन्हें कसदियों के देश में सदा के लिए बस जाने को मनाया। वह सचमुच एक उपजाऊ और मनोहर देश था; परन्तु उसने उन्हें वहाँ विलास में रहने, अपने आप को सुख में डुबोने और अपने देश को भूल जाने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया; कदापि नहीं: वरन् उसने जो कुछ कहा उसे बँधुआई के समय तक, अर्थात् सत्तर वर्षों के अन्त तक सीमित रखा। अतः उस समय के दौरान वह चाहता था कि वे कसदियों के देश और उसकी सब सुविधाओं का आनन्द ऐसे लें मानो वे निर्वासित नहीं वरन् उस स्थान के मूल निवासी हों। किस उद्देश्य से? इसलिए नहीं कि वे आलस्य में पड़ जाएँ, वरन् इसलिए कि वे उपद्रव खड़ा करके परमेश्वर को अप्रसन्न न करें, और एक प्रकार से अपने ही विरुद्ध उसके अनुग्रह का द्वार बन्द न कर लें, क्योंकि जो समय उसने ठहराया था उसकी बाट जोहनी थी। क्योंकि जब हम किसी प्रबल अभिलाषा से अन्धाधुन्ध दौड़ाए जाते हैं, तब हम एक प्रकार से परमेश्वर के अनुग्रह को दूर हटा देते हैं; तब हम उसे वैसा कार्य करने नहीं देते जैसा उसे शोभा देता है: और जब हम उससे उसके अपने अधिकार और इच्छा छीन लेते हैं, तो यह ऐसा ही है मानो हम उसका अनुग्रह ग्रहण करना नहीं चाहते। यदि वे कसदियों के देश में परमेश्वर के द्वारा ठहराए गए समय के अन्त तक अपनी विपत्ति को शान्ति और अधीनता से न सहते, तो यही उनकी दशा होती।
अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता का सन्देश केवल निर्वासन के समय से सम्बन्ध रखता था; और हम यह भी समझते हैं कि उसका उद्देश्य क्या था, अर्थात् उन्हें परमेश्वर के आज्ञाकारी बनाना, ताकि वे इस प्रकार अपने धीरज से दिखाएँ कि उन्होंने सचमुच पश्चाताप किया है, और यह भी कि वे केवल परमेश्वर के अनुग्रह के द्वारा ही, और किसी रीति से नहीं, लौटने की आशा रखते थे।
अपने बेटों के लिए स्त्रियाँ ब्याह लेने और अपनी बेटियों का ब्याह कर देने की आज्ञा देने में वह स्वभाव की साधारण रीति के अनुसार बोलता है; क्योंकि जवान पुरुषों और जवान स्त्रियों का अपनी ही रुचि और कल्पना के अनुसार अपने लिए साथी ढूँढ़ना सर्वथा अनुचित होगा। अतः परमेश्वर यहाँ बातों की सामान्य रीति के अनुसार बोलता है, जब वह आज्ञा देता है कि जवान पुरुष माता-पिता की सम्मति के बिना किसी और रीति से विवाह-बन्धन में न बँधें, और जवान स्त्रियाँ उन्हीं से ब्याह करें जिन्हें वे दी जाएँ।
फिर वह आगे कहता है, वहाँ बढ़ते जाओ और घटो नहीं; मानो उसने कहा हो कि निर्वासन का समय इतना लम्बा होगा कि यदि वे सन्तान उत्पन्न न करें तो शीघ्र ही मिट जाएँगे: और परमेश्वर ने यह इसलिए व्यक्त किया क्योंकि उसकी यह इच्छा न थी कि अब्राहम का वंश लुप्त हो जाए। यह सचमुच एक प्रकार की मृत्यु थी, जब उसने उन्हें इतनी दूर खदेड़ दिया था, मानो उसने उन्हें उस निज भाग से वंचित कर दिया हो जिसके सदा बने रहने की उसने प्रतिज्ञा की थी: तौभी वह यहाँ उन्हें अपना वंश बढ़ाने की आज्ञा देकर सान्त्वना देता है: क्योंकि यदि उनकी आँखें लौटने की आशा पर न लगी होतीं, तो उन्हें ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जा सकता था। अतः जब उसने उन्हें कसदियों के देश में घटने न देने की आज्ञा दी, तब उसने उन्हें अपनी दया का कुछ स्वाद चखाया। फिर वह आगे कहता है, —
यिर्मयाह 29:7
7. परन्तु जिस नगर में मैं ने तुम को बँधुआ कराके भेज दिया है, उसके कुशल का यत्न किया करो, और उसके हित के लिये यहोवा से प्रार्थना किया करो। क्योंकि उसके कुशल से तुम भी कुशल से रहोगे।
7. Et quaerite pacem urbis ad quam transtuli vos illuc (sed abundat), et orate pro ea Jehovam, quia in pace ejus erit vobis pax.
यिर्मयाह और भी आगे बढ़ता है, अर्थात् यह कि यहूदी इस शर्त पर बाबुल में ले जाए गए थे कि वे राजा नबूकदनेस्सर के अधिकार के प्रति स्वेच्छा से आज्ञाकारिता दिखाएँ, और अपनी प्रार्थनाओं के द्वारा इसकी गवाही दें। वह उन्हें केवल अपने ऊपर रखे गए दण्ड को धीरज से सहने की ही आज्ञा नहीं देता, वरन् यह भी कि वे अपने विजेता की विश्वासयोग्य प्रजा बनें; वह उन्हें केवल राजद्रोही होने से मना ही नहीं करता, वरन् चाहता है कि वे मन से आज्ञा मानें, ताकि परमेश्वर उनकी स्वेच्छापूर्ण अधीनता और आज्ञाकारिता का साक्षी हो।
वह कहता है, नगर के कुशल का यत्न करो; यह प्रार्थनाओं के विषय में समझा जा सकता है; क्योंकि {,}דרש daresh का अर्थ प्रायः प्रार्थना करना होता है: परन्तु, जैसा मैं समझता हूँ, यहाँ इसे प्रजा के आचरण के सम्बन्ध में लेना उचित है, मानो उसने कहा हो कि यहूदी जो कुछ कर सकें करें, अपनी पूरी शक्ति लगाएँ, कि कसदी राज्य को कोई हानि न पहुँचे; क्योंकि आगे उन्हें प्रार्थना करने की आज्ञा दी गई है। हो सकता है कि वही बात दूसरे शब्दों में दोहराई गई हो; परन्तु यदि कोई इस विषय को अधिक पूर्णता से तौले, तो मैं समझता हूँ कि वह मेरी कही हुई बात से सहमत होगा, कि पहले वाक्यांश में भविष्यद्वक्ता उन्हें राजा नबूकदनेस्सर और उसके राज्य के प्रति विश्वासयोग्य रहने की आज्ञा देता है। अतः, नगर के कुशल का यत्न करो: कुशल से, जैसा भली-भाँति ज्ञात है, समृद्धि समझनी चाहिए।
परन्तु वह बाहरी प्रयत्नों से सन्तुष्ट नहीं था, वरन् चाहता था कि वे परमेश्वर से प्रार्थना करें कि बाबुल के राजा के लिए सब बातें सफल और सुखद हों, अर्थात् उनके निर्वासन के अन्त तक; क्योंकि हमें स्मरण रखना चाहिए कि भविष्यद्वक्ता की दृष्टि सदा उसी समय पर थी। इससे हम सीखते हैं कि उसने निर्वासितों को उपदेश दिया कि बँधुआई के लिए ठहराए गए समय के दौरान वे बाबुल के राजा का जूआ सहें, क्योंकि उतावली से कुछ भी करने का प्रयत्न करना परमेश्वर से लड़ना था; और इस सीमा तक उसने उन्हें उस अत्याचारी शासन को शान्ति से सहने की आज्ञा दी।
वह फिर वही बात दोहराता है जो उसने कही थी (यद्यपि मैंने उसे छोड़ दिया था), कि वे बँधुआ करके ले जाए गए थे: क्योंकि उसने इसका उल्लेख किया था, “सारी बँधुआई जिसे,” वह कहता है, “मैं ने देशान्तर कराया,” या हटाया, या बँधुआ करके ले गया, “यरूशलेम से।” अब फिर वह वही बात दोहराता है, कि उसी ने उन्हें बँधुआ करके भेजा था, {,}אשו{ }הגליתי asher egeliti; और उसने यह इसलिए कहा कि वे केवल राजा नबूकदनेस्सर के लोभ, या महत्त्वाकांक्षा, या घमण्ड पर ही दृष्टि न करें, वरन् अपनी आँखें स्वर्ग की ओर उठाएँ, और नबूकदनेस्सर को परमेश्वर का कोड़ा, और अपने निर्वासन को अपने पापों की ताड़ना मानें। इस प्रकार परमेश्वर ने गवाही दी कि वही उनके निर्वासन का कर्ता था, ताकि यहूदी यह न सोचें कि उनका सम्बन्ध एक नश्वर मनुष्य से है, वरन् इसके विपरीत, समझ लें कि यदि वे इस कारण कुड़कुड़ाएँ और शिकायत करें कि वे एक विदेशी राजा के अत्याचार के अधीन रहते हैं, तो वे पैने पर लात मार रहे हैं।
अतः इसलिए कि वे व्यर्थ विचारों से व्याकुल न हों, परमेश्वर सामने आकर कहता है कि यह निर्वासन उसके धर्मी न्याय के द्वारा उन पर डाला गया था, ताकि वे जान लें कि अपने हठ से उन्हें कुछ लाभ न होगा, और वे किसी चिन्ताभरी बेचैनी से व्याकुल न हों, न कोई नया काम करने का साहस करें, क्योंकि यह परमेश्वर का विरोध करना, और मानो स्वर्ग से युद्ध छेड़ना होगा। मैं यहीं समाप्त करता हूँ।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, ऐसा अनुग्रह कर कि हम तेरी आज्ञा मानने के अधिकाधिक अभ्यस्त होते जाएँ, और जब कभी तू अपने कोड़ों से हमें ताड़ना दे, तब हम अपने विवेक को जाँचें, और दीनता और गिड़गिड़ाहट के साथ तेरे क्रोध को टालने की विनती करें, और कभी सन्देह न करें कि अपने पितृ-हाथ से हमें ताड़ना देने के पश्चात् तू हम पर कृपालु होगा; और हम इस प्रकार तेरी पितृ-सुलभ करुणा पर टिके रहें, कि शान्त मन से सदा उस अन्त की बाट जोहते रहें जिसकी तू ने हम से प्रतिज्ञा की है, जब तक वह प्रकट न हो जाए; और जब इस वर्तमान जीवन का संघर्ष समाप्त हो जाए, तब हम उस धन्य विश्राम तक पहुँचें जो हमारे लिए स्वर्ग में तैयार किया गया है, हमारे प्रभु मसीह के द्वारा। —
आमीन।
208 “नगर के कुशल का यत्न करना” निःसन्देह अपने प्रयत्नों से उसे बढ़ाना, और उसकी रक्षा करने में सावधान रहना था। व्यवस्थाविवरण 11:12 में “देश की सुधि लेना” उसकी चिन्ता करना था; अय्यूब 3:4 में “दिन की सुधि न लेना” उसका आदर न करना था। अतः “नगर के कुशल का यत्न करना” उसकी चिन्ता करना, या उसका ध्यान रखना था, कि उसे बढ़ाने के लिए सब कुछ किया जाए। मोर्दकै के विषय में कहा गया है कि वह “अपने लोगों की भलाई (अधिक ठीक, हित) का यत्न करता था।” (एस्तेर 10:3) उसका सारा आचरण इसका प्रमाण था। “किसी की हानि का यत्न करना,” जैसा भजन संहिता 38:12 में है, उसके लिए प्रार्थना करना नहीं, वरन् उसे पूरा करने के लिए सब साधन काम में लाना था। अतः कैल्विन द्वारा दिया गया पहला अर्थ ही ठीक है। — सं.
209 इसका शाब्दिक अर्थ है, “जिन्हें मैं ने हटाया है,” या दूसरी जगह रोप दिया है; सेप्टुआजिन्ट में “घर से हटाया,” वल्गेट में “स्थानान्तरित किया,” टार्गुम में “देशान्तर कराया” है। — सं.
एक सौ दसवाँ व्याख्यान
पिछले व्याख्यान में हमने सातवाँ पद समाप्त नहीं किया था, जिसमें भविष्यद्वक्ता कहता है कि यहूदी, जब तक परमेश्वर उन्हें निर्वासित रखना चाहे, बाबुल में ऐसे स्थिर रहें कि उन्हें अपने मेल को ऐसा समझना चाहिए मानो वे एक ही देह के हों। क्योंकि यह कहकर कि बाबुल के कुशल में उनका कुशल होगा, वह संकेत करता है कि जब तक सत्तर वर्ष का समय पूरा न हो जाए, तब तक वे एक अलग प्रजा नहीं समझे जा सकते थे। इसलिए उसने उन्हें बाबुल की समृद्धि के लिए प्रार्थना करने की आज्ञा दी।
पहली दृष्टि में यह कठोर प्रतीत हो सकता है; क्योंकि हम जानते हैं कि कसदियों ने उस दुखी प्रजा के साथ कैसा क्रूर व्यवहार किया था। तो सबसे निर्दय शत्रुओं के लिए प्रार्थना करना अनुचित और किसी भी रीति से अनुपयुक्त प्रतीत हो सकता था। परन्तु भविष्यद्वक्ता यह कहकर इस काम की कठोरता को हलका करता है कि बाबुल की सुखद दशा के लिए प्रार्थना करना उनके लिए लाभदायक होगा, क्योंकि वे उसके भाग्य के साझी थे। हम जानते हैं कि लाभ की सम्भावना हमें मनाने में कितनी प्रभावशाली होती है, क्योंकि हम उसी काम को हाथ में लेने का विचार करते हैं जिसे हम सफल होनेवाला समझते हैं। अतः इसी कारण भविष्यद्वक्ता यहूदियों को सिखाता है कि जब परमेश्वर ने उन्हें बाबुल के लिए प्रार्थना करने की आज्ञा दी, तब उन्हें उस बात को अस्वीकार नहीं करना चाहिए था जो उनसे माँगी गई थी, क्योंकि उस राज्य की समृद्धि उनके लाभ के लिए होगी; वह यह भी संकेत करता है, जैसा मैं पहले ही इशारा कर चुका हूँ, कि वे बाबुल से ऐसे जुड़े हुए थे कि यदि बाबुल पर कोई विपत्ति आती तो वे सब कष्ट और क्लेश से बचे रहने की आशा नहीं कर सकते थे, क्योंकि वे एक ही देह के थे। अब हम भविष्यद्वक्ता का अर्थ समझते हैं।
परन्तु इससे हम एक अत्यन्त उपयोगी शिक्षा निकाल सकते हैं, — कि हमें न केवल उन राजाओं की आज्ञा माननी चाहिए जिनके अधिकार के अधीन हम रहते हैं, वरन् उनकी समृद्धि के लिए प्रार्थना भी करनी चाहिए, ताकि परमेश्वर हमारी स्वेच्छापूर्ण अधीनता का साक्षी हो। क्योंकि यदि यहूदियों का यह कर्तव्य था कि वे इस कारण कसदियों के कल्याण के लिए प्रार्थना करें कि वे कुछ समय के लिए उनके अधिकार के अधीन थे, तो जब हम किसी वैध शासक के अधीन रहते हैं, और वह भी केवल थोड़े दिनों के लिए नहीं, तब हमारे लिए कोई बहाना नहीं, यदि हम परमेश्वर के सामने अपनी स्वेच्छापूर्ण अधीनता की गवाही न दें; और जो उस देश की सुखद दशा के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करता है जिसमें वह रहता है, वह निश्चय ही अपने अन्य कर्तव्यों की उपेक्षा नहीं करेगा। मुख्य बात सचमुच यह है कि हम परमेश्वर के सामने गवाही दें कि हमारी भावना क्या है; और फिर अन्य बातें भी जोड़ी जानी चाहिए, जैसे आज्ञाकारिता के सब कर्तव्यों और इसी प्रकार की हर बात को करने की तत्परता। अब आगे यह आता है, —
यिर्मयाह 29:8
8. क्योंकि इस्राएल का परमेश्वर सेनाओं का यहोवा तुम से यों कहता है, कि तुम्हारे जो भविष्यद्वक्ता और भावी कहनेवाले तुम्हारे बीच में हैं, वे तुम को बहकाने न पाएँ, और जो स्वप्न वे तुम्हारे निमित्त देखते हैं उनकी ओर कान मत लगाओ।
8. Quoniam sic dicit Jehova exercituum, Deus Israel, Ne decipiant vos prophetae vestri, qui sunt in medio vestri, et divini vestri; et ne attendatis ad somnia vestra, quae vos somniatis.
जैसा हम देख चुके हैं, लगभग सब के मन उस व्यर्थ और झूठे भरोसे से भरे हुए थे जो उन्होंने झूठी भविष्यद्वाणियों से ग्रहण किया था, कि वे दो वर्ष के पश्चात् लौट आएँगे; इसलिए भविष्यद्वक्ता यह उत्तर देता है, और उन्हें ऐसे छलों से सावधान रहने का स्मरण दिलाता है। और इस प्रकार हम देखते हैं कि किसी के लिए केवल यह सिखाना पर्याप्त नहीं कि क्या ठीक है, जब तक वह उन लोगों को भी भ्रम से वापस न लाए जो पहले ही धोखा खा चुके हैं या धोखा खाने के संकट में हैं। क्योंकि सत्य का प्रतिपादन करना शिक्षा के पद का केवल आधा भाग है, क्योंकि शैतान अपने सेवकों को सदा इस ओर ले जाता है कि वे शुद्ध सिद्धान्त को झूठ से भ्रष्ट करें। अतः स्वयं सत्य की घोषणा करना पर्याप्त नहीं, जब तक शैतान के सब छल भी छिन्न-भिन्न न किए जाएँ; इसका आज के दिन पोप-तन्त्र में एक प्रत्यक्ष उदाहरण है; क्योंकि वहाँ लगभग सब के मन अनेक भ्रष्ट आविष्कारों से मतवाले हैं, इसलिए यदि कोई केवल यह दिखाए कि यह या वह ठीक है, तो वह निश्चय ही इस रीति से मनुष्यों के हृदयों से भ्रमों को उखाड़ न सकेगा। और इसी कारण पौलुस अध्यक्षों को आज्ञा देता है कि वे न केवल सिद्धान्त से सुसज्जित हों, जिससे सिखाने योग्य लोगों को सही मार्ग दिखाएँ, वरन् ऐसे शस्त्र-सज्जित भी हों कि विरोधियों का सामना कर सकें और उनके मुँह बन्द कर सकें। (तीतुस 1:9)
210 “किसी नगर या देश की शान्ति के लिए, और शासकों के स्वास्थ्य या अनन्त उद्धार के लिए प्रार्थना करना, उनके महत्त्वाकांक्षी, लोभी या रक्तपात भरे उपक्रमों की सफलता की कामना करने से बहुत भिन्न है; यद्यपि इस भेद पर साधारणतः ध्यान नहीं दिया जाता।” — स्कॉट।
अतः क्योंकि जगत के आरम्भ से शैतान ने, जहाँ तक उससे हो सका, परमेश्वर के सत्य को भ्रष्ट करने, या उसे अन्धकार में डुबो देने का प्रयत्न और चेष्टा करना कभी नहीं छोड़ा, इसलिए परमेश्वर के सेवकों के लिए सदा यह आवश्यक रहा है कि वे ये दो काम करने को तैयार रहें, — नम्र और दीन लोगों को विश्वासयोग्यता से सिखाना, — और सत्य के शत्रुओं का साहस से विरोध करना और उनकी ढिठाई को तोड़ना। यही वह नियम है जिसका भविष्यद्वक्ता अब पालन करता है; उसने यहूदियों को उपदेश दिया था कि जिस अत्याचार के वे अधीन थे उसे धीरज से सहें, क्योंकि वह परमेश्वर का जूआ था; परन्तु दूसरी ओर, क्योंकि झूठे भविष्यद्वक्ता घमण्ड करते थे कि दो वर्ष में लौटना होगा, इसलिए उसके लिए उनका विरोध करना आवश्यक था; अतः इसी विषय पर वह अब बोलता है।
और इसलिए कि जो कुछ वह कहने जा रहा था उसका अधिक प्रभाव हो, वह फिर परमेश्वर के नाम से बोलता है, तुम्हारे जो भविष्यद्वक्ता तुम्हारे बीच में हैं वे तुम को बहकाने न पाएँ। क्योंकि जब यिर्मयाह के यरूशलेम में बहुत से विरोधी थे, तब शैतान कसदियों के देश में दुखी निर्वासितों को भी धोखा दे रहा था। इसलिए वह उन्हें चिताता है कि वे इन छलियों पर विश्वास न करें; और यद्यपि वह रियायत के तौर पर उन्हें भविष्यद्वक्ता कहता है जो ऐसे आदरणीय नाम के सर्वथा अयोग्य थे, तौभी बाद में वह निन्दा के तौर पर उन्हें भावी कहनेवाले का नाम देता है। अतः पहला नाम उस बाहरी अंगीकार की ओर संकेत करता है जिस पर वे घमण्ड करते थे, जब वे डींग मारते थे कि वे परमेश्वर के भेजे हुए हैं और उसकी आज्ञाएँ लाए हैं। अतः उसने उन्हें भविष्यद्वक्ता का नाम दिया, परन्तु अनुचित रूप से, या जैसा वे कहते हैं, लाक्षणिक रूप से (catachristically); जैसा आज के दिन भी होता है; क्योंकि हम सदा नामों पर नहीं लड़ते, वरन् उन लोगों को याजक, अध्यक्ष या धर्माध्यक्ष कहते हैं जो इतने पशुवत हैं कि उन्हें मनुष्यों में भी नहीं गिना जाना चाहिए। इसी प्रकार, जैसा पहले भी बहुधा प्रकट हो चुका है, भविष्यद्वक्ता स्वतन्त्रता से बोलते थे, और उन लोगों को भविष्यद्वक्ता कहने में कभी संकोच नहीं करते थे जिन्होंने प्रजा में पहले ही कुछ प्रतिष्ठा पा ली थी। परन्तु इसलिए कि वे ऐसी झूठी डींग पर घमण्ड न करें, उसने बाद में उन्हें दूसरे नाम से पुकारा; उसने उन्हें भावी कहनेवाले, और फिर स्वप्न देखनेवाले कहा; और बाद में वह जोड़ता है, अपने स्वप्नों की ओर कान मत लगाओ। यहाँ वह सारी प्रजा को सम्बोधित करता है; और कुछ थोड़े लोग ऐसे थे जो भविष्यद्वाणी का आत्मा रखने के बहाने और आड़ में भविष्यद्वाणियाँ सुनाते थे।
परन्तु यिर्मयाह ने अकारण ही उस बात को सारी प्रजा पर नहीं लगाया जो थोड़े ही लोगों से सम्बन्ध रखती थी; क्योंकि हम जानते हैं कि शैतान के सेवक केवल मनुष्यों के मूर्खतापूर्ण भोलेपन से ही नहीं, वरन उनकी भ्रष्ट लालसा से भी पाले-पोसे जाते हैं। क्योंकि संसार कभी धोखा नहीं खाता जब तक वह स्वयं धोखा खाना न चाहे; और मनुष्य, मानो अपने ही विनाश के लिए सौंप दिए गए हों, चारों ओर अपने लिए झूठ ढूँढ़ते फिरते हैं, और यद्यपि वे धोखा खाना नहीं चाहते, तौभी अधिकतर वे धोखा खाने ही की खोज में रहते हैं। यदि कोई पूछे, क्या संसार धोखा खाना चाहता है? तो छोटे से लेकर बड़े तक सब चिल्ला उठेंगे कि वे किसी बात से इतना नहीं बचते और इतना नहीं डरते जितना इससे; तौभी ऐसा क्यों है कि ज्योंही शैतान कोई संकेत देता है, वह भारी भीड़ को अपनी ओर खींच लेता है? इसका कारण यही है कि हम स्वभाव ही से झूठी और व्यर्थ बातों की ओर झुके हुए हैं। फिर एक और बुराई यह है कि हम ज्योति की अपेक्षा अन्धकार को अधिक पसन्द करते हैं।
सो यिर्मयाह ने प्रजा के साथ कोई अन्याय नहीं किया जब उसने उनसे कहा कि उन स्वप्नों से सावधान रहो जो वे स्वयं देखते थे।
कुछ लोग तो {,}מחלמיםmechelmim को सकर्मक अर्थ में लेते हैं, मानो यह हिफ़िल में हो, और तब यहाँ इसे {,}מחלימיםmechelimim लिखा जाना चाहिए था; परन्तु इसे अकर्मक रूप में भी लिया जा सकता है।
चाहे जो हो, भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय संदिग्ध नहीं है; क्योंकि वह यह दोष सब यहूदियों पर लगाता है कि वे व्यर्थ स्वप्नों से धोखा खा गए थे, और यह दोष थोड़े से ठगों तक ही सीमित नहीं किया जा सकता था, क्योंकि यह बुराई उन सब में समान रूप से फैली हुई थी।
और सर्वनाम {,}אתםatere बल देनेवाला है: तुम, वह कहता है, स्वप्न देखते हो; क्योंकि वह इन झूठे स्वप्नों को भविष्यद्वाणियों के विरोध में रखता है। हम जानते हैं कि प्राचीन काल में परमेश्वर अपनी इच्छा या तो दर्शनों के द्वारा या स्वप्नों के द्वारा प्रगट करता था। सो ऐसे स्वप्न भी थे जो ईश्वरीय थे, जिनका रचयिता परमेश्वर था। परन्तु वह यहाँ दिखाता है कि प्रजा ने ये सारे छल अपने ही लिए गढ़ लिए थे, इसलिए उन्हें इस बात का बहाना करने से कुछ लाभ न था कि वे भविष्यद्वक्ता हैं, परमेश्वर के व्याख्याता हैं, और जो कुछ वे सुनाते हैं वह उन्हें स्वप्नों के द्वारा मिला है; क्योंकि अन्तर इसी बात में है कि कोई अपने ही मस्तिष्क से स्वप्न देखता है, या परमेश्वर स्वप्न में उस पर वह बात प्रगट करता है जिसे ईश्वरीय वाणी माना जाना चाहिए। अब हम भविष्यद्वक्ता का उद्देश्य समझ गए हैं। आगे लिखा है,—
यिर्मयाह 29:9
9. क्योंकि वे मेरे नाम से तुम को झूठी भविष्यद्वाणी सुनाते हैं; मैं ने उन्हें नहीं भेजा, यहोवा की यही वाणी है।
9. Quoniam fallaciter (vel, in mendacio) ipsi prophetant vobis in nomine meo; non misi eos, dicit Jehova.
211 सब प्राचीन अनुवाद, और तर्गुम भी, इस उपवाक्य का अनुवाद यों करते हैं, “तुम्हारे स्वप्न जो तुम देखते हो।” स्वप्न देखना इब्रानी में एक सामान्य मुहावरा है। यहाँ स्वप्नों के लिए प्रयुक्त संज्ञा का ऐसा कोई उदाहरण नहीं जिसमें उसका अर्थ स्वप्न देखनेवाले हो, जैसा ब्लेनी इसका अनुवाद करता है; यिर्मयाह 27:9 में हमारे अनुवाद का हाशिये का पाठ निःसन्देह ठीक है, क्योंकि अन्य हर स्थान में इस शब्द का अनुवाद “स्वप्न” ही किया गया है; और जब इसका अर्थ “स्वप्न देखनेवाले” होता है तब यह शब्द दूसरे रूप में आता है, देखिए भजन संहिता 126:1। अन्तिम शब्द हिफ़िल रूप में केवल यहीं पाया जाता है; परन्तु इस रूप का अर्थ सदा प्रेरणार्थक नहीं होता, और न यहाँ ऐसा प्रतीत होता है। तब यह उपवाक्य यों होगा, “और न अपने उन स्वप्नों पर ध्यान दो जो तुम देख रहे हो।” — सं.
वह जो कुछ उसने कहा था उसे इस कारण से पुष्ट करता है कि वे बिना बुलाए दौड़ पड़े थे, जैसा हमने यिर्मयाह 23:21 में पाया। सो वह इन झूठे भविष्यद्वक्ताओं को अस्वीकार करता है, क्योंकि वे परमेश्वर के मुख से नहीं बोलते थे। परन्तु जब वे बड़े आडम्बर से परमेश्वर का नाम लेते थे और यह दावा करते थे कि वे केवल वही बातें सामने रखते हैं जो उन्होंने उससे सीखी हैं, तब यह अन्तर बहुत धुँधला और अस्पष्ट हो गया; तौभी, जैसा हम अन्यत्र कह चुके हैं, कोई भी धोखा नहीं खा सकता जब तक वह स्वयं जान-बूझकर और चाहकर धोखा न खाए; क्योंकि परमेश्वर अपने विश्वासयोग्य लोगों को परख की आत्मा से कभी वंचित नहीं छोड़ता, बशर्ते वे अपने सच्चे और वैध सेवकों से शिक्षा पाने के लिए स्वयं को हृदय से और सच्चाई से अर्पित करें। फिर यहूदियों को चाहिए था कि वे सब शिक्षाओं और सब भविष्यद्वाणियों को व्यवस्था के नियम से जाँचते। और यदि व्यवस्था को समझना कठिन था, तो जैसा मैंने कहा है, उन्हें परमेश्वर से बुद्धि और परख की आत्मा माँगनी चाहिए थी।
सो यिर्मयाह ने अकारण ही उन सब बातों को अस्वीकार नहीं किया जिन पर झूठे भविष्यद्वक्ता प्रजा की स्वीकृति और वाहवाही पाने के लिए घमण्ड करते थे; क्योंकि वे न तो परमेश्वर के भेजे हुए थे और न उसके द्वारा स्वीकृत थे। इसी प्रकार आज भी, जो कोई उन विविध शिक्षाओं के बीच निश्चय के साथ भेद करना चाहता है जिनसे संसार विचलित, वरन हिल रहा है, वह बिना कठिनाई अपना लक्ष्य पा सकता है, बशर्ते वह स्वयं को मसीह के शिष्य के रूप में अर्पित करे, और व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं को सुसमाचार से जोड़े, और सब शिक्षाओं को परखने के लिए इसी नियम का उपयोग करे; और बशर्ते इस बीच वह अपनी ही तीक्ष्ण बुद्धि पर भरोसा न रखे, वरन स्वयं को परमेश्वर के अधीन करे और उससे न्याय और विवेक की आत्मा माँगे। यह भी ध्यान देने योग्य है कि इसी रीति से झूठे भविष्यद्वक्ताओं का पूरी तरह भण्डाफोड़ किया जा सकता है जब हम इस प्रकार दिखाते हैं कि वे परमेश्वर के भेजे हुए नहीं हैं; और जब हम यह सिद्ध करते हैं कि उनकी शिक्षा व्यवस्था और सुसमाचार से मेल नहीं खाती, तब हम उन्हें और भी अधिक व्यर्थता का दोषी ठहराते हैं।
चाहे जो हो, यह सिद्धान्त थामे रहना चाहिए कि किसी की बात पर ध्यान न दिया जाए, केवल उन्हीं की जो यह दिखा सकें कि वे परमेश्वर की ओर से सन्देश लाते हैं और उसके वचन से सुसज्जित हैं। हम अन्यत्र कह चुके हैं कि किसी को परमेश्वर का भेजा हुआ माना जाए, इसके लिए आवश्यक है कि पहले तो वह ठीक रीति से बुलाया गया हो, और दूसरे, वह अपना पद विश्वासयोग्यता से निभाए; क्योंकि जो कोई परमेश्वर की आज्ञा के बिना अपने आप को घुसा देता है, चाहे वह सच्ची और पवित्र बात ही क्यों न कहे, तौभी वह भविष्यद्वक्ता या शिक्षक कहलाने के योग्य नहीं; और फिर विश्वासयोग्यता और खराई के बिना बुलाहट भी पर्याप्त नहीं होगी। परन्तु यिर्मयाह यहाँ मुख्यतः इस बात पर बल देता है कि जो लोग प्रजा से थोड़े ही समय में लौटने की प्रतिज्ञा करते थे वे परमेश्वर के मुख से नहीं बोलते थे: वे मेरे नाम से, वह कहता है, झूठी भविष्यद्वाणी करते हैं; कैसे?
क्योंकि मैं ने उन्हें नहीं भेजा। आगे लिखा है—
यिर्मयाह 29:10
10. क्योंकि यहोवा यों कहता है, कि बाबुल के सत्तर वर्ष पूरे होने पर मैं तुम्हारी सुधि लूँगा, और अपना मनभावना वचन तुम्हारे विषय में पूरा करूँगा, कि तुम्हें इस स्थान में लौटा ले आऊँ।
10. Quia sic dicit Jehova, secundum mensuram (nam {}מלאתaccipitur metaphorice pro mensura; sed adhuc aspera esset loquutio, ideo simplicius vertendum est, quia ubi impleti fuerint) in Babylone septuaginta anni, visitabo vos, et suscitabo super vos sermonem meum bonum, ut reducam vos ad locum hunc.
उन स्वप्नों का भण्डाफोड़ करने के लिए जिनसे झूठे भविष्यद्वक्ताओं ने प्रजा को मतवाला कर दिया था, वह फिर वही बात दोहराता है जो उसने कही थी, कि सत्तर वर्ष के अन्त से पहले उनकी बँधुआई के अन्त की आशा नहीं की जा सकती। और शिक्षा देने की इस रीति पर विशेष ध्यान देना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर का सत्य उन सब धुन्धों को छिन्न-भिन्न करने में सदा समर्थ रहेगा जिनमें शैतान शुद्ध सत्य को लपेटने से कभी नहीं रुकता। सो जैसे हम पहले देख चुके हैं कि जब प्रजा किसी भ्रम से भर जाए, तो उसका साहस से विरोध करना चाहिए, वैसे ही अब हम देखते हैं कि परमेश्वर के सब सेवकों को किन हथियारों से लड़ना चाहिए, ताकि वे उन सब छलों का भण्डाफोड़ करें जिनसे शुद्ध शिक्षा पर आक्रमण होता है, अर्थात् उनके विरोध में परमेश्वर का वचन रखकर; क्योंकि यही वह मार्ग है जो यिर्मयाह अपने उदाहरण से हमें दिखाता है। वह झूठे भविष्यद्वक्ताओं के विषय में बोल चुका था, उसने प्रजा को चिताया था कि उनका विश्वास न करें; परन्तु क्योंकि बहुतों के मन अब भी डाँवाडोल थे, इसलिए वह अपनी कही हुई बात को पुष्ट करता है कि वे परमेश्वर के भेजे हुए नहीं थे, क्योंकि परमेश्वर अपनी युक्ति में कभी डगमगाता नहीं, और कभी नहीं बदलता, और कभी अपने आप से असंगत नहीं होता: “उसने अब तुम्हारी बँधुआई के लिए सत्तर वर्ष ठहरा दिए हैं; इसलिए जो कोई उस सत्य का खण्डन करने का प्रयत्न करता है, वह परमेश्वर का घोषित और खुला शत्रु है।” अब हम भविष्यद्वक्ता का उद्देश्य समझते हैं; सो जब सत्तर वर्ष पूरे होंगे, इत्यादि।
भविष्यद्वक्ता यहाँ यहूदियों पर रोक लगाता है, कि वे समय से पहले उतावली न करें; और फिर वह उन्हें लौटने की आशा देता है, बशर्ते वे परमेश्वर के ठहराए हुए अन्त तक शान्ति से ठहरे रहें। सो इस पद में दो बातें हैं,—एक यह कि यदि प्रजा उतावली करती और सत्तर वर्ष के अन्त से पहले ही अपने लिए लौटने की प्रतिज्ञा कर लेती, तो वह अपनी भलाई का बुरा विचार करती,—और दूसरी यह कि जब वह समय पूरा हो जाता, तो लौटने की आशा निश्चित होती, क्योंकि परमेश्वर ने ऐसी ही प्रतिज्ञा की थी।
वह आगे कहता है, और मैं अपना भला वचन तुम्हारे विषय में खड़ा करूँगा। भले वचन से उसका अभिप्राय उस बात से है जो यहूदियों को आनन्द दे सकती थी। यद्यपि परमेश्वर का वचन अविश्वासियों के लिए घातक है, तौभी वह अपना स्वभाव कभी नहीं बदलता; वह सदा भला ही बना रहता है। और इसी कारण पौलुस कहता है कि सुसमाचार बहुतों के लिए मृत्यु की गन्ध है, तौभी वह परमेश्वर के सम्मुख सुगन्ध ही है, (2 कुरिन्थियों 2:16;) क्योंकि यह नाश होनेवालों ही के दोष पर ठहराया जाना चाहिए कि वे सुसमाचार की शिक्षा को अपने उद्धार के लिए ग्रहण नहीं करते। सो परमेश्वर का वचन सदा भला है: परन्तु यह प्रशंसा अनुभव से सम्बन्धित की जानी चाहिए, अर्थात् जब परमेश्वर वास्तव में यह दिखाता है कि वह हम पर अनुग्रहकारी है। और इससे संक्षिप्त कोई परिभाषा नहीं दी जा सकती कि भला वचन उन प्रतिज्ञाओं को सूचित करता है जिनके द्वारा परमेश्वर अपनी पितृतुल्य कृपा की साक्षी देता है। परन्तु हम अन्यत्र देख चुके हैं कि धमकियों को बुरा वचन कहा गया है: ऐसा क्यों? यह विशेषण, जैसा अभी कहा गया, परमेश्वर के वचन पर उचित रूप से लागू नहीं किया जा सकता; तौभी परमेश्वर का वह वचन जो विनाश की धमकी देता है, बुरा कहलाता है, जैसा लिखा है, “मैं ही भलाई और बुराई का सृजनेवाला हूँ,” (यशायाह 45:7) परन्तु यह उसके प्रभावों के विषय में हमारी समझ के अनुसार ही कहा गया है। और जब हम यह समझ लेते हैं कि परमेश्वर बुराई के वचन से अविश्वासियों को भय से मारता है, परन्तु भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय अब इसके सिवा और कुछ नहीं कि वह यहूदियों के प्रति परमेश्वर की कृपा की साक्षी दे, तब यह सारा तर्क लगभग अनावश्यक-सा प्रतीत होता है: और इसी कारण वह कहता है कि वे अनुभव से जान लेंगे कि जो कुछ परमेश्वर ने पहले कहा था उसकी प्रतिज्ञा उसने व्यर्थ नहीं की थी।
परन्तु कहा गया है कि वह अपने भले वचन को जगाता है, अर्थात् जब उसने उनकी आँखों के सामने अपना प्रभाव उत्पन्न किया; क्योंकि जब परमेश्वर केवल बोलता है, और बात स्वयं अभी प्रगट नहीं होती, तब उसका वचन मानो सोया हुआ और निष्फल-सा प्रतीत होता है। और सत्तर वर्ष तक यहूदी इसके सिवा और कुछ न देख सके कि परमेश्वर उनसे अप्रसन्न है, और इस प्रकार वे निरन्तर भय में रहे; क्योंकि प्रतिज्ञा मानो सोई हुई रही, क्योंकि उसके प्रभाव अभी दिखाई नहीं देते थे। सो कहा गया है कि परमेश्वर अपने वचन को जगाता है, जब वह यह प्रमाणित करता है कि उसने कोई भी प्रतिज्ञा व्यर्थ नहीं की। तात्पर्य यह है कि जो भविष्यद्वाणी यिर्मयाह ने सुनाई थी वह निष्फल न होगी; परन्तु यदि प्रजा इसे शीघ्र न भी जाने, तौभी परमेश्वर, समय आने पर, वास्तव में प्रमाणित करेगा कि वह अपनी प्रजा को धोखा नहीं देता, और न जब वह कोई प्रतिज्ञा करता है तब उन्हें व्यर्थ आशाओं से बहकाता है।
212 शब्दशः ये शब्द हैं, “जब बाबुल में भराव (या, पूर्तियों) के मुख (या छोर) पर सत्तर वर्ष होंगे,” इत्यादि, अर्थात् जब सत्तर वर्ष पूरे हो जाएँगे, और सारी संख्या या माप भर जाएगा। ब्लेनी का अनुवाद है, “निश्चय जब बाबुल में सत्तर वर्ष पूरे हो चुकेंगे।” परन्तु तर्गुम और प्राचीन अनुवादों में {{כי यहाँ “निश्चय” नहीं, वरन “जब” अनूदित किया गया है। — सं.
213 वल्गेट का पाठ भी यही है, “suscitabo — मैं जगाऊँगा,” इत्यादि; और ऐसा ही सेप्टुआजिंट और तर्गुम में है; परन्तु सीरियाई का पाठ है, “मैं दृढ़ करूँगा,” या पुष्ट करूँगा। {{קם का मूल अर्थ है उठना, और हिफ़िल में, जैसा यहाँ है, उठाना, अर्थात् जगाना, जागृत करना; इसका गौण अर्थ है खड़ा होना, और हिफ़िल में खड़ा करना, अर्थात् दृढ़ या पुष्ट करना। पहला भाव सबसे प्रभावशाली है: प्रतिज्ञा का वचन मानो सत्तर वर्ष तक पड़ा और सोया रहा था, और अब उसे जगाया जाना था: “मैं तुम्हारे लिए अपना वही वचन, वह भला वचन, जगाऊँगा।” यही शब्दशः अनुवाद है, सिवाय इसके कि हम क्रिया का गौण अर्थ लें, जो भी बहुत उपयुक्त है, “मैं तुम्हारे लिए पुष्ट करूँगा,” इत्यादि। — सं.
और भविष्यद्वक्ता स्वयं अपनी बात समझाता है, क्योंकि वह कहता है कि परमेश्वर उन्हें उनके अपने देश में लौटा ले आएगा: क्योंकि यही भला वचन था, अर्थात् छुटकारे की प्रतिज्ञा, जैसे कि, प्रजा के अनुभव के अनुसार, वह वचन बुरा, कड़वा और अप्रिय था जब परमेश्वर ने धमकी दी थी कि वह त्यागे हुओं को निकाल फेंकेगा। परन्तु, जैसा मैंने कहा है, यह एक आकस्मिक बात है कि मनुष्य परमेश्वर के वचन को अपने लिए बुरा या अपने विरुद्ध पाते हैं; क्योंकि यह उनके अपने दोष से होता है, न कि वचन के स्वभाव से। आगे लिखा है—
यिर्मयाह 29:11
11. क्योंकि यहोवा की यह वाणी है, कि जो कल्पनाएँ मैं तुम्हारे विषय में करता हूँ उन्हें मैं जानता हूँ, वे हानि की नहीं, वरन कुशल ही की हैं, और अन्त में तुम्हारी आशा पूरी करूँगा।
11. Quia ego cognosco cogitationes meas, quas ego cogito super vos, dicit Jehova, cogitationes pacis, et non in malum; ut dem vobis finem et expectationem.
वह उसी बात को पुष्ट करता है, और बहुत से शब्दों का प्रयोग करता है, क्योंकि पूरी तरह टूटे हुए मनों को उठाना कठिन था। क्योंकि संसार दो अति-विरोधी बुराइयों से ग्रस्त रहता है,—या तो लोग निराशा में डूब जाते हैं, या मूर्खतापूर्ण घमण्ड से बहुत अधिक फूल जाते हैं: वरन कोई संयम है ही नहीं, केवल तब जब हम परमेश्वर के आत्मा से संचालित होकर उसके वचन पर टिकते हैं; क्योंकि जब वे अपने लिए व्यर्थ आशाएँ गढ़ लेते हैं, तब वे तुरन्त बादलों के ऊपर उड़ा लिए जाते हैं, इधर-उधर उड़ते फिरते हैं, और संक्षेप में यह सोचते हैं कि वे स्वर्ग पर चढ़ सकते हैं; यह व्यर्थ और मूर्खतापूर्ण भरोसे की अति है: परन्तु जब वे हताश होते हैं, तब वे पूरी तरह भयभीत होकर गिर पड़ते हैं, वरन चकित और निर्जीव होकर सारी संवेदना खो बैठते हैं, कोई सान्त्वना ग्रहण नहीं करते, और परमेश्वर की प्रतिज्ञा की हुई किसी बात का स्वाद नहीं ले सकते। और ये दोनों बुराइयाँ यहूदियों में स्पष्ट रूप से प्रबल थीं। हम देख चुके हैं कि भविष्यद्वक्ता ने उनके घमण्ड और अहंकार को गिराने के लिए कितना परिश्रम किया; क्योंकि वे सब धमकियों पर हँसते थे, और सदा निश्चिन्त बने रहते थे; यद्यपि परमेश्वर मानो हथियारबन्द हाथ और खींची हुई तलवार से उन्हें निश्चित विनाश की धमकी देता था, तौभी किसी बात ने उन्हें विचलित न किया। और जब वे बँधुआई में खदेड़ दिए गए, तब जब झूठे भविष्यद्वक्ताओं ने उनसे शीघ्र लौटने की प्रतिज्ञा की, तो वे अत्यन्त भोलेपन से विश्वास कर बैठे; जबकि इसी बीच परमेश्वर ने अपने सेवकों के द्वारा उन्हें दिखाया कि वह उन पर अनुग्रह करेगा, और सत्तर वर्ष के बाद उनका छुड़ानेवाला बनेगा; परन्तु वे इन सब बातों के प्रति बहरे थे, वरन उन्होंने इन सब प्रतिज्ञाओं को तिरस्कार के साथ ठुकरा दिया, और कहा, “क्या! परमेश्वर सचमुच मरे हुओं को जिलाएगा!” *
*(यहेजकेल 37:12)
सो यही कारण है कि भविष्यद्वक्ता अब उनके आनेवाले छुटकारे के विषय में इतने विस्तार से बोलता है: यहूदियों को विश्वास दिलाना कठिन था; क्योंकि वे सोचते थे कि वे शीघ्र ही अपने देश को लौट जाएँगे, इसलिए वे विलम्ब सह नहीं सकते थे, और न वह धीरज रख सकते थे जिसकी परमेश्वर ने आज्ञा दी थी। साथ ही, जैसा हम कह चुके हैं, वे पूरी तरह निश्चिन्त थे, क्योंकि झूठे भविष्यद्वक्ताओं ने उनके मनों को व्यर्थ आशाओं से भर दिया था।
इसलिए वह कहता है, जो विचार मैं तुम्हारे विषय में करता हूँ उन्हें मैं जानता हूँ। कुछ लोग सोचते हैं कि परमेश्वर यहाँ भविष्य की बातों के पूर्वज्ञान को ऐसी वस्तु के रूप में अपने लिए दावा करता है जो विशेष रूप से उसी की है; परन्तु यह भविष्यद्वक्ता के अभिप्राय से भिन्न है। इसके विपरीत, यहाँ परमेश्वर की निश्चित युक्ति और उन व्यर्थ कल्पनाओं के बीच एक निहित विरोध है जिनमें यहूदी मग्न रहते थे। यही बात तब अभिप्रेत है जब यशायाह कहता है, “जितना आकाश पृथ्वी से ऊँचा है, उतने ही मेरे विचार तुम्हारे विचारों से दूर हैं,” (यशायाह 55:9) क्योंकि वे मूर्खता से परमेश्वर को अपनी ही धारणाओं से नापने के आदी थे। जब कोई प्रतिज्ञा की जाती थी, तब वे उसकी प्रामाणिकता पर तर्क करते थे, और आसपास की सब परिस्थितियों पर दृष्टि डालते थे; और इस प्रकार वे केवल अपने ही मस्तिष्क से परामर्श करते थे। इसलिए परमेश्वर ने उन्हें डाँटा, और दिखाया कि वे कितनी उलटी रीति से काम कर रहे थे, और कहा कि उसके विचार उनके विचारों से उतने ही दूर हैं जितना आकाश पृथ्वी से। ऐसा ही इस स्थान में भी है, यद्यपि दोनों भाग यहाँ प्रगट रूप से नहीं कहे गए; भविष्यद्वक्ता का उद्देश्य इसके सिवा और कुछ न था कि यह दिखाए कि यहूदियों को चाहिए था कि वे स्वयं को परमेश्वर के हाथ सौंप दें, और यह समझने के लिए इतने चतुर बनने का प्रयत्न न करें कि यह या वह कैसे होगा, वरन इस बात का दृढ़ निश्चय रखें कि जो कुछ परमेश्वर ने ठहरा दिया है वह बदला नहीं जा सकता।
तौभी यह ध्यान देना चाहिए कि वह यहाँ अपनी गुप्त और अगम्य युक्ति के विषय में नहीं बोलता। तो फिर वे विचार कौन से हैं जिनके विषय में यिर्मयाह अब बोलता है? वे प्रजा के छुटकारे से सम्बन्धित थे, जो ठहराए हुए समय के पूरे होने के बाद होना था, क्योंकि परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की थी कि तब वह अपनी कलीसिया पर अनुग्रहकारी होगा। इससे हम देखते हैं कि यहाँ प्रश्न परमेश्वर की गुप्त युक्तियों के विषय में नहीं है, वरन संकेत केवल उस वचन की ओर है जो यहूदियों को भली-भाँति ज्ञात था, अर्थात् यिर्मयाह की उस भविष्यद्वाणी की ओर, जिसके द्वारा उसने पहले से बताया था कि यहूदी सत्तर वर्ष तक निर्वासित रहेंगे, और अन्त में पाएँगे कि उनका दण्ड केवल एक छोटी-सी ताड़ना था, क्योंकि वह केवल कुछ समय के लिए था: सो मैं अपने विचार जानता हूँ। परन्तु फिर भी वह परोक्ष रूप से यहूदियों को दोषी ठहराता है, क्योंकि वे छुटकारे की कोई आशा नहीं रखते थे सिवाय उसके जो उनकी इन्द्रियों की पहुँच में आती थी। सो वह हमें सिखाता है कि सच्ची बुद्धि यह है कि परमेश्वर की आज्ञा मानें, और स्वयं को उसके हाथ सौंप दें; और जब हम उसकी युक्ति को न समझें, तब हमें धीरज और समर्पण के साथ तब तक प्रतीक्षा करनी चाहिए जब तक उचित समय न आ जाए।
वह कहता है कि वे शान्ति के विचार थे, अर्थात् भलाई के। शान्ति, जैसा अक्सर कहा जा चुका है, सुख-समृद्धि के अर्थ में ली जाती है, जैसे यिर्मयाह 29:7 में, “क्योंकि बाबुल की शान्ति ही तुम्हारी शान्ति होगी;” अर्थात् यदि बाबुल समृद्ध हो, तो तुम भी उसी सुख के भागी होगे।
सो अब, इस स्थान में, परमेश्वर घोषणा करता है कि उसके विचार शान्ति के विचार थे, क्योंकि वह अपनी प्रजा के प्रति अपनी पितृतुल्य दयालुता को परिणाम के द्वारा वास्तव में दिखाना चाहता था।
इसके बाद वह आगे कहता है, कि मैं तुम्हें अन्त और प्रतीक्षा दूँ। {,}אחרית achrit से, जिसका अर्थ इब्रानी में अन्तिम वस्तु है, हमें यहाँ अन्त समझना चाहिए, मानो उसने कहा हो कि जब लोग परदेश में खदेड़ दिए गए थे, तब इसे अन्तिम विनाश ही समझा जाता था। क्योंकि यह कोई छोटी परीक्षा न थी जब यहूदी उस देश से वंचित कर दिए गए जो परमेश्वर का विश्राम-स्थान और निवास था; यह ऐसा ही था मानो वे सारी आशा से काट दिए गए हों: सो यह एक प्रकार का परित्याग था, और परित्याग एक प्रकार की मृत्यु थी। परन्तु यहाँ परमेश्वर घोषणा करता है कि वह उनकी बँधुआई का अन्त करेगा, क्योंकि वह केवल कुछ समय के लिए थी। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि जब प्रजा बँधुआई में ले जाई गई तब वह नाश नहीं हुई, वरन केवल परमेश्वर के हाथ से ताड़ना पाई।
214 “विचारों” के लिए प्रयुक्त शब्द का अनुवाद अक्सर “अभिप्राय” या “संकल्प” किया जा सकता है, जैसा कभी-कभी हमारे अनुवाद में किया गया है। परमेश्वर के विचार उसके संकल्प हैं। सो यहाँ भी: “क्योंकि मैं—मैं उन्हीं संकल्पों को जानता हूँ जो मैं तुम्हारे विषय में ठान रहा हूँ, यहोवा की यह वाणी है,—शान्ति के संकल्प, न कि बुराई के लिए, कि तुम्हें इस स्थान में लौटा ले आऊँ।” परमेश्वर ने “इस स्थान में” कहकर अपने आप को यरूशलेम में, मन्दिर में, निवास करनेवाले के रूप में प्रस्तुत किया, जहाँ उसने अपनी उपस्थिति की प्रतिज्ञा की थी। एकवचन “संकल्प” के स्थान पर बहुवचन “संकल्पों” का उल्लेख करने में सम्भवतः उद्देश्य उसकी दृढ़ता और निश्चितता को दिखाना था। इब्रानी लोग कभी-कभी अर्थ को बढ़ाने के लिए बहुवचन का प्रयोग करते थे, जैसे नीतिवचन 9:1 में सिद्ध बुद्धि के लिए “बुद्धियाँ”। तब इस शब्द का अर्थ होगा, “अत्यन्त निश्चित संकल्प;” और अनुवाद में शब्द का शाब्दिक रूप नहीं, वरन उसका अर्थ दिया जाना चाहिए। — सं.
वह प्रतीक्षा जोड़ता है, जिसका अनुवाद जेरोम ने “धीरज” किया है, परन्तु बड़े खींचतान के साथ। निःसन्देह इसमें कोई सन्देह नहीं कि इस दूसरे शब्द के द्वारा भविष्यद्वक्ता ने उस बात को अधिक पूर्णता और स्पष्टता से व्यक्त किया जो उसने पहले शब्द {,}אחריתachrit से अभिप्रेत की थी, अर्थात् वह अन्त जिसकी लालसा या कामना की जाती थी; सो मैं तुम्हें अन्त दूँगा, अर्थात् कि तुम उन प्रतिज्ञाओं का आनन्द लो, जैसी तुम कामना और प्रतीक्षा करते हो, और जैसी तुम्हें आशा रखनी चाहिए, क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें किया है। यहाँ मैं समाप्त करता हूँ।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जब तू ने अनुग्रहपूर्वक हम पर अपना पितृतुल्य प्रेम प्रगट करना चाहा है, और अपने सुसमाचार में प्रतिदिन उसकी साक्षी हमें देता है,—हाँ, यह वरदान दे कि हम अपने भटकनेवाले और भूल करनेवाले विचारों के पीछे चलकर भटक न जाएँ, वरन तेरे सरल सत्य में सन्तुष्ट रहें; और यद्यपि इस संसार में हमें बहुत से संघर्षों के द्वारा परखा जाना है, क्योंकि हमारा जीवन मानो एक निरन्तर युद्ध है, तौभी हम कभी इस बात पर सन्देह न करें कि हमारे प्रभु मसीह के द्वारा स्वर्ग में हमारे लिए एक निश्चित विश्राम तैयार किया गया है।—आमीन।
एक सौ ग्यारहवाँ व्याख्यान
यिर्मयाह 29:12
12. तब उस समय तुम मुझ को पुकारोगे और आकर मुझ से प्रार्थना करोगे और मैं तुम्हारी सुनूँगा।
12. Et invocabitis me et ibitis; et orabitis me, et exaudiam vos.
यिर्मयाह उसी विषय को आगे बढ़ाता है, अर्थात् यह कि यहूदी, परमेश्वर के ठहराए हुए दण्ड को भुगत लेने के बाद, अन्त में अपने देश को लौटेंगे और परमेश्वर को दयालु पाएँगे, और इससे सीखेंगे कि बँधुआई में उनकी ताड़ना उनके लिए लाभदायक सिद्ध हुई। उसने पिछले पद में यह बात पर्याप्त स्पष्टता से समझा तो दी थी, परन्तु अब वह उसकी रीति बताता है; और वह यह होगी कि वे परमेश्वर को पुकारेंगे। वह दो शब्दों का प्रयोग करता है, तुम मुझे पुकारोगे, वह कहता है, और प्रार्थना करोगे। इन दोनों के बीच रखी गई क्रिया {,}הלכתםelcatem को लगभग सब लोग जीवन के सही आचरण से सम्बन्धित मानते हैं, मानो भविष्यद्वक्ता ने कहा हो कि जो लोग पहले अपनी ही अभिलाषाओं के पीछे भटकते थे वे अब परमेश्वर के मार्ग पर, अर्थात् उसकी व्यवस्था में, चलेंगे; परन्तु मुझे यह व्याख्या बहुत खींचतान की प्रतीत होती है। सो मुझे सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता यहाँ परोक्ष रूप से प्रजा की उदासीनता को डाँटता है, कि उन्होंने तुरन्त यह स्वीकार नहीं किया कि वे परमेश्वर के हाथ से ताड़ना पा रहे हैं, ताकि वे उचित समय पर पश्चाताप करते। सो मेरे विचार में, जाना या चलना वही बात है मानो उसने कहा हो, “एक वर्ष की नहीं, वरन सत्तर वर्ष की बँधुआई भुगत लेने के बाद, तब तुम बुद्धिमान होने लगोगे।”
यह केवल आलस्य नहीं वरन मूर्खता थी कि वे परमेश्वर के कोड़ों से ऐसे वश में न हुए कि उसे पुकारें; परन्तु क्योंकि उनका स्वभाव ऐसा अक्खड़ और हठीला था, इसलिए भविष्यद्वक्ता यहाँ संक्षेप में उन्हें स्मरण दिलाता है कि उन्हें वश में करने के लिए बहुत वर्ष आवश्यक थे, क्योंकि बीस या तीस वर्ष पर्याप्त न थे। सो अब हम शब्द {,}הלקelek, चलना, का अभिप्राय समझ गए हैं। तात्पर्य यह है कि परमेश्वर के कोड़ों के अधीन लाभ पाने के बाद वे दीन हो जाएँगे, यहाँ तक कि उसके क्रोध को टालने के लिए विनती करेंगे।
215 सेप्टुआजिंट में ये दोनों शब्द छोड़ दिए गए हैं; वल्गेट का पाठ है “अन्त और धीरज”; तर्गुम का “अन्त और आशा”; सीरियाई का केवल “आशा”। इन शब्दों को अलग-अलग रखना उन्हें मिला देने से अच्छा है, जैसा बहुतों ने किया है: “अन्त” उनके क्लेशों और बँधुआई का था, और “प्रतीक्षा” अपने देश को लौटने की थी,—ये दो बातें पूर्णतः भिन्न हैं, यद्यपि एक ही समय की हैं: “तुम्हें (तुम्हारी बँधुआई का) अन्त और (लौटने की) प्रतीक्षा देने को,” अर्थात् उसकी पूर्ति। यह लक्षणा है, प्रतीक्षा अपने विषय के, अर्थात् प्रतीक्षित वस्तु के स्थान पर रखी गई है। — सं.
216 पहली दो क्रियाएँ सेप्टुआजिंट और तर्गुम में नहीं हैं, और दूसरी सीरियाई में नहीं है। वल्गेट हमारे अनुवाद के अनुसार है, जो शब्दशः इब्रानी ही है: और इसमें पाठान्तर नहीं हैं। यहाँ दूसरी क्रिया, जाना, या आगे बढ़ना, का अर्थ समझना कठिन है। कुछ लोग यह अर्थ देते हैं, “और तुम मुझे पुकारोगे और अपने देश को जाओगे; और तुम मुझ से प्रार्थना करोगे, और मैं तुम्हारी सुनूँगा।” परन्तु सबसे उपयुक्त अर्थ यह प्रतीत होता है,—“और तुम मुझे पुकारोगे, और आगे बढ़कर मुझ से विनती करोगे, और मैं तुम्हारी सुनूँगा।” क्रिया {{הלך आगे बढ़ने, या आरम्भ किए हुए मार्ग पर आगे चलते जाने के अर्थ में प्रयुक्त होती है। देखिए उत्पत्ति 26:13; निर्गमन 19:19। अपने लिए और दूसरों के लिए विनती करना, परमेश्वर को पुकारने से बढ़कर था। पुकारने से वे आगे बढ़कर विनती करने लगेंगे, अर्थात् अपने लिए और दूसरों के लिए गिड़गिड़ाकर याचना करेंगे, और तब प्रतिज्ञा यह है कि परमेश्वर उनकी सुनेगा। — सं.
परन्तु इसके साथ एक प्रतिज्ञा जोड़ी गई है, कि परमेश्वर उनकी सुनेगा। तौभी ऐसा प्रतीत हो सकता है कि परमेश्वर ने पहले उपवाक्य में ही मन फिराव की प्रतिज्ञा की थी; और निःसन्देह प्रार्थना पश्चाताप का फल है, क्योंकि वह विश्वास से निकलती है; और पश्चाताप परमेश्वर का दान है।
और फिर, हम पवित्र आत्मा की अगुवाई और शिक्षा के बिना परमेश्वर को ठीक रीति से और सच्चाई से पुकार नहीं सकते; क्योंकि वही है जो न केवल हमें शब्द सिखाता है, वरन हमारे हृदयों में कराहें भी उत्पन्न करता है। और इसी प्रकार अगस्तीन, पेलेगियसवादियों के विरुद्ध लिखते हुए, इस स्थान को समझता है, और सिद्ध करता है कि न तो अपने आप को फेरना मनुष्य के वश में है और न प्रार्थना करना; “क्योंकि परमेश्वर,” वह कहता है, “उस बात की प्रतिज्ञा व्यर्थ करता जो मनुष्य के अपने वश में हो; और प्रतिज्ञा यह है, तुम प्रार्थना करोगे; अतः इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि हम अपने शरीर की प्रेरणा से प्रार्थना नहीं करते, वरन तब करते हैं जब पवित्र आत्मा हमारे हृदयों का मार्गदर्शन करता है, और एक प्रकार से हम में प्रार्थना करता है।” तौभी मैं नहीं जानता कि भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय इतनी सूक्ष्म रीति से बोलने का था या नहीं। पवित्रशास्त्र के अन्य स्थानों से यह सिद्ध करना सरल है कि हम परमेश्वर से प्रार्थना नहीं कर सकते जब तक वह अपने आत्मा के द्वारा हमसे पहले न आए। परन्तु इस स्थान के विषय में, मैं एक सरल अर्थ लेना अधिक पसन्द करता हूँ, कि जब वे प्रार्थना करने लगेंगे तब परमेश्वर सुनेगा; तौभी वह दिखाता है कि यह थोड़े समय के बाद नहीं होगा, क्योंकि वे लगभग अदम्य थे, और बहुत वर्षों के बीतने तक पश्चाताप न करते।
आगे लिखा है,—
यिर्मयाह 29:13
13. तुम मुझे ढूँढ़ोगे और पाओगे भी; क्योंकि तुम अपने सम्पूर्ण मन से मुझे ढूँढ़ोगे।
13. Et quaeretis me, et invenietis, quia quaeretis in toto corde vestro.
वह दूसरे शब्दों में उसी बात को पुष्ट करता है; और फिर भी यह दोहराव, जैसा हमने कल कहा था, व्यर्थ नहीं है; क्योंकि जैसे यहूदी हठपूर्वक सब धमकियों को तुच्छ जानते थे, वैसे ही उनके लिए परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं से उसकी भलाई का कोई स्वाद पाना कठिन था।
सो यही कारण है कि भविष्यद्वक्ता इस विषय पर बहुत से शब्दों का प्रयोग करता है। ढूँढ़ने शब्द से उसका अभिप्राय प्रार्थनाओं और विनतियों से है, जैसा पिछले पद में कहा गया। और मसीह भी, अपने चेलों को प्रार्थना करने का उपदेश देते हुए, कहता है, “ढूँढ़ो तो तुम पाओगे; खटखटाओ तो तुम्हारे लिये खोला जाएगा।” इसमें सन्देह नहीं कि वह वहाँ प्रार्थना के विषय में बोलता है; तौभी उसने मनुष्यों की सामान्य आदतों से लिए गए विविध बोलने के ढंग अपनाए।
परन्तु जब हम परमेश्वर के अनुग्रह की आवश्यकता अनुभव करते हैं, तब ढूँढ़ना प्रार्थना करने के सिवा और कुछ नहीं। इसलिए भविष्यद्वक्ता कहता है, तुम मुझे ढूँढ़ोगे और मुझे पाओगे। और यद्यपि वह यहाँ इस्राएलियों को सम्बोधित करता है, तौभी यह शिक्षा सारी कलीसिया तक बढ़ाई जानी चाहिए; क्योंकि परमेश्वर साक्षी देता है कि वह उन सब पर अनुग्रहकारी होगा जो उसकी शरण में भागते हैं।
217 हमारे अनुवाद में और प्राचीन अनुवादों में यहाँ {{כי का अनुवाद “जब” किया गया है, सेप्टुआजिंट को छोड़कर, जिसमें यह {ὅτι}, “क्योंकि,” या इस कारण कि, है। इस अव्यय का सबसे सामान्य अर्थ “क्योंकि” है; और यहाँ भी इसका यही अनुवाद किया जा सकता है; क्योंकि सच्चाई को उचित रूप से
परन्तु क्योंकि कपटी लोग बहुत शोर मचाते हैं, और जब केवल बाहरी अंगीकार पर ध्यान दिया जाए तब अपने उत्साह की तीव्रता में स्वयं पवित्र लोगों से भी बढ़कर प्रतीत होते हैं, इसलिए भविष्यद्वक्ता जोड़ता है, क्योंकि तुम अपने सम्पूर्ण मन से मुझे ढूँढ़ोगे। इसमें सन्देह नहीं कि जब कसदी यहूदियों पर अत्याचार करते थे तब वे हर वर्ष हज़ार बार कराहते थे; क्योंकि उन्हें हर प्रकार की निन्दा सहनी पड़ती थी, और फिर उनके पास कुछ भी सुरक्षित या निश्चिन्त न था।
सो उनके लिए यह अनिवार्य था, जब तक वे लोहे से भी कठोर न हों, कि वे कुछ प्रार्थनाएँ करें। परन्तु परमेश्वर दिखाता है कि उचित समय तब तक न आएगा जब तक उनकी प्रार्थनाएँ सही भावना से न निकलें; यही बात वह सम्पूर्ण मन से अभिप्रेत करता है। यह तो निश्चित है कि मनुष्य कभी अपने सम्पूर्ण मन से परमेश्वर की ओर नहीं फिरते, और न सम्पूर्ण मन कभी प्रार्थना में उतना लगा रहता है जितना उसे लगना चाहिए; परन्तु भविष्यद्वक्ता सम्पूर्ण मन को दोचित्ते मन के विरोध में रखता है। सो यहाँ सिद्धता नहीं समझी जानी चाहिए, जो मनुष्यों में कभी पाई नहीं जा सकती, वरन खराई या सच्चाई।
सो अब हम भविष्यद्वक्ता के शब्दों का अर्थ समझते हैं,—कि यहूदी, जब सचमुच परमेश्वर की शरण में भागने लगेंगे, तब उसे अनुग्रहकारी पाएँगे, केवल इतना हो कि वे यह मन की सच्चाई से करें, न कि कपट से; और यह भी कि यह शीघ्र न होगा, क्योंकि उनकी कठोरता और हठ इतना बड़ा था कि वे थोड़े समय में पश्चाताप की ओर लाए नहीं जा सकते थे। इसलिए परमेश्वर उन्हें स्मरण दिलाता है कि बहुत सी विपत्तियों की आवश्यकता थी, ताकि वे अन्त में फिरें और उस उलटेपन को उतार फेंकें जिसके हाथ उन्होंने अपने आप को पूरी तरह सौंप दिया था।
अब, जैसा मैं पहले ही कह चुका हूँ, यह सब कलीसिया के लाभ के लिए लागू किया जाना चाहिए; क्योंकि यह प्रतिज्ञा सब भक्तों तक बढ़ाई जानी चाहिए,—कि जब वे अपने दुःखों में परमेश्वर को पुकारते हैं, तब वह उनकी सुनेगा। और ऐसा प्रतीत होता है कि यिर्मयाह ने यह वचन यशायाह से लिया है, “ज्योंही तू मुझे पुकारेगा, मैं तेरी सुनूँगा; तेरे बोलने से पहले ही मैं अपना हाथ बढ़ाऊँगा।” (यशायाह 58:9)
और इस परिस्थिति पर भी ध्यान देना चाहिए कि भविष्यद्वक्ता ने उन यहूदियों को सम्बोधित किया जो बुरी तरह सताए जा रहे थे। सो हम जान लें कि यह वचन उचित रूप से उन संकटग्रस्त लोगों को सम्बोधित है, जिन्हें ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर उनके विरुद्ध है और उनसे अप्रसन्न है; और यही वह उचित समय है जिसका उल्लेख दाऊद ने भजन संहिता 32:6 में किया है।
यह खण्ड हमें यह भी सिखाता है कि इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि प्रभु अपने कोड़ों को दुगना कर देता है और हमें तुरन्त क्षमा नहीं करता, क्योंकि हम इतने नम्र होने को तत्पर नहीं कि पहले ही दिन उसकी ओर लौट आएँ। इसलिए हमारी हठीली टेढ़ाई के कारण वह विवश होता है कि हमें अधिक समय तक ताड़ना दे; तौभी यह प्रतिज्ञा अब भी स्थिर मानी जानी चाहिए कि यदि हम देर से भी पश्चाताप करें, तो परमेश्वर तब भी हम पर अनुग्रहकारी रहेगा; केवल इतना कि त्यागे हुए लोग इस बहाने से अपनी बुराइयों में लिप्त न रहें; क्योंकि हम देखते हैं कि अधर्मी मनुष्य परमेश्वर से खिलवाड़ करते हैं और उसकी पितृ-सुलभ सहनशीलता का दुष्टता से दुरुपयोग करते हैं। इसलिए पापी सावधान रहे, कहीं ऐसा न हो कि वह जीवन के अन्त तक ठहरा रहकर अपने लिए प्रतिशोध का भण्डार इकट्ठा कर ले।
परन्तु जो लोग बहुत समय तक अपने पापों में सुस्त पड़े रहे हैं, उनके सामने भी यह आशा रखी गई है कि यदि वे अन्त में, देर से ही सही, आएँ, तो भी वे समय पर ही आएँगे, क्योंकि परमेश्वर उनकी सुनेगा। परन्तु इस शर्त पर ध्यानपूर्वक ध्यान देना चाहिए कि परमेश्वर तब तक मनाया नहीं जाएगा जब तक उसे सम्पूर्ण मन से, अर्थात् सच्चाई से, न खोजा जाए। इस प्रकार प्रार्थनाओं के सुने जाने का कारण बताया गया है, और इसमें किसी पुण्य का कोई संकेत नहीं है। वास्तव में, स्वयं वस्तुओं के स्वभाव से ही, सच्चाई के बिना की गई प्रार्थना किसी प्रकार ग्रहण नहीं की जा सकती। हमारे अंग्रेज़ी अनुवाद में दोनों क्रियाओं का अर्थ उलट दिया गया है; पहली का अनुवाद अधिकतर "ढूँढ़ निकालना" होना चाहिए, और दूसरी का "खोजना"। पहली के साथ "पाना" जुड़ा है, और इसमें ढूँढ़ना निहित है, और क्रिया {}בקשका अर्थ कभी-कभी खोई हुई वस्तु को ढूँढ़ना होता है। पद इस प्रकार होना चाहिए, — "और तुम मुझे ढूँढ़ोगे और मुझे पाओगे, क्योंकि तुम अपने सम्पूर्ण मन से मुझे खोजोगे।" परमेश्वर को खोजने का अर्थ है उसकी कृपा को खोजना। वे उसे ढूँढ़ेंगे जिसे उन्होंने मानो खो दिया था, और वे उसे पाएँगे क्योंकि वे पूरी सच्चाई से उसकी कृपा खोजेंगे; यह किसी स्वार्थपूर्ण उद्देश्य से नहीं, परन्तु परमेश्वर की कृपा का आनन्द लेने के लिए होगा। — सं।
…इसलिए हमारे लिए आश्चर्य करने का कोई कारण नहीं कि उसके कान प्रायः हमारी प्रार्थनाओं के प्रति बन्द रहते हैं, क्योंकि हम केवल उसे खोजने का दिखावा करते हैं, और हमारे जीवन से ही प्रकट होता है कि हम में कुछ भी सच्चाई नहीं है। अब आगे यह आता है, —
यिर्मयाह 29:14
14. और मैं तुम्हें मिलूँगा, यहोवा की यही वाणी है; और मैं तुम्हारी बँधुआई को लौटा दूँगा, और तुम को उन सब जातियों और उन सब स्थानों में से इकट्ठा करूँगा जिनमें मैं ने तुम को बरबस निकाल दिया है, यहोवा की यही वाणी है; और मैं तुम्हें उसी स्थान में लौटा ले आऊँगा जहाँ से मैं ने तुम्हें बँधुआ करके भिजवा दिया था।
14. Et inveniar a vobis, dicit Jehova, et reducam captivitatem vestram, et colligam (vel, congregabo) vox ex omnibus gentibus et ex omnibus locis quo expulero vos illue, dicit Jehova; et redire faciam vos ad locum e quo expuli vos illinc (abundat).
भविष्यद्वक्ता अब उस बात को लागू करता है जो उसने सामान्य रूप से कही हुई प्रतीत होती थी। फिर वह परमेश्वर की कृपा का फल दिखाता है, जब वह अपनी प्रजा से मेल कर चुका होगा, अर्थात् यह कि वह उनकी बँधुआई को लौटा देगा और उन्हें सब स्थानों से इकट्ठा करेगा। यह विशेष रूप से यहूदियों से कहा गया था; परन्तु पिछले दो पद, जैसा मैं कह चुका हूँ, एक सामान्य शिक्षा रखते हैं। उसने पहले कहा था, तुम मुझे पाओगे; परन्तु अब वह कहता है, मैं तुम्हें मिलूँगा, अथवा, मैं अपने आप को तुम पर प्रकट करूँगा। यहाँ छिपने और प्रकट होने के बीच एक निहित विरोध है, क्योंकि निर्वासन के समय में परमेश्वर ने मानो अपने आप को छिपा लिया था; परन्तु उसने अचानक अपना मुख चमका दिया, और इस प्रकार अपनी प्रजा को प्रत्यक्षतः भूल जाने के बाद अपने आप को पिता के रूप में प्रकट किया। इसलिए भविष्यद्वक्ता यहाँ उचित रीति से बोलता है; क्योंकि यद्यपि प्रभु सदा हम पर दृष्टि रखता है, तौभी दूसरी ओर हम उसे नहीं देखते, वरन् हम सोचते हैं कि वह हम से दूर है। परन्तु वह हम पर केवल तभी प्रकट होता है जब हम अनुभव करते हैं कि वह हमारे उद्धार की चिन्ता करता है।
सब जातियों में से और सब स्थानों में से कहकर उसने स्पष्टतः एक ऐसे सन्देह का निवारण किया जो अन्यथा बहुतों के मन में घुस सकता था: "यह कैसे हो सकता है कि इस प्रकार तितर-बितर हो जाने के बाद परमेश्वर हमें इकट्ठा करे?" क्योंकि उनके लिए कोई निश्चित प्रदेश नियत नहीं किया गया था जिसमें वे एक साथ रहकर एक देह बन सकें; परन्तु वे मानो किसी प्रचण्ड बवण्डर से भूसी या खूँटी के समान बिखेर दिए गए थे; और परमेश्वर ने उन्हें ऐसा भगा दिया था कि फिर से इकट्ठे होने की कोई आशा न रही थी। इसलिए जब यह अविश्वसनीय था कि इस प्रकार बिखरी हुई प्रजा फिर एकत्र की जा सके, तब भविष्यद्वक्ता कहता है, "सब जातियों में से और सब स्थानों में से।" यही बात भजन में भी घोषित की गई है, "वह इस्राएल के निकाले हुओं को इकट्ठा करेगा।" (भजन संहिता 147:2)
क्योंकि जब यहूदी अपने भयानक तितर-बितर होने को देखते थे, तो वे कोई आशा नहीं रख सकते थे। इसलिए हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने उन्हें किस प्रकार फिर भी आशा रखने के लिए उत्साहित किया, और उन्हें इस परीक्षा के विरुद्ध संघर्ष करने की आज्ञा दी। यह वाक्य मूसा से लिया गया प्रतीत होता है, क्योंकि वह कहता है, "चाहे तुम संसार के छोर तक तितर-बितर हो जाओ, तौभी परमेश्वर तुम्हें इकट्ठा करेगा।" (व्यवस्थाविवरण 30:1-3)
हम देखते हैं कि वहाँ मूसा स्पष्ट रूप से प्रजा के अविश्वास को डाँटता है, यदि वे इस कारण परमेश्वर की दया और उद्धार से निराश हो जाएँ कि वे छिन्न-भिन्न और तितर-बितर कर दिए गए थे। इसलिए वह दिखाता है कि परमेश्वर का सामर्थ्य उन्हें फिर से इकट्ठा करने के लिए भरपूर पर्याप्त था, चाहे वे संसार की चारों दिशाओं में बिखेर दिए गए हों। अब हम भविष्यद्वक्ता का उद्देश्य समझते हैं।
218 इसमें पाया जानेवाला क्रम ध्यान देने योग्य है; पहले पुनर्स्थापना का उल्लेख है, और फिर उसके लिए आवश्यक साधन, अर्थात् सब स्थानों से प्रजा का इकट्ठा किया जाना; "मैं तुम्हारी बँधुआई को," अथवा बन्दियों को, "लौटा दूँगा, और मैं इकट्ठा करूँगा," इत्यादि। अन्तिम वाक्य यह है, "जहाँ मैं ने तुम्हें वहाँ से हटा दिया है;" जहाँ और वहाँ से, जहाँ से के स्थान पर। — सं।
और इससे हम एक उपयोगी शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं, — कि परमेश्वर अपनी तितर-बितर कलीसिया को अद्भुत रीति से इकट्ठा करता है, जिससे वह उसे एक देह बना दे, चाहे वह कुछ समय के लिए उसका नाम और यहाँ तक कि उसका रूप भी मिटा दे। और इसका कुछ प्रमाण उसने हमारे समय में भी हमें दिया है। क्योंकि कौन सोच सकता था कि जो कुछ हम अब अपनी आँखों से देखते हैं, वह कभी घटित होगा? कि परमेश्वर गुप्त रीति से अपने चुने हुए लोगों को इकट्ठा करेगा, जब हर स्थान पर भयानक उजाड़ छाया हुआ था, और संसार में कोई ऐसा कोना नहीं मिलता था जहाँ दो या तीन विश्वासी मनुष्य एक साथ रह सकें। इसलिए हम देखते हैं कि यह भविष्यद्वाणी केवल एक ही समय में पूरी नहीं हुई, परन्तु यहाँ परमेश्वर का वह अनुग्रह प्रस्तुत किया गया है जिसे उसने अपनी कलीसिया को इकट्ठा करने में बार-बार प्रकट किया है, और अब भी प्रकट करता है।
आगे यह आता है, —
यिर्मयाह 29:15-17
15. तुम ने जो कहा है कि यहोवा ने बाबुल में हमारे लिए भविष्यद्वक्ता उत्पन्न किए हैं;
15. Quoniam dixistis, Excitabit nobis Jehova prophetas in Babylone;
16. इसलिए जान लो कि जो राजा दाऊद की गद्दी पर विराजमान है, और जो सारी प्रजा इस नगर में रहती है, अर्थात् तुम्हारे जो भाई तुम्हारे संग बँधुआई में नहीं गए, उनके विषय में यहोवा यों कहता है;
16. Ideo sic dicit Jehova regi sedenti super solium Davidis et toti populo sedenti in hac urbe (hoc est, habitanti, nam {}יושבhic diversis modis accipitur,) fratribus vestris, qui non egressi sunt vobiscum in exilium;
17. सेनाओं का यहोवा यों कहता है, देखो, मैं उन पर तलवार, अकाल और मरी भेजूँगा, और उन्हें ऐसे निकम्मे अंजीरों के समान कर दूँगा जो इतने बुरे हैं कि खाए नहीं जा सकते।
17. Sic dicit Jehova exercituum, Ecce ego mitto in eos gladium, famem, pestem; et ponam eos tanquam ficus sordidas (aut, foetidas,) quae non comeduntur prae malitia (id est, prae amaritudine.)
अनेक व्याख्याकार इन पदों में से पहले पद को पिछले पदों के साथ जोड़ते हैं, और ऐसा प्रतीत होता है कि वे अकारण ऐसा नहीं सोचते; क्योंकि यदि हम उस बात का ध्यान करें जो भविष्यद्वक्ता ने कही थी, अर्थात् यह कि यहूदियों को सत्तर वर्ष के अन्त तक किसी प्रकार लौटने की आशा नहीं करनी थी, तो दिया गया कारण अनुपयुक्त नहीं है। परन्तु जो अर्थ मैं अपनाता हूँ वह अधिक सम्भव है; निपात {,}כיki दोहराया गया है; पहला कारणवाचक है, और दूसरा निष्कर्षवाचक; और पवित्रशास्त्र की प्रयोग-रीति के अनुसार विद्वान और अनुभवी लोग समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता का वास्तविक अर्थ यही है। तब वह कहता है कि वे बन्दी बड़े मूर्ख थे जो अपने निर्वासन के शीघ्र अन्त की आशा करते थे, क्योंकि उनके पास झूठे भविष्यद्वक्ता थे जो उन्हें ऐसी प्रतिज्ञा देते थे; तो तुम ने कहा है कि कसदियों के देश में तुम्हें भविष्यद्वक्ता दिए गए हैं, और कि परमेश्वर ने वहाँ तुम पर दया की है, क्योंकि वहाँ ऐसे लोग हैं जो थोड़े ही समय में लौटने की भविष्यद्वाणी करते हैं। इसलिए जब तुम इतने मूर्खतापूर्वक विश्वास कर लेनेवाले हो, तो यहोवा तुम्हारे भाइयों से यों कहता है; फिर वह अपनी बात निर्वासितों की ओर मोड़ता है, और उन्हें समझाता है कि वे अपने आप को भटकने न दें। परन्तु यहाँ वह परोक्ष रूप से उन्हें डाँटता है, क्योंकि वे ऐसी दशा को भी सह नहीं सकते थे जो शेष बचे हुओं की दशा से भी अच्छी थी, मानो उसने कहा हो, "तुम्हारी यह अनुचितता क्या है! कि जब तुम्हारे सब मार्ग तुम्हारे विरुद्ध बन्द कर दिए गए हैं, और तुम्हारे विजेता का सामर्थ्य इतना बड़ा है कि तुम उसके संकेत के बिना एक उँगली भी नहीं हिला सकते, तब भी तुम सोचते हो कि दो वर्ष में तुम स्वतन्त्र कर दिए जाओगे! और निश्चय ही, यदि तुम पहले मूर्खतापूर्वक निश्चिन्त और आत्मविश्वासी थे, तो अब तुम्हारी विपत्तियों को तुम्हें नम्र बना देना चाहिए। परन्तु तुम्हारे भाई, जो अब भी स्वतन्त्रता का आनन्द लेते प्रतीत होते हैं क्योंकि वे यरूशलेम में रहते हैं, (क्योंकि उस समय केवल वे ही बचे रह गए थे,) तुम्हारे ये भाई भी तुम से कहीं अधिक कठोर दुःख भोगते हैं।"
219 गैटेकर इसका समर्थन करता है और स्पष्टतः कैल्विन की ओर संकेत करते हुए कहता है, "एक प्रमुख ख्याति के व्याख्याकार ने इसका अनुवाद ऐसा ही किया है।" कि {{כיकभी-कभी निष्कर्षवाचक होता है, यह सामान्यतः माना जाता है; और यहाँ सम्बन्ध अन्य किसी प्रकार दिखाई नहीं दे सकता। सेप्टुआजिन्ट में 15वें पद (यिर्मयाह 29:15) के बाद एक बड़ा अन्तराल है, 16, 17, 18, 19 और 20वें पद (यिर्मयाह 29:16-20) छोड़ दिए गए हैं, परन्तु अन्य अनुवादों में और तर्गुम में नहीं; और इसी कारण ब्लेनी 15वें पद को उसके स्थान से हटाकर 20वें और 21वें पद के बीच रखने को प्रेरित हुआ, परन्तु पर्याप्त कारण के बिना। जैसा कैल्विन ने दिखाया है, पद अपनी वर्तमान स्थिति में ही सम्बन्ध उपयुक्त है, और उसे हटा देने से आगे आनेवाली बात का आशय इतना स्पष्ट दिखाई नहीं देता। ब्लेनी द्वारा प्रस्तुत एक और बात भी, यद्यपि हूबिगाँ और हॉर्स्ली—दो प्रतिस्पर्धी नवप्रवर्तक—उसका समर्थन करते हैं, स्वीकार नहीं की जानी चाहिए, — कि पत्र 20वें पद (यिर्मयाह 29:20) के अन्त में समाप्त होता है, न कि 23वें पद (यिर्मयाह 29:23) के अन्त में, और जो आगे आता है वह एक दूसरा पत्र है। यह स्पष्ट है कि जो कुछ 24वें पद (यिर्मयाह 29:24) में और उसके बाद अन्त तक के पदों में है, वह इस पत्र के उत्तर में बाबुल से आए एक उत्तर के परिणामस्वरूप लिखा गया था। 5वें पद (यिर्मयाह 29:5) की तुलना 28वें पद (यिर्मयाह 29:28) से कीजिए। — सं।
अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने बन्दियों को सम्बोधित करने के बाद किस उद्देश्य से अपनी बात राजा सिदकिय्याह की ओर और उन यहूदियों की ओर मोड़ी जो अब तक घर में अर्थात् अपने ही देश में रह रहे थे; यह इसलिए था कि बन्दी इससे जान लें कि दूर देशों में भगा दिए जाने के बाद अपने आप से लौटने की प्रतिज्ञा करना उनका कितना बड़ा पागलपन था, जबकि अन्तिम विनाश राजा और उस प्रजा दोनों के निकट था जो अब तक यरूशलेम में रह रहे थे; इसलिए यहोवा उस राजा से जो दाऊद की गद्दी पर बैठा है, और उस सारी प्रजा से जो इस नगर में बैठी है, यों कहता है, इत्यादि।
बैठना, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, यहाँ दो भिन्न अर्थों में लिया जाना चाहिए; राजा के विषय में कहा गया है कि वह अपनी गद्दी पर बैठा है जब तक वह अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखता है; परन्तु प्रजा के विषय में कहा गया है कि वह बैठी है जब वह किसी स्थान में चैन से विश्राम करती और निवास करती है। यहाँ राजा शब्द का स्पष्ट रूप से उल्लेख अकारण नहीं किया गया, क्योंकि निर्वासित लोग सदा उसे अपने लौटने की आशा से जोड़ा करते थे: "मन्दिर अब भी बना है, वहाँ परमेश्वर की आराधना होती है, और राज्य अब भी विद्यमान है; जब ये बातें सुरक्षित हैं, तो हमारी जाति का सब कुछ समाप्त नहीं हो सकता।" प्रजा की सुरक्षा राज्य और याजकपद पर निर्भर थी। इसलिए जब वे एक ओर राजपद पर, और दूसरी ओर याजकपद और बलिदानों पर अपनी आँखें लगाए रहते थे, तो उन्हें दृढ़ निश्चय था कि इसके सिवा और कुछ नहीं हो सकता कि परमेश्वर उन्हें शीघ्र लौटा ले आएगा; क्योंकि परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की थी कि दाऊद का राज्य तब तक सदा बना रहेगा जब तक सूर्य और चन्द्रमा आकाश में चमकते रहेंगे। इसलिए जब तक यह वैभव या महिमा बुझा न दी जाती, इस्राएली दीन नहीं किए जा सकते थे, विशेषकर इसलिए कि जो लोग निर्वासन में ले जाए गए थे वे यहूदा के गोत्र के थे।
अब हम समझते हैं कि राजा शब्द का उल्लेख स्पष्ट रूप से क्यों किया गया। इसलिए यद्यपि अब भी एक राजा दाऊद की गद्दी पर बैठा था, तौभी वह घोषणा करता है कि उसकी और उसकी प्रजा की दशा बन्दी भीड़ की दशा से अधिक कठोर थी।
वह कहता है, मैं तलवार, अकाल और मरी लेकर उनका पीछा करूँगा। यकोन्याह का आत्मसमर्पण, जैसा हम अन्यत्र देख चुके हैं, स्वेच्छा से हुआ था; इसलिए बाबुल के राजा ने उसके साथ अधिक कृपा से व्यवहार किया। अन्त में नगर पर आक्रमण हुआ, और क्योंकि घेरा बहुत लम्बा चला, इसलिए राजा और सारी प्रजा के विरुद्ध अधिक क्रोध भड़का, क्योंकि कसदी उनके हठ से थक गए थे। इसी कारण उन्होंने उनके साथ अधिक कठोरता से व्यवहार किया। परन्तु परमेश्वर के न्यायपूर्ण प्रतिशोध के बिना कुछ भी नहीं हुआ; क्योंकि यद्यपि उन्होंने कसदियों को क्रोध दिलाया, तौभी इसमें कोई सन्देह नहीं कि परमेश्वर ने उनके मनों को अन्धा कर दिया था, जिससे उन्होंने अपने ऊपर अधिक भारी दण्ड बुला लिया। इसलिए यह परमेश्वर द्वारा उन पर डाला गया दण्ड था; और इसलिए यिर्मयाह ठीक ही साक्षी देता है कि परमेश्वर ही उन विपत्तियों का कर्ता था, क्योंकि कसदी, जैसा हम अन्यत्र देख चुके हैं, परमेश्वर के प्रतिशोध के केवल सेवक और उसे पूरा करनेवाले थे; इसलिए सेनाओं का यहोवा कहता है, देखो, मैं तुम्हारा पीछा करूँगा, इत्यादि।
फिर वह आगे कहता है, और मैं उन्हें निकम्मे अंजीरों के समान कर दूँगा। यहाँ वह अंजीरों को निकम्मे कहता है; परन्तु चौबीसवें अध्याय में उसने उन्हें बुरे कहा था; तौभी अर्थ एक ही है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि वह उस भविष्यद्वाणी की ओर संकेत करता है जिसकी व्याख्या हमने वहाँ की थी। क्योंकि भविष्यद्वक्ता ने अंजीरों की दो टोकरियाँ देखी थीं, जिनमें से एक में मीठे अंजीर थे, और दूसरी में कड़वे। परमेश्वर ने पूछा, "तू क्या देखता है?" उसने कहा, "अच्छे अंजीर, बहुत ही अच्छे, और निकम्मे अंजीर, बहुत ही निकम्मे।" परमेश्वर ने बाद में आगे कहा, "अच्छे और मीठे अंजीर बन्दी हैं; क्योंकि मैं अन्त में उन पर दया करूँगा, और उन्हें लौटने की स्वतन्त्रता दी जाएगी। तब वे अच्छे अंजीर होंगे, यद्यपि अभी उनके विषय में भिन्न धारणा बनी हुई है; क्योंकि जो अब तक यरूशलेम में रहते थे, वे अपने आप को निर्वासितों से अधिक सुखी समझते हैं; परन्तु निकम्मे और कड़वे अंजीर," वह कहता है, "यह प्रजा है जो इस बात पर घमण्ड करती है कि वह बँधुआई में नहीं ले जाई गई; क्योंकि मैं उन्हें मरी, अकाल और तलवार से नष्ट कर दूँगा।" उस खण्ड में भविष्यद्वक्ता की यही भाषा थी। अब वह फिर से घोषणा करता है कि राजा सिदकिय्याह और सारी प्रजा कड़वे और सड़े हुए अंजीरों के समान होंगे, जो इतने बुरे होने के कारण खाने योग्य नहीं होते। फिर वह आगे कहता है, —
यिर्मयाह 29:18-19
18. और मैं तलवार, अकाल और मरी लेकर उनका पीछा करूँगा, और उन्हें पृथ्वी के सब राज्यों में मारे-मारे फिरने के लिए सौंप दूँगा, कि जिन जिन जातियों में मैं ने उन्हें बरबस निकाल दिया है उन सब के बीच वे शाप, और चकित होने का कारण, और ताली बजाने का विषय, और निन्दा का पात्र बनें;
18. Et persequar (ad verbum est, post eos: persequar eos) gladio, fame et peste; et ponam eos in commotionem (vel, concussionem) cunctis regnis terrae, in execrationem, et in stuporem, et in sibilum, et in probrum inter cunctas gentes ad quas expulero eos (vel, quo expulero eos illuc:)
19. क्योंकि उन्होंने मेरे वचनों को नहीं सुना, यहोवा की यही वाणी है, जिन्हें मैं ने अपने दास भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा बड़े तड़के उठकर बार-बार उनके पास भेजा; परन्तु तुम ने नहीं सुना, यहोवा की यही वाणी है।
19. Propterea quod non audierunt sermones meos, inquit Jehovah, quos misi ad eos peer servos meos Prophetas, mane surgendo et mittendo; et non audistis, inquit Jehova.
वह उसी विषय को आगे बढ़ाता है, — कि वह उन्हें मरी, अकाल और तलवार से नष्ट करने से तब तक नहीं रुकेगा जब तक उन्हें पूरी तरह नष्ट न कर दे, जैसा हम चौबीसवें अध्याय में पाते हैं। वह उसी को दोहराता है जो उस अध्याय में है; परन्तु ये शब्द व्यवस्थाविवरण के अट्ठाईसवें अध्याय से, और उनतीसवें अध्याय से लिए गए हैं। हम जानते हैं कि भविष्यद्वक्ताओं ने अपनी शिक्षा का सार व्यवस्था के सोते से निकाला, और ठीक-ठीक कहें तो कुछ भी नया प्रस्तुत नहीं किया, परन्तु मूसा की शिक्षा को उस समय की परिस्थितियों के अनुसार ढाला जिसमें प्रत्येक जीवित रहा।
इसलिए हम व्यवस्था के शापों में ये शब्द पाते हैं, मैं उन्हें हलचल का, अथवा झकझोर का, कारण बनाऊँगा। इस शब्द की व्याख्या दो प्रकार से की जा सकती है, — या तो यह कि जातियाँ ऐसे दुःखद दृश्य को देखकर काँप उठेंगी, — या यह कि वे अपना सिर हिलाएँगी। दूसरा मत अधिक मान्य है, जैसा मैं अन्यत्र कह चुका हूँ। तो मैं उन्हें हलचल का कारण बनाऊँगा, अर्थात् जो कोई उनकी दुर्दशा देखेगा वह तिरस्कार से अपना सिर हिलाएगा, मानो उसने कहा हो, "सब लोग परमेश्वर के न्यायपूर्ण प्रतिशोध को स्वीकार करेंगे, और तुम सब अन्यजातियों के बीच निन्दा के पात्र बनोगे; क्योंकि सब मान लेंगे कि तुम अपने पापों के कारण पूर्णतया न्यायपूर्वक दुःख भोगते हो।"
वह आगे कहता है, शाप के लिए। शब्द {,}אלהale का ठीक अर्थ शपथ है, परन्तु बहुत से स्थानों में यह शाप के अर्थ में लिया गया है, जो शपथ खाते समय जोड़ा या समझा जाता है। परन्तु क्योंकि मनुष्य झूठी शपथ के कारण प्रायः अपने आप को दण्ड के अधीन कर देते हैं, इसलिए इस शब्द का अर्थ प्रायः शाप होता है; और जो समझा जाना चाहिए, जैसा अन्यत्र समझाया जा चुका है, वह शाप का नमूना या सूत्र है; और हम देख चुके हैं कि भविष्यद्वक्ता ने यह किस अर्थ में कहा, अर्थात् यह कि जो कोई अपने आप को या दूसरों को शाप देना चाहे, अथवा, जैसा वे कहते हैं, किसी भयानक बात की कामना करना चाहे, वह यहूदियों को उदाहरण के रूप में लेगा: "परमेश्वर तुझे वैसा ही शाप दे जैसा उसने यहूदियों को दिया;" अथवा, "वह तेरे विनाश के लिए अपनी कठोरता वैसे ही प्रकट करे जैसे उसने यहूदियों के प्रति की।"
तब वह कहता है कि वे शाप के लिए होंगे, अर्थात् वे ऐसे दुःखी होंगे कि शाप देते समय उन्हें उदाहरण के रूप में लिया जाएगा।
उसके बाद वह आगे कहता है, चकित होने के लिए; जैसे उसने सिर हिलाने की बात कही थी, वैसे ही अब वह विस्मय का उल्लेख करता है, जो उससे भी अधिक दुःखदायी बात है, अर्थात् जब ऐसा दृश्य सामने आता है जो सब मनुष्यों को विस्मित खड़ा कर देता है, मानो वे न जानते हों कि इसका अर्थ क्या है। ताली बजाने का उल्लेख किया गया है; जैसे अन्यत्र कहा गया है कि वे एक कहावत, {,}משלmeshel, और एक ताना भी बनेंगे, वैसे ही यिर्मयाह इस स्थान पर कहता है कि वे ताली बजाने का विषय बनेंगे, जैसे उसने सिर हिलाने की बात कही है।
और अन्त में वह आगे कहता है कि वे सब जातियों के लिए भी निन्दा का पात्र बनेंगे, क्योंकि जब उनके अधर्म और परमेश्वर के प्रतिशोध के बीच तुलना की जाएगी, तब सब लोग उन्हें उनकी विपत्तियों के योग्य समझेंगे, चाहे वे कितनी ही भारी क्यों न हों। इसके बाद कारण आता है, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर की नहीं सुनी। परन्तु मैं अभी इसे समाप्त नहीं कर सकता।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अनुग्रह कर कि जैसे तू ने अपनी प्राचीन प्रजा के साथ अपने व्यवहार में अपने क्रोध और अपनी पितृ-सुलभ करुणा दोनों का ऐसा उल्लेखनीय प्रमाण दिया है, — हाँ, अनुग्रह कर कि हम अपने हठ से तेरे अत्यन्त क्रोध को न भड़काएँ, परन्तु समय रहते तेरे न्याय से पहले ही चेत जाएँ, जिससे हम तुझे मेल करने को तत्पर पाएँ, और कभी सन्देह न करें कि जब हम सच्चाई से तेरी ओर फिरेंगे तब तू हम पर दयालु होगा; और क्योंकि हम सब बुराई की ओर इतने झुके हुए हैं, वरन् उसमें सिर के बल दौड़ पड़ते हैं, और हमारी दुष्टता और कठोरता इतनी बड़ी है, इसलिए हम तुझ से विनती करते हैं, हमें नम्रता का आत्मा प्रदान कर, कि हम सब बातों में अपने आप को तेरे अधीन करें, और इस प्रकार अपने आप को तेरी सन्तान प्रमाणित करें, जिससे हम तेरे एकलौते पुत्र में तुझे अपना पिता भी पाएँ। — आमीन।
एक सौ बारहवाँ व्याख्यान
भविष्यद्वक्ता ने उन पर जो अपने देश में रह गए थे और साथ ही निर्वासितों पर भी परमेश्वर के न्याय की घोषणा करने के बाद, यह कारण जोड़ा, क्योंकि उन्होंने प्रभु के वचन को नहीं सुना; और यह अत्यन्त गम्भीर पाप था। यद्यपि परमेश्वर के सामने अज्ञानता कोई बहाना नहीं है, क्योंकि जो व्यवस्था के बिना हैं वे भी नाश होंगे; तौभी वह दास जो अपने स्वामी की इच्छा जानता था और उसके अनुसार नहीं चला, बहुत मार खाएगा। और उद्धार के सही मार्ग पर हमें बुलाने में परमेश्वर का अनुग्रह जितना अधिक भरपूर होता है, उतनी ही अधिक नीच हमारी कृतघ्नता होती है, जब हम अपने कान बन्द कर लेते हैं और उस चिन्ता और देखभाल की उपेक्षा करते हैं जो वह हमारे उद्धार के लिए प्रकट करता है। इसलिए हम जान लें कि भविष्यद्वाणी के वचन को ठुकराने से अधिक असहनीय और कुछ नहीं है।
और हमें आगे आनेवाली बात पर ध्यान देना चाहिए, जिसे मैं ने अपने दास भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा उनके पास भेजा।
अन्यथा यहूदी आपत्ति करके कह सकते थे कि उनका परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोही होने का कोई इरादा नहीं था, परन्तु भविष्यद्वक्ताओं के बीच बहुत से विवाद थे।
इसलिए, कहीं ऐसा न हो कि वे इस प्रकार के बहाने से बच निकलने का मार्ग ढूँढ़ें, वह कहता है कि जो वचन उसके सेवकों और साक्षियों अर्थात् भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा लाया गया, वह उससे कम आदर के योग्य नहीं था मानो स्वर्गदूत स्वर्ग से उतरकर उनके पास आए हों। और यह खण्ड बाहरी शिक्षा का उपयोग दिखाने में सहायक है, जिसे उन्मादी लोग तुच्छ जानते हैं, यह सोचकर कि गुप्त वचन ही पर्याप्त है, अर्थात् जो कुछ वे स्वप्न में देखें। परन्तु परमेश्वर इस प्रकार हमारे विश्वास की आज्ञाकारिता को परखता है, जब वह मनुष्यों के हाथ और परिश्रम के द्वारा हम पर शासन करता है। इसलिए जो कोई वचन के विश्वासयोग्य शिक्षकों को ठुकराता है, वह प्रकट करता है कि वह स्वयं परमेश्वर का तिरस्कार करनेवाला है। अर्थ यह है कि परमेश्वर अपने वचन को किसी भी प्रकार की देववाणी के रूप में नहीं, परन्तु उस शिक्षा के रूप में परिभाषित करता है जो विश्वासयोग्य शिक्षकों को सौंपी गई है।
उसके बाद वह आगे कहता है, बड़े तड़के उठकर और भेजते हुए। यह रूपक उन मनुष्यों से लिया गया है जो तत्पर और परिश्रमी होते हैं। हम निश्चय जानते हैं कि परमेश्वर न कभी जागता है और न कभी स्थान बदलता है; परन्तु वह अपनी प्रजा के प्रति अपनी पितृ-सुलभ चिन्ता को किसी अन्य प्रकार व्यक्त नहीं कर सकता था, मानो उसने कहा हो कि वह उन्हें चेतावनी देने में तत्परता से लगा रहा।
और इस प्रकार प्रजा का आलस्य और भी अधिक निरुत्तर ठहराया गया; क्योंकि परमेश्वर ने मानो बड़े तड़के उठने में शीघ्रता की, उनके समान जो किसी परिश्रम से पीछे नहीं हटते, परन्तु अपना काम या अपनी यात्रा पूरी करने के लिए स्वेच्छा से अपनी नींद का कुछ भाग त्याग देते हैं। इसलिए जब परमेश्वर ने मनुष्यों के कल्याण को सुरक्षित करने में इतना परिश्रम प्रकट किया, तो मनुष्यों का आलस्य और भी अधिक लज्जाजनक है, जब वे बहरे बन जाते हैं, या प्रभावित नहीं होते, परन्तु अपनी उदासीनता में पड़े रहते हैं। अब आगे यह आता है, —
यिर्मयाह 29:20-21
20. इसलिए हे सब बँधुओ, जिन्हें मैं ने यरूशलेम से बाबुल को भेजा है, तुम यहोवा का वचन सुनो:
20. Et vos audite sermonem Jehovae cuncta captivitas, quam misi Jerosolyma Babylonem;
21. कोलायाह के पुत्र अहाब के, और मासेयाह के पुत्र सिदकिय्याह के विषय में, जो मेरे नाम से तुम्हें झूठी भविष्यद्वाणी सुनाते हैं, इस्राएल का परमेश्वर सेनाओं का यहोवा यों कहता है; देखो, मैं उन्हें बाबुल के राजा नबूकदनेस्सर के हाथ में कर दूँगा; और वह उन्हें तुम्हारी आँखों के सामने मार डालेगा;
21. Sic dicit Jehova exercituum, Deus Israel, ad Achab filium Colaniah, et ad Zedechiam filium Maassiae, prophetantes vobis in nomine meo mendacium, Ecce ego ponam eos (vel, tradam) in manum Nebuehadnezer regis Babylonis; et percutiet eos coram oculis vestris: यिर्मयाह एक विशेष भविष्यद्वाणी की घोषणा करता है, परन्तु अपनी पहली शिक्षा की पुष्टि में।
उसका उद्देश्य अब भी वही है, कि बन्दियों को, जैसा वे करने लगे थे, चापलूसी की बातें सुनने से रोके, और उन्हें निश्चय दिलाए कि उन्हें सत्तर वर्ष के अन्त तक अपना निर्वासन सहना है। परन्तु यहाँ वह तीन धोखेबाज़ों के विषय में बोलता है; उनमें से दो को वह एक साथ जोड़ता है, और तीसरे का अलग उल्लेख करता है। वह अपनी बात विशेषकर सब बन्दियों की ओर करता है, क्योंकि उसने उन लोगों को सम्बोधित करना उचित न समझा जो स्वयं को परमेश्वर का शत्रु घोषित करते थे, और धोखा देने के उद्देश्य से अपने आप को शैतान के हाथ दास के रूप में बेच चुके थे। इसलिए उन पर परिश्रम करना व्यर्थ था। परन्तु उसने सारी प्रजा को सम्बोधित किया, और साथ ही यह भी पहले से बता दिया कि इन दोनों झूठे भविष्यद्वक्ताओं, अर्थात् अहाब और सिदकिय्याह, का क्या होगा। वह एक को कोलायाह का पुत्र, और दूसरे को मासेयाह का पुत्र कहता है; क्योंकि अहाब उस समय बहुत प्रचलित नाम था, और सिदकिय्याह एक ऐसा नाम था जो एक धर्मपरायण और भक्त राजा की स्मृति के कारण भले लोगों में बड़े आदर में था। इसलिए किसी भ्रम को रोकने के लिए उसने उनके पिताओं का उल्लेख किया।
इस भविष्यद्वाणी का आशय यह है कि उन पर शीघ्र ही दण्ड आ पड़ेगा, क्योंकि राजा नबूकदनेस्सर उन्हें मरवा डालेगा। वे निर्वासन में थे, परन्तु उन पर ऐसा पागलपन सवार था कि वे उस अत्याचारी के क्रोध को भड़काने में नहीं हिचकिचाए जिसे वे क्रूर और रक्तपिपासु जानते थे। तब यिर्मयाह घोषणा करता है कि क्योंकि वे इस प्रकार प्रजा को धोखा देते थे, इसलिए उन्हें शीघ्र दण्ड मिलेगा, क्योंकि नबूकदनेस्सर उन्हें मार डालेगा। तौभी इसमें कोई सन्देह नहीं कि नबूकदनेस्सर ने अपने निजी लाभ का ध्यान रखा; क्योंकि उनके उसके सामने लाए जाने से पहले ही वह उपद्रव के हर कारण को शान्त करना चाहता था। क्योंकि वे शीघ्र लौटने की आशा को उकसाने से नहीं रुकते थे, इसलिए किसी रोक-थाम के बिना ऐसा हुए बिना नहीं रह सकता था कि बार-बार उपद्रव उठें।
इसलिए नबूकदनेस्सर ने, जैसा पृथ्वी के राजाओं की रीति है, अपने हित का विचार किया। परन्तु इस बीच वह परमेश्वर का सेवक था; क्योंकि वे दोनों धोखेबाज़ जिन्होंने प्रजा से लौटने की प्रतिज्ञा की थी, तिरस्कार के लिए उजागर किए जाने थे। इसलिए उनकी मृत्यु ने उनकी व्यर्थता को प्रकट कर दिया, क्योंकि इससे यह प्रकट हुआ कि वे परमेश्वर के भेजे हुए नहीं थे। यह सत्य है कि परमेश्वर के विश्वासयोग्य सेवकों के साथ प्रायः अधर्मियों द्वारा क्रूर व्यवहार किया जाता है, वरन् वे मार भी डाले जाते हैं। परन्तु इन दोनों का मामला भिन्न था। क्योंकि वे इस कारण झूठे सिद्ध नहीं हुए कि उन्होंने संयोग से अभागेपन में भविष्यद्वाणी की थी, परन्तु इस कारण कि उन्होंने मानो एक झण्डा खड़ा किया, और कहा कि प्रजा शीघ्र अपने देश को लौट जाएगी; और इसी कारण वे मार डाले गए। तब हम देखते हैं कि जो होनेवाला था उसकी पूर्वसूचना यिर्मयाह ने अकारण नहीं दी; क्योंकि उनकी मृत्यु से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता था कि प्रजा के लौटने के विषय में उन्होंने जो कुछ प्रतिज्ञा की थी, वह सब कोरा छल था; और वे उस समय से भी पहले मार डाले गए जिसकी उन्होंने भविष्यद्वाणी की थी। अब हम अर्थ समझते हैं। अब हम शब्दों पर ध्यान देंगे।
वह कहता है, हे सारी बँधुआई, यहोवा का वचन सुनो। वह चाहता था कि यहूदी ध्यान दें, क्योंकि यदि हज़ार धोखेबाज़ भी मार डाले जाते, तौभी झूठ पर उनका विश्वास कभी नष्ट न होता, यदि यिर्मयाह ने समय से पहले ही भविष्यद्वाणी न कर दी होती कि क्या होनेवाला है। इसलिए वह यहाँ न्यायी के रूप में बैठता है; क्योंकि यद्यपि नबूकदनेस्सर ने उन्हें मार डालने की आज्ञा दी, तौभी यह स्पष्ट प्रकट होता है कि यह परमेश्वर द्वारा ठहराया गया था, और वास्तव में इसी उद्देश्य से कि प्रजा पश्चाताप करना सीखे। इसलिए हम देखते हैं कि यिर्मयाह उनका न्यायी था; और नबूकदनेस्सर ने बाद में वह पूरा किया जो परमेश्वर ने अपने दास के मुख से न्याय के रूप में सुनाया था। यही कारण है कि उसने अपने शब्द सारी प्रजा को सम्बोधित किए।
तौभी वह साथ ही यह भी जोड़ता है कि वे परमेश्वर द्वारा भेजे गए थे, जिन्हें मैं ने भेजा है, इत्यादि; और उसने यह इसलिए कहा कि वे यह न समझें कि वे संयोग से या प्रतिकूल भाग्य से वहाँ गए थे, और कि वे स्वीकार करें कि जब वे अपने देश से वंचित किए गए, तो यह उनके पापों का न्यायपूर्ण दण्ड था।
मैं उन्हें नबूकदनेस्सर के हाथ में दूँगा (या कर दूँगा) कहकर भविष्यद्वक्ता उस बात को और भी स्पष्ट रूप से व्यक्त करता है जो मैंने अभी कही है, कि वे राजा की आज्ञा से इस प्रकार मार डाले जाएँगे, क्योंकि परमेश्वर ने निश्चित कर दिया था कि उनके साथ क्या किया जाए। और वह उनकी मृत्यु का कारण बताता है अथवा उसके कर्ता का उल्लेख करता है, जिससे यहूदी अपनी आँखें बाबुल के राजा पर न लगाएँ। नबूकदनेस्सर का उद्देश्य क्या था? एक शान्तिपूर्ण राज्य बनाए रखना; उसने देखा कि यदि वह इन दो मनुष्यों को, जिन्होंने प्रजा में अशान्ति फैलाई थी, क्षमा कर दे, तो उपद्रव का संकट है। इसलिए, कहीं ऐसा न हो कि यहूदी केवल राजा के अभिप्राय पर ही दृष्टि रखें, परमेश्वर यहाँ उनके सामने एक अन्य और उच्चतर कारण रखता है, अर्थात् यह कि उन्होंने उसके नाम से झूठी भविष्यद्वाणी की। इसके बाद एक अधिक स्पष्ट व्याख्या आती है, —
यिर्मयाह 29:22
22. और यहूदा के सब बँधुए जो बाबुल में हैं, उनकी उपमा देकर यह शाप दिया करेंगे, कि यहोवा तुझे सिदकिय्याह और अहाब के समान करे, जिन्हें बाबुल के राजा ने आग में भून डाला; 22 Et sumetur ab ipsis maledictio apud omnem captivatem Jehjudah, quae ist in Babylone, dicendo, Statuat to Jehova ut Zedechiam et sicut Achab, quos combussit rex Babylonis igni (vel, ustalavit, vel, frixit etiam, ut alii vertunt; {}קלהnon tantum significat comburere, sed ustulare, vel paulatim urere, quod idem est, sed Hieronymus vertit fuisse frictos;)
यहाँ हमें परिस्थितियों पर ध्यान देना है; क्योंकि यदि यिर्मयाह ने केवल उनकी मृत्यु की ही बात कही होती, तो यहूदियों को फिर भी सन्देह हो सकता था कि उसने कोई भविष्यद्वाणी की थी या नहीं; परन्तु अब जब यह भी जोड़ा गया है कि उन पर किस प्रकार का दण्ड डाला गया, तो यिर्मयाह मानो उँगली से उस बात की ओर संकेत करता है जो अब तक अज्ञात, वरन् अविश्वसनीय थी। यह सचमुच बन्दियों के साथ हो सकता था कि राजा उन्हें मार डालने की आज्ञा दे, परन्तु किसी मनुष्य के मन में यह बात नहीं आ सकती थी जो यिर्मयाह घोषित करता है, कि वे आग में भून डाले जाएँगे। इसलिए हम देखते हैं कि परमेश्वर यहाँ टेढ़े मनों के बहानों का निवारण करता है, जिससे बच निकलने का कोई स्थान न रहे, जब वह उस मृत्यु का प्रकार ही ठीक-ठीक बता देता है जो उन्हें भोगनी थी।
परन्तु वह पहले कहता है, उनसे एक शाप लिया जाएगा, अर्थात् शाप देने का सूत्र।
कल {,}אלהale, अर्थात् शपथ, का उल्लेख हुआ था; अब वह {,}קללהkolle रखता है; और {,}קללkoll का अर्थ शाप देना है। तब अर्थ यह है कि वे सब बन्दियों के लिए शाप का एक नमूना बन जाएँगे, जो कहेंगे, परमेश्वर तुझे सिदकिय्याह के समान और अहाब के समान करे, जिन्हें बाबुल के राजा ने भून डाला। उनकी मृत्यु का कारण फिर से दोहराया गया है; और भविष्यद्वक्ता ने अकारण इस पर बल नहीं दिया, ताकि वह प्रजा की आँखों को उस निकटवर्ती कारण से हटा दे जो सब को ज्ञात था, अर्थात् यह कि नबूकदनेस्सर अपने राज्य में किसी उपद्रव का उठना सहन नहीं करेगा; इसलिए कि वे परमेश्वर को इस दण्ड का कर्ता स्वीकार करें, वह कहता है, —
यिर्मयाह 29:23
23. क्योंकि उन्होंने इस्राएल में मूढ़ता के काम किए हैं, और अपने पड़ोसियों की स्त्रियों के साथ व्यभिचार किया है, और मेरे नाम से झूठे वचन कहे हैं, जिनकी आज्ञा मैं ने उन्हें नहीं दी थी; मैं ही जानता हूँ, और मैं ही साक्षी हूँ, यहोवा की यही वाणी है।
23. Propterea quod fecerunt (vel, patrarunt) flagitium in Israel, et scortati sunt cum uxoribus sociorum suorum, et locuti sunt sermonem in nomine meo mendaciter; quod (vel, quem sermonem) non mandaveram ipsis; ego autem sum cognitor et testis, dicit Jehova.
220 “भूनना” वह शब्द है जिसका प्रयोग सेप्टुआजिंट, वुलगेट, सीरियाई अनुवाद और तरगूम करते हैं। इब्रानी शब्द क्रिया के रूप में और किसी स्थान पर नहीं मिलता, परन्तु कृदन्त के रूप में भुने हुए अन्न के लिए प्रयुक्त हुआ है, लैव्यव्यवस्था 2:14; यहोशू 11। — सं.
हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता उनकी मृत्यु का कारण क्यों बताता है; वह यह था, कि यहूदी उस घटना को अपने ही विचारों के अनुसार न देखें, परन्तु निश्चय जान लें कि परमेश्वर ने उन लोगों की दुष्टता का पलटा लिया जिन्होंने झूठ-मूठ उसके नाम का बहाना किया था। क्योंकि हम जानते हैं कि हम सदा इधर-उधर ताकते रहते हैं, और जब हमें कोई निकट का कारण मिल जाता है, तब हम परमेश्वर के न्यायों की उपेक्षा करते और उन्हें कुछ भी नहीं समझते। अतः इस बुराई को सुधारने के लिए यिर्मयाह फिर दोहराता है कि सिदकिय्याह और अहाब को बाबुल के राजा ने नहीं, वरन् स्वयं परमेश्वर ने दण्ड दिया, क्योंकि उन्होंने इस्राएल में मूर्खता का घृणित काम किया था। कुछ लोग {,}נבלהnubele का अनुवाद “घोर अपराध” या “घृणित काम” करते हैं; परन्तु मैं इसका अनुवाद “नीचता,” या “लज्जाजनक काम,” या “अशुद्धता” करना उचित समझता हूँ। अतः उन्होंने एक अशुद्ध काम किया। इसके बाद वह उसके दो प्रकार बताता है, कि उन्होंने अपने मित्रों की पत्नियों के साथ व्यभिचार किया, और कि उन्होंने परमेश्वर के नाम से झूठी भविष्यद्वाणी की।
पहले वाक्यांश से हम देखते हैं कि लोगों की मूढ़ता कितनी बड़ी थी, क्योंकि उन्होंने यह विचार नहीं किया कि उन लोगों का जीवन कैसा था जो परमेश्वर के गवाह होने का बहाना करते थे, मानो वे स्वर्ग से उतरे हुए स्वर्गदूत हों। उनकी दुष्टता वास्तव में छिपी रह सकती थी; परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि यहूदी अत्यन्त मूढ़ थे, क्योंकि उन्होंने उन व्यर्थ प्रतिज्ञाओं को स्वेच्छा से पकड़ लिया था जो उन्हें सुख देती थीं।
अतः जब वे लौटने को उतावले थे, और मानो परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध अपने देश में फिर पहुँचाए जाना चाहते थे, और अपने हठ के बल से सब बाधाओं को तोड़ डालने का यत्न करते थे; तो यह उचित दण्ड था कि वे ऐसे अन्धे कर दिए गए कि जो बात पर्याप्त रूप से प्रकट थी उसे भी न देख सके, अर्थात् यह कि ये डींग मारनेवाले भविष्यद्वक्ता व्यभिचारी थे, और उनके जीवन की अशुद्धता इतनी बड़ी थी कि यह निश्चित था कि उनमें कुछ भी ईश्वरीय या स्वर्गीय नहीं था।
फिर एक और प्रकार की बुराई जोड़ी गई है, कि उन्होंने परमेश्वर के नाम से झूठी भविष्यद्वाणी की। यह एक जघन्य अपराध था; क्योंकि जिस प्रकार परमेश्वर को अपनी सच्चाई प्रिय है, उसी प्रकार जब उसकी सच्चाई झूठ में बदल दी जाती है, तो यह ऐसा अपवित्र कर्म है जिसे वह सह नहीं सकता। परन्तु जब सब के मन इतने भ्रष्ट हो गए थे कि कोई भी अपनी आँखें नहीं खोलता था, तब परमेश्वर साक्षी देता है कि चाहे उनके व्यभिचार लोगों से छिपे रहें, चाहे उनकी झूठी भविष्यद्वाणियों का खोखलापन पहचाना न जाए, तौभी इतना पर्याप्त था कि वह स्वयं जानता था और गवाह था।
अब यह स्थान विशेष ध्यान देने योग्य है; क्योंकि कपटी लोग, जब तक यह न देख लें कि मनुष्यों के सामने उनका दोष सिद्ध हो गया है, तब तक किसी बात से नहीं डरते, वरन् जब उन पर ठीक ही दोष लगाए जाते हैं, तब भी वे घमण्ड से अपने आप को ऊँचा उठाते हैं। अतः जब कपटियों की कठोरता और बेईमानी इतनी बड़ी है, तो आवश्यक है कि उन्हें परमेश्वर के न्यायासन के सामने बुलाया जाए, ताकि वे जान लें कि संसार उन्हें सौ बार भी निर्दोष ठहरा दे, तौभी इससे परमेश्वर के न्याय में कुछ भी कमी नहीं होती। अब आगे यह है—
यिर्मयाह 29:24-27
24. और नेहेलामी शमायाह से तू यह कह,
24. Et ad Semaiah Nehelamitem dices, dicendo, (sic dices,)
221 सेप्टुआजिंट में “अधर्म” है; वुलगेट में “मूर्खता”; सीरियाई में “अपराध” या दोष; और तरगूम में “अपमान।” इसका अर्थ नीचता या घृणित काम है। इसका प्रयोग वेश्यागमन के पाप के लिए हुआ है, उत्पत्ति 34:7, — चोरी के लिए, यहोशू 7:15, — हत्या के लिए, न्यायियों 20:6, — सदोम के पाप के लिए, न्यायियों 19:24, — अगम्यागमन के लिए, 2 शमूएल 13:12, — और घोर कृतघ्नता के लिए, 1 शमूएल 25:25। इन सब स्थानों के लिए सबसे उपयुक्त शब्द “घृणित काम” है, न कि “मूर्खता,” जैसा हमारे अनुवाद में है। इसका अर्थ है वह जो घृणास्पद, नीच, तुच्छ या घिनौना हो। यहाँ इसका संकेत उस बात की ओर है जो घिनौने रूप से अशुद्ध थी — व्यभिचार; और उस बात की ओर जो घिनौने रूप से दुष्ट और ढिठाई की थी — परमेश्वर के नाम से झूठ बोलना। — सं.
25. इस्राएल का परमेश्वर सेनाओं का यहोवा यों कहता है, इसलिये कि तू ने यरूशलेम के सब रहनेवालों को और मासेयाह के पुत्र सपन्याह याजक को और सब याजकों को अपने ही नाम की इस आशय की पत्री भेजी,
25. Sic dicit Jehova exercituum, Deus Israel, dicendo, Propterea quod tu misisti in nomine meo literas ad totum populum, qui est Jerosolymae, et ad Zephaniam filium Maassiae, et ad cunctos sacerdotes, dicendo,
26. कि यहोवा ने यहोयादा याजक के स्थान पर तुझे याजक ठहरा दिया, ताकि तुम यहोवा के भवन में अधिकारी हो, कि जितने पागल हों और अपने को नबी बना लें, उन्हें तू बन्दीगृह में और काठ में डाले।
26. Jehova posuit to (vel, constituit to) sacerdotem pro Jehoiada sacerdote, ut sitis praefecti domus Jehovae super omnem virum insanum (vel, arreptitium) et prophetantem, ut ponas ipsum in carcem (alii vertunt, in cippum) et in compedes (vel, manicas, quod aliis magis placet.)
27. इसलिये अनातोती यिर्मयाह जो तुम्हारा नबी बन बैठा है, उसको तू ने क्यों नहीं घुड़का?
27. Et tu quare non increpuisti Jeremiam Anathotitem, qui prophetat vobis?
यहाँ यिर्मयाह एक तीसरे व्यक्ति के विषय में भविष्यद्वाणी करता है, जिसने याजकों और सारी प्रजा को स्वयं उसके विरुद्ध एक पत्री लिखी थी, और महायाजक तथा औरों से इस बात पर विवाद किया था कि यिर्मयाह बहुत समय से बिना दण्ड पाए लोगों को उपदेश देता रहा है कि वे अपनी लम्बी बन्धुआई को सह लें। इस स्थान का आशय यही है; परन्तु उसका दण्ड क्या था, यह हम अध्याय के अन्त में देखेंगे। मैंने पूरा भाग नहीं लेना चाहा, क्योंकि मैं आज यह भविष्यद्वाणी समाप्त नहीं कर सकता। इसलिये मैंने केवल पहला भाग लिया है, अर्थात् यह कि शमायाह ने न केवल, जैसा और लोग करते थे, प्रजा को लौटने की आशा रखने और उपद्रव खड़ा करने के लिए उकसाया था, वरन् यरूशलेम में भी अपना विष फैलाया था, और यिर्मयाह को घृणा का पात्र बनाने का यत्न किया था, ताकि वह एक झूठे भविष्यद्वक्ता के रूप में, और सार्वजनिक भलाई का, तथा व्यवस्था और मन्दिर का भी शत्रु ठहराकर मार डाला जाए।
222 उसे “नेहेलामी” कहा गया है। कुछ लोग इस शब्द का अनुवाद “स्वप्न देखनेवाला” करते हैं: परन्तु, जैसा ब्लेनी कहता है, “इसका प्रत्यय बताता है कि यह एक पितृवंश-सूचक नाम है।” सम्भवतः इसका संकेत उसके जन्मस्थान की ओर है। — सं.
अतः तू शमायाह से या शमायाह के विषय में कहना, क्योंकि {,}אלal दोनों अर्थों में लिया जा सकता है। अब उसका अपराध बताया गया है, उसका दण्ड क्या था यह हम आगे देखेंगे। उसका अपराध यह था, कि उसने परमेश्वर के नाम से लिखा। यदि वह केवल क्रूरता को भड़कानेवाला होता, तब भी वह क्षमा के योग्य न होता; परन्तु उसका अपराध दुगुना था, क्योंकि उसने परमेश्वर के अधिकार का बहाना करने और यह डींग मारने का साहस किया कि वह मानो उसका लेखक है, मानो वह कह रहा हो कि उसकी पत्री पवित्र आत्मा ने लिखवाई है, कि उसने अपने ही विचार या ढिठाई से कुछ नहीं कहा, परन्तु यह कि परमेश्वर उस स्वतन्त्रता को सह नहीं सकता जो यिर्मयाह को दी गई थी; क्योंकि यद्यपि वह निरन्तर लम्बी बन्धुआई का प्रचार करता था, तौभी महायाजक उसे सहता रहा, और सारी याजकीय श्रेणी में से किसी ने उसका विरोध नहीं किया; और साथ ही वह लोगों को भी उनकी ढील के लिए दोष देता है। उसने यह सब परमेश्वर के नाम से किया, यह इससे कहीं अधिक गम्भीर बात थी कि वह एक साधारण व्यक्ति के रूप में लिखता। और यह कहा गया है कि उसने सारी प्रजा को लिखा था, इसी उद्देश्य से कि वे सब एक साथ मिलकर यिर्मयाह के विरुद्ध उठ खड़े हों। क्योंकि यदि वह केवल याजकों को लिखता, तो वे यह आपत्ति कर सकते थे कि उन्हें यिर्मयाह के विरुद्ध इतनी कठोरता से काम करने की स्वतन्त्रता नहीं है, क्योंकि इससे बलवा खड़ा हो सकता है। इससे हम इस नीच मनुष्य की धूर्तता देखते हैं; यद्यपि वह लोगों को तुच्छ जानता था, तौभी इसलिये कि वे सब, छोटे से छोटा भी, क्रूरता के इस काम में याजकों की सहायता करें, और कि सब में एकता हो, उसने अपनी पत्री में सारी प्रजा को सम्मिलित कर लिया।
इसके बाद उसने याजक का और सब याजकों का उल्लेख किया। एकवचन में “याजक” शब्द का अर्थ महायाजक था: फिर “याजक” केवल हारून के वंशज ही नहीं थे, वरन् सब लेवीय भी। एक तो महायाजक था, और फिर हारून के वंशज प्रधान थे, और मानो महायाजक के सहकर्मी थे; परन्तु लेवीय निचली श्रेणी के थे, यद्यपि यहाँ “याजकों” से उसका अर्थ लेवीय भी है।
यहाँ पत्री का विषय आता है, यहोवा ने तुझे याजक ठहराया है, इत्यादि। यहाँ धोखेबाज़ शमायाह महायाजक पर कृतघ्नता का दोष लगाता है, क्योंकि वह किसी दूसरे के स्थान पर चुना गया था। क्योंकि सम्भव है कि यहोयादा अभी जीवित था, परन्तु अन्य बन्धुओं के साथ कसदियों के देश में ले जाया गया था। अतः जब इतना ऊँचा पद आशा के विपरीत और समय से पहले महायाजक को मिल गया था, तो झूठा भविष्यद्वक्ता उसे डाँटता है कि उसने परमेश्वर के इस अनुग्रह को ठीक रीति से नहीं माना, मानो वह कह रहा हो कि वह उस परमेश्वर को अयोग्य प्रतिफल दे रहा है जिसने उसे उस ऊँचे पद पर पहुँचाया था: वह कहता है, परमेश्वर ने यहोयादा याजक के स्थान पर तुझे याजक ठहराया है। इस प्रकार शैतान के सेवक अपने आप को ज्योतिर्मय स्वर्गदूतों का रूप धारण कराते हैं; तौभी वे परमेश्वर के सेवकों की ऐसी चतुराई से नकल नहीं कर सकते कि उनका छल तुरन्त प्रकट न हो जाए; क्योंकि धूर्तता उचित और विवेकपूर्ण सम्मति से बहुत भिन्न है। परमेश्वर अपने सेवकों को सम्मति और बुद्धि देता है; परन्तु शैतान धूर्तता और छल देता है। अतः यद्यपि पहली दृष्टि में झूठे भविष्यद्वक्ता की इस पत्री में कुछ चतुराई दिखाई देती है, तौभी हम उसकी विषय-वस्तु से यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि उसने झूठ-मूठ परमेश्वर के नाम का बहाना किया, कि उसने झूठ-मूठ यह दावा किया कि महायाजक यहोयादा के स्थान पर चुना गया था। वह कहता है, ताकि तुम हो: पहले वह महायाजक को सम्बोधित करता है, परन्तु अब वह औरों को भी सम्मिलित करता है, कि तुम परमेश्वर के भवन के रखवाले या अधिकारी हो। क्योंकि यद्यपि प्रधान अधिकार महायाजक के हाथ में था, तौभी वह अकेला सब कुछ नहीं सम्भाल सकता था, इसलिये आवश्यक था कि और लोग भी उसके साथ जुड़े हों।
यही कारण है कि शमायाह न केवल यह कहता है कि महायाजक परमेश्वर के मन्दिर में अधिकारी था, परन्तु उसे सर्वोच्च सम्मान में रखने के बाद औरों का भी उल्लेख करता है।
223 इब्रानी यह है, “कि यहोवा के भवन में हर एक के लिए अध्यक्ष हों,” इत्यादि। वह इसी उद्देश्य के लिए महायाजक के अधीन एक याजक था। सपन्याह अधिकार में दूसरे स्थान पर था, जैसा अध्याय 52:24 से प्रकट होता है। सम्भवतः वह मन्दिर का प्रधान या अधिपति था, जैसा पशहूर था, यिर्मयाह 20:1। इसी कारण इस वाक्यांश के विषय में तरगूम का भावानुवाद है, “कि तू प्रभु के पवित्रस्थान के भवन में हर एक के लिए याजकों का प्रधान ठहराया जाए,” इत्यादि। ब्लेनी इसे सम्भव समझता है कि सपन्याह उस पद पर यहोयादा नामक एक याजक का उत्तराधिकारी हुआ, जो या तो बुरे आचरण के कारण पदच्युत किया गया था या बन्धुआई में ले जाया गया था। गैटेकर और ग्रोशियस समझते हैं कि यहाँ संकेत यहोयादा याजक की ओर है, जो योआश के राज्यकाल में उत्साही सुधारक था, 2 राजा 11 और 12; और कि शमायाह का उद्देश्य सपन्याह को परमेश्वर के भवन के लिए वैसा ही उत्साह दिखाने को उभारना था। यदि ऐसा है, तो यहाँ एक ऐसा उदाहरण है, जो असामान्य नहीं, जिसमें उत्साह के एक अच्छे आदर्श को इस उद्देश्य से बिगाड़ा गया कि अत्याचार करने और सत्य को दबाने में उत्साह को बढ़ावा मिले। यह कुछ विचित्र बात है कि सब प्राचीन अनुवाद, और तरगूम भी, “अध्यक्ष” या अधिकारी को एकवचन में देते हैं; वुलगेट में है, “कि तू हर एक के ऊपर… प्रधान हो;” सेप्टुआजिंट में, “कि तू निर्णायक हो;” सीरियाई में, “कि तू परीक्षक हो।” परन्तु ऐसे पाठ के पक्ष में कोई हस्तलिपियाँ नहीं हैं। — सं.
वह कहता है, हर एक पागल मनुष्य के विरुद्ध; जेरोम ने {,}משגעmeshego का अनुवाद ऐसा ही किया है, और मेरी समझ में अनुचित नहीं; क्योंकि इस शब्द का ठीक अर्थ वह है जो विक्षिप्त हो: परन्तु यह झूठे शिक्षकों पर लागू किया जाता था, क्योंकि वे डींग मारते थे कि वे ईश्वरीय प्रेरणा के अधीन हैं, जब कि वे अपने ही विचार बोलते थे। यह होशे के नौवें अध्याय से स्पष्ट प्रकट होता है, जहाँ कहा गया है कि लोग अन्त में मान लेंगे कि जिन भविष्यद्वक्ताओं ने उनकी चापलूसी की थी वे विक्षिप्त थे, और आत्मा के मनुष्य पागल थे। भविष्यद्वक्ता ने उन्हें दोनों नाम दिए, कि वे भविष्यद्वक्ता और आत्मा के मनुष्य, अर्थात् आत्मिक, थे; परन्तु उसने सिद्ध किया कि उनके पास केवल नाम था, वास्तविकता नहीं: क्योंकि भविष्यद्वक्ता आत्मिक मनुष्य इसलिये कहलाते थे कि परमेश्वर उन्हें अपने आत्मा से प्रेरित करता था; परन्तु भक्तिहीन लोग, जब सच्चे भविष्यद्वक्ताओं की निन्दा करना चाहते थे, तब उन्हें पागल कहते थे। ऐसा ही वे लोग बोले जो येहू के साथ थे, जब एक भविष्यद्वक्ता उसका अभिषेक करने आया, “यह बावला क्यों आया था?” यही शब्द {,}משגעmeshego उन्होंने प्रयोग किया; और उन्होंने उसे तुच्छता से पागल कहा, जो तौभी आत्मा की गुप्त प्रेरणा से बोला था। (2 राजा 9:11।) इसी प्रकार भक्तिहीन लोग परमेश्वर का तिरस्कार करते हुए पवित्रशास्त्र में पाई जानेवाली हर बात के विरुद्ध बकवाद करते हैं।
परन्तु जैसा पहले कहा जा चुका है, परमेश्वर के सच्चे सेवकों और केवल नाम के सेवकों में भेद करना आवश्यक था; क्योंकि बहुत से लोग डींग मारते थे कि वे परमेश्वर के बुलाए हुए हैं, तौभी वे धोखेबाज़ थे। अतः परमेश्वर ने इन्हें पागल और विक्षिप्त कहा; परन्तु भक्तिहीनों ने क्या किया? उन्होंने वह निन्दा परमेश्वर के वैध सेवकों पर डाल दी। इसी प्रकार, इस स्थान में शमायाह कहता है कि यिर्मयाह पागल था, जो झूठ-मूठ परमेश्वर के नाम का बहाना करता और झूठी भविष्यद्वाणी करता था।
वह आगे कहता है, कि तू उसे बन्दीगृह में डाले, या उसे बन्दीगृह में या काठ में डाल दे, जैसा कुछ लोग इस शब्द का अनुवाद करते हैं। फिर वह कहता है, हथकड़ियों में, अर्थात् तू उसे बाँध दे, जब तक उसकी अभक्ति प्रकट न हो जाए, ताकि तू उसे बन्दीगृह में रोके रखे।
यह वास्तव में सम्भव है कि महायाजकों ने अव्यवस्थित परिस्थिति के समय यह अधिकार अपने हाथ में ले लिया था। निस्सन्देह यह कार्यवाही एक अच्छे सिद्धान्त से निकली थी; क्योंकि परमेश्वर ने सदा यही चाहा कि उसकी कलीसिया का भली-भाँति शासन हो: इसलिये उसने अपनी व्यवस्था में आज्ञा दी कि जब कोई विवाद या प्रश्न उठे, तो महायाजक न्यायी हो, (व्यवस्थाविवरण 17:8, 9;) परन्तु जब यहाँ बन्दीगृह और हथकड़ियों का उल्लेख किया गया है, तो वह निस्सन्देह व्यवस्था से बाहर का कार्य था। इसलिये सम्भव है कि यह परमेश्वर की व्यवस्था में तब जोड़ा गया जब यहूदियों में परिस्थिति अव्यवस्था और गड़बड़ी में थी। और इस बुराई का मूल क्या था? याजकों का अज्ञान और आलस्य। उन्हें सेनाओं के परमेश्वर के दूत, व्यवस्था के व्याख्याता होना चाहिए था, सत्य उन्हीं के मुँह से खोजा जाना चाहिए था; परन्तु वे गूँगे कुत्ते थे, वरन् वे इतने पतित हो गए थे कि उनमें याजकों जैसी कोई बात नहीं पाई जाती थी; वे व्यवस्था को भूल गए थे, उनमें कोई धर्म नहीं था। अतः जब उन्होंने अपने पद की उपेक्षा की थी, तो दूसरे भविष्यद्वक्ताओं को चुनना आवश्यक था: और जैसा हम अन्यत्र कह चुके हैं, यह मानो आकस्मिक बात थी कि परमेश्वर ने साधारण लोगों में से भविष्यद्वक्ता खड़े किए। प्राचीन कलीसिया में सदा भविष्यद्वक्ताओं का होना वास्तव में आवश्यक था; परन्तु परमेश्वर उन्हें लेवियों में से ही लेता, यदि उसका यह अभिप्राय न होता कि वह सारी प्रजा के सामने उन्हें लज्जित करे, जब उसने चरवाहों में से भी भविष्यद्वक्ता बनाए, जैसा आमोस के विषय में हुआ।
224 {{משנע शब्द का अनुवाद सेप्टुआजिंट में “उन्मत्त,” — वुलगेट में “पागल,” — सीरियाई में “झूठ में बकनेवाला,” — और तरगूम में “मूर्ख” किया गया है। भविष्यद्वक्ताओं पर लागू होने पर इसका अर्थ है वह जो भावावेश या आत्म-विभोरता में हो, चाहे सच्चा हो या झूठा, — एक उत्साहोन्मत्त व्यक्ति, परन्तु अधिकतर बुरे अर्थ में लिया जाता है। अगला शब्द हिथपाएल में है, “स्वयं-भविष्यद्वाणी करनेवाला,” या अपनी ओर से भविष्यद्वाणी करनेवाला, जिसे परमेश्वर ने भविष्यद्वक्ता नहीं बनाया; सेप्टुआजिंट, वुलगेट और सीरियाई में इसका अपूर्ण अनुवाद “भविष्यद्वाणी करनेवाला” किया गया है। इसका अनुवाद “भविष्यद्वक्ता होने का बहाना करनेवाला” किया जा सकता है। — सं.
225 अन्तिम शब्द केवल यहीं मिलता है, और सेप्टुआजिंट में इसका अनुवाद “कालकोठरी” और वुलगेट, सीरियाई तथा तरगूम में “बन्दीगृह” किया गया है। पार्कहर्स्ट कहता है कि सामरी अनुवाद निर्गमन 14:3 में इसे क्रिया के रूप में बन्द करने, घेर लेने के अर्थ में प्रयोग करता है। अतः यह संज्ञा भली-भाँति बन्दीगृह को सूचित कर सकती है। — सं.
अतः जब याजकों ने भविष्यद्वक्ता का पद साधारण लोगों को हस्तान्तरित हो जाने दिया, तो एक नई युक्ति निकाली गई, ताकि उनकी कोई हानि न हो, जैसा पोप-तन्त्र के अधीन है; क्योंकि हम जानते हैं कि बिशप कलीसिया में और किसी कारण से नहीं, केवल इसलिये शासक बनाए जाते हैं कि पासबान और शिक्षक हों। क्योंकि इन गदहों का क्या उपयोग हो सकता था, जिनके विषय में हम जानते हैं कि वे अधिकतर सब प्रकार की विद्या से रहित हैं? वे लोग क्या कर सकते थे जो अपवित्र हैं, और अपने भोग-विलास और सुखों में लिप्त हैं?
संक्षेप में, जुआरी और दलाल क्या कर सकते थे? क्योंकि पोप के लगभग सब बिशप ऐसे ही हैं। इसलिये आवश्यक था कि वे अपना पद झगड़ालू सन्यासियों को सौंप दें, “तुम शिक्षा दो, क्योंकि हम मंच तुम्हें सौंपते हैं।” परन्तु साथ ही उन्होंने न्याय का अधिकार अपने ही हाथों में रखा: जब कोई विवाद उठता, तो न तो शोर मचानेवाले झगड़ालू और न गूँगे पशु अपने आप से कुछ निर्णय कर सकते थे; क्योंकि पिछलों को अज्ञान रोकता था, और पहलों के पास अधिकार का अभाव था। तो फिर पहले बिशप विधर्मियों को कैसे दोषी ठहराते थे? और अब भी उन्हें कैसे दोषी ठहराते हैं?
इस प्रकार: जब कोई कार्मेलाइट होता, तो वे फ्रांसिस्कनों को बुलाते थे; और जब कोई अगस्तीनी होता, तो डोमिनिकनों को बुलाया जाता था। क्योंकि, जैसा मैंने कहा है, इन गूँगे पशुओं के पास न ज्ञान था न बुद्धि। तौभी जब वे विधर्मियों को दोषी ठहराने में दण्डाज्ञा सुनाते थे, तब बिशपों या उनके प्रतिनिधियों द्वारा एक प्रकार की प्रतिष्ठा बनाए रखी जाती थी।
और सम्भवतः प्राचीन प्रजा में भी ऐसा ही था; क्योंकि जो लोग भविष्यद्वक्ता होने का बहाना करते थे वे बुलाए जाते थे, और वह भी महायाजक के अधिकार से, व्यवस्था के बहाने, परन्तु उसमें कुछ भ्रष्टता मिलाए बिना नहीं; क्योंकि परमेश्वर ने याजकों को बेड़ियाँ और हथकड़ियाँ इसलिये नहीं दी थीं कि वे इस प्रकार उन लोगों को रोकें जो उपद्रव खड़ा करें और शुद्ध सत्य को भ्रष्ट करें। परन्तु जो शेष है उसे मैं अगले व्याख्यान तक टालता हूँ।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जब हम झूठ की ओर झुके हुए हैं और पूरी रीति से व्यर्थता में लीन हैं, तो हम तेरे आत्मा के द्वारा चलाए जाएँ, और तेरी आज्ञा मानने के सिवा और कुछ न चाहें; और जब हम अपने आप को तेरे चेलों के रूप में तुझे अर्पित करते हैं, तो यह वरदान दे कि तेरे वचन की ज्योति अपने आगे चमकती हुई पाकर, हम उस मार्ग पर चलें जो तू हमें दिखाता है, और इस प्रकार सीधे मार्ग में स्थिर बने रहें, जब तक कि हम अन्त में उस धन्य विश्राम में न पहुँचें जो स्वर्ग में हमारे लिए तैयार किया गया है, हमारे प्रभु मसीह के द्वारा। — आमीन।
एक सौ तेरहवाँ व्याख्यान
पिछले व्याख्यान में हमने उस पत्री का सार देखा जो शमायाह ने महायाजक को लिखी थी। उसने उसकी उपेक्षा के लिए उसे डाँटा, क्योंकि उसने अपने पद के अधिकार और कर्तव्य के अनुसार यिर्मयाह का मुँह बन्द नहीं किया। इसका रूप तो विश्वसनीय दिखाई देता था; परन्तु जो सिद्धान्त उसने मान लिया वह झूठा था, — कि यिर्मयाह झूठ-मूठ परमेश्वर के नाम का बहाना करता था, और भेजा नहीं गया था, और उसे भविष्यद्वाणी करने की कोई आज्ञा नहीं मिली थी; यह झूठ था। अतः भविष्यद्वक्ता अब ठीक ही उसका विरोध करता है, और वह दण्ड सुनाता है जिसके वह योग्य था। फिर आगे यह है, —
यिर्मयाह 29:28-29
226 भविष्यद्वाणी करने की क्रिया पहले की तरह हिथपाएल में है; वह अब भी यिर्मयाह को ऐसा व्यक्ति दर्शाता है जिसने अपने आप को भविष्यद्वक्ता बना लिया, — “जो अपनी ओर से तुम से भविष्यद्वाणी करता है;” न कि जैसा ब्लेनी इस वाक्यांश का अनुवाद करता है, “जो तुम्हारे बीच अपने आप को भविष्यद्वक्ता बताता है।” उसका अभिप्राय यह था कि जो कुछ यिर्मयाह ने भविष्यद्वाणी की वह उसकी अपनी ओर से थी, ठीक वही बात जो परमेश्वर ने झूठे भविष्यद्वक्ताओं पर आरोपित की थी; इस प्रकार दुष्ट मनुष्य भलों पर ठीक वही पाप लगाते हैं जिसके दोषी वे स्वयं हैं। — सं.
28. उस ने तो बाबुल में हमारे पास यह कहला भेजा है कि बन्धुआई तो बहुत काल तक रहेगी, इसलिये घर बनाकर उन में रहो, और बारियाँ लगाकर उनके फल खाओ।
28. Nempe quia misit (vel, quia ideo, ad verbum, quia ob id, vel, propterea) ad nos in Babylonem, dicendo, Longum est (tempus exilii,) aedificate domos et habitate, plantate hortos et comedite fractum eorum.
29. यह पत्री सपन्याह याजक ने यिर्मयाह नबी को पढ़ सुनाई।
29. Legerat autem Zephania epistolam hanc in auribus Jeremiae prophetae.
यिर्मयाह पर जो अपराध लगाया गया वह यह था, — कि उसने बन्धुओं को उदासीन बना दिया था, यहाँ तक कि उन्होंने छुटकारे की हर आशा त्याग दी, और अपने देश की चिन्ता छोड़ दी।
परन्तु यिर्मयाह का उद्देश्य बिलकुल भिन्न था; वह यह था, कि लोग अत्यधिक उतावली करके परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं से आगे न बढ़ जाएँ, और यह भी कि वह उनकी आशा को ठहराए हुए अन्त तक बढ़ाए। क्योंकि यहाँ दो कारणवाचक निपात पाए जाते हैं, -{}כי{ }על,}כן{ki ol-ken, कुछ लोग यह अनुवाद देते हैं, “क्योंकि इसी कारण,” अर्थात् इसलिये कि उसने भविष्यद्वक्ता का नाम धारण किया। परन्तु सरल अर्थ यह है, कि वह इसका कारण बताता है कि शमायाह ने याजक की उपेक्षा को क्यों दोष दिया, अर्थात् इसलिये कि उसने (यिर्मयाह ने) बन्धुओं को अपनी बन्धुआई सहने का अभ्यस्त बना दिया था। परन्तु उसने उस पवित्र जन की निन्दा की, मानो उसने लम्बे विलम्ब के द्वारा उन्हें उदासीन बना दिया हो। यिर्मयाह ने वास्तव में कहा था कि समय लम्बा होगा; परन्तु यह विशेष वाक्यांश, यह लम्बा है, कुछ और ही अर्थ रखता है, मानो यिर्मयाह लौटने की आशा को विस्मृति में गाड़ देना चाहता हो, क्योंकि इतने समय तक तरसते रहना मूर्खता होती।
आगे यह है, और सपन्याह ने पढ़ सुनाया था, इत्यादि। यहाँ पूर्ण भूतकाल अधिक उपयुक्त है, क्योंकि यह पद कोष्ठक में रखा जाना चाहिए। भविष्यद्वक्ता एक सन्देह को दूर करता है जो उठ सकता था। फिर वह दिखाता है कि वह भविष्यद्वाणी उसे कैसे ज्ञात हुई; जब पत्री पढ़ी गई तब वह सुननेवालों में से एक था। और सम्भव है कि याजक ने यिर्मयाह को जानबूझकर बुलाया, ताकि उसके अपने ही दोष लगानेवाले के द्वारा उसका दोष सिद्ध हो जाए। चाहे जो हो, वह उस पवित्र जन को लोगों की घृणा का, वरन् उनके क्रोध का पात्र बनाना चाहता था। यिर्मयाह की दृढ़ता और भी अधिक प्रशंसा के योग्य थी, क्योंकि उसने निडर होकर उन सब के घमण्ड को डाँटा, जिनके सामने और कोई उद्देश्य नहीं था सिवाय इसके कि बल और अत्याचार के द्वारा परमेश्वर की सच्चाई को दबा दें।
यिर्मयाह 29:30-32
30. तब यहोवा का यह वचन यिर्मयाह के पास पहुँचा,
30. Et fuit sermo Jehovae ad Jeremiam, dicendo,
31. सब बन्धुओं के पास यह कहला भेज कि यहोवा नेहेलामी शमायाह के विषय यों कहता है कि शमायाह ने जो मेरे बिना भेजे तुम से भविष्यद्वाणी की और तुम को झूठ पर भरोसा दिलाया है,
31. Mitte ad totam captivitatem, dicendo, Sic dicit Jehova de Semaiah Nehelamita, Propterea quod prophetavit vobis Semaiah, cum ego non miserim ipsum, et confidere vos fecit super mendacio;
32. इसलिये यहोवा यों कहता है कि मैं उस नेहेलामी शमायाह और उसके वंश को दण्ड दिया चाहता हूँ; उसके घर में से कोई इन प्रजाओं में न रह जाएगा। और जो भलाई मैं अपनी प्रजा की करनेवाला हूँ उसको वह देखने न पाएगा, क्योंकि उस ने यहोवा से फिर जाने की बातें कही हैं, यहोवा की यही वाणी है।
32. Ideo sic dicit Jehova, Ecce ego visitans (id est, visitabo) super Semaiah Nehelamitam, et super semen ejus, non erit illi vir, qui habitet in medio populi hujus, et non videbit bonum quod ego faciam populo meo, dicit Jehova, quia aversionem (vel, defectionem) loquutus est contra Jehovam.
यिर्मयाह स्पष्ट रूप से घोषणा करता है कि यह धोखेबाज़ दण्ड से नहीं बचेगा, क्योंकि उसने झूठ-मूठ परमेश्वर के नाम का बहाना करने का साहस किया था, और खुल्लमखुल्ला यिर्मयाह का विरोध किया था। अतः यहाँ भविष्यद्वक्ता कोई लम्बा प्रवचन नहीं करता, परन्तु इसके विपरीत आत्मा की सामर्थ्य से सीधे-सीधे घोषणा करता है कि क्या होनेवाला है। वह परमेश्वर के नाम से बोलता है, क्योंकि वह इस न्याय की घोषणा करने के लिए दूत के रूप में भेजा गया था। अतः यही कारण है कि वह इतना संक्षिप्त है; क्योंकि कोई विवाद नहीं होना था, यद्यपि दूसरी ओर वह धोखेबाज़ बहुत ऊँचा सिर उठाए फिरता था, और परमेश्वर के प्रकट किए हुए सत्य को, जिसकी बहुत से गवाहों ने पुष्टि की थी, उलट देने में संकोच नहीं करता था।
जो कहा गया है उसका सार यह है, कि शमायाह परमेश्वर का अनुग्रह नहीं देखेगा, और उसके वंश में से कोई जीवित नहीं बचेगा। व्यवस्था के अधीन यह एक शाप था, जैसा सब जानते हैं, कि किसी का वंश न बचे। (व्यवस्थाविवरण 28:18।) अतः यिर्मयाह शमायाह पर यह दण्ड सुनाता है, कि उसके वंश में से कोई जीवित न रहेगा, परन्तु वह निःसन्तान मरेगा; और फिर वह उसे उस लाभ के उपभोग से वंचित करता है जो प्रभु ने अपनी प्रजा को देने का निश्चय किया था। वह दो वर्ष के बाद अपने देश को लौटना चाहता था; यिर्मयाह ने लोगों को आज्ञा दी कि वे सत्तर वर्ष के अन्त तक, जो उनके छुटकारे का समय था, धीरज से अपनी बन्धुआई सहें।
अतः जब शमायाह ने उचित समय को तुच्छ जाना, तो वह उस घटना को देखने के अनुग्रह से वंचित कर दिया गया।
फिर कारण भी जोड़ा गया है; पहला, इसलिये कि उसने परमेश्वर के नाम का दुरुपयोग किया था; उसने भविष्यद्वाणी की और मैंने उसे नहीं भेजा था, प्रभु ने कहा; दूसरा कारण यह था, कि उसने लोगों को एक व्यर्थ आशा से धोखा दिया; झूठ अपने आप में भारी दण्ड के योग्य है; परन्तु जब वह परमेश्वर की प्रजा के लिए विनाशकारी था, तो वह और भी अधिक जघन्य हो गया, और इसलिये दोहरे दण्ड के योग्य था।
अब हम देखते हैं कि यिर्मयाह ने शमायाह के द्वारा दोषी ठहराए जाने को कुछ भी नहीं समझा; क्योंकि उसने अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखी; यद्यपि उस धोखेबाज़ ने उसके अधिकार को उलटने का यत्न किया, तौभी भविष्यद्वक्ता ऐसे बोलता है मानो वह पूर्णतः निष्कलंक हो और किसी निन्दा से न तो घायल हुआ हो और न प्रभावित। मन की यही उदारता और महानता सब विश्वासयोग्य शिक्षकों में होनी चाहिए, कि वे मानो ऊँचाई पर से सब धोखेबाज़ों को, और उनकी बकबक, और शापों को नीचे देखें, और अपने मार्ग पर आगे बढ़ते जाएँ, चाहे परमेश्वर के तिरस्कार करनेवाले कितनी ही ढिठाई से उनके विरुद्ध उठें, और उन्हें फाड़ें और निन्दाओं से दबा दें। अतः जो कोई परमेश्वर और उसकी कलीसिया की सेवा करना चाहते हैं, वे सब भविष्यद्वक्ता के इस उदाहरण का अनुसरण करें, ताकि जब वे देखें कि उन्हें बेईमान मनुष्यों से संघर्ष करना है, तो वे मन में निराश न हों।
परन्तु यिर्मयाह को आज्ञा दी गई है कि वह सब बन्धुओं को लिखे, क्योंकि शमायाह डाँटे जाने के भी योग्य न था; परन्तु परमेश्वर को निर्वासितों की सार्वजनिक भलाई की चिन्ता थी, और उसने उन्हें स्मरण दिलाया कि क्या होनेवाला है। वास्तव में सम्भव है कि यह भविष्यद्वाणी तब तक निष्फल रही, जब तक स्वयं घटना के द्वारा यह ज्ञात न हो गया कि यिर्मयाह ने अकारण इस प्रकार भविष्यद्वाणी नहीं की थी। अतः जब तक शमायाह मर न गया, और बिना किसी उत्तराधिकारी के न मरा, तब तक लोगों ने उस भविष्यद्वाणी की उपेक्षा की; परन्तु अन्त में वे यह मानने को विवश हुए कि यिर्मयाह ने अपने ही विचार नहीं बोले थे, परन्तु उसे परमेश्वर की ओर से सन्देश दिया गया था; क्योंकि परमेश्वर ने सचमुच वह पूरा किया जो उसने अपने भविष्यद्वक्ता के मुँह से पहले से कहा था।
अब वे दो कारण आते हैं जिनके लिए परमेश्वर ने शमायाह को दण्ड देने का निश्चय किया: पहला यह, कि उसने बिना बुलाहट के भविष्यद्वक्ता का पद हथिया लिया था; और इससे हम, जैसा पहले प्रकट हो चुका है, यह निष्कर्ष निकालते हैं कि यह पद, जो परमेश्वर के द्वारा स्थापित किया गया था, तब बिगाड़ा जाता था जब कोई बिना आज्ञा-पत्र के उसमें घुस आता था। अतः हम यह जान लें कि किसी को वैध शिक्षक नहीं माना जाना चाहिए, जब तक वह सचमुच यह न दिखा सके कि वह ऊपर से बुलाया गया है। मैंने कई स्थानों पर कहा है कि बुलाहट से दो बातें सम्बन्ध रखती थीं; जब कलीसिया की दशा अव्यवस्थित थी, अर्थात् जब याजकों ने शिक्षा देने के कर्तव्य की उपेक्षा की, और जो कुछ उनके पद की माँग थी उससे पूर्णतः हट गए, तब भीतरी बुलाहट ही मुख्य बात थी। अतः जब कलीसिया अव्यवस्थित हो गई, तब परमेश्वर ने भविष्यद्वक्ताओं को खड़ा करके एक असाधारण उपाय किया।
परन्तु जब कलीसिया ठीक और व्यवस्थित रीति से गठित हो, तब कोई यह डींग नहीं मार सकता कि वह पासबान या सेवक है, जब तक वह मनुष्यों के मतों के द्वारा भी बुलाया न गया हो। परन्तु जैसा मैं तेईसवें अध्याय पर इस विषय पर अधिक विस्तार से बोल चुका हूँ, अब मैं केवल संक्षेप में इसका उल्लेख करता हूँ।
जहाँ तक इस स्थान का प्रश्न है, जिसमें परमेश्वर शमायाह को बिना बुलाए अपने आप को घुसा देने के लिए दोषी ठहराता है, इसका अर्थ यह है कि उसने बिना किसी आज्ञा-पत्र के अपने ही स्वप्न प्रस्तुत किए; क्योंकि उस समय भविष्यद्वक्ता का पद विशेष था। अतः यहाँ शमायाह को एक धोखेबाज़ के रूप में अस्वीकार किया गया है, क्योंकि उसने केवल वे भविष्यद्वाणियाँ प्रस्तुत की थीं जो उसके अपने मस्तिष्क की उपज थीं, जिन्हें उसने तौभी झूठ-मूठ परमेश्वर की ओर से होने का बहाना किया; और यह अत्यन्त जघन्य अपराध था, क्योंकि शमायाह के समान परमेश्वर के नाम का दुरुपयोग करना एक अपवित्र कर्म था। परन्तु भविष्यद्वक्ता उसके पाप की जघन्यता को और भी आगे प्रकट करता है, यह कहकर कि उसकी भविष्यद्वाणियाँ लोगों के लिए विनाशकारी और घातक थीं। इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि परमेश्वर अपनी प्रजा की सुरक्षा के लिए कितना चिन्तित था, कि उसने उन झूठों का इस प्रकार पलटा लिया जो उन्हें विनाश की ओर ले जानेवाले थे; और यिर्मयाह दिखाता है कि शमायाह की शिक्षा विनाशकारी थी, क्योंकि उसने लोगों को झूठे भरोसे से मतवाला कर दिया था; वह कहता है, उसने तुम को झूठ पर भरोसा दिलाया; क्योंकि उसने उनसे शीघ्र लौटने की प्रतिज्ञा की, जब कि परमेश्वर की इच्छा यह थी कि यहूदी सत्तर वर्ष के अन्त तक धीरज से अपनी बन्धुआई सहें।
परन्तु हम इस स्थान से एक उपयोगी शिक्षा निकाल सकते हैं, — कि कलीसिया में इससे बढ़कर घातक और कुछ नहीं कि मनुष्य किसी झूठे भरोसे या आसरे के द्वारा भटका दिए जाएँ।
क्योंकि परमेश्वर के मुँह या वचन पर निर्भर रहना ही सब सच्चे धर्म की नींव है; और यही हमारे उद्धार की भी नींव है। अतः जैसे मनुष्यों का उद्धार और सच्चा धर्म दोनों विश्वास और विश्वास की आज्ञाकारिता पर आधारित हैं; वैसे ही जब हम किसी झूठे भरोसे की ओर खींच लिए जाते हैं, तब सारा सच्चा धर्म भूमि पर गिर जाता है, और साथ ही उद्धार की हर आशा लुप्त हो जाती है। इस पर सावधानी से ध्यान देना चाहिए, ताकि हम उस शिक्षा को ग्रहण करना सीखें जो हमें एकमात्र सच्चे परमेश्वर को छोड़ और किसी पर भरोसा न रखना सिखाती है, और उन सब आविष्कारों को अस्वीकार करें जो हमें उससे थोड़ा सा भी दूर ले जा सकते हैं, ताकि हम अपने चारों ओर न ताकें और न इधर-उधर बहकाए जाएँ।
इसी कारण, जैसा मैंने कहा है, भविष्यद्वक्ता घोषणा करता है कि शमायाह निःसन्तान मरेगा, और उस अनुग्रह के उपभोग से वंचित रहेगा जिसे परमेश्वर ने अपनी प्रजा को देने का निश्चय किया था, वरन् जिसकी प्रतिज्ञा भी की थी। और यह सब, जैसा मैंने तुम्हें स्मरण दिलाया है, लोगों के लिए कहा गया था; क्योंकि इस भविष्यद्वाणी से न तो शमायाह को और न उसके वंश को कोई लाभ हुआ; परन्तु उसके दण्ड से दुःखी निर्वासितों को ऐसा लाभ होना चाहिए था कि वे पश्चात्ताप की ओर ले जाए जाएँ, चाहे वह कितनी ही देर से क्यों न हो। इस स्थान का आशय यही है।
