यिर्मयाह और विलापगीत पर टीका · खण्ड 2 · यिर्मयाह 30

यिर्मयाह 30

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यिर्मयाह 30

यिर्मयाह 30:1-3

1. यहोवा का यह वचन यिर्मयाह के पास पहुँचा,

1. Sermo qui fuit ad Jeremiam a Jehova dicendo,

2. इस्राएल का परमेश्वर यहोवा तुझ से यों कहता है, जो वचन मैं ने तुझ से कहे हैं उन सभों को पुस्तक में लिख ले।

2. Sic dicit Jehova, Deus Israel, dicendo, Scribe tibi omnes sermones quos loquutus sum ad to in libro:

3. क्योंकि यहोवा की यह वाणी है, देख, ऐसे दिन आते हैं कि मैं अपनी प्रजा इस्राएल और यहूदा को बँधुआई से लौटा लाऊँगा, यहोवा का यही वचन है; और जो देश मैं ने उनके पितरों को दिया था उस में उन्हें लौटा ले आऊँगा, और वे उसके अधिकारी होंगे।

3. Quoniam ecce dies veniunt, dicit Jehova, et reducam captivitatem populi mei Israel et Jehudah, dicit Jehovah; et reducam eos in terram quam dedi patribus ipsorum et possidebunt cam.

जैसा हम देखेंगे, यह अध्याय और अगला अध्याय एक अत्यन्त लाभदायक सत्य से भरे हुए हैं; और इसलिये कि लोग और भी अधिक ध्यान दें, परमेश्वर ने इन भविष्यद्वाणियों को एक भूमिका के साथ आरम्भ किया। यिर्मयाह ने बहुत सी बातें कही थीं, जिन्हें बाद में, जैसा अन्यत्र प्रकट हो चुका है, याजकों और लेवियों ने इकट्ठा करके एक ही ग्रन्थ में रख दिया था; परन्तु परमेश्वर इन शब्दों के द्वारा हमें स्मरण दिलाता है कि जो भविष्यद्वाणियाँ आगे प्रजा के छुटकारे के विषय में आनेवाली हैं, वे विशेष रूप से स्मरण रखने योग्य थीं।

तौभी एक और बात पर ध्यान देना है। हम देख चुके हैं कि प्रजा का हठ ऐसा था कि यिर्मयाह ने उनके बीच व्यर्थ ही परिश्रम किया, क्योंकि वह बहिरों से, वरन् ठूँठों और पत्थरों से बातें करता था; क्योंकि वे ऐसी जड़ता से ग्रस्त थे कि कुछ भी नहीं समझते थे, क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें अन्धा भी कर दिया था—यह ऐसा दण्ड था जिसके वे पूरी रीति से योग्य थे। प्रजा की दशा ऐसी ही थी। फिर हमें यिर्मयाह की शिक्षा और उन लोगों की कहानियों के बीच की तुलना को भी ध्यान में रखना चाहिए जो दो वर्ष के पश्चात् लौटने की आशा देकर उस दुखी प्रजा को चापलूसी से पालते थे। परमेश्वर जानता था कि परिणाम क्या होगा; परन्तु प्रजा आशा रखने और दो वर्ष के अन्त में लौटने का घमण्ड करने से नहीं रुकी। इस प्रकार उन्होंने परमेश्वर के अनुग्रह को तुच्छ जाना, क्योंकि सत्तर वर्ष एक लम्बी अवधि थी: “यह क्या! परमेश्वर लौटने की प्रतिज्ञा तो करता है, परन्तु सत्तर वर्ष के बाद हम में से कौन जीवित रहेगा? तब तो हम में से कठिनाई से कोई एक बचा हुआ मिलेगा; इसलिये ऐसी ठण्डी प्रतिज्ञा हमारे लिये कुछ भी नहीं।” साथ ही, जैसा मैं कह चुका हूँ, वे मानो हवा से फूले हुए झूठे भरोसे से भरे थे, और परमेश्वर तथा उसके भविष्यद्वक्ताओं के प्रति ढिठाई से व्यवहार करते थे, मानो वे थोड़े ही समय में भले-चंगे और सुरक्षित लौट आनेवाले हों।

परन्तु अधर्मी मनुष्य सदा एक छोर से दूसरे छोर पर दौड़ते हैं; कभी तो वे घमण्ड से फूल जाते हैं, अर्थात् जब बातें समृद्धि से चलती हैं, या जब समृद्धि की कोई आशा दिखाई देती है, और वे परमेश्वर के विरुद्ध अभिमान से चलते हैं, मानो उन पर कोई विपत्ति आ ही नहीं सकती; फिर जब आशा और झूठी कल्पना उन्हें धोखा दे देती है, तब वे पूरी रीति से हियाव छोड़ देते हैं, यहाँ तक कि कोई शान्ति ग्रहण नहीं करते, वरन् निराशा के अथाह गड्ढे में डूब जाते हैं। परमेश्वर ने देखा कि यदि वह उनकी सहायता को न आए तो प्रजा के साथ ऐसा ही होगा। इसलिये वह यहाँ सबसे उत्तम और सबसे उपयुक्त उपाय प्रस्तुत करता है—कि भविष्यद्वक्ता, जिसने बोलकर कुछ भी सिद्ध नहीं किया था, लिखे और जो कुछ उसने कहा था उसे मानो कर्मों या लेखों में बदल दे, ताकि दो वर्ष बीत जाने के बाद वे हियाव बाँधें, और फिर यह मान लें कि सिद्धान्तहीन मनुष्यों ने उन्हें धोखा दिया था, और इस प्रकार उन्होंने अपनी चंचलता का उचित दण्ड भोगा है, जिससे वे अन्त में परमेश्वर की ओर दृष्टि करने लगें और प्रतिज्ञा किए हुए छुटकारे को ग्रहण करें, और पूरी रीति से निराश न हों। सो यही कारण है कि भविष्यद्वक्ता को आज्ञा दी गई कि जो वचन उसने पहले अपने मुँह से सुनाए थे, उन्हें लिख ले।

अब जब हम परमेश्वर का अभिप्राय समझ गए हैं, तो आओ हम यह सीखें कि जब ऐसा होता है कि हम भटक जाते हैं और झूठी कल्पनाओं के पीछे फिरते हैं, तो इस कारण हमें उद्धार की आशा को फेंक नहीं देना चाहिए; क्योंकि हम देखते हैं कि परमेश्वर यहाँ उन लोगों की ओर अपना हाथ बढ़ाता है जिन्होंने भूल की थी, वरन् जिन्होंने जान-बूझकर अपने आप को विनाश में डाल दिया था, क्योंकि सच्चे और विश्वासयोग्य भविष्यद्वक्ताओं ने उन्हें आवश्यकता से अधिक समझाया और चिताया था; उन्होंने अपने कान बन्द कर लिए थे, अपने हृदय कठोर कर लिए थे; तौभी जब वे मानो जान-बूझकर अपना नाश करना चाहते थे, हम देखते हैं कि परमेश्वर ने फिर भी उन्हें अपनी ओर कैसे बुला लिया।

वह कहता है कि परमेश्वर ने उसे आज्ञा दी थी कि जितने वचन उसने सुने थे, उन सबको एक पुस्तक में लिखे; और इसका कारण आगे आता है, क्योंकि, देख, यहोवा की यह वाणी है, ऐसे दिन आएँगे जिनमें मैं अपनी प्रजा इस्राएल और यहूदा की बँधुआई को फेर दूँगा। यहाँ जिस पुनःस्थापन का उल्लेख है, और जिसकी बकवाद झूठे भविष्यद्वक्ता करते थे जब वे प्रजा को थोड़े ही समय में लौटने की आशा से उभारते थे, उन दोनों के बीच एक विरोध समझना चाहिए; क्योंकि, जैसा मैं कह चुका हूँ, वह झूठी आशा, जब यहूदी असमय अपने देश को लौटना चाहते थे, एक प्रकार का मानसिक मतवालापन थी। परन्तु जब उन्होंने पाया कि वे धोखा खा गए हैं, तब उनके लिये केवल निराशा ही रह गई। इसलिये भविष्यद्वक्ता यहाँ उन्हें मन की शान्ति की ओर लौटा लाता है, अर्थात् इसलिये कि जब उन्हें पता चल जाए कि उन्होंने उतावली से वह ग्रहण कर लिया था जो धूर्तों ने अपनी ओर से प्रचार किया था, तब वे जानें कि परमेश्वर विश्वासयोग्य ठहरेगा। सो हम देखते हैं कि यहाँ उस निश्चित और पक्के छुटकारे के बीच, जिसकी प्रतिज्ञा परमेश्वर ने की थी, और उस झूठी और मूढ़ आशा के बीच, जिससे प्रजा मतवाली हो गई थी, एक निहित तुलना है: सो दिन आएँगे। अब ऐसा प्रतीत होता है कि दो वर्षों ने हर एक आशा को छीन लिया था; क्योंकि उन्होंने उन झूठे भविष्यद्वक्ताओं की बात मानी थी जो कहते थे कि परमेश्वर दो वर्ष में उन्हें लौटा लाएगा; उस समय के बीत जाने पर प्रजा की सारी आशा टूट गई। इसलिये भविष्यद्वक्ता यहाँ उस भ्रमपूर्ण छाप को दूर करता है जो उनके मन पर पड़ी थी, और कहता है कि वे दिन आएँगे जिनमें परमेश्वर अपनी प्रजा को छुड़ाएगा; और इस प्रकार वह परोक्ष रूप से प्रजा की मूर्खता का उपहास करता है, और उन लोगों की अभक्ति को दोषी ठहराता है जिन्होंने इतनी शीघ्र वापसी की प्रतिज्ञा करने का दुस्साहस किया था।

227 “एक पुस्तक में:” “पुस्तक” से पहले का {{אל कुछ प्रतियों में ,{}על है, जैसा अन्य स्थानों में होता है जब उसके पहले “लिख” आता है। इसका और अधिक शाब्दिक अनुवाद यह हो सकता है, “एक पुस्तक-पत्र (लपेटे हुए पत्र) पर;” परन्तु यदि {}אל बना रहे, तो अनुवाद यह हो सकता है, “एक अभिलेख के लिये,” या स्मारक के लिये। वेनेमा का विचार है कि ये दोनों अध्याय यरूशलेम के विनाश के बाद लिखे गए थे, और चूँकि सम्बोधित करने के लिये कोई प्रजा नहीं रह गई थी, इसलिये यिर्मयाह को आज्ञा दी गई कि जो कुछ वह पहले बार-बार मुँह से सुना चुका था, उसे लिख डाले। — सं. 228 शब्द शाब्दिक रूप से ये हैं, “क्योंकि देख, दिन आ रहे हैं, यहोवा की यह वाणी है, जब मैं अपनी प्रजा, इस्राएल और यहूदा, के देश-निकाले को फेर दूँगा, यहोवा की यह वाणी है; और मैं उन्हें उस देश में लौटा लाऊँगा जो मैं ने उनके पितरों को दिया था, और वे उसके अधिकारी होंगे।” {{ו का अनुवाद “जब” करना, जब उसके पहले कोई कृदन्त हो, ऐसा है जो किया जा सकता है, और मेरी दृष्टि में सामान्यतः किया जाना चाहिए। {}שבות शब्द का अर्थ, जैसा तर्गूम में दिया गया है, बँधुआई की अपेक्षा देश-निकाला (प्रवास) है। सेप्टुआजिंट में इसका अनुवाद {ἀποικία} है, अर्थात् घर से हटाया जाना। — सं.

सो अब हम देखते हैं कि वह क्यों कहता है, दिन आएँगे; क्योंकि यदि परमेश्वर बीच में न पड़ता, तो दो वर्ष के बाद हर एक आशा बुझ गई होती। सो दिन आएँगे जिनमें मैं इस्राएल और यहूदा की बँधुआई को फेर दूँगा। हम जानते हैं कि दस गोत्र पहले ही बँधुआई में ले जाए जा चुके थे; केवल यहूदा का गोत्र और बिन्यामीन का आधा गोत्र बचा था। इसलिये दस गोत्रों का, अर्थात् इस्राएल के सम्पूर्ण राज्य का, उल्लेख पहले किया गया है।

इस्राएल का देश-निकाला यहूदा के देश-निकाले से कहीं अधिक लम्बा था। आगे यह आता है,—

यिर्मयाह 30:4-6

4. जो वचन यहोवा ने इस्राएल और यहूदा के विषय में कहे थे, वे ये हैं।

4. Hi vero sunt sermones quos loquutus est Jehova de Israele et Jehudah (vel, ad Israelera et ad Jehudah:)

5. क्योंकि यहोवा यों कहता है; हम ने थरथराहट का, भय का शब्द सुना है, शान्ति का नहीं।

5. Certe ita dicit Jehova, Vocem trepidationis audivimus, pavorem et non pacem (vel, pavoris et non pacis)

6. पूछो तो भला, और देखो, क्या पुरुष को भी कहीं जनने की पीड़ा उठती है? फिर क्या कारण है कि मैं सब पुरुषों को जच्चा स्त्री की नाईं अपनी अपनी कमर पर हाथ रखे हुए देखता हूँ, और सब के मुख पीले पड़ गए हैं?

6. Inquirite et aspicite an pariat masculus? quare video cunctos viros manibus suis super lumbos tanquam parturiens (solet mulier, subaudiendum est, vel, sicuti solet mulier parturiens) et conversae sunt omnes facies in pallorem (vel, in auriginem, ut alii vertunt, sed nomen palloris melius convenit?)

यहूदी और मसीही दोनों इस खण्ड का अर्थ बिगाड़ते हैं, क्योंकि वे इसे मसीहा के समय पर लागू करते हैं; और यद्यपि वे पवित्रशास्त्र के किसी और भाग पर कठिनाई से ही सहमत होते हैं, यहाँ वे आश्चर्यजनक रूप से एक हो गए हैं; परन्तु, जैसा मैं कह चुका हूँ, वे भविष्यद्वक्ता के वास्तविक अर्थ से बहुत दूर चले जाते हैं।

वे सब इसे मसीहा के समय से सम्बन्धित भविष्यद्वाणी समझते हैं; परन्तु यदि कोई बुद्धिमानी से पूरे प्रसंग पर दृष्टि करे, तो वह तुरन्त मुझ से सहमत होगा कि भविष्यद्वक्ता यहाँ उस शिक्षा का सार सम्मिलित करता है जो प्रजा उसके मुँह से पहले सुन चुकी थी। पहले वाक्यांश में वह दिखाता है कि उसने परमेश्वर के उस पलटे के विषय में कहा था जो प्रजा पर ठहरा हुआ था। परन्तु यह वाक्यांश उस बात को संक्षेप में ही छूता है, क्योंकि मुख्य उद्देश्य दुखी प्रजा के शोक को हल्का करना था; क्योंकि यह कारण सदा ध्यान में रखना चाहिए कि भविष्यद्वक्ता को अपनी शिक्षा का सार लिखने की आज्ञा क्यों दी गई थी, अर्थात् इसलिये कि बँधुओं को कुछ शान्ति मिले, जब वे अनुभव से जान लें कि वे अत्यन्त हठीले रहे थे, क्योंकि इतने लम्बे समय तक उन्होंने न कभी अपना मन बदला और न पश्चाताप की ओर फिरे। भविष्यद्वक्ता ने पहले प्रजा के दुर्गुणों के विषय में विस्तार से कहा था, और बहुत बार उनके हठ को दोषी ठहराया था, और उस भारी और भयानक दण्ड की ओर भी संकेत किया था जो उनकी बाट जोह रहा था। सो भविष्यद्वक्ता ने बहुत से प्रवचनों में प्रजा को डाँटा था, और उसे आज्ञा दी गई थी कि वह प्रतिदिन वही बात दोहराए, यद्यपि न अपने लिये, और न मुख्यतः अपने समय के लोगों के लिये, या पुरनियों के लिये। परन्तु जब परमेश्वर ने मन्दिर और नगर को नष्ट कर दिया, तब उसका उद्देश्य उनके व्याकुल मनों को सम्भालना था, जो अन्यथा अवश्य निराशा से दब जाते। सो यही कारण है कि भविष्यद्वक्ता यहाँ उस पलटे को केवल हल्के से छूता है जो प्रजा की बाट जोह रहा था। तौभी, जैसा हम देखेंगे, इस संक्षिप्तता में बड़ी शक्ति है; परन्तु दूसरे भाग के विषय में वह कहीं अधिक विस्तार से कहता है, और इस उद्देश्य से कि प्रजा अपनी विपत्तियों के नीचे दब न जाए, वरन् मृत्यु के बीच भी आशा रखे, और उस दण्ड को भोगते हुए भी, जिसके वे योग्य थे, आशा रखने लगे।

अब वह कहता है, यहोवा यों कहता है, हम ने पुकार, अर्थात् थरथराहट का, या भय का शब्द सुना है। {,}חרדה चेरेदे शब्द का ठीक अर्थ वह भय समझा जाता है जो सारे शरीर को कँपा देता है, और इसलिये इसका अनुवाद थरथराहट किया गया है। परमेश्वर बोलता है, तौभी प्रजा के रूप में। क्यों? उनकी संवेदनहीनता को प्रकट करने के लिये; क्योंकि जैसे वे अपनी दुष्टता में हठीले थे, वैसे ही धमकियों से, चाहे वे कितनी ही अधिक और भयानक क्यों न हों, नहीं डरते थे। परमेश्वर ने उनके लिये शब्द बोल-बोलकर लिखवाए, क्योंकि वे पूरी रीति से भावना-शून्य थे। अब हम देखते हैं कि परमेश्वर ने उन निश्चिन्त लोगों का रूप क्यों धारण किया, यद्यपि यिर्मयाह प्रतिदिन परमेश्वर के पलटे को उनके सामने निकट आता हुआ दिखाता था। अर्थ यह है कि यद्यपि प्रजा अपने पापों में सोई हुई थी, और अपने आप को संकट की पहुँच से बाहर समझती थी, उस समय भी जब परमेश्वर उनसे अप्रसन्न था, तौभी वे धमकियाँ जिनके द्वारा परमेश्वर उन्हें पश्चाताप की ओर ले जाना चाहता था, व्यर्थ न होंगी।

इसलिये परमेश्वर कहता है, हम ने भय का शब्द सुना है; अर्थात्, “जितना चाहो उपहास और ठट्ठा करो, या अपने भ्रमों में संवेदनहीन बने रहो, यहाँ तक कि मतवालों के समान जो कहा जाता है उसकी उपेक्षा करो, क्योंकि तुम भावना, विवेक और स्मृति से रहित हो, तौभी परमेश्वर तुम से यह अंगीकार, यह थरथराहट और भय का शब्द, बलपूर्वक निकलवाएगा।”

फिर वह आगे कहता है, और शान्ति का नहीं। यह बल देकर जोड़ा गया है, ताकि भविष्यद्वक्ता प्रजा से उन मूर्ख भ्रमों को झाड़ दे जिनसे झूठे भविष्यद्वक्ताओं ने उन्हें भर दिया था। सो वह कहता है कि वे शान्ति की व्यर्थ आशा रखते थे, क्योंकि वे आतंक और भय से भाग नहीं सकते थे। वह इस भय को यह कहकर और बढ़ाता है, पूछो और देखो, क्या पुरुष को जनने की पीड़ा होती है? किसी ने इसका बेतुका अनुवाद किया है, “क्या पुरुष जन्म देता (सन्तान उत्पन्न करता) है?” इस भूल से उसने अपने विवेक की कमी और अपना अज्ञान दोनों प्रकट कर दिए हैं; वह इब्रानी में तो सचमुच विद्वान था, परन्तु लातीनी से अनजान, और विवेक से भी रहित था। क्योंकि भविष्यद्वक्ता यहाँ किसी विलक्षण और अस्वाभाविक बात के विषय में कहता है; परन्तु पुरुष के लिये सन्तान उत्पन्न करना स्वाभाविक है। वह यहाँ व्यंग्य से पूछता है, “क्या पुरुष को जनने की पीड़ा हो सकती है?” क्योंकि परमेश्वर सब पुरुषों को ऐसी पीड़ाओं और वेदनाओं में डालेगा, मानो वे जनने की पीड़ा में पड़ी स्त्रियाँ हों। सो जैसे स्त्रियाँ, जब जनने का समय निकट आता है, अपनी सारी शक्ति लगा देती हैं और वेदना से छटपटाती हैं, वैसे ही पुरुष भी, सब पुरुष, अपने आतंक और भय के कारण अपनी कमर पर हाथ रखे होंगे। फिर वह कहता है, और सब के मुख पीले पड़ गए हैं; अर्थात् परमेश्वर उन सबको भयभीत कर देगा।

अब हम भविष्यद्वक्ता का अर्थ समझते हैं; क्योंकि यहूदी परमेश्वर के न्याय पर विश्वास नहीं करते थे, इसलिये आवश्यक था, जैसा भविष्यद्वक्ता यहाँ करता है, कि उनकी कठोरता पर धावा बोला जाए।

यदि उसने बोलने की कोई साधारण रीति अपनाई होती, तो वे विचलित न होते।

इसलिये उसने उनके हठीलेपन का ध्यान रखा; और इसी कारण वह इतना प्रचण्ड था। सो वह कहता है, पूछो, और देखो, क्या पुरुष को जनने की पीड़ा होती है? परमेश्वर सब पुरुषों को ऐसी दशा में पहुँचा देगा जो पुरुषोचित नहीं, अर्थात् जनने की पीड़ा में पड़ी स्त्री की सी दशा, जब वह जनने के अन्तिम प्रयत्न में हो, जब उसकी पीड़ा सबसे बड़ी और सबसे कड़वी होती है। तब पुरुष अत्यन्त अशोभनीय, विचित्र और अस्वाभाविक दशा में धकेल दिए जाएँगे। आगे यह आता है,—

यिर्मयाह 30:7

7. हाय, हाय, वह दिन क्या ही भारी है! उसके समान और कोई दिन नहीं; वह याकूब के संकट का समय है; परन्तु वह उस से भी छुड़ाया जाएगा।

7. Heus, quia magnus hic dies a non esse sicut ipsum (hoc est, ut non sit similis, ut nunquam fuerit similis) et tempus afflictionis (vel, augustiae), hoc ipsi Jacob. (hoc est, populo Israelitico) et ab ea servabitur.

भविष्यद्वक्ता इस पद में उस दण्ड की भयंकरता का वर्णन करता चला जाता है जिसकी प्रजा को कोई चिन्ता नहीं थी, क्योंकि, जैसा मैं कह चुका हूँ, वे सब धमकियों की उपेक्षा करते थे, और अब बहुत वर्षों से अपने आप को इतना कठोर कर चुके थे कि इतनी सारी भयानक बातों को कुछ भी नहीं समझते थे। सो यही कारण था कि वह इस चेतावनी पर इतना ठहरा, और पुकार उठा, हाय! वह दिन बड़ा है: “बड़ा” का अर्थ भयानक समझना चाहिए; और वह आगे कहता है, यहाँ तक कि उसके समान कोई नहीं। नगर को नष्ट होते, और मन्दिर को कुछ तो गिराए जाते और कुछ आग से भस्म होते देखना एक भयानक दृश्य था: राजा सब कुलीनों समेत बँधुआई में खदेड़ा गया, उसकी आँखें फोड़ दी गईं, और उसके बच्चे घात किए गए; और फिर वह ऐसी अपमानजनक रीति से ले जाया गया कि ऐसा अनादर सहने से सौ बार मरना अधिक वांछनीय होता। इसलिये भविष्यद्वक्ता अकारण नहीं कहता कि वह दिन बड़ा होगा, यहाँ तक कि उसके समान कोई न होगा: और उसने यह प्रजा की जड़ता को झकझोरने के लिये कहा, क्योंकि वे सोचते थे कि वह पवित्र नगर, जिसे परमेश्वर ने अपने निवास के लिये चुना था, गिर नहीं सकता, और न मन्दिर नष्ट हो सकता है; वह आगे कहता है कि वह प्रजा के लिये संकट का समय होगा। परन्तु पद के अन्त में वह उन्हें परमेश्वर की दया की, अर्थात् इस संकट से छुटकारे की, आशा देता है। सो अब हम इन पदों में भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय देखते हैं।— परामर्श-सभा (कन्सिस्टरी) के कारण कल व्याख्यान नहीं होगा।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जैसे हम नाना प्रकार से हठपूर्वक तेरे क्रोध को अपने विरुद्ध भड़काने से नहीं रुकते,—हाय, यह वरदान दे कि हम अन्त में तेरी कृपामय चेतावनियों के द्वारा आज्ञाकारिता की ओर फिरें, और साथ ही तेरी न्यायपूर्ण कठोरता के अधीन भी हो जाएँ, और जानें कि जब कभी तू हमें कठोरता से ताड़ना देता है, तब हमारे साथ वैसा ही व्यवहार होता है जैसे के हम योग्य हैं: तौभी हम कभी निराश न हों, वरन् तेरी दया की शरण लें, इस बात में सन्देह न करते हुए कि तू क्रोध के बीच भी अपने पितृ-प्रेम को स्मरण करता है, बशर्ते कि हम उस अनुग्रह पर भरोसा रखें जिसकी प्रतिज्ञा तू ने अपने एकलौते पुत्र के द्वारा हम से की है।— आमीन।

229 इस पद का “वह दिन” और अगले पद का “वह दिन” एक ही प्रतीत होते हैं। तब {{הוי का अनुवाद “हाय” नहीं, वरन् उसके सबसे सामान्य अर्थ के अनुसार “अहो!” या “सुनो!” करना चाहिए। चौथे पद (यिर्मयाह 30:4) से लेकर इस पद के अन्त तक का खण्ड, आठवें पद (यिर्मयाह 30:8) के आरम्भ समेत, इस प्रकार अनूदित किया जा सकता है,— 4. ये ही वे वचन हैं जो यहोवा ने इस्राएल के विषय में और यहूदा के विषय में कहे हैं: 5. निश्चय यहोवा ने यों कहा है— (थरथराहट का शब्द हम ने सुना है, भय का, और शान्ति का नहीं: 6. अब पूछो और देखो, क्या पुरुष को जनने की पीड़ा होती है? यह कैसी बात है? मैं हर एक पुरुष को देखता हूँ कि जनने की पीड़ा में पड़ी स्त्री के समान उसके हाथ उसकी कमर पर हैं, और सब के मुख पीले पड़ गए हैं:) 7. सुनो! क्योंकि वह दिन बड़ा होगा, उसके समान कोई नहीं; यद्यपि याकूब के लिये संकट का समय होगा, तौभी वह उस से छुड़ाया जाएगा: 8. और उस दिन ऐसा होगा, सेनाओं के यहोवा की यह वाणी है, कि मैं तोड़ डालूँगा, इत्यादि, इत्यादि। कोष्ठक का भाग उस बात का कारण बताता है जो सातवें पद (यिर्मयाह 30:7) के अन्त में कही गई है, और उसका उद्देश्य प्रतिज्ञा किए हुए छुटकारे के उस बड़े दिन के साथ विरोध दिखाना है। — सं.

एक सौ चौदहवाँ व्याख्यान

यिर्मयाह 30:8

8. और सेनाओं के यहोवा की यह वाणी है, कि उस दिन ऐसा होगा कि मैं उसका जूआ तेरी गर्दन पर से तोड़ दूँगा, और तेरे बन्धनों को तोड़ डालूँगा; और परदेशी फिर उस से अपनी सेवा न कराने पाएँगे:

8. Et erit die illo, dicit Jehova exercituum, confringam jugum a collo tuo, et vincula tua disrumpam et non adigent amplius eum ad servitutem alieni: यिर्मयाह उस बात को आगे बढ़ाता है जिसे उसने पिछले पद में छुआ था, अर्थात् यह कि प्रभु अपनी प्रजा को ताड़ना देने के बाद अन्त में उन पर दया करेगा, यहाँ तक कि उन्हें फिर अनुग्रह में ग्रहण करेगा। संक्षेप में, वह कहता है कि उनकी बँधुआई सदा की न होगी।

परन्तु हमें वह स्मरण रखना चाहिए जो हम पहले कह चुके हैं, अर्थात् यह कि छुटकारे की प्रतिज्ञा केवल विश्वासयोग्य लोगों से की गई है, जो धीरज और नम्रता से परमेश्वर के अधीन होंगे और उसकी पितृ-तुल्य ताड़ना की उपेक्षा न करेंगे। सो यदि हम चाहते हैं कि परमेश्वर हम पर कृपालु हो, तो हमें अपने आप को उसके द्वारा पिता की रीति से ताड़ना पाने देना चाहिए; क्योंकि यदि हम पैने से हाँके जाने पर विरोध करें, तो किसी भी प्रकार क्षमा की आशा नहीं की जा सकती, क्योंकि तब हम मानो जान-बूझकर अपनी कठोरता से परमेश्वर को भड़काते हैं।

सो वह कहता है, उस दिन, अर्थात् जब ठहराया हुआ समय पूरा हो जाएगा।

झूठे भविष्यद्वक्ताओं ने प्रजा को झूठी आशा से भड़काया था, मानो उनका छुटकारा दो वर्ष के बाद होनेवाला हो। परमेश्वर ने विश्वासयोग्य लोगों को बाट जोहने, और इस प्रकार उतावली न करने की आज्ञा दी; उसने उनके लिये एक दिन ठहराया था, और वह, जैसा हम देख चुके हैं, सत्तरवाँ वर्ष था। फिर वह जूए का, अर्थात् बाबुल के राजा के जूए का, उल्लेख करता है, और दूसरी दृष्टि से, बन्धनों का। जूआ वह था जो नबूकदनेस्सर ने यहूदियों पर रखा था; और प्रजा के बन्धन वे थे जिनसे नबूकदनेस्सर ने उन्हें बाँधा था। अन्त में वह कहता है, और परदेशी फिर उन पर प्रभुता न करेंगे। {,}עבד ओबेद क्रिया को यहाँ प्रेरणार्थक अर्थ में लेना चाहिए; वाक्य की रचना ही यह दिखाती है, और जो लोग इन शब्दों का अनुवाद करते हैं, “और परदेशी उनकी सेवा न करेंगे,” वे अर्थ को तोड़-मरोड़ देते हैं; क्योंकि यह कोई प्रतिज्ञा नहीं हो सकती थी; और यह प्रसंग से मेल नहीं खाता, और इसके खण्डन की आवश्यकता नहीं, क्योंकि यह स्पष्ट रूप से अनुपयुक्त है। यदि क्रिया को सेवा करने के अर्थ में लिया जाए, तो “परदेशी” सम्प्रदान कारक में होना चाहिए। हम पहले यिर्मयाह 25:14 में ऐसा ही वाक्यांश देख चुके हैं, जहाँ भविष्यद्वक्ता कहता है कि न राजा और न बलवन्त जातियाँ फिर यहूदियों पर प्रभुता करेंगी। वहाँ यही क्रिया प्रयुक्त है, और अभिव्यक्ति की यही रीति। सो परदेशी फिर उनसे सेवा न कराएँगे; अर्थात् वे उन पर ऐसी प्रभुता न करेंगे कि उन्हें दासों की नाईं सताएँ।

अब हम भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय समझते हैं; वह यहूदियों को धीरज रखने का उपदेश देता है, और दिखाता है कि यद्यपि उनका देश-निकाला लम्बा होगा, तौभी उनका छुटकारा निश्चित था। आगे यह आता है,—

230 मैं इस पद का अनुवाद इस प्रकार करता हूँ,— 8. और उस दिन ऐसा होगा, सेनाओं के यहोवा की यह वाणी है, कि मैं उसका जूआ तेरी गर्दन पर से तोड़ दूँगा, और तेरे बन्धनों को मैं तोड़ डालूँगा: और उस से सेवा परदेशी फिर न कराएँगे: 9. परन्तु सेवा वे यहोवा की करेंगे, इत्यादि। द्वितीय पुरुष से तृतीय पुरुष की ओर, “तेरा” और “उसे” में, और एकवचन से बहुवचन की ओर, “उसे” और “वे” में, यह परिवर्तन भविष्यद्वक्ताओं में बहुत सामान्य है। आठवें पद (यिर्मयाह 30:8) की अन्तिम पंक्ति पर। — सं.

यिर्मयाह 30:9

9. परन्तु वे अपने परमेश्वर यहोवा की, और अपने राजा दाऊद की सेवा करेंगे, जिसे मैं उनके लिये खड़ा करूँगा।

9. Et servient Jehovae Deo suo et Davidi regi suo quem suscitabo ipsis.

यदि यह वाक्यांश न जोड़ा गया होता तो पहली प्रतिज्ञा अधूरी रह जाती; क्योंकि मनुष्यों के लिये इतना पर्याप्त न होता कि वे जैसा चाहें वैसा जीवन बिताएँ और उनसे स्वतन्त्रता की प्रतिज्ञा की जाए, जब तक कि कोई व्यवस्थित क्रम स्थापित न हो। वास्तव में, शासन और व्यवस्थाओं के बिना जीने की अपेक्षा हमारे लिये यह अधिक अच्छा होता कि हम जंगली पशु होते और वनों में भटकते फिरते; क्योंकि हम जानते हैं कि मनुष्यों की वासनाएँ कितनी प्रचण्ड हैं। इसलिये यदि कोई अंकुश न हो, तो जंगली पशुओं की दशा हमारी दशा से अधिक अच्छी और अधिक वांछनीय होगी।

सो स्वतन्त्रता, यदि उस पर लगाम न लगाई जाए और वह व्यवस्थित शासन से जुड़ी न हो, तो सदा अपने साथ विनाश ही लाएगी। इसलिये मैंने कहा कि यह पद इसलिये जोड़ा गया कि यहूदी जान लें कि परमेश्वर को उनके कल्याण की चिन्ता थी; क्योंकि वह प्रतिज्ञा करता है कि उन्हें किसी बात की घटी न होगी। सो सच्चा और वास्तविक सुख तब है, जब न केवल हमें स्वतन्त्रता दी जाती है, वरन् जब परमेश्वर हमारे लिये एक निश्चित नियम ठहराता और अच्छी व्यवस्था स्थापित करता है, कि कोई गड़बड़ी न हो। इसलिये यिर्मयाह, प्रजा से उनके अपने देश में लौटने की प्रतिज्ञा करने के बाद, और यह भी प्रतिज्ञा करने के बाद कि जूआ उनकी गर्दन पर से उतार फेंका जाएगा, यह बात जोड़ता है कि परदेशियों की सेवा करने के बाद अब वे परमेश्वर के और अपने राजा के शासन के अधीन होंगे। और यह अधीनता संसार की सारी शासक शक्तियों से उत्तम है; अर्थात् जब परमेश्वर हम पर प्रभुता करने में प्रसन्न होता है, और हमारी सुरक्षा का भार अपने ऊपर लेता है, और शासक का कार्य करता है।

इससे हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय विश्वासयोग्य लोगों को न केवल स्वतन्त्रता की प्रतिज्ञा से शान्ति देना था, वरन् इस बात को जोड़कर भी कि, उनके पूर्ण सुख में किसी बात की घटी न हो, इसलिये परमेश्वर आप उन पर प्रभुता करेगा।

सो वे अपने परमेश्वर की सेवा करेंगे। राजा शब्द इसलिये जोड़ा गया है कि परमेश्वर ने ठहराया था कि उसकी प्रजा पर एक राजा के द्वारा शासन हो; इसलिये नहीं कि राजा परमेश्वर के स्थान पर बैठे, वरन् उसके सेवक के रूप में जोड़ा गया। अब यह बात दाऊद की मृत्यु के बहुत समय बाद कही गई; क्योंकि दाऊद यिर्मयाह के जन्म से बहुत वर्ष पहले मर चुका था: और न वह इसलिये फिर जी उठा कि प्रजा पर राज्य करे; परन्तु यहाँ दाऊद के नाम से कोई भी ऐसा व्यक्ति समझना चाहिए जो उसका उत्तराधिकारी हो।

अब, चूँकि परमेश्वर ने दाऊद से वाचा बाँधी थी, और प्रतिज्ञा की थी कि उसके वंश में से सदा कोई न कोई उसकी गद्दी पर बैठेगा, इसलिये भविष्यद्वक्ता यहाँ दाऊद का उल्लेख करते हुए मसीह तक के सब राजाओं की ओर संकेत करता है: तौभी उस समय के बाद कोई उसका उत्तराधिकारी न हुआ, क्योंकि यिर्मयाह की मृत्यु से पहले ही राज्य मिट गया था; और जब प्रजा अपने देश में लौटी तब कोई राजकीय शक्ति न थी, क्योंकि जरुब्बाबेल को केवल एक अस्थिर प्रतिष्ठा मिली, और धीरे-धीरे वह राजवंश लुप्त हो गया; और यद्यपि दाऊद के वंश में से सत्तर चुने गए थे, तौभी न कोई राजदण्ड था, न कोई मुकुट, न कोई सिंहासन। इसलिये इस भविष्यद्वाणी को मसीह पर लागू करना आवश्यक है; क्योंकि, जैसा यहेजकेल कहता है, मुकुट तोड़ दिया गया और पाँवों तले रौंदा गया, जब तक कि वैध राजा न आया। उसने यह संकेत दिया कि बहुत समय तक कोई राजा न होगा, जब उसने कहा, “मुकुट को उलट दो, उलट दो, उलट दो।”

(यहेजकेल 21:27)

इसलिये उसने आज्ञा दी कि राजा का नाम उसके सब चिह्नों समेत मिटा दिया जाए, और वह भी थोड़े समय के लिये नहीं वरन् युगों तक, अर्थात् तब तक जब तक वह प्रकट न हो जिसका मुकुट या राजकीय किरीट पर उचित अधिकार था। इससे हम देखते हैं कि इस खण्ड की व्याख्या मसीह की ओर संकेत किए बिना और किसी प्रकार नहीं की जा सकती, और यह कि उसे दाऊद कहा गया है, जैसा कि मसीह के संसार में प्रकट होने से पहले यहूदी सदा उसे कहा करते थे; क्योंकि वे उस मसीहा को, जिसकी वे बाट जोहते थे, दाऊद का पुत्र कहते थे। अब हम भविष्यद्वक्ता का अर्थ समझते हैं।

परन्तु इससे हम एक अत्यन्त उपयोगी शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं, अर्थात् यह,—कि परमेश्वर के अधीन रहने से बढ़कर हमारे लिये कुछ भी अच्छा नहीं; क्योंकि यदि परमेश्वर हमें अपनी मनमानी और अपनी रुचियों के अनुसार जीने दे, तो हमारी स्वतन्त्रता जंगली पशुओं की सी स्वतन्त्रता बन जाएगी।

सो स्वतन्त्रता हमारे लिये सदा विनाशकारी ही रहेगी, जब तक परमेश्वर हमारी चिन्ता अपने ऊपर न ले, और हमें तैयार करके ऐसा न गढ़े कि हम उसका जूआ उठा सकें। इसलिये जब हम परमेश्वर की आज्ञा मानते हैं, तब हम सच्चा और वास्तविक सुख पाते हैं। सो जब हम प्रार्थना करें, तो आओ हम यह सीखें कि इन दो बातों को अलग न करें जिन्हें अनिवार्य रूप से एक साथ जुड़ा रहना चाहिए, अर्थात् यह कि परमेश्वर हमें अधर्मियों के अत्याचार से छुड़ाए, और यह भी कि वह आप हम पर प्रभुता करे। और यह शिक्षा हमारे समय के लिये उपयुक्त है: क्योंकि यदि परमेश्वर अब केवल पोप के अत्याचार को ढा दे और अपनी प्रजा को छुड़ा दे, और उन्हें इधर-उधर भटकने दे, यहाँ तक कि हर एक को अपनी इच्छा को ही अपनी व्यवस्था मानकर चलने दे, तो कैसी भयानक गड़बड़ी होगी! इससे अच्छा तो यह है कि शैतान किसी भी प्रकार के शासन के अधीन मनुष्यों पर प्रभुता करे, बजाय इसके कि वे बिना किसी व्यवस्था के, बिना किसी अंकुश के, खुले छोड़ दिए जाएँ। हमारा समय तो पर्याप्त रूप से प्रमाणित करता है कि ये दो बातें अकारण एक साथ नहीं जोड़ी गई हैं; अर्थात् यह कि परमेश्वर अपनी प्रजा का छुड़ानेवाला बनेगा, कि दयनीय दासता का जूआ उतार फेंके और उनके बन्धन तोड़ दे, और यह भी कि वह अपनी प्रजा पर शासन करनेवाला राजा होगा।

परन्तु जो आगे आता है उस पर भी हमें ध्यान से विचार करना चाहिए,—कि परमेश्वर अपनी कलीसिया पर एक राजा के द्वारा ही शासन करेगा, और किसी प्रकार नहीं। उसने व्यवस्था के अधीन इसी बात का एक उदाहरण, या पूर्वाभास, देना चाहा, जब उसने दाऊद और उसके वंश को चुना। परन्तु यह प्रतिज्ञा विशेष रूप से हमारी है; क्योंकि यहूदियों ने अपनी कृतघ्नता के कारण इस प्रतिज्ञा के फल का स्वाद नहीं चखा: परमेश्वर ने उन्हें इस अनमोल लाभ से वंचित कर दिया, जिसकी वे उचित रूप से और निश्चय के साथ आशा रख सकते थे। चूँकि वह अनुग्रह जिसे उन्होंने खो दिया अब हमें सौंप दिया गया है, इसलिये जो कुछ यिर्मयाह यहाँ सिखाता है, जैसा मैं कह चुका हूँ, वह ठीक-ठीक हमसे सम्बन्ध रखता है; अर्थात् यह कि परमेश्वर हमारा राजा नहीं है जब तक हम मसीह की आज्ञा न मानें, जिसे उसने हम पर ठहराया है, और जिसके द्वारा वह चाहता है कि हम पर शासन हो। सो जो कोई यह घमण्ड करते हैं कि वे परमेश्वर का जूआ स्वेच्छा से उठाते हैं, और साथ ही मसीह के जूए को ठुकराते हैं, वे इसी भविष्यद्वाणी के द्वारा दोषी ठहराए जाते हैं; क्योंकि परमेश्वर की यह इच्छा नहीं कि वह, यों कहें, बिना किसी मध्यस्थ के अपनी कलीसिया पर प्रभुता करे; वरन् उसकी इच्छा यह है कि मसीह, जिसे यहाँ दाऊद कहा गया है, राजा हो; जब तक कि हम यिर्मयाह पर असत्य कहने का दोष न लगाएँ, हमें दाऊद शब्द को मसीह के व्यक्तित्व पर लागू करना ही होगा। जब ऐसा है, तो परमेश्वर संसार के अन्त तक मसीह के द्वारा ही हम पर प्रभुता करेगा, और किसी प्रकार नहीं; हमें उसकी आज्ञा माननी और उसकी सेवा करनी चाहिए।

वह आगे कहता है, जिसे मैं खड़ा करूँगा। मसीह को खड़ा करना भी परमेश्वर ही का पद और कार्य था, जैसा दूसरे भजन में कहा गया है, “मैं ने अपने राजा का अभिषेक किया है।”

यदि हम मसीह की आशिषों का आनन्द लेना चाहते हैं, तो हमें सदा परमेश्वर की दया के सोते के पास आना चाहिए, जैसा लिखा है, “परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया।”

निश्चय ही, जो कुछ हमारे उद्धार के लिये आवश्यक है वह सब हम मसीह में पाएँगे; परन्तु परमेश्वर की असीम भलाई के सिवा हमें मसीह और कहाँ से मिला है? जब उसने हम पर तरस खाया, तब उसने ठहराया कि अपने एकलौते पुत्र के द्वारा हमारा उद्धार करे। सो उद्धार हमारे लिये मसीह में रखा हुआ है, और उसे कहीं और नहीं ढूँढ़ना चाहिए: परन्तु हमें सदा स्मरण रखना चाहिए कि यह उद्धार परमेश्वर की दया से बहता है, इसलिये मसीह को हमारे प्रति परमेश्वर के पितृ-अनुग्रह की गवाही और बयाने के रूप में देखा जाना चाहिए। यही कारण है कि भविष्यद्वक्ता स्पष्ट रूप से यह जोड़ता है कि परमेश्वर अपनी प्रजा पर प्रभुता करने के लिये एक राजा खड़ा करेगा।

आगे यह आता है,—

यिर्मयाह 30:10

10. इसलिये हे मेरे दास याकूब, तू मत डर, यहोवा की यही वाणी है; हे इस्राएल, विस्मित न हो; क्योंकि देख, मैं दूर देश से तुझे और तेरे वंश को बँधुआई के देश से छुड़ा ले आऊँगा; और याकूब लौटकर चैन और सुख से रहेगा, और कोई उसको डराने न पाएगा।

10. Et tu ne timeas, Jacob, serve mi, dicit Jehova, et ne paveas, Israel, quia ecce ego servans to a longinquo, et semen tuum e terra captivitatis eorum; et sedebit Jacob et quiescet et tranquillus erit, et nemo exterrebit (nemo exterrens, ad verbum)

भविष्यद्वक्ता अपनी शिक्षा को एक उपदेश के द्वारा दृढ़ करता है; क्योंकि हमें केवल परमेश्वर के पितृ-प्रेम और कृपा का निश्चय दिलाना पर्याप्त न होता, जब तक कि हमें उसकी आशा रखने के लिये प्रोत्साहित न किया जाए, क्योंकि अनुभव हमें सिखाता है कि परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को ग्रहण करने में हम कितने पिछड़े और धीमे हैं। सो यही कारण है कि भविष्यद्वक्ता विश्वासयोग्य लोगों को आशा रखने के लिये समझाता और उत्साहित करता है। यदि हम में वह तत्परता और उत्सुकता होती जो होनी चाहिए, तो हम एक ही वचन से सन्तुष्ट हो जाते; क्योंकि अपने अनुग्रह के विषय में परमेश्वर की गवाही से बढ़कर और क्या चाहा जा सकता है? परन्तु हमारी सुस्ती के कारण बहुत से पैनों की आवश्यकता पड़ती है। इसलिये जब शिक्षा पहले आती है, तब हमें उभारने के लिये उपदेश जोड़ना आवश्यक है; और ये उपदेश शिक्षा को दृढ़ करते हैं, जिससे परमेश्वर का अनुग्रह हमारे हृदयों में प्रभावशाली रूप से फले-फूले।

वह “याकूब” और “इस्राएल” को सम्बोधित करता है; परन्तु इनका अर्थ एक ही है, जैसा कि बहुत से अन्य स्थानों में होता है। ऐसी द्विरुक्तियाँ, जैसा उन्हें कहा जाता है, इब्रानी भाषा में सामान्य हैं, यह हम जानते हैं; क्योंकि बल देने के लिए वही शब्द दोहराए जाते हैं। इसलिए इस खण्ड में भी, जब यिर्मयाह दो नामों का उल्लेख करता है, तो उसमें उससे अधिक बल है जितना यदि वह केवल इतना कहता, “हे याकूब, तू मत डर, और भयभीत न हो।” तब वह कहता है, हे याकूब, तू मत डर; और हे इस्राएल, तू विस्मित न हो। और वह ऐसा इसलिए करता है कि यहूदी स्मरण करें कि परमेश्वर उनके पिता याकूब पर केवल एक ही बार नहीं, वरन् बहुत बार कृपालु हुआ था; क्योंकि गर्भ ही से वह उस पहिलौठेपन का चिह्न धारण किए हुए था जिसे परमेश्वर ने उसके लिए ठहराया था; और बाद में आदर के लिए उसे इस्राएल नाम दिया गया। अतः जब परमेश्वर ने नाना प्रकार से और एक के बाद एक याकूब पर अपनी भलाई प्रकट की थी, तो इससे लोग और भी अधिक आशा रख सकते थे।

वह उसे अपना दास कहता है; इसलिए नहीं कि यहूदी ऐसी आदरपूर्ण उपाधि के योग्य थे; परन्तु परमेश्वर ने उनके पुण्यों की अपेक्षा अपने आप पर और अपने अनुग्रहपूर्ण लेपालकपन पर दृष्टि की। अतः उसने उन्हें इसलिए दास नहीं कहा कि वे आज्ञाकारी थे, क्योंकि हम जानते हैं कि उन्होंने परमेश्वर को और उसके भविष्यद्वक्ताओं को कितने हठ के साथ ठुकराया; परन्तु इसलिए कि उसने उन्हें लेपालक बनाया था। इसी प्रकार जब दाऊद कहता है, “मैं तेरा दास, और तेरी दासी का पुत्र हूँ,” (भजन संहिता 116:16) तो वह अपनी आज्ञाकारिता पर घमण्ड नहीं करता, और न अपने लिए किसी योग्य गुण का दावा करता है, वरन् इसके विपरीत यह घोषित करता है कि गर्भ में रचे जाने से पहले ही वह परमेश्वर के अनुग्रहपूर्ण लेपालकपन के द्वारा उसका दास था। इसलिए वह जोड़ता है, “मैं तेरी दासी का पुत्र हूँ,” मानो वह कहता, “मैं पैतृक अधिकार से तेरा हूँ, क्योंकि मैं उस जाति से उत्पन्न हुआ हूँ जिसे तू ने अपनी निज प्रजा होने के लिए चुन लेना उचित समझा।” अब हम देखते हैं कि “दास” नाम को लोगों के पुण्यों का संकेत करनेवाला नहीं समझना चाहिए, और कि यहाँ उनकी आज्ञाकारिता की प्रशंसा नहीं की गई, मानो उन्होंने परमेश्वर की बुलाहट का सच्चाई और विश्वासयोग्यता से उत्तर दिया हो, वरन् केवल उनके अनुग्रहपूर्ण लेपालकपन की महिमा की गई है। 231 यह शब्द “डरने” से अधिक प्रबल है; इसका अर्थ है मन में टूट जाना, हताश हो जाना, यहाँ तक कि सारी आशा छोड़ देना। अगले वाक्यांश में जिस दूरी का उल्लेख है, वह उन्हें हताश करने वाली थी, और वे डरते थे कि कहीं उनकी सन्तान बँधुआई ही में न पड़ी रहे। इसलिए कहा गया है, “मत डर,” अर्थात् अन्तिम वापसी के विषय में; और “हताश न हो,” या निरुत्साहित न हो, दूरी के विषय में। क्रम, जैसा कि प्रायः होता है, उलट दिया गया है। — सं.

वह आगे कहता है, देख, मैं तुझे दूर देश से छुड़ाऊँगा। वह पहले यह घोषित करता है कि उपयुक्त समय आने पर वह लोगों का उद्धार करने को तैयार रहेगा; क्योंकि यहाँ “देख” निश्चितता को सूचित करता है।

और वह जोड़ता है, दूर से, कहीं ऐसा न हो कि लोगों का भरोसा टूट जाए; क्योंकि वे दूर की बँधुआई में खदेड़ दिए गए थे; और दूरी एक बड़ी बाधा है। यदि कोई हमें किसी अनजाने देश में बुलाए बिना कोई लाभदायक आश्रय देने की प्रतिज्ञा करे, तो हम उस प्रतिज्ञा को अधिक सहजता से ग्रहण कर सकते; परन्तु यदि कोई कहे, “मैं तुझ से अराम में सबसे बड़ी आय की प्रतिज्ञा करता हूँ, और तेरे जीवन को सुखी बनाने के लिए जो कुछ आवश्यक समझा जाए वह सब तुझे वहाँ मिलेगा;” तो क्या तुम यह उत्तर न दोगे, “क्या! क्या मैं वहाँ रहने के लिए समुद्र पार जाऊँ? मेरे लिए यहाँ थोड़ी-बहुत दरिद्रता में रहना वहाँ राजा होने से भला है।” अतः जब यहूदियों के सामने यह कठिनाई आ सकती थी, क्योंकि उन्होंने देखा कि वे अत्यन्त दूर के देशों में खदेड़ दिए गए हैं, तो भविष्यद्वक्ता जोड़ता है कि यह बात कोई ऐसी बाधा न होगी जो परमेश्वर को उनका उद्धार करने से रोके: मैं तुम्हें दूर से छुड़ाऊँगा; मानो वह कहता कि उसके हाथ इतने लम्बे हैं कि वह उन्हें कसदियों के देश तक बढ़ा सकता है, और उन्हें वहाँ से खींच निकाल सकता है।

फिर वह जोड़ता है, और तेरे वंश को उनकी बँधुआई के देश से। क्योंकि सत्तर वर्ष की प्रतीक्षा लम्बी थी, इसलिए परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञा को उनके वंश से जोड़ता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता ने यहूदियों को स्मरण दिलाया कि परमेश्वर द्वारा ठहराए गए समय की धीरज के साथ बाट जोहनी है, जैसा अब्राहम, इसहाक और याकूब के साथ हुआ था; क्योंकि यद्यपि वे जानते थे कि जिस देश की प्रतिज्ञा परमेश्वर ने उनसे की थी उसमें वे परदेशी होंगे, तौभी इस कारण उन्होंने उस अनुग्रह को, जिसकी प्रतिज्ञा उनसे की गई थी, न तुच्छ जाना और न उसकी उपेक्षा की।

अब्राहम ने जो कुछ परमेश्वर के मुँह से सुना था, “मैं यह देश तुझे दूँगा,” उसे विश्वास से ग्रहण किया; और तौभी वह जानता था कि वह वहाँ परदेशी और यात्री होकर रहेगा। (उत्पत्ति 12:7)

उसकी सन्तान को भी वही धीरज रखना था। अब्राहम को तो अत्यन्त लम्बे विलम्ब की चेतावनी दी गई थी; क्योंकि परमेश्वर ने घोषित किया था कि उसका वंश चार सौ वर्ष तक दासत्व में रहेगा। (उत्पत्ति 15:13) अतः यहाँ भविष्यद्वक्ता अपने समय के लोगों को उपदेश देता है कि वे अपने पिता के उदाहरण के अनुसार आशा रखें, और परमेश्वर के अनुग्रह को इसलिए तुच्छ न जानें कि उसका फल तुरन्त प्रकट नहीं हुआ; क्योंकि अब्राहम जब तक जीवित रहा उस देश का भोग न कर सका, तौभी उसने उसे अपने देश से बढ़कर जाना; इसहाक ने भी ऐसा ही किया; और याकूब ने अपने पूर्वजों के उदाहरण का अनुसरण किया। अतः यही कारण है कि भविष्यद्वक्ता वंश का उल्लेख करता है, मानो वह कहता, “यदि छुटकारे का फल तुम तक न भी पहुँचे, तौभी परमेश्वर तुम्हारी आशा को निष्फल न करेगा, क्योंकि तुम्हारी सन्तान पाएगी कि वह सच्चा और विश्वासयोग्य है।”

यदि उस समय कोई आपत्ति करता और कहता, “इससे मुझे क्या?” तो वह आपत्ति बेतुकी होती; क्योंकि परमेश्वर ने उनकी सन्तान से अपने देश में लौटने की प्रतिज्ञा क्यों की थी? क्या इस प्रकार उनके प्रति अपने प्रेम की गवाही देने के लिए नहीं? और उनकी स्वतन्त्रता कहाँ से आई, और परमेश्वर का पितृ-प्रेम कहाँ से आया, सिवाय वाचा के?

इससे हम देखते हैं कि पूर्वजों का उद्धार उस लाभ में सम्मिलित था जिसका भोग उनके पुत्रों ने किया। और इसलिए, यद्यपि उस लाभ का भोग प्रत्यक्ष रूप से पूर्वजों को नहीं दिया गया, तौभी वे कुछ अंश में उसके फल के भागी हुए, क्योंकि उनके लिए यह निश्चित कर दिया गया था कि परमेश्वर मृत्यु में भी अपनी प्रजा का छुड़ानेवाला होगा।

वह वह बात जोड़ता है जो सुखी जीवन में मुख्य है, कि वे चैन से और निश्चिन्त रहेंगे, यहाँ तक कि कोई उन्हें न डराएगा; क्योंकि अपने देश में लौटना, उसके शान्तिपूर्ण अधिकार के बिना, कुछ बड़े महत्व का न होता। इसलिए भविष्यद्वक्ता यह कहने के बाद कि परमेश्वर लोगों का उद्धार करने आएगा, और कि दूरी उसे अपनी प्रतिज्ञा को पूरा और सिद्ध करने से न रोकेगी, अब जोड़ता है कि यह लाभ स्थिर किया जाएगा, क्योंकि परमेश्वर फिर कभी परदेशियों को यहूदियों को बँधुआई में ले जाने, या जैसा उन्होंने किया था वैसे उन पर प्रभुता करने न देगा। अतः यहाँ परमेश्वर अपने अनुग्रह के बने रहने की प्रतिज्ञा करता है।

परन्तु क्योंकि यहूदियों के साथ ऐसा नहीं हुआ, इसलिए हमें फिर यही निष्कर्ष निकालना पड़ता है कि इस भविष्यद्वाणी का अर्थ मसीह के राज्य के सिवाय और किसी प्रकार नहीं लगाया जा सकता। और इस विषय का सबसे उत्तम व्याख्याकार दानिय्येल है; क्योंकि वह कहता है कि लौटने के बाद लोगों को बहुत से दुःखों और विपत्तियों का सामना करना पड़ेगा, और कि वे बड़े संकटों के बीच ही मन्दिर और नगर के बनने की आशा कर सकते थे। अतः यहूदी सदा भयभीत रहते थे। हम यह भी जानते हैं कि मन्दिर बनाते समय वे एक हाथ में करनी और दूसरे में तलवार लिए रहते थे, क्योंकि उन्हें बार-बार अपने शत्रुओं के आक्रमण सहने पड़ते थे। (नहेम्याह 4:17) अतः जब यहूदी मसीह के आने तक सदा अशान्ति ही सहते रहे, तो इससे यह निकलता है कि उसके आने तक यह प्रतिज्ञा कभी पूरी नहीं हुई। तब जिस लाभ की चर्चा भविष्यद्वक्ता यहाँ करता है, वह विशेष रूप से मसीह के राज्य का है।

अब, जब से मसीह जगत पर प्रकट हुआ, तब से हम देखते हैं कि जगत बहुत सी आँधियों से हिलाया गया है, वरन् सब कुछ उथल-पुथल में रहा है; इससे यह निकलता है कि इस खण्ड की व्याख्या बाहरी विश्राम और सांसारिक चैन के अर्थ में नहीं की जा सकती।

इसलिए इसे उसके राज्य के स्वभाव के अनुसार समझना चाहिए।

अतः जब मसीह का राज्य आत्मिक है, तो इससे यह निकलता है कि यहाँ चैन और शान्ति की दशा की प्रतिज्ञा इसलिए नहीं की गई कि कोई शत्रु हमें न सताएगा या हमें कष्ट न देगा, परन्तु इसलिए कि हम विशेष करके परमेश्वर के साथ मेल का आनन्द लेंगे, और हमारा जीवन परमेश्वर के हाथ और रक्षा से सुरक्षित रहकर निर्भय रहेगा। अतः यहाँ आत्मिक चैन ही समझना है, जिसका फल विश्वासी अपने विवेक में अनुभव करते हैं, यद्यपि जगत उन पर सदा आक्रमण करता रहता है, जैसा मसीह कहता है, “मैं तुम्हें अपनी शान्ति देता हूँ; जैसे संसार देता है, मैं तुम्हें नहीं देता,” और फिर, “संसार में तुम्हें क्लेश होता है, परन्तु ढाढ़स बाँधो, मैं ने संसार को जीत लिया है।” (यूहन्ना 16:33) 232 कैल्विन {,{`` שבका अनुवाद “वास करेगा” करते हैं, मानो यह {}ישבसे निकला हो; परन्तु अधिकांश लोग इसका अनुवाद “लौटेगा” करते हैं, जैसा हमारे अनुवाद में है। फिर, “चैन से रहना” और “निश्चिन्त दशा में रहना” पर्याप्त रूप से भिन्न नहीं हैं। मैं इस वाक्यांश का अनुवाद इस प्रकार करता हूँ, — और याकूब लौटेगा और चैन से रहेगा, और वह निर्भय रहेगा, और कोई उसको न डराएगा। निर्भयता का अर्थ है उपद्रव से छुटकारा: “वह समृद्ध होगा,” जैसा कुछ लोगों ने अनुवाद किया है, किसी प्रकार उपयुक्त नहीं। “याकूब” को, जो बारह कुलपतियों का पिता था, चौथे पद (यिर्मयाह 30:4) के अनुसार इस्राएल और यहूदा दोनों को सम्मिलित करनेवाला समझना चाहिए। — सं.

आगे लिखा है —

यिर्मयाह 30:11

11. क्योंकि यहोवा की यह वाणी है, तुम्हारा उद्धार करने के लिए मैं तुम्हारे संग हूँ; इसलिए मैं उन सब जातियों का अन्त कर डालूँगा, जिनमें मैं ने उन्हें तितर-बितर किया है, परन्तु तुम्हारा अन्त न करूँगा। तुम्हारी ताड़ना मैं विचार करके करूँगा, और तुम्हें किसी प्रकार से निर्दोष न ठहराऊँगा।

11. Quoniam ego tecum, dicit Jehova, ad servandum to; nam faciam consumptionem in cunctis gentibus, ad quas dispergam to illuc; atqui tecum non faciam consumptionem, et castigabo to in judicio, et mundando non mundabo to (vel, purgando non purgabo to, vel, succidendo non succidam to: dicemus postea de verbo)

जो कुछ हम कह चुके हैं उसे वह दूसरे शब्दों में दोहराता है, परन्तु इस उद्देश्य से कि काँपते और डगमगाते मनों को और भी पूरा सहारा दे। अतः परमेश्वर प्रतिज्ञा करता है कि वह अपनी प्रजा का उद्धार करने के लिए उसके साथ उपस्थित रहेगा। अब क्योंकि इस पर सहज ही विश्वास नहीं किया जा सकता था, और यहूदी उस समय की अपनी दशा ही को देखकर निराश हुए बिना नहीं रह सकते थे, इसलिए भविष्यद्वक्ता ने उनके और अन्यजातियों के बीच यह तुलना जोड़ दी। कसदी और अश्शूरी सत्तर वर्ष तक हर प्रकार के धन, सुख-विलास और आदर में फूलते-फलते रहे — संक्षेप में, सांसारिक सुख के लिए जो कुछ आवश्यक था वह सब उनके पास था।

तब यहूदी इसके सिवाय और क्या सोच सकते थे कि अविश्वासी और परमेश्वर के शत्रु सुखी हैं, परन्तु वे स्वयं दुःखी हैं, कठोर दासत्व से दबे हुए और बहुत सी निन्दाओं से लदे हुए, और दरिद्रता में जीवन बिताते हुए, और वध होनेवाली भेड़ों के समान गिने जाते हुए? अतः जब ये सब बातें उनकी आँखों के सामने स्पष्ट थीं, तो निराशा के सिवाय और क्या उनके मनों को पकड़ सकती थी? इसलिए परमेश्वर इस बुराई का उपाय करता है;

और वह कहता है कि वह जातियों का अन्त कर डालेगा, मानो वह कहता, “जब मैं अन्यजातियों को दण्ड देना आरम्भ करूँगा, तब मैं उन्हें पूर्ण विनाश से नष्ट कर दूँगा, उनके लिए कोई आशा शेष न रहेगी। परन्तु तेरा मैं अन्त न करूँगा।” इस प्रकार वह उस दण्ड में, जो निकम्मे ठहराए हुए और अभक्त लोगों पर डाला जाता है, और उस दण्ड में, जिससे वह अपनी प्रजा के पापों की ताड़ना करेगा, भेद करता है; क्योंकि जो दण्ड वह दुष्टों पर डालेगा वह घातक होगा, जबकि जिस दण्ड से वह अपनी कलीसिया की ताड़ना करेगा वह केवल कुछ समय के लिए होगा; इसलिए वह उसके लिए औषधि और उद्धार का कारण होगा।

अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय क्या था: उसने विश्वासियों के शोक की कड़वाहट को कम किया, क्योंकि परमेश्वर उन्हें पूर्ण रूप से त्याग न देगा। और वह दिखाता है कि उनकी ताड़नाओं को धीरज से सहना चाहिए, क्योंकि उन्हें उनके अन्त की आशा रखनी थी; परन्तु जब वह निकम्मे ठहराए हुओं की सुधि लेगा तब बात भिन्न होगी, क्योंकि वह उन्हें बिना किसी आशा के छोड़ देगा। संक्षेप में, वह कहता है कि अविश्वासियों के प्रति वह अन्तिम सीमा तक कठोर न्यायी होगा, परन्तु अपनी प्रजा की ताड़ना वह पिता के समान करेगा।

233 पहले वाक्यांश में कोई क्रिया नहीं है, “क्योंकि मैं तेरे साथ।” प्रसंग दिखाता है कि भविष्यत् काल अभिप्रेत है; तब अनुवाद यह होना चाहिए, “क्योंकि मैं तेरे साथ रहूँगा;” अर्थात् लोगों के अपने देश में लौटाए जाने के समय, जिसका उल्लेख पिछले पद में है। कैल्विन ने भी इस वाक्यांश को इसी प्रकार समझा, यद्यपि प्राचीन अनुवादों ने, हमारे अनुवाद की नाईं, क्रिया को वर्तमान काल में दिया, जो किसी प्रकार ठीक नहीं है। — सं.

तौभी अन्य स्थल इस विचार के विरुद्ध प्रतीत होते हैं; क्योंकि परमेश्वर घोषित करता है कि वह अपनी चुनी हुई प्रजा का भी अन्त कर डालेगा, जैसे यशायाह 10:23 में, और अन्य स्थानों में। परन्तु इसका स्पष्टीकरण सरल है; क्योंकि वहाँ वह लोगों के पूरे समूह की ओर संकेत करता है, जो उससे विमुख हो गए थे; परन्तु यहाँ उसका वचन विश्वासियों को सम्बोधित है, “अनुग्रह से बचे हुए लोगों” को, जैसा पौलुस उन्हें कहता है, (रोमियों 11:5) अतः हमें सदा यह विचार करना चाहिए कि भविष्यद्वक्ता किन लोगों को सम्बोधित करते हैं; क्योंकि कभी वे मिली-जुली भीड़ की ओर संकेत करते हैं, और कभी वे विश्वासियों को अलग से सम्बोधित करते हैं, और उनसे उद्धार की प्रतिज्ञा करते हैं।

सो हम पहले देख चुके हैं कि परमेश्वर अपनी प्रजा का, अर्थात् निकम्मे ठहराए हुओं का, अन्त कर डालेगा; परन्तु भविष्यद्वक्ता यहाँ अपनी बात कलीसिया की ओर और उस वंश की ओर मोड़ता है जिसे परमेश्वर ऐसी प्रजा के बीच सुरक्षित रखेगा जो प्रत्यक्ष में कटी हुई और नष्ट हो चुकी थी। इसलिए जब कभी शैतान हमें निराशा की ओर धकेलना चाहे, जब कभी परमेश्वर हमारी आशा से अधिक कठोरता से हमारे साथ व्यवहार करे और हम मन में व्याकुल हों, तब यह सान्त्वना स्मरण रहे कि परमेश्वर हमारा अन्त न करेगा; क्योंकि जो बात यहाँ कलीसिया के विषय में कही गई है, वह हर एक विश्वासी पर लागू की जा सकती है और की जानी चाहिए। परमेश्वर निःसन्देह जब उनके लिए आवश्यक देखता है तब बहुधा उनके साथ कठोर व्यवहार करता है, परन्तु वह उन्हें कभी पूर्ण रूप से भस्म नहीं करता।

वह कहता है, मैं तेरा अन्त न करूँगा, परन्तु तेरी ताड़ना न्याय से करूँगा। यहाँ संयोजक अव्यय को विरोधसूचक अव्यय के रूप में लेना चाहिए, और “न्याय” का अर्थ संयम है, जैसा हम यिर्मयाह 10:24 में देख चुके हैं, “हे यहोवा, मेरी ताड़ना कर, पर क्रोध में नहीं;” वहाँ उसने पहले “न्याय” का उल्लेख किया था। इसी अर्थ में यहाँ न्याय का प्रयोग हुआ है, अर्थात् उस संयम के लिए जिसे परमेश्वर अपने चुने हुओं के प्रति अपनाता है, क्योंकि वह सदा अपनी दया को स्मरण रखता है, और यह नहीं देखता कि वे किस बात के योग्य हैं, परन्तु यह कि वे क्या सह सकते हैं। इसलिए जब परमेश्वर अपना हाथ रोक लेता है और कोमलता से अपनी प्रजा की ताड़ना करता है, तब कहा जाता है कि वह उन्हें न्याय से, अर्थात् संयम के साथ, दण्ड देता है। क्योंकि यहाँ न्याय को धार्मिकता के अर्थ में नहीं लेना है, क्योंकि परमेश्वर कभी उचित सीमा का ऐसा उल्लंघन नहीं करता कि उस पर क्रूरता का दोष लगे; न्याय कठोर न्याय-रीति के विपरीत भी रखा जाता है, और बहुधा अन्याय के विपरीत भी; परन्तु इस स्थान पर हमें समझना है कि विरोध न्याय और परमेश्वर की न्यायपूर्ण कठोरता के बीच है। अतः न्याय और कुछ नहीं, केवल क्रोध का हलका किया जाना है।

अन्त में वह जोड़ता है, शुद्ध करते हुए मैं तुझे शुद्ध न करूँगा, या, “काटते हुए मैं तुझे काट न डालूँगा।” क्रिया {,}נקהnuke, का अर्थ कभी-कभी शुद्ध करना, या निर्दोष ठहराना होता है; और अकर्मक रूप में इसका अर्थ शुद्ध और निर्दोष होना भी है; परन्तु यहाँ इसे सकर्मक रूप में लेना है। अतः इसका अनुवाद इसके सिवाय और किसी प्रकार नहीं हो सकता, “शुद्ध करते हुए मैं तुझे शुद्ध न करूँगा,” या, “मैं तुझे काट न डालूँगा;” क्योंकि इसका यह अर्थ भी है, और दोनों में से कोई भी अर्थ उपयुक्त है। यदि हम पढ़ें, “मैं तुझे काट न डालूँगा,” तो यह उसी विषय का क्रम है; “मैं न्याय से तेरी ताड़ना करूँगा, और इसलिए तुझे काट न डालूँगा,” अर्थात् मैं तेरा अन्त न करूँगा। तब, जैसा स्पष्ट है, यह अत्यन्त उपयुक्त सम्बन्ध होगा, और यदि हम पढ़ें, “मैं तुझे काट न डालूँगा,” तो बात सहजता से चलेगी। परन्तु दूसरा अनुवाद भी उपयुक्त है, यद्यपि उसके दो अर्थ हो सकते हैं; कुछ लोग इसे विरोधसूचक रूप में लेते हैं, “यद्यपि मैं तुझे निर्दोष न ठहराऊँगा;” अर्थात् यद्यपि मैं तुझे न छोड़ूँगा, परन्तु संयम के साथ तेरी ताड़ना करूँगा; और यह संकेत अत्यन्त समयोचित था; क्योंकि शरीर सदा दण्ड से छूट जाना चाहता है। अब परमेश्वर देखता है कि जब हम अपराध करें तब हमारा बिना दण्ड के बच निकलना हमारे लिए भला नहीं; अतः इस शिक्षा को स्मरण रखना आवश्यक है, कि यद्यपि परमेश्वर हमें दण्ड से मुक्त न रहने देगा, और न हमें छूट देगा, वरन् अपनी छड़ियों से हमें मारेगा, तौभी वह हमारे प्रति अपने न्याय में संयमी है। परन्तु अन्य लोग इसका सम्बन्ध यशायाह के इस खण्ड से जोड़ते हैं, “मैं ने तुझे भट्ठी में से पार कराया और तुझे ताया, परन्तु चाँदी के समान नहीं, नहीं तो तू भस्म हो जाता।” (यशायाह 48:10)

अतः परमेश्वर अपनी प्रजा को परखता है, या ताड़नाओं के द्वारा उन्हें शुद्ध करता है; परन्तु किस प्रकार? या, कहाँ तक? — चाँदी और सोने के समान नहीं, क्योंकि वह उन्हें पूर्ण रूप से भस्म कर देता। क्योंकि जब चाँदी, और सोना भी, अपने मैल से शुद्ध किया जाता है, तब अधिक शुद्ध और निर्मल भाग बचा रहता है; परन्तु मनुष्य, क्योंकि उनमें व्यर्थता के सिवाय और कुछ नहीं, पूर्ण रूप से भस्म हो जाते, यदि परमेश्वर उन्हें चाँदी और सोने के समान परखता। परन्तु क्योंकि यह व्याख्या अत्यधिक सूक्ष्म है, इसलिए मैं पहली दो व्याख्याओं में से किसी एक को अपनाना अधिक पसन्द करता हूँ, अर्थात् यह कि परमेश्वर उन्हें पूर्ण रूप से काट न डालेगा, यद्यपि वह उनकी ताड़ना करेगा; या यह कि यद्यपि वह उन्हें पूर्ण रूप से निर्दोष न गिनेगा या न समझेगा, और न उन्हें ऐसी छूट देगा कि वे बिना दण्ड के छूट जाएँ, तौभी वह उन पर दयालु और कृपालु रहेगा, क्योंकि वह अपनी ताड़नाओं के साथ न्याय को जोड़ेगा, ताकि वे असंयमी न हों।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, ऐसा अनुग्रह कर कि जब हम तेरे राज्य से और उद्धार की आशा से पूर्ण रूप से विमुख उत्पन्न हुए हैं, और जब तक तू अपने आत्मा की सामर्थ्य और अनुग्रह से हमें इकट्ठा न करे तब तक एक भयानक तितर-बितर होना हमारी बाट जोहता है, — हाँ, ऐसा अनुग्रह कर कि जैसे तू ने एक बार हमें अपनी प्रजा करके लेपालक बनाया है, और हमें मसीह के जूए के नीचे इकट्ठा करना तुझे भाया है, वैसे ही हम उसकी आज्ञाकारिता में बने रहें, और इस प्रकार तेरे शासन के अधीन स्थिर रहें, कि इस जीवन में अपनी दौड़ पूरी करने के बाद हम अन्त में उस राज्य में पहुँचें जहाँ हम उन सब उत्तम वस्तुओं का आनन्द लेंगे जिनका स्वाद हम अभी केवल आशा से चखते हैं, उसी हमारे प्रभु मसीह यीशु के द्वारा। — आमीन।

एक सौ पन्द्रहवाँ व्याख्यान

यिर्मयाह 30:12

12. यहोवा यों कहता है, तेरे दुःख की कोई औषधि नहीं, और तेरी चोट गहरी और दुःखदायी है।

12. Quoniam sic dicit Jehova, gravitas confractioni tuae (vel, fracturae alii vertunt, contritionem, qued idem est, nam {}שברsignificat etiam centerere) segra plaga tua.

पहले भविष्यद्वक्ता के अभिप्राय पर ध्यान देना है: वह उन धोखेबाज़ों से लड़ रहा था जो लोगों को थोड़े ही समय में लौटने की आशा देते थे, जबकि, जैसा कहा जा चुका है, सत्तर वर्ष की बाट जोहनी थी। अतः भविष्यद्वक्ता लोगों को दिखाना चाहता था कि वे कितनी मूर्खता से इतने थोड़े समय में अपनी विपत्तियों के अन्त की आशा करते थे। और इस पर सावधानी से ध्यान देना चाहिए, क्योंकि भविष्यद्वक्ता ने अकारण इस बात पर बहुत बल नहीं दिया; क्योंकि मनुष्यों को परमेश्वर के न्याय को गम्भीरता से स्वीकार करने तक ले आने से अधिक कठिन और कुछ नहीं। जब कोई प्रतिकूल बात होती है, तब वे सहे जानेवाले दुःखों के विषय में कोमल और संवेदनशील होते हैं; परन्तु साथ ही वे परमेश्वर की ओर नहीं देखते, और व्यर्थ कल्पनाओं से अपने आप को सान्त्वना देते हैं। इसलिए भविष्यद्वक्ता के लिए अपनी शिक्षा पर विस्तार से ठहरना आवश्यक था; क्योंकि उसने देखा कि इस्राएली दो वर्ष के बाद लौटने की प्रतिज्ञा अपने आप से कर रहे थे, यद्यपि भविष्यद्वक्ताओं ने उन्हें चेतावनी दी थी कि उन्हें सत्तर वर्ष तक परमेश्वर की ताड़ना सहनी होगी। 234 इस वाक्यांश का अनुवाद वल्गेट में है, “कि तू अपने आप को निर्दोष न समझे;” सुरियानी में, “परन्तु मैं तुझे पूर्ण रूप से दण्डरहित न छोड़ूँगा;” और तरगुम में, “और नष्ट करते हुए मैं तुझे नष्ट न करूँगा।” वेनेमा और ब्लेनी दोनों तरगुम के अर्थ का अनुसरण करते हैं; बाद वाले का अनुवाद है, “और तुझे पूर्ण रूप से उजाड़ न करूँगा।” यह वाक्यांश यिर्मयाह 25:29 में, और निर्गमन 34:7; गिनती 14:18; नहूम 1:3 में भी आता है; जिन स्थानों में क्रिया का भाव है निर्दोष या दोषरहित ठहराना, बरी करना, बिना दण्ड के छोड़ देना, न कि उजाड़ करना, काट डालना या नष्ट करना। कि निर्गमन 34:7 में इसका पहला अर्थ ही है, यह उसके बाद आनेवाले स्पष्टीकरण से प्रकट है, “निर्दोष ठहराते हुए वह निर्दोष न ठहराएगा, पितरों के अधर्म का दण्ड देता है,” इत्यादि; पितरों के अधर्म का दण्ड देना सिद्ध करता है कि वह निर्दोष नहीं ठहराया जाता, या बिना दण्ड के नहीं छोड़ा जाता। क्रिया {{נקהका अर्थ है अशुद्धता, अपराध, दोष या दण्ड से मुक्त होना, या किसी को मुक्त गिनना। दण्ड से मुक्त छोड़ देना ही यहाँ सबसे उपयुक्त भाव है; परमेश्वर कुछ मात्रा में उनकी ताड़ना करेगा, और उन्हें पूर्ण रूप से दण्डरहित न रहने देगा। — सं.

यही कारण है कि भविष्यद्वक्ता यहाँ विपत्तियों की गम्भीरता की चर्चा करता है, इसलिए नहीं कि इस्राएली संवेदनहीन थे, परन्तु इसलिए कि वे भोले-भाले विश्वास करनेवाले रहे थे, और अब भी लौटने की आशा कर रहे थे, यहाँ तक कि झूठी सान्त्वना से अपने आप को धोखा देते थे।

इसलिए वह कहता है कि टूटन गम्भीर थी; कुछ लोग यह अनुवाद देते हैं, “असाध्य, या निराशाजनक, है तेरी चोट।” परन्तु {,}אנושanush, यहाँ एक संज्ञा है, क्योंकि उसके बाद सम्बन्धसूचक {,}לlamed आता है; और जो भविष्यद्वक्ता कहता है उसका अनुवाद इसके सिवाय और किसी प्रकार नहीं हो सकता, “तेरी चोट को,” या टूटन को, “गम्भीरता है।”

फिर वह जोड़ता है कि घाव दुःखदायी था, अर्थात् चंगा होना कठिन था; क्योंकि मैं इस खण्ड को इसी प्रकार समझता हूँ। परन्तु अन्त की आशा रखनी थी; तौभी लोगों को उसे निकट नहीं समझना था; इसके विपरीत, उन्हें धीरज के साथ बाट जोहने के लिए अपने आप को तैयार करना था, जब तक कि परमेश्वर का ठहराया हुआ अन्त न आ जाए। आगे लिखा है, —

यिर्मयाह 30:13

13. तेरा मुकद्दमा लड़ने के लिए कोई नहीं, तेरा घाव बाँधने के लिए न औषधि, न मरहम है।

13. Nemo judicans (hoc est, nemo est qui judicet) judicium tuum (hoc est, qui suscipiat causam tuam) ad sanitatem medelae et curatio non sunt tibi (alii vertunt, Nemo judicans judicium tuum, ut emplastrum adhibeat; sed hoc durius; deinde, medela et curatio non sunt tibi; sed videtur mihi simplex esse verborum sensus, quod nemo judicet judicium, deinde quod nihil ad curationem remedii suppetat)

भविष्यद्वक्ता पहले बिना किसी अलंकार के बोलता है, फिर वह उस सीधे सत्य को एक रूपक से स्पष्ट करता है। वह कहता है कि लोगों का पक्ष लेनेवाला कोई न था; मानो वह कहता कि वे हर प्रकार की सहायता से रहित थे। यह बात तो कुछ हद तक पहले ही प्रकट थी; परन्तु लोगों की निश्चिन्तता ऐसी आलस्यपूर्ण थी कि वे प्रतिदिन अपने लिए कोई नई आशा गढ़ लेते थे। तब यिर्मयाह ने वह घोषित किया जो कुछ अंश में हो चुका था और जो अब भी सिर पर मँडरा रहा था; और इस प्रकार उसने लोगों की मूर्खता सिद्ध की, जो लगभग असाध्य विपत्तियों में फँसे होते हुए भी अपनी चापलूसी करते रहते थे। वह कहता है, “तू देखता है कि कोई ऐसा नहीं जो तेरी ओर हाथ बढ़ाए, या जो तेरी सहायता करने को तैयार हो; और तौभी तू सोचता है कि तू शीघ्र स्वतन्त्र हो जाएगा: यह व्यर्थ आशा कहाँ से आई?” फिर वह एक रूपक पर आता है, तुझे चंगा करने के लिए औषधि लगानेवाला कोई नहीं। एक ही वाक्य में वह यशायाह के पूरे पहले अध्याय को समेट लेता है, जो इस विषय की चर्चा करता है, परन्तु अपना अर्थ और भी पूरी रीति से समझाता है।

235 इब्रानी में {{ל कभी-कभी यूनानी के {κατὰ} के समान होता है; इसका अर्थ है, के विषय में, के सम्बन्ध में; अतः यहाँ, — तेरी चोट के विषय में असाध्य, दुःखदायी रही है तेरी मार। या हम क्रम उलटकर यह अनुवाद दे सकते हैं, — तेरी चोट के विषय में, वह असाध्य है; दुःखदायी रही है तेरी मार। “दुःखदायी मार” से उत्पन्न “चोट” असाध्य थी, अर्थात् मानवीय साधनों से। पहले परिणाम का उल्लेख है, “चोट;” फिर कारण का, “मार।” — सं.

तौभी जब भविष्यद्वक्ता कहता है कि लोगों की विपत्तियों को चंगा करनेवाला कोई न था, तो इसमें कुछ भी अस्पष्ट नहीं है।

हमें उसके उद्देश्य को सदा ध्यान में रखना चाहिए, अर्थात् यह कि लोग बहुत सहज ही धोखा खा जाते थे, जब वे शीघ्र अपने देश में लौटने की आशा करते थे। परन्तु इससे हम एक सामान्य सत्य निकाल सकते हैं, — कि मनुष्य परमेश्वर के अनुग्रह को तब तक कभी नहीं समझते जब तक वे बहुत सी और कड़ी डाँटों से वश में न किए जाएँ: क्योंकि वे सदा परमेश्वर के न्याय से भागते हैं, और फिर अपने ही पापों के प्रति अन्धे हो जाते हैं, और मूर्खता से अपनी चापलूसी करते हैं। और इसके अतिरिक्त, जब वे केवल शब्दों से मान लेते हैं कि उन्होंने पाप किया है, तो वे सोचते हैं कि उन्होंने बहुत पर्याप्त कर लिया। इसलिए उन्हें पश्चाताप के अभ्यास और कर्तव्य के लिए उकसाया जाना चाहिए। इसके बाद लिखा है —

यिर्मयाह 30:14

14. तेरे सब मित्र तुझे भूल गए; वे तेरी सुधि नहीं लेते; क्योंकि तेरे बड़े अधर्म और भारी पापों के कारण, मैं ने शत्रु के समान तुझे घायल किया है, मैं ने क्रूर बनकर ताड़ना दी है।

14. Omnes amici tui obliti sunt tui, et non requirunt; quia plaga tibi (hoc est percussi to) castigtione crudelis (hominis, aut, saevi) propter multitudinem iniquitatum tuarum, invaluerunt scelera tua.

भविष्यद्वक्ता फिर दोहराता है कि इस्राएल के लिए मनुष्यों की ओर से कुछ भी शेष न रहा, क्योंकि कोई सहायता पहुँचाने को आगे न आया। कुछ लोग तो इन शब्दों की व्याख्या ऐसे करते हैं मानो भविष्यद्वक्ता ने कहा हो कि मित्र, जैसा प्रायः होता है, लोगों की दशा को निराशाजनक देखकर लज्जा के मारे छिप गए: क्योंकि जब तक मित्र रोगी को राहत दे सकते हैं, तब तक वे पास तैयार रहते हैं, और उत्सुकता से परिश्रम करते हैं, परन्तु जब जीवन की आशा नहीं रहती, तब वे फिर दिखाई नहीं देते। परन्तु मुझे कोई सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता यहाँ यहूदियों को उस झूठे भरोसे के लिए दोषी ठहराता है जिससे वे लम्बे समय से मोहित थे; क्योंकि हम जानते हैं कि कभी उन्होंने मिस्रियों पर आशा रखी; कभी अश्शूरियों पर; और इस प्रकार ऐसा हुआ कि उन्होंने अपने ऊपर बहुत सी विपत्तियाँ ले लीं। और हम अन्यत्र बहुत से खण्डों में देख चुके हैं कि इन सन्धियों की तुलना अशुद्ध वासनाओं से की गई है; क्योंकि जब लोग कभी मिस्रियों की, कभी अश्शूरियों की मित्रता ढूँढ़ते थे, तो यह एक प्रकार का व्यभिचार था। परमेश्वर ने यहूदियों को अपनी देखभाल और रक्षा में ले लिया था; परन्तु अविश्वास ने उन्हें भटका दिया, यहाँ तक कि वे दूसरों की सहायता से अपने आप को दृढ़ करना चाहते थे।

इसलिए भविष्यद्वक्ताओं में सर्वत्र मिस्रियों और अश्शूरियों की तुलना यारों से की गई है। और यह विचार यहाँ भली-भाँति उपयुक्त होगा; क्योंकि लोगों के दुःखों को बताना, उनके कारण को प्रकट किए बिना, पर्याप्त न था।

तब भविष्यद्वक्ता उन झूठी युक्तियों की ओर संकेत करता है जिन्हें यहूदियों ने अपना लिया था, जब वे अपने आप को निश्चिन्त और सुरक्षित समझते थे जब तक मिस्री, या अश्शूरी, या कसदी उन पर कृपालु रहते। इसी कारण वह कहता है कि उनके सब मित्र उन्हें भूल गए थे, और यह भी कि वे उनकी सुधि नहीं लेते थे, अर्थात् उन्होंने उनकी सारी चिन्ता त्याग दी थी। और वह कारण जोड़ता है, क्योंकि परमेश्वर ने लोगों को शत्रु के समान घाव से मारा था। यहाँ भविष्यद्वक्ता उन्हें फिर परमेश्वर के न्यायासन के सामने बुलाता है, ताकि वे यह विचार करना सीखें कि ये विपत्तियाँ संयोग से नहीं आईं, परन्तु वे परमेश्वर के न्यायपूर्ण क्रोध की गवाहियाँ थीं। अतः परमेश्वर यहाँ सामने आता है, और अपने आप को उन सब विपत्तियों का कर्ता घोषित करता है; क्योंकि भविष्यद्वक्ता का लोगों के दुःखों के विषय में बोलना व्यर्थ होता, यदि यह सत्य उनके मनों पर पूरी रीति से अंकित न होता, — कि उनका काम परमेश्वर से था।

236 कैल्विन के अनुसार पद इस प्रकार पढ़ा जाता है, — कोई तेरा मुकद्दमा नहीं लड़ता; चंगाई के लिए औषधियाँ और चंगा करना तेरे पास नहीं। यह विभाजन सेप्टुआजिंट ने किया है, यद्यपि अन्य अनुवादों ने नहीं, और न तरगुम ने। वेनेमा इसे अपनाता है। शब्द {,{מזור, जिसका अनुवाद ऊपर “चंगाई” किया गया है, स्पष्टतः घाव का अर्थ देता है। यह केवल यहाँ, और ओबद्याह 7 में, और दो बार होशे 5:13 में आता है, जहाँ इसका अनुवाद “घाव” किया गया है। यह ,{}זור से निकला है, दबाने या बाँधने के अर्थ में; परन्तु यह संज्ञा कर्मवाच्य अर्थ में लेने पर उस वस्तु को सूचित करती है जो दबाई या बाँधी जाती है, और वह घाव है। तब शाब्दिक अनुवाद यह होगा — कोई तेरा मुकद्दमा नहीं लड़ रहा; घाव के विषय में, औषधियाँ, पट्टी बाँधना, तेरे लिए कुछ नहीं; या दूसरे शब्दों में, — घाव के विषय में, तेरे पास न औषधियाँ हैं, न पट्टी। शब्द {}רפאות का अर्थ दवाओं की अपेक्षा औषधियाँ या लेप है, क्योंकि यहाँ, और अधिकांश स्थानों में, यह घावों और चोटों पर बाहर से लगाए जानेवाले उपचारों को सूचित करता है। क्रम, जैसा पिछले पद में, उलट दिया गया है, औषधियाँ पट्टी बाँधने से पहले रखी गई हैं। देखिए यहेजकेल 30:21। — सं.

अब, यह कि परमेश्वर अपने आप को शत्रु कहता है, और अपनी तुलना एक क्रूर शत्रु से करता है, इसे ऐसा नहीं समझना चाहिए मानो वह वाचा रद्द हो गई थी जिसके द्वारा उसने अब्राहम की सन्तान को अपनी करके लेपालक बनाया था; क्योंकि वह अपनी दया से सदा कुछ बचे हुओं को सुरक्षित रखता था। और न हमें यह समझना चाहिए कि परमेश्वर की कठोरता में कोई अति थी, मानो जब उसने अपने न्याय के काम पूरे किए तब वह अपनी प्रजा के विरुद्ध क्रूरता से भड़क उठा हो: परन्तु इसे मनुष्यों की सामान्य धारणाओं के अनुसार समझना चाहिए। परमेश्वर अन्यत्र भी इस्राएलियों को अपने शत्रु कहता है, परन्तु विलाप के बिना नहीं, जब वह कहता है, “आह, मैं अपने शत्रुओं से पलटा लूँगा।” (यशायाह 1:24)

वहाँ उसने शोक करनेवाले का रूप धारण किया, मानो वह कहता कि वह अनिच्छा से इतनी कठोरता तक बढ़ा, क्योंकि यदि आवश्यकता ने उसे ऐसी कठोरता के लिए विवश न किया होता तो वह स्वेच्छा से लोगों को छोड़ देता। परन्तु, जैसा मैं कह चुका हूँ, जब परमेश्वर अपने आप को अपनी प्रजा का शत्रु कहता है, तो इसे सांसारिक दण्ड के विषय में समझना चाहिए, या इसकी व्याख्या उन निकम्मे ठहराए हुए और नष्ट लोगों के विषय में करनी चाहिए जो परमेश्वर के अनुग्रह से पूर्ण रूप से विमुख हो गए थे, और जिन्हें परमेश्वर ने भी सड़े हुए अंगों के समान अपनी कलीसिया की देह से काट दिया था। परन्तु क्योंकि भविष्यद्वक्ता यहाँ विश्वासियों को सम्बोधित करता है, इसमें कोई सन्देह नहीं कि परमेश्वर अपने आप को शत्रु इसलिए कहता है, क्योंकि उस समय की दशा के अनुसार यहूदी इसके सिवाय और कुछ नहीं सोच सकते थे कि परमेश्वर उनसे क्रोधित है।

क्रूर शब्द के विषय में हम पहले ही कह चुके हैं कि इसके द्वारा अति का संकेत किया गया है, मानो परमेश्वर पर बहुत अधिक कठोरता या निष्ठुरता का आरोप लगाया गया हो: परन्तु यहूदी किसी और रीति से अपने पापों पर विचार करने के लिये जगाए नहीं जा सकते थे, और न इतने भयभीत किए जा सकते थे कि वे गम्भीरता से परमेश्वर के न्याय को स्वीकार करने की ओर ले जाए जाएँ। और परमेश्वर आप आगे चलकर पर्याप्त रूप से प्रमाणित करता है कि यद्यपि वह अपनी तुलना एक कठोर या क्रूर मनुष्य से करता है, तौभी उसके न्यायों में कोई अनुचित बात नहीं पाई जा सकती थी।

क्योंकि वह आगे कहता है, तेरे अधर्म की बहुतायत के कारण, क्योंकि तेरे पाप प्रबल हो गए हैं

यद्यपि यहूदी यह समझते थे कि जब परमेश्वर ने उन्हें लम्बी बँधुआई की धमकी दी तो उसने कठोरता से व्यवहार किया, तौभी यहाँ उनके अधर्म की बहुतायत के द्वारा उनका मुँह बन्द कर दिया गया; मानो वह कहता है, “तराजू के एक पलड़े पर उस दण्ड का भार रखो जिसकी तुम शिकायत करते हो, और दूसरे पलड़े पर पापों का वह ढेर रखो जिनके द्वारा तुमने बार-बार और बहुत समय तक मेरे क्रोध को अपने विरुद्ध भड़काया है।” अतः परमेश्वर अधर्म की बहुतायत के द्वारा यह दिखाता है कि यह उसका दोष नहीं ठहराया जा सकता था कि उसने यहूदियों को इतनी कठोरता से दण्ड दिया, क्योंकि वे ऐसे ही दण्ड के योग्य थे। और वह दूसरे शब्दों में उसी बात की पुष्टि करता है, इसलिये नहीं कि जो उसने कहा था उसमें कुछ अस्पष्टता थी, वरन् इसलिये कि भविष्यद्वक्ता ने देखा कि उसका पाला हठीले मनुष्यों से पड़ा है। तब उनकी उदासीनता को डाँटने के लिये वह कहता है कि उनके पाप प्रबल हो गए थे आगे यह लिखा है, —

यिर्मयाह 30:15

15. तू अपने घाव के कारण क्यों चिल्लाती है? तेरी पीड़ा असाध्य है; तेरे बड़े अधर्म के कारण, और इसलिये कि तेरे पाप बढ़ गए, मैं ने तुझ से ये काम किए हैं।

15. Quid vociferaris propter confractionem tuam? aeger est (vel, gravis) dolor tuus propter multitu-dinum iniquitatis tuae, quoniam invaluerunt scelera tua, feci haec tibi.

भविष्यद्वक्ता अब एक आपत्ति का पहले से उत्तर देता है, ताकि यहूदी परमेश्वर से वाद-विवाद न करें; क्योंकि यह भली-भाँति प्रकट है कि जब वे अपने दुर्गुणों में लिप्त रहते थे, तब वे सदा परमेश्वर की अत्यधिक कठोरता की शिकायत करते थे। इसलिये ज्यों ही परमेश्वर ने उनसे उनके योग्य व्यवहार किया, त्यों ही वे उसके विरुद्ध चिढ़ गए और क्रोध से भर गए। इस कारण भविष्यद्वक्ता अब उनकी हठीली और अन्यायपूर्ण शिकायतों का सामना करता है, और पूछता है कि वे अपने घाव के कारण क्यों चिल्लाते हैं, मानो वह कहता है कि ये चिल्लाहटें बहुत देर से उठ रही थीं, जब वे पश्चाताप का समय गँवा चुके थे। क्योंकि परमेश्वर ने अपनी चरम धमकियों को तब तक रोक रखा था जब तक कि लोगों ने इतना हठ प्रकट नहीं कर दिया कि दया के लिये कोई स्थान न रहा। इसलिये जब लोगों की दुष्टता असाध्य हो गई, तब भविष्यद्वक्ता ने, जैसा हम देख चुके हैं, उनकी बँधुआई की घोषणा की।

अब वह सचमुच उनके देर से चिल्लाने का उपहास करता है, क्योंकि वे परमेश्वर का तिरस्कार करने में बहुत समय तक सुन्न पड़े रहे थे: तो फिर तू अपने घाव के कारण क्यों चिल्लाती है? तेरी पीड़ा भारी है, या, तेरी पीड़ा में भारीपन है; परन्तु तेरे अधर्म की बहुतायत के कारण, और इसलिये कि तेरे पाप प्रबल हो गए हैं, मैं ने तुझ से ये काम किए हैं यहाँ परमेश्वर अपने को लोगों के मिथ्या दोषारोपणों से मुक्त करता है, और दिखाता है कि जो कुड़कुड़ाते या कोलाहल मचाते थे, वे अन्याय करते थे, क्योंकि उन्होंने यह विचार नहीं किया था कि वे किसके योग्य थे: क्योंकि वे सबसे भारी दण्ड के योग्य थे, इसलिये कि उन्होंने न केवल एक ही रीति से अपने ऊपर विनाश बुलाया था, और परमेश्वर के प्रतिशोध को अधिकाधिक भड़काया था, वरन् बहुत वर्षों तक अपने पापों में अपने को कठोर भी कर लिया था; और इसके अतिरिक्त उन्होंने अपने को नाना प्रकार से हर प्रकार की दुष्टता के हाथ सौंप दिया था, यहाँ तक कि भविष्यद्वक्ता ने उचित ही उन्हें अधर्म की बहुतायत के लिये, और पापों के ढेर के लिये भी उलाहना दिया। अतः परमेश्वर कहता है कि लोगों पर जो दण्ड उसने डाला, उसमें उसने संयम की सीमा का उल्लंघन नहीं किया, क्योंकि उनकी निराशाजनक दुष्टता और हठ ने उसे विवश कर दिया था। परन्तु तुरन्त ही शान्ति का वचन जोड़ा गया है, —

यिर्मयाह 30:16

237 “मित्रों” के स्थान पर, जैसा Sept., Syr. और Targ. ने अनुवाद किया है, यद्यपि Vulg. ने नहीं, शाब्दिक शब्द “प्रेमियों” को बनाए रखना अधिक अच्छा है। अव्यय {{עלसाधारणतः एक सम्बन्धसूचक अव्यय होता है, परन्तु जब वह किसी क्रिया से पहले आता है, जैसा यहाँ, तब नहीं; और यह कि {}רבयहाँ एक क्रिया है, यह उसके बाद आनेवाले वाक्य से सिद्ध होता है, जो समानाधिकरण में है; और ब्लेनी ने भी इसका यही अनुवाद किया है। यह पद इस प्रकार अनूदित किया जा सकता है — 14. तेरे सब प्रेमी तुझे भूल गए हैं, वे तुझे नहीं ढूँढ़ते: निश्चय मैं ने शत्रु की सी मार से तुझे मारा है, — कठोर ताड़ना के साथ; क्योंकि तेरा अधर्म बहुत बढ़ गया था, तेरे पाप प्रबल हो गए थे, इत्यादि। “कठोर” या क्रूर के लिये आए शब्द का प्राचीन अनुवादों में यही अर्थ लिया गया है; केवल Targ. ही हमारे अनुवाद का समर्थन करता है। अन्तिम पंक्ति पिछली पंक्ति से भिन्न विचार प्रकट करती है। क्रिया का अर्थ, निःसन्देह, संख्या में प्रबल होना भी है और शक्ति में प्रबल होना भी; परन्तु क्योंकि संख्या पिछली पंक्ति में व्यक्त हो चुकी है, हम उचित ही यह मान सकते हैं कि यहाँ शक्ति अभिप्रेत है: उनके पाप न केवल बहुत थे, वरन् प्रबल और बलवन्त भी थे, इतने प्रबल कि वे सब उपदेशों और सब धमकियों का सामना करते थे। — सं.

238 अधिक उचित है “घाव,” या चोट। शब्द {{מכאבका अर्थ, निःसन्देह, कभी-कभी मन की पीड़ा या घाव, अर्थात् शोक या दुःख होता है; परन्तु यहाँ निःसन्देह वह अपना मूल अर्थ बनाए रखता है, मार, चोट और घाव के अनुरूप। Targ. यही अर्थ बनाए रखता है, जबकि अनुवाद सब के सब भटक गए हैं। तब यह इस प्रकार है, “तेरा घाव दयनीय है।” पद का शेष भाग इस प्रकार है, — क्योंकि तेरा अधर्म बहुत बढ़ गया था, तेरे पाप प्रबल हो गए थे, मैं ने तुझ से ये काम किए हैं। — सं.

16. इस कारण जितने तुझे खा जाते हैं, वे आप ही खाए जाएँगे; और तेरे सब द्रोही, उनमें से एक-एक, बँधुआई में जाएँगे; और जो तुझे लूटते हैं वे आप लूट का माल बनेंगे, और जितने तुझे अहेर बनाते हैं, उन सभों को मैं अहेर होने के लिये दे दूँगा।

16. Propterea omnes qui devorant to devorabuntur, et omnes hostes tui, omnes, inquam, in captivitatem ibunt; et erunt qui to diripiunt in direptionem, et omnes qui to praedantur erunt in praedam.

यहाँ भविष्यद्वक्ता फिर प्रतिज्ञा करता है कि परमेश्वर अपनी प्रजा पर अनुग्रह करेगा, परन्तु बहुत समय के बाद, जब वह हठ दबा दिया जाएगा जो शीघ्र चंगा नहीं हो सकता था। इसलिये हमें सदा उस अन्तर को स्मरण रखना चाहिए जो अनुग्रहों की उस प्रतिज्ञा में, जिसका यिर्मयाह साक्षी और घोषक था, और उन व्यर्थ डींगों में है जिनके द्वारा झूठे भविष्यद्वक्ताओं ने लोगों को धोखा दिया, जब उन्होंने उन्हें थोड़े ही समय में लौट आने की आशा दिलाई, और कहा कि छुटकारे का समय निकट है।

और इस अन्तर पर इसलिये ध्यान देना चाहिए कि इससे एक अत्यन्त उपयोगी शिक्षा प्राप्त की जा सकती है: वे सिद्धान्तहीन मनुष्य जो नीचता से परमेश्वर के नाम का बहाना करते हैं, उसके सच्चे और विश्वासयोग्य दासों के साथ इतनी बात में समान हैं, — कि दोनों परमेश्वर के अनुग्रह को सामने रखते हैं: परन्तु जो परमेश्वर के नाम का झूठा प्रयोग करते हैं, वे पश्चाताप की शिक्षा को गाड़ देते हैं; क्योंकि वे केवल चापलूसी से लोगों को बहलाना चाहते हैं: और क्योंकि वे लोगों की प्रसन्नता के पीछे दौड़ते हैं, इसलिये वे उस शिक्षा को पूर्णतः छोड़ देते हैं जो ठेस पहुँचा सकती है, और जो शरीर को किसी भी प्रकार मधुर और सुहावनी नहीं लगती। यिर्मयाह ने, निःसन्देह, लोगों से इतनी कठोरता से व्यवहार नहीं किया कि उन्हें क्षमा की कुछ आशा न दे, वरन् पश्चाताप की शिक्षा में जो कुछ कठोरता थी उसे वह सदा कोमल करता रहा: परन्तु साथ ही उसने लोगों के दुर्गुणों को ढील देकर पोषित नहीं किया, जैसा झूठे भविष्यद्वक्ताओं का ढंग था।

परन्तु ये क्या करते थे? वे डींग मारते थे कि परमेश्वर दयालु, कोप करने में धीमा, और पापियों से मेल करने को तत्पर है: इससे वे यह निष्कर्ष निकालते थे कि बँधुआई लम्बी नहीं होगी; और साथ ही, जैसा हम कह चुके हैं, वे विश्वासघात करके लोगों की चापलूसी करते थे। अतः यह स्मरण रखना चाहिए कि हम परमेश्वर के अनुग्रह को ग्रहण करने के योग्य नहीं हैं, और न, यों कहें, उसे धारण करने में समर्थ हैं, जब तक कि शरीर का सारा घमण्ड सचमुच दबा न दिया जाए, और सारी निश्चिन्तता भी सुधारी और दूर न कर दी जाए।

अब हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने परमेश्वर के भयानक न्याय की चर्चा करने के बाद अनुग्रह की प्रतिज्ञा क्यों जोड़ी। परन्तु निष्कर्षसूचक शब्द, {}לכןlaken, उपयुक्त नहीं जान पड़ता; क्योंकि यह पद उन धमकियों से कैसे जोड़ा जा सकता है जिन पर हमने ध्यान दिया है?

इस कारण जो तुझे खा जाते हैं वे आप ही खाए जाएँगे परन्तु इस कारण उस बात की ओर संकेत करता है जो वह पहले कह चुका था। अतः यह कोई विचित्र बात नहीं कि वह यह निष्कर्ष निकालता है, — कि परमेश्वर, लोगों की दुष्टता का प्रतिशोध लेने के बाद, उनके शत्रुओं से भी पलटा लेगा। तब निष्कर्षसूचक शब्द अनुपयुक्त नहीं है, क्योंकि दया का समय तब आ पहुँचा था जब यहूदी ऐसे दब गए कि वे परमेश्वर के सामने अपने को दीन करें और अपने पापों से पश्चाताप करें।

239 उसका अभिप्राय यह प्रतीत होता है कि जैसे परमेश्वर ने अपनी प्रजा को दण्ड दिया था, वैसे ही इस कारण वह जातियों को भी दण्ड देगा। अनुवाद और Targ. इसका अनुवाद “इस कारण” करते हैं; परन्तु लाउथ “तौभी निश्चय” देता है; और ब्लेनी, “बाद में।” परन्तु हम इसका अनुवाद “इस कारण,” या इसी कारण से, कर सकते हैं, मानो यह उस बात का पूर्व संकेत है जो अगले पद के अन्त में है, “क्योंकि उन्होंने तुझे निकाली हुई कहा है, सिय्योन, जिसे कोई नहीं ढूँढ़ता।” वेनेमा ने, इस स्थल का यही अर्थ समझकर, यह अनुमान किया कि ये दोनों पद अपने स्थान से उलट-पलट गए हैं: परन्तु इस प्रकार की वाक्य-रचना पवित्रशास्त्र में असाधारण नहीं है। — सं.

परन्तु यहाँ एक सामान्य शिक्षा है जो हमें भविष्यद्वक्ताओं में सर्वत्र मिलती है, अर्थात् यह कि परमेश्वर अपनी कलीसिया से आरम्भ करने के बाद, फिर सब जातियों का न्यायी बन जाता है; क्योंकि यदि वह अपने चुने हुओं को, अपने ही घराने को, किसी प्रकार नहीं छोड़ता, तो वह परायों को बिना दण्ड दिए कैसे छोड़ सकता है? और कलीसिया की यह निरन्तर शान्ति है कि यद्यपि परमेश्वर अपनी प्रजा की ताड़ना के लिये दुष्टों को कोड़ों के समान काम में लाता है, तौभी उनकी दशा अच्छी नहीं होती, क्योंकि जब वे क्षण भर विजय मना चुकते हैं, तब परमेश्वर शीघ्र ही उन्हें न्याय में लाएगा। इसलिये जब विश्वासी परमेश्वर के हाथ से ताड़ना पाते हैं, और उनके शत्रु अपने सुख-विलास में मगन होते हैं, तब विश्वासियों के लिये अपने शत्रुओं से डाह करने का कोई कारण नहीं है; क्योंकि उनकी समृद्धि शीघ्र ही समाप्त हो जाएगी, और जिस नाप से उन्होंने उसकी प्रजा के साथ अन्याय किया, उसी नाप से परमेश्वर उन्हें उसका बदला नापकर देगा।

अतः जो कोई तुझे खा जाता है वह आप ही खाया जाएगा, और तेरे सब शत्रु, हाँ, सब के सब, बँधुआई में जाएँगे; और अन्त में, जो तुझे लूटते हैं, इत्यादि, जिसका अनुवाद कुछ लोग यों करते हैं, “जो तुझे रौंदते हैं वे रौंदे जाने के लिये होंगे।” परन्तु क्योंकि क्रिया का अर्थ लूटना है, पुनरावृत्ति से बचने के लिये मैं पहले अर्थ को अच्छा समझता हूँ: “अतः जो तुझे लूटते हैं वे आप लूट का माल बनेंगे, और जो तुझे अहेर करते हैं वे अहेर होने के लिये होंगे।” इसका कारण आगे दिया गया है, —

यिर्मयाह 30:17

17. क्योंकि मैं तुझे फिर से स्वस्थ करूँगा, और तेरे घावों को चंगा करूँगा, यहोवा की यह वाणी है; क्योंकि उन्होंने तुझे निकाली हुई कहा है, और यह कहा है, यह तो सिय्योन है, जिसकी सुधि कोई नहीं लेता।

17. Quia adducam sanationem tibi, et a doloribus tuis sanabo to, dicit Jehova; quoniam expulsam vocarunt to Sion, quam nemo requirit.

जब परमेश्वर ने यहूदियों से अनुग्रह की प्रतिज्ञा की, तब उसने उनके शत्रुओं का उल्लेख किया; क्योंकि अपने शत्रुओं को मनचाही हर वस्तु का आनन्द लेते, और अपने हर प्रयत्न में सफल होते देखना एक भारी परीक्षा होती, जो अन्यथा न केवल उनके मनों को व्याकुल और उदास कर देती, वरन् सारे विश्वास को भी बुझा देती, यदि उन्हें यह शान्ति न दी जाती, — कि उनके शत्रुओं को अन्त में उस दुष्टता का लेखा देना पड़ेगा जिस पर वे घमण्ड करते थे। परन्तु अब मुख्य बात यहाँ व्यक्त की गई है, — कि परमेश्वर, जब अपनी प्रजा से मेल कर लेगा, तब उन घावों को चंगा करेगा जो उसने आप दिए थे; क्योंकि जो हमें घायल करता है, वही अकेला हमें चंगा कर सकता है। वह दण्ड देने में न्याय करता है, और बाद में वैद्य का पद ग्रहण करता है, कि हमें हमारी विपत्तियों से छुड़ाए। इसलिये यह ऐसा ही है मानो भविष्यद्वक्ता ने कहा हो, “जब वह नियत समय बीत जाएगा जिसे परमेश्वर ने अपनी प्रजा के विषय में ठहराया है, तब छुटकारे की आशा निश्चय के साथ रखनी चाहिए; क्योंकि प्रभु ने अपनी प्रजा को केवल कुछ समय के लिये दण्ड देने का निर्णय किया है, न कि उसे पूरी रीति से नष्ट करने का।”

वह कहता है, मैं तेरे लिये चंगाई लाऊँगा, और तेरे घावों को चंगा करूँगा और यह चेतावनी अत्यन्त आवश्यक थी, क्योंकि जब परमेश्वर ने यहूदियों को छुड़ाया, तब तक वे अपनी बँधुआई में लगभग सड़ चुके थे। वे तब सौ बार निराशा में डूब सकते थे; परन्तु परमेश्वर यहाँ उन्हें आज्ञा देता है कि वे अपने मनों को ऊपर उठाएँ, कि स्वर्ग से सहायता की आशा रखें, क्योंकि पृथ्वी पर तो कोई सहायता थी ही नहीं। और वह आगे कहता है, क्योंकि उन्होंने तुझे, सिय्योन, निकाली हुई कहा है, जिसे कोई नहीं ढूँढ़ता; अर्थात् जिसकी, या जिसके कल्याण की, किसी को चिन्ता नहीं। वह उस बात की पुष्टि करता है जो मैं पहले कह चुका हूँ, — कि जब परमेश्वर उन्हें छुड़ाने आएगा, तब लोगों की चरम विपत्तियाँ कोई बाधा न होंगी, वरन् इसके विपरीत, आगे अनुग्रह और दया का अवसर बनेंगी। इसलिये जब लोग दुःख में इतने डूब जाएँगे कि सब यही समझें कि उनका छुटकारा आशाहीन है, तब परमेश्वर प्रतिज्ञा करता है कि वह उस समय उनका छुड़ानेवाला होगा। और इस पर हमें ध्यानपूर्वक विचार करना चाहिए: क्योंकि जब कभी हम किसी सहायता की आशा करते हैं, तो हम यहाँ-वहाँ अपने चारों ओर देखते हैं; परन्तु परमेश्वर दिखाता है कि वह हम पर विशेष करके तब कृपालु होगा, जब हम मनुष्यों की सामान्य धारणा के अनुसार आशाहीन दशा में होंगे। आगे यह लिखा है, —

यिर्मयाह 30:18

18. यहोवा यों कहता है: देखो, मैं याकूब के तम्बुओं को बँधुआई से लौटा लाऊँगा, और उसके निवासस्थानों पर दया करूँगा; और नगर अपने ही टीले पर फिर बसाया जाएगा, और राजभवन अपनी पहली रीति पर बना रहेगा।

18. Sic dicit Jehova, Ecce ego reducens captivitatem tabernaculorum Jacob et habitaculorum ejus miserabor; et adificabitur urbs super excelsum suum (vel, super acervum suum; vel, culmen) et palatium in sua statione (vel, regula) sedebit.

यिर्मयाह उसी विषय को आगे बढ़ाता है, और उस पर अधिक विस्तार से ठहरता है; क्योंकि जैसे लोगों को गम्भीरता से पश्चाताप की ओर ले जाना कठिन था, वैसे ही बहुत सी विपत्तियों के अधीन किए जाने के बाद उनके निराश मनों को उठाना भी कठिन था। इसलिये परमेश्वर यहाँ फिर घोषणा करता है कि वह अपनी प्रजा को बँधुआई से लौटा लाने के लिये आएगा।

वह कहता है, देखो, मैं लौटा लाता हूँ, इत्यादि, मानो वह अपनी प्रजा को स्वतन्त्र करने के लिये बढ़ाए हुए हाथ के साथ पहले से ही तैयार था। ध्यान देना चाहिए कि भविष्यद्वक्ता ने परमेश्वर को व्यर्थ ही उपस्थित के रूप में प्रस्तुत नहीं किया; वरन् निःसन्देह उसने लोगों के अविश्वास का ध्यान रखा, और इस दोष को दूर करना चाहा। इसलिये जब कि यहूदी अपने को पूरी रीति से त्यागा हुआ समझते थे, भविष्यद्वक्ता यह गवाही देता है कि परमेश्वर उनके साथ उपस्थित होगा, और वह उसे यह कहते हुए प्रस्तुत करता है, देखो, मैं लौटा लाता हूँ, इत्यादि, मानो वह पहले से ही लोगों का छुड़ानेवाला हो। वह तम्बुओं और निवासस्थानों के लौटाए जाने का नाम लेता है, क्योंकि वे बहुत समय तक कसदियों के देश में और दूसरे देशों में, जहाँ वे तितर-बितर किए गए थे, परदेशी होकर रहे थे। अतः यद्यपि वहाँ उनके अपने घर थे, तौभी भविष्यद्वक्ता उन्हें स्मरण दिलाता है कि वे जातियों के बीच अब भी परदेशी ही थे, क्योंकि परमेश्वर उन्हें उनके अपने देश में लौटा लाएगा, जो उनका वास्तविक निवासस्थान था। यही कारण है कि वह तम्बुओं और निवासस्थानों की चर्चा करता है। साथ ही वह उनके छुटकारे का कारण भी बताता है, अर्थात् दया, ताकि यहूदी अन्त में इसी एकमात्र शरणस्थान की ओर भागना सीखें, और जानें कि उनकी विपत्तियों का इसके सिवा और कोई उपाय नहीं था, — कि परमेश्वर अपनी दया के अनुसार उन पर दृष्टि करे, क्योंकि वह उचित ही उन्हें पूरी रीति से नष्ट कर सकता था। संक्षेप में, भविष्यद्वक्ता उन्हें स्मरण दिलाता है कि यदि परमेश्वर अन्त में उन पर दया न दिखाता, तो वे सदा के लिये नष्ट हो जाते।

वह अपने अनुग्रह के और भी पूर्ण प्रकटीकरण का उल्लेख करता है, — कि वह यरूशलेम को उसके अपने टीले, या पहाड़ी पर, जैसा कुछ लोग अनुवाद करते हैं, फिर से बनाएगा; क्योंकि नगर की स्थिति ऊँची थी, और वह यहूदिया के दूसरे भागों से ऊपर उठा हुआ था। परन्तु मुझे ऐसा जान पड़ता है कि भविष्यद्वक्ता का अर्थ यह है कि नगर अपनी ही नींवों पर बनाया जाएगा, क्योंकि वह यहाँ खण्डहरों को टीले, या ढेर कहता है। क्योंकि नगर इस रीति से नष्ट किया गया था कि तौभी कुछ खण्डहर, और शहरपनाह के कुछ चिह्न बचे रह गए थे। अतः यह ऐसा ही है मानो उसने कहा हो कि नगर, चाहे पूर्वकाल में कितना ही वैभवशाली और धनी क्यों न रहा हो, तौभी इस प्रकार पुनर्स्थापित किया जाएगा कि उसकी प्रतिष्ठा पहले से कम न होगी। परन्तु जब वह कहता है कि वह अपने टीलों पर, अर्थात् अपनी प्राचीन नींवों पर बनाया जाएगा, तब वह उसके विस्तार की चर्चा करता है।

और इस बात की पुष्टि उससे होती है जो तुरन्त आगे आता है, राजभवन अपने रूप या स्थान पर स्थापित किया जाएगा, {}על{ }משפטוal meshephthu। शब्द {}שפטshepheth का ठीक अर्थ न्याय है, परन्तु इसका अर्थ रूप, नाप, रीति, प्रथा भी है। यहाँ, निःसन्देह, भविष्यद्वक्ता का अर्थ यह है कि राजा का भवन उतना ही वैभवशाली होगा जितना पहले था, और उसी स्थान पर होगा। कुछ लोग सोचते हैं कि {}ארמוןarmun का अर्थ मन्दिर है; और इस अर्थ को मैं अस्वीकार नहीं करता; परन्तु क्योंकि इब्रानी लोग अधिकतर इस शब्द से कोई वैभवशाली, बड़ा या ऊँचा भवन समझते हैं, इसलिये मैं पहले अर्थ को अच्छा समझता हूँ, अर्थात् यह कि वह राजभवन की चर्चा करता है: तब राजा का भवन अपने रूप या स्थान पर ऐसा खड़ा रहेगा मानो वह कभी नष्ट ही न हुआ हो। संक्षेप में, वह नगर और राज्य की ऐसी पुनर्स्थापना की प्रतिज्ञा करता है कि कलीसिया की दूसरी दशा में परमेश्वर से उससे कम अनुग्रह की आशा नहीं करनी थी जितना उसे पहले मिला था; क्योंकि जब कलीसिया फिर से फूले-फलेगी, और राज्य धन, आदर, सामर्थ्य और अन्य उत्तमताओं में ऐसा प्रसिद्ध हो जाएगा कि स्पष्ट प्रकट हो जाए कि परमेश्वर अपनी कलीसिया से केवल कुछ समय के लिये अप्रसन्न रहा था, तब परमेश्वर विपत्तियों की सारी स्मृति मिटा देगा।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जब कि हम तेरे न्यायों पर विचार करने में इतने धीमे हैं, और अपने पापों में निरन्तर कठोर होते जाते हैं, — हाँ, यह वरदान दे कि उन अनेक चेतावनियों से, जिनके द्वारा तू हमें पश्चाताप करने के लिये न केवल बुलाता है, वरन् उकसाता भी है, सचमुच प्रभावित होकर, हम अपने को दीन करना सीखें, और तेरी ताड़नाओं के ऐसे अधीन हो जाएँ कि हम उस दया को ग्रहण करने के योग्य बनें जो हम पर आनेवाली हर बुराई को हमारी भलाई और उद्धार में बदल देती है, जब तक कि हम अन्त में उस धन्य विश्राम में इकट्ठे न किए जाएँ जो स्वर्ग में हमारे लिये तैयार किया गया है, हमारे प्रभु मसीह के द्वारा। — आमीन।

एक सौ सोलहवाँ व्याख्यान

यिर्मयाह 30:19

19. और उनमें से धन्यवाद और आनन्द करनेवालों का शब्द निकलेगा: और मैं उन्हें बढ़ाऊँगा, और वे थोड़े न होंगे; मैं उनकी महिमा भी करूँगा, और वे छोटे न होंगे।

19. Et egredietur ab ipsis laus et vox laetitiarum; et augebo eos, et non minuentur; et decorabo eos, nec attenuabuntur.

भविष्यद्वक्ता अपनी कही हुई बात की पुष्टि करता है। हम कह चुके हैं कि जब तक यहूदियों के लिये कुछ भी आशा बची रही, तब तक वे परमेश्वर के प्रति हठीले बने रहे, परन्तु जब वे चरम दशा तक पहुँचा दिए गए, तब वे अत्यन्त हताश हो गए; क्योंकि उन्होंने अपनी दशा के विषय में सारी आशा खो दी, और ऐसे निराश हो गए कि कोई शान्ति ग्रहण न करते थे। इसलिये उनसे हल्के से, या थोड़े शब्दों में, पुनर्स्थापना की प्रतिज्ञा कर देना पर्याप्त न था; आवश्यक था कि प्रतिज्ञा बार-बार पुष्ट की जाए। अतः यही अब भविष्यद्वक्ता का विषय है; वह प्रतिज्ञा करता है कि उनमें से स्तुति और आनन्द का शब्द निकलेगा।

यहाँ हमें आहों, कराहों, शिकायतों, विलापों और धन्यवाद देने के बीच के विरोध पर ध्यान देना चाहिए; क्योंकि जब तक वे बँधुआई में रोके रहे, तब तक उनके बीच कोई स्तुति सुनाई नहीं दे सकती थी। शोक, निःसन्देह, हमें चरम दुःख में भी परमेश्वर को धन्य कहने से रोकने की बाधा नहीं है; परन्तु हम, यों कहें, भरे मुँह से परमेश्वर को धन्य नहीं कह सकते, जब तक कि हमारे सामने आनन्द का कोई कारण प्रस्तुत न हो। इसी से याकूब का यह वचन है, “यदि तुम में कोई आनन्दित हो, तो वह स्तुति के भजन गाए।” (याकूब 5:13)

240 अनुवाद और Targ. “राजभवन” के लिये आए शब्द का अनुवाद मन्दिर करते हैं; और जैसे पहले उपवाक्य में “अपने टीले पर,” या अपने खण्डहरों पर है, वैसे ही इसमें भी वही सम्बन्धसूचक अव्यय प्रयुक्त हुआ है, और वह वैसी ही वाक्य-रचना की माँग करता प्रतीत होता है, “अपने पहले स्थान पर,” या अपने अभ्यस्त स्थान पर। शब्द {{משפטजो प्रचलित या साधारण है उसका, और जो उचित और न्यायसंगत है उसका भी, बोध कराता है। तब ये दोनों पंक्तियाँ इस प्रकार पढ़ी जाएँगी, — और नगर अपने खण्डहरों पर बनाया जाएगा, और राजभवन अपने अभ्यस्त आसन पर स्थिर किया जाएगा, (या खड़ा रहेगा।) परन्तु अनुवाद और Targ. सम्बन्धसूचक अव्यय के अर्थ में भिन्नता करते हैं। Vulg., जिससे शेष सब मूलतः सहमत हैं, यह है, “और मन्दिर अपनी व्यवस्था के अनुसार नींव पर स्थापित किया जाएगा।” ब्लेनी इस पंक्ति का अनुवाद यों करता है, — और राजभवन अपनी (पहली) योजना पर स्थापित किया जाएगा। क्योंकि पिछली पंक्ति में स्थान का निर्देश किया गया है, इसलिये सम्भव है कि यहाँ भी स्थान ही अभिप्रेत हो। — सं.

जैसे कि भविष्यद्वक्ता धन्यवाद की चर्चा करता है, वह संकेत करता है कि परमेश्वर का अनुग्रह इतना बड़ा होगा कि वह यहूदियों से सारा शोक और उदासी दूर कर देगा। परन्तु वह अप्रत्यक्ष रूप से विश्वासियों को परमेश्वर की करुणा का गुणगान करने के लिये उभारता है। यदि वह केवल इतना कहता, “उनमें से आनन्द का शब्द निकलेगा,” तो निःसन्देह यह एक पूर्ण वाक्य होता; परन्तु यह भी आवश्यक था कि विश्वासियों को स्मरण दिलाया जाए कि परमेश्वर अपनी प्रजा से किस उद्देश्य से इतनी कृपा का व्यवहार करेगा, अर्थात् इसलिये कि वे उसकी भलाई का प्रचार करें; क्योंकि यही वह अभिप्राय है जिसके लिये हम परमेश्वर के हाथ से हर भली वस्तु पाते हैं। अतः जब कलीसिया की चर्चा होती है, तब धन्यवाद साधारणतः आनन्द के साथ जोड़ा जाता है।

परन्तु हम कह चुके हैं कि जब विश्वासी संकटों से दबे होते हैं, तब वे उतनी तत्परता से परमेश्वर की स्तुति नहीं कर सकते जितनी तब, जब परमेश्वर उनके हृदयों को आनन्दित करता है; क्योंकि शोक मनुष्यों की सारी भावनाओं को बाँधे रखता है; परन्तु आनन्द, जो परमेश्वर के पितृवत् अनुग्रह के अनुभव से उत्पन्न होता है, मानो उनके प्राणों को फैला देता है; और इसी से उनकी जीभें भी खुल जाती हैं। इसी कारण भजन संहिता 51:15 में कहा गया है, “हे प्रभु, मेरा मुँह खोल दे, तब मैं तेरा गुणानुवाद कर सकूँगा।”

दाऊद वहाँ संकेत करता है कि वह कुछ समय तक चुप रहा था; जब परमेश्वर ने उससे अपना मुख छिपा लिया, तब वह उसकी पितृवत् भलाई का स्वाद नहीं ले सका। उस समय दाऊद का हृदय मानो बँधा हुआ और उसका मुँह बन्द था; परन्तु वह प्रभु से प्रार्थना करता है कि उसका मुँह खोल दे, अर्थात् उसे आनन्द दे कि वह उसका धन्यवाद कर सके।

अब हम भविष्यद्वक्ता का अर्थ समझते हैं: वह संकेत करता है कि यद्यपि यहूदी कुछ समय तक शोक में रहेंगे, कराहेंगे और विलाप करेंगे, तौभी यह दशा सदा की न होगी; क्योंकि परमेश्वर अन्त में उन्हें शान्ति देगा, यहाँ तक कि वे छुटकारा पाकर न केवल आनन्द करेंगे, वरन् उसकी दया का प्रचार भी करेंगे।

वह आगे कहता है, मैं उन्हें बढ़ाऊँगा, और वे घटाए न जाएँगे; मैं उन्हें शोभायमान करूँगा, इत्यादि। कुछ लोग इसका भी अनुवाद करते हैं, “मैं उन्हें बढ़ाऊँगा:” परन्तु शब्द भिन्न हैं; और {}כבדcebed का अर्थ कभी बढ़ाना, और कभी शोभायमान करना, महिमा देना, आदर करना होता है। जो शब्द आगे आते हैं वे भी भिन्न हैं, {}מעתmoth, और {}צערtsor। और यद्यपि भविष्यद्वक्ता लगभग वही बात दोहराना चाहता था, तौभी इसमें कोई सन्देह नहीं कि उसने इस विविधता के द्वारा परमेश्वर के अनुग्रह को प्रकट करना चाहा, मानो वह कहता है कि परमेश्वर की दया ऐसी अद्भुत होगी कि यहूदी स्वीकार करेंगे कि जो प्रतिज्ञा उनके पिता अब्राहम से की गई थी वह उनमें पूरी हो गई है, “तेरा वंश समुद्र के तीर की बालू, और आकाश के तारागण के समान होगा।” (उत्पत्ति 22:17)

जब वह कहता है, वे घटाए न जाएँगे, वे छोटे न किए जाएँगे, तब उसके अनुग्रह की सदा बने रहने, या निरन्तरता का भी संकेत होता है। किसी जाति का थोड़े समय के लिये बढ़ना सम्भव है; परन्तु ऐसी बात प्रायः अधिक समय तक नहीं टिकती, क्योंकि इस संसार का रूप बीतता जाता है। अतः परमेश्वर अपनी कलीसिया से स्थिरता और सदा बने रहने की प्रतिज्ञा करता है, क्योंकि वह दिन-प्रतिदिन और वर्ष-प्रतिवर्ष उस पर अपना अनुग्रह प्रकट करता रहेगा। यही इसका अर्थ है। आगे यह लिखा है —

यिर्मयाह 30:20

241 इन उपवाक्यों में बाद की क्रियाओं का अर्थ पहले की क्रियाओं के द्वारा निश्चित किया जाना चाहिए: “मैं उन्हें बहुत करूँगा,” या बढ़ाऊँगा; तब इसका विपरीत है, “और वे घटाए न जाएँगे,” या कम न होंगे: और जब कहा जाता है, “मैं उनकी महिमा करूँगा,” या उन्हें आदर दूँगा, तो इसका अनुरूप विरोध है, “वे अपमानित न किए जाएँगे,” या अनादर न पाएँगे। पहला उपवाक्य संख्या से, और दूसरा आदर, प्रतिष्ठा या कीर्ति से सम्बन्ध रखता है। तब ठीक अनुवाद यह होगा, — और मैं उन्हें बहुत करूँगा, और वे घटाए न जाएँगे, मैं उन्हें आदर भी दूँगा, और वे अपमानित न किए जाएँगे। — सं.

20. उनके लड़केबाले भी पहले के समान होंगे, और उनकी मण्डली मेरे सामने स्थिर रहेगी, और जितने उन पर अन्धेर करते हैं उन सभों को मैं दण्ड दूँगा।

20. Et erunt filii ejus sicut ab initio, et coetus ejus coram facie mea stabilietur (vel, dirigetur, nam {}כוןutrumque significat) et visitabo super omnes oppressores ejus.

शब्दों की यह बहुतायत जिसका भविष्यद्वक्ता प्रयोग करता है, किसी प्रकार व्यर्थ नहीं है; क्योंकि हमें सदा स्मरण रखना चाहिए कि जब सत्तर वर्ष तक परमेश्वर के अनुग्रह का कोई चिह्न दिखाई न दिया, तब उनकी परीक्षाएँ कितनी कठिन थीं। इसलिये आवश्यक था कि विपत्तियों से दबे हुए मनों को बहुत से सहारों से सम्भाला जाए, ताकि वे पूरी रीति से मूर्छित न हो जाएँ; और वह प्रतिज्ञाओं पर प्रतिज्ञाएँ जोड़ता है, ताकि यहूदी मानो गहरे अथाह कुण्ड में से प्रकाश की एक चिनगारी देख सकें। और इससे हम भी एक उपयोगी चेतावनी प्राप्त कर सकते हैं: यद्यपि प्रभु आज हम पर ऐसी कृपा करे कि हम बहुत भारी परीक्षाओं में न पड़ें, तौभी हर एक अपने अनुभव से जानता है कि हम हताश होने की ओर कितने प्रवृत्त हैं; और फिर जब हम एक बार मूर्छित होने लगते हैं, तब आशा के भरोसे तक उठाया जाना कितना कठिन होता है। इसलिये आओ, हम प्रतिज्ञाओं के साथ प्रतिज्ञाएँ जोड़ना सीखें, कि यदि एक पर्याप्त न हो, तो दूसरी हो।

अब वह कहता है कि उनके लड़केबाले आरम्भ के समान होंगे कुछ लोग यह सूक्ष्म व्याख्या देते हैं कि कलीसिया के लड़केबाले आरम्भ के समान, अर्थात् व्यवस्था से पहले के समान होंगे; क्योंकि अनुग्रह की वाचा परमेश्वर ने व्यवस्था के प्रचार किए जाने से पहले अब्राहम के साथ बाँधी थी: इसलिये वे सोचते हैं कि यहाँ व्यवस्था के रद्द किए जाने का संकेत है, मानो उसने कहा हो कि जब मसीह आएगा तब कलीसिया स्वतन्त्र होगी, और तब व्यवस्था का दासत्व का जूआ उतार दिया जाएगा। परन्तु इस प्रकार की सूक्ष्मता को मैं स्वीकार नहीं कर सकता; क्योंकि मैं नहीं समझता कि ऐसा विचार कभी भविष्यद्वक्ता के मन में आया था। अतः मुझे कोई सन्देह नहीं कि यहाँ दाऊद के राज्य की ओर संकेत है, मानो भविष्यद्वक्ता ने कहा हो कि मसीह के अधीन कलीसिया की दशा उससे कम समृद्ध और सुखी न होगी जितनी पहले दाऊद के अधीन थी। यदि कोई आपत्ति करके कहे कि मसीह का राज्य दाऊद के राज्य से कहीं अधिक सुखी है: तो यह मैं मानता हूँ; परन्तु भविष्यद्वक्ता सदा मसीह के राज्य की तुलना दाऊद के राज्य से करते हैं, और वे शिक्षा की इसी रीति से सन्तुष्ट थे, क्योंकि यह लोगों की आशा से भी बढ़कर थी; क्योंकि यहूदी इस बात को विश्वास के योग्य नहीं समझते थे कि वे कभी अपनी प्राचीन कीर्ति को फिर प्राप्त कर सकेंगे। इसलिये जब वह यहाँ कहता है कि यहूदा के लड़केबाले आरम्भ के समान होंगे, तो मुझे कोई सन्देह नहीं कि उसने उस प्रतिज्ञा का ध्यान रखा, जो यह घोषणा करती है कि जब तक आकाश में सूर्य और चन्द्रमा चमकते रहेंगे, तब तक दाऊद का वंश सदा उसके सिंहासन पर रहेगा। (भजन संहिता 89:37)

अर्थ यह है कि यद्यपि राज्य एक भयानक विनाश के द्वारा अपनी सारी प्रतिष्ठा समेत लुप्त हो जाएगा, तौभी यहूदी मसीह के द्वारा वह फिर प्राप्त कर लेंगे जो उन्होंने अपने पापों, कृतघ्नता और हठ के कारण खो दिया था।

इसके बाद वह आगे कहता है, उसका वंश मेरे सम्मुख स्थिर किया जाएगा, और मैं उसके सब अन्धेर करनेवालों को दण्ड दूँगा यहाँ फिर परमेश्वर अपनी कलीसिया के सदा बने रहने के विषय में प्रतिज्ञा की पुष्टि करता है। इसलिये वह कहता है कि लोगों की मण्डली उसके सम्मुख स्थिर की जाएगी, जिन शब्दों के द्वारा वह यहूदियों को ऊपर की ओर देखने की आज्ञा देता है, क्योंकि संसार में निराशा के सिवा और कुछ न मिलता था। अतः जब परमेश्वर कहता है कि कलीसिया उसके मुख के सामने स्थिर की जाएगी, तब वह यहूदियों का ध्यान अपनी ओर खींचता है। और क्योंकि शत्रुओं की शक्ति इतनी बड़ी थी कि विश्वासी उचित ही आपत्ति करके कह सकते थे कि परमेश्वर के अनुग्रह के लिये हर मार्ग बन्द हो गया है, इसलिये वह जोड़ता है कि दूसरी ओर परमेश्वर में उनके सब शत्रुओं को नष्ट करने और उन्हें शून्य कर देने की पर्याप्त सामर्थ्य है; और वह सब का उल्लेख करता है, क्योंकि कसदी साम्राज्य दूर-दूर तक फैला हुआ था और बहुत सी जातियों से मिलकर बना था; और उसका कोई भी भाग ऐसा न था जो यहूदियों का घोर शत्रु न हो। अतः जब उन दुखी निर्वासितों ने देखा कि न केवल कसदी उनके बैरी हैं, वरन् दूसरी जातियाँ भी, यहाँ तक कि लगभग सारा संसार उनसे बैर रखता है, तब परमेश्वर यहाँ उनकी सहायता को आता है, और घोषणा करता है कि उसमें उनके सब शत्रुओं को नष्ट करने की पर्याप्त सामर्थ्य है।

242 मूल के क्रम का पालन करना अधिक अच्छा होगा, “और मेरे सामने उसका इकट्ठा होना पुष्ट किया जाएगा,” या Vulg. और Syr. के अनुसार, “बना रहेगा।” संकेत नियत पर्वों पर इकट्ठे होने की ओर है। क्रिया का अर्थ है पुष्ट किया जाना, स्थिर किया जाना, निश्चित किया जाना; इसलिये “बना रहेगा” ठीक विचार प्रकट करता है: इकट्ठा होना स्थिर किया जाना था, ताकि

इससे एक उपयोगी शिक्षा निकाली जा सकती है: कलीसिया इस रीति से सदा बनी रहनेवाली थी कि तौभी उसकी दशा परिवर्तनशील थी; क्योंकि मसीह के आने से पहले परमेश्वर को प्रायः यह अच्छा लगा कि वह अपने अनुग्रह के प्रवाह को बीच में रोक दे। अतः जो कुछ तब हुआ, उसे हम अपने समय पर लागू कर सकते हैं। इसलिये जब भविष्यद्वक्ता यहाँ कहता है कि कलीसिया के लड़केबाले आरम्भ के समान होंगे, तो हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए जब कभी कलीसिया तितर-बितर हो जाए, जैसा कि सचमुच पोप-तन्त्र के अधीन हुआ। क्योंकि कलीसिया न केवल मर गई थी, वरन् गाड़ी भी गई थी, और न केवल एक सड़ी हुई लोथ के समान थी, वरन् धूल के समान पूरी रीति से लोप हो गई थी; क्योंकि पचास वर्ष पहले उसके कौन से अवशेष पाए जा सकते थे? इससे हम देखते हैं कि जो व्यवस्था के अधीन हुआ, वही मसीह के राज्य के अधीन भी हुआ है; क्योंकि कलीसिया कभी-कभी संकटों से दब गई है, और बिना किसी महिमा या शोभा के छिपी रही है। परन्तु इस बीच हम इस प्रतिज्ञा को थामे रहते हैं कि भक्तों के लड़केबाले पहले के समान होंगे; क्योंकि जैसे पूर्वकाल में मसीह का राज्य फूला-फला, वैसे ही हमें निश्चित रहना चाहिए कि परमेश्वर में कलीसिया को उसकी महिमा लौटा देने की पर्याप्त सामर्थ्य है, जिससे मसीह का राज्य फिर उठ खड़ा हो, और परमेश्वर की सारी आशीषें उसमें चमक उठें।

परन्तु क्योंकि बहुत से शत्रु कलीसिया को चारों ओर से घेरे रहते हैं, और शैतान सदा हर कहीं उपद्रव और अशान्ति भड़काता रहता है, इसलिए हमें जानना चाहिए कि एक और वाक्यांश जोड़ा गया है, अर्थात् यह कि परमेश्वर अपनी प्रजा का रक्षक होगा; ताकि सारा संसार उसके अनुग्रह को पाँवों तले रौंदने का चाहे जितना भी प्रयत्न करे, तौभी वह उन्हें अपना क्रोध पूरा करने न देगा; क्योंकि उसमें यह सामर्थ्य है कि वह न केवल उनके आक्रमणों को रोके, वरन् उन्हें पूरी रीति से नष्ट कर दे और उनका स्मरण तक मिटा डाले; क्योंकि "दण्ड देने" (visiting) शब्द में यही अभिप्राय निहित है। इसके बाद यह आता है —

यिर्मयाह 30:21

21. और उनका प्रधान उन्हीं में से होगा, और उन पर प्रभुता करनेवाला उन्हीं के बीच में से निकलेगा; और मैं उसे अपने निकट बुलाऊँगा, और वह मेरे समीप आएगा: क्योंकि यह कौन है जिसने मेरे समीप आने के लिए अपना मन लगाया है? यहोवा की यही वाणी है।

21. Et erit fortis ejus (vel, magnificus) ab ipso, et dominator ejus e medio ejus exibit, et appropinquare eum faciam, et aceedet ad me; nam (vel, certe) quisnam hic qui applicet, (vel, qui adaptet) cor suum ut accedat ad me? (alii vertunt, qui alliciat cor suum; dicemus postea de sensu) dicit Jehova.

…स्थायी हो जाए; और यह कहा गया है कि वह परमेश्वर के सम्मुख है, ताकि उसे किसी भी अन्य प्रकार के एकत्र होने से अलग पहचाना जाए। — सं.

नबी निःसन्देह यहाँ उस बात को अधिक विस्तार से समझाता है जो उसने कलीसिया की पुनःस्थापना के विषय में कही थी; क्योंकि हम जानते हैं कि यहूदियों को इस प्रकार सिखाया गया था कि वे अपने उद्धार के विषय में अपना सारा भरोसा दाऊद पर, अर्थात् उस राजा पर रखें जिसे परमेश्वर ने उन पर ठहराया था। इसलिए कलीसिया का सुख और कुशल सदा राजा पर आधारित था; उसके उठा लिए जाने पर कलीसिया का अन्त हो जाता था, जैसा कि अभिषिक्त को वह प्रभु कहा गया है जिसके आत्मा में हमारा आत्मा है। (विलापगीत 4:20)

इसलिए परमेश्वर ने आरम्भ ही से अपनी प्रजा का ध्यान उनके राजा की ओर लगाया, कि वे उस पर निर्भर रहें; इसलिए नहीं कि दाऊद अपनी निज सामर्थ्य से प्रजा का उद्धार कर सकता था, परन्तु इसलिए कि वह प्रतिरूप के रूप में मसीह का प्रतिनिधित्व करता था। अब हमारे पास कोई पार्थिव राजा नहीं जो मसीह का प्रतिरूप हो; परन्तु केवल मसीह ही है जो कलीसिया को जीवन देता है। परन्तु उस समय यह बात प्रतीक के रूप में दिखाई गई थी कि राजा मानो समाज का प्राण था; और हम पहले देख चुके हैं कि जब नबी ने यहूदियों को आशा से उत्साहित किया, तब उसने उनके सामने दाऊद को, और उसके बाद दाऊद के पुत्र को रखा।

इसी कारण वह यहाँ कहता है, उसका वीर, अथवा उसका प्रतापी, उसी में से होगा। क्योंकि हमें उस अभागे और विपत्तिपूर्ण समय की दशा स्मरण रखनी चाहिए, जब परमेश्वर ने प्रजा से वह सारा गौरव छीनकर जिससे वह सम्मानित की गई थी, आनन्द का हर स्रोत उठा लिया था। अतः यह ऐसा ही था मानो यिर्मयाह ने यहूदियों से पुनरुत्थान की प्रतिज्ञा की हो, क्योंकि वे अपनी बँधुआई में मरे हुओं के समान थे, इसलिए कि उनके राजा के नष्ट हो जाने पर सार्वजनिक कुशल की उनकी आशा मिट गई थी। अतः यहाँ वह उन्हें अच्छी आशा रखने को कहता है, क्योंकि प्रभु उन्हें मृत्यु से जीवन में उठाने में समर्थ था। और निःसन्देह जब यहूदी, उनके लिए मार्ग खुल जाने पर, अपने देश को लौटे, तो वह एक अद्भुत पुनरुत्थान था; क्योंकि वे मानो किसी दूसरे संसार में खदेड़ दिए गए थे। और जब कसदियों ने अपना राज्य यहूदिया तक फैला लिया था, तब कौन कभी सोच सकता था कि इतनी सारी बाधाएँ दूर की जा सकती हैं? उन अभागे निर्वासितों के लिए निश्चय कोई शरण न थी। अतः यिर्मयाह का यहाँ यह साक्षी देना व्यर्थ नहीं था कि बलवन्त अथवा वीर, अर्थात् राजा, प्रजा में से होगा, और उनके बीच में से एक प्रभुता करनेवाला निकलेगा। यहाँ "आना" या "निकलना" का अर्थ चले जाना नहीं है, मानो राजा कहीं और चला जाएगा; परन्तु यहाँ "निकलना" का अर्थ उत्पन्न होना है: अतः प्रजा के बीच में से एक प्रभुता करनेवाला निकलेगा, अथवा उत्पन्न होगा: यह किस प्रकार हुआ, यह भली-भाँति विदित है।

परन्तु यशायाह ने वह बात पहले ही कह दी थी जिसकी पुष्टि उसका उत्तराधिकारी यहाँ करता है, जब उसने कहा, "यिशै की जड़ (अथवा ठूँठ) में से एक डाली फूट निकलेगी, और उसके वृक्ष की जड़ में से एक शाखा उगेगी।" (यशायाह 11:1)

वहाँ वह इसे यिशै का घराना कहता है, जो एक साधारण घराना था: यदि वह दाऊद का उल्लेख करता, तो इस अनुग्रह को अधिक महिमामय नाम से विभूषित करता; परन्तु क्योंकि उस समय कोई राज्य न था, इसलिए वह यिशै का उल्लेख करता है; क्योंकि जैसे दाऊद भेड़शालाओं में से एक अनजाने देहाती के रूप में निकला था, वैसे ही प्रभु एक कटे हुए वृक्ष के ठूँठ में से एक डाली उगाएगा। इससे हम देखते हैं कि यिर्मयाह "निकलेगा" शब्द को किस अर्थ में प्रयोग करता है; क्योंकि मसीह मनुष्यों की आशा के विपरीत उठ खड़ा हुआ, और ऐसे उगा जैसे वृक्ष के काट डाले जाने पर डाली उगती है, अर्थात् उस समय जब प्रजा के बीच राजसी प्रताप का कोई चिह्न तक न था।

इसके बाद वह कहता है, मैं उसे निकट बुलाऊँगा, और वह मेरे समीप आएगा। यह बात या तो सिर तक सीमित की जा सकती है या सारी देह तक फैलाई जा सकती है; और दूसरा विचार वह है जिसे मैं अधिक स्वीकार करता हूँ; क्योंकि प्रजा बहुत समय तक परमेश्वर की उपस्थिति से दूर रही थी, अर्थात् उतने समय तक जितने समय तक वे अपने देश से निर्वासित रहे। इसलिए परमेश्वर कहता है, "मैं उन्हें फिर से निकट बुलाऊँगा, और वे मेरे समीप आएँगे।" तौभी यदि कोई इसे सिर के, अर्थात् स्वयं राजा के विषय में समझाना अधिक पसन्द करे, तो मुझे कोई आपत्ति नहीं।

अब इस खण्ड से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जब कभी परमेश्वर कलीसिया की पुनःस्थापना के विषय में बोलता है, तब वह सदा यह घोषित करता है कि वह हमारी विनती सुनेगा; संक्षेप में, जब कभी वह हमें अनुग्रह और उद्धार की आशा की ओर बुलाता है, तब हमें सदा मसीह की ओर दृष्टि करनी चाहिए; क्योंकि जब तक हम अपने सारे विचार उसकी ओर न लगाएँ, सारी प्रतिज्ञाएँ लुप्त हो जाएँगी, क्योंकि वे उसके बिना प्रभावी नहीं हो सकतीं; क्योंकि, जैसा पौलुस कहता है, केवल मसीह में ही वे "हाँ" और "आमीन" हैं। (2 कुरिन्थियों 1:19, 20) परन्तु क्योंकि यह सत्य नबियों में बार-बार आता है, इसलिए यहाँ इसे प्रसंगवश छू देना ही पर्याप्त है, क्योंकि मैंने इसका विवेचन अन्यत्र अधिक विस्तार से किया है।

पद के पिछले भाग के विषय में कुछ अस्पष्टता है — क्योंकि यह कौन है, इत्यादि।

यहाँ दो संकेतवाचक सर्वनाम हैं, {}הוא{ }זהhua, ze। इसके बाद {}ערב oreb आता है, अर्थात् अपने मन को उपयुक्त बनाना। क्रिया {}ערבoreb का अर्थ है ज़मानतदार होना, और साथ ही उपयुक्त बनाना, अनुकूल करना, ढालना या रचना, और कभी-कभी मधुर या सुखद बनाना; और इसी कारण कुछ लोगों ने इसका अनुवाद इस प्रकार किया है, "कौन अपने मन को लुभाएगा?" फिर वह कहता है, कि वह मेरे समीप आए, यहोवा की यही वाणी है? मैंने कहा है कि यह खण्ड अस्पष्ट है, और इसी कारण व्याख्याकारों ने इसे भिन्न-भिन्न अर्थों में मोड़ा है। कुछ लोग इन शब्दों को मसीह पर लागू करते हैं, कि केवल वही अपनी इच्छा से पिता के पास आया है।

दूसरे लोग समझते हैं कि यहाँ एक निषेध छिपा हुआ है, मानो यह कहा गया हो कि कोई भी परमेश्वर के पास आने के लिए अपना मन तैयार नहीं करता। परन्तु कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इस खण्ड को एक उपदेश मानते हैं, "वह कौन है जो मेरे समीप आने के लिए अपना मन लगाएगा?" अब यदि हम इसे विस्मय या आश्चर्य के भाव में पढ़ें, तो मेरे विचार में यही इसका वास्तविक अर्थ होगा। मुझे ज्ञात नहीं कि किसी ने इसका उल्लेख किया है; परन्तु मुझे कोई सन्देह नहीं कि नबी का अभिप्राय यही था कि उसके शब्द इसी प्रकार समझे जाएँ।

उसने पहले कहा था, "मैं उसे निकट बुलाऊँगा, कि वह मेरे समीप आए।" मैं इसे पहले ही प्रजा के विषय में समझा चुका हूँ, जो बहुत समय से त्यागी हुई थी। अतः परमेश्वर यहाँ एकत्र करने की प्रतिज्ञा करता है, मानो वह कहता, "कुछ समय तक मैंने प्रजा को भूसी के समान इधर-उधर तितर-बितर किया; अब मैं उन्हें फिर से इकट्ठा करूँगा, और वे पहले के समान मेरी देखरेख और रक्षा में रहेंगे।" यह कहकर अब वह इस प्रश्न के द्वारा प्रजा की कृतघ्नता पर चोट करता है, "कौन है जो मेरे पास आता है? कौन अपना मन ढालेगा कि मुझ से उसका मेल हो जाए?" अतः यह विस्मय की अभिव्यक्ति है, जिसका उद्देश्य यहूदियों को यह जताना है कि उनकी कठोरता और जड़ता दोषी ठहराई गई है; क्योंकि जब परमेश्वर ने उन्हें कृपापूर्वक बुलाया, तब उन्होंने उसके अनुग्रह को ठुकरा दिया, और जब उसने उन्हें गले लगाना चाहा, तब वे उससे दूर भाग गए।

परन्तु यहाँ यह आपत्ति उठाई जा सकती है, "तो फिर परमेश्वर ने यह प्रतिज्ञा क्यों की कि वह यहूदियों को अपने पास ले आएगा?" इसका मैं यह उत्तर देता हूँ कि परमेश्वर इस प्रतिज्ञा को भिन्न-भिन्न रीतियों से पूरा करता है: उसने यहूदियों को एक बाहरी निमन्त्रण के द्वारा अपने पास बुलाया होगा, जैसा उसने तब किया जब उन्हें लौटने की स्वतन्त्रता दी गई: और तब सचमुच थोड़े से यहूदियों ने उसके अनुग्रह को ग्रहण किया; परन्तु सब इस्राएलियों ने, जो उन देशों के सुख-विलास के पहले ही अभ्यस्त हो चुके थे, परमेश्वर की प्रतिज्ञा को कुछ न समझा। इस प्रकार बहुत ही थोड़े लोग अपने देश को लौटे, और उन्होंने पुनःस्थापना को तुच्छ जाना, यद्यपि एक समय वे उसके लिए बहुत उत्सुक रहे थे। तौभी परमेश्वर ने उस समय भी प्रजा को निकट बुलाया; क्योंकि उसने अपना हाथ ऐसे बढ़ाया मानो वह उन्हें इकट्ठा करके अपने पंखों तले पालेगा। परन्तु क्योंकि अधिकांश लोगों ने उसके अनमोल अनुग्रह को तुच्छ जाना, इसलिए परमेश्वर यहाँ उचित ही इतनी बड़ी अधर्मता की शिकायत करता है, और मानो विस्मय या आश्चर्य से पुकार उठता है, वह कौन है जो अपना मन ढालेगा, कि वह मेरे समीप आए?

यदि केवल इतना ही कहा गया होता, "वह कौन है जो मेरे पास आता है?" तो संक्षिप्तता के कारण अर्थ अस्पष्ट रह जाता। परन्तु परमेश्वर यहाँ दो प्रकार के प्रवेश में स्पष्ट भेद करता है: पहला तब था, जब कुस्रू की आज्ञा के द्वारा प्रजा को स्वतन्त्रता दी गई, और नगर तथा मन्दिर बनाने की अनुमति दी गई। अतः परमेश्वर ने तब उन्हें निकट बुलाया कि वे उसके पास आएँ; यह पहला प्रवेश था। परन्तु अब वह यह भी कहता है कि यहूदियों ने अपना मन न ढाला और न तैयार किया।

वह भविष्यकाल की बात तो करता है, तौभी वह उन पर कृतघ्नता का दोष लगाता है, जो बाद में पूरी रीति से प्रकट हुई। इसलिए वह कहता है, "यह कौन है, कि वह मेरे समीप आए?" अर्थात्, "मैं ऐसे उपाय करूँगा कि वे फिर एक देह में मिल जाएँ, मुझे पुकारें और अपने निज भाग का आनन्द लें: यह मैं इसलिए करूँगा कि वे मेरे पास आएँ; परन्तु बहुत से लोग फिर भी अपनी तलछट में पड़े रहेंगे, और मन्दिर तथा धर्म की अपेक्षा कसदियों के देश और अन्य देशों को अधिक पसन्द करेंगे। अतः बहुत से ऐसे होंगे जो मेरे पास आने के लिए अपना मन न ढालेंगे।"

अब हम नबी का अर्थ समझते हैं। परन्तु साथ ही हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि ऊपर यह कहकर, "मैं उसे निकट बुलाऊँगा कि वह मेरे समीप आए," परमेश्वर अपने आत्मा के गुप्त कार्य की बात नहीं करता; क्योंकि, जैसा हम अभी आगे कहेंगे, यह उसके अधिकार में है कि जब चाहे मनुष्यों के मनों को अपनी ओर खींच ले। परन्तु जब उसने कहा, मैं उसे निकट बुलाऊँगा, इत्यादि, तब उसने केवल एक बाहरी पुनःस्थापना की बात की; और अब वह यह शिकायत जोड़ता है कि यहूदी इस अनुग्रह को दुष्टता से ठुकरा देंगे, क्योंकि कोई भी अपना मन तैयार न करेगा। तौभी हम देखते हैं कि उनके अपने देश से वंचित किए जाने का सारा दोष यहूदियों पर डाला गया है: क्योंकि उनका पुनःस्थापित न होना परमेश्वर की ओर की किसी बात के कारण नहीं, वरन् स्वयं उन्हीं के कारण था, क्योंकि वे अपने सुख में लिप्त थे, और अपने लौटने को तथा परमेश्वर की प्रजा गिने जाने को कुछ भी न समझते थे। अतः नबी का उद्देश्य यह था कि सारा दोष यहूदियों पर डाले कि परमेश्वर का अनुग्रह उन तक न पहुँचेगा, अथवा उनके अधिकांश भाग के लिए प्रभावी न होगा, इसी कारण कि वे परमेश्वर के पास आने के लिए अपना मन तैयार न करेंगे और न ढालेंगे, जिससे वे उस अनमोल विशेषाधिकार के भागी हो सकें जो उन्हें दिया गया था।

अब पोप के अनुयायी इस खण्ड को यह सिद्ध करने के लिए पकड़ते हैं कि मनुष्य में परमेश्वर के पास आने की स्वतंत्र इच्छा है; परन्तु ऐसा करना सचमुच अत्यन्त बेतुका है। क्योंकि जब कभी परमेश्वर प्रजा की कठोरता को दोषी ठहराता है, तब वह निःसन्देह इस प्रश्न पर तर्क नहीं करता कि मनुष्यों में कितनी सामर्थ्य है, कि क्या वे भलाई करने की ओर फिर सकते हैं, कि क्या वे अपने मनों को स्वयं चला सकते हैं। ऐसा मानना अत्यन्त मूर्खता होगी। जब भजन संहिता 45:8 में कहा गया है, "यदि तुम उसका शब्द सुनो, तो अपने मन को कठोर न करो, जैसे तुम्हारे पुरखाओं ने जंगल में किया था," तो क्या हम कहेंगे कि जिस प्रकार उन्होंने अपने मन कठोर किए, उसी प्रकार वे फिरने में भी समर्थ थे, जिससे वे स्वतंत्र इच्छा की सामर्थ्य से भलाई या बुराई में से किसी को भी चुन सकते थे? ऐसा कहना बचकाना और अत्यन्त मूढ़ता होगी। इससे हम देखते हैं कि पोप के अनुयायी, जब ऐसे तर्कों से स्वतंत्र इच्छा को सिद्ध करना चाहते हैं, तब वे इस योग्य भी नहीं कि उनसे वाद-विवाद किया जाए। यदि उनकी व्याख्या मान ली जाती, तो वे सचमुच कुछ विश्वसनीय-सी बात प्रस्तुत करते; क्योंकि वे इन शब्दों का अनुवाद इस प्रकार करते हैं, "यह कौन है," इत्यादि, मानो परमेश्वर उन विश्वासियों की तत्परता की प्रशंसा करता हो, जो स्वेच्छा से अपने आप को अर्पित करते और अपने मन तैयार करते हैं। परन्तु इस विचार के विरुद्ध सारा प्रसंग है। इससे प्रकट होता है कि नबी का यह अभिप्राय बिलकुल न था कि परमेश्वर को भक्तों की आज्ञाकारिता की सराहना करते हुए दिखाए; वरन् इसके विपरीत, वह विस्मय से पुकार उठता है, जैसा यशायाह करता है जब वह कहता है, "जो समाचार हमें दिया गया, उसका किस ने विश्वास किया? और यहोवा का भुजबल किस पर प्रगट हुआ?" (यशायाह 53:1)

वह निश्चय ही सुसमाचार को तत्परता और आनन्द से ग्रहण करने में विश्वासियों की आज्ञाकारिता का वर्णन नहीं करता; परन्तु इसके विपरीत (मानो कोई भयानक बात उसे आतंकित कर रही हो) यह कहता है कि संसार सुसमाचार पर विश्वास न करेगा, जबकि वह उन्हें उद्धार और अनन्त जीवन प्रदान करता था। इसी प्रकार इस स्थान में भी, वह कौन है? इत्यादि। क्योंकि इससे बढ़कर और क्या वांछनीय हो सकता था कि परमेश्वर अन्त में फैली हुई भुजाओं से यहूदियों को अपने पास इकट्ठा करे? "मैं चाहता हूँ कि तुम निकट आओ; तुम कुछ समय तक मानो मुझ से निर्वासित रहे, मैंने तुम्हें दूर-दूर के देशों में खदेड़ दिया था; परन्तु अब मैं तुम्हें इकट्ठा करने को तैयार हूँ।" अतः जब परमेश्वर ने इतनी मधुरता और कृपा से उन्हें अपनी ओर लुभाया, तब उनका इस प्रस्ताव को ठुकराना और मानो परमेश्वर की ओर, जिसने उन्हें इतनी कृपा से बुलाया, पीठ फेर लेना निःसन्देह अत्यन्त घृणित और भयानक कृतघ्नता थी। अतः जब नबी यहाँ केवल यहूदियों की ऐसी जड़ता और हठीली दुष्टता को दोषी ठहरा रहा है, तब कोई कारण नहीं कि हम यहाँ स्वतंत्र इच्छा के पक्ष में प्रमाण खोजें।

हम यह भी जोड़ सकते हैं कि दाऊद भजन संहिता 119:73, 125 में यही क्रिया प्रयोग करता है, जब वह कहता है, "अपने दास को अपने निकट आने दे, कि वह तेरी आज्ञाओं को सीखे।"

कुछ लोग इन शब्दों का अनुवाद इस प्रकार करते हैं, "अपने दास का ज़मानतदार हो," इत्यादि; क्योंकि क्रिया {,}ערב जो यहाँ है, वहाँ भी पाई जाती है। अतः यह खण्ड पोप के अनुयायियों के विरुद्ध उपयुक्त रीति से मोड़ा जा सकता है, जो यह मानते हैं कि अपने मन को ढालना मनुष्य के अधिकार में है।

परन्तु दाऊद साक्षी देता है कि यह विशेष रूप से परमेश्वर ही का पद और कार्य है; क्योंकि उससे यह माँगकर वह निःसन्देह स्वीकार करता है कि यह उसके अपने अधिकार में न था। इसके बाद यह आता है —

यिर्मयाह 30:22

22. और तुम मेरी प्रजा ठहरोगे, और मैं तुम्हारा परमेश्वर ठहरूँगा।

22. Et eritis mihi in populum, et ego ero vobis in Deum (Quod postea confirmat primo versu capitis, 31, cum dicit, In tempore illo, dicit Jehova, Ero in Deum cunctis cognationibus Israel, et ipsi erunt mihi in populum)

243 वुलगाता उस अर्थ का समर्थन करता है जिसकी वकालत कैल्विन करता है, "क्योंकि यह (iste) कौन है जो मेरे निकट आने के लिए अपना मन लगाएगा, प्रभु की यही वाणी है?" सेप्टुआजिंट भी लगभग वैसा ही है, "क्योंकि यह ({οὕτος}) कौन है जिसने मेरे पास लौटने के लिए अपना मन दिया है, प्रभु की यही वाणी है?" सुरियानी अनुवाद यह है, "क्योंकि मैं उसके मन को अपनी ओर फेरूँगा, प्रभु की यही वाणी है।" तारगुम इस प्रकार है, "क्योंकि यह कौन है जो अपने मन में मेरी आराधना के लिए आएगा, प्रभु की यही वाणी है?" बहुत सी ऐसी व्याख्याएँ दी गई हैं जो सर्वथा अस्वीकार्य हैं, क्योंकि प्रसंग में उनका समर्थन करनेवाली कोई बात नहीं, जैसे इन शब्दों को हमारे उद्धारकर्ता पर लागू करना। ये स्पष्ट रूप से पिछले वाक्यांश से जुड़े हैं, क्योंकि वे "क्योंकि" के द्वारा उससे जोड़े गए हैं: वे एक प्रकार से उस वाक्यांश की व्याख्या करते और उसे सीमित करते हैं, और उन्हें कोष्ठक-वाक्य माना जा सकता है, क्योंकि पहला वाक्यांश और इन शब्दों के बाद आनेवाला वाक्यांश परस्पर जुड़े हुए हैं, — और मैं उसे निकट लाऊँगा कि वह मेरे समीप आए, (क्योंकि वह कौन है जो अपने मन को गिरवी रखता है कि मेरे समीप आए, यहोवा की यही वाणी है!) 22. और तुम मेरे लिए एक प्रजा होगे, और मैं तुम्हारे लिए एक परमेश्वर होऊँगा। "उसे" से हमें "याकूब" समझना है, जो पूरे खण्ड का विषय है, न कि वह "प्रभुता करनेवाला" जो "उसके बीच में से", अर्थात् याकूब में से, आनेवाला था — वह नाम जिससे यहाँ सारी जाति पुकारी गई है। प्रतिज्ञा यह है कि याकूब को, अर्थात् प्रजा को, निकट लाया जाएगा; और फिर यह दिखाने के लिए कि यह केवल परमेश्वर ही का कार्य है, कोष्ठक के भीतर के शब्द रखे गए हैं, और वह भी एक प्रश्न के रूप में, जो सबसे प्रबल रीति से निषेध का भाव देता है, मानो उसने कहा हो, "यह कार्य, अर्थात् तुम्हें निकट लाना, केवल मेरा है, क्योंकि तुम में से कोई भी मेरे समीप आने के लिए अपने मन को गिरवी नहीं रखता या वचनबद्ध नहीं करता।" सेप्टुआजिंट और तारगुम दोनों पहली पंक्ति के "उसे" का अनुवाद बहुवचन में "उन्हें", अर्थात् प्रजा को, करते हैं। और सुरियानी अनुवाद, यद्यपि अभिव्यक्ति का रूप बदला हुआ है, तौभी कोष्ठक के भीतर के शब्दों का अर्थ देता है, क्योंकि मन को फेरने का कार्य प्रभु को सौंपा गया है। — सं.

244 इस सन्दर्भ के विषय में भूल हुई है, क्योंकि यह शब्द केवल भजन संहिता 119:122 में पाया जाता है। — सं.

क्योंकि यह पद और अगले अध्याय के पहले पद में जो आता है, वे सारतः एक ही हैं, इसलिए दोनों की व्याख्या यहीं की जाएगी। तब परमेश्वर कहता है कि यहूदी उसकी प्रजा होंगे, और वह उनका परमेश्वर होगा। बोलने का यह ढंग हमें नबियों में सर्वत्र मिलता है; और यह अत्यन्त अर्थपूर्ण है, और इसमें सच्चे सुख की सम्पूर्णता समाई हुई है। क्योंकि हमें जीवन कब मिलता है, सिवाय तब के जब हम परमेश्वर की प्रजा बन जाते हैं? हमें भजनकार का यह वचन भी स्मरण रखना चाहिए, "क्या ही धन्य है वह प्रजा जिसका परमेश्वर यहोवा है!"

(भजन संहिता 144:15)

यह उस बात की पुष्टि करता है जो मैंने अभी कही, कि सुखी जीवन अपने सब अंगों में तब पूर्ण होता है, जब परमेश्वर हमारा परमेश्वर होने की प्रतिज्ञा करता है और हमें अपनी प्रजा के रूप में ग्रहण करता है। इसलिए नबी अकारण ही इस सत्य पर इतनी बार बल नहीं देते; क्योंकि चाहे हमें किसी ऐसी वस्तु की घटी न हो जिसकी आशा की जा सकती है, तौभी जब तक हमें यह निश्चय न हो जाए कि परमेश्वर हमारा पिता है और हम उसकी प्रजा हैं, तब तक हमें चाहे जो भी सुख प्राप्त हो, उसका अन्त केवल दुर्दशा में होगा।

परन्तु नबी अपनी बात और अधिक पूर्णता से कहता है, जब वह कहता है, उस समय, अर्थात् जब परमेश्वर अपनी कलीसिया को पुनःस्थापित करेगा, मैं इस्राएल के सारे कुलों का परमेश्वर ठहरूँगा। वे इतने तितर-बितर हो गए थे कि वे एक देह न रहे थे; परन्तु परमेश्वर उस कलीसिया को इकट्ठा करने की प्रतिज्ञा करता है, जिससे दस गोत्र उस समय अलग हो गए थे, जब उन्होंने दाऊद के घराने से बलवा किया था। अभी मैं इससे आगे नहीं बढ़ सकता।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जिस प्रकार तू ने अपने एकलौते पुत्र में वह सारी पितृतुल्य भलाई हम पर प्रगट की है जिसका स्वाद प्राचीन काल में पूर्वजों ने चखा था, और उसे ऐसी सच्चाई और पूर्णता से दिखाया है कि हमें और कुछ चाहने को शेष नहीं रहता, — हाँ, यह वरदान दे कि हम तुझ पर अपने भरोसे में दृढ़ बने रहें, और सच्चे विश्वास और मन की सच्चाई से अपने छुड़ानेवाले से ऐसे लिपटे रहें कि अपने उद्धार के लिए आवश्यक सब कुछ उसी से आशा करें: और हम यह जानें कि हम पर चाहे जो भी बीते, तौभी हम धन्य हैं, यदि हम इस अनुपम विशेषाधिकार का आनन्द लेते हैं कि उसी तेरे पुत्र के नाम के द्वारा तुझे अपना पिता कहकर पुकारें। — आमीन।

एक सौ सत्रहवाँ व्याख्यान

कल हमने उन दो पदों की तुलना की थी जिनमें परमेश्वर प्रतिज्ञा करता है कि वह फिर भी अपनी प्रजा का परमेश्वर होगा। हमने बताया था कि इस प्रतिज्ञा का क्या अर्थ है। परन्तु पिछला पद समय निर्दिष्ट करता है, ताकि इस्राएली इस अनुग्रह की बाट जोहें और आशा रखें, यद्यपि वह अभी प्रगट न था: इसलिए कहा गया है, उस समय। इसके बाद वह कहता है, मैं इस्राएल के सारे कुलों का परमेश्वर ठहरूँगा, और इस कारण से, क्योंकि वे इतने बिखर गए थे कि वे एक प्रजा के रूप में दिखाई न देते थे, और भिन्न-भिन्न जातियों के समान थे।

अतः यहाँ यह प्रतिज्ञा की गई है कि प्रजा फिर इकट्ठी की जाएगी, जिससे वे एक हो जाएँ, और एक देह बन जाएँ, जैसे वे अपने तितर-बितर होने से पहले थे।

इसके बाद यह आता है —

यिर्मयाह 30:23

23. देखो, यहोवा की आँधी जलजलाहट के साथ निकलती है, एक लगातार चलनेवाली आँधी: वह पीड़ा के साथ दुष्टों के सिर पर आ पड़ेगी।

23. Ecce tempestas (sed subaudienda est nota similitudinis {,}כsicut tempestas)

Jehovae furor (vel, iracundia) egredietur, tempestas sese involvens, super caput impiorum residebit.

ऐसा प्रतीत होता है कि नबी अचानक बात बदल देता है; क्योंकि उस प्रतिज्ञा से बढ़कर आनन्ददायक और कुछ नहीं हो सकता था जो परमेश्वर देता है, कि वह प्रजा का पिता होगा; परन्तु वह तुरन्त जोड़ता है कि एक लपेटनेवाला बवंडर उठेगा, जो दुष्टों के सिर पर ठहरा रहेगा। ये बातें पहली दृष्टि में मेल खाती नहीं जान पड़तीं। परन्तु यह पिछला वाक्य अन्यजातियों पर, अथवा कलीसिया के किसी भी शत्रु पर लागू किया जा सकता है; क्योंकि जब कभी परमेश्वर अपनी प्रजा के उद्धारकर्ता के रूप में प्रगट होता है, तब उसका पलटा निकल पड़ता है, और दुष्टों पर उण्डेला जाता है। इसलिए इस प्रकार की घोषणाएँ बार-बार आती हैं, "मेरे पलटा लेने का दिन निकट है, और मेरे दण्ड देने का वर्ष।" (यशायाह 63:4)

यशायाह दोनों को, परमेश्वर के अनुग्रह और उसके पलटे को, साथ जोड़ता है: और अन्य नबी भी प्रायः ऐसा ही करते हैं, ताकि हम देखें कि विश्वासियों के प्रति परमेश्वर की दया स्पष्ट और भिन्न रूप से तब तक नहीं पहचानी जा सकती, जब तक दूसरी ओर दुष्टों पर उसका न्याय प्रत्यक्ष न किया जाए। अतः इस खण्ड की व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है। परन्तु हम नबी के शब्दों को भली-भाँति इस प्रकार भी जोड़ सकते हैं, — कि उसने प्रजा को परमेश्वर का अनुग्रह प्रदान करके कृपापूर्वक उन्हें लुभाने का प्रयत्न किया; परन्तु यह देखकर कि, जैसा हमने कल कहा, उनमें से अधिकांश उसे तुच्छ जानेंगे, अब वह उचित समय पर उन्हें धमकी देता है कि यदि वे दिए गए अनुग्रह को ठुकराएँगे, तो ऐसी कृतघ्नता परमेश्वर से सही नहीं जा सकती। और पवित्रशास्त्र में शिक्षा देने का यह ढंग सामान्य है। क्योंकि परमेश्वर अपनी ओर से अपनी कृपा इस प्रकार प्रगट करता है कि मनुष्यों को उत्तेजित करे; परन्तु जब वह उन्हें न केवल आलसी और सुस्त, वरन् दुष्ट और कृतघ्न भी देखता है, तब वह घोषित करता है कि यदि वे उसके अनुग्रह को तुच्छ जानेंगे, तो वे दण्ड से न बचेंगे। अतः पहला सत्य उस बात से भली-भाँति मेल खाता है जो नबी अब कहता है, — कि परमेश्वर का क्रोध एक प्रचण्ड आँधी के समान उठेगा।

इसके बाद वह कहता है, एक घूमती हुई या लपेटनेवाली आँधी, ठीक-ठीक कहें तो, अपने आप को समेटती हुई आँधी। क्रिया {}גורgur है, द्विरुक्त रूप में और हित्पाएल में। ऐसा ही एक वाक्य यिर्मयाह 23:19 में पाया जाता है; परन्तु वहाँ नबी ने विषय की माँग के अनुसार एक दूसरा शब्द प्रयोग किया। कुछ लोग इसका अनुवाद "गिरती हुई" करते हैं, क्योंकि {,}גורgur का अर्थ गिरना है; और यह अर्थ उपयुक्त है, "एक गिरती हुई आँधी", अर्थात् प्रचण्ड वेग से उतरती हुई, जिससे वह दुष्टों के सिर पर ठहरी रहे। परन्तु पहला अर्थ अधिक सामान्य रूप से अपनाया गया है, और मैं उसे स्वीकार करने को प्रवृत्त हूँ; क्योंकि जब आँधी को बवंडर के समान कहा जाता है, तब इससे मनुष्य भय से काँप उठते हैं, क्योंकि वह चारों ओर घूमती और मरोड़ खाती है, जिससे उससे बचा नहीं जा सकता। अतः अर्थ यह है कि परमेश्वर का पलटा सब दुष्टों के लिए घातक होगा। परन्तु हम दुष्टों को, {}רשעיםreshoim, परमेश्वर का तिरस्कार करनेवालों के अर्थ में ले सकते हैं, चाहे वे उसके नाम पर घमण्ड करते हों, और परदेशियों के अर्थ में भी: परन्तु मैं दोनों को सम्मिलित करने को प्रवृत्त हूँ, अर्थात् परमेश्वर के घरेलू और विदेशी दोनों शत्रुओं को; मानो नबी ने कहा हो कि कोई उपाय शेष नहीं, सिवाय इसके कि वे परमेश्वर की दया की शरण में भागें। इसके बाद यह आता है —

यिर्मयाह 30:24

24. यहोवा का भड़का हुआ कोप, जब तक वह अपना काम न कर चुके, और अपने मन की युक्तियों को पूरी न कर चुके, तब तक न लौटेगा: अन्त के दिनों में तुम इस बात को समझोगे।

245 यह पद, जिस शब्द की ओर ध्यान दिलाया गया है उसको छोड़कर, उस खण्ड से जिसका यहाँ उल्लेख है, शब्दशः ज्यों का त्यों है; और तौभी न तो प्राचीन अनुवाद और न तारगुम एक-से हैं: यह विचित्र है कि वे स्वयं अपने से कैसे भिन्न हैं, जिससे हम उनकी शाब्दिक यथार्थता पर कोई भरोसा नहीं रख सकते। यिर्मयाह 23:19 की "गर्भवती आँधी" के स्थान पर यहाँ हमें "प्रचण्ड आँधी" मिलती है; यह एक ऐसी क्रिया का कृदन्त है जिसका अर्थ है झकझोरना, भड़काना, उभारना; और कर्मवाच्य होने के कारण इसका अर्थ है वह जो झकझोरा गया हो या बड़ी उथल-पुथल में हो, और इसलिए प्रचण्ड या उपद्रवी। बहुत सी प्रतियों में यहाँ ,{}סער से पहले {{ו है, जैसा पिछले खण्ड में है, जहाँ यह केवल एक प्रति में छूटा है। — सं.

24. Non revertetur (vertunt) furor irae Jehovae, donec exequatur ipsum, et donec surgere faciat (attollat, vel, stabiliat) cogitationes cordis sui: in extremo dierum intelligatis in hac re.

वह पिछले वाक्य की पुष्टि करता है, और परमेश्वर के क्रोध या पलटे की तुलना एक दूत या सेवक से करता है, जो कोई सन्देश ले जाने के लिए, या जो कुछ उसे आज्ञा दी गई है उसे पूरा करने के लिए भेजा जाता है। परमेश्वर के वचन के विषय में, अर्थात् उसकी धमकियों के साथ-साथ उसकी प्रतिज्ञाओं के विषय में, यशायाह इस प्रकार कहता है, "मेरा वचन व्यर्थ ठहरकर मेरे पास न लौटेगा।" (यशायाह 55:11)

अर्थ यह है कि परमेश्वर जो कुछ प्रतिज्ञा करता या धमकी देता है, वह कभी निष्फल नहीं होता। परन्तु वे इस खण्ड को गलत समझते हैं जो कहते हैं कि परमेश्वर का वचन व्यर्थ नहीं लौटता क्योंकि वह फल लाता है; क्योंकि वह वचन के प्रभाव की बात करता है, चाहे वह उद्धार के लिए हो या विनाश के लिए। इसी प्रकार अब भी परमेश्वर घोषित करता है कि उसका पलटा, जब निकल चुका, तब तक न लौटेगा जब तक वह आज्ञा दी हुई बात को पूरा न कर ले।

फिर वह कहता है, और जब तक वह स्थिर न कर ले, इत्यादि; क्योंकि क्रिया {}הקימו ekimu का ठीक यही अर्थ है: अतः जब तक परमेश्वर अपने मन की युक्तियों को स्थिर या दृढ़ न कर ले। अपने मन की युक्तियाँ वह परमेश्वर की आज्ञाओं या उद्देश्यों को कहता है; परन्तु यह मनुष्यों से लिया गया बोलने का ढंग है, और इसलिए आलंकारिक है; क्योंकि सोचना या विचार-विमर्श करना परमेश्वर के स्वरूप से मेल नहीं खाता। परन्तु जहाँ तक स्वयं विषय का सम्बन्ध है, उसमें कुछ भी अस्पष्ट नहीं; क्योंकि नबी का अर्थ यह है कि जब परमेश्वर अपना पलटा भेजता है, तब सब दुष्टों का नाश होना अवश्य है, क्योंकि परमेश्वर ने ऐसा ही ठहराया है, और उसके उद्देश्य कभी विफल नहीं किए जा सकते। फिर वह दिखाता है कि परमेश्वर का पलटा पूरा होगा, क्योंकि परमेश्वर ने ऐसा ही निश्चय किया है। क्योंकि जब परमेश्वर मनुष्यों से उद्धार की प्रतिज्ञा करता है, या उन पर उस दण्ड की घोषणा करता है जिसके वे योग्य हैं, तब वह कपट नहीं करता; परन्तु वह अपने मन की आज्ञाओं या उद्देश्यों को पूरा करता है।

फिर नबी यहाँ उन सब की मूढ़ता को दोषी ठहराता है जो सोचते थे कि वे बच निकलेंगे, यद्यपि उन्होंने बार-बार सुना था कि उनका दोष इतना बड़ा है कि अन्त में उन पर न्याय अवश्य आएगा। यद्यपि उन्होंने यह बार-बार सुना था, तौभी वे सब चेतावनियों के प्रति बहरे थे; और इसी कारण नबी ने परमेश्वर के मन की युक्तियों की बात की।

अन्त में वह कहता है, दिनों के अन्त में तुम इसे समझोगे। यह बात विश्वासियों पर भी उतनी ही लागू की जा सकती है जितनी दुष्टों पर। क्योंकि यद्यपि विश्वासियों ने परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को अपनाया, और उन पर भरोसा किया, तौभी क्योंकि उन्हें निरन्तर सबसे भारी परीक्षाओं से संघर्ष करना पड़ता था, इसलिए यह आवश्यक था कि उन्हें धीरज के लिए उत्तेजित और उत्साहित किया जाए। अतः उनसे उचित रूप से यह कहा जा सकता था, "अन्त के दिनों में तुम इसे समझोगे;" यह एक प्रकार का उपदेश है, मानो उसने कहा हो, "तुम तो दुष्टों को सुखी समझते हो, क्योंकि परमेश्वर उन्हें तुरन्त दण्ड नहीं देता, क्योंकि उसका पलटा उन पर तत्काल गर्जनों के साथ नहीं टूट पड़ता; परन्तु अपनी विपत्तियों को धीरज से सहो, और अन्त में तुम पाओगे कि उनके विनाश की भविष्यद्वाणी व्यर्थ नहीं की गई थी; और यदि तुम अन्त तक समर्पित बने रहोगे, तो तुम्हें भी अपने विश्वास और धीरज का प्रतिफल मिलेगा।" परन्तु यह वाक्य दुष्टों पर भी उचित रूप से लागू किया जा सकता है, क्योंकि वे वस्तुओं के वर्तमान रूप के अनुसार ही अपना निर्णय बनाने के अभ्यस्त थे। इसलिए नबी उस झूठी धारणा को उघाड़ता है जिससे वे अपने आप को धोखा देते थे, और कहता है कि जो बात वे उस समय समझना नहीं चाहते थे, उसे वे बहुत देर से समझेंगे।

246 यह पद शब्दशः इस प्रकार है, — यहोवा के क्रोध की जलन न लौटेगी, जब तक उसका कार्यान्वयन और जब तक उसकी पूर्ति न हो अपने मन की युक्तियों की: अन्त के दिनों में तुम इसे समझोगे। इब्रानी में सामान्य क्रियार्थक रूप की क्रिया प्रायः संज्ञा के रूप में प्रयोग की जाती है, "उसका कार्यान्वयन।" ऐसा ही एक रूप वेल्श भाषा में भी है, nes gwneuthur ohono। हमारे अनुवाद के अनुसार "जब तक उसने स्थिर न किया हो," या "पूरा न किया हो," का अनुवाद वुलगाता में अधिक अच्छा है, "जब तक उसने पूर्ण न किया हो।" यहाँ कार्यान्वयन और पूर्ति दोनों हैं। — सं.

अतः यदि हम इस वाक्य की व्याख्या परमेश्वर की सन्तानों के विषय में करें, तो यह एक उपदेश है कि जब तक परमेश्वर उनके रक्षक के रूप में प्रगट न हो, तब तक वे अपनी विपत्तियों को धीरज से सहें: परन्तु यदि हम इसे अविश्वासियों पर लागू करें, तो यह उनकी जड़ता का उपहास है, क्योंकि वे सब धमकियों को कहानियाँ समझते थे; परन्तु नबी पुकार उठता है, "अन्त में तुम बुद्धिमान तो हो जाओगे, परन्तु तब बहुत देर हो चुकी होगी।" जब मन फिराने का कोई अवसर शेष नहीं रहता, तब अनुभव भी शिक्षक बन जाता है।

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