यिर्मयाह और विलापगीत पर टीका · खण्ड 2 · यिर्मयाह 46

यिर्मयाह 46

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यिर्मयाह 46

यिर्मयाह 46:1-2

1. जाति जाति के विषय यहोवा का जो वचन यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता के पास पहुँचा, वह यह है;

1. Qui fuit sermo Jehovae (ita ad verbum) ad Jeremiam Prophetam super cunctas Gentes:

2. मिस्र के विषय। मिस्र के राजा फ़िरौन नको की सेना के विषय, जो फरात महानद के तट पर कर्कमीश में थी, और जिसे बाबुल के राजा नबूकदनेस्सर ने योशिय्याह के पुत्र यहूदा के राजा यहोयाकीम के राज्य के चौथे वर्ष में मार लिया।

2. Quantum ad Aegyptum, contra exercitum Pharaonis Necho, regis Aegypti qui erat super flumen Euphratem in Charchamis, quem percussit Nabuchadnezer, rex Babylonis, anno quarto Jehoiakim, filii Josiae, regis Jehudah.

यिर्मयाह यहाँ से अन्य जातियों के विरुद्ध भविष्यद्वाणी करना आरम्भ करता है, और अन्तिम से पहले वाले अध्याय तक ऐसा ही करता रहता है; यह नहीं कि उसने तभी पहली बार इन वचनों की घोषणा करनी आरम्भ की, परन्तु, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, अन्त में एक ग्रन्थ तैयार किया गया जिसमें उसकी भविष्यद्वाणियाँ सम्मिलित की गईं, और उसमें हर स्थान पर समय का क्रम नहीं रखा गया; क्योंकि हम 25वें अध्याय में देखते हैं कि यहोयाकीम के राजा बनाए जाने से पहले ही उसने अन्यजाति राष्ट्रों को उन दण्डों की धमकी दी थी जिनके वे योग्य थे। परन्तु जैसा मैंने कहा है, अन्यजाति राष्ट्रों से सम्बन्धित भविष्यद्वाणियाँ अलग कर दी गई हैं, यद्यपि समय की दृष्टि से यिर्मयाह ने वह पहले ही बता दिया था जो बाद में घटित हुआ।

फिर वह कहता है कि उसने मिस्री सेना के विनाश के विषय भविष्यद्वाणी की थी, जिसे राजा नबूकदनेस्सर ने यहोयाकीम के चौथे वर्ष में पराजित किया। इस प्रकार यिर्मयाह ने इस समय से पहले ही बता दिया था कि क्या होनेवाला है। ऐसा हो सकता है कि फ़िरौन नको के अपनी सेना तैयार करने से पहले ही यिर्मयाह ने बता दिया हो कि क्या होगा; परन्तु सम्भव यह है कि यह भविष्यद्वाणी उस समय सुनाई गई जब फ़िरौन नको कसदियों के विरुद्ध निकला, क्योंकि उस समय वह अश्शूरियों की ओर से लड़ रहा था। चूँकि वे कसदियों के बराबर नहीं थे, इसलिए उन्होंने मिस्रियों से सन्धि कर ली। तब वे सहायता के लिए आए थे, कि बाबुलियों को खदेड़ दें और इस प्रकार अश्शूरियों की उनकी सेनाओं से रक्षा करें। आरम्भ में तो इस चढ़ाई को सफलता मिली; तौभी अन्त में वही पूरा हुआ जो भविष्यद्वक्ता ने पहले से कहा था।

यह ज्ञात नहीं कि इस भविष्यद्वाणी के द्वारा लोगों के शोक को हलका करने का उद्देश्य था या नहीं; तौभी मैं उस बात को स्वीकार करने की ओर झुकता हूँ जिसे अधिकांश व्याख्याकारों ने माना है, कि उस समय लोग अत्यन्त संकट में थे, इसलिए यह भविष्यद्वाणी इस हेतु दी गई कि विश्वासी जान लें कि परमेश्वर ने अपनी प्रजा की सुधि लेना नहीं छोड़ा है। परन्तु हमें विशेष रूप से इतिहास की सच्चाई पर ध्यान देना चाहिए; क्योंकि जब, जैसा कहा गया है, अश्शूरियों के उकसाने पर फ़िरौन नको अपनी सेना को फरात तक ले जाने के लिए प्रेरित हुआ, तब भक्त राजा योशिय्याह उससे भिड़ने गया; और वह उस समय बाबुलियों का मित्र-सहयोगी था, क्योंकि हिजकिय्याह के राज्यकाल से कसदियों और यहूदियों के बीच मित्रता का व्यवहार चला आ रहा था। सो जब योशिय्याह अपने मित्र राजा की सेवा करना चाहता था, उसने फ़िरौन की सेना का विरोध किया; परन्तु वह पराजित हुआ और मारा गया। अब फ़िरौन की वह चढ़ाई कुछ समय तक भाग्यशाली और सफल रही, परन्तु जब वह विजय पर घमण्ड करने लगा तो अचानक नीचे गिरा दिया गया; क्योंकि राजा नबूकदनेस्सर ने न केवल उसके दुस्साहस को रोका, वरन् उसकी सेना को तितर-बितर करके उसे मिस्र लौट जाने पर विवश किया, और फरात से लेकर पेलूसियम तक सारे देश पर अधिकार कर लिया। वह देश तब तक उन निरन्तर उलट-फेरों के अधीन नहीं हुआ था जो बाद में हुए, अर्थात् जब वे लुटेरे, जो सिकन्दर महान के उत्तराधिकारी हुए, घमण्ड से अपने आप को राजाओं के राजा कहने लगे, और हर एक सब कुछ अपनी ओर खींचने का यत्न करने लगा। क्योंकि इसी से ऐसा हुआ कि कभी मिस्री राजा, तो कभी एशियाई राजा, जहाँ तक उनसे हो सका उस देश को बार-बार झकझोरते रहे। जब यिर्मयाह ने भविष्यद्वाणी की, तब तक यह नहीं हुआ था, और न सिकन्दर तब तक जन्मा था; तौभी यह प्रकट होता है कि ये प्रदेश उस समय भी परिवर्तनों के अधीन थे, यहाँ तक कि उनसे जुड़ी कोई बात स्थिर या स्थायी न थी। सो हमें स्मरण रखना चाहिए कि युद्धों के परिणाम अनिश्चित थे, यहाँ तक कि कभी मिस्रियों ने बलपूर्वक एशिया का एक भाग छीन लिया, और दूसरे समय अश्शूरियों ने, और फिर कसदियों ने, उनकी शक्ति घटा दी।

सो फ़िरौन नको इस प्रकार पीछे खदेड़ दिया गया कि फिर उसने कभी बाहर निकलने का साहस न किया, जैसा कि पवित्र इतिहास 2 राजा 24:7 में साक्षी देता है।

अब हम यिर्मयाह की भविष्यद्वाणी पर आएँ। वह कहता है कि उसने फ़िरौन नको की सेना के विरुद्ध भविष्यद्वाणी की, जब वह फरात पर थी, अर्थात् जब वह वहाँ लड़ रहा था और सोचता था कि वह विजयी होगा, क्योंकि उसने शत्रु के देश को दूर-दूर तक उजाड़ दिया था और बहुत से नगरों को अपने अधिकार में कर लिया था। सो जब उसे बड़ी सफलताएँ मिल चुकी थीं, तब यिर्मयाह को उसकी सेना के विरुद्ध भविष्यद्वाणी करने की आज्ञा दी गई, जिससे यहूदी जान लें कि भक्त योशिय्याह की मृत्यु बिना दण्ड के न रहेगी, क्योंकि परमेश्वर ने ठान लिया था कि उस बड़ी सेना को, जिसके द्वारा योशिय्याह मारा गया था, नाश करे, और मिस्र की शक्ति को ऐसा तोड़कर धूल में मिला दे कि राजा फ़िरौन आगे से मानो बन्दीगृह में बन्द रहे, जैसा कि बाद में हुआ भी। शेष कल।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, ऐसा अनुग्रह कर कि जब तुझे यह भाया है कि हमें आत्मिक युद्ध के लिए बुलाए, तो हम कभी थक न जाएँ; और चूँकि हमारी दुर्बलता इतनी बड़ी है कि हम अपने संघर्षों के योग्य नहीं हैं, तो ऐसा अनुग्रह कर कि तेरे आत्मा की सामर्थ्य से सम्भाले जाकर हम तेरी पवित्र बुलाहट के मार्ग में स्थिर बने रहें, और जो कुछ भी हम पर आ पड़े उससे कभी टूट न जाएँ, वरन् सब संकटों को ऐसे पार करना सीखें कि अपना प्राण तेरे हाथों में सौंप दें, और इस बीच जीने या मरने के लिए तैयार रहें, जब तक कि तू हमें उस धन्य विश्राम में एकत्र न कर ले जो स्वर्ग में हमारे लिए रखा गया है, हमारे प्रभु मसीह के द्वारा। — आमीन।

एक सौ पैंसठवाँ व्याख्यान

यिर्मयाह 46:3-5

3. ढालें और फरियाँ तैयार करो, और लड़ने को निकट चले आओ।

3. Preparate scutum et clypeum et accedite ad praelium.

4. घोड़ों को जुतवाओ; और हे सवारो, चढ़कर टोप पहिने हुए खड़े हो जाओ; भालों को पैना करो, झिलमों को पहिन लो।

4. Ligate equos et ascendite equi-tes, et state (statute vos) in galeis vestris, abstergite lanceas, induite loricas.

5. मैं क्यों उनको व्याकुल और पीछे हटे हुए देखता हूँ? उनके शूरवीर गिराए गए और उतावली करके भाग गए, वे पीछे देखते भी नहीं; क्योंकि चारों ओर भय ही भय है, यहोवा की यही वाणी है।

5. Quare vidi ipsos fractos, aver-sos retrorsum? et fortes eorum per-cutientur (percussi sunt) et fuga fugerunt, et non respexerunt; terror undique, dicit Jehova.

यिर्मयाह अब बोलने की एक ऐसी शैली का प्रयोग करता है जो भविष्यद्वक्ताओं में बहुत प्रचलित है, यद्यपि साधारण बोलचाल से दूर है। क्योंकि भविष्यद्वक्ता जब दुष्टों पर परमेश्वर के न्याय और दण्डों की घोषणा करते हैं, तब वे सीधी-सादी भाषा में नहीं बोलते, मानो कोई वृत्तान्त सुना रहे हों, वरन् वे आलंकारिक अभिव्यक्तियों का प्रयोग करते थे, मानो वे मनुष्यों को उसी दृश्य के भीतर ले जाना चाहते हों। और इसलिए कि उनकी शिक्षा मनुष्यों के हृदयों में और भी प्रभावशाली रीति से उतर जाए, वे भिन्न-भिन्न पात्रों को सामने लाते हैं; कभी वे परमेश्वर को बोलते हुए प्रस्तुत करते हैं, और कभी दूसरों की भावनाओं के अनुसार यह या वह कहते हैं; और फिर वे परमेश्वर की आज्ञाओं की घोषणा करते हैं।

यिर्मयाह यहाँ मिस्रियों को ऐसे बुलाकर आरम्भ करता है मानो वह फ़िरौन का घोषक हो, और इस प्रकार वह दूसरे व्यक्ति का नाम उधार लेता है। वह कहता है, तैयार करो। क्रिया {,}ערךorec का मूल अर्थ है क्रम में सजाना, परन्तु यहाँ उसका अर्थ है तैयार करना; सो ढाल और फरी तैयार करो। शब्द {,}צנהtsane एक बड़े आकार की ढाल थी, और {,}מגןmegen हलके शस्त्रोंवाले घुड़सवारों द्वारा ली जानेवाली फरी जान पड़ती है। और युद्ध के लिए निकट आओ। फिर वह आगे कहता है, घोड़ों को बाँधो या जोतो। लड़ने की रीति अब वैसी नहीं है जैसी पहले थी; वे रथों पर चढ़कर लड़ते थे, जैसा अन्यजाति लेखक भरपूर दिखाते हैं। इसलिए वह कहता है, घोड़ों को जोतो, अर्थात् उन्हें एक साथ जोड़ो कि वे रथों को खींचें। हे सवारो, चढ़ो, अपने टोप पहिने खड़े हो, अपने भालों को चमकाओ, और अपने झिलम पहिन लो। अर्थ यह है कि मिस्री सब प्रकार के शस्त्रों से भली-भाँति सुसज्जित होकर आएँगे, जिससे वे अपने शत्रुओं के लिए भयानक हों। और इसी से पलटा और भी स्पष्ट रूप से प्रकट हुआ, क्योंकि वे भली-भाँति सुसज्जित थे, यहाँ तक कि अपने शत्रुओं से भिड़ने से पहले ही मानो विजय पा चुके प्रतीत होते थे। यही कारण है कि भविष्यद्वक्ता उनके सम्पूर्ण हथियारों की गिनती करता है, और कोई महत्त्वपूर्ण भाग नहीं छोड़ता; वह भालों, टोपों, झिलमों, रथों, घोड़ों और ढाल का उल्लेख करता है, कि मनुष्यों के विचार के अनुसार विजय पहले से ही उनकी थी। यह पहली बात है।

परन्तु हमें पवित्र आत्मा के उद्देश्य पर ध्यान देना चाहिए; उसका अभिप्राय यह था कि विश्वासियों की आँखों पर से वह परदा हटा दे जो प्रायः हमें परमेश्वर की सामर्थ्य को उतनी स्पष्टता से देखने से रोकता है जितना हमें देखना चाहिए; क्योंकि जब हम युद्ध की तैयारियों पर ध्यान लगाते हैं, तब हम यह नहीं सोचते कि परमेश्वर के करने के लिए कुछ बचा है; क्योंकि जो भली-भाँति तैयार हैं वे हार के जोखिम से परे प्रतीत होते हैं। सो इसलिए कि यहूदी जान लें कि परमेश्वर के लिए मिस्रियों को दण्ड देना कुछ भी कठिन न होगा, वह इस तैयारी का वर्णन करता है। और जब वह कहता है, इसमें एक प्रकार की स्वीकृति है: वे टोप, झिलम, ढाल, तलवार और भाले से सुसज्जित तो अवश्य होंगे; परन्तु परिणाम के विषय में यह सब कुछ काम न आएगा। सो इस भविष्यद्वाणी के वचन से हम यह सीखें कि जब मनुष्य कुछ कर दिखाना चाहते हैं, तब जो कुछ वे तैयार करते हैं उस सब को परमेश्वर कुछ नहीं गिनता। क्योंकि जो कुछ हमारी आँखों को चौंधियाता है वह सब धुआँ है; इसी प्रकार सेनाओं और शस्त्रों का परमेश्वर के सामने कोई महत्त्व नहीं; क्योंकि वह एक ही फूँक से ऐसे सब बादलों को उड़ा सकता है।

और यह सत्य बहुत उपयोगी है; क्योंकि हम बाहरी वस्तुओं पर दृष्टि करते हैं, और जब कोई दिखावटी वस्तु हमारे सामने आती है, तो हम तुरन्त उसमें खो जाते हैं और परमेश्वर से सारी सामर्थ्य छीन लेते हैं; क्योंकि हम उसकी महिमा इन मुखौटों को दे देते हैं जो हमारे सामने प्रकट होते हैं। सो अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता यहाँ ढालों, फरियों, भालों, रथों, टोपों और झिलमों की चर्चा क्यों करता है।

क्योंकि तुरन्त इसके बाद आता है, मैंने उन्हें टूटे हुए क्यों, या कैसे, देखा? यहाँ भविष्यद्वक्ता, इसके विपरीत, उन सब बातों को तुच्छ जानता है जिनकी गिनती उसने पहले इतने ऊँचे शब्दों में की थी, क्योंकि वह मानो मनुष्यों के साधारण विचार के अनुसार बोला था। और, जैसा मैंने कहा है, उसने घोषक का रूप धारण किया, मानो फ़िरौन ने स्वयं मिस्रियों को तुरन्त हथियार उठाने की आज्ञा दी हो। सो यह देखने में बहुत भयानक था। परन्तु अब भविष्यद्वक्ता मानो किसी ऊँचे स्थान पर खड़ा होकर बोलता है और कहता है, यह कैसे, या क्या है? क्योंकि {,}מדועmeduo आश्चर्य का सूचक अव्यय है, कैसे! तब वह शरीर की साधारण धारणा से भविष्यद्वाणी के आत्मा की ओर बढ़ता है, मानो उसने कहा हो, “यदि कोई मिस्रियों को उनके बाहरी वैभव से परखे, तो वह कहेगा कि वे अपने शत्रुओं पर विजयी होंगे; परन्तु यदि कोई और ऊपर चढ़कर शरीर के अनुसार नहीं, वरन् आत्मा के अनुसार विचार करे, तो वह देखेगा कि यह सब नाशमान और क्षणभंगुर है।”

परन्तु प्रश्न, कैसे? को बल देनेवाला समझना चाहिए; क्योंकि इस पर विश्वास करना कठिन था कि इतनी भली-भाँति सुसज्जित सेना बाबुलियों का शिकार बन जाएगी, और वह अपने ही विनाश की ओर दौड़ रही है। सो जब विषय पर ध्यान देनेवाले किसी भी व्यक्ति को यह अविश्वसनीय लगता था, तब भविष्यद्वक्ता पूछता है, मैंने उन्हें कैसे देखा? तौभी वह कहता है कि उसने उन्हें देखा, क्योंकि परमेश्वर ने, जैसा हम कह चुके हैं, उसे मानो एक पहरे की मीनार पर रखा था। तौभी यह बात शरीर पर भी उतनी ही लागू हो सकती है जितनी मन पर। मैंने उन्हें पीछे हटते देखा, जबकि वे आगे की ओर दौड़ रहे थे, जैसा वह बाद में कहता है, बाढ़ के समान। वह कहता है, उनके शूरवीर मारे गए, और वे भागकर भाग गए। संक्षेप में उसका अर्थ यह है कि मिस्रियों में इतना साहस न होगा कि वे अपने शत्रुओं के आक्रमण का सामना कर सकें, क्योंकि वे परमेश्वर की गुप्त सामर्थ्य से तोड़ दिए जाएँगे। वह यह भी जोड़ता है कि उनका भागना इतने भय के साथ होगा कि वे पीछे मुड़कर देखने का साहस न करेंगे, यहाँ तक कि उनका संकट उनकी उतावली को और बढ़ा देगा।

अन्त में वह परमेश्वर के नाम से जोड़ता है, चारों ओर भय है, यहोवा कहता है। यहाँ वह तीसरी बार पात्र बदलता है, क्योंकि वह मानो परमेश्वर के मुख से घोषणा करता है कि चारों ओर भय होगा; और इस प्रकार यह उस प्रश्न का उत्तर है, कैसे, या क्यों? अर्थात्, वह कहता है, इसलिए कि परमेश्वर उन पर अपना न्याय पूरा करता है। सो जब कभी हम देखें कि हमारे शत्रुओं को, परमेश्वर की कलीसिया पर भी, विजय पाने के लिए किसी बात की घटी नहीं है, तो जो भविष्यद्वक्ता यहाँ कहता है उसे हम स्मरण रखें, कि हमारे निराश होने का कोई कारण नहीं, चाहे हम आश्चर्य और विस्मय से भर जाएँ; क्योंकि परमेश्वर ऐसा कार्य करेगा कि जो सारे संसार को भय से कँपा देते हैं, उन्हें वह मनुष्य के हाथ के बिना तोड़ डालेगा। इसके बाद आता है,—

यिर्मयाह 46:6

6. न वेग से चलनेवाला भागने पाए और न वीर बचने पाए; उत्तर दिशा में फरात महानद के तट पर वे ठोकर खाकर गिर पड़ेंगे।

6. Ne effugiat volex, et ne servetur fortis; in Aquilone (in Septentrione) super ripam fluvii Euphratis impingent (vel, impegerunt, est proeteriti temporis,) et ceciderunt ({}כשלsignificat etiam corruere, ideo vertunt alii, corruerunt, sed videtur esse species gradationis.)

तब वह पहले कहता है कि वे बल प्राप्त करेंगे, परन्तु तुरन्त उनके पतन की बात करता है, जब तक कि यह न समझा जाए कि एक ही बात दोहराई गई है; और पद का आरम्भ निश्चयात्मक रूप में भी पढ़ा जा सकता है, “वेग से चलनेवाला न भागेगा,” इत्यादि। परन्तु चूँकि अव्यय {,}אלal प्रायः निषेधात्मक अर्थ में प्रयुक्त होता है, इसलिए इस पद को स्पष्ट रूप से परमेश्वर द्वारा कहा गया समझा जा सकता है, और इस प्रकार इसे पिछले पद के साथ जोड़कर पढ़ा जा सकता है, वेग से चलनेवाला न भागने पाए, और न वीर बचने पाए। क्योंकि परमेश्वर यहाँ अधिकार के साथ घोषणा करता है कि फुर्ती और साहस मिस्रियों के किसी काम न आएँगे, क्योंकि सबसे वेगवान को उनके शत्रु पकड़ लेंगे, और सबसे वीर गिर पड़ेगा।

वह कहता है, उत्तर के देश में, महानद के तट पर। हम जानते हैं कि बाबुल और अश्शूर और कसदियों का देश और वे प्रदेश यहूदिया की अपेक्षा उत्तर की ओर थे।

सो जब कभी भविष्यद्वक्ता बाबुलियों की चर्चा करते हैं, तो वे उन्हें उत्तरवासी कहते हैं; परन्तु मिस्र दक्षिण की ओर था, जैसा पवित्रशास्त्र के बहुत से भागों से स्पष्ट है। परन्तु चूँकि भविष्यद्वक्ता यहाँ मिस्रियों के विषय बोलता है, इसलिए वह ठीक ही कसदियों के देश को उत्तर में बताता है।

फिर वह कहता है, फरात महानद के तट पर वे ठोकर खाएँगे, या गिरेंगे। अर्थ यह है कि युद्ध का परिणाम परमेश्वर के अधिकार में है, यहाँ तक कि वह मिस्रियों को, चाहे वे कितने ही सुसज्जित हों और अपने बल पर कितना ही भरोसा रखें, टुकड़े-टुकड़े करके धूल में मिला देगा या तितर-बितर कर देगा।

हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि मनुष्य अपनी सुरक्षा की रक्षा के लिए अपने लिए जो भी सहायताएँ जुटाते हैं, जब परमेश्वर उनका विरोधी होता है तो वे कुछ भी नहीं। भविष्यद्वक्ता तो केवल दो बातों का उल्लेख करता है; परन्तु उसका अर्थ यह है कि चाहे मनुष्य बहुत सी बातों में श्रेष्ठ हों और बहुत से गुणों से सम्पन्न हों, तौभी जब परमेश्वर की यही इच्छा हो तो उन्हें नाश होना ही पड़ेगा: न भागना वेगवान को बचा सकता है, न बल वीर को। इसके बाद आता है,—

यिर्मयाह 46:7-8

7. यह कौन है जो बाढ़ के समान चढ़ा आता है, जिसका जल महानदों के समान उछलता है?

7. Quis iste tanquam lacus ascendet (vel, ascendit, ad verbum) tanquam fluvii sese agitant (aut, moventur) aquae ejus?

8. मिस्र बाढ़ के समान चढ़ता है, और उसका जल महानदों के समान उछलता है; और वह कहता है, मैं चढ़कर पृथ्वी को ढाँप लूँगा; मैं नगर को उसके निवासियों समेत नाश कर दूँगा।

8. Aegyptus tanquam lacus ascendit (ascendet, ad verbum, sed significat continuum actum,) et tanquam fluvii sese movent aquae: dixit enim, Ascendam et operiam terram; perdam urbem et qui habitant in ea.

359 इस वाक्यांश के साथ अधिक संगत यह है कि क्रियाओं का अनुवाद भविष्यत् काल में किया जाए, — न भागेगा वेगवान, न बचेगा बलवान; उत्तर में, फरात महानद के किनारे, उन्होंने ठोकर खाई और गिर पड़े। — सं.

भविष्यद्वक्ता फिर उन सन्देहों का सामना करता है जो भक्तों के मन में घर कर सकते थे, और उन्हें इस भविष्यद्वाणी को विश्वास और उचित श्रद्धा के साथ ग्रहण करने से रोक सकते थे: क्योंकि हम कह चुके हैं कि जब हमारे विचार बाहरी वस्तुओं में लगे रहते हैं, तब परमेश्वर की सामर्थ्य की उपेक्षा होती है। सो जब हम किसी अजेय राज्य की चर्चा करते हैं, तब हमारे मन में यह नहीं आता कि परमेश्वर के सामने सब गढ़ कुछ नहीं हैं। इसलिए यह आवश्यक था कि जब भविष्यद्वक्ता उसके न्यायों की चर्चा करें, तब परमेश्वर की सामर्थ्य की बहुत बड़ाई करें; नहीं तो शरीर, जैसा हम कह चुके हैं, यह कहता, “जो भली-भाँति गढ़बन्द हैं वे अवश्य विपत्तियों से मुक्त होंगे, और मानो शस्त्रों की पहुँच से परे होंगे, इसलिए उनके लिए डरने की कोई बात नहीं।” और इसी झूठी कल्पना से घमण्डी अपने आप को धोखा देते हैं, क्योंकि वे अपनी सेनाओं, अपने सहायकों, और उन सब वस्तुओं को खड़ा करते हैं जिन्हें वे शरीर के विचार के अनुसार अपनी सुरक्षा की रक्षा के लिए पर्याप्त समझते हैं। इस प्रकार ऐसा होता है कि वे सब धमकियों की लापरवाही से उपेक्षा करते हैं, क्योंकि वे सोचते हैं कि जो सहायताएँ उनके पास हैं वे सब आक्रमणों के विरुद्ध इतने ही गढ़ हैं।

इसी उद्देश्य से भविष्यद्वक्ता अब कहता है, यह कौन है जो झील के समान चढ़ता, या उमड़ता है, जैसे महानद हिलोरें लेते हैं, या, जिसका जल उछलता है? परन्तु वह मनुष्यों के साधारण विचार के अनुसार बोलता है, क्योंकि वह दृश्य ही मनुष्यों को भय से भर देता था; और इस प्रकार यहूदी कभी सोच भी नहीं सकते थे कि जो बात भविष्यद्वक्ता यहाँ कहता है वह सम्भव है। तब वह मानो उन सब को अपने विचार के अनुसार चिन्ता से पूछते हुए प्रस्तुत करता है, यह कौन है? मानो फ़िरौन कोई नश्वर मनुष्य नहीं, वरन् मनुष्य से ऊपर कोई वस्तु हो। क्योंकि इस प्रश्न का आशय यह है कि फ़िरौन मानो मनुष्यों की साधारण दशा से छूटा हुआ था, क्योंकि उसकी शक्ति चढ़ती या उमड़ती हुई नदी के समान बढ़ती थी; और वह कहता है, उसका जल गरजता है।

फिर वह जोड़ता है, मिस्र महानदों के समान और झील के समान है: वह अपनी सेनाओं के साथ ऐसा गरजा मानो कोई नदी अपना जल बहाए लिए जा रही हो। परन्तु यह सब कुछ भी न होगा, जैसा वह बाद में हमें बताता है। वह जोड़ता है, उसने कहा है, मैं चढ़ूँगा, मैं देश को ढाँप लूँगा, मैं नगर को नाश करूँगा, इत्यादि। वह बहुवचन के स्थान पर एकवचन में नगर रखता है; वह कहता है, मैं नगरों को और उनमें रहनेवाले सब को नाश करूँगा। संक्षेप में वह यहाँ फ़िरौन को ऐसा प्रस्तुत करता है जो लड़ने से पहले ही विजय मना रहा था, क्योंकि वह अपने पैदलों और सवारों की भीड़ से देश को ढाँप सकता था। अब इसके बाद आता है,—

यिर्मयाह 46:9

9. हे घोड़ो, चढ़ो; हे रथो, प्रचण्ड वेग से चलो; और वीर निकल आएँ, ढाल पकड़नेवाले कूशी और पूती, और धनुष पकड़ने और चढ़ानेवाले लूदी।

9. Ascendite equi (quidam vertunt, insanite, sed dura esset metaphora, ideo simpliciter accipio,) jactate vos currus (ponit in singulari numero, cum tamen verbum sit pluralis numeri,) egredientur fortes, nempe Aethiopes et Lybes, qui tenent clypeum, et Lydi, qui tenent et tendunt arcum.

वह उसी विषय को आगे बढ़ाता है, और उन सब बातों की गिनती करता है जो उसकी भविष्यद्वाणी को अविश्वसनीय ठहरा सकती थीं। क्योंकि जब विश्वासियों ने देखा कि मिस्री उस चढ़ाई पर न केवल असंख्य सेनाओं के साथ गए, वरन् विदेशी सहायकों के रूप में उनके साथ कूशी और लूबी थे, और समुद्र-पार लूदिया के सैनिक भी,—जब उन्होंने देखा कि सब ओर से भाड़े के सैनिक मिस्रियों के साथ जुड़ गए हैं, तब इस पर विश्वास करना कठिन था कि ऐसी सेना भगाई जा सकती है। तब भविष्यद्वक्ता यहाँ कहता है कि यद्यपि फ़िरौन ने कूशियों, लूबियों और लूदियों को भाड़े पर लिया, तौभी इन सब सेनाओं के रहते वह नाश हो जाएगा।

360 यहाँ नगर को देश के विपरीत रखा गया है, — और उसने (मिस्र ने) कहा, मैं चढ़ूँगा, मैं देश को ढाँप लूँगा; मैं (हर एक) नगर को और उसके रहनेवालों को नाश करूँगा।

वह फिर फ़िरौन के नाम से बोलता है, हे घोड़ो, चढ़ो; हे रथो, उछलो, और वीर निकल आएँ। यह निकलना उन देशों की ओर संकेत कर सकता है जहाँ से वे आए। वह पहले कूशियों का उल्लेख करता है, जो मिस्रियों के निकट थे, यद्यपि उनसे अलग थे। फिर वह लूबिया के लोगों को जोड़ता है, जो अफ्रीकी थे, या जो मिस्र और अफ्रीका के बीच में बसे थे। फिर वह कहता है कि उन्होंने ढाल पकड़ी। वह उनके मुख्य शस्त्र की ओर संकेत करता है; यह नहीं कि उनके पास टोप और तलवार और अन्य शस्त्र नहीं थे, परन्तु वे मुख्यतः अपनी ढालों पर भरोसा रखते थे। जैसे हम जानते हैं कि मकिदुनी लोग पेल्टा धारण करते थे और उस शस्त्र के लिए प्रसिद्ध थे, वैसे ही भविष्यद्वक्ता कहता है कि कूशी और लूबी फरियों या ढालों से सुसज्जित थे। वह लूदियों का भी उल्लेख करता है, जो दूसरी ओर से, अर्थात् समुद्र के उस पार के तट से थे; क्योंकि हम जानते हैं कि लूदी लघु एशिया में थे, जबकि मिस्री अफ्रीका और यहूदिया के बीच में थे। सो भूमध्य सागर उनके बीच था। इससे प्रकट होता है कि जब फ़िरौन ने यह युद्ध छेड़ा, तब उसने दूर-दूर से और बड़े व्यय से सहायक सेनाएँ जुटाईं। और यह भी सम्भव है कि अन्य जातियाँ भी भाड़े पर ली गईं; परन्तु भविष्यद्वक्ता केवल कूशियों, लूबियों और लूदियों का उल्लेख करता है: और वह कहता है कि अन्त में नामित लोगों ने धनुष पकड़ा, क्योंकि वे सबसे अच्छे धनुर्धारी थे। अब इसके बाद आता है,—

यिर्मयाह 46:10

10. क्योंकि वह दिन सेनाओं के यहोवा प्रभु का दिन, पलटा लेने का दिन है, जिसमें वह अपने द्रोहियों से पलटा ले; और तलवार खाकर तृप्त होगी, और उनका लोहू पीकर छक जाएगी; क्योंकि उत्तर के देश में फरात महानद के तट पर सेनाओं के यहोवा प्रभु का यज्ञ है।

10. Verum (copula enim hic adversative exponi debet, atqui) dies ille Domino Jehovae exercituum, dies ultionis ad ulciscendum de adversariis suis; et vorabit gladius et saturabitur et inebriabitur sanguine ipsorum; quia victima Domino Jehovae exercituum in terra aquilonis ad fluvium Euphratem.

भविष्यद्वक्ता ने फ़िरौन की उन भयानक सेनाओं का वर्णन करके, जिन पर वह इतना भरोसा रखता था कि निश्चित विजय का घमण्ड करने का साहस करता था, अब कहता है कि परिणाम बहुत भिन्न होगा: परन्तु यह दिन, वह कहता है, यहोवा के पलटा लेने का दिन होगा; मानो उसने कहा हो कि फ़िरौन केवल अपने रथों और सवारों, अपने भाड़े के सैनिकों, उनके शस्त्रों और युद्ध की तैयारियों पर ही दृष्टि करेगा, और साथ ही परमेश्वर की ओर न देखेगा, जो अकारण ही सेनाओं का परमेश्वर नहीं कहलाता। यद्यपि पवित्रशास्त्र बहुत से स्थानों में यह उपाधि परमेश्वर को देता है, तौभी यहाँ इसका एक विशेष प्रयोग है। क्योंकि भविष्यद्वक्ता फ़िरौन की मूर्खता का उपहास करता है, क्योंकि वह सोचता था कि युद्ध का परिणाम उसके अपने हाथ में है, मानो सब वस्तुओं का संचालन परमेश्वर के हाथ में न हो। तब वह कहता है कि विजय केवल परमेश्वर पर निर्भर थी; और आगे, वह घोषणा करता है कि क्या होनेवाला था: यह दिन, वह कहता है, परमेश्वर के पलटा लेने का दिन होगा।

इन शब्दों से वह संकेत करता है कि परमेश्वर मिस्रियों पर क्रोधित था, और उसका कारण वही है जिसका उल्लेख हमने कल किया, अर्थात् यह कि फ़िरौन नको ने मार्ग से गुज़रते हुए भक्त राजा योशिय्याह को मार डाला था। सो वह इसी योग्य था कि परमेश्वर उसके अहंकार को धूल में मिला दे, और उसकी क्रूरता को ताड़ना भी दे और उसके अत्याचार को रोके। परन्तु जब वह मिस्रियों को परमेश्वर के द्रोही कहता है, तो यह चुनी हुई प्रजा की शान्ति के लिए कहा गया, यह दिखाने के लिए कि परमेश्वर उनका मुकद्दमा अपने हाथ में लेगा। क्योंकि वह मिस्रियों का शत्रु क्यों था? इसीलिए कि वह भक्त राजा के बिना दण्ड के मारे जाने को सहन न करता। सो अब हम समझते हैं कि इन शब्दों का क्या अर्थ है, कि यह दिन सेनाओं के परमेश्वर के लिए पलटा लेने का दिन होगा; मानो उसने कहा हो कि परमेश्वर उस युद्ध का अध्यक्ष होकर उसका संचालन करेगा, यहाँ तक कि फ़िरौन की सारी सेनाएँ उसके किसी काम न आएँगी। बाद में, पुष्टि के लिए, वह जो कह चुका था उसे और स्पष्ट रूप से व्यक्त करता है: वह कहता है, तलवार खा जाएगी, और उनके लोहू से तृप्त होकर छक जाएगी।

परन्तु पद के अन्त में वह कहता है कि यह परमेश्वर का धर्ममय न्याय होगा। क्योंकि परमेश्वर अपनी सामर्थ्य की ऐसी बड़ाई करता है कि तौभी जब कभी वह दुष्टों पर दण्ड लाता है, तब वह चाहता है कि उसे धर्मी माना जाए; क्योंकि उसकी कठोरता प्रायः चरम सीमा की प्रतीत होती है, इसलिए भविष्यद्वक्ता, जब वे परमेश्वर द्वारा लिए जानेवाले पलटों की चर्चा करते हैं, साथ ही उसके न्याय के धर्ममय होने की कुछ साक्षी भी जोड़ देते हैं, जैसे इस स्थान में, जब यह कहा गया कि सेनाओं के परमेश्वर का एक यज्ञ था।

यज्ञ से भविष्यद्वक्ता का अर्थ यह है कि वह संहार हर प्रकार के कलंक से रहित होगा; क्योंकि यह मानो ऐसा ही है जैसे उसने कहा हो, “जब सब मिस्री नाश किए जाएँगे, तब उस संहार में परमेश्वर की महिमा होगी।” क्योंकि हम परमेश्वर को बलिदान क्यों चढ़ाते हैं, सिवाय इसके कि उसकी महिमा प्रकट की जाए, कि वह धर्मी भी है और दयालु भी, और सर्वशक्तिमान, और सारी बुद्धि और खराई का सोता है? इससे हम देखते हैं कि यज्ञ शब्द किस उद्देश्य से प्रयुक्त हुआ है, अर्थात् इसलिए कि कोई उस संहार पर दोष लगाने का साहस न करे, मानो परमेश्वर बहुत कठोर हो और उस लोहू को बहाने में न्याय की सीमाओं का उल्लंघन करता हो। तब वह कहता है कि सारे संहार मानो इतने ही यज्ञ होंगे, जिनमें परमेश्वर का न्याय और उसकी सामर्थ्य दोनों चमक उठेंगे। वह फिर स्थान का संकेत करता है, उत्तर का देश, फरात के निकट, जिससे भविष्यद्वाणी को अधिक विश्वसनीयता और निश्चयता मिले। अब इसके बाद आता है,—

यिर्मयाह 46:11

11. हे मिस्र की कुमारी कन्या, गिलाद को चढ़ जा, और बलसान ले; तू व्यर्थ ही बहुत सी औषधियाँ काम में लाती है; तू चंगी न होगी।

11. Ascende in Guilead, et sume resinam virgo filia Aegypti; frustra multiplicas medicamina; sanitas nulla tibi.

भविष्यद्वक्ता यहाँ कोई नई बात नहीं जोड़ता, परन्तु एक दूसरे रूपक के द्वारा उस बात की पुष्टि करता है जो वह पहले कह चुका था। तब वह कहता है कि वह संहार एक प्राणघातक मरी के समान होगा, मानो परमेश्वर मिस्रियों से हर आशा छीन लेगा। हम जानते तो हैं कि मिस्र का राज्य उस समय नाश नहीं हुआ; क्योंकि वह जाति स्वयं बनी रही। परन्तु वह राज्य इतना दबा दिया गया कि, जैसा कल कहा गया था, वे मानो अपनी ही सीमाओं के भीतर बन्द रहे, और बाद में अपनी सेनाएँ बाहर न निकालीं। और तौभी यह भली-भाँति ज्ञात है कि उस जाति का घमण्ड और दुस्साहस कितना बड़ा था; परन्तु उन्होंने देखा कि वे पूरी तरह टूट चुके और निर्बल हो गए हैं। इसलिए भविष्यद्वक्ता अकारण नहीं कहता कि वह एक असाध्य घाव होगा, जिससे परमेश्वर मिस्र को ऐसा मारेगा कि वह फिर अपना पुराना बल प्राप्त न करेगा; क्योंकि उस समय के बाद मिस्र का राज्य कभी नहीं फला-फूला; और कुछ ही वर्षों के बाद, जैसा हम एक दूसरी भविष्यद्वाणी में देखेंगे, वह बाबुल के अधिकार में कर दिया गया। अब वह अपनी बात मिस्र की ओर मोड़ता है: वह कहता है, हे मिस्र की कुमारी कन्या, यह भविष्यद्वक्ताओं में बोलने की एक प्रचलित शैली है। वे बाबुल को बाबुल की पुत्री कहते हैं; वे यहूदिया को यहूदा की पुत्री कहते हैं। परन्तु यह प्रजा पर या राज्य पर लागू की जा सकती है। और वह मिस्र को उसकी विलासिता के कारण कुमारी कहता है, मानो उसने कहा हो कि मिस्री कोमल और सुकुमार थे, क्योंकि लम्बी शान्ति के समय उन्होंने बल और सब प्रकार का धन बटोर लिया था। सो जब वे अपने सुख-विलासों में ऐसे मतवाले हो गए थे, तब मिस्र को उपहास के रूप में कुमारी कहा गया है।

वह कहता है, गिलाद को चढ़ जा, और राल ले, या, जैसा कुछ लोग अनुवाद करते हैं, “बलसान।”

जेरोम ने एक दूसरे स्थान पर इसका अनुवाद “मधु” किया, परन्तु बिना किसी कारण के; और सम्भव यह है कि इस शब्द का अर्थ बलसान की अपेक्षा राल है। अन्य स्थानों से भी यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि सबसे उत्तम राल गिलाद पर्वत पर पाई जाती थी, जैसा हम इस पुस्तक के आठवें अध्याय (यिर्मयाह 8) में भी कह चुके हैं। राल वृक्षों से, विशेषकर तार्पीन-वृक्ष से, बहनेवाला रस थी; और इसलिए सबसे उत्तम राल तार्पीन की राल है, जिसे हम तेरेबेन्तीन कहते हैं। साथ ही देवदार-जाति के वृक्षों और अन्य वृक्षों से भी राल मिलती है। परन्तु जैसा मैं कह चुका हूँ, गिलाद पर्वत राल में उपजाऊ था, और वह न केवल अपनी राल की बहुतायत के लिए वरन् उसकी उत्तमता के लिए भी प्रसिद्ध है; और उसके औषधीय गुण कुछ स्थानों में दूसरे स्थानों से अधिक अच्छे और अधिक प्रभावकारी पाए जाते हैं।

सो बोलने की साधारण रीति के अनुसार वह कहता है, हे मिस्र की पुत्री, गिलाद को चढ़ जा, और अपने लिए राल ले; परन्तु वह कहता है, यह व्यर्थ होगा; अर्थात्, “यदि तू अपनी विपत्तियों का उपाय यत्न से ढूँढ़े भी, तौभी तू उसे कभी न पाएगी; क्योंकि तेरा घाव असाध्य है।” यह नहीं कि मिस्र का राज्य नाश हुआ या पूरी तरह उलट दिया गया, परन्तु यह कि उसका बल जाता रहेगा, यहाँ तक कि कसदी राजा एशिया के उस सारे भाग पर अधिकार कर लेगा जिस पर मिस्रियों ने कब्ज़ा कर रखा था, ठीक पेलूसियम तक, नील नदी की सीमाओं तक। अन्त में वह जोड़ता है,—

यिर्मयाह 46:12

12. जाति जाति ने तेरी नामधराई सुनी है, और पृथ्वी तेरी चिल्लाहट से भर गई है; क्योंकि वीर वीर से ठोकर खाकर गिरा, और वे दोनों एक संग गिर पड़े हैं।

12. Audierunt gentes opprobrium tuum, et clamore tuo repleta est terra; quia fortis contra fortem impegit, et simul ceciderunt ambo.

वह इस भविष्यद्वाणी को यह कहकर समाप्त करता है कि इस संहार का समाचार सब जातियों में सर्वत्र फैल जाएगा। यदि मिस्रियों को केवल थोड़ी सी हानि उठानी पड़ती, तो यह बात अज्ञात रह सकती थी, जैसे जब कोई छोटी सी मुठभेड़ होती है तो उसका समाचार दूर-दूर तक नहीं फैलता; परन्तु जब एक ही युद्ध से कोई जाति ऐसी पराजित होती है कि उसके बाद कोई उल्लेखनीय परिवर्तन होता है, तब वह घटना सर्वत्र प्रचारित होती है।

तब भविष्यद्वक्ता इन शब्दों के द्वारा संकेत करता है कि मिस्र पर पड़नेवाली मार साधारण न होगी, जैसा कि उसने पहले भी कहा था, क्योंकि उसका समाचार सब जातियों में उड़कर फैल जाएगा।

तब सब जातियों ने तेरी नामधराई सुनी है, अर्थात् यह कि मिस्री लोग अपने बड़े अपमान के साथ कसदियों से पराजित हुए थे, और वे न केवल भगा दिए गए थे, वरन् उनमें से अधिकांश घात भी किए गए थे, यहाँ तक कि मिस्र का राज्य लगभग नष्ट हो गया था; कम से कम वे ऐसे संकट में डाल दिए गए थे कि उन्होंने अपने मुख्य नगर और एक बहुत विस्तृत देश, अर्थात् सारे एशिया में फरात नदी तक का भूभाग, खो दिया।

वह कहता है कि पृथ्वी उनकी चिल्लाहट से भर गई: शब्द या चिल्लाहट से उसका अभिप्राय विलाप है। फिर वह आगे कहता है, क्योंकि वीर वीर से ठोकर खाकर गिरा है। इसकी व्याख्या इस प्रकार भी की जा सकती है, "वीर ने वीर से युद्ध किया है;" परन्तु यह कि कसदी मिस्री से अधिक बलवन्त निकला: परन्तु मैं इसे मिस्रियों पर ही लागू करना अधिक उचित समझता हूँ; और यह बात पद के अन्त से निकाली जा सकती है, जहाँ वह कहता है कि दोनों गिर पड़े। अतः भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय यह है कि जिस भीड़ पर मिस्री घमण्ड करते थे, वही उनके लिए बाधा बन जाएगी, जैसा कि प्रायः होता है जब सेना बहुत ठसाठस भरी होती है; क्योंकि सेना जितनी बड़ी और जितनी अधिक संख्या में होती है, उतनी ही अधिक उसमें अव्यवस्था और गड़बड़ी होती है। जब सेना छोटी होती है, तो वे धीरे-धीरे पीछे हट सकते हैं, या ठहरे रह सकते हैं, जब तक कि वे सुरक्षित रूप से भाग न निकलें: परन्तु बड़ी भीड़ में घबराहट भी बड़ी होती है, और इस कारण अव्यवस्था और गड़बड़ी भी बड़ी होती है। अतः भविष्यद्वक्ता यही बात दिखाता है जब वह कहता है, वीर वीर से ठोकर खाकर गिरा, और वे दोनों एक संग गिर पड़े; अर्थात् यह कि लड़ते समय वे आपस में ही टकरा जाएँगे, और ऐसी अव्यवस्था उत्पन्न करेंगे कि दोनों का पतन हो जाए।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जब हम देखते हैं कि अत्यन्त धनी राज्य भी तेरे हाथ से नहीं बच सके, तो हम केवल तेरी ही सहायता पर निर्भर रहना, और उचित दीनता के साथ अपने आप को तेरे अधीन करना सीखें, कि हम तेरे हाथ से सुरक्षित रहें, और यही एकमात्र सच्चा भरोसा सब संकटों में हमें सँभाले रहे कि तूने हमारे उद्धार की चिन्ता अपने ऊपर ले ली है; और इस बीच हम सच्चाई और जीवन की सीधाई के साथ तेरे झण्डे के नीचे लड़ते रहें, जब तक कि अन्त में हम स्वर्गीय राज्य में अपनी विजय का फल न भोगें, हमारे प्रभु मसीह के द्वारा। — आमीन।

एक सौ छियासठवाँ व्याख्यान

यिर्मयाह 46:13

13 यहोवा ने यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता से यह वचन भी कहा, कि बाबुल का राजा नबूकदनेस्सर क्योंकर आकर मिस्र देश को मार लेगा।

13. Sermo quem locutus est Jehova ad Jeremiam Prophetam ad veniendum (vel, de veniendo,) de adventu Nabuchadnezer regis Babylonis ad percutiendam terram

Aegypti.

पहली भविष्यद्वाणी मिस्री सेना के संहार के विषय में थी, जब फ़िरौन अश्शूरियों की सहायता करने आया था, जिनके साथ उस समय उसकी वाचा बँधी हुई थी। परन्तु यह भविष्यद्वाणी उससे आगे तक जाती है; क्योंकि यिर्मयाह घोषणा करता है कि स्वयं मिस्रियों की भी बारी आएगी; क्योंकि हम दूसरे भविष्यद्वक्ताओं से भी जानते हैं कि उन पर दण्ड की घोषणा की गई थी (और यहेजकेल इस विषय को कई अध्यायों में आगे बढ़ाता है), क्योंकि उन्होंने अपने प्रलोभनों के द्वारा परमेश्वर की प्रजा को धोखा दिया था। और परमेश्वर ने उन्हें न केवल उन बुराइयों के कारण दण्ड दिया जिनसे उन्होंने स्वयं उसके क्रोध को भड़काया था, वरन् इसलिए भी कि उन्होंने यहूदियों को बिगाड़ दिया था और उन्हें उनकी हठधर्मिता में और भी अधिक दृढ़ कर दिया था।

अब हम भविष्यद्वक्ता के अभिप्राय को समझते हैं: अर्थ यह है कि परमेश्वर, इस्राएलियों और यहूदियों पर अपना न्याय पूरा करने के बाद, मिस्रियों और अन्य जातियों का भी न्यायी बनेगा। हमें आगे यह भी ध्यान देना चाहिए कि यह भविष्यद्वाणी नगर के ले लिए जाने से पहले सुनाई गई थी। अतः उसी समय, जब मिस्री निश्चिन्त थे, और यहूदी उनकी सहायता पर भरोसा रखकर अपने आप को नबूकदनेस्सर के उपद्रव से सुरक्षित समझते थे, तभी यह भविष्यद्वाणी दी गई थी।

परन्तु हम फिर देखते हैं कि इन भविष्यद्वाणियों के विषय में समय का क्रम नहीं रखा गया है; क्योंकि उसने यहोयाकीम के चौथे वर्ष में सेना के संहार के विषय में कहा था। और यह सम्भव है, यद्यपि यहाँ समय नहीं बताया गया है, कि मिस्र के विनाश की भविष्यद्वाणी उसी समय की गई थी; क्योंकि यिर्मयाह के अपने भविष्यद्वक्ता-पद का कार्य आरम्भ करने से पहले ही यशायाह मिस्र के विरुद्ध कह चुका था। यहेजकेल ने भी, जब वह कसदियों के देश में बँधुआ था, उसी समय यिर्मयाह की भविष्यद्वाणियों की पुष्टि की, और मिस्र के विरुद्ध और भी बहुत सी बातें कहीं। तौभी हमें यह ध्यान देना चाहिए कि यिर्मयाह ने मिस्र के विनाश के विषय में केवल एक ही बार भविष्यद्वाणी नहीं की थी; क्योंकि जब वह बलपूर्वक वहाँ ले जाया गया, तब उसने, जैसा हम पहले देख चुके हैं, अपनी पहले कही हुई बात की पुष्टि की।

अतः जो कुछ हम यहाँ पढ़ते हैं, उसकी भविष्यद्वाणी यिर्मयाह ने नगर के ले लिए जाने से बहुत वर्ष पहले कर दी थी। परन्तु जब यहूदियों ने उसकी पहले कही हुई बात की उपेक्षा की, तब उसने मिस्र में रहते हुए उसकी फिर पुष्टि की, यद्यपि यह उसके प्राण के बड़े जोखिम के बिना न था, क्योंकि उसने न राजा को छोड़ा और न जाति को।

फिर वह कहता है कि नबूकदनेस्सर के मिस्र देश को मारने के लिए आने के विषय में उसके पास वचन पहुँचा। अब तक उसने उस दण्ड के विषय में कहा है जो परमेश्वर ने मिस्रियों पर उनके अपने राज्य से बाहर, फरात के तट पर, डाला था; परन्तु अब वह स्वयं मिस्र के दण्ड का वर्णन करता है, जब नबूकदनेस्सर न केवल मिस्रियों को अपनी सीमाओं से खदेड़ने के लिए उनका सामना करने निकला, वरन् जब उसने उनके राज्य पर चढ़ाई की, और बहुत से नगरों को लूटा, और सारे राज्य को ऐसा दु:ख दिया कि उसके बाद मिस्र का राजा मानो उसी की अनुमति से राज्य करता रहा। आगे लिखा है, —

यिर्मयाह 46:14

14. मिस्र में वर्णन करो, और मिग्दोल में सुनाओ; हाँ, और नोप और तहपन्हेस में सुनाकर यह कहो कि खड़े होकर तैयारी करो; क्योंकि तुम्हारे चारों ओर सब कुछ तलवार खा गई है।

14. Annuntiate in Aegypto, et promulgate in Migdol, promulgate in Noph et in Taphnees, dicite, Sta, et para te; quia voravit (vel, consumpsit) gladius circuitus tuos.

वह वही बोलने की रीति अपनाए रहता है जिसे हमने कल देखा था; और उसका कारण समझाया गया था, अर्थात् यह कि मनुष्य परमेश्वर के न्याय-कार्यों के प्रति बहुत असावधान होते हैं, इसलिए यदि यिर्मयाह सीधे-सादे और साधारण ढंग से बोलता, तो उसका सन्देश निष्फल हो जाता। इसलिए एक ऊँची शैली अपनाना, और जैसा वह करता है, प्रभावशाली और बलवन्त रीति से बोलना आवश्यक था। सार्वजनिक वक्ता सुन्दर भाषण का दिखावा करते हैं, परन्तु केवल वाहवाही पाने के लिए, या मनुष्यों को व्यर्थ भय अथवा आनन्द से भर देने के लिए: परन्तु भविष्यद्वक्ताओं के सामने एक और ही बात थी, अर्थात् ऐसी रीति से सिखाना, समझाना, डाँटना और धमकाना जो प्रभावकारी हो।

वह कहता है, मिस्र में वर्णन करो, मानो वह ईश्वरीय अधिकार से युक्त होकर न्यायासन से निर्णय सुना रहा हो। फिर वह आज्ञा देता है कि यह सन्देश मिस्रियों तक पहुँचाया जाए। इसके बाद वह कुछ नगरों का नाम लेता है, मिग्दोल, नोप और तहपन्हेस। कुछ लोग नोप को सिकन्दरिया समझते हैं; परन्तु सम्भवतः वह मेम्फिस था, और यह पवित्रशास्त्र के अन्य भागों से स्पष्ट प्रकट होता है। परन्तु वे भूल करते हैं जो समझते हैं कि वही मिग्दोल था, क्योंकि भविष्यद्वक्ता यहाँ उनका उल्लेख भिन्न-भिन्न स्थानों के रूप में करता है। तहपन्हेस के विषय में हम अन्यत्र कह चुके हैं। ये नगर प्रसिद्ध थे और यहूदियों के जाने-पहचाने थे, क्योंकि वे उनसे दूर नहीं थे।

हम जानते हैं कि मेम्फिस एक प्रसिद्ध नगर था; परन्तु यह इस्राएलियों को कहीं अधिक ज्ञात था, क्योंकि वह मिस्र से उनके निकलने के मार्ग से दूर नहीं था, जैसा कि हम मूसा की दूसरी पुस्तक और पवित्रशास्त्र के अन्य भागों से सीख सकते हैं। फिर हम देख चुके हैं कि जब यहूदी अपने देश से भगोड़े हो गए, तब वे तहपन्हेस में रहे, और वहाँ अतिथि के रूप में ग्रहण किए गए।

तब यह ऐसा ही है मानो भविष्यद्वक्ता ने कहा हो कि परमेश्वर अब मिस्रियों के विरुद्ध हथियार बाँधे हुए है; परन्तु क्योंकि वह उनके ऊपर ठहराया हुआ शिक्षक नहीं था, इसलिए वह उनके विषय में परदेशी जातियों के समान बात करता है। वह कहता है, मिस्र में वर्णन करो, अर्थात् मिस्री यह जान लें। कहो, खड़े हो, और अपने आप को तैयार कर, क्योंकि तलवार ने तेरी सीमाओं को, और तेरे चारों ओर की हर वस्तु को, खा लिया है। इन शब्दों के द्वारा भविष्यद्वक्ता संकेत करता है कि यद्यपि मिस्री, समय रहते चेतावनी पाकर, चौकसी करें, तौभी उनकी चिन्ता व्यर्थ होगी, क्योंकि वे परमेश्वर को उस बात को पूरा करने से नहीं रोक सकते थे जिसे उसने ठान लिया था; तौभी वह ऐसी बात कहता है जो अविश्वसनीय थी, क्योंकि मिस्री अपने आप को हर संकट से दूर समझते थे: इसलिए भविष्यद्वक्ता कहता है कि वे अपने आप को चाहे कितना ही तैयार करें, तौभी सब व्यर्थ होगा। फिर वह उनकी निश्चिन्तता का उपहास करता है, क्योंकि वे अपने आप को संकट की पहुँच से परे समझते थे। आगे लिखा है —

यिर्मयाह 46:15

15. तेरे बलवन्त जन क्यों नाश हो गए हैं? वे इस कारण खड़े न रह सके कि यहोवा ने उन्हें ढकेल दिया।

15. Quomodo dispersus est fortis tuns (ad verbum, fortes tui, est mutatio numeri,) non stabit (vel, non stetit,) quia Jehova impulit eum (iterum mutatur munerus, designat enim fortes tuos.)

इन शब्दों के द्वारा भविष्यद्वक्ता उस बात को और अधिक स्पष्टता से प्रकट करता है जिसकी ओर मैंने अभी संकेत किया है, कि मिस्री सामना न कर सकेंगे, चाहे उन्होंने हर ओर से सहायक सेनाएँ इकट्ठी कर ली हों, क्योंकि परमेश्वर स्वयं उनके विरुद्ध युद्ध करेगा। विस्मय में वह पूछता है, "यह कैसे हुआ, या यह क्या बात है, कि तेरे वीर इस प्रकार तितर-बितर कर दिए गए हैं?" क्रिया का अर्थ वास्तव में बुहार देना है, परन्तु यहाँ इसका अर्थ तितर-बितर करना है।

वह तुरन्त उत्तर देता है, क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें ढकेल दिया है, वे खड़े न रह सके। ऐसे प्रश्न का कारण हमने कल समझाया था, अर्थात् यह कि अविश्वासी लोग भविष्यद्वक्ताओं से जो कुछ सुनते थे उसे कहानी समझते थे; और जब तक बातें सफलतापूर्वक चलती रहती थीं, वे मानो अपने सौभाग्य पर सोए पड़े रहते थे, और उससे मतवाले हो जाते थे, यहाँ तक कि वे किसी बात से नहीं डरते थे, और अपने आप को किसी विपत्ति के अधीन नहीं समझते थे। अतः जब अधर्मी मनुष्य घमण्ड से परमेश्वर की उपेक्षा करते थे, तब भविष्यद्वक्ता सामान्य बुद्धि की दुहाई देकर उनसे पूछते थे, यह कैसे होता है? क्योंकि यिर्मयाह उन बातों के विषय में बोल रहा था जो अभी छिपी हुई थीं, और जो मनुष्यों के देखने में नहीं आई थीं। इससे हम देखते हैं कि यह आश्चर्य क्यों प्रकट किया गया, तेरे वीर कैसे गिर गए? फिर वह कहता है, क्योंकि यहोवा ने उन्हें ढकेल दिया है, वे खड़े न रह सके।

यहाँ फिर हमें वह बात स्मरण रखनी चाहिए जिसकी ओर हमने कल संक्षेप में संकेत किया था, कि अधर्मी मनुष्य झूठे भरोसे के द्वारा अपने आप को धोखा देते हैं, जब वे परमेश्वर की सामर्थ्य के विरोध में अपनी सांसारिक सहायताएँ और साधन खड़े करते हैं, और समझते हैं कि जब उनके पास बहुत सी सेनाएँ और गढ़ हैं, और जब वे हर ओर से अपने लिए सहायक सेनाएँ जुटा सकते हैं, तब वे भली-भाँति सुरक्षित हैं। हम यह जान लें कि जब परमेश्वर घोषणा करता है कि वह हमारा विरोधी है, तब सांसारिक सहायताओं पर भरोसा रखने से बढ़कर घातक और कुछ नहीं। इसलिए भविष्यद्वक्ता कहता है कि वे खड़े न रह सके, क्योंकि यहोवा ने उन्हें ढकेल दिया; मानो उसने कहा हो कि मिस्रियों का पाला न केवल बाबुल के राजा से, वरन् स्वयं परमेश्वर से पड़ेगा, जिसे उन्होंने क्रोध दिलाया था। आगे लिखा है, —

यिर्मयाह 46:16

16. उसने बहुतों को ठोकर खिलाई, वे एक दूसरे पर गिर पड़े; और वे कहने लगे, उठो, चलो, हम अंधेर करनेवाली तलवार के डर के मारे अपने-अपने लोगों और अपनी-अपनी जन्मभूमि में फिर लौट जाएँ।

16. Multiplicavit, impingent, etiam cecidit quisque in socium suum; et dixerunt, surge et revertamur ad populum nostrum, et ad terram nativitatis nostrae a facie gladii populantis.

संक्षिप्त अभिव्यक्ति इस वाक्य को अस्पष्ट या द्विअर्थी बना देती है। क्रिया बिना कर्ता के रखी गई है; परन्तु इसे परमेश्वर पर लागू करना चाहिए।

अतः परमेश्वर ने बहुतों को बढ़ाया है। और फिर वचन का परिवर्तन है, क्योंकि जब वह कहता है, वह गिरता है, {,}כושלcushil, तो एकवचन को बहुवचन के रूप में लेना चाहिए: अर्थ यह है कि बहुत से लोग ठोकर खाएँगे, क्योंकि परमेश्वर उन्हें ढकेल देगा, जैसा कि पिछले पद में कहा गया था।

इसी से वह बात निकलती है जो तुरन्त आगे आती है, हर एक अपने साथी पर गिर पड़ेगा, अर्थात् शत्रु के उन्हें मारने से पहले ही; एक साथ भीड़ लगाने के कारण वे अपने आप ही एक दूसरे से टकरा जाएँगे, यहाँ तक कि हर एक अपने संगी के धक्के से गिर पड़ेगा।

इसके बाद वह आगे कहता है, और वे कहेंगे, उठो। यहाँ वह देशवासियों के विषय में नहीं कहता। कुछ लोग समझते हैं कि यह संकेत उन परदेशियों की ओर है जो देश की उपजाऊ भूमि के कारण मिस्र में आए थे; क्योंकि मिस्र में निवास करना, जिसे हम जानते हैं कि बहुत उपजाऊ और सब प्रकार की बहुतायत से भरा हुआ था, उनके लिए विशेष रूप से लाभदायक था। अतः जब मिस्र में बहुत से परदेशी और प्रवासी थे, तो कुछ व्याख्याकार समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता यहाँ उन्हीं के विषय में कहता है, मानो उसने कहा हो, "जो लोग सब अच्छी वस्तुओं की बहुतायत के कारण वहाँ सुख से रहने के लिए मिस्र में आए थे, वे अपने लिए भाग जाने से बढ़कर और कुछ अच्छा न पाएँगे:" तब वे कहेंगे, उठो; अर्थात् हर एक दूसरे को समझाएगा और कहेगा, चलो, हम अपनी जन्मभूमि में चलें, अर्थात् "हम अपनी ही जन्मभूमि से सन्तुष्ट रहें; क्योंकि यदि हम मिस्र में रहें तो उसकी समृद्धि ही हमारे लिए घातक सिद्ध होगी।" परन्तु मैं यह अधिक समझता हूँ कि भविष्यद्वक्ता भाड़े के सैनिकों की ओर संकेत करता है। हमने कल देखा कि जब फ़िरौन ने फरात के तट पर युद्ध किया, तब उसके साथ कूशी, और लूदी, और लूबी देश से बहुत से लोग थे, और हम अभी फिर देखेंगे कि जब नबूकदनेस्सर ने मिस्र को जीता तब वहाँ भाड़े के सैनिक थे। अतः भविष्यद्वक्ता के लिए उन परदेशी सैनिकों का उल्लेख करना बहुत उपयुक्त था जिन्हें फ़िरौन ने भाड़े पर रखा था; क्योंकि पद के आरम्भ में उसने कहा, हर एक अपने पड़ोसी पर ठोकर खाएगा, और फिर आगे आता है, और वे कहेंगे, आओ, हम अपने लोगों और अपनी जन्मभूमि में लौट चलें। जब वह कहता है, हर एक अपने पड़ोसी पर ठोकर खाएगा, तो निस्सन्देह उसका अभिप्राय उन्हीं वीरों से है जो मिस्र की रक्षा के लिए बुलाए गए थे; उन्हीं के विषय में वह तब भी कहता है जब वह कहता है, उठो, हम अपनी जन्मभूमि में लौट चलें।

वह कहता है, उजाड़नेवाली तलवार के सामने से। शब्द {,}היונהeiune को कुछ लोग {,}ייןiin, अर्थात् दाखमधु, से निकला हुआ मानते हैं; और वे यह व्याख्या देते हैं, "मतवाली तलवार से।" जेरोम इस शब्द का अनुवाद "कबूतरी" करता है, परन्तु बिना किसी कारण के। अतः वह उस तलवार को उजाड़नेवाली या नाश करनेवाली कहता है, जो पहले ही बहुत लहू से मतवाली हो चुकी थी, और जिसने बहुत संहार किए थे। तलवार से उसका अभिप्राय नबूकदनेस्सर के सैनिकों की तलवार से है। कुछ लोग इन शब्दों का अनुवाद "उदास करनेवाली तलवार" करते हैं, परन्तु यह अनुवाद मुझे निरर्थक प्रतीत होता है। तब वे कहते हैं, "जब हम पहले ही कुचल दिए गए हैं, और देखते हैं कि हमारे शत्रु बेरोक-टोक संहार कर रहे हैं, और जो कोई उनके सामने आता है उसे मार डालते हैं, तो हमारे लिए अपने देश को लौट जाने से बढ़कर और कुछ अच्छा नहीं।" आगे लिखा है, यिर्मयाह 46:17

17. वहाँ वे पुकारकर कहते हैं, मिस्र का राजा फ़िरौन सत्यानाश हुआ; क्योंकि उसने अपना बहुमूल्य अवसर खो दिया।

17. Clamarunt illic, Pharao rex Aegypti perturbationis, praeteriit tempus statutum (vel, condictum.)

यह पद पिछले पद के साथ जोड़ा जाना चाहिए, क्योंकि वह उन सैनिकों की चिल्लाहट की ओर संकेत करता है जो अपनी ही आशाओं से धोखा खा गए थे: अन्त में वे चिल्ला उठे, फ़िरौन हमारे लिए गड़बड़ी का राजा है। भविष्यद्वक्ता उस बात की भविष्यद्वाणी करता है जो होनेवाली थी; परन्तु वह, जैसा कि प्रायः किया जाता था, भूतकाल में बोलता है; क्योंकि भविष्यद्वक्ता अनजानी बातों की घोषणा ऐसे करते हैं मानो वे उनकी आँखों के सामने हों, ताकि उनकी भविष्यद्वाणियों पर विश्वास किया जाए।

फिर वह कहता है कि सैनिकों के बीच यह चिल्लाहट होगी, मिस्र का राजा फ़िरौन गड़बड़ी का राजा है; क्योंकि शब्द {,}שאוןshaun को सम्बन्ध कारक में पढ़ना चाहिए; मानो भविष्यद्वक्ता ने कहा हो कि सैनिक सचमुच पाएँगे कि फ़िरौन अपनी डींग के अनुसार नहीं निकलेगा। मिस्र के नाम ने पहले तो उसे और सारी जाति को अहंकार से भर दिया; और फिर पड़ोसी जातियाँ उससे भय खाती थीं। इसलिए जब वे फ़िरौन के पास आए, तो उन्होंने समझा कि वे किसी प्रकार के देवता के पास आ रहे हैं। भविष्यद्वक्ता ने उस मूर्खतापूर्ण और अकारण रखे गए भरोसे का उपहास किया, और कहता है, "वे वहाँ चिल्लाएँगे, हे फ़िरौन, हे प्रतापी राजा, तू अब कोलाहल का राजा है," या गड़बड़ी का।

जो आगे आता है, उसकी व्याख्या मेरी समझ में व्याख्याकारों ने ठीक नहीं की; क्योंकि वे सब एक मत होकर समझते हैं कि फ़िरौन का उपहास इसलिए किया गया है कि उसने पहले यह कहकर कि वह नबूकदनेस्सर के विरुद्ध जाएगा, समय टाल दिया; जैसे पृथ्वी के राजा, जब अपने आप को पर्याप्त तैयार समझते हैं, तो शत्रु के निकट आने तक या उसके द्वारा घर पर पकड़े जाने तक प्रतीक्षा नहीं करते, वरन् दूर ही जाकर उसका सामना करते हैं। दूसरे लोग समझते हैं कि युद्ध का समय घोषित किया गया था, जैसा कि प्राचीन काल में दोनों पक्षों की रीति थी कि वे कोई निश्चित दिन घोषित करते थे जिस दिन उन्हें मुठभेड़ करनी होती थी। परन्तु अन्तिम पद से हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय कुछ और था; यदि मैं भूल नहीं करता, तो वह फ़िरौन की मूर्खता का उपहास एक दूसरे कारण से करता है, अर्थात् इसलिए कि वह समझता था कि वे धमकियाँ व्यर्थ और खोखली थीं जो यहूदियों के द्वारा फैलाई गई थीं; क्योंकि मिस्री इस बात से अनजान नहीं थे कि भविष्यद्वक्ताओं ने क्या भविष्यद्वाणी की थी। यशायाह ने बहुत पहले यहूदियों के विरुद्ध पुकारा था, क्योंकि वे मिस्रियों से सन्धि करते थे, और सहायता के लिए वहाँ भागते थे। इसमें कोई सन्देह नहीं कि दरबारी लोग कृपा पाने के लिए उनसे कहते थे, "देखो, हमारे भविष्यद्वक्ता जितना हो सके हमें रोकते हैं, और हमें सावधान रहना चाहिए कि कहीं वे प्रजा को भटका न दें: इसलिए जब तक समय है, आओ, हम वह सन्धि कर लें जो तुम्हारे लिए और हमारे लिए भी लाभदायक होगी।" अतः जब मिस्र के विनाश की भविष्यद्वाणी बहुत वर्ष पहले की जा चुकी थी, और जब यहूदिया के उलट दिए जाने और उजाड़ दिए जाने के बाद भी मिस्री सुरक्षित बने रहे, तो सम्भव है कि वे यह सोचकर और भी कठोर हो गए कि वह समय बीत चुका है। और जैसा मैंने कहा है, यह विचार प्रसंग से पुष्ट होता है। क्योंकि आगे लिखा है, —

यिर्मयाह 46:18

18. वह राजाधिराज जिसका नाम सेनाओं का यहोवा है, उसकी यह वाणी है कि मेरे जीवन की शपथ, जैसा ताबोर अन्य पहाड़ों में, और जैसा कर्मेल समुद्र के किनारे है, वैसा ही वह आएगा।

18. Vivo ego, dicit rex (cui nomen est rex) Jehova exercituum, quoniam sicut

Thabor in montibus, et sicut Carmelus in mari, veniet.

भविष्यद्वक्ता ने यह बात क्यों कही, सिवाय इसके कि मिस्री समझते थे कि वे बच निकले हैं, क्योंकि समय टल गया था? अतः जब समय की लम्बाई ने उन्हें धोखा दिया था, और वे समझते थे कि परमेश्वर ने झूठ कहा था, या जो कुछ उसने अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा पहले से कहा था उसे वह भूल गया है, तो वह कहता है, मेरे जीवन की शपथ, यहोवा की यही वाणी है, अर्थात् मेरे प्राण की सौगन्ध; क्योंकि परमेश्वर यहाँ अपने जीवन की शपथ खाता है कि जो कुछ वह अब घोषित करता है वह होकर रहेगा। यही सच्चा अर्थ प्रतीत होता है। और भविष्यद्वक्ता ने ऐसा केवल मिस्रियों के लिए नहीं कहा, वरन् यहूदियों के लिए भी; क्योंकि हम जानते हैं कि उनके बीच यह एक प्रचलित और सामान्य बात थी कि वे घमण्ड से यह दावा करते थे कि जो कुछ भविष्यद्वक्ताओं ने परमेश्वर के मुख से कहा था वह सब व्यर्थ था: इसी से वह कहावत चली, "आओ, खाएँ-पीएँ, क्योंकि कल तो मरना ही है।"

(यशायाह 22:13)

वे भविष्यद्वाणियों को निन्दा और तिरस्कार के रूप में बोझ भी कहते थे। जब अधर्मी लोग परमेश्वर की सहनशीलता के कारण अपने आप को दण्ड से बचे रहने का आश्वासन देते थे, तो उन्हें वह बात जताना आवश्यक था जो हम यहाँ पढ़ते हैं, अर्थात् यह कि परमेश्वर ने जिस किसी बात की धमकी दी थी वह पूरी होकर रहेगी, चाहे वह उसे कुछ समय के लिए टाल दे। क्योंकि वह अपना दण्ड रोके रखता है, परन्तु अन्त में उसका पलटा टूट पड़ता है, जब अविश्वासी समझते हैं कि सब बातें सफल होंगी; हाँ, जब वे कहते हैं, "कुशल है, और कुछ भय नहीं, तो उन पर एकाएक विनाश आ पड़ता है।"

(1 थिस्सलुनीकियों 5:3)

अतः शब्द {,}מועדmuod से भविष्यद्वक्ताओं का अभिप्राय एक नियत समय है; यह नहीं कि उन्होंने कोई निश्चित दिन बताया था, वरन् यह कि उन्होंने मिस्र के विनाश के विषय में ऐसे कहा था मानो परमेश्वर न्यायी के रूप में पहले ही निकल पड़ा हो।

अतः जब वे कहते थे कि समय बीत गया है, तो परमेश्वर यहाँ अपने जीवन की शपथ खाता है; और इसलिए वह कहता है, जिसका नाम राजा, सेनाओं का यहोवा है। परमेश्वर यहाँ फ़िरौन और अन्य सब राजाओं की शक्ति के विरोध में अपनी महानता प्रकट करता है; क्योंकि समृद्धि प्रायः अपने साथ घमण्ड लाती है, और जो प्रतिष्ठा और शक्ति में बढ़कर होते हैं वे हठी और ढीठ हो जाते हैं। इसलिए इस अहंकारपूर्ण ढिठाई को दबाने के लिए वह कहता है कि राजा, सेनाओं के परमेश्वर का नाम, वास्तव में किसी और का नहीं, केवल उसी का है।

वह कहता है, वह ऐसे आएगा जैसे ताबोर पहाड़ों में है, और कर्मेल समुद्र में। उन लोगों की व्याख्या उपयुक्त नहीं जो कहते हैं, "जैसे शिकारियों से भागनेवाले जंगली पशु पड़ोसी पहाड़ों से ताबोर पर्वत पर चले जाते हैं, और जैसे कर्मेल पर काटे गए पेड़ समुद्र तक ले जाए जाते हैं।" यह अत्यन्त खींचतान की व्याख्या है, और वर्तमान स्थल पर लागू नहीं की जा सकती। क्योंकि भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय क्या है? यही दिखाना कि जो कुछ उसने अभी घोषित किया था वह अटल होगा, और ऐसा स्थिर कि वह पलटा न जा सके, कि चाहे सारा संसार परमेश्वर के ठहराए हुए को विफल करने का प्रयत्न करे, तौभी कुछ न किया जा सकेगा। फिर वह कहता है, जैसे ताबोर पहाड़ों में है, अर्थात् जैसे ताबोर पर्वत दूसरे पहाड़ों से घिरा हुआ है, और वहाँ उसकी गहरी जड़ें हैं, यहाँ तक कि वह उखाड़ा नहीं जा सकता; और जैसे कर्मेल समुद्र में है। यहूदी इस कर्मेल को वह पर्वत नहीं समझते थे जहाँ नाबाल रहता था, वरन् एक पर्वत जो तोलमाइस से दूर नहीं था, और जो समुद्र से घिरा और धोया जाता था: इसलिए वह कहता है, जैसे कर्मेल समुद्र में एक पर्वत है। ताबोर और कर्मेल दोनों स्थिर बने रहते हैं, और किसी दूसरे स्थान पर हटाए नहीं जा सकते; वैसे ही, वह कहता है, यह भविष्यद्वाणी पूरी होगी; यह अटल है और पूरी की जाएगी; मानो उसने कहा हो, "यह अटल आज्ञा बदली नहीं जा सकती, जैसे कर्मेल हिलाया नहीं जा सकता, और न ताबोर, कि उन्हें कहीं और लगाया जाए।" अब आगे लिखा है, —

यिर्मयाह 46:19

19. हे मिस्र की रहनेवाली पुत्री! बँधुआई में जाने का सामान तैयार कर, क्योंकि नोप नगर उजाड़ और ऐसा भस्म हो जाएगा कि उसमें कोई भी न रहेगा।

19. Vasa migrationis fac (vel, para) tibi habitatrix Aegypti; quia Noph (id est, Memphis,) in solitudinem erit, et vastabitur, ut non sit habitator.

भविष्यद्वक्ता मिस्रियों पर विजयोल्लास प्रकट करता है, ताकि वह अपनी शिक्षा को और भी अधिक पुष्ट करे; क्योंकि हम कह चुके हैं, और अनुभव भी यही सिखाता है, कि जब परमेश्वर अविश्वासियों को अपने न्यायासन के सामने बुलाता है, और अपने पलटे का प्रमाण देता है, तब वे बहुत थोड़े ही प्रभावित होते हैं; क्योंकि वे जड़ बने रहते हैं, जब तक कि उनकी सुस्ती बलपूर्वक उनसे झाड़ न दी जाए। यही कारण है कि भविष्यद्वक्ता दुष्टों पर तीखा प्रहार करता है, अर्थात् इसलिए कि वे अपनी ऊँघ से जाग उठें।

इसलिए वह कहता है, देश-निकाले का सामान अपने लिए ले, अर्थात् स्थान बदलने के लिए अपने लिए वस्त्र और अन्य वस्तुएँ तैयार कर। मिस्री, उपजाऊ देश पाकर, अपने ही देश में चैन से रहते थे, और मानो एक स्थिर जीवन बिताते थे। अब भविष्यद्वक्ता संकेत करता है कि उन्हें कहीं और जाना पड़ेगा; और वह उन्हें एक लम्बी यात्रा, या लम्बे परदेशवास के लिए तैयार होने की आज्ञा देता है: तब अपने लिए देश-निकाले का सामान तैयार कर; क्योंकि मेम्फिस सूना कर दिया जाएगा, और ऐसा उजाड़ा जाएगा कि उसमें कोई निवासी न रहेगा।

वह फिर मेम्फिस का उल्लेख करता है, जो, जैसा हम कह चुके हैं, एक अत्यन्त प्रसिद्ध नगर और राजधानी था। वह कहता है कि वह उजाड़ दिया जाएगा, और फिर भी हम जानते हैं कि वहाँ के पिरामिड संसार के आश्चर्यों में गिने जाते थे। वह नगर घनी आबादीवाला था, और उसे बहुत से लाभ प्राप्त थे। भविष्यद्वक्ता उसे उजाड़ के लिए ठहराता है। तो यदि सबसे प्रसिद्ध नगर की ऐसी सुनसान दशा होनेवाली थी, तो छोटे नगरों का क्या होना था? गाँवों का क्या होना था? अब हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता का उद्देश्य क्या था, अर्थात् यह दिखाना कि जब नबूकदनेस्सर मिस्र पर चढ़ाई करेगा, तब सब कुछ उसके अधिकार में होगा, यहाँ तक कि वह अपनी इच्छा के अनुसार सारे देश को अधिकार में कर लेगा, लूटेगा और उजाड़ देगा। अब आगे लिखा है, —

यिर्मयाह 46:20

20. मिस्र बहुत ही सुन्दर बछिया तो है, परन्तु उत्तर दिशा से नाश चला आता है, वह आ ही गया है।

20. Vitula formosa Aegyptus, afflictio ab aquilone venit, venit.

यिर्मयाह यहाँ संकेत करता है कि यद्यपि मिस्र भोग-विलास में लिप्त रहा, तौभी वह परमेश्वर के पलटे से बच नहीं सकता था। हमने कल तुम्हें स्मरण दिलाया था कि भविष्यद्वक्ता अधर्मियों के धन, सम्पत्ति और शक्ति का उल्लेख क्यों करते थे, अर्थात् इसलिए कि वे उन सब अच्छी वस्तुओं के कारण अन्धे हो जाते हैं जो उनके पास बहुतायत से होती हैं; क्योंकि वे किसी बात से नहीं डरते, और न कोई चिन्ता अनुभव करते हैं, वरन् एक झूठी धारणा के कारण अपने आप को हर बुराई से मुक्त मान लेते हैं। अतः जब अविश्वासी इस प्रकार ढीठ और घमण्डी होते हैं, तो दूसरी ओर भविष्यद्वक्ता उन्हें चेतावनी देते हैं और कहते हैं कि वे अपने बल और गढ़ों पर चाहे कितना ही इतराएँ, तौभी जब परमेश्वर को उन्हें शिकार बनाना भाए, तब वे सबसे अधिक दयनीय हो जाएँगे।

अतः संक्षेप में भविष्यद्वक्ता यहूदियों के और मिस्रियों के भी झूठे घमण्ड को दूर करता है; मानो उसने कहा हो, "मिस्री अपनी समृद्धि पर भरोसा रखते हैं, मानो वे खेतों में उछल-कूद करती बछिया के समान हों; परन्तु विपत्ति," वह कहता है, "आ रही है, उत्तर से आ रही है।" वह हर सन्देह को दूर करने के लिए एक ही शब्द को दोहराता है: अतः संकट आ रहा है, वह उत्तर से आ रहा है, अर्थात् बाबुलियों की ओर से, जो यहूदिया के उत्तर की ओर बसे हुए थे, जैसा हमने कल बताया था।

यिर्मयाह 46:21

21. उसके जो सिपाही किराये पर आए हैं वह पाले-पोसे हुए बछड़ों के समान हैं; उन्होंने मुँह मोड़ा, और एक संग भाग गए, वे खड़े न रहे; क्योंकि उनकी विपत्ति का दिन और दण्ड पाने का समय आ गया।

21. Etiam mercenarii ejus in medio ejus tanquam vituli saginati, quia etiam ipsi vertent terga, fugient simul, non steterunt, quia dies calamitatis (vel, miseriae) venit super eos, tempus visitationis ipsorum.

यहाँ भविष्यद्वक्ता मिस्र के भाड़े के सैनिकों का, जैसा हम पहले कह चुके हैं, ऐसे परदेशी सैनिकों के रूप में वर्णन करता है जिन्हें इधर-उधर से, और लूदिया जैसे दूर के देशों से, भाड़े पर रखा गया था। तौभी यह हो सकता है कि उस समय समुद्र पार से मिस्रियों के पास आए हुए लोग बहुत न रहे हों; परन्तु उनके पास कूशी थे, क्योंकि यहेजकेल कहता है कि बहुत से लोग कूश, अर्थात् इथियोपिया, से आए थे; और फिर उनके पास लूबी देश और आस-पास के देशों से भी कुछ लोग थे। अतः यिर्मयाह उन्हें एक ही नाम के अन्तर्गत सम्मिलित करता है, और कहता है कि वे भाड़े के सैनिक थे। अब जो लोग अपने आप को भाड़े पर देते हैं वे दूसरों से अधिक युद्धप्रिय प्रतीत होते हैं; क्योंकि जो अपने देश की रक्षा करते हैं वे यह आवश्यकता के कारण करते हैं; परन्तु जो स्वयं युद्ध की खोज करते हैं, और युद्ध में लगने के लिए अपनी सीमाओं से निकल जाते हैं, वे किसी भी साहसिक कार्य के योग्य मनुष्य प्रतीत होते हैं।

परन्तु भविष्यद्वक्ता कहता है, {,}גםgam, भाड़े के सैनिक भी; अर्थात् न केवल मिस्री कोमल और विलासी जीवन के अभ्यस्त थे, वरन् कूशी और अन्य लोग भी जिन्हें भाड़े पर रखा गया था। वे भी उसके बीच में पाले-पोसे हुए बछड़ों के समान हैं, अर्थात् वे मिस्र की बहुतायत से अपना पेट भरते हैं; और इसी कारण वे अपने शत्रुओं के शिकार बन गए; क्योंकि हम जानते हैं कि सैनिकों के लिए कोमलता और विलासिता से जीवन बिताने से बढ़कर हानिकारक और कुछ नहीं। सब प्राचीन सेनापतियों में सबसे प्रसिद्ध हन्निबाल है; परन्तु यह कैसे हुआ कि एक अजेय सेना रखते हुए भी, जिसके द्वारा उसने सारे इटली को भयभीत कर दिया था, वह बाद में गिर गया? क्योंकि कैम्पेनिया ने अपने भोग-विलासों से उसे निर्बल कर दिया, क्योंकि वह वहाँ एक सैनिक के समान नहीं रहा, वरन् अपने और अपनी सेना के लिए समृद्ध भोजन से सजी मेज़ें रखता था। इसी कारण वे फिर वैसे न रहे जैसे पहले थे। वैसे ही भविष्यद्वक्ता भी कहता है, "मिस्र अपने भाड़े के सैनिकों को नष्ट कर देगा; क्योंकि वह उन्हें भोग-विलासों से तृप्त कर देगी।" अन्त में उनका क्या हुआ? वह उनकी तुलना थान के बछड़ों से करता है, {,}מרבקmerebec; कुछ लोग चरागाह के बछड़े पढ़ते हैं, परन्तु यह ठीक नहीं; क्योंकि {,}רבקrebec का वास्तविक अर्थ मोटा करना है। अतः वह उन्हें थान के बछड़े कहता है, जिन्हें इसलिए खिलाया जाता है कि वे मोटे हो जाएँ और शीघ्र घात किए जाएँ। इसलिए वह कहता है, वे भी पीठ फेरेंगे; और फिर वह कहता है, वे खड़े न रहेंगे, क्योंकि विपत्ति का समय आ पहुँचा है। मैं इस विषय को अभी समाप्त नहीं कर सकता।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जब तू हम पर कृपा करता है, तब हम तेरी सहनशीलता का दुरुपयोग न करें, और न समृद्धि में उच्छृंखल हो जाएँ, वरन् अपनी ही इच्छा से अपने आप को ऐसा वश में करना सीखें कि हम अपने जीवन के सारे मार्ग में तेरी आज्ञा मानें, और अपने शरीर को मार डालें, ऐसा न हो कि हम घमण्ड और झूठे भरोसे से फूल उठें, वरन् तेरे भय में ऐसा जीवन बिताएँ कि जब हम तुझे जगत का धर्मी न्यायी मानें तब तेरा आदर करें, और साथ ही जब हम तुझे अपना पिता स्वीकार करें तब तुझ पर निर्भर रहें, क्योंकि तुझे यह भाया है कि तू अपने एकलौते पुत्र, हमारे प्रभु, में हमें लेपालक बनाए। — आमीन।

एक सौ सड़सठवाँ व्याख्यान

यिर्मयाह 46:22

22. उसकी आहट सर्प के भागने की सी होगी; क्योंकि वे वृक्षों के काटनेवालों की सेना और कुल्हाड़ियाँ लिए हुए उसके विरुद्ध चढ़ आएँगे।

22. Vox ejus tanquam serpentis incedet, quia in potentia incedent; et cum securibus venient contra eam, sicuti caesores lignorum.

भविष्यद्वक्ता का उद्देश्य भाषा की सुन्दरता का अध्ययन करना उतना नहीं था जितना कि अपनी सिखाई हुई बात की पुष्टि करना। अतः जिन अलंकारों का वह अब प्रयोग करता है, वे भाषण के आभूषण के रूप में नहीं, वरन् अपनी कही हुई बात को बल और सामर्थ्य देने के लिए थे; क्योंकि, जैसा कहा जा चुका है, जड़बुद्धि मनुष्यों के बीच भविष्यद्वाणियों पर तब तक विश्वास नहीं किया जाता था जब तक उनके साथ उत्तेजक बातें न जोड़ी जाएँ।

अब वह कहता है कि मिस्र की आवाज़ सर्प की आवाज़ के समान निकलेगी: कुछ लोग पढ़ते हैं, "मानो वह सर्प हो;" परन्तु मैं इसका अनुवाद सम्बन्ध कारक में करना अधिक उचित समझता हूँ, और यह अधिक उपयुक्त है; क्योंकि भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय यह है कि मिस्र के विलाप ऊँचे स्वर के न होंगे; जैसे सर्प रेंगते समय फुफकार निकालते हैं, वैसे ही वह संकेत करता है कि मिस्री, उलट दिए जाने पर, ऐसे कुचल दिए जाएँगे कि वे खुले विलाप करने का साहस न करेंगे, जैसे वे लोग करते हैं जो स्वतन्त्रता से चिल्लाते हैं, वरन् जो जीवित बचेंगे वे भय से ऐसे मारे जाएँगे कि केवल बुदबुदाएँगे, जैसा कि सर्पों के विषय में कहा गया है, जो रेंगते हुए फुफकारते हैं। अब हम भविष्यद्वक्ता का वास्तविक अर्थ समझते हैं: वह कहता है कि मिस्री ऐसे गिरा दिए जाएँगे कि वे अपनी विपत्तियों की खुलकर शिकायत करने का साहस न करेंगे, क्योंकि वे केवल बुदबुदाएँगे, ठीक उन सर्पों के समान जो भूमि पर अस्पष्ट रूप से फुफकारते हैं: अतः उसकी आवाज़ सर्प की आवाज़ के समान आगे बढ़ेगी, या निकलेगी; और इस प्रकार वह उनकी बेचैनी को दिखाता है, क्योंकि वे छिपने के स्थान ढूँढ़ेंगे, और इधर-उधर भागेंगे, और कभी एक ही स्थान पर ठहरने का साहस न करेंगे। सचमुच यह सबसे दयनीय घबराहट का प्रमाण है, जब जो व्यक्ति अपनी विपत्तियों के नीचे दब जाता है उसे पाँव रखने का कोई स्थान नहीं मिलता, वरन् वह सर्पों के समान इधर-उधर भटकने को विवश होता है। जेरोम का अनुवाद है, "पीतल के समान," मानो लिखा हो {,}נחשת nuchashet; परन्तु मैं पहले ही दिखा चुका हूँ कि भविष्यद्वक्ता का क्या अभिप्राय था।

वह आगे कहता है, क्योंकि वे सेना के साथ, अथवा बल के साथ आएँगे। शब्द {,}חילchil का अर्थ दोनों है। अब वह कसदियों के विषय में बोलता है। उसने कहा था कि मिस्री काँप उठेंगे, और ऐसे टूट जाएँगे कि खुलकर कराहने का भी साहस न करेंगे। अब इसका कारण आता है, क्योंकि कसदी बल के साथ, अथवा सेना के साथ आएँगे; वे केवल लड़नेवाले सैनिकों के रूप में ही नहीं, वरन् अपनी कुल्हाड़ियाँ लिए लकड़हारों के समान भी आएँगे। वह संकेत करता है कि युद्ध का परिणाम किसी भी प्रकार सन्दिग्ध न होगा, वरन् कसदी मिस्र में ऐसे आएँगे जैसे मज़दूरी पर लगाए गए लोग पेड़ काटने आते हैं। सैनिक तो तलवारों और भालों से सुसज्जित होते हैं; क्योंकि उनका सामना शत्रुओं से होता है, और वे बिना जोखिम के विजय नहीं पा सकते, कम से कम बिना संघर्ष के तो जीत नहीं सकते; परन्तु भविष्यद्वक्ता कहता है कि कसदी ऐसे आत्मविश्वास से भरे होंगे कि वे मिस्रियों को शत्रु भी न समझेंगे, क्योंकि वे मानो ऐसे पेड़ों को काटने आएँगे जो कोई प्रतिरोध नहीं करते: अतः वे लकड़हारों के समान आएँगे। यहाँ तलवारों, भालों और कुल्हाड़ियों के बीच एक निहित विरोध है, जैसा सैनिकों और लकड़हारों के बीच है। आगे लिखा है,—

यिर्मयाह 46:23

23. यहोवा की यह वाणी है, कि चाहे उसका वन बहुत ही घना हो, परन्तु वे उसको काट डालेंगे, क्योंकि वे टिड्डियों से भी अधिक अनगिनित हैं।

23. Exciderunt sylvam ejus, dicit Jehova, quia non investigabitur, quia multiplicati sunt prae locusta (phsquam locustrae) et non illis numerus.

वह यहाँ उसी विषय को आगे बढ़ाता है। वह भूतकाल का प्रयोग तो करता है, परन्तु हम जानते हैं कि भविष्यद्वक्ता प्रायः ऐसा ही करते थे। वह मिस्र की प्रजा की तुलना एक वन से करता है, जैसे उसने कहा था कि एक-एक मनुष्य पेड़ों के समान होगा: तब उन्होंने काट डाला है, अर्थात् वे उसके वन को काट डालेंगे, यहोवा की यह वाणी है। पुष्टि के लिए वह इन वचनों को परमेश्वर से सम्बद्ध करता है; मानो उसने कहा हो कि वह केवल वही भविष्यद्वाणी करता है जिसे करने का परमेश्वर ने निश्चय कर लिया है। अतः उसका उद्देश्य हर सन्देह को दूर करना था; क्योंकि एक ओर यहूदी मिस्र की शक्ति पर विचार करके इस भविष्यद्वाणी पर विश्वास करने से इन्कार कर सकते थे; और दूसरी ओर मिस्री अपने ही बल पर भरोसा करके इन धमकियों की उपेक्षा कर सकते थे। इसलिए भविष्यद्वक्ता परमेश्वर को वक्ता के रूप में प्रस्तुत करता है, मानो उसने कहा हो, "यह आज्ञप्ति टाली नहीं जा सकती, क्योंकि परमेश्वर ने कहा है।"

और वह कहता है कि वे टिड्डियों से भी अधिक बढ़ गए थे, इसलिए उनकी कोई गिनती न हो सकेगी। मैंने इससे पहले का एक वाक्यांश छोड़ दिया है, उसकी खोज न की जाएगी। चूँकि अव्यय {,}כיki दो बार पढ़ा जाता है, इसलिए कुछ लोग समझते हैं कि दोनों उपवाक्य कसदियों से सम्बन्ध रखते हैं। अन्य लोग पढ़ते हैं, "उसकी गिनती न की जाएगी;" परन्तु क्रिया {,}חקרchekor का ठीक-ठीक अर्थ है पूछताछ करना, छानबीन करना; और वाक्य का उपयुक्त अनुवाद यों किया जा सकता है, "ताकि वन की छानबीन न की जा सके।" फिर भी एक और अर्थ अधिक स्वीकार किया गया है, कि कसदियों की गिनती न की जाएगी। यदि यह मत ग्रहण किया जाए, तो यहाँ वचन का परिवर्तन है, क्योंकि तुरन्त बाद आता है, "वे बढ़ जाएँगे," {,}רבוrebu; और फिर, उनकी कोई गिनती न होगी, {,}להםlaem। परन्तु जो मैंने पहले कहा, वह मुझे इस स्थल के प्रतिकूल नहीं लगता, अर्थात् मिस्र के वन की, अर्थात् प्रजा की, कोई छानबीन न होगी; क्योंकि जब कोई वन काट डाला जाता है, तो वह एक नंगा मैदान दिखाई देता है, और किसी पेड़ का स्थान भी नहीं बताया जा सकता। जहाँ तक सामान्य अर्थ का प्रश्न है, उसमें अधिक अन्तर नहीं है। संक्षेप में, भविष्यद्वक्ता का अर्थ यह है कि जिस संहार की वह भविष्यद्वाणी करता है वह इतना बड़ा होगा कि मिस्र उजाड़ हो जाएगा, क्योंकि कसदी एक विशाल सेना के साथ आएँगे: और वह इस संख्या को मिस्री सेनाओं के विरोध में खड़ा करता है, ताकि वे जान लें कि उनके शत्रु उनसे कहीं बढ़कर होंगे। आगे लिखा है—

यिर्मयाह 46:24

24. मिस्री स्त्री लज्जित होगी, वह उत्तर दिशा के लोगों के वश में कर दी जाएगी।

24. Pudefacta est filia Aegypti, tradita in manum populi Aquilonis.

वह कहता है कि मिस्र लज्जित होगा, क्योंकि वह घोर अपमान में डाला जाएगा, क्योंकि उनके शत्रु उनसे निन्दापूर्ण व्यवहार करेंगे। उत्तर दिशा के लोगों से उसका अभिप्राय कसदियों से है, जैसा अन्य बहुत से स्थानों में है; क्योंकि बाबुल मिस्र के उत्तर में था। संक्षेप में, वह संकेत करता है कि कसदी घमण्डी विजेता होंगे, यहाँ तक कि वे मिस्रियों को जीत लेने के बाद निन्दापूर्ण रीति से उन पर अत्याचार करेंगे। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि भविष्यद्वक्ता एक ही बात को बार-बार दोहराता है, क्योंकि उस समय यह बात अविश्वसनीय थी, जैसा हम पहले कह चुके हैं। अतः जब यहूदियों को यह विश्वास दिलाना कठिन था कि कसदी उस जाति और देश पर विजयी होंगे, तो यिर्मयाह उसी बात की विस्तार से पुष्टि करता है, क्योंकि वह प्रजा के हठीले अविश्वास से दृढ़ता के साथ संघर्ष करता रहा। आइए, हम आगे बढ़ें,—

यिर्मयाह 46:25

25. इस्राएल का परमेश्वर, सेनाओं का यहोवा कहता है, देखो, मैं नो नगरवासी आमोन और फ़िरौन राजा और मिस्र को उसके सब देवताओं और राजाओं समेत और फ़िरौन को उन समेत जो उस पर भरोसा रखते हैं दण्ड देने पर हूँ।

25. Dicit Jehova exercituum, Deus Israel, Ecce ego visito super multitudinem quae ab Alexandria, et super Pharaonem, et super Aegyptum, et super deos ejus, et super reges ejus, et super Pharaonem, et super eos, qui confidunt in ipso.

भविष्यद्वक्ता फिर परमेश्वर के नाम से बोलता है, और परमेश्वर की महिमा को अपनी ही जाति की कुटिलता के विरोध में खड़ा करता है; क्योंकि, जैसा कहा जा चुका है, जब उसने मिस्रियों को धमकाया तो उसका बहुत थोड़ा प्रभाव हुआ। क्योंकि यहूदी उस देश को अजेय मानकर निश्चिन्त थे; क्योंकि वे सोचते थे कि मिस्री उनकी सहायता को आएँगे, और इस प्रकार वे विश्वास करते थे कि वे हर शत्रु-शक्ति के विरुद्ध सुरक्षित हैं। अतः जब यहूदी इस झूठे भरोसे से मतवाले हो गए थे, तब भविष्यद्वक्ता विवश हुआ कि न केवल बहुत से शब्दों में इस विषय का विस्तार करे, वरन् परमेश्वर को न्यायी के रूप में भी प्रस्तुत करे।

अतः वह यहाँ अपने शब्दों में नहीं बोलता, परन्तु कहता है, सेनाओं के यहोवा, इस्राएल के परमेश्वर ने कहा है, देखो, मैं, इत्यादि। यह बोलने की ऐसी रीति थी जो उससे कहीं अधिक प्रभावशाली थी, मानो भविष्यद्वक्ता ने अपने ही नाम से वह दोहराया हो जो परमेश्वर ने उसे सौंपा था; और फिर भी यहूदी विचलित न हुए: तौभी बोलने की यह रीति उनकी कठोरता को तोड़ने के योग्य थी। फिर वह कहता है, देखो, मैं भीड़ की सुधि लूँगा, इत्यादि। शब्द {,}אמוןamun को यहाँ {,}המוןemun के अर्थ में लेना चाहिए; {,}אaleph, {,}ה he के स्थान पर रखा गया है; यद्यपि कुछ लोग इसका अनुवाद "राजा" करते हैं, परन्तु अनुचित रूप से: मैं उस भीड़ की सुधि लूँगा जो अलेक्ज़ेन्ड्रिया से है। हम जानते हैं कि यह मिस्र का एक प्रसिद्ध नगर था, यद्यपि तब तक उसका यह नाम नहीं पड़ा था; क्योंकि सिकन्दर, जिसने उसे अपने नाम से पुकारा, तब तक जन्मा भी न था; परन्तु उसका पुराना नाम {,}נאna था, और इब्रानी लोग उसे इसी नाम से पुकारते थे। बाद के समय में उसका नाम बदल दिया गया और वह अलेक्ज़ेन्ड्रिया कहलाया।

परन्तु यहाँ अंश के द्वारा सम्पूर्ण का वर्णन है, क्योंकि भविष्यद्वक्ता ने सारे मिस्र को सम्मिलित किया; जो सामान्य है वह विशेष के अन्तर्गत समाहित है; क्योंकि परमेश्वर ने मिस्र के अन्य नगरों को भी नहीं छोड़ा; और प्रसंग से प्रकट है कि यह भविष्यद्वाणी उस देश के सब भागों तक फैली हुई थी, उसका एक कोना भी, छोटे से छोटा भी, अपवाद न था। परन्तु चूँकि यह सम्भव था कि अन्य नगरों के नष्ट होने पर भी अलेक्ज़ेन्ड्रिया सुरक्षित बचा रहे, इसलिए यहाँ उसका विशेष रूप से उल्लेख किया गया है, मानो उसने कहा हो कि मिस्र में कुछ भी सुरक्षित न रहेगा। देखो, वह कहता है, मैं भीड़ की सुधि लूँगा, इत्यादि। वह एक अत्यन्त घनी आबादीवाला नगर था, जैसा हम अन्यजाति लेखकों से जानते हैं; और इसी कारण वह घमण्ड से भरा हुआ था, क्योंकि जब उनके पास मानो उसी अनुपात की सेना थी तो वे उसे पर्याप्त सुरक्षित समझते थे।

परन्तु भविष्यद्वक्ता इस व्यर्थ घमण्ड का उपहास करता है, और कहता है कि अलेक्ज़ेन्ड्रिया के लोगों की विशाल संख्या कसदियों को उस पर अधिकार करने से रोकने में कुछ काम न आएगी।

मैं सुधि लूँगा, वह कहता है, सारी प्रजा की, और फिर फ़िरौन और मिस्र की। अब हम स्पष्ट देखते हैं कि जिस नगर का नाम लिया गया वह प्रमुख नगर था, और उसकी भीड़ का स्पष्ट उल्लेख इसलिए किया गया कि मिस्री जान लें कि वे विनाश से बच नहीं सकते, क्योंकि उनका युद्ध मनुष्यों से नहीं, वरन् परमेश्वर से था; क्योंकि जब तक वे केवल कसदियों पर दृष्टि करते रहे, तब तक वे निश्चिन्त बने रहे। परन्तु भविष्यद्वक्ता उन्हें उनकी तन्द्रा से जगाता है, और कहता है कि उन्हें यह नहीं देखना था कि कसदी अपने बल से क्या कर सकते हैं, क्योंकि वे परमेश्वर की ध्वजा के नीचे युद्ध करेंगे, और उसकी अगुवाई में बिना किसी कठिनाई के सारे मिस्र में घुस जाएँगे। इसलिए वह कहता है, मैं फ़िरौन और मिस्र की सुधि लूँगा।

वह आगे कहता है, और उसके देवताओं की। हम जानते हैं कि वह देश अन्धविश्वासों में अत्यन्त लीन था, कि मिस्रियों ने स्थूल और लज्जाजनक भ्रान्तियों को आत्मसात कर लिया था, यद्यपि अन्यथा वे अपनी बुद्धि और ज्ञान के लिए विख्यात थे। परन्तु परमेश्वर ने उन्हें पागलपन से मारा था, यहाँ तक कि वे लगभग निर्बुद्धि पशुओं के समान हो गए थे। इसके अतिरिक्त, चूँकि वे सोचते थे कि उनकी मूर्तियों में उन्हें पूर्ण सुरक्षा प्राप्त है, इसलिए भविष्यद्वक्ता इस भरोसे को झकझोर देता है, और घोषणा करता है कि परमेश्वर न केवल मनुष्यों का, वरन् मूर्तियों का भी न्यायी होगा। क्योंकि हम जानते हैं कि मनुष्य परमेश्वर की धमकियों के विरुद्ध या तो अन्धविश्वास से या अपने बल के भरोसे से अपने आप को दृढ़ करते हैं: जब तक वे संसार पर निर्भर रहते हैं, तब तक वे सब ओर से आशा के कुछ आधार बटोरते रहते हैं; और इसी कारण वे सोचते हैं कि परमेश्वर की इच्छा के विरोध में होते हुए भी वे सुरक्षित रहेंगे। भविष्यद्वक्ता इस मूर्खता को गिरा देता है जब वह कहता है, देखो, मैं अलेक्ज़ेन्ड्रिया की भीड़ की सुधि लूँगा, और आगे कहता है, मैं मिस्र के देवताओं की सुधि लूँगा। चूँकि अविश्वासी, जब पाते हैं कि सांसारिक सहायताएँ उनके लिए पर्याप्त नहीं हैं, तब परमेश्वर की ओर भागते तो हैं, परन्तु उचित रीति से नहीं, क्योंकि वे अपने मूर्खतापूर्ण विचारों में व्यर्थ हो जाते हैं; इसी कारण भविष्यद्वक्ता मिस्र की मूर्तियों को धमकाता है।

वह आगे कहता है, उसके राजाओं की। मिस्र में तो एक ही राजा था, फिर वह राजाओं का उल्लेख क्यों करता है? इसकी व्याख्या उत्तराधिकारियों के रूप में की जा सकती है; परन्तु मैं यहाँ "राजाओं" से क्षत्रपों और प्रधानों का अर्थ लेना अधिक उचित समझता हूँ, क्योंकि हम जानते हैं कि वह राज्य अत्यन्त धनी था, और उसमें बहुत से लोग राजाओं के तुल्य थे। इसलिए मैं सोचता हूँ कि भविष्यद्वक्ता ने मिस्र के प्रधानों और क्षत्रपों को इस ऊँची उपाधि से विभूषित किया; और वह इस मत की पुष्टि उस बात से करता है जो तुरन्त बाद आती है, अर्थात्—फ़िरौन और जो उस पर भरोसा रखते हैं। वह फ़िरौन का नाम दोहराता है, और जब वह कहता है कि वह उनकी सुधि लेगा जो उस पर भरोसा रखते हैं, तो मुझे सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता उन्हीं की ओर संकेत करता है जिन्हें उसने पहले निर्दिष्ट किया था

अब हम वास्तविक अर्थ समझते हैं, कि यद्यपि फ़िरौन के पास बहुत से रक्षा-साधन थे, मनुष्यों की बड़ी भीड़ से वह दृढ़ किया गया था, और उसके पास शक्तिशाली क्षत्रप भी थे, तौभी जब उसे परमेश्वर से युद्ध करना पड़ेगा तब यह सब मुरझानेवाला और क्षणभंगुर सिद्ध होगा: और परमेश्वर यहाँ घोषणा करता है कि वह कसदियों का मार्गदर्शन और संचालन करते हुए सारे युद्ध का सेनापति होगा। अब आगे लिखा है,—

यिर्मयाह 46:26

26. मैं उनको नबूकदनेस्सर नामक बाबुल के राजा और उसके कर्मचारियों के वश में कर दूँगा जो उनके प्राण के खोजी हैं। उसके बाद वह प्राचीनकाल की नाईं फिर बसाया जाएगा, यहोवा की यही वाणी है।

26. Et dabo illos in manum quaerentium animam ipsorum, et in manum Nabuchadnezer regis Babylonis, et in manum servorum ejus, et postea habitabitur sicut diebus antiquis, dicit Jehova.

यिर्मयाह उसी विषय को आगे बढ़ाता है, और परमेश्वर के नाम से बोलता रहता है, ताकि वह अन्यथा मन्द मनों पर अधिक प्रबल छाप डाल सके; मैं उन्हें, वह कहता है, शत्रुओं के हाथ में, और वह भी प्राणघातक शत्रुओं के हाथ में कर दूँगा; क्योंकि हम अन्यत्र कह चुके हैं कि "प्राण का खोजी होना" उसे न छोड़ना है। अतः यहाँ कसदी सेना की क्रूरता व्यक्त की गई है, मानो उसने कहा हो कि वे मिस्रियों के प्राणघातक शत्रु होंगे।

और वह अपने आप को और भी स्पष्ट करता है, और कहता है, बाबुल के राजा के हाथ में, और उसके कर्मचारियों के हाथ में, अर्थात् केवल नबूकदनेस्सर ही मिस्र पर विजयी न होगा, वरन् उसके कर्मचारी भी, जो और भी अधिक अपमानजनक था।

अन्त में एक प्रतिज्ञा जोड़ी गई है, उस अन्यजाति पर अनुग्रह दिखाने के लिए नहीं, परन्तु इसलिए कि परमेश्वर दिखाए कि वह मिस्रियों पर इतना दयालु होगा कि उन्हें पूर्णतः नष्ट न करेगा। वह बसाया जाएगा, वह कहता है, जैसे प्राचीन दिनों में। यहेजकेल कहता है कि वह राज्य छोटा और दीन अथवा तुच्छ होगा। (यहेजकेल 29:14, 15।) परन्तु हमारा भविष्यद्वक्ता मिस्र को वही समृद्धि प्रतिज्ञा करता जान पड़ता है जो उसके विनाश से पहले उसकी थी।

हम कह चुके हैं कि मिस्रियों से पुनःस्थापना की प्रतिज्ञा इसलिए नहीं की गई कि परमेश्वर उनके प्रति शान्त हो गया था, परन्तु इसलिए कि उसका अभिप्राय यह था कि उसकी दया उन न्यायदण्डों में भी प्रकट हो जो उसने परदेशी जातियों पर भी चलाए; और फिर, यह भविष्यद्वाणी की पुष्टि का साधन बना, जब नष्ट हो जाने के बाद मिस्र को वह पुनःस्थापना प्रदान की गई जिसकी भविष्यद्वाणी यिर्मयाह ने की थी। अतः भविष्यद्वक्ता की कही हुई बात की सच्चाई इन दो परिवर्तनों के द्वारा उससे कहीं अधिक प्रकट हुई, जितनी तब होती जब वह केवल इतना कहता, "परमेश्वर मिस्र को नष्ट करेगा।" अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने मिस्र की भावी दशा के विषय में क्यों कहा। आगे लिखा है,—

यिर्मयाह 46:27

27. परन्तु हे मेरे दास याकूब, तू मत डर, और हे इस्राएल, विस्मित न हो; क्योंकि मैं तुझे और तेरे वंश को बँधुआई के दूर देश से छुड़ा ले आऊँगा। और याकूब लौटकर चैन और सुख से रहेगा, और कोई उसे डराने न पाएगा।

27. Et tu ne timeas, serve mi Jacob, et ne expavescas (vel, frangaris animo, {}חתתsignificat conteri et frangi, sed magis refertur ad animum metaphorice, ne ergo frangaris animo,) Israel; quia ecce ego servo te a longinquo, et semen tuum e terra captivitatis ipsorum; et revertetur Jacob et quiescet et securus erit, et nemo exterrebit (nemo qui exterreat, ad verbum.)

भविष्यद्वक्ता अब अपना वचन इस्राएलियों की ओर मोड़ता है; क्योंकि हम कह चुके हैं कि वह अन्यजातियों का शिक्षक नियुक्त नहीं किया गया था। अतः अन्यजातियों के विषय में जो कुछ भी उसने कहा, उसका सम्बन्ध उसकी अपनी प्रजा की भलाई से था; और इसी उद्देश्य से, जैसा हम कह चुके हैं, भविष्यद्वक्ताओं ने परमेश्वर के न्यायदण्डों के विषय में अपनी भविष्यद्वाणियों को सब जातियों तक फैलाया; क्योंकि अन्यथा इस्राएली निराश हो जाते, मानो उनकी दशा दूसरों की दशा से भी बुरी हो: "इसका क्या अर्थ हो सकता है? परमेश्वर ने हमें अपनी निज प्रजा के रूप में चुना है; और इस बीच केवल हम ही दुःखी हैं: परमेश्वर अपनी सारी कठोरता हम पर उण्डेलता है, और फिर भी अविश्वासियों को छोड़ देता है। हमारे लिए यह अच्छा होता कि वह हमें पूरी रीति से त्याग देता, क्योंकि जो वाचा उसने हमारे साथ बाँधी है वह हमें दूसरों से अधिक दुःखी ही बनाती है।" इस प्रकार दुःखी इस्राएली सिर के बल निराशा में जा गिरते, यदि समय पर उन्हें राहत देने के लिए कुछ न किया जाता। और फिर भविष्यद्वक्ता, या यों कहें कि परमेश्वर का आत्मा जो उनके द्वारा बोला, एक और बात पर ध्यान देता था; क्योंकि यदि कुछ भी पहले से न बताया गया होता, तो वे उन न्यायदण्डों को, जो परमेश्वर ने उनके सब पड़ोसियों पर चलाए, आँखें मूँदकर अनदेखा कर देते, क्योंकि जो कुछ यशायाह, यिर्मयाह और यहेजकेल ने भविष्यद्वाणी की थी वह सब पूरा हुआ। यदि वे मिस्र के, पलिश्तियों और मोआबियों के विनाश के विषय में चुप रहते, तो प्रजा अपनी जड़ता के कारण परमेश्वर के न्यायदण्डों पर विचार न करती, वरन् सोचती कि यह सब संयोग से हुआ है। अतः भविष्यद्वक्ताओं ने मानो दर्पण में परमेश्वर की सामर्थ्य को प्रस्तुत किया, ताकि इस्राएली जान लें कि वह सारे संसार और हर एक जाति तक फैली हुई है।

यही कारण है कि यिर्मयाह अब अपना वचन चुनी हुई प्रजा की ओर मोड़ता है, और कहता है, हे मेरे दास याकूब, मत डर। वह अब भी परमेश्वर के नाम से बोलता है। अब परमेश्वर याकूब को अपना दास आज्ञाकारिता के आधार पर नहीं, वरन् इसलिए कहता है कि उसने उसे चुन लिया था।

अतः इस शब्द के द्वारा परमेश्वर लेपालकपन के अनुग्रह को प्रस्तुत करता है, न कि प्रजा की आज्ञाकारिता को, क्योंकि हम जानते हैं कि वे कितने हठीले और आज्ञा न माननेवाले थे; हम जानते हैं कि वे निरन्तर जूआ उतार फेंकते थे, कि वे मानो स्वयं परमेश्वर का अपमान करते थे; दासों के योग्य रीति से शान्तिपूर्वक उसके अधिकार के अधीन होने से वे बहुत दूर थे। अतः यहाँ इस्राएलियों की आज्ञाकारिता की प्रशंसा नहीं की गई, परन्तु वह चुनाव प्रस्तुत किया गया है जिसके द्वारा परमेश्वर ने उन्हें अन्य जातियों से अलग कर लिया था। तो फिर याकूब परमेश्वर का दास कैसे था? इसलिए नहीं कि उसने अपने गुणों से उस आदर को कमाया था, परन्तु इसलिए कि परमेश्वर को यह भाया कि वह उसे सेंत-मेंत अपने लिए चुन ले। इसी प्रकार दाऊद भी कहता है, "मैं तेरा दास, और तेरी दासी का बेटा हूँ," (भजन संहिता 116:16)

उसका अर्थ यह है कि वह मानो एक पैतृक दास था, जो अपनी माता के गर्भ में आने से पहले ही परमेश्वर को समर्पित किया जा चुका था। परन्तु चूँकि बोलने की यह रीति प्रायः आती है, इसलिए मैं थोड़े ही शब्दों में इसे छोड़ देता हूँ।

हे याकूब, मत डर, वह कहता है, और हे इस्राएल, मन में टूट न जा। यहाँ दो नाम तो प्रयुक्त हुए हैं, परन्तु परमेश्वर प्रायः अपनी प्रजा को इसी प्रकार सम्बोधित करता है; और क्यों? क्योंकि मैं तेरा उद्धार करूँगा। अब हम देखते हैं कि परमेश्वर ने याकूब को अपना दास क्यों कहा, अर्थात् इसलिए कि चुनी हुई प्रजा का उद्धार इसी विशेष अधिकार पर निर्भर था कि परमेश्वर ने उन्हें अपने लिए चुन लिया था; मैं दूर से तेरा उद्धार करूँगा, वह कहता है। जैसा सब जानते हैं, दस गोत्र पहले ही दूर खदेड़ दिए गए थे, और यहूदा का एक भाग बँधुआई में ले जाया जा चुका था। दूरी ने लौटने की आशा छीन ली थी। इसलिए परमेश्वर यहाँ घोषणा करता है कि जब उसे अच्छा लगे तब अपनी प्रजा को पुनःस्थापित करने में लम्बी दूरी उसके लिए कोई बाधा न होगी; देखो, मैं तेरा उद्धार करूँगा। इस प्रकार वह इस आपत्ति का निवारण करता है; "क्या! तो फिर परमेश्वर हमें इस प्रकार परदेशों में क्यों खदेड़ा जाने देता है? हम अपने ही देश में क्यों न ठहरे?" परमेश्वर, वह कहता है, सबसे दूर के स्थानों में भी तेरा उद्धार करने में उससे कम समर्थ न होगा, जितना वह तब होता जब तू अपनी जन्मभूमि में और अपने ही निवास में बना रहता। और वह आगे कहता है, और तेरे वंश को, उनकी बँधुआई के देश से।

इससे हम सीखते हैं कि यद्यपि भविष्यद्वक्ता ने प्रजा की सांसारिक पुनःस्थापना के विषय में कहा, तौभी उसकी दृष्टि ऊँची और बड़ी बातों पर भी थी, अर्थात् यह कि बन्दी परमेश्वर की दया पर टिके रहें, और विश्वास करें कि वह मरने के बाद भी उन पर कृपालु रहेगा। अतः यह स्थल दिखाता है कि परमेश्वर की सन्तानों की आशा इसी जीवन तक सीमित नहीं है, वरन् आगे तक फैली हुई है, ताकि वे जान लें कि मृत्यु के बाद भी परमेश्वर उन पर कृपालु रहेगा, और वे उसके अनुग्रह के निश्चय से अपने आप को सँभाले रहें; क्योंकि अन्यथा यह प्रतिज्ञा कि परमेश्वर उनकी मृत्यु के बाद उनकी सन्तानों को पुनःस्थापित करेगा, असंगत होती। "परन्तु वह हमसे क्यों अप्रसन्न बना रहता है? वह हमें शीघ्र क्यों पुनःस्थापित नहीं करता?" यहूदी यह आपत्ति उठा सकते थे; परन्तु भविष्यद्वक्ता उन्हें स्मरण दिलाता है कि यद्यपि उन्हें तुरन्त अपने देश में लौटाया न जाएगा, तौभी परमेश्वर की वाचा स्थिर बनी रहेगी, और सत्तर वर्ष के बाद उसकी दृढ़ता प्रकट होगी।

अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने क्यों कहा, याकूब लौटेगा और चैन से रहेगा, और निश्चिन्त रहेगा। मुझे आश्चर्य होता है कि कुछ लोगों ने अन्तिम शब्दों का अनुवाद "और सुखी रहेगा" किया है, क्योंकि {,}שאנןshanun का अर्थ है निश्चिन्त होना, अथवा विश्राम करना; और फिर भविष्यद्वक्ता स्वयं स्पष्ट करता है, और कोई डरानेवाला न होगा। हम तो जानते हैं कि सुख का मुख्य भाग यही है कि कोई भय हमें व्याकुल न करे, कि हमारे मन स्थिर और शान्त दशा में हों। इसके अतिरिक्त, इन शब्दों के द्वारा वह परमेश्वर के अनुग्रह की निरन्तरता का संकेत करता है, मानो उसने कहा हो कि उसका अनुग्रह न केवल प्रजा को बँधुआई से लौटाने में प्रकट होगा, वरन् दुःखियों को इस रीति से पुनःस्थापित करने में भी कि उन्हें पूर्ण और स्थायी सुख प्रदान करे। आगे लिखा है,—

यिर्मयाह 46:28

28. हे मेरे दास याकूब, यहोवा की यह वाणी है, कि तू मत डर, क्योंकि मैं तेरे साथ हूँ। और यद्यपि मैं उन सब जातियों का अन्त कर डालूँगा जिनमें मैं ने तुझे बरबस भेज दिया है, तौभी तेरा अन्त न करूँगा। मैं तेरी ताड़ना विचार करके करूँगा, परन्तु तुझे किसी प्रकार से निर्दोष न ठहराऊँगा।

28. Tu ne timeas, serve mi Jacob, dicit Jehova, quia ego tecum, quia faciam consumptionem in cunctis gentibus ad quas te expulero illuc (est supervacuum {);}שמה et tecum non faciam consumptionem; et castigabo te in judicio, et excidendo non excidam te (alii vertunt, non faciam te innocentem, sed male, ut postea dicemus.)

वह वही बात दोहराता है, और इसमें आश्चर्य नहीं, क्योंकि ऐसी निराशाजनक परिस्थितियों में प्रजा के मनों को उठाना और सँभाले रखना सहज न था, ताकि वे धीरज के साथ अपने छुटकारे के समय की बाट जोहें। उसे उन्हें मानो सबसे निचली गहराइयों से उजियाले में उठाना था, क्योंकि बँधुआई मृत्यु से कुछ ही कम थी, जैसा यहेजकेल कहता है, (यहेजकेल 37) जो दिखाता है कि उनके बीच यह आम कहावत थी, "क्या परमेश्वर मुर्दों को उनकी कब्रों से जिला सकता है?"

जब कभी भविष्यद्वक्ताओं ने प्रतिज्ञा की कि परमेश्वर उनका छुड़ानेवाला होगा, तब वे कहते थे, "अहा, क्या परमेश्वर हमें फिर उठाएगा? यह सब कोरी कहानी है।" इसी कारण परमेश्वर ने मरी हुई और सूखी हड्डियों को आज्ञा दी कि वे उठें और अपनी खाल और मांस धारण करें, कम से कम यह भविष्यद्वक्ता को एक दर्शन में दिखाया गया।

अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने वह बात दो बार क्यों दोहराई जो अपने आप में पर्याप्त स्पष्ट थी, हे मेरे दास याकूब, मत डर, अर्थात् इसलिए कि वे परमेश्वर की दया को तब तक ग्रहण नहीं कर सकते थे जब तक वे अपनी बड़ी कठिनाइयों से दृष्टि हटा न लें, और फिर इसलिए कि उनके लिए यह पर्याप्त न था कि वे इस प्रतिज्ञा को एक बार ग्रहण कर लें, जब तक वे निरन्तर उस पर टिके न रहें। इसलिए भविष्यद्वक्ता, उन्हें दृढ़ता से आशा रखने को प्रोत्साहित करने, और साथ ही उन्हें धीरजवन्त बनाने और स्थिर करने के लिए, दो बार कहता है, हे मेरे दास याकूब, मत डर। फिर वह आगे कहता है, मैं तेरे साथ हूँ। और यह प्रतिज्ञा, जैसा कहा जा चुका है, सेंत-मेंत लेपालकपन पर निर्भर है, क्योंकि परमेश्वर ने उस प्रजा को अपने लिए चुना था, ताकि वे याजकों का राज्य हों।

इसके बाद वह आगे कहता है, क्योंकि मैं सब जातियों के बीच अन्त कर डालूँगा, इत्यादि। इस तुलना के द्वारा वह सारे शोक को कोमल और हलका करता है: क्योंकि प्रजा की दशा कितनी ही कड़वी क्यों न हो, फिर भी जब वे विचार करते कि परमेश्वर उनके साथ अन्य मनुष्यों की अपेक्षा अधिक कोमलता से व्यवहार करेगा, तो यह भरपूर सान्त्वना का कारण था। अतः भविष्यद्वक्ता, यह देखकर कि यहूदी अपने मनों में कड़वाहट रहते हुए परमेश्वर के अनुग्रह को ग्रहण नहीं कर सकते थे, यहाँ दिखाता है कि परमेश्वर उनकी ताड़ना कितनी ही कठोरता से क्यों न करे, तौभी वह उन पर अन्य जातियों की अपेक्षा अधिक दयालु होगा: वह कैसे? क्योंकि, वह कहता है, मैं अन्य जातियों के बीच अन्त कर डालूँगा, अर्थात् वे बिना किसी उपाय के नष्ट हो जाएँगी; मानो उसने कहा हो कि जो घाव वह अन्य जातियों को देगा वह प्राणघातक होगा, परन्तु अपनी चुनी हुई प्रजा का वह अन्त न करेगा।

यह उस बात से मेल खाता नहीं जान पड़ता जो उसने पहले कही थी, कि मिस्र प्राचीन दिनों के समान फिर बसाया जाएगा। मिस्र की पुनःस्थापना यहाँ भविष्यद्वक्ता के वचनों से कैसे संगत हो सकती है? इसका मैं यह उत्तर देता हूँ कि जब परमेश्वर अविश्वासियों के प्रति अपनी कठोरता को कम करता है, तब भी वह उन पर कृपालु नहीं होता, और न उन पर दिखाई गई सहनशीलता उसके पितृ-अनुग्रह का प्रमाण है, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ। अतः यद्यपि उनके राज्य के विनाश के बाद कुछ मिस्री जीवित बचे रहे, तौभी परमेश्वर ने मिस्र में अन्त कर डाला, क्योंकि उस समय के बाद भी वहाँ उसका प्रतिशोध बना रहा। अब, जब हम चुनी हुई प्रजा पर आते हैं, तो परमेश्वर बहुत से स्थानों में कहता है, मैं अन्त न करूँगा। यदि कोई केवल शब्दों पर ही ध्यान दे, तो यहाँ फिर कुछ विरोधाभास जान पड़ता है; क्योंकि कहा गया है कि परमेश्वर ने अपनी चुनी हुई प्रजा का अन्त कर डाला: परन्तु यह तब हुआ जब उसने प्रजा के सारे समूह को नष्ट कर दिया; और वह अन्त बाहरी था; उसी समय कोई छिपी हुई जड़ सदा बची रही।

संक्षेप में, जब परमेश्वर कहता है कि वह अन्यजातियों का अन्त कर डालता है, तो यह समझना चाहिए कि परमेश्वर उन्हें जड़ से शापित करता है। जैसे कोई पेड़ खड़ा रहता है जबकि उसकी जड़ मर चुकी होती है; वैसे ही अन्यजातियाँ भी मानो खड़ी रहती हैं, परन्तु इस बीच वे भस्म हो जाती हैं, क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें अनन्त विनाश के लिए ठहरा दिया है। परन्तु परमेश्वर की सन्तानों का अन्त तब कहा जाता है जब ऊपर कुछ दिखाई नहीं देता, सिवाय कदाचित् एक सूखे ठूँठ के; तौभी एक जीवित जड़ बची रहती है, जो फिर बढ़ेगी, और उससे डालियाँ निकलेंगी। इससे हम देखते हैं कि परमेश्वर कैसे सब अविश्वासियों का अन्त कर डालता है, और फिर भी अपनी चुनी हुई प्रजा का अन्त नहीं करता।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अनुग्रह कर कि जैसे तू ने यह गवाही दी है कि तू हमारा पिता होगा, और हमें अपने लेपालकपन की बयाना के रूप में अपना एकलौता पुत्र दिया है,—हाँ, अनुग्रह कर कि हम तेरी प्रतिज्ञा पर भरोसा रखते हुए कभी सन्देह न करें, उस समय भी जब तू हमारी कठोर ताड़ना करता है, वरन् यह निश्चय रखें कि अन्त में तू हम पर दया करेगा, और इस प्रकार हम तेरी दया की शरण में भागना कभी न छोड़ें, और यों तेरे अधीन हों, और अपने आप को सुधारे जाने दें; और इस बीच यह आशा हमें सँभाले रहे, और हमारे सब शोकों को हलका करे, ताकि हम अपने सब दुःखों में भी सदा तेरे नाम की महिमा करते रहें, उसी तेरे पुत्र हमारे प्रभु के द्वारा।—आमीन।

एक सौ अड़सठवाँ व्याख्यान

कल हमने समझाया था कि अन्त न करने का क्या अर्थ है। अर्थ यह है कि कभी-कभी अपनी कलीसिया के प्रति परमेश्वर का प्रतिशोध ऐसा होता है कि वह भस्म होती हुई जान पड़ती है, जबकि फिर भी कोई छिपी हुई आशा बची रहती है, क्योंकि परमेश्वर अपने लोगों को मानो मृत्यु में से उठाता है। हमने कहा था कि यिर्मयाह अब चुनी हुई प्रजा से जो प्रतिज्ञा करता है, उसे इसी अर्थ में समझना चाहिए: क्योंकि परमेश्वर इस्राएलियों और परदेशियों के बीच भेद करता है; क्योंकि जो वाचा उसने उनके साथ बाँधी थी उसके कारण वह उन्हें छोड़ देगा, यहाँ तक कि कुछ आशा बची रहे, यद्यपि कलीसिया स्वयं कुछ समय के लिए खोई हुई जान पड़ती थी।

और वह दूसरे शब्दों में अपने आप को स्पष्ट करता है, मैं तेरी ताड़ना, वह कहता है, न्याय से करूँगा; क्योंकि न्याय से ताड़ना करना संयम बरतना है, ताकि कठोरता विनाश में न बदल जाए। दसवें अध्याय में यिर्मयाह यही बात कहता है, "हे यहोवा, मेरी ताड़ना कर, पर न्याय से; अपने क्रोध में नहीं।" अतः भविष्यद्वक्ता ने विश्वासयोग्य लोगों की ओर से अपने आप को परमेश्वर के कोड़ों के अधीन कर दिया, क्योंकि उनका सुधारा जाना उनके लिए लाभदायक था, क्योंकि यदि प्रभु उन्हें छोड़ देता, तो वे उसकी सहनशीलता का दुरुपयोग करते, और इस प्रकार अपने दुर्गुणों में सड़ जाते। इसलिए भविष्यद्वक्ता ने अपने आप को परमेश्वर के द्वारा ताड़ना पाने के लिए प्रस्तुत किया, परन्तु उसके क्रोध से बचने की विनती की, जिसे उसने न्याय के विरोध में रखा। इब्रानी में न्याय शब्द कई अर्थों में लिया जाता है; परन्तु उस स्थल में, जैसा मैंने वहाँ समझाया था, उसका अर्थ उचित माप, अथवा संयम है। जब परमेश्वर अविश्वासियों को दण्ड देता है, तो उस पर अत्यधिक कठोरता का दोष नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि वह सदा न्यायी है और उचित माप का ध्यान रखता है। परन्तु, जैसा मैं कह चुका हूँ, न्याय का अर्थ केवल खराई ही नहीं, वरन् परमेश्वर का पितृ-प्रेम भी है, जब वह दण्ड को ऐसा संयमित करता है कि वह उसके चुने हुओं के लिए औषधि और हितकारी बन जाए। इसलिए वह अपनी कलीसिया को संयम से दण्ड देने की प्रतिज्ञा करता है, न केवल इसलिए कि वह न्यायी है, वरन् इसलिए भी कि वह दया करके अपने लोगों को छोड़ देता है, और इस बात का ध्यान रखता है कि वे क्या सह सकते हैं, और उनके लिए क्या लाभदायक है।

अब इस स्थल पर विशेष ध्यान देना चाहिए, जिससे हम बड़ी सान्त्वना पा सकते हैं; क्योंकि यहाँ हमें सिखाया गया है कि हम पर लाए गए दण्ड अस्थायी हैं, और परमेश्वर उनकी ऐसी सीमाएँ ठहराता है जैसी वह हमारे लिए सर्वोत्तम जानता है: क्योंकि वह निराशा कहाँ से आती है जो अविश्वासियों को डुबो देती है, सिवाय इसके कि गहराई में डूबे हुए वे नहीं जानते कि परमेश्वर उन पर दयालु होगा, वरन् उसके क्रोध के सिवा और कुछ नहीं समझते? इसी कारण उनकी विपत्तियों और शोकों में उन्हें कोई सान्त्वना नहीं मिलती। अतः जब कभी अत्यधिक चिन्ता हमें घेर ले, अथवा हमारी विपत्तियाँ हमें निराशा की ओर धकेलें, तो आइए हम इस सान्त्वना की शरण लेना सीखें, अर्थात् यह कि जिन दण्डों से हमारी ताड़ना होती है वे केवल कुछ समय के लिए हैं।

इसके बाद वह आगे कहता है, और काट डालते हुए भी मैं तुझे काट न डालूँगा। कुछ लोग इसका दूसरा अनुवाद करते हैं, "मैं तुझे निर्दोष न ठहराऊँगा:" और कभी-कभी क्रिया को इस अर्थ में लेना पड़ता है; परन्तु यहाँ यह प्रसंग के उपयुक्त नहीं है, जब तक कि संयोजक को विरोधवाचक के रूप में अनूदित न किया जाए, "यद्यपि मैं तुझे निर्दोष न ठहराऊँगा, तौभी मैं पितृ-संयम के साथ तेरी ताड़ना करूँगा।" परन्तु चूँकि यह खींचतान जान पड़ता है, इसलिए मुझे सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता का अर्थ यह है कि ताड़ना संयमित होगी, क्योंकि परमेश्वर अपनी चुनी हुई प्रजा को पूर्णतः काट न डालेगा, उस व्याख्या के अनुसार जो मैंने इस पुस्तक के तीसवें अध्याय पर दी थी; और इस प्रकार भविष्यद्वक्ता उस बात की पुष्टि करता है जो मैं कह चुका हूँ, कि परमेश्वर अपनी सन्तानों को छोड़ देता है, क्योंकि वह उन्हें क्लेशों के द्वारा शुद्ध करता है, जैसे सोना आग में पिघलाया और शुद्ध किया जाता है, ताकि दण्ड उनके विनाश में न बदल जाए। अब सैंतालीसवाँ अध्याय आता है:

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