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यिर्मयाह 35
यिर्मयाह 35:1-7
1. यहूदा के राजा योशिय्याह के पुत्र यहोयाकीम के दिनों में यहोवा की ओर से यह वचन यिर्मयाह के पास पहुँचा,
1. Sermo qui factus fuit ad Jeremiam a Jehova diebus Jehoiakim filii Joziae regis
Jehudah, dicendo,
2. रेकाबियों के घराने के पास जाकर उन से बातें कर, और उन्हें यहोवा के भवन की एक कोठरी में ले जाकर दाखमधु पिला।
2. Vade ad domum Rechabitarum, et dices illis, (et loquere cum ipsis) et adducas eos in domum Jehovae ad unum cubiculorum, et popina illis vinum.
3. तब मैं ने याजन्याह को, जो यिर्मयाह का पुत्र और हबस्सिन्याह का पोता था, और उसके भाइयों और उसके सब पुत्रों को, अर्थात् रेकाबियों के सारे घराने को साथ लिया;
3. Et sumpsi Jaazaniah filium Jeremiae, filii Habazaniiae, et fratres ejus, (hoc est, cognatos) et omnes filios ejus, totam domum Rechabitarum;
4. और मैं उनको यहोवा के भवन में, यिग्दल्याह के पुत्र हानान के पुत्रों की कोठरी में ले आया, जो परमेश्वर का एक जन था; वह कोठरी हाकिमों की कोठरी के पास थी, और शल्लूम के पुत्र द्वारपाल मासेयाह की कोठरी के ऊपर थी;
4. Et adduxi eos in domum Jehovae ad cubiculum filiorum Chanan filii Igdaliae, viri Dei, quod erat juxta cubiculum principum, quod erat e super cubiculo Maassaiae filii Selum custodis thesauri (alii vertunt, liminis, sed sine ratione, ut milhividetur)-
5. और मैं ने रेकाबियों के घराने के पुत्रों के आगे दाखमधु से भरे हुए हंडे और कटोरे रखकर उन से कहा, दाखमधु पीओ।
5. Et posui in conspectu filiorum domus Rechabitarum (vel, coram filiis domus
Rechabitarum) scyphos plenos vino, et calices, et dixi, Bibite vinum.
6. परन्तु उन्होंने कहा, हम दाखमधु न पीएँगे; क्योंकि रेकाब के पुत्र योनादाब ने, जो हमारा पुरखा था, हम को यह आज्ञा दी थी, कि तुम कभी दाखमधु न पीना, न तुम और न तुम्हारे पुत्र;
6. Et dixerunt, Non bibimus vinum, quia Jonadab filius Rechab, pater noster (vel, patris nostri) praecepit nobis, dicendo, Non bibetis vinum, vos et filii vestri, usque in seculum;
7. और न घर बनाना, न बीज बोना, न दाख की बारी लगाना, और न उनके अधिकारी होना; परन्तु जीवन भर तम्बुओं ही में रहना, जिस से जिस देश में तुम परदेशी हो, उस में बहुत दिन तक जीते रहो।
7. Et domos non aedificabitia, et semen non seretis, et vitem non plantabitis, et non erit vobis quicquam, quia (hoc est, quin potius) habitabitis in tabernaculis, cunctis diebus vestris, ut vivatis dies multos in superficie terrae in qua vos peregrini estis.
पहले यह ध्यान देना चाहिए कि जिस समय-क्रम में भविष्यद्वाणियाँ लिखी गईं, वह बनाए नहीं रखा गया है। इतिहास में दिनों और वर्षों का नियमित क्रम बनाए रखना चाहिए, परन्तु भविष्यद्वाणी के लेखों में यह इतना आवश्यक नहीं है, जैसा मैं तुम्हें पहले ही स्मरण दिला चुका हूँ। भविष्यद्वक्ता प्रचार कर चुकने के बाद, जो कुछ उन्होंने कहा था उसे एक सार में संक्षिप्त कर देते थे; उसकी एक प्रति प्रायः मन्दिर के द्वारों पर लगा दी जाती थी, ताकि जो कोई स्वर्गीय शिक्षा को जानने का इच्छुक हो वह उस प्रति को पढ़ सके; और बाद में वह अभिलेखागार में रख दी जाती थी। इन्हीं से वे पुस्तकें बनीं जो अब विद्यमान हैं। और जो मैं कहता हूँ, वह निश्चित और ज्ञात तथ्यों से जाना जा सकता है।
परन्तु अभी हम बहुत बातें न बढ़ाएँ, यह खण्ड दिखाता है कि यहाँ जोड़ी गई यिर्मयाह की भविष्यद्वाणी पिछले प्रवचन के बाद की नहीं थी, क्योंकि वह उस बात का वर्णन करता है जिसे कहने और करने की आज्ञा उसे यहोयाकीम के समय में दी गई थी, अर्थात् नगर के विनाश से पन्द्रह वर्ष पहले। इसलिये जो मैं ने कहा है वह स्पष्ट है, कि यिर्मयाह ने यह पुस्तक उस रूप में नहीं लिखी जिसमें वह अब है, वरन् उसके प्रवचन एकत्र करके समय-क्रम का ध्यान रखे बिना एक ग्रन्थ के रूप में बनाए गए। यही बात उन भविष्यद्वाणियों से भी जानी जा सकती है जिन्हें हम आगे पैंतालीसवें अध्याय से लेकर पचासवें अध्याय के अन्त तक देखेंगे।
राजा यहोयाकीम के अधीन यहूदा के राज्य की शक्ति इतनी क्षीण नहीं हुई थी कि वे अब भी घमण्ड से फूले न हों। सो जब उनकी निश्चिन्तता उन्हें भविष्यद्वक्ता के वचनों पर ध्यान देने से रोकती थी, तो आवश्यक था कि उनके सामने एक दृश्य चिह्न रखा जाए, जिस से वे लज्जित हों। अतः परमेश्वर का अभिप्राय यह दिखाना था कि उनकी हठधर्मिता कितनी अक्षम्य थी। इस भविष्यद्वाणी का यही उद्देश्य था। और भविष्यद्वक्ता को स्पष्ट आज्ञा दी गई कि वह रेकाबियों को एकत्र करे और उन्हें दाखमधु दे, ताकि प्रजा की हठ और भी अधिक लज्जाजनक दिखाई दे, क्योंकि वे परमेश्वर की आज्ञा मानने को किसी प्रकार प्रेरित न किए जा सके, जबकि रेकाबी अपने पिता के, जो एक नश्वर मनुष्य था और जिसे मरे लगभग तीन सौ वर्ष हो चुके थे, इतने आज्ञाकारी थे। रेकाबियों की उत्पत्ति ओबाद से और मूसा के ससुर यित्रो से हुई थी। कुछ लोग अवश्य ऐसा सोचते हैं कि ओबाद और यित्रो एक ही थे; परन्तु यह अनुमान मुझे सम्भव नहीं जान पड़ता। चाहे जो हो, व्याख्याकार सोचते हैं कि रेकाबी ओबाद के वंशज थे, जो मूसा और इस्राएलियों के पीछे चला आया था। और उनका मत पुष्ट होता प्रतीत होता है, क्योंकि यहाँ कहा गया है कि योनादाब ने उन्हें आज्ञा दी थी कि वे देश में परदेशियों के समान रहें।
उनसे एक निज भाग की प्रतिज्ञा तो अवश्य की गई थी, परन्तु जैसा पवित्रशास्त्र के बहुत से स्थानों से प्रकट होता है, उनके साथ विश्वासघात हुआ, क्योंकि वे गोत्रों के बीच इधर-उधर बिखेर दिए गए। अतः उन्होंने वैसा निज भाग नहीं भोगा जैसा उचित था और जिसके वे योग्य थे। और हम यह भी देखते हैं कि वे अन्य जातियों के बीच रहते थे।
योनादाब के विषय में, जिसका उल्लेख किया गया है, हम 2 राजा 10:15 में पढ़ते हैं कि वह बड़े नाम और प्रभाव का मनुष्य था, क्योंकि जब येहू राज्य करने लगा, तब उसने उसे अपना मित्र बना रखा था, यद्यपि वह परदेशी था। अतः वह इस्राएलियों के बीच अवश्य बड़े आदर का पात्र, और शक्ति और धन से सम्पन्न मनुष्य रहा होगा। और यह निश्चित है कि यह वही योनादाब था जिसके विषय में वहाँ पवित्र इतिहास बोलता है, क्योंकि वह रेकाब का पुत्र कहलाता है; और फिर भी उस समय से यहोयाकीम के राज्य तक तीन सौ वर्ष, या लगभग इतने, बीत चुके थे। इस कुल या जाति की उत्पत्ति के विषय में, पहला ओबाद था; उससे रेकाब हुआ, जिसका पुत्र योनादाब था, जो राजा येहू के समय में रहता था, और उसके रथ पर चढ़ा लिया गया कि वह मानो उसके निकट दूसरे स्थान पर हो, जब येहू की शक्ति अभी दृढ़ता से स्थापित नहीं हुई थी। परन्तु बाद में वे इस्राएल देश की निरन्तर विपत्तियों के कारण यरूशलेम को चले गए, क्योंकि वह निरन्तर लूटपाट का शिकार होता रहता था, और इसे हम आगे वृत्तान्त में देखेंगे। सो रेकाब के पुत्र किसी समय इस्राएल के राज्य में रहते थे; परन्तु जब नाना प्रकार के आक्रमणों ने देश को उजाड़ दिया, और अन्तिम विनाश निकट आ पहुँचा, तब वे अपने तम्बू छोड़कर यरूशलेम को चले गए; क्योंकि उन्हें न खेत जोतने की और न दाख की बारियाँ लगाने की अनुमति थी, जैसा हम आगे देखेंगे। इसलिये रेकाबी यरूशलेम नगर में रहते थे, जो उन्हें शत्रुओं के आक्रमणों और हिंसा से बचाता था; परन्तु उन्होंने दाखमधु से परहेज़ करने में, और न खेत और न दाख की बारियाँ जोतने-लगाने में, अपनी प्राचीन जीवन-रीति को बनाए रखा। उन्होंने भवनों में रहना अपने लिये उचित तो समझा, क्योंकि नगर में उन्हें कोई खाली स्थान न मिल सका जहाँ वे अपने तम्बू खड़े कर सकें: परन्तु यह विवशता से किया गया। इस बीच वे अपने पिता योनादाब की आज्ञा मानते रहे; और यद्यपि उसे मरे तीन सौ वर्ष हो चुके थे, तौभी वे अपने पिता की स्मृति का इतना आदर करते थे कि उन्होंने स्वेच्छा से दाखमधु से परहेज़ किया, और न केवल मितव्ययी वरन् कठोर जीवन बिताया।
अब भविष्यद्वक्ता को आज्ञा दी जाती है कि वह इन्हें मन्दिर में लाए, और उन्हें पीने के लिये दाखमधु दे। इस विषय में परमेश्वर का अभिप्राय मैं संक्षेप में समझा चुका हूँ, अर्थात् यह कि वह यहूदियों के सामने रेकाबियों का उदाहरण रखना चाहता था, ताकि वे लज्जित हों; क्योंकि उस घराने ने अपने पिता के मरने के बाद भी उसकी आज्ञा मानी, परन्तु यहूदी जीवते परमेश्वर की आज्ञा के अधीन होने को प्रेरित न किए जा सके, जो सब का एकमात्र पिता भी था। सो भविष्यद्वक्ता को आज्ञा दी गई कि वह उन्हें मन्दिर में लाए, और उनके सामने दाखमधु से भरे हुए कटोरे रखे, कि वे पीएँ। वह कहता है कि उन्होंने पीने से इनकार किया, और कारण यह बताया कि उनके पिता योनादाब ने उन्हें ऐसा करने से मना किया था। यह उदाहरण किस प्रकार लागू किया गया, यह हम आगे देखेंगे; क्योंकि सब कुछ एक ही समय में नहीं समझाया जा सकता।
आइए हम भविष्यद्वक्ता के वचनों पर विचार करें; वह कहता है कि यहोयाकीम के दिनों में वचन उसके पास पहुँचा, अर्थात् तब, जब वह बहुत वर्षों की परख से जान चुका था कि यहूदी कितने अदम्य थे, और उनकी उग्रता कितनी बड़ी थी। भविष्यद्वक्ता ने बहुत परिश्रम उठाया था, तौभी वे ऐसे वश में नहीं आए थे कि परमेश्वर के जूए के अधीन हों। इसलिये जब वे अब बहुत वर्षों से अपनी कठोरता के बहुत से प्रमाण दे चुके थे, तब परमेश्वर ने रेकाबियों को साक्षी के रूप में बुलाया, जिन्होंने अपने उदाहरण से सिद्ध किया कि यहूदी भविष्यद्वक्ता की आज्ञाओं के प्रति ऐसे विद्रोही और आज्ञा न माननेवाले होने के कारण अक्षम्य थे।
उसने कहा, रेकाब के घराने के पास जा, (हम कह चुके हैं कि वे उस समय यरूशलेम में रहते थे, और यह आगे प्रकट होगा) और उन्हें यहोवा के भवन में ले आ। परन्तु हमें यह पूछना चाहिए कि भविष्यद्वक्ता को किसी निजी घर के बजाय मन्दिर में उनके सामने दाखमधु रखने की आज्ञा क्यों दी गई। इसका कारण तो स्पष्ट है; क्योंकि परमेश्वर का अभिप्राय यह दिखाना था कि यहूदी कितने दुष्ट और हठीले थे, क्योंकि याजक भी, अपना कार्य करते समय को छोड़, दाखमधु से परहेज़ नहीं करते थे। व्यवस्था ने उन्हें उस समय दाखमधु से परहेज़ करने की आज्ञा दी थी; परन्तु लेवीय, जो मन्दिर की देखभाल करते थे, और याजक भी, जब वे अपने पद के कार्य में न लगे होते, तो दाखमधु पीने की उन्हें पूरी छूट थी। सो जब याजकों को मन्दिर में भी, अर्थात् याजकों के आँगन से लगी हुई कोठरियों में, दाखमधु पीने की अनुमति थी, तो क्या बहाना बनाया जा सकता था, जब रेकाबी, जो साधारण लोगों में से थे, और यहूदियों के बीच परदेशी भी थे, अपने पिता योनादाब की आज्ञा के अनुसार दाखमधु से इनकार करते थे? यदि परमेश्वर ने सारी प्रजा के लिये दाखमधु का उपयोग वर्जित किया होता, तो व्यवस्था अत्यधिक कठोर प्रतीत हो सकती थी; परन्तु परमेश्वर ने न केवल प्रजा को, वरन् याजकों को भी दाखमधु पीने की अनुमति दी थी; हाँ, कोई धार्मिक श्रद्धा उन्हें मन्दिर के निकट दाखमधु पीने से नहीं रोकती थी, जब वे अपने कार्य में न लगे होते। सो अब हम समझते हैं कि स्थान का उल्लेख क्यों किया गया है, अर्थात् भविष्यद्वक्ता यह क्यों बताता है कि वह रेकाबियों को मन्दिर में ले आया।
सो जा, और उन्हें यहोवा के भवन में, एक कोठरी में ले आ, और उन्हें पीने के लिये दाखमधु दे। हम कह चुके हैं कि कोठरियाँ याजकों के आँगन के निकट थीं; क्योंकि बहुत से लेवीय सदा पहरा देते हुए मन्दिर की रखवाली करते थे, और कुछ याजक भी। याजक, अपनी बारी की सेवा करते समय, केवल वे ही दाखमधु से परहेज़ करते थे; परन्तु लेवियों को व्यवस्था द्वारा दाखमधु पीने की अनुमति दी गई थी, और उन्हीं कोठरियों में, जो दोनों ओर मन्दिर से जुड़े हुए एक प्रकार के उपभवन थीं।
अब भविष्यद्वक्ता आगे कहता है कि उसने याजन्याह को लिया, जो एक प्रधान पुरुष, और मानो उस घराने का मुखिया था। और वह उसके पिता का नाम बताता है, अर्थात् हबस्सिन्याह का पुत्र यिर्मयाह; और फिर कहता है, उसका सारा घराना। आगे कहा गया है कि वह उन्हें मन्दिर में, यिग्दल्याह के पुत्र हानान के पुत्रों की कोठरी में ले आया, जो परमेश्वर का एक जन था। निःसन्देह भविष्यद्वक्ता ने एक सुप्रसिद्ध स्थान चुना, ताकि इसकी चर्चा सारे नगर में, वरन् सारे यहूदिया में फैल जाए, और यह भी कि स्थान की प्रतिष्ठा उस समाचार को विश्वसनीयता दे; क्योंकि हम जानते हैं कि जब कोई बात किसी अन्धेरे कोने में की जाती है, तो वह सन्दिग्ध या कल्पित समझी जा सकती है। परन्तु भविष्यद्वक्ता रेकाबियों को एक प्रतिष्ठित स्थान में, अर्थात् हानान के पुत्रों की कोठरी में ले आया। और फिर वह कहता है कि वह यिग्दल्याह का पुत्र था, जो परमेश्वर का एक जन था।
निःसन्देह इस मनुष्य का इतना आदर था कि जो कुछ वहाँ किया गया, उस पर कोई प्रश्न उठाने का साहस न करता। फिर वह आगे कहता है कि वह कोठरी हाकिमों की कोठरी के निकट थी, जो भण्डार के रखवाले की कोठरी के ऊपर थी। कुछ लोग अन्तिम शब्द का अनुवाद "प्रवेश-द्वार" करते हैं; परन्तु इस शब्द का अर्थ पात्र है; और यहाँ यह पवित्र सामग्री को सूचित करता है; और यहाँ वचन का परिवर्तन है, क्योंकि इस शब्द में मन्दिर के सब पात्र सम्मिलित थे। इस से हम देखते हैं कि वह स्थान चुना हुआ, अन्य स्थानों से श्रेष्ठ था, ताकि वह मानो एक प्रसिद्ध रंगमंच हो, और इस प्रकार भविष्यद्वाणी सब यहूदियों के बीच अधिक विश्वसनीयता पाए।
वह कहता है कि उसने उनके आगे दाखमधु रखा, और जब भरे हुए कटोरे उनके सामने रखे गए तो उनसे पीने का आग्रह किया। फिर वह आगे कहता है कि उन्होंने इनकार किया, हम दाखमधु न पीएँगे, क्योंकि हमारे पिता योनादाब ने हमें यह आज्ञा दी थी, कि तुम दाखमधु न पीना, न घर बनाना, न बीज बोना, न दाख की बारियाँ लगाना, और न कोई ऐसी वस्तु अपनी करके रखना। हम देखते हैं कि रेकाबियों को उनके पिता ने चार बातों की आज्ञा दी थी: दाखमधु न पीना, खेत न जोतना, और दाख की बारियाँ न लगाना, — ये तीन थीं; और चौथी यह थी कि घर न बनाना, वरन् तम्बुओं से सन्तुष्ट रहना। यहाँ एक प्रतिज्ञा भी जोड़ी गई है, जिस से जिस देश में तुम परदेशी हो उस में बहुत दिन तक जीते रहो। सो योनादाब ने अपने पुत्रों और अपने वंश से दीर्घ आयु की प्रतिज्ञा की, यदि वे उसके उपदेशों को मानें, अर्थात् जीवन भर दाखमधु के बिना रहें, और कुछ भी अपने अधिकार में न रखें, और न घर बनाएँ। उनका यह कहना कि उन्होंने अपने पिता की आज्ञा मानी है, इस पर आगे विचार किया जाएगा, क्योंकि हम सब कुछ एक साथ नहीं समझ सकते।
325 Sept., Vulg. और Syr. ने ऐसा ही अनुवाद किया है; और इस शब्द, {,{סף, का सामान्यतः यही अर्थ होता है, ओसारा, प्रवेश-द्वार या डेवढ़ी। — सं.
परन्तु अब हम देखें कि क्या योनादाब ने अपने वंश को दाखमधु पीने और भूमि जोतने से मना करके ठीक किया। खेती अपने आप में जीविका की एक ऐसी रीति है जो न केवल ईमानदार और निर्दोष है, वरन् महत्त्वाकांक्षा, छल और लूट से भी दूर है: संक्षेप में, यह सब प्रकार की जीविकाओं में सबसे सरल और सबसे निर्दोष जान पड़ती है। तब इस विषय में योनादाब का अपने पुत्रों को खेती से दूर रखने का परामर्श दोषपूर्ण और निन्दनीय ठहराया जा सकता है। परन्तु सम्भावना यह है कि जब उसने यहूदियों और इस्राएलियों को अपने परमेश्वर की व्यवस्था को तुच्छ जानते देखा, तब उसने उस पलटे का विचार किया, जो यद्यपि बहुत समय तक नहीं आया, तौभी उस समय उसका भय मानना चाहिए था। उसने दुर्गुणों के स्रोतों को भी देखा, अर्थात् यह कि विशेषकर इस्राएली भोग-विलास में लिप्त हो गए थे, और, जैसा भविष्यद्वक्ताओं से स्पष्ट प्रकट होता है, सब प्रकार की अति में अपने आप को छोड़ दिया था। इसलिये जब उसने एक ओर देश की भ्रष्टताओं को देखा, और दूसरी ओर दण्ड से डरा, तब उसने चाहा कि उसका वंश एक कठोर जीवन-रीति का अभ्यस्त हो, जिस से वे अधिक सरलता से इधर-उधर जा सकें, और यह भी कि जो कोई विपत्ति आ पड़े उसे वे अधिक शान्त मन से सह सकें, क्योंकि वे न धनी होंगे और न विलासिताओं के आदी। सो योनादाब ने खेती की, या दाखमधु के उपयोग की, या सुविधाजनक निवास-स्थानों की निन्दा नहीं की, जब उसने अपने वंश को तम्बुओं और जल से सन्तुष्ट रहने की आज्ञा दी, और चाहा कि वे गेहूँ मोल लें और केवल चरवाहों का जीवन बिताएँ; परन्तु, जैसा हम कह चुके हैं, उसकी दृष्टि में एक और उद्देश्य था। सो पहले हमें यही बात मन में रखनी है।
परन्तु साथ ही हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि योनादाब का वंश लूट पर नहीं जीता था, और न आलस्य में अपना समय बिताता था; क्योंकि वे चरवाहे थे, जो बड़े परिश्रम और बहुत जागरण से अपनी जीविका कमाते थे। परन्तु उनके पिता योनादाब की यह इच्छा थी कि वे एक प्रकार से जीवन के सामान्य कार्य-व्यवहारों से अलग रहें, उन भ्रष्टताओं के कारण जो फैली हुई थीं, और जिन्हें उसने अपनी आँखों के सामने बेलगाम बढ़ते देखा; यहाँ तक कि उसे इसमें कोई सन्देह नहीं था कि क्या होनेवाला है, जब इस्राएली अपने आप को अधिकाधिक सब प्रकार की अति में छोड़ते जा रहे थे, और जब सारी खराई की उपेक्षा की जा रही थी। सो यही कारण था कि योनादाब ने अपने वंश को सामान्य जीवन-रीति अपनाने से रोका।
तौभी उसके परामर्श की प्रशंसा नहीं की गई, वरन् उस आज्ञाकारिता की जो उसके पुत्रों ने दिखाई; और यह यहाँ एक उदाहरण के रूप में रखा गया है, ताकि यहूदी लज्जित हों, क्योंकि उन्होंने इतनी हठ से परमेश्वर की व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं की शिक्षा को ठुकरा दिया: और यह छोटे से बड़े की ओर का तर्क है; क्योंकि यदि एक नश्वर मनुष्य का अधिकार उसके वंश पर इतना प्रबल हुआ कि वे दाखमधु से परहेज़ करें, और न केवल मितव्ययिता से जीएँ, वरन् जाड़ा और अभाव और अन्य कठिन बातें भी सहें, तो यहूदियों के लिये यह कितना अधिक उचित था कि जब परमेश्वर ने उन्हें आज्ञा दी तो वे वह करें जो ठीक और सरल था: यह एक बात है, अर्थात् परमेश्वर और नश्वर मनुष्य के बीच तुलना।
और फिर एक और बात है, — कि यह आज्ञा तीन सौ वर्ष तक प्रभावी रही, और उसने वंश को लापरवाही से रोके रखा; परन्तु परमेश्वर की व्यवस्था, जो प्रजा के कानों में निरन्तर गूँजती रहती थी, उन पर कोई प्रभाव डालने की सामर्थ्य न रखती थी। यहाँ दूसरी तुलना है। तीसरी यह है कि परमेश्वर ने न्याय से काम लिया, और यहूदियों पर इतना अधिक दबाव नहीं डाला कि व्यवस्था की कठोरता घृणित और थका देनेवाली हो जाए: सो जब परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था में संयम बरता, कि प्रजा से ऐसी कोई बात न माँगी जो सहज से सही न जा सके, तो वह कहता है कि योनादाब कठोर और सख्त था, क्योंकि उसने दाखमधु के उपयोग को वर्जित किया, और अपने वंश को न खेत जोतने दिए, न घरों में रहने दिया।
सो इस तिहरी तुलना को मन में रखना चाहिए, और इस विरोध के इन तीनों भागों पर भली-भाँति विचार करना चाहिए, अर्थात् यह कि परमेश्वर ने अपनी प्रजा से वह प्राप्त नहीं किया जो योनादाब ने अपने वंश से प्राप्त किया; और यह भी कि परमेश्वर निरन्तर चिताते रहने पर भी कुछ सफल न हुआ, जबकि एक मरे हुए मनुष्य के प्रति आदर ने वंश को उनके कर्तव्य में बनाए रखा; और फिर यह कि परमेश्वर की व्यवस्था, जो केवल वही माँगती थी जो सहज से किया जा सके, यहूदियों द्वारा हठ से ठुकरा दी गई, जबकि रेकाबियों ने अपने मृत पिता के सम्मान में सब विलासिताओं से वंचित होना स्वीकार किया, और एक कठोर, देहाती, और मानो जंगली प्रकार के जीवन से नहीं डरे; क्योंकि उन्होंने न केवल दाखमधु से परहेज़ किया, वरन् घरों में रहकर जाड़े से अपने आप को बचाने का साहस भी नहीं किया, और जीवन की सब सुख-सुविधाएँ उनके लिये वर्जित थीं।
अब जबकि भविष्यद्वक्ता को उन्हें दाखमधु देने की आज्ञा दी गई, और उन्होंने इनकार किया, तो यहाँ एक प्रश्न उठता है, क्या इस विषय में उनका संयम प्रशंसनीय था? इस प्रकार वे योनादाब को परमेश्वर से बढ़कर मानते प्रतीत होते थे, क्योंकि वे जानते थे कि यिर्मयाह, जिसने उन्हें दाखमधु दिया, परमेश्वर की ओर से भेजा गया था। परन्तु निःसन्देह रेकाबियों ने नम्रता से अपना पक्ष रखा, जब उन्होंने कहा कि उनके लिये दाखमधु पीना उचित नहीं, क्योंकि उनके पिता ने उन्हें मना किया था। सो उनका यह अभिप्राय नहीं था कि वे परमेश्वर या उसके भविष्यद्वक्ता से बढ़कर अपने पिता का आदर करें, वरन् उन्होंने केवल अपना पक्ष रखने के लिये यह उत्तर दिया कि वे तीन सौ वर्ष से दाखमधु से परहेज़ करते आए हैं, अर्थात् यह कि सारे घराने ने ऐसा किया था। सो प्रश्न का समाधान यही है। परन्तु पोप के अनुयायी जो करते हैं, कि पहले अपने अत्याचारी नियमों का समर्थन करने के लिये, और दूसरे, दीन विवेकों को मनमाने ढंग से सताने के लिये, रेकाबियों को हमारे विरुद्ध ले आते हैं, वह अत्यन्त निरर्थक है। जैसा मैं पहले ही कह चुका हूँ, योनादाब के परामर्श की प्रशंसा नहीं की गई, मानो उसने अपने पुत्रों को दाखमधु पीने से ठीक ही मना किया हो; वरन् केवल उसके पुत्रों के विषय में यह कहा गया है कि उन्होंने अपने मृत पिता की आज्ञा श्रद्धा और नम्रता से मानी। सो यह खण्ड पोप के अनुयायियों का कुछ भी समर्थन नहीं करता, मानो इसका उद्देश्य विश्वासियों के विवेकों को उनके नियमों से बाँधना हो; क्योंकि यहाँ जिस बात की चर्चा है वह यह है, कि रेकाबियों ने अपनी आज्ञाकारिता से सिद्ध किया कि प्रजा की कठोरता कितनी नीच और दुष्ट थी, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर का उतना आदर और सम्मान नहीं किया जितना इन्होंने एक मरे हुए मनुष्य का किया।
परन्तु तौभी पोप के अनुयायी एक और बात पर बहुत ज़ोर देते हैं, — कि जो कुछ पितरों से चला आया है उसका पालन करना चाहिए; और इस प्रकार वे तर्क करते हैं, "सारी कलीसिया का अधिकार एक निजी मनुष्य के अधिकार से बड़ा है; अब रेकाबियों की प्रशंसा इसलिये की गई है कि उन्होंने एक निजी व्यक्ति की आज्ञा का पालन किया, तो हमें कलीसिया के नियमों का पालन कितना अधिक करना चाहिए।" इसका मैं यह उत्तर देता हूँ, कि हमें पितरों और सारी कलीसिया की आज्ञा माननी चाहिए: और न इस विषय में हमारा उनसे कोई विवाद है; क्योंकि हम सीधे यह नहीं कहते कि जो कुछ मनुष्यों ने हमें सौंपा है, वह सब ठुकरा देना चाहिए; परन्तु हम इस बात से इनकार करते हैं कि जब मनुष्यों के नियम बिना किसी आवश्यकता के विवेक को बाँधते हैं, तब हमें उनका पालन करना चाहिए। इसलिये जब हम पर कोई धार्मिक कार्य थोपा जाता है, तब मनुष्य अपने लिये वह ले लेते हैं जो केवल परमेश्वर ही का है; इस प्रकार परमेश्वर के अधिकार का उल्लंघन होता है, जब मनुष्य अपने लिये इतना दावा करते हैं कि अपने ही नियमों से विवेकों को बाँधें। सो हमें नागरिक नियमों में, जैसे वे जो व्यवस्था बनाए रखने के लिये या किसी अन्य उद्देश्य से लागू किए जाते हैं, और आत्मिक नियमों में, जैसे वे जो परमेश्वर की आराधना में लाए जाते हैं, और जिनके द्वारा धर्म थोपा जाता है और विवेकों पर अनिवार्यता डाली जाती है, भेद करना चाहिए। — परन्तु अभी मैं समाप्त नहीं कर सकता, क्योंकि मैं देखता हूँ कि समय पहले ही बीत चुका है।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जैसे तुझे हमें अपनी सन्तान होने के लिये लेपालक बनाना, और हमें यह भी दिखाना भाया कि तुझे क्या भाता है, — आह, यह वरदान दे कि हम सब बातों में तेरे आज्ञाकारी हों, और कभी न दाहिने न बाएँ मुड़ें; और जैसे तू हमें निरन्तर चिताता भी है और आगे बढ़ने को उभारता है, वैसे ही यह वरदान दे कि हम शान्त और नम्र आत्मा से अपने आप को तेरे शासन के अधीन ऐसा सौंप दें कि अपने आप को तेरी सन्तान प्रमाणित करें, और तुझे अपने पिता के रूप में महिमा दें, जब तक कि हम उस अनन्त मीरास का आनन्द न भोगें जो स्वर्ग में हमारे लिये रखी हुई है, हमारे प्रभु मसीह के द्वारा।
एक सौ चालीसवाँ व्याख्यान
हमने पिछले व्याख्यान में कहा था कि रेकाबियों का उदाहरण इस उद्देश्य से सामने नहीं लाया गया कि उनकी आज्ञाकारिता की प्रशंसा की जाए, मानो वह कोई बड़ा सद्गुण हो, वरन् केवल इसलिये कि भविष्यद्वक्ता यहूदियों को इस बात के लिये डाँटे कि वे जीवते परमेश्वर का उतना आदर नहीं करते थे जितना रेकाबी अपने मृत पिता का करते थे। और निःसन्देह इस तुलना ने यहूदियों को अत्यन्त लज्जाजनक आचरण करनेवाले दिखाया होगा, क्योंकि वे आज्ञा मानने को प्रेरित न किए जा सके, यद्यपि रेकाबी उदाहरण के रूप में उनकी आँखों के सामने थे। हमने यह भी कहा है कि योनादाब ने अपने वंश को दाखमधु पीने, खेत बोने और दाख की बारियाँ लगाने से इसलिये मना नहीं किया कि परमेश्वर की आराधना में कोई नई बात स्थापित करे; वरन् उसने ऐसा इसलिये किया कि उसने अपने वंश के लिये यह भला समझा कि वे इस प्रकार देश में परदेशी होकर रहें, जिस से वे अपनी सम्पत्ति से आसक्त न हो जाएँ, और नाना प्रकार के परिवर्तनों के बीच कम चिन्तित रहें, और मानो कहीं और जाने को तैयार रहें। इसलिये हमने दिखाया है कि पोप के अनुयायी अज्ञानता से इस खण्ड को अपने अत्याचारी नियमों के समर्थन के लिये तोड़-मरोड़ते हैं, जिनमें वे परमेश्वर की आत्मिक आराधना को सम्मिलित करने का ढोंग करते हैं, और जिनके द्वारा वे दीन आत्माओं को भी पीड़ित करते हैं; क्योंकि योनादाब की आज्ञा और उन नियमों के बीच, जो परमेश्वर की आत्मिक आराधना स्थापित करने के उद्देश्य से लाए जाते हैं, न कोई समानता है और न कोई सम्बन्ध।
क्योंकि योनादाब की आज्ञा का मुख्य उद्देश्य यह नहीं था कि अपने वंश से दाखमधु से परहेज़ को एक अनिवार्य बात के रूप में माँगे, वरन् उसका ध्यान किसी बिलकुल भिन्न बात पर था। अब, जो किसी अन्य उद्देश्य से आज्ञा दी जाती है, वह जैसे अनिवार्य नहीं है, वैसे ही परमेश्वर के वचन के विरुद्ध भी नहीं है; क्योंकि उनके विवेक की स्वतन्त्रता छीनी नहीं जाती: और न योनादाब का यह अभिप्राय था कि अपने लिये परमेश्वर का अधिकार और प्रभुता का दावा करे, मानो वह कोई आत्मिक व्यवस्था देनेवाला हो; वरन् उसकी आज्ञा केवल नागरिक या सामाजिक बातों से सम्बन्ध रखती थी। इस से प्रकट होता है कि उसकी आज्ञा उन अत्याचारी नियमों से कितनी भिन्न थी जिनके द्वारा पोप-तन्त्र में स्वतन्त्रता नष्ट की जाती है। यदि विनोद में बोलना उचित होता, तो हम कह सकते थे कि यह आश्चर्य की बात है कि पोप के अनुयायी इस उदाहरण को इतना महत्त्व देते हैं, जबकि उनमें से कोई इसका अनुसरण नहीं करता; क्योंकि यद्यपि सन्यासियों में खाने-पीने के विषय में कड़े और कठोर नियम हैं, तौभी उनमें से सबसे पवित्र लोगों ने भी कभी उनका पालन नहीं किया; और कोई कार्थूसियन या सेलेस्टियन ऐसा नहीं हुआ जिसने दाखमधु से परहेज़ करने का बन्धन स्वीकार किया हो। यदि रेकाबियों का यह सद्गुण उन्हें इतना भाता है, तो वे दाखमधु का उपयोग छोड़ क्यों नहीं देते? परन्तु यह मैंने गम्भीरता से नहीं कहा।
विषय के सम्बन्ध में, समाधान निश्चित और सरल है, — कि रेकाबियों की प्रशंसा इसलिये नहीं की गई कि मानो उन्होंने अपने पिता की आज्ञा परमेश्वर के समान मानी हो, वरन् इसलिये कि उन्होंने आज्ञाकारिता से वह ग्रहण किया जो उनके पिता ने उन्हें आज्ञा दी थी, क्योंकि वह केवल एक नागरिक आज्ञा थी: इसलिये उसकी दृष्टि में एक और आगे का उद्देश्य था; और उसने दाखमधु और अन्य वस्तुओं से परहेज़ को उसके अपने लिये नहीं माँगा। और पौलुस ने एक ही वाक्य से इस विवाद को सुलझा दिया है; क्योंकि जब वह बच्चों को अपने माता-पिता की आज्ञा मानने का उपदेश देता है, तो वह अपने उपदेश को यह कहकर सीमित करता है, "प्रभु में।" (इफिसियों 6:1)
सो हम देखते हैं कि पौलुस बच्चों को अपने माता-पिता की आज्ञा मानने का आदेश देता है, सब बातों में या बिना किसी सीमा के नहीं, वरन् इस प्रकार कि परमेश्वर, जो सर्वोच्च प्रभु और सब का एकमात्र पिता है, अपना अधिकार बनाए रखे, और पार्थिव माता-पिता अपने लिये इतने अधिकार का दावा न करें कि परमेश्वर के सिंहासन पर चढ़ बैठें, मानो वे आत्माओं के व्यवस्था देनेवाले हों। अब हम आगे बढ़ें —
यिर्मयाह 35:8-10
8. सो हम रेकाब के पुत्र अपने पुरखा योनादाब की बात मानकर, उसकी सारी आज्ञाओं के अनुसार चलते हैं, कि जीवन भर दाखमधु न पीएँ, न हम, न हमारी स्त्रियाँ, न हमारे पुत्र, न हमारी पुत्रियाँ;
8. Et audivimus in voce (hoc est, obedivimus voci) Jenadab, filii Rechab, patris nostri, secundum omnia qute mandavit nobis, ne biberemus vinum cunctus diebus nostris, nos, uxores nostrae, filii nostri, et filiae nostrae;
9. और न अपने रहने के लिये घर बनाएँ; और न हमारे पास दाख की बारी, न खेत, न बीज है;
9. Et ne, aedificaremus domes in quibus habitaremus, et ne vitis vel ager vel semen nobis esset (ad verbum, et vitis et ager et semen non erunt nobis)
10. परन्तु हम तम्बुओं ही में रहते आए हैं, और अपने पुरखा योनादाब की बात मानकर उसकी सारी आज्ञाओं के अनुसार करते आए हैं।
10. Et habitavimus (quin potius, est enim copula resolvenda in adversativam particulam, quin potius habitavimus) in tabernaculis, et obedivimus, et fecimus secundum omnia quae praecepit nobis Jonadab pater noster.
यिर्मयाह विस्तार से वह बात समझाता है जो थोड़े शब्दों में कही जा सकती थी, ताकि रेकाबियों की स्थिरता को बढ़ाकर दिखाए। क्योंकि कोई अपने पिता की आज्ञा मान तो सकता है, तौभी अपने संकल्प में ऐसा दृढ़ न हो कि किसी छोटे से अवसर पर अपने कर्तव्य से चूक न जाए। यिर्मयाह यहाँ दिखाता है कि रेकाबियों की तत्पर दृढ़ता ऐसी थी कि अपने सामने दाखमधु रखे जाने से भी वे बहकाए न जा सके; वरन् मानो उनके सामने कोई परीक्षा रखी ही न गई हो, उन्होंने अपने पिता की आज्ञा का पालन किया, जिसे साथ ही, जैसा पहले प्रकट हो चुका है, मरे कई युग बीत चुके थे।
तब उन्होंने कहा कि उन्होंने रेकाब के पुत्र अपने पिता योनादाब की बात सुनी; और यह भी जोड़ा, उन सब बातों के अनुसार जिनकी उसने हमें आज्ञा दी है। वह फिर से बताता है कि योनादाब ने क्या आज्ञा दी थी, और इसी से यह वाक्य सम्बन्धित है, सब बातों के अनुसार, इत्यादि। क्योंकि यदि उसने उन्हें केवल संयमी रहने की आज्ञा दी होती, तो आज्ञा मानना कठिन या कष्टदायक न होता; परन्तु उसका अभिप्राय उन्हें एक भटकते जीवन से बाँधने का था, कि वे केवल तम्बुओं से ढके रहें, और कुछ भी अपने अधिकार में न रखें।
जब योनादाब ने अपने घराने की आज्ञाकारिता को केवल एक ही बात में नहीं परखा, तो इससे और भी स्पष्ट प्रकट होता है कि आज्ञा मानने में उनकी तत्परता और दृढ़ता कितनी बड़ी थी।
तब उन्होंने पहले यह कहा कि उन्हें दाखमधु नहीं पीना था; और यह भी जोड़ा, जीवन भर। हम तो जानते हैं कि नाज़ीरों को दाखमधु पीना वर्जित था, परन्तु वह केवल कुछ समय के लिए, जब तक वे अपनी मन्नत पूरी न कर लें; हम यह भी जानते हैं कि जब याजक अपनी सेवा पूरी कर रहा होता था, तब उसे उस समय दाखमधु लेने की अनुमति नहीं थी। परन्तु बाद में याजक और नाज़ीर दोनों फिर से अपने साधारण रहन-सहन पर लौट आते थे। परन्तु जीवन भर दाखमधु न चखना कहीं अधिक कठिन बात थी। निःसन्देह भविष्यद्वक्ता ने ये बातें इसलिए विस्तार से बताईं कि वह यहूदियों पर और भी अधिक लज्जा लादे, जो, जैसा हम देखेंगे, एक अत्यन्त न्यायसंगत और किसी भी प्रकार कठिन न होनेवाली बात में भी परमेश्वर के आज्ञाकारी न थे। उन्होंने कहा, हम, हमारी पत्नियाँ, हमारे बेटे, हमारी बेटियाँ, मानो वे कह रहे हों, “यह आज्ञा हमारे घराने में सदा मानी गई है; और जो कुछ हमारे पुरखाओं ने हमें सौंपा, उसका हमने आज तक पालन किया है, जैसे हमारे पुरखाओं ने भी किया, जिन्होंने एक मरे हुए मनुष्य की आज्ञा मानी, क्योंकि उसकी इच्छा उन्हें समझा दी गई थी।”
उन्होंने यह भी जोड़ा कि उन्हें घर नहीं बनाने थे, शब्दशः, उनमें बसने के लिए, अर्थात् उनमें रहने के लिए। अतः रेकाबियों के लिए घर बनाना, अर्थात् दूसरों के लिए उनका निर्माण करना, उचित था; परन्तु उन्हें स्वयं तम्बुओं से सन्तुष्ट रहना और उन्हीं में रहना था। वे दूसरों को भव्य महल बनाने में सहायता दे सकते थे और इस प्रकार अपने परिश्रम से जीविका कमा सकते थे; परन्तु उन्हें उनमें रहने की अनुमति न थी, क्योंकि यह उनकी आज्ञाओं में से एक थी। उन्होंने आगे यह भी जोड़ा, और दाख की बारी और खेत और बीज हमारे पास नहीं है। यदि हम भली-भाँति विचार करें कि उनकी दशा कितनी कठिन थी, तो हम रेकाबियों की स्थिरता की प्रशंसा करने का कारण पाएँगे, क्योंकि जब उन्होंने देखा कि वे दयनीय तंगी में पड़ गए हैं, तब भी वे अपने संकल्प से डरकर पीछे नहीं हटे। परन्तु फिर भी हमें विशेष रूप से उस उद्देश्य पर ध्यान देना चाहिए जो भविष्यद्वक्ता के सामने था, अर्थात् यह दिखाना कि यहूदियों का हठ कितना लज्जाजनक था, जिन्होंने परमेश्वर की आज्ञाओं को तुच्छ जानने और उन्हें कुछ न समझने का दुस्साहस किया, जबकि एक नश्वर मनुष्य का, और वह भी मरे हुए का, अधिकार उसके वंशजों पर इतना बड़ा था। तब उन्होंने कहा कि वे तम्बुओं में रहते थे, और उन सब बातों के अनुसार करते थे जिनकी आज्ञा उनके पिता योनादाब ने उन्हें दी थी।
आगे लिखा है —
यिर्मयाह 35:11
11. परन्तु जब बाबुल के राजा नबूकदनेस्सर ने इस देश पर चढ़ाई की, तब हम ने कहा, चलो, कसदियों और अरामियों के दल के डर के मारे यरूशलेम में जाएँ। इस कारण हम अब यरूशलेम में रहते हैं।
11. Et factum est cum ascendit Nebuchadnezer rex Babylonis in terram, tunc diximus, Venite, ingrediamur Jerusalem a facie excreitus Chaldaeorum, eta facie excreitus Assyriorum (alii vertunt, Syriae, sed {}ארםquamvis aliquando restringatur ad Syriae, comprehendit tamem Mesopotamiam et alias regiones) et habitavimus Jerusalem.
इससे प्रकट होता है कि अपने पिता की आज्ञा का पालन करना रेकाबियों के लिए लाभदायक सिद्ध हुआ: क्योंकि यदि वे अपनी सम्पत्ति से बँधे होते, तो जब इस्राएल का राज्य नष्ट किया गया, तब उन्हें भी बाकी लोगों के साथ बँधुआई में खदेड़ दिया जाता; जो दस गोत्रों पर बीता, वही रेकाबियों पर भी बीतता।
परन्तु क्योंकि उनके पास अपना कहने को कुछ भी न था, इसलिए वे कहीं और जाने के लिए अधिक स्वतन्त्र थे; और न उन्हें सम्पत्ति छोड़ने की परीक्षा का सामना करना पड़ा, क्योंकि उनके पास कोई सम्पत्ति थी ही नहीं। हम जानते हैं कि बहुत से लोग अपने घरों, खेतों, दाख की बारियों और चरागाहों से इतने बँधे होते हैं कि उनसे अलग किए जाने की अपेक्षा वे सौ बार मार डाले जाना अधिक पसन्द करेंगे। अतः योनादाब ने जब उन्हें तम्बुओं में रहने की आज्ञा दी, तब उसने अपने वंशजों के हित का भली-भाँति विचार किया; क्योंकि इस प्रकार वे बियास की प्रसिद्ध उक्ति के अनुसार अपना सब कुछ एक ही दिन में समेट सकते थे। इसलिए दरिद्रता उनके लिए बड़ा लाभ थी: उनके जीवन की कठोरता भी उनके लिए हितकर थी; वे बिना कठिनाई के यरूशलेम में रह सकते थे, क्योंकि उन्हें बहुत सी विलासिताओं की आवश्यकता न थी। यदि वे दाखमधु और अन्य स्वादिष्ट वस्तुओं के अभ्यस्त होते, तो वे इस बात पर विवाद करते कि घिरे हुए नगर में अभाव सहने की अपेक्षा क्या एक ही बार मर जाना उनके लिए अच्छा न होता। इसके अतिरिक्त, क्योंकि वे मितव्ययिता से जीते आए थे और कठोर जीवन के अभ्यस्त भी थे, इसलिए किसी चिन्ता ने उन्हें भरोसे के साथ यरूशलेम आने से नहीं रोका; क्योंकि वे सोचते थे कि वे अपने परिश्रम से रूखी-सूखी और साधारण जीविका कमा सकते हैं।
अतः इससे प्रकट होता है कि जब योनादाब ने अपने वंशजों को दाखमधु के उपयोग से और खेतों तथा दाख की बारियों के स्वामित्व से रोका, तब उसके मन में क्या था; क्योंकि वह तब पहले से देख सकता था कि कैसे भयानक उलट-फेर निकट थे। इसलिए उसका उद्देश्य था कि वह अपने वंशजों को इस प्रकार प्रशिक्षित करे कि जब कठिनाइयाँ आएँ तो वे बोझ के नीचे दब न जाएँ, बल्कि अभाव को या किसी भी अन्य असुविधा को, जो दूसरों के लिए असहनीय होती जब-जब उन्हें अपनी पहले की सुख-सुविधाएँ याद आतीं, धीरज से सह लें। हमने कहा, चलो, हम दोनों सेनाओं के सामने से यरूशलेम में प्रवेश करें। अतः जब इस्राएली अपने खेतों और घरेलू सम्पत्ति के कारण रुके रहे, तब रेकाबी यरूशलेम चले गए, और इस प्रकार संकट से बच गए। अब आगे लिखा है —
यिर्मयाह 35:12-15
12. तब यहोवा का यह वचन यिर्मयाह के पास पहुँचा,
12. Et fuit serum Jehovae ad Jeremiam, dicendo,
13. इस्राएल का परमेश्वर, सेनाओं का यहोवा यों कहता है, जाकर यहूदा देश के लोगों और यरूशलेम नगर के निवासियों से कह, यहोवा की यह वाणी है, क्या तुम शिक्षा मानकर मेरी बातें न सुनोगे?
13. Sic dicit Jehova exercituum, Deus Israel, Vade et dic viro Jehudah et incolis Jerusalem, Annon recipietis disciplinam (vel, correctionum) ad obediendum sermonibus meis, dicit Jehova?
14. देखो, रेकाब के पुत्र योनादाब ने जो आज्ञा अपने वंश को दी थी कि तुम दाखमधु न पीना वह तो मानी गई है, यहाँ तक कि आज के दिन भी वे लोग कुछ नहीं पीते, वे अपने पुरखा की आज्ञा मानते हैं; परन्तु यद्यपि मैं तुम से बड़े यत्न से कहता आया हूँ, तौभी तुम ने मेरी नहीं सुनी।
14, Stabiliti sunt sermones Jonadab filii Rechab, quos mandavit filiis suis, ne biberent vinum, et non biberunt usque ad hunc diem; quia obedierunt mandato patris sui; ego autem loquutus sum ad vos, mane surgens (vel, mane surgendo) et loquendo, et non obtemperastis mihi:
15. मैं तुम्हारे पास अपने सारे दास नबियों को बड़ा यत्न करके यह कहने को भेजता आया हूँ, अपनी बुरी चाल से फिरो, और अपने काम सुधारो, और दूसरे देवताओं के पीछे जाकर उनकी उपासना मत करो, तब तुम इस देश में जो मैं ने तुम्हारे पितरों को दिया था और तुम को भी दिया है, बसने पाओगे; पर तुम ने मेरी ओर कान नहीं लगाया, न मेरी सुनी है।
15. Et misi ad vos omnes servos meos Prophetas, mane surgendo et mitttendo (mane surgens et mittens) dicendo, Convertimini agedum quisque a via sua mala, et bonas facite actiones vestras, et ne ambuletis post deos alienos ad serviendum ipsis (ut serviatis ipsis) et habitabitis in terra quam dedi vobis et patribus vestris, et non inclinastis aurem vestram, et non obedivistis mihi.
यहाँ यिर्मयाह उस उदाहरण को लागू करता है जिसका उसने वर्णन किया था; क्योंकि इसके बाद परमेश्वर की यह शिकायत जोड़ी गई है — कि उसके अपने लोगों ने उसका उतना आदर नहीं किया जितना योनादाब का उसके वंशजों ने किया। फिर वह कहता है, जाकर यहूदा के लोगों और यरूशलेम के निवासियों से कह। डाँट को और अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए भविष्यद्वक्ता परमेश्वर को वक्ता के रूप में प्रस्तुत करता है। अतः परमेश्वर का उद्देश्य था कि वह यह डाँट यहूदियों तक अपने ही नाम से, और मानो अपने ही व्यक्तित्व में, पहुँचाए। क्या तुम शिक्षा न मानोगे, वह कहता है, कि मेरी बात मानो? {}מוסרmusar शब्द का अर्थ कभी-कभी शासन करना या नियन्त्रण करना होता है, और कभी-कभी ताड़ना। परन्तु निःसन्देह यहाँ परमेश्वर यहूदियों के उस पागलपन को डाँटता है जिसमें उन्होंने बहुत समय से अपने आप को कठोर कर लिया था, मानो वह कह रहा हो, “तुम कभी स्वस्थ बुद्धि की ओर लौटना उचित नहीं समझते।” अतः क्योंकि वे बहुत समय से सुधरने के योग्य न रहे थे और बेलगाम जंगली पशुओं के समान अपनी अभिलाषाओं के पीछे भटकते रहे थे, इसलिए यहाँ डाँट दी गई है, मानो वह कह रहा हो, “क्या यह प्रजा सदा ऐसी बेलगाम स्वच्छन्द बनी रहेगी कि कभी जूए के अधीन न होगी?” और वह कहता है, कि मेरी बात मानो। परमेश्वर दिखाता है कि उसने यहूदियों से कोई अन्यायपूर्ण बात नहीं माँगी, जिससे कोई सच्चा बहाना बनाया जा सके, मानो वह बहुत कठोर हो: वह कहता है, “मैं केवल इतना चाहता हूँ कि तुम मेरी बात मानो: यही मेरी सारी कठोरता है, क्योंकि जिस नम्रता के नियम का मैं तुम्हारे प्रति उपयोग करता हूँ वह मनोहर है। अतः जब मैं केवल वही माँगता हूँ जो बच्चों को बिना चेतावनी के ही अपने पिताओं को स्वेच्छा से देना चाहिए, तो यह कैसे है कि यह संयम तुम्हें इतना अप्रिय लगता है, और तुम किसी भी प्रकार इसे स्वीकार नहीं कर सकते?”
फिर यह जोड़ा गया है, योनादाब के वचन उसकी सन्तान द्वारा स्थिर रखे गए हैं; परन्तु मेरी प्रजा मेरी बात नहीं मानती। परन्तु जैसा हमने पिछले व्याख्यान में कहा था, भविष्यद्वक्ता विशेष रूप से इस बात का उल्लेख करता है — कि रेकाबियों ने दाखमधु न पीने में अपने पिता की आज्ञा मानी: यह कठिन था; उन्होंने आज के दिन तक भी नहीं पिया।
परन्तु परमेश्वर ने अपनी सन्तान से क्या माँगा? केवल यह कि वे उसकी व्यवस्था को ग्रहण करें, और भटक न जाएँ, जैसा कि यहाँ जोड़ा गया है, पराए देवताओं के पीछे। अतः योनादाब की कठोर आज्ञा और व्यवस्था की न्यायसंगतता के बीच एक विरोधाभास है; क्योंकि परमेश्वर ने अपनी प्रजा से इसके सिवा कुछ नहीं माँगा कि वे उसकी शुद्ध आराधना करें। वह कहता है, उन्होंने आज के दिन तक दाखमधु नहीं पिया — और क्यों? क्योंकि उन्होंने आज्ञा मानी; अर्थात् विवेक की कोई शंका उन्हें नहीं रोकती थी, परन्तु एक मरे हुए मनुष्य का अधिकार उन पर इतना प्रबल था कि उन्होंने स्वेच्छा से दाखमधु का उपयोग छोड़ दिया। “अतः जब सीधी-सादी आज्ञाकारिता ने, अर्थात् अपने पिता के प्रति भक्ति या आदर ने, रेकाबियों पर इतना प्रभाव डाला, तो यह कैसे है कि मेरी नहीं सुनी जाती? क्योंकि मैंने कहा है,” वह कहता है, “इसलिए प्रजा का पाप अज्ञानता के आधार पर क्षमा योग्य नहीं है।”
फिर वह जोड़ता है, तड़के उठकर और कहते हुए। यहाँ लगन और परिश्रम का उल्लेख है। योनादाब ने अपनी सन्तान को केवल एक बार आज्ञा दी; वह आज्ञा, जो भुलाई जा सकती थी, उसके पुत्रों के हृदयों में सदा बनी रही, यहाँ तक कि उन्होंने वही बात उसके पोतों को भी सिखाई। परन्तु परमेश्वर ने जो उचित था उसकी आज्ञा केवल एक बार नहीं दी, बल्कि तड़के उठा, अर्थात् उसने यत्नपूर्वक उनसे पहले ही पहल की; क्योंकि इस रूपक के द्वारा वह संकेत करता है कि उसने तब तक प्रतीक्षा नहीं की जब तक लगातार स्वेच्छाचार के बाद वे अपने दुर्गुणों में और अधिक लिप्त न हो जाएँ; क्योंकि हम जानते हैं कि जो लोग बहुत वर्षों तक बिना किसी रोक-टोक के रहे हैं, वे सहज ही व्यवस्थित नहीं किए जा सकते, बल्कि वे आदतन हठी हो जाते हैं। और इसीलिए यह भी आवश्यक हो जाता है कि जिन पर हमें शासन करना है उन्हें बचपन से ही गढ़ा जाए; क्योंकि यदि उन्हें मनमानी करने दिया जाए, तो बाद में उनकी स्वच्छन्दता किसी भी नियम से रोकी नहीं जा सकती। अतः परमेश्वर कहता है कि वह तड़के उठा, अर्थात् उसने यहूदियों से पहले ही पहल की, ताकि वे अपनी माता के दूध के साथ ही धर्म को भी ग्रहण करें।
इसके बाद वह जोड़ता है कि वह उन्हें सिखाने में लगनशील रहा, तड़के उठकर और कहते हुए। कहते हुए से वह संकेत करता है कि उसने प्रतिदिन वही बातें दोहराई थीं, ताकि यहूदी भूल जाने का बहाना न बना सकें: मैं तुम से तड़के उठकर और कहते हुए बोलता रहा, और तुम ने मेरी नहीं मानी। इसके बाद एक व्याख्या आती है, कि परमेश्वर ने भविष्यद्वक्ताओं को भेजा था: अन्यथा यहूदी आपत्ति करने और यह कहने को तैयार रहते कि परमेश्वर उन्हें कभी दिखाई ही नहीं दिया। इसलिए वह कहता है कि उसने अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा उनसे बातें की थीं। वह कहता है, मैंने भेजा, और वह भी बहुतों को — मैंने अपने सब दासों को भेजा, इत्यादि; क्योंकि यदि केवल मूसा ने ही यहूदियों को उचित बात की आज्ञा दी होती, तो वे यह बहाना बना सकते थे कि व्यवस्था दबा दी गई और भुला दी गई, और उन्हें स्मरण नहीं कि मूसा ने क्या सिखाया था। इसलिए ऐसे टाल-मटोल का सामना करने के लिए वह संक्षेप में कहता है कि उसने अपने सब दासों को भेजा था, अर्थात् उसने बहुत से भविष्यद्वक्ता भेजे थे, और इतने अधिक कि वह उनके सुनते हुए निरन्तर व्यवस्था की शिक्षा का प्रचार करता रहा।
वह फिर से ये शब्द दोहराता है, तड़के उठकर और भेजते हुए, ताकि यह प्रकट हो कि उसने उन्हें चेतावनी देना और समझाना कभी नहीं छोड़ा। अब जो लोग अन्यथा सुस्त और हठी भी होते हैं, वे भी तब नम्र हो जाते हैं जब उन्हें प्रतिदिन और प्रति घड़ी उनके कर्तव्य की ओर बुलाया जाता है। अतः जब परमेश्वर ने अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा उन पर इस प्रकार ज़ोर डाला, तब भी जब उन्होंने आज्ञा मानने से इनकार किया, तो उनका पागलपन भरा हठ और भी अधिक प्रकट हो गया।
अब वह सहज माँग आती है, जिसने उनके पाप को और भी अधिक गम्भीर बना दिया, अब तुम में से हर एक अपनी बुरी चाल से फिरो, और अपने कामों को सीधा करो, (शब्दशः, भला करो)
यहाँ परमेश्वर अपनी व्यवस्था और योनादाब की आज्ञाओं के बीच का अन्तर दिखाता है; क्योंकि उसने यहूदियों से केवल वही माँगा जो उन्हें स्वेच्छा से करना चाहिए था; क्योंकि यदि कोई व्यवस्था लिखी भी न गई होती, तब भी स्वाभाविक ज्योति यहूदियों को यह सिखाने के लिए पर्याप्त थी कि परमेश्वर की आज्ञा मानना उनका कर्तव्य था; क्योंकि आज्ञाकारिता की व्यवस्था हमारे हृदयों पर गवाही के रूप में ऐसी लिखी हुई है कि कोई भी उचित रूप से अज्ञानता का बहाना नहीं बना सकता। अतः परमेश्वर यहाँ घोषणा करता है कि उसने इसके सिवा कुछ नहीं माँगा जो स्वयं स्वभाव ने बताया था, अर्थात् यह कि यहूदी पश्चाताप करें और अपने जीवन को आज्ञाकारिता के नियम के अनुसार ढालें; यद्यपि उनके बीच कोई भविष्यद्वक्ता न होता, तौभी इस विषय में हर एक को अपना शिक्षक आप होना चाहिए था।
आगे लिखा है, और पराए देवताओं के पीछे जाकर उनकी उपासना मत करो। यह चेतावनी और भी स्पष्ट रूप से सिद्ध करती है कि परमेश्वर की माँग कितनी संयमित थी; क्योंकि उसने इससे अधिक कुछ नहीं चाहा कि यहूदियों को अपने अधिकार और संरक्षण के अधीन रखे, ताकि वह उनका पिता हो। योनादाब अपने वंशजों से आज्ञाकारिता माँग सकता था, और फिर भी उन्हें दाखमधु का स्वतन्त्र उपयोग, और खेतों तथा दाख की बारियों का स्वामित्व भी दे सकता था; परन्तु वह उन्हें मानो मानवजाति से अलग कर देना चाहता था, यहाँ तक कि उनकी दशा उन सब जातियों और लोगों की दशा से बुरी हो गई जिनके बीच वे रहते थे; क्योंकि निःसन्देह वे अपने पड़ोसियों के उपहास का पात्र बन गए, उन्होंने बहुत सी निन्दा सही, और वे बहुत सताए गए। परमेश्वर दिखाता है कि उसने कठोर अधिकार चलाने से और असहनीय दासता माँगने से अपने को रोके रखा, और अपनी प्रजा से इसके सिवा कुछ नहीं माँगा कि वे उसे पिता करके मानें। अतः जब उसने यहूदियों को अपनी सेवा करने के लिए अत्याचारपूर्वक विवश नहीं किया, और उसकी व्यवस्था अपनी माँगों में संयमित थी, तो इससे, जैसा मैंने कहा है, और भी स्पष्ट प्रकट होता है कि उस प्रजा की दुष्टता और भ्रष्टता कितनी असुधार्य थी।
वह आगे एक प्रतिज्ञा जोड़ता है, जिसे अपनी मधुरता से उन्हें आकर्षित करना चाहिए था, ताकि वे आज्ञा मानने के लिए और अधिक इच्छुक और तत्पर हो जाएँ। यद्यपि वह अधिकार से यह आज्ञा दे सकता था, “अपने अन्धविश्वासों से फिरो, और विश्वासयोग्यता से मेरी सेवा करो,” तौभी यह एक न्यायसंगत और उचित आज्ञा होती; परन्तु जब वह एक प्रतिज्ञा जोड़ने में प्रसन्न होता है, जिसे यहूदियों को आज्ञाकारिता की ओर प्रवृत्त करना चाहिए था, और फिर भी उनसे कुछ नहीं पाता, तो इस बात से उनकी दुष्टता फिर और भी अधिक घृणित ठहरती है।
अतः हम देखते हैं कि हर वाक्यांश में कुछ महत्त्वपूर्ण है, और यह बिना अर्थ के नहीं है कि वह यहाँ जोड़ता है, तुम उस देश में बसोगे जो मैंने तुम्हें और तुम्हारे पितरों को दिया। यहाँ परमेश्वर अपनी उदारता को प्रस्तुत करता है, और फिर उसके निरन्तर उपभोग की प्रतिज्ञा करता है, यदि यहूदी आज्ञा मानें। वह कहता है कि उसने वह देश उन्हें, और उनसे पहले उनके पितरों को, दिया था; यदि वे परमेश्वर की उदारता के कभी भागी न भी हुए होते, तौभी केवल प्रतिज्ञा ही उन्हें उसके अधिकार के अधीन होने के लिए प्रेरित करने को पर्याप्त होनी चाहिए थी। परन्तु परमेश्वर तो पहले ही उनके प्रति उदार रहा था। अतः अनुभव से उन्हें निश्चय हो जाना चाहिए था, क्योंकि वे जानते थे कि उन्होंने प्रतिज्ञा के देश को परमेश्वर की दी हुई प्रतिज्ञा के सिवा किसी और अधिकार से प्राप्त नहीं किया था; वे जानते थे कि जिन जातियों के स्थान पर वे आए थे, वे परमेश्वर के सामर्थी हाथ से निकाल दी गई थीं। अतः जब उन्होंने अनुभव से परमेश्वर को उदार पाया था, और जब उसने भविष्य में भी वैसा ही बने रहने की प्रतिज्ञा की थी, तो उनका पागलपन कितना बड़ा और कितना भयंकर रहा होगा कि वे आज्ञाकारिता की ओर न फिरे?
फिर यह भी एक बड़े महत्त्व की बात है, कि परमेश्वर ने उन्हें स्मरण दिलाया कि वही था जिसने वह देश उन्हें और उनके पितरों को दिया।
वह जोड़ता है, तुमने अपना कान नहीं लगाया, न मेरी मानी। हम अन्यत्र इन शब्दों का अर्थ बता चुके हैं, “कान न लगाना”: ये अज्ञानता या ज्ञान के अभाव के बहाने को हटा देते थे। अतः परमेश्वर यहाँ यहूदियों पर जान-बूझकर की गई दुष्टता का दोष लगाता है; क्योंकि उन्होंने हठपूर्वक व्यवस्था की शिक्षा को, और भविष्यद्वक्ताओं द्वारा दी गई सब चेतावनियों को ठुकरा दिया था; क्योंकि जब किसी प्रजा के सामने शिक्षा रखी जाती है, और परमेश्वर उन्हें आत्मीयता से सिखाने में प्रसन्न होता है, और कुछ भी फल नहीं होता, तो इससे उनका हठ और भी पूर्ण रूप से प्रकट होता है। अतः परमेश्वर यहाँ संकेत करता है कि यहूदी अज्ञानता के कारण नहीं भटके थे, क्योंकि वे भली-भाँति समझते थे कि उचित क्या है। तो फिर इतनी बड़ी कठोरता कहाँ से आई? इसी से कि उन्होंने जान-बूझकर अपने कान बन्द कर लिए थे, अर्थात् उन्होंने दुष्टता से परमेश्वर की आज्ञा मानने से इनकार किया था, और मानो लम्बे समय से पाले हुए संकल्प के कारण हठी बने रहे थे, यहाँ तक कि उन्हें कभी स्वस्थ बुद्धि की ओर नहीं लाया जा सका। इसके बाद फिर आगे लिखा है —
यिर्मयाह 35:16
16. रेकाब के पुत्र योनादाब के वंश ने तो अपने पुरखा की आज्ञा, जो उसने उन्हें दी थी, मान ली; परन्तु इन लोगों ने मेरी नहीं सुनी।
16. Quoniam stabilierunt filii Jonadab, filii Rechab, mandatum patris sui, qued mandaverat ipsis, populus antera hic non audierunt ad me, (hoc est, non obediverunt mihi)
भविष्यद्वक्ता यहाँ कोई नई बात नहीं कहता, बल्कि जो पहले कहा जा चुका है उसी की पुष्टि करता है; और उसने यह इसलिए किया कि प्रजा के आचरण की अनुचितता और भी पूर्ण रूप से प्रकट हो, क्योंकि एक ओर एक नश्वर मनुष्य ने, और वह भी अब मरा हुआ, अपने वंशजों पर अपना अधिकार बनाए रखा, जबकि उसने एक बार एक कठिन और दुष्कर बात में उन पर रोक लगाई थी; जबकि दूसरी ओर परमेश्वर कुछ भी न कर सका, यद्यपि उसने अपनी प्रजा से निरन्तर बातें की और उन्हें समझाया था, भविष्यद्वक्ताओं को भेजा था, और उन्हें अपनी ओर बुलाना नहीं छोड़ा था, और न केवल उन्हें बुलाया था, बल्कि उनके सामने अपने उपकार रखकर उन्हें प्रेम से आकर्षित भी किया था, और उन्हें आनेवाले समय के विषय में आशा दी थी। अतः जब परमेश्वर ने सब उपाय करके देख लिए, परन्तु कोई सफलता न मिली, तो इससे प्रजा की निराशाजनक भ्रष्टता प्रकट हो गई। सम्पूर्ण का यही आशय है।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जब तू ने अपने दासों के द्वारा केवल एक बार ही नहीं, वरन् बार-बार हमें उद्धार का मार्ग बताया है, और अपने एकलौते पुत्र को भी भेजा है कि वह हमारे लिए सिद्ध बुद्धि का शिक्षक हो, — हाँ, यह वरदान दे कि हम तेरे ऐसे अधीन हो जाएँ और अपना सम्पूर्ण जीवन तुझे ऐसा समर्पित करें कि वह जो हमारे उद्धार के लिए मरा और फिर जी उठा, अपने सुसमाचार की शिक्षा के द्वारा शान्ति से हम पर राज्य करे; और कि हम इस संसार में तेरी महिमा करने का यत्न करें, जिससे हम अन्त में उस स्वर्गीय महिमा के भागी बनाए जाएँ जो उसी तेरे पुत्र, हमारे प्रभु ने हमारे लिए प्राप्त की है। — आमीन।
एक सौ इकतालीसवाँ व्याख्यान
यिर्मयाह 35:17
17. इसलिए सेनाओं का परमेश्वर यहोवा, जो इस्राएल का परमेश्वर है, यों कहता है, देखो, यहूदा और यरूशलेम के सारे निवासियों पर जितनी विपत्ति डालने की मैं ने चर्चा की है वह अब मैं उन पर डालता हूँ; क्योंकि मैं ने उनको सुनाया, परन्तु उन्होंने नहीं सुना; मैं ने उनको बुलाया, परन्तु उन्होंने उत्तर न दिया।
17. Propterea sic dicit Jehova, Deus exercituum, Deus Israel, Ecce ego adducam super Jehudah, et super incolas Jerusalem omne malum quod pronuntiavi contra cos; quia loquutus sum ad eos, et non audierunt; et vocavi eos et non responderunt.
भविष्यद्वक्ता, यह दिखाने के बाद कि यहूदी रेकाबियों के उदाहरण से ऐसे दोषी ठहराए गए कि उनके लिए कोई बचाव न रहा, अब यह जोड़ता है — कि जैसे परमेश्वर का वचन उनके लिए व्यर्थ रहा था, वैसे ही अब वह उनके विरुद्ध प्रभावशाली होगा। इस पद का यही आशय है।
परमेश्वर कहता है, मैंने उनसे बातें की; अब मैं उनसे और बातें नहीं करूँगा, परन्तु उनके विरुद्ध बोलूँगा, अर्थात् मैं कसदियों को आज्ञा दूँगा, और वे मेरे सेवक और मेरे पलटे के कार्यान्वित करनेवाले होंगे। अतः हम वह क्रम देखते हैं जिसका भविष्यद्वक्ता ने पालन किया है: उसने यह अन्तिम दण्डाज्ञा, जो वज्रपात के समान है, तब तक सामने नहीं रखी जब तक उसने यहूदियों को दोषी सिद्ध न कर दिया। इसी उद्देश्य से उसने वह तुलना की, जब उसने कहा कि रेकाबियों ने अपने पिता की आज्ञा मानी थी, और यहूदियों ने परमेश्वर की व्यवस्था की और भविष्यद्वक्ताओं द्वारा दी गई सब चेतावनियों की उपेक्षा की थी। वह कहता है, मैं यहूदा पर, और यरूशलेम के निवासियों पर, वह सारी विपत्ति डालूँगा जो मैंने उनके विरुद्ध कही है; क्योंकि मैंने उनसे बातें कीं, और उन्होंने नहीं सुना। यहाँ भविष्यद्वक्ता दो प्रकार के बोलने में भेद करता है। क्योंकि परमेश्वर ने यहूदियों से बातें की थीं, परन्तु उसने उनके विरुद्ध भी बातें की थीं। यहाँ दो पूर्वसर्ग हैं, जो बहुत भिन्न नहीं हैं, एक {}אaleph से आरम्भ होता है, और दूसरा {,}עoin से। एक के द्वारा भविष्यद्वक्ता शिक्षा, उपदेशों, और जो कुछ भी पश्चाताप की ओर ले जा सकता है, उसे सूचित करता है, ताकि मनुष्य या तो अपने कर्तव्य की ओर लौटाए जाएँ या उसमें बनाए रखे जाएँ। अतः यह बोलने की एक रीति है, अर्थात् जब परमेश्वर हमसे बातें करता है और हमें अपनी ओर बुलाता है।
दूसरी रीति वह है जो धमकियों से सम्बन्धित है, अर्थात् जब परमेश्वर यह पाकर कि वह शिक्षा देकर कुछ नहीं कर सकता, धमकियों का सहारा लेता है, और दिखाता है कि कैसा पलटा हमारी बाट जोह रहा है। अतः यह पद विशेष ध्यान देने योग्य है, क्योंकि इससे हम सीखते हैं कि जब मनुष्य शिक्षा के वचन को ठुकराते हैं, तो वे उस दूसरे वचन से नहीं बच सकते, जो परमेश्वर के न्याय की घोषणा करता है। जब मनुष्य शिक्षा को ग्रहण नहीं करते, तब वह व्यर्थ प्रतीत होती है; परन्तु जो कोई उसके वचन को तुच्छ जानता है, वह अन्त में अपने ही विनाश के द्वारा जान लेगा कि जिन घोषणाओं से परमेश्वर अपने वचन के अधिकार को पुष्ट और प्रमाणित करता है, वे किसी भी प्रकार व्यर्थ नहीं की जा सकतीं: अतः जब उन्होंने वह वचन नहीं सुना जो मैंने उनसे कहा था, तो वे सब विपत्तियाँ उन पर आ पड़ेंगी जिनकी घोषणा मैंने उनके विरुद्ध की है।
यह जोड़कर कि, मैंने बुलाया और उन्होंने उत्तर न दिया, वह उनके पाप की भयंकरता को बढ़ाकर दिखाता है; क्योंकि परमेश्वर ने केवल यही नहीं दिखाया था कि उनके उद्धार के लिए क्या आवश्यक है, बल्कि उन्हें अपनी ओर बुलाया भी था, और ऊँचे स्वर से भी बुलाया था; परन्तु उसने बहरों से बातें की, क्योंकि उन्होंने उत्तर न दिया। आगे लिखा है —
यिर्मयाह 35:18-19
18. और रेकाबियों के घराने से यिर्मयाह ने कहा, इस्राएल का परमेश्वर सेनाओं का यहोवा तुम से यों कहता है, इसलिए कि तुम ने जो आज्ञा अपने पुरखा योनादाब की मानी, वरन् उसकी सब आज्ञाओं को मान लिया और जो कुछ उसने कहा उसके अनुसार काम किया है,
18. Domui autem Rechabitarum dixit Jeremias, sic dicit Jehova exercituum, Deus Israel, Propterea quod audistis (vel, obedivistis) mandato Jonadab patris vestri, et servastis omnia ejus mandata, et fecistis secundum omnia quae praeceperat vobis,
19. इसलिए इस्राएल का परमेश्वर सेनाओं का यहोवा यों कहता है, रेकाब के पुत्र योनादाब के वंश में सदा ऐसा जन पाया जाएगा जो मेरे सम्मुख खड़ा रहे।
19. Propterea sic dick Jehova exercituum, Deus Israel, Non excidetur vir ex Jonadab filio Rechab, quin stet coram facie mea cunctis diebus.
यहाँ भविष्यद्वक्ता, ताकि यहूदियों के मन पर और गहरा प्रभाव डाले, योनादाब के पुत्रों को प्रतिफल की प्रतिज्ञा देता है, क्योंकि उन्होंने अपने पिता की आज्ञा मानी; और वह उन्हें परमेश्वर की ओर से आशीष की प्रतिज्ञा देता है। और इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं, क्योंकि जैसा पौलुस कहता है, यह आज्ञा पहली है जिसके साथ प्रतिज्ञा जुड़ी है। (इफिसियों 6:2) परमेश्वर सामान्य रूप से उन सब को प्रतिफल की प्रतिज्ञा देता है जो व्यवस्था का पालन करते हैं, क्योंकि हर आज्ञा के साथ सामान्यतः प्रतिफल की आशा जुड़ी है; परन्तु यह पाँचवीं आज्ञा के साथ विशेष रीति से जोड़ी गई है: “अपने पिता और अपनी माता का आदर करना, जिससे तेरी आयु लम्बी हो,” इत्यादि। अतः यह कोई अनोखी बात नहीं कि परमेश्वर ने रेकाबियों को प्रतिफल की प्रतिज्ञा दी, क्योंकि उन्होंने अपने पिता की आज्ञा का पालन किया, क्योंकि उसने व्यवस्था में इसकी प्रतिज्ञा की थी।
परन्तु पोप के अनुयायी जो यह दावा करते हैं कि कलीसिया के प्रति की गई आज्ञाकारिता इसी कारण परमेश्वर को प्रसन्न करती है, उसका, जैसा हमने कहा है, सहज ही खण्डन किया जा सकता है; क्योंकि यदि रेकाबियों ने किसी अनुचित बात में अपने पिता की आज्ञा का पालन किया होता, तो वे दण्ड के योग्य होते; परन्तु क्योंकि यह आज्ञा, जैसा हमने दिखाया है, परमेश्वर की व्यवस्था के विरुद्ध न थी, इसलिए परमेश्वर ने उनकी आज्ञाकारिता को स्वीकार किया। परन्तु जो नियम काल्पनिक आराधना-विधियाँ स्थापित करने के उद्देश्य से बनाए जाते हैं, वे पूर्णतः अधार्मिक हैं, क्योंकि वे मूर्तिपूजा को ले आते हैं। परमेश्वर ने ठहरा दिया है कि वह किस प्रकार चाहता है कि हम उसकी आराधना करें; इसलिए मनुष्य अपनी ओर से जो कुछ भी ले आते हैं वह पूर्णतः अधार्मिक है, क्योंकि वह परमेश्वर की शुद्ध आराधना को दूषित करता है; और इसके अतिरिक्त, जब विवेकों पर विवशता डाली जाती है, तो वह, जैसा हमने कहा है, अत्याचारपूर्ण दासता है। योनादाब का उद्देश्य ऐसा न था; क्योंकि उसने अपने वंशजों को जो आज्ञा दी वह उपयोगी थी, और केवल इस जीवन की बातों से सम्बन्धित थी; और उसने उनके विवेकों को नहीं बाँधा; क्योंकि जब आवश्यकता पड़ी तो वे यरूशलेम चले गए और दूसरों के समान घरों में रहे; क्योंकि उन्होंने यरूशलेम में तम्बू खड़े नहीं किए, बल्कि किराये के घरों में रहे; और फिर भी उन्होंने अपने पिता की आज्ञा मानी, क्योंकि उन्हें तम्बुओं में रहने की आज्ञा देने में उसका उद्देश्य यह था कि वे बन्धनमुक्त रहें, ताकि वे सदा कहीं भी जाने के लिए तैयार रहें। अतः हम देखते हैं कि पोप के अनुयायी अपने अत्याचारपूर्ण नियमों का समर्थन करने के लिए इस पद को कितनी मूर्खता से तोड़-मरोड़ते हैं।
और इस प्रकार यह सत्य स्थिर रह सकता है कि रेकाबियों की आज्ञाकारिता परमेश्वर को भाई, क्योंकि स्वयं स्वभाव यह माँगता है कि बच्चे अपने माता-पिता की आज्ञा मानें; और हम यह भी जानते हैं कि परमेश्वर प्रायः सद्गुणों की छायाओं को भी प्रतिफल देता है, ताकि यह दिखाए कि स्वयं सद्गुण उसे प्रिय हैं। परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि यह प्रतिज्ञा, जैसा मैंने पहले कहा है, जान-बूझकर दी गई थी, ताकि यहूदियों को उत्तेजित किया जाए, जैसा मूसा के गीत में कहा गया है, “मैं एक मूर्ख जाति के द्वारा उन्हें रिस दिलाऊँगा, क्योंकि उन्होंने उनके द्वारा जो ईश्वर नहीं हैं मुझे रिस दिलाई है; और मैं उनसे पलटा लूँगा, क्योंकि मैं ऐसी जातियों को उठाऊँगा जो पहले न थीं।” (व्यवस्थाविवरण 32:21)
अतः परमेश्वर अब यहूदियों को उत्तेजित करने और जगाने के लिए रेकाबियों को आशीष देने की प्रतिज्ञा करता है, क्योंकि वे अपने पिता के आज्ञाकारी रहे थे, योनादाब में से, अर्थात् योनादाब के वंश में से, कोई मनुष्य नाश न किया जाएगा, जो मेरे सम्मुख खड़ा रहता हो (शब्दशः); परन्तु क्योंकि पद की संक्षिप्तता उसे अस्पष्ट और द्विअर्थी बना देती है, इसलिए मैंने एक अंश जोड़ दिया है, — वरन् वह मेरे सम्मुख खड़ा रहे। और वह कहता है कि वे उसके सम्मुख खड़े रहेंगे, इसका अर्थ यह नहीं कि वे याजक या लेवीय होने वाले थे, जैसा कुछ रब्बियों ने कहा है, जिन्होंने इस पद को याजकपद पर लागू किया है, क्योंकि पवित्रशास्त्र में लेवियों और याजकों दोनों के विषय में प्रायः कहा गया है कि वे परमेश्वर के सम्मुख खड़े रहते थे। इसलिए वे सोचते हैं कि रेकाबियों के विषय में कहे जाने पर यहाँ भी वही अर्थ है। परन्तु यह खींचतान का अर्थ है। परमेश्वर केवल इतना संकेत करता है कि योनादाब के वंश में से कुछ लोग सदा जीवित रहेंगे, और वह भी उसके विशेष अनुग्रह से, ताकि उनकी आज्ञाकारिता अपने उचित प्रतिफल के बिना न दिखाई दे।
यही अर्थ है। अब आगे लिखा है —
326 इसका एक उदाहरण हम अहाब में देखते हैं, 1 राजाओं 21:27-29। — सं.
