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यिर्मयाह 40
यिर्मयाह 40:1-4
1. जब अंगरक्षकों के प्रधान नबूजरदान ने यिर्मयाह को रामा में उन सब यरूशलेमी और यहूदी बन्दियों के बीच हथकड़ियों से बन्धा हुआ पाकर, जो बाबुल जाने को थे, छुड़ा लिया, उसके बाद यहोवा का वचन उसके पास पहुँचा।
1. Sermo qui fuit ad Jeremiam a Jehova, postquam dimisit eum Nabuzardan, princeps interfectorum, e Ramah, quum sustulisset ipsum: et ipse vinctus erat cathenis (vel, manicis,) in medio captivitatis (hoc est, multitudinis captivae) Jerusalem et Jehudah, qui transferebantur Babylonem.
2. अंगरक्षकों के प्रधान ने यिर्मयाह को उस समय अपने पास बुलाकर कहा, इस स्थान पर यह जो विपत्ति पड़ी है, वह तेरे परमेश्वर यहोवा की कही हुई थी।
2. Et sumpsit princeps interfectorum Jeremiam, et dixit ad eum, Jehova Deus tuus loquutus est malum hoc super locum hunc;
3. और जैसा यहोवा ने कहा था वैसा ही उसने पूरा भी किया है। तुम लोगों ने जो यहोवा के विरुद्ध पाप किया और उसकी आज्ञा नहीं मानी, इस कारण तुम्हारी यह दशा हुई है।
3. Et adduxit et fecit Jehova sicut loquutus fuerat, quia peccastis Jehovae, et non audiistis vocem ejus; et fuit vobis res haec (hoc est, accidit vobis haec res.)
4. और अब देख, मैं तेरी इन हथकड़ियों को आज काट देता हूँ जो तेरे हाथों में हैं। यदि मेरे संग बाबुल में जाना तुझे अच्छा लगे तो चल, वहाँ मैं तुझ पर कृपादृष्टि रखूँगा; और यदि मेरे संग बाबुल जाना तुझे न भाए, तो यहीं रह जा। देख, सारा देश तेरे सामने पड़ा है, जिधर जाना तुझे अच्छा और ठीक जान पड़े उधर ही चला जा।
4. Et tu ecce (hoc est, quantum ad te,) ego ecce solvi te hodie a manicis (vel, cathenis, sed potius, a manicis, quoniam addit) quae erant super manus tuas (ideo perperam alii, vertunt, compedes, quia non ligantur compedibus;) si bonum in oculis tuis fecerit, ut venias (hoc est, si tibi placuerit venire) Babylonem, venias; ego autem ponam oculum meum super te; si autem malum in oculis tuis fuerit, ut venias Babylonem, desine (cessa, veI, supersedeas:) ecce tota regio coram facie tua est, ad bonum et rectum in oculis tuis, ad proficiscendum (hoc est, quod fuerit bonum et rectum in oculis tuis,) ut illic eas, eas.
यहाँ यिर्मयाह उस बात को अधिक विस्तार से बताता है जिसे उसने पहले संक्षेप में छुआ था; क्योंकि इब्रियों की यह रीति थी कि वे थोड़े शब्दों में पूरे विषय का सार कह देते थे, और फिर जो कुछ उन्होंने संक्षेप में कहा था उसे अधिक विस्तार से समझाते थे। यिर्मयाह ने पहले हमें बताया था कि बाबुली सेनापतियों में से कुछ उसे बन्दीगृह से छुड़ाने के लिए भेजे गए थे; और उसने यह भी जोड़ा था कि उसे गदल्याह की देखरेख में सौंप दिया गया, जो देश के कंगालों पर अधिकारी ठहराया गया था। अब वह हमें बताता है कि उसे, जब वह अब तक जंजीरों से बन्धा हुआ था, उसी दयनीय दशा में रामा तक लाया गया था। ये बातें परस्पर असंगत प्रतीत होती हैं; परन्तु, जैसा मैंने कहा है, हमें स्मरण रखना चाहिए कि उस सारांश में, जिसकी हमने चर्चा की है, कुछ बातें छोड़ दी गई थीं। क्योंकि पहले स्थान पर यिर्मयाह ने केवल इतना कहा था कि वह अपनी जंजीरों से छुड़ाया गया; परन्तु अब वह उसकी रीति को अधिक स्पष्टता से, और मानो उस घटना के अलग-अलग अंशों को बताता है। अतः इस क्रम पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
इसके अतिरिक्त, यह अध्याय इस प्रकार आरम्भ होता है कि ऐसा लगता है मानो वह पूरे अध्याय में अपनी भूमिका को भूल गया हो। वह कहता है कि उसके पास एक वचन पहुँचा; फिर वह इतिहास के रूप में बताता है कि वह किस प्रकार रामा तक लाया गया, और फिर वहाँ छोड़ दिया गया, और यह भी कि गदल्याह बचे हुए लोगों पर अधिकारी ठहराया गया: संक्षेप में, इस लम्बे खण्ड में किसी भविष्यद्वाणी का कोई उल्लेख नहीं है; परन्तु भविष्यद्वक्ता के यह प्रकट करने से पहले कि नगर के ले लिए जाने के बाद, और उसके अपनी पहली स्वतन्त्रता में लौटाए जाने के बाद, परमेश्वर ने उसे क्या सौंपा था, बीच में एक पूरा ऐतिहासिक वृत्तान्त रख दिया गया है। इसलिए जब वह यहाँ कहता है कि उसके पास एक वचन पहुँचा, तो हमें तब तक प्रतीक्षा करनी चाहिए जब तक वह उस बात को पूरा न कर ले जो हम इस अध्याय में पाते हैं; क्योंकि तब वह इस भविष्यद्वाणी पर लौट आएगा।
अब हम शब्दों पर विचार करें। वह कहता है, जब नबूजरदान ने उसे रामा से विदा किया, इत्यादि; उस स्थान पर उसे पहरेदार तब लाए थे जब वह अब तक जंजीरों से बन्धा हुआ था। अतः इसमें कोई सन्देह नहीं कि सेना के प्रधानों ने आज्ञा दी थी कि यिर्मयाह को, पहरे के आँगन से निकाले जाने के बाद, वहाँ लाया जाए, और वह सारे लोगों के सामने वहाँ लाया गया; क्योंकि यह भी सम्भव है कि सब यहूदी, जिन्हें बँधुआई में ले जाया जाना था, वहीं लाए गए थे, और वहाँ उनकी गिनती की गई कि कोई बच न निकले; क्योंकि यदि वे पहरेदारों को न सौंपे जाते तो वे इधर-उधर खिसक जाते। इसलिए जब सब बन्दी वहाँ थे, तब नबूजरदान ने यिर्मयाह को सामने लाने की आज्ञा दी, उसका अपमान करने के लिए नहीं; क्योंकि, जैसा हम देख चुके हैं, राजा उसके प्राण के विषय में चिन्तित था; और निःसन्देह यह दरबारी हर प्रकार से अपने राजा को प्रसन्न करना चाहता था: परन्तु इसके विपरीत, यह सारे लोगों को परोक्ष रूप से डाँटने के उद्देश्य से था, मानो वह परमेश्वर के उस सेवक का आदर करना चाहता हो जिसने उन्हें इतनी विश्वासयोग्यता से, और इतने लम्बे समय तक, अर्थात् चालीस वर्ष से भी अधिक, चेतावनी दी थी, और उनके सामने उनकी दुष्टता तथा उनकी कृतघ्नता भी रखना चाहता हो, कि उन्होंने परमेश्वर के सेवक के साथ इतनी क्रूरता का व्यवहार किया था।
तो यही कारण था कि नबूजरदान चाहता था कि यिर्मयाह जंजीरों से बन्धा हुआ आए और सारे लोगों के सामने छोड़ा जाए; यह इसलिए था कि यहूदी अन्ततः परमेश्वर के विरुद्ध अपने घमण्ड और अभक्ति पर, और पवित्र भविष्यद्वक्ता के प्रति अपनी कृतघ्नता पर लज्जित हों। अतः नबूजरदान ने यिर्मयाह के साथ अपमानजनक व्यवहार नहीं किया; परन्तु वह उसे जंजीरों में इसलिए सामने लाया कि सारी जाति की दुष्टता को सबके सामने प्रकट करे।
वह कहता है कि नबूजरदान ने उसे चुनने का अधिकार दिया; कि यदि वह चाहे तो अपने ही देश में रह सकता है, और अपने लिए सबसे अच्छा स्थान, और जो स्थिति उसे सबसे अधिक भाए, चुन सकता है; परन्तु यदि वह बाबुल जाना अधिक पसन्द करे, तो वहाँ जा सकता है। निश्चय ही यह एक उदार प्रस्ताव था। भविष्यद्वक्ता न केवल बन्दीगृह से छुड़ाया गया और अपनी जंजीरों से मुक्त किया गया; परन्तु उसे ऐसी स्वतन्त्रता दी गई कि जब सारी जाति दासत्व में डाल दी गई, तब अकेला वही स्वतन्त्र था। क्योंकि जो लोग पीछे रह गए उन्हें कहीं और जाने की स्वतन्त्रता नहीं थी। परन्तु नबूजरदान ने यहाँ यिर्मयाह को खुला चुनाव दिया, कि वह चाहे तो कसदियों के देश में रहे, या जिस स्थान में चाहे, या पृथ्वी के किसी भी भाग में रहे।
परन्तु यह कहने से पहले वह लोगों को डाँटता है, और कहता है, तेरे परमेश्वर यहोवा ने इस नगर पर विपत्ति की बात कही थी; और उसने उसे ला दिया, और घटित कर दिया।
यहाँ नबूजरदान ने भविष्यद्वक्ता का पद अपने ऊपर ले लिया, और लोगों पर परमेश्वर के धर्ममय पलटे के विषय में ऊँचे शब्दों में बात की। इसमें कोई सन्देह नहीं कि परमेश्वर ने यहूदियों के लिए ऐसा शिक्षक खड़ा किया था; क्योंकि उन्होंने चालीस वर्ष और उससे भी अधिक समय तक हठपूर्वक स्वर्गीय सत्य को ठुकराया था। परमेश्वर ने कृपापूर्वक उन्हें मन फिराने के लिए बुलाना, और यदि वे मन फिराएँ तो उनसे क्षमा और उद्धार की प्रतिज्ञा करना नहीं छोड़ा था। अतः जब परमेश्वर ने इतने लम्बे समय तक, और निरन्तर, अपनी पितृतुल्य भलाई के अनुसार उनसे बातें करना नहीं छोड़ा था, और फिर भी वह मानो बहिरों से बोल रहा था, तो वे इसी योग्य थे कि नबूजरदान जैसे उपदेशक की बात सुनें, जो अब अपमान के साथ उन्हें उलाहना दे रहा था कि यह विपत्ति उन्होंने स्वयं अपने ऊपर बुलाई है, क्योंकि वे परमेश्वर के प्रति आज्ञा न माननेवाले और विद्रोही रहे थे, और उन्होंने उसके वचन को नहीं माना था।
यहाँ हमारे सामने एक उल्लेखनीय उदाहरण रखा गया है, जिससे हम यह सीखें कि जब परमेश्वर अपने सेवकों के द्वारा हमसे बातें करता है, तो हमें तुरन्त उसकी आज्ञा माननी चाहिए; जब वह हमें धमकाता है तब हम डरना सीखें, और जब वह हमें अपना अनुग्रह प्रदान करता है तब आशा रखना सीखें। क्योंकि यदि हम भविष्यद्वक्ताओं को, जब वे हमारे पास भेजे जाते हैं, ठुकरा दें, तो दूसरे शिक्षक उठ खड़े होंगे जो हमारा उपहास करेंगे, और चाहे वे स्वयं भक्तिहीन हों, फिर भी वे हमारी अभक्ति के कारण हमें उलाहना देंगे। तो यही वह शिक्षा है जो हमें इस खण्ड से ग्रहण करनी चाहिए, जिसमें हम देखते हैं कि नबूजरदान ने, मानो भविष्यद्वाणी के आत्मा से सम्पन्न होकर, लोगों को कठोरता से डाँटा। निस्सन्देह उसने यिर्मयाह को सम्बोधित किया, और ऐसा प्रतीत होता है कि उसने उसे भी लोगों के साथ सम्मिलित कर लिया, जब उसने कहा, तेरे परमेश्वर ने कहा है — क्योंकि तुमने पाप किया है और विद्रोही रहे हो। परन्तु निःसन्देह नबूजरदान ने इस प्रकार यिर्मयाह की विश्वासयोग्यता की बड़ी प्रशंसा की, क्योंकि वह अपनी बुलाहट और पद में सच्चा और विश्वासयोग्य रहा था; अतः उसने उसे लोगों में से एक नहीं ठहराया, न ही उसका यह अर्थ था कि उसने दूसरों के साथ पाप किया था, या परमेश्वर के प्रति विद्रोही रहा था। परन्तु पहले स्थान पर उसने यिर्मयाह को सम्बोधित किया, तेरे परमेश्वर ने, उसने कहा; और यह आदर के रूप में कहा गया, अर्थात् यह कि परमेश्वर यिर्मयाह का परमेश्वर था; क्योंकि यद्यपि लोग घमण्ड करते थे कि वे पवित्र हैं, फिर भी नबूजरदान ने यहाँ परोक्ष रूप से उनके मूर्खतापूर्ण घमण्ड को दोषी ठहराया, क्योंकि उसने संकेत किया कि केवल यिर्मयाह ही परमेश्वर के सेवकों में गिने जाने के योग्य था, मानो उसने कहा हो कि यहूदी परमेश्वर के नाम पर गर्व करने, या उसका अंगीकार करने के आदर के योग्य नहीं थे: अतः तेरे परमेश्वर ने कहा है — शेष कल।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जैसे तूने प्रतिज्ञा की है कि हम तेरे लिए आँख की पुतली के समान होंगे, — हाँ, यह वरदान दे कि हम सदा तेरी दया की छाया के नीचे शरण लें, और गड़बड़ी और दुःख के समयों में केवल यही हमारी शान्ति हो: और साथ ही हम भरोसे के साथ तेरी सहायता पर टिके रहें, कि जो कुछ तू हमें आज्ञा देता है, और जो करना हमारा कर्तव्य है, उसे हम सच्चाई से पूरा करें, ताकि हम अनुभव से यह जान लें कि जो तेरी वाणी मानते हैं वे सब सचमुच तेरे हाथ से सम्भाले जाते हैं, और जो अपनी आज्ञाकारिता का निश्चित प्रतिफल तुझ से आशा करते हैं वे कभी निराश नहीं होते; और हम इस जीवन में ऐसी दृढ़ता से युद्ध करते रहें कि हम जान लें कि जब तेरा एकलौता पुत्र मसीह प्रकट होगा, तब स्वर्ग में हमारे लिए प्रतिफल रखा हुआ है। — आमीन।
एक सौ तिरपनवाँ व्याख्यान
कल हमने नबूजरदान के उन शब्दों की व्याख्या आरम्भ की थी जो उसने सब यहूदियों के सामने कहे थे। हमने कहा है कि यद्यपि उसने अपने शब्द यिर्मयाह की ओर किए, फिर भी जो कुछ उसने कहा वह सारे लोगों से सम्बन्धित था; क्योंकि उसने यिर्मयाह की प्रशंसा में बात की, और उसकी भविष्यद्वाणियों पर अपनी सहमति की मुहर लगाई: इसी से उसने यह निष्कर्ष निकाला कि लोग अपने अत्यन्त कठोर दण्ड के योग्य थे। वह कहता है कि परमेश्वर ने कहा था; इसलिए नहीं कि उसे यिर्मयाह के शब्दों पर विश्वास था, परन्तु जहाँ तक उसने देखा कि वे उसके उद्देश्य के लिए उपयोगी हैं।
जिस बात को वह स्वीकार करता था उसे उसने आनन्द से पकड़ लिया, जैसा भक्तिहीन मनुष्य करते हैं, जो परमेश्वर की व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं में से वह ग्रहण कर लेते हैं जो उनके लिए उपयोगी है, यद्यपि वे उनका बहुत आदर नहीं करते; और फिर भी वे धर्म के लिए बड़ी चिन्ता का दिखावा करते हैं। नबूजरदान के साथ भी ऐसा ही था; जब उसने यहूदियों पर विजय पा ली, तब उसने घमण्ड किया कि वह परमेश्वर का सेवक है; वह कहता है, यहोवा ने कहा है, मानो उसने कहा हो कि यहूदियों ने वैसा ही दण्ड भोगा जिसके वे योग्य थे, क्योंकि परमेश्वर ने बहुत पहले घोषणा कर दी थी कि वह उन्हें दण्ड देगा।
और फिर वह जोड़ता है कि परमेश्वर ने जैसा कहा था वैसा ही किया, क्योंकि उन्होंने पाप किया था और उसकी वाणी पर कान नहीं लगाया था। वह स्वयं कुछ भी उनसे अच्छा नहीं था; परन्तु, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, उसने साहस के साथ दूसरों को डाँटा। और कपटियों और परमेश्वर के सब तिरस्कार करनेवालों में यह एक सामान्य बात है; वे दूसरे के मुकद्दमे में न्यायी बन बैठते हैं, परन्तु, जैसा किसी ने कहा है, झोले के दूसरे भाग की ओर नहीं देखते। इस प्रकार सब लोग दूसरों को दोषी ठहराने में तीव्र और पर्याप्त तत्पर रहते हैं; और इसका एक उदाहरण हमें यहाँ नबूजरदान में मिलता है; क्योंकि मानो वह लोगों का वैध न्यायी हो, उसने घोषणा की कि नगर और मन्दिर का विनाश संयोग से नहीं हुआ था, परन्तु यह परमेश्वर द्वारा दुष्टों पर डाला गया न्यायोचित दण्ड था, क्योंकि उन्होंने हठपूर्वक भविष्यद्वक्ता की शिक्षा को ठुकरा दिया था, और वे अड़ियल और आज्ञा न माननेवाले रहे थे।
और वास्तव में इसमें कोई सन्देह नहीं, जैसा हमने कल संकेत किया था, कि परमेश्वर ने यहूदियों को और अधिक लज्जा के सामने खड़ा करने के लिए उनके लिए यह भविष्यद्वक्ता खड़ा किया; क्योंकि जब यिर्मयाह ने उनसे बातें कीं, और वह भी उनकी रक्षा के लिए, जबकि मन फिराने का समय अभी शेष था, तब उन्होंने हठ के साथ परमेश्वर के उस अनुग्रह को ठुकरा दिया था। अतः वे इसी योग्य थे कि एक विदेशी शिक्षक उनसे बिना किसी लाभ के बातें करे, जो उन पर विजय का आनन्द मनाता था, जैसा इस अविश्वासी अन्यजाति ने इस अवसर पर किया।
यिर्मयाह को दिए गए चुनाव के विषय में हमने कल कहा था कि यह यहूदियों के सामने खुले रूप में किया गया, ताकि नबूजरदान उन्हें और अधिक घायल करे।
परन्तु साथ ही परमेश्वर का यह उद्देश्य था कि अपने सेवक की दृढ़ता को एक उदाहरण बनाए, जैसा हम आगे देखेंगे। अब हम आगे बढ़ें, —
यिर्मयाह 40:5
5. वह वहाँ से लौट न पाया था, कि नबूजरदान ने फिर उससे कहा, गदल्याह जो अहीकाम का पुत्र और शापान का पोता है, जिसको बाबुल के राजा ने यहूदा के नगरों पर अधिकारी ठहराया है, उसके पास लौट जा और उसके संग लोगों के बीच रह, या जहाँ कहीं तुझे जाना ठीक जान पड़े वहीं चला जा। तब अंगरक्षकों के प्रधान ने उसको भोजन-सामग्री और कुछ भेंट भी देकर विदा किया।
5. Adhuc autem non reversus erat (hoc per parenthesin legendum est) et revertere ad Godoliam filium Achikam filii Saphan, quem praefecit rex Babylonis urbibus Jehudah, et habita cum eo in medio populi, vel ad quemcunque locum qui visus erit in oculis tuis ad proficiscendum illuc proficiscere; et dedit illi princeps interfectorum cibum et munus (est enallage numeri, munera) et demisit eum.
यिर्मयाह उसी वृत्तान्त को आगे बढ़ाता है, कि नबूजरदान ने उसके साथ उदारता का व्यवहार किया, और उसे जहाँ वह चाहे वहाँ जाने की अनुमति दी। इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि नबूकदनेस्सर को यिर्मयाह की ईमानदारी और खराई का पूरा निश्चय था।
क्योंकि वह जानता था कि उसके अपने लोगों में उसे किस दृष्टि से देखा जाता था, और कि यदि वह खरा और शान्त न होता तो बड़े उपद्रव खड़े कर सकता था। अतः जब नबूकदनेस्सर को यिर्मयाह के चरित्र के विषय में कोई सन्देह नहीं था, तो वह उसे यह पूरी स्वतन्त्रता देना चाहता था कि वह जिस नगर में चाहे अपना निवास चुन ले, या जहाँ उसे अच्छा लगे वहाँ चला जाए। उसे बाबुल चलने का निमन्त्रण दिया गया, और साथ में कृपा की प्रतिज्ञा भी जोड़ी गई; परन्तु उसे यह भी अनुमति दी गई कि वह अपने ही देश में रहे।
मैंने कहा है कि यह परमेश्वर के उद्देश्य के अनुसार हुआ, ताकि भविष्यद्वक्ता अपनी भक्ति का प्रमाण दे। क्योंकि यदि वह कसदियों के देश में चला जाता, तो सम्भव था कि बहुतों का भरोसा टूट जाता, और प्रतिज्ञाओं पर विश्वास लुप्त हो जाता: क्योंकि यदि भविष्यद्वक्ता वहाँ चला जाता, तो वे इसे आशाहीन निराशा का चिह्न समझ सकते थे। अतः निर्बल मनों को विचलित न करने के लिए उसने अपने ही देश में रहना अपना कर्तव्य समझा। और इसी कारण परमेश्वर ने नबूकदनेस्सर के मन को और उसके प्रधानों के मनों को ऐसा झुकाया कि वे पवित्र भविष्यद्वक्ता को यहूदिया में रहने की स्वतन्त्रता दें, मानो बन्दियों के लिए एक झण्डा खड़ा करने के लिए, और सत्तर वर्ष के बाद उनकी वापसी को पूरा करने के लिए। तौभी हम शीघ्र ही देखेंगे कि उसे कहीं और ले जाया गया; परन्तु इससे उसकी भविष्यद्वाणियाँ किसी भी प्रकार व्यर्थ नहीं हुईं, क्योंकि उपद्रवी मनुष्य उसे बन्दी के रूप में ले गए, और अन्ततः वह मिस्र में मर गया। परन्तु उसने अपनी इच्छा से यहूदिया को नहीं छोड़ा, यद्यपि वहाँ उसे शोक और दुःख के सिवा कुछ नहीं मिला; क्योंकि उसने अपने आपको प्रसन्न नहीं किया, न ही वह खाने-पीने की बहुतायत में किसी सुख-विलास में लिप्त हो सकता था, परन्तु वह निरन्तर अपनी जाति के पतन पर, और विशेष रूप से मन्दिर के विनाश पर विलाप करता रहता था। अतः जब उसने यहूदिया को अन्य सब देशों से बढ़कर चुना, और इतनी विपत्तियों का निरन्तर दर्शक बने रहना स्वीकार किया, तो उसने अपने विश्वास और धीरज का उल्लेखनीय प्रमाण दिया, और इस प्रकार दुःखी निर्वासितों के विश्वास को दृढ़ किया, कि वे जान लें कि परमेश्वर अब भी अपनी प्रजा पर दयालु और अनुग्रहकारी रहेगा।
वह नबूजरदान के शब्दों को आगे बताता है, परन्तु वह यह वाक्यांश बीच में रखता है, वह अभी लौटा नहीं था, अर्थात् क्योंकि वह अभी लौटा नहीं था। तब नबूजरदान ने कहा, "गदल्याह के पास लौट जा, अर्थात् यदि तू मेरे पीछे चलने की अपेक्षा यहीं रहना अधिक पसन्द करता है, तो गदल्याह के पास जा।" यहाँ नबूजरदान दिखाता है कि वह किस प्रकार चाहता था कि यिर्मयाह उस देश में सुरक्षित रहे, जो अब तक मानो डाकुओं की खोह के समान था, अर्थात् यह कि वह गदल्याह के साथ रहे। और हम देखते हैं कि नबूजरदान भविष्यद्वक्ता के प्राण की रक्षा के लिए कितना चिन्तित था, क्योंकि वह चाहता था कि गदल्याह उसका रक्षक हो, जैसा उसने पहले संक्षेप में कहा था; परन्तु अब वह इस विषय को अधिक पूर्णता और विस्तार से उसके सामने रखता है; वह कहता है, गदल्याह के पास लौट जा, जिसे बाबुल के राजा ने यहूदा के नगरों पर अधिकारी ठहराया है, और उसके संग रह; वह संकेत करता है कि यदि यिर्मयाह गदल्याह के साथ रहे तो वह बिना जोखिम के रहेगा, क्योंकि उसे बाबुल के राजा ने यहूदा पर अधिकारी ठहराया था। साथ ही वह बात दोहराई गई है जिसे हम पहले देख चुके हैं, कि यह भविष्यद्वक्ता के अधिकार में था कि वह चाहे गदल्याह के पास जाए या कहीं और; वह कहता है, जो भी स्थान तेरी दृष्टि में जाने के लिए ठीक जान पड़े, वहीं जा। अतः उसने उसके लिए कोई निश्चित स्थान नियत नहीं किया, परन्तु उसे कहीं भी जाने की अनुमति दी; जिससे भविष्यद्वक्ता अपने लिए चाहे यहूदिया में या यहूदिया के बाहर निवास-स्थान चुन ले।
इसके बाद यह आता है कि उसने उसे भोजन दिया; क्योंकि मैं {,}ארחהareche का यही अनुवाद करता हूँ, यद्यपि कुछ लोग इसका अर्थ "भेंट" करते हैं; परन्तु इसका अर्थ भोजन है, जैसा हम आगे इक्यावनवें अध्याय में देखेंगे, जहाँ यिर्मयाह प्रतिदिन की रोटी के विषय में बात करता है। दूसरे शब्द {,}משאהmeshae को मैं दान या भेंट के अर्थ में लेता हूँ। तब नबूजरदान ने परमेश्वर के सेवक को भोजन और अन्य दान दिए। जहाँ तक भोजन का सम्बन्ध है, भविष्यद्वक्ता उसे भली-भाँति स्वीकार कर सकता था, क्योंकि हम जानते हैं कि नगर के ले लिए जाने के बाद उसे हर वस्तु का अभाव रहा होगा। पहले भी वह बहुत तंगी और दुःख में रहता था, और उसे प्रतिदिन केवल रोटी का एक टुकड़ा मिलता था। और अब जब नबूजरदान ने उसे भोजन दिया, तो कोई कारण नहीं था कि वह पवित्र जन ऐसे अभाव में जो कुछ उसे दिया गया उसे ग्रहण न करे। परन्तु भेंटों के विषय में ऐसा प्रतीत हो सकता है कि यिर्मयाह अपने आपको भूल गया; क्योंकि उसके लिए यह लज्जा की बात थी कि वह परमेश्वर की प्रजा के एक शत्रु से अपनी शिक्षा के बदले भेंट या दान ग्रहण करे; क्योंकि भविष्यद्वक्ता के प्रति यह कृपा और उदारता कहाँ से उत्पन्न हुई, सिवाय इसके कि नबूजरदान जानता था कि उसकी भविष्यद्वाणी स्वयं उसकी अपनी जाति के विनाश से सम्बन्धित थी? अतः ऐसा प्रतीत होता है कि इसी कारण वह उस पवित्र जन को पुरस्कार देना चाहता था; तो उसे इन भेंटों को अस्वीकार कर देना चाहिए था। परन्तु सम्भव है कि वह किसी बड़ी धनराशि या बहुमूल्य वस्तुओं से धनी नहीं बना; नबूजरदान ने उसे केवल सद्भावना का कोई चिह्न दिया; और भविष्यद्वक्ता बिना किसी सन्देह के उस भेंट को ग्रहण कर सकता था, अपनी शिक्षा के पुरस्कार के रूप में नहीं, परन्तु उसकी पुष्टि के रूप में जो परमेश्वर की ओर से दी गई थी; क्योंकि जब तक वह विश्वासयोग्यता से उनके बीच अपना परिश्रम लगाता रहा, तब तक यहूदी उसके शत्रु बने रहे थे; क्योंकि जब उसने उन्हें कड़ी डाँट दी, तब उसका उनके कल्याण को सुनिश्चित करने के सिवा कोई और उद्देश्य नहीं था। परन्तु जब यहूदियों ने उसके साथ इतना निर्दय व्यवहार किया था, तो परमेश्वर की इच्छा थी कि अब्राहम की सन्तान की अपेक्षा, जो घमण्ड करते थे कि वे परमेश्वर की पवित्र प्रजा हैं, एक अन्यजाति और बर्बर जाति उसके प्रति अधिक मानवता दिखाए। तो इसी कारण यिर्मयाह ने नबूजरदान के हाथ से दान ग्रहण किए। इसके बाद यह आता है, —
यिर्मयाह 40:6
6. तब यिर्मयाह अहीकाम के पुत्र गदल्याह के पास मिस्पा को गया, और वहाँ उन लोगों के बीच जो देश में रह गए थे, उसके संग रहने लगा।
6. Et venit Jeremias ad Godoliam filium Achikam in Mispath; et habitavit cum eo in medio populi, qui residui erant in terra.
यहाँ हमें भविष्यद्वक्ता की दृढ़ता दिखाई गई है, कि उसने उस बात को अस्वीकार करने में संकोच नहीं किया जो नबूजरदान ने कृपापूर्वक उसके सामने रखी थी; और फिर भी वह मानो कसदियों के देश को तुच्छ समझकर बड़ा अपराध कर सकता था। जैसा हम जानते हैं, वह एक अत्यन्त मनोहर और बहुत उपजाऊ देश था; और अत्याचारी शासक अपनी उदारता का तिरस्कार सहन नहीं कर सकते; क्योंकि जब वे किसी का आदर करना चाहते हैं, तो चाहे जो कुछ वे दें वह कितना ही थोड़ा क्यों न हो, यदि वह उसे अस्वीकार करे, तो वे इसे अपना अपमान समझते हैं। अतः भविष्यद्वक्ता संकोच और भय से दबकर कसदियों के देश को जा सकता था। उसका साहस करके सीधे-सीधे उस प्रस्ताव को अस्वीकार करना, और यह माँगना कि वह अपने ही देश में रहे, इस बात का प्रमाण और साक्ष्य था कि उसे मनुष्यों के सब अनुग्रहों से, और जो कुछ वह बाबुल और कसदियों के देश के धन से आशा कर सकता था उन सबसे बढ़कर, धर्म की अधिक चिन्ता और परमेश्वर की कलीसिया की अधिक परवाह थी।
इससे हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने भेंटें ग्रहण करते समय ऐसा कुछ भी स्वीकार नहीं किया जिसके विषय में वह न जानता हो कि वह परमेश्वर की कलीसिया के लाभ के लिए होगा। साथ ही उसने उस अपराध को तुच्छ समझा जो वह अपने ही देश में रहना चुनकर कर सकता था; क्योंकि, जैसा हमने कहा है, यह ऐसा था मानो उसने यहूदियों को लौटने का निमन्त्रण देने के लिए एक झण्डा खड़ा किया हो, और इस प्रकार उनकी बँधुआई के अस्थायी होने के विषय में अपनी भविष्यद्वाणी की सच्चाई प्रमाणित की हो, जिसके अन्त की आशा सत्तर वर्ष के बाद की जानी थी। इसी कारण वह कहता है कि वह गदल्याह के पास गया, और लोगों के बीच, अर्थात् उनके बीच जो देश में रह गए थे, रहने लगा। इसके बाद यह आता है, —
यिर्मयाह 40:7-8
7. योद्धाओं के जो दल दिहात में थे, जब उनके सब प्रधानों ने अपने जनों समेत सुना कि बाबुल के राजा ने अहीकाम के पुत्र गदल्याह को देश का अधिकारी ठहराया है, और देश के जिन कंगाल लोगों को वह बाबुल को बन्दी करके नहीं ले गया, क्या पुरुष, क्या स्त्री, क्या बाल-बच्चे, उन सभों को उसे सौंप दिया है,
7. Et audierunt omnes principes exercituum qui erant in agro, ipsi et viri eorum, quod praefecisset rex Babylonis Godoliam filium Achikam in terra; et quod commiserat ei viros et mulieres et parvulum (hoc est, parvulos, sed fere in singulari numero hoc nomen legitur tam singulari quam plurali·significatione,) et ex paupertate terrae ex his qui non fuerant translati Babylonem;
8. तब नतन्याह का पुत्र इश्माएल, कारेह के पुत्र योहानान और योनातान, तन्हूमेत का पुत्र सरायाह, एपै नतोपाई के पुत्र, और किसी माकाई का पुत्र याजन्याह अपने जनों समेत गदल्याह के पास मिस्पा में आए।
8. Et venerunt ad Godoliam in Mispath Ishmael filius Nathaniae et Jochanan (Joannes) et Jonathan filii Chareah et Seraiah filius Thanekumeth et filii Ophi, qui erat Nethophites, et Jazanias filius Maachati, ipsi et viri eorum.
गदल्याह का उल्लेख पहले हो चुका है। हम देख चुके हैं कि भविष्यद्वक्ता एक बार उसकी कृपा से मृत्यु से बचाया गया था, क्योंकि जब लगभग सब ने एक मत होकर पवित्र भविष्यद्वक्ता को मृत्यु के योग्य ठहराया था, तब उसने उसके लिए बीच-बचाव किया था। और परमेश्वर ने उसे कोई साधारण आदर नहीं दिया, कि जब वह कुछ भी नहीं खोज रहा था, तब नबूकदनेस्सर ने उसे देश पर अधिकारी ठहराया। निस्सन्देह उसने बहुत समय तक अधिकार का भोग नहीं किया; फिर भी परमेश्वर की इच्छा थी कि वह उस भक्त जन की ओर अपना हाथ बढ़ाए, जिससे उसे कम से कम कुछ समय के लिए अपने अनुग्रह का कोई प्रमाण मिले। अन्त में, जैसा हम देखेंगे, वह विश्वासघात से मार डाला गया।
345 यहाँ एक भूल है; वह उसका पिता अहीकाम था जिसने भविष्यद्वक्ता को छुड़ाया था, जैसा छब्बीसवें अध्याय (यिर्मयाह 26) में लिखा है। — सं.
अब भविष्यद्वक्ता हमें बताता है कि सेनाओं के प्रधान, जो पहले अपने दलों समेत तितर-बितर हो गए थे, अब उसके पास आए। जब भविष्यद्वक्ता कहता है कि वे मैदान में थे, तो मैं कुछ लोगों के समान यह नहीं सोचता कि वे वे लोग थे जो नगर के ले लिए जाने पर भाग गए थे। परन्तु सम्भवतः वे वे लोग थे जिन्हें कसदी सेना के पहले प्रवेश के समय नगरों से भागने के लिए विवश होना पड़ा था। और न यह सम्भव प्रतीत होता है कि वे तब बच निकले, जब राजा के सब साथी यरीहो के मैदान में जा पकड़े गए और बन्दी बना लिए गए, जैसा हम पहले देख चुके हैं। अतः मेरा विचार है कि वे वे लोग थे जो अपने शत्रुओं के पहले आगमन पर अपने को सौंपे गए नगरों को छोड़कर इधर-उधर तितर-बितर हो गए थे। अतः जब वे अपने ही देश से भटकते और निर्वासित रहे थे, तो अब वे गदल्याह के पास लौट आए। यह कहकर कि सेनाओं के प्रधानों ने सुना, उसका यह अर्थ नहीं कि उनके पास अब कोई सेना थी, परन्तु यह कि वे अपने दलों समेत यहूदिया के नगरों और कस्बों पर नियुक्त किए गए थे।
तब वे और उनके जन गदल्याह के पास आए, जब उन्होंने सुना कि बाबुल के राजा ने अहीकाम के पुत्र गदल्याह को यहूदिया पर अधिकारी ठहराया है, और कि पुरुष, स्त्रियाँ और बालक उसके अधिकार या रखवाली में सौंप दिए गए हैं। और फिर वह जोड़ता है, देश के कंगालों में से, अर्थात् प्रजा के तलछट में से, उन्हीं में से जो बाबुल को नहीं ले जाए गए थे: वे आए, अर्थात् इश्माएल इत्यादि; जो, जैसा हम आगे देखेंगे, विश्वासघाती निकला। वह, जैसा भविष्यद्वक्ता कहता है, राजवंश का था।
उसका मन अब भी बहुत ऊँचा था, और डाह से प्रेरित होकर उसने गदल्याह को मार डाला, यद्यपि गदल्याह ने उसका कृपापूर्वक स्वागत किया था। साथ ही उसने अपने विश्वासघात का पुरस्कार अम्मोन के राजा से पाया था। परन्तु ये सब बातें हम आगे देखेंगे।
वह यहाँ भागे हुए प्रधानों के नाम बताता है, जिनमें पहला इश्माएल था, और उनमें कारेह के पुत्र भी थे; जिन्होंने गदल्याह से अपनी निष्ठा की प्रतिज्ञा की थी; परन्तु वह अत्यधिक विश्वास करनेवाला था, और साथ ही उसने बुद्धिमानी की सम्मतियों और चेतावनियों की ओर से अपने कान बन्द कर लिए।
भविष्यद्वक्ता आगे बताता है कि गदल्याह ने अपनी जाति के साथ कैसा व्यवहार किया, —
यिर्मयाह 40:9-10
9. और गदल्याह जो अहीकाम का पुत्र और शापान का पोता था, उसने उनसे और उनके जनों से शपथ खाकर कहा, कसदियों के अधीन रहने से मत डरो; देश में रहते हुए बाबुल के राजा के अधीन रहो, तब तुम्हारा भला होगा।
9. Et juravit illis Godolias filius Achikam et viris eorum, dicendo, Ne metuatis a serviendo (hoc est, ne metuatis servire, ne impediat vos timor quo minus serviatis Chaldaeis;) sed subjicite vos et servite regi Babylonis; et bene erit vobis.
10. और मैं तो इसलिये मिस्पा में रहता हूँ कि जो कसदी हमारे पास आएँ उनके सामने हाज़िर हुआ करूँ; परन्तु तुम दाखमधु और धूपकाल के फल और तेल को बटोरकर अपने बरतनों में रखो और अपने लिए हुए नगरों में बसे रहो।
10. Et ego, ecce ego manebo in Mispath, ut stem coram facie Chaldaeorum (hoc est, ut occurram Chaldaeis) qui venient ad nos; et vos colligite vinum et fructus aestivos ({}קיףsignificat oestatem, sed transfertur metaphorice ad oestivos fructus,) et oleum; et reponite in vasis vestris, et habitate in urbibus quas apprehenderitis.
यहाँ, जैसा मैंने संकेत किया है, गदल्याह की बड़ी मानवता का, और अपनी जाति के प्रति उसकी भक्तिपूर्ण चिन्ता का भी वर्णन किया गया है, ताकि नतन्याह के पुत्र का विश्वासघात और क्रूरता और भी अधिक घृणित दिखाई दे, जिसने ऐसे मनुष्य को घूस लेकर मार डाला जिसने उसके और दूसरों के प्रति अपने आचरण में इतनी भलाई की थी।
भविष्यद्वक्ता कहता है कि उसने उनसे शपथ खाई; और ऐसी उथल-पुथल की दशा में शपथ बीच में लाना कोई अनोखी बात न थी। इश्माएल और बाकी लोगों को कठिनाई से ही कोई भरोसा हो सकता था, क्योंकि कसदी उनके प्रति अत्यन्त शत्रुता रखते थे; निश्चय ही वे बड़े भय और घबराहट में रहे होंगे। इसलिये एक उपाय की आवश्यकता थी, अर्थात् यह कि गदल्याह उन्हें अपनी खराई का निश्चय दिलाए। यही कारण था कि उसने शपथ खाई; क्योंकि यदि शान्ति का समय होता, तो शपथ आवश्यक न होती। परन्तु जब उनका प्राण मानो एक धागे पर लटका था, और वे चारों ओर बहुत से संकट देखते थे, तब पुष्टि की आवश्यकता थी; और गदल्याह ने भी उन्हें बिना कुछ जोखिम उठाए ग्रहण नहीं किया; क्योंकि कसदियों को यह अच्छा नहीं लगता था कि ऐसे मनुष्य देश में बने रहें। क्योंकि हम देख चुके हैं कि इसी कारण हाकिम मार डाले गए थे, और फिर प्रजा के सब प्रमुख पुरुष कसदियों के देश को ले जाए गए थे, कहीं ऐसा न हो कि उनमें से कोई नए उपद्रव का प्रयत्न करे। इसलिये नबूकदनेस्सर का उद्देश्य देश को शान्त रखना था; और किसी भी उपद्रव को रोकने का यही सबसे अच्छा उपाय था। तब निःसन्देह गदल्याह ने देखा कि यह कसदियों को बहुत भाता न होगा, तौभी उसकी मानवता और अपनी जाति के प्रति उसकी चिन्ता प्रबल हुई, यहाँ तक कि उसने न केवल उनका अतिथि-सत्कार के साथ स्वागत किया, वरन् शपथ खाकर उनसे प्रतिज्ञा भी की कि उनके लिये सुरक्षा होगी। इसलिये उसने उन्हें ढाढ़स रखने, और कसदियों की सेवा करने का भी उपदेश दिया। निश्चय ही उनसे विशेष रूप से यही अपेक्षा थी कि वे अपने आप को सौंप दें, क्योंकि उनकी दशा आशाहीन थी। तब गदल्याह ने प्रतिज्ञा की कि कसदी स्वेच्छा से किए गए आत्मसमर्पण से सन्तुष्ट रहेंगे; और उसने उनसे यह भी प्रतिज्ञा की कि देश में उनके लिये सुरक्षित निवास होगा।
और उसने उन्हें आज्ञा दी कि दाखमधु, अन्न और फल बटोरकर रख लें, क्योंकि युद्ध का कोई भय न रहेगा। उसने उन्हें यह भी आज्ञा दी कि वे उन नगरों में बसें जिन्हें उन्होंने ले लिया था, या जिनमें वे खदेड़े गए थे। यहाँ क्रिया द्विअर्थी है; परन्तु मैं उसका सबसे शाब्दिक अर्थ पसन्द करता हूँ, जिन्हें तुमने ले लिया है। निश्चय ही वे बल और शस्त्रों से किसी नगर को नहीं ले सकते थे, क्योंकि उनके पास थोड़े ही जन थे, और वे अपने शत्रुओं की बराबरी कभी नहीं कर सकते थे। अतः नगरों को बलपूर्वक ले लेना यहाँ अभिप्रेत नहीं है; परन्तु गदल्याह का अभिप्राय यह था कि वे जहाँ कहीं भी हों वहाँ सुरक्षित रह सकते हैं, या जिस किसी नगर में पहुँचें उसमें बस सकते हैं। परन्तु यह बड़ी बात थी जब उसने उनसे कहा कि वह उनके लिये खड़ा रहेगा; क्योंकि इस प्रकार उसने अपना प्राण दाँव पर लगा दिया, मानो उसने कहा हो कि वह जमानतदार होगा कि उन पर कोई विपत्ति न आएगी। और इससे और भी स्पष्ट दिखाई देता है कि उसने अपना ध्यान नहीं रखा, वरन् उसे दिए गए अधिकार का उपयोग सार्वजनिक भलाई के लिये किया; क्योंकि यदि उसमें महत्वाकांक्षा होती, तो निःसन्देह वह बाबुल के राजा की कृपा पाने के लिये अधिक सावधान रहता, और वह ऐसी कठोर और हठीली प्रजा के साथ उनके शत्रुओं से कम क्रूरता का व्यवहार न करने का निश्चय करता। परन्तु जब उसने मुर्गी के समान अपने पंख फैलाए, कि अपनी जाति के बचे हुओं को उनके नीचे इकट्ठा करे, तो यह बिलकुल स्पष्ट प्रकट होता है कि उसे अपनी निजी सुरक्षा की कोई चिन्ता न थी, वरन् राजा नबूकदनेस्सर ने उसे जो भी अधिकार दिया था, उसने उसे पूरी रीति से सार्वजनिक भलाई के लिये लगाया।
अतः इन शब्दों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए, और मैं, देखो, मैं मिस्पा में रहूँगा, कि खड़ा रहूँ इत्यादि, अर्थात् कि जो कसदी हमारे पास आएँ उनसे मैं मिलूँ, अर्थात् कहीं ऐसा न हो कि वे किसी शत्रुतापूर्ण उद्देश्य से तुम पर चढ़ आएँ। इसके बाद यह आता है —
यिर्मयाह 40:11-12
11. फिर जब मोआबियों, अम्मोनियों, एदोमियों और अन्य सब देशों में रहनेवाले सब यहूदियों ने सुना कि बाबुल के राजा ने यहूदियों में से कुछ लोगों को बचा रहने दिया है और उन पर गदल्याह को जो अहीकाम का पुत्र और शापान का पोता है अधिकारी नियुक्त किया है,
11. Atque etiam omnes Judaei qui erant in Moab (hoc est, apud Moabitas) et apud filios Ammon, et apud ldumaeos (et in Edom,) et quicunque erant in omnibus terris (hoc est, qui dispersi erant per varios regiones,) audierunt quod dimisisset rex Babylonis reliquias (residuum aliquod) Jehudah, et quod praefecisset illis Godoliam filium Achikam filii Saphan;
12. तब सब यहूदी जिन जिन स्थानों में तितर-बितर हो गए थे, वहाँ से लौटकर यहूदा देश के मिस्पा में गदल्याह के पास आए; और बहुत दाखमधु और धूपकाल के फल बटोरने लगे।
12. Et venerunt omnes Judaei (venerunt ergo omnes Judaei) ex cunctis locis ad quae expulsi fuerunt et venerunt (reversi sunt) in terrain Jehudah ad Godoliam in Mispath; et collegerunt vinum et fructus aestivos multos valde (hoc est, in magna copia.)
भविष्यद्वक्ता यहाँ दिखाता है कि यदि भीतरी दुष्टता न उठ खड़ी होती, तो निर्वासन का समय बीत जाने तक प्रजा की दशा सहने योग्य रहती।
परमेश्वर ने, जैसा पहले कहा जा चुका है, सत्तर वर्ष पहले से ठहरा दिए थे। नबूकदनेस्सर प्रजा के श्रेष्ठ भाग को पहले ही इस रीति से ले जा चुका था कि फिर भी कुछ निवासी बचे रहे, ताकि देश बिलकुल नंगा और उजाड़ न हो जाए। क्योंकि जो कंगाल छोड़ दिए गए थे उनके अतिरिक्त, वह हमें पहले ही बता चुका है कि कुछ प्रमुख पुरुष अपनी टुकड़ियों के साथ आए। अब वह जोड़ता है कि सब यहूदी, जो पड़ोसी जातियों में भाग गए थे, गदल्याह के पास आए; कुछ ने अम्मोनियों के बीच शरण ली थी, और कुछ ने मोआबियों के बीच; ये आकर देश में बस गए। इस प्रकार परमेश्वर ने अपने पलटा लेने की कठोरता को ऐसा कम किया कि सारी प्रजा के पुनःस्थापन तक कुछ बचे हुए लोग यहूदिया में बने रहे।
परन्तु दूसरी ओर, उन लोगों का हठ जिन्होंने पहले उसकी कृपा को तुच्छ जाना था, अत्यन्त स्पष्ट रूप से दिखाया गया है। निःसन्देह परमेश्वर ने उनकी चरम दुष्टता को प्रकट करना चाहा; क्योंकि उन्होंने न केवल राजा नबूकदनेस्सर की दया को तुच्छ जाना, वरन् अपने ही विनाश की ओर सिर के बल दौड़ पड़े; क्योंकि उनके क्रोध और उन्माद ने उन्हें अपने ही अगुवे को मार डालने तक पहुँचा दिया, और इस प्रकार सब कुछ उलट-पुलट हो गया, क्योंकि इससे विजेता का क्रोध भड़क सकता था कि वह बन्दियों को और देश में छोड़े गए लोगों को भी मारकर प्रजा का नाम ही मिटा दे। इसी बात को दिखाना अध्याय के इस भाग में भविष्यद्वक्ता का उद्देश्य था।
वह कहता है कि सब यहूदी; वह ज़ोर देने के लिये {,}גםgam निपात जोड़ता है, और सब यहूदी भी, जो या तो मोआबियों के पास, या अम्मोनियों के पास, या एदोमियों के पास, या अन्य देशों के अन्य भागों में भाग गए थे। इसमें सन्देह नहीं कि उनकी संख्या काफ़ी बड़ी थी। तब सारे देश में बहुत से निवासी रहे होंगे; और यद्यपि वह घनी बस्तीवाला न था, तौभी जिस उजाड़ का भय हो सकता था वह चरम सीमा का न था। इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि जब गदल्याह ने सेनाओं के अगुवों और उनके साथियों से सुरक्षा की प्रतिज्ञा की, तब उसने कोई बढ़ा-चढ़ाकर बात नहीं कही। सो जब उसने शपथ खाई कि वे सब सुरक्षित रहेंगे, तो उसने उन्हें धोखा नहीं दिया, क्योंकि उसने सचमुच अपनी विश्वासयोग्यता प्रमाणित की, क्योंकि ये दुखी निर्वासित, जो यहूदिया में लौट आए, निडर होकर बसे रहे, और परमेश्वर ने उन्हें फलों की भरपूर बहुतायत भी दी, यहाँ तक कि वे अपने ही देश में सुख से रहने लगे। नगर के ले लिए जाने से पहले ये भटकनेवाले थे, और निःसन्देह उन्हें बड़ी कंगाली और अभाव सहना पड़ा होगा। परन्तु अब प्रभु ने उन्हें राहत दी, और उन्हें बहुतायत से तृप्त किया।
परन्तु इससे हम और भी पूरी रीति से जानते हैं कि इश्माएल और उसके साथियों की अभक्ति और दुष्टता कितनी बड़ी रही होगी, जिन्हें न केवल गदल्याह की देखरेख और संरक्षण में अपने ही देश में सुख से रहने की स्वतन्त्रता थी, वरन् जो आशीषों की बहुतायत का भी आनन्द लेते थे। क्योंकि जब उनमें से सबसे दुखी लोगों ने भी फलों की बड़ी बहुतायत बटोरी, तो उनके पास सब अच्छी वस्तुओं का बड़ा भाग हो सकता था। इसलिये उनकी कृतघ्नता और भी अधिक घृणित दिखाई दी। और यह भी प्रकट होता है कि उनका हठ कितना चरम और असाध्य था, कि जब उन्होंने यरूशलेम को नष्ट, मन्दिर को जला हुआ, और वहाँ हुए भयानक संहार को देखा, तब भी वे न हिले और न प्रभावित हुए; और विशेषकर तब जब वे जानते थे कि नबूजरदान ने परमेश्वर के पलटा लेने के विषय में क्या प्रचार किया था, और उन्हें डाँटने में भविष्यद्वक्ता का काम किया था। कि उन्होंने इस प्रकार इतनी हठ से परमेश्वर की आशीषों को ठुकराया और जो कुछ उसने उनके लिये किया उसका विरोध किया, यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण था कि वे भयंकर रूप से जड़बुद्धि थे; और यही भविष्यद्वक्ता दिखाना चाहता था, जैसा हम आगे देखेंगे। परन्तु मुझे यहीं समाप्त करना चाहिए।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जब हम तेरे न्यायों पर विचार करने में पर्याप्त ध्यान नहीं देते, तब हम दूसरों के उदाहरणों से बुद्धिमान होना सीखें, और जो कुछ तू अपने दास भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा हमें सिखाता है उस पर ऐसा मनन करें कि उसे अपने ही उपयोग में लाएँ, और इस प्रकार अपने आप को तेरे प्रति सीखने योग्य और आज्ञाकारी बनाएँ; और विशेषकर जब तू अपने कोड़ों से हमारी ताड़ना करे, तब हम तेरी सामर्थ्य का विरोध न करें, वरन् तेरे अधीन ऐसे हो जाएँ कि अन्त में तेरी दया से उठाए जाएँ और शान्ति पाएँ, और पूर्ण उद्धार में पुनःस्थापित किए जाएँ, हमारे प्रभु मसीह यीशु के द्वारा। —
आमीन।
एक सौ चौवनवाँ व्याख्यान
यिर्मयाह 40:13-14
13. तब कारेह का पुत्र योहानान और मैदान में रहनेवाले सब दलों के प्रधान मिस्पा में गदल्याह के पास आकर
13. Et Johanan (Joannes) filius Chareah et omnes duces copiarum qui fuerant in agro, venerunt ad Godoliam in Mispath;
14. कहने लगे, क्या तू जानता है कि अम्मोनियों के राजा बालीस ने नतन्याह के पुत्र इश्माएल को तुझे जान से मारने के लिये भेजा है? परन्तु अहीकाम के पुत्र गदल्याह ने उनकी प्रतीति न की।
14. Et dixerunt ei, An sciendo scis, quod Baalis rex filiorum Ammon misit Ismael filium Nathaniae qui percutiat to in anima? Sed non credidit illis Godolias filius Achikam.
यहाँ एक दुःखद वृत्तान्त दिया गया है, जिससे हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि नगर के विनाश और मन्दिर के जलाए जाने से प्रजा के विरुद्ध परमेश्वर का क्रोध शान्त नहीं हुआ था। यह दया का कुछ चिह्न था, जब गदल्याह प्रजा के बचे हुओं और कंगालों पर ठहराया गया, जिन्हें देश में रहने दिया गया था। परन्तु अब गदल्याह मारा जाता है, और अवश्य ही एक दुखद तितर-बितर होना उसके बाद हुआ होगा। बाबुल के राजा का क्रोध भी भड़क उठा, क्योंकि जो कसदी रक्षकों के रूप में दिए गए थे, वे भी उसी समय मार डाले गए। तब परमेश्वर का उद्देश्य था कि इन बचे हुओं पर भी अपना न्याय पूरा करे।
परन्तु भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि गदल्याह कैसे मारा गया, अर्थात् इसलिये कि इश्माएल को अम्मोन के राजा ने भाड़े पर रखा और उकसाया था। तौभी वह कहता है कि कारेह के पुत्रों ने, जिनका उल्लेख हो चुका है, उसे चेतावनी दी थी, परन्तु उसने उन पर विश्वास न किया। और इसलिये भविष्यद्वक्ता यह कहकर आरम्भ करता है कि कारेह का पुत्र योहानान और दूसरे अगुवे उसके पास आए। जैसा हम देख चुके हैं, उसने पहले उनका स्वागत किया था, और उनसे शपथ खाई थी कि वह उनका रक्षक होगा, ताकि कोई उनकी हानि न करे; उसने सब संकटों का सामना करने का भार अपने ऊपर लिया था, और अपना सिर बन्धक के रूप में दे दिया था कि कसदी उनके विरुद्ध कुछ न करेंगे। सो वे उसके पास आए, क्योंकि उसकी सुरक्षा के साथ सार्वजनिक लाभ जुड़ा हुआ था; उसने उन्हें कोई साधारण उपकार करके अपने साथ नहीं बाँधा था, और उनकी भलाई इसी में थी कि वह, जो बाबुल के राजा का कृपापात्र था, सुरक्षित और निश्चिन्त रहे।
इसलिये उन्होंने आकर कहा कि नतन्याह के पुत्र इश्माएल को अम्मोन के राजा ने गुप्त रूप से उकसाया है। हो सकता है कि अम्मोन के राजा ने यह आशा की हो कि वह यहूदिया का राजा बनेगा, या कसदी सेना के चले जाने के बाद वह सारा देश उसका अपना हो जाएगा। परन्तु जब उसकी आशा निष्फल हुई, तो उसने दूसरी बात का प्रयत्न आरम्भ किया, कि उपद्रव खड़े करके देश को उजाड़ कर दे। सो यही कारण प्रतीत होता है कि उसने इश्माएल को गदल्याह को मार डालने का अभक्तिपूर्ण और घिनौना काम करने के लिये उभारा।
गदल्याह ने जो उनकी बातों पर विश्वास न किया, उसके विषय में यहाँ एक प्रश्न उठाया जा सकता है, कि परमेश्वर ने ऐसा कैसे होने दिया कि यह पवित्र पुरुष, जो ऐसे दुर्लभ सद्गुणों से सम्पन्न था, एक विश्वासघाती और हत्यारे के हाथ से नीचता से मार डाला जाए? पहले तो हमें इसे सत्य मानना चाहिए कि परमेश्वर के न्याय धर्ममय हैं, चाहे वे हमारी धारणाओं से मेल न खाएँ। निश्चय ही पहली दृष्टि में यह बहुत अबूझ प्रतीत होता है कि गदल्याह मार डाला जाए, जो मानो मृत्यु में से उभर आया था, और कसदियों का कृपापात्र बन गया था; परन्तु परमेश्वर का उद्देश्य था कि उसे अपने पास उठा ले, और साथ ही प्रजा पर अपना पलटा पूरी सीमा तक ले; क्योंकि हम देखेंगे कि जो लोग छोड़ दिए गए थे वे परमेश्वर की कृपा के बिलकुल अयोग्य थे; और हम यह भी देखेंगे कि वे पागल जंगली पशुओं के समान मृत्यु की ओर सिर के बल दौड़े, और अपने विरुद्ध परमेश्वर के क्रोध को भड़काने से कभी न रुके।
तो आओ, इस खण्ड से हम यह सीखें कि जब परमेश्वर अपने दासों को इस संसार से बुलाता है, तब वह उनके उद्धार का ध्यान रखता है, ताकि मृत्यु उनकी भलाई के लिये हो। क्योंकि गदल्याह देख सकता था कि यदि वह और अधिक जीवित रहता, तो उस पर सौ मृत्युओं से भी अधिक कड़वी बातें आ पड़तीं। सो परमेश्वर की इच्छा थी कि उसे समय रहते उठा ले, इससे पहले कि वह दुःखों से दब जाए। क्योंकि प्रजा को परमेश्वर की भलाई के विरुद्ध हठपूर्वक संघर्ष करते देखना, जब तक कि उनका अन्तिम विनाश न आ जाए, शोक का कोई छोटा कारण न था। सो यह हठ उस पवित्र पुरुष के लिये अविश्वसनीय शोक का कारण हो सकता था: इसलिये प्रभु ने उसे उचित समय पर उठा लिया। इस बीच, जैसा मैंने कहा है, उसने अपने क्रोध के लिये मार्ग खोल दिया, ताकि जब यह प्रकट हो गया कि जो बचे हुए बचाए गए थे वे दया के बिलकुल अयोग्य थे, तब वे बाकी लोगों के साथ नष्ट कर दिए गए।
परन्तु दूसरी बात यह है कि हम देखते हैं कि गदल्याह में सद्गुण के साथ एक दोष मिला हुआ था। निश्चय ही प्रेम सन्देह नहीं करता, जैसा पौलुस कहता है, और उसे किसी दोषारोपण को सहज में ग्रहण नहीं करना चाहिए। (1 कुरिन्थियों 13:5।) परन्तु उसे सावधान रहना चाहिए था, न केवल अपने लिये, वरन् इसलिये कि उसकी मृत्यु अपने साथ सारी प्रजा का विनाश ले आई।
अतः उसे और अधिक सचेत रहना चाहिए था। परन्तु इससे हम सीखते हैं कि विशेष सद्गुणों से सम्पन्न श्रेष्ठतम मनुष्यों के लिये भी अपना आचरण ऐसा रखना कितना कठिन है कि वे किसी भी ओर न भटकें। यह एक प्रशंसनीय सरलता थी कि गदल्याह को सन्देह न हुआ कि इश्माएल इतना विश्वासघाती और इतना दुष्ट होगा; परन्तु चूँकि इस बात में उसने न अपना और न सार्वजनिक सुरक्षा का ध्यान रखा, इसलिये वह दोष का भागी था। परन्तु, जैसा मैंने कहा है, परमेश्वर का उद्देश्य था कि उसे उसके विश्राम में ले जाए, क्योंकि यदि वह जीवित रहता, तो वह सौ बार विपत्तियों से दब जाता। अभक्त मनुष्य उस पवित्र पुरुष की स्मृति को कलंकित कर सकते हैं, क्योंकि वह इतना मूढ़ रहा था: परन्तु जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, कि चूँकि उसे इस या उस ओर भटकना ही था, इसलिये यह अच्छा था कि जब तक इश्माएल दोषी न पाया जाए, तब तक उस पर दोष न लगाया जाए। गदल्याह की एकमात्र भूल यह थी कि जिस विश्वासघात की उसे चेतावनी दी गई थी, उसकी उसने उपेक्षा की। अब यह आता है —
यिर्मयाह 40:15-16
15. फिर कारेह के पुत्र योहानान ने गदल्याह से मिस्पा में छिपकर कहा, मुझे जाकर नतन्याह के पुत्र इश्माएल को मार डालने दे, और कोई इसे न जानेगा; वह क्यों तुझे मार डाले, और जितने यहूदी लोग तेरे पास इकट्ठे हुए हैं वे क्यों तितर-बितर हो जाएँ और बचे हुए यहूदी क्यों नष्ट हों?
15. Et Joannes filius Kareah dixit ad Godoliam in secreto in Mispath, dicendo, lbo nunc (vel, agedum eam) et percutiam Ismael filium Nathaniae ita ut nemo sciat: quare percutiet to in anima, 346 et dissipabuntur totus Jehudah, qui congregati sunt ad te (hoc est, dissipabuntur qui congregati sunt ad te ex toto Jehudah,) et peribit residuum Jehudah?
16 अहीकाम के पुत्र गदल्याह ने कारेह के पुत्र योहानान से कहा, ऐसा काम मत कर, तू इश्माएल के विषय में झूठ बोलता है।
16. Et dixit Godolias filius Achikam Joanni filio Kareah, Ne feceris hanc rem, quia merdacium tu loqueris contra Ismael.
हम यहाँ देखते हैं कि वह पवित्र पुरुष अन्धा कर दिया गया था, यहाँ तक कि उसने न केवल उसे दी गई सम्मति की उपेक्षा की, वरन् उसे दी गई सहायता को भी ठुकरा दिया। फिर यह प्रशंसा के योग्य बात है कि वह नहीं चाहता था कि कारण जाने बिना इश्माएल उतावली से मार डाला जाए; परन्तु उसे सावधानी से जाँच करनी चाहिए थी, और बात का पता लगने पर वह अपनी रक्षा कर सकता था, और एक दुष्ट मनुष्य और सार्वजनिक विपत्ति को मृत्यु-दण्ड दे सकता था। वह तलवार से सुसज्जित था; और यदि वह इस विषय पर ध्यान ही देता, अर्थात् यदि वह इस तथ्य को निश्चित करने का कष्ट उठाता, तो वह इश्माएल को न्याय के साथ दण्ड दे सकता था। सो चूँकि उसे अधिकार दिया गया था, क्योंकि नबूकदनेस्सर ने उसे देश पर ठहराया था, इसलिये वह इस बात में दोषी था कि उसने पलटा लेने से अपना हाथ रोक लिया, (क्योंकि वह कोई साधारण व्यक्ति न था,) परन्तु उसने विश्वास न किया कि इश्माएल में इतना बड़ा विश्वासघात है, जिसे वह एक ईमानदार और खरा मनुष्य, और अपना मित्र समझता था। तौभी एक ओर सरलता और दूसरी ओर क्रूरता के बीच एक मध्य मार्ग है। यदि वह तुरन्त इश्माएल के विरुद्ध भड़क उठता, तो यह निन्दनीय क्रूरता होती; क्योंकि हमें निर्दोष मनुष्यों को दोषी ठहराने के लिये सिर के बल नहीं बह जाना चाहिए; क्योंकि यदि हम हर प्रकार की निन्दा को बिना भेद के ग्रहण करें, तो कोई मनुष्य निर्दोष नहीं रह सकता। परन्तु जैसा मैंने कहा है, गदल्याह ऐसा आचरण कर सकता था कि हर एक व्यर्थ अफ़वाह पर विश्वास करके इश्माएल के साथ अन्याय न करे, और फिर भी अपना ध्यान रख सके। यदि वह जाँच करता, और मामले को जानकर उसी के अनुसार निर्णय करता, तो वह ऐसा कर सकता था; परन्तु उसने जान-बूझकर अपनी आँखें बन्द कर लीं, और इस प्रकार एक बड़ी भूल की।
346 “वह तेरे प्राण को क्यों मारे (या, क्यों घात करे)?” ऐसा ही सब अनुवाद और तरगूम कहते हैं। परन्तु {{נפש का अर्थ प्रायः शव या मृत देह होता है, लैव्यव्यवस्था 21:1; लैव्यव्यवस्था 22:4। तब सबसे स्पष्ट अनुवाद यह होगा, “वह तुझे क्यों मारकर शव बना दे?” या, “वह तुझे क्यों मारकर लाश कर दे?” ब्लेनी अर्थ तो देता है, पर अनुवाद नहीं, “वह तेरा प्राण क्यों ले ले?” — सं.
परन्तु इससे हम देखते हैं कि यद्यपि अन्य बातों में वह विवेक और दूरदर्शिता से रहित न था, तौभी इस विषय में वह मानो स्वस्थ बुद्धि से रहित था; क्योंकि परमेश्वर का उद्देश्य था कि अपने न्याय के लिये मार्ग खोले, ताकि वह प्रजा के बचे हुओं को नष्ट करे। और साथ ही हम देखते हैं कि जब हम न्यायी, सहनशील और सन्देह-रहित होना चाहते हैं, तब अनुचित न करना कितना कठिन है। संक्षेप में, हमें सिखाया जाता है कि संयम बरतना कितनी कठिन बात है, और यह सद्गुण कितना दुर्लभ है। इश्माएल तुरन्त विश्वासघात और दुष्टता का दोषी सिद्ध किया जा सकता था; यही गदल्याह करना नहीं चाहता था; और क्यों? क्योंकि वह उस मनुष्य में कोई बुराई का सन्देह नहीं करना चाहता था जिसे वह निष्कपट और विश्वासयोग्य समझता था। अच्छा, परन्तु साथ ही उसने कारेह के पुत्र योहानान के साथ, और सेनाओं के अन्य अगुवों के साथ अन्याय किया। वे उसके पास आए, एक या दो मनुष्य नहीं, वरन् वे प्रधान जिन्हें राजा सिदकिय्याह ने सैनिकों पर ठहराया था। ये उसके पास आए, इसलिये उनका आरोप विश्वसनीय था। गदल्याह ने क्या कहा? तू झूठ बोलता है, उसने कहा। उसने कारेह के पुत्र योहानान को, जो फिर भी उसके प्रति शुभचिन्तक था और उसे उसके संकट से बचाना चाहता था, निन्दापूर्वक ठुकरा दिया। इससे हम स्पष्ट देखते हैं कि श्रेष्ठतम मनुष्य भी कभी ऐसा आचरण नहीं करते कि न्याय और मानवता के बहाने प्रायः आलस्य और लापरवाही में न पड़ जाएँ; और जब वे एक के प्रति दयालु होना चाहते हैं, तब बहुतों के प्रति निर्दयता और निन्दा से व्यवहार करते हैं। इसलिये सदा परमेश्वर की शरण लेना आवश्यक है, कि वह विवेक के आत्मा के द्वारा हम पर शासन करे। अब गदल्याह की हत्या का वृत्तान्त आता है।
