यिर्मयाह और विलापगीत पर टीका · खण्ड 2 · यिर्मयाह 38

यिर्मयाह 38

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यिर्मयाह 38

यिर्मयाह 38:1-4

1. फिर जो वचन यिर्मयाह सब लोगों से कहता था, उनको मत्तान के पुत्र शपत्याह, पशहूर के पुत्र गदल्याह, शेलेम्याह के पुत्र यूकल और मल्किय्याह के पुत्र पशहूर ने सुना, अर्थात् यह वचन,

1. Et audivit Saphatias fillus Matthew tam, et Guadalias filius Passhur, et Juchal filius Selemiae et Passhur filius Malchiae, sermones quos Jere-mias loquutus fuerat ad toturm popu-lum, dicendo,

2. यहोवा यों कहता है, जो कोई इस नगर में रहेगा वह तलवार, महँगी और मरी से मरेगा; परन्तु जो कोई कसदियों के पास निकल भागे वह जीवित रहेगा; उसका प्राण लूट के समान उसके पास रहेगा, और वह जीवित रहेगा।

2. Sic dicit Jehova, Qui manebit in urbe hac morietur gladio, fame et peste; qui autem egressus fuerit ad Chaldaeos, rivet et erit ei anima sua in spolium et vivet.

3. यहोवा यों कहता है, यह नगर बाबुल के राजा की सेना के वश में निश्चय कर दिया जाएगा और वह इसको ले लेगा।

3. Sic dicit Jehova, Ecce tradendo tradetur haec urbs in manum exer-citus regis

Babylonis, et capiet eam.

4. इसलिए उन हाकिमों ने राजा से कहा, उस पुरुष को मरवा डाल, क्योंकि वह जो ऐसे-ऐसे वचन कहता है, इससे इस नगर में बचे हुए योद्धाओं और अन्य सब लोगों के हाथ ढीले कर देता है। वह पुरुष इस प्रजा के लोगों की भलाई नहीं वरन् बुराई ही चाहता है।

4. Et dixeunt principes ad regem, Moriatur nunc (vel, agedum, est hor-tantis particula {)}נאvir iste, quoni-am propterea (vel, hoc modo) solvit manus virorum bellicosorum, qui residui sunt in urbe hac, et manus totius populi, loquendo ad ipsos se-cundum istos sermones; quoniam hic vir non quaerit pacem (hoc est, non spectat ad pacem) populo huic (populi hujus) quin potius ad malum.

भविष्यद्वक्ता अब दिखाता है कि उसे फिर से बन्दीगृह के आँगन से घसीटकर भीतर के उस भाग में ले जाया गया जो अन्धकारमय, गन्दा और कब्र के समान था। इसका कारण वह बताता है: यह इसलिए हुआ कि चार हाकिमों ने उसके वचन सुन लिए थे। सम्भव है कि बहुत से लोग भविष्यद्वक्ता की बातें सुनने के लिए वहाँ आए थे, और उसने कोई सन्देश पाकर उसे हर एक आनेवाले को सुना दिया। अतः यद्यपि वह बन्दीगृह में बन्द था, तौभी परमेश्वर का वचन बाँधा न जा सका, जैसा कि पौलुस कहता है, जिसने इस बात पर गर्व किया कि यद्यपि वह जंजीरों में था, तौभी सत्य दूर-दूर तक फैलता गया (2 तीमुथियुस 2:9)। यिर्मयाह के विषय में भी ऐसा ही हुआ; यद्यपि वह बन्दी बनाकर रखा गया था, तौभी उसने अपना पद निभाना नहीं छोड़ा; और इसमें कोई सन्देह नहीं कि राजा का उद्देश्य इसी रीति से उसे रोकना था। वह बन्दीगृह मानो भविष्यद्वाणी के सत्य की बन्धुआई था। परन्तु राजा और उसके मन्त्री धोखे में थे; क्योंकि यिर्मयाह बन्दीगृह के आँगन में उससे कम स्वतन्त्र न था मानो वह दिन भर नगर में घूमता फिरता हो; वरन् उसके बहुत से प्रचारक थे।

परन्तु यहाँ जिन चार हाकिमों का उल्लेख है, अर्थात् शपत्याह, गदल्याह, यूकल और पशहूर, वे उस पर घात लगाए हुए थे। तब जिन चार हाकिमों के वह नाम लेता है, उन्होंने छल से उसकी कही बातों की ताक में रहकर तुरन्त हलचल मचा दी। इसमें सन्देह नहीं कि राजा के पास आने से पहले ही उन्होंने भविष्यद्वक्ता के विनाश की युक्ति रच ली थी; क्योंकि हम जानते हैं कि सिद्धान्तहीन और दुष्ट लोग जब बुराई पर तुले होते हैं तो आपस में मिलकर बातों पर विचार करते हैं, और उनकी दरबारी चालबाज़ियों को भी गिनती में लेना चाहिए। अतः जब वे चारों अधिकार के पद पर थे, तो निस्सन्देह उन्होंने राजा की सभा के अधिकांश लोगों को प्रभावित किया होगा, और सीधे-सादे लोगों को, अर्थात् जो स्वयं बुराई पर तुले न थे, बहका लिया होगा। अन्त में यह मामला राजा के सामने लाया गया; और इसलिए वह आगे कहता है कि वे राजा के पास आए। परन्तु पहले वह उस शिक्षा का वर्णन करता है जिसके कारण इन सिद्धान्तहीन मनुष्यों ने उसके विरुद्ध इतना द्वेष भड़काया और उसके प्राण को संकट में डाला। अतः वह कहता है कि उस पर यह दोष लगाया गया कि उसने न केवल यरूशलेम के सब निवासियों को विनाश की धमकी दी थी, वरन् जो कोई कसदियों के पास निकल जाए उन सब को जीवन की प्रतिज्ञा भी दी थी: जो कोई नगर में रहेगा वह तलवार, महँगी या मरी से मरेगा; परन्तु जो कोई कसदियों के पास निकल जाएगा वह जीवित रहेगा। यही वह दोष था।

हम अन्यत्र देख चुके हैं कि भविष्यद्वक्ता पहले भी यही बात कह चुका था; अतः यह कोई नई बात न थी, क्योंकि उस समय से तीस वर्ष पहले उसने मन्दिर में यही बात स्पष्ट रूप से घोषित की थी, और तब वह भविष्यद्वाणी के रूप में लिखी गई और मन्दिर के द्वारों पर लगा दी गई थी। इसलिए यिर्मयाह के मुँह से यह सब सुनना कोई नई बात न थी। परन्तु जैसा मैं कह चुका हूँ, राजा और उसके दरबारी समझते थे कि वह विपत्तियों से इतना दब गया है कि मुँह भी कठिनाई से खोल पाएगा। संक्षेप में, वे समझते थे कि जब से वह पवित्र जन बन्दीगृह में है, तब से मानो उसकी जीभ ही जाती रही है।

अतः यही कारण था कि उन्होंने अब राजा के सामने उस पर इतना गम्भीर दोष लगाया और उसे मृत्यु के योग्य ठहराया। यदि उसने अब कोई प्राणदण्ड के योग्य अपराध किया होता, तो वह बहुत वर्ष पहले ही मृत्यु के योग्य हो चुका होता। परन्तु जैसा मैं कह चुका हूँ, वे समझते थे कि भविष्यद्वक्ता ने जान-बूझकर राजा के अधिकार को तुच्छ जाना है, और वे इस बात से क्रुद्ध थे कि वह दबाया नहीं जा सकता था, यद्यपि वह बन्दी था और हर घड़ी संकट को निकट देख सकता था। अतः यही कारण था कि यिर्मयाह की कही हुई बात को उन्होंने नई बात समझा, जो कोई नगर में रहेगा वह नाश होगा, इत्यादि।

इन धमकियों के विषय में हम अन्यत्र कह चुके हैं कि जो कोई मिस्रियों से सहायता की आशा रखते थे वे सब जान-बूझकर परमेश्वर को तुच्छ जाननेवाले थे; क्योंकि भविष्यद्वक्ता ने बार-बार उन सब को समझाया था कि वे उस अस्थायी दण्ड को, जिसे परमेश्वर ने उन पर डालने का निश्चय किया था, शान्ति और अधीनता से सह लें। वे अपने हठ में परमेश्वर के न्याय को दूर हटाना चाहते थे, और फिर जब उन्होंने देखा कि परमेश्वर उनका शत्रु है, तो उन्होंने मिस्रियों को अपना मित्र बना लेना ही पर्याप्त समझा। अतः यह कोई आश्चर्य की बात न थी कि भविष्यद्वक्ता ने उनके भाग में तलवार, महँगी और मरी ठहराई।

फिर वह आगे कहता है, जो कोई कसदियों के पास चला जाएगा वह जीवित रहेगा। तौभी वह शर्त बहुत कठोर थी; वह कहता है, उसका प्राण लूट के समान उसके पास रहेगा, मानो उसने कहा हो, “जो कसदियों के पास भाग जाएगा वह केवल अपना प्राण बचाएगा, परन्तु उसे अपनी सारी सम्पत्ति की हानि सहनी पड़ेगी,” जैसे जब जहाज़ के टूटने का भय होता है, तो ऐसा कोई नहीं जो अपनी सारी वस्तुओं की हानि उठाकर अपना प्राण बचाने को तैयार न हो; और इसलिए अत्यन्त संकट में व्यापारी अपना सब कुछ समुद्र में फेंक देते हैं, क्योंकि वे अपने धन के साथ नाश होने की अपेक्षा खाली हाथ और सब वस्तुओं से रहित होकर बन्दरगाह तक बच निकलना अधिक उत्तम समझते हैं। अतः वह शर्त कठोर थी; परन्तु भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि वे और किसी रीति से बच नहीं सकते थे; उन्हें अपना देश और अन्य सब वस्तुएँ छोड़नी थीं, और वे केवल अपना प्राण बचा सकते थे। इसी कारण वह कहता है कि उनका प्राण लूट के समान उनके पास रहेगा, जैसे जब कोई वस्तु आग में से झपटकर निकाली जाती है, या जब कोई लूटपाट के बीच में फँसा हो, तो वह चुपके से कुछ ले जाने में ही सन्तुष्ट रहता है, क्योंकि अन्यथा यदि वह बहुत सी वस्तुएँ ले जाना चाहे, तो उसे बहुत से शत्रुओं से जूझना पड़ेगा।

अतः भविष्यद्वक्ता संकेत करता है कि यहूदी अपना सब कुछ फेंक देने और केवल अपना प्राण बचाने की चिन्ता करने के सिवाय और किसी रीति से अपने आप को मृत्यु से नहीं बचा सकते थे। वह फिर दोहराता है, वह जीवित रहेगा। इस दोहराव के द्वारा उसने उन पर और अधिक दबाव डाला, और अधिक गम्भीरता से उन्हें अपना प्राण बचाने के लिए समझाया।

इसके बाद एक पुष्टि आती है, यह नगर बाबुल के राजा की सेना के हाथ में कर दिया जाएगा, और वे उसे ले लेंगे। भविष्यद्वक्ता वह कारण दिखाता है जिससे उसने यहूदियों को भाग जाने के लिए समझाया था, अर्थात् यह कि अन्त में नगर ले लिया जाएगा। उसके कथन का सार यही है।

अब हाकिम आगे कहते हैं, यह पुरुष मार डाला जाए, क्योंकि इस रीति से, या इसलिए, अर्थात् अपनी बुरी सम्मति के कारण, वह योद्धाओं के हाथ ढीले कर देता है, इत्यादि। यहाँ हाथ का अर्थ पराक्रम लेना चाहिए, क्योंकि काम मुख्यतः हाथों से ही किए जाते हैं। अतः हाथों को ढीला या निर्बल करने का अर्थ यही है कि मनुष्यों को निष्क्रिय, या इतना आलसी बना देना कि वे उँगली तक न हिलाएँ। तब हाकिमों ने यिर्मयाह पर यह दोष लगाया कि वह योद्धाओं को भयभीत करता है और इस प्रकार उन्हें उदासीन बना देता है। यह एक दिखावटी दोष था; परन्तु उस निन्दा का कोई आधार न था; क्योंकि यिर्मयाह को अपने देश का सार्वजनिक शत्रु ठहराकर दोषी नहीं ठहराया जा सकता था, जबकि उसने उन्हें गम्भीरता से भाग जाने के लिए समझाया और लोगों को कोई आशा न दी, ताकि वे सब छुटकारे से निराश होकर स्वेच्छा से अपने आप को शत्रुओं के हाथ सौंप दें।

यहाँ यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि क्या किसी साधारण व्यक्ति के लिए यह उचित है कि वह प्रजा को अपने राजा या शासक के प्रति ली हुई निष्ठा की शपथ तोड़ने के लिए उकसाए। मैं यहाँ भविष्यद्वक्ताओं को साधारण व्यक्ति कहता हूँ; क्योंकि मेरे ध्यान में नागरिक व्यवस्था है। यिर्मयाह निस्सन्देह एक सार्वजनिक पद धारण किए हुए था, क्योंकि वह परमेश्वर का भविष्यद्वक्ता था; परन्तु नगर के शासन के विषय में वह एक साधारण व्यक्ति, प्रजा में से एक, था। अतः ऐसा लगता है कि भविष्यद्वक्ता ने उचित की सीमा का उल्लंघन किया जब उसने लोगों को विद्रोह करने के लिए उकसाया, क्योंकि यह राजा के प्रति निष्ठा को तोड़े बिना नहीं हो सकता था। इसका मेरा उत्तर यह है कि भविष्यद्वक्ता को एक विशेष आज्ञा दी गई थी, और इसलिए उसने कुछ भी ढिठाई या उतावली से नहीं किया। अतः यद्यपि लोगों ने अन्त तक राजा के प्रति अपनी निष्ठा की शपथ खाई थी, तौभी जब परमेश्वर ने अब नगर को कसदियों के हाथ सौंप दिया था, तो उस शपथ का बन्धन समाप्त हो गया; क्योंकि जब शासन बदल जाते हैं, तो प्रजा ने जो कुछ प्रतिज्ञा की थी वह फिर बाध्यकारी नहीं रहती। उदाहरण के लिए, जब किसी देश का कोई शासक होता है, तो वह सारी प्रजा को शपथ के द्वारा अपने से बाँध लेता है, ताकि वे सब उसके प्रति निष्ठावान बने रहें। जब कोई उस देश पर आक्रमण करता है, तो यदि प्रजा आगे आकर अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार अपने शासक की सहायता न करे, तो वह विश्वासघात की दोषी ठहरती है; परन्तु जब कोई विदेशी शत्रु सारे देश पर अधिकार कर लेता है, तो शपथ का बन्धन समाप्त हो जाता है; क्योंकि शासकों को स्थापित करना प्रजा के वश में नहीं है, क्योंकि अपनी इच्छा के अनुसार शासनों को बदलना परमेश्वर का काम है। अतः जब यह सामर्थ्य केवल परमेश्वर ही का है, तो जब तक कोई शासक राज्य करता है, प्रजा को दृढ़ता से उसकी आज्ञाकारी बनी रहनी चाहिए, क्योंकि वह परमेश्वर के द्वारा उन पर नियुक्त किया हुआ उनका वैध शासक है। परन्तु उस समय यहूदियों की दशा ऐसी न थी; क्योंकि यद्यपि कसदी अभी नगर में प्रवेश नहीं कर पाए थे, तौभी परमेश्वर घोषित कर चुका था कि वे ही उसके स्वामी हैं। अतः लोगों को इस बात की प्रतीक्षा नहीं करनी थी कि कसदी नगर में घुस आएँ, उसके घरों को जला दें, और जो कोई उन्हें मिले उसे मार डालें; वरन् उनके लिए इतना ही पर्याप्त होना चाहिए था कि भविष्यद्वक्ता की भविष्यद्वाणी परमेश्वर का आदेश या निर्णय था, जिसके द्वारा वे कसदियों के हाथ सौंप दिए गए थे।

अब यिर्मयाह और ऐसी ही परिस्थितियों में पड़े अन्य सब लोगों के विषय का प्रश्न हल हो गया: क्योंकि जब कोई केवल कुछ संकट को निकट देखता है, तो उसे इस कारण लोगों को अपने शासक को त्याग देने के लिए नहीं उकसाना चाहिए; वरन् जो कोई परमेश्वर का विश्वासयोग्य दास होना चाहता है, वह अपने राजा की रक्षा में अपने प्राण को भी जोखिम में डालेगा। जब उसे राजा की सभा में बुलाया जाए, तो वह वही सम्मति देगा जो लाभदायक और उचित हो; परन्तु वह उपद्रव और हुल्लड़ नहीं भड़काएगा: इसके विपरीत, वह अपनी सम्मति या अपने प्रभाव से लोगों को विद्रोही बनाने की अपेक्षा सौ बार मरना अधिक पसन्द करेगा। परन्तु जैसा कहा जा चुका है, यिर्मयाह का मामला विशेष था; क्योंकि परमेश्वर ने कसदियों के विषय में अपना उद्देश्य प्रकट कर दिया था। अतः यिर्मयाह ने न केवल बुद्धिमानी से लोगों को वह करने के लिए समझाया जिसे वह आवश्यक समझता था, वरन् उसने विश्वासयोग्यता से भविष्यद्वक्ता के रूप में अपना पद भी निभाया: और उसने उस सम्मति के सिवाय और कोई सम्मति नहीं दी जिसे देने की उसे आज्ञा मिली थी: वरन् उसने अधिकार के साथ उन्हें आज्ञा दी कि वे कसदियों के पास चले जाएँ, क्योंकि यह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार था।

तौभी हाकिमों ने उस पर यह दोष लगाया कि वह हाथ ढीले कर देता है, इत्यादि; और आगे कहा, इस रीति से वह लोगों की भलाई नहीं चाहता, जब वह ऐसा कहता है, (यहाँ शान्ति का अर्थ भलाई या लाभ लेना चाहिए,) वरन् वह बुराई चाहता है। यह उन्होंने निन्दा करते हुए जोड़ा, क्योंकि यिर्मयाह ने जहाँ तक उससे हो सका, सार्वजनिक भलाई का ध्यान रखा, वह चाहता था कि नगर सुरक्षित बना रहे; यदि यह उसके वश में होता, तो वह सब कसदियों को भगा देता; परन्तु वह परमेश्वर से युद्ध नहीं कर सकता था, जिसके झण्डे के नीचे कसदी लड़ रहे थे। अतः यिर्मयाह लोगों की भलाई चाहता था, परन्तु वह परमेश्वर का सामना नहीं कर सकता था, और इसलिए उसने ईश्वरीय आदेश के आगे सिर झुका दिया: उसे इसके सिवाय और कोई उपाय न दिखा कि यहूदी एक अस्थायी दण्ड सहें, और बन्धुआई के द्वारा ताड़ना पाएँ, ताकि वे बाद में अपने देश को लौट सकें। जैसा मैं कह चुका हूँ, यदि सम्भव होता, तो वह लोगों को हर हानि से बचाए रखता; परन्तु अब यह सम्भव न था; क्योंकि परमेश्वर घोषित कर चुका था कि राज्य और नगर का अन्त हो चुका है, जब तक कि यहूदी सत्तर वर्ष की बन्धुआई के द्वारा दण्डित न हो जाएँ। अतः एक दूसरी भलाई या लाभ शेष था, अर्थात् यह कि दुखियों के लिए बन्धुआई अधिक सहने योग्य हो, या दासत्व कुछ हल्का हो जाए: और यह भलाई यह थी कि वे अपनी इच्छा से राजा नबूकदनेस्सर के पास आएँ, और अपने आप को कसदियों के पास ले जाए जाने दें। यही दूसरी भलाई थी।

अतः यिर्मयाह ने, यह देखकर कि नगर, राज्य और मन्दिर स्थिर न रहेंगे, अपनी पूरी शक्ति से उस बात पर बल देने की चिन्ता की जो करने को शेष रह गई थी, ताकि कम से कम नगर जैसा था वैसा ही बना रहे, जबकि उसके निवासी दूसरे देश में चले जाएँ, जिससे वे बाद में उसमें लौट सकें। लोगों के लिए यही सबसे उत्तम बात थी, क्योंकि परमेश्वर ने उन सब को बन्धुआई में भेज देने का निश्चय कर लिया था। अतः उस पर यह अन्यायपूर्ण दोष लगाना कि वह लोगों की भलाई नहीं वरन् उनका विनाश चाहता है, मूर्खता की बात थी।

परन्तु जैसा हमने कल कहा था, पवित्र जनों की सब बातें और सब काम सदा अन्याय से दोषी ठहराए गए हैं। और यदि आज हमारे साथ भी यही बात हो, तो आइए, हम उसे धीरज से सहें। हम यह भी देखते हैं कि भविष्यद्वक्ताओं और विश्वासयोग्य शिक्षकों पर सदा यह अपराध के रूप में लगाया गया है कि वे सार्वजनिक भलाई का ध्यान नहीं रखते, जैसे आज सब अभक्त लोग हम पर यही दोष लगाते हैं, विशेषकर दरबारी लोग, जो यह मान लेते हैं कि यदि कुछ भी बदला गया, तो वह हर प्रकार की गड़बड़ी का कारण होगा; और इसलिए वे सोचते हैं कि उनका धर्म सार्वजनिक भलाई के विनाश के बिना कदापि गिर नहीं सकता। इसी कारण सुसमाचार का स्वतन्त्र प्रचार उन्हें अप्रिय लगता है, मानो वह अपने साथ कोई सार्वजनिक विपत्ति लाता हो। इसलिए वे हमें उपद्रवी कहते हैं; और कहते हैं कि हम अज्ञानता के कारण भटक जाते हैं: कि यद्यपि हम खुले रूप से सार्वजनिक भलाई के शत्रु नहीं हैं, तौभी हम यह नहीं समझते कि राज्यों का शासन कैसे किया जाना चाहिए; और इसलिए हम उतावली से बड़े-बड़े उपद्रव भड़काते हैं। ये सब निन्दाएँ हमें सहनी हैं, जैसे यिर्मयाह ने सहीं, जब उसने शान्त मन से उस बैर को सहा जो हाकिमों ने अन्याय से उसकी शिक्षा के कारण उसके विरुद्ध खड़ा किया, जिस शिक्षा को उसने परमेश्वर की आज्ञा से सुनाया था, और जो नगर और प्रजा की सुरक्षा के लिए आवश्यक थी; क्योंकि यहूदी परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध अपने उस नगर में नहीं रह सकते थे जिससे परमेश्वर ने उन्हें हटाने का निश्चय कर लिया था। अतः जब यिर्मयाह ने देखा कि नगर की कसदियों से रक्षा नहीं की जा सकती, तो यदि वह परमेश्वर का भविष्यद्वक्ता न होकर केवल राजा का एकमात्र मन्त्री भी होता, तो वह इससे उत्तम या अधिक लाभदायक और क्या सम्मति दे सकता था कि वे अपने शत्रुओं की चरम क्रूरता से पहले ही बच निकलें, और कम से कम जो कुछ उनसे हो सके वह करें, ताकि नगर आग से जलाया न जाए, और लोगों का सर्वनाश न हो, वरन् वे केवल अपनी सम्पत्ति की हानि उठाकर जीवित बने रहें? अतः वह इससे उत्तम सम्मति नहीं दे सकता था। परन्तु जैसा मैं कह चुका हूँ, अभक्त लोगों की दृष्टि में हठपूर्वक परमेश्वर का विरोध करने की स्वतन्त्रता के सिवाय और कुछ भी भला या लाभदायक नहीं समझा जाता। यही कारण था कि उन्होंने परमेश्वर के भविष्यद्वक्ता पर इतने अन्याय से दोष लगाया। आगे लिखा है —

यिर्मयाह 38:5

5. सिदकिय्याह राजा ने कहा, सुनो, वह तो तुम्हारे वश में है; क्योंकि ऐसा नहीं हो सकता कि राजा तुम्हारे विरुद्ध कुछ कर सके।

5. Et dixit rex Zedechias, Ecce ipsc in manibus vestris; quia rex non potest erga vos quicquam.

सिदकिय्याह निस्सन्देह जानता था कि पवित्र भविष्यद्वक्ता के साथ अन्याय किया जा रहा है; क्योंकि यद्यपि वह चाहता था कि वह जैसा था वैसा ही बना रहे, तौभी वह जानता था कि भविष्यद्वक्ता ने द्वेष या शत्रुतापूर्ण मन से लोगों को धमकी नहीं दी थी; और इस प्रकार उसे भीतर से ज्ञात था कि उसका काम किसी नश्वर मनुष्य से नहीं, वरन् परमेश्वर से है। जो भी हो, वह जानता था कि यिर्मयाह, जैसा हाकिमों ने दोष लगाया था, सार्वजनिक सुरक्षा का शत्रु नहीं था। अतः हो सकता है कि वह भविष्यद्वक्ता को उनके हाथों से छुड़ाना चाहता हो, परन्तु वह उनके रोष के आगे झुक गया; क्योंकि वह सारे राजकीय अधिकार से वंचित हो चुका था, और मानो अपने ही मन्त्रियों का दास बन गया था, जिन पर राज्य का शासन निर्भर था।

जो लोग सोचते हैं कि राजा ने अपने मन्त्रियों के विषय में आदर के साथ बात की, मानो उसने कहा हो कि उनकी बुद्धि और प्रतिष्ठा ऐसी है कि उन्हें किसी बात से इन्कार नहीं किया जा सकता, वे इस पद की गलत व्याख्या करते हैं। वे भविष्यद्वक्ता के अर्थ को बिगाड़ देते हैं; क्योंकि इसके विपरीत, राजा यहाँ स्वीकार करता है कि वह ऐसी दशा में पहुँचा दिया गया था मानो वह एक साधारण व्यक्ति हो; संक्षेप में, उसने मान लिया कि वह दासों का दास है; वह कहता है, “अब मैं देखता हूँ कि मैं राजा नहीं हूँ, वरन् तुम ऐसा शासन करते हो कि चाहे मैं चाहूँ या न चाहूँ, मुझे सबसे उत्तम कार्य में भी तुम्हारे आगे झुकने को विवश होना पड़ता है।” अतः इसमें कोई सन्देह नहीं कि जब राजा ने कहा, राजा तुम्हारे विरुद्ध कुछ नहीं कर सकता, तो यह उसकी कड़वी शिकायत थी।

परन्तु सिदकिय्याह इस अपमान के योग्य था: क्योंकि उसे आरम्भ ही से अधिक सीखने योग्य होना चाहिए था, और परमेश्वर के अधीन होना चाहिए था। परन्तु पहले तो, जैसा हम देख चुके हैं, उसने भविष्यद्वाणी की शिक्षा को तुच्छ जाना था, और परमेश्वर की वाणी पर कान नहीं लगाया था; और दूसरे, उसने विश्वासघात करके कसदी राजा से विद्रोह किया, और इस प्रकार कृतघ्नता का दोषी बना, क्योंकि जब उसका भतीजा, अर्थात् यकोन्याह या कोन्याह, सिंहासन से उतारा गया, तब उसने बाबुल के राजा की कृपा से राजपद पाया था। इसलिए उसे कर देने से इन्कार करके वह कृतघ्न बना था। परन्तु उसकी अभक्ति ही सब बुराइयों का मुख्य कारण थी। अतः जब वह परमेश्वर के विरुद्ध ऐसा विद्रोही रहा था, तो वह इसी योग्य था कि हाकिम उसके विरुद्ध विद्रोही ठहरें। अतः उसने स्वयं अपने आप को नीचा किया, और अपने आप को राजकीय अधिकार से वंचित किया, जब उसने परमेश्वर के वचन के अधीन होने से इन्कार किया, और जब उसने बाबुल के राजा को कर देने से भी इन्कार किया। अतः कोई आश्चर्य नहीं कि परमेश्वर ने उसे उन हाकिमों और मन्त्रियों के अधीन कर दिया, जो तौभी उसके सेवक थे।

इन दरबारियों के विषय में, यिर्मयाह को दोषी ठहराने का साहस करने में उनका अहंकार अक्षम्य था; क्योंकि यह राजा से उसका अपना अधिकार छीन लेना था; यह पुरुष मार डाला जाए, क्योंकि वह मृत्यु के योग्य है। वे केवल उस पर दोष लगाने से सन्तुष्ट क्यों न रहे, और उसके एकमात्र न्यायी भी क्यों बन बैठे? अतः जब उन्होंने राजा के साथ ऐसा अनादरपूर्ण व्यवहार किया, तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि वे परमेश्वर को तुच्छ जाननेवाले थे, जब उन्होंने राजकीय प्रतिष्ठा को कुछ भी न समझा। परन्तु राजा के विषय में, जैसा मैं कह चुका हूँ, उसने अपनी ही अभक्ति का फल पाया, क्योंकि उसने भविष्यद्वक्ता के द्वारा सिखाए गए सत्य को ग्रहण करके परमेश्वर को उसका उचित आदर नहीं दिया था। इसलिए यह आवश्यक था कि उसके साथ अयोग्य और अपमानजनक व्यवहार किया जाए, यहाँ तक कि वह एक न्यायपूर्ण और भले कार्य के पक्ष में एक शब्द भी कहने का साहस न कर सका। यही कारण था कि उसने कहा, वह तुम्हारे वश में है, क्योंकि राजा तुम्हारे विरुद्ध कुछ नहीं कर सकता।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जब तू हमें प्रतिदिन इतनी करुणा से अपने पास बुलाता है, और हमें मन फिराने का समय भी देता है, और फिर यदि हम तेरी ओर लौटें तो हमारे सामने दया और उद्धार की आशा रखता है, — हाँ, यह वरदान दे कि हम ऐसी कृपालु चेतावनियों को बहरे कानों से अनसुना न करें, वरन् उचित समय पर तेरी ओर ध्यान दें, और अपने सब पापों को सच्चाई और निष्कपटता से मानकर अपने आप को तुझे ऐसा सौंप दें कि हम तुझे दयालु पाएँ; और जब हम तेरी ओर लौटें तो तेरी आज्ञाकारिता में ऐसे बने रहें कि हम तेरी निरन्तर करुणा को ग्रहण करने के योग्य हों, जब तक कि तेरे स्वर्गीय राज्य में उसका पूर्ण उपभोग हमें न दिया जाए, हमारे प्रभु मसीह के द्वारा। — आमीन।

336 ब्लेनी कहता है, “राजा यह बात स्पष्ट रूप से हाकिमों से खिन्न होकर कहता है, क्योंकि वे उसकी दयालुता को विफल करने का प्रयत्न कर रहे थे।” — सं.

एक सौ अड़तालीसवाँ व्याख्यान

यिर्मयाह 38:6

6. तब उन्होंने यिर्मयाह को लेकर राजपुत्र मल्किय्याह के उस गड्ढे में जो पहरे के आँगन में था, रस्सियों से उतारकर डाल दिया। और उस गड्ढे में पानी नहीं केवल दलदल था, और यिर्मयाह कीचड़ में धँस गया।

6. Et tulerunt Jeremiam, et demiserunt eum in puteum Malchiae filii Hammalech (in lacum, proprie,) qui erat in atrio custodiae; et (itaque) demiserunt Jeremiam funibus; et in lacu non erat aqua, sed coenum; et demersus fuit Jeremias in coeno.

यहाँ हाकिमों की चरम ढिठाई और क्रूरता का वर्णन है; क्योंकि उन्होंने पवित्र भविष्यद्वक्ता को एक गड्ढे में डाल दिया, जहाँ वह कीचड़ में धँस गया। परमेश्वर के इतने उत्तम दास को भी न छोड़ना कठोर हो चुकी अभक्ति का प्रमाण था; और यह एक बर्बर क्रूरता भी थी, क्योंकि उनके इतने रोष से भर जाने का इसके सिवाय और कोई कारण न था कि यिर्मयाह ने परमेश्वर की आज्ञा मानी थी, और उसे सौंपे गए पद को विश्वासयोग्यता से निभाया था।

साथ ही आइए, हम इस उदाहरण से यह सीखें कि जब कभी प्रभु को हमारे धीरज को परखना भाए, तो जो कुछ हम देखते हैं कि पवित्र भविष्यद्वक्ता ने सहा, उसे हम भी अधीनता से सहें। अतः यदि हम कभी क्रूस की भयानकताओं से काँप उठें, यहाँ तक कि सताव सहना हमें कठिन जान पड़े, तो आइए, हम भविष्यद्वक्ता के इस उदाहरण को स्मरण करें। संक्षेप में, यहाँ मानो एक चित्र में एक ओर तो संसार की दुष्टता हमें दिखाई गई है; और दूसरी ओर परमेश्वर के दास की अद्भुत दृढ़ता और अनोखी नम्रता भी महिमा के साथ चमकती है।

तब यिर्मयाह कहता है कि हाकिमों ने उसे पकड़कर एक गड्ढे में डाल दिया, जो बन्दीगृह के आँगन में था; और उस भाग में था जहाँ मन्त्रियों में से एक, अर्थात् राजपुत्र मल्किय्याह रहता था। और साथ ही वह उस स्थान की दशा का वर्णन करता है, कि वह कीचड़ भरा गड्ढा था, यहाँ तक कि वह दलदल में धँस गया। उसका यह अर्थ नहीं कि वह कीचड़ से ढक गया, वरन् यह कि वह उसमें फँस गया, जैसा कि इब्रानी शब्द संकेत करता है; और इसलिए हम इन शब्दों का ठीक अनुवाद यों कर सकते हैं, “वह कीचड़ में फँसा पड़ा रहा।” अब आगे लिखा है —

यिर्मयाह 38:7-9

7. उस समय राजा बिन्यामीन के फाटक के पास बैठा था: सो जब एबेदमेलेक कूशी ने, जो राजभवन में एक खोजा था, सुना कि उन्होंने यिर्मयाह को गड्ढे में डाल दिया है,

7. Audivit autem Ebedmelech Aethiops vir eunuchus (vel, unus ex numero procerum, {}םיסרסenim ut alibi dictum fuit, non tanturn eunuchos vocant, sed etiam proceres et consiliarios regis) ipsc autem erat in domo regis (per parenthesin hoc legendum est, audivit ergo) quod posuissent Jeremiam in lacum; rex autera sedebat in porta Benjamin:

8. तब एबेदमेलेक राजभवन से निकलकर राजा से कहने लगा,

8. Et egressus est Ebedmelech e domo (vel, palatio) regis, et loquutus est ad

regem, dicendo,

9. हे मेरे स्वामी, हे राजा, उन लोगों ने यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता से जो कुछ किया है वह बुरा किया है, क्योंकि उन्होंने उसे गड्ढे में डाल दिया है; वहाँ वह भूख से मर जाएगा क्योंकि नगर में कुछ रोटी नहीं रही है।

9. Domine, mi Rex, perverse egerunt viri isti in onmibus quae fecerunt Jeremiae

Prophetae, quando eum demiserunt in foveam (vel, lacum,) uti subtus se morietur a fame (hoc est, prae fame,) quia nullus panis amplius est in urbe.

यिर्मयाह यहाँ बताता है कि वह मृत्यु से कैसे छुड़ाया गया; क्योंकि वह कीचड़ में अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकता था; कुछ तो इसलिए कि उसे अभाव के कारण मरना पड़ता; और कुछ इसलिए कि वह ठण्ड से ठिठुरकर और गड्ढे की गन्दगी से दम घुटकर मर जाता।

परन्तु परमेश्वर ने एबेदमेलेक नामक एक कूशी की सहायता से उसे अद्भुत रीति से छुड़ाया। वह एक परदेशी था, और यह बात स्पष्ट रूप से इसलिए कही गई है कि हम जान लें कि राजा के मन्त्रियों में एक भी ऐसा न था जिसने इतनी बड़ी दुष्टता का विरोध किया हो। परन्तु एक कूशी पाया गया, जो परमेश्वर के भविष्यद्वक्ता की सहायता को आया।

अतः यहाँ एक कूशी, एक परदेशी, और उन सब यहूदियों के बीच एक तुलना निहित है, जो अपने आप को अब्राहम का पवित्र वंश कहते थे, जिनका खतना हुआ था, और जो परमेश्वर की व्यवस्था और वाचा पर बड़ा घमण्ड करते थे; और तौभी उनमें से एक भी ऐसा न था जो परमेश्वर के पवित्र दास की ओर अपना हाथ बढ़ाता! हो सकता है कि कुछ ऐसे थे जिन्हें उस पर तरस आया, परन्तु साहस की कमी थी; इसलिए किसी को अपना मुँह खोलने का साहस न हुआ, क्योंकि उस पवित्र जन का पक्ष लेना निन्दा की बात समझी जाती थी। अतः उन्होंने अपने कर्तव्य से बढ़कर अभक्तों की कृपा को चाहा। परन्तु एक कूशी इतना साहसी था कि उसने राजा के सब दरबारियों और अन्य हाकिमों पर दोष लगाने का साहस किया।

अतः इसमें कोई सन्देह नहीं कि आत्मा ने उस कूशी के मुँह से राजा के उन हाकिमों पर सदा का कलंक लगा दिया, जो अपने आप को अब्राहम की सन्तान बताते थे, और परमेश्वर की वाचा पर ऊँचे शब्दों में घमण्ड करते थे। ऐसा ही एक मामला मसीह ने एक दृष्टान्त में प्रस्तुत किया है, जब वह कहता है कि एक लेवी और एक याजक एक घायल मनुष्य के पास से कतराकर निकल गए और उसकी उपेक्षा की, परन्तु एक सामरी ने उसकी सहायता की (लूका 10:30-35)। निस्सन्देह उसका उद्देश्य यहूदियों को, यहाँ तक कि लेवियों और याजकों को भी, उनकी बर्बरता के लिए दोषी ठहराना था, कि वे संकट की चरम दशा में पड़े एक दुखी मनुष्य के प्राण की कुछ भी चिन्ता नहीं करते थे। इसी प्रकार इस स्थान पर भी वह कूशी हमारे सामने एक उदाहरण के रूप में रखा गया है, क्योंकि केवल उसी में करुणा और मानवता की भावना थी, जिससे वह पवित्र भविष्यद्वक्ता की सहायता करे, और उसे मानो तात्कालिक मृत्यु और कब्र से छुड़ा ले: परन्तु हम देखते हैं कि राजा के सब दरबारी या तो पूर्णतः सुन्न पड़े थे, या रोष और क्रूरता की उसी आत्मा से ऐसे प्रेरित थे कि वे उस पवित्र जन के प्राणघातक शत्रु बन गए, क्योंकि उसने स्वतन्त्रता और खुलेपन से उन्हें परमेश्वर की आज्ञा सुनाई थी।

और यिर्मयाह कहता है कि एबेदमेलेक ने सुना, इत्यादि। इससे हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि वह पवित्र भविष्यद्वक्ता की सुरक्षा के विषय में चिन्तित था, और उसके ऐसे मित्र थे जो होनेवाली बातों पर दृष्टि रखते थे। फिर यह जोड़ा गया है कि वह राजभवन में था, परन्तु राजा बिन्यामीन के फाटक में बैठा था; क्योंकि राजा फाटकों में न्याय करने, और वहीं अपना न्यायासन रखने के अभ्यस्त थे; और वहीं लोग अपनी नियमित सभाएँ करते थे। अतः राजा बिन्यामीन के फाटक में बैठा था। परन्तु इसी बीच उसका राजभवन वध का स्थान और डाकुओं की गुफा बना हुआ था। अतः हम देखते हैं कि यहाँ राजा के आलस्य की ओर संकेत है, क्योंकि ऊपर से तो वह राजा का उचित कर्तव्य निभाता दिखाई देता था, परन्तु उसके मुख्य भाग की उपेक्षा करता था, क्योंकि उसने एक पवित्र जन को गड्ढे में डाले जाने दिया। अतः जब उसने इस प्रकार भविष्यद्वक्ता के प्राण को हाकिमों की इच्छा पर छोड़ दिया, तो स्पष्ट है कि वह केवल एक खोखली छाया था, यद्यपि वह वहाँ लोगों के न्यायी के रूप में खड़ा था, और उसका वहाँ एक पवित्र न्यायासन था।

अब आगे लिखा है कि एबेदमेलेक राजभवन से निकलकर राजा के न्यायासन के पास आया, ताकि वहाँ भविष्यद्वक्ता का पक्ष ले। पहली परिस्थिति के समान इस परिस्थिति पर भी ध्यान देना उचित है। क्योंकि यदि एबेदमेलेक राजा से संयोग से मिला होता, तो वह चलते-चलते उससे बात कर सकता था; परन्तु जब वह राजभवन से निकलकर गया, तो स्पष्ट है कि वह इस पर मनन कर चुका था कि उसे क्या करना है, और उसके मन में केवल अचानक करुणा का आवेग नहीं उठा था: वरन् जब वह राजभवन में चैन से रह सकता था, तब वह अपनी इच्छा से राजा के पास अपनी शिकायत सुनाने आया। और फिर, उसने राजा से किसी कमरे में या राजभवन के किसी एकान्त कोने में बात नहीं की, वरन् फाटक में, अर्थात् सार्वजनिक सभा में, उससे बात की।

अतः हम देखते हैं कि पहली परिस्थिति हमारे सामने इस मनुष्य की दृढ़ता की प्रशंसा करती है, क्योंकि वह केवल अचानक प्रेरित नहीं हुआ, वरन् अपने पवित्र उद्देश्य में डटा रहा; और दूसरी परिस्थिति हमारे सामने उसकी उदारचित्त वीरता की प्रशंसा करती है, क्योंकि वह बैर से नहीं कतराया, वरन् लोगों के सामने खुलकर और निडरता से यिर्मयाह के पक्ष में बोला; और उसने हाकिमों पर दोष लगाकर भविष्यद्वक्ता की श्रेष्ठता को और बढ़ाया। निस्सन्देह वह जानता था कि वह अपने आप को संकट में डाल रहा है, परन्तु भविष्यद्वक्ता की सहायता करने के लिए उसने अपने प्राण को जोखिम में डाला।

तब उसने कहा कि राजा के मन्त्रियों ने यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता के विरुद्ध जो कुछ किया है उस सब में दुष्टता की है, क्योंकि उन्होंने उसे कुएँ में डाल दिया था: और उसने आगे कहा, वहाँ वह अपने नीचे मर जाएगा, या जैसा कुछ लोग अनुवाद करते हैं, और ठीक ही करते हैं, “अपने ही स्थान में।” परन्तु यह अभिव्यक्ति बड़ी मार्मिक है, परन्तु हमारी भाषा में पूरी तरह व्यक्त नहीं की जा सकती: क्योंकि एबेदमेलेक का अर्थ यह था कि यिर्मयाह मर जाएगा, चाहे कोई उसे न सताए, चाहे कोई दूसरा उसे कोई बुराई या हानि न पहुँचाए। अतः वह अपने ही स्थान में मर जाएगा, अर्थात् यदि उसे वहीं छोड़ दिया गया जहाँ वह है, तो वह मर जाएगा; क्योंकि जैसा प्रकट हो चुका है, वह कीचड़ में धँसा पड़ा था। और फिर उसने कहा, वह भूख से मर जाएगा; क्योंकि उसे मानो कब्र में डाल दिया गया था। और जब सारी प्रजा में अकाल फैला हुआ था, तो यिर्मयाह किसी सहायता की आशा नहीं कर सकता था; और जैसा हम आगे देखेंगे, उसके पास रोटी फेंकी भी नहीं जा सकती थी। अतः एबेदमेलेक यहाँ पहले तो यह कहता है कि यिर्मयाह के साथ अयोग्य व्यवहार किया गया है, क्योंकि वह परमेश्वर का भविष्यद्वक्ता था; क्योंकि वह उसे यह उपाधि देकर उसका आदर करता है, ताकि हाकिमों की अभक्ति को प्रकट करे; और दूसरे, वह दिखाता है कि वह गड्ढे में कितनी दयनीय दशा में पड़ा था, क्योंकि कोई उसे भोजन नहीं पहुँचा सकता था, और नगर में और रोटी न रही थी। अब आगे लिखा है —

यिर्मयाह 38:10

10. तब राजा ने एबेदमेलेक कूशी को यह आज्ञा दी, यहाँ से तीस पुरुष साथ लेकर यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता को मरने से पहले गड्ढे में से निकाल।

10. Et praecepit rex ipsi Ebed-melech Aethiopi, Sume ad manum tuam hinc triginta viros, et educas Jeremiam Prophetam e fovea antequam moriatur.

यहाँ हम वही देखते हैं जो मैं पहले कह चुका हूँ, कि भविष्यद्वक्ता का छुटकारा पूर्णतः ऊपर से था। राजा ने भय से घबराकर अभी-अभी पवित्र भविष्यद्वक्ता को अपने हाकिमों की क्रूरता के हाथ सौंप दिया था; और मान लिया था कि अब उसके पास कोई अधिकार नहीं रहा: उसने कहा था, “क्योंकि अब तुम पर राजा का शासन नहीं चलता।” तो जब राजा ने अपने हाकिमों का दृढ़ता से विरोध करने का साहस नहीं किया था, तो यह कैसे हुआ कि अब उसने यिर्मयाह को गड़हे से निकालने का साहस किया? इससे हम देखते हैं कि राजा का मन बदल दिया गया था; क्योंकि अभी कुछ ही समय पहले वह भय से ऐसा स्तब्ध था कि उस पवित्र जन का पक्ष लेने का साहस न कर सका; परन्तु अब वह उस कूशी को आज्ञा देता है कि उसे गड़हे से निकाल ले। अतः यह प्रकट होता है कि यह सब ईश्वरीय सामर्थ्य द्वारा संचालित हुआ था।

परन्तु आओ, हम इससे यह सीखें कि जब आवश्यकता पड़े तब साहसी बनें, चाहे किसी अनुकूल परिणाम की आशा न भी हो। एबेदमेलेक अपने मन में सोच सकता था कि वह यिर्मयाह के पक्ष में चाहे कितनी ही दृढ़ता से विनती करे, उसका प्रयत्न व्यर्थ ही होगा। तब वह उस उद्देश्य को, जिसे उसने इतने साहस के साथ हाथ में लिया था, छोड़ सकता था; क्योंकि जो लोग अत्यधिक चतुर बनते हैं वे प्रायः इसी प्रकार मानो निष्क्रियता की ओर ले जाए जाते हैं: “तू क्या कर सकता है? तू तो अकेला है, और वे बहुत हैं; और फिर बात तो हो चुकी है। यदि स्वयं राजा को उनके क्रोध के आगे झुकना पड़ा, तो तू, जो एक साधारण व्यक्ति है, किस भरोसे से उनका सामना कर सकता है? और फिर, उपद्रव खड़ा हो जाएगा, और तू उसमें नष्ट हो जाएगा; और इस बीच कदाचित् वे उस अभागे मनुष्य को, जिसकी तू सहायता करना चाहता है, पत्थरों से पत्थरवाह कर देंगे।” ये सब बातें एबेदमेलेक के मन में आ सकती थीं, और इस प्रकार वह रुक सकता था। परन्तु हम देखते हैं कि उसने परमेश्वर के अनुग्रह पर भरोसा रखकर विश्राम किया। तो आओ, हम उसके उदाहरण को स्मरण करके, जब परमेश्वर हम से कोई काम करवाना चाहे, अर्थात् जब विश्वास और कर्तव्य का बन्धन हम से कुछ माँगे, और वह काम किया जा सकता हो, तो आशा के विपरीत भी आशा रखें, यदि हम सब बाधाओं की ओर से अपनी आँखें मूँद लें और अपने काम में आगे बढ़ते जाएँ; क्योंकि परिणाम केवल परमेश्वर के हाथ में हैं, और वे वैसे ही होंगे जैसे वह चाहता है। इस बीच हमारा कर्तव्य केवल इतना है कि अपने मार्ग पर आगे बढ़ते रहें, चाहे हमें लगे कि हमारे परिश्रम व्यर्थ और निष्फल होंगे। एबेदमेलेक सफल हुआ, और कैसे? इसलिये कि उसने एक भक्त और सीधे मनुष्य का काम किया। इसी प्रकार परमेश्वर हमारी ओर भी अपना हाथ बढ़ाएगा; चाहे कैसी भी कठिनाइयाँ हमारे सामने आएँ, हम उसकी सामर्थ्य और सहायता से उन सब पर जय पाएँगे।

तब राजा ने एबेदमेलेक कूशी को आज्ञा दी, यहाँ से तीस पुरुषों को अपने साथ ले और यिर्मयाह को कुएँ से निकाल। एबेदमेलेक तब भी अपना काम छोड़ सकता था; क्योंकि हो सकता था कि वह तीस पुरुषों के साथ इतनी बड़ी शक्ति पर प्रबल न हो सके; क्योंकि राजा के सब मन्त्री एक हो गए थे, और निःसन्देह उन्होंने बहुत से अन्य लोगों को भी अपने साथ मिला लिया था। इस प्रकार हम देखते हैं कि एबेदमेलेक ने मनुष्य की सहायता पर भरोसा नहीं रखा, परन्तु अजेय भरोसे से दृढ़ होकर उसने यह कार्य अपने ऊपर लिया, यहाँ तक कि उसने यिर्मयाह को गड़हे से खींच निकालने का साहस किया। इसके बाद यह आता है—

यिर्मयाह 38:11

11. सो एबेदमेलेक उन मनुष्यों को साथ लेकर राजभवन के भण्डार के नीचेवाले स्थान में गया; और वहाँ से फटे-पुराने कपड़े और सड़े-गले चिथड़े लेकर गड़हे में यिर्मयाह के पास रस्सियों से उतार दिए।

11. Et sumpsit Ebedmelech homines illos in manum suam (hoc est, sub sua potestate,) et venit in domum regis, nempe in locum sub thesauris; et sumpsit illinc veteramenta tractorum, et veteramenta (ad verbum) corruptorum, et demisit ad Jeremiam in lacum per funes.

यहाँ यिर्मयाह अपने छुटकारे का वृत्तान्त आगे बढ़ाता है। एबेदमेलेक के साहस पर हमें सदा ध्यान देना चाहिए, क्योंकि वह तुरन्त पवित्र भविष्यद्वक्ता के पास गया।

और कहा गया है कि उसने किसी छिपे हुए स्थान से पुराने चिथड़े लिए, De vieux haillons, जैसा कि हम कहते हैं। यह वास्तव में एक संज्ञा शब्द है। परन्तु यदि इसकी कठोरता अप्रिय लगे, तो हम इसका यह अनुवाद कर सकते हैं, “पुराने चिथड़े जो घसीटे गए थे, और पुराने चिथड़े जो सड़ गए थे।” फिर भी कुछ लोग इन शब्दों का अनुवाद इस प्रकार करते हैं, “घिसे हुए कपड़े और सड़े हुए कपड़े।” परन्तु पहला अर्थ अधिक उपयुक्त है; क्योंकि {,}סחבsacheb का अर्थ है घसीटना, और फ्रेंच में इसका अनुवाद यों किया जा सकता है, Vieux haillons trainez, ou, qui avoyent traine

फिर हमारे पास {,}סלחיםsalechim है, अर्थात् बिगड़े हुए या नष्ट हुए, usez; क्योंकि {,}סלחsalech का अर्थ है नमक लगाना; परन्तु यह हॉफल रूप में क्रिया है, और उस रूप में इसका अर्थ है सड़ाना। वे फटे हुए या सड़े हुए वस्त्र थे, des vieux haillons a demi pourris। सो कहा गया है कि एबेदमेलेक ने ये पुराने, फटे और सड़े हुए वस्त्र लिए, जो काम में आ चुके थे।

इस बात पर सावधानी से ध्यान देना चाहिए; क्योंकि यह प्रकट होता है कि एबेदमेलेक हाकिमों की हिंसा से डरता था, अपने कारण उतना नहीं, जितना इस कारण कि कहीं वह अपना उद्देश्य पूरा करने से रोक न दिया जाए।

क्योंकि यदि वह अन्य वस्तुओं का प्रबन्ध करता, तो पकड़ा जा सकता था; हाकिमों तक समाचार पहुँच सकता था, जो तुरन्त इकट्ठे होकर उसके प्रयत्नों को रोक देते। अतः इसमें कोई सन्देह नहीं कि एबेदमेलेक ने, बड़े भरोसे के साथ, बुद्धिमानी से इस बात पर विचार किया कि पवित्र भविष्यद्वक्ता की सहायता करने के उसके प्रयत्न में क्या बाधा डाल सकता है। इसी कारण उसने चुपके से एक छिपे हुए स्थान से ये घिसे-पिटे और बिगड़े हुए वस्त्र लिए। यह एक बात है। फिर हम पवित्र भविष्यद्वक्ता की दयनीय दशा देखते हैं; वह कीचड़ में आधा धँसा पड़ा था, और उसे रस्सियों या डोरियों से खींचकर निकाला जाना था, और ये फटे और घिसे हुए वस्त्र उसकी काँखों के नीचे रखे जाने थे। और आगे हमें स्पष्ट बताया गया है कि ये कपड़े किस उद्देश्य से उसके पास नीचे उतारे गए।

यिर्मयाह 38:12

12. तब एबेदमेलेक कूशी ने यिर्मयाह से कहा, ये फटे-पुराने कपड़े और सड़े चिथड़े अपनी काँखों में रस्सियों के नीचे रख ले। यिर्मयाह ने वैसा ही किया।

12. Et dixit Ebedmelech Aethiops Jeremiae, Pone nunc veteramenta tractorum et corruptorum sub axillis manuum tuarum subtus funes: et fecit Jeremias sic.

यहाँ हम वही शब्द पाते हैं जो पहले थे, अब ये पुराने चिथड़े, घसीटे हुए या फटे हुए और सड़े हुए, अपने हाथों के गड्ढों में रस्सियों के नीचे रख। लातीनी में यह बोलने का अनुचित ढंग है, परन्तु इब्रानी में नहीं। अतः इसका अर्थ है, “इन्हें अपनी काँखों में रस्सियों के नीचे रख।” यह इसलिये करना था कि भविष्यद्वक्ता को कोई चोट न पहुँचे; क्योंकि उसे रस्सियों से ऊपर खींचा जाना था, और वह कीचड़ में धँसा हुआ था: और यह उसकी खाल छिले बिना और उसकी काँखों को चोट पहुँचाए बिना नहीं हो सकता था, क्योंकि हम जानते हैं कि वह अंग कोमल होता है। तब एबेदमेलेक ने भविष्यद्वक्ता को आज्ञा दी कि इन पुराने चिथड़ों को लेकर रस्सियों के नीचे रख ले, ताकि वे मनुष्य उसे कम से कम चोट के साथ ऊपर खींच सकें। यह एबेदमेलेक की सम्मति थी, और यिर्मयाह ने जैसा उससे कहा गया था वैसा ही किया।

इस प्रकार परमेश्वर ने अपने भविष्यद्वक्ता को अद्भुत रीति से मृत्यु से छुड़ाया: परन्तु इससे हम देखते हैं कि उसकी दशा कितनी दयनीय थी; क्योंकि भविष्यद्वक्ता इन घिसे और सड़े चिथड़ों का उपयोग किए बिना और रस्सियों से खींचे जाए बिना किसी और रीति से बच नहीं सकता था। इसमें कोई सन्देह नहीं कि उसने इस कठिनाई पर विचार किया था; क्योंकि वह अब कुछ समय से वहाँ पड़ा था; और वह इतना बलवान नहीं था कि अपनी भुजाओं पर भरोसा कर सके, और वह जानता था कि उसके हाथ इतने बलवान नहीं कि रस्सियों को कसकर पकड़े रहें। परन्तु निःसन्देह उसने अपनी सारी चिन्ताएँ परमेश्वर और उसके विधान पर डाल दीं। अतः यद्यपि वह हमें संक्षेप में केवल इतना ही बताता है कि उसने वैसा ही किया जैसा उससे कहा गया था, तौभी उसने हम पर यह विचार करना छोड़ दिया है कि उसमें कितना भरोसा था, जब उसने तुरन्त आज्ञा मानी, और उस बात से पीछे न हटा जिसका उसे उचित रूप से भय हो सकता था, कि वह निर्बल और दुर्बल है; और न वह यह जानता था कि उसके हाथ रस्सियों को पकड़ने के लिये पर्याप्त बलवान हैं या नहीं, और न यह कि रस्सियाँ उसके कन्धों पर कैसे लगाई जाएँगी। इसलिये उसने वैसा ही किया जैसा एबेदमेलेक ने उससे कहा था, क्योंकि वह जानता था कि वह सम्मति परमेश्वर की ओर से आई है। इसके बाद यह आता है—

337 ब्लेनी इससे अच्छा अनुवाद देता है, “फटे चिथड़े और घिसे हुए चिथड़े।” शाब्दिक अनुवाद यह है, “फटे हुओं के चिथड़े, और सड़े हुओं के चिथड़े।” — सं.

यिर्मयाह 38:13

13. तब उन्होंने यिर्मयाह को रस्सियों से खींचकर गड़हे में से निकाला; और यिर्मयाह पहरे के आँगन में रहने लगा।

13. Et extraxerunt Jeremiam funibus, et extulerunt ipsum e fovea (vel, lacu;) et habitavit Jeremias in atrio custodiae.

यहाँ हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता मृत्यु से बचाया गया, परन्तु इसलिये नहीं कि वह स्वतन्त्र कर दिया जाए और घर भेज दिया जाए, क्योंकि उसमें उसका भला न होता, क्योंकि राजा के मन्त्री उसे फिर पकड़ लेते। इसलिये एबेदमेलेक उसके प्राण को किसी और रीति से नहीं बचा सकता था, केवल इसके कि उसे बन्दीगृह के किसी दूसरे भाग में बन्द रखवाए। निःसन्देह वह चाहता तो यह कि उसे अपने घर में अतिथि बनाकर रखे: निःसन्देह वह उसके लिये जितना उसने किया उससे अधिक करना चाहता था। परन्तु उसकी बुद्धिमानी सराहने योग्य है कि उसने भविष्यद्वक्ता को फिर बन्दीगृह में रखा; क्योंकि अन्यथा हाकिमों का रोष और क्रूरता शान्त नहीं की जा सकती थी। तब यिर्मयाह पहरे के आँगन में रहा।

स्पष्ट है कि वह एबेदमेलेक द्वारा वहाँ ले जाया गया था। यदि कोई आपत्ति करे और कहे कि यह अत्यधिक भीरुता का प्रमाण था; तो इसका उत्तर यह है कि एबेदमेलेक अपने कारण भयभीत नहीं था, परन्तु इसलिये कि उसने देखा कि उसका पाला जंगली पशुओं से पड़ा है; और उसने देखा कि उनका क्रोध किसी और रीति से शान्त नहीं किया जा सकता था, केवल इसके कि यिर्मयाह बन्दीगृह में बन्द रखा जाए। वास्तव में, जैसा कि भली-भाँति ज्ञात है, उस समय सारा नगर एक बन्दीगृह के समान था; क्योंकि वे हर ओर अभाव से पीड़ित थे, और कोई भी कठिनाई से अपने घर से बाहर निकल पाता था। अतः एबेदमेलेक ने इस स्थिति पर बुद्धिमानी से विचार किया, क्योंकि उसे केवल अपने ही काम की चिन्ता नहीं करनी थी, वरन् वह परमेश्वर के भविष्यद्वक्ता को बचाए रखने का भी परिश्रम करता था।

जब कभी परमेश्वर हमारे दुःखों को हल्का करे, तौभी हमें उनसे एक साथ पूरी रीति से छुटकारा न दे, तो हम उन्हें धीरज से सहें, और यिर्मयाह के इस उदाहरण को स्मरण करें।

परमेश्वर ने निश्चय उसे छुड़ाने में अपनी सामर्थ्य प्रकट की, तौभी उसकी इच्छा यह थी कि वह बन्दीगृह में बना रहे: इसी प्रकार वह अपना कार्य धीरे-धीरे पूरा करता है। अतः यदि परमेश्वर के अनुग्रह का पूरा तेज हम पर न चमके, या यदि हमारा छुटकारा अभी पूरी रीति से न दिया गया हो, तो हम परमेश्वर को थोड़ा-थोड़ा करके आगे बढ़ने दें; और छोटी से छोटी राहत भी हमारी शान्ति, समर्पण और धीरज के लिये पर्याप्त होनी चाहिए। अब यह आता है,—

यिर्मयाह 38:14

14. फिर राजा सिदकिय्याह ने यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता को यहोवा के भवन के तीसरे द्वार में अपने पास बुलवा भेजा। और राजा ने यिर्मयाह से कहा, मैं तुझ से एक बात पूछता हूँ; मुझ से कुछ न छिपा।

14. Et misit rex Zedechias et tulit (hoc est, accersivit) Jeremiam Prophetam ad se ad ingressum tertium, qui erat in domo Jehovae (hoc est, in ipso Templo,) et dixit rex ad Jeremiam, Ego interrogo to verbum, ne celes a me verbum (hoc est, Ego rem unam abs to quaero, ne quicquam celes.)

यहाँ एक और वृत्तान्त जोड़ा गया है,—कि राजा सिदकिय्याह ने फिर यिर्मयाह को मन्दिर में, अर्थात् मन्दिर के आँगन में, अपने पास बुलवा भेजा; क्योंकि राजा को पवित्रस्थान में प्रवेश करना उचित न था, और आँगन को प्रायः मन्दिर कहा जाता है। परन्तु, जैसा कि भली-भाँति ज्ञात है, वहाँ बहुत से प्रवेशद्वार थे। सबसे बड़ा फाटक पूर्व की ओर था, परन्तु अन्य दिशाओं में भी फाटक थे। आँगन के भी कई भाग थे, जो एक दूसरे से अलग थे। तब सिदकिय्याह, इसलिये कि वह यिर्मयाह से एकान्त में बात कर सके, आँगन के तीसरे प्रवेशद्वार पर आया, और वहाँ उसने भविष्यद्वक्ता से विनती की कि जो कुछ उसे परमेश्वर से मिला है, उसे सच्चाई से उसके सामने खोलकर बताए।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि समय बीतने के साथ सिदकिय्याह यिर्मयाह को परमेश्वर का विश्वासयोग्य सेवक मानकर उसका अधिक आदर करने लगा था। तौभी, जैसा हम कह चुके हैं, वह भविष्यद्वक्ता की शिक्षा पर सचमुच ध्यान नहीं देता था। इसलिये राजा का मन दुविधा में था, उन कपटियों के समान, जिनमें परमेश्वर के भय का कुछ बीज शेष रहता है, और जो डगमगाते और निरन्तर बदलते रहते हैं, और जिनमें कुछ भी ठोस और स्थिर नहीं होता। वे परमेश्वर या उसके सेवकों को तुच्छ जानने का साहस तो नहीं करते; वरन् वे मानते हैं कि वे परमेश्वर के अधिकार के अधीन हैं, और कि उसका वचन क्षणभंगुर नहीं है; तौभी वे जहाँ तक हो सके बहाने बनाते हैं, और मानो परमेश्वर के स्वभाव ही को बदल देना चाहते हैं। सिदकिय्याह का चरित्र ऐसा ही था। क्योंकि वह उन लोगों में से नहीं था जो खुले और भद्दे ढंग से परमेश्वर को तुच्छ जानते हैं, जैसा हम आज के दिन देखते हैं, जब संसार इपिकूरियों से भरा है, जो धर्म को कहानी समझते हैं। सिदकिय्याह ऐसा नहीं था, वरन् उसने परमेश्वर का कुछ भय बनाए रखा था; हाँ, उसने भविष्यद्वक्ता के प्रति आदर भी दिखाया; तौभी वह परमेश्वर के अधीन होने और भविष्यद्वक्ता की सम्मति पर चलने को तैयार न था। इसलिये वह मानो दो विचारों के बीच लटका हुआ था। परन्तु सम्भव है कि उसके मन में कुछ आशा थी, क्योंकि उसने यिर्मयाह के प्राण बचाए थे। तब उसने सोचा होगा कि परमेश्वर शान्त हो गया है, या कि वह अपनी कठोरता में कुछ कमी करेगा, जैसे कपटी सदा अपनी चापलूसी आप करते हैं। क्योंकि यदि वे छोटा सा भी काम करें, तो सोचते हैं कि वे परमेश्वर के हाथ से कोई न कोई—न जाने कौन सा—अनुग्रह पाने के योग्य हो गए हैं। इसलिये सिदकिय्याह ने, जब पवित्र भविष्यद्वक्ता को राहत दी, और भारी अकाल के समय उसका पालन-पोषण किया, तो सोचा कि यह सेवा परमेश्वर को ग्रहणयोग्य है; और यह कुछ अंश में ग्रहणयोग्य थी भी; परन्तु वह इसे एक प्रकार का प्रायश्चित समझने में भूल कर रहा था। इसी कारण उसने भविष्यद्वक्ता को बुलवा भेजा; वह किसी अनुकूल उत्तर की आशा करता था, अर्थात् यह कि परमेश्वर का क्रोध शान्त हो गया है, या कम से कम घट गया है। परन्तु शेष बात हमें कल तक के लिये टालनी होगी।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जैसे तेरे सेवकों का जीवन हमारी दृष्टि में बहुमूल्य समझा जाना चाहिए, वैसे ही हम में से हर एक अपनी सामर्थ्य के अनुसार इस विषय में अपना भाग पूरा करने का यत्न करे, और इस बीच परस्पर प्रेम को ऐसा बढ़ाए कि आवश्यकता के समय एक दूसरे की सहायता करें; और यह भी कि हम तेरे सेवकों के विषय में ऐसे चिन्तित रहें कि अपने सब प्रयत्न, अपने सब परिश्रम और अपनी सब सेवाएँ तुझे ही अर्पित करें, और इसी प्रकार तुझे प्रसन्न करने का यत्न करें, कि हमारे सब काम इसी लक्ष्य की ओर लगे रहें, जब तक कि हम अपने वर्तमान युद्ध की दौड़ अन्त में पूरी करके तेरे स्वर्गीय राज्य में उस विश्राम में न पहुँच जाएँ, जो तेरे एकलौते पुत्र के लहू के द्वारा हमारे लिये प्राप्त किया गया है।—आमीन।

एक सौ उनचासवाँ व्याख्यान

यिर्मयाह 38:15

15. तब यिर्मयाह ने सिदकिय्याह से कहा, यदि मैं तुझे बताऊँ, तो क्या तू मुझे निश्चय मरवा न डालेगा? और यदि मैं तुझे सम्मति दूँ, तो क्या तू मेरी न सुनेगा?

15. Et dixit Jeremias ad Zedechiam, Si annuntiavero tibi, an non interficiendo interficies me? et si consilium dedero tibi, non auscultabis mihi (non audies ad me, ad verbum.)

ऐसा प्रतीत होता है कि भविष्यद्वक्ता ने यहाँ बहुत विवेक से काम नहीं लिया; क्योंकि जब उसे अपनी ओर से ही राजा को नगर के विनाश का समाचार देना चाहिए था, तब पूछे जाने पर उसने उत्तर देने से इनकार किया, या कम से कम एक शब्द भी बोलने से पहले उसने अपने प्राण की चिन्ता की, और अपने आप को संकट से सुरक्षित कर लिया। और हम जानते हैं कि भविष्यद्वक्ताओं को अपने प्राण की परवाह न करके परमेश्वर की आज्ञाओं को उससे बढ़कर मानना चाहिए था, जैसा हम यिर्मयाह के विषय में बार-बार पाते हैं, जिसने प्रायः अपने प्राण को जोखिम में डालकर ऐसी भविष्यद्वाणियाँ सुनाईं जो सारी प्रजा की घृणा भड़काने और स्वयं उसके लिये बड़े से बड़ा संकट उत्पन्न करनेवाली थीं। तो ऐसा प्रतीत होता है कि उसने कोई अच्छी उन्नति नहीं की थी, क्योंकि अब वह मानो अपनी बुलाहट के इस जोखिम भरे काम में चूक जाता है, और अपने आप को संकट में डालने का साहस नहीं करता।

परन्तु ध्यान देना चाहिए कि भविष्यद्वक्ताओं को बोलने की स्पष्ट आज्ञा सदा नहीं मिलती थी। क्योंकि यदि परमेश्वर ने यिर्मयाह को वह बात प्रकट करने की आज्ञा दी होती जो हम आगे पाएँगे, तो वह प्रश्न को न टालता; क्योंकि वह बहुत समय से ऐसा प्रशिक्षित हो चुका था कि वह अपने लिये ऐसा न डरता था कि अपने पद के सीधे मार्ग से हट जाए। तो अब जो वह पीछे हटता हुआ प्रतीत होता है, उसने ऐसा इसलिये किया कि परमेश्वर ने उसे अभी तक यह आज्ञा नहीं दी थी कि वह राजा को वह बात समझाए जो हम अभी देखेंगे। क्योंकि ऐसा करना निष्फल होता: और वह राजा को बहुत बार चेतावनी दे चुका था, और देख चुका था कि उसकी सम्मति तुच्छ जानी गई। तो कोई आश्चर्य नहीं कि वह कोई भलाई करने की आशा के बिना अपने प्राण को संकट में डालना नहीं चाहता था। यदि कोई यह आपत्ति उठाए कि तब तो हमारे लिये भी ऐसा ही करना उचित है; तो इसका मेरा उत्तर यह है कि हमें बिना सोचे-समझे मोती सूअरों के आगे नहीं डालने चाहिए; परन्तु जब तक हम हर उपाय आज़मा न लें, तब तक हमें अच्छे की आशा रखनी चाहिए, और इसलिये भरोसे के साथ काम करना चाहिए। परन्तु यिर्मयाह अपना कर्तव्य पूरी रीति से निभा चुका था: क्योंकि राजा भूल या अज्ञानता का बहाना नहीं कर सकता था, क्योंकि भविष्यद्वक्ता ने इतनी बार साक्षी दी थी कि उस विपत्ति का कसदियों के पास चले जाने के सिवाय और कोई उपाय नहीं।

अतः जब भविष्यद्वक्ता राजा को इतनी बार चेतावनी दे चुका था, तो अब वह चुप रह सकता था, और इस प्रकार अपने आप को क्षमा-योग्य ठहरा सकता था, “तू मुझे मार डालेगा, और साथ ही तू मेरा विश्वास न करेगा, या, यदि मैं तुझे सम्मति दूँ तो तू न मानेगा।” इन दोनों वाक्यांशों को एक साथ पढ़ना चाहिए; क्योंकि यदि यिर्मयाह ने देखा होता कि कोई भलाई होने की सम्भावना है, तो वह निःसन्देह अपने प्राण को बलिदान के रूप में अर्पित कर देता। परन्तु जब उसने देखा कि उसकी शिक्षा व्यर्थ होगी, और उसका प्राण संकट में है, तो उसने उचित न समझा कि जब किसी लाभ की आशा नहीं, तब अपने प्राण को उतावली से संकट में डाले। अतः भविष्यद्वक्ता ने केवल अपने संकट का ही विचार नहीं किया, परन्तु वह स्वर्गीय सत्य को भी उपहास का पात्र बनाना नहीं चाहता था, क्योंकि वह पहले ही बहुत बार तुच्छ जाना जा चुका था। सो उसने राजा के प्रश्न का उत्तर नहीं दिया, क्योंकि उसे निश्चय था कि वह आज्ञा न मानेगा, जैसा कि वह उस समय तक सदा करता आया था। इसके बाद यह आता है—

यिर्मयाह 38:16

16. तब राजा सिदकिय्याह ने अकेले में यिर्मयाह से शपथ खाकर कहा, यहोवा जिसने हमारा यह जीव रचा है, उसके जीवन की शपथ, न तो मैं तुझे मरवा डालूँगा, और न उन मनुष्यों के वश में कर दूँगा जो तेरे प्राण के खोजी हैं।

16. Et juravit rex Zedechias Jeremiae in secreto, dicens, Vivit Jehova, qui fecit nobis animam hanc, si interfecero te, et si tradidero te in manum istorum qui quaerunt animam tuam.

राजा ने, नया प्रकाशन पाने की इच्छा से, शपथ खाकर भविष्यद्वक्ता को सुरक्षा का वचन दिया। सो उसने शपथ खाई कि चाहे वह भविष्यद्वक्ता के उत्तर से अप्रसन्न भी हो, तौभी बदला न लेगा। वह निश्चय अनुमान कर सकता था, यद्यपि यिर्मयाह ने स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा था, कि उत्तर प्रतिकूल होगा, और उसकी इच्छाओं के किसी प्रकार अनुकूल न होगा। क्योंकि यदि भविष्यद्वक्ता को कोई सुखद और आनन्ददायक वाणी दी गई होती, तो वह अपने संकट के, और राजा के क्रोध के, और उसके हठ के विषय में भूमिका न बाँधता। अतः सिदकिय्याह यह निष्कर्ष निकाल सकता था कि दुःखद बात के सिवाय और किसी बात की आशा नहीं की जा सकती। इसी कारण उसने शपथ खाई कि उत्तर चाहे जो हो, वह ऐसा क्रुद्ध न होगा कि भविष्यद्वक्ता को कोई हानि पहुँचाए।

उसने कहा, मैं तुझे न मारूँगा, और न उनके हाथ में सौंपूँगा जो तेरे प्राण के खोजी हैं, अर्थात् जो तेरे प्राण के शत्रु हैं: क्योंकि प्राण खोजना वही बात है जो मनुष्य का मृत्यु तक पीछा करना। यह बोलने का ढंग प्रायः आता है, विशेषकर भजन संहिता में। (भजन संहिता 38:12; भजन संहिता 40:14, 15.) अतः वह यिर्मयाह के प्राणघातक शत्रुओं की ओर संकेत करता है: और साथ ही वह प्रतिज्ञा करता है कि जो कुछ वह भविष्यद्वक्ता से सुनेगा उसे वह शान्त मन से ग्रहण करेगा।

आओ, हम शपथ के रूप पर ध्यान दें, जीवित है यहोवा, जिसने हमारे लिये यह प्राण रचा

पहले उसने परमेश्वर के जीवन की, अर्थात् अमर परमेश्वर की, शपथ खाई। यह शब्द, “जीवित है”, जब परमेश्वर पर लागू किया जाता है, तो ऐसे जीवन को सूचित करता है जो मनुष्यों या पशुओं के जीवन से भिन्न है; क्योंकि मनुष्य दूसरे की इच्छा से जीते हैं, अर्थात् जब तक परमेश्वर उन्हें जीवन देता है।

अतः जीवित रहना केवल परमेश्वर ही का गुण है, क्योंकि हम उसी में जीवित रहते, और चलते-फिरते, और स्थिर रहते हैं, उसके बिना हमारा कोई अस्तित्व नहीं, जैसा पौलुस प्रेरितों के काम 17:28 में कहता है; और इसलिये वह दूसरे स्थान पर हमें सिखाता है कि अमरता केवल परमेश्वर ही की है। (1 तीमुथियुस 6:16) साथ ही इस शब्द में वह सब कुछ सम्मिलित है जो विशेष रूप से परमेश्वर का है; क्योंकि परमेश्वर इसलिये नहीं जीवित है कि आराम भोगे और आलस्य में पड़ा रहे, परन्तु इसलिये कि विश्व पर शासन करे, सारे स्वर्ग और पृथ्वी पर अपनी सामर्थ्य का प्रयोग करे, मनुष्यों का न्याय करे, और हर एक को उसका उचित प्रतिफल दे। अतः परमेश्वर में जीवन आलसी जीवन नहीं है, जैसा भक्तिहीन लोग कल्पना करते हैं, परन्तु उसमें उसकी असीम सामर्थ्य, न्याय, बुद्धि, और वह सब सम्मिलित है जो विशेष रूप से उसका है। अतः जब कभी हम परमेश्वर के जीवन की चर्चा करें, तो जान लें कि हम उसी के द्वारा जीवित हैं, और यह भी कि वह स्वर्ग में आलस्य और लापरवाही से बैठा नहीं रहता, परन्तु सारे संसार पर शासन करता है, और मनुष्यों का न्यायी है।

तो इसी अर्थ के अनुसार सिदकिय्याह ने कहा, जीवित है यहोवा, और फिर उसने जोड़ा, जिसने हमारे लिये यह प्राण रचा। जो मैं पहले कह चुका हूँ उसे वह और स्पष्ट रूप से व्यक्त करता है, और यह ऐसा ही है मानो उसने परमेश्वर के सामने अपने प्राण को बन्धक के रूप में रख दिया हो। सो उसने झूठी शपथ का दण्ड अपने ऊपर माँगा; क्योंकि जब उसने जीवनदाता परमेश्वर की शपथ खाई, तो यह ऐसा ही था मानो उसने कहा हो, “यदि मैं तुझे धोखा दूँ, या विश्वासघात करूँ, तो मेरा प्राण चला जाए।” इससे हम देखते हैं कि शपथ का उद्देश्य क्या है, अर्थात् यह कि परमेश्वर का पवित्र नाम हमारे लिये ज़मानत ठहरे, ताकि हमारी बात पर भरोसा किया जा सके। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि जब कभी हम शपथ खाते हैं, तो परमेश्वर का नाम दण्ड से बचकर नहीं लिया जा सकता: क्योंकि हम अपने प्राण को उसके न्याय के अधीन कर देते हैं, कि वह अपने प्रति किए गए अन्याय का बदला ले; क्योंकि, जैसा भली-भाँति ज्ञात है, झूठी शपथों से उसका नाम अपवित्र किया जाता है।

अब यह आता है—

यिर्मयाह 38:17

17. तब यिर्मयाह ने सिदकिय्याह से कहा, सेनाओं का परमेश्वर यहोवा, जो इस्राएल का परमेश्वर है, यों कहता है, यदि तू बाबुल के राजा के हाकिमों के पास सचमुच निकल जाए, तब तो तेरा प्राण बचेगा, और यह नगर आग से फूँका न जाएगा; और तू अपने घराने समेत जीवित रहेगा:

17. Tunc dixit Jeremias ad Zedechiam, Sic dicit Jehova, Deus exercituum, Deus

Israel, Si egrediendo egressus fueris ad proceres regis Babylonis, vivet anima tua, et urbs ista non consumetur (non incendetur) igni, sed vives tu et domus tua.

यहाँ यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि क्या परमेश्वर ने अपने भविष्यद्वक्ता को फिर से वह बात दोहराने की आज्ञा दी थी जो वह इतनी बार व्यर्थ कह चुका था? इस पर हम कुछ निश्चित नहीं कह सकते, केवल यह कि सम्भावना यही है कि भविष्यद्वक्ता ने पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के बिना अपना मुँह नहीं खोला। क्योंकि यद्यपि उसे कोई नई आज्ञा नहीं मिली थी, तौभी परमेश्वर का आत्मा उसे प्रेरित करता था, और उसके मन के साथ-साथ उसकी जीभ पर भी शासन करता था। हम अभी पाएँगे कि जो बात निकट थी वह उस पर प्रकट की गई थी; ऐसी बात नहीं जो उसके पास पहले न थी, परन्तु वह पहले की शिक्षा की नई पुष्टि के रूप में जोड़ी गई। परन्तु यह केवल एक सम्भावित अनुमान है; अतः इस प्रश्न पर हर एक अपना-अपना विचार रखे।

इसलिये कि वह अब अपने उत्तर को विश्वसनीय बना सके, उसने यह भूमिका बाँधी कि वह परमेश्वर के मुख के बिना कुछ नहीं बोलता। उसने यह बात बहुत बार प्रकट की थी, और साक्षी दी थी कि जो कुछ वह कहता है वह परमेश्वर ने उस पर प्रकट किया है। परन्तु अब यह ज्ञात नहीं कि उसे वही बातें दोहराने की आज्ञा दी गई थी या नहीं; यद्यपि यह निश्चित है कि उसने परमेश्वर के नाम का दुरुपयोग नहीं किया, और न बिना अधिकार के यह दावा किया कि यह परमेश्वर का वचन है। अतः, जैसा मैं कह चुका हूँ, आत्मा उसका मार्गदर्शक और शासक था, चाहे हम यह मान लें कि उसे कोई ईश्वरीय आज्ञा नहीं मिली थी।

वह परमेश्वर को सेनाओं का परमेश्वर, और इस्राएल का परमेश्वर कहता है। पहली उपाधि से वह परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता को सूचित करता है; और दूसरी से उस वाचा को जो उसने यहूदियों के साथ बाँधी थी। अतः उसने परमेश्वर की अपार सामर्थ्य को इसलिये सामने रखा कि सिदकिय्याह को भयभीत करे; क्योंकि कपटी लोग, यद्यपि परमेश्वर के नाम से डरने को विवश होते हैं, तौभी बाद में एक प्रकार से कठोर हो जाते हैं: इसलिये उन्हें झकझोरना आवश्यक है, जैसा भविष्यद्वक्ता ने यहाँ किया। फिर उसने सिदकिय्याह की भक्तिहीनता को छुआ; क्योंकि वह न केवल अपने आप को परमेश्वर की चुनी हुई प्रजा में से एक बताता था, वरन् वह राजा और प्रधान भी था; वह प्रभु के निज भाग पर शासन करता था। तौभी वह किसी भविष्यद्वाणी पर विश्वास नहीं करता था। अतः जब भविष्यद्वक्ता कहता है, इस्राएल का परमेश्वर, तो उसमें एक भर्त्सना निहित है।

दण्ड में कमी की बात जोड़ी गई है, इस शर्त पर कि सिदकिय्याह स्वेच्छा से अपनी गर्दन जूए के नीचे रख दे। और यह परमेश्वर की ओर से कोई साधारण दया नहीं थी कि वह अब भी चरम दण्ड से बच सकता था; क्योंकि वह इस योग्य न था कि परमेश्वर उसकी ओर ध्यान दे, क्योंकि कई वर्षों से उसने उस बात पर ध्यान नहीं दिया था जो उसने यिर्मयाह के मुख से सुनी थी, कि उसे अपने आप को, अपनी प्रजा को, और नगर को कसदियों के हाथ सौंप देना है। उसने इनकार किया था, वरन् वह परमेश्वर के विरुद्ध हठीला और ढीठ बना रहा था। इससे हम देखते हैं कि वह किसी भी राहत के योग्य न था; तौभी परमेश्वर अब भी उसके प्राण के विषय में उसे क्षमा करने को तैयार था, इस शर्त पर कि वह अपनी इच्छा से कसदियों के पास चला जाए। और इस प्रकार वह और भी अधिक निरुत्तर ठहराया गया, क्योंकि जब उसने सुना कि यदि वह उचित दण्ड के अधीन हो जाए तो परमेश्वर उस पर कृपालु होगा, तौभी वह आज्ञा मानने को तैयार न हुआ, जैसा हम आगे देखेंगे। और इस प्रकार हम देखते हैं कि यिर्मयाह ने अकारण नहीं कहा था, “यदि मैं तुझे सम्मति दूँ, तो तू मेरी न सुनेगा और न मानेगा;” क्योंकि परिणाम ने यही सिद्ध किया। यह एक बात है। फिर उसने कहा, तू जीवित रहेगा; और पहले उसने कहा, तेरा प्राण जीवित रहेगा; और फिर, यह नगर फूँका न जाएगा, और तू जीवित रहेगा; और उसने ये शब्द दोहराए, तू जीवित रहेगा, तू और तेरा घराना। अब धमकी आती है—

यिर्मयाह 38:18

18. परन्तु यदि तू बाबुल के राजा के हाकिमों के पास न निकल जाए, तो यह नगर कसदियों के वश में कर दिया जाएगा, और वे इसे आग से फूँक देंगे, और तू उनके हाथ से बच न सकेगा।

18. Si vero non egressus fucris ad proceres regis Babylonis, tradetur urbs ista in manum Chaldaeorum, et exurent eam igni, et tu non evades e manu ipsorum.

भविष्यद्वक्ता ने राजा को क्षमा की आशा दी; इसलिये नहीं कि उसने दण्ड से पूरी छूट की प्रतिज्ञा की, परन्तु इसलिये कि राजा कम से कम यह आशा रख सके कि यदि वह परमेश्वर के चरम प्रतिशोध से पहले ही सँभल जाए, तो परमेश्वर उस पर दया करेगा। परन्तु क्योंकि जब परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं की मधुरता से कपटियों को आकर्षित करता है तब वे सहज में नहीं पिघलते, इसलिये धमकी जोड़ी गई है; भविष्यद्वक्ता कहता है, “यदि तू अपने आप को कसदियों के हाथ न सौंपेगा, तो तू न बचेगा, और नगर कसदियों द्वारा ले लिया जाएगा और जला दिया जाएगा।”

सिदकिय्याह कुछ अंश में आशा रख सकता था, और इस प्रकार वह दया पा सकता था जो परमेश्वर ने उसके सामने रखी थी। जब इस बात में उसे कुछ लाभ न हुआ, तो आवश्यक था कि उसे दूसरे ढंग से, नगर के विनाश और उसकी अपनी मृत्यु को उसके सामने रखकर, जगाया जाए। परन्तु न भय से और न आशा से वह भविष्यद्वक्ता की सम्मति मानने को राज़ी हुआ। इससे हम देखते हैं कि यद्यपि वह प्रकट रूप से परमेश्वर को तुच्छ नहीं जानता था, तौभी वह न ठण्डा था न गर्म, परन्तु चाहता था कि उसे पूरी रीति से छोड़ दिया जाए। इसी कारण उसने भविष्यद्वक्ता द्वारा प्रस्तुत अनुग्रह को ठुकरा दिया। परन्तु उसका बहाना आगे आता है

यिर्मयाह 38:19

19. तब राजा सिदकिय्याह ने यिर्मयाह से कहा, जो यहूदी कसदियों के पास भाग गए हैं, मैं उनसे डरता हूँ, ऐसा न हो कि मैं उनके वश में कर दिया जाऊँ और वे मुझ से ठट्ठा करें।

19. Et dixit rex Zedechias ad Jeremiam, Ego metuo (vel, crucior) ob Judaeos qui defecerunt ad Chaldaeos (vel, solitus sum, vel, timeo, et metuo Judaeos ipsos,) ne forte tradant me in manum ipsorum, et contumelia me afficiant (alii vertunt, illudant mihi.)

ऐसा प्रतीत होता है कि सिदकिय्याह के पास यहाँ भविष्यद्वक्ता की बात तुरन्त न मानने का एक अच्छा कारण था। और प्रायः सबसे उत्तम विश्वासी भी अपनी चिन्ताओं को खुलकर प्रकट करते हैं, और हम देख चुके हैं कि स्वयं भविष्यद्वक्ता ने भी, जब किसी संकट की आशंका होती थी, कभी-कभी उसका उल्लेख किया। अतः यह कोई दोष की बात न थी कि सिदकिय्याह ने निष्कपट भाव से मान लिया कि वह उन लोगों के भय से रुका हुआ है जो कसदियों से जा मिले थे। क्योंकि हम जानते हैं कि प्रजा, जब एक बार जूआ उतार फेंकती और अपनी दी हुई वफ़ादारी तोड़ देती है, तो ढिठाई से व्यवहार करती है; क्योंकि वे जानते हैं कि जिनके प्रति उन्होंने अपना कर्तव्य पूरा नहीं किया वे उनके प्रति कभी नरम न होंगे। अतः सिदकिय्याह की चिन्ता उचित थी, और भविष्यद्वक्ता के सामने अपना भय प्रकट करने में उसकी सरलता क्षमा के योग्य प्रतीत होती थी, क्योंकि वह आज्ञाकारिता का कुछ चिह्न देता हुआ प्रतीत होता था। परन्तु अन्त में परिणाम हमें दिखाएगा कि वह भय से ऐसा जकड़ा हुआ था कि उसने परमेश्वर और भविष्यद्वक्ता की सम्मति को ठुकरा दिया। जैसा मैंने अभी कहा, प्रायः ऐसा होता है कि विश्वासी भी डरते हैं, और इस प्रकार डगमगाते या ठिठक जाते हैं, जब परमेश्वर उन्हें कोई कठोर और कठिन बात करने की आज्ञा देता है, और वे प्रसन्नता से उस संघर्ष से हट जाना चाहते हैं, परन्तु अन्त में वे परमेश्वर की आज्ञा मानते हैं, और अपने विचारों को त्याग देते हैं, और आज्ञाकारिता में परमेश्वर के अधीन हो जाते हैं। परन्तु सिदकिय्याह ऐसा डरा कि वह अपने लिये प्रतिज्ञा की गई परमेश्वर की भलाई का भागी न हो सका।

इससे हम देखते हैं कि विश्वासियों में और त्यागे हुओं में क्या समान है, और यह भी कि वे एक दूसरे से कैसे भिन्न हैं। पहले-पहल विश्वासी भी अविश्वासियों के समान डरते हैं; वे चिन्तित होते हैं, डगमगाते हैं, और अपनी उलझनें प्रकट करते हैं: उसी समय अविश्वासी अपने आप को ढील देते हैं, और अपने कुटिल उद्देश्यों में कठोर हो जाते हैं; परन्तु विश्वासी अपने आप से लड़ते हैं, और अपने विचारों को परमेश्वर की इच्छा के अधीन कर देते हैं, और इस प्रकार विश्वास के द्वारा भय पर जय पाते हैं; वे शरीर को भी क्रूस पर चढ़ाते हैं, और अपने आप को पूरी रीति से परमेश्वर को सौंप देते हैं। यही बात हम पहले भविष्यद्वक्ता में देख चुके हैं। परन्तु अब हम राजा सिदकिय्याह का वह हठ देखेंगे जिसकी ओर हमने संकेत किया है। सो सिदकिय्याह डरता था कि कहीं वे यहूदी, जो कसदियों से जा मिले थे, उसके साथ ढिठाई का व्यवहार न करें।

भविष्यद्वक्ता ने उसे इस प्रकार उत्तर दिया—

यिर्मयाह 38:20-22

20. यिर्मयाह ने कहा, तू उनके वश में न कर दिया जाएगा; जो कुछ मैं तुझ से कहता हूँ उसमें यहोवा की बात मान ले, तब तेरा भला होगा, और तेरा प्राण बचेगा।

20. Tunc dixit Jeremias, Non tradent te, audi agedum vocem Jehovae quam tibi profero (quam ego loquar ad te,) et tibi erit bene (tibi bene cedat,) et vivet anima tua:

21. परन्तु यदि तू निकल जाने से इन्कार करे, तो जो वचन यहोवा ने मुझे दिखाया है, वह यह है:

21. Quod si tu abnueris ad egrediendum (hoc est, recusaveris egredi,) hic est sermo quem ostendit mihi Jehova;

22. और देख, यहूदा के राजा के भवन में जितनी स्त्रियाँ रह गई हैं, वे सब बाबुल के राजा के हाकिमों के पास निकालकर पहुँचाई जाएँगी, और वे स्त्रियाँ कहेंगी, तेरे मित्रों ने तुझे उकसाया और तुझ पर प्रबल हुए हैं; तेरे पाँव कीच में धँस गए हैं, और वे पीछे फिर गए हैं।

22. Et ecce omnes mulieres, quae relictae fuerint in domo regis Jehudah egrediuntur ad proceres regis Babylonis, et ecce ipsae dicent, Suaserunt tibi (alii, deceperunt te, vel, subduxerunt) et praevaluerunt tibi viri pacis tuae; defixi sunt in luto pedes tui, conversi sunt retrorsum.

यहाँ यिर्मयाह फिर सिदकिय्याह को दृढ़ करता है, ताकि वह परीक्षा करके देखने में हिचकिचाए नहीं, क्योंकि परमेश्वर अब भी उसे क्षमा प्रदान करेगा, जिससे कम से कम उसकी ताड़ना पिता की-सी और हल्की होगी। तब उसने सिदकिय्याह से प्रतिज्ञा की कि वह उन सब अपमानों से सुरक्षित रहेगा जिनके विषय में वह चिन्तित था। वह कहता है, वे तुझे सौंपेंगे नहीं; मानो उसने कहा हो, "इसे परमेश्वर के विधान पर छोड़ दे, अपने आप को परमेश्वर के हाथ सौंप दे, और सन्देह न कर कि वह तुझे सुरक्षित रखेगा।" जैसा मैं कह चुका हूँ, परमेश्वर अपनी कृपा से विश्वासियों को अनुमति देता है कि वे अपनी चिन्ताएँ उसकी गोद में डाल दें; परन्तु साथ ही, जब वह उन्हें दृढ़ करता है और फिर भी कोई आज्ञा न माने, तो यह जान-बूझकर की गई दुष्टता का चिह्न है, और ऐसा हठ अनुग्रह के सारे प्रकाश को बुझा देता है। सिदकिय्याह की मूढ़ता ऐसी थी कि उसने इस दूसरी प्रतिज्ञा को भी ग्रहण न किया। वह अपना भय तो स्वीकार कर सकता था, परन्तु उसे उपाय भी ग्रहण करना चाहिए था। भविष्यद्वक्ता ने उसे निश्चय दिलाया कि उसका प्राण परमेश्वर के हाथ में सुरक्षित रहेगा; वह इससे अधिक और क्या चाह सकता था? परन्तु यह व्यर्थ ही कहा गया, क्योंकि भय ने उसके मन को पूरी तरह घेर रखा था, यहाँ तक कि प्रतिज्ञा के लिए कोई प्रवेश-मार्ग न रहा। अब इस बात पर सावधानी से ध्यान देना चाहिए; क्योंकि हम में से कोई ऐसा नहीं जिसे बहुत-सी चिन्ताएँ व्याकुल न करती हों और बहुत-से भय उलझन में न डालते हों; परन्तु उपाय को स्थान दिया जाना चाहिए। जब परमेश्वर हमें चिन्ता-भरे विचारों से दुःखी देखता है, तब वह हमारी सहायता करता है; परन्तु यदि भय ऐसा प्रबल हो जाए कि वे सब प्रतिज्ञाएँ, जिनके द्वारा परमेश्वर हमें उठाता है, कुछ भी लाभ न दें, तो यह निराशाजनक अविश्वास का चिह्न है।

338 यह क्रिया भय की अपेक्षा मन की व्याकुलता या चिन्ता का अर्थ देती है, "मैं यहूदियों के विषय में व्याकुल हूँ," इत्यादि। वल्गेट में है, "मैं चिन्तित हूँ," और टार्गम में, "मैं व्याकुल हूँ।" हमारा अनुवाद, "मैं ... से डरता हूँ," सीरियाई अनुवाद के अनुसार है। ऐसा जान पड़ता है कि राजा इतना घमण्डी था कि वह यह मानने को तैयार न था कि उसे भय है। इस पद के अन्तिम वाक्यांश का अनुवाद यों किया जा सकता है, "और वे मुझ पर आनन्द से इतराएँ।" यह क्रिया अपने आप को ऊँचा उठाने या बढ़ाने का अर्थ देती है, और तब पूर्वसर्ग {{ב का अर्थ "पर" या "विरुद्ध" होता है। राजा अपने मन में व्याकुल था, क्योंकि उसे उन लोगों के तानों और अपमानों की आशंका थी जो पहले ही कसदियों के पास चले गए थे। — सं.

इसके बाद लिखा है, यहोवा की वह वाणी सुन जो मैं तुझ से कहता हूँ, जिससे तेरा भला हो और तेरा प्राण जीवित रहे। प्रतिज्ञा फिर से जोड़ी गई है, ताकि सिदकिय्याह अधिक स्वेच्छा से परमेश्वर के अधीन हो जाए। क्योंकि यद्यपि हम जानते हैं कि हम उसकी सामर्थ्य से बच नहीं सकते, तौभी जब तक वह हमें अनुग्रह की प्रतिज्ञाएँ देकर कृपा न करे, तब तक वह सामर्थ्य हमारे लिए भय का कारण ही बनी रहेगी।

इस प्रकार भविष्यद्वक्ता ने सिदकिय्याह को परमेश्वर की आज्ञा मानने की ओर ले जाने का प्रयत्न किया: वह कहता है, यहोवा की वाणी सुन, जिससे तेरा भला हो। उसने दिखाया कि यदि सिदकिय्याह केवल परमेश्वर के वचन का पालन करे, तो अपनी सुरक्षा का प्रबन्ध करना अब भी उसके वश में था। और यह स्थल हमें सिखाता है कि भविष्यद्वक्ता ने बिना सोचे-समझे और व्यर्थ नहीं, परन्तु परमेश्वर के आत्मा की अगुवाई और शिक्षा के अधीन होकर बात कही थी। क्योंकि यद्यपि सम्भव है कि उसे कोई नई आज्ञा न मिली हो, तौभी वह जानता था कि परमेश्वर की इच्छा यही है कि वह पहले की ईश्वरीय वाणियों की पुष्टि करे और उन्हें फिर से दृढ़ता से कहे; क्योंकि जब उसने सिदकिय्याह से परमेश्वर की वह वाणी सुनने को कहा जिसे उसने प्रकट किया था, तब उसने परमेश्वर का नाम झूठमूठ नहीं लिया।

अब यद्यपि यह वचन विशेष रूप से सिदकिय्याह से कहा गया था, तौभी हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि जो कुछ परमेश्वर हम से कहता है, उसे ग्रहण करना सदा हमारी भलाई के लिए होता है, चाहे वह ऊपर से देखने में कठोर और अप्रिय ही क्यों न हो, जैसा वह सिदकिय्याह के लिए था; क्योंकि अपने आप को शत्रुओं के हाथ सौंप देना, अपने राजकीय अधिकार से वंचित होना, बँधुआई में घसीटा जाना, और राजा से दास बन जाना उसके लिए कदापि सुखद बात न थी; तौभी अपना प्राण बचाने के लिए परमेश्वर की आज्ञा मानने से बढ़कर उसके लिए कुछ भी अच्छा न था। इसलिए यद्यपि परमेश्वर के वचनों में ऐसी बातें हों जो हमारे शरीर के विपरीत और कष्टदायक हैं, तौभी हमें दृढ़ निश्चय रखना चाहिए कि परमेश्वर सदा वही कहता है जो हमारे उद्धार के लिए भला है। अतः यदि सिदकिय्याह ने भविष्यद्वक्ता की सम्मति मानी होती, तो उसका भला होता; क्योंकि वह बँधुआई में पाता कि परमेश्वर उस पर कृपालु है, और यह एक अमूल्य सान्त्वना होती; और फिर सम्भव था कि वह बँधुआई से लौटा लाया जाता, कम से कम वह नगर और मन्दिर को तो बचा लेता: परन्तु अपने हठ के कारण उसने नगर को शत्रुओं के हाथ में पकड़वा दिया, और इसी कारण मन्दिर भी जला दिया गया।

फिर वह कहता है, यदि तू निकल जाने से इन्कार करे, तो जो वचन परमेश्वर ने मुझे दिखाया है वह यह है। यिर्मयाह फिर घोषणा करता है कि सिदकिय्याह का विरोध व्यर्थ था, क्योंकि वह, जैसा कहा जाता है, पैने के विरुद्ध लात मार रहा था, क्योंकि शत्रुओं के हाथ में पड़ने से बचना उसके लिए किसी प्रकार सम्भव न था; और जब ऐसा हो जाएगा, तब न तो नगर बचेगा और न मन्दिर। परन्तु भविष्यद्वक्ता फिर दोहराता है कि उसे दिखाया गया था कि क्या कहना है, इसलिए वह अपने नाम से नहीं, परन्तु परमेश्वर की आज्ञा से बोल रहा था; सम्भव है कि वह आज्ञा उसे उस समय न दी गई हो, परन्तु भविष्यद्वक्ता जानता था कि परमेश्वर का वह ठहराव, जिसका वह प्रचारक रहा था, मिटाया नहीं जा सकता। तब वह कहता है कि यह वचन उसे परमेश्वर ने दिखाया था, अर्थात् वह जो आगे आता है —

देख, जो स्त्रियाँ अब तक राजा के भवन में बची हैं, वे बाबुल के राजा के हाकिमों के पास निकल जाएँगी, अर्थात् नगर छोड़कर वे तुझे तेरे शत्रुओं के हाथ पकड़वा देंगी; और वे कहेंगी, तेरे मेल के लोगों ने तुझे धोखा दिया, या तुझे बहकाया, और प्रबल हुए हैं; इस प्रकार तेरे पाँव कीच में धँसे हुए हैं, और वे पीछे फिर गए हैं। यहाँ अंश को सम्पूर्ण के स्थान पर रखा गया है, क्योंकि एक बात के अन्तर्गत नगर की सारी विपत्ति सम्मिलित है। हम तो जानते हैं कि स्त्रियाँ लड़ने के लिए पंक्तियों में खड़ी नहीं होतीं, और जब कोई नगर ले लिया जाता है, तो प्रायः स्त्रियों को छोड़ दिया जाता है। इसलिए जब भविष्यद्वक्ता कहता है, जो स्त्रियाँ अब तक राजा के भवन में बची हैं वे निकल जाएँगी, तो यह ऐसा है मानो उसने कहा हो, "स्त्रियाँ भी विवश होकर शत्रुओं के पास निकल जाएँगी और अपने आप को उनके वश में सौंप देंगी; तो जब स्त्रियों की दशा ऐसी कठोर होगी, तब पुरुषों का क्या होगा?"

अब हम भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय समझते हैं: तब स्त्रियाँ निकल जाएँगी, अर्थात् जब नगर ले लिया जाएगा, तब भवन की स्त्रियाँ अपने छिपने के स्थानों से निकाली जाएँगी और अपने शत्रुओं के सामने उपस्थित होने को विवश की जाएँगी। और फिर वह जोड़ता है, और देख, वे कहेंगी, इत्यादि। उसने {,}הנהene, अर्थात् "देख", शब्द को दो बार प्रयोग किया, ताकि सिदकिय्याह को मानो उसी दृश्य के बीच ले जाए; क्योंकि जो लोग अपनी उदासीनता में सुन्न पड़े हैं, उन्हें इसी प्रकार जगाना आवश्यक है। वह कहता है, और देख, वे कहेंगी। यहाँ यिर्मयाह घोषणा करता है कि स्त्रियाँ राजा की मूर्खता की, और हाकिमों की दुष्टता और हठ की भी गवाही देनेवाली साक्षी होंगी, मानो उसने कहा हो, "तू आज मेरी बात नहीं मानेगा, और तेरे मन्त्री भी हठपूर्वक विरोध करते हैं; परमेश्वर तुम पर पहले ही न्याय सुना चुका है: तुम उसे तुच्छ जानते हो और कुछ भी नहीं समझते: अन्त में परमेश्वर स्त्रियों को उभारेगा, जो खुलेआम तेरी मूर्खता का, हे राजा, और तेरे मन्त्रियों के हठ का प्रचार करेंगी, क्योंकि तुम ने सब भविष्यद्वाणियों को तुच्छ जाना।"

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जब तू प्रतिदिन निरन्तर उपदेशों के द्वारा हमें पश्चाताप के लिए बुलाता है, तो हम तेरी भलाई पर गम्भीरता से मनन करें, और उचित समय पर तेरी ओर लौट आएँ और तेरी इच्छा के अधीन हो जाएँ, और जो दण्ड तू हम पर डालता है उसे सहने से कभी इन्कार न करें; और हम इस बीच तेरे चरम प्रतिशोध को ऐसा न भड़काएँ कि तुझे कठोर न्यायी पाएँ, परन्तु दण्ड के नीचे भी तेरी पितृतुल्य दया का सदा अनुभव करते रहें, जब तक कि हम अन्त में उस आनन्द की परिपूर्णता तक न पहुँच जाएँ जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में स्वर्ग में हमारे लिए रखा हुआ है। — आमीन।

एक सौ पचासवाँ व्याख्यान

कल हमें वहाँ रुकना पड़ा था जहाँ भविष्यद्वक्ता ने राजा सिदकिय्याह से कहा कि स्त्रियाँ उसकी न्यायी होंगी, और यह उसकी और भी भारी निन्दा के लिए था, क्योंकि उसने परमेश्वर की वाणियों पर विश्वास करने से इन्कार किया था। यद्यपि भविष्यद्वक्ता ने उसे बार-बार पश्चाताप करने के लिए समझाया था, तौभी उसने उसकी सब चेतावनियों को ठुकरा दिया था। इसलिए यिर्मयाह यहाँ घोषणा करता है कि उसे वह दण्ड सहना पड़ेगा जिसके वह योग्य था, अर्थात् स्वयं स्त्रियाँ खुलेआम उसकी मूर्खता की और सब हाकिमों के विश्वासघात की चर्चा करेंगी। तब वे कहेंगी, उन्होंने तुझे बहकाया, या जैसा कुछ लोग पढ़ते हैं, तुझे फुसलाया, और कुछ अन्य, "तुझे हाँक ले गए," जिसे मैं पसन्द करता, यदि यह इसका सामान्य अर्थ होता, क्योंकि इसके तुरन्त बाद आता है, और तुझ पर प्रबल हुए हैं; परन्तु हम इसे सीधे इसके अपने अर्थ में ले सकते हैं, क्योंकि उन्होंने विश्वासघात करके राजा को बहकाया था।

वह उन्हें मेल के लोग कहता है, जिनसे भलाई के कामों की आशा की जा सकती थी। हम तो जानते हैं कि इब्रानी लोग मित्रों और साथियों को इसी प्रकार कहते थे। मेल का अर्थ केवल एकता नहीं, परन्तु उससे बढ़कर मित्रता भी है, जैसी राजा और उसके मन्त्रियों के बीच होनी चाहिए। निःसन्देह यिर्मयाह ने इस बात में यह परखना चाहा कि क्या सिदकिय्याह अब भी सुधारा जा सकता है; क्योंकि वह पहले से बताता है कि स्त्रियाँ यह बात मानो न्यायासन से घोषित करेंगी; परन्तु जैसा मैंने कल कहा था, और जैसा हम आगे देखेंगे, वह बहरों से बात कर रहा था।

फिर लिखा है, तेरे पाँव कीच में धँसे हुए हैं। इसे लाक्षणिक अर्थ में लेना चाहिए।

यदि वह शत्रु के पास चला जाता तो अपना प्राण बचा सकता था, और इस प्रकार स्वेच्छा से किया गया आत्मसमर्पण मानो उसके छुटकारे का मूल्य बन जाता; परन्तु उसने अपने ही घोंसले में रहना अधिक पसन्द किया: और भविष्यद्वक्ता कहता है कि यह सुस्ती ऐसी कीचड़ के समान होगी जिसमें वह धँसा रहेगा। जो आगे आता है, वे पीछे फिर गए हैं, उसे मेरे विचार में अनुचित रूप से हाकिमों पर लागू किया गया है। मैं इन शब्दों को पहले के शब्दों के साथ जोड़कर पढ़ता हूँ, तेरे पाँव कीच में धँसे हुए हैं, पीछे फिर गए हैं; क्योंकि राजा के साथ सब कुछ उसकी आशा के विपरीत हुआ। आगे लिखा है —

यिर्मयाह 38:23

23. तेरी सब स्त्रियाँ और तेरे बाल-बच्चे कसदियों के पास निकालकर पहुँचाए जाएँगे; और तू उनके हाथ से न बचेगा, वरन् बाबुल के राजा के हाथ से पकड़ा जाएगा; और तू इस नगर को आग से फुँकवाएगा।

23. Et omnes uxores tuas et filios tuos deducent ad Chaldaeos, et tu non evades e manu eorum, quia in manu regis Babylonis comprehenderis, et urbem hanc combures igni.

यिर्मयाह उसी विषय को आगे बढ़ाता है; परन्तु वह विपत्ति का विस्तार से वर्णन करता है, ताकि राजा कम से कम भय से काँपकर ठीक सम्मति के अधीन हो जाए; क्योंकि जब हम सुनते हैं कि मृत्यु निकट है, तो यह सचमुच हमें भय से भर देता है; और जब बहुत-सी विपत्तियों का उल्लेख किया जाता है, तो हमारा जागना अवश्य है; और निःसन्देह भविष्यद्वक्ता यही चाहता था। तब वह कहता है कि सिदकिय्याह अपने शत्रुओं के हाथ में पड़ेगा, परन्तु वह और भी अपमान जोड़ता है, जो अधिक कड़वाहट लाएँगे, वह कहता है, वे तेरी सब स्त्रियों और तेरे बाल-बच्चों को निकाल ले जाएँगे, इत्यादि। यदि सिदकिय्याह का मन ठीक होता, तो वह इतनी विपत्तियों का कारण बनने की अपेक्षा सौ बार मरना, और इस प्रकार उन सब के लिए मर जाना अधिक पसन्द करता। क्योंकि हम जानते हैं कि बहुतों ने अपनी पत्नियों की पवित्रता की रक्षा करने में साहस के साथ अपने आप को संकट में डाला है; और निःसन्देह कुलीन मन वालों के लिए ऐसी निन्दा सहना सौ मृत्युओं से भी कहीं कठिन है। इससे हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता का उद्देश्य क्या था; क्योंकि उसने देखा कि केवल उसकी अपनी मृत्यु उसके सामने रखने से सिदकिय्याह पर्याप्त रूप से जगाया नहीं जा सकता, इसलिए उसने अन्य परिस्थितियाँ जोड़ीं, जो उस पर और भी अधिक प्रभाव डालने योग्य थीं, वह कहता है, वे तेरी स्त्रियों और तेरे बाल-बच्चों को निकाल ले जाएँगे।

339 सेप्टुआजिंट और वल्गेट दोनों "धँसे हुए" को सकर्मक अर्थ में लेते हैं, "उन्होंने धँसा दिया है" या डुबा दिया है; और अन्तिम शब्दों को हाकिमों से सम्बन्धित माना गया है। वल्गेट के अनुसार दोनों वाक्यांश ये हैं, "उन्होंने तेरे पाँव कीच और फिसलनेवाले स्थान में धँसा दिए हैं, और तुझ से हट गए हैं।" अन्तिम वाक्यांश के विषय में सीरियाई अनुवाद भी वैसा ही है। सारी बात एक दर्शन में देखी हुई बात के रूप में वर्णित है, जो भविष्यद्वक्ता को दिया गया था, जैसा वह पिछले पद में कहता है, — 21. यह वह बात है जो यहोवा ने मुझे दिखाई; और (उसने कहा) देख, वे स्त्रियाँ जो यहूदा के भवन में रह गई हैं, बाबुल के राजा के हाकिमों के पास निकलती हुई, और देख, वे कह रही हैं, — उन्होंने तुझे उभारा और तुझ पर प्रबल हुए, अर्थात् तेरे मित्र; उन्होंने तेरे पाँव कीच में धँसा दिए, वे तुझे छोड़कर भाग गए हैं। दर्शन में देखा गया यह दृश्य राजा के सामने रखा गया है, कि स्त्रियाँ बाहर निकल रही हैं और फिर ताना मारते हुए उससे बोल रही हैं। हाकिमों ने सिदकिय्याह को बाबुल के राजा से विश्वासघात करने के लिए उभारा या उकसाया, और उसे ऐसा करने के लिए मना लिया। ऐसा करके उन्होंने मानो उसे कीच में धँसा दिया, अर्थात् उसे कठिनाइयों में डाल दिया, और फिर उसे छोड़कर भाग गए। और फिर अगले पद में भविष्यद्वक्ता दर्शन की पुष्टि करता और उसे समझाता है। — सं.

इससे हम सीखते हैं कि उस समय वैवाहिक विश्वासयोग्यता किस प्रकार बिना दण्ड के भंग की जाती थी। हम जानते हैं कि यह एक प्राचीन बुराई थी, परन्तु अब यह सामान्य चलन बन गई थी, यहाँ तक कि मानो साधारण नियम हो गई थी: तौभी जो कुछ परमेश्वर ने एक बार ठहराया था वह अपरिवर्तित बना रहा, अर्थात् हर पुरुष की केवल अपनी एक ही पत्नी हो। अतः जब यहूदियों में बहुविवाह इतना फैल गया था और इतना स्वच्छन्द हो गया था, तो हम देखते हैं कि वास्तव में परमेश्वर का भय और पवित्रता का सारा ध्यान बुझ गया था। राजाओं को तो अधिक स्वतंत्रता दी जाती थी, परन्तु इस कारण वे निर्दोष नहीं ठहराए जा सकते थे, क्योंकि उनका जीवन औरों के लिए एक आदर्श, सीधाई और पवित्रता का दर्पण होना चाहिए था।

इसलिए जब उन्होंने बहुत-सी पत्नियों से विवाह किया, तो यह एक असहनीय बुराई बन गई। और अब जब सब पत्नियों का उल्लेख किया गया है, तो हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि राजा की केवल तीन या चार पत्नियाँ या रखेलियाँ न थीं, परन्तु बड़ी संख्या थी, जिससे वह अपनी कामना को तृप्त करे। अतः इससे हम सीखते हैं कि उस युग की भ्रष्टता कितनी बड़ी थी। यह भी आश्चर्य की बात है कि राजा इस प्रकार अपनी वासनाओं में लिप्त था, और जब स्वयं आवश्यकता ने उसे विवश किया, तब भी वह कुछ संयम की ओर नहीं लौटा। इससे हम देखते हैं कि वह अत्यन्त संवेदनहीन रहा होगा कि इतनी रखेलियों को रखे रहा, जब कि उसका एकमात्र नगर भी कठिनाई से सुरक्षित था, और सारा देश शत्रुओं के अधिकार में था। परन्तु इसी प्रकार टेढ़े मनुष्य परमेश्वर को और उसके कोड़ों को तुच्छ जानते हैं। क्योंकि यद्यपि सब लोग सामान्य कहावत के अनुसार मानते हैं कि आवश्यकता एक ऐसी स्वामिनी है जिसकी आज्ञा सब को माननी पड़ती है, तौभी अधिकतर लोग स्वयं आवश्यकता से संघर्ष करते हैं, जैसा हम सिदकिय्याह के विषय में देखते हैं, जिसने अत्यन्त दरिद्र और दुःखी होने पर भी झुकने या मुड़ने से इन्कार किया, और अपनी राजसी शान-शौकत और वैभव में से कुछ भी घटने न दिया। इसी कारण उसकी बड़ी संख्या में पत्नियाँ या रखेलियाँ थीं, जैसा यहाँ उल्लेख किया गया है।

फिर लिखा है, तू इस नगर को आग से फुँकवाएगा। यह निश्चित है कि मशाल सिदकिय्याह ने नहीं लगाई थी, और न जलाने का काम उसने किया था। परन्तु भविष्यद्वक्ता ने उसे स्मरण दिलाया कि सब विपत्तियों का कारण उचित रूप से उसके हठ पर डाला जा सकता है; मानो उसने कहा हो कि कसदी तो सचमुच आग लगाने वाले होंगे, क्योंकि वे अपने ही हाथों से घरों में आग लगाएँगे, तौभी पहला और मुख्य दोष स्वयं सिदकिय्याह का होगा, क्योंकि उसने हठपूर्वक परमेश्वर का विरोध किया।

परन्तु स्त्रियों के विषय में यह संक्षिप्त टिप्पणी जोड़नी आवश्यक है: अन्य राजा भी सचमुच बहुत भोग-विलासी रहे थे; परन्तु अब परमेश्वर ने उपाय किया, जब राजदरबार उसकी सारी पुरानी मैल से शुद्ध किया गया। क्योंकि हम जानते हैं कि यकोन्याह के साथ राजकीय प्रतिष्ठा समाप्त हो गई; और नगर लूट के लिए खुला छोड़ दिया गया; तौभी कुछ रखेलियाँ बची रहीं; और वे मानो उत्तराधिकार के अधिकार से अन्य राजाओं को मिलती गईं, क्योंकि वे जैसे राज्य के, वैसे ही पत्नियों के भी उत्तराधिकारी होते थे।

परन्तु जब दुष्टता असाध्य हो गई, तब सब रखेलियाँ भी उठा ली गईं।

तब यह अन्तिम विनाश का चिह्न था। आगे लिखा है —

340 "और यह नगर आग से जलाया जाएगा," यह सेप्टुआजिंट, सीरियाई अनुवाद और टार्गम का अनुवाद है। वल्गेट में है, "और वह (बाबुल का राजा) इस नगर को आग से जलाएगा।" निःसन्देह पहला इब्रानी का सही अनुवाद है, सिवाय इसके कि हमारे अनुवाद के अनुसार, और ब्लेनी के अनुसार भी, क्रिया हिफ़िल में "वह" है; परन्तु जो इस स्थल से सबसे अच्छा मेल खाता है, वह पहला अनुवाद है। — सं.

यिर्मयाह 38:24

24. तब सिदकिय्याह ने यिर्मयाह से कहा, इन बातों को कोई न जानने पाए, और तू मारा न जाएगा।

24. Et dixit Zedechias ad Jeremias, Vir nesciat (hoc est, nemo sciat) de sermonibus istis, et non morieris (hoc est, ne moriaris.)

यहाँ राजा की दयनीय दशा दिखाई देती है। यदि उसे यिर्मयाह के उत्तर पर विश्वास न होता, तो वह इस प्रकार न डरता। परन्तु उसने स्वीकार किया कि जो कुछ उसने भविष्यद्वक्ता के मुँह से सुना था वह सत्य था। इस बीच उसने जहाँ तक हो सका टालमटोल की और समय बढ़ाता गया, और सारी चिन्ता और व्याकुलता से तुरन्त मुक्त होने की अपेक्षा काँपते-काँपते अपना जीवन बिताना अधिक पसन्द किया। यह कदापि राजा के समान आचरण न था; क्योंकि यदि उसमें कुछ भी साहस होता, तो वह अन्तिम घड़ी तक प्रतीक्षा न करता।

हम तो जानते हैं कि साहसी मनुष्य, जब उन्हें प्रतिष्ठा की कोई आशा शेष नहीं दिखती, तो निडर होकर मृत्यु का सामना करते हैं। सिदकिय्याह अपना अधिकार खो चुका था; उसके पास राजा की उपाधि तो थी, परन्तु वह शक्तिहीन था; क्योंकि वह दास की भाँति अपने मन्त्रियों की आज्ञा मानने को विवश था; और अब वह अपनी ही छाया से डरता था, तौभी, जैसा मैंने कहा, जहाँ तक हो सका समय को खींचता रहा; और इसी कारण उसने भविष्यद्वक्ता से विनती की कि यह बातचीत मानो दबी हुई रहे।

यह कहकर कि तू मारा न जाएगा, उसने भविष्यद्वक्ता को धमकी नहीं दी, परन्तु संकेत किया कि चुप रहना उसके अपने लिए जितना लाभदायक होगा, यिर्मयाह के लिए उससे कम नहीं: "यदि तू इस भेंट के विषय में कुछ कहेगा, तो सब का क्रोध अपने विरुद्ध भड़का देगा, क्योंकि कोई भी नगर के विनाश के विषय में कुछ सुनना सहन नहीं कर सकता: इसलिए यदि तू अपना भला चाहता है, तो इसके विषय में एक शब्द भी न कहना, और यह बात न लोगों तक पहुँचे और न मेरे मन्त्रियों तक।" इस प्रकार सम्मति देने के बहाने उसने यिर्मयाह से कहा, "देख, कहीं तू मारा न जाए।" इसलिए उसने धमकी के रूप में बात नहीं की।

यिर्मयाह 38:25-26

25. परन्तु यदि हाकिम यह सुनें कि मैंने तुझ से बातचीत की है, और वे तेरे पास आकर तुझ से कहें, जो कुछ तूने राजा से कहा है वह अब हमें बता, उसे हम से न छिपा, और हम तुझे न मार डालेंगे; और यह भी कि राजा ने तुझ से क्या कहा:

25. Et si audierint proceres quod loquutus fuerim tecum, et venerint ad te, et dixerint tibi, Expone (vel, narra) nunc nobis quod loquutus fueris ad regem, ne celes a nobis (hoc est, ne celes nos quicquam,) et non occidemus te, et quid locutus sit tecum rex:

26. तो तू उन से कहना, मैंने राजा के सामने गिड़गिड़ाकर विनती की कि वह मुझे योनातान के घर में फिर न लौटाए, कि मैं वहाँ मर जाऊँ।

26. Et tunc, (copula enim resolvi debet in adverbium temporis, tunc) dices illis, Prostravi ego preces meas coram facie regis (hoc est, suppliciter deprecatus sum regem,) ne reduceret me in domum Jonathan, ut morerer illic.

यहाँ सिदकिय्याह फिर अपनी चिन्ता प्रकट करता है, कि कहीं ऐसा न हो कि यदि हाकिम अचानक यिर्मयाह पर टूट पड़ें, तो वह पकड़ में आ जाए; क्योंकि चेतावनी पाने पर भी वह इस बात में ठोकर खा सकता था। तब राजा ने उसे संकेत किया कि यदि मन्त्री उसके पास आएँ और उनकी आपसी बातचीत के विषय में पूछताछ करें, तो वह क्या उत्तर दे। उसने उसे सम्मति दी कि वह केवल इतना कहे कि उसने उससे विनती की थी कि उसे उस गन्दे गड्ढे में फिर न भेजे, जहाँ वह मरते-मरते बचा था। राजा की दयनीय दासता अब और भी स्पष्ट दिखाई देती है; क्योंकि वह अपने ही मन्त्रियों से डरता था कि कहीं वे उससे फिर न जाएँ। वह सहज ही स्वेच्छा से आत्मसमर्पण कर सकता था, परन्तु उसका साहस न हुआ, कहीं ऐसा न हो कि किसी उपद्रव में वे उसे मार डालें; और तौभी, दूसरी ओर, वह डरता था कि कहीं हाकिम उसे तुच्छ न जानें, और इस प्रकार उसके प्राण की बलि देकर अपने आप को छुड़ा न लें।

341 शब्दशः ये शब्द हैं, "इन बातों को कोई न जानने पाए, और तू मारा न जाएगा।" सेप्टुआजिंट, वल्गेट और टार्गम का अनुवाद ऐसा ही है; सीरियाई अनुवाद में है, "कहीं ऐसा न हो कि तू मर जाए;" जिससे वह विचार सूझता है जो कैल्विन ने अपनाया है। — सं.

हम देखते हैं कि वह कैसी सकेती में था, परन्तु परमेश्वर ने उसे उसके हठ का उचित प्रतिफल दिया। यह सुनना सचमुच दुःखद बात थी कि राजा इस प्रकार चारों ओर से दबा हुआ था, परन्तु इन सब का कारण सदा स्मरण रखना चाहिए; और वह यह था कि उसने परमेश्वर को और उसके भविष्यद्वक्ता को तुच्छ जाना था। इसलिए वह इसी योग्य था कि इस चिन्ता की दशा में रहे, चारों ओर से मृत्यु से डरे, और उन चिन्ताओं और उलझनों से, जो उसे सताती थीं, अपने आप को छुड़ा न सके।

इसलिए आओ, हम अपनी सारी चिन्ताएँ परमेश्वर पर डालना सीखें, जिससे हमारा जीवन सुरक्षित रहे, और हमारे मन शान्त और स्थिर रहें: अन्यथा जो व्यवस्था में लिखा है वह अवश्य हम पर घटेगा, "हमारा जीवन मानो धागे से लटका रहेगा, यहाँ तक कि हम भोर को कहेंगे, कौन हमें साँझ देखने देगा? और साँझ को, हम भोर तक कैसे जीवित रह सकेंगे?"

(व्यवस्थाविवरण 28:66, 67)

इसलिए कहीं ऐसा न हो कि हमारे साथ भी वैसा ही हो जैसा इस अभागे राजा के साथ हुआ, आओ, हम परमेश्वर पर टेक लगाना सीखें, क्योंकि शान्ति पाने का यही एकमात्र मार्ग है।

क्योंकि यद्यपि सिदकिय्याह ने यिर्मयाह के सामने वह संकट रखा जो वह अपने ऊपर ला सकता था, यदि वह उनके बीच हुई बात को मान लेता, तौभी निःसन्देह उसका ध्यान अपनी ही सुरक्षा पर था, क्योंकि भविष्यद्वक्ता के लिए उसकी चिन्ता बहुत अधिक न थी। वह कहता है, यदि हाकिम सुनेंगे कि मैंने उससे बात की है, इत्यादि। हम यहाँ देखते हैं कि जैसे राजा सब लोगों की बातों और कामों की बड़ी बारीकी से छानबीन करते हैं, वैसे ही वे भी बदले में असंख्य भेदियों के सामने खुले रहते हैं, जो उनकी सब गुप्त कार्यवाहियों को देखते रहते हैं। जैसा हम देख चुके हैं, सिदकिय्याह ने अपना भवन छोड़ा, कोई गुप्त स्थान ढूँढ़ा, और तीसरे द्वार पर यिर्मयाह को अपने पास बुलाया। यह स्थान कुछ हद तक गुप्त समझा जा सकता था, तौभी वह जानता था कि उसके अपने सेवक भी उस पर दृष्टि रखते हैं।

इस प्रकार राजा, अत्यधिक वैभव की खोज करते हुए, उस मुख्य भलाई को त्याग देते हैं जिसे अन्य सब बातों से बढ़कर चुना जाना चाहिए। क्योंकि सामान्यतः कहा जाता है कि स्वतंत्रता एक अमूल्य वरदान है, और यह बिलकुल सत्य है: परन्तु यदि हम मनुष्यों के बीच स्वतंत्रता खोजें, तो वह हमें राजदरबारों में कदापि न मिलेगी; क्योंकि वहाँ सब दास हैं, और दासता सबसे ऊँचे पदवालों से आरम्भ होती है। इसलिए राजा, जब वे इस प्रकार अपनी ऊँचाई से सारी मनुष्य-जाति को नीचे देखना चाहते हैं, तो मानो एक रंगमंच पर रखे जाते हैं, और सब की आँखें उन्हीं की ओर लगी रहती हैं, यहाँ तक कि उनके लिए कोई स्वतंत्रता शेष नहीं रहती; और जो उनकी कृपा पर निर्भर रहते हैं वे भी निरन्तर भय में रहते हैं। इसलिए हमें इस पर ध्यान देना चाहिए; क्योंकि कोई ऐसा नहीं जो वैभव की खोज न करता हो; तौभी हम जानते हैं कि हाकिमों का जीवन कितना चिन्ता-भरा होता है।

उनका बाहरी रूप तो बड़ा लुभावना होता है; परन्तु हम यह नहीं देखते कि कैसी भीतरी यातनाएँ उन्हें सताती हैं। इसलिए जब सिदकिय्याह के विषय में कहा जाता है कि वह कोई गुप्त बातचीत भी न कर सका, तो इससे प्रकट होता है कि राजा कदापि स्वतंत्र नहीं हैं।

वह कहता है, "यद्यपि वे तुझे दण्ड से छुटकारे की प्रतिज्ञा करें, तौभी उन पर भरोसा न करना।" सिदकिय्याह डरता था कि कहीं भविष्यद्वक्ता बहुत भोला न निकले, और जो कुछ उसने कहा था उसे मन्त्रियों को खुलकर न बता दे। परन्तु निःसन्देह उसने इस बात पर विचार किया था कि भविष्यद्वक्ता पहले ही नगर के विनाश की घोषणा कर चुका था। इसलिए वह उस चुप्पी की, जो वह चाहता था, कठिनाई से ही आशा कर सकता था। इसी कारण उसने इतनी गम्भीरता से उसे सावधान रहने को कहा; और यद्यपि मन्त्री प्रतिज्ञा करें कि उसे कोई संकट न होगा, तौभी उसने उसे चुप रहने को कहा। उसने कहा, उन से कहना, मैंने राजा से दीनता से विनती की कि वह मुझे योनातान के घर में फिर न भेजे, जिससे मैं वहाँ मर न जाऊँ। यह सचमुच झूठ तो न था, परन्तु यह टालमटोल पूरी तरह क्षमा के योग्य नहीं ठहराई जा सकती। भविष्यद्वक्ता का डरना उचित था, और जैसा हम पहले देख चुके हैं, वह उलझन और चिन्ता में था, क्योंकि वह बन्दीगृह भयानक था, और इस प्रकार पृथ्वी में जीवित गाड़े जाने से तुरन्त मर जाना अच्छा होता। परन्तु यह निश्चित है कि वह इस उद्देश्य से राजा के पास नहीं आया था, क्योंकि उसे बुलवाया गया था। इसलिए यद्यपि भविष्यद्वक्ता ने स्पष्ट रूप से या ठीक-ठीक शब्दों में कोई झूठी बात नहीं कही, तौभी यह एक प्रकार का झूठ था; और जो आगे आता है, वह उसके अपने विषय में, क्षमा के योग्य नहीं ठहराया जा सकता।

यिर्मयाह 38:27

27. तब सब हाकिम यिर्मयाह के पास आए, और उससे पूछा; और जैसा राजा ने आज्ञा दी थी, उन्हीं सब बातों के अनुसार उसने उनको बता दिया। तब वे उससे बात करना छोड़कर चुप हो गए; क्योंकि वह बात किसी को मालूम न हुई थी।

27. Et venerunt cuncti proceres ad Jeremiam, et interrogarunt ipsum; et annuntiavit illis (hoc est, narravit illis) secundum sermones istos, quemadmodum praeceperat rex, et siluerunt ab eo, quia sermo non fuit auditus.

यहाँ भविष्यद्वक्ता सचमुच स्वीकार करता है कि उसने वैसा ही किया जैसी राजा ने उसे आज्ञा दी थी; परन्तु वह अपने किए की प्रशंसा नहीं करता। इसमें सन्देह नहीं कि एक ओर उसने राजा की कायरता को अपनी आँखों के सामने रखा, जो सीधाई को भूलकर दास की भाँति अपने मन्त्रियों से डरता था; और दूसरी ओर उसने यह प्रकट किया कि वह स्वयं भी पर्याप्त विवेकी न था, क्योंकि जब हाकिम आए, तो यद्यपि वह उन्हें धोखा देना नहीं चाहता था, तौभी उसने मुख्य बात छिपा ली, और कहा कि वह अपने प्राण के लिए विनती करने राजा के पास गया था, जो सत्य न था। इसलिए यद्यपि उसकी कही बात अंशतः सत्य थी, कि उसने विनती की थी कि उसे फिर बन्दीगृह में न भेजा जाए, तौभी इस टालमटोल के द्वारा वह पूरी तरह दोष से मुक्त नहीं हो सकता था।

संक्षेप में, हम देखते हैं कि परमेश्वर के सेवक भी, जब अत्यन्त भय से दबे हुए थे, कभी-कभी टालमटोल की बातें बोले हैं; और इस प्रकार हमें स्मरण दिलाया जाता है कि हम परमेश्वर से मन की उदारता और दृढ़ स्थिरता माँगें; क्योंकि जब हम किसी संकट के भय से घबरा जाते हैं, तब केवल वही हमें दृढ़ कर सकता और सम्भाल सकता है।

वह कहता है कि उसने वैसा ही किया जैसी राजा ने उसे आज्ञा दी थी; परन्तु उसे इसके बजाय परमेश्वर के वचन पर कान लगाना चाहिए था, जिसमें सीधाई की आज्ञा दी गई है। यह भी कहा गया है कि हाकिम चुप हो गए, अर्थात् चुपचाप चले गए; क्योंकि उस बातचीत का कोई साक्षी न था, और वह बात आगे न फैली थी; क्योंकि राजा भय के कारण चुप था, और भविष्यद्वक्ता ने भी उस गुप्त भेंट को प्रकट न किया था। इसी कारण हाकिम चले गए, और समझा कि बात वैसी ही है जैसी बताई गई। संक्षेप में, यिर्मयाह संकेत करता है कि वे इस बहाने से धोखा खा गए। अन्त में आगे लिखा है, यिर्मयाह 38:28

28. इस प्रकार जिस दिन यरूशलेम ले लिया गया, उस दिन तक यिर्मयाह पहरे के आँगन ही में रहा; और जब यरूशलेम ले लिया गया तब वह वहीं था।

28. Et habitavit Jeremias in atrio custodiae, usque ad diem quo capta fuit Jerusalem; et accidit secundum quod capta fuit Jerusalem.

कुछ लोग अन्तिम शब्दों का अनुवाद सीधे यों करते हैं, "और ऐसा हुआ कि यरूशलेम ले लिया गया;" और अन्य, "तदनुसार ऐसा हुआ कि यरूशलेम ले लिया गया;" परन्तु यह अस्वाभाविक जान पड़ता है। अन्य लोग सम्बन्धवाचक को संकेतवाचक सर्वनाम के रूप में लेते हैं, और इसे मैं ठीक मानता हूँ, "क्योंकि ऐसा हुआ कि इसी के अनुसार यरूशलेम ले लिया गया।"

पहले वह कहता है कि वह पहरे के आँगन में रहा। इससे प्रकट होता है कि वह उस समय भी स्वतंत्र न था; क्योंकि यद्यपि राजा चाहता था कि वह स्वतंत्र हो, तौभी उसे छोड़ने का साहस उसमें न था। यह एक बात है। फिर वह कहता है कि जिस दिन नगर ले लिया गया उस दिन तक वह वहीं रहा। हम आगे देखेंगे कि वह राजा की आज्ञा से बचाया गया, और बन्दीगृह से बाहर लाया गया। इसलिए वह उस दिन तक पहरे के आँगन में रहा, मानो उसने कहा हो कि वह तब तक बन्दी रहा जब तक राजा अपने मन्त्रियों समेत बन्दी न बना लिया गया, और उस दिन तक भी जब तक सारा नगर ले न लिया गया। और यहाँ हम मानो एक सजीव चित्र में परमेश्वर का अद्भुत न्याय देख सकते हैं। जब तक यहूदी घमण्ड करते रहे कि वे परमेश्वर को बलिदान चढ़ाते हैं, तब तक उन्होंने यिर्मयाह को बन्दीगृह में बन्द रखा, यहाँ तक कि वह तब तक स्वतंत्र मनुष्य न हुआ जब तक राजा पकड़ा न गया, नगर नाश न हुआ, और लगभग सब बँधुआई में न हाँक दिए गए। मुझे कोई सन्देह नहीं कि उसने व्याख्या के रूप में यह जोड़ा, और ऐसा हुआ कि इसी के अनुसार यरूशलेम ले लिया गया; अर्थात् इन शब्दों में वह पाठकों को स्मरण दिलाता है कि वह झूठा भविष्यद्वक्ता न था, परन्तु परमेश्वर के न्याय के विषय में सच्चा और विश्वासयोग्य साक्षी था, क्योंकि उसकी सब भविष्यद्वाणियाँ घटना के द्वारा सच प्रमाणित हुईं। फिर वह कहता है कि नगर संयोग से नहीं, परन्तु इसलिए ले लिया गया कि परमेश्वर ने ऐसा घोषित किया था। अब वह ऐतिहासिक रूप से नगर के विनाश और जलाए जाने का वर्णन आरम्भ करता है। इसलिए वह कहता है —

342 ये शब्द सेप्टुआजिंट और सीरियाई अनुवाद में छोड़ दिए गए हैं। वल्गेट और टार्गम यह अनुवाद देते हैं, "और ऐसा हुआ कि यरूशलेम ले लिया गया;" जिसका इस प्रसंग में कोई अर्थ नहीं जान पड़ता। कुछ लोग इन्हें अगले अध्याय से जोड़ते हैं, परन्तु अनुचित रूप से। हमारा अनुवाद, जिसका अनुसरण ब्लेनी ने किया है, सबसे अच्छा अर्थ देता है, "और जब यरूशलेम ले लिया गया तब वह वहीं (अर्थात् पहरे के आँगन में) था:" वह केवल उसके ले लिए जाने के दिन या समय तक ही नहीं, परन्तु उस समय के दौरान भी वहीं था। यह दिखाने के लिए जोड़ा गया कि उसे यहूदियों ने नहीं, परन्तु उन लोगों ने छुड़ाया जिन्होंने नगर को ले लिया। — सं.

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