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यिर्मयाह 36
यिर्मयाह 36:1-2
1. फिर योशिय्याह के पुत्र यहूदा के राजा यहोयाकीम के राज्य के चौथे वर्ष में यहोवा की ओर से यह वचन यिर्मयाह के पास पहुँचा,
1. Et fuit anno quarto Joakim filii Josiae regis Jehudah (fuit inquam) sermo hic ad Jeremiam a Jehova, dicendo,
2. एक पुस्तक लेकर, जितने वचन मैं ने तुझ से इस्राएल और यहूदा और सब जातियों के विरुद्ध कहे हैं, उस दिन से जब मैं तुझ से बातें करने लगा, अर्थात् योशिय्याह के दिनों से लेकर आज के दिन तक, सब को उसमें लिख।
2. Sume tibi volumen libri, et scribe in eo cunctos sermones quos loquutus sum ad to contra Israel et contra Jehudah, et contra eunctos gentes a die quo loquutus sum ad to, a diebus scilicet Josiae usque ad hunc diem.
भविष्यद्वक्ता इस अध्याय में एक ऐसा इतिहास वर्णन करता है जो स्मरण रखने योग्य है और हमारे लिए बहुत उपयोगी है; क्योंकि वह कहता है कि जो कुछ उसने पहले मन्दिर में सिखाया था, उसे उसने परमेश्वर की आज्ञा से लिख डाला, और यह भी कि उसने वह सारांश बारूक के द्वारा भेजा कि मन्दिर में पढ़कर सुनाया जाए; कि इसकी चर्चा फैल गई, और राजा के मन्त्रियों ने बारूक को अपने पास बुलवाया, और जब उन्होंने सुना कि पुस्तक में क्या लिखा है, तो उन्होंने राजा को इसका समाचार दिया; परन्तु पहले उन्होंने बारूक को चेतावनी दी कि वह यिर्मयाह के साथ छिप जाए, ऐसा न हो कि राजा उन पर क्रोध से भड़क उठे।
और ऐसा ही हुआ; क्योंकि राजा ने तुरन्त क्रोध से भरकर आज्ञा दी कि यिर्मयाह और बारूक पकड़े जाएँ, कि वे मार डाले जाएँ; परन्तु वे परमेश्वर की कृपा से छिपाए और सुरक्षित रखे गए। आगे चलकर हम देखेंगे कि राजा ने अपनी हठधर्मिता से क्या परिणाम उत्पन्न किया, अर्थात् यह कि भविष्यद्वक्ता उसके विरुद्ध और भी अधिक साहस से बोलने लगा।
तो भविष्यद्वक्ता आरम्भ में कहता है कि यहोवा का वचन आया, जिसके द्वारा उसे आज्ञा दी गई कि जो कुछ उसने पहले कहा था, उसे एक पुस्तक के खर्रे में लिखे।
पुस्तक के खर्रे से उसका अभिप्राय वह खर्रा है जिसमें उसे लिखना था; क्योंकि {}ספר sepher का अर्थ यहाँ लिखी हुई पुस्तक नहीं है, क्योंकि वह खर्रा बिना किसी लिखावट के था। तब भविष्यद्वक्ता ने अवश्य अपने सेवक बारूक को लिखवाया होगा। और यह कथन-शैली अन्यत्र भी पाई जाती है, जैसे भजन संहिता 40:7 में। परन्तु इब्रानी लोग एक प्राचीन रीति के अनुसार खर्रे को {,}מגלהmegele कहते थे; क्योंकि उनके पास ऐसी सिली हुई सघन पुस्तकें न थीं जैसी आज के दिन हमारे पास हैं, वरन् उनके पास खर्रे या लपेटे हुए पत्र थे; और लातीनी भाषा में भी यही शब्द, volumen (खर्रा), प्रयोग होता है। क्योंकि जैसे इब्रानी लोग लपेटी हुई वस्तु को {,}מגלהmegele कहते थे, जो {,}גללgelal से निकला है, जिसका अर्थ है लपेटना या लुढ़काना; वैसे ही लातीनियों ने भी इसे एक क्रिया (volvo) से लिया है जिसका अर्थ है लुढ़काना, और हम इसे rolle कहते हैं; और गॉल में भी लोग लिखने की यही रीति काम में लाते थे; क्योंकि प्राचीन काल में सब पुराने लेख और न्यायालय की कार्यवाहियाँ भी खर्रों पर लिखी जाती थीं, और पुराने अभिलेखागारों में ऐसे लिखे हुए लेखों के सिवा और कुछ नहीं मिलता। तो परमेश्वर ने अपने भविष्यद्वक्ता को आज्ञा दी कि वह एक खर्रा ले, और फिर उसे आज्ञा दी कि जितने वचन उसने परमेश्वर के मुख से सुने थे, और जो उसने इस्राएल और यहूदा और अन्य सब जातियों के विरुद्ध सुनाए थे, उन सब को उसमें लिखे।
यहाँ हम पहले तो यह देखते हैं कि पवित्रशास्त्र के होने का क्या लाभ है, अर्थात् यह कि जो बात अन्यथा लुप्त हो जाती या मनुष्य की स्मृति से निकल जाती, वह बनी रहे और एक से दूसरे को सौंपी जाए, और यह भी कि वह पढ़ी जा सके; क्योंकि जो लिखा हुआ है उस पर अवकाश के समय अधिक अच्छी रीति से विचार किया जा सकता है। जब कोई केवल बोलता है, तो हर एक अपनी योग्यता और अपने ध्यान के अनुसार कुछ ग्रहण करता है; परन्तु मनुष्य के मुख से निकले शब्द फिसलकर निकल जाते हैं, इसलिए इससे पवित्रशास्त्र की उपयोगिता और भी स्पष्ट प्रकट होती है; क्योंकि जो बात तुरन्त समझ में नहीं आती, वह जब दोहराई जाती है तो अधिक प्रकाश देती है; और फिर जो कोई आज पढ़ता है, उसे वह कल, और अगले वर्ष, और बहुत वर्षों के बाद भी पढ़ सकता है। तो जब परमेश्वर ने देखा कि अपने भविष्यद्वक्ता के द्वारा बोलते हुए वह मानो हवा को पीट रहा था, तब उसका उद्देश्य यह था कि जो बातें यिर्मयाह ने व्यर्थ कही थीं, वे लिख ली जाएँ। निःसन्देह इस रीति से वह राजा और उसके मन्त्रियों को, और सारी प्रजा को भी, न केवल उनके आलस्य के लिए, वरन् उनकी जड़ता के लिए भी दोषी ठहराना चाहता था, क्योंकि उसकी सारी शिक्षा निष्फल रही थी, यद्यपि यिर्मयाह ने उनके बीच बहुत परिश्रम किया था, और शिक्षक के रूप में अपने पद के निर्वाह में परिश्रमी और विश्वासयोग्य रहा था।
अब हम परमेश्वर के इस कहने का अभिप्राय समझते हैं कि एक खर्रा ले और उसमें लिख; और वह कहता है, जितने वचन मैं ने तुझ से कहे हैं, उन सब को। यह इसलिए कहा गया कि यहूदी समझ लें कि यिर्मयाह अपनी गढ़ी हुई बातें सामने नहीं ला रहा था, वरन् जो कुछ उसने परमेश्वर के मुख से सुना था, उसी को विश्वासयोग्यता से सौंप रहा था। वह आगे कहता है, इस्राएल और यहूदा के विरुद्ध। क्योंकि यिर्मयाह ने आरम्भ में दस गोत्रों के विरुद्ध भविष्यद्वाणी की थी; परन्तु इस्राएल का राज्य मिट जाने के बाद उसने केवल बचे हुए लोगों के प्रति अपना पद निभाया, इसलिए उसकी शिक्षा विशेष करके यहूदियों से सम्बन्धित थी। आगे जोड़ा गया है, सब जातियों के विरुद्ध; और इसे हम शीघ्र ही देखेंगे; और इससे प्रकट होता है कि उसकी भविष्यद्वाणियाँ समय के क्रम के अनुसार नहीं लिखी गईं, जैसा मैं तुम्हें पहले स्मरण दिला चुका हूँ, वरन् वह पुस्तक क्रम का ध्यान रखे बिना लिखी गई। तौभी इतना तो सुरक्षित रखा गया कि इस पुस्तक में उस सारी शिक्षा का सारांश है जो यिर्मयाह ने अपनी सारी सेवकाई के दौरान सिखाई। वह कहता है, उस दिन से जब वह बोलने लगा, अर्थात् योशिय्याह के दिनों से, वह कहता है, आज के दिन तक। और भविष्यद्वक्ता दस, या बीस, या तीस नहीं, वरन् चालीस वर्ष से शिक्षक के रूप में अपना कर्तव्य निभा रहा था। आगे लिखा है,
यिर्मयाह 36:3
3. क्या जाने यहूदा का घराना उस सारी विपत्ति का समाचार सुनकर जो मैं उन पर डालने की कल्पना कर रहा हूँ, अपनी अपनी बुरी चाल से फिरे, और मैं उनके अधर्म और पाप को क्षमा करूँ।
3. Si forte audiant domus Jehudah omne malum quod ego cogito ad faciendum (hoc est, facere) ipsis, ut revertantur quisque a via sua mala; et propitius sim iniquitati eorum et peccato eorum.
यहाँ परमेश्वर उस उद्देश्य को समझाता है जो उसकी दृष्टि में था, अर्थात् एक बार फिर यह परखना कि यहूदी चंगे होने योग्य थे या नहीं, जिससे भविष्यद्वक्ता की शिक्षा उनके उद्धार के लिए सहायक हो। परन्तु वह अव्यय {}אוליauli, "क्या जाने," का प्रयोग करता है, जिसमें सन्देह निहित है; क्योंकि उन्होंने इतनी बार, और इतने लम्बे समय तक, और इतनी विभिन्न रीतियों से अपने आप को ऐसा हठीला दिखाया था कि उनके मन फिराने की आशा कठिनाई से ही की जा सकती थी। तौभी परमेश्वर दिखाता है कि वह थका नहीं था, यदि उनमें अब भी भक्ति का छोटे से छोटा अंश बचा हो। तो वह कहता है, क्या जाने यहूदा का घराना सारी विपत्ति का समाचार सुने, इत्यादि।
हम देख चुके हैं कि भविष्यद्वक्ता ने न केवल अपनी जाति को धमकियों से डराने का, वरन् उन्हें मधुरता से परमेश्वर की सेवा की ओर आकर्षित करने का भी परिश्रम किया; परन्तु यहाँ परमेश्वर उनके विषय में ऐसे टेढ़े मनुष्यों के रूप में बोलता है जो लगभग वश में न आनेवाले थे, जैसा भजन संहिता 18:26 में कहा गया है कि परमेश्वर टेढ़ों के प्रति कठोर होगा; क्योंकि परमेश्वर मनुष्यों से उनके स्वभाव के अनुसार व्यवहार करता है। अतः जब यहूदी इस योग्य न थे कि परमेश्वर अपनी कोमलता के अनुसार उन्हें बालकों के समान सिखाए, तो उनके लिए केवल यही शेष रह गया था कि वे भय के प्रभाव में मन फिराएँ। वह कहता है, क्या जाने वे सारी विपत्ति का समाचार सुनें, इत्यादि। अब हम देखते हैं कि परमेश्वर केवल धमकियों को ही क्यों छूता है, क्योंकि ऐसे हठीले मनुष्यों के लिए केवल यही शेष रह गया था।
वह कहता है, वह विपत्ति जो मैं करने की सोचता हूँ, इत्यादि। परमेश्वर यहाँ अपने ऊपर वह बात लागू करता है जो मनुष्यों की है; क्योंकि वह अपने मन में सोच-विचार या मन्त्रणा नहीं करता; परन्तु क्योंकि हम उसकी अगम्य युक्ति को समझ नहीं सकते, इसलिए वह कभी-कभी मनुष्य का रूप धारण करता है; और पवित्रशास्त्र में यह सामान्य बात है। परन्तु वह कहता है कि जो कुछ वह अपने वचन में घोषित करता है, उसी को वह सोचता है; क्योंकि जब तक परमेश्वर मनुष्यों को मन फिराने का उपदेश देता है, तब तक वह मानो अपना हाथ रोके रखता है, और मन फिराने का अवसर देता है। तो वह कहता है कि वह मानो अपने विचार-विमर्श के बीच में है: जैसे जब कोई जानना चाहता है कि कोई अपराधी झुकेगा या नहीं, वैसे ही परमेश्वर, जब वह कहता है, मैं सोचता हूँ, तो एक प्रकार से अपने आप को मनुष्य के रूप में बदल लेता है; अर्थात्, वे जान लें कि मेरे वचन में बदला व्यर्थ नहीं सुनाया गया; क्योंकि जो कुछ मैं अब धमकी देता हूँ, वह सब मैं पूरा करूँगा, जब तक कि वे मन न फिराएँ।
वह कहता है, कि वे अपनी अपनी बुरी चाल से फिरें। यही पहले कहा हुआ सुनना है, अर्थात् जब मनुष्य सचमुच ऐसे छू जाते हैं कि अपने दोषों से अप्रसन्न होते हैं, और हृदय से अपने आप को परमेश्वर को सौंप देना चाहते हैं। वह इसके साथ एक प्रतिज्ञा जोड़ता है, क्योंकि क्षमा की आशा के बिना यह हो नहीं सकता कि मनुष्य मन फिराएँ, जैसा बार-बार कहा जा चुका है; परन्तु इसे दोहराना आवश्यक है, क्योंकि थोड़े ही लोग समझते हैं कि विश्वास को मन फिराव से अलग नहीं किया जा सकता; और कोई पापी कभी सच्चाई से परमेश्वर की ओर लौटने के लिए प्रेरित नहीं किया जा सकता, जब तक कि वह क्षमा की आशा न रखे, क्योंकि यह एक मुख्य सत्य है, जैसा भजन संहिता 130:4 में कहा गया है, "परन्तु तू क्षमा करनेवाला है, जिस से तेरा भय माना जाए।"
फिर, जैसा सामान्यतः किया जाता है, भविष्यद्वक्ता कहता है कि यदि यहूदी परमेश्वर की ओर फिरें, तो वह उन पर दयालु होगा, मानो उसने कहा हो कि यदि मनुष्य मन फिराएँ तो वे निराश न होंगे, क्योंकि परमेश्वर तत्परता से उनसे मिलेगा और उनसे मेल कर लेगा: क्योंकि, जैसा मैं कह चुका हूँ, केवल यही एक बात है जो हमें मन फिराने का साहस दे सकती है, अर्थात् जब हमें निश्चय हो जाता है कि परमेश्वर हमें क्षमा देने को तैयार है। वह अधर्म और पाप का उल्लेख करता है। निःसन्देह भविष्यद्वक्ता ने इन दोनों शब्दों का प्रयोग यह दिखाने के लिए किया कि हमें किसी रीति से निराश नहीं होना चाहिए, चाहे पाप पर पाप का ढेर लगा हो। आगे लिखा है —
यिर्मयाह 36:4-6
4. तब यिर्मयाह ने नेरिय्याह के पुत्र बारूक को बुलाया, और बारूक ने यहोवा के सब वचन जो उसने यिर्मयाह से कहे थे, उसके मुख से सुनकर पुस्तक के खर्रे पर लिख दिए।
4. Et vocavit Jeremias Baruch fillium Neriae; et scripsit Baruch ex ore Jeremiae cunctos sermones Jehovae, quos loquutus est ad ipsum, in volumine libri.
5. फिर यिर्मयाह ने बारूक को आज्ञा दी और कहा, मैं तो बन्द हूँ; मैं यहोवा के भवन में नहीं जा सकता:
5. Et praecepit Jeremias ipsi Baruch, dicendo, Ego detineor (vel, sum conclusus) non potero venire in domum Jehovae (hoc est, in Templum:)
6. इसलिए तू उपवास के दिन यहोवा के भवन में जाकर, उस खर्रे में से जो तू ने मेरे मुख से सुनकर लिखा है, यहोवा के वचन लोगों को पढ़कर सुनाना; और जितने यहूदी अपने अपने नगरों से आएँगे, उनको भी पढ़कर सुनाना।
6. Tu autem vade, et lege in volumine quod scripseris ex ore meo, sermones Jehovae in auribus populi, in domo Jehovae, in die jejunii, atque etiam in auribus totius Jehudab, qui venerint (hoc est, omnium Judaeorum qui venerint) ex urbibus suis, tu leges ipsis.
यहाँ भविष्यद्वक्ता घोषित करता है कि जो कुछ उसने पहले सिखाया था, वह सब उसने परमेश्वर के सेवक बारूक को लिखवाया। परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि उस समय परमेश्वर ने भविष्यद्वक्ता के मन में वे बातें डालीं जो उसकी स्मृति से मिट गई होंगी; क्योंकि जो बातें हमने कुछ समय पहले कही थीं, वे सब हमें सदा स्मरण नहीं आतीं। इसलिए इतने अधिक वचनों का बड़ा भाग भविष्यद्वक्ता की स्मृति से निकल गया होता, यदि परमेश्वर उन्हें फिर से उसे न लिखवाता। तो यिर्मयाह मानो परमेश्वर और बारूक के बीच खड़ा था; क्योंकि परमेश्वर अपने आत्मा के द्वारा भविष्यद्वक्ता के मन और जीभ का अधिष्ठाता और मार्गदर्शक था।
अब भविष्यद्वक्ता ने, आत्मा को अपना मार्गदर्शक और शिक्षक पाकर, वह सब सुनाया जिसकी आज्ञा परमेश्वर ने दी थी; और बारूक ने उसे लिख लिया, और फिर उस पूरे सारांश का प्रचार किया जो भविष्यद्वक्ता ने सिखाया था।
इसलिए वह कहता है कि उसने नेरिय्याह के पुत्र बारूक को अपने पास बुलाया, जिसने उसके मुख से सुनकर लिखा, और उसने यहोवा के सब वचन लिखे। यिर्मयाह फिर दोहराता है कि उसकी अपनी ओर से कुछ नहीं आया। इससे हम देखते हैं कि जो कुछ उसके मन में आया, उसे उसने अपनी इच्छा के अनुसार नहीं लिखवाया, वरन् जो कुछ परमेश्वर बारूक से लिखवाना चाहता था, वह सब परमेश्वर ने ही उसके मन में डाला। आगे जोड़ा गया है कि उसने बारूक को आज्ञा दी कि जो कुछ उसने लिखा था उसे मन्दिर में पढ़कर सुनाए, क्योंकि वह स्वयं रोका गया था। कुछ लोग सोचते हैं कि वह बन्दीगृह में बन्द था; और उसने पहले भी यही शब्द प्रयोग किया था, जब उसने हमें बताया कि सिदकिय्याह ने उसे बन्दीगृह में डाल दिया था। परन्तु क्योंकि पवित्र इतिहास यह नहीं कहता कि यहोयाकीम के अधीन उसने ऐसा कुछ सहा, इसलिए मेरा झुकाव यह सोचने की ओर है कि उसे परमेश्वर ने रोका था; तौभी मैं इसे किसी ईश्वरीय वाणी पर आरोपित नहीं करता; क्योंकि यह परमेश्वर की आज्ञा से, या किन्हीं मानवीय बाधाओं से हुआ हो सकता है। यदि हम मानें कि भविष्यद्वक्ता बन्दीगृह में था, और वह बाहर जा सकता था, तौभी वह रुका रहा; क्योंकि उसे जितनी अधिक स्वतन्त्रता दी गई, उतना ही अधिक वह अपने आप को बन्दीगृह में बने रहने के लिए बाध्य समझता था, ऐसा न हो कि वह सार्वजनिक अधिकार का उल्लंघन करे। परन्तु दूसरी धारणा अधिक सम्भव है, कि वह परमेश्वर के हाथ से रोका गया था। जो भी हो, वह कहता है कि वह बाहर नहीं जा सकता था; और उसने इसका उल्लेख इसलिए किया कि ऐसा प्रतीत न हो कि वह केवल अपनी ही चिन्ता करता था, और संकट के भय से उसने यह कर्तव्य बारूक पर डाल दिया। तो वह दिखाता है कि उसने अपने पद से इसलिए मुँह नहीं मोड़ा कि वह उसे घृणा का पात्र बनाता था, वरन् इसलिए कि उसे बाहर जाने की स्वतन्त्रता न थी।
तो वह कहता है, तू जा, और खर्रे में से पढ़। इस विषय में भविष्यद्वक्ता हर प्रकार की घृणा उठाने को तैयार था, क्योंकि उसने बारूक से यह नहीं कहा कि जो कुछ उसने उससे सुना था उसे स्मृति से सुना दे, वरन् उसे आज्ञा दी कि खर्रा ले, और जो कुछ उसने लिखा था उसे पढ़े, जैसा हम आगे देखेंगे। अतः इस अवसर पर भविष्यद्वक्ता ने संकट से बचकर बारूक को अपने स्थान पर नहीं रखा, वरन् उसने स्पष्ट रूप से उससे खर्रे में से पढ़ने को कहा: वह कहता है, जो तू ने मेरे मुख से सुनकर लिखा है, और जो यहोवा ने कहा है, ये बातें तू मन्दिर में उपवास के दिन लोगों को पढ़कर सुना। यह दिन इसलिए चुना गया, पहले तो इसलिए कि उस समय लोगों की अधिक भीड़ होती थी, जैसा तुरन्त आगे कहा गया है, क्योंकि उसे ये बातें न केवल नगरवासियों के, वरन् सारी प्रजा के कानों में पढ़नी थीं; और उपवास के दिनों में, जैसा सब जानते हैं, लोग बलि चढ़ाने के लिए बड़ी संख्या में नगर में आया करते थे। तो परमेश्वर का उद्देश्य यह था कि ये धमकियाँ न केवल यरूशलेम के निवासियों को, वरन् अन्य सब यहूदियों को भी सुनाई जाएँ, कि उनकी चर्चा देश के हर भाग में फैल जाए। दूसरे, ऐसा दिन उस सन्देश के लिए कहीं अधिक उपयुक्त था; क्योंकि उपवास की आज्ञा किस लिए दी जाती थी, सिवाय इसके कि दीनता से परमेश्वर की दया के लिए गिड़गिड़ाया जाए, और उसके क्रोध को टालने की विनती की जाए? तो जब उपवास का यही उद्देश्य था, तो यहूदियों को उस समय मानो दीन मन की दशा में होना चाहिए था, और इन धमकियों को शान्ति से ग्रहण करने और उनसे लाभ उठाने के लिए तैयार रहना चाहिए था।
तो हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने परमेश्वर की आज्ञा से इस दिन को चुनने के दो कारण थे, — पहला, क्योंकि उस समय लोगों की संख्या अधिक होती थी, — और दूसरा, क्योंकि उपवास उन्हें सीखने योग्य बना देना चाहिए था, कि वे अधिक तत्परता से परमेश्वर के अधीन हों, अपने पापों को मान लें, और भयभीत होकर परमेश्वर की दया की शरण में भी भागें, और इस प्रकार अपने पापों के कारण अपने आप से घृणा करें। शेष कल।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जैसे हम निरन्तर तेरे क्रोध को अपने विरुद्ध भड़काने से नहीं रुकते, वैसे ही हम अन्त में तेरी ओर लौट आएँ, और हर एक अपने जीवन को ऐसा जाँचे कि तेरे क्रोध के बोध से दण्डवत् पड़कर हम उसी एकमात्र सच्चे उपाय का सहारा लें, अर्थात् तुझसे विनती करें और क्षमा माँगें; और तू भी हमसे ऐसे अनुग्रह से मिल कि हम दृढ़ विश्वास से तुझे पुकारें, और इस बीच अनुभव से सचमुच यह पाएँ कि हमारी प्रार्थनाएँ व्यर्थ नहीं हैं, जब तक कि हम अन्त में तेरे स्वर्गीय राज्य में तेरी दया का पूर्ण आनन्द न पाएँ। — आमीन।
327 ब्लेनी का यह सुझाव असम्भव नहीं है कि भविष्यद्वक्ता पर, जब पहले हाकिमों के सामने उसका मुकद्दमा चल चुका था (यिर्मयाह 26), कुछ प्रतिबन्ध लगा दिया गया था, सम्भवतः उसे मन्दिर के परिसर में प्रवेश करने से मना कर दिया गया था। — सं.
एक सौ बयालीसवाँ व्याख्यान
यिर्मयाह 36:7
7. क्या जाने वे यहोवा के सामने गिड़गिड़ाकर प्रार्थना करें, और अपनी अपनी बुरी चाल से फिरें; क्योंकि जो क्रोध और जलजलाहट यहोवा ने इस प्रजा के विरुद्ध कही है, वह बड़ी है।
7. Si forte cadat precatio ipsorum coram facie Jehovae, et convertantur quisque a via sua mala; quia magna est excandescentia et magna iracundia quam locutus est Jehova contra populum hunc.
यिर्मयाह, जो कुछ उसने पहले लोगों को प्रचार किया था उसे लेखक बारूक को लिखवाने के बाद, उस उद्देश्य को दोहराता है जिसे हम पहले देख चुके हैं; क्योंकि परमेश्वर की इच्छा यह परखने की थी कि क्या प्रजा किसी भी रीति से फिर स्वस्थ बुद्धि में लाई जा सकती है। यह प्रयत्न सचमुच बहुत समय से व्यर्थ किया जा चुका था; तौभी परमेश्वर अपनी दया में अन्तिम सीमा तक आगे बढ़ने को तैयार था। इसलिए यिर्मयाह अब उस उद्देश्य को घोषित करता है जिसके लिए वह चाहता था कि पुस्तक लोगों को पढ़कर सुनाई जाए। और इसमें कोई सन्देह नहीं कि बारूक को इस प्रकार चेतावनी दी गई थी, कि वह मानो यिर्मयाह के मुख से लोगों को मन फिराने का उपदेश दे।
अब क्षमा पाने के लिए दो बातें आवश्यक बताई गई हैं, — प्रार्थना, और फिरना या मन-परिवर्तन। क्योंकि यदि कोई केवल शब्दों से परमेश्वर से मेल करना चाहे, तो वह सफल न होगा। फिरने या मन-परिवर्तन को प्रार्थना से अलग नहीं किया जा सकता।
परन्तु फिर, यदि कोई पापी हज़ार बार भी मन फिराए, तौभी वह परमेश्वर के न्याय के अधीन बना रहेगा; क्योंकि मेल-मिलाप, जिसके द्वारा हम निर्दोष ठहराए जाते हैं, मन फिराव पर नहीं, वरन् परमेश्वर की सेंतमेंत कृपा पर निर्भर है; क्योंकि परमेश्वर हमें इसलिए अपनी कृपा में ग्रहण नहीं करता कि वह देखता है कि हम बदलकर अच्छे मन के हो गए हैं, मानो मन-परिवर्तन क्षमा का कारण हो; वरन् वह अपनी सेंतमेंत दया के अनुसार हमें गले लगाता है।
तो यही कारण है कि यिर्मयाह इन दोनों बातों को एक साथ जोड़ता है — प्रार्थना, और मन-परिवर्तन या मन फिराव; क्योंकि जैसा मैं कह चुका हूँ, कपटी लोग शब्दों से अपने पाप मान लेते हैं और क्षमा माँगते हैं, परन्तु कपटी या दोहरे मन से। इसलिए प्रार्थना सच्ची हो, इसके लिए मन फिराव जोड़ा जाना चाहिए, जिसके द्वारा मनुष्य दिखाते हैं कि वे अपने आप से घृणा करते हैं। और फिर, दूसरी ओर, हमारे लिए केवल फिरना या मन फिराना पर्याप्त नहीं, जब तक कि पापी परमेश्वर की दया की शरण में न भागे, क्योंकि क्षमा उसी सोते से बहती है; क्योंकि, जैसा कहा जा चुका है, परमेश्वर हमारे किसी गुण के कारण हमें क्षमा नहीं करता, वरन् इसलिए कि उसे हमारे पापों को गाड़ देना भला लगता है। पूरे का सार यह है कि परमेश्वर चाहता था कि यिर्मयाह की भविष्यद्वाणियाँ सारी प्रजा के सामने पढ़कर सुनाई जाएँ, क्योंकि वे उनकी रक्षा और उद्धार के लिए सहायक थीं। रीति का वर्णन किया गया है, — कि लोगों को दीनता से प्रार्थना करनी थी और सचमुच मन भी फिराना था।
जहाँ तक इस कथन का प्रश्न है, क्या जाने उनकी प्रार्थना गिरे, इसका अर्थ हम अन्यत्र समझा चुके हैं। पवित्रशास्त्र प्रार्थना के विषय में कहता है कि वह ऊपर उठती है और कि वह नीचे गिरती है। दोनों कथन उपयुक्त हैं, यद्यपि उन्हें भिन्न रीति से समझना चाहिए; क्योंकि प्रार्थना ठीक रीति से तब तक नहीं चढ़ाई जा सकती जब तक मनुष्य ऊपर न चढ़े और नीचे न गिरे। ये दोनों बातें परस्पर विरोधी प्रतीत होती हैं, परन्तु वे भली-भाँति एक साथ मेल खाती हैं; वरन् उन्हें अलग किया ही नहीं जा सकता। क्योंकि प्रार्थना में दो बातें आवश्यक हैं — विश्वास और दीनता: विश्वास के द्वारा हम परमेश्वर की ओर ऊपर उठते हैं, और दीनता के द्वारा हम भूमि पर दण्डवत् पड़े रहते हैं। यही कारण है कि पवित्रशास्त्र प्रायः कहता है कि प्रार्थना ऊपर चढ़ती है, क्योंकि जब तक हम अपने मनों को ऊपर न उठाएँ, हम जैसी चाहिए वैसी प्रार्थना नहीं कर सकते; और विश्वास, प्रतिज्ञाओं से सम्भला हुआ, हमें सारे संसार से ऊपर उठा देता है। तो इस प्रकार प्रार्थना विश्वास के द्वारा ऊपर उठाई जाती है; परन्तु दीनता के द्वारा वह पृथ्वी पर नीचे गिरती है; क्योंकि भय को विश्वास के साथ जुड़ा होना चाहिए। और जैसे हमारे हृदयों में विश्वास भरोसे के द्वारा उत्साह उत्पन्न करता है, वैसे ही विवेक हमें नीचे गिराता और दण्डवत् लिटा देता है। अब हम इस कथन का अर्थ समझते हैं।
328 सेप्टुआजिन्ट और वल्गेट में क्रिया का अनुवाद ऐसा ही किया गया है; परन्तु सीरियाई और टार्गुम में "स्वीकार की जाए"। हमारा अंग्रेज़ी अनुवाद एक भावानुवाद है; अर्थ को पूरी रीति से व्यक्त करने के लिए "दीनता से" शब्द जोड़ा जाना चाहिए था, "क्या जाने वे दीनता से अपनी विनती प्रस्तुत करें," इत्यादि। — सं.
वह आगे कहता है, क्योंकि वह क्रोध और जलजलाहट बड़ी है जो यहोवा ने इस प्रजा के विरुद्ध सुनाई है, या कही है। क्रोध और जलजलाहट से हमें परमेश्वर का बदला समझना चाहिए, कारण को परिणाम के स्थान पर रखा गया है। परन्तु भविष्यद्वक्ता संकेत करता है कि जब तक मनुष्य पूरी रीति से अन्धे न हो गए हों, और मानो मन से विमुख न हो गए हों, तब तक जब परमेश्वर उनके सामने कोई भयानक न्याय रखता है, तो उन्हें बहुत गहराई से छू जाना चाहिए। जब परमेश्वर किसी छोटे दोष के लिए ताड़ना देता है, और जब वह हमें बहुत कठोरता से धमकी नहीं देता, तब भी हमें घबरा जाना चाहिए; परन्तु जब परमेश्वर दिखाता है कि उसका क्रोध ऐसा भड़का है कि अन्तिम विनाश का भय होना चाहिए, तब यदि ऐसी धमकी हमें भयभीत न करे, तो हम सचमुच जड़ ही होंगे। तब भविष्यद्वक्ता कहता है कि ढील की कोई आशा न थी, क्योंकि परमेश्वर ने प्रजा पर कोई हल्का या साधारण न्याय नहीं सुनाया था; वरन् वह दिखाता है कि वह सारी जाति को नष्ट करने को तैयार था, क्योंकि यहूदी अत्यन्त कठोर दण्ड के योग्य थे।
यिर्मयाह 36:8
8. यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता की सब आज्ञाओं के अनुसार नेरिय्याह के पुत्र बारूक ने यहोवा के भवन में उस पुस्तक में से यहोवा के वचन पढ़कर सुनाए।
8. Et fecit Baruch filius Neriae secundum omnia quae praeceperat ei Jeremias Propheta, legendo in libro sermones Jehovae in domo Jehovae.
यहाँ बारूक की तत्परता की प्रशंसा की गई है, क्योंकि उसने परमेश्वर के भविष्यद्वक्ता की आज्ञा नहीं टाली, वरन् जो पद उसे सौंपा गया था उसे स्वेच्छा से स्वीकार किया। उसका यह पद, जैसा हम कह चुके हैं, संकट से रहित न था। तो जब उसका सन्देश किसी प्रकार लोकप्रिय न था, वरन् इसके विपरीत बहुत अप्रिय था, इसलिए इससे बारूक की निष्ठा दिखाई देती है। उसने कोई इनकार नहीं किया, क्योंकि वह जानता था कि यह भार किसी उद्देश्य से उस पर रखा गया था। तो यिर्मयाह कहता है कि जैसी उसे आज्ञा दी गई थी वैसा ही उसने किया, और मन्दिर में यहोवा के वचन पढ़े। थोड़ा आगे वह उन्हें यिर्मयाह के वचन कहता है, परन्तु अभिप्राय एक ही है; क्योंकि जैसे परमेश्वर मानो अपने सेवकों के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है, वैसे ही वह प्रायः उन पर वह बात आरोपित करता है जो विशेष रूप से उसी की है। (रोमियों 2:16; 16:25; 2 तीमुथियुस 2:8) वह शिक्षा यिर्मयाह की कहलाती है, जिसका ठीक-ठीक कहें तो परमेश्वर के सिवा कोई दूसरा रचयिता नहीं है। इसी प्रकार पौलुस ने उस सुसमाचार को, जिसका वह प्रचारक और गवाह था, अपना सुसमाचार कहा; तौभी उसने स्वयं सुसमाचार को गढ़ा न था, वरन् उसे मसीह से पाया था, और मानो उसके हाथ से लेकर विश्वासयोग्यता से सौंप दिया।
इसलिए हमें इस कथन-शैली पर ध्यान देना चाहिए, जो पवित्रशास्त्र में सर्वत्र पाई जाती है, — एक ही बात परमेश्वर पर और उसके सेवकों पर आरोपित की जाती है। इस प्रकार हम वह बात पाते हैं जो विचित्र लग सकती है, — प्रेरितों के विषय में कहा गया है कि वे पाप क्षमा करते हैं, उनके विषय में ऐसा कहा गया है मानो वे उद्धार लाते हैं; परन्तु इसका कारण यह है कि वे परमेश्वर के अनुग्रह के सेवक थे, और मसीह के नाम से मनुष्यों को उपदेश देते थे कि परमेश्वर से मेल कर लो। तो उन्होंने इसलिए पापमुक्त किया कि वे पापमुक्ति के गवाह थे। इसी प्रकार जो वचन परमेश्वर ने अपने सेवक को लिखवाए, वे यिर्मयाह के वचन कहलाए; तौभी, ठीक-ठीक कहें तो, वे मनुष्य के वचन न थे, क्योंकि वे किसी नश्वर मनुष्य से नहीं, वरन् एकमात्र सच्चे परमेश्वर से निकले थे। आगे लिखा है — 329 मैं इस पद का अनुवाद यों करता हूँ, — 8. और नेरिय्याह के पुत्र बारूक ने यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता की सब आज्ञाओं के अनुसार किया, इसलिए कि यहोवा के भवन में पुस्तक में से यहोवा के वचन पढ़े। यिर्मयाह ने बारूक को जो आज्ञा दी थी वह यह थी कि वह एक खर्रा ले और उसके मुख से वचन लिखे: यह बारूक ने किया, और इस उद्देश्य से किया कि वह (जैसा टार्गुम में है) प्रभु के भवन में वे वचन पढ़े। — सं.
यिर्मयाह 36:9-10
9. और योशिय्याह के पुत्र यहूदा के राजा यहोयाकीम के राज्य के पाँचवें वर्ष के नौवें महीने में ऐसा हुआ कि उन्होंने यरूशलेम के सब लोगों के लिए, और यहूदा के नगरों से यरूशलेम में आए हुए सब लोगों के लिए, यहोवा के सामने उपवास का प्रचार किया।
9. Et fuit anno quinto Jehoiakim filii Josiae regis Jehudah, mense nono, indixerunt jejunium coram Jehova toti populo (qui erat, subaudiendum est) Jerosolymae, et toti populo qui venerunt ex urbibus Jehudah Jerosolymam:
10. तब बारूक ने यहोवा के भवन में, शापान के पुत्र गमर्याह लेखक की कोठरी में, जो ऊपर के आँगन में यहोवा के भवन के नये फाटक के द्वार पर थी, सब लोगों को यिर्मयाह के वचन पुस्तक में से पढ़ सुनाए।
10. Et legit Baruch in libro sermones Jeremiae in domo Jehovae (hoc est, in Templo) in cubiculo Gamarliae filii Saphan scribae, in atrio superiori, in introitu (vel, ingressu) portae novae domus Jehovae (portae novae Templi) in auribus totius populi.
यहाँ एक अधिक पूर्ण व्याख्या जोड़ी गई है; क्योंकि भविष्यद्वक्ता कोई नई बात नहीं बताता, वरन् इब्रानी में जो सामान्य है उसके अनुसार वह विस्तार से वह बात व्यक्त करता है जो उसने पहले संक्षेप में कही थी: क्योंकि उसने कहा था कि बारूक ने, जैसी उसे आज्ञा दी गई थी, मन्दिर में परमेश्वर के वचन पढ़े; परन्तु अब वह बताता है कि यह कब और कैसे किया गया, अर्थात् यहोयाकीम के पाँचवें वर्ष में, और जब नौवें महीने में उपवास का प्रचार किया गया।
तो अब हम इस दोहराव का उद्देश्य देखते हैं, अर्थात् समय को और स्पष्टता से बताना। तो वह कहता है कि पुस्तक तब पढ़ी और सुनाई गई जब यहोयाकीम के पाँचवें वर्ष में उपवास का प्रचार किया गया। निःसन्देह यहूदी जानते थे कि कोई भारी विपत्ति निकट थी, क्योंकि यह प्रचार असाधारण था। और हम जानते हैं कि जब किसी विपत्ति की आशंका होती थी, तो वे प्रायः इसी उपाय का सहारा लेते थे; इसलिए नहीं कि उपवास अपने आप में परमेश्वर को भाता था, वरन् इसलिए कि वह दीनता का एक चिह्न था, और वह मनुष्यों को प्रार्थना के लिए तैयार भी करता था। यह रीति अकारण नहीं घुस आई थी, वरन् परमेश्वर ने इसी प्रकार अपनी प्रजा को मन फिराव का अभ्यस्त बनाना चाहा था। इसलिए जब परमेश्वर अपनी अप्रसन्नता के कुछ चिह्न प्रकट करता था, तब यहूदी आवश्यक समझते थे कि न केवल क्षमा माँगें, वरन् अपनी प्रार्थनाओं के साथ उपवास भी जोड़ें, जैसा हम योएल के दूसरे अध्याय में और अन्य स्थानों में भी पाते हैं। तो यह पाप और दोष का एक गम्भीर अंगीकार था; क्योंकि उपवास के द्वारा वे मान लेते थे कि वे परमेश्वर के न्याय के अधीन हैं, और टाट और राख के द्वारा भी; क्योंकि वे अपने सुन्दर वस्त्र उतार फेंककर टाट पहन लेते थे, और अपने सिरों पर राख भी डालते थे, या भूमि पर लेट जाते थे: और ये मानो दोषियों की मलिनता थी: और इस दीन दशा में वे परमेश्वर से क्षमा माँगते थे, इस प्रकार पहले तो इन बाहरी चिह्नों के द्वारा अपनी मलिनता को स्वीकार करते थे, और दूसरे, परमेश्वर और स्वर्गदूतों के सामने यह अंगीकार करते थे कि वे मृत्यु के योग्य हैं, और यदि परमेश्वर उन्हें क्षमा न करे तो उनके लिए कोई आशा शेष नहीं।
330 पद के उत्तरार्ध का अनुवाद सेप्टुआजिन्ट, सीरियाई और टार्गुम में भिन्न रीति से किया गया है, और इब्रानी से अधिक मेल खाता हुआ, — — यरूशलेम के सब लोगों ने, और नगरों से यरूशलेम में आए हुए सब लोगों ने, यहोवा के सामने उपवास का प्रचार किया। यह उपवास प्रजा ने प्रचारित किया था, राजा ने नहीं, जो बहुत ही अभक्त था। इस अवसर पर उसके आचरण ने उसकी बड़ी अभक्ति को प्रमाणित कर दिया। — सं.
तो जब यिर्मयाह यहाँ लिखता है कि उपवास का प्रचार किया गया, तो इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि उस समय परमेश्वर के बदले के कुछ चिह्न प्रकट हुए थे। और यद्यपि यहोयाकीम ने कर देने से इनकार करके राजा नबूकदनेस्सर को भड़का दिया था, तौभी यहूदियों में यह विचार सदा प्रबल रहा कि परमेश्वर के न्यायपूर्ण बदले के बिना कुछ भी नहीं होता। तो जब वे जानते थे कि उनका काम परमेश्वर से है, तो उन्होंने सोचा कि उन्हें उसे शान्त करना उचित है।
वह आगे कहता है कि यहोवा के सामने उपवास का प्रचार किया गया; इसलिए नहीं कि वह पुण्य-अर्जक था, या उसके द्वारा कोई प्रायश्चित्त होता, जैसा पोपपन्थी कल्पना करते हैं, जो सोचते हैं कि वे उपवासों के द्वारा अपने पापों का मोल चुका सकते हैं, और इसलिए उन्हें "सन्तुष्टियाँ" कहते हैं; परन्तु भविष्यद्वक्ता कहता है कि उपवास यहोवा के सामने प्रार्थना के एक पूरक के रूप में प्रचारित किया गया। तो जब वह प्रार्थना के लिए एक गम्भीर सभा थी, तो उपवास मानो उसमें जोड़ा गया एक भाग था, कि इस बाहरी चिह्न के द्वारा वे परमेश्वर के सामने अपने आप को और भी पूरी रीति से दीन करें, और साथ ही अपने मन फिराव की गवाही दें। और वह कहता है कि यह उन सब लोगों के लिए प्रचारित किया गया जो यरूशलेम में थे, और उन अन्य यहूदियों के लिए जो दूसरे नगरों से मन्दिर में प्रार्थना करने आए थे। और इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि उपवास अपने आप में कुछ महत्व नहीं रखता, वरन् वह मन फिराव का एक प्रमाण था, और इसलिए प्रार्थना के साथ जोड़ा गया। और मसीह ने भी, प्रार्थना का उल्लेख करके, उपवास जोड़ा (मत्ती 17:21); इसलिए नहीं कि उपवास को प्रतिदिन की प्रार्थनाओं से अलग नहीं किया जाना चाहिए; क्योंकि हमें सदा प्रार्थना करनी चाहिए; परन्तु हमें सुबह और शाम उपवास नहीं करना है; वरन् जब हमारे लिए मेज़ तैयार की जाती है और हमारे सामने भोजन रखा जाता है तब हम प्रार्थना करते हैं; और फिर जब हम दोपहर और रात का भोजन करते हैं, तब हम परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं। परन्तु इसे अधिक गम्भीर प्रार्थनाओं के विषय में समझना चाहिए, जब, जैसा हम कह चुके हैं, परमेश्वर मानो हमें अपने न्यायासन के सामने बुलाता है, और अपनी अप्रसन्नता के प्रत्यक्ष चिह्न दिखाता है। और इसी कारण पौलुस भी, 1 कुरिन्थियों 7:5 में, पतियों को अपनी पत्नियों के साथ रहने की आज्ञा देते हुए, यह जोड़ता है, "केवल कुछ समय तक" — किस उद्देश्य से? अर्थात् इसलिए कि वे पूरी रीति से प्रार्थना और उपवास में लगें। इससे हम देखते हैं कि उपवास कोई साधारण बात न थी, वरन् तभी किया जाता था जब कोई अत्यावश्यक आवश्यकता उसे माँगती थी।
फिर यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि उपवास का प्रचार उन दूसरे यहूदियों के लिए भी किया गया जो यरूशलेम में आए थे; क्योंकि उनके यरूशलेम आने की और क्या आवश्यकता थी, सिवाय इसके कि वे दीनता से परमेश्वर के अनुग्रह के लिए विनती करें?
वह कहता है कि वह पुस्तक तब मन्दिर में, शापान लेखक के पुत्र गमर्याह की कोठरी में पढ़ी गई। जैसा हम पहले कह चुके हैं, कोठरियाँ याजकों के आँगन से जुड़ी हुई थीं; क्योंकि लेवीय मन्दिर के रखवाले थे; और प्रत्येक याजक भी, जब तक वह अपनी सेवा करता था, मन्दिर में ही रहता था। शापान के विषय में, उसे लेखक कहा गया है, परन्तु वह राजा का मन्त्री नहीं है, जिसे आगे इसी नाम से पुकारा गया है; क्योंकि मैं उसे एक लिपिक मानता हूँ। क्योंकि वे लेखकों को {,}ספרים sepharim कहते थे; परन्तु इस नाम से कभी व्यवस्था के व्याख्याता अभिप्रेत होते हैं, और कभी वे लिपिक, जिनका काम भविष्यद्वाणियों को संग्रह करना था, या जो सार्वजनिक अभिलेखों के संग्रह में लगे रहते थे। तो शापान लेखक के पुत्र गमर्याह की मन्दिर में अपनी कोठरी थी; और वह कहता है, ऊपरवाले आँगन में। इससे हम, जो मैं पहले ही कह चुका हूँ उसके अनुसार, यह निष्कर्ष निकालते हैं कि ये कोठरियाँ आँगन के ही भाग थीं।
और वह आगे कहता है, मन्दिर के नये फाटक के द्वार पर। कुछ लोग सोचते हैं कि यह पूर्वी फाटक था, और कि लोगों की सबसे बड़ी भीड़ प्रायः वहीं इकट्ठी होती थी।
इस प्रकार हम देखते हैं कि बारूक ने पुस्तक पढ़ने में साहस के साथ अपना कर्तव्य पूरा किया, यद्यपि उसका पढ़ा जाना सारी प्रजा के मन को बहुत अधिक भड़काने वाला रहा होगा। आगे लिखा है, यिर्मयाह 36:11-13
11. तब शापान के पोते गमर्याह के पुत्र मीकायाह ने यहोवा के सारे वचन पुस्तक में से सुने,
11. Et audivit Michas filius Gamariae filii Saphan onmes sermones Jehovae de super libre (hoc est, ut recitabantur ex libre)
12. तब वह राजभवन में लेखक की कोठरी में उतर गया; और क्या देखा कि वहाँ सब हाकिम बैठे हुए हैं, अर्थात् एलीशामा लेखक, और शमायाह का पुत्र दलायाह, और अकबोर का पुत्र एलनातान, और शापान का पुत्र गमर्याह, और हनन्याह का पुत्र सिदकिय्याह, और सब हाकिम।
12. Et descendit in domum regis ad cubiculum scribae; et ecce illic omnes principes sedentes (hoc est, sedebant) Elisama scriba, et Dalaiah filius Semaiah, et
Elnathan filius Achobor, et Gamarias filius Saphan, et Zedechias filius Chananiae, et omnes proceres;
13. तब मीकायाह ने जितने वचन उस समय सुने थे जब बारूक ने लोगों को पुस्तक में से पढ़ सुनाया था, वे सब उनसे वर्णन किए।
13. Et nuntiavit (indicavit) ipsis Michas omnes sermones quos audierat cum legeret Baruch in libre (hoc est, recitaret ex libre) in auribus populi.
यह ज्ञात नहीं कि यह मीकायाह किस उद्देश्य से हाकिमों और राजा के मन्त्रियों के पास आया; हो सकता है कि वह एक चुगलखोर रहा हो, जो भविष्यद्वक्ता के प्रति द्वेष उत्पन्न करना और हाकिमों का कृपापात्र बनना चाहता था, जैसा दरबारी प्रायः करते हैं। यदि ऐसा था, तो हम इस उदाहरण से सीख सकते हैं कि जितने सुनते हैं वे सब ऐसे सिखाए जाने योग्य और आज्ञा मानने को तत्पर नहीं होते कि भले और पवित्र सिद्धान्त के ज्ञान में उन्नति करें: हम देखते हैं कि बहुत से लोग धीरज से सुनते हैं और कुछ-कुछ नम्रता का प्रमाण भी देते हैं, तौभी अपने हृदयों में हठ पाले रहते हैं, और बाद में जो कुछ उन्होंने सुना है उसकी निन्दा करते हैं। यहाँ जिस मीकायाह की चर्चा है, उसका स्वभाव भी ऐसा ही रहा हो सकता है। परन्तु उसकी बात भिन्न भी हो सकती है,—कि वह आश्चर्य से भरकर, जो कुछ उसे नया और मानो अविश्वसनीय लगा, उसे राजा के मन्त्रियों तक पहुँचा आया। मैं इस विषय में कोई मत दिए बिना इसे छोड़ देता हूँ, क्योंकि इस विषय में हमारे पास कुछ भी निश्चित नहीं है।
कहा गया है कि वह राजभवन में आया, जहाँ सब हाकिम बैठे थे, और लेखक की कोठरी में। सम्भव है कि यह लेखक राजा का मन्त्री था, जिसके साथ दरबार के सब हाकिम थे। वह कुछ के नाम लेता है, और फिर कहता है कि वे सब वहाँ थे, और कि मीकायाह ने उन्हें वे वचन पढ़ सुनाए जो उसने बारूक के मुख से तब सुने थे जब उसने सारी प्रजा को पढ़कर सुनाया था।
अब यह परमेश्वर के अद्भुत अभिप्राय के बिना नहीं हुआ कि राजा को अन्ततः यह पता चल गया कि मन्दिर में क्या हुआ था, ताकि परमेश्वर के विरुद्ध उसका हठ प्रकट हो जाए, जैसा हम आगे देखेंगे। यह सन्देशवाहक सचमुच यिर्मयाह के लिए और उसके सेवक बारूक के लिए भी संकट का कारण बना; परन्तु प्रभु ने उनकी रक्षा की। तौभी राजा की अभक्ति और हठ प्रकट हो गए; क्योंकि जब वे सब भयभीत हो गए, तब उसने परमेश्वर को तुच्छ जाना और उसके भविष्यद्वक्ता पर क्रोध से भड़क उठा। उसने पुस्तक जला दी, और उसके रचयिता को भी नष्ट करना चाहा। अब आगे लिखा है, यिर्मयाह 36:14
14. इसलिए सब हाकिमों ने यहूदी को, जो नतन्याह का पुत्र, शेलेम्याह का पोता और कूशी का परपोता था, बारूक के पास यह कहने को भेजा, कि जिस पुस्तक में से तू ने लोगों को पढ़ सुनाया है, उसे अपने हाथ में लेकर चला आ। तब नेरिय्याह का पुत्र बारूक वह पुस्तक हाथ में लिए हुए उनके पास आया।
14. Et miserunt omnes proceres ad Baruch, Jehudi fillium Nathaniae, filii Selemiae, filii Cussi, dicendo, Volumen in quo legisti in auribus populi sume in manum tuam, et veni. Et sumpsit Baruch filius Neriae volumen in manum suam, et yenit ad ipsos.
उन्हें तो चाहिए था कि वे तुरन्त मन्दिर में ऊपर जाते; परन्तु यद्यपि वे पूर्णतया अधर्मी नहीं थे, तौभी उन्होंने कुछ घमण्ड दिखाया, जैसा प्रायः वे करते हैं जो वैभव से घिरे रहते हैं, और अपने आप को दीन करने के लिए तैयार नहीं होते।
हम देखते हैं कि सब दरबारी घमण्ड से ऐसे फूले रहते हैं कि वे साधारण लोगों में मिलना अपना अपमान समझते हैं। वे चाहते हैं कि कोई विशेष सम्मान उनके लिए सुरक्षित रखा जाए। यही कारण था कि वे सन्देश जानने के लिए मन्दिर में ऊपर नहीं गए, बल्कि बारूक को अपने पास बुलवा भेजा। अब यही बात थी जिसने उन्हें हृदय से पश्चाताप करने से रोक दिया।
हम सचमुच देखेंगे कि वे भय से मारे गए और विस्मय से भर गए; और हम यह भी देखेंगे कि वे इस विषय को राजा के सामने ले गए, और फिर भी भविष्यद्वक्ता और उसके सेवक की सुरक्षा का प्रबन्ध करना चाहते थे; परन्तु उन्हें इससे आगे बढ़ना चाहिए था, यहाँ तक कि मन्दिर में प्रजा के साथ मिलकर अपने पश्चाताप का सार्वजनिक अंगीकार करते। उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया, यह हम समझा चुके हैं: घमण्ड, आडम्बर और महत्त्वाकांक्षा सदा धन और सामर्थ्य के साथ रहते हैं।
तब बारूक को बुलवाया गया, परन्तु आदरपूर्ण रीति से; क्योंकि उन्होंने किसी साधारण मनुष्य को नहीं भेजा; और इसी कारण उसकी वंशावली दी गई है, और केवल उसके पिता का ही नहीं, बल्कि उसके दादा और परदादा का नाम भी बताया गया है; और इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि वह कुछ प्रतिष्ठित व्यक्ति था। उन्होंने उसे आने की आज्ञा दी, और आगे कहा गया है कि वह पुस्तक लेकर उनके पास आया; इससे उसने अपनी दृढ़ता प्रकट की। उसकी तत्परता पहले भी सराहनीय थी, कि उसने मन्दिर में जाने और उन बातों को सबके सामने पढ़ सुनाने का साहस किया जो सारी प्रजा के क्रोध को भड़काने वाली थीं। जैसे आरम्भ में उसने उसे सौंपे गए काम को तत्परता से हाथ में लिया था, वैसे ही अब भी वह उसी मार्ग पर स्थिर रहा। वह हाकिमों के पास आया; और उसने पुस्तक को छिपाया नहीं, यद्यपि हो सकता था कि वह उसके साथ अपनी मृत्यु ही लिए जा रहा हो, परन्तु वह साहस के साथ उनके पास गया, क्योंकि वह जानता था कि सारा काम परमेश्वर के निर्देशन में है। आगे लिखा है,—
यिर्मयाह 36:15-16
15. तब उन्होंने उससे कहा, अब बैठकर हमें इसे पढ़कर सुना। तब बारूक ने उनको पढ़कर सुनाया।
15. Et dixerunt, sede agedum, et lege ipsum (volumen) in auribus nostris; et legit
Baruch in auribus ipsorum.
16. जब वे सब वचन सुन चुके, तब वे एक दूसरे की ओर देखकर डर गए, और बारूक से कहा, हम निश्चय राजा से इन सब वचनों का वर्णन करेंगे।
16. Et factum est cum audirent cunctos sermones, expaverunt quisque ad propinquum suum, et dixerunt ipsi Baruch,Indicando indicabimus Regi omnes hos sermones.
हम देखते हैं कि हाकिमों में धर्म के प्रति कुछ आदर था, क्योंकि उन्होंने सुनना स्वीकार किया, और भविष्यद्वक्ता के सेवक को आदर के साथ ग्रहण किया। यदि यिर्मयाह स्वयं आया होता, तो निःसन्देह उसे परमेश्वर के भविष्यद्वक्ता के रूप में ग्रहण किया जाता, क्योंकि उसके सेवक को ऐसा सम्मान दिया गया कि हाकिमों ने उसे बैठने की आज्ञा दी, जो निश्चय ही एक अनुग्रह था।
इससे प्रकट होता है कि वे परमेश्वर का तिरस्कार करनेवाले अपवित्र लोग नहीं थे। फिर एक और बात आती है,—कि वे भय से विचलित हो गए। तो राजा के मन्त्रियों के विषय में हम देखते हैं कि उनके मन की दशा ऐसी थी कि उन्होंने परमेश्वर की धमकियों को तत्परता से सुना और उनसे डरे। परन्तु वह ऐसा भय था जो निःसन्देह शीघ्र ही मिट गया; और जो वह कहता है कि वे प्रत्येक अपने पड़ोसी की ओर देखकर डरे, वह डगमगाहट का चिह्न था; क्योंकि जो उचित रीति से डरता है, वह अपने विषय में सोचता है, और परमेश्वर के सामने अपने आप को जाँचता है; परन्तु जब मन डगमगाता है, तब हर कोई दूसरे की ओर देखता है। इसलिए इस प्रकार डरना कि एक दूसरे की ओर देखें, सच्चे और खरे पश्चाताप का नहीं, बल्कि उसके विपरीत का चिह्न था; क्योंकि उनमें से प्रत्येक को परमेश्वर की ओर देखना चाहिए था, ताकि वे भीतरी विवेक से अपने पापों को स्वीकार करते, और इस प्रकार सच्चे उपचार की शरण लेते।
आगे लिखा है कि उन्होंने कहा, हम निश्चय राजा से वर्णन करेंगे, इत्यादि। इससे हम सीखते हैं कि उनका भय ऐसा था कि वे अब भी राजा को अप्रसन्न नहीं करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने यह विषय उसी पर छोड़ दिया, क्योंकि वे उसे प्रसन्न करने को उत्सुक थे। यही दरबार का धर्म है, अर्थात् परमेश्वर से इस प्रकार डरना कि अपना कृपा-स्थान न खोएँ, बल्कि इसके विपरीत, अपना कर्तव्य इस प्रकार निभाना कि उन पर यह दोष न लगे कि वे राजा के हित के प्रति पर्याप्त सचेत और समर्पित नहीं हैं। संक्षेप में, भविष्यद्वक्ता इस प्रकार मानो दर्पण में हमारे सामने राजा के मन्त्रियों का धर्म प्रस्तुत करता है, और साथ ही हमें दिखाता है कि उनके मन महत्त्वाकांक्षा से भ्रष्ट हो चुके थे, और महत्त्वाकांक्षा इतनी प्रबल हो गई थी कि वे स्वर्ग के एकमात्र सच्चे राजा की अपेक्षा एक नश्वर राजा का अधिक ध्यान रखते थे।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अनुग्रह कर कि जैसे तुझे प्रतिदिन हमें अपने पास बुलाना भाता है, वैसे ही हम नम्रता और आज्ञाकारिता की आत्मा में तेरी बुलाहट का उत्तर दें; और तू हमारे मनों पर ऐसी गम्भीर छाप भी डाल कि हम न केवल अपने पापों का अंगीकार करें, बल्कि उनके कारण अपने आप से ऐसी घृणा भी करें कि बिना विलम्ब सच्चे उपचार को खोजें, और तेरी दया पर भरोसा रखते हुए ऐसा पश्चाताप करें कि आगे से तेरा नाम हम में महिमा पाए, जब तक कि हम अन्त में उस महिमा के सहभागी न हो जाएँ जिसे तेरे पुत्र ने अपने ही लहू से हमारे लिए प्राप्त किया है। —आमीन।
एक सौ तैंतालीसवाँ व्याख्यान
यिर्मयाह 36:17-18
17. फिर उन्होंने बारूक से पूछा, हम से कह, तू ने ये सब वचन उसके मुख से सुनकर कैसे लिखे?
17. Baruch autem interrogarunt, dicendo, Indica agedum nobis quomodo scripseris cunctos sermones istos ex ore ejus?
18. बारूक ने उनसे कहा, वह ये सब वचन अपने मुख से मुझे सुनाता गया, और मैं इन्हें पुस्तक में स्याही से लिखता गया।
18. Et dixit illis Baruch, Ex ore suo pronuntiavit mihi cunctos sermones istos, et ego scripsi super librum cum atramento.
राजा के मन्त्री, जब उन्होंने सुना कि ये धमकियाँ ठीक वैसी ही लिखी गई हैं जैसी भविष्यद्वक्ता ने उन्हें बोलकर लिखवाया था, तो निःसन्देह इतने चकित हुए कि वे भिन्न-भिन्न विचारों से व्याकुल हो गए, जैसा अविश्वासी प्रायः हुआ करते हैं; और स्वर्गीय सिद्धान्त को, जैसा उन्हें करना चाहिए था, ग्रहण न करके वे डगमगाते रहे, और एक-सा मार्ग नहीं पकड़ सके। तो हाकिमों के मनों पर ऐसी ही अनिश्चितता छाई हुई थी; क्योंकि वे कठिनाई से विश्वास कर पाते थे कि ये वचन स्मरण से कहे गए हैं, बल्कि उन्हें किसी छल का सन्देह था, जैसे अविश्वासी परमेश्वर के सेवकों के विषय में ऐसी बहुत सी बातें कल्पना करते हैं; और वे जान-बूझकर ऐसा करते प्रतीत होते हैं, ताकि परमेश्वर के उस अनुग्रह को धुँधला कर दें जो उनकी आँखों के सामने प्रकट होता है। इसी उद्देश्य से कहा गया है कि उन्होंने बारूक से पूछा कि उसने यिर्मयाह के मुख से वे वचन किस प्रकार लिए।
उसने सीधे-सीधे उत्तर दिया कि यिर्मयाह ने ये वचन उसे बोलकर सुनाए थे। इससे वे यह निष्कर्ष निकाल सकते थे कि यिर्मयाह के सामने कोई पुस्तक रखी हुई नहीं थी, और कि जो कुछ उसने अपने लेखक बारूक को बताया, उस पर वह बहुत समय से मनन नहीं करता रहा था।
और यद्यपि ऐसा प्रतीत होता है कि उसने उतना ही कहा जितना हाकिमों को सन्तुष्ट करने के लिए पर्याप्त था, तौभी पूरी बात का आशय यह है कि यिर्मयाह ने किसी गुप्त स्थान या अपनी मेज़ से पुस्तक निकालकर प्रस्तुत नहीं की, बल्कि जो कुछ परमेश्वर के आत्मा ने उसे सुझाया उसे तत्परता से कह सुनाया। इसलिए जब राजा के मन्त्रियों ने जाना कि ये आज्ञाएँ किसी नश्वर मनुष्य से नहीं निकलीं, बल्कि इसके विपरीत परमेश्वर ने उन्हें यिर्मयाह के मुख से और बारूक के हाथ से कहा है, तो उनका विस्मय और भी बढ़ गया होगा। आगे लिखा है,—
यिर्मयाह 36:19
19. तब हाकिमों ने बारूक से कहा, जा, तू और यिर्मयाह छिप जाओ, और कोई न जानने पाए कि तुम कहाँ हो।
19. Et dixerunt principes ipsi Baruch, Vade et absconde to, tu et Jeremias, et vir nesciat (hoc est, nesciat quisqaam) ubinam sitis.
हम देखते हैं कि जब इन दरबारी हाकिमों ने अनुभव किया कि यह सचमुच परमेश्वर का हाथ है, तो वे बदल गए, और फिर भी वे संवेदनहीनता की दशा में ही बने रहे। परमेश्वर प्रायः इस प्रकार अपवित्र मनुष्यों को भयभीत करता है, और फिर भी वे अपनी उदासीनता में लौट जाते हैं। वे सचमुच क्षण भर के लिए जागे हुए, और गम्भीरता से परमेश्वर के न्याय को स्वीकार करते हुए प्रतीत हुए; परन्तु ये विचार तुरन्त ही लुप्त हो गए। इस प्रकार ऐसा हुआ कि उन्होंने मान लिया कि परमेश्वर ने बोला है, परन्तु मानो बहरों से बोला था, क्योंकि वह व्यर्थ था, जैसा हम शीघ्र ही देखेंगे।
तब राजा के मन्त्रियों को कोई लाभ नहीं हुआ; परन्तु वे क्रूर नहीं थे, क्योंकि वे चाहते थे कि भविष्यद्वक्ता छिप जाए, कहीं ऐसा न हो कि राजा उसके साथ कठोरता का व्यवहार करे। हम आज ऐसे बहुत से मनुष्यों को देखते हैं जिन पर ईश्वरीय सत्य का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वे सचमुच गदहों के समान सिर हिलाते हैं जो अपने कान हिलाते हैं; क्योंकि वे अपने मुँह से मान लेते हैं कि जो कुछ उनके सामने रखा गया है वह सत्य और उचित है; परन्तु, जैसा मैंने कहा, वे या तो अपनी आँखें मूँद लेते हैं, या कम से कम ध्यान नहीं देते, कि जान लें कि बोलनेवाला परमेश्वर है। प्रतीत होता है कि राजा के मन्त्री ऐसे ही थे, जिनके विषय में परमेश्वर के आत्मा ने वह घोषित किया है जो हम अभी देखेंगे। तब उन्होंने बारूक को छिप जाने की सलाह दी, और यिर्मयाह को भी ऐसा ही करने की; क्योंकि उन्होंने देखा कि यदि वे भाग न जाएँ तो उन पर संकट है। इसके बाद आगे लिखा है,—
331 कुछ लोगों ने यहाँ दो प्रश्न बनाए हैं,—"तू ने ये सब वचन कैसे लिखे? उसके मुख से?" उत्तर इसी रचना के पक्ष में प्रतीत होता है; जैसा पवित्रशास्त्र में प्रायः होता है, पहले अन्तिम प्रश्न का उत्तर दिया गया है, और फिर पहले का: बारूक ने कहा, "अपने मुख से उसने ये सब वचन मुझे सुनाए;" और फिर पहले प्रश्न का उत्तर देते हुए वह आगे कहता है, "और मैं ने पुस्तक में स्याही से लिखा।" — सं.
यिर्मयाह 36:20-21
20. तब वे पुस्तक को एलीशामा लेखक की कोठरी में रखकर राजा के पास आँगन में गए; और राजा को वे सब वचन कह सुनाए।
20. Et venerunt ad regem in atrium, et volumen deposuerunt in cubiculo Elisamae scribae, et nuntiarunt in auribus regis omnes sermones.
21. तब राजा ने यहूदी को पुस्तक ले आने के लिए भेजा, और उसने उसे एलीशामा लेखक की कोठरी में से निकाल लिया। और यहूदी ने उसे राजा को, और उन सब हाकिमों को भी जो राजा के पास खड़े थे, पढ़ सुनाया।
21. Et misit Rex Jehudi ad tollendum volumen, et accepit ex cubiculo Elisama scribae, et legit illud Jehudi in auribus regis et in auribus cunctorum principum, qui stabant a conspectu regis.
भविष्यद्वक्ता अब बताता है कि हाकिम पहले पुस्तक को एलीशामा लेखक के पास रखकर राजा के पास गए; क्योंकि राजा के कान कोमल थे, इसलिए वे ऐसा अप्रिय काम तुरन्त करने को तैयार न थे। और इस प्रकार जो लोग राजाओं के साथ रहते और उनका ध्यान अपनी ओर खींचते हैं, वे अपनी चापलूसी से उन्हें मोहित कर लेते हैं; क्योंकि दरबारों में कोई स्वतन्त्रता नहीं होती, क्योंकि सबसे बड़ा चापलूस ही सबसे अधिक कृपापात्र होता है। अतः जैसे सब दरबारी उत्सुकता से यह खोजते रहते हैं कि वे राजाओं को किस प्रकार प्रसन्न करें, वैसे ही वे सावधानी से चौकस रहते हैं कि कहीं उन्हें अप्रसन्न न कर दें। यही कारण था कि हाकिमों ने पुस्तक एलीशामा के पास रख दी। इससे हम सीखते हैं कि परमेश्वर के प्रति उनका आदर थोड़ा और ठण्डा था; क्योंकि यदि वे विश्वास करते कि यिर्मयाह ने अपने लेखक को वही लिखवाया था जो उसने परमेश्वर के आत्मा से पाया था, तो राजा को अप्रसन्न करना निश्चय ही उनकी दृष्टि में इतना महत्त्वपूर्ण नहीं ठहरना चाहिए था। तो फिर उन्होंने तुरन्त पुस्तक को सामने लाने, और राजा को सुनने के लिए समझाने का साहस क्यों नहीं किया, सिवाय इसके कि चापलूसी, जैसा मैंने कहा, सदा डरपोक होती है? इसी कारण उन्होंने राजा को पुस्तक दिखाने का साहस नहीं किया, बल्कि केवल उसे बताया कि उन्होंने कुछ भयानक बातें पढ़ी हैं, ताकि राजा उन पर दोष न लगाए, क्योंकि उन्होंने उसके सामने वह बात बहुत ढिठाई से नहीं रखी थी जिसे वह सुनना नहीं चाहता था। तो यह एक बात है।
अब आगे लिखा है कि राजा ने यहूदी को एलीशामा लेखक की कोठरी से पुस्तक ले आने के लिए भेजा। यहोयाकीम के व्यक्तित्व में हम देखते हैं कि अविश्वासी किस प्रकार एक ही समय में परमेश्वर से भागते भी हैं और उसे खोजते भी हैं, परन्तु उलझे हुए मन से, क्योंकि वे नहीं जानते कि वे क्या खोज रहे हैं। राजा जो कुछ उसे बताया गया था उसे लापरवाही से तुच्छ जान सकता था, क्योंकि यदि वह सब झंझट से मुक्त रहना चाहता था, तो उसने पुस्तक को अपने पास मँगवाने, और उसका एक भाग पढ़वाने की आज्ञा क्यों दी? इससे हम देखते हैं कि अविश्वासी, यद्यपि परमेश्वर से जितनी दूर हो सके उतनी दूर जाना चाहते हैं, तौभी एक प्रकार की अन्धी रीति से उसकी ओर दौड़ते हैं; परन्तु यह वे अपनी इच्छा से नहीं करते; क्योंकि परमेश्वर अपनी गुप्त प्रेरणा से उन्हें अपनी ओर खींचता है, ताकि वे और भी अधिक निरुत्तर ठहरें। इसी से ऐसा होता है कि जिज्ञासा बहुतों को सत्य सुनने की ओर ले जाती है, और कुछ लोग उन्मत्त होकर पूछते हैं कि सत्य से उनका क्या लेना-देना? वे उन जंगली पशुओं के समान हैं जो तलवारों पर टूट पड़ते हैं। यहोयाकीम का स्वभाव ऐसा ही था, क्योंकि वह चाहता था कि यिर्मयाह की सब भविष्यद्वाणियाँ गाड़ दी जाएँ; और फिर भी वह अपने आप को रोक न सका, बल्कि उनका सार या उनका कुछ भाग जानना चाहता था। इसलिए उसने यहूदी को पुस्तक ले आने के लिए भेजा।
फिर आगे कहा गया है कि यहूदी ने राजा के सामने और उसके मन्त्रियों के सामने पुस्तक पढ़ी। इसी से उसकी अभक्ति और अधिक प्रकट हो गई, क्योंकि जो भविष्यद्वाणियाँ उसे पढ़कर सुनाई गईं उनसे वह विचलित नहीं हुआ। वह सचमुच उनका पढ़ा जाना सह न सका, बल्कि कुछ अध्याय समाप्त होने के बाद, जैसा हम देखेंगे, वह इतना क्रोधित हो गया कि उसने पुस्तक को आग में फेंककर जला दिया। तौभी परमेश्वर का अभिप्राय यह था कि राजा से और उसके मन्त्रियों से भी हर बहाना छीन ले, ताकि वे बाद में यह न कह सकें कि वे अज्ञानता के कारण गिरे थे; क्योंकि जब पुस्तक उनके सामने प्रस्तुत की जा चुकी, तो यदि वे उस सुरक्षा की दशा में फिर से नहीं लौटाए गए जिससे वे गिर गए थे, तो यह उनका अपना ही दोष था। वह अब आगे कहता है,—
यिर्मयाह 36:22-23
22. राजा नौवें महीने में शीतकाल के भवन में बैठा हुआ था, और उसके सामने अँगीठी में आग जल रही थी।
22. Rex autem sedebat in domo hyemali, mense nono; et focus coram facie ejus accensus (vel, ardebat)
23. और ऐसा हुआ कि जब यहूदी तीन चार पृष्ठ पढ़ चुका, तब उसने उसे चाकू से काटा, और जो आग अँगीठी में थी उसमें फेंक दिया, यहाँ तक कि सारी पुस्तक अँगीठी की आग में भस्म हो गई।
23. Et factum est, cum legisset Jehudi tres paginas et quatuor (hoc est, tres vel quatuor) scidit cultello scribae (vel, graphio) et projecit in ignem qui crat in foco, usque dum consumeret volumen totum super ignem qui erat in foco.
यहाँ यिर्मयाह दिखाता है कि उसने कितना कम कुछ प्राप्त किया था; क्योंकि राजा ने पुस्तक को न केवल एक ओर फेंक दिया, बल्कि उसे फाड़कर टुकड़े-टुकड़े कर दिया, और फाड़ने के बाद वह चाहता था कि उसका स्मरण भी मिट जाए, क्योंकि उसने उसे आग में फेंक दिया। इस परीक्षा ने भविष्यद्वक्ता के मन को बहुत ही दुःख पहुँचाया होगा; उसने वह पुस्तक परमेश्वर की आज्ञा से लिखवाई थी; अब उसने देखा कि उसका सारा परिश्रम व्यर्थ गया। तब वह परमेश्वर से शिकायत कर सकता था कि इतना परिश्रम निष्फल खर्च हुआ। क्योंकि परमेश्वर ने पुस्तक लिखवाने की आज्ञा और किस उद्देश्य से दी थी, सिवाय इसके कि राजा और उसके मन्त्रियों को पश्चाताप की ओर ले जाए? प्रजा के विषय में, भविष्यद्वक्ता यह नहीं जान सकता था कि जिस उद्देश्य से उसने अपने लेखक बारूक को उनके पास भेजा था वह पूरा हुआ या नहीं, क्योंकि उनके ध्यान देने के विषय में कोई विवरण नहीं दिया गया। परन्तु बारूक को राजभवन में ले जाया गया, इसलिए सबके मन असमंजस में पड़े रहे: अब परिणाम क्या हुआ? राजा ने पुस्तक जला दी। तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता का मन बहुत व्यथित हुआ। परन्तु परमेश्वर अपने सेवकों को इसी प्रकार अभ्यास कराता है, जब वह उन्हें बहरों से बोलने या अन्धों के पास ज्योति ले जाने की आज्ञा देता है।
तो आइए, हम सीधे-सीधे परमेश्वर की आज्ञा मानना सीखें, यद्यपि जो परिश्रम वह हम से माँगता है वह व्यर्थ प्रतीत हो। और इसी कारण पौलुस संसार की सारी कृतघ्नता से ऊपर उठकर कहता है कि सुसमाचार के सेवक परमेश्वर के लिए सुगन्ध हैं, चाहे मृत्यु के लिए चाहे जीवन के लिए, (2 कुरिन्थियों 2:15, 16) क्योंकि यद्यपि अधिकांश लोग सुसमाचार सुनकर और भी बुरे हो जाते हैं, तौभी सेवकों द्वारा परमेश्वर को दी गई आज्ञाकारिता उसे ग्रहणयोग्य है, और परिणाम की ओर नहीं देखना चाहिए। तो यिर्मयाह ने देखा कि राजा का मन भड़क उठा है, परन्तु इस कारण उसने अपनी आज्ञाकारिता पर पछतावा नहीं किया, क्योंकि वह जानता था कि परिणाम परमेश्वर और उसकी इच्छा पर छोड़ देना है। मनुष्यों का कर्तव्य यह है कि जो कुछ परमेश्वर आज्ञा दे उसे पूरा करें, चाहे उनके परिश्रम से कोई फल निकलता न दिखाई दे।
तो यह एक बात है।
अब राजा के विषय में, हम उसमें मानो दर्पण में देखते हैं कि जो शैतान के दास हैं उनका अन्धापन कितना भयंकर है। निश्चय ही राजा को, जब परमेश्वर ने उसके कानों में ऐसा गर्जन किया, भयभीत हो जाना चाहिए था। वह वचन का उपहास तो नहीं कर सका, परन्तु वह क्रोध से भड़क उठा, और एक पागल जंगली पशु के समान हिंसा से काम किया, और अपना क्रोध स्वयं पुस्तक पर उतारा! यदि वह यिर्मयाह को उसका रचयिता समझता था, तो उसने उसे सार्वजनिक मामलों में कोई अधिकार न रखनेवाला मनुष्य समझकर उसकी उपेक्षा क्यों नहीं की? क्योंकि यिर्मयाह राजा के रूप में उसकी प्रतिष्ठा को घटा नहीं सकता था। तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि उसने, यद्यपि अनचाहे, यह अनुभव किया कि उसका सामना परमेश्वर से है; तो फिर वह इस प्रकार क्रोध से क्यों भड़क उठा? परमेश्वर के प्रति ऐसे उन्माद से वह क्या पाने की आशा कर सकता था? परन्तु, जैसा मैंने कहा, यह वही भयानक अन्धापन था जो सब त्यागे हुए लोगों में पाया जाता है, जिनके मनों को शैतान ने मोहित कर लिया है; क्योंकि एक ओर वे, चाहे-अनचाहे, अनुभव करते हैं कि परमेश्वर उपस्थित है, और कि उन्हें एक प्रकार से उसके न्यायासन के सामने बुलाया गया है; और दूसरी ओर, मानो वे परमेश्वर को भूल गए हों, वे उन्मत्त होकर उसके विरुद्ध भड़कते हैं।
तो राजा यहोयाकीम के विषय में कहा गया है कि जब वह अपने शीतकाल के भवन में था और आग के सामने बैठा था, तब जब तीन चार पृष्ठ पढ़े जा चुके, उसने पुस्तक को लोहे की लेखनी से, या लेखक के छोटे चाकू से काट डाला। शब्द {}תערtor का अर्थ प्रायः उस्तरा होता है, परन्तु यहाँ उसे लेखकों द्वारा प्रयोग किए जानेवाले चाकू के अर्थ में लेना चाहिए, un canivet. पहली बात, राजा ने तब तक प्रतीक्षा नहीं की जब तक यहूदी पुस्तक समाप्त न कर ले; तीन या चार पन्ने, या जैसा हम कहते हैं पृष्ठ, सुन लेने के बाद उसने पुस्तक छीनकर काट डाली; और दूसरी बात, इस अपवित्र कार्य से सन्तुष्ट न होकर उसने पुस्तक को जला दिया, मानो वह पुस्तक के साथ परमेश्वर के न्याय को भी मिटा सकता हो। परन्तु हम आगे देखेंगे कि पुस्तक को जलाने में, यहाँ तक कि सारी पुस्तक आग में भस्म हो गई, इस असंयमी आत्मा से उसने क्या पाया। अब आगे लिखा है,—
यिर्मयाह 36:24
24. तौभी न तो वे डरे और न उन्होंने अपने वस्त्र फाड़े, अर्थात् न राजा ने और न उसके कर्मचारियों में से किसी ने, जिन्होंने ये सब वचन सुने थे।
24. Et non timuerunt et non sciderunt vestes suas rex et cuncti servi ejus, cum audissent cunctos sermones istos.
भविष्यद्वक्ता अब वृत्तान्त के साथ शिक्षा को जोड़ता है, क्योंकि जो कुछ हमने अब तक देखा है वह नीरस रहता यदि उसके साथ कोई उपदेश न जोड़ा जाता। तो भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि उसने राजा के अभक्तिपूर्ण हठ के विषय में जो हमने पढ़ा है वह क्यों बताया। परन्तु एक सीधे कथन में उससे अधिक बल है जितना तब होता यदि भविष्यद्वक्ता ऊँचे-ऊँचे शब्दों में राजा और उसके मन्त्रियों के विरुद्ध बरसता; क्योंकि वह यहाँ एक चकित मनुष्य के समान बोलता है; वह कहता है, उन्होंने न अपने वस्त्र फाड़े, न डरे, जब उन्होंने ऐसी भयानक धमकियाँ सुनीं। और निःसन्देह इसे उचित ही सब बातों में सबसे भयंकर माना जा सकता है कि अभागे मनुष्य ऐसे तिरस्कार के साथ परमेश्वर की धमकियों की उपेक्षा करें, जिनसे उन्हें तत्काल विनाश से कम नहीं डरना चाहिए था। तो यह कि नश्वर मनुष्य तब भी विचलित न हों जब परमेश्वर अपनी धमकियों के द्वारा उनके विरुद्ध गरजता है, बल्कि इसके विपरीत और भी कठोर हो जाएँ,—यह शैतानी उन्माद का प्रमाण है। इसलिए भविष्यद्वक्ता अकारण नहीं, एक चकित मनुष्य के समान, कहता है कि न राजा डरा और न उसके मन्त्री, और न उन्होंने अपने वस्त्र फाड़े।
अब, इस खण्ड में हमें यह सिखाया जाता है कि यह त्याग का चिह्न है जब हम तब भी भयभीत नहीं होते जब परमेश्वर धमकी देता है और घोषित करता है कि वह हमारा न्यायी बनेगा, और जब वह हमारे पापों को सामने लाता है, और यह भी दिखाता है कि हम किस योग्य हैं। इसलिए जब इन सब बातों का हम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, तो यह निराशाजनक उन्माद का निश्चित चिह्न है। भविष्यद्वक्ता का यही अभिप्राय है जब वह कहता है, वे नहीं डरे, क्योंकि उसका उद्देश्य यह दिखाना था कि सब लोगों को भी, उसी के समान, इस बात पर विस्मित होना चाहिए कि राजा और उसके मन्त्री इस प्रकार निडर होकर परमेश्वर की धमकियों का सामना कर सके।
332 पूर्व के देशों में चिमनियाँ नहीं होती थीं, और इसलिए "अँगीठियाँ" (चूल्हे) भी नहीं। यहाँ जिस शब्द का अनुवाद "अँगीठी" किया गया है उसका ठीक अर्थ आग की कड़ाही (अँगीठी-पात्र) है, और उसके पहले आया {{את एक सम्बन्धसूचक अव्यय है। इस पद का अनुवाद इस प्रकार किया जा सकता है,— और राजा नौवें महीने में शीतकाल के भवन में बैठा था, और आग की कड़ाही उसके सामने जल रही थी (या, जो उसके सामने जल रही थी)। Vulg. में यह "एक छोटी वेदी, arula," है; Syr. और Targ. में "आग"; परन्तु Sept. में "अँगीठी"। — सं.
वस्त्रों के विषय में, चिह्न को वस्तु के स्थान पर रखा गया है; और फिर सम्पूर्ण के स्थान पर एक भाग का कथन किया गया है: पहली बात, वस्त्र फाड़ना कोई बड़ी बात नहीं है, जब तक पहले हृदय न फाड़ा जाए, जैसा योएल दूसरे अध्याय में कहता है; परन्तु यद्यपि कपटी लोग धोखा देनेवाले चिह्नों से पश्चाताप का दिखावा करते हैं, तौभी जब सच्चे और खरे पश्चाताप की चर्चा होती है, तो चिह्न को चिह्नित वस्तु के स्थान पर रखा जाता है, जैसा इस खण्ड में, उन्होंने अपने वस्त्र नहीं फाड़े, अर्थात् उन्होंने कोई भय प्रकट नहीं किया। और क्योंकि वस्त्र फाड़ना प्रायः किया जाता था, इसलिए वह कहता है कि उन्होंने अपने वस्त्र नहीं फाड़े, जब परमेश्वर ने यिर्मयाह के मुख से और बारूक के हाथ से उनके विरुद्ध गर्जन किया। दूसरी बात, यहाँ सम्पूर्ण के स्थान पर एक भाग का कथन है, क्योंकि वे टाट ओढ़ने और अपने सिरों पर राख डालने के अभ्यस्त थे। यहाँ केवल वस्त्रों का उल्लेख किया गया है; परन्तु दूसरे चिह्न भी इसमें सम्मिलित थे।
वह कहता है, जब उन्होंने ये सब वचन सुने; यह नहीं कि राजा ने पूरी पुस्तक सुनी, परन्तु तीन या चार अध्याय उसे दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त थे; क्योंकि इसमें कोई सन्देह नहीं कि वह भरपूर रीति से दोषी सिद्ध हो चुका था, और कि उसने अपने आप को ऐसे क्रोध में डाल दिया कि उसने पुस्तक को काट डाला, और परमेश्वर के न्याय से डरकर अपने वस्त्र नहीं फाड़े। और शब्दों {}קרעkoro, काटना, और {}קראkora, पढ़ना, में एक उल्लेखनीय अनुप्रास है, पहला {,}עoin पर समाप्त होता है, और दूसरा {,}אaleph पर।
उसने पहले कहा था कि जब यहूदी ने पुस्तक का एक भाग पढ़ा, तब राजा ने उसे काट डाला; एक पढ़ता था और दूसरा काटता था; और यहाँ वह कहता है कि राजा ने अपने वस्त्र नहीं काटे (यह वही शब्द है) या नहीं फाड़े। राजा ने पहले पुस्तक को काटकर टुकड़े-टुकड़े कर दिया था, जबकि इसके विपरीत उसे और बाकी लोगों को अपने वस्त्र काटने या फाड़ने चाहिए थे, और यदि उचित होता तो अपने आप को भी, जब परमेश्वर ने ऐसी भयानक धमकियों से उन्हें भयभीत किया। आगे लिखा है,—
यिर्मयाह 36:25
25. तौभी एलनातान, और दलायाह, और गमर्याह ने राजा से विनती की थी कि वह पुस्तक को न जलाए; परन्तु उसने उनकी न सुनी।
25. Quinetiam Elnathan et Dalaia et Gainaria, intercesserunt regi (vel, prohibuerunt regem, vel rogarunt; ham {}ענפomnia hcec significat, occurrere, vel deprecari, vel prohibere, et se interponere; illi ergo conati sunt regi occurrere) ne combureret volumen, et non audivit ipsos.
भविष्यद्वक्ता इस परिस्थिति के द्वारा राजा की दुष्टता को और भारी ठहराता है, कि तीन मनुष्यों ने उसका विरोध किया, यद्यपि इससे उन्होंने अपने आप को बड़े संकट में डाला।
उन्होंने देखा कि राजा अपने स्वभाव के उग्र आवेग में बहा जा रहा है; और जब वह ऐसी ढिठाई से परमेश्वर का विरोध कर रहा था, तो वह उनके साथ क्या कुछ करने का साहस न करता?
कि इसके बावजूद उन्होंने उससे विनती करने में संकोच नहीं किया, यह बड़े साहस का उदाहरण था। परन्तु इससे प्रकट होता है कि, क्योंकि राजा ने उनकी सम्मति पर ध्यान नहीं दिया, उसकी अभक्ति चरम सीमा पर थी।
अव्यय {}וגםugam का अनुवाद तौभी किया जाना चाहिए। बहुत से व्याख्याकारों ने यहाँ उस बात पर ध्यान नहीं दिया जो बलपूर्ण है, और इसलिए उन्होंने भविष्यद्वक्ता के अर्थ को बिगाड़ दिया है, या कम से कम उसे इतना हल्का कर दिया है कि भविष्यद्वक्ता के उद्देश्य को विश्वासयोग्यता से प्रस्तुत नहीं करते; क्योंकि, जैसा मैंने कहा, तौभी शब्द में एक अत्यन्त बलपूर्ण अतिशयोक्ति है। और आइए, हम इस खण्ड से सीखें कि जब परमेश्वर हमें दुष्ट योजनाओं से पीछे खींचता है, तो यदि हम उस काम को करने में लगे रहें जिसके विषय में वह स्पष्ट दिखाता है कि उसे नहीं करना चाहिए, तो हम और भी कम क्षमा के योग्य ठहरते हैं। विवेक तो सदा हमारे लिए हज़ार गवाहों के समान रहेगा; और यद्यपि कोई गवाह या सलाहकार या चेतावनी देनेवाला उपस्थित न हो, तौभी हम अज्ञानता या भूल या असावधानी का बहाना बनाकर परमेश्वर के सामने से बच निकलने का व्यर्थ प्रयत्न करेंगे: परन्तु जब प्रभु मनुष्यों के माध्यम से हमें वापस बुलाता है, ताकि हम बुरे मार्गों पर आगे न बढ़ें, तब यदि हम रुकने के लिए राज़ी नहीं होते, तो हमारा असुधार्य हठ और भी पूर्णता से प्रकट हो जाता है, जैसा भविष्यद्वक्ता यहाँ संकेत करता है। संक्षेप में, हम यह जान लें कि परमेश्वर किसी को उसके बुरे मार्ग से पीछे खींचने के लिए जितने अधिक साधन काम में लाता है, वह उतना ही अधिक घोर पाप करता है।
सो जब हम देखते हैं कि यहोयाकीम कितना हठीला था, तो हमें इस बात पर अचम्भा करने का कोई कारण नहीं कि आज के दिन भी बहुत से लोग ढिठाई से अपनी चाल पर चलते रहते हैं, यद्यपि परमेश्वर मानो उन्हें रोकता है, या कम से कम उन्हें रोकने के लिए मनुष्यों को भेजता है। अतः हम यह जान लें कि यह एक पुरानी बुराई है, ताकि दुष्टों की ऐसी ढीठ अवहेलना से हम विचलित न हों।
आइए, हम यहाँ दिए गए साहसपूर्ण चेतावनी के उदाहरण पर भी ध्यान दें: क्योंकि आज के दिन राजाओं के दरबारों में ऐसे लोगों का मिलना मानो एक आश्चर्यकर्म के समान है जो बड़े संकट के समय विरोध करने का साहस रखते हों; क्योंकि, जैसा पहले कहा जा चुका है, हर कोई चापलूसी के उपाय गढ़ने में चतुर है; और चूँकि ऊँचे पद तक पहुँचने का यही सबसे अच्छा और सबसे छोटा मार्ग है, इसलिए सब लोग पूरे परिश्रम से इसी कला में लगे रहते हैं। भविष्यद्वक्ता ने तो यह कहा था कि राजा और उसके मन्त्रियों ने अपने वस्त्र नहीं फाड़े, और फिर भी अब वह हमें तीन ऐसे लोगों के विषय में बताता है जिन्होंने खुले रूप से यह अंगीकार किया कि वे परमेश्वर का भय मानते थे: परन्तु जब उसने पहले सब हाकिमों की चर्चा की, तब हमें यह समझना चाहिए कि वह उनकी बात एक समूह के रूप में कर रहा था। अतः जिन तीन का अब उल्लेख हुआ है, उन्हें उससे अलग रखना चाहिए; और इसमें कोई सन्देह नहीं कि उन्होंने सब दरबारियों की अप्रसन्नता मोल ली, क्योंकि वे सब उनके विरोधी हो गए थे, इसलिए कि उन्हें अपनी लापरवाही पर लज्जित होना पड़ा होगा; परन्तु उन्होंने राजा की और बाकी सब की अप्रसन्नता अपने ऊपर लेने का साहस किया, क्योंकि उन्होंने देखा कि यह परमेश्वर का मामला था। आगे लिखा है —
यिर्मयाह 36:26
26. और राजा ने राजपुत्र यरह्मेल को और अज्रीएल के पुत्र सरायाह को और अब्देल के पुत्र शेलेम्याह को आज्ञा दी कि बारूक लेखक और यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता को पकड़ लें; परन्तु यहोवा ने उनको छिपा रखा।
26. Et praecepit rex Jerameel filio Hamelek (vel, regis, sed existimant esse nomen proprium, et est probabile) et Seraiae filio Abdeel, et Selemiae filio Abdeel, ut acciperent Baruch seribam et Jeremiam Prophetam; sed abscondit eos Jehova.
यहाँ राजा के पागलपन का वर्णन है, जो इतना बड़ा था कि उसने भविष्यद्वक्ता और उसके लेखक पर अपना क्रोध उण्डेला; और निःसन्देह उसने उन्हीं लोगों को चुना जिन्हें वह अपनी आज्ञा मानने के लिए सबसे अधिक तत्पर समझता था। वह एल्नातान या दलायाह या गमर्याह जैसे सेवकों को कभी न लेता, क्योंकि वह जानता था कि वे ऐसे घोर अधर्म के काम से कितनी घृणा करते थे; परन्तु उसने उन्हें भेजा जिन्हें वह यिर्मयाह और बारूक को मार डालने जैसी सेवा के लिए सबसे अधिक उपयुक्त समझता था।
इस अनुच्छेद से और पहले के एक अनुच्छेद से यह अनुमान लगाना अनुचित नहीं कि यिर्मयाह बन्दीगृह में बन्द नहीं था, परन्तु परमेश्वर ने उसे राजा के सामने अपनी भविष्यद्वाणियाँ प्रचार करने से और उन्हें लोगों को पढ़कर सुनाने से रोक रखा था। परन्तु चूँकि {,}עצורotsur शब्द अन्य स्थानों में बन्दी या बँधे हुए व्यक्ति के अर्थ में लिया गया है, इसलिए हम निश्चय ही दूसरा निष्कर्ष भी निकाल सकते हैं। तौभी मैं ऐसी बात पर विवाद नहीं करूँगा। जो मुझे सबसे अधिक ठीक लगता है, उसे मैं पहले ही समझा चुका हूँ, — कि यिर्मयाह को एक गुप्त प्रकाशन के द्वारा रोका गया था, जैसे पौलुस को बिथुनिया जाने से रोका गया था। (प्रेरितों के काम 16:7) यह निश्चय ही सम्भव नहीं जान पड़ता कि वह राजा के बन्दीगृह से बच निकल सकता था, जब तक यह न कहा जाए कि वह ऐसा बन्द नहीं था कि जब उसने देखा कि यह परमेश्वर की इच्छा है तो वह अपने को बच निकलने के लिए स्वतन्त्र न समझे; या यह कि यद्यपि यिर्मयाह स्वयं बन्दीगृह से न निकलता, तौभी वह राजा के तत्कालीन क्रोध से चुपके से बच निकला, क्योंकि उसे विवश किया गया था।
यह बात चाहे जैसे भी रही हो, हमें इन शब्दों पर ध्यान देना चाहिए, कि परमेश्वर ने उनको छिपा रखा।
निःसन्देह यिर्मयाह ने अपने प्राण की रक्षा करने के लिए उसे दी गई सम्मति को स्वीकार किया; तौभी अब वह मानता है कि वह परमेश्वर की कृपा से बचाया गया था, मानो वह यह कहता है कि यद्यपि ऐसे बहुत से मार्ग हो सकते हैं जिनके द्वारा हम अपने वर्तमान संकटों से बच निकलें, तौभी हमारा जीवन परमेश्वर के हाथ में है, सो वही हमें छिपाता और ढाँप रखता है; क्योंकि यदि हम उसके हाथ की छाया से ढँके न होते, तो हम स्वयं सिर के बल मृत्यु की ओर दौड़ पड़ते। परन्तु शेष कल।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, ऐसा अनुग्रह कर कि चूँकि तू हमें प्रतिदिन कृपापूर्वक अपने पास बुलाता है, और हमारी ढिलाई और आलस्य को सुधारने के लिए हमें डराता भी है, — हाँ, ऐसा अनुग्रह कर कि हम हठपूर्वक तेरा और तेरे वचन का विरोध न करें, परन्तु तेरी दीनतापूर्ण कृपा से ऐसे आकर्षित और तेरी धमकियों से ऐसे वश में किए जाएँ कि सच्चे भय के साथ तेरी दया की शरण में भागें, और किसी दूसरे उपाय की आशा कभी न रखें, सिवाय इसके कि तुझसे मेल-मिलाप पाकर उद्धार प्राप्त करें; और हम सच्चे पश्चाताप और सच्चे विश्वास के साथ तुझे ऐसा खोजें कि तू हमारी सहायता को आए, और अपने एकलौते पुत्र हमारे प्रभु के द्वारा हम पर अनुग्रहकारी हो। — आमीन।
एक सौ चौवालीसवाँ व्याख्यान
यिर्मयाह 36:27-28
27. जब राजा ने उन वचनों की पुस्तक को जो बारूक ने यिर्मयाह के मुख से सुन सुनकर लिखी थी, जला दिया, तब यहोवा का यह वचन यिर्मयाह के पास पहुँचा,
27. Et fuit sermo Jehovae ad Jeremiam postquam combusserat rex librum et sermones quos scripserat Baruch ex ore Jeremiae, dicendo,
28. फिर एक और पुस्तक लेकर उसमें यहूदा के राजा यहोयाकीम की जलाई हुई पहली पुस्तक के सब वचन लिख दे।
28. Conversus accipe tibi volumen aliud, et scribe in ipso cunctos sermones prioris, qui fuerunt in volumine priori, et quod combussit Joiakim rex Jehudah.
इन शब्दों के द्वारा भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि दुष्ट लोग परमेश्वर से लड़कर क्या पाते हैं; क्योंकि वे चाहे कितने ही कठोर और हठीले क्यों न हों, परमेश्वर की सामर्थ्य से उनका तोड़ा जाना अवश्य है। यही राजा यहोयाकीम के साथ हुआ। कल के व्याख्यान में हमने देखा कि वह कितना क्रोधित था जब उसने पुस्तक को काटा और जलाया, और भविष्यद्वक्ता को मार डालने की आज्ञा भी दी। परन्तु अब आगे यह आता है कि एक और पुस्तक लिखी गई।
अब परमेश्वर विद्रोहियों के साथ भिन्न-भिन्न रीति से व्यवहार करता है। क्योंकि कभी तो वह उन्हें छोड़ देता है या उनके पास से हट जाता है, जब वह देखता है कि उन्हें चेतावनी देने में वह अपना परिश्रम व्यर्थ ही खर्च कर रहा है।
तब वह उन्हें डाँटने या धमकाने के लिए अपने भविष्यद्वक्ताओं को फिर नहीं भेजता, परन्तु चुपचाप अपने न्याय-दण्ड पूरे करता है। और इसी कारण कहा गया है, “मेरा आत्मा मनुष्य से सदा विवाद करता न रहेगा, क्योंकि मनुष्य भी शरीर ही है।” (उत्पत्ति 6:3)
और ऐसे ही उदाहरण सब जगह मिलते हैं, अर्थात् जब परमेश्वर ने देखा कि भविष्यद्वाणी की शिक्षा तुच्छ जानी गई, तब उसने दुष्टों के विरुद्ध अपना हाथ उठाया, और साथ ही उनसे बोलना बन्द कर दिया। परन्तु यहाँ उसने यहोयाकीम के उत्पात को एक भिन्न रीति से तोड़ने का निश्चय किया, क्योंकि उसने एक और पुस्तक लिखवाई।
उसने मूर्खता से यह सोचा था कि पुस्तक के राख हो जाने से परमेश्वर की सामर्थ्य मानो कट गई या आग से बुझ गई। परन्तु परमेश्वर दिखाता है कि उसका वचन बाँधा या रोका नहीं जा सकता। तब वह नए सिरे से धमकाना आरम्भ करता है, इसलिए नहीं कि उसे इस दोहराने से कुछ लाभ की आशा थी, परन्तु इसलिए कि उस राजा के पागलपन को उपहास का विषय बनाना आवश्यक था, जिसने इतनी ढिठाई से परमेश्वर और उसके पवित्र भविष्यद्वक्ता दोनों को तुच्छ जानने का साहस किया था।
सो पहली बात यह है कि जब राजा यहोयाकीम ने अपने सामने पढ़ी गई पुस्तक पर अपना क्रोध उण्डेला, उसके बाद भविष्यद्वक्ता को एक और पुस्तक लिखने की आज्ञा दी गई; और इसी कारण वह इन शब्दों को सावधानी से दोहराता है, एक और पुस्तक ले, और उसमें वे ही वचन लिख जो पहली पुस्तक में थे; मानो उसने कहा हो, “एक अक्षर भी न छूटे, परन्तु जो कुछ मैंने एक बार तेरे मुख से प्रचार किया, वह बिना बदले बना रहे; और इस प्रकार सब दुष्ट जान लें कि जो तूने मेरे मुख से पाया, उसे तूने विश्वासयोग्यता से पहुँचा दिया है।” आगे लिखा है —
यिर्मयाह 36:29-30
29. और यहूदा के राजा यहोयाकीम के विषय में कह, यहोवा यों कहता है, तूने उस पुस्तक को यह कहकर जला दिया है कि तूने उसमें यह क्यों लिखा है कि बाबुल का राजा निश्चय आकर इस देश को नष्ट करेगा, और उसमें न तो मनुष्य को छोड़ेगा और न पशु को?
29. Et ad Joiakim regem Jehudah dices, Sic dicit Jehova, Tu combussisti librum hunc, dicendo, Quare scripsisti in ipso, dicendo, Veniendo veniet rex Babel (Babylonis) et perdet ex ea hominem et animal (vel, bestiam?)
30. इसलिए यहोवा यहूदा के राजा यहोयाकीम के विषय में यों कहता है, कि उसका कोई दाऊद की गद्दी पर विराजमान न रहेगा; और उसकी लोथ ऐसी फेंक दी जाएगी कि दिन को धूप में और रात को पाले में पड़ी रहेगी।
30. Propterea sic dixit Jehova ad Joiakim (vel, de Joiakim) regent Jehudah, Non erit ei qui succedat super solium Davidis, et cadaver ejus projectum erit in aestum per diem et in gelu per noctem.
अब हम देखते हैं कि यहोयाकीम ने अपनी अभक्ति और हठ के कारण अपने ऊपर कैसा प्रतिफल ले आया। परन्तु इसमें दो वाक्यांश हैं; पहले में परमेश्वर उसे इस बात के लिए डाँटता है कि उसने ढिठाई से भविष्यद्वक्ता का मुँह बन्द करने का साहस किया; और दूसरे में वह एक दण्ड जोड़ता है।
तू यहोयाकीम से कहना। यहाँ हमें {}עלol को {,}אלal के अर्थ में लेना चाहिए, जैसा कि सन्दर्भ से प्रकट होता है; उसका ठीक अर्थ तो “के विषय में” या “के ऊपर” है, जैसे अगले पद में, जहाँ परमेश्वर इसी प्रकार यहोयाकीम के विषय में बोलता है। परन्तु चूँकि यहाँ भविष्यद्वक्ता को मध्यम पुरुष में उससे बात करने की आज्ञा दी गई है, इसलिए दूसरा अर्थ, अर्थात् “से”, अधिक उचित है, अर्थात् उसे आज्ञा दी गई कि वह राजा से बात करे, और नाम लेकर उससे बात करे: तब अर्थ यह होगा, “तू यहूदा के राजा यहोयाकीम से कहना।” “राजा” शब्द का उल्लेख आदर के लिए उतना नहीं किया गया जितना यह दिखाने के लिए कि वह आदर पर, या प्रतिष्ठा की उपाधि पर व्यर्थ ही घमण्ड करता था; क्योंकि, जैसा हम अन्यत्र देख चुके हैं, भविष्यद्वक्ता को पहाड़ों और पहाड़ियों को डाँटने के लिए भेजा गया था, और राजाओं या राज्यों को न छोड़ने के लिए। (मीका 6:1; यिर्मयाह 1:10) उससे तो यह कहा गया था, “मैंने तुझे जातियों और राज्यों पर अधिकारी ठहराया है।”
सो चूँकि यहोयाकीम घमण्ड से इतना भर नहीं सकता था कि यह समझे कि उसके लिए सब कुछ उचित है, इसलिए परमेश्वर संकेत करता है कि राजसी वैभव से उसके मन और इन्द्रियों के चौंधिया जाने का कोई कारण नहीं था, क्योंकि वह ऐसे मुखौटों का कोई मूल्य नहीं समझता, और संसार की कोई भी ऊँचाई भविष्यद्वाणी के सत्य की गति को रोक नहीं सकती। संक्षेप में, यहाँ यिर्मयाह को स्थिर बने रहने के लिए प्रोत्साहित किया गया है, कहीं ऐसा न हो कि राजा का ऊँचा पद उसे डरा दे, या उसके मन को ऐसा निर्बल कर दे कि वह परमेश्वर की आज्ञाओं को विश्वासयोग्यता से प्रकट न करे।
इससे दो प्रकार की चेतावनी निकाली जा सकती है। पहली राजाओं से, और उनसे सम्बन्ध रखती है जो पृथ्वी पर धन या सामर्थ्य में बड़े हैं; उन्हें चेतावनी दी जाती है कि वे भक्तिभाव से परमेश्वर के वचन के अधीन हों, और यह न समझें कि अपनी प्रतिष्ठा के कारण वे उस बात से छूट गए हैं जो सब पर लागू है, या उससे मुक्त हैं, क्योंकि परमेश्वर किसी का पक्षपात नहीं करता। दूसरी चेतावनी शिक्षकों से सम्बन्ध रखती है, और वह यह है कि वे आँखें मूँदकर, बिना किसी का पक्षपात किए, वह सब करें जो परमेश्वर उन्हें आज्ञा देता है; और इस प्रकार वे न किसी ठोकर से डरें, न राजा के नाम से भी, न खिंची हुई तलवार से, न किसी संकट से।
पहले अपराध का उल्लेख किया गया है, तूने पुस्तक को यह कहकर जला दिया है, कि तूने उसमें क्यों लिखा, बाबुल का राजा निश्चय आएगा, और इस नगर को नष्ट करेगा। यहाँ परमेश्वर दिखाता है कि वह मुख्य कारण क्या था जिससे यहोयाकीम ने पुस्तक को आग में डाल दिया, अर्थात् यह कि वह उसमें लिखी हुई खुली डाँटों और धमकियों को सह नहीं सकता था। जब परमेश्वर कपटियों को छोड़ देता है, या उनके दुर्गुणों को नहीं छूता, तब वे भविष्यद्वाणी की शिक्षा को सह लेते हैं; परन्तु जब घाव को छुआ जाता है, तब वे तुरन्त क्रोधित हो उठते हैं; और यही वह निरन्तर संघर्ष था जो परमेश्वर के भविष्यद्वक्ताओं का दुष्टों के साथ रहा: क्योंकि यदि वे उनकी चापलूसी करते और उनसे चिकनी-चुपड़ी बातें कहते, यदि वे दुष्टों से सदा कुछ आनन्ददायक और समृद्धि की प्रतिज्ञा करते, तो वे बड़ी कृपा और प्रशंसा के साथ ग्रहण किए जाते; परन्तु परमेश्वर का वचन अप्रिय और कड़वा था; और जब वे सुनते थे कि परमेश्वर उनसे अप्रसन्न और क्रोधित है, तो उनके मन भड़क उठते थे।
सो इस अनुच्छेद पर सावधानी से ध्यान देना चाहिए; क्योंकि परमेश्वर का आत्मा मानो उँगली से सारे हठ के सोते की ओर संकेत करता है, अर्थात् यह कि कपटी लोग परमेश्वर से समझौता करना या उसके साथ वाचा बाँधना चाहते हैं कि वह उनके साथ कठोरता का व्यवहार न करे, और उसके भविष्यद्वक्ता केवल चिकनी बातें ही कहें। परन्तु यह आवश्यक है कि परमेश्वर का वचन अपने रचयिता के स्वभाव के अनुरूप हो। क्योंकि जैसे परमेश्वर मन को जानता है, वह भीतर के सबसे गुप्त कोनों तक पैठता है; और वैसे ही उसका वचन भी दोधारी तलवार है, और इस प्रकार वह मनुष्यों को गूदे तक छेदता है, और विचारों और भावनाओं को जाँचता है, जैसा प्रेरित हमें सिखाता है। (इब्रानियों 4:12) इसी कारण जब परमेश्वर कपटियों को न्याय के लिए बुलाता है, तब वे पागल हो उठते हैं। जब कोई फोड़ों से भरे हुए मनुष्य को कोमलता से छूता है, तब बेचैनी का कोई चिह्न प्रकट नहीं होता; परन्तु जब शल्य-चिकित्सक फोड़ों को दबाता है, तब वह चिढ़ जाता है, और तब वह भी बाहर आ जाता है जो पहले छिपा था। ऐसा ही हाल कपटियों का है; क्योंकि, जैसा कहा जा चुका है, जब केवल सीधा-सादा सत्य प्रकट किया जाता है, तब वे परमेश्वर के विरुद्ध चिल्लाते नहीं, न कोई शिकायत ही करते हैं; परन्तु जब उन पर डाँटों और धमकियों के साथ दबाव डाला जाता है, तब उनका क्रोध भड़क उठता है, तब वे हर प्रकार से अपना विष प्रकट करते हैं। और यही बात यहाँ प्रस्तुत की गई है, जब भविष्यद्वक्ता कहता है कि पुस्तक इसलिए जलाई गई, क्योंकि उसमें यह लिखा था कि बाबुल का राजा देश को नष्ट या उजाड़ करने, और उसमें से मनुष्य और पशु दोनों को मिटाने के लिए आएगा।
इसी प्रकार हम देखते हैं कि मीका की भविष्यद्वाणी ने सब यहूदियों को भड़का दिया, जब उसने कहा कि यरूशलेम पत्थरों के ढेर बन जाएगा। (मीका 3:12)
परन्तु भविष्यद्वक्ता तुरन्त दिखाता है कि जब दुष्ट पैने पर लात मारते हैं, तब वे व्यर्थ ही परमेश्वर का विरोध करते हैं; जिस पत्थर से वे लड़ते हैं उसी से उनका टुकड़े-टुकड़े होना अवश्य है, क्योंकि उनकी कठोरता परमेश्वर को अपने न्याय-दण्ड पूरे करने से रोक नहीं सकती। इसलिए आगे जोड़ा गया है, यहोवा राजा यहोयाकीम के विषय में यों कहता है, दाऊद की गद्दी पर उसका उत्तराधिकारी कोई न होगा। यह कहकर कि उसका कोई उत्तराधिकारी न होगा, उसका अर्थ यह है कि उसके अपने वंश में से कोई न होगा; क्योंकि यद्यपि उसका पुत्र यकोन्याह उसके स्थान पर राजा बनाया गया, तौभी चूँकि उसने केवल तीन महीने राज्य किया, इसलिए यह थोड़ा समय गिना नहीं गया। तब यिर्मयाह परमेश्वर की आज्ञा से घोषणा करता है कि राजा यहोयाकीम का कोई वैध उत्तराधिकारी न होगा, क्योंकि उसका पुत्र यकोन्याह तीन महीने के अन्त में बन्धुआई में ले जाया गया; और सिदकिय्याह को वैध उत्तराधिकारी नहीं गिना गया, क्योंकि वह चाचा था। और इसमें भी कोई सन्देह नहीं कि नबूकदनेस्सर ने द्वेष और घृणा के कारण उसे गद्दी पर बैठाया, क्योंकि उसने उसे इसलिए ऊँचा किया कि यहोयाकीम और यकोन्याह का अपमान करे।
सो अब हम समझते हैं कि परमेश्वर ने किस अर्थ में यह धमकी दी कि राजा यहोयाकीम का कोई उत्तराधिकारी न होगा; क्योंकि केवल यह नहीं कहा गया, “दाऊद की गद्दी पर बैठनेवाला कोई न होगा;” परन्तु यह, “उसका कोई न होगा,” {}לא{ }יהיה{ }לוla ieie lu, अर्थात्, “उसके बच्चों में से, या उसकी सन्तान में से कोई न होगा जो दाऊद की गद्दी पर उसका उत्तराधिकारी हो।” क्योंकि अन्तिम राजा सिदकिय्याह था, और वह, जैसा मैंने कहा, चाचा था; सो सारा राजवंश त्याग दिया गया, क्योंकि इस समय के बाद कोई भी कभी गद्दी पर नहीं बैठा।
परन्तु यह पूछा जा सकता है कि यह भविष्यद्वाणी उस प्रतिज्ञा से कैसे मेल खा सकती है कि दाऊद का वंश तब तक बना रहेगा जब तक सूर्य और चन्द्रमा आकाश में विश्वासयोग्य साक्षियों के रूप में चमकते रहेंगे? (भजन संहिता 89:37, 38) परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की थी कि दाऊद का राज्य सदा का होगा, और जब तक सूर्य और चन्द्रमा आकाश में चमकते रहेंगे, तब तक उसके वंश में से कोई न कोई राज्य करता रहेगा; परन्तु अब हमारे भविष्यद्वक्ता का क्या अर्थ है, जब वह कहता है कि कोई उत्तराधिकारी न होगा? निश्चय ही इसे यहोयाकीम के वंश तक सीमित रखना चाहिए; तौभी हमें वह बात स्मरण रखनी चाहिए जो हम अन्यत्र देख चुके हैं, अर्थात् यह कि वह यहाँ एक रुकावट की बात कर रहा है, जो सदाकालिकता के विरुद्ध नहीं है; क्योंकि दाऊद से की गई राज्य की सदाकालिकता की प्रतिज्ञा ऐसी थी कि वह राज्य कुछ समय के लिए गिरेगा और पाँवों तले रौंदा जाएगा, परन्तु अन्त में यिशै की जड़ से एक डाली निकलेगी, और मसीह, जो एकमात्र सच्चा और अनन्त दाऊद है, ऐसा राज्य करेगा कि उसके राज्य का अन्त न होगा। इसलिए जब भविष्यद्वक्ता कहते हैं कि दाऊद की गद्दी पर बैठनेवाला कोई न होगा, तो वे इसे अक्षरशः नहीं कहते, परन्तु वे इसके द्वारा केवल उस अस्थायी दण्ड की ओर संकेत करते हैं जिससे गद्दी ऐसी उलट दी गई कि अन्त में परमेश्वर अपने ठहराए हुए समय पर उसे फिर से स्थापित करे, जैसा आमोस कहता है, “क्योंकि वह समय आएगा जब परमेश्वर दाऊद की गिरी हुई झोंपड़ी को खड़ा करेगा।”
अब हम समझते हैं कि राज्य की सदाकालिकता के विषय की प्रतिज्ञा किस अर्थ में स्थिर रही, और फिर भी राज्य कुछ समय के लिए बन्द हो गया था, अर्थात् जब तक मसीह न आया, जिसके सिर पर मुकुट, अर्थात् राजकीय किरीट रखा गया, जैसा यहेजकेल कहता है। (यहेजकेल 21:26) तौभी इसमें कोई सन्देह नहीं कि यह बड़ी असंगति यिर्मयाह के विरुद्ध आपत्ति के रूप में उठाई गई: “क्या! क्या यह हो सकता है कि दाऊद की गद्दी बिना किसी वैध उत्तराधिकारी के रहे? क्या तू सूर्य और चन्द्रमा को आकाश से नीचे खींच सकता है?”
इसी प्रकार जब भविष्यद्वक्ताओं ने यरूशलेम के विनाश की बात की, तब लोग कहते थे: “क्या! क्या यह नहीं कहा गया, ‘यह युग युग के लिए मेरा विश्रामस्थान है; यहीं मैं रहूँगा?’ (भजन संहिता 132:14) क्या यह हो सकता है कि परमेश्वर पृथ्वी पर अपने निवासस्थान के बिना रहे, विशेषकर जब वह उसे अपना विश्रामस्थान कहता है?” परन्तु इन सब बातों का उत्तर कठिन न था, अर्थात् यह कि परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं के प्रति विश्वासयोग्य बना रहा, यद्यपि उसकी कृपा कुछ समय के लिए मानो बादल के नीचे छिपी रही, ताकि नगर और राज्य दोनों का भयानक उजाड़ सब के लिए एक उदाहरण ठहरे।
सो इसमें कोई सन्देह नहीं कि उन्होंने भविष्यद्वक्ता के सामने यह दिखाया कि राज्य छिपा रहेगा, मानो वह पृथ्वी में छिपाया हुआ धन हो, और फिर भी वह समय आएगा जब परमेश्वर नगर और राज्य दोनों को फिर से चुनेगा, और उन्हें उनकी पहली प्रतिष्ठा पर फिर स्थापित करेगा; ठीक वैसे ही जैसे पोप के अनुयायी कहते हैं, जो कलीसिया की सदा की रक्षा के विषय में पवित्रशास्त्र में कही गई हर बात पर बड़े ऊँचे शब्दों में घमण्ड करते हैं: “मसीह प्रतिज्ञा करता है कि वह जगत के अन्त तक अपने लोगों के साथ रहेगा, कि जहाँ दो या तीन उसके नाम से इकट्ठे होते हैं वहाँ वह होगा, कि कलीसिया सत्य का खम्भा और नींव है।” (मत्ती 28:20; 1 तीमुथियुस 3:15)
वे ये सब बातें इकट्ठी करके यह दिखाना चाहते हैं कि परमेश्वर मानो उनसे बँधा और जकड़ा हुआ है। परन्तु हम इन तुच्छ आपत्तियों को सहज ही उड़ा सकते हैं; क्योंकि परमेश्वर अद्भुत और अदृश्य रीति से संसार में अपनी कलीसिया की रक्षा करता है; और फिर कलीसिया का बाहरी रूप सदा दिखाई नहीं देता, परन्तु वह कभी-कभी छिपा रहता है, और बाद में उभर आता है और अपनी उस प्रतिष्ठा को फिर पा लेता है जो कुछ समय के लिए बुझी हुई जान पड़ती थी। इसलिए अब हम पोप के अनुयायियों को वही उत्तर देते हैं जो भविष्यद्वक्ताओं ने पूर्वकाल में प्राचीन प्रजा को दिया था, — कि परमेश्वर अपनी कलीसिया का विश्वासयोग्य रक्षक है, परन्तु शरीर की समझ के अनुसार नहीं, क्योंकि कलीसिया परमेश्वर के द्वारा अद्भुत रीति से सम्भाली जाती है, साधारण रीति से नहीं, या जैसा वे कहते हैं, वस्तुओं के सामान्य क्रम के अनुसार नहीं।
वह कहता है कि यहोयाकीम की लोथ बाहर फेंक दी जाएगी, कि रात को पाले में और दिन को धूप में पड़ी रहे। यह बात तुच्छ जान पड़ सकती है, उसके समान जिससे हम बच्चों को डराते हैं, जब हम उनसे किसी भूत-प्रेत की चर्चा करते हैं; क्योंकि यहोयाकीम की इसमें क्या हानि हो सकती थी कि उसकी लोथ रात को पाले में पड़ी रहे? क्योंकि मृत देह को कोई चोट या दुःख का अनुभव नहीं हो सकता, इसलिए कि मरा हुआ मनुष्य अपनी देह के विषय में कुछ भी अनुभव नहीं कर सकता। सो ऐसा जान पड़ता है कि भविष्यद्वक्ता का यह कहना कुछ विशेष प्रयोजन का नहीं कि उसकी लोथ दिन को धूप में और रात को पाले में पड़ी रहेगी। परन्तु इसे प्रकृति की उस सामान्य व्यवस्था से जोड़ना चाहिए, जिसकी चर्चा हम अन्यत्र कर चुके हैं; क्योंकि जब हम मनुष्यों को बिना गाड़े पड़े देखते हैं, तो यह दुःखद और लज्जाजनक बात, वरन् भयानक दृश्य होता है; और मृतकों को गाड़ने का कर्तव्य आरम्भ ही से माना गया है, और गाड़ा जाना आनेवाले पुनरुत्थान का प्रमाण है, जैसा पहले कहा जा चुका है। इसलिए जब मनुष्य की देह बिना गाड़े पड़ी रहती है, तब सब मनुष्य उस दृश्य से कतराते और डरते हैं; और फिर जब देह ठण्ड से अकड़ जाती है, और दिन की गरमी से सड़ जाती है, तब अपमान और भी बड़ा हो जाता है। सो परमेश्वर उस अपमान को प्रकट करना चाहता था जो यहोयाकीम की बाट जोह रहा था; इसलिए नहीं कि जब उसकी देह बाहर फेंकी गई और गाड़े जाने का आदर उसे न मिला, तब उसकी कोई हानि हो सकती थी, परन्तु इसलिए कि जब एक राजा इस प्रकार गदहे या कुत्ते के समान बाहर फेंका गया, तो यह परमेश्वर के पलटा लेने का प्रमाण होगा, जैसा हम अन्यत्र देख चुके हैं, “उसको गदहे के समान मिट्टी दी जाएगी,” अर्थात् वह साधारण आदर के भी अयोग्य समझा जाएगा; क्योंकि जब मनुष्यों में से सबसे नीच लोगों को भी एक गड्ढा मिल जाता है जिसमें उनकी देह गाड़ी पड़ी रहे, तो यह परमेश्वर के पलटा लेने का एक विरला और असाधारण प्रमाण था कि एक राजा पक्षियों और जंगली पशुओं के आहार के लिए खुला छोड़ दिया जाए। हम जानते हैं कि येहू ने ईज़ेबेल के विषय में क्या कहा, “उसे मिट्टी दो, क्योंकि वह राजा की बेटी है।” (2 राजाओं 9:34)
वह सौ बार टुकड़े-टुकड़े किए जाने के योग्य थी। उसे एक कोठरी से नीचे फेंका गया था, और कुत्तों ने उसका लहू चाटा; तौभी एक शत्रु ने उसे गाड़ने की आज्ञा दी — और क्यों? क्योंकि वह राजा की बेटी थी, अर्थात् राजकुल में उत्पन्न हुई थी, (1 राजाओं 21:23:) इसलिए उसने कहा, उसे मिट्टी दो।
सो अब हम भविष्यद्वक्ता का, या यों कहें कि पवित्र आत्मा का, अभिप्राय समझते हैं, कि यह परमेश्वर के पलटा लेने का एक उल्लेखनीय प्रमाण होगा, जब राजा यहोयाकीम की देह रात को पाले में और दिन को धूप में पड़ी रहेगी। जैसा हम पहले कह चुके हैं, कभी-कभी पवित्र लोगों के साथ भी ऐसा हुआ है; परन्तु वह एक लौकिक दण्ड था जो भले और बुरे दोनों पर समान रूप से आता है। तौभी हमें उसे सदा परमेश्वर का न्याय ही समझना चाहिए। जब कोई भक्त मनुष्य बिना गाड़े छोड़ दिया जाता है, तो हमें जानना चाहिए कि परमेश्वर की सन्तानों के लिए सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं, जैसा पौलुस कहता है, चाहे जीवन हो या मृत्यु, वह उनके उद्धार ही के लिए है। (रोमियों 8:28) परन्तु जब परमेश्वर किसी दुष्ट मनुष्य के विरुद्ध अपने क्रोध का उल्लेखनीय प्रमाण देता है, तब हमारी आँखें खुल जानी चाहिए; क्योंकि परमेश्वर के प्रत्यक्ष न्याय-दण्डों की ओर से अन्धे बने रहना उचित नहीं; क्योंकि पौलुस व्यर्थ ही हमें यह स्मरण नहीं दिलाता कि परमेश्वर का न्याय दुष्टों पर आएगा; परन्तु वह चाहता है कि हम सावधानी से विचार करें कि परमेश्वर त्यागे हुए लोगों को जीवन में और मृत्यु में और मृत्यु के बाद भी कैसे दण्ड देता है। आगे लिखा है —
यिर्मयाह 36:31
31. मैं उसको और उसके वंश और कर्मचारियों को उनके अधर्म का दण्ड दूँगा; और जितनी विपत्ति मैंने उन पर और यरूशलेम के निवासियों और यहूदा के सब लोगों पर डालने को कहा है, और जिसको उन्होंने सच नहीं माना, उन सब को मैं उन पर डालूँगा।
31. Et visitabo super eum et super semen ejus, et super servos ejus iniquitatem eormn, et evenire faciam illis (super eos, ad verbum) et super habitatores Jerusalem, et super virum Jehudab omne malum quod pronuntiavi adversus cos, et non a udierunt.
यहाँ पिछले पद में कही गई बात का कारण दिया गया है; क्योंकि यदि भविष्यद्वक्ता ने केवल इतना ही कहा होता कि राजा की लोथ बिना गाड़े अनादर के साथ बाहर फेंकी हुई पड़ी रहेगी, कि रात को पाले में और दिन को धूप में पड़ी रहे, तो उस वर्णन का अभिप्रेत प्रभाव न पड़ता; परन्तु परमेश्वर यहाँ उसका कारण दिखाता है, जो यह था कि उसने राजा यहोयाकीम को और उसके सब मन्त्रियों को (जिन्हें यहाँ कर्मचारी कहा गया है) और यरूशलेम के निवासियों को, और सारे यहूदियों को पहले ही से चेतावनी दे दी थी: सो जबकि उन्हें ठीक समय पर स्पष्ट रूप से बता दिया गया था कि कैसी विपत्ति निकट आ पहुँची है, और फिर भी किसी ने पश्चाताप नहीं किया था, इसलिए ऐसे बड़े हठ के कारण परमेश्वर अब कहता है कि वह पलटा लेगा, मैं उसको और उसके वंश को और सारी प्रजा को उनके अधर्म का दण्ड दूँगा — वह अधर्म क्या था? यही कि उन्होंने इतनी गम्भीरता से और इतनी रीतियों से परमेश्वर को क्रोध दिलाया था, और भविष्यद्वक्ता के डाँटने पर भी सुबुद्धि की ओर नहीं लौटे थे, परन्तु और भी अधिक कठोर होते गए थे।
भविष्यद्वक्ता उनके अधर्म की चरम सीमा को इस प्रकार दिखाता है, कि उन्होंने उन धमकियों को नहीं सुना जिनके द्वारा परमेश्वर ने उन्हें आनेवाले विनाश से बचाने का प्रयत्न किया था: क्योंकि यदि वे परमेश्वर के क्रोध को टालने के लिए विनती करते, तो छुटकारे की कुछ आशा होती; परन्तु चूँकि उसकी धमकियाँ तुच्छ जानी गई थीं, इसलिए, जैसा मैंने कहा, यह चरम अधर्म था। और हम अन्यत्र देखते हैं कि परमेश्वर मनुष्यों की इस शैतानी ढिठाई से कितनी घृणा करता है, “मैंने टाट ओढ़ने और राख लगाने को बुलाया था; परन्तु तुमने वीणा और आनन्द को बुलाया, और कहा, ‘आओ खाएँ-पीएँ, क्योंकि कल तो मरना ही है:’ मेरे जीवन की शपथ, यह अधर्म मिटाया न जाएगा।” (यशायाह 22:12, 13)
परमेश्वर ने अपनी ही शपथ खाई कि इस पाप का प्रायश्चित न होगा, क्योंकि जब उसने कृपापूर्वक यहूदियों को अपने पास बुलाया, और उनसे यह प्रकट किया कि वे चरम दण्ड से बच नहीं सकते, तब भी उन्होंने पश्चाताप नहीं किया। इसलिए कोई अचम्भे की बात नहीं कि इस स्थान में भी परमेश्वर उनकी हठीली दुष्टता को सबसे बड़ी बताता है, क्योंकि यहूदियों ने उन डाँटों को नहीं सुना जो यिर्मयाह के मुख से उन तक पहुँचाई गई थीं। आगे लिखा है —
यिर्मयाह 36:32
32. तब यिर्मयाह ने दूसरी पुस्तक लेकर नेरिय्याह के पुत्र बारूक लेखक को दी, और जो पुस्तक यहूदा के राजा यहोयाकीम ने आग में जला दी थी, उसमें के सब वचनों को बारूक ने यिर्मयाह के मुख से सुन सुनकर उसमें लिख दिए; और उन वचनों में उनके समान और भी बहुत सी बातें बढ़ा दी गईं।
32. Et (tunc) Jeremias scripsit volumen aliud, et dedit Baruch filio Neriae, qui scripsit in ipso ex ore Jeremiae cunctos sermones libri, quem combusserat Joiakim rex Jehudah igne, et adhuc additi sunt cum illis sermones multi similes illis.
यहाँ भविष्यद्वक्ता हमें बताता है कि उसने दूसरी पुस्तक लिखने में विश्वासयोग्यता से परमेश्वर की आज्ञा मानी; और इस मामले में उसकी स्थिरता असाधारण प्रशंसा के योग्य है; क्योंकि वह अभी हाल ही में डर के मारे भागा था, वह जानता था कि राजा उसका शत्रु है, क्योंकि उसने पहले ही उसे और बारूक को मार डालने की आज्ञा दे दी थी। सो जब वह जानता था कि राजा इतने क्रोध और घृणा से जल रहा है, तो उसे और भी भड़काने का साहस उसमें कैसे आया? परन्तु हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता भय के प्रभाव से मुक्त न थे, और अक्सर अपनी सुरक्षा के विषय में चिन्तित रहते थे; और फिर भी उन्होंने परमेश्वर के द्वारा अपने ऊपर रखे गए कर्तव्य को सदा अपने प्राण से बढ़कर माना। निःसन्देह भविष्यद्वक्ता काँपा, परन्तु चूँकि वह अपने को परमेश्वर की आज्ञा मानने के लिए बँधा हुआ समझता था, इसलिए जब उसे यह चुनना पड़ा कि वह अपने ऊपर रखे गए भार को अस्वीकार करे, या अपनी सुरक्षा का प्रबन्ध करे, तब उसने अपने प्राण की चिन्ता न की। सो इस प्रकार उसने अपने प्राण को बलिदान के रूप में अर्पित कर दिया, यद्यपि वह भय और अन्य निर्बलताओं से मुक्त न था। यह एक बात है।
परन्तु मुझे सन्देह नहीं कि बारूक ने इन वचनों को फिर से प्रचार किया; तो फिर राजा क्रूरता से कैसे रुका रहा? क्या उसका पागलपन किसी प्रकार कम हो गया था? यह निश्चित है कि वह बदला नहीं, और उसने दया के कारण परमेश्वर के सेवकों को नहीं छोड़ा; परन्तु परमेश्वर ने उसकी क्रूरता को रोक रखा; क्योंकि जब दुष्टों के मनों को कोमल करना उसकी इच्छा नहीं होती, तब भी वह उनके उत्पात पर लगाम लगाता है, कि वे जो कुछ अपने मन में ठान चुके हैं उसे अपने हाथों से पूरा करने का या तो साहस नहीं करते, या उसका मार्ग नहीं पाते, चाहे वे इसके लिए कितना ही प्रयत्न क्यों न करें। इसलिए मैं समझता हूँ कि राजा यहोयाकीम परमेश्वर की गुप्त सामर्थ्य से रोका गया, जिससे वह यिर्मयाह और उसके लेखक बारूक की कुछ हानि न कर सका; और इस बीच भविष्यद्वक्ता का और उसके लेखक का भी साहस अजेय बना रहा; क्योंकि परमेश्वर की इच्छा थी कि वह इस अभक्त राजा से मानो आमने-सामने लड़े, जब तक कि वह अपमान के साथ अपनी गद्दी से गिरा न दिया जाए, जो, जैसा हम देखेंगे, शीघ्र ही हुआ।
प्रार्थना
हे सर्वसामर्थी परमेश्वर, ऐसा अनुग्रह कर कि चूँकि तू ऐसे उल्लेखनीय उदाहरणों के द्वारा हमें चेतावनी देता है कि दुष्ट लोग हठपूर्वक तेरा विरोध करके केवल अपने ही विनाश को और भारी बनाते हैं, — हाँ, ऐसा अनुग्रह कर कि हम तेरे भविष्यद्वक्ताओं की चेतावनियों को नम्र हृदय से ग्रहण करें, और तेरे अधीन हों, और तेरी धमकियों से ऐसे दीन किए जाएँ और तेरे वचन से ऐसे काँपें कि सच्चे पश्चाताप की भावना से छुए जाकर, और विश्वास के द्वारा तुझसे मेल-मिलाप पाकर, हम तुझे आज्ञाकारी सन्तानों के लिए सबसे उत्तम और सबसे दयालु पिता पाएँ, जब तक कि हम अन्त में उस अनन्त मीरास का आनन्द न लें जो तेरे एकलौते पुत्र के लहू के द्वारा हमारे लिए प्राप्त की गई है। — आमीन।
