यिर्मयाह और विलापगीत पर टीका · खण्ड 2 · विलापगीत का कैल्विन-कृत अनुवाद

विलापगीत का कैल्विन-कृत अनुवाद

यह हिन्दी संस्करण UECF.NET के लिए AI-सहायता से किए गए पूर्ण अनुवाद और सम्पादकीय गुणवत्ता-समीक्षा के द्वारा तैयार किया गया है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

विलापगीत का कैल्विन-कृत अनुवाद

अनुवाद: विलापगीत

1 जो नगरी लोगों से भरपूर थी वह कैसी अकेली बैठी है! वह कैसी विधवा के समान हो गई है, जो जातियों में महान थी! जो प्रान्तों पर राज्य करती थी, वह कर देनेवाली हो गई है!

2 रात को वह फूट फूटकर रोती है, और उसके आँसू उसके गालों पर ढलते हैं; उसके सब प्रेमियों में से उसे शान्ति देनेवाला कोई नहीं रहा; उसके सब मित्रों ने उससे विश्वासघात किया है, वे उसके शत्रु बन गए हैं।

3 यहूदा दुःख और बड़ी दासता के कारण देश छोड़कर चली गई है; वह जातियों के बीच रहती है, उसे कहीं विश्राम नहीं मिलता; जितनों ने उसका पीछा किया, उन्होंने उसे सकेत स्थानों के बीच जा पकड़ा है।

4 सिय्योन के मार्ग विलाप करते हैं, क्योंकि पर्वों में कोई नहीं आता; उसके सब फाटक सुनसान पड़े हैं, उसके याजक कराहते हैं; उसकी कुमारियाँ दुःखित हैं, और वह स्वयं कड़वाहट में है!

5 उसके द्रोही प्रधान हो गए हैं, उसके शत्रु सफल हुए हैं; क्योंकि यहोवा ने उसके अधर्म के कामों की बहुतायत के कारण उसे दुःख दिया है: उसके बाल-बच्चे द्रोही के सामने बंधुआई में चले गए हैं; 6 और सिय्योन की बेटी का सारा प्रताप उससे जाता रहा है; उसके हाकिम ऐसे हरिणों के समान हो गए हैं जिन्हें कोई चरागाह नहीं मिलती; और वे बलहीन होकर अपने खदेड़नेवाले के आगे से चले गए हैं।

7 यरूशलेम ने अपने दुःख और दरिद्रता के दिनों में अपनी उन सब मनभावनी वस्तुओं को स्मरण किया, जो प्राचीनकाल से उसकी थीं; जब उसके लोग शत्रु के हाथ में पड़ गए, और उसका कोई सहायक न रहा: तब शत्रुओं ने उसे देखा, और उसके विश्रामदिनों पर हँसे।

8 यरूशलेम ने बड़ा पाप किया है, इस कारण वह मारी-मारी फिरनेवाली हो गई है; जितने उसका आदर करते थे वे सब उसे तुच्छ जानते हैं, क्योंकि उन्होंने उसका नंगापन देखा है; वह स्वयं भी कराहती है, और मुँह फेरकर पीछे हट गई है: 9 उसकी अशुद्धता उसके वस्त्र के छोर पर है; उसने अपने अन्त का स्मरण न किया; इस कारण वह अद्भुत रीति से गिराई गई है, उसे शान्ति देनेवाला कोई नहीं: हे यहोवा, मेरे दुःख पर दृष्टि कर, क्योंकि शत्रु ने अपने को बढ़ाया है।

10 शत्रु ने उसकी सब मनभावनी वस्तुओं पर हाथ बढ़ाया है; क्योंकि उसने अन्यजातियों को अपने पवित्रस्थान में घुसते देखा है, जिनके विषय में तू ने आज्ञा दी थी कि वे तेरी सभा में प्रवेश न करने पाएँ।

11 उसके सब लोग कराहते हुए भोजन-वस्तु ढूँढ़ रहे हैं; उन्होंने प्राण बचाने के लिए अपनी मनभावनी वस्तुएँ भोजन के बदले दे दी हैं: हे यहोवा, दृष्टि कर, और ध्यान से देख, क्योंकि मैं तुच्छ हो गई हूँ।

12 हे सब बटोहियो, क्या तुम्हें इससे कुछ भी नहीं? दृष्टि करके देखो, क्या मेरे दुःख के समान कोई और दुःख है जो मुझ पर आ पड़ा है; क्योंकि यहोवा ने अपने भड़के हुए कोप के दिन मुझे दुःख दिया है।

13 उसने ऊपर से मेरी हड्डियों में आग भेजी है, और वह उन पर प्रबल हुई है: उसने मेरे पैरों के लिए जाल बिछाया है, उसने मुझे उलटा फेर दिया है; उसने मुझे उजाड़ दिया है, और मैं दिन भर शोकित रहती हूँ।

14 मेरे अधर्म के कामों का जूआ उसके हाथ से बाँधा गया है, वे आपस में बटकर गूँथे गए हैं: वे मेरी गर्दन पर चढ़ गए हैं, उसने मेरा बल घटा दिया है: प्रभु ने मुझे मेरे शत्रुओं के हाथ में सौंप दिया है, जिनके सामने से मैं उठ न सकूँगी।

15 प्रभु ने मेरे बीच में मेरे सब पराक्रमी पुरुषों को पाँवों तले रौंद डाला है: उसने मेरे जवानों को नष्ट करने के लिए मुझ पर नियत समय ले आया है; प्रभु ने यहूदा की कुमारी बेटी को मानो कोल्हू में रौंद डाला है।

16 इसी कारण मैं रोती हूँ; मेरी आँख, मेरी आँख! उससे जल बहता रहता है; क्योंकि जो शान्ति देनेवाला मेरे प्राण को फिर से जिला सकता, वह मुझसे दूर हो गया है; मेरे बच्चे उजड़ गए हैं, क्योंकि शत्रु प्रबल हुआ है।

17 सिय्योन ने अपने हाथ फैलाए हैं, उसे शान्ति देनेवाला कोई नहीं; यहोवा ने याकूब के विषय में उसके चारों ओर के द्रोहियों को आज्ञा दी है; यरूशलेम उनके बीच घृणित वस्तु बन गई है।

18 यहोवा धर्मी है, क्योंकि मैंने उसके मुँह की आज्ञा के विरुद्ध उसे क्रोध दिलाया है; हे सब लोगो, सुनो, और मेरी पीड़ा को देखो: मेरी कुमारियाँ और मेरे जवान बंधुआई में चले गए हैं।

19 मैंने अपने मित्रों को पुकारा, परन्तु उन्होंने मुझे धोखा दिया; मेरे याजक और मेरे पुरनिये नगर ही में प्राण छोड़ गए, जब वे अपने प्राण को फिर से जिलाने के लिए अपने लिए भोजन ढूँढ़ रहे थे।

20 हे यहोवा, देख, क्योंकि मैं संकट में हूँ, मेरी अन्तड़ियाँ ऐंठी जाती हैं; मेरा हृदय भीतर ही भीतर उलट गया है, क्योंकि मैंने बहुत बलवा किया है: बाहर तो तलवार निर्वंश करती है, और भीतर मानो मृत्यु है। 21 उन्होंने सुना है कि मैं कराहती हूँ, और मुझे शान्ति देनेवाला कोई नहीं; मेरे सब शत्रुओं ने मेरी विपत्ति का समाचार सुना है; वे आनन्दित हैं कि तू ही ने यह किया है, और वह दिन ले आया है जिसका तू ने प्रचार किया था: परन्तु वे भी मेरे ही समान हो जाएँगे।

22 उनकी सारी दुष्टता तेरे सम्मुख आए; और जैसा तू ने मेरे सब पापों के कारण मुझसे किया है, वैसा ही उनसे भी कर; क्योंकि मेरी आहें बहुत हैं, और मेरा हृदय निर्बल है।

अनुवाद: विलापगीत 2

1 प्रभु ने अपने कोप में सिय्योन की बेटी को कैसा बादलों से ढाँप दिया है! उसने इस्राएल की शोभा को आकाश से पृथ्वी पर पटक दिया है; और अपने कोप के दिन अपने पाँवों की चौकी को स्मरण नहीं किया!

2 प्रभु ने याकूब के सब निवासों को नष्ट किया है, और कुछ भी तरस नहीं खाया; उसने रोष में आकर यहूदा की बेटी के गढ़ों को ढा दिया है; उसने उन्हें भूमि पर गिरा दिया है, उसने उसके राज्य और उसके हाकिमों को अपवित्र ठहराया है।

3 उसने अपने भड़के हुए कोप में इस्राएल के सब सींगों को काट डाला है; उसने शत्रु के सामने से अपना दाहिना हाथ खींच लिया है; और उसने याकूब में आग के समान जलकर चारों ओर सब कुछ भस्म कर दिया है।

4 उसने शत्रु के समान अपना धनुष चढ़ाया है, उसका दाहिना हाथ द्रोही के समान खड़ा हुआ, और उसने सिय्योन की बेटी के तम्बू में आँखों को भानेवाली सब वस्तुओं को घात किया है; उसने अपनी जलजलाहट आग के समान उण्डेल दी है।

5 प्रभु शत्रु के समान हो गया है, उसने इस्राएल को नष्ट किया है; उसने उसके सब भवनों को नष्ट किया है, उसके गढ़ों को ढा दिया है; और यहूदा की बेटी में शोक और विलाप बहुत बढ़ा दिया है: 6 और उसने अपना तम्बू बारी के समान हटा दिया है; उसने अपनी साक्षी को नष्ट किया है; यहोवा ने सिय्योन में सभा और विश्रामदिन दोनों को भुला दिया है; और अपने भड़के हुए कोप में राजा और याजक दोनों को ठुकरा दिया है: 7 यहोवा ने अपनी वेदी से घृणा की है, उसने अपने पवित्रस्थान को त्याग दिया है; उसने उसके भवनों की दीवारों को शत्रु के हाथ में सौंप दिया है: उन्होंने यहोवा के भवन में ऐसा कोलाहल किया, मानो सभा के दिन हो।

8 यहोवा ने सिय्योन की बेटी की शहरपनाह को नष्ट करने की ठान ली; उसने डोरी डाली, उसने बिखराने से अपना हाथ नहीं खींचा; इस कारण किला और शहरपनाह दोनों विलाप करते हैं, वे एक साथ गिर पड़े हैं।

9 उसके फाटक भूमि में धँस गए हैं; उसने उसके बेंड़ों को नष्ट करके तोड़ डाला है; उसका राजा और उसके हाकिम अन्यजातियों के बीच हैं; व्यवस्था नहीं रही, और उसके भविष्यद्वक्ताओं को यहोवा की ओर से कोई दर्शन नहीं मिलता:

10 सिय्योन की बेटी के पुरनिये भूमि पर बैठे हैं, वे चुप हैं; उन्होंने अपने सिर पर धूल डाली है, उन्होंने टाट की कमर बाँधी है; यरूशलेम की कुमारियाँ अपना सिर भूमि तक झुकाए हुए हैं।

11 मेरी आँखें आँसुओं से धुँधली हो गईं, मेरी अन्तड़ियाँ ऐंठ गईं; मेरे लोगों की बेटी के विनाश के कारण मेरा कलेजा भूमि पर उण्डेला गया; जब बच्चे और दूधपीते बालक नगर के चौकों में मूर्छित हो गए।

12 वे अपनी माताओं से कहते हैं, “अन्न और दाखमधु कहाँ है?” जब वे नगर के चौकों में घायल मनुष्य के समान मूर्छित होते हैं, और जब वे अपनी माताओं की गोद में अपना प्राण उण्डेल देते हैं।

13 मैं तुझे क्या साक्षी दूँ? हे यरूशलेम की बेटी, मैं तेरी उपमा किससे दूँ? हे सिय्योन की कुमारी बेटी, मैं किस वस्तु से तेरी तुलना करके तुझे शान्ति दूँ?

क्योंकि तेरा घाव समुद्र के समान बड़ा है; तुझे कौन चंगा कर सकता है?

14 तेरे भविष्यद्वक्ताओं ने तेरे लिए व्यर्थ और फीकी बातें देखी हैं; और उन्होंने तेरा अधर्म तुझ पर प्रगट नहीं किया, जिससे वे तेरी बंधुआई को लौटा देते; परन्तु उन्होंने तेरे लिए व्यर्थ भविष्यद्वाणियाँ और निकाले जाने की बातें देखी हैं।

15 सब बटोही तुझ पर तालियाँ बजाते हैं; वे यरूशलेम की बेटी पर ताली बजाते और सिर हिलाते हुए कहते हैं, “क्या यह वही नगरी है जिसे वे परम सुन्दर और सारी पृथ्वी का आनन्द कहते थे?”

16 तेरे सब शत्रुओं ने तुझ पर अपना मुँह खोला है; वे ताली बजाते और दाँत पीसते हुए कहते हैं, “हम उसे निगल जाएँगे! निश्चय जिस दिन की बाट हम जोहते थे, वह हमें मिल गया है, हमने उसे देख लिया है।”

17 यहोवा ने जो ठाना था वही किया है; उसने अपना वह वचन पूरा किया है जिसकी आज्ञा उसने प्राचीनकाल से दी थी; उसने तुझे ढा दिया है और तरस नहीं खाया; और उसने शत्रु को तुझ पर आनन्दित किया है, और तेरे द्रोहियों के सींग को ऊँचा किया है।

18 उनका हृदय प्रभु की दोहाई देता है: हे सिय्योन की बेटी की शहरपनाह, दिन और रात नदी के समान आँसू बहाती रह; अपने को विश्राम न दे, तेरी आँख की पुतली थमने न पाए।

19 उठ, रात के पहरों के आरम्भ में चिल्ला; अपने मन की बातों को प्रभु के सम्मुख जल के समान उण्डेल; अपने बाल-बच्चों के प्राण के लिए, जो सब सड़कों के सिरे पर भूख के कारण मूर्छित हो रहे हैं, उसकी ओर अपने हाथ उठा।

20 हे यहोवा, दृष्टि करके देख, कि तू ने यह किसके साथ किया है: क्या स्त्रियाँ अपना फल, अर्थात् गोद में खिलाए हुए बच्चों को खा जाएँ? क्या याजक और भविष्यद्वक्ता प्रभु के पवित्रस्थान में घात किए जाएँ?

21 सड़कों में लड़के और बूढ़े दोनों भूमि पर पड़े हैं; मेरी कुमारियाँ और मेरे जवान तलवार से गिर गए हैं: तू ने अपने कोप के दिन उन्हें घात किया है, तू ने उनका वध किया और तरस नहीं खाया।

22 तू ने मानो पर्व के दिन के लिए चारों ओर से मेरे भय के कारणों को बुला लिया है; और यहोवा के रोष के दिन न कोई बच निकला और न कोई बचा रहा; जिनको मैंने गोद में खिलाया और पाल-पोसकर बड़ा किया, उन्हें शत्रु ने नष्ट कर डाला।

अनुवाद: विलापगीत 3

1 मैं वह पुरुष हूँ जिसने उसके रोष की छड़ी से दुःख देखा है।

2 उसने मुझे ले जाकर उजियाले में नहीं, अन्धियारे ही में चलाया है।

3 निश्चय वह मेरे ही विरुद्ध फिरा है, वह दिन भर अपना हाथ मुझ पर फेरता है।

4 उसने मेरा मांस और मेरा चमड़ा बूढ़ा कर दिया है, उसने मेरी हड्डियों को तोड़ दिया है।

5 उसने मेरे विरुद्ध गढ़ बाँधा है, और मुझे कड़वाहट और कष्ट से घेर लिया है।

6 उसने मुझे बहुत काल के मरे हुए लोगों के समान अन्धेरे स्थानों में बसा दिया है।

7 उसने मुझे घेर रखा है कि मैं निकल नहीं सकता; उसने मेरी बेड़ी भारी कर दी है।

8 मैं चिल्ला चिल्लाकर दोहाई देता हूँ, तौभी वह मेरी प्रार्थना को रोक देता है।

9 उसने मेरे मार्गों को गढ़े हुए पत्थरों से घेर दिया है, उसने मेरी डगरों को टेढ़ा कर दिया है।

10 वह मेरे लिए घात में बैठे हुए भालू, और अपनी माँद में छिपे हुए सिंह के समान हुआ है।

11 उसने मेरे मार्गों को टेढ़ा कर दिया, और मुझे फाड़ डाला है; उसने मुझे उजाड़ दिया है।

12 उसने अपना धनुष चढ़ाकर मुझे तीर का निशाना बनाया है।

13 उसने अपने तरकश के पुत्रों को, अर्थात् तीरों को, मेरे गुर्दों में बेध दिया है।

14 मैं अपने सब लोगों के लिए हँसी का कारण, और दिन भर उनका गीत बना हूँ।

15 उसने मुझे कड़वाहट से तृप्त किया है, उसने मुझे नागदौना से भर दिया है।

16 उसने कंकरों से मेरे दाँत तोड़ डाले हैं, उसने मुझे धूल से ढाँप दिया है; 17 और मेरा प्राण शान्ति से बहुत दूर हो गया है; मैं भलाई को भूल गया हूँ।

18 और मैंने कहा, “मेरा बल और यहोवा की ओर से मेरी आशा जाती रही है;”

19 जब मैं अपने दुःख और कष्ट को, विष और नागदौने को स्मरण करता हूँ: 20 मेरा प्राण निरन्तर उन्हें स्मरण करता रहता है, और वह मेरे भीतर झुका जाता है।

21 परन्तु मैं यह बात अपने मन में फिर लाऊँगा, इसलिए मैं आशा रखूँगा।

22 यहोवा की करुणा! निश्चय वह समाप्त नहीं हुई; निश्चय उसकी दया का अन्त नहीं हुआ; 23 वह प्रति भोर नई होती रहती है; तेरी सच्चाई महान है।

24 मेरे मन ने कहा, यहोवा मेरा भाग है, इस कारण मैं उसमें आशा रखूँगा।

25 जो यहोवा की बाट जोहता है, और जो प्राणी उसको ढूँढ़ता है, उसके लिए यहोवा भला है;

26 यहोवा के उद्धार के विषय में आशा रखना और चुपचाप रहना भला है; 27 पुरुष के लिए अपनी जवानी में जूआ उठाना भला है: 28 वह अकेला बैठकर चुपचाप रहेगा, क्योंकि वह उसे अपने ऊपर उठा लेगा; 29 वह अपना मुँह धूल में रखेगा, कि कदाचित् आशा हो; 30 वह अपना गाल मारनेवाले की ओर फेर देगा, वह निन्दा सहते सहते भर जाएगा।

31 क्योंकि प्रभु सदा के लिए नहीं त्यागेगा; 32 क्योंकि चाहे वह दुःख भी दे, तौभी अपनी करुणा की बहुतायत के अनुसार वह दया भी करेगा; 33 क्योंकि वह मनुष्यों को अपने मन से न दुःख देता है और न शोकित करता है।

34 जब कोई पृथ्वी भर के सब बन्दियों को अपने पाँवों के तले कुचल डालता है, —

35 जब वह परमप्रधान के सम्मुख किसी मनुष्य का न्याय बिगाड़ता है, —

36 जब वह किसी मनुष्य का मुकद्दमा उलट देता है, — तब क्या प्रभु यह नहीं देखता?

37 वह कौन है जो कहता है, “ऐसा हुआ, और परमेश्वर ने इसकी आज्ञा नहीं दी”?

38 क्या परमप्रधान के मुख से विपत्ति और भलाई दोनों नहीं निकलतीं?

39 जीवित मनुष्य, हाँ, वह मनुष्य जो अपने पापों में है, क्यों कुड़कुड़ाकर अपने को थकाए?

40 आओ, हम अपने चालचलन को परखें और जाँचें, और यहोवा की ओर फिरें; 41 आओ, हम स्वर्ग में रहनेवाले परमेश्वर की ओर अपने हाथों के साथ अपना मन भी उठाएँ।

42 हमने पाप किया और बलवा किया है, तू ने हमें क्षमा नहीं किया; 43 तू ने कोप में आकर हमें ढाँप लिया और हमारा पीछा किया है, तू ने घात किया और तरस नहीं खाया।

44 तू ने अपने को बादल से ढाँप लिया है, कि प्रार्थना उसके पार न पहुँच सके।

45 तू ने हमें जातियों के बीच कूड़ा-करकट और मैल सा बना दिया है; 46 हमारे सब शत्रुओं ने हम पर अपना मुँह खोला है; 47 भय और गड्ढा, उजाड़ और विनाश हम पर आ पड़े हैं।

48 मेरे लोगों की बेटी के विनाश के कारण मेरी आँखों से जल की धाराएँ बह रही हैं।

49 मेरी आँख से लगातार आँसू बहते रहेंगे और वह थमेगी नहीं; उसे कोई विराम न मिलेगा, 50 जब तक यहोवा स्वर्ग से नीचे दृष्टि करके न देखे।

51 मेरे नगर की सब बेटियों के कारण मेरी आँख मेरे प्राण को दुःख देती है।

52 जो अकारण मेरे शत्रु हैं, उन्होंने चिड़िया के समान मेरा अहेर किया है; 53 उन्होंने मेरे जीवन को गड्ढे में बन्द कर दिया है, और मुझ पर पत्थर डाल दिया है; 54 मेरे सिर पर से जल बह गया; मैंने कहा, मैं नाश हो गया।

55 हे यहोवा, मैंने गहिरे गड्ढे में से तेरे नाम की दोहाई दी: 56 तू ने मेरा शब्द सुना है; मेरी आह और मेरी दोहाई से अपना कान न मूँद।

57 जिस दिन मैंने तुझे पुकारा, उस दिन तू मेरे निकट आया, तू ने कहा, “मत डर।”

58 हे प्रभु, तू ने मेरे प्राण का मुकद्दमा लड़ा है, तू ने मेरा जीवन छुड़ा लिया है।

59 हे यहोवा, तू ने मुझ पर हुआ अन्धेर देखा है; तू मेरा न्याय चुका।

60 तू ने उनका सारा पलटा लेना, और मेरे विरुद्ध उनकी सब युक्तियाँ देखी हैं।

61 हे यहोवा, तू ने उनकी नामधराई, और मेरे विरुद्ध उनकी सब युक्तियाँ सुनी हैं, —

62 अर्थात् मेरे विरुद्ध उठनेवालों की बातें, और दिन भर मेरे विरुद्ध उनकी कही हुई बातें।

63 उनका उठना-बैठना देख; मैं उनका गीत बना हूँ।

64 हे यहोवा, उनके हाथों के काम के अनुसार उनको बदला दे।

65 उनका मन अन्धा कर दे; तेरा शाप उन पर पड़े।

66 कोप में आकर उनका पीछा कर, और उन्हें यहोवा के आकाश के नीचे से नष्ट कर दे।

अनुवाद: विलापगीत 4

1 सोना कैसा धुँधला हो गया है! उत्तम कुन्दन कैसा बदल गया है! पवित्रस्थान के पत्थर सब सड़कों के सिरे पर फेंक दिए गए हैं!

2 सिय्योन के बहुमूल्य पुत्र, जो सोने से मढ़े हुए थे, वे कैसे कुम्हार के हाथ के बनाए हुए मिट्टी के घड़ों के समान गिने गए हैं!

3 अजगर भी अपने स्तन खोलकर अपने बच्चों को दूध पिलाते हैं: परन्तु मेरे लोगों की बेटी जंगल के शुतुर्मुर्गों के समान निर्दयी हो गई है।

4 दूधपीते बच्चों की जीभ प्यास के मारे तालू से चिपट गई है; बाल-बच्चे रोटी माँगते हैं, परन्तु कोई उनको तोड़कर नहीं देता।

5 जो स्वादिष्ट भोजन खाते थे, वे सड़कों में नाश हो गए हैं; जो लाल वस्त्र पहिनकर पले थे, वे घूरों से लिपट गए हैं: 6 और मेरे लोगों की बेटी का दण्ड सदोम के दण्ड से भी बड़ा हुआ है, जो क्षण भर में उलट दिया गया, और उस पर मार देर तक न रही।

7 उसके नाज़ीर हिम से भी अधिक निर्मल, और दूध से भी अधिक उजले थे; उनकी देह मूँगों से भी अधिक लाल थी, उनकी चमक नीलमणि की सी थी: 8 परन्तु उनका रूप अन्धकार से भी अधिक काला हो गया है, वे सड़कों में पहिचाने नहीं जाते; उनका चमड़ा हड्डियों से चिपट गया है, वह लकड़ी के समान सूख गया है।

9 तलवार से मारे हुए भूख से मारे हुओं से अच्छे थे: क्योंकि ये खेत की उपज के अभाव से मानो छिदकर घुल घुलकर मरे।

10 दयालु माताओं के हाथों ने अपने ही बच्चों को पकाया है; मेरे लोगों की बेटी के विनाश के समय वे ही उनका भोजन बन गए।

11 यहोवा ने अपना कोप पूरा किया है; उसने अपना भड़का हुआ कोप उण्डेल दिया है; और उसने सिय्योन में ऐसी आग लगाई है जिसने उसकी नेव तक को भस्म कर दिया है।

12 पृथ्वी के राजा और जगत के सब निवासी इस बात की प्रतीति नहीं कर सकते थे कि द्रोही और शत्रु यरूशलेम के फाटकों के भीतर घुसने पाएँगे।

13 यह उसके भविष्यद्वक्ताओं के पापों और उसके याजकों के अधर्म के कामों के कारण हुआ, जो उसके बीच धर्मियों का लहू बहाते थे, —

14 वे सड़कों में अन्धे होकर मारे-मारे फिरते थे, वे लहू से अशुद्ध हो गए थे; यहाँ तक कि लोग उनके वस्त्रों को छूने से बच नहीं सकते थे।

15 लोग उनको पुकारकर कहते थे, “हे अशुद्ध लोगो, हट जाओ, हट जाओ, हट जाओ, निकट मत आओ”: क्योंकि वे भाग गए और मारे-मारे फिरने लगे, तब अन्यजातियों के बीच लोगों ने कहा, “वे फिर यहाँ बसने के लिए न लौटेंगे; 16 यहोवा के मुख ने उन्हें तितर-बितर कर दिया है, वह उन पर फिर दृष्टि न करेगा।” उन्होंने न याजकों का मुख देखकर आदर किया, और न पुरनियों पर दया की।

17 जब तक हम खड़े थे, तब तक हमारी आँखें अपनी व्यर्थ सहायता की बाट जोहते जोहते रह गईं; हम ताकते ताकते एक ऐसी जाति की ओर ताकते रहे जो हमें बचा नहीं सकती थी।

18 उन्होंने हमारे पैरों का ऐसा पीछा किया कि हम अपनी सड़कों पर चल न सके; हमारा अन्त निकट आ गया, हमारे दिन पूरे हो गए, निश्चय हमारा अन्त आ पहुँचा।

19 हमारे खदेड़नेवाले आकाश के उकाबों से भी अधिक वेग से चलते थे; उन्होंने पहाड़ों पर हमारा पीछा किया, और जंगल में हमारे लिए घात लगाई।

20 यहोवा का अभिषिक्त, जो हमारी नाक का श्वास था, उनके खोदे हुए गड्ढों में पकड़ा गया; जिसके विषय में हम कहते थे, “उसकी छाया में हम जातियों के बीच जीवित रहेंगे।”

21 हे एदोम की बेटी, तू जो ऊस देश में रहती है, हर्षित और आनन्दित रह।

कटोरा तुझ तक भी पहुँचेगा, तू मतवाली होकर नंगी हो जाएगी।

22 हे सिय्योन की बेटी, तेरे दण्ड की समाप्ति हो गई है, वह फिर तुझे बंधुआई में न जाने देगा; हे एदोम की बेटी, वह तेरे अधर्म का दण्ड देगा, और तेरे पापों को प्रगट कर देगा।

अनुवाद: विलापगीत 5

1 हे यहोवा, स्मरण कर कि हम पर क्या क्या बीता है; हमारी ओर दृष्टि करके हमारी नामधराई को देख: 2 हमारा भाग परदेशियों के और हमारे घर परायों के हाथ पड़ गए हैं।

3 हम अनाथ और पिताहीन हो गए हैं; हमारी माताएँ विधवा सी हो गई हैं।

4 हम अपना ही पानी मोल लेकर पीते हैं; अपनी ही लकड़ी दाम देकर पाते हैं।

5 हमारी गर्दनों पर सताव हुआ है; हम परिश्रम करते हैं, और हमें विश्राम नहीं मिलता।

6 हमने मिस्रियों के अधीन, और अश्शूरियों के अधीन भी, इसलिए हाथ फैलाया कि पेट भर रोटी मिले।

7 हमारे पुरखाओं ने पाप किया, और मर मिटे हैं; और हम उनके अधर्म के कामों का भार उठाए हुए हैं।

8 दास हम पर प्रभुता करते हैं; उनके हाथ से कोई हमें नहीं छुड़ाता।

9 जंगल के सूखे के कारण हम अपने प्राण जोखिम में डालकर रोटी ले आते हैं।

10 भूख की जलन के कारण हमारा चमड़ा तन्दूर के समान काला हो गया है।

11 सिय्योन में स्त्रियाँ, और यहूदा के नगरों में कुमारियाँ भ्रष्ट की गई हैं।

12 हाकिम उनके हाथ से फाँसी पर लटकाए गए; पुरनियों के मुख का कुछ भी आदर न किया गया।

13 जवानों को उन्होंने चक्की पीसने को ले लिया, और लड़के लकड़ी के बोझ के नीचे दबकर गिर पड़े।

14 पुरनिये फाटक पर से जाते रहे, जवानों का गाना-बजाना बन्द हो गया।

15 हमारे मन का हर्ष जाता रहा, हमारा नाचना विलाप में बदल गया है।

16 हमारे सिर पर का मुकुट गिर पड़ा है; हम पर हाय, क्योंकि हमने पाप किया है!

17 इस कारण हमारा हृदय निर्बल हो गया है; इन्हीं बातों से हमारी आँखें धुँधली पड़ गई हैं, 18 अर्थात् सिय्योन पर्वत के कारण, जो उजाड़ पड़ा है; उसमें सियार घूमते हैं।

19 परन्तु हे यहोवा, तू सदा विराजमान रहता है; तेरा सिंहासन पीढ़ी से पीढ़ी तक बना रहता है।

20 तू क्यों हमें सदा के लिए भूल जाए, और हमें सदा के लिए त्याग दे?

21 हे यहोवा, हमको अपनी ओर फेर, तब हम फिर सकेंगे; हमारे दिन प्राचीनकाल के समान नये कर दे; 22 जब तक कि तू ने हमें सर्वथा त्याग न दिया हो, और तू हम पर अत्यन्त क्रोधित न हो गया हो।

परमेश्वर की स्तुति हो

↑