यिर्मयाह और विलापगीत पर टीका · खण्ड 2 · यिर्मयाह 37

यिर्मयाह 37

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यिर्मयाह 37

एक सौ पैंतालीसवाँ व्याख्यान

यिर्मयाह 37:1-2

1. और यहोयाकीम के पुत्र कोन्याह के स्थान पर योशिय्याह का पुत्र सिदकिय्याह राजा होकर राज्य करने लगा, जिसे बाबुल के राजा नबूकदनेस्सर ने यहूदा देश में राजा ठहराया था।

1. Et regnavit rex Zedechias, filius Josiae, pro Choniah (Jechania) filio Joiakim, quem constituit regem Nebuchadnezer, rex Babylonis, in terra Jehudah:

2. परन्तु न तो उसने, न उसके कर्मचारियों ने, और न देश के लोगों ने यहोवा के उन वचनों को माना जो उसने यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहे थे।

2. Et non audivit, neque servi ejus, neque populus terrae sermones Jehovae, quos loquutus est per manum Jeremiae Prophetae.

भविष्यद्वक्ता यहाँ हमें बताता है कि जब राजा यकोन्याह बँधुआई में ले जाया गया, तब भी यहूदियों ने उस कारण पश्चाताप नहीं किया, यद्यपि परमेश्वर ने मानो उन्हें बलपूर्वक अपनी ओर लौटने को विवश किया था; क्योंकि वह ताड़ना इतनी कठोर थी कि उसके बाद और भी बिगड़ जाना भयानक जड़ता का प्रमाण था। तौभी यिर्मयाह कहता है कि वे उस दण्ड से सुधरे नहीं; क्योंकि सिदकिय्याह ने, जो यकोन्याह के स्थान पर आया था, खरी शिक्षा को ठुकरा दिया और भविष्यद्वक्ता की सम्मति को नहीं माना।

परन्तु भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय समझने के लिए हमें उस समय का इतिहास स्मरण रखना चाहिए: यहूदियों ने यकोन्याह को उसके पिता के स्थान पर राजा बनाया, परन्तु तीसरे महीने में बाबुल के राजा की सेना आ पहुँची। तब यकोन्याह ने अपनी ही इच्छा से अपने आप को उनके हाथ सौंप दिया। भविष्यद्वक्ता ने कहा था कि यहोयाकीम का कोई वैध उत्तराधिकारी न होगा; और यह पूरा हुआ, यद्यपि उसका पुत्र सिंहासन पर बैठाया गया, क्योंकि तीन महीने का राज्य इतना तुच्छ था कि वह कुछ भी नहीं गिना गया। और जब नबूकदनेस्सर ने देखा कि बिना राजा के प्रजा को व्यवस्था में रखना कठिन है, तब उसने मत्तन्याह को राजा बनाया, जिसका नाम उसने सिदकिय्याह रखा। और उसने तुरन्त मिस्रियों की ओर फिरकर उनसे सन्धि कर ली, जिससे वह बाबुल के राजा का जूआ उतार फेंके। इसलिए भविष्यद्वक्ता जब कहता है कि यद्यपि सिदकिय्याह को यहोयाकीम और अपने भतीजे यकोन्याह के उदाहरण से शिक्षा मिल चुकी थी, तौभी वह कुछ भी अच्छा न हुआ, तो वह केवल उसकी कृतघ्नता को ही दोषी नहीं ठहराता: यह तो निश्चित है कि भविष्यद्वक्ता ने उसे इस बात के लिए कड़ी डाँट लगाई थी कि उसने राजा नबूकदनेस्सर के साथ विश्वासघात किया, क्योंकि उसे अन्त तक उसके प्रति अपना वचन निभाना चाहिए था। उससे फिर जाने के लिए उसने अपना ही गढ़ा हुआ कारण बताया; कोई नया कारण उत्पन्न नहीं हुआ था; केवल यह था कि वह कर देने से छूट जाए, और यह भी कि द्वेषी लोग उस पर यह दोष न लगाएँ कि वह दूसरे की अनुमति से राज्य करता है और किसी दूसरे राजा का दास है। सो जब उसने देखा कि यदि वह बाबुल के राजा से न फिरे तो उसका राज्य अनेक निन्दाओं का पात्र बनेगा, तब उसने मिस्रियों से सन्धि कर ली। यह बात डाँट के योग्य थी; परन्तु यहाँ भविष्यद्वक्ता सामान्य रूप से उसकी हठीली दुष्टता के विषय में, और साथ ही सारी प्रजा की दुष्टता के विषय में बोलता है।

राजा सिदकिय्याह, वह कहता है, जो योशिय्याह का पुत्र था, कोन्याह के स्थान पर राज्य करने लगा। यहाँ यकोन्याह नाम को छोटा कर दिया गया है, सम्भवतः उसका अपमान करने के लिए; और हम देख चुके हैं कि यही सामान्य मत रहा है। इसलिए उसे निन्दा के रूप में कोन्याह कहा गया है, जबकि उसका पूरा नाम यकोन्याह था। वह कहता है कि सिदकिय्याह को नबूकदनेस्सर ने राजा बनाया था: इससे उसका विश्वासघात और उसकी कृतघ्नता प्रकट हो गई।

आगे कहा गया है कि न उसने, न उसके कर्मचारियों ने, न उसकी प्रजा ने यहोवा का वचन माना। मैंने कहा है कि सिदकिय्याह केवल इसलिए दोषी नहीं ठहराया गया कि उसने राजा नबूकदनेस्सर के प्रति अपना वचन निभाकर भविष्यद्वक्ता की आज्ञा नहीं मानी, वरन् इसलिए भी कि उसने अपने पुरखाओं के अन्धविश्वासों को थामे रखा, और परमेश्वर की सच्ची आराधना को भ्रष्ट किया, और व्यवस्था की शिक्षा की ओर लौटाए जाने को तैयार न हुआ।

इसलिए यहाँ जिस आज्ञा-उल्लंघन का उल्लेख है वह परमेश्वर की सारी व्यवस्था तक, अर्थात् दोनों पटियाओं तक फैला हुआ था; क्योंकि यहूदी उस समय अपने राजा के साथ-साथ पतित हो चुके थे; वे परमेश्वर की शुद्ध आराधना नहीं करते थे, वरन् अधर्मी और घिनौने अन्धविश्वासों से अपने आप को और मन्दिर को अशुद्ध करते थे; और वे कामुक, लोभी, क्रूर, उपद्रवी और बेईमान भी थे, और इस प्रकार उन्होंने व्यवस्था की सारी शिक्षा को त्याग दिया था। और यह विचित्र अन्धेपन का प्रमाण था, क्योंकि नगर की विपत्तियाँ और वह अपमान जो उनके राजा पर पड़ा था, उनकी आँखों के सामने था; क्योंकि, जैसा हम कह चुके हैं, उसके पुत्र उसके सामने घात किए गए, उसकी अपनी आँखें निकाल ली गईं, और प्राणदण्ड के योग्य अपराध का दोषी ठहराए जाने के बाद वह जंजीरों से बाँधा गया। निश्चय ही ऐसे उदाहरण से सिदकिय्याह और बाकी सब भयभीत हो जाने चाहिए थे, जिससे वे अन्ततः बुद्धिमान बनते और परमेश्वर से मेल-मिलाप खोजते। परन्तु भविष्यद्वक्ता कहता है कि उन्होंने यहोवा का वचन नहीं माना।

वह पहले राजा का, फिर उसके मन्त्रियों का, और तीसरे स्थान पर सारी प्रजा का उल्लेख करता है; मानो वह कह रहा हो कि यह पागलपन केवल राजा में ही नहीं, वरन् उसके मन्त्रियों में और सारे समाज में भी पाया गया, यहाँ तक कि कोई भी निर्दोष न ठहर सका। सो वह सिर से, अर्थात् स्वयं राजा से आरम्भ करता है, और यह भी दिखाता है कि उसके मन्त्री कुछ भी अच्छे न थे, और फिर साधारण लोगों को जोड़ता है, जिनमें दोष कम प्रतीत होता है; क्योंकि हम जानते हैं कि निचले वर्ग के लोग बुद्धि की कमी और अज्ञानता के कारण भटक जाते हैं। परन्तु भविष्यद्वक्ता यहाँ दिखाता है कि प्रजा के सबसे छोटे लोग भी परमेश्वर के आज्ञा-उल्लंघनकारी थे।

हमें विशेष रूप से इन शब्दों पर ध्यान देना चाहिए कि उन्होंने यहोवा का वह वचन नहीं माना जो उसने यिर्मयाह के द्वारा कहा था। क्योंकि वह संकेत करता है कि यद्यपि परमेश्वर स्वर्ग से प्रकट नहीं हुआ, तौभी अविश्वासियों को दोषी ठहराने के लिए इतना पर्याप्त था कि उसने अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा बात की। इसलिए दुष्टों के पास बहाने बनाने और यह कहने का कोई कारण न था कि परमेश्वर और उसकी शिक्षा को ठुकराना उनका उद्देश्य नहीं था, वरन् वे केवल नश्वर मनुष्यों का आदर करने से इनकार करते थे, और मनुष्यों के शब्दों को स्वर्गीय वाणी नहीं मानना चाहते थे। यह बहाना उनके किसी काम का न था, क्योंकि परमेश्वर चाहता था कि वे उसके दासों की सुनें। यद्यपि उसने स्वर्ग से अपने आप को नहीं दिखाया, न किसी दृश्य रूप में उनसे बात की, तौभी इतना पर्याप्त था कि उसने एक ही बार सदा के लिए यह साक्षी दे दी थी कि व्यवस्था के प्रकाशित किए जाने के बाद प्रजा के बीच सदा भविष्यद्वक्ता रहेंगे, और आज्ञा दी थी कि उनकी बातें श्रद्धा के साथ सुनी जाएँ। न ही यहूदी उस बहाने का सहारा ले सकते थे जिसका अधर्मी लोग प्रायः सहारा लिया करते हैं, कि वे सच्चे और झूठे भविष्यद्वक्ताओं में भेद नहीं कर सकते थे; क्योंकि यदि उन्होंने यिर्मयाह की शिक्षा को जाँचा होता, तो वे पाते कि उसमें ऐसे निश्चित चिह्न थे जिनके द्वारा वे सहज ही देख सकते थे कि वह व्यवस्था से पूर्णतः मेल खाती है। सो उन्होंने जो भविष्यद्वक्ता और उसकी स्वर्गीय शिक्षा को ठुकराया, वह उनकी हठ और तिरस्कार का प्रमाण था, न कि अज्ञानता का। आगे लिखा है, —

यिर्मयाह 37:3-8

3. सिदकिय्याह राजा ने शेलेम्याह के पुत्र यहूकल और मासेयाह के पुत्र सपन्याह याजक को यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता के पास यह कहला भेजा, कि हमारे निमित्त हमारे परमेश्वर यहोवा से प्रार्थना कर।

3. Et misit rex Zedechias Jucal filium Selemiae, et Zephaniam filium Maassiae sacerdotem (vel, sacerdotis) ad Jeremiam Prophetam, dicendo, Ora agedum pro nobis

Jehovam Deum nostrum.

4. उस समय यिर्मयाह लोगों के बीच आया-जाया करता था, क्योंकि उन्होंने उसको तब तक बन्दीगृह में नहीं डाला था।

4. Et Jeremias (autem) ibat et egrediebatur in medio populi; necdum posuerant eum in domum clausurae (vel, carceris)

5. उस समय फ़िरौन की सेना मिस्र से निकली थी; और जब कसदियों ने, जो यरूशलेम को घेरे हुए थे, उसका समाचार सुना, तब वे यरूशलेम के पास से चले गए।

5. Et exercitus Pharaonis egressus erat ex Egypto, et audierant Chaldmi qui oppugnabant Jerusalem famam de illis, et ascenderant a Jerusalem.

6. तब यहोवा का यह वचन यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता के पास पहुँचा,

6. Et fuit sermo Jehovae ad Jeremiam Prophetam, dicendo,

7. इस्राएल का परमेश्वर यहोवा यों कहता है, यहूदा के जिस राजा ने तुम को मुझ से पूछने के लिए मेरे पास भेजा है, उससे तुम यों कहो, कि देख, फ़िरौन की जो सेना तुम्हारी सहायता के लिए निकली है, वह अपने देश मिस्र में लौट जाएगी।

7. Sic dicit Jehova, Deus Israel, Ita dicetis regi Jehudab, qui misit vos ad me ut me interrogaretis, Ecce exercitus Pharaonis, qui egressus est vobis in auxilium, reversus est (revertatur, potius) in terram Egypti;

8. और कसदी फिर आकर इस नगर से लड़ेंगे, और इसको ले लेंगे और आग लगाकर फूँक देंगे।

8. Et redibunt Chaldaei et oppugnabunt hanc urbem (proeliabuntur contra urbem hanc) et capient eam et comburent eam igni.

यिर्मयाह ने संक्षेप में बताया था कि नगर और देश की दशा क्या थी, अर्थात् यद्यपि वे परमेश्वर के कोड़ों से पहले ही कठोरता से ताड़ना पा चुके थे, तौभी वे अपनी दुष्टता में हठीले बने रहे। अब वह यह जोड़ता है कि जब कसदियों की ओर से संकट उठा, तब राजा सिदकिय्याह ने उसके पास दूत भेजे; और सम्भव है कि यह सन्देश यिर्मयाह के पास उस समय आया जब घेरा उठा लिया गया था, या यदि घेरा अब भी बना हुआ था, तो यह उस समय हुआ जब यहूदी निःसन्देह कुछ सहायता पाने की आशा से अपने आप को बहला रहे थे, जबकि वे यह भी देखते थे कि बाबुल के राजा की शक्ति बहुत बड़ी है। क्योंकि यद्यपि वे मिस्रियों से कुछ सहायता की आशा रखते थे, तौभी वे उलझन में थे, और भय ने राजा को विवश किया कि वह यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता के पास दूत भेजे। परन्तु उत्तर से प्रकट होता है कि मिस्री पहले ही हथियार उठा चुके थे, और घेरा उठवाने तथा कसदियों को यहूदिया से खदेड़ने के उद्देश्य से निकल भी आए थे। इससे हम देखते हैं कि राजा एक प्रकार से व्यर्थ भरोसे से फूला हुआ था, क्योंकि वह देखता था कि मिस्री एक बलवन्त सेना लेकर उसकी सहायता को आ रहे हैं, और तौभी वह चिन्ता से भरा था, जैसा अधर्मी लोग सदा रहते हैं: जब वे अपने आप को निश्चिन्तता की दशा में दृढ़ करना चाहते हैं, तब भी वे इधर-उधर उछाले जाते हैं, क्योंकि परमेश्वर का न्याय उन पर है। वे भयभीत रहते हैं, यद्यपि वे भय को झटक देने का प्रयत्न करते हैं।

इसलिए सिदकिय्याह, यद्यपि वह सोचता था कि वह शीघ्र ही सब संकट से छूट जाएगा, तौभी चिन्ता को पूरी तरह उतार न सका, और इसलिए उसने यिर्मयाह के पास दूत भेजे: क्योंकि अधर्मी लोग परमेश्वर को खोजा तो करते हैं, परन्तु सच्चे मन से नहीं; वे बाहरी कर्तव्य तो पूरा करना चाहते हैं, परन्तु न विश्वास लाते हैं और न पश्चाताप, जिनके द्वारा ही परमेश्वर के पास पहुँचने का मार्ग खुलता है।

परन्तु यिर्मयाह हमें बताता है कि वह उस समय स्वतन्त्र था, लोगों के बीच आया-जाया करता था। हो सकता है कि वह बन्दीगृह में रहा हो, परन्तु जब राजा और प्रजा का रोष ठण्डा पड़ गया, तब वह छोड़ दिया गया हो। इसलिए कहा गया है कि वह लोगों के बीच था, अर्थात् स्वतन्त्र किया गया था और अपने वश में था, यहाँ तक कि वह नगर में निडर होकर घूम सकता था; क्योंकि आना और जाना यह सूचित करता है कि वह अपने काम-काज में लगने के लिए स्वतन्त्र था। जो मनुष्य अपनी इच्छा के अनुसार यह या वह काम हाथ में लेता है, उसके विषय में कहा जाता है कि वह आता-जाता है; क्योंकि हम जानते हैं कि मनुष्य सदा एक ही काम में नहीं लगे रहते, वरन् आवश्यकता के अनुसार भिन्न-भिन्न काम करते हैं। सो यिर्मयाह की यही दशा थी; वह साधारण स्वतन्त्रता का आनन्द लेता था। फिर आगे कहा गया है कि वह तब तक बन्दीगृह में नहीं डाला गया था, जैसा कि थोड़े ही समय बाद हुआ। फिर यह भी कहा गया है कि फ़िरौन की सेना यहूदियों की सहायता के लिए मिस्र से निकली थी, और इस प्रकार घेरा उठ गया, क्योंकि कसदी मिस्रियों का सामना करने को निकल गए। सो इसी समय यिर्मयाह को परमेश्वर की ओर से उत्तर मिला। इसलिए यह सम्भव नहीं जान पड़ता कि दूत उस समय भेजे गए जब नगर में शत्रु के आने का समाचार फैला, वरन् तब जब नगर को राहत मिली; क्योंकि प्रजा की दशा तब भी अनिश्चित थी, इसलिए कि नगर और देश की स्वतन्त्रता युद्ध के अनिश्चित परिणाम पर निर्भर थी। कसदी अभी तक मिस्रियों से भिड़े नहीं थे। फ़िरौन की विजय सिदकिय्याह और सारी प्रजा को शान्ति और सुरक्षा की आशा देती; परन्तु यदि कसदी जीत जाते, तो वे देखते थे कि सबसे बड़ा संकट निकट है, क्योंकि तब वे हर प्रकार की सहायता से वंचित हो जाते।

ऐसी ही परिस्थिति में सिदकिय्याह ने यिर्मयाह के पास दूत भेजे कि वे उससे प्रार्थना की विनती करें। इस प्रकार हम देखते हैं कि कपटी लोग परमेश्वर के भय से प्रेरित होकर, जिसे वे तौभी घमण्ड से तुच्छ जानते हैं, विवश किए जाने पर उसकी सहायता खोजते हैं; और यह इसलिए नहीं किया जाता कि वे मनुष्यों के सामने ऐसा करते दिखाई दें, वरन् इसलिए कि परमेश्वर उन्हें ऐसे संकट में डाल देता है कि वे यह अनुभव किए बिना नहीं रह सकते कि उन्हें उसकी सहायता की आवश्यकता है। वे तो, जैसा मैंने कहा है, परमेश्वर का सारा स्मरण मिटा देना चाहते हैं, और यदि वे ऐसा कर सकते, तो वे उससे सारी शक्ति और अधिकार छीन लेते; परन्तु चूँकि वे चाहे-अनचाहे यह जानने को विवश होते हैं कि परमेश्वर स्वर्ग में ऐसा राज्य करता है कि सारा संसार उसकी शक्ति के अधीन है, इसलिए आवश्यकता उन्हें विवश करती है कि वे औपचारिक रीति से प्रार्थना करें, और एक प्रकार से उसकी कृपा प्राप्त करें, या कम से कम ऐसा करने का प्रयत्न करें। परन्तु जैसा मैं कह चुका हूँ, उन्हें पश्चाताप और विश्वास से आरम्भ करना चाहिए था। कपटी लोग जहाँ तक हो सके, परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं से भी और पश्चाताप के कर्तव्य से भी अपने आप को दूर रखते हैं। वे परमेश्वर को इस प्रकार खोजते हैं कि उसी समय उससे बचते भी हैं।

हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि सिदकिय्याह अपने आप को इतना दोषी अनुभव करता था कि वह स्वयं प्रार्थना नहीं कर सकता था। सो अपनी अयोग्यता से भली-भाँति परिचित होने के कारण उसने भविष्यद्वक्ता को मानो अपने और परमेश्वर के बीच खड़ा किया, जिससे वह गिड़गिड़ाकर उसके लिए मध्यस्थता करे। विश्वासी लोग भी प्रायः ऐसा ही करते हैं, क्योंकि वे इधर-उधर सहायता खोजते हैं जिससे परमेश्वर उनकी और भी शीघ्र सुने; और यह वे परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार करते हैं। परन्तु भक्तों और कपटियों में बड़ा अन्तर है। परमेश्वर के सच्चे आराधक, जैसा मैंने कहा है, अपनी ही प्रार्थनाओं से सन्तुष्ट नहीं रहते, वरन् दूसरों से भी अपने साथ सम्मिलित होने को कहते हैं, और साथ ही स्वयं भी परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं। परन्तु कपटी लोग क्या करते हैं? चूँकि वे सोचते हैं कि परमेश्वर के पास पहुँचना उनके लिए वर्जित है, और जानते हैं कि वे परमेश्वर के द्वारा सुने जाने के योग्य नहीं, इसलिए वे अपने स्थान पर दूसरों को खड़ा कर देते हैं कि वे उनके लिए प्रार्थना करें। इस प्रकार वे स्वयं यह जानने का प्रयत्न नहीं करते कि परमेश्वर उन पर अनुग्रहकारी होगा या नहीं; और यद्यपि वे चाहते हैं कि सारा संसार उनके लिए प्रार्थना करे, तौभी वे स्वयं प्रार्थना नहीं करते। सो सिदकिय्याह की मूढ़ता ऐसी ही थी, जिसने पवित्र भविष्यद्वक्ता से कहा कि वह उसके लिए परमेश्वर से प्रार्थना करे, जबकि वह स्वयं अपनी तलछट में सुन्न पड़ा था; क्योंकि उसने यह स्वीकार नहीं किया कि वह न्यायोचित दण्ड भोग रहा है, और न उसने सच्चे उपाय का सहारा लिया, अर्थात् परमेश्वर की कृपा की ओर लौटना, और उसकी दया और उद्धार की प्रतिज्ञाओं को थाम लेना। इन सब मुख्य बातों को उसने छोड़ दिया, और केवल उस पर ध्यान दिया जो, जैसा लोग कहते हैं, गौण है।

अब समय के विषय में हमें सावधानी से ध्यान देना चाहिए कि यह तब हुआ जब मिस्री घेरा उठवाने को आए। इस प्रकार परमेश्वर ने कुछ समय के लिए कपटियों को एक सौभाग्यपूर्ण घटना के द्वारा धोखा खाने दिया; क्योंकि तब यहूदी मिस्रियों से वाचा बाँधने में अपनी ही चतुराई की प्रशंसा करने लगे, क्योंकि वह राज्य, जैसा भली-भाँति ज्ञात है, शक्तिशाली था और साथ ही घनी आबादी वाला भी, जिससे एक बड़ी सेना खड़ी की जा सकती थी। सो जब उन्होंने देखा कि उनकी सन्धि उनके लिए लाभदायक सिद्ध हुई, तब उन्होंने निःसन्देह अपने आप को बड़ा श्रेय दिया, और इस प्रकार उनका दुस्साहस बढ़ गया। तौभी परमेश्वर ने उनके हृदयों को ऐसा छुआ कि वे दुविधा में बने रहे, और बीच-बीच में बहुत डरते रहे: क्योंकि सिदकिय्याह किसी बड़ी आवश्यकता से विवश हुए बिना यिर्मयाह के पास न भेजता; और तौभी, जैसा कहा जा चुका है, सफलता उसे मतवाला कर सकती थी; परन्तु परमेश्वर ने उसे चिन्तित कर दिया, यहाँ तक कि उसने अनुभव किया कि भविष्यद्वक्ता की प्रार्थना की आवश्यकता है।

अब उत्तर आता है: यिर्मयाह कहता है कि यहोवा का वचन उसके पास पहुँचा, और यह कि उसे सिदकिय्याह के दूतों से कहना था कि कसदी शीघ्र ही लौट आएँगे। फिर वह कहता है, देखो, फ़िरौन की जो सेना तुम्हें छुड़ाने को निकली है, वह अपने देश को लौट जाएगी; अर्थात् विवश होकर, क्योंकि मिस्री या तो युद्ध में पराजित हो जाएँगे, या भय से मारे जाकर अपने नगरों में अपनी रक्षा करने के लिए अपनी ही इच्छा से लौट जाएँगे। भविष्यद्वक्ता कहता है कि मिस्रियों से किसी लाभ की आशा नहीं की जा सकती थी, क्योंकि फ़िरौन के सैनिक अपने देश को लौट जाएँगे; और फिर वह जोड़ता है, और कसदी लौटकर इस नगर से लड़ेंगे, यहाँ तक कि वे इसे ले लेंगे और जला देंगे। यह एक कठोर उत्तर था, और निःसन्देह सिदकिय्याह यह सन्देश सुनकर बहुत चिढ़ गया, और भविष्यद्वक्ता पर भी बहुत क्रोधित हुआ, जिसने इस प्रकार नगर और प्रजा को खुलकर अन्तिम विनाश की धमकी देने का साहस किया।

परन्तु यहाँ भविष्यद्वक्ता ने राजा के घमण्ड की कुछ चिन्ता न की, क्योंकि उसके लिए परमेश्वर की आज्ञा मानना आवश्यक था, इसलिए उसने साहस के साथ अपना पद-कर्तव्य निभाया; और साथ ही उसने राजा सिदकिय्याह को मर्म तक छेद दिया, उस राजा से कहो जिसने तुम्हें मुझ से पूछने को भेजा है, इत्यादि।

शब्द {}דרשdaresh का अर्थ तो सामान्य रूप से माँगना है, परन्तु यहाँ भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय यह है कि उसे पूछताछ करनी थी; और तौभी यह बात पहले नहीं कही गई थी; क्योंकि उसने हमें केवल इतना बताया था कि राजा और प्रजा की कुशलता के लिए प्रार्थना करने को कहने के लिए उसके पास दूत भेजे गए थे। परन्तु हम जानते हैं कि पवित्रशास्त्र प्रायः उन दो बातों में से एक को छोड़ देता है जो उसमें सम्मिलित होती हैं; और हम सहज ही यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि राजा ने यिर्मयाह के पास केवल प्रार्थना के लिए ही नहीं, वरन् इसलिए भी भेजा था कि वह प्रभु की ओर से कोई अनुकूल भविष्यद्वाणी ले आए। क्योंकि वह महायाजक या किसी और के पास न जाकर उसी के पास क्यों गया, सिवाय इसके कि वह जानता था कि वह परमेश्वर का सच्चा भविष्यद्वक्ता है? सो सिदकिय्याह ने यिर्मयाह से प्रार्थना करने की विनती की, परन्तु उसने उससे कोई ऐसी अनुकूल भविष्यद्वाणी निकलवाने का भी प्रयत्न किया जिससे उसे ढाढ़स मिले। इसलिए यिर्मयाह ने परोक्ष रूप से उसे डाँटा, क्योंकि उसने कपट से उसके पास इस प्रकार भेजा था मानो वह जो कुछ परमेश्वर अपने दास के मुँह से प्रकट करे उसे सुनने को तैयार हो, — “उसने तुम्हें मुझ से पूछने को भेजा है; वह भूल में है, क्योंकि जो वह खोजता है वह उसे न मिलेगा; क्योंकि परमेश्वर यों कहता है, ‘मिस्री तुम्हारे किसी काम न आएँगे, और कसदी लौटकर नगर को ले लेंगे और जला देंगे।’ ”

अब हम समझते हैं कि जब कपटी लोग घुमा-फिराकर परमेश्वर को खोजने का दिखावा करते हैं, तो जो वे चाहते हैं वह उन्हें नहीं मिलता; क्योंकि परमेश्वर न्यायपूर्वक उन्हें निराश करता है, इसलिए कि वे सच्चे हृदय और सच्ची अभिलाषा के साथ उसके पास नहीं आते; क्योंकि वे परमेश्वर को अपने ही स्वभाव और चरित्र के अनुसार बदल देना चाहते हैं, और न तो अपने आप को उसकी सेवा के लिए झुकाते हैं और न उसके वचन के अधीन होते हैं। इसी कारण परमेश्वर उनकी प्रार्थनाओं का उत्तर नहीं देता; परन्तु विश्वासी लोग, जो सच्चाई से और हृदय से परमेश्वर को खोजते हैं, उसे सदा अनुग्रहकारी पाते हैं; और यद्यपि वह उनकी तुरन्त न सुने, तौभी वह सचमुच दिखाता है कि उसे उनकी कुशलता की चिन्ता है। परन्तु कपटी लोग, जिनके भरोसे को परमेश्वर तिरस्कार की दृष्टि से देखता है, इसी योग्य हैं कि उनका भरोसा खोखला और व्यर्थ ठहरे। सो यही कारण है कि भविष्यद्वक्ता ने सिदकिय्याह और उसके दूतों को ऐसा कठोर उत्तर दिया। अब आगे लिखा है, —

यिर्मयाह 37:9-10

9. यहोवा यों कहता है, तुम यह कहकर अपने आप को धोखा न दो कि कसदी हमारे पास से निश्चय चले गए हैं; क्योंकि वे नहीं चले गए।

9. Sic dicit Jehova, Ne efferatis animas vestras (vel, cum puncto diverso, Ne decipiatis, quia duoe sunt lectiones,] {}תשאוaut, {}תשיאוNe ergo efferatis vos, vel, Ne decipiatis animus vestras) dicendo, Proficisicendo proficisicentur Chaldaei, quia non proficisicentur:

10. क्योंकि चाहे तुम ने कसदियों की सारी सेना को जो तुम से लड़ती है ऐसा मार भी लिया होता कि उन में से केवल घायल लोग रह जाते, तौभी वे अपने अपने डेरे में से उठकर इस नगर को फूँक देते।

10. Quia si percusscritis totum exercitum Chaldaeorum, qui praeliantur vobiscam (vol, qui vos oppugnant) et residui, fuerint ex illis viri transfixi (hoc est, vulnerati) quisque e tabernaculo suo consurgent (hoc est, singuli ex tabernacalo suo) et ex-

urent hanc urbem igni.

भविष्यद्वक्ता पिछले पद की पुष्टि करता है, और वास्तव में यह जोड़ना आवश्यक था, क्योंकि यद्यपि सिदकिय्याह ने सारी चिन्ता और भय को उतार न फेंका हो, तौभी वह उस भविष्यद्वाणी से अवश्य विचलित हुआ होगा, और इस प्रकार वह अपनी हठ में और भी कठोर हो सकता था, जैसा कपटियों के साथ होता है; जो यह देखकर कि उन्हें कुछ लाभ नहीं हो सकता, परमेश्वर के विरुद्ध भड़क उठते हैं और अपने मार्ग पर अन्धाधुन्ध दौड़ते चले जाते हैं। सो सिदकिय्याह और यहूदियों के साथ भी ऐसा ही हो सकता था; इसलिए यिर्मयाह पुष्टि के रूप में जोड़ता है, अपने मन को फुलाओ मत, या, अपने आप को धोखा न दो; अर्थात् मिस्री सेना के विषय में फैले समाचार के कारण। इस प्रकार उसने यहूदियों से कहा कि उनके पास किसी राहत की आशा करने का कोई कारण नहीं।

और कारण भी जोड़ा गया है, क्योंकि यदि, वह कहता है, तुम ने कसदियों को ऐसा मारा भी होता कि थोड़े ही बचे रहते, तौभी वे अपने अपने डेरे से उठकर इस नगर को जला देते।

भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि यहूदियों ने सौभाग्यपूर्ण घटनाओं पर दृष्टि लगाकर और उसी के अनुसार अपनी राय बनाकर कितनी मूर्खता और बेतुकेपन से काम किया। इसलिए वह उन्हें समझाता है कि वे ऐसे भरोसे पर टिकना छोड़ दें जो उन्हें धोखा देगा; क्योंकि वह कहता है कि चाहे वे बहुत-सी लड़ाइयाँ जीत लें, और युद्ध का पलड़ा उनकी ओर झुक जाए, तौभी वे अन्तिम विनाश से बच नहीं सकते, क्योंकि उनका सामना परमेश्वर से था। सो यह ऐसा ही था मानो वह कहता कि उन्हें उस समय की अपनी दशा से यह अनुमान नहीं लगाना चाहिए कि आगे क्या होगा, क्योंकि परमेश्वर उनसे युद्ध कर रहा था; और इसलिए यदि परमेश्वर ने उन्हें नष्ट करने का निश्चय कर लिया था, तो चाहे कोई शत्रु न भी होता, तौभी वह एक ही फूँक से उन सब को मार सकता था। और इसी कारण वह निष्कर्ष निकालता है कि वह कसदियों को काम में ला सकता था, चाहे गिनती में थोड़े ही बचे होते, और वे भी घायल, तौभी वे अपने डेरों से उठकर यरूशलेम के भवनों में आग लगा देते। इसलिए यह नगर जलाया जाएगा; यह मत पूछो कि किसके द्वारा या कब: परमेश्वर इस काम में कसदियों को लगाएगा, क्योंकि उसने ऐसा ही ठान लिया है।

इससे हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि यहूदी कुछ समय के लिए विजयी रहे थे, कम से कम उन्होंने नगर पर शत्रुओं के आक्रमणों को सफलतापूर्वक पीछे धकेल दिया था; क्योंकि यदि भविष्यद्वक्ता ने यह न देखा होता कि युद्ध में मिली किसी सफलता के कारण यहूदी छुटकारे की आशा पाल रहे हैं, तो वह यह बात न कहता। इसलिए वह कहता है कि यह सब कुछ महत्त्व का न था, क्योंकि उनका नगर आग से नष्ट होने को था। परन्तु जिस सिद्धान्त का मैंने उल्लेख किया है उसे स्मरण रखना चाहिए, क्योंकि यिर्मयाह ने यह मानकर बात कही कि यरूशलेम नगर का विनाश राजा नबूकदनेस्सर की सेनाओं के द्वारा, न उसकी सेना की शक्ति या गिनती के द्वारा, न उसके सैनिकों की वीरता के द्वारा, वरन् परमेश्वर के न्याय के द्वारा होना था। चूँकि ऐसा है, वह कहता है, चाहे थोड़े ही बचे होते, और वे भी घायल, यहाँ तक कि अधमरे पड़े होते, तौभी वे अपने अपने डेरे से उठ खड़े होते, अर्थात् इकट्ठे नहीं, न नियमित पाँति में, न किसी झण्डे के नीचे, जैसा सैनिक किया करते हैं, वरन् हर एक, चाहे कोई साथी निकट न हो, चाहे वे इधर-उधर बिखरे हों, तौभी अपने डेरे से उठ खड़ा होता। संक्षेप में वह यह संकेत करता है कि चाहे लड़ाई केवल छायाओं से ही होती, तौभी वे उस चरम पलटे से बच नहीं सकते थे जिसकी धमकी परमेश्वर ने दी थी। इसलिए वह कहता है, वे अपने अपने डेरे से उठेंगे, और इस नगर को जला देंगे।

अब वह यह नहीं कहता कि कसदी नगर को अपने अधिकार में ले लेंगे, वह आक्रमण की बात नहीं करता, केवल जलाने की बात करता है; इससे वह संकेत करता है कि यद्यपि कसदियों में स्वयं उन्हें हानि पहुँचाने की कोई शक्ति न भी होती, तौभी इतना पर्याप्त था कि वे परमेश्वर के द्वारा घरों में आग लगाने के उद्देश्य से हथियारबन्द किए गए थे, उन स्त्रियों और बच्चों के समान जो प्रायः पूरे-पूरे नगरों और गाँवों को जला देते हैं; क्योंकि इस काम में न वीरता की आवश्यकता होती है और न किसी बड़े कौशल की। सो परमेश्वर घोषणा करता है कि यद्यपि कसदी लड़ने को तैयार न भी होते, तौभी वे पर्याप्त बलवन्त थे, हाँ, चाहे वे घायल होने के बाद अधमरे पड़े भी होते। यही इसका अर्थ है।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जैसे तू ने कृपा करके हमें अपने पास बुलाना उचित समझा है, और अपने एकलौते पुत्र के द्वारा होनेवाले मेल-मिलाप को हमारे सामने रखता है, — हाँ, यह वरदान दे कि हम अपनी दुष्टता में ऐसे आगे न बढ़ें कि तुझे अपने विरुद्ध और भी अधिक भड़काएँ, और तेरे पलटे की आग अपने ही सिरों पर सुलगाएँ, वरन् अपने आप को तेरे अधीन ऐसा कर दें कि सच्चे पश्चाताप और सच्चे विश्वास के साथ तेरी दया की शरण में भागें, जिससे हम तुझे अपने ऊपर अनुग्रहकारी पाएँ, और तू इस प्रकार हम पर दया करके हमें अपने नाम की महिमा करने का कारण दे, उसी तेरे एकलौते पुत्र के द्वारा। — आमीन।

एक सौ छियालीसवाँ व्याख्यान

यिर्मयाह 37:11-14

11. जब कसदियों की सेना फ़िरौन की सेना के डर के मारे यरूशलेम के पास से निकल गई,

11. Et aceidit postquam ascenderat exercitus Chaeldmorum ab Jerosolyma propter exercitum Pharaonis;

12. तब यिर्मयाह यरूशलेम से निकलकर बिन्यामीन के देश की ओर इसलिए जा निकला कि वहाँ से और लोगों के संग अपना अंश ले।

12. Tunc egressus est Jeremias Jerosolyma, ut proficisceretur in terram Benjamin, ut divideret illinc in medio populi.

13. जब वह बिन्यामीन के फाटक में पहुँचा, तब यिरिय्याह नामक पहरुओं का एक सरदार वहाँ था जो शेलेम्याह का पुत्र और हनन्याह का पोता था, और उसने यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता को यह कहकर पकड़ लिया, कि तू कसदियों के पास भागा जाता है।

13. Quum esset in porta Benjamin, illic erat magister custodiae, cujus nomen liria, filius Selemiae, filii Chananiae, qui apprehendit Jeremiam Prophetam, dicendo, Ad Chaldaeos tu cadis (aut, dilaberis, hoc enim significat verbum ({}לפנ

14. तब यिर्मयाह ने कहा, यह झूठ है; मैं कसदियों के पास नहीं भागा जाता हूँ। परन्तु यिरिय्याह ने उसकी एक न मानी, और वह उसे पकड़कर हाकिमों के पास ले गया।

14. Et dixit Jeremias, Mendacium, non dilabor ad Chaldaeos; sed non audivit eum, et apprehendit Iiria Jeremiam, et deduxit eum ad principes.

यहाँ यिर्मयाह हमें बताता है कि वह कैसे और किस अवसर पर बन्दीगृह में डाला गया। उसने थोड़ी ही देर पहले कहा था कि वह प्रजा के बीच, या उनके मध्य में था; परन्तु अब वह हाकिमों की क्रूरता का वर्णन करता है, कि उन्होंने उसे न केवल बन्दीगृह में, वरन् मानो कब्र में डाल दिया, क्योंकि, जैसा हम देखेंगे, उन्होंने उसे एक तलघर में डाल दिया, यहाँ तक कि उसका वहाँ न मरना एक आश्चर्यकर्म था; और यह केवल एक ही बार नहीं हुआ; वरन् हम आगे अध्याय के अन्त से पहले देखेंगे कि उसके साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार किया गया कि वह उसी स्थान पर लौटने से डरता था, कहीं ऐसा न हो कि वह उसके लिए प्राणघातक सिद्ध हो।

वह उस समय का उल्लेख करता है जब यह हुआ, अर्थात् जब कसदी सेना मिस्रियों का सामना करने को निकली। तब वह नगर छोड़कर जाने के लिए स्वतन्त्र था: इससे पहले कोई बाहर नहीं जा सकता था, क्योंकि फाटक बन्द थे, और नगर शत्रुओं से घिरा भी हुआ था। वह कहता है कि तभी वह बाहर निकला, कि बिन्यामीन के देश को जाए, जहाँ, जैसा अन्यत्र प्रकट हुआ है, उसका जन्म हुआ था।

परन्तु फिर वह जोड़ता है कि बिन्यामीन के फाटक में पहरुओं के सरदार ने उसे रोक लिया। उस फाटक का नाम उसकी स्थिति से पड़ा था, क्योंकि यरूशलेम का एक भाग बिन्यामीन के गोत्र का था; और इसलिए यह कोई विचित्र बात न थी कि जो फाटक बिन्यामीन के गोत्र के भाग की ओर ले जाता था वह इसी नाम से पुकारा जाता था। सो वहीं यिर्मयाह को पहरुओं के सरदार यिरिय्याह ने रोक लिया, और वह भी एक गम्भीर दोष लगाकर, कि वह कसदियों के पास भागा जा रहा है। भविष्यद्वक्ता ने अपने आप को निर्दोष सिद्ध करने का प्रयत्न किया, परन्तु कुछ फल न हुआ; क्योंकि यह धारणा फैल चुकी थी कि वह पहले ही शत्रुओं से मिला हुआ है।

इस प्रकार अपना बचाव करने से उसे कुछ लाभ न हुआ, वरन् वह हाकिमों के पास, जो राजा के मन्त्री थे, ले जाया गया।

यह खण्ड हमें सिखाता है कि परमेश्वर के दास बहुत-सी निन्दाओं और झूठे सन्देहों का निशाना बने बिना बच नहीं सकते। यिर्मयाह आरम्भ में ही इससे बच सकता था, और शरीर की समझ के अनुसार उसकी यह छूट या मुक्ति उचित भी समझी जा सकती थी, क्योंकि अब उसकी आँखों के सामने न केवल प्राण खोने का, वरन् अपने नाम और प्रतिष्ठा को खोने का भी संकट था, जो सरल-हृदय और बुद्धिमान मनुष्यों के लिए कहीं अधिक मूल्यवान होती है। यदि यिर्मयाह बचना चाहता, तो वह यह बहाना बना सकता था, — “मैं तो सौ बार अपने प्राण को बलि के रूप में चढ़ाने को तैयार हूँ, परन्तु यदि मुझे विद्रोही समझा जाए तो इससे मुझे क्या लाभ होगा?” क्योंकि इस प्रकार उसे परमेश्वर के नाम को ही बहुत-सी निन्दाओं के लिए खोल देना पड़ता: वे कह सकते थे, “यही वह भविष्यद्वक्ता है जो डींग मारता था कि वह ऊपर से भेजा गया है, परन्तु अब वह विश्वासघाती और अपने ही देश का द्रोही बन गया है, और उसने नगर को शत्रुओं के हाथ में सौंप देने का प्रयत्न किया है।” सो यिर्मयाह अपने ऊपर रखे गए इस बोझ को झटक सकता था; परन्तु उसके लिए यह आवश्यक था कि वह इस निन्दा को सहे, जिसका झूठा दोष उस पर लगाया गया था। विश्वासयोग्य शिक्षकों को वास्तव में जहाँ तक हो सके, सब निन्दाओं को दूर करना चाहिए, और दुष्टों और द्वेषियों को रोकना चाहिए, जिससे उन्हें बुरा कहने का अवसर न मिले; परन्तु जब वे सब कुछ कर चुकें, तब भी वे अपने आप को निन्दा से मुक्त न कर पाएँगे; क्योंकि उनके शब्दों और उनके कामों का उलटा अर्थ लगाया जाएगा। इस प्रकार यिर्मयाह पर झूठे दोषों का बोझ लाद दिया गया; क्योंकि सब ने अपने मन में यह ठान लिया था कि चूँकि उसने राजा नबूकदनेस्सर की शक्ति की इतनी अधिक बड़ाई की थी, इसलिए उसने प्रजा को भय से दबा देने के लिए उससे घूस ली है; और हो सकता है कि उनमें से उपद्रवी लोगों ने जान-बूझकर, झूठे समाचारों के द्वारा भी, अज्ञानियों के सामने उसका मामला और भी बुरा दिखाया हो। सो जब उसके विषय में यह धारणा सब ओर फैल गई, तब नगर से बाहर जाते समय वह विद्रोही समझकर पकड़ लिया गया।

परन्तु वह कहता है कि वह अलग हो जाने के लिए बिन्यामीन के देश में जाना चाहता था। क्रिया {,}חלקchelak का अर्थ है बाँटना, तितर-बितर करना, बिखेरना; और इसी कारण कुछ लोगों ने यह अर्थ दिया है कि वह अपना भाग बाँटने के लिए बिन्यामीन के देश में गया; परन्तु यह कठोर और खींचतान का अर्थ जान पड़ता है। वे यह भी जोड़ते हैं, "लोगों के बीच में," मानो यिर्मयाह अपनी भूमि को सबकी साझी बनाकर लोगों को दे देना चाहता था; परन्तु इस व्याख्या में कुछ भी सम्भव या उपयुक्त नहीं है। इसलिए मुझे सन्देह नहीं कि यिर्मयाह ने इसे एक शान्त स्थान के रूप में ढूँढ़ा, जैसा कि अधिकांश व्याख्याकार समझते हैं; अतः वह बिन्यामीन के देश की ओर निकल पड़ा कि अलग हो जाए; अर्थात् कि वहाँ अपने लोगों के बीच एकान्त में रहे।

यह सचमुच बोलने की एक संक्षिप्त रीति है, परन्तु इसका अर्थ अस्पष्ट नहीं है — कि वह वहाँ रहे जहाँ वह लोगों से अलग रह सके, क्योंकि वे स्थान एक दूसरे से दूर थे। क्योंकि वह नगर से ऊब गया था, इसलिए कि उसने देखा कि वह अपना परिश्रम व्यर्थ गँवा रहा है। कुछ लोग सोचते हैं कि वह बन्दीगृह में डाले जाने से डरता था, क्योंकि उसने अभी-अभी एक अत्यन्त अप्रिय आज्ञा सुनाई थी; परन्तु अधिक सम्भव यह है कि वह थकान से चूर हो गया था, क्योंकि उसने देखा कि ऐसे कठोर और हठीले मनुष्यों पर उसका कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता। इसी कारण वह सारी प्रजा के सामने से हट जाना चाहता था।

फिर वह बात आती है जिसका हम उल्लेख कर चुके हैं, कि पहरुओं के सरदार यिरिय्याह ने उसे फाटक में पकड़ लिया, मानो वह कसदियों के पास भागा जा रहा हो। हम बता चुके हैं कि यह सन्देह कैसे उत्पन्न हुआ, अर्थात् इसी कारण कि उसने परमेश्वर की आज्ञाओं का विश्वासयोग्यता से प्रचार किया था। इससे हम देखते हैं कि परमेश्वर ने अपने दास को कैसे परखा, जब उसने उसे इस प्रकार बोलने के लिए विवश किया कि उसके वचन सन्देह के योग्य समझे गए। और इसी से हम यह भी समझ सकते हैं कि मनुष्यों के मनों में वह झूठी धारणा कितनी गहराई से जमी हुई थी, क्योंकि यिर्मयाह की अपने बचाव में कोई सुनवाई नहीं हुई। उसने तो खुलकर कहा कि वह भाग नहीं रहा, वरन् यह झूठा आरोप है। वह कहता है, यह झूठ है, मैं कसदियों के पास नहीं भाग रहा।

मैं तुम्हें पहले ही स्मरण दिला चुका हूँ कि यहाँ आई हुई क्रिया {}נפלnuphal का ठीक अर्थ है गिरना, परन्तु यहाँ इसे लाक्षणिक रूप में लेना चाहिए, अर्थात् फिर जाना, या दूसरी ओर झुक जाना। तू तो कसदियों की ओर फिर जाता या झुक जाता है, जो विद्रोह करने के ही समान था। हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता पर कोई साधारण अपराध नहीं लगाया गया था, क्योंकि अपने देश को त्याग कर शत्रुओं से जा मिलना सबसे बड़ा अपराध होता; इससे तो उसके लिए सौ बार मरना भला होता। परन्तु, जैसा मैं कह चुका हूँ, परमेश्वर के दासों को इतना साहसी होना चाहिए कि वे दुष्ट मनुष्यों की निन्दा को तुच्छ जानें, और जब परमेश्वर को भाए, तब जब कभी कोई अपमान सहना पड़े, धीरज के लिए अपने आप को तैयार करें; केवल उनका विवेक परमेश्वर और स्वर्गदूतों के सामने सदा निर्मल रहे; और उनकी खराई भी सब निन्दाओं का खण्डन करे, और वे स्वयं भी उनका खण्डन करें, यदि ऐसे लोग हों जो उनकी बात सुनना सह सकें; परन्तु यदि उन्हें सदा अपना बचाव करने का अवसर न दिया जाए, तो वे इस अनादर को धीरज से सहें। और हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि परमेश्वर के दास, यद्यपि अपने ऊपर लगाए गए अपराधों से अपने आप को निर्दोष ठहराने और अपने प्राण को जोखिम में डालकर भी अपनी निर्दोषता का बचाव करने को तैयार रहते हैं, तौभी प्रायः बिना सुने ठुकरा दिए जाते और दोषी ठहराए जाते हैं। यह सचमुच बड़ा अनादर है; परन्तु तौभी जब यिर्मयाह के साथ ऐसा व्यवहार हुआ, तो आज यह हमें असहनीय या नया नहीं लगना चाहिए। अब आगे लिखा है —

यिर्मयाह 37:15

15. तब हाकिमों ने यिर्मयाह से क्रोधित होकर उसे पिटवाया, और योनातान प्रधान के घर में बन्दी करके डलवा दिया; क्योंकि उन्होंने उसको साधारण बन्दीगृह बना दिया था।

15. Et ebullierunt (iracundia) principes (nam {;}קצףhoc significat, vel, efferbuerunt principes) contra Jeremiam, et percusserunt eum (alii vetunt transitive, percutere fecerunt, sed proprie est percutere, vel verberare, percusserunt ergo eun) et posuerunt ipsum in domum carceris, in domum Jonathan scribae, quia ipsam fecerant (id est, constituerant) in domum carceris.

333 मोल लेने या व्यापार करने का विचार सेप्टुआजिन्ट (Sept.) देता है, "कि वहाँ लोगों के बीच में से मोल ले।" वल्गेट (Vulg.) का पाठ है, "कि वह वहाँ नगरवासियों के सामने अपनी सम्पत्ति बाँटे;" और सीरियाई (Syr.) तथा तरगुम (Targ.) भी मूलतः यही अर्थ देते हैं। शाब्दिक अनुवाद है, "वहाँ से (या, वहाँ) लोगों के बीच एक भाग के लिए;" जिसका अर्थ यह जान पड़ता है कि वह बिन्यामीन के देश में जाना चाहता था, कि अपने लोगों के बीच अपने निज भाग में से अपना हिस्सा या अंश प्राप्त करे। अतः ब्लेनी का अनुवाद ठीक प्रतीत होता है, "कि लोगों के बीच उसका एक भाग प्राप्त करे।" कसदियों ने उसे बिन्यामीन के देश में उसकी पैतृक सम्पत्ति से वंचित कर दिया था; जब वे पीछे हट गए, तब उसने वहाँ जाने का विचार किया, "इस उद्देश्य से," जैसा ब्लेनी कहता है, "कि अपने अन्य पड़ोसियों के साथ भूमि की उपज में से अपना भाग ले।" — सं.

यहाँ यिर्मयाह वही वृत्तान्त आगे बढ़ाता है, और दिखाता है कि उसके साथ कितना अन्यायपूर्ण व्यवहार किया गया, क्योंकि उसे हाकिमों के हाथों से भी उतना ही न्याय न मिला जितना पहरुओं के सरदार से। निःसन्देह वह उनके सामने अपना बचाव करने को तैयार था, और पर्याप्त प्रमाण भी हाथ में थे, केवल उसे बहरों से बोलना पड़ता। परन्तु यहाँ वह एक ही शब्द से दिखाता है कि बोलने की स्वतन्त्रता छीन ली गई थी, क्योंकि उन पर ऐसा प्रचण्ड उन्माद छा गया था कि वे उसकी सुनते ही न थे। और यहाँ हम देख सकते हैं कि क्रोध न्यायपूर्ण और शान्त निर्णयों का कितना विरोधी है; क्योंकि यदि हम सही और निष्पक्ष न्यायी होना चाहते हैं, तो आत्म-संयम विशेष रूप से आवश्यक है। इसलिए जब हमारे मन रोष या क्रोध से भड़क उठते हैं, तब यह असम्भव है कि कोई सीधाई या मानवता प्रबल रहे। सो यिर्मयाह शिकायत करता है कि उस पर अत्याचार हुआ, क्योंकि हाकिम क्रोध से उबल पड़े, यहाँ तक कि उन्होंने उसे वह स्पष्टीकरण देने न दिया जो उसने तैयार कर रखा था।

फिर वह जोड़ता है कि उन्होंने उसे मारा। निःसन्देह उन्होंने अपने सेवकों को उसे मारने की आज्ञा दी; क्योंकि यह अत्यन्त विचित्र बात होती, यदि हाकिम स्वयं उठकर भविष्यद्वक्ता को घूँसों से मारते, या अपने हाथों से पीटते। अतः सम्भव यही है कि वह उनकी आज्ञा से और उनके कहने पर पीटा गया। यदि मैं भूल नहीं करता, तो यही कारण है कि कुछ लोगों ने इसका अनुवाद यों किया है, "उन्होंने उसे पिटवाया।" परन्तु प्रायः ऐसा कहा जाता है कि उस व्यक्ति ने किसी मनुष्य को मार डाला, जिसने उसे मरवाने की आज्ञा दी हो, जबकि उसने स्वयं उसे उँगली से भी न छुआ हो। इसी प्रकार यिर्मयाह हाकिमों के द्वारा पीटा गया, क्योंकि उन्होंने उसे पीटने की आज्ञा दी थी। और यह स्थल मानो दर्पण में यह भी दिखाता है कि परमेश्वर के दासों की दशा कितनी दयनीय होती, यदि वह अपने आत्मा की सामर्थ्य से उन्हें सम्भाले न रखता। क्योंकि यहाँ एक पवित्र भविष्यद्वक्ता अन्यायपूर्ण आरोपों और अपमानों से भी दबा हुआ है, और हाकिम कोड़े लगाने से भी न रुके, और अन्त में वह एक गड्ढे में डाल दिया गया। इसलिए जब कभी हमारे साथ ऐसा कुछ हो, तो हम यिर्मयाह पर अपनी दृष्टि लगाएँ, और उस पवित्र भविष्यद्वक्ता के पदचिह्नों पर चलना हमें भारी न लगे; और न हम उन परीक्षाओं को सहना कठिन समझें जिनसे परमेश्वर ने उसे अभ्यस्त करना उचित समझा। वह कहता है, उन्होंने उसे घर में डाल दिया, और फिर शब्द बदल जाता है, बन्दीगृह, {}האסורeasur, परन्तु अर्थ वही है। अब आगे बताया गया है कि वह किस प्रकार का बन्दीगृह था —

यिर्मयाह 37:16

16. जब यिर्मयाह उस तलघर में, और उसकी कोठरियों में पहुँचा, और यिर्मयाह वहाँ बहुत दिनों तक रहा;

16. Et quo venit Jeremias in domum lacus, et ad mansiones, et sedit ibi Jeremias diebus multis.

मेरे विचार में यहाँ अव्यय {,}כיki को समयवाचक क्रियाविशेषण के रूप में लेना चाहिए, यद्यपि व्याख्याकारों ने इस पर ध्यान नहीं दिया; वह कहता है, जब यिर्मयाह गड्ढे या तलघर, या बन्दीगृह के घर में आया। शब्द {}בור कभी-कभी कब्र का अर्थ भी देता है, परन्तु यहाँ इसे गड्ढा या गहरा स्थान समझना चाहिए: उसका अभिप्राय यह है कि वह एक अन्धेरा और गन्दा बन्दीगृह था। और वह जोड़ता है, और कोठरियों में। मैं नहीं जानता कि कुछ लोगों ने इसका अनुवाद "भोजनालय" क्यों किया है; क्योंकि शब्द {,}החניותecheniot का अर्थ है संकरे बन्दीगृह, जिन्हें आज हम cachots (काल-कोठरियाँ) कहते हैं: अतः वह एक तलघर में डाला गया, जहाँ संकरे स्थान थे, यहाँ तक कि उस पवित्र जन को न तो स्वतन्त्रता से उठने, न खड़े होने, न बैठने, न लेटने की जगह थी। तब भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि वह उस स्थान की संकीर्णता से ऐसा बन्द था कि वह कठिनाई से ही बैठ, लेट या सीधा खड़ा हो सकता था; और वह कहता है कि वह वहाँ बहुत दिनों तक रहा।

हमें इस घटना की परिस्थितियों पर ध्यान देना चाहिए: अपने आप में यही बात काफी क्रूर थी कि एक निर्दोष मनुष्य को पीटने के बाद बन्दीगृह में ठूँस दिया जाए; परन्तु जब एक अन्धेरा और गहरा बन्दीगृह चुना गया, और जब वह एक संकरे स्थान में बन्द किया गया, मानो बेड़ियों में जकड़ा हो, तब उसके साथ किए गए अनादर में बड़ी वृद्धि हुई। इसलिए जब पवित्र भविष्यद्वक्ता के साथ ऐसा घोर अत्याचार हुआ, तो हम इसे विचित्र न समझें, जब आज परमेश्वर की सन्तान वही बात सहती है, और उसी कारण से, अर्थात् स्वर्गीय सत्य की गवाही देने के कारण। जब इसमें समय की लम्बाई भी जुड़ गई, तो विपत्ति और बढ़ गई; क्योंकि वह कुछ दिनों या एक महीने के लिए बन्दीगृह में नहीं रखा गया, वरन् नगर के ले लिए जाने तक; हाँ, उसी बन्दीगृह में नहीं, क्योंकि राजा ने, जैसा हम अभी देखेंगे, उसे पहरे के आँगन में पहुँचवा दिया। तौभी वह दूसरी बार एक गन्दे बन्दीगृह में डाला गया, मानो वह मृत्यु के लिए ठहराया गया हो; वहाँ से भी वह बाद में राजा की आज्ञा से निकाला गया। परन्तु भविष्यद्वक्ता कहता है कि वह उस तलघर में बहुत दिनों तक रहा। अब आगे लिखा है —

यिर्मयाह 37:17

17. तब सिदकिय्याह राजा ने उसको बुलवा भेजा, और अपने भवन में उससे छिपकर यह प्रश्न किया, क्या यहोवा की ओर से कोई वचन पहुँचा है? यिर्मयाह ने कहा, हाँ, पहुँचा है। वह यह है, कि तू बाबुल के राजा के वश में कर दिया जाएगा।

17. Et misit rex Zedechias et sustulit cum; et interrogavit eum rex domi suae secreto loco (hoc est, seorsum) et dixit, Estne sermo a Jehova? Tunc dixit Jeremias, Est; et cixit, In manum regis Babylonis traderis.

इन शब्दों से हम सीखते हैं कि राजा सिदकिय्याह, यद्यपि उसने अच्छी और बुद्धिमानी की सम्मतियों को, वरन् परमेश्वर और उसके सत्य को भी नहीं माना था, तौभी वह सबसे बुरे लोगों में से न था, क्योंकि उसने अपनी ही इच्छा से भविष्यद्वक्ता को अपने पास बुलाया, और यह जानना चाहा कि क्या वह किसी रीति से परमेश्वर को शान्त कर सकता है। संक्षेप में, यहाँ सिदकिय्याह के चरित्र का वर्णन दिया गया है: वह परमेश्वर और उसके वचन के अधीन होना नहीं चाहता था, तौभी वह इतना क्रूर न था कि भविष्यद्वक्ता पर क्रोध से भड़क उठे; और न उसने परमेश्वर का सारा भय, धर्म की सारी चिन्ता, और भविष्यद्वाणी की शिक्षा के प्रति सारा आदर पूरी तरह त्याग दिया था। क्योंकि निःसन्देह उसने यिर्मयाह को परमेश्वर का सच्चा दास समझकर बुलवाया, और कुछ हद तक उसका आदर किया, और चाहा कि परमेश्वर उस पर कृपालु हो। परन्तु कपटियों के साथ प्रायः यही होता है: वे स्वेच्छा से परमेश्वर से मेल कर लेना चाहते हैं, परन्तु साथ ही स्वतन्त्र भी रहना चाहते हैं, अर्थात् अपनी पापमय प्रवृत्तियों को बनाए रखना चाहते हैं; संक्षेप में, वे ऐसे जीना चाहते हैं कि परमेश्वर उनके लिए स्थान छोड़ दे, और उन्हें मनमाना पाप करने दे।

334 प्राचीन अनुवाद और तरगुम (Targ.) इस शब्द का अनुवाद भिन्न-भिन्न रीति से करते हैं; इसका अर्थ स्पष्ट रूप से नहीं समझा गया था। ब्लेनी सबसे अच्छी व्याख्या देता है, जो इसका अनुवाद "कोठरियाँ" करता है। वह कहता है, "तलघर" कुएँ के समान एक गहरा गड्ढा था, और उसके तल के पास आले या कोठरियाँ खोदी गई थीं, जिनमें बन्दियों को रखा जाता था। यह शब्द {,{הנה से निकला है, जिसका अर्थ है टिकाना, बसाना, ठहराना; इसलिए यहाँ बहुवचन संज्ञा का अर्थ है बन्दियों के टिकने या ठहरने के स्थान, जहाँ वे गड्ढे के तल के कीचड़ में धँसे बिना टिक सकते थे, जैसा कि एक अन्य अवसर पर यिर्मयाह के साथ हुआ था। देखिए यिर्मयाह 38:6। ऐसा जान पड़ता है कि उस गड्ढे में कोठरियाँ नहीं थीं। — सं.

335 मूल ग्रन्थ में यह अनुच्छेद मूलपाठ के साथ मिला हुआ है; परन्तु इसे अलग से प्रस्तुत करना अधिक उचित समझा गया है। — सं.

ऐसा था सिदकिय्याह, तौभी वह अभक्ति की चरम सीमा तक नहीं पहुँचा था, क्योंकि अब तक उसके मन में भविष्यद्वक्ता के लिए कुछ आदर था; और न वह अपने मन्त्रियों के समान बर्बर और क्रूर था। अतः उसने उसे अपने पास बुलाया और एकान्त में उससे पूछा, कि वह, जैसा हम एक अन्य स्थान पर देखेंगे, अपनी राजकीय प्रतिष्ठा से किसी भी अंश में न गिरे: क्योंकि उसने भविष्यद्वक्ता से केवल यह माँगा कि वह खुलकर न बोले, क्योंकि ऐसा करने से वह अपना अधिकार खो देता।

तब उसने उससे गुप्त रूप से पूछा, क्योंकि वह असमंजस में पड़ा था। वह तो किसी अनुकूल उत्तर की कामना करता था, परन्तु उसकी आशा करने का साहस भी उसे कठिनाई से होता था; और इसलिए वह भविष्यद्वक्ता को एक गुप्त स्थान में ले गया, और बिना किसी गवाह के उससे पूछा, क्या, उसने कहा, परमेश्वर की ओर से कोई वचन है? कुछ लोग इसकी व्याख्या ऐसे करते हैं मानो सिदकिय्याह ने पूछा हो कि क्या यिर्मयाह की भविष्यद्वाणियाँ सच्ची थीं, मानो उसने कहा हो, "जो कुछ तू अब तक कहता आया है, क्या वह परमेश्वर की ओर से आया है?" परन्तु यह उपयुक्त व्याख्या नहीं है; इसके विपरीत, उसने यह पूछा कि क्या भविष्यद्वक्ता को हाल ही में परमेश्वर की ओर से कोई वचन मिला है? अतः वह कोई नया सन्देश चाहता था, और नगर के भावी छुटकारे के विषय में कुछ सुनना चाहता था: क्योंकि निःसन्देह उसे निश्चय था कि यिर्मयाह अब तक भविष्यद्वक्ता का पद वैसे ही निभाता आया है जैसा उसे उचित था; क्योंकि उसने उससे एक साधारण मनुष्य के समान नहीं पूछा, और न उसे धोखेबाज़ समझा, वरन् यह पूछा कि क्या परमेश्वर की ओर से कोई वचन है। जो मैंने पहले कहा वह सत्य है, कि कपटी लोग सदा मूर्खतापूर्ण रीति से परमेश्वर का अनुग्रह ढूँढ़ते हैं; क्योंकि वे चाहते हैं कि परमेश्वर उनकी पापमय अभिलाषाओं को तृप्त करे, परन्तु परमेश्वर अपने आप का इन्कार नहीं कर सकता। इसलिए सिदकिय्याह ने, यद्यपि ऊपर से धर्म के प्रति कुछ आदर दिखाया, तौभी मूर्खता से पूछा, क्या यहोवा की ओर से कोई वचन है? अर्थात् क्या हाल ही में यिर्मयाह पर कोई सन्देश प्रकट किया गया है? उसने उत्तर दिया, है, अर्थात् यह, तू कसदियों के हाथ में कर दिया जाएगा।

यहाँ हम भविष्यद्वक्ता के साहस पर ध्यान दे सकते हैं; वह उन सब विपत्तियों से, जो उस पर पड़ी थीं, टूटा नहीं था, वरन् उसे सौंपे गए पद को सदा विश्वासयोग्यता से निभाता रहा। इसलिए उसने राजा को, यद्यपि जोखिम के बिना नहीं, सच्चाई से उत्तर दिया, उसने कहा, तू कसदियों के हाथ में कर दिया जाएगा: क्योंकि वह अभी-अभी उस बन्दीगृह से निकला ही था, जहाँ वह मानो कब्र में गाड़ा गया था, और हम देखेंगे कि वह बन्दीगृह उसके लिए मृत्यु के समान रहा था; और भविष्यद्वक्ता निर्बलता और भय से रहित न था, जैसा वह अभी दिखाएगा; तौभी भय ने उसे अपने सौंपे गए पद को विश्वासयोग्यता से निभाने से नहीं रोका। यद्यपि भविष्यद्वक्ता बन्दीगृह के कष्टों से डरता था, यद्यपि वह मृत्यु से भी भयभीत था, तौभी उसने इन सब भावनाओं पर विजय पाई, और अपने प्राण को बलिदान के रूप में अर्पित कर दिया, जब उसने राजा को खुलकर और निडरता से उत्तर दिया कि कसदी शीघ्र ही विजयी होंगे, और उसे बन्दी बना लेंगे। इसके बाद वह विवाद आता है जो भविष्यद्वक्ता ने राजा से किया —

यिर्मयाह 37:18

18. फिर यिर्मयाह ने सिदकिय्याह राजा से कहा, मैं ने तेरा, तेरे कर्मचारियों का, व इस प्रजा का क्या अपराध किया है, कि तुम लोगों ने मुझ को बन्दीगृह में डलवाया है?

18. Et dixit Jeremias regi Zedechiae: Quid peccavi tibi et servis tuis? (hoc est, quid sceleris in to admisi et in servos tuos) et populum hunc, quod tradidistis me in domum carceris.

यद्यपि भविष्यद्वक्ता ने वह बात कही थी जो राजा को अप्रिय थी, तौभी वह शिकायत करता है कि उसके साथ अन्याय हुआ, क्योंकि वह बन्दीगृह में डाला गया था; और इस प्रकार वह दिखाता है कि नगर के विनाश और राज्य के नाश की धमकी देने के कारण उसे अन्याय से दोषी ठहराया गया था, क्योंकि अपने पद के दायित्व के कारण वह ऐसा करने के लिए विवश था। अतः भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि उसने इसमें पाप नहीं किया — कि उसने परमेश्वर की आज्ञाओं का प्रचार किया, चाहे वे राजा और प्रजा को कितनी ही कड़वी क्यों न लगी हों।

यह स्थल विशेष ध्यान देने योग्य है: पृथ्वी के राजा इतने अभिमानी होते हैं कि ज्यों ही वे कोई आज्ञा देते हैं, वे चाहते हैं कि उनके अधिकार के विषय में सब विवाद थम जाए; क्योंकि वे चाहते हैं कि उनके अपने नियम व्यवस्था माने जाएँ, और उनके अपने आदेश पवित्र और अधिकारपूर्ण समझे जाएँ; तौभी हम जानते हैं कि अपनी ही इच्छाओं के पीछे चलकर वे प्रायः ऐसे आदेश देते हैं जो पूर्णतः अन्यायपूर्ण और हर उचित बात के विरुद्ध होते हैं। अतः, जैसा मैंने कहा, यह स्थल विशेष ध्यान देने योग्य है; क्योंकि यिर्मयाह निडरता से घोषणा करता है कि उसने पाप नहीं किया, यद्यपि उसने राजा को धमकी दी थी, उसके मन्त्रियों को अप्रसन्न किया था, प्रजा की अभक्ति के विरुद्ध कड़े वचन कहे थे, और नगर तथा मन्दिर के पूर्ण विनाश की घोषणा की थी। अतः वह इन्कार करता है कि इन सब में उसने कुछ भी अनुचित किया। इसी प्रकार दानिय्येल ने भी कहा, "मैं ने परमेश्वर और राजा के विरुद्ध कोई अपराध नहीं किया," (दानिय्येल 6:22) तौभी उसने राजा के आदेश की उपेक्षा की थी, और अभक्तिपूर्ण चापलूसी से राजा को परमेश्वर के स्थान पर रखने से दृढ़ता से इन्कार किया था; तौभी उसने इन्कार किया कि उसने राजा के विरुद्ध कुछ भी अनुचित किया, क्योंकि उसका आदेश अन्यायपूर्ण और दुष्ट था। इसलिए हम स्मरण रखें कि यद्यपि राजा अपने आदेशों की हमारे द्वारा उपेक्षा किए जाने को सहन न करें, तौभी वे परमेश्वर और उसके स्वर्गदूतों के सामने निर्दोष नहीं ठहरते; और यह भी कि जब धर्म हमें विवश करे, और जब राजाओं की अभक्तिपूर्ण और अन्यायपूर्ण आज्ञाओं का पालन करना उचित न हो, तब हम निडरता से, खुलकर, और जैसा कहते हैं, पूरे मुँह से अपनी निर्दोषता का दावा कर सकते हैं।

इसके बाद वह जोड़ता है —

यिर्मयाह 37:19

19. जो भविष्यद्वक्ता तुम को भविष्यद्वाणी सुनाया करते थे कि बाबुल का राजा तुम पर और इस देश पर चढ़ाई नहीं करेगा, वे अब कहाँ हैं?

19. Et ubi prophertae vestri, qui prophetarunt vobis, dicendo, Non veniet rex Babylonis contra vos et contra hanc terram?

यहाँ यिर्मयाह, हियाव बाँधकर, और भी ऊँचे स्थान पर बढ़ता है; क्योंकि वह सिदकिय्याह की मूर्खता को धिक्कारता है, क्योंकि उसने झूठे भविष्यद्वक्ताओं और उनकी चापलूसियों पर कान लगाया था। परन्तु उसने यह इसलिए किया कि अपनी निर्दोषता को और भी पूरी रीति से पुष्ट करे, मानो उसने कहा हो, "मुझ पर तो भारी दोष लगाया जाता है, क्योंकि मैंने नगर और मन्दिर के विनाश की धमकी दी; परन्तु यदि प्रभु ने ही मुझे ऐसा करने के लिए विवश किया हो, तो क्या? और यह प्रकट है कि मुझे परमेश्वर ने नियुक्त किया था, और मैंने बिना अधिकार के कुछ भी नहीं कहा; क्योंकि मैंने सदा वही घोषित किया जो घटित हुआ है, और घटनाओं ने प्रमाणित कर दिया है कि मैं ऊपर से भेजा गया था, जब मैंने तुम्हें बताया कि क्या होनेवाला है। परन्तु तुम्हारे भविष्यद्वक्ता कहाँ हैं? क्योंकि वे सदा तुम्हारी चापलूसी करते आए हैं; और उनके झूठ के कारण ऐसा हुआ है कि तुम सीधे मार्ग पर नहीं लौटे। जब मैंने पहले तुम्हें चेतावनी दी, तब भी तुम्हारे हाथ में था कि परमेश्वर से मेल कर लो; और मेरा सारा परिश्रम और प्रयत्न इसी उद्देश्य से था कि तुम स्वेच्छा से पश्चाताप करके परमेश्वर के क्रोध से पहले ही बच जाओ। इसलिए जब तुम्हारे भविष्यद्वक्ताओं ने तुम्हें धोखा दिया है, और अब परिणाम इसे स्पष्ट रूप से प्रमाणित करता है, तो हे राजा, जान ले कि मैं ऊपर से भेजा गया हूँ।"

इस प्रकार हम देखते हैं कि यिर्मयाह अपने प्राण के विषय में इतना चिन्तित न था कि अपने उद्देश्य पर स्थिर न रहे; और इसलिए वह अपनी सुरक्षा का प्रबन्ध करने के लिए सत्य को सच्चाई से अंगीकार करने से नहीं हटा, जैसा वे लोग करते हैं जो डरपोक हैं और सोचते हैं कि वे बुद्धिमानी से काम करते हैं, जब वे झुक जाते हैं और सत्य की कीमत पर अपने विरोधी मनुष्यों को प्रसन्न करने का प्रयत्न करते हैं। यिर्मयाह ने ऐसा नहीं किया।

उसे अपने प्राण की चिन्ता तो थी, जैसा हम अभी देखेंगे; परन्तु वह अपने पद के कर्तव्य को निभाता रहा, और ऊपर से उसे सौंपे गए सत्य को सौ प्राणों से भी अधिक मूल्यवान समझता था। अतः इसी के सम्बन्ध में वह कहता है, तुम्हारे भविष्यद्वक्ता कहाँ हैं? मानो उसने कहा हो, "तुम देखते हो कि उनकी झूठी भविष्यद्वाणियों से तुम सब धोखा खा गए हो।" आगे लिखा है —

यिर्मयाह 37:20

20. अब, हे मेरे प्रभु, हे राजा, मेरी प्रार्थना ग्रहण कर कि मुझे योनातान प्रधान के घर में फिर न भेज, नहीं तो मैं वहाँ मर जाऊँगा।

20. Et tu audi obsecro (vel, nunc, vel agedum) domine mi Rex; cadat precatio mea coram facie tua, ut ne (ad verbum, et non sed, potius, ut ne) remittas me (v.el, redire me facias) in domum Jonathan scribae, neque moriar lilic.

यह पद दिखाता है कि यिर्मयाह मानवीय भावनाओं से रहित न था, क्योंकि वह भी अन्य मनुष्यों के समान मृत्यु से डरता था। परन्तु तौभी वह अपने आप को ऐसे वश में रख सकता था कि कोई भी भय उसे अपने कर्तव्य से न हटा सका। अतः भय ने उसका हियाव नहीं तोड़ा, क्योंकि जिस साहस पर हमने ध्यान दिया वह उसकी स्थिरता का स्पष्ट प्रमाण था। इसलिए भविष्यद्वक्ता ने, अपने काम के विषय में, हर चिन्ता और मृत्यु के भय पर विजय पाई; तौभी उसने अपने प्राण की उपेक्षा नहीं की, वरन् जहाँ तक हो सका, अपनी विपत्तियों से छुटकारा ढूँढ़ा। उसने राजा से कुछ राहत माँगी। इससे हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता न तो लकड़ी के लट्ठे थे, और न उनके हृदय लोहे के थे; परन्तु यद्यपि वे मानवीय भावनाओं के अधीन थे, तौभी अपने काम के विषय में वे अपने आप को अजेय साहस तक ऊँचा उठाते थे, कि अपना पद पूरा करें।

जहाँ तक इन शब्दों का सम्बन्ध है, मेरी प्रार्थना तेरे सामने गिरे, उनका अर्थ है दीन विनती; यह कहने की एक रीति है, जो, जैसा हम पहले देख चुके हैं, मनुष्यों के प्रार्थना में दण्डवत् करने की रीति से ली गई है, और यहाँ परमेश्वर से नश्वर मनुष्यों पर लागू की गई है। अतः भविष्यद्वक्ता ने दीनता से विनती की कि वह फिर से उस भयानक बन्दीगृह में न डाला जाए जहाँ वह बन्द रहा था — और क्यों? कि वह मर न जाए। हम देखते हैं कि वह मृत्यु से बचना चाहता था, क्योंकि यह स्वाभाविक था; तौभी वह, जब कभी आवश्यक हो, परमेश्वर द्वारा उस पर रखे गए कर्तव्य को निभाने से तनिक भी हटने की अपेक्षा मरने को तैयार था।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जैसे हमें पृथ्वी पर अनेक प्रकार से युद्ध करना पड़ता है, वैसे ही हम तेरे आत्मा की सामर्थ्य से ऐसे उत्साहित हों कि आग और जल में से होकर आगे बढ़ते जाएँ, और सदा तेरे ऐसे अधीन रहें कि तेरी सहायता पर भरोसा रखते हुए हम मृत्यु के सब संकटों, सब क्लेशों, सब अपमानों और मनुष्यों के सब आतंकों का सामना करने में कभी न हिचकिचाएँ, जब तक कि अन्त में अन्तिम विजय पाकर हम उस धन्य विश्राम में न पहुँच जाएँ, जिसे तेरे एकलौते पुत्र ने अपने ही लहू से हमारे लिए प्राप्त किया है। — आमीन।

एक सौ सैंतालीसवाँ व्याख्यान

यिर्मयाह 37:21

21. तब सिदकिय्याह राजा की आज्ञा से यिर्मयाह पहरे के आँगन में रखा गया, और जब तक नगर की सब रोटी न चुक गई, तब तक उसको रोटीवालों की दूकान में से प्रतिदिन एक रोटी दी जाती थी। यिर्मयाह पहरे के आँगन में रहने लगा।

21. Et praecepit rex Zedechias, et posuerunt Jeremiam in atrio custodiae, et dederunt ei frustum panis quotidie e platea pistorum, usque dum consumptus esset totus panis ex urbe; et habitavit Jeremias in atrio custodiae.

भविष्यद्वक्ता हमें बताता है कि परमेश्वर ने उन दुःखों पर दृष्टि की जिनमें वह अन्याय से डाला गया था: और निःसन्देह राजा यिर्मयाह के प्रति दयालु हो गया, क्योंकि परमेश्वर ने उसके हृदय को उस ओर फेर दिया जो न्यायपूर्ण और उचित था। हमने कल कहा तो था कि राजा स्वभाव से क्रूर या रक्तपिपासु न था; तौभी यदि वह परमेश्वर के आत्मा के गुप्त कार्य से प्रभावित न होता, तो भविष्यद्वक्ता की विनती को इतनी सहजता से न मानता। इससे हम देखते हैं कि परमेश्वर अपने दासों पर कैसे कृपा करता है और आवश्यकता पड़ने पर उनकी निर्बलता का ध्यान रखता है। तौभी हम यह भी देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता के साथ इतनी दया का व्यवहार नहीं किया गया कि उसे स्वतन्त्र होकर अपने घर लौटने दिया जाए, वरन् वह दूसरे बन्दीगृह में पहुँचाया गया, जहाँ उसकी दशा अधिक सहनीय थी। अतः वह पहरे के आँगन में था।

वह कहता है कि उसे प्रतिदिन, या हर दिन, रोटी का एक टुकड़ा दिया जाता था। इस शब्द का अनुवाद कुछ लोग "पिण्ड" या लोंदा करते हैं, और कभी-कभी इसका अर्थ एक बड़ी रोटी होता है; परन्तु सम्भव यह है कि इतनी बड़ी कमी के समय भविष्यद्वक्ता को बहुत थोड़ा ही भोजन मिलता था। अतः उसे हर दिन रोटी की एक पपड़ी या टुकड़ा मिलता था। हम देखते हैं कि उसका भोजन कितना तुच्छ था; परन्तु परमेश्वर प्रायः अपने दासों को इसी रीति से परखता है, और इस संसार के सब स्वादिष्ट पदार्थों को उनसे रोक रखता है। आगे जोड़ा गया है, रोटीवालों की गली में से; मेरे विचार में इन शब्दों का अर्थ यह है कि वह मोटी रोटी थी, मैदे की बनी नहीं, जैसी धनी लोग खाते थे, क्योंकि उनके मुँह रूखी और मोटी वस्तु को सह नहीं सकते थे। अतः परमेश्वर का पवित्र भविष्यद्वक्ता साधारण रोटी से सन्तुष्ट था। राजा और उसके मन्त्रियों के अपने रोटी पकानेवाले थे; परन्तु कहा गया है कि भविष्यद्वक्ता के लिए रोटी एक सार्वजनिक स्थान से, अर्थात् रोटीवालों की गली से लाई जाती थी। और उस समय ऐसी कमी में जो रोटी बिकती थी, वह निःसन्देह काली रोटी थी। इससे हम देखते हैं कि वह किस प्रकार की रोटी थी, क्योंकि वह प्रजा के साधारण उपयोग के लिए बेची जाती थी।

इस प्रकार भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि यद्यपि उसे कुछ ढील दी गई थी, तौभी वह अब भी बन्दीगृह में बन्द था, और यह भी कि उसे न मांस, न कोई स्वादिष्ट वस्तु दी जाती थी, केवल रोटी का एक टुकड़ा। तौभी वह परमेश्वर की कृपा का स्मरण करता है, क्योंकि इतनी बड़ी कमी में भी वह रोटी से वंचित न था। अतः उसे अपनी प्रतिदिन की रोटी तब तक मिलती रही जब तक सारी भोजन-सामग्री चुक न गई।

और इससे हम सीखते हैं कि परमेश्वर प्रायः अपने दासों का ऐसा प्रबन्ध करता है कि ऐसा जान पड़ता है मानो उसने उन्हें त्याग दिया हो; तौभी ठीक उसी समय वह विशेष रूप से उनकी चिन्ता करता है और उनके निर्वाह के लिए जो आवश्यक है वह उन्हें देता है। यदि यिर्मयाह घर पर होता, तो प्रजा उसे किसी भी समय पत्थरवाह कर सकती थी; क्योंकि ऐसे लोगों की कमी न थी जो भूखे मनुष्यों को उसके विरुद्ध भड़काने को तैयार थे। अतः घर पर उसका प्राण हर क्षण संकट में रहता। परन्तु अब बन्दीगृह में वह सुरक्षित था, और कोई उसकी कुछ हानि नहीं कर सकता था। इसके अतिरिक्त, यदि वह घर पर होता, तो बहुत से लोग उसे लूट सकते थे, यहाँ तक कि उसके पास जीवित रहने के लिए कुछ भी न छोड़ते; परन्तु बन्दीगृह में उसे उसका प्रतिदिन का भाग मिलता था। इस प्रकार परमेश्वर प्रायः अपने दासों की ऐसी रीति से अगुवाई करता है जो अद्भुत और हमारी समझ से परे है, और साथ ही एक घर के स्वामी के समान उनकी घटियाँ पूरी करता है। संक्षेप में, भविष्यद्वक्ता यहाँ संकेत करता है कि परमेश्वर उसकी चिन्ता करता था, यहाँ तक कि सारी प्रजा में अकाल और कमी के समय भी उसकी रोटी उसे दी जाती थी, जब वह उसे माँग भी नहीं सकता था। जब वह न परिश्रम से, न उद्योग से, न भीख माँगकर, न धन से अपने लिए रोटी प्राप्त कर सकता था, तब वह दिखाता है कि परमेश्वर ने उस संकट में उसे खिलाने के लिए उसकी चिन्ता की।

तौभी वह जोड़ता है कि वह पहरे के आँगन में था, यह दिखाने के लिए कि परमेश्वर ने उसके धीरज को परखा, क्योंकि बन्दीगृह अपमान का स्थान था। भविष्यद्वक्ता सबकी निन्दा का पात्र बना रहा; और फिर हाकिम प्रायः उसे संकट की धमकी दे सकते थे, और उसे किसी दूसरे स्थान में भी पहुँचा सकते थे, जैसा हम आगे देखेंगे। इसलिए परमेश्वर ने अपने भविष्यद्वक्ता को केवल कुछ हद तक ही सहायता पहुँचाई, क्योंकि उसे पूरी तरह छुड़ाना उसकी इच्छा न थी, तौभी उसने उसे चरम दुर्दशा तक नहीं पहुँचने दिया। अब आगे लिखा है —

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