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यिर्मयाह 22
यिर्मयाह 22:1-3 1. यहोवा ने यों कहा: यहूदा के राजा के भवन में उतरकर वहाँ यह वचन कह,
1. Sic dicit Jehova, Descende in domum regis Jehudah, et loquere illic ser-monem hunc,
2. और कह, हे दाऊद की गद्दी पर विराजमान यहूदा के राजा, तू अपने कर्मचारियों और अपनी प्रजा समेत जो इन फाटकों से प्रवेश करती है, यहोवा का वचन सुन।
2. Et dices, Audi sermonem Jehova, rex Jehudah, qui sedes super solium Davidis, tu et servi tui, et populus tuus qui ingredimini per portas has:
3. यहोवा यों कहता है, न्याय और धर्म के काम करो; और लुटे हुए को अन्धेर करनेवाले के हाथ से छुड़ाओ; और परदेशी, अनाथ और विधवा पर अन्याय न करो, न उन पर उपद्रव करो, और न इस स्थान में निर्दोषों का लोहू बहाओ।
3. Sic dicit Jehova, Facite judicium et justitiam, et eripite spoliatum e manu oppressoris; peregrinum, pupilum, et viduam ne fraudetis (Hieronymus hoc verbum ubique vertit, contristari, vel, tristitia afficere; significat autem potius inferre violentiam, aut fraudulenter nocere;) ne violentiam exerceatis (alii vertunt, {{}לא{, רסמחתet sanguinem innocentem ne fundatis in loco isto.
भविष्यद्वक्ता को फिर से आज्ञा दी जाती है कि वह राजा और उसके मन्त्रियों को डाँटे; परन्तु साथ ही यह उपदेश सारी प्रजा तक भी फैलाया गया है। सिर से आरम्भ करना आवश्यक था, ताकि साधारण लोग जान लें कि यह कोई खिलवाड़ की बात नहीं है, क्योंकि परमेश्वर किसी को न छोड़ेगा, हाँ, स्वयं राजा और उसके दरबारियों को भी नहीं; क्योंकि जब निचले वर्ग के लोगों ने देखा कि सबसे ऊँचे लोग भी गिरा दिए गए, तो उन पर और भी अधिक भय छा गया। इसलिए, ताकि जो कुछ यहाँ सिखाया गया है वह सब के हृदयों में और भी प्रभावशाली रीति से उतर जाए, भविष्यद्वक्ता को आज्ञा दी गई कि वह स्वयं राजा और उसके दरबारियों को सम्बोधित करे; और उसके बाद उसे यह भी आज्ञा दी गई कि वह प्रजा के सारे समूह को भी इसमें सम्मिलित करे। और इससे प्रकट होता है कि अनुग्रह की कुछ आशा अब भी शेष थी, बशर्ते राजा और सारी प्रजा भविष्यद्वक्ता की चेतावनियों को ग्रहण करते; यदि उनका मन फिराना और उनका परिवर्तन सच्चा होता, तो परमेश्वर उन्हें क्षमा करने के लिए अब भी तैयार था।
साथ ही हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, कि वे उस विपत्ति से बच नहीं सकते थे जो निकट आ पहुँची थी; परन्तु उनकी बँधुआई कहीं अधिक हल्की होती, और उनका लौटना भी अधिक निश्चित होता, और वे अनेक प्रकार से यह अनुभव करते कि यद्यपि कुछ समय के लिए उनकी ताड़ना हुई, तौभी परमेश्वर ने उन्हें त्यागा नहीं था। इसलिए जब हम अब यह कहते हैं कि उनके सामने क्षमा की आशा रखी गई थी, तो इसका यह अर्थ नहीं समझना चाहिए कि वे नगर के विनाश को टाल सकते थे; क्योंकि परमेश्वर ने एक ही बार सदा के लिए यह ठहरा दिया था कि वह प्रजा को कुछ समय की बँधुआई में खदेड़ देगा, और कुछ समय के लिए उनके बलिदानों का भी पूरी रीति से अन्त कर देगा; क्योंकि यह भयानक उजाड़ इस बात का प्रमाण होना था कि प्रजा परमेश्वर के प्रति अत्यन्त कृतघ्न रही थी, और विशेष करके यह कि उनकी हठधर्मिता, जिसके कारण उन्होंने इतने लम्बे समय तक भविष्यद्वक्ताओं और परमेश्वर की आज्ञाओं को तुच्छ जाना था, सही नहीं जा सकती थी। तौभी उन्हें यह आशा दी गई कि उनका दण्ड हल्का कर दिया जाएगा, बशर्ते वे उचित भावना से ऐसे प्रभावित हों कि परमेश्वर के अनुग्रह में लौट आने का यत्न करें। परन्तु जब यिर्मयाह इतनी सारी चेतावनियों से कुछ भी न कर सका, तो वे और भी अधिक निरुत्तर ठहरे।
अब हम यहाँ कही गई बात का अभिप्राय देखते हैं, अर्थात् यह कि यहूदी, जो इतनी बार दोषी सिद्ध हो चुके थे, यह शिकायत करना छोड़ दें कि वे बिना कारण कुछ भी दुःख उठा रहे हैं; क्योंकि उन्हें बार-बार, हाँ, लगभग अनगिनत बार चेतावनी दी गई थी, और परमेश्वर ने उन्हें दया प्रदान की थी, बशर्ते वे सुधर सकने योग्य होते। अब मैं शब्दों पर आता हूँ —
यहोवा यों कहता है, राजा के भवन में उतर जा हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता को इतना बड़ा साहस प्रदान किया गया था कि राजा के नाम की प्रतिष्ठा उसे भयभीत न कर सकी, कि वह उसे सौंपे गए काम को पूरा करने से रुक जाए। ऐसे उदाहरण हम अन्यत्र भी देख चुके हैं; परन्तु जब भी ऐसे प्रसंग आते हैं, वे ध्यान देने योग्य हैं। पहली बात यह है कि परमेश्वर के दासों को अपना पद साहस के साथ निभाना चाहिए, और बड़े और धनी लोगों की चापलूसी नहीं करनी चाहिए, और न प्रतिष्ठा और महानता के सामने आने पर अपने अधिकार में से कुछ भी कम करना चाहिए। दूसरी बात यह है कि जो लोग दूसरों से अधिक प्रतिष्ठित दिखाई देते हैं, वे यह सीखें कि उनकी कोई भी श्रेष्ठता उनके किसी काम की नहीं, वरन् उन्हें भविष्यद्वाणी की शिक्षा के अधीन होना चाहिए। हम पहले देख चुके हैं कि भविष्यद्वक्ता इसलिए भेजा गया था कि वह सबसे ऊँचे लोगों को भी डाँटे और घुड़के, और किसी का पक्षपात न करे। (यिर्मयाह 1:10।) सो अब यहाँ वह दिखाता है कि मानो सारा संसार उसके पाँवों तले था, क्योंकि अपने पद का निर्वाह करते हुए उसने स्वयं राजा को और उसके सब हाकिमों को डाँटा।
परन्तु वह राजा के विषय में कहता है कि वह दाऊद की गद्दी पर विराजमान है; परन्तु, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, आदर के लिए नहीं, वरन् उसके अपराध को और भारी ठहराने के लिए; क्योंकि वह एक पवित्र सिंहासन पर बैठा था, जिसके वह सर्वथा अयोग्य था। क्योंकि यद्यपि कहा गया है कि परमेश्वर देवताओं के बीच में बैठता है, क्योंकि उसी के द्वारा राजा राज्य करते हैं, तौभी हम जानते हैं कि दाऊद का सिंहासन अन्य किसी भी सिंहासन से अधिक श्रेष्ठ था; क्योंकि वह एक याजकीय राज्य था और उस स्वर्गीय राज्य का प्रतिरूप था जो बाद में मसीह में पूर्ण रीति से प्रकट हुआ। इसलिए जब यहूदा के राजा, जो दाऊद के वंशज थे, मसीह के प्रतिरूप थे, तो उनकी अभक्ति और भी कम सहने योग्य थी, जब वे अपनी बुलाहट को भूलकर अपने पिता दाऊद की भक्ति से हट गए थे और सर्वथा भ्रष्ट हो गए थे। इसी प्रकार भविष्यद्वक्ता ने इस्राएल के घराने और याकूब के घराने का उल्लेख करके निःसन्देह यहूदियों को दोषी ठहराया, क्योंकि वे उस पवित्र कुलपिता के समान नहीं रह गए थे। अतः अब हम भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय समझते हैं जब वह कहता है, “हे दाऊद की गद्दी पर विराजमान यहूदा के राजा, तू यहोवा का वचन सुन।” 32 अथवा “उतर”; ऐसा प्रतीत होता है कि जब यिर्मयाह को यह आज्ञा मिली तब वह मन्दिर में था। और पहले शब्दों का अनुवाद “यहोवा ने यों कहा” करना अधिक अच्छा होगा, क्योंकि यह जो कुछ घटित हुआ था उसका वर्णन है। यिर्मयाह 18:1 में कहा गया है कि यहोवा का वचन यिर्मयाह के पास पहुँचा, और तब उसे कुम्हार के घर उतर जाने की आज्ञा दी गई; जिससे यह संकेत मिलता है कि वह उस समय मन्दिर में था, और सम्भवतः याजक के रूप में अपनी बारी में सेवा कर रहा था। — सं.
परन्तु इसलिए कि उसकी डाँट उचित प्रभाव रखे, भविष्यद्वक्ता ध्यानपूर्वक दिखाता है कि वह कुछ भी नहीं लाया सिवाय उसके जो ऊपर से उसे सौंपा गया था; यही कारण है कि वह दोहराता है, तू कहना, “यहोवा यों कहता है, उतर जा, बोल, और कह।” राजा से वह दरबारियों की ओर आता है, और उनसे सारी प्रजा की ओर।
तू, वह कहता है, और तेरे कर्मचारी; राजा के कर्मचारियों से पवित्रशास्त्र का अभिप्राय वे सब सेवक हैं जो उसके मन्त्री थे, जो न्याय करने के लिए नियुक्त थे और जो अधिकार चलाते थे। परन्तु हमें ध्यान देना चाहिए कि अन्त में वह सारी प्रजा को सम्बोधित करता है। इससे हम देखते हैं कि जो कुछ उसने सिखाया वह सब पर समान रूप से लागू होता था, यद्यपि उसने राजा और उसके मन्त्रियों से आरम्भ किया, ताकि साधारण लोग यह न सोचें कि यदि वे उस शिक्षा को तुच्छ जानें जिसके अधीन राजाओं को भी होना था, तो वे दण्ड से बच जाएँगे।
वह पहले कहता है, न्याय और धर्म के काम करो यह विशेष करके राजा और उसके न्यायियों और हाकिमों से सम्बन्ध रखता था; क्योंकि हम जानते हैं कि साधारण व्यक्तियों के पास अपनी सम्पत्ति की रक्षा करने का अधिकार नहीं था; क्योंकि यद्यपि हर एक को अन्यायों और बुरे कामों का विरोध करना चाहिए, तौभी यह विशेष रूप से उन न्यायियों का कर्तव्य था जिन्हें परमेश्वर ने इसी उद्देश्य से तलवार से सुसज्जित किया था। न्याय करने का अर्थ है हर एक को उसके अधिकार के अनुसार देना; परन्तु जब दोनों शब्द, न्याय और धर्म, एक साथ जोड़े जाते हैं, तो धर्म से हमें खराई समझनी चाहिए, जिससे हर एक को उसका अपना अधिकार मिले; और न्याय से उचित दण्ड का कार्यान्वयन समझना चाहिए; क्योंकि न्यायी के लिए केवल यह निर्णय करना पर्याप्त नहीं कि उचित क्या है, जब तक कि वह दुष्टों को, जब वे ढिठाई से विरोध करते हैं, रोके नहीं।
अतः न्याय करना यह है कि निर्बलों और निर्दोषों की, मानो सशस्त्र हाथ से, रक्षा की जाए।
फिर वह आगे कहता है, लुटे हुए को अन्धेर करनेवाले के हाथ से छुड़ाओ वह वही दोहराता है जो हमने पिछले अध्याय में देखा था; और यहाँ एक ही बात के अन्तर्गत वह न्यायियों का कर्तव्य सम्मिलित करता है, अर्थात् यह कि उन्हें सदा अन्याय का विरोध करना और दुष्टों की ढिठाई को रोकना चाहिए, क्योंकि उन्हें कभी इस बात के लिए राज़ी नहीं किया जा सकता कि वे अपनी इच्छा से संयम और शान्ति के साथ आचरण करें। इसलिए, क्योंकि उन्हें बल से रोकना पड़ता है, वह कहता है, “लुटे हुए को अन्धेर करनेवाले के हाथ से छुड़ाओ।” {,}גזולgesul शब्द के विषय में हम पहले कह चुके हैं; परन्तु इस कथन-शैली के द्वारा परमेश्वर यह संकेत करता है कि न्यायी के लिए यह पर्याप्त नहीं कि वह अत्याचार और क्रूरता से दूर रहे, और न दुष्टों को उकसाए और न उनका पक्ष ले, जब तक कि वह यह भी स्वीकार न करे कि परमेश्वर ने उसे इसी उद्देश्य के लिए नियुक्त किया है — कि वह लुटे हुए को अन्धेर करनेवाले के हाथ से छुड़ाए, और अपने पद का निर्वाह करते हुए बैर और संकट का सामना करने में न हिचकिचाए।
33 यहाँ की क्रिया यिर्मयाह 21:12 की क्रिया से भिन्न है, यद्यपि हमारे अनुवाद में दोनों का अनुवाद एक ही — “execute” — किया गया है। यह {,{עשהकरना, कार्य करना है, परन्तु व्यापक अर्थ में प्रयुक्त होता है, जैसे लातीनी में facio। न्याय करना अर्थात् न्याय-निर्णय करना या दोषी ठहराना, अर्थात् अपराधी को; धर्म करना अर्थात् धर्मी ठहराना या निर्दोष छोड़ देना, अर्थात् निर्दोष को। सम्भवतः सबसे उत्तम अनुवाद यह होगा, “न्याय और धर्म का प्रबन्ध करो;” पहला अपराधी के प्रति, और दूसरा निर्दोष के प्रति। ब्लेनी का अनुवाद, “उचित और धर्म के काम करो,” किसी भी प्रकार स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि उसमें इन दोनों कार्यों का विशिष्ट स्वरूप व्यक्त नहीं होता। “न्याय और धर्म के काम करो,” यही सब प्राचीन अनुवादों और तर्गुम में है। — सं.
अब भविष्यद्वक्ता अन्य बातें जोड़ता है जिनका उल्लेख उसने पिछले अध्याय में नहीं किया था; अन्याय न करो, वह कहता है, परदेशी और अनाथ और विधवा पर पवित्रशास्त्र में बार-बार यह कहा गया है कि किसी पर भी अन्याय करना उचित नहीं; क्योंकि परमेश्वर सब को अन्याय से बचाना चाहता है, न कि केवल परदेशियों, अनाथों और विधवाओं को; परन्तु क्योंकि अनाथों के पास न ज्ञान होता है और न बुद्धि, वे मानो लूट के लिए खुले पड़े रहते हैं; और विधवाएँ भी, क्योंकि वे अपने आप में असहाय होती हैं; और परदेशी, क्योंकि उनके कोई मित्र नहीं होते जो उनका पक्ष लें; इसलिए परमेश्वर विशेष रीति से यह माँग करता है कि परदेशियों, अनाथों और विधवाओं का ध्यान रखा जाए। इसका एक और कारण भी है; क्योंकि जब परदेशियों, अनाथों और विधवाओं को उनका अधिकार दिया जाता है, तब निःसन्देह खराई और भी स्पष्ट रूप से चमकती है। जब कोई अपने साथ मित्रों को लाता है और उन्हें अपने मुक़द्दमे की पैरवी में लगाता है, तो न्यायी उससे प्रभावित होता है; और जो देश का निवासी है, उसके नातेदार और पड़ोसी उसके पक्ष का समर्थन करेंगे; और जो धनी और सामर्थी है, वह भी न्यायी को प्रभावित करेगा, यहाँ तक कि वह कोई खुला अन्याय करने का साहस नहीं करता; परन्तु जब परदेशी, या अनाथ, या विधवा न्यायी के सामने आते हैं, तो वह बिना दण्ड के उन सब पर अन्धेर कर सकता है। इसलिए यदि वह उचित न्याय करता है, तो यह निःसन्देह उसकी खराई और सीधाई का स्पष्ट प्रमाण है। अतः यही कारण है कि परमेश्वर जब उचित और न्यायसंगत निर्णयों की बात करता है, तब हर स्थान पर इन लोगों की गिनती करता है। वह आगे यह भी कहता है, उपद्रव न करो, और न इस स्थान में निर्दोषों का लोहू बहाओ ये बातें भी न्यायियों से सम्बन्ध रखती थीं। परन्तु यह अत्यन्त भयानक और घृणित बात थी कि दाऊद का सिंहासन इतना अशुद्ध हो गया कि मानो डाकुओं की खोह बन गया। जहाँ कहीं न्याय का कोई दिखावा होता है, वहाँ कुछ भय या लज्जा अवश्य होनी चाहिए; परन्तु जैसा हमने कहा है, वह न्याय-आसन विशेष रीति से परमेश्वर के लिए पवित्र था। अतः जब राजा और उसके मन्त्री डाकुओं के समान हो गए थे, और वे दाऊद के सिंहासन पर इस प्रकार बैठे थे कि सब प्रकार की अभक्ति प्रबल हो गई थी, और वे हर ओर लूटने में तनिक भी नहीं हिचकिचाते थे, मानो वे लूट के घर में रहते हों; तो यह, जैसा मैंने कहा है, एक दुःखद और लज्जाजनक दृश्य था।
परन्तु हमें इस अंश पर और भी अधिक ध्यान देना चाहिए, ताकि हम बुरे उदाहरणों के विरुद्ध अपने आप को दृढ़ करना सीखें, कहीं ऐसा न हो कि मनुष्यों की अभक्ति हमारे विश्वास को उलट दे; जब हम परमेश्वर की कलीसिया में बातों को ऐसी अव्यवस्था में देखते हैं कि जो लोग परमेश्वर के नाम पर घमण्ड करते हैं वे डाकुओं के समान बन गए हैं, तो हमें सावधान रहना चाहिए कि हम इस कारण सच्चे धर्म से विमुख न हो जाएँ। हमें ऐसे राक्षसी लोगों से घृणा तो अवश्य करनी चाहिए, परन्तु हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि मनुष्यों की दुष्टता के कारण परमेश्वर का वचन हमारी दृष्टि में अपना मूल्य न खो दे। इसलिए हमें मसीह की उस चेतावनी को स्मरण रखना चाहिए कि हम उन शास्त्रियों और फरीसियों की सुनें जो मूसा की गद्दी पर बैठे थे। (मत्ती 23:2।) इसी प्रकार यहूदियों के लिए उचित था कि वे उस राजसिंहासन का आदर करें, जिस पर परमेश्वर ने अपनी महिमा के कुछ चिह्न अंकित किए थे। यद्यपि उन्होंने देखा कि वह मनुष्यों के अपराधों और बुरे कामों से अपवित्र हो गया था, तौभी उन्हें इस वचन के कारण उसके प्रति कुछ आदर बनाए रखना चाहिए था, “यह युग युग के लिए मेरा विश्रामस्थान है।” 34 ब्लेनी ने इसका यही अनुवाद किया है; वुल्गेट और तर्गुम ने, “उदास न करो;” सेप्टुआजिंट ने, “अत्याचार न करो;” और सीरियाई ने, “अन्याय न करो।” इस क्रिया का अर्थ है नीचे दबाना, कुचलना, और इसलिए अन्धेर करना। इसके साथ अगली क्रिया बहुत सी प्रतियों में {{וके द्वारा जुड़ी है, और अरबी को छोड़ सब प्राचीन अनुवादों में और तर्गुम में भी; और उसका अर्थ है बल या उपद्रव से अन्याय करना, अत्यन्त हानि पहुँचाना, या अन्याय का व्यवहार करना, लूटना। उन्हें न तो उनके अधिकार छीनकर उन्हें दबाना था, और न बलपूर्वक उनकी वस्तुएँ उनसे छीन लेनी थीं, या उन्हें लूटना था। हम इस अंश का अनुवाद वैसे कर सकते हैं जैसे गेटेकर करता है, “और परदेशी, अनाथ और विधवा पर अन्धेर न करो, अन्याय न करो,” या उन्हें लूटो मत। ऐसा ही एक अंश यिर्मयाह 7:6 में है। वहाँ जिस शब्द का अनुवाद “अन्धेर” किया गया है वह भिन्न है, ,{}עשקऔर अपने अर्थ में अधिक व्यापक है, जिसमें यहाँ के दोनों विचार सम्मिलित हैं — उनके अधिकार छीनकर अन्धेर करना, और उन्हें लूटना। — सं.
35 इस अंश में पहले एक सामान्य निर्देश है, “न्याय और धर्म का प्रबन्ध करो;” और फिर एक विशेष विवरण है जो पहले धर्म से और फिर न्याय से सम्बन्ध रखता है, क्रम उलटा रखा गया है, जैसा प्रायः होता है। लुटे हुए को लूटनेवाले के हाथ से छुड़ाना “धर्म” का कार्य था। फिर उन्हें अन्यायपूर्ण “न्याय” करने से मना किया गया, जिससे परदेशी, अनाथ और विधवा दबाए और लूटे जाएँ, और निर्दोषों का लोहू बहाया जाए। देखिए भजन संहिता 94:6। जब दुष्टों और अपराधियों को दण्ड नहीं दिया जाता, तो यह समाज की बुरी दशा को दिखाता है; परन्तु इससे भी बुरा तब होता है जब असहायों पर अन्धेर किया जाता है, और निर्दोषों को दोषी ठहराया जाता है। — सं.
तौभी हम देखते हैं कि राजा को, जैसा वह योग्य था, कड़ाई और कठोरता से डाँटा गया।
इसलिए आज के समय में पोप अत्यन्त मूर्खता से अपने आप को हर डाँट से मुक्त करना चाहता है, क्योंकि वह प्रेरितीय सिंहासन पर बैठा है। यदि हम यह दावा मान भी लें, (यद्यपि वह तुच्छ और बचकाना है,) कि रोमी सिंहासन प्रेरितीय है, (जिस पर, मेरी समझ में, पतरस कभी नहीं बैठा,) तो क्या दाऊद का सिंहासन पतरस की कुर्सी से कहीं अधिक आदरणीय नहीं था? और फिर भी दाऊद के वंशज जो उसके उत्तराधिकारी हुए, यद्यपि वे मसीह के प्रतिरूप और प्रतिनिधि थे, उस कारण डाँट से मुक्त नहीं थे, जैसा हम यहाँ देखते हैं।
तौभी यह पूछा जा सकता है कि भविष्यद्वक्ता ने यह क्यों कहा कि वह सारी प्रजा के पास भेजा गया था, जबकि उसकी शिक्षा केवल राजा और सार्वजनिक न्यायियों को सम्बोधित थी? क्योंकि वह प्रजा या साधारण व्यक्तियों से सम्बन्ध नहीं रखती थी। परन्तु मैं पहले ही कह चुका हूँ कि साधारण लोगों के लिए यह समझ लेना सरल था कि परमेश्वर के न्याय से कितना डरना चाहिए था, क्योंकि उन्होंने सुना था कि दाऊद के घराने पर भी, जो पवित्र माना जाता था, दण्ड की घोषणा की गई थी। अतः जब उन्होंने देखा कि जो लोग एक प्रकार से व्यवस्थाओं के अधीन नहीं थे, वे परमेश्वर के न्याय-आसन के सामने बुलाए गए, तो वे इसके सिवाय और क्या सोचते कि उनमें से हर एक को अपने विषय में सोचना और अपने जीवन को जाँचना चाहिए था? क्योंकि अन्त में उन्हें भी लेखा देने के लिए बुलाया जाना था, जबकि स्वयं राजा और उसके मन्त्री ऐसा करने के लिए बुलाए गए थे। आगे लिखा है, यिर्मयाह 22:4-5
4. क्योंकि यदि तुम सचमुच इस वचन के अनुसार करोगे, तो इस भवन के फाटकों से होकर दाऊद की गद्दी पर विराजमान राजा रथों और घोड़ों पर चढ़े हुए, वह, और उसके कर्मचारी, और उसकी प्रजा प्रवेश किया करेंगे।
4. Quid si faciendo feceritis (alii vertunt, quin potius faciendo faciatis) ser-monem hunc (hoc est, obediatis sermoni huic,) et ingrediemini per portas domus hujus, reges sedentes pro Davide (vel, Davidi) super solium ejus, insidentes currui et equis, ipse, rex, et servi ejus et populus ejus.
5. परन्तु यदि तुम इन बातों को न मानोगे, तो यहोवा की यह वाणी है, मैं अपनी ही सौगन्ध खाकर कहता हूँ कि यह भवन उजाड़ हो जाएगा।
5. Quod si non obedieritis sermonibus istis, in me (hoc est, per me) juravi, dicit
Jehova, quod in solitudinem (aut, vastitatem) erit domus haec.
भविष्यद्वक्ता वह बात और भी स्पष्ट रूप से व्यक्त करता है जो मैं पहले कह चुका हूँ, कि यदि यहूदी हृदय से मन फिराते, तो दया के लिए अब भी स्थान था; क्योंकि वह उनसे प्रतिज्ञा करता है कि यदि वे परमेश्वर से मेल करना चाहें, तो वह मेल करने को तैयार होगा; वह कृपा के शब्दों से उन्हें मन फिराने की ओर आकर्षित करता है। हम वास्तव में {,}כיאםkiam को एक ही शब्द पढ़ सकते हैं, और उसका अनुवाद “वरन् अधिक” कर सकते हैं; परन्तु मैं उन दूसरों के पीछे चलता हूँ जो यह अनुवाद देते हैं, क्योंकि यदि तुम करते हुए इस वचन को करोगे, तो तुम प्रवेश करोगे, इत्यादि; और इस प्रकार वे संयोजक को समयवाचक क्रियाविशेषण में बदल देते हैं, जो प्रायः होता है। फिर भी दूसरा अर्थ भी अनुचित नहीं है, जब भविष्यत् काल की क्रिया {,}תעשוtoshu, को प्रेरणार्थक अर्थ में लिया जाए; क्योंकि हम जानते हैं कि इब्रानी में भविष्यत् काल को प्रायः आज्ञार्थक समझना होता है। जहाँ तक सामान्य अर्थ का सम्बन्ध है, इसमें अधिक अन्तर नहीं है; क्योंकि भविष्यद्वक्ता जो दिखाना चाहता था वह यह था कि यदि यहूदी पूर्ण रूप से आज्ञा न माननेवाले न होते, तो परमेश्वर उनसे मेल कर लेता। “केवल,” वह कहता है, “मेरे वचन को मानो, और तुम्हारी सुरक्षा निश्चित हो जाएगी।” 36 बेचारे पतरस का कभी कोई सिंहासन था ही नहीं, इसलिए पोप का सिंहासन प्रेरितीय नहीं हो सकता। पोप का सिंहासन एक अन्यजाति सिंहासन है, भौतिक रूप से भी और आत्मिक रूप से भी। वह आसन स्वयं किसी अन्यजाति नायक या देवता की कुर्सी है, और जिस अधिकार का दावा किया जाता है उसका न तो कभी पतरस ने दावा किया और न वह उसके पास था। पोप ठीक उतना ही धोखेबाज़ है जितना मुहम्मद, केवल उसकी निन्दा अधिक बड़ी और अधिक घृणित है। — सं.
ऐसा नहीं कि दण्ड से छुटकारे की आशा की जानी थी, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, परन्तु, जैसा वे अनुभव करते, परमेश्वर से उनका मेल व्यर्थ न होता, क्योंकि उनका दण्ड हल्का कर दिया जाता; उस दशा में उनकी बँधुआई अधिक सहने योग्य बना दी जाती, क्योंकि परमेश्वर निःसन्देह उनके शत्रुओं को उनके प्रति कृपालु बना देता; संक्षेप में, अनेक प्रकार से उन पर दया दिखाई जाती। इसके अतिरिक्त, भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि उसने उन्हें व्यर्थ ही मन फिराने के लिए नहीं बुलाया; क्योंकि वह उनके सामने उनका दण्ड हल्का करने में परमेश्वर का अनुग्रह रखता है।
और वह आगे कहता है, तुम इस भवन के फाटकों से होकर प्रवेश करोगे, तुम्हारे राजा भी और उनके मन्त्री भी; परन्तु बाद में वचन बदल दिया गया है, वह, अर्थात् हर एक राजा।
पहली दृष्टि में ऐसा प्रतीत होता है कि भविष्यद्वक्ता ने बँधुआई के विषय में जो कहा था उसे वापस ले लिया है; परन्तु इन दोनों बातों को एक साथ जोड़ना चाहिए, कि यदि यहूदी परमेश्वर के अनुग्रह को स्वीकार करते तो कुछ आशा शेष थी, और फिर यह कि जो दण्ड एक बार ठहराया जा चुका था, वह उन्हें सहना ही था। ये दोनों बातें आपस में विरोधी नहीं हैं। क्योंकि परमेश्वर ने यहूदियों को बँधुआई में खदेड़ने का निश्चय कर लिया था; परन्तु सारा यहूदिया निःसन्देह उजाड़ न कर दिया जाता, जैसा कि उनकी असुधार्य हठधर्मिता के कारण हुआ, उसके अनुसार जो हम इस पुस्तक के अन्त में पढ़ते हैं; क्योंकि अन्यथा वे अपने ही देश में बसे रह सकते थे। यह एक बात है; और फिर बँधुआई के बाद उनकी दशा अधिक अच्छी और कहीं अधिक सुखी होती। परन्तु उस समय भी मुकुट पाँवों तले रौंदा गया, और दाऊद के घराने की सारी प्रतिष्ठा और सामर्थ्य लगभग मिटा दी गई।
अतः जब भविष्यद्वक्ता कहता है, “रथों और घोड़ों पर चढ़े हुए राजा प्रवेश करेंगे,” और यह भी कि “प्रजा, और वह, और उसके मन्त्री इस नगर के फाटकों से होकर;” तो उसका यह अर्थ नहीं कि वे इस प्रकार बच निकलेंगे कि परमेश्वर उनके पापों के लिए उनकी ताड़ना न करेगा, जैसा उसने घोषित किया था, वरन् यह कि राज्य का कुछ न कुछ स्वरूप फिर भी बना रहेगा, और बँधुआई थोड़े समय की होगी, और यह भी कि अन्त में पुनःस्थापना होगी, जिससे दाऊद के वंशज अपनी पहली दशा में लौट आएँगे, और स्वयं नगर ऐसा फिर से बसाया जाएगा कि वह धन-सम्पत्ति में और अन्य सब आशीषों में भरपूर होगा। यही प्रतिज्ञा है। भविष्यद्वक्ता आगे यह भी बताता है कि अन्यथा क्या होगा, यदि वे न सुनेंगे, तो यह स्थान उजाड़ हो जाएगा। परन्तु इस धमकी पर कल विचार किया जाएगा। 37 वुल्गेट, सीरियाई और तर्गुम “प्रवेश करोगे” से पहले के {{וको छोड़ देते हैं: परन्तु इसका अर्थ प्रायः “तो” होता है, विशेषकर जब, जैसा यहाँ है, इसके पहले शर्तवाचक अव्यय “यदि” आता है। — सं.
38 इस पद का अनुवाद इस प्रकार किया जा सकता है, — 4. क्योंकि यदि तुम करते हुए इस वचन को करोगे, तो इस भवन के फाटकों से होकर प्रवेश करेंगे राजा, जो दाऊद के स्थान पर उसके सिंहासन पर बैठते हैं, जो रथ पर और घोड़ों पर सवार होंगे, वह, और उसका कर्मचारी, और उसकी प्रजा। “बैठना” राजाओं से सम्बन्ध रखता है, परन्तु “सवार होना” राजा, उसके कर्मचारी और उसकी प्रजा से। जैसे “वह” एकवचन में है, वैसे ही “कर्मचारी” भी है, यद्यपि सेप्टुआजिंट, वुल्गेट और अरबी ने दोनों को बहुवचन बना दिया है, और वास्तव में सीरियाई और तर्गुम ने “कर्मचारी” को। परन्तु “रथ” और “कर्मचारी” शब्द के विषय में इब्रानी वैसा ही है जैसा ऊपर अनुवाद किया गया है; यह उस भाषा का मुहावरा है। — सं.
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अनुग्रह कर कि जैसे तुझे यह भाया है कि तू अपने पुत्र का सिंहासन हमारे बीच में स्थापित करे, वैसे ही हम अपने आप को उसके शासन के अधीन होने दें, और झूठा घमण्ड न करें कि हम उसकी प्रजा हैं, वरन् सचमुच यह प्रमाणित करें कि हम सच्चाई से और हृदय से उसे अपना राजा मानते हैं, ताकि वह भी जीवन के सारे मार्ग में हमारे शत्रुओं के सब आक्रमणों से हमारी ऐसी रक्षा करे, कि हम सदा तेरी सहायता पर भरोसा रखते हुए, और धीरज से अपने प्राणों को बचाए रखते हुए, अन्त में उस धन्य महिमा और विश्राम में पहुँचा दिए जाएँ, जिसे उसने अपने ही लोहू से हमारे लिए मोल लिया है। — आमीन।
इक्यासीवाँ व्याख्यान
कल हमने भविष्यद्वक्ता की इस घोषणा की व्याख्या की थी, — कि यदि राजा और उसके कर्मचारी और सारी प्रजा मन फिराते, तो प्रभु राज्य को फिर से स्थापित कर देता। अब वह एक धमकी प्रस्तुत करता है, — कि यदि वे न सुनें, तो राजभवन और नगर दोनों का अन्त हो चुका। परन्तु भवन, या राजभवन, शब्द बार-बार दोहराया गया है; क्योंकि यद्यपि नगर की किलेबन्दी प्रजा को साहस देती थी, तौभी जिस बात ने उन्हें विशेष रूप से घमण्डी बना दिया था वह यह भरोसा था कि राज्य के सदा बने रहने की प्रतिज्ञा की गई है। इसलिए वे सोचते थे कि जब तक सूर्य और चन्द्रमा आकाश में बने रहेंगे, तब तक राजसी प्रतिष्ठा का गिरना असम्भव है। (भजन संहिता 89:38।) इसी झूठे भरोसे का भविष्यद्वक्ता अब सामना करता है, और कहता है, यदि तुम इन बातों को न मानोगे, इत्यादि। वह वचन बदल देता है: पहले उसने कहा था यह वचन, {}את{ }הדבר,}הזה{at edeber eze; परन्तु अब वह कहता है ये बातें, {,}את{ }הדבריםat edeberim।
परन्तु एकवचन में उसकी सारी शिक्षा सम्मिलित है; फिर भी अब वह बहुवचन का प्रयोग करता है, क्योंकि उसने उन्हें अपना जीवन बदलने का उपदेश दिया था।
और इसलिए कि वे यह न सोचें कि उन्हें बिना किसी उचित कारण के डराया जा रहा है, वह घोषणा करता है कि परमेश्वर ने अपनी ही सौगन्ध खाई थी हम जानते हैं कि जब परमेश्वर शपथ खाता है, चाहे वह किसी बात की प्रतिज्ञा करे, चाहे पापियों पर दण्ड की घोषणा करे, तो यह मनुष्यों के आलस्य और मन्दता के कारण होता है। क्योंकि हमारे हृदय अविश्वास के कारण किसी साधारण सत्य को कठिनाई से ग्रहण करते हैं, जब तक कि परमेश्वर बाधाओं को दूर न करे; और शपथ खाने का यही उद्देश्य है, जब परमेश्वर केवल बोलता ही नहीं, वरन् हमें हमारे उद्धार के विषय में और भी अधिक निश्चित करने के लिए, अपने ही नाम को बन्धक के रूप में बीच में लाकर अपनी प्रतिज्ञा को दृढ़ करता है। धमकियों के विषय में भी कारण वैसा ही है; क्योंकि पापियों की झूठी निश्चिन्तता इतनी बड़ी होती है कि वे तब तक बहरे बने रहते हैं जब तक परमेश्वर मानो बलपूर्वक उनके हृदयों में प्रवेश न करे। इसलिए वह कहता है कि परमेश्वर ने अपनी ही सौगन्ध खाई; क्योंकि यहूदियों को यह अविश्वसनीय लगता था कि जिस घराने को परमेश्वर ने संसार से अलग किया था, वह कभी नष्ट हो जाएगा। अब आगे लिखा है: यिर्मयाह 22:6
6. क्योंकि यहोवा यहूदा के राजा के घराने के विषय में यों कहता है, तू मेरी दृष्टि में गिलाद और लबानोन का शिखर है; तौभी निश्चय मैं तुझे मरुस्थल और निर्जन नगरों के समान बना दूँगा।
6. Quoniam dicit Jehova super domum regis Jehudah, Guilead, tu mihi caput
Libani, si non posuero to desertum, tanquam urbes quae non habitantur.
वह पिछली घोषणा की पुष्टि करता है, और जो बात पर्याप्त स्पष्टता से कही जा चुकी थी, उसे और अधिक विस्तार से समझाता है; क्योंकि यहूदियों के झूठे घमण्ड को रोकना कठिन था, क्योंकि वे अब भी यह सोचते थे कि दाऊद के घराने में राज्य स्थायी रहेगा और परिवर्तन के किसी भी संकट से मुक्त रहेगा। 39 “ये बातें” में दूसरे पद में निहित सन्देश का “वचन” और तीसरे पद में निहित आज्ञा का “वचन” दोनों सम्मिलित हैं; और चौथे पद के आरम्भ में “यह वचन” या बात, पिछला वाला है — आज्ञा का वचन। — सं.
परन्तु शब्दों के अर्थ के विषय में व्याख्याकारों में मतभेद है। मैं उनके मतों को नहीं दोहराऊँगा, और न इसकी आवश्यकता है: मैं केवल वही बताऊँगा जो मुझे वास्तविक अर्थ प्रतीत होता है। अन्य सब तो वास्तव में भिन्न व्याख्या देते हैं; परन्तु मुझे सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय वही है जो हमने यिर्मयाह 7:12 में देखा था; जहाँ वह कहता है, “शीलो को जाओ, और देखो कि उस स्थान की क्या दशा है, क्योंकि वाचा का सन्दूक बहुत समय तक वहाँ रहा था।”
अतः यद्यपि वे उस स्थान को पवित्र समझते थे, तौभी वह उजाड़ कर दिया गया; और इस प्रकार वह सारी प्रजा के लिए एक भयानक दृश्य बन गया होगा। अब इसी कारण, जैसा मुझे प्रतीत होता है, भविष्यद्वक्ता लबानोन की तुलना गिलाद पर्वत से करता है; क्योंकि कुछ लोग जो कहते हैं, कि गिलाद दस गोत्रों का मुख्य नगर था, उसमें कोई सार नहीं है।
परन्तु हमें उस समय की दशा को स्मरण रखना चाहिए; जब हमारे भविष्यद्वक्ता ने ये शब्द कहे, तब इस्राएल का राज्य पूर्ण रूप से ढा दिया जा चुका था। यहूदिया तो अनेक विपत्तियों से बहुत घट गया था; परन्तु फिर भी किसी न किसी प्रकार का राज्य बना हुआ था। तो गिलाद पर्वत से भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय निःसन्देह, अंश को पूर्ण के स्थान पर रखकर, इस्राएल का राज्य था, परन्तु उस उद्देश्य से भिन्न उद्देश्य से जो व्याख्याकार बताते हैं, अर्थात् इसलिए कि उस समय इस्राएल का सारा देश उजाड़ दिया गया था; क्योंकि सब निवासी बँधुआई में ले जाए गए थे, और सारी लूट उठा ली गई थी, और उनके शत्रुओं के लालच और क्रूरता से कुछ भी नहीं बचा था।
अतः जब इस्राएल का देश उजाड़ कर दिया गया था, तो परमेश्वर अब कहता है कि यरूशलेम और यहूदा का राज्य उसकी दृष्टि में दस गोत्रों के उस सारे देश से अधिक मूल्यवान न होगा, जो निःसन्देह विस्तार और धन दोनों में बड़ा था। और यह अर्थ इस अंश के शब्दों से सरलता से निकाला जा सकता है; वह यह नहीं कहता, “तू लबानोन के शिखर गिलाद के समान है;” वरन्, मेरे लिए गिलाद है तू, हे लबानोन के शिखर और वह यरूशलेम को लबानोन कहता है, क्योंकि वह मानो उस देश की रानी था; क्योंकि लबानोन पर्वत से उसने उस देश में जो कुछ बहुमूल्य था उसका संकेत किया, उस कारण से जिसका उल्लेख हमने कल किया था। गिलाद के विषय में, मैं यह नहीं समझता कि भविष्यद्वक्ता विशेष रूप से उस नगर की ओर संकेत करता है, वरन् अंश को पूर्ण के स्थान पर रखकर वह सारे देश को सम्मिलित करता है, और इस कारण से कि गिलाद पर्वत बहुत से फलदार वृक्षों से भरा था, और विशेष करके बलसान और राल के वृक्षों से, और बहुत सी सुगन्धित जड़ी-बूटियों और सुगन्ध-द्रव्यों से, जो आज भी वहाँ से संसार के विभिन्न भागों में लाए जाते हैं। और इसी कारण हमने यिर्मयाह 8:22 में यह प्रश्न पाया, “क्या गिलाद में राल नहीं? क्या वहाँ कोई औषधि नहीं मिलती जिससे कलीसिया चंगी हो?”
तो फिर गिलाद पर्वत का उल्लेख क्यों किया गया? इसलिए कि वहाँ सबसे उत्तम सुगन्ध-द्रव्य उगते थे, और विशेष करके बलसान का वृक्ष, और बहुत से सुगन्धित वृक्ष और अत्यन्त बहुमूल्य फल भी।
तो अर्थ यह है, “तू अपने आप को क्या समझता है? या, किस कारण तू अपने ऊपर इतना भरोसा रखता है? मैंने गिलाद पर्वत को और उस विस्तृत देश को नहीं छोड़ा जो तुझसे कहीं श्रेष्ठ था; तो फिर इस मूर्खतापूर्ण ढिठाई का क्या अर्थ है, कि तू अपने आप को यह विश्वास दिलाता है कि सब संकट दूर है? तू मेरे लिए गिलाद के समान होगा।
गिलाद पर्वत पर किए गए मेरे न्याय को, और इस्राएल के देश के भयानक उजाड़ को सोच; जो तुम अब वहाँ देख सकते हो, वही तुझ पर भी आ पड़ेगा।” अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता किस अर्थ में कहता है कि परमेश्वर के सामने लबानोन का शिखर, अर्थात् स्वयं यरूशलेम, जो लबानोन पर शासन करता था, गिलाद के समान हो जाएगा।
फिर वह आगे कहता है, यदि मैं तुझे मरुस्थल न बना दूँ परमेश्वर फिर से शपथ खाता है; क्योंकि, हम जानते हैं, यह एक अपूर्ण कथन-शैली है, जब केवल {,}אםam अव्यय का प्रयोग किया जाता है, क्योंकि उसमें एक शाप समझा जाना चाहिए, — “मुझे परमेश्वर न समझा जाए;” या, “मेरी सामर्थ्य कुछ भी न गिनी जाए;” या, “आगे से मुझे सच्चा और विश्वासयोग्य न माना जाए।”
चाहे जो हो, परमेश्वर शपथ खाता है कि नगर मरुस्थल हो जाएगा, उन नगरों के समान जो बसे हुए नहीं हैं इस प्रकार सारा प्रसंग सुसंगत प्रतीत होता है, — कि यरूशलेम अन्त में इस्राएल के देश के समान हो जाएगा, क्योंकि वह लबानोन को गिलाद पर्वत से अधिक न छोड़ेगा। इसके बाद लिखा है: यिर्मयाह 22:7
7. मैं नाश करनेवालों को, हर एक को उसके हथियार समेत, तेरे विरुद्ध तैयार करूँगा; और वे तेरे चुने हुए देवदारों को काटकर आग में झोंक देंगे।
7. Et praeparabo (vertunt alii, sanctificabo, ut etiam {}קדשhoc significat, praeparabo igitur) adversum to perditores, (aut, vastatores; {}שחתsignificat perdere, et redigere in nihilum, et corrumpere, unde nomen {,}משחתיםquod hic ponitur,) virum et arma ejus (aut, instrumenta bellica, vasa transferunt,) et exscindent electionem cedrorum tuarum (hoc est, electissimas quasque cedros tuas,) et conjicient in ignem.
वह रीति को व्यक्त करता है, क्योंकि उसने पहले केवल इतना कहा था कि नगर यरूशलेम का विनाश निकट था; अब वह आगे कहता है कि नाश करनेवाले आएँगे, और वे भी युद्ध के हथियारों से भली-भाँति सुसज्जित, जो सब से चुने हुए देवदारों को काटकर आग में झोंक देंगे परन्तु वह उन्हें स्मरण दिलाता है कि वे नाश करनेवाले अपने आप से या अपनी ही प्रेरणा से नहीं, वरन् परमेश्वर के गुप्त कार्य के द्वारा आएँगे; क्योंकि यदि यहूदी यह सोचते कि उन्हें केवल कसदियों से काम है, तो धार्मिक भावना को जगाने के लिए कुछ भी न होता; परन्तु भविष्यद्वक्ता स्पष्ट घोषणा करता है कि कसदी परमेश्वर के सेवक होंगे, क्योंकि वे उसी के द्वारा उकसाए और चलाए जाएँगे, उसके अनुसार जो भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा बार-बार सिखाया जाता है।
संक्षेप में, इन दो बातों पर ध्यान देना चाहिए, — पहली, कि परमेश्वर के पास अनेक मार्ग तैयार थे जिनके द्वारा वह यहूदियों को दण्ड दे सकता था। क्योंकि अभक्त लोगों का तिरस्कार इसलिए उत्पन्न होता है कि वे यह स्वप्न देखते हैं कि परमेश्वर निहत्था है और, जैसा वे कहते हैं, दण्ड का कार्यान्वयन सदा उसके हाथ में तैयार नहीं रहता। इसलिए भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि जैसे ही परमेश्वर उनके लिए सीटी बजाएगा, या उन्हें संकेत देगा, कसदी तैयार होंगे। यह एक बात है।
दूसरी, यह ध्यान देना चाहिए कि वह उन्हें स्मरण दिलाता है कि कसदी परमेश्वर का कोड़ा होंगे, ताकि यहूदी यह न सोचें कि वे नश्वर मनुष्यों से लड़ रहे हैं, वरन् यह जानें कि उन्हें अपने जीवन का लेखा देने के लिए बुलाया गया है, क्योंकि वे बहुत लम्बे समय से परमेश्वर और उसके भविष्यद्वक्ताओं के विरुद्ध बलवा करते आए थे। तैयार करना शब्द से हमें यही समझना चाहिए। 40 कि “लबानोन का शिखर (या सिर)” का अर्थ यरूशलेम, या दाऊद का नगर, राजघराने का निवास-स्थान है, यह सातवें पद से स्पष्ट है, “वे तेरे चुने हुए देवदारों को गिरा देंगे।” यह बात निश्चित हो जाने पर, कैल्विन के मत की सत्यता के विषय में शायद ही कोई सन्देह रह सकता है। सब प्राचीन अनुवाद यही अनुवाद देते हैं, “गिलाद, तू मेरे लिए लबानोन का सिर है;” जिसका अर्थ स्पष्ट नहीं होता। तर्गुम एक भावानुवाद है जो इससे अधिक समझ में आने योग्य नहीं। भविष्यत् काल का प्रयोग करना अधिक अच्छा होगा, क्योंकि पद के अन्त में उसी का प्रयोग हुआ है, — गिलाद तू मेरे लिए होगा, हे लबानोन के शिखर! निश्चय मैं तुझे मरुस्थल बना दूँगा, निर्जन नगरों के समान। उसके साथ वैसा ही व्यवहार किया जाना था जैसा गिलाद के साथ हुआ था, जो अब पूर्ण रूप से निर्जन हो चुका था। — सं.
अब चुने हुए देवदारों के विषय में, भविष्यद्वक्ता फिर से लबानोन पर्वत की ओर और यरूशलेम के उस वन की ओर संकेत करता है जिसका उल्लेख कल किया गया था। तौभी वन शब्द भवनों पर भी लागू किया जा सकता है; क्योंकि, जैसा भली-भाँति ज्ञात है, यहूदी अपनी कोठरियाँ अधिकतर देवदार की लकड़ी से बनाते थे; अतः हम इसे उनके भव्य और वैभवशाली घरों पर लागू कर सकते हैं; परन्तु हम इसे बिना अलंकार के भी ले सकते हैं और लबानोन पर्वत के वृक्षों पर लागू कर सकते हैं। परन्तु उस देश का मुख्य शोभा उस पर्वत के उत्तम वृक्ष थे; इसलिए देवदारों से भविष्यद्वक्ता ने निःसन्देह उस सब का संकेत किया जो यरूशलेम में और उसके चारों ओर के देश में भव्य था। आगे लिखा है, —
यिर्मयाह 22:8-9
8. और जाति जाति के बहुत से लोग इस नगर के पास से होकर निकलेंगे, और एक दूसरे से पूछेंगे, यहोवा ने इस बड़े नगर की ऐसी दशा क्यों की है?
8. Et transibunt gentes multae per urbem hanc, et dicent quisque socio suo (vir ad socium suum, ad verbum,) cur fecit Jehova in hunc modum urbi huic magnae?
9. तब वे उत्तर देंगे, इसलिए कि उन्होंने अपने परमेश्वर यहोवा की वाचा को त्यागकर दूसरे देवताओं को दण्डवत् की और उनकी उपासना की।
9. Et dicent, Quia dereliquierunt foedus Jehovae Dei sui, et sese inclinarunt coram diis alienis, et coluerunt eos.
भविष्यद्वक्ता इन शब्दों में दिखाता है कि यहूदी अपने ही विनाश के विषय में कितने अन्धे थे, कि वे इतनी हठीली रीति से परमेश्वर के न्याय की उपेक्षा करते थे। निःसन्देह इन शब्दों में दो विषमताएँ सम्मिलित हैं; वह नश्वर मनुष्यों की तुलना परमेश्वर से करता है, और उन बहुत सी जातियों की तुलना अकेले उससे। यहूदी परमेश्वर को अपने न्यायी के रूप में सह नहीं सकते थे, और फिर भी हठीले बने रहे और अपनी कुटिलता से उस पर प्रबल होने का यत्न करते रहे। तब भविष्यद्वक्ता कहता है कि क्योंकि वे परमेश्वर के द्वारा न्याय किए जाना सहन न करते थे, इसलिए ऐसे न्यायी आएँगे जो उन पर स्वतन्त्र और निष्पक्ष निर्णय सुनाएँगे; और वे कौन होंगे? अन्यजाति लोग।
और फिर, क्योंकि यहूदी एकमात्र सच्चे परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानते थे, इसलिए भविष्यद्वक्ता बहुत-सी जातियों को उस एकमात्र सच्चे परमेश्वर के विपरीत रखता है।
इसलिए हम इन शब्दों का पूरा आशय देखते हैं, बहुत-सी जातियाँ इस नगर में से होकर जाएँगी; अर्थात् परमेश्वर ने अब तक इस नगर को बहुत-से विशेषाधिकारों से सुशोभित किया था, यहाँ तक कि यह परदेशियों के लिए एक आश्चर्यकर्म-सा बन गया था; क्योंकि इस नगर की प्रतिष्ठा इतनी प्रकट थी कि वह सबका ध्यान अपनी ओर खींचती थी, और उसकी कीर्ति दूर-दूर तक फैली हुई थी। अब, वह कहता है, जब परमेश्वर इसे छोड़कर चला जाएगा, तब यह नगर अपने सारे शृंगार से वंचित कर दिया जाएगा। तो, वह कहता है, बहुत-सी जातियाँ इस नगर में से होकर जाएँगी, और वे एक-दूसरे से पूछेंगी, यहोवा ने इस नगर से ऐसा क्यों किया? निःसन्देह यिर्मयाह परोक्ष रूप से न केवल आलस्य की, वरन् उस संवेदनहीनता की भी निन्दा करता है जिसने यहूदियों को ऐसा बावला कर दिया था कि उन्होंने परमेश्वर के न्याय पर कभी उचित रीति से विचार नहीं किया, और न कभी व्यवस्था के शापों से उनका मन छिदा। तब वह दिखाता है कि अन्यजातियों में अधिक समझ और बुद्धि होगी; क्योंकि यरूशलेम को उलटा और पूरी रीति से ढाया हुआ देखकर वे जान लेंगी कि यह संयोग से नहीं हुआ, वरन् यह स्वर्ग से आए पलटा लेने का प्रमाण था। इस प्रकार हम देखते हैं कि उसने यहूदियों को उनकी अपनी मूढ़ता के लिए धिक्कारा, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के न्याय पर ध्यान नहीं दिया; परन्तु उसने जातियों में बुद्धि और खोज करने की आत्मा मानी; क्योंकि वे पूछेंगी, “यहोवा ने इस नगर से ऐसा क्यों किया?”
41 क्रिया {,{קדש है, जिसका अर्थ है पवित्र करना, या यों कहें कि अलग करना, अथवा किसी पवित्र उद्देश्य के लिए अलग ठहराना, अर्पित करना। सेप्टुआजिंट ने इसका अनुवाद “मैं लाऊँगा” किया है; वल्गेट ने “मैं पवित्र करूँगा”; सुरियानी ने “मैं तैयार करूँगा”; परन्तु ब्लेनी ने “मैं नियुक्त करूँगा।” यह किसी पवित्र उद्देश्य के लिए अलग ठहराए जाने या चुने जाने का संकेत देता है, जैसे परमेश्वर के धर्ममय न्याय को पूरा करना। सम्भवतः सबसे अच्छा अनुवाद यह होगा, “मैं तेरे विरुद्ध ठहराऊँगा (अर्पित करूँगा)।” अगले शब्द हैं “नाश करनेवाले, हर एक मनुष्य और उसका औज़ार,” जिनका अनुवाद सेप्टुआजिंट ने “एक नाश करनेवाला मनुष्य और उसकी कुल्हाड़ी” किया है; वल्गेट ने “एक घात करनेवाला मनुष्य और उसके हथियार”; सुरियानी ने “उजाड़नेवाले, हर एक अपने हाथ में कुल्हाड़ी लिए हुए”; और अरबी ने “एक नाश करनेवाला मनुष्य अपनी कुल्हाड़ी के साथ।” शब्द ,{}כלי का अर्थ विशेष रूप से युद्ध का हथियार नहीं, वरन् सामान्यतः किसी भी प्रकार का औज़ार है; और यहाँ उसके लिए “कुल्हाड़ी” सबसे उपयुक्त शब्द है। तब हम यह अनुवाद दे सकते हैं, — 7. और मैं तेरे विरुद्ध नाश करनेवालों को ठहराऊँगा, हर एक मनुष्य को उसकी कुल्हाड़ी समेत; और वे तेरे उत्तम से उत्तम देवदारों को काट डालेंगे, और उन्हें आग में झोंक देंगे। — सं.
42 इसी प्रकार अनुवाद “में से होकर” कहते हैं, न कि “के पास से,” जैसा हमारे अनुवाद में है; तर्गुम में यह “निकट” है। पूर्वसर्ग {,{על है, जिसका अर्थ प्रायः “ऊपर, पर” होता है। इसका अर्थ खण्डहर बने नगर के ऊपर से होकर जाना हो सकता है। — सं.
“जातियाँ,” वह कहता है, “वह समझ लेंगी जो तुम नहीं समझते, अर्थात् यह कि यह नगर भयंकर पलटे का एक दृष्टान्त ठहरेगा, और यही उनकी पूछताछ का विषय होगा; परन्तु जब परमेश्वर अब अपनी ही स्वतंत्र इच्छा से तुम्हें यह पहले से बता रहा है, तब तुम अपने कान बन्द कर लेते हो; निश्चय ही इतनी स्पष्ट बात में अधिक पूछताछ की कोई आवश्यकता न होती, यदि तुम बहरे और अन्धे, वरन् हठीले न होते; क्योंकि परमेश्वर अपनी ही इच्छा से तुम्हें पहले से चिताता है। तो फिर इसका क्या अर्थ हो सकता है कि परमेश्वर तुम्हें पहले से चिताता है और तुम उसकी सुनने से इनकार करते हो, सिवाय इसके कि शैतान ने तुम पर टोना कर दिया है?”
और वह कहता है, यह बड़ा नगर; क्योंकि उसकी विशालता के कारण उसका विनाश और भी उल्लेखनीय था। जब कोई छोटा कस्बा नष्ट होता है, तो उस घटना का कोई विशेष लेखा नहीं लिया जाता; परन्तु जब कोई ऐसा नगर गिरता है जो अपनी विशालता के लिए, और परमेश्वर के द्वारा उस पर किए गए असाधारण उपकारों के लिए भी, सब कहीं प्रसिद्ध था, तो वह सबको ऐसे चकित कर देता है मानो वह बादलों से गिर पड़ा हो।
इसके बाद वह यह जोड़ता है कि जातियों में न केवल खोज करने की आत्मा होगी, वरन् हर एक अपने आप ही सारी प्रजा का न्यायी बन जाएगा: वे उत्तर देंगे, वह कहता है, क्योंकि उन्होंने अपने परमेश्वर यहोवा की वाचा को तोड़ दिया। अब जब यिर्मयाह घोषणा करता है कि सारी जातियाँ इस प्रजा की न्यायी बन जाएँगी, तो निःसन्देह उसका अभिप्राय उस झूठे भरोसे की निन्दा करना था जिसमें वे घमण्ड से मग्न रहते थे। साथ ही वह कहता है, “उन्होंने अपने परमेश्वर यहोवा की वाचा को तोड़ दिया,” ताकि वह अज्ञानता के बहाने को दूर कर दे। क्योंकि उन्होंने न केवल सनातन परमेश्वर को उसके अपने अधिकार और प्रभुता से वंचित किया था, वरन् वे दोहरे दुष्ट बन गए थे, क्योंकि परमेश्वर ने अपने आप को उन पर घनिष्ठ रीति से प्रकट किया था।
इसलिए, क्योंकि सच्चा धर्म व्यवस्था में उन पर पूरी रीति से प्रकट किया गया था, इसी से उनका हठ और उनकी दुष्ट तथा नीच कृतघ्नता प्रकट हुई; क्योंकि उन्होंने इस रीति से अपने ऊपर प्रकट किए गए परमेश्वर को त्याग दिया, और पराए देवताओं के आगे झुककर उनकी सेवा की। मैं यहाँ इन बातों को केवल छूता हूँ, क्योंकि उनकी व्याख्या अन्यत्र की जा चुकी है। आगे लिखा है, यिर्मयाह 22:10
10. मरे हुए के लिए मत रोओ, उसके लिए विलाप मत करो; उसी के लिए फूट-फूटकर रोओ जो परदेश चला जाता है, क्योंकि वह लौटकर अपनी जन्मभूमि फिर कभी न देखने पाएगा।
10. Ne fleatis (vel, ne lugeatis) super mortuum, et ne condoleatis ei; flete flendo super eum qui migrat, qui non revertetur amplius, et videbit (hoc est, ut videt) terram nativitatis suae.
कुछ लोग इस पद की व्याख्या यहोयाकीम और यकोन्याह के विषय में करते हैं, परन्तु मैं इसे एक सामान्य घोषणा मानता हूँ; क्योंकि भविष्यद्वक्ता संक्षेप में यह दिखाना चाहता था कि प्रजा की दशा कितनी दयनीय होगी, यहाँ तक कि निरन्तर क्षीणता में जीवन को लम्बा खींचने से तुरन्त मर जाना अधिक अच्छा और अधिक वांछनीय होगा। राजाओं के विषय में वह आगे चलकर बोलेगा, परन्तु तर्क हमें विवश करता है कि हम इन शब्दों को सारी प्रजा पर लागू करें।
जब कोई प्रजा अपने शत्रुओं का सामना न कर सकने के कारण भाग जाती है, तो वह पुनः स्थापित होने की आशा रख सकती है। ऐसी दशा में सब लोग बँधुआई और इस जीवन में सही जानेवाली अन्य सब विपत्तियों से अधिक मृत्यु से डरते हैं; क्योंकि जो जीवित बचे रहते हैं वे किसी न किसी प्रकार अपनी विपत्तियों और कष्टों से उबर सकते हैं, या कम से कम उनके कष्ट हल्के हो सकते हैं; परन्तु मृत्यु सब आशाओं को काट देती है। परन्तु भविष्यद्वक्ता यहाँ कहता है कि बँधुआई से मृत्यु अच्छी होगी; और क्यों? क्योंकि दुःख, थकान और निन्दा से भरे जीवन को लम्बा खींचकर अन्त में नष्ट होने से तुरन्त मर जाना अधिक अच्छा होता। इसलिए जब वह कहता है, मरे हुए के लिए मत रोओ, और न उसके लिए विलाप करो, तो यह मानो ऐसा कहना है, “यदि इस नगर के विनाश पर विलाप किया जाए, तो जो मरेंगे उनसे कहीं अधिक उन पर विलाप किया जाना चाहिए जो जीवित बचे रहेंगे; क्योंकि मृत्यु मानो एक विश्राम होगी, वह सब बुराइयों का अन्त करनेवाला बन्दरगाह होगी; परन्तु जीवन दुःखों के निरन्तर क्रम के सिवा और कुछ न होगा।” इसलिए हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि इसे उन दो राजाओं तक सीमित न रखा जाए, वरन् सारी प्रजा के विषय में सामान्य रूप से कहा गया माना जाए।
आगे लिखा है, क्योंकि वह फिर कभी न लौटेगा, कि अपनी जन्मभूमि को देखे।
वह दिखाता है कि बँधुआई एक प्रकार का रोग होगी जो अभागे यहूदियों को धीरे-धीरे खा जाएगी। इस प्रकार उनके लिए इस रीति से बहुत समय तक यातना सहने और कोई राहत न पाने से मृत्यु कहीं अधिक अच्छी होती। फिर वह लौटने की आशा को भी छीन लेता है, ताकि वह दिखाए कि उनकी बँधुआई मानो एक मरणासन्न क्षीणता होगी, जो कीड़े के समान उन्हें खोखला करती रहेगी, यहाँ तक कि ऐसी कठोर और दयनीय दासता में बने रहने से सौ बार मरना अधिक वांछनीय होता। अब आगे लिखा है: यिर्मयाह 22:11-12
11. क्योंकि यहूदा के राजा योशिय्याह का पुत्र शल्लूम, जो अपने पिता योशिय्याह के स्थान पर राजा था और इस स्थान से निकल गया, उसके विषय में यहोवा यों कहता है, वह फिर लौटकर यहाँ न आने पाएगा;
11. Quia sic dicit Jehova ad Sallum (vel, super Sallum) filium Josliae, regis Jehudah, qui regnat pro Josia patre suo, quando ,{)}רשאest quidem relativum, sed non dubito quin, sumatur hic pro adverbio temporis; et ideo obscuerant sensum interpretes, dum vertunt, qui egressus est, et coguntur deinde mutare sensum verbi; sed hoc optime fluit et soepe occipitur pro quando) egressus fuerit ex hoc loco, non revertetur amplius:
12. वरन् जिस स्थान में वे उसे बँधुआ करके ले गए हैं, उसी में वह मर जाएगा, और इस देश को फिर कभी न देखने पाएगा।
12. Quoniam in loco ad quem transtulerint ipsum, illic morietur, et terram hanc non videbit amplius.
43 शब्दशः, “और न उसके लिए सिर हिलाओ।” उन्हें शोक के चिह्न के रूप में उसके लिए सिर नहीं हिलाना था। सिर हिलाना तिरस्कार या उपहास में भी होता था और संवेदना या सहानुभूति में भी। देखिए यिर्मयाह 18:16। — सं.
44 अनुवाद और तर्गुम कैल्विन के इस मत के पक्ष में जान पड़ते हैं, क्योंकि वे कृदन्त “चला जाता हुआ” का अनुवाद वर्तमान काल में करते हैं, जैसा हमारे अनुवाद में है। तब पद इस प्रकार है, — मरे हुए के लिए मत रोओ, और न उसके लिए विलाप करो; रोओ, रोओ उसके लिए जो चला जाता है; क्योंकि वह फिर कभी न लौटेगा, और न अपनी जन्मभूमि को देखेगा। क्रिया “रोओ” की पुनरावृत्ति बलपूर्वक है। हमारे अनुवाद का “फूट-फूटकर रोओ” अरबी का है। सेप्टुआजिंट और तर्गुम इसे उस बात का उदाहरण मानते हैं जो इब्रानी में प्रायः होती है, अर्थात् किसी क्रिया के बल को बढ़ाने के लिए उसके साथ एक कृदन्त जोड़ा जाता है; परन्तु यहाँ ऐसा नहीं है, दोनों क्रियाएँ आज्ञार्थक रूप में हैं। परन्तु हो सकता है, जैसा बहुत लोग सोचते हैं, कि यहाँ सीधे योशिय्याह की ओर संकेत है, जो मर चुका था और जिस पर बहुत विलाप किया गया था, और शल्लूम की ओर, जो बँधुआ करके मिस्र ले जाया गया, जहाँ वह मर गया। उस दशा में हमें दूसरी पंक्ति का अनुवाद इस प्रकार करना चाहिए, — रोओ, रोओ उसके लिए जो चला गया है। इब्रानी कृदन्त का अनुवाद प्रायः भूतकाल में किया जा सकता है; और यहाँ गेटेकर, वेनेमा और ब्लेनी ने उसका अनुवाद ऐसा ही किया है। — सं.
जो कुछ उसने पहले सामान्य रूप से कहा था, उसे अब वह स्पष्ट रूप से और विशेष करके राजा के व्यक्तित्व पर लागू करता है, ताकि साधारण प्रजा जान ले कि वे उस दण्ड से बच नहीं सकते जिससे स्वयं राजा भी मुक्त न रहेगा। निःसन्देह जब उन्होंने सुना कि ऐसी कठोर और कड़वी दशा एक राजा पर आ पड़ेगी, तो उन्होंने इसे अविश्वसनीय बात समझा; परन्तु यिर्मयाह उसके व्यक्तित्व में यह दिखाना चाहता था कि जो कुछ हमने अभी देखा, वह उन सबके निकट था, अर्थात् यह कि उनके लिए बहुत समय तक घुलते रहने से तुरन्त मर जाना अधिक अच्छा होता।
साथ ही हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि इन दो पदों में राजा के विषय में जो कुछ लिखा है, वह ऐसे नहीं कहा गया मानो वह केवल उसी पर लागू होता हो, वरन् इसलिए कि जो कुछ भविष्यद्वक्ता ने केवल राजा के विषय में कहा, उसे हर एक अपने ऊपर लागू करे।
जहाँ तक शल्लूम शब्द की बात है, ऐसा समझा जाता है कि यह नाम यहोयाकीम का था, जिसका एक नाम यकोन्याह भी था, और जिसने अपनी इच्छा से राज्य त्याग दिया था और बँधुआई में मर गया। परन्तु क्योंकि उसे योशिय्याह का पुत्र कहा गया है, इसलिए सन्देह उत्पन्न हुआ है। परन्तु यदि हम पवित्र इतिहास के वर्णन पर उचित रीति से विचार करें, तो सम्भावित अनुमान यह है कि वह उसका पुत्र नहीं वरन् पोता था; क्योंकि उसके पिता का चुना हुआ उत्तराधिकारी यहोयाकीम था, जिसे एल्याकीम भी कहा जाता था।
फिर भी मत्ती उसे योशिय्याह का पुत्र कहता है, और यह कि वह अपने भाइयों समेत उससे उत्पन्न हुआ। (मत्ती 1:11।) परन्तु हम जानते हैं कि इब्रानियों में वंशजों को पुत्र कहना एक साधारण बात थी, विशेष करके जब दाऊद के घराने की चर्चा होती थी; उत्तराधिकार का क्रम बनाए रखने के लिए, जो अपने पूर्ववर्तियों के ठीक बाद आते थे वे पुत्र कहलाते थे। इस प्रकार, इस रीति के अनुसार, एल्याकीम को उसका पुत्र माना जा सकता था, जो वास्तव में उसका भाई था। इसलिए, क्योंकि वह योशिय्याह का उत्तराधिकारी था, वह उसका पुत्र कहलाता है।
फिर भी इसमें कोई सन्देह नहीं कि परमेश्वर यहाँ दिखाता है कि एक भक्त राजा न तो अपने पुत्र का, न अपने पोते का, न दूसरों का संरक्षक होगा; क्योंकि कपटी लोग अपने पूर्वजों की पवित्रता से अपने लिए बचाव गढ़ने के आदी होते हैं। और क्योंकि राजा योशिय्याह ने विश्वासयोग्यता से परमेश्वर की सेवा की थी, इसलिए उसके पुत्रों ने सोचा कि परमेश्वर एक प्रकार से उनसे बँधा हुआ है, मानो यह सब परमेश्वर की केवल उदारता से न हुआ हो कि योशिय्याह ऐसा सच्चा धर्मपरायण था। परन्तु कपटी लोग, जैसा मैंने अभी कहा, सदा परमेश्वर को अपने से बँधा हुआ ठहराना चाहते हैं। इसलिए भविष्यद्वक्ता इस झूठे भरोसे को रोकता है, और घोषणा करता है कि यद्यपि योशिय्याह परमेश्वर का ग्रहणयोग्य था, तौभी उसकी स्मृति इतनी महत्त्व की न होगी कि उसके वंश को दण्ड से बचा सके। निःसन्देह परमेश्वर अपनी व्यवस्था में हज़ार पीढ़ी तक दया करने की प्रतिज्ञा करता है, अर्थात् उन पर जो उससे प्रेम रखते हैं (निर्गमन 20:6); परन्तु दुष्ट लोग बड़ी मूर्खता से इसे ऐसे पकड़ लेते हैं, मानो उन्होंने परमेश्वर को अपने से बाँध रखा हो; क्योंकि वे इस प्रकार कल्पना करते हैं कि वे उसे उसकी सामर्थ्य, न्याय और जगत पर उसके अधिकार से वंचित कर सकते हैं। तो अर्थ यह है कि शल्लूम ने व्यर्थ ही अपने को सुरक्षा का वचन दिया, क्योंकि वह पवित्र राजा योशिय्याह के वंश से था, जो उत्तम भक्ति का संरक्षक रहा था; क्योंकि इससे उसका दण्ड कम नहीं हो सकता था, इसलिए कि वह अपने पिता से पतित हो गया था, जिसका अनुकरण उसे करना चाहिए था, यह जानते हुए कि वह परमेश्वर का ग्रहणयोग्य था। और पुनरावृत्ति का कारण भी यही था; क्योंकि वह उसे केवल योशिय्याह का पुत्र ही नहीं कहता, वरन् यह भी जोड़ता है कि वह अपने पिता योशिय्याह के स्थान पर राज्य करता था। इसलिए यद्यपि वह ऐसे भक्त राजा का उत्तराधिकारी हुआ, तौभी वह पतित हो गया और अपने पिता के आदर्श से हट गया।
45 अधिकांश टीकाकार इस बात पर सहमत हैं कि शल्लूम यहोआहाज का दूसरा नाम था, जो अपने पिता योशिय्याह के बाद राजा हुआ। देखिए 2 राजाओं 23:30; और 2 इतिहास 36:1। उसने केवल तीन महीने राज्य किया, और उसके बाद उसका बड़ा भाई यहोयाकीम राजा हुआ। 2 इतिहास 36:2 की तुलना यिर्मयाह 22:5 से कीजिए। एकमात्र कठिनाई 1 इतिहास 3:15 से उत्पन्न होती है, जहाँ योशिय्याह के पुत्रों को इस क्रम में रखा गया है, — योहानान, यहोयाकीम, सिदकिय्याह और शल्लूम। योहानान निःसन्देह बचपन में ही मर गया, और वह यहोआहाज नहीं हो सकता था, क्योंकि उसे पहिलौठा कहा गया है; और यहोआहाज, जैसा 2 इतिहास 36:2 और 5 से प्रकट होता है, यहोयाकीम से छोटा और सिदकिय्याह से कई वर्ष बड़ा था। इस कठिनाई का एकमात्र समाधान यही जान पड़ता है कि, जैसा ब्लेनी, हॉर्सले और अन्य लोगों ने सोचा, 1 इतिहास 3:15 में लिपि की एक भूल है, कि शल्लूम को सिदकिय्याह के बाद नहीं, वरन् उससे पहले होना चाहिए। शल्लूम के समान उसके दोनों भाइयों के भी दो-दो नाम थे। इसी प्रकार की एक भूल (आरम्भिक काल के प्रतिलिपिकारों की, क्योंकि पाठ-भेद नहीं मिलते) 2 इतिहास 36:9 में है, जहाँ कहा गया है कि यहोयाकीन जब राज्य करने लगा तब आठ वर्ष का था, न कि अठारह वर्ष का, जैसा हम 2 राजाओं 24:8 में लिखा पाते हैं। और केवल यही आयु इस अध्याय में यिर्मयाह की भाषा से मेल खाती है, क्योंकि वह आठ वर्ष के बालक पर ऐसा दण्ड घोषित न करता। जहाँ तक मत्ती 1:11 की बात है, सच्चा पाठ निःसन्देह यह है, “और योशिय्याह से यहोयाकीम उत्पन्न हुआ, और यहोयाकीम से यकोन्याह उत्पन्न हुआ,” इत्यादि, जैसा कुछ प्रतियों में मिलता है, यद्यपि वे अधिक प्रामाणिक नहीं हैं। कुछ लोग कैल्विन के साथ शल्लूम को यकोन्याह, अर्थात् यहोयाकीम का पुत्र यहोयाकीन, मानते हैं, न कि योशिय्याह का पुत्र शल्लूम। इसके विरुद्ध आपत्ति यह है कि भविष्यद्वक्ता यहाँ शल्लूम से यहोयाकीम की ओर, और फिर उसके पुत्र यकोन्याह की ओर बढ़ता है। और जो कुछ वह यहोयाकीम के विषय में कहता है, उससे प्रकट होता है कि उसने यह भविष्यद्वाणी उसी के राज्यकाल में की थी, जब तक कि हम, जैसा कुछ लोग करते हैं, यह न मानें कि भविष्यद्वक्ता यहाँ सिदकिय्याह के राज्यकाल में वह बात बताता है जिसकी भविष्यद्वाणी उसने पहले की थी। परन्तु सम्भावना यही है, जैसा ब्लेनी और अन्य लोग सोचते हैं, कि यह भविष्यद्वाणी यहोयाकीम के राज्यकाल में की गई थी। — सं.
जब वह इस स्थान से निकल गया होगा, तब फिर कभी यहाँ न लौटेगा।
तो जब राजा का लौटना ही रोक दिया गया, तो साधारण लोगों और समाज के निम्नतम वर्ग का क्या होगा? क्या उनकी दशा अच्छी हो सकती थी? तब यहूदी अपने आप को कैसे फुसलाने का साहस कर सकते थे, जब उन्होंने स्वयं राजा में, जिस पर उनकी सुरक्षा निर्भर थी, परमेश्वर के क्रोध का ऐसा भयानक प्रमाण देखा? इसके बाद एक पुष्टि आती है, क्योंकि जिस स्थान में वे उसे ले गए होंगे, वहीं वह मर जाएगा। वह संकेत करता है कि वह बलपूर्वक ले जाया जाएगा; निःसन्देह उसने तब तक अपने आप को नहीं सौंपा जब तक उसने न देखा कि उसे झुकना ही पड़ेगा। तो भविष्यद्वक्ता वास्तव में यह कहता है कि वह एक दयनीय निर्वासित होगा, जो अपनी इच्छा के विरुद्ध देश-निकाले में धकेला जाएगा। फिर यह जोड़ा गया है कि वह अपनी जन्मभूमि को फिर कभी न देखेगा, यहाँ तक कि उसकी दशा साधारण प्रजा के किसी भी व्यक्ति की दशा से अच्छी न होगी। आगे लिखा है, —
यिर्मयाह 22:13
13. उस पर हाय जो अपने घर को अधर्म से और अपनी कोठरियों को अन्याय से बनवाता है; जो अपने पड़ोसी से बिना मज़दूरी के काम करवाता है, और उसके काम का बदला उसे नहीं देता;
13. Ileus qui aedificat domum suam in non justitia, (hoc est, injuste,) et coenacula sua in non judicio (hoc est, sine rectitudine et aequitate;) proximum suum servire facit gratis, et opus ejus non reddit ei (vel, quod ille operatus fuerit non reddit ei; (vel, quod ille operatus fuerit non reddit ei; quidam enim volunt esse verbum, alii nomen, sed idem manebit sensus).
भविष्यद्वक्ता यहाँ यह दिखाना आरम्भ करता है कि इसके सिवा और कुछ हो ही नहीं सकता था कि राजा का महल और यरूशलेम दोनों नष्ट किए जाएँ; क्योंकि उनकी दुष्टता चरम सीमा तक पहुँच गई थी; परन्तु अब वह, जैसा अभी प्रकट होगा, यकोन्याह के पिता को डाँटता है।
फिर वह कहता है कि नगर डकैतियों से भरा हुआ था, और विशेष करके राजा का महल। तौभी मैं नहीं सोचता कि भविष्यद्वक्ता केवल राजा के विषय में बोलता है, वरन् दरबारियों और प्रधान पुरुषों के विषय में भी। हमें यह भी स्मरण रखना चाहिए जो मैंने कल कहा था, कि जब राजा दोषी ठहराया गया तब साधारण लोग निर्दोष नहीं ठहराए गए। परन्तु क्योंकि प्रजा में प्रतिष्ठा और सम्मान राजा और प्रधानों दोनों का था, इसलिए भविष्यद्वक्ता उन्हें खुले रूप से प्रकट करता है, ताकि यह स्पष्ट हो जाए कि सारे समाज में स्थिति कितनी शोचनीय थी। साथ ही हमें यह भी जोड़ना चाहिए कि उनमें से प्रधान लोग पहले न्याय के लिए बुलाए गए, न केवल इसलिए कि हर एक ने व्यक्तिगत रूप से अपराध किया था, वरन् इसलिए कि उन्होंने अपने बुरे उदाहरणों से सारी प्रजा को भ्रष्ट कर दिया था; और इसलिए भी कि उन्होंने अधिक स्वच्छन्दता ली थी, क्योंकि वे किसी बात से नहीं डरते थे। हम जानते ही हैं कि धनी लोग अत्याचार करते हैं, क्योंकि वे अपने आप को सब नियमों से मुक्त समझते हैं। तो यही कारण है कि भविष्यद्वक्ता यहाँ विशेष रीति से राजा और प्रधान पुरुषों पर शाप की घोषणा करता है।
46 इसमें कोई सन्देह नहीं कि {{אשר कभी-कभी समयवाचक क्रियाविशेषण “जब” होता है; परन्तु सब अनुवाद और तर्गुम यहाँ इसका अनुवाद “जो” करते हैं, “जो निकल गया है,” इत्यादि। शल्लूम, वह जो भी रहा हो, निःसन्देह बँधुआ करके ले जाया जा चुका था, जैसा अगले पद में कहा गया है; क्योंकि वह क्रिया, जिसका अनुवाद कैल्विन भविष्यत् पूर्ण काल में करता है, भूतकाल में है, और सब अनुवादों में उसका अनुवाद ऐसा ही किया गया है। — सं.
वह कहता है कि उन्होंने अन्याय से निर्माण किया; उसके शब्द हैं, बिना धार्मिकता के और बिना न्याय के, जिनके द्वारा वह क्रूरता, छल और डकैतियों को सूचित करता है; संक्षेप में, वह इन शब्दों के अन्तर्गत सब प्रकार के अधर्म को सम्मिलित करता है। जिस रीति से ये काम किए गए, वह भी बताई गई है; उन्होंने अपने पड़ोसियों के साथ अन्याय किया, उनसे परिश्रम माँगकर और ऐंठकर, बिना उसका बदला दिए। निःसन्देह यहाँ भविष्यद्वक्ता केवल एक ही प्रकार के अन्याय का उल्लेख करता है; परन्तु इससे सहज ही यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जो उस समय अधिकार में थे वे कितने अन्याय और दुष्टता से शासन करते थे; क्योंकि वे अपने पड़ोसियों से, मानो वे दास हों, घर और महल बनवाने का काम लेते थे, क्योंकि वे उन्हें उनकी मज़दूरी देने से इनकार करते थे। परन्तु कंगालों को उनके परिश्रम के फल से वंचित करने से बढ़कर कोई क्रूरता नहीं हो सकती, जो अपने परिश्रम से ही अपनी दैनिक जीविका पाते हैं। निःसन्देह व्यवस्था में यह आज्ञा दी गई है कि मज़दूर की मज़दूरी रात भर हमारे पास न रहे (लैव्यव्यवस्था 19:13); क्योंकि यह उसे मार डालने के समान होगा। एक और अनुचित बात भी है; जब कोई डाकू किसी मनुष्य को मारता है, तो उसका उद्देश्य लूट होता है; परन्तु जो किसी कंगाल से परिश्रम ऐंठता है, और मानो उसका लहू चूसता है, और बाद में उसे नंगा और दरिद्र विदा कर देता है, यह बलपूर्वक उसे मार डालने से भी अधिक घोर है। अब हम भविष्यद्वक्ता का अर्थ समझते हैं। परन्तु क्योंकि वह इसी विषय को आगे जारी रखता है, इसलिए मैं आगे की टिप्पणियाँ कल तक के लिए स्थगित करता हूँ।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जबकि तू हमें ताड़ना देकर भी और कृपा से अपनी ओर खींचकर भी, हमारे साथ निरन्तर ऐसा व्यवहार करता है कि यह परखे कि हम चंगे किए जा सकते हैं या नहीं, — हाँ, यह वरदान दे कि हम न तो तेरी धमकियों के विरुद्ध और न तेरी प्रतिज्ञाओं के विरुद्ध कठोर हो जाएँ, वरन् सिखाए जाने योग्य मन से उसी के पीछे चलें जिसे तू अपने लिए प्रिय ठहराता है, और पवित्र जीवन में उन्नति करें, और दिन-प्रतिदिन अधिक जागरूक और परिश्रमी होते जाएँ, जब तक कि हम अन्ततः उस लक्ष्य तक न पहुँच जाएँ जो हमारे सामने रखा गया है, और तेरे स्वर्गीय राज्य में अपने विश्वास का प्रतिफल न पाएँ, जो तेरे एकलौते पुत्र के लहू के द्वारा हमारे लिए प्राप्त किया गया है। — आमीन।
बयासीवाँ व्याख्यान
पिछले व्याख्यान में हमने उस डाँट की व्याख्या आरम्भ की थी जो भविष्यद्वक्ता ने राजा यहोयाकीम को उसकी क्रूरता और अत्याचार के लिए दी थी; क्योंकि अपने भव्य महल बनवाने में उसने प्रजा को बिना कुछ पाए परिश्रम करने के लिए विवश किया। यही वह अपराध था जिसे भविष्यद्वक्ता ने तब बताया जब उसने कहा, हाय! वह अन्याय से बनवाता है, और अपनी कोठरियाँ अधर्म से; शब्दशः, “न्याय में नहीं।”
47 इस पद का अनुवाद न तो कैल्विन ने ठीक किया है और न किसी प्राचीन अनुवाद ने। उन सबने अन्तिम दो उपवाक्यों को बहुत हद तक पुनरुक्तिपूर्ण बना दिया है, जबकि अपने अर्थ में वे पूर्णतः भिन्न हैं। मैं इस पद का अनुवाद इस प्रकार करता हूँ, — हाय उस पर जो अपना घर अन्याय के द्वारा बनाता है, और अपनी कोठरियाँ अनुचित न्याय के द्वारा: अपने पड़ोसी को वह अकारण दास बना लेता है, और उसके काम के लिए उसे कुछ नहीं देता। क्रिया {{עבר जब उसके बाद ,{}ב आता है, तो उसका अर्थ दास बनाना, या किसी को दास बना लेना होता है। देखिए यिर्मयाह 25:14। इससे हम शब्द {}חנס का बल देखते हैं, अर्थात् मुफ़्त में, अकारण; क्योंकि कुछ परिस्थितियों में यहूदी दासता की दशा में पहुँचाए जा सकते थे; परन्तु यहोयाकीम ने यह तब किया जब कोई कारण न था। यही “अनुचित न्याय” था। और फिर उसने उन्हें कोई भरण-पोषण नहीं दिया, उनके काम के लिए कुछ नहीं; यही “अन्याय” था। उसने उन्हें दास बना लिया, और उनका भरण-पोषण नहीं किया। अनुवादों के ढीले अनुवाद में इस खण्ड का वास्तविक आशय पूरी रीति से खो गया है; परन्तु तर्गुम तीसरी पंक्ति का अर्थ ठीक व्यक्त करता है, “वह अकारण अपने पड़ोसी को दासता में डाल देता है।” — सं.
क्योंकि यहोयाकीम यह आपत्ति करके कह सकता था कि यह उसके लिए उचित है—क्योंकि राजा सोचते हैं कि सारा संसार उन्हीं के लिए रचा गया है—इसलिए भविष्यद्वक्ता ने मनुष्यों के सामान्य अधिकारों की ओर उसका ध्यान दिलाया; क्योंकि सब इस्राएली उसके कुटुम्बी थे; मानो उसने कहा हो, “यद्यपि तू प्रतिष्ठा में श्रेष्ठ है, तौभी तू अब्राहम के वंश का एक जन है, और अपने भाइयों के बीच में से लिया गया है; इसलिए तेरे लिए इतनी स्वच्छन्दता लेने का कोई कारण नहीं, मानो वे तेरे दास हों।” इससे हम भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय देखते हैं, जब उसने राजा यहोयाकीम की क्रूरता की निन्दा की, जिसने भव्य महल बनवाने में प्रजा के साथ मनमाना और अन्यायपूर्ण व्यवहार किया, और उचित से अधिक परिश्रम ऐंठा। अब आगे लिखा है, —
यिर्मयाह 22:14
14. वह कहता है, मैं अपने लिए एक लम्बा-चौड़ा घर और बड़ी-बड़ी कोठरियाँ बनाऊँगा, और वह अपने लिए खिड़कियाँ काटता है; और वह देवदार से पाटा जाता है, और सिन्दूर से रंगा जाता है।
14. Qui dicit, AEdificabo mihi domum amplam (mensuram, ad verbum, subaudiunt quidam Interpretes, magnarum; sed illud frigidum est, simpliciter enim domus mensurarum tantundem valet ac domus spatiosa,) et coenacula dilatationum (ad verbum, vel, respirationum, aut perflationum, nam {}הורsignificat tam respirare quam dilatare; unde deducitur {}הורquod significat spiritum et ventum,) et perforat sibi fenestras, et tecta (vel, cooperta) est domus cedro et uncta minio.
कुछ लोग अन्तिम शब्दों का अनुवाद “और लाल रंग से रंगा जाता है” करते हैं; परन्तु सिन्दूर लाल रंग का ही एक प्रकार है।
निःसन्देह वे लाल के तीन प्रकार बताते हैं, — गहरा लाल, भूरापन लिए हुए, और तीसरा जो अनेक रंगों से मिला हुआ होता है; परन्तु सिन्दूर अधिक चमकीला रंग है। मुख्य बात के विषय में कोई कठिनाई नहीं; भविष्यद्वक्ता राजा यहोयाकीम की महत्त्वाकांक्षा और घमण्ड को डाँटता है, कि वह अपने पूर्वजों के संयम से सन्तुष्ट न था, वरन् अति आडम्बर में लिप्त रहता था, और उसने अपने लिए मानो बादलों में एक महल बनवाया, मानो वह पृथ्वी पर निवास ही न रखना चाहता हो। घरों की भव्यता की अपने आप में निन्दा नहीं की जा सकती; परन्तु क्योंकि ऐसा कठिनता से ही हो सकता है, वरन् ऐसा क्वचित् ही होता है कि ऐसी अतृप्त महत्त्वाकांक्षा घमण्ड से उत्पन्न न हो, इसलिए भविष्यद्वक्ताओं ने ठाट-बाट के घरों की कड़ी निन्दा की; और उन्होंने ऐसे आडम्बरों पर शाप सुनाया, क्योंकि वे उद्देश्य और परिणाम पर ध्यान देते थे। इस खण्ड में भविष्यद्वक्ता का यही अभिप्राय था।
इसलिए वह राजा यहोयाकीम को इस प्रकार बोलते हुए प्रस्तुत करता है, मैं अपने लिए एक बड़ा घर और हवादार कोठरियाँ बनाऊँगा। उसका यह कहना उस मूर्ख महत्त्वाकांक्षा को प्रमाणित करता था जिसके नशे में यहोयाकीम चूर था, यहाँ तक कि यरूशलेम में पहले जो कुछ भी भव्य था उसे वह कुछ भी नहीं समझता था। हम जानते हैं कि वहाँ बहुत ठाट-बाट के महल थे; और हम यह भी जानते हैं कि यहूदा का राजा बड़े वैभव में रहता था।
क्योंकि यद्यपि सुलैमान के महल उस समय अपनी मूल भव्यता में खड़े न थे, तौभी जो कुछ बचा था वह ऐसे मनुष्य को सन्तुष्ट करने के लिए भरपूर था जो घमण्ड से भरा न हो। इससे प्रकट होता है कि यहोयाकीम में अति की लालसा प्रबल थी; क्योंकि वह राजमहल को, और सुलैमान की मृत्यु के बाद जो कुछ बचा था, उस सबको तुच्छ समझता था। क्योंकि हम जानते हैं कि परमेश्वर ने हिजकिय्याह, योशिय्याह और अन्य राजाओं को समृद्धि की आशीष दी थी; परन्तु वे उचित सीमाओं के भीतर बने रहे थे। तो जबकि ऐसा अहंकार यहोयाकीम के मन में घुस आया था, यह स्पष्ट है कि वह व्यर्थ घमण्ड से भरा था, वरन् मूर्खता के नशे में चूर था। यही कारण था कि भविष्यद्वक्ता ने उसे यह कहने के लिए कड़ी डाँट दी, “मैं अपने लिए एक बड़ा घर और हवादार कोठरियाँ बनाऊँगा,” अर्थात् खुली वायु वाली कोठरियाँ।
फिर वह आगे कहता है, और वह अपने लिए खिड़कियाँ काटता है। यह विलासिता का प्रमाण था, जब मनुष्य अनावश्यक वस्तुओं में लिप्त होने लगे। प्राचीन समय में खिड़कियाँ छोटी होती थीं; क्योंकि मितव्ययी लोग केवल उपयोगिता पर ध्यान देते थे; परन्तु बाद में बहुतों के मन पर एक प्रकार का उन्माद छा गया, यहाँ तक कि वे मानो वायु में लटके रहना चाहते थे। और इसलिए वे अधिक चौड़ी खिड़कियाँ रखने लगे। जैसा मैंने कहा है, वह बात अपने आप में ऐसी नहीं जिसकी परमेश्वर निन्दा करता है; परन्तु हमें सदा स्मरण रखना चाहिए, जैसा मैंने तुम्हें स्मरण दिलाया है, कि मनुष्य बाहरी बातों में तभी अति करते हैं जब उनके मन घमण्ड से दूषित होते हैं, यहाँ तक कि वे इस पर ध्यान नहीं देते कि क्या उपयोगी है, क्या शोभनीय है, वरन् अति की लालसा में बह जाते हैं।
फिर यह जोड़ा गया है, और वह देवदार से ढका जाता है, अर्थात् घर देवदार के तख़्तों से ढका जाता है। क्योंकि मेरे विचार में भविष्यद्वक्ता यहाँ दीवारों पर लगाई जानेवाली लकड़ी की पटिया-सज्जा का अर्थ लेता है, जब वह कहता है कि घर देवदार से ढका गया था; मानो उसने कहा हो कि राजा यहोयाकीम गढ़े और चिकने किए हुए पत्थरों को कुछ भी नहीं समझता था, जब तक दीवारों को सजाने के लिए देवदार के तख़्तों का आवरण न जोड़ा जाए। और इसी उद्देश्य से सिन्दूर से रंगाई भी थी; क्योंकि चित्रकारी को उचित ही अति अनावश्यक वस्तु माना जा सकता है। तो जबकि दीवारों को तरह-तरह की चित्रकारी से सजाना विलासिता का अंग था, मानो मनुष्य वस्तुओं के सरल स्वभाव को बदल देना चाहते हों, इसलिए भविष्यद्वक्ता यहाँ राजा यहोयाकीम पर क्रोधित है। और इसमें भी सन्देह नहीं कि परमेश्वर ने उस समय की परिस्थितियों पर भी ध्यान दिया; क्योंकि परमेश्वर उसे और सब यहूदियों को उनकी आनेवाली विपत्तियों के विषय में पहले ही चिता चुका था। तो यह एक प्रकार से परमेश्वर की धमकियों का उपहास करना था। और हम जानते हैं कि उसकी दृष्टि में यह कितना असहनीय था; क्योंकि वह यशायाह के द्वारा इस प्रकार घोषणा करता है, “मेरे जीवन की शपथ, यह अधर्म कभी न मिटाया जाएगा” (यशायाह 22:14); क्योंकि जब उसने उन्हें टाट ओढ़ने और राख डालने का उपदेश दिया था, तब उन्होंने कहा, “आओ, खाएँ-पीएँ, क्योंकि कल तो हम मर ही जाएँगे।” तो राजा यहोयाकीम का हठ भी ऐसा ही था; क्योंकि उसे उस आनेवाली विपत्ति को देखना चाहिए था जो मानो उसकी आँखों के सामने रखी गई थी; परन्तु वह, एक बावले के समान, राजसी वैभव को बढ़ाता गया, यहाँ तक कि उसके व्यय के सामने दाऊद और सुलैमान का धन कुछ भी न जान पड़ता था। अब आगे लिखा है, —
48 शब्द {,{מרוחים है, जिसका अनुवाद सेप्टुआजिंट ने “पंखा झले हुए — {ῥιπιστὰ}” किया है, और अन्य अनुवादों तथा तर्गुम ने “विस्तृत।” इसका अनुवाद “वायु-संचार की कोठरियाँ” हो सकता है, जिसका अर्थ है “हवादार कोठरियाँ।” पार्कहर्स्ट इसे हुफ़ल कृदन्त मानता है, और इसका अनुवाद “हवादार” करता है। परन्तु ब्लेनी इस पर आपत्ति करता है, क्योंकि यह “कोठरियाँ” से भिन्न लिंग में है; परन्तु इसे सम्बन्ध-रचना (construct) में माना जा सकता है; क्योंकि इब्रानी में प्रायः एक संज्ञा और एक कृदन्त, या विशेषण, के स्थान पर दो संज्ञाएँ प्रयुक्त होती हैं। — सं.
49 वल्गेट, सुरियानी और तर्गुम पढ़ते हैं, “और वह अपने लिए खिड़कियाँ खोलता है।” क्रिया {,{קרע है, जिसका अर्थ है फाड़ना, विभाजित करना, और फैलाना, बड़ा करना, चौड़ा करना भी। देखिए यिर्मयाह 4:30। इस पंक्ति का अनुवाद इस प्रकार किया जा सकता है, — और वह अपनी खिड़कियाँ बड़ी करता है। — सं.
50 कैल्विन पिछले भाग को सामान्यतः घर पर लागू करने में बिलकुल ठीक है, न कि कोठरियों पर, जैसा सेप्टुआजिंट और अरबी ने किया है; और उन्हीं से मार्गदर्शन पाकर हूबिगाँ ने मूल पाठ में संशोधन प्रस्तावित किए। पद की रचना भविष्यद्वक्ताओं की सामान्य रीति के अनुसार है, — 14. जो कहता है, “मैं अपने लिए एक विस्तृत घर, और हवादार ऊपरी कमरे बनाऊँगा:” और वह अपनी खिड़कियाँ बड़ी करता है; और वह देवदार से ढका है, और सिन्दूर से रंगा है। दो वस्तुओं का उल्लेख है, — घर और कमरे। पिछली वस्तु के विषय में वह पहले बोलता है, जैसा प्रायः होता है, कि उसने उनमें बड़ी खिड़कियाँ बनाईं; और फिर वह सामान्यतः घर के विषय में बोलता है, कि वह देवदार से ढका गया था (छत पाटी नहीं गई थी), जैसा मन्दिर था (1 राजाओं 6:15), और सिन्दूर से रंगा गया था। यहाँ हम एक उदाहरण देखते हैं कि इब्रानी शैली के विषय में अज्ञानता के कारण किस प्रकार संशोधन प्रस्तावित किए गए हैं। सुरियानी अनुवाद अर्थ को अधिक स्पष्ट करता है, यद्यपि वह शब्दशः नहीं है, और इस प्रकार है, — जो कहता है, “मैं अपने लिए बड़े घर, और विस्तृत कोठरियाँ बनाऊँगा:” इनके लिए वह खिड़कियाँ खोलता है; उन्हें वह देवदारों से ढकता है, और चित्रकारी से सजाता है। “सिन्दूर,” {,{ששר, जिसका अनुवाद सेप्टुआजिंट ने “{μίλτω} — गेरू,” या लाल मिट्टी, किया है; वल्गेट और तर्गुम ने “sinopide — एक लाल पत्थर।” पार्कहर्स्ट प्लिनी का उद्धरण देता है, जो कहता है कि {μίλτος} चाँदी की खानों में पाया जाता था, और एक प्रकार की लालिमा लिए हुए रेत थी, और रंग के रूप में प्रयुक्त होती थी। यहाँ जिसका उल्लेख है वह इसी प्रकार की कोई वस्तु थी, यद्यपि अब यह ठीक-ठीक ज्ञात नहीं कि वह क्या थी, और न इसका अधिक महत्त्व है। यह केवल यहीं, और यहेजकेल 23:14 में आता है। — सं.
यिर्मयाह 22:15
15. क्या तू इसलिए राज्य करेगा कि तू अपने आप को देवदार में बन्द करता है? क्या तेरा पिता खाता-पीता और न्याय और धर्म के काम नहीं करता था, और तब उसका भला होता था?
15. An regnabis, quia tu permisces se in cedro? (hoc est, quia to involvis cedro? pater tuus annon comedit et bibit et fecit (hoc est, cum faceret) judicium et justitiam?
Tunc bene fuit ei.
भविष्यद्वक्ता यहाँ राजा यहोयाकीम के मूर्खतापूर्ण भरोसे की हँसी उड़ाता है, क्योंकि उसने अपने शत्रुओं के विरुद्ध दृढ़ गढ़ों के स्थान पर खोखली वस्तुएँ खड़ी कीं। जब शान्ति और सुरक्षा होती है, अर्थात् जब वे किसी बात से नहीं डरते, तब राजा भोग-विलास में लिप्त होने के आदी होते हैं; जब कोई संकट दिखाई नहीं देता, तब वे अपनी अभिलाषाओं के वश में हो जाते हैं; और यह सबके साथ सामान्यतः होता है; क्योंकि हम देखते हैं कि राजा विशेष करके तब अति करते हैं जब कोई युद्ध नहीं होता, जब कोई उन्हें कष्ट नहीं देता, और कोई उन्हें धमकाता नहीं; परन्तु यहोयाकीम, यदि उसमें बुद्धि का तनिक भी अंश होता, तो जान सकता था कि उसे बहुत-से संकटों का भय था। अब, जब उसने अपने सारे विचार अपनी दीवारों की चित्रकारी पर, और अपने महल के वैभव पर, उसकी पटिया-सज्जा और अन्य तुच्छ बातों पर लगा दिए, तो क्या वह पागल और विक्षिप्त बुद्धि का न रहा होगा?
इसी उन्माद की यिर्मयाह अब निन्दा करता है जब वह कहता है, क्या तू इसलिए राज्य करेगा कि तू अपने आप को देवदार के तख़्तों से घेर लेता है? अर्थात्, “क्या इससे तेरा राज्य तेरे लिए स्थिर हो सकता है? या क्या तू इस कारण अधिक सुखी होगा कि तू देवदारों से घिरा हुआ है?” भविष्यद्वक्ता का अर्थ पद के शेष भाग से और अधिक पूरी रीति से जाना जा सकता है; क्योंकि तुरन्त आगे लिखा है, तेरा पिता, क्या वह खाता-पीता न था जब वह न्याय और धर्म के काम करता था?
कुछ लोग इस खण्ड को ऐसे समझते हैं मानो भविष्यद्वक्ता किसी आपत्ति का पहले से उत्तर देना चाहता था; क्योंकि यहोयाकीम अपने पिता योशिय्याह के उदाहरण का हवाला दे सकता था, जो कोई कंजूस मनुष्य न था, वरन् जिसने अपने सारे जीवनकाल में कुछ राजसी प्रतिष्ठा और भव्यता प्रदर्शित की थी। तो कुछ व्याख्याकार सोचते हैं कि भविष्यद्वक्ता यहाँ उसका उत्तर देता है जो यहोयाकीम आपत्ति कर सकता था: “क्या! क्या मेरे पिता ने भी राजसी ठाट-बाट नहीं दिखाया?” इस प्रकार वे इन शब्दों की व्याख्या करते हैं, मानो भविष्यद्वक्ता ने पहले कुछ मान लिया, परन्तु फिर एक सुधार जोड़कर दिखाया कि यहोयाकीम का बहाना निरर्थक था: “मैं मानता हूँ कि तेरा पिता राजसी रीति से सुशोभित था, परन्तु वह न्याय और धर्म के काम करता था; तू अपने पिता के सद्गुणों का अनुकरण क्यों नहीं करता? जो कुछ अनावश्यक या अति था उसे परमेश्वर ने क्षमा कर दिया, क्योंकि वह अपनी बड़ी सहनशीलता से राजाओं में बहुत-सी बातें सह लेता है; परन्तु तू अपने पिता से बहुत भिन्न है, क्योंकि तू अपनी कंगाल प्रजा से परिश्रम ऐंठता है, और ज़बरदस्ती वसूली और लूट के द्वारा अपने महल बनवाता है। इसलिए तेरे लिए अपने पिता की आड़ लेने का कोई कारण नहीं, क्योंकि तू उसकी खराई से पूरी रीति से गिर गया है।”
51 सामान्य अर्थ दिया गया है, परन्तु शब्दशः अनुवाद नहीं। अन्तिम क्रिया का अनुवाद भिन्न-भिन्न प्रकार से किया गया है; “क्योंकि तू देवदार की ओर प्रवृत्त होता है,” वल्गेट का है; “क्या तू देवदारों में आनन्दित होगा?” सुरियानी का; तर्गुम एक ढीली व्याख्या है, और सेप्टुआजिंट तथा अरबी हमारे वर्तमान पाठ से पूरी रीति से हट जाते हैं, “क्योंकि तू अपने पिता आहाज के द्वारा उकसाया जाता है।” फिर जो कुछ आगे आता है वह बहुत भिन्न है, परन्तु मूल से पूरी रीति से असंगत है। यह क्रिया {,{חרה का हित्पाएल रूप है, जिसका अर्थ है जलना, गर्म होना; और इसका अर्थ क्रोध, परिश्रम, शोक या आनन्द से गर्म या उत्तेजित होना है। दूसरे अर्थ में यह यिर्मयाह 12:5 में प्रयुक्त हुआ है; परन्तु यहाँ अन्तिम अर्थ में, “क्योंकि तू देवदार से उत्तेजित है,” अर्थात् देवदार में अत्यन्त आनन्दित होता है; और इस अर्थ का समर्थन वल्गेट और सुरियानी दोनों करते हैं। ब्लेनी तीसरा अर्थ लेता है — “शोक से तप्त,” और यह अनुवाद देता है, जिसे हॉर्सले ने स्वीकार किया है, यद्यपि उसका अर्थ बहुत स्पष्ट नहीं, — क्या तू इसलिए राज्य करेगा कि तू देवदार में कुढ़ता है? वेनेमा अधिक सटीक है, — क्या तू इसलिए राज्य करेगा कि तू देवदार के लिए बहुत उतावला है? — सं.
अन्य लोग इससे बिलकुल भिन्न अर्थ निकालते हैं, — कि योशिय्याह ने न्याय से शासन करके अपने जीवन को लम्बा किया था और परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त किया था। इसलिए वे शब्दों को इस प्रकार जोड़ते हैं: “क्या तेरा पिता खाता-पीता न था,” अर्थात्, “क्या वह सुख से नहीं रहा, क्योंकि परमेश्वर ने उसे आशीष दी थी? कारण की खोज कर, और तू पाएगा कि वह यह है — उसने अपने कर्तव्यों को विश्वासयोग्यता से पूरा किया, क्योंकि उसने न्याय और धर्म के काम किए। तो जबकि तू देखता है कि जिस न्यायपरायणता और संयम का तेरे पिता ने पालन किया था, वही उसके सुखी जीवन का कारण था, तो तू भी उसका अनुकरण क्यों नहीं करता?”
परन्तु मुझे जान पड़ता है कि भविष्यद्वक्ता का अर्थ केवल यह है, “निःसन्देह तेरा पिता सुख से रहा, और जब तक वह न्याय और धर्म के काम करता रहा, तब तक उसे किसी वस्तु की घटी न थी।”
क्योंकि इस प्रकार यहोयाकीम के अत्याचार और उसके पिता योशिय्याह की खराई के बीच का विरोध अधिक अच्छी रीति से प्रकट होता है; मानो उसने कहा हो, “तू अब अपनी दशा को अपने पिता की दशा से अच्छी समझता है, क्योंकि तू विलासिता और वैभव में उससे बढ़कर है।
"इस प्रकार तू व्यर्थ बातों पर इतराता है, और अपने आप को अपने पिता से अधिक सुखी समझता है; परन्तु तेरा पिता अपने भाग से सन्तुष्ट था; वरन् यदि उसकी दशा पर ठीक-ठीक ध्यान दिया जाए, तो परमेश्वर ने उसे हर प्रकार की भरपूरी और विविध आशीषों से सम्मानित किया था; वह खाता-पीता था।"
खाने-पीने से मैं और कुछ नहीं, केवल यही समझता हूँ कि वह आनन्द से जीवन बिताता था, समृद्धि का सुख भोगता था, और शान्ति का जीवन व्यतीत करता था। वह कहता है, तेरा पिता खाता-पीता था; अर्थात् उसे किसी वस्तु की लालसा न थी, और जब वह न्याय और धर्म का ध्यान रखता था, तब उसकी दशा परमेश्वर के अनुग्रह का प्रमाण थी। और इस अर्थ से वह बात भी बेमेल नहीं जो आगे आती है, तब उसका भला हुआ।
इस से हम देखते हैं कि यहाँ यहोयाकीम की मूर्खतापूर्ण महत्वाकांक्षा का उपहास किया गया है; क्योंकि जब तक वह किसी पागल के समान आचरण न करे, तब तक वह अपने आप को राजा ही नहीं समझता था।
आज के राजाओं की भी यही दशा है; वे मनुष्योचित दया दिखाने में लजाते हैं, और केवल अत्याचार करने की युक्तियाँ गढ़ते हैं; और वे यह भी सोचते रहते हैं कि मनुष्यों की साधारण रीति और व्यवहार से जहाँ तक हो सके दूर कैसे रहें। सो जब राजा अपनी ही मूर्खताओं में ऐसे निपुण हैं, जो मानो परदे के समान हैं, कि कहीं उनमें कोई मनुष्योचित बात दिखाई न दे जाए, तो भविष्यद्वक्ता यहाँ यहोयाकीम के विरुद्ध उचित ही कठोर वचन कहता है; वह कहता है, "तेरे पिता का भला हुआ; तौभी वह अपनी प्रजा के साथ दया और शिष्टता से व्यवहार करता था; और उसमें ऐसा घमण्ड न था कि वह मनुष्यों की साधारण रीतियों को तुच्छ जाने। सो जब वह सुखी था, यदि तू इस पर ध्यान दे कि सच्चा सुख किस में है, तो तू अपने आप पर इतना क्यों फूलता है? तेरे पास ऐसा क्या है जो उसके पास की वस्तुओं से उत्तम या श्रेष्ठ हो!"
अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता क्या दिखाना चाहता था, अर्थात् यह कि राजाओं की एकमात्र सच्ची महिमा और सबसे बड़ा आदर यही है कि वे अपने कर्तव्यों का पालन करें, और जब वे न्याय और धर्म के काम करते हैं, तब परमेश्वर का स्वरूप उनमें चमकता है; और जब वे अन्धे उत्साह से महत्वाकांक्षी होकर घमण्ड के दास बनना चाहते हैं, तो यह व्यर्थ प्रयत्न है, और उस सुखी जीवन की ओर कुछ भी नहीं ले जाता जिसकी वे मूर्खता से कल्पना करते हैं। इसी आशय से वह आगे कहता है, —
52 पूरा पद इस प्रकार पढ़ा जाए तो अधिक अच्छा होगा, — 15. क्या तू इसलिए राज्य करेगा कि तू देवदार पर मोहित है? तेरा पिता — क्या वह खाता-पीता न था? जब वह न्याय और धर्म के काम करता था, तब उसका भला हुआ। जैसा कैल्विन कहता है, खाने और पीने का अर्थ सुखी जीवन है; उसके पिता ने जीवन का सुख भोगा, यद्यपि उसे देवदारों में कोई आनन्द न था; परन्तु उसका सुख अपनी प्रजा पर न्याय से शासन करने से उत्पन्न हुआ। सुरियानी अनुवाद अन्तिम दो पंक्तियों को ऊपर के समान जोड़ता है, — उसने न्याय और धर्म के काम किए, इसलिए मैं ने उसका भला किया। — सं.
यिर्मयाह 22:16
16. वह दीन और दरिद्र लोगों का न्याय चुकाता था, इसलिए उसका भला होता था। क्या यही मेरा ज्ञान रखना नहीं है? यहोवा की यह वाणी है।
16. Judicium judicavit pauperis et egeni, tunc bene; an non cognoscere me, inquit Jehova?
जो कुछ उसने कहा था उसे वह और भी पूर्णता से प्रकट करता है, अर्थात् यह कि योशिय्याह ने उपयोगी जीवन बिताया, और वह आदर और सम्मान पाता था, क्योंकि राजकीय प्रताप उसमें चमकता था। तब वह जो कुछ कह चुका था उसे दूसरे शब्दों में दोहराता है, परन्तु उसने यह स्पष्टीकरण के लिए किया।
वह कहता है, उसने दीन और दरिद्र का मुक़द्दमा, या उनका झगड़ा, अपने हाथ में लिया। यहाँ अंश के द्वारा सम्पूर्ण का वर्णन है; क्योंकि जब कोई कंगालों के साथ दया का व्यवहार करता है, तब भी वह धनवानों का धन लूट सकता है, जिसे उचित नहीं ठहराया जा सकता; परन्तु क्योंकि प्रायः ऐसा ही होता है कि शासन करनेवाले दीनों और असहायों की उपेक्षा करते हैं, इसलिए भविष्यद्वक्ता एक ही बात में शासकों का सम्पूर्ण कर्तव्य समेट लेता है, और कहता है कि राजा योशिय्याह खरा, धर्मी और न्यायप्रिय था, कि वह न केवल अन्याय करने से बचा रहा, वरन् जिन निर्दोषों को उसने सताए जाते देखा उनकी सहायता भी की, और अपनी इच्छा से बीच में पड़कर किसी को उन्हें सताने से रोका। सो वह एक ही बात में वह सब कुछ समेट लेता है जो एक न्यायी और खरे न्यायाधीश के पद से सम्बन्ध रखता है। क्योंकि न्यायियों का पहला कर्तव्य यह है कि वे सब प्रकार की लूट-खसोट और उपद्रव से दूर रहें; और दूसरा यह कि जब कभी वे कंगालों को दूसरों के अन्याय का शिकार होते देखें, तो उनकी ओर हाथ बढ़ाएँ और उन्हें सहायता पहुँचाएँ। सो उसने दीन और दरिद्र का न्याय चुकाया, या उनका मुक़द्दमा अपने हाथ में लिया; और आगे कहा गया है, तब भला; अर्थात्, जैसा मैं समझा चुका हूँ, "यही तेरे पिता योशिय्याह का सुख था, कि प्रजा उसे तुच्छ न जानती थी, और उसे किसी और वस्तु की लालसा न थी।"
फिर आगे लिखा है, यहोवा की यह वाणी है, क्या यही मेरा ज्ञान रखना नहीं है? भविष्यद्वक्ता फिर दिखाता है कि राजा यहोयाकीम ने भोग-विलास और व्यर्थ आडम्बर में, और साथ ही लूट, क्रूरता और अत्याचार में जो स्वच्छन्दता अपनाई थी, वह कहाँ से उत्पन्न हुई, अर्थात् इसलिए कि उसने धर्म की सारी चिन्ता और परवाह को त्याग दिया था; क्योंकि जहाँ परमेश्वर का सच्चा ज्ञान होता है, वहाँ मनुष्य अवश्य ही खराई और संयम का ध्यान रखते हैं। सो जो अपने पड़ोसियों के प्रति ऐसी क्रूरता करता है, वह स्पष्ट दिखाता है कि धर्म का हर विचार और उसकी हर चिन्ता उसके हृदय से उखाड़ फेंकी गई है। संक्षेप में, भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय यह है कि यहोयाकीम न केवल मनुष्यों के प्रति अन्यायी था, वरन् अभक्ति का भी दोषी था; क्योंकि यदि वह परमेश्वर का अपवित्र तिरस्कार करनेवाला न बन गया होता, तो वह अपने पड़ोसियों पर ऐसा अन्यायपूर्ण अत्याचार न करता।
परन्तु यह स्थल ध्यान देने योग्य है, क्योंकि यह दिखाता है कि भक्ति मनुष्यों को प्रेम के सब कर्तव्यों की ओर ले जाती है। सो जहाँ परमेश्वर जाना जाता है, वहाँ मनुष्यों के प्रति दया भी प्रकट होती है। इसी प्रकार दूसरी ओर हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि जब मनुष्य जान-बूझकर एक दूसरे के साथ अन्याय करते हैं, और एक दूसरे पर अत्याचार करने या एक दूसरे को ठगने का यत्न करते हैं, तब परमेश्वर के प्रति सारा आदर बुझ गया है और उसका सारा भय मिट गया है। इसलिए इस में कोई सन्देह नहीं कि जहाँ प्रेम के कर्तव्यों की उपेक्षा की जाती है, वहाँ घोर अभक्ति पाई जाएगी। क्योंकि जब यिर्मयाह ने योशिय्याह की भक्ति की प्रशंसा इस कारण से की कि वह न्याय और धर्म के काम करता था, तब उसने निःसन्देह यहोयाकीम को दोषी ठहराया, मानो उसने यह कहा कि वह एक पतित और असुधार्य धर्मत्यागी था; क्योंकि यदि उसमें धर्म की एक चिनगारी भी बची रहती, तो वह अपनी प्रजा के साथ अधिक न्याय और दया से व्यवहार करता। अब आगे लिखा है, —
53 वेनेमा का विचार है कि यहाँ कोई दोहराव नहीं है, वरन् वह इस पद को यहोयाकीम से कहा गया मानता है, और यह अनुवाद देता है, — न्याय करते हुए दुःखी और कंगाल का न्याय कर, तब तेरा भला होगा: क्या यही मेरा ज्ञान नहीं है, यहोवा की यह वाणी है? परन्तु शब्द इस अनुवाद की अनुमति नहीं देते। क्रिया भूतकाल में है, और उसके बाद उसी क्रिया से बनी एक संज्ञा आती है, जो इब्रानी में कोई असाधारण बात नहीं। शब्दशः पद यह है, — उसने दरिद्र और कंगाल के बचाव (मुक़द्दमे) का बचाव किया, तब उसका भला हुआ: क्या वह मुझे जानना न था, यहोवा की यह वाणी है? सर्वनाम {,{הוא जब संकेतवाचक सर्वनाम के रूप में प्रयुक्त होता है, तो उसका अर्थ "यह" नहीं, वरन् "वह" होता है। देखिए उत्पत्ति 2:19। हम अन्तिम पंक्ति का अनुवाद इस प्रकार भी कर सकते हैं, — क्या वह मेरा ज्ञान न था, यहोवा की यह वाणी है? अर्थात्, क्या वह उस ज्ञान का फल या परिणाम न था?
54 वल्गेट में है, "क्या ऐसा इसलिए न था कि वह मुझे जानता था, यहोवा की यह वाणी है?" सुरियानी में, "जो ऐसे काम करता है वह मुझे जानता है, प्रभु की यह वाणी है;" और टार्गुम में, "क्या वही वह ज्ञान नहीं जो मैं चाहता हूँ, प्रभु की यह वाणी है?" वल्गेट सबसे अधिक शुद्ध है। ग्रोशियस कहता है, "वे परमेश्वर को जाननेवाले कहलाते हैं, जो अपने कामों से दिखाते हैं कि वे जानते हैं कि उसे क्या भाता है।" — सं.
यिर्मयाह 22:17
17. परन्तु तू केवल अपना ही लाभ देखता है, और निर्दोष की हत्या करने और अन्धेर और उपद्रव करने ही में अपना मन और दृष्टि लगाता है।
17. Quia non oculus tuus et cor tuum nisi ad cupidatatem tuam, et ad sanguinem innoxium fundendum, et ad rapacitatem, et ad oppressionem, ad faciendum (hoc est, ut exequaris.
यहाँ भविष्यद्वक्ता और भी स्पष्टता से प्रकट करता है कि यहोयाकीम अपने पिता योशिय्याह से कितना भिन्न था। वह सचमुच दिखाता है कि वह उससे पूरी रीति से असमान था, क्योंकि योशिय्याह ने जो न्यायसंगत था उसका पालन करने का यत्न किया था, जबकि इसने अपने सारे विचार छल, लूट और क्रूरता पर लगा दिए थे; क्योंकि आँख और हृदय से उसका अभिप्राय उसके प्राण और शरीर की सब शक्तियों से है। जैसा कि सब जानते हैं, शरीर की मुख्य इन्द्रियों में से एक दृष्टि है।
इसलिए भविष्यद्वक्ता यहाँ मनुष्यों में जो कुछ बाहरी और भीतरी है, सब को सम्मिलित कर लेता है, जब वह कहता है, तेरी आँख, अर्थात् तेरी सब शारीरिक इन्द्रियाँ लोभ पर लगी हैं, और तेरा हृदय भी, अर्थात् तेरे सब विचार, भावनाएँ, योजनाएँ, चिन्तन और अभिप्राय उसी रीति से उसी में लगे हैं। संक्षेप में, वह संकेत करता है कि यहोयाकीम शरीर और मन दोनों में भ्रष्ट था, यहाँ तक कि परमेश्वर का सारा भय त्यागकर उसने अपने आप को लोभ के, और साथ ही लूट और सब प्रकार के अत्याचार के हवाले कर दिया था। वह कहता है, तेरी आँख और तेरा हृदय लोभ को छोड़ और किसी बात पर नहीं।
क्रिया {,}בצעbetso का अर्थ लालच करना है; इसलिए संज्ञा का अर्थ केवल लोभ ही नहीं, वरन् कोई भी पापमय अभिलाषा है। वह क्रूरता को भी जोड़ता है, क्योंकि यह हो ही नहीं सकता कि जो अपनी अभिलाषाओं की लगाम ढीली छोड़ देते हैं वे सब रक्तपाती न हों। तीसरे स्थान पर वह लूट-खसोट, या बलपूर्वक छीन लेने का उल्लेख करता है; क्योंकि {,}עשקoshek का अर्थ है जो दूसरे का है उसे बलपूर्वक ले लेना; इसलिए संज्ञा का अर्थ लूट-खसोट है। अन्त में जो आता है वह अत्याचार, या उत्पीड़न है।
क्योंकि {,}רוףruts का अर्थ दौड़ना है, इसलिए जेरोम इसका अनुवाद "तेरे काम का मार्ग" करता है, मानो {,}עשותoshut के आगे लगा {,}לlamed सेवक अक्षरों {,}ם{,}ל{,}כ caph, lamed, mem में से एक न हो; परन्तु यह स्वीकार नहीं किया जा सकता। भविष्यद्वक्ता का स्पष्ट अभिप्राय सचमुच यह है कि यहोयाकीम न केवल दूसरों की वस्तुओं पर अधिकार करने में लगा रहता था, वरन् जितनों को वह सता सकता था उन सब पर अत्याचार करता और उन्हें क्लेश देता था। अन्त में जोड़ा गया है, करने के लिए; "करना" क्रिया को पहले कही गई बातों पर लागू करना चाहिए, अर्थात् यह कि यहोयाकीम ने अपने सारे विचार बुरे कामों में लगा दिए थे और पूरी रीति से उन्हीं में लीन था, कि वह न केवल अपने मन में क्रूरता और लोभ के काम सोचता था, वरन् जो कुछ उसने सोचा था उसे पूरी रीति से कार्य में भी परिणत करता था। आगे लिखा है, —
यिर्मयाह 22:18-19
18. इसलिए योशिय्याह के पुत्र यहूदा के राजा यहोयाकीम के विषय में यहोवा यों कहता है, जैसे लोग इस रीति से कहकर रोते हैं, हाय मेरे भाई, हाय मेरी बहिन! इस रीति से कोई "हाय मेरे प्रभु" या "हाय तेरा वैभव" कहकर उसके लिए विलाप न करेगा।
18. Propterea sic dicit Jehova ad Joakim (vel, de, {,}אלcapitur pro de, ergo de Joakim) filio Josiae regis Jehudah, Non lugebunt eum, Heus frater mi! et heus soror! non lugebunt eum, Heus domine! heus gloria ejus!
19. वरन् उसको गदहे के समान मिट्टी दी जाएगी, वह घसीटकर यरूशलेम के फाटकों के बाहर फेंक दिया जाएगा।
19. Sepultura asini sepelietur, ad trahendum, et projiciendum ad extra ad portas (ad verbum hoc est, longe extra portas) Jerosolymae.
यहोयाकीम के विरुद्ध कठोर वचन कहने के बाद, भविष्यद्वक्ता अब दिखाता है कि परमेश्वर की ओर से किस प्रकार का दण्ड उसकी बाट जोह रहा था; अन्यथा वह भविष्यद्वक्ता की डाँट को तुच्छ जानता; परन्तु जब उसने सुना कि उसके लिए प्रतिफल तैयार है, तो अवश्य ही वह चौंक उठा होगा। सो जब वह महिमा की मूर्खतापूर्ण, वरन् जड़ बुद्धि की-सी लालसा से ऐसा ग्रस्त था कि उसने खराई की सारी चिन्ता त्याग दी, तो भविष्यद्वक्ता घोषणा करता है कि उसके लिए अपमान तैयार है; और इसलिए वह उसकी मृत्यु के पश्चात् उसकी तुलना गदहे से करता है।
इसलिए यहोवा राजा यहोयाकीम से, या राजा यहोयाकीम के विषय में, जो राजा योशिय्याह का पुत्र है, यों कहता है, इत्यादि। उसे आदर के लिए योशिय्याह का पुत्र नहीं कहा गया, वरन् उसे मर्म तक छेदने के लिए, क्योंकि वह अपने पिता की भक्ति से पतित हो गया था। परन्तु क्योंकि वह आशा रखता था कि योशिय्याह का धर्म उसके लिए एक प्रकार का आवरण होगा, इसलिए भविष्यद्वक्ता इस व्यर्थ भरोसे का उपहास करता और उसे रोकता है। "तू राजा योशिय्याह का पुत्र होने पर घमण्ड करता है, परन्तु तेरा पवित्र पिता तेरे कुछ काम न आएगा, क्योंकि तू खुलेआम यह दिखाता प्रतीत होता है कि तू उससे पूरी रीति से भिन्न है। सो यद्यपि तू योशिय्याह के वंश से है, और यद्यपि परमेश्वर ने तुझे राजसिंहासन पर बैठाया है, तौभी तेरे पास अपनी सुरक्षा के विषय में निश्चिन्त रहने का कोई कारण नहीं; क्योंकि परमेश्वर के ये उपकार तुझे उस अपमानजनक व्यवहार से नहीं बचाएँगे जिसके तू योग्य है।"
पहले वह कहता है, वे उसके लिए यह कहकर विलाप न करेंगे, हाय मेरे भाई! हाय बहिन! भविष्यद्वक्ता विलाप करनेवालों के शब्दों का अनुकरण करते हुए उल्लेख करता है। हम जानते हैं कि वे लोग अपना शोक प्रकट करने में बहुत उग्र होते थे। और यह बात स्मरण रखनी चाहिए, क्योंकि कुछ लोग यह मानकर कि भविष्यद्वक्ता ऐसी कोई बात नहीं बताते जिसे उदाहरण के रूप में ग्रहण न किया जाए, इसलिए यह सोचते हैं कि विलाप की ये रीतियाँ परमेश्वर को स्वीकार्य थीं। परन्तु हम पहले देख चुके हैं कि भविष्यद्वक्ता ने यिर्मयाह 22:4 में क्या कहा था, "इन फाटकों से होकर यहूदा के राजा और उनके हाकिम रथों पर" इत्यादि, तौभी हम जानते हैं कि राजाओं को ऐसे आडम्बर करने से मना किया गया था; परन्तु राजकीय वैभव के विषय में बोलते समय परमेश्वर ने बारीकी से इस बात का उल्लेख नहीं किया कि क्या उचित या ठीक है; वैसे ही जब उसने अन्त्येष्टि की रीतियों के विषय में कहा। इसलिए भविष्यद्वक्ता जो कहता है उसे हमें व्यवस्था नहीं बना लेना चाहिए, मानो मरे हुओं के लिए हाहाकार करके रोना उचित और ठीक हो। इस में सचमुच कोई सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता जिन अतिरेकों का उल्लेख करता है वे न केवल मूर्खतापूर्ण थे, वरन् पूरी रीति से निन्दनीय भी थे; क्योंकि हम प्रायः अपने विलापों में एक दूसरे से होड़ करते हैं; और जब मनुष्य अन्त्येष्टि में असंयम से अपना शोक प्रकट करते हैं, तो वे रोने और विलाप करने में अपने आप को एक प्रकार के उन्माद तक उभार लेते हैं, और फिर जब वे अपने आप को सँभालकर शोक का दिखावा करते हैं, तो वे मानो रंगमंच पर अभिनय करते हैं। परन्तु भविष्यद्वक्ता यहाँ केवल उस युग की साधारण रीति के अनुसार बोलता है, जब वह कहता है, "वे उसके लिए विलाप न करेंगे," इत्यादि; अर्थात् वह बताता है कि साधारणतः क्या किया जाता था, जब एक दूसरे को गले लगाता था, जब बहिन कहती थी, "हाय, मेरे भाई!" और जब भाई कहता था, "हाय, मेरी बहिन!" या जब लोग कहते थे, "हाय, प्रभु, हे राजा, तेरा वैभव कहाँ है! तेरा आदर कहाँ है! तेरा मुकुट कहाँ है! तेरा राजदण्ड कहाँ है! तेरा सिंहासन कहाँ है!" सो जिन विलापों का भविष्यद्वक्ता यहाँ उल्लेख करता है वे अत्यन्त मूर्खतापूर्ण थे।
55 इस पद का सबसे अधिक शब्दशः अनुवाद यह है, — क्योंकि तेरी आँखें और तेरा हृदय किसी बात पर नहीं, केवल तेरे लाभ पर, और निर्दोष के लहू पर, कि वह बहाया जाए, और अन्धेर और उपद्रव पर, कि वे किए जाएँ। "कि वह बहाया जाए," शब्दशः "बहाए जाने के लिए" है, यह कर्मवाच्य कृदन्त है; और अन्तिम क्रिया के विषय में भी यही बात है। — सं. 56 सेप्टुआजिन्ट और वल्गेट में "से" है, और सुरियानी, अरबी और टार्गुम में "के विषय में"। व्याख्याकारों ने अधिकतर दूसरे अर्थ को अपनाया है। — सं.
परन्तु जैसा मैं कह चुका हूँ, हमारे लिए इतना जानना पर्याप्त है कि वह उन रीतियों की ओर संकेत करता है जो उस समय साधारणतः प्रचलित थीं, बिना उनके प्रति अपनी स्वीकृति प्रकट किए।
वह कहता है, वे राजा यहोयाकीम के लिए विलाप न करेंगे; वे उसकी अन्त्येष्टि में न कहेंगे, हाय, मेरे भाई! हाय, बहिन! और, हाय, प्रभु! हाय, उसका वैभव! ऐसा कुछ भी न होगा; और क्यों? क्योंकि उसको गदहे के समान मिट्टी दी जाएगी। हम पहले कह चुके हैं कि जब किसी लोथ को बिना गाड़े फेंक दिया जाता था, तो यह उचित ही परमेश्वर के शापों में से एक माना जाता था; क्योंकि परमेश्वर चाहता था कि गाड़ा जाना इस बात का प्रमाण हो कि मृत्यु के बाद भी हम पशुओं से भिन्न हैं, जैसे जीवन में हम उनसे श्रेष्ठ हैं, और जैसे हमारी दशा पशु-सृष्टि की दशा से कहीं अधिक उत्तम है। गाड़ा जाना मानो अमरता की एक बयाना भी है; क्योंकि जब मनुष्य की देह पृथ्वी में छिपाकर रखी जाती है, तो वह मानो आनेवाले जीवन का दर्पण होती है। सो जब गाड़ा जाना मनुष्यजाति के प्रति परमेश्वर के अनुग्रह और कृपा का प्रमाण है, तो दूसरी ओर जब गाड़ा जाना रोक लिया जाता है, तो यह शाप का चिह्न है।
परन्तु अन्यत्र कहा जा चुका है कि सांसारिक दण्डों को सदा एक ही दृष्टि से नहीं देखना चाहिए; क्योंकि परमेश्वर ने कभी-कभी अपने विश्वासयोग्य दासों को भी बिना गाड़े रहने दिया है, जैसा हम भजन संहिता 79:2, 3 में पढ़ते हैं, कि उनकी लोथें मैदानों में फेंक दी गईं, कि वे पृथ्वी के पशुओं और आकाश के पक्षियों का आहार होने के लिए छोड़ दी गईं। जिनके विषय में यह कहा गया वे परमेश्वर के सच्चे और निष्कपट उपासक थे। परन्तु हम जानते हैं कि सांसारिक दण्ड भले और बुरे दोनों पर समान रूप से पड़ते हैं; और यह अकाल और नंगेपन, मरी और युद्ध के विषय में सच है। यरूशलेम नगर का विनाश दुष्टों पर एक न्यायसंगत दण्ड था; तौभी दानिय्येल और यिर्मयाह भी दुष्टों के साथ बँधुआई में ले जाए गए, और उन्होंने बड़े कष्ट सहे; और संक्षेप में, वे अभक्तों के साथ ऐसे मिले-जुले थे कि उनकी बाहरी दशा में कुछ भी भिन्नता न थी। सो संसार की दशा प्रायः ऐसी अव्यवस्थित होती है कि हम बाहरी परिस्थितियों से भले और बुरे में भेद नहीं कर सकते।
57 मूल में "उसका" (पुल्लिंग) नहीं, वरन् "उसका" (स्त्रीलिंग) वैभव है। यह विलाप वैसा है जैसा राजाओं के लिए किया जाता था, जब रानियों के प्रति भी संवेदना प्रकट की जाती थी। हाय, मेरे भाई! और, हाय, प्रभु! मरे हुए राजा के लिए विलाप था, (यिर्मयाह 34:5;) और, हाय, बहिन! और, हाय, उसका वैभव! जीवित रानी के प्रति सहानुभूति थी। उसका वैभव उसके पति के साथ चला गया था। यह ब्लेनी का मत है। सब अनुवाद और टार्गुम भिन्न-भिन्न हैं, और उनमें से कोई भी मूल का ठीक अनुवाद नहीं करता। पद का अनुवाद इस प्रकार किया जा सकता है, — 18. इसलिए यहोवा यहोयाकीम के विषय में, जो योशिय्याह का पुत्र, यहूदा का राजा है, यों कहता है — वे उसके लिए विलाप न करेंगे — "हाय, मेरे भाई, और, हाय, बहिन। वे उसके लिए विलाप न करेंगे — "हाय, प्रभु! और, हाय, उसका वैभव!" {{ו का विभाजक अर्थ में "या" अनुवाद करना, जैसा हमारे अनुवाद में है, उपयुक्त नहीं जान पड़ता। विलाप और संवेदना को एक साथ जोड़ना चाहिए। "हाय" का अनुवाद "आह" भी किया जा सकता है; और बहुत-से स्थानों में ऐसा ही है। देखिए 1 राजाओं 13:30। — सं.
परन्तु फिर भी यह सत्य सदा थामे रहना उचित है कि जब किसी मनुष्य को गाड़ा जाना नहीं मिलता, तो यह परमेश्वर के शाप का चिह्न है।
इसलिए भविष्यद्वक्ता अब कहता है, उसको गदहे के समान मिट्टी दी जाएगी। वह गदहे का उल्लेख इसलिए करता है कि वह एक तुच्छ पशु है; वह घोड़े या बैल का नाम ले सकता था, परन्तु क्योंकि गदहा अधिक तुच्छ और घृणित पशु है, इसलिए यह मानो ऐसा कहना है, "यहोयाकीम कुत्तों के साथ फेंक दिया जाएगा।" इस भविष्यद्वाणी ने निःसन्देह न केवल स्वयं राजा के मन को, वरन् सारी प्रजा के मन को भी गहरा घाव पहुँचाया; क्योंकि अब तक उसका सिंहासन स्थिर था, और सब लोग दाऊद के घराने का बड़ा आदर करते थे, और राज्य को पवित्र समझते थे, क्योंकि वह परमेश्वर की रक्षा और संरक्षण में था। परन्तु भविष्यद्वक्ता ने वह घोषित करने में संकोच न किया जो बाद में घटना से पुष्ट हुआ; क्योंकि यहोयाकीम को गदहे के समान मिट्टी दी गई, क्योंकि वह यरूशलेम के फाटकों से बहुत दूर बाहर फेंक दिया गया। यहाँ भविष्यद्वक्ता उस अपमान को बढ़ाकर बताता है जिससे राजा यहोयाकीम कलंकित किया जाएगा, क्योंकि वह किसी यात्रा में मरा हुआ छोड़ दिया जा सकता था; परन्तु वह फेंके जाने से भी अधिक दुःखदायी बात प्रकट करता है; वह कहता है, घसीटकर, और फेंक दिया जाएगा, इत्यादि; अर्थात् यहोयाकीम न केवल फेंक दिया जाएगा, वरन् गदहे या कुत्ते के समान घसीटा भी जाएगा, कि कहीं उसकी दुर्गन्ध नगर को दूषित न करे; मानो वह न केवल कब्र के, वरन् मनुष्यों के द्वारा देखे जाने के भी योग्य न था।
और इस पर विशेष ध्यान देना चाहिए, क्योंकि इस से हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि परमेश्वर की धमकियों को तुच्छ जानने में उसकी हठधर्मिता कितनी बड़ी थी, क्योंकि भविष्यद्वक्ता उस अपमान को बढ़ा-चढ़ाकर बताने के सिवाय, जो उस पर आनेवाला था, और किसी रीति से राजा के मन पर आक्रमण नहीं कर सकता था और प्रजा को भयभीत नहीं कर सकता था। क्योंकि यदि राजा और प्रजा में सीखने की कुछ भी इच्छा होती, तो भविष्यद्वक्ता एक साधारण कथन से सन्तुष्ट रहता, "यहोयाकीम को मिट्टी न दी जाएगी;" अर्थात् परमेश्वर मरने पर भी उसे दण्ड देगा; परमेश्वर का शाप न केवल जीते जी उस पर रहेगा, वरन् वह उसकी मृत्यु के बाद भी उससे पलटा लेगा। वह इस प्रकार के कथन से सन्तुष्ट न था; वरन् वह कहता है, उसको गदहे के समान मिट्टी दी जाएगी, और वह दूर फेंक दिया जाएगा; और इससे भी बढ़कर, उसकी लोथ खींची या घसीटी जाएगी; जिससे यह अपकीर्ति और अपमान का एक सदा का चिह्न बन जाए।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जैसे तुझे यह भाया है कि तू ने दाऊद के वंशजों पर जो भयानक पलटा लिया उसकी स्मृति सदा बनी रहे, जिससे हम उनकी विपत्तियों से तेरे सामने सावधानी से चलना सीखें, — हाँ, यह वरदान दे कि इस उदाहरण की विस्मृति हम पर कभी अधिकार न करे, वरन् जो कुछ हमारे सामने रखा गया है उस पर हम लगन से मनन करते रहें, ताकि हम इस प्रकार अपने सम्पूर्ण जीवन भर तेरे नाम की महिमा को बढ़ाने और फैलाने का यत्न करें, और अन्त में तेरी उस स्वर्गीय महिमा के भागी बनाए जाएँ, जिसे तू ने हमारे लिए तैयार किया है, और जिसे तेरे एकलौते पुत्र ने अपने ही लहू से हमारे लिए प्राप्त किया है। — आमीन।
58 जिस क्रिया, या यों कहें कि कृदन्त, का अनुवाद "घसीटकर" किया गया है, उसका अर्थ है घसीटा जाना, न कि उठाकर ले जाया जाना। देखिए 2 शमूएल 17:13। उसे नगर से बाहर घसीटकर यरूशलेम के फाटकों के बाहर फेंक दिया जाना था। 2 इतिहास 36:6 में कहा गया है कि नबूकदनेस्सर ने "उसको बाबुल ले जाने के लिए बेड़ियों से जकड़ दिया।" सम्भावना यह है (क्योंकि हमारे पास कोई स्पष्ट वृत्तान्त नहीं) कि वह ले जाए जाने से पहले यरूशलेम में बेड़ियों में ही मर गया, और नबूकदनेस्सर ने उसके विद्रोह पर क्रोधित होकर उसे मरे हुए गदहे के समान नगर से बाहर घसीटवाया और फाड़नेवाले पक्षियों और पशुओं का आहार होने के लिए खुला छोड़ दिया। 2 राजाओं 24:6 में हम पाते हैं कि "यहोयाकीम अपने पुरखाओं के संग सो गया;" परन्तु इसका अर्थ केवल इतना है कि वह मर गया, या कि वह स्वाभाविक मृत्यु से मरा और मारा नहीं गया; क्योंकि हम पाते हैं कि यह वाक्यांश तब भी प्रयुक्त होता है जब बाद में गाड़े जाने का उल्लेख किया जाता है। देखिए 2 इतिहास 12:16; 16:13, 14। — सं.
तिरासीवाँ व्याख्यान
यिर्मयाह 22:20
20. लबानोन पर चढ़कर हाय हाय कर, तब बाशान जाकर ऊँचे स्वर से चिल्ला; फिर अबारीम पहाड़ पर आकर हाय हाय कर, क्योंकि तेरे सब मित्र नाश हो गए हैं।
20. Ascende in Libanum, et clama, et in Basan ede vocem tuam, et clama a lateribus, quia contriti sunt omnes amatores tui.
यिर्मयाह यहूदियों पर विजय-गर्व से बोलता है, और उनके इस ढिठाई भरे विचार का उपहास करता है कि परमेश्वर के उनके विरुद्ध होने पर भी वे सुरक्षित रहेंगे। सो वह दिखाता है कि अपने लिए दण्ड से छूट जाने की आशा बाँधकर वे धोखा खा रहे थे; परन्तु वह उनसे लबानोन पहाड़ पर चढ़ने, और बाशान पहाड़ पर ऊँचे स्वर से चिल्लाने को कहता है, जिससे वे जान लें कि जब परमेश्वर का न्याय आएगा तब उनके लिए कोई सहायता न होगी। परन्तु पूरा पद व्यंग्यपूर्ण है; क्योंकि वे व्यर्थ ही चिल्लाते और हाहाकार करते। सचमुच, भविष्यद्वक्ता ने उनके साथ ऐसा व्यवहार इसलिए किया क्योंकि उसने देखा कि वे पूरी रीति से असुधार्य थे। सो वे इस योग्य न थे कि वह उन्हें परामर्श दे, या विश्वासयोग्यता से उन्हें चिताए। इसलिए उसे विवश होकर व्यंग्य से उनके इस पागलपन का उपहास करना पड़ा कि वे अपने लिए सुरक्षा की प्रतिज्ञा करते थे, जबकि वे अपने विरुद्ध परमेश्वर के पलटे को लगातार भड़का रहे थे।
परन्तु साथ ही वह जो कहता है उसे उनके अभिप्रायों के अनुरूप ढालता है; क्योंकि इस में कोई सन्देह नहीं कि जब कभी उन्हें सहायता की आवश्यकता होती थी, तो वे सदा या तो मिस्र की ओर या अश्शूर की ओर दृष्टि लगाते थे। इसलिए वह कहता है, लबानोन पहाड़ पर चढ़कर चिल्ला, और फिर बाशान पहाड़ पर चिल्ला, और चारों ओर चिल्ला, (क्योंकि "किनारों" से उसका अभिप्राय सब दिशाओं से है;) परन्तु वह कहता है, तुझे कुछ लाभ न होगा, क्योंकि तेरे सब प्रेमी नष्ट हो गए हैं। पद के अन्त से हम सीखते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने "चढ़ और चिल्ला" उपहास के रूप में कहा था। प्रेमियों से उसका अभिप्राय मिस्रियों और अश्शूरियों, और अन्य पड़ोसी जातियों से है; क्योंकि यहूदी, जब किसी संकट से डरते थे, तो अपने पड़ोसियों की शरण में भागने के अभ्यस्त थे, और इस बीच परमेश्वर की उपेक्षा करते थे; और इसी कारण वे प्रेमी कहलाए।
परमेश्वर ने उस प्रजा को अपनी निज प्रजा के रूप में ब्याह लिया था, और इसलिए वह प्रायः उसे अपनी पत्नी कहता था, और वह यहाँ स्त्रीलिंग में बोलता है; और इस प्रकार प्रजा की तुलना पत्नी से की गई है, और परमेश्वर पति का रूप धारण करता है। सो जब प्रजा अपनी इच्छा और मनमौज के अनुसार इधर-उधर भटकती थी, तो इस चंचलता को व्यभिचार कहा गया; क्योंकि विश्वास की सरलता ही हमारी आत्मिक पवित्रता है; क्योंकि जैसे वह पत्नी जो केवल अपने पति ही की ओर देखती है, वैवाहिक विश्वासयोग्यता और पवित्र आचरण बनाए रखती है, वैसे ही जब हम केवल परमेश्वर ही से लिपटे रहते हैं, तो हम आत्मिक अर्थ में वैसे ही पवित्र हैं जैसा वह हम से चाहता है; परन्तु जब हम इधर-उधर से अपना उद्धार खोजते हैं, तो हम उस विश्वासयोग्यता को भंग करते हैं जो हम पर परमेश्वर के प्रति अनिवार्य है। सो जैसे ही हम अपने विचार इधर-उधर दौड़ाते हैं, तो यह उस स्त्री के समान आचरण करना है जो भटकते और अवैध सम्बन्ध खोजती है।
अब हम कारण देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता मिस्रियों और अश्शूरियों की तुलना प्रेमियों से क्यों करता है, क्योंकि वह संकेत करता है कि इस्राएल की प्रजा ने इस रीति से व्यभिचार किया, जैसा कि अन्य स्थानों में कहा गया है। आगे लिखा है, —
59 "चारों ओर," {,{מעברים का अनुवाद सेप्टुआजिन्ट ने "समुद्र के पार" किया है; वल्गेट ने "जो पास से होकर जाते हैं उनके प्रति"; सुरियानी ने "समुद्र के दूर के तटों से"; टार्गुम ने "घाटों पर"; ग्रोशियस और पिस्केटर ने "घाटों के पार," अर्थात् नील के; और ब्लेनी ने "सीमाओं से"। परन्तु यहाँ सबसे उपयुक्त अनुवाद वह है जिसे गेटेकर और वेनेमा ने अपनाया है, "अबारीम से," जो मोआब की सीमाओं पर एक पहाड़ है। देखिए गिनती 27:12। यहाँ पहले दो पहाड़ों का उल्लेख है, जो उत्तर में स्थित हैं; और यहाँ एक और है जो पूर्व में है। यरूशलेम को (क्योंकि यहाँ उसी को सम्बोधित किया गया है) ताने के रूप में आज्ञा दी गई है कि वह इन पहाड़ों पर चढ़कर सहायता के लिए पुकारे और अपना विलाप करे; क्योंकि इन दिशाओं के उसके सब प्रेमी नष्ट हो गए थे; बाबुल के राजा ने उन्हें अधीन कर लिया था। — सं.
यिर्मयाह 22:21
21. तेरी सुख-शान्ति के समय मैं ने तुझ को चिताया था, परन्तु तू ने कहा, मैं तेरी न सुनूँगी। युवावस्था ही से तेरी चाल ऐसी है कि तू मेरी बात नहीं सुनती।
21. Loquutus sum tecum in pace tua (vel, quiete, vel, foelicitate tua,) dixisti, Non audiam; haec via tua (id est, ratio, vel, consuetudo) a pueritia tua, quod non audieris vocem meam.
यहाँ परमेश्वर दिखाता है कि वह प्रजा उस प्रतिफल के योग्य थी जिसका उसने उल्लेख किया था, अर्थात् शोक करने और हर ओर सहायता खोजने पर भी कुछ न पाने के। सचमुच प्रायः ऐसा होता है कि पति की अत्यधिक कठोरता पत्नी को उसकी संगति से दूर कर देती है; और जब पति असावधानी से दूसरी बातों में लगा रहता है और अपने घर के कामों की उपेक्षा करता है, और इस प्रकार उसकी पत्नी भटक जाती है; या जब वह अपनी पत्नी को खतरनाक प्रलोभनों और चापलूसियों के सामने खुला देखकर भी आँखें मूँद लेता है, तो दोष का एक भाग उसी पर डाला जाना चाहिए। परन्तु परमेश्वर यहाँ दिखाता है कि उसने एक भले और विश्वासयोग्य पति के कर्तव्य निभाए थे, और यह भी कि यदि प्रजा ने अपना भाग पूरा न किया तो इसमें उसका दोष न था।
वह कहता है, मैं ने तुझ से कहा था; अर्थात् तू यह नहीं कह सकती कि तू अज्ञानता से भटक गई; क्योंकि जो दोषी सिद्ध होते हैं वे प्रायः इसी प्रकार के बहाने की शरण लेते हैं, — "मैं ने सोचा नहीं; यदि मुझे चिताया जाता, तो मैं अच्छे परामर्श पर ध्यान देता; परन्तु फिसलनी भूमि पर गिरना सहज है, विशेष करके जब कोई सहायता के लिए हाथ न बढ़ाए।" परन्तु परमेश्वर यहाँ इस प्रकार का हर बहाना छीन लेता है, और कहता है कि उसने कहा था; मानो वह यह कहता, "मैं ने तुझे समय रहते चिताया था; सो तू ने अज्ञानता या असावधानी से पाप नहीं किया।" संक्षेप में, परमेश्वर यहाँ प्रजा की हठधर्मिता को दोषी ठहराता है, कि उन्होंने जान-बूझकर और अपनी इच्छा से अपने आप को हर प्रकार की दुष्टता के हवाले कर दिया। अब यह स्थल विशेष ध्यान देने योग्य है; क्योंकि हम देखते हैं कि यह दोहरा अपराध है, जब परमेश्वर उचित समय पर हम से बोलता है और हमें सीधे मार्ग पर बुलाता है, और हम सुनने से इन्कार करते हैं; क्योंकि जब हम उसके द्वारा सुधारे जाना स्वीकार नहीं करते, तो हमारी दुष्टता अक्षम्य है।
वह आगे कहता है, मैं ने तेरी शान्ति के समय तुझ से कहा था। इस परिस्थिति से भी उनका अपराध और भारी हो जाता है; क्योंकि परमेश्वर ने न केवल अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा अपनी प्रजा पर प्रकट किया था कि क्या उचित है, वरन् अपनी आशीष के द्वारा उन्हें अपनी ओर आकर्षित भी किया था। क्योंकि जब पति अपनी पत्नी को परामर्श देता है, और साथ ही कठोर या चिड़चिड़ा होता है, तो पत्नी जो कुछ सुनती है उसकी उपेक्षा करेगी, क्योंकि उसका मन पहले ही अरुचि से भरा होगा; परन्तु जब पति अपनी पत्नी के साथ दया का व्यवहार करता है, और अपनी भलाई के द्वारा उसके प्रति अपने प्रेम को प्रमाणित करता है, और साथ ही उसके प्रति अपने आचरण में बुद्धिमानी दिखाता है, तो यदि वह अपने पति की ओर से ऐसे परामर्श, दया और भलाई से प्रभावित न हो, तो अवश्य ही उसका स्वभाव बहुत बुरा होगा। अब परमेश्वर यहाँ दिखाता है कि उसने अपनी प्रजा को उसके कर्तव्यों के विश्वासयोग्य पालन में बनाए रखने के लिए भविष्यद्वक्ताओं को भेजा था, और यह भी कि वह उनके प्रति दयालु और उदार रहा था, ताकि इसके द्वारा वे मधुरता से उसकी आज्ञा मानने की ओर खिंच आएँ। इसलिए "शान्ति" शब्द के द्वारा भविष्यद्वक्ता अपनी प्रजा के प्रति परमेश्वर की दया और उदारता का वर्णन करता है।
60 "शान्ति" के लिए शब्द बहुवचन में है, "शान्तियाँ," जिसका अर्थ है शान्त या चैन के समय या ऋतुएँ। सेप्टुआजिन्ट ने इसका अनुवाद बड़े विचित्र ढंग से "पतन" किया है; वल्गेट ने "भरपूरी"; सुरियानी ने "सम्पन्नता"; टार्गुम ने "जब तू चैन से बैठी थी"। परन्तु शब्द का स्पष्ट अर्थ शान्त, चैन की या शान्तिपूर्ण दशा है। ब्लेनी ठीक ही इस अभिव्यक्ति का अनुवाद "तेरी शान्ति के समयों में" करता है। — सं.
यह सचमुच सच है जो मूसा कहता है, कि मनुष्य जब मोटे हो जाते हैं तो वे तेज़ और उच्छृंखल घोड़ों के समान हो जाते हैं। (व्यवस्थाविवरण 32:15।) सो मोटापे और शान्ति का ऐसा प्रभाव होता है कि वे हमें और भी हठीला बना देते हैं। तौभी जब परमेश्वर दया से हमें बुलाता है, और अपनी शिक्षा के साथ दयालु और पितृवत् भलाई को जोड़ता है, और जब हम सीखने को तैयार हों और उसकी स्वेच्छा से आज्ञा मानें तो उसके परिणामों द्वारा उसकी पुष्टि करता है, तब यह बात बहाने के रूप में काम नहीं आ सकती। इस प्रकार भविष्यद्वक्ता ने यहूदियों के मुँह बन्द कर दिए, क्योंकि सम्भवतः वे यह आपत्ति उठाना चाहते, — कि उन पर पलटे की घोषणा बहुत उग्रता से की गई है, और परमेश्वर ने उन पर अचानक आक्रमण किया है; परन्तु वह दिखाता है कि जब शान्ति और समृद्धि में वे परमेश्वर की पितृवत् दया को पहचान सकते थे, तब भी वे विद्रोही रहे थे और उन्होंने परमेश्वर की कृपा का दुरुपयोग किया था।
वह कहता है, मैं ने तेरी शान्ति के समय तुझ से कहा था, और तू ने कहा, मैं न सुनूँगी। सचमुच यह सम्भव नहीं कि यहूदियों ने इतनी धृष्टता से बात की हो कि खुलेआम और ऐसे स्पष्ट शब्दों में कहें कि वे आज्ञा न मानेंगे; परन्तु भविष्यद्वक्ता उनके शब्दों पर नहीं, वरन् उनके जीवन पर ध्यान देता है। सो यद्यपि यहूदियों ने ये शब्द नहीं कहे, — कि वे परमेश्वर की आज्ञा न मानेंगे; तौभी ऐसी भाषा उनके आचरण से स्पष्ट रूप से निकाली जा सकती थी, क्योंकि वे ऐसे हठीले थे कि परमेश्वर और उसके परामर्शों की आज्ञा नहीं मानते थे।
तीसरे स्थान पर वह कहता है कि प्रजा की यह रीति बचपन ही से रही थी कि वे परमेश्वर की वाणी न सुनें। यह अभक्ति की चरम सीमा है जब हम केवल एक दिन या थोड़े समय के लिए ही हठीले न हों, वरन् निरन्तर दुष्टता में लगे रहें। इस बीच परमेश्वर संकेत करता है कि वह आरम्भ ही से अपनी प्रजा के उद्धार के लिए चिन्तित रहा था, परन्तु व्यर्थ। कभी-कभी ऐसा होता है कि जो अपने दुर्गुणों में कठोर हो गया है, वह तीसवें या चालीसवें वर्ष के बाद सिखाया जाने लगता है, परन्तु वह बहुत लचीला नहीं होता; क्योंकि मनुष्य लम्बे अभ्यास से कठोर हो जाते हैं; हम देखते हैं कि बूढ़े लोग जवानों की अपेक्षा कम सीखने योग्य होते हैं; और क्यों? क्योंकि आयु उन्हें एक प्रकार से अड़ियल बना देती है, जिससे वे मोड़े और वश में किए जाना सह नहीं सकते। परन्तु परमेश्वर यहाँ दिखाता है कि उसकी प्रजा की दुष्टता ऐसी थी कि वे बचपन ही से विद्रोही रहे थे; मानो वह यह कहता, "तू यह बहाना नहीं बना सकती कि तू बहुत समय तक बिना शिक्षक के रही, कि तू बिना किसी बुद्धि और समझ के रही, और इस कारण बुराइयों में कठोर हो गई; नहीं, क्योंकि मैं ने तुझे तेरे बचपन ही से पूरी रीति से न सीखनेवाली पाया है; तेरी रीति, या चाल, यही थी कि मेरी वाणी न सुने," या, "तेरी यही रीति रही है कि तू ने मेरी वाणी न सुनी;" शब्दशः, "क्योंकि तू ने मेरी वाणी न सुनी;" परन्तु इसका अनुवाद ऊपर के समान किया जाना चाहिए, क्योंकि {,}כי यहाँ संयोजक नहीं, वरन् पूरक या व्याख्यात्मक अव्यय है। आगे लिखा है, —
यिर्मयाह 22:22
22. तेरे सब चरवाहे वायु से उड़ाए जाएँगे, और तेरे मित्र बँधुआई में चले जाएँगे; निश्चय तू उस समय अपनी सारी बुराइयों के कारण लज्जित होगी और तेरा मुँह काला हो जाएगा।
22. Omnes pastores tuos depascet ventus, et amatores tui in exilium migrabunt; certe tunc pudefies et erubesces ab omni malitia tua (hoc est, propter cunctam malitiam tuam.)
61 सेप्टुआजिन्ट में {{כי छोड़ दिया गया है, और उपवाक्य को पिछले उपवाक्य के समानाधिकरण में दिया गया है, जो अर्थ प्रतीत होता है; "चाल" यह थी कि परमेश्वर की वाणी न सुनी जाए। ब्लेनी बड़े अनुपयुक्त ढंग से अन्तिम पंक्ति को अगले पद से जोड़ता है। मैं इस पद का अनुवाद इस प्रकार करता हूँ, — 21. मैं ने तेरे शान्त समयों में तुझ से कहा; तू ने कहा, "मैं न सुनूँगी:" यह तेरे बचपन ही से तेरी चाल रही है; क्योंकि तू ने मेरी वाणी न सुनी। बहुतों के यहाँ "सुनना" का अनुवाद "आज्ञा मानना" करने की रीति रही है; परन्तु यह ठीक नहीं। प्रजा के विरुद्ध शिकायत यह थी कि वे परमेश्वर की वाणी "सुनते" तक न थे, आज्ञा मानना तो दूर रहा। यहाँ उत्तर यह था कि वे "सुनेंगे" नहीं। शिकायत, या उनके विरुद्ध आरोप, वही है, और क्रिया का अनुवाद वैसा ही किया जाना चाहिए। — सं.
चूँकि मुख्य दोष प्रधान पुरुषों में था, इसलिए परमेश्वर दिखाता है कि जब बातें चरम सीमा तक पहुँचेंगी तब उनकी बुद्धिमानी और धन-सम्पत्ति में कोई बचाव न मिलेगा: और साधारण लोगों की यह सामान्य रीति थी कि जब उन्हें डाँटा जाता, तब वे अपने शासकों को अपनी ढाल बताकर उन्हीं की ओर संकेत करते थे: और इसमें कोई सन्देह नहीं कि यहूदी परमेश्वर के भविष्यद्वक्ताओं के सामने यह आपत्ति रखते थे, — "तुम्हारा क्या अभिप्राय है? क्या यह कि परमेश्वर ने हमें बुरे प्रधानों के द्वारा दुर्भाग्यपूर्ण रीति से शासित होने दिया है? तब तो उसने हमें भेड़ियों का आहार बनने के लिए छोड़ दिया है: अब यदि वह हमें दण्ड देता है, तो यह अन्यायपूर्ण प्रतीत होता है कि हम दूसरों के दोष के कारण दुःख उठाएँ।" साथ ही, जो इस प्रकार बोलते थे वे निश्चिन्त थे और परमेश्वर को तुच्छ जानते थे, क्योंकि वे सोचते थे कि उनके प्रधान पुरुषों के द्वारा उनकी सुरक्षा पक्की हो गई है।
अतः भविष्यद्वक्ता यहाँ यहूदियों से यह व्यर्थ भरोसा झाड़ देता है; वह कहता है, तेरे चरवाहों को वायु खा जाएगी। चरवाहों से उसका तात्पर्य राजा और उसके मन्त्रियों से है, और साथ ही याजकों और भविष्यद्वक्ताओं से भी। खा जाना शब्द का अर्थ यह है कि सब कुछ वायु के द्वारा भस्म हो जाएगा। कभी-कभी, निस्सन्देह, मनुष्यों के विषय में कहा जाता है कि वे वायु चराते हैं, अर्थात् जब वे व्यर्थ भरोसे पालते हैं। इसी प्रकार अन्य स्थानों में वायु का अर्थ व्यर्थ आशाएँ है, जैसा कि लोग कहते हैं; परन्तु भविष्यद्वक्ता यहाँ दूसरे अर्थ में बोलता है, जब वह कहता है कि चरवाहे वायु के द्वारा खा लिए जाएँगे, अर्थात् वे धुएँ के समान लुप्त हो जाएँगे। इस प्रकार परमेश्वर दिखाता है कि उनका ढिठाईपूर्ण अहंकार, और उनके छल, और उनकी झूठी कल्पनाएँ धुएँ और शून्यता के सिवाय और कुछ न थीं।
फिर वह उनके यारों के विषय में कहता है, — कि वे बन्धुआई में चले जाएँगे: क्योंकि यहूदी पहले तो यह सोचते थे कि जब तक दाऊद का सिंहासन स्थिर है, तब तक उन्हें कोई जीत नहीं सकता; और फिर हम जानते हैं कि साधारण लोग बाहरी वैभव से सहज ही धोखा खा जाते थे, जब वे देखते थे कि याजक और भविष्यद्वक्ता और राजा के मन्त्री भी चतुराई से सम्पन्न और बड़े घमण्ड से फूले हुए हैं; और इसी कारण वे भविष्यद्वक्ताओं की धमकियों की उपेक्षा करते थे। अब उनके भरोसे का दूसरा आधार मिस्रियों, अश्शूरियों और अन्य पड़ोसी जातियों के साथ उनकी सन्धि थी।
इसलिए परमेश्वर, यह कहने के बाद कि उनके सब चरवाहे नष्ट हो जाएँगे, यह जोड़ता है कि मिस्री और अन्य लोग भी बन्धुआई में खदेड़े जाएँगे।
इसके बाद वह कहता है, निश्चय तब तू लज्जित होगी, और अपनी सारी दुष्टता के कारण तेरा मुँह काला होगा; अर्थात्, "तू अन्त में जान लेगी कि तुझे तेरे पापों के कारण न्याय से दण्ड मिला है, जब परमेश्वर तुझे सब सहायताओं से नंगा कर देगा, और यह प्रकट कर देगा कि जिस किसी पर अब तू भरोसा रखती है, वह सब पूरी रीति से खोखला और व्यर्थ है।" और वह सारी दुष्टता का उल्लेख करता है; क्योंकि यहूदियों ने केवल एक ही बात में पाप नहीं किया था, वरन् बुराइयों पर बुराइयाँ जोड़ी थीं, यहाँ तक कि उन्होंने दुष्टता के एक विशाल ढेर से परमेश्वर के पलटा लेने को भड़काया था। तौभी उनका यह स्वीकार करना ऐसा न होगा जो मन फिराव के लिए लाभदायक हो, वरन् बलपूर्वक निकलवाया हुआ होगा; क्योंकि त्यागे हुए लोग, चाहे चाहें या न चाहें, बहुधा अपनी लज्जा को स्वीकार करने के लिए विवश किए जाते हैं। आगे यह आता है —
62 वायु का अर्थ कभी-कभी वह होता है जो खोखला है; और इसी अर्थ में सेप्टुआजिन्ट, वल्गेट और अरबी अनुवाद इसे यहाँ लेते हैं, "तेरे सब चरवाहों को वायु चराएगी;" परन्तु सुरियानी और तर्गुम "वायु" का अर्थ झुलसा देनेवाली या आँधी की वायु लेते हैं: "तेरे सब चरवाहों को वायु चर जाएगी," या खा जाएगी, यह सुरियानी का पाठ है; और तर्गुम यह भावानुवाद देता है, "तेरे सब चरवाहे हर एक दिशा की वायु की ओर तितर-बितर कर दिए जाएँगे।" निस्सन्देह इस क्रिया का अर्थ चराना, और चर जाना, या खा जाना, या भस्म करना है, परन्तु तितर-बितर करना या छिन्न-भिन्न करना नहीं। इसलिए यहाँ अर्थ यह है कि या तो चरवाहों के पास अपने सहारे के लिए खोखली वस्तु के सिवाय कुछ न रहेगा, या वे मानो किसी झोंके से भस्म हो जाएँगे। पहला अर्थ इस खण्ड के आशय से सबसे अधिक मेल खाता है; क्योंकि उनके यारों की सहायता का उल्लेख पहले हो चुका है; परन्तु वे इस सहायता को "वायु" ही पाएँगे, और फिर यह जोड़ा गया है कि ये यार भी उन्हीं के समान बन्धुआई में खदेड़े जाएँगे। इन शब्दों में एक अद्भुत शब्द-क्रीड़ा है। चरवाहों के लिए प्रयुक्त शब्द चराने की क्रिया से बना है। हम यह अनुवाद दे सकते हैं, "तेरे सब चरानेवालों को वायु चराएगी।" चरानेवालों ने लोगों को वायु से, अर्थात् खोखली आशाओं से चराया था, और बदले में उनके पास भी जीने या सहारे के लिए वायु के सिवाय, अर्थात् खोखली वस्तु के सिवाय, कुछ न रहेगा। — सं.
63 यहाँ प्रयुक्त दो क्रियाओं के विषय में हमारा अनुवाद अधिक अच्छा है, "लज्जित और व्याकुल।" दूसरी क्रिया पहली से अधिक प्रबल है। वल्गेट और तर्गुम क्रम उलट देते हैं, "व्याकुल और लज्जित।" सेप्टुआजिन्ट और अरबी में "लज्जित और अपमानित," या तुच्छ ठहराए हुए, है। पहली क्रिया का अर्थ केवल लज्जित होना है, और दूसरी का अर्थ मानो लज्जा के कारण मुँह फेर लेना है, जैसे कोई दूसरों की ओर देख न सकता हो। — सं.
यिर्मयाह 22:23
23. हे लबानोन की रहनेवाली, हे देवदारों में अपना घोंसला बनानेवाली, जब तुझ पर पीड़ाएँ, जच्चा की सी पीड़ा, आ पड़ेंगी, तब तू कैसी अनुग्रह-योग्य ठहरेगी!
23. Sedisti (hoc est, sedem tibi posuisti) in Libano, nidulata es in cedris, quomodo gratiosa fuisti (alii, vertunt, precata es) in veniendo tibi dolores, dolorem quasi parturientis (ad verbum, sed sensus est, quomodo gratiosa eris, ubi venerint tibi dolores, dolor quasi foeminae parturientis.)
भविष्यद्वक्ता वही बात दूसरे शब्दों में दृढ़ करता है; और इससे प्रकट होता है कि जब मनुष्य अपने आप को सांसारिक वस्तुओं के हाथ सौंप देते हैं, तब उनसे उनका झूठा भरोसा छुड़ाना कितना कठिन है। अतः जैसे ही झूठा भरोसा मनुष्यों के हृदयों में अपनी जड़ें जमा लेता है, वैसे ही वे न किसी धमकी से और न किसी संकट से डिगाए जा सकते हैं; चाहे मृत्यु स्वयं उनके सिर पर मँडरा रही हो, तौभी वे बेपरवाह बने रहते हैं: और इसी कारण यशायाह उन्हें उलाहना देकर कहता है कि उन्होंने मृत्यु से वाचा बाँधी थी। (यशायाह 28:15) यही कारण था कि भविष्यद्वक्ता ने यहाँ बहुत से शब्द कहे और अधिक प्रचण्डता का प्रयोग किया; यह उस हठीलेपन को सुधारने के लिए था जो यहूदियों में प्रबल था; क्योंकि वे सोचते थे कि वे उन तीरों की पहुँच से परे हैं जिन्हें परमेश्वर के हाथ चलाएँगे।
इसलिए वह कहता है कि उन्होंने लबानोन पर अपना आसन जमाया था, और देवदारों के बीच अपना घोंसला बनाया था। कुछ व्याख्याकार इसे लाक्षणिक रूप से देवदार के उन घरों के विषय में समझते हैं जिनमें वे रहते थे; अर्थात् यह कि उन्होंने अपने घरों या महलों को, जैसा हम देख चुके हैं, देवदार के तख्तों से सजाया था। परन्तु मैं इन शब्दों को अधिक सरल रूप में लेता हूँ, — कि वे लबानोन को एक अजेय गढ़ समझते थे, और वह उनकी तुलना उन पक्षियों से करता है जो अपने घोंसले बनाने के लिए सबसे ऊँचे देवदार चुनते हैं। अभिप्राय यह है कि यहूदी अपने घमण्ड से इतने अन्धे हो गए थे कि वे सोचते थे कि लबानोन उनके लिए एक सुरक्षित शरणस्थान है, और यह भी कल्पना करते थे कि मानो उसके देवदारों में उनके घोंसले हैं।
परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता ने इस एक विशेष बात का उल्लेख करके उन सब झूठे और व्यर्थ भरोसों को सम्मिलित करना चाहा जिनसे यहूदी मतवाले हो गए थे।
परन्तु वह रियायत देने की रीति से बोलता है, मानो उसने कहा हो कि यहूदी परमेश्वर की धमकियों से भयभीत न होते थे, क्योंकि वे अपनी आँखें लबानोन और उसके ऊँचे देवदारों पर लगाए रहते थे।
परन्तु वह कहता है, तू कैसी अनुग्रह-योग्य होगी; अर्थात्, जब तुझ पर पीड़ाएँ, जच्चा की सी पीड़ा, आ पड़ेंगी, तब तुझे कौन सा अनुग्रह मिलेगा? भविष्यद्वक्ता यहाँ वह बात व्यक्त करता है जो पवित्रशास्त्र में बहुधा पाई जाती है, कि जब अधर्मी कहते हैं, "कुशल है, और कुछ भय नहीं," तो उन पर एकाएक विनाश आ पड़ता है। (1 थिस्सलुनीकियों 5:3) अतः वह यह नहीं मानता कि यहूदियों को यह सोचकर कुछ लाभ हुआ कि लबानोन पर उनका शान्त निवास रहेगा, और देवदारों में उनके घोंसले होने से भी कुछ लाभ न हुआ, क्योंकि परमेश्वर उन पर स्त्रियों की सी एकाएक पीड़ाएँ ले आएगा, जो हँसती और आनन्द से भरी होती हैं, और पल भर में प्रसव की पीड़ाओं से पकड़ ली जाती हैं। यिर्मयाह अब कहता है कि ऐसी ही बात यहूदियों के साथ होगी। मैं इस बात को केवल हल्के से छूता हूँ, यद्यपि यह दीर्घ और सावधान मनन के योग्य है। तो हम यह जान लें कि परमेश्वर के लिए इससे बढ़कर असहनीय और कुछ नहीं कि जब वह हमारे विरुद्ध युद्ध की घोषणा करता है, और जब हम मानो जान-बूझकर प्रतिदिन उसे क्रोध दिलाते हैं, तब भी हम अपने आप से शान्त विश्राम की प्रतिज्ञा करें। आगे यह आता है —
64 इस खण्ड के पहले भाग का अनुवाद सब प्राचीन अनुवादों में भिन्न-भिन्न रीति से किया गया है: सेप्टुआजिन्ट में, "तू कराहेगी;" वल्गेट में, "तू कैसे कराही है;" सुरियानी में, "तू कितना कराहेगी।" अपनाया गया पाठ {,{נהנת था, जो ,{}נהה से बना है, ,{}נחנת के स्थान पर; क्योंकि {}י बहुत सी प्रतियों में नहीं पाया जाता, न केरी में, और न पद के आरम्भ के दोनों कृदन्तों के सम्बन्ध में। तर्गुम में है, "तू क्या करेगी।" आधुनिक व्याख्याकारों में से अधिकांश पाठ को वैसा ही लेते हैं जैसा वह हमारे पास है, और कोई भिन्न पाठ नहीं हैं। तब सारा पद इस प्रकार पढ़ा जाएगा, — 23. हे लबानोन की रहनेवाली! हे देवदारों में घोंसला बनानेवाली! तू कैसी शोभायमान (या अनुग्रह पाई हुई) होगी, जब तुझ पर ऐंठनें आएँगी, प्रसव की सी पीड़ा! लिंग स्त्रीलिंग है, और इससे या तो यरूशलेम या दाऊद का घराना या कुल अभिप्रेत है। "ऐंठनें" के लिए प्रयुक्त शब्द का अर्थ कमर कसनेवाली पीड़ाएँ या वेदनाएँ है। यह पद व्यंग्य की भाषा है। लोग इतने कठोर हो गए थे कि और कोई बात उन्हें छू न सकती थी। — सं.
यिर्मयाह 22:24
24. यहोवा की यह वाणी है, मेरे जीवन की सौगन्ध, चाहे यहोयाकीम का पुत्र यहूदा का राजा कोन्याह मेरे दाहिने हाथ की मुहरवाली अंगूठी भी होता, तौभी मैं तुझे वहाँ से उतार फेंकता;
24. Vivo ego, dicit Jehova, quod si esset Coniahu filius Joakim regis Jehudah annulus signatorius super manum dexteram meam (hoc est, in many dextera mea,) ego inde to evallam (mutatio est personae.)
परमेश्वर यहाँ शपथ खाकर कहता है कि उसने यकोन्याह को, जो यहोयाकीन भी कहलाता था, दण्ड देने का निश्चय कर लिया है। और वह कहता है कि यद्यपि वह दाऊद के सिंहासन पर बैठा था, तौभी वह एक दुखी निर्वासित होगा। हम अन्यत्र देख ही चुके हैं कि यहूदी ऐसे मोहित हो गए थे कि सोचते थे कि परमेश्वर उनसे बँधा हुआ है; और साथ ही वे इस बहाने से पाप करने की हर प्रकार की छूट ले लेते थे कि परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की है कि जब तक आकाश में सूर्य और चन्द्रमा बने रहेंगे तब तक दाऊद का राज्य बना रहेगा, (भजन संहिता 89:37) परन्तु उन्होंने यह न सोचा कि परमेश्वर की वाचा में एक परस्पर अनुबन्ध था; क्योंकि वह चाहता था कि वे अपनी ओर से विश्वासयोग्य रहें: और न उन्होंने यह सोचा कि बहुत से लोग शरीर के अनुसार तो अब्राहम की सन्तान थे, परन्तु परमेश्वर के सामने उसकी वैध सन्तान न थे। जहाँ तक स्वयं राजा का सम्बन्ध है, उसने कभी नहीं सोचा कि उसका बन्धुआई में खदेड़ा जाना सम्भव है, क्योंकि वह दाऊद का उत्तराधिकारी था और परमेश्वर द्वारा ठहराया गया था।
अतः यही कारण है कि परमेश्वर अब घोषणा करता है, चाहे वह कोन्याह मेरी उँगली पर मुहरवाली अंगूठी के समान भी होता, तौभी मैं उसे वहाँ से उतार फेंकता। अतः यकोन्याह चाहे कितना ही ऊँचा क्यों न उठाया गया हो, परमेश्वर दिखाता है कि उसकी प्रतिष्ठा केवल कुछ समय के लिए होगी, और शीघ्र ही मुरझा जाएगी; क्योंकि अन्त में वह अपने सिंहासन से धकेल दिया जाएगा, और उसकी दशा पूरी रीति से बदल जाएगी। कोन्याह शब्द, निस्सन्देह, यहोयाकीन के स्थान पर एक अंग-भंग किया हुआ रूप है।
अतः भविष्यद्वक्ता तिरस्कार की रीति से उसे कोन्याह कहता है, मानो वह उसे पूरे नाम के योग्य न समझता हो, वरन् उसे चार अक्षरों के स्थान पर दो अक्षरों में व्यक्त करता है।
इसी प्रकार भविष्यद्वक्ता, यद्यपि यकोन्याह उस समय राजा था, तौभी उसे कोन्याह कहता है।
अब यह खण्ड हमें सिखाता है कि हमें परमेश्वर के अनुग्रह-दानों पर ऐसा घमण्ड न करना चाहिए कि हम भूल जाएँ कि हम क्या हैं, वरन् सदा स्मरण रखना चाहिए कि हम उस पर निर्भर हैं, और हमें हर समय यत्न से उससे प्रार्थना करनी चाहिए; क्योंकि निश्चिन्तता तिरस्कार को जन्म देती है; इसी कारण ऐसा होता है कि परमेश्वर हमसे वे आभूषण छीन लेता है जिनसे हम पहनाए गए थे; और यह हमारी कृतघ्नता का उचित प्रतिफल है। अतः जो सब दूसरों से बढ़कर हैं वे यह जान लें कि जो कुछ दिया गया है वह किसी भी समय छीना जा सकता है, जब तक कि शुद्ध विवेक मानो पहरेदार बनकर परमेश्वर के दानों और उपकारों की रक्षा न करे, ताकि वे किसी समय नष्ट या खो न जाएँ। आगे यह आता है —
65 इस सारे खण्ड में प्राचीन अनुवाद उसका नाम यकोन्याह देते हैं; परन्तु तर्गुम, इब्रानी के अनुसार, कोन्याह देता है। रब्बी इस परिवर्तन के अनेक कारण बताते हैं, और दूसरे लोग भी, जो सब निरर्थक हैं। कैल्विन द्वारा दिया गया और गैटेकर, लाउथ तथा अन्यों द्वारा अपनाया गया कारण 28वें पद में प्रयुक्त तिरस्कारपूर्ण भाषा से पुष्ट होता है। — सं.
यिर्मयाह 22:25
25. मैं तुझे तेरे प्राण के खोजियों के हाथ, और जिनसे तू डरता है उनके हाथ, अर्थात् बाबुल के राजा नबूकदनेस्सर के हाथ और कसदियों के हाथ में कर दूँगा।
25. Et ponam to (tradam to) in manum quierentium animam tuam, et in manum eorum a quorum facie formidas (metuis) et in manum Nebuchadrezzar regis Babylonii et in manum Cladaeorum.
यह पद पिछले पद से जुड़ा हुआ है, और जो संक्षेप में कहा गया था उसे अधिक पूर्णता से समझाता है। परमेश्वर की उँगली से मुहरवाली अंगूठी का उतारा जाना तब हुआ जब यकोन्याह अपनी महिमा और अपने राज्य से वंचित किया गया, और बाबुल के राजा के अधीन कर दिया गया। यद्यपि राजा ने उसके प्राण बचाए, जैसा कि पवित्र इतिहास साक्षी देता है, (2 राजा 25:7; 2 इतिहास 36:6; यिर्मयाह 52:11) तौभी जब उसने अपने आप को उसके हाथ सौंपा, तब वह ऐसे काँपा मानो उसने तलवार को अपना सिर काटने के लिए तैयार देखा हो; क्योंकि उसे किसी दया की आशा न थी, और उसका भय ही उसे नगर से बाहर निकलने और अपने कट्टर शत्रु के हाथ अपने आप को सौंपने के लिए ले गया। पूरे का आशय यह है कि राजा यकोन्याह अन्तिम दुर्दशा तक पहुँचेगा, क्योंकि वह विवश होकर अपने आप को असहाय और निहत्था अपने क्रूर शत्रुओं के हाथों में सौंप देगा।
परन्तु वह धमकी को दोहराता है, और विषय को विस्तार देता है; वह कहता है, मैं तुझे उनके हाथ में कर दूँगा जो तेरे प्राण के खोजी हैं, और फिर, उनके हाथ में जिनके मुख से तू भय खाता है, और तीसरे, नबूकदनेस्सर के हाथ में, (बाबुल का राजा नबूकदनेस्सर यहाँ और अन्य स्थानों में नबूकद्रेस्सर कहलाता है,) और अन्त में, कसदियों के हाथ में। इस प्रकार भविष्यद्वक्ता मानो क्रम से मृत्यु के अनेक प्रकार गिनाता है, ताकि यकोन्याह जान ले कि परमेश्वर का न्याय कितना भयानक होगा। वह आगे जोड़ता है —
यिर्मयाह 22:26
26. और मैं तुझे और तेरी जननी को जिसने तुझे जन्म दिया, एक पराए देश में जहाँ तुम उत्पन्न नहीं हुए, फेंक दूँगा; और वहीं तुम मर जाओगे।
26. Et projiciam to et matrem tuam quae genuit to in terram alienam, in qua non estis geniti, et illic moriemini.
यहाँ भविष्यद्वक्ता फिर से उस बात को दृढ़ करता है जो उसने उस कठोर पलटे के विषय में कही थी जो परमेश्वर यकोन्याह से लेनेवाला था। और यद्यपि उसके सैंतीसवें वर्ष में वह बन्दीगृह से निकाला गया, और अन्य प्रधानों के बीच राजा की मेज़ पर बैठने दिया गया, तौभी वह बन्धुआई ही में मरा; और कदाचित् उसके लिए यह अधिक अच्छा होता कि वह मृत्यु तक बन्दीगृह में ही रहता, बजाय इसके कि जब वह प्रधानों में से एक बना तब प्रलोभनों के द्वारा भ्रष्ट किया जाता, क्योंकि इस प्रकार उसने अपने आप को अशुद्ध किया। चाहे जो हो, वह अपनी माता नहुश्ता के साथ बन्धुआई में मरा।
तब भविष्यद्वक्ता ने यह कहकर उसके दण्ड की गम्भीरता को बढ़ाया, मैं तुझे देश से निकालूँगा, या बाहर फेंक दूँगा, और तेरी जननी को भी जिसने तुझे जन्म दिया। अपमान के लिए यह जोड़ा गया है कि राजा की माता भी उसके साथ बन्दी बनाकर ले जाई जाएगी; क्योंकि स्त्रीजाति को बहुधा छोड़ दिया जाता है, और वह आयु में भी बढ़ी हुई थी।
66 यहाँ एक अद्भुत विरोधाभास है: परमेश्वर यकोन्याह को, चाहे वह उसके दाहिने हाथ की मुहर के समान भी होता, उतार फेंकता, और उसे उसके शत्रुओं के हाथ में कर देता। मानो ईश्वरीय हाथ पर रहने की दशा से वह उनके हाथ में सौंप दिया जाता जो उसके प्राण के खोजी थे। — सं.
67 यह शब्द प्रबल है; इसका अर्थ उछालना, झटककर फेंकना, बलपूर्वक बाहर फेंकना, ज़ोर से फेंकना है, जैसे कोई फेंकने का हथियार चलाता है। देखिए 1 शमूएल 28:11। वल्गेट का "mittam" बहुत दुर्बल है; सेप्टुआजिन्ट का "{ἀποῤῥίψω}'' अधिक उपयुक्त है। — सं.
परन्तु परमेश्वर ने उस पर अपना न्याय पूरा किया, क्योंकि वह अधर्म में उसकी साथिन थी: वह कहता है, "मैं तुम्हें पराए देशों में, जहाँ तुम उत्पन्न नहीं हुए, पहुँचा दूँगा, और वहीं तुम मर जाओगे।"
यिर्मयाह 22:27
27. परन्तु जिस देश में वे लौटने की लालसा करते हैं, वहाँ वे लौटने न पाएँगे।
27. Et in terram ad quam ipsi levant animum suum, ut revertantur illuc, non revertentur illuc.
भविष्यद्वक्ता फिर से पुरुष बदलता है, और तौभी अशोभनीय रीति से नहीं, क्योंकि वह यहाँ एक क्रुद्ध व्यक्ति के समान बोलता है, और राजा यकोन्याह से कुछ शब्द कहने के बाद वह उससे मुँह फेर लेता है और घोषणा करता है कि परमेश्वर क्या करेगा। इसी प्रकार, जब हम किसी को सम्बोधित किए जाने के योग्य कठिनाई से समझते हैं, तब हम अपनी बात का ढंग बदल देते हैं; और उससे कुछ शब्द कहने के बाद हम बोलने की कोई और रीति अपनाते हैं। इसी रीति से भविष्यद्वक्ता ने बड़े क्रोध से बात की जब उसने यहोयाकीम को सम्बोधित किया, और फिर घोषणा की कि परमेश्वर उसके साथ कैसा व्यवहार करेगा: वह उसके पास से ऐसे निकल गया मानो वह बहरा हो या ध्यान दिए जाने के योग्य न हो। इस प्रकार हम इस खण्ड में भविष्यद्वक्ता द्वारा किए गए परिवर्तन का अभिप्राय देखते हैं।
वह कहता है, जिस देश की ओर वे लौटने के लिए अपना मन उठाते हैं, वहाँ वे लौटने न पाएँगे। उसने पहले कहा था कि राजा और उसकी माता दोनों पराए देश में मरेंगे, और अब वह उसी बात को दृढ़ करता है; क्योंकि यह मूर्खतापूर्ण धारणा कि बाबुल का राजा अन्त में उन पर कृपालु होगा, उनके मनों से बड़ी कठिनाई के बिना उखाड़ी नहीं जा सकती थी: और इसमें कोई सन्देह नहीं कि ऐसे विचार मन में रखे जाते थे, — "जब नबूकदनेस्सर हमें दीनता से अपने पास आते देखेगा, तब वह दया की ओर फिर जाएगा, क्योंकि वह और क्या चाहता है? वह यहाँ अपना राजमहल स्थापित करना नहीं चाहता; उसके लिए इतना ही पर्याप्त होगा कि लोग उसे कर देनेवाले बनें; और जब वह पाएगा कि मैं साहसहीन मनुष्य हूँ, तब वह कोई नया राजा ठहराने के बदले मुझे ही राजा बनाए रखना पसन्द करेगा।" अतः राजा अपने दरबारियों के साथ इसी प्रकार तर्क करता था। इसलिए भविष्यद्वक्ता अब इसी व्यर्थ धारणा को ढा देता है: वे देश की ओर अपना मन उठाते हैं, अर्थात् वे अन्त में अपने देश में स्वतन्त्र रूप से लौटने की बात सोचते हैं; क्योंकि मन उठाने का अर्थ किसी वस्तु की ओर मन या विचार लगाना है। अतः वे देश की ओर, अर्थात् यहूदा देश की ओर, अपना मन उठाते हैं; परन्तु वे अपने आप से चाहे जो प्रतिज्ञा करें, वहाँ कभी लौटने न पाएँगे।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जैसे तू हमें अपने स्वर्गीय राज्य के सिवाय और कहीं विश्राम की प्रतिज्ञा नहीं देता, वैसे ही हम पृथ्वी पर यात्रा करते हुए कभी अपने आप को इधर-उधर लुभाए और भटकाए जाने न दें; वरन् इस बीच हम समर्पित मन से तुझे पुकारते रहें, और इस प्रकार अपना युद्ध लड़ते रहें, कि तू चाहे विविध संघर्षों के द्वारा हमें परखने और जाँचने में कितना ही प्रसन्न क्यों न हो, तौभी हम तब तक तेरे विश्वासयोग्य सैनिक बने रहें, जब तक कि हम उस विश्राम का आनन्द न लें जो तेरे एकलौते पुत्र के लहू के द्वारा हमारे लिए प्राप्त किया गया है। — आमीन।
68 "मन उठाना" या प्राण उठाना, इस वाक्यांश का अर्थ किसी वस्तु पर मन लगाना है। वल्गेट ने इब्रानी मुहावरा अपनाया है, "जिसकी ओर वे अपना प्राण उठाते हैं।" सेप्टुआजिन्ट "लौटना" छोड़ देता है, और उसमें केवल यह है, "जिसकी वे अपने प्राणों में इच्छा करते हैं।" हमारा अनुवाद, यद्यपि शाब्दिक नहीं, सच्चे भाव को बनाए रखता है, "जहाँ वे लौटने की लालसा करते हैं;" शाब्दिक रूप से, "जहाँ वे वहाँ लौटने के लिए अपना प्राण उठा रहे हैं:" स्थानवाचक दोनों क्रियाविशेषण दिए गए हैं, सम्बन्धवाचक क्रियाविशेषण और सर्वनामवाचक क्रियाविशेषण, यदि हम उन्हें ऐसा कह सकें। यह उसी प्रकार का मुहावरा है जैसे जब एक सम्बन्धवाचक और एक सर्वनाम प्रयुक्त होते हैं, एक क्रिया से पहले और दूसरा उसके बाद, जैसे यिर्मयाह 22:25 में, "जिनसे तू उनके मुख से डरता (या भय खाता) है," जिसका हमारे अनुवाद में ठीक ही अनुवाद किया गया है, "जिनके मुख से तू डरता है:" परन्तु वेल्श अक्षरशः इब्रानी ही है; मुहावरा बिलकुल वही है। — सं.
चौरासीवाँ व्याख्यान
यिर्मयाह 22:28
28. क्या यह पुरुष कोन्याह तुच्छ और टूटी हुई मूरत है? क्या यह ऐसा पात्र है जिससे कोई प्रसन्न नहीं होता? फिर वह और उसका वंश क्यों निकाल दिए गए, और ऐसे देश में क्यों फेंक दिए गए हैं जिसे वे नहीं जानते?
28. An simulachrum contemptum, contritum, vir iste Coniah? an vas, in quo non est oblectatio? ut quid disjecti sunt ipse et semen ejus et projecti super terram quam non noverunt?
चूँकि भविष्यद्वक्ता जो कुछ उसने पहले से कहा था उसका यहूदियों को कठिनाई से ही निश्चय करा सकता था, इसलिए वह उसी बात को दृढ़ करता है; परन्तु वह यहाँ ऐसे बोलता है मानो किसी अविश्वसनीय बात के विषय में बोल रहा हो। वह अत्यन्त आश्चर्य करनेवाले व्यक्ति का रूप धारण करता है, ताकि दूसरे आश्चर्य करना छोड़ दें। तब वह पूछता है कि क्या यह सम्भव था कि यकोन्याह बन्धुआई में खदेड़ा जाए और वहाँ दुर्दशा से नष्ट हो? अब हम भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय देखते हैं, कि चूँकि यहूदी सोचते थे कि राज्य सदा बना रहेगा, इसलिए ऐसी धारणा को झाड़ फेंकना आवश्यक था, ताकि वे जान लें कि परमेश्वर ने वह धमकी व्यर्थ नहीं दी थी जिस पर हम पहले ही ध्यान दे चुके हैं। परन्तु इन प्रश्नों में एक प्रकार का व्यंग्य है, क्योंकि भविष्यद्वक्ता स्पष्ट शब्दों में निश्चित कथन कर सकता था; परन्तु दूसरों का ध्यान रखकर वह आश्चर्य के कारण हिचकता है, या मानो किसी भयानक बात के विषय में सन्देह करता प्रतीत होता है।
वह कहता है, क्या वह कोई मूरत है? कुछ लोग इसका अनुवाद "एक पात्र" करते हैं; परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ इसे, अन्य स्थानों के समान, इसके उचित अर्थ में, अर्थात् मूरत, लिया गया है। तो क्या यह पुरुष कोन्याह एक तुच्छ और टूटी हुई मूरत है? क्योंकि {,}פוףputs का अर्थ निष्फल होना और तोड़ना दोनों है। हम कह चुके हैं कि उसके नाम का एक भाग तिरस्कार की रीति से छोड़ दिया गया था; तौभी, चूँकि यहूदी राजकीय प्रतिष्ठा से ऐसे अन्धे हो गए थे कि वे इस भविष्यद्वाणी पर विश्वास न कर सकते थे, इसलिए वह इसके विषय में ऐसे पूछता है मानो कोई अविश्वसनीय बात हो। वह आगे कहता है, क्या वह कोई पात्र है? इत्यादि। इब्रानी शब्द {,}כליcali, जैसा हम जानते हैं, किसी भी प्रकार के पात्र के लिए प्रयुक्त होता है; क्योंकि प्राचीन लोग हर प्रकार के सामान को पात्र कहते थे। तब वह पूछता है, क्या वह तुच्छ पात्र है? क्या वह ऐसा पात्र है जिससे कोई प्रसन्न नहीं होता? उसने पहले कहा था कि वह एक तुच्छ मूरत है। वे, वह और उसका वंश, क्यों बाहर फेंक दिए गए, और ऐसे देश में क्यों डाल दिए गए जिसे उन्होंने नहीं जाना? अर्थात्, किसी दूर देश में? और हम जानते हैं कि यह कठोर भाग्य है जब कोई अपने देश से दूर खदेड़ दिया जाता है। अतः इसमें कोई सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता एक अनजाने देश की बात कहकर उस विपत्ति की गम्भीरता को बढ़ाता है: क्योंकि सिदकिय्याह, जो सिंहासन पर बैठाया गया, उसका चाचा था; और उसके वंशजों में पहला शालतीएल था, जो बन्धुआई में उत्पन्न हुआ। अब आगे यह आता है —
69 इस क्रिया का अर्थ खोलना, मुक्त करना है; और यहाँ यह कर्मवाच्य अर्थ में है, खोला जाना या मुक्त किया जाना। ऐसा प्रतीत होता है कि यह मूरत या प्रतिमा को उसके बन्धनों से मुक्त करने की ओर संकेत करता है; इसलिए "ढाया हुआ" इसका सबसे अच्छा अनुवाद होगा। — सं.
70 यह विचित्र बात है कि सब प्राचीन अनुवाद इस पद में प्रयुक्त कठोर शब्दों को नरम कर देते हैं; उनमें से एक भी विश्वासयोग्य अनुवाद नहीं देता। सेप्टुआजिन्ट, सुरियानी और अरबी पद का कठिनाई से आधा भाग देते हैं, और जो वे देते हैं वह भी मूल के स्वर और भाव से रहित है। वल्गेट "मूरत" या प्रतिमा शब्द को छोड़ देता है, और उसके स्थान पर "मिट्टी का पात्र" रखता है। मैं सारे पद का अनुवाद इस प्रकार करता हूँ, — 28. एक तुच्छ, ढाई हुई मूरत! क्या यह वही पुरुष कोन्याह है? क्या वह ऐसा पात्र है जिससे कोई प्रसन्न नहीं होता? वे, वह और उसका वंश, क्यों बाहर फेंक दिए गए, और ऐसे देश में भेज दिए गए जिसे उन्होंने नहीं जाना? तीसरी पंक्ति में "पात्र" के बाद सम्बन्धवाचक "जिससे" अध्याहृत है। वेल्श, जो इस प्रकार के मुहावरे में बिलकुल इब्रानी के समान है, उसी प्रकार के लोप की अनुमति देती है, — Ai llester yw heb hoffder ynddo? जो शब्दशः इब्रानी है, "क्या वह ऐसा पात्र है जिसमें कोई प्रसन्नता नहीं?" "बाहर फेंका जाना" कनान देश से था, और "भेजा जाना" अनजाने देश में था। — सं.
यिर्मयाह 22:29-30
29. हे पृथ्वी, पृथ्वी, हे पृथ्वी, यहोवा का वचन सुन!
29. Terra, terra, terra, audi sermonem Jehovae,
30. यहोवा यों कहता है, इस पुरुष को निर्वंश लिखो, ऐसा पुरुष जो अपने दिनों में कभी सफल न होगा; क्योंकि उसके वंश में से कोई भी दाऊद की गद्दी पर विराजकर फिर यहूदा पर प्रभुता करता हुआ सफल न होगा।
30. Sic dicit Jehova, Scribite virum hunc orbum (vel, solitarium) virum, cui prospere non erit in diebus suis; quia prospere non habebit quisquam ex semine ejus sedens super solium Davidis et dominans adhuc in Jehudah.
भविष्यद्वक्ता उस बात को और अधिक पूर्णता से दृढ़ करता है जिसका उल्लेख मैंने अभी किया है; और तीन बार "पृथ्वी" पुकारने में यह दोहराव व्यर्थ न था, क्योंकि जैसे लोहे की कठोरता हथौड़े की बार-बार की चोटों से जीती जाती है, वैसे ही भविष्यद्वक्ता ने यह शब्द दोहराया, ताकि वह उस हठीलेपन को वश में करे जिसमें यहूदी ऐसे कठोर हो गए थे कि परमेश्वर की कोई भी धमकी उन्हें विचलित न करती थी। उसने यह प्रचण्डता उन वक्ताओं की नाईं नहीं अपनाई जो वाक्पटु दिखाई देने का लक्ष्य रखते हैं; वरन् आवश्यकता ने ही उसे उस हठी प्रजा पर इस प्रकार प्रहार करने को विवश किया, जो अन्यथा उन बातों के प्रति बहरे कान कर लेती जिन पर हमने ध्यान दिया और जिन्हें हमने पढ़ा है। अतः इस प्रस्तावना के द्वारा भविष्यद्वक्ता विशेष रूप से दिखाता है कि वह परमेश्वर के भयानक न्याय के विषय में बोल रहा था, और यहूदियों को इस भविष्यद्वाणी की निश्चितता का भी स्मरण दिलाता है, यद्यपि वे पक्का विश्वास किए हुए थे कि राज्य कभी न गिरेगा। इसलिए इस दोहराव में हम देखते हैं कि इसमें एक निहित डाँट है, मानो उसने कहा हो कि वे सचमुच बहरे थे, परन्तु इसका कोई लाभ न था, क्योंकि वे उस बात की पूर्ति देखने के लिए विवश किए जाएँगे जिस पर वे उस समय विश्वास न करते थे। वह कहता है, हे पृथ्वी, पृथ्वी, पृथ्वी, सुन।
फिर वह जोड़ता है, यहोवा यों कहता है, इस पुरुष को अकेला, या निर्वंश, लिखो। कुछ लोग सोचते हैं कि ये शब्द स्वर्गदूतों या भविष्यद्वक्ताओं से कहे गए थे; परन्तु मैं ऐसी धारणा को सुदृढ़ आधारवाली नहीं समझता: मुझे तो यह कथन-रीति सामान्य व्यवहार से ली हुई प्रतीत होती है, क्योंकि जो आज्ञप्तियाँ लम्बे समय तक लागू रहनेवाली होती थीं, वे प्रायः लिखी जाती थीं। जब कोई आदेश घोषित किया जाता था और वह केवल थोड़े दिनों के लिए लागू रहनेवाला होता था, तो वह सामान्यतः सार्वजनिक अभिलेखों में दर्ज नहीं किया जाता था; परन्तु जब कोई व्यवस्था बनाई जाती थी जो आनेवाली पीढ़ियों पर भी बाध्यकारी होती, तो वह सार्वजनिक पटियाओं पर लिखी जाती थी। तब भविष्यद्वक्ता संकेत करता है कि परमेश्वर का यह न्याय व्यर्थ नहीं ठहराया जा सकता था, और न उन आज्ञप्तियों के समान क्षणिक होता जिनकी थोड़े ही दिनों में उपेक्षा होने लगती है और जो शीघ्र भुला दी जाती हैं, वरन् यह निश्चित और स्थायी होगा। अतः, इस पुरुष को निर्वंश लिखो। यह निर्वंशता परमेश्वर की उस प्रतिज्ञा के विपरीत रखी गई है कि जब तक आकाश में सूर्य और चन्द्रमा बने रहेंगे, तब तक दाऊद के सिंहासन पर उसके उत्तराधिकारी निरन्तर बने रहेंगे। (भजन संहिता 89:37) और भविष्यद्वक्ता यहाँ दिखाता है कि यकोन्याह के विषय में यह प्रतिज्ञा पूरी न होगी।
71 यह प्रकट नहीं होता कि कैल्विन का अभिप्राय सामान्य रूप से पृथ्वी से था या यहूदिया देश से। परन्तु सबसे अधिक सम्भावना यही है कि यहाँ दूसरा अभिप्रेत है। तब अनुवाद यह होना चाहिए, "हे देश, देश, देश!" सेप्टुआजिन्ट और अरबी में "देश" केवल दो बार है, परन्तु अन्य अनुवादों में यह इब्रानी के समान तीन बार है। तर्गुम का भावानुवाद विचित्र है, "उन्होंने उन्हें उनके अपने देश से दूसरे देश में निर्वासित किया है; हे इस्राएल के देश! यहोवा के वचन सुन।" "देश" का अर्थ बहुधा उसके निवासी होता है; और जो आगे आता है वह प्रमाणित करता है कि यहाँ इसका यही अर्थ है; क्योंकि आगे जोड़ा गया है, "लिखो," इत्यादि। — सं.
और वह आगे कहता है, इस पुरुष को ऐसा लिखो जो अपने दिनों में सफल न होगा; वरन्, (क्योंकि मुझे यहाँ {,}כי पर बल प्रतीत होता है,) उसके वंश में से कोई भी सफल न होगा; और फिर वह एक व्याख्या जोड़ता है, दाऊद के सिंहासन पर बैठकर, और फिर यहूदा में प्रभुता करते हुए।
अब यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि यहूदी परमेश्वर के इस न्याय को घृणा से देखते थे, मानो यह कोई भयानक बात हो, क्योंकि परमेश्वर उन्हें अपने आप से असंगत प्रतीत होता था, क्योंकि उसने साक्षी दी थी कि उसकी वाचा कभी व्यर्थ न ठहरेगी, और उसने सूर्य और चन्द्रमा को साक्षी ठहराया था। इसलिए जब दाऊद का वंश मिट गया, कम से कम जब उसका सिंहासन उलट दिया गया और उसका कोई उत्तराधिकारी दिखाई न दिया, तब प्रतिज्ञा की सच्चाई विफल हो गई सी प्रतीत हुई, जो बड़ी विचित्र बात थी।
परन्तु परमेश्वर के लिए, जो आश्चर्यकर्म करता है, यह सम्भव था कि वह यकोन्याह पर और उसके जैसे लोगों पर ऐसा दण्ड लाए, और तौभी एक गुप्त और अगम्य रीति से बातों को ऐसा घटित करे कि जो वाचा उसने बाँधी थी वह पूरी रीति से विफल न हो। अतः परमेश्वर का अनुग्रह कुछ समय के लिए छिपा रहा, परन्तु कभी बुझा नहीं; क्योंकि अन्त में यिशै के ठूँठ से एक डाली निकली, जैसा यशायाह द्वारा कहा गया है।
तौभी, ये शब्द कुछ और ही आशय रखते प्रतीत होते हैं, क्योंकि यकोन्याह के विषय में कहा गया है कि वह अकेला होगा, और फिर असफल; और अन्त में, भविष्यद्वक्ता घोषणा करता है कि उसके वंश में से कोई भी राजसिंहासन पर न बैठेगा। परन्तु हमें स्मरण रखना चाहिए कि ये शब्द एक अस्थायी दण्ड तक सीमित रखे जाने चाहिए, और ये केवल मसीह के आगमन तक फैले हुए हैं, यद्यपि दाऊद का वंश, जैसा हम आगे देखेंगे, जरुब्बाबेल में उठने लगा था, परन्तु यह केवल एक धुँधली और छोटी पूर्व-झलक थी। इसलिए यदि हम इन दो बातों का, जो परस्पर विरोधी प्रतीत होती हैं, मेल बैठाना चाहें, — कि यकोन्याह निर्वंश हो गया, और कि दाऊद के वंश से उत्तराधिकारी कभी समाप्त नहीं हुआ, — तो हमें मसीह के समय तक आना होगा; ऐसा इसलिए था कि यह निर्वंशता केवल कुछ समय के लिए थी; और परमेश्वर के अनुग्रह का यह व्यवधान मृत्यु के समान कुछ था; परन्तु समय बीतने पर यह प्रकट हुआ कि परमेश्वर अपनी वाचा को स्मरण रखता था, उस समय भी जब वह उसे भूल गया सा प्रतीत होता था।
और इसलिए इस भविष्यद्वाणी को यहेजकेल की इस भविष्यद्वाणी से जोड़ना चाहिए, "हटाओ, हटाओ, मुकुट को हटाओ, जब तक वह न आए जिसका वह है।" (यहेजकेल 21:26, 27)
वहाँ भी यहेजकेल "हटाओ" शब्द को तीन बार दोहराता है, मानो उसने कहा हो कि दाऊद का राज्य न केवल कुछ महीनों या वर्षों तक, वरन् अनेक युगों की एक लम्बी श्रृंखला तक न रहेगा।
अतः कोई आश्चर्य नहीं कि भविष्यद्वक्ता यहाँ घोषणा करता है कि यकोन्याह निर्वंश होगा, क्योंकि इतने युगों तक ऐसी दुःखद विपत्ति, अर्थात् दाऊद का सिंहासन तिरस्कार और घृणा के साथ पाँवों तले रौंदा जाना, विश्वासियों को निराशा में डुबो सकती थी। अतः यही कारण था कि उसने कहा कि वह निर्वंश होगा, और यह भी कि उसका सारा वंश शाप के अधीन रहेगा। परन्तु हमें उस अपवाद को स्मरण रखना चाहिए जो एक दूसरे भविष्यद्वक्ता द्वारा व्यक्त किया गया है, "जब तक वह न आए जिसका मुकुट है।" (यहेजकेल 21:27)
72 "निर्वंश" अनूदित शब्द का उचित अर्थ "पूरी रीति से छीना हुआ," या निराश्रित, या "बिलकुल नंगा" है। सेप्टुआजिन्ट में इसका अनुवाद "निर्वासित" है, परन्तु वल्गेट, सुरियानी और तर्गुम में "निर्वंश" है। वह राजा के रूप में "निर्वंश" था, क्योंकि दाऊद के सिंहासन पर उत्तराधिकारी होने के लिए उसका कोई पुत्र न था; परन्तु उसके सन्तानें थीं, देखिए 1 इतिहास 3:17, 18। और यह अर्थ पद के अन्त से स्पष्ट प्रकट होता है। स्कॉट सोचता है कि इन अन्तिम दो पदों में यकोन्याह का चाचा सिदकिय्याह ही वह व्यक्ति है जिसके विषय में कहा गया है। वह मानता है कि इस अध्याय की बातें सिदकिय्याह के राज्य में उसे चेतावनी देने के लिए दोहराई गई थीं। परन्तु यह विचार अध्याय के सामान्य आशय से मेल नहीं खाता। विशेषकर देखिए यिर्मयाह 22:13, 14, 15, 17, 18 और 19; ये स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि यह भविष्यद्वाणी यहोयाकीम के समय में, सम्भवतः उसके अन्तिम समय में, दी गई थी; फिर भविष्यद्वक्ता यिर्मयाह 22:24 से अध्याय के अन्त तक, उसके पुत्र यकोन्याह के भाग्य का भविष्यद्वाणी के रूप में वर्णन करने के लिए आगे बढ़ता है। और यह कहकर कि वह राजा के रूप में निर्वंश होगा, कि उसके वंश में से कोई भी दाऊद के सिंहासन पर न बैठेगा, वह अगले अध्याय में, जो इससे जुड़ा हुआ है, "धर्मी डाली" को, अर्थात् मसीहा को, सिय्योन के राजा को, प्रस्तुत करता है। अध्याय का उचित विभाजन नौवें पद पर है। इस विचार के अनुसार पूर्ण संगति है, — यकोन्याह दाऊद के सिंहासन पर, एक लौकिक राजा के रूप में, सीधी वंश-रेखा में राज्य करनेवाला अन्तिम राजकुमार था (उसका चाचा सिदकिय्याह सीधी रेखा में न था); तब वह आया जिसका दाऊद एक प्रतिरूप था, दाऊद के दृश्य सिंहासन पर बैठने और राज्य करने के लिए नहीं, वरन् उस पर जिसका वह प्रतीक था। — सं.
क्योंकि वह मसीह के सिर के लिए सुरक्षित रखा गया था, यद्यपि वह लम्बे समय तक अपमान और सब जातियों की निन्दा के लिए खुला पड़ा रहा।
अब यह जानना उपयोगी है, क्योंकि हमें यह सिखाया जाता है कि परमेश्वर सदा अपने आप से ऐसा संगत रहता है कि उसकी वाचा, जो उसने मसीह से और उसके सब अंगों से बाँधी है, कभी विफल नहीं होती, और फिर भी वह कपटियों को मृत्यु तक दण्ड देता है। यदि किसी ने लम्बे समय तक संसार में कलीसिया को खोजा होता, तो बाहरी रूप में वह कहीं न थी; तौभी परमेश्वर ने दिखाया कि वह अपनी प्रतिज्ञाओं के प्रति विश्वासयोग्य है, क्योंकि एकाएक सुसमाचार के द्वारा नया जन्म पाए हुए लोग उठ खड़े हुए, जिससे उसकी वाचा मरी हुई नहीं, वरन् मानो कुछ समय के लिए गाड़ी हुई थी। अतः परमेश्वर की सच्चाई घटना के द्वारा प्रमाणित हुई; और तौभी जब उसने इस प्रकार सारे संसार को अन्धा कर दिया, तब उसने मनुष्यों की कृतघ्नता का भयानक पलटा लिया। अब आगे यह आता है —
