यिर्मयाह और विलापगीत पर टीका · खण्ड 2 · यिर्मयाह 28

यिर्मयाह 28

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यिर्मयाह 28

यिर्मयाह 28:1-2

1. फिर उसी वर्ष, अर्थात् यहूदा के राजा सिदकिय्याह के राज्य के आरम्भ में, चौथे वर्ष के पाँचवें महीने में, अज्जूर का पुत्र हनन्याह जो गिबोन का भविष्यद्वक्ता था, उसने मुझ से यहोवा के भवन में, याजकों और सब लोगों के साम्हने कहा,

1. Factum est anno illo, principio regni Zedechiae, regis Jehudah, anno quarto, mense quinto, loquutus ad me Chananiah, filius Assur, propheta qui erat e Guibeon (oriundus e Guibeon) in Templo Jehovae, coram oculis sacerdotum et totius populi, dicendo,

2. इस्राएल का परमेश्वर, सेनाओं का यहोवा यों कहता है, कि मैं ने बाबुल के राजा के जूए को तोड़ डाला है।

2. Sic dicit Jehova exercituum, Deus Israel, confregi (aut contrivi) jugum regis Babylonis.

भविष्यद्वक्ता यहाँ बताता है कि झूठा भविष्यद्वक्ता हनन्याह कैसे घमण्ड, वरन् कैसे उन्माद के साथ लोगों को धोखा देने और अपनी निकम्मी बातों का प्रचार करने के लिए आगे आया, यद्यपि उसे अपनी दुष्टता का बोध अवश्य रहा होगा। इससे स्पष्ट प्रकट होता है कि जो लोग परमेश्वर के द्वारा अन्धे किए जाकर शैतानी प्रेरणा से बहा लिए जाते हैं, उनका पागलपन कितना बड़ा होता होगा। इस घटना की परिस्थितियाँ विशेष रूप से दिखाती हैं कि इस धोखेबाज़ ने परमेश्वर का कितना बड़ा तिरस्कार प्रकट किया; क्योंकि वह मन्दिर में आया, याजक उपस्थित थे, लोग वहाँ थे, और वहीं उसकी आँखों के साम्हने पवित्रस्थान और वाचा का सन्दूक था; और हम जानते हैं कि वाचा का सन्दूक सर्वत्र परमेश्वर की उपस्थिति रखनेवाला बताया गया है; क्योंकि उस चिह्न के द्वारा परमेश्वर एक प्रकार से दृश्य था, जब वह मन्दिर में अपनी सामर्थ्य और अपने अनुग्रह की उपस्थिति प्रकट करता था। तो जब हनन्याह इस प्रकार परमेश्वर की आँखों के साम्हने खड़ा था, तो उसकी मूर्खता कितनी बड़ी रही होगी कि वह आगे बढ़कर स्वयं परमेश्वर के नाम से निर्लज्जता से झूठ सुनाने लगा! तौभी उसे इसमें कोई सन्देह न था कि वह झूठ ही डींग मार रहा था कि वह परमेश्वर का भविष्यद्वक्ता है। 192 क्या वह सचमुच ऐसा जानता था, या झूठ की प्रतीति करने के लिए छोड़ दिया गया था? क्या वह महत्त्वाकांक्षा से प्रेरित होकर अभिनय कर रहा था, या दुष्ट आत्मा के भ्रामक प्रभाव में पड़ा हुआ एक सच्चे मन का कट्टरपन्थी था? दोनों दशाओं में वह शैतान का दास था; और क्या संसार में आज भी उसके जैसे बहुत-से लोग नहीं हैं? — सं.

और उसने वही शब्द प्रयोग किए जो यिर्मयाह ने किए थे, इस्राएल का परमेश्वर, सेनाओं का यहोवा यों कहता है। निश्चय ही ये शब्द उसके लिए वज्रपात के समान होने चाहिए थे, जो उसकी हठधर्मिता को धूल में मिला देते, चाहे वह लोहे से भी अधिक कठोर क्यों न होता; क्योंकि सेनाओं के यहोवा का क्या अर्थ है? यह नाम केवल परमेश्वर के अनन्त अस्तित्व को ही नहीं, वरन् उसकी उस सामर्थ्य को भी प्रकट करता है जो स्वर्ग और पृथ्वी में व्याप्त है। तो क्या हनन्याह को काँप नहीं उठना चाहिए था, जब कोई दूसरा भी परमेश्वर का नाम लेता? परन्तु अब, यद्यपि उसने भविष्यद्वक्ता के पद और परमेश्वर के पवित्र नाम दोनों का उपहास और ठट्ठा किया, तौभी वह यह डींग मारने से न हिचका कि इस भविष्यद्वाणी का रचयिता परमेश्वर है, जबकि वह छल के सिवाय और कुछ न थी। और उसने यह भी जोड़ा, इस्राएल का परमेश्वर, ताकि वह किसी बात में यिर्मयाह से कम न ठहरे। यह एक कठिन परीक्षा थी, जो न केवल लोगों को निरुत्साहित करने के योग्य थी, वरन् पवित्र भविष्यद्वक्ता की दृढ़ता को भी तोड़ देने के योग्य थी। लोगों ने देखा कि परमेश्वर का नाम विवाद का विषय बन गया है; एक भयानक संघर्ष था, ``परमेश्वर ने मुझ से कहा है;'' ``नहीं, वरन् मुझ से।'' यिर्मयाह और हनन्याह एक दूसरे के विरोध में खड़े थे; दोनों में से प्रत्येक भविष्यद्वक्ता होने का दावा करता था। ऐसा था वह संघर्ष; परमेश्वर का नाम मानो मनमाने ढंग से धारण किया गया और शैतान के द्वारा मानो खेल में इधर-उधर उछाला गया प्रतीत होता था।

जहाँ तक यिर्मयाह की बात है, उसका हृदय अवश्य ही बहुत घायल हुआ होगा, जब उसने उस सिद्धान्तहीन मनुष्य को निडर होकर परमेश्वर के नाम को अपवित्र करते देखा। परन्तु, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, परमेश्वर ने इस बीच भक्तों के मनों को सम्भाले रखा, ताकि वे पूरी तरह गिर न जाएँ, यद्यपि वे कुछ न कुछ विचलित अवश्य हुए होंगे। क्योंकि हम जानते हैं कि परमेश्वर की सन्तान ऐसी भावनाशून्य न थी कि ऐसी बातों से विचलित न हो; परन्तु तौभी परमेश्वर ने उन सब को सम्भाले रखा जो सच्चे धर्म से सम्पन्न थे। वास्तव में उनके लिए यिर्मयाह और हनन्याह में भेद करना सरल था; क्योंकि उन्होंने देखा कि पहला परमेश्वर की आज्ञाएँ सुनाता था, जबकि दूसरा मनुष्यों की कृपा और वाहवाही के सिवाय और कुछ नहीं चाहता था।

परन्तु हनन्याह के विषय में, वह उनके लिए अन्धेपन और पागलपन का एक भयानक दृश्य था, क्योंकि वह स्वयं परमेश्वर की दृष्टि से नहीं डरा, वरन् मन्दिर में प्रवेश करके अपने झूठों से उसे अपवित्र किया, और साथ ही तिरस्कार के साथ परमेश्वर का नाम धारण किया, और डींग मारी कि वह भविष्यद्वक्ता है, जबकि वह ऐसा कुछ भी न था। तो यदि आज भी बहुत-से भाड़े के बकवादी हों, जो बिना लज्जा और भय के उग्रता से परमेश्वर के नाम का बहाना करते हैं, और इस प्रकार हम पर ऐसे इतराते हैं मानो जो कुछ वे व्यर्थ बकते हैं वह सब परमेश्वर ने उन्हें दिया हो, जबकि यह पूर्ण रूप से सिद्ध किया जा सकता है कि वे झूठ के सिवाय और कुछ प्रचार नहीं करते, तो हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए; क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें न्याय के साथ अन्धा कर दिया है, क्योंकि वे इस प्रकार उसके पवित्र नाम को अपवित्र करते हैं। अब हम शब्दों पर आएँगे: और उसी वर्ष, अर्थात् सिदकिय्याह के राज्य के चौथे वर्ष में ऐसा हुआ, इत्यादि। ऐसा प्रतीत होता है कि चौथे वर्ष को अनुचित रूप से उसके राज्य का आरम्भ कहा गया है। हम अन्यत्र कह चुके हैं कि सम्भव है कि परमेश्वर ने यह भविष्यद्वाणी यिर्मयाह के पास रख छोड़ी हो, और यह न चाहा हो कि वह तुरन्त प्रकाशित की जाए। परन्तु यदि उसके राज्य की पुष्टि को उसका आरम्भ कहा गया हो, तो इसमें कुछ भी विचित्र न होगा।

सिदकिय्याह को नबूकदनेस्सर ने राजा बनाया था, क्योंकि लोग किसी परदेशी को स्वीकार करने को तैयार न होते। वह चाहता तो सारे देश पर अपने ही किसी अधिकारी को नियुक्त कर सकता था; और वह देश के प्रधान पुरुषों में से किसी को राजा भी बना सकता था, परन्तु उसने देखा कि इस प्रकार की कोई भी बात बहुत अप्रिय लगती।

इसलिए उसने यही पर्याप्त समझा कि यकोन्याह को हटा दे, और उसके स्थान पर ऐसे व्यक्ति को रखे जिसके पास न बहुत शक्ति हो न बहुत धन, और जो उसे कर देनेवाला हो, जैसी सिदकिय्याह की दशा थी। परन्तु समय के साथ सिदकिय्याह की शक्ति बढ़ गई, यहाँ तक कि वह अपने राज्य में शान्ति से रहने लगा। हम यह भी जानते हैं कि उसे पड़ोसी देशों पर भी अधिकारी ठहराया गया, क्योंकि नबूकदनेस्सर ने उपकारों के द्वारा उसे अपने साथ बाँध लेना लाभदायक समझा। तो यह चौथा वर्ष भली-भाँति उसके राज्य का आरम्भ माना जा सकता था, क्योंकि तीन वर्ष तक परिस्थितियाँ इतनी अशान्त रहीं कि उसके पास कोई अधिकार न था, और वह सिंहासन पर चढ़ने का साहस भी कठिनाई से करता था। अतः यही सबसे सम्भावित मत है।

इसके बाद वह कहता है कि हनन्याह ने याजकों और सारी प्रजा के साम्हने उससे बात की। जब हनन्याह ने यिर्मयाह को बोलते सुना, तो उसे कम से कम मर्म तक छू जाना और विचलित होना चाहिए था; उसके पास अपनी बुलाहट का कोई प्रमाण न था; वरन् वह धोखेबाज़ था, और जानता था कि वह लोगों को धोखा देने के सिवाय और कुछ नहीं करता, तौभी वह ढिठाई से अपने उद्देश्य पर अड़ा रहा, और मानो खुलेआम भविष्यद्वक्ता से विवाद करने के लिए अपने को आगे कर दिया, मानो वह परमेश्वर से युद्ध कर रहा हो। उसने कहा, बाबुल के राजा का जूआ टूट गया है, अर्थात् वह अत्याचार जिससे उसने लोगों को सताया है, शीघ्र तोड़ दिया जाएगा। परन्तु उसने उस जूए की ओर संकेत किया जिसे यिर्मयाह ने पहना था, जैसा हम अभी देखेंगे। उसकी भविष्यद्वाणी का आरम्भ यह था कि यहूदियों के लिए बाबुल के राजा की वर्तमान शक्ति से डरने का कोई कारण नहीं, क्योंकि परमेश्वर शीघ्र ही उसे उलट देगा। जब तक वह राजतन्त्र पाँवों तले रौंदा न जाता, तब तक वे पुनःस्थापना या किसी अच्छी दशा की आशा नहीं रख सकते थे; क्योंकि जब तक बाबुल का राजा शासन करता रहता, तब तक यह आशा न थी कि वह कर माफ़ कर देगा और मन्दिर के पात्र यहूदियों को लौटा देगा। तो हनन्याह ने इसी से आरम्भ किया कि परमेश्वर बाबुल के राजा की शक्ति को तोड़ देगा, जिससे वह चाहे-अनचाहे लोगों को स्वतंत्र करने को विवश होगा, या लोग बिना दण्ड पाए उसकी शक्ति की पकड़ से अपने को छुड़ा लेंगे। फिर वह आगे कहता है, ---

यिर्मयाह 28:3

3. यहोवा के भवन के जितने पात्र बाबुल का राजा नबूकदनेस्सर इस स्थान से उठाकर बाबुल ले गया, उन्हें मैं दो वर्ष के भीतर फिर इसी स्थान में ले आऊँगा।

193 गेटेकर इस कठिनाई के कई प्रस्तावित समाधानों का उल्लेख करता है: एक तो वही जो यहाँ बताया गया है; दूसरा यह कि उसके राज्य की पूरी अवधि, अर्थात् ग्यारह वर्ष, तीन भागों में बाँटे जाने पर पहले तीन वर्ष और चौथे का आरम्भ उसके राज्य का आरम्भ माना जा सकता है; और तीसरा, जिसे वह स्वयं पसन्द करता है, यह कि चौथा वर्ष सिदकिय्याह से नहीं, वरन् विश्राम-वर्ष से सम्बन्ध रखता है, अर्थात् वह उस चक्र का चौथा वर्ष था; और ऐसा प्रतीत होता है कि कालगणना करनेवालों के अनुसार यरूशलेम का विनाश एक विश्राम-वर्ष में हुआ, जो अठारहवें जुबली का चौथा था। इस दशा में, सिदकिय्याह का पहला वर्ष एक विश्राम-वर्ष के बाद का चौथा होने के कारण, उसका ग्यारहवाँ वर्ष उसी प्रकार की अगली अवधि से मेल खाएगा, यदि उस वर्ष के आरम्भ का ध्यान रखा जाए जिसमें वह राज्य करने लगा। ब्लेनी दूसरा समाधान अपनाता है। सम्भवतः सबसे अच्छा यह होगा कि "आरम्भ" को, जैसा स्कॉट करता है, उसके राज्य के आरम्भिक या पहले भाग के अर्थ में लिया जाए।

194 कुछ लोगों के विचार में हनन्याह एक याजक था, क्योंकि बिन्यामीन के गोत्र में स्थित गिबोन उन नगरों में से एक था जो याजकों को दिए गए थे; निःसन्देह वह पेशे से भविष्यद्वक्ता था, यिर्मयाह सर्वत्र उसे यही कहता है। यहूदियों में प्राचीन समय से मनुष्यों का एक वर्ग था जो भविष्यद्वक्ता कहलाता था; वे सब भविष्यद्वाणी के वरदान से सम्पन्न न थे, वरन् इसी प्रयोजन के लिए विद्यालयों में प्रशिक्षित किए जाते थे, ताकि व्यवस्था के व्याख्याता और लोगों के शिक्षक हों। देखिए 1 शमूएल 19:20; 2 राजाओं 2:3; 6:1। हनन्याह सम्भवतः इसी प्रकार का भविष्यद्वक्ता था, और इसी कारण यिर्मयाह ने उसे भविष्यद्वक्ता कहा; परन्तु यहाँ वह एक दूसरे रूप में, भविष्यद्वाणी के आत्मा से सम्पन्न भविष्यद्वक्ता के रूप में, प्रकट होता है। नये नियम के शास्त्री पुराने नियम के शिक्षा देनेवाले भविष्यद्वक्ता जैसे प्रतीत होते हैं।

3. Adhuc (in adhuc, ad verbum) anni duo dierum (hoc est, cum transierint anni dierum duo,) ego reducam ad locum hunc omnia vasa domus Jehovae (id est, Templi,) quae abstulit Nebuchadnezer, rex Babylonis, a loco hoc et transportavit Babylonem.

अब हम देखते हैं कि हनन्याह का उद्देश्य यह था कि लोगों को दण्ड से छूट जाने की प्रतिज्ञा दे, और केवल इतना ही नहीं, वरन् उन्हें व्यर्थ भरोसे से बहलाए, मानो लोगों को उनका राजा उन लूटी हुई वस्तुओं समेत, जिन्हें शत्रु ले गया था, शीघ्र लौटा दिया जाएगा। परन्तु उसने राजा की शक्ति की चर्चा से आरम्भ किया, कहीं ऐसा न हो कि वह भयानक दृश्य लोगों के मनों पर ऐसा छा जाए कि वे इस आनन्ददायक भविष्यद्वाणी को ग्रहण न कर सकें। फिर वह कहता है, और, जब दो वर्ष बीत जाएँगे, तब मैं उन सब पात्रों को जिन्हें राजा नबूकदनेस्सर ले गया है, इसी स्थान में लौटा ले आऊँगा। यिर्मयाह ने लोगों की बँधुआई के लिए सत्तर वर्ष ठहराए थे, जैसा पहले बताया जा चुका है, और जैसा हम आगे बार-बार देखेंगे; परन्तु यहाँ झूठा भविष्यद्वक्ता कहता है कि दो वर्ष के बाद राजा और लोगों की बँधुआई का अन्त हो जाएगा, और जो पात्र ले जाए गए थे वे लौटा दिए जाएँगे; वह स्वयं राजा के विषय में भी कहता है, यिर्मयाह 28:4

4. और यहूदा के राजा यहोयाकीम का पुत्र यकोन्याह और सब यहूदी बँधुए जो बाबुल को गए हैं, उनको भी मैं इस स्थान में लौटा ले आऊँगा, यहोवा की यही वाणी है; क्योंकि मैं ने बाबुल के राजा के जूए को तोड़ दिया है।

4. Et Jechaniam, filium Jehoiakim, regem Jehudah, et totam captivatatem (hoc est, totam turbam captivam; est enim {}גלותnomen collectivum, ut alibi diximus, totam ergo turbam captivam) Jehudah, quae profecta est Babylonem (hoc est, qui abducti fuerunt, vel, qui profecti sunt; sed violonter tracti tamen) ego reducam ad hunt locum, dicit Jehova; quia contrivi jugurn regis Babylonis.

जो बात उसने अभी मन्दिर और राजभवन के पात्रों के विषय में कही थी, वही हनन्याह ने स्वयं राजा के विषय में भी प्रतिज्ञा की। परन्तु यह पूछा जा सकता है कि उसने यकोन्याह की पुनःस्थापना की आशा देने का साहस कैसे किया, जबकि यह सिदकिय्याह को स्वीकार्य नहीं हो सकता था? क्योंकि सिदकिय्याह के राजपद त्यागे बिना यकोन्याह वह फिर से प्राप्त नहीं कर सकता था जो उसने खो दिया था; परन्तु सिदकिय्याह कभी अपनी इच्छा से यह न मानता कि वह अपनी प्रतिष्ठा खोकर एक साधारण मनुष्य बन जाए, और उसे लौट आने दे जो इस ऊँचे सम्मान से वंचित किया गया था। परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि वह लोगों की कृपा पर भरोसा रखता था, और उसे पूरा विश्वास था कि यदि सिदकिय्याह इस प्रकार नीचा किया जाना कठिनाई से सह भी पाता, तौभी उसे विवश होकर कोई और ही भाव प्रकट करना पड़ता; क्योंकि सिदकिय्याह स्वयं अपने राज्य को सम्मानजनक नहीं मानता था, क्योंकि वह उत्तराधिकार के अधिकार से दाऊद के सिंहासन पर नहीं बैठा था। उसे एक अत्याचारी ने सिंहासन पर बैठाया था, और वह लोगों के साम्हने इसके सिवाय कोई और बहाना करने का साहस न करता था कि वह चाहता है कि यकोन्याह लौट आए और उस राज्य को फिर से अपने अधिकार में ले जिससे वह वंचित किया गया था। तो जब इस धोखेबाज़ ने जाना कि राजा कोई अप्रसन्नता दिखाने का साहस न करेगा, वरन् उसकी भविष्यद्वाणी लोगों को सुहावनी और स्वीकार्य होगी, तो उसने निडर होकर वह प्रतिज्ञा की जो हम यहाँ यकोन्याह के लौटने के विषय में पढ़ते हैं।

इसलिए वह परमेश्वर के नाम से कहता है, यहूदा के राजा यहोयाकीम का पुत्र यकोन्याह, और सारी बँधुआ प्रजा, जो बाबुल को ले जाई गई है, उन्हें मैं इस स्थान में लौटा लाऊँगा। हम देखते हैं कि वह सदा उसी घमण्ड से फूला हुआ था, और उसने परमेश्वर की, जिसके नाम को वह इस प्रकार खेल-खेल में अपवित्र करता था, पूरी तरह उपेक्षा की। परन्तु यह सब इसी स्रोत से निकला, अर्थात् इसलिए कि वह परमेश्वर के धर्ममय न्याय के द्वारा अन्धा कर दिया गया था। फिर वह अपनी भविष्यद्वाणी का आरम्भ दोहराकर उसकी पुष्टि करता है, मैं ने बाबुल के राजा का जूआ तोड़ दिया है। उसने यह कहकर अपने लिए प्रवेश का मार्ग खोला था कि बाबुल के राजतन्त्र का विनाश निकट है; और अब, जो कुछ उसे पूरे विषय में अच्छा लगा वह कह चुकने के बाद, वह फिर उसी घटना की ओर लौटता है। तो जब उसने प्रतिज्ञा की कि वह राजतन्त्र दो वर्ष से अधिक न टिकेगा, तो यहूदी यह समझ सकते थे कि वे स्वतंत्र हो जाएँगे, और इस प्रकार सुखमय दशा की आशा रख सकते थे; और उस धोखेबाज़ की यही युक्ति थी; परन्तु यिर्मयाह का उत्तर क्या था? उसका विरोध खरा और दृढ़ था; परन्तु क्योंकि उसने देखा कि उसने लोगों का बैर मोल ले लिया था, इसलिए वह उसे दूर करने को उत्सुक था; और जो कुछ उसने बँधुआई के उनके सत्तर वर्षों के विषय में कहा था उसे दोहराने से पहले, उसने दिखाया कि उसने अपना कार्यभार उत्सुकता से ग्रहण नहीं किया था, मानो वह अपने लोगों से विमुख हो गया हो, या उनके कल्याण की उपेक्षा करता हो, या किसी रोगी भावना में बहकर एक दुःखद और शोकपूर्ण सन्देश लाया हो। इसलिए उसने कहा, --- 195 हमारे अनुवाद में यह अधिक अच्छे ढंग से दिया गया है, "दो वर्ष के भीतर;" शब्दशः, "दो पूरे वर्षों के दौरान (अर्थात्, उनकी अवधि में):" अन्त में नहीं, वरन् दो वर्षों के भीतर। उसने कोई विशेष समय निर्दिष्ट किए बिना दो वर्षों की अवधि ले ली। — सं.

यिर्मयाह 28:5-6

5. तब यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता ने हनन्याह भविष्यद्वक्ता से, याजकों और उन सब लोगों के साम्हने जो यहोवा के भवन में खड़े हुए थे, कहा,

5. Tunc dixit Jeremias propheta Chananiae prophetae coram oculis sacerdotum et coram oculis totius populi, qui stabant in domo Jehovae (hoc est, in Tempe,)

6. यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता ने कहा, आमीन! यहोवा ऐसा ही करे; जो बातें तू ने भविष्यद्वाणी करके कही हैं कि यहोवा के भवन के पात्र और सब बँधुए बाबुल से इस स्थान में फिर आएँगे, उन्हें यहोवा पूरा करे।

6. Et dixit Jeremias propheta, Amen, sic faciat Jehova, stabiliet Jehova sermones tuos, quos prophetasti ad reducendum (hoc est, ut reducantur) vasa Templi et tota captivitas ex Babylone ad hunc locum.

मैंने आपको संक्षेप में भविष्यद्वक्ता के उद्देश्य का स्मरण दिलाया है; क्योंकि यह डर था कि लोग उसकी न सुनेंगे, या कम से कम उसे भली-भाँति ग्रहण न करेंगे, क्योंकि उसने उन्हें धमकाया था और उनके साथ कठोरता और कड़ाई से व्यवहार किया था। हम जानते हैं कि मनुष्य सदा चापलूसी चाहते हैं; इसलिए चाटुकारी बातें सदा आनन्द से ग्रहण की जाती हैं। मनुष्यों का घमण्ड ऐसा है कि वे अपने किए का हिसाब माँगा जाना सह नहीं सकते; और जब वे अपने अपराधों और दोषों को प्रकाश में लाए जाते देखते हैं, तो वे क्रोधित भी हो जाते हैं; इसके अतिरिक्त वे इतने कोमल और नाज़ुक हैं कि जहाँ तक हो सके सब प्रतिकूल समाचारों से बचते हैं; और यदि कोई भय उन पर आ पड़ता है, तो वे तुरन्त उसका प्रतिरोध करते हैं।

अब यिर्मयाह को दोहरा सन्देश सौंपा गया था: लोगों के दोषों को उजागर करना, यह दिखाना कि यहूदी उस देश के उत्तराधिकारी होने के अयोग्य थे, क्योंकि वे वाचा तोड़नेवाले और परमेश्वर तथा उसकी व्यवस्था को तुच्छ जाननेवाले थे; और फिर, क्योंकि वे इतनी बार हठीले और टेढ़े रहे थे, उसके पास एक और सन्देश था, कि वे दण्ड से बच निकलने न पाएँगे, क्योंकि वे इतने प्रकार से और इतने लम्बे समय तक परमेश्वर के क्रोध को भड़काते रहे थे; यह सब लोगों को बहुत अप्रिय था। इसलिए यिर्मयाह का उद्देश्य उस झूठे सन्देह को दूर करना था जिसके नीचे वह दबा हुआ था, और उसने साक्षी दी कि वह लोगों के कल्याण से बढ़कर और कुछ नहीं चाहता; उसने कहा, ``आमीन, ऐसा ही हो, भला होता कि मैं झूठा भविष्यद्वक्ता होता; अब तक जो कुछ मैंने भविष्यद्वाणी की है, उस सब को मैं प्रसन्नता से, और वह भी लज्जा के साथ, वापस ले लूँगा, सार्वजनिक कुशल के लिए मेरी चिन्ता और व्याकुलता इतनी बड़ी है; क्योंकि मैं अपनी प्रतिष्ठा से बढ़कर सारी प्रजा के कल्याण को चाहूँगा।'' परन्तु बाद में उसने जोड़ा, जैसा हम देखेंगे, कि हनन्याह की प्रतिज्ञा पूरी तरह व्यर्थ थी, और कोई भी बात लोगों को उस विपत्ति से न बचाएगी जो बहुत निकट आ पहुँची थी। 196 यहाँ काल ठीक नहीं दिया गया है, शब्द ये हैं, "क्योंकि मैं बाबुल के राजा का जूआ तोड़ दूँगा;" और सब अनुवादों में ऐसा ही है। — सं.

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अनुग्रह कर कि जैसे तू हमें अपने पास निरन्तर बुलाता रहता है, और बार-बार हमें हमारे पापों का स्मरण दिलाता है, ताकि हम उस दया की आशा को ग्रहण करें जो हमें दी जाती है, --- हे प्रभु, अनुग्रह कर कि हम इतनी बड़ी और अमूल्य आशीष के प्रति कृतघ्न न हों, वरन् सच्ची दीनता और सच्चे पश्चाताप के साथ तेरे पास आएँ, और तेरी असीम भलाई पर भरोसा रखकर इसमें सन्देह न करें कि तू हम पर कृपालु होगा, जिससे हम सच्चे धर्म की लालसा से प्रज्वलित हों, और सब बातों में तेरे वचन का पालन करें, ताकि तेरा नाम हम में महिमा पाए, जब तक कि हम अन्त में उस स्वर्गीय महिमा में न पहुँच जाएँ, जिसे तेरे पुत्र ने अपने लहू के द्वारा हमारे लिए प्राप्त किया है। --- आमीन।

एक सौ सातवाँ व्याख्यान

पिछले व्याख्यान में हमने यिर्मयाह के उस उत्तर की व्याख्या आरम्भ की थी, जब उसने हनन्याह से कहा, ``परमेश्वर तेरे वचनों को स्थिर करे, और मन्दिर के पात्र इस स्थान में लौटाए जाएँ और बँधुए लोगों के साथ लौट आएँ।'' हमने संक्षेप में वह बात कही थी जिसे अब फिर दोहराना आवश्यक है, कि भविष्यद्वक्ताओं में दो भावनाएँ थीं जो देखने में परस्पर विरोधी थीं, तौभी एक दूसरे के साथ संगत थीं। परमेश्वर ने उन्हें जो कुछ आज्ञा दी थी, उसे वे निडर होकर सुनाते थे, और इस प्रकार जब वे कोई प्रतिकूल बात सुनाते थे तो अपनी जाति को भूल जाते थे। इसलिए जब भविष्यद्वक्ताओं ने लोगों को धमकाया, और कहा कि युद्ध या अकाल निकट है, तब वे निःसन्देह ऐसी वीरोचित मन की महानता से सम्पन्न थे कि लोगों का ध्यान छोड़कर अपने पद के कार्य में आगे बढ़ते जाते थे; इस प्रकार परमेश्वर ने उन्हें जो कुछ आज्ञा दी थी, उसे वे दृढ़ता से पूरा करते थे। परन्तु उन्होंने हर मानवीय भावना को पूरी तरह उतार नहीं फेंका था, वरन् लोगों के दुःखों में सहानुभूति रखते थे; और यद्यपि वे उन पर विनाश की घोषणा करते थे, तौभी वे अपनी ही भविष्यद्वाणियों से दुःख पाए बिना न रह सकते थे।

इसलिए यिर्मयाह में इस बात में कोई असंगति न थी कि वह मन्दिर के पात्रों की पुनःस्थापना और निर्वासितों के लौटने की इच्छा करे, जबकि तौभी वह सदा उसी मन पर बना रहा, जैसा हम आगे देखेंगे।

यदि कोई आपत्ति करे और कहे कि ऐसा नहीं हो सकता था, क्योंकि तब तो यिर्मयाह व्यर्थ और झूठा भविष्यद्वक्ता ठहरता, तो इसका उत्तर यह है कि जब भविष्यद्वक्ता प्रचण्ड उत्साह में बह जाते थे, तब वे सूक्ष्म तर्कों का सहारा नहीं लेते थे; क्योंकि हम देखते हैं कि मूसा ने चाहा कि उसका नाम जीवन की पुस्तक में से काट दिया जाए, और पौलुस ने भी ऐसी ही इच्छा प्रकट की, यहाँ तक कि वह अपने भाइयों के लिए मसीह से शापित हो जाए। (निर्गमन 32:32; रोमियों 9:3।) यदि किसी ने स्पष्ट रूप से मूसा से पूछा होता, क्या तू नाश होना और उद्धार की आशा से काट दिया जाना चाहता है? तो निःसन्देह उसका उत्तर यह होता कि परमेश्वर के अटल अनुग्रह को त्याग देना उसके मन में सबसे कम था; परन्तु जब उसका मन पूरी तरह परमेश्वर की महिमा पर लगा था, जो सब प्रकार की निन्दाओं का पात्र बन जाती, यदि लोग जंगल में नाश कर दिए जाते, और जब उसके मन में एक और बात थी, अर्थात् अपनी जाति के उद्धार की चिन्ता, तब वह उस समय अपने आप को भूल गया, और मानो अपने आप से परे बहकर उसने कहा, ``वरन् मुझे जीवन की पुस्तक में से मिटा दे,'' और पौलुस की दशा भी ऐसी ही थी। और यिर्मयाह के विषय में भी हमें यही दृष्टिकोण रखना चाहिए, जब उसने वास्तव में यह कहा, भला होता कि मैं झूठा भविष्यद्वक्ता होता, और तू ने लोगों से जो कहा है वह घटना के द्वारा सच पाया जाए।'' परन्तु यिर्मयाह का अभिप्राय परमेश्वर के वचन में से छोटी से छोटी बात भी घटाने का न था; उसने केवल एक इच्छा प्रकट की, और दूसरी बात की चिन्ता, अर्थात् अपनी भविष्यद्वाणी की साख और अधिकार, परमेश्वर को सौंप दी; अतः उसने इसका उत्तरदायित्व अपने ऊपर नहीं लिया, मानो यदि संयोगवश घटना उसकी भविष्यद्वाणी से मेल न खाती तो उसे ही उसे सच ठहराना पड़ता; वरन् उसने इसकी चिन्ता परमेश्वर पर छोड़ दी, और इस प्रकार बिना किसी कठिनाई के लोगों के छुटकारे और लौटने के लिए प्रार्थना की।

परन्तु अब यह आता है ---

यिर्मयाह 28:7-9

7. तौभी मेरा यह वचन सुन, जो मैं तेरे कानों में और सब लोगों के कानों में कहता हूँ;

7. Verum audi nunc (vel, agedum, hortantis) sermonem hunc, quem ego pronuncio (pronuncians sum) in auribus tuis et in auribus totius populi, ---

8. जो भविष्यद्वक्ता प्राचीनकाल से मेरे और तेरे पहले होते आए थे, उन्होंने बहुत-से देशों और बड़े-बड़े राज्यों के विरुद्ध युद्ध और विपत्ति और मरी की भविष्यद्वाणी की थी।

8. Prophetae qui fuerunt ante me et ante to a seculo, et prophetarunt super terras multas (vel, magnas) et regna magna de praelio, de malo et de peste:

9. जो भविष्यद्वक्ता कुशल की भविष्यद्वाणी करे, तो जब उस भविष्यद्वक्ता का वचन पूरा हो, तब ही वह भविष्यद्वक्ता जाना जाएगा कि यहोवा ने सचमुच उसे भेजा है।

9. Propheta qui prophetaverit de pace (hoc est, de rebus prosperis,) cum venerit sermo (id est, cum eventu comprobatus fuerit sermo prophetae,) cognoscetur propheta quod miserit eum Jellova in veritate.

यिर्मयाह यह साक्षी देकर कि वह अपने लोगों के लिए कोई अनिष्ट नहीं चाहता, वरन् उनके प्रति सद्भाव रखता है, अब यह जोड़ता है कि जो कुछ उसने भविष्यद्वाणी की थी वह तौभी पूरी तरह सत्य थी। यहाँ उसकी दोहरी भावना के विषय में जो मैंने कहा है, वह और भी पूर्ण रूप से दिखाई देता है; क्योंकि यद्यपि भविष्यद्वक्ता लोगों के कल्याण का ध्यान रखना चाहता था, तौभी उसने परमेश्वर की पूरी आज्ञाकारिता करना और उन सन्देशों को सुनाना नहीं छोड़ा जो साथ ही बहुत दुःखदायी थे: इस प्रकार यिर्मयाह चुप न रहा, वरन् लोगों के विरुद्ध परमेश्वर के पलटा लेने का दूत बन गया। तो एक ओर उसने दिखाया कि वह अपने लोगों के कल्याण और कुशल से बढ़कर और कुछ नहीं चाहता, और दूसरी ओर यह कि उस स्वर्गीय आदेश को, जिसे उसने सुनाया था, बदलना न उसके वश में था न किसी नश्वर मनुष्य के। अतः हम देखते हैं कि परमेश्वर ने अपने दासों के मनों और हृदयों पर ऐसा प्रभाव डाला कि वे क्रूर या बर्बर न थे; तौभी मानवता के प्रभाव से वे कोमल और लचीले नहीं बनाए गए, वरन् परमेश्वर ने उन्हें जो आज्ञा दी थी उसे वे निडर होकर सुनाते थे।

इसी कारण उसने कहा, तौभी यह वचन सुन जो मैं तेरे कानों में और सब लोगों के कानों में कहता हूँ। इन शब्दों के द्वारा यिर्मयाह ने परोक्ष रूप से हनन्याह की व्यर्थता की निन्दा की, जो लोगों की चापलूसी करना चाहता था, और अपनी चाटुकारी बातों से कृपा और वाहवाही का शिकार करता था, जैसा ऐसे धोखेबाज़ों की रीति है; फिर उसने कहा कि लोगों को निकट छुटकारे की आशा देने से उसे कुछ लाभ न हुआ, क्योंकि परमेश्वर ने अपना उद्देश्य नहीं बदला था। और अब यिर्मयाह ने निडर होकर और खुलकर उसका विरोध किया, क्योंकि उसने उस बैर का पर्याप्त खण्डन कर दिया था जिसका भार अन्याय से उस पर डाला गया था; क्योंकि धोखेबाज़ सदा ऐसी निन्दाएँ ढूँढ़ निकालते हैं जिनसे वे परमेश्वर के विश्वासयोग्य दासों पर आक्रमण करते हैं। वह आरम्भ में ही यिर्मयाह पर यह आपत्ति कर सकता था और कह सकता था, ``तू अपनी ही जाति से विमुख हो गया है, जिन बहुत-से दुःखों से हम अब तक सताए गए हैं उनसे तू द्रवित नहीं होता, और न तुझे इसकी चिन्ता है कि आगे हम पर क्या बीतेगी।''

इस प्रकार वह यिर्मयाह के विरुद्ध घृणा भड़का सकता था, यदि उसने अपने को निर्दोष सिद्ध न किया होता।

परन्तु जब उसने साक्षी दे दी कि वह अपनी जाति के प्रति सद्भाव रखता और उससे स्नेह करता है, तब उसने स्वयं उस धोखेबाज़ पर आक्रमण किया, और वह बात कहने से न हिचका जो बहुत दुःखदायी प्रतीत होती थी, अर्थात् यह कि लोग बँधुए हो जाएँगे।

तौभी ऐसा प्रतीत होता है कि यिर्मयाह यहाँ कुछ हद तक भय से ग्रस्त हो गया था; क्योंकि उसने अपनी भविष्यद्वाणी की पुष्टि नहीं की, वरन् उसे मानो अनिर्णीत छोड़ दिया; और तौभी उसने निःसन्देह हनन्याह की झूठी घोषणा का भण्डाफोड़ किया। परन्तु हम जानते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने जो कुछ कहा वह सब यहाँ वर्णित नहीं है; क्योंकि वह संक्षेप में केवल मुख्य बातें या प्रधान विषय लिखता है; और फिर, जैसा हम अभी देखेंगे, ऐसे कोलाहल के बीच यिर्मयाह अपनी इच्छा के अनुसार कार्य नहीं कर सकता था, क्योंकि वह बहरों से बात करता; और क्योंकि हनन्याह ने लगभग सब के मनों को पहले से ही प्रभावित कर रखा था, इसलिए जब तक ऐसी गड़बड़ी थी, पवित्र भविष्यद्वक्ता की बात सुनी न जाती। इसलिए वह इस संक्षिप्त कथन से सन्तुष्ट रहा कि परमेश्वर शीघ्र ही दिखा देगा कि हनन्याह बँधुओं और निर्वासितों को इतने शीघ्र लौटने की प्रतिज्ञा देकर झूठा गवाह था।

परन्तु वह यहाँ केवल एक सामान्य कथन करता है, जो भविष्यद्वक्ता मुझ से और तुझ से पहले हुए, और जिन्होंने बहुत-से (या बड़े) देशों के विरुद्ध, और बड़े-बड़े राज्यों के विरुद्ध भविष्यद्वाणी की, उन्होंने युद्ध और विपत्ति और मरी की भविष्यद्वाणी की है। शब्द {,}רעה roe, विपत्ति, बुराई के दो अन्य प्रकारों के बीच रखा गया है; परन्तु निःसन्देह यहाँ इसे अकाल के अर्थ में लेना चाहिए, जैसा बहुत-से अन्य स्थलों से स्पष्ट है। फिर वह वचन बदलकर कहता है, ``जब कभी किसी भविष्यद्वक्ता ने कुशल की बात कही, तो घटना ने सिद्ध किया कि वह सच्चा भविष्यद्वक्ता था या नहीं। अब, स्वयं अनुभव शीघ्र ही तुझे झूठा सिद्ध करेगा, क्योंकि दो वर्ष के बाद भी जो लोग अब बाबुल में हैं वे वहीं अत्याचार के अधीन रहेंगे, और बचे हुओं की दशा भी कुछ अच्छी न होगी, क्योंकि जो अब नगर में और सारे यहूदिया में रह गए हैं, वे भी अपने भाइयों के समान बँधुआई में खदेड़ दिए जाएँगे।''

ऐसा प्रतीत होता है कि यिर्मयाह यहाँ यह निष्कर्ष निकालता है कि केवल वे ही सच्चे भविष्यद्वक्ता माने जाएँ जो घटना के द्वारा सिद्ध करते हैं कि वे ऊपर से भेजे गए हैं; और यह न केवल उसके शब्दों से निकाला जा सकता प्रतीत होता है, वरन् यह भी दिखाया जा सकता है कि सच्चे भविष्यद्वक्ता की यही परिभाषा है; क्योंकि जब घटना भविष्यद्वाणी से मेल खाती है, तब इसमें कोई सन्देह नहीं कि जिसने वह बात पहले से कही जो पूरी होती है, वह परमेश्वर का भेजा हुआ ही होगा। परन्तु हमें वह बात स्मरण रखनी चाहिए जो व्यवस्थाविवरण 13:1, 2 में कही गई है, जहाँ परमेश्वर लोगों को चेतावनी देता है कि जब घटना भविष्यद्वाणी के अनुसार हो भी जाए, तब भी भविष्यद्वक्ताओं पर बिना सोचे-विचारे और अन्धाधुन्ध विश्वास न किया जाए, मानो उन्होंने सत्य ही भविष्यद्वाणी की हो; वह कहता है, ``क्योंकि परमेश्वर तेरी परीक्षा करता है,'' अर्थात् तेरे विश्वास को परखता है कि क्या तू उपदेश की हर एक बयार से सहज ही बहा लिया जाएगा।''

197 बीस से अधिक हस्तलिपियों में {,{`` רעבअकाल,'' पढ़ा जाता है, जिसे सही पाठ माना जा सकता है, यद्यपि सब अनुवाद दूसरे पाठ का समर्थन करते हैं। इस पद का अनुवाद करना कुछ कठिन है। कैल्विन यहाँ ``भविष्यद्वाणी की'' शब्द को दोहराता है, जो सम्भवतः सबसे अच्छी वाक्य-रचना होगी। मूलपाठ में ``भविष्यद्वाणी की'' से पहले एक {}ו है, जो उसे ``हुए हैं'' से जोड़ता है। तब मैं इसका अनुवाद इस प्रकार करूँगा, --- 8. जो भविष्यद्वक्ता आरम्भ से मुझ से और तुझ से पहले हुए हैं, और जिन्होंने बहुत-से देशों के विषय में और शक्तिशाली राज्यों के विरुद्ध भविष्यद्वाणी की है, उन्होंने युद्ध और अकाल और मरी की भविष्यद्वाणी की है। ऐसे भविष्यद्वक्ता भी थे जिन्होंने ``बहुत-से देशों के विषय में,'' इत्यादि भविष्यद्वाणी नहीं की; वह इनकी नहीं, वरन् उनकी चर्चा करता है जिन्होंने ऐसा किया था। --- सं.

198 यहाँ भूतकाल नहीं, वरन् भविष्यत्काल प्रयुक्त हुआ है, "जो भविष्यद्वक्ता कुशल की भविष्यद्वाणी करेगा," इत्यादि; वुल्गेट को छोड़ अन्य अनुवादों में ऐसा ही है। पिछले पद में यिर्मयाह उस बात की चर्चा करता है जो पहले के सब भविष्यद्वक्ताओं ने विभिन्न राज्यों के विषय में भविष्यद्वाणी की थी, अर्थात् युद्ध, अकाल और मरी की, और निःसन्देह यहूदा की भी, जो उनमें से एक था। अब इस पद में वह यह कहता प्रतीत होता है कि यदि कोई भविष्यद्वक्ता पहले के सब भविष्यद्वक्ताओं के विपरीत कोई भिन्न भाषा बोलता पाया जाए, तो केवल घटना, अर्थात् केवल उसकी भविष्यद्वाणी का पूरा होना, उसे सच्चा भविष्यद्वक्ता सिद्ध कर सकता है। वह संकेत करता है कि क्योंकि हनन्याह ने पहले के सब भविष्यद्वक्ताओं के विपरीत बातें कहीं, इसलिए जब तक उसकी कही बात पूरी न हो जाए, तब तक उस पर विश्वास न किया जाए। इस पद का अनुवाद यों किया जा सकता है, — 9. जो भविष्यद्वक्ता कुशल की भविष्यद्वाणी करेगा (या करता है), जब उस भविष्यद्वक्ता का वचन पूरा होगा, तब वह उस भविष्यद्वक्ता के रूप में जाना जाएगा जिसे यहोवा ने सचमुच भेजा है। पहला शब्द, "भविष्यद्वक्ता," स्वतन्त्र कर्ता कारक है, जिसके बहुत-से उदाहरण इब्रानी में पाए जाते हैं। — सं.

परन्तु मूसा के ही कहे हुए दो स्थल हैं जो पहली दृष्टि में एक दूसरे के विरोधी प्रतीत होते हैं। पहला हम व्यवस्थाविवरण 13 से उद्धृत कर चुके हैं; दूसरा हमें व्यवस्थाविवरण 18:18 में मिलता है, ``जिस भविष्यद्वक्ता ने वह बात कही जो सच निकली, उसे मैं ने भेजा है।''

वहाँ परमेश्वर उन्हें अपने विश्वासयोग्य दास मानता प्रतीत होता है जो सच्ची बात पहले से बताते हैं। परन्तु मूसा ने पहले ही लोगों को चेतावनी दी थी कि धोखेबाज़ भी कभी-कभी सच बोलते हैं, परन्तु इस कारण उन पर विश्वास नहीं करना चाहिए। परन्तु हमें वह बात स्मरण रखनी चाहिए जो परमेश्वर यशायाह के द्वारा बार-बार घोषित करता है, जब वह भविष्य की बातों का पूर्वज्ञान केवल अपने लिए दावा करता है; वह कहता है, ``जाओ, और पूछो कि क्या अन्यजातियों के देवता आनेवाली बातों के विषय में उत्तर देंगे।'' (यशायाह 44:7)

हम देखते हैं कि परमेश्वर यह विशेषता केवल अपने लिए ठहराता है कि वह भविष्य की घटनाओं को पहले से जानता है और उनके विषय में साक्षी देता है। और निश्चय ही इससे बढ़कर स्पष्ट कुछ नहीं हो सकता कि केवल परमेश्वर ही छिपी बातों के विषय में बोल सकता है: मनुष्य वास्तव में यह या वह अनुमान लगा सकते हैं, परन्तु वे प्रायः भूल करते हैं।

जहाँ तक शैतान की बात है, मैं उन सूक्ष्म विवेचनाओं को छोड़ देता हूँ जिनमें अगस्तीन ने विशेष रूप से अपने को थका डाला; क्योंकि सब बातों से बढ़कर उसने इस विषय पर परिश्रम किया कि दुष्टात्माएँ भविष्य और छिपी बातों को कैसे प्रकट करती हैं? जैसा मैंने कहा, उसने बहुत अधिक सूक्ष्म रीति से अटकलें लगाईं। परन्तु इस कठिनाई का समाधान, जहाँ तक अभी के विषय का सम्बन्ध है, सरलता से दिया जा सकता है। पहले हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि भविष्य की घटनाएँ केवल परमेश्वर के सिवाय और किसी के द्वारा जानी नहीं जा सकतीं, और इसलिए पूर्वज्ञान केवल उसी की विशेष सम्पत्ति है, यहाँ तक कि कोई भी भविष्य या छिपी बात उसके सिवाय और किसी के द्वारा पहले से बताई नहीं जा सकती। परन्तु फिर, इससे यह नहीं निकलता कि परमेश्वर शैतान और उसके सेवकों को कोई सच्ची बात पहले से बताने की छूट नहीं देता। कैसे? जैसा बिलाम के साथ हुआ, जो एक धोखेबाज़ था, और अपनी भविष्यद्वाणियों को भाड़े पर देने या बेचने को तैयार रहता था, जैसा सब जानते हैं, और तौभी वह भविष्यद्वक्ता था।

परन्तु बातों को पहले से बताना एक विशेष वरदान था: यह उसे कहाँ से मिला? शैतान से नहीं, सिवाय उतने के जितना परमेश्वर को भाया; और तौभी सत्य का स्वयं परमेश्वर और उसके आत्मा के सिवाय और कोई स्रोत न था। इसलिए जब शैतान कोई सच्ची बात बताता है, तो वह मानो बाहरी और आकस्मिक होती है।

अब, जैसा हमने कहा, कि परमेश्वर सत्य का स्रोत है, तो इससे यह निकलता है कि उसके भेजे हुए भविष्यद्वक्ता भूल नहीं कर सकते; क्योंकि वे अपनी बुलाहट की सीमाओं का उल्लंघन नहीं करते, और इसलिए छिपी बातों के विषय में झूठ नहीं बोलते; वरन् जब वे यह या वह घोषित करते हैं, तब वह उनका शिक्षक होता है। परन्तु ये पद, जैसा वे कहते हैं, परस्पर परिवर्तनीय नहीं हैं --- सच्ची बात पहले से बताना और सच्चा भविष्यद्वक्ता होना: क्योंकि कुछ लोग, जैसा मैंने कहा, ऐसी बातें पहले से बताते हैं जो बाद में परख और अनुभव से सच पाई जाती हैं, और तौभी वे धोखेबाज़ होते हैं; न ही परमेश्वर का व्यवस्थाविवरण के अठारहवें अध्याय में यह अभिप्राय था कि कोई निश्चित परिभाषा दे जिसके द्वारा उसके अपने भविष्यद्वक्ता पहचाने जाएँ; परन्तु क्योंकि उसने देखा कि इस्राएली बहुत अधिक भोले-भाले होंगे, यहाँ तक कि जो कुछ भी कहा जाए उसे लालच से पकड़ लेंगे, इसलिए उसने उस अतिरेक को रोकना और उस असंयमी उत्साह को सुधारना चाहा। इसलिए उसने उन्हें घटना की प्रतीक्षा करने की आज्ञा दी, मानो उसने कहा हो, ``यदि तुम्हारे बीच कोई उठे जो मेरे नाम से यह या वह प्रतिज्ञा करे, तो जो कुछ वे सुनाएँ उसे तुरन्त ग्रहण न करना; परन्तु घटना दिखा देगी कि मैं ने उन्हें भेजा है या नहीं।'' इसी प्रकार इस स्थान में भी यिर्मयाह कहता है कि परमेश्वर के सच्चे भविष्यद्वक्ताओं ने प्रभावशाली रूप से बात की थी, क्योंकि उन्होंने ऐसी किसी बात की भविष्यद्वाणी नहीं की थी जिसे परमेश्वर ने पक्का न किया हो और वास्तव में अपनी ओर से आई हुई सिद्ध न किया हो।

इसलिए हमें अधिकांश के विषय में यही समझना चाहिए, अर्थात् जो लोग सच्ची बातों की भविष्यद्वाणी करते हैं वे अधिकतर परमेश्वर के भविष्यद्वक्ता होते हैं: इसे सामान्य नियम के रूप में ग्रहण करना चाहिए। परन्तु इससे हम यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकते कि जितने लोग प्रत्यक्ष रूप से यह या वह भविष्यद्वाणी करते हैं, वे सब परमेश्वर के भेजे हुए हैं, और इस कारण जो कुछ वे सिखाते हैं वह सब सत्य है: क्योंकि एक ही विशेष भविष्यद्वाणी उस सब की सच्चाई को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त न होगी जो सिखाया और प्रचार किया जाता है।

इतना ही पर्याप्त है कि जब घटना मेल नहीं खाती, तब परमेश्वर उन लोगों की व्यर्थता को दोषी ठहराता है जो अपने ही मन से या अपनी ही बुद्धि से बोलते हैं। साथ ही वह इस प्रमाण के द्वारा अपने भविष्यद्वक्ताओं को पहचनवाता है,—कि जब वह उन बातों को पूरा करता है जिनकी उन्होंने भविष्यद्वाणी की थी, तब वह सचमुच दिखा देता है कि उसी ने उन्हें भेजा है। झूठे भविष्यद्वक्ताओं के विषय में एक विशेष कारण है कि परमेश्वर उन्हें इतनी छूट क्यों देता है, क्योंकि संसार ऐसे ही प्रतिफल के योग्य है, जब वह स्वेच्छा से धोखा खाने के लिए अपने आप को सौंप देता है। शैतान, जो झूठ का पिता है, मनुष्यों के लिए सब कहीं अपने फन्दे बिछाता है, और जो उनमें दौड़कर जा फँसते हैं और उसके काँटों पर अपने आप को डाल देना चाहते हैं, वे इस योग्य हैं कि झूठ की प्रतीति करने के लिए छोड़ दिए जाएँ, क्योंकि, जैसा पौलुस कहता है, वे सत्य की प्रतीति नहीं करेंगे। (2 थिस्सलुनीकियों 2:10, 11।)

अब हम देखते हैं कि यिर्मयाह का उद्देश्य क्या था: उसका अभिप्राय यह सिद्ध करना नहीं था कि जितनों ने कोई सच्ची बात की भविष्यद्वाणी की वे सब सच्चे भविष्यद्वक्ता थे, क्योंकि यह उसका विषय नहीं था; परन्तु उसने एक दूसरी बात उठाई,—कि जितनों ने यह या वह भविष्यद्वाणी की जो बाद में व्यर्थ पाई गई, वे इसी से झूठे ठहरे। अतः यदि किसी ने भविष्य की कोई बात कही और वह बात पूरी न हुई, तो यह उसकी ढिठाई का पर्याप्त प्रमाण था: इससे प्रकट हो गया कि वह, जैसा वह डींग मारता था, परमेश्वर का भेजा हुआ नहीं था। यही यिर्मयाह का उद्देश्य था, और वह इससे आगे नहीं गया; क्योंकि उसने इस प्रश्न पर विचार नहीं किया कि क्या वे सब जो सच्ची बातों की भविष्यद्वाणी करते थे ऊपर से भेजे गए थे, और क्या उनकी सब शिक्षाओं को माना जाए और बिना भेद किए उनकी प्रतीति की जाए; यह वह विषय नहीं था जिसे यिर्मयाह ने उठाया; परन्तु उसने दिखाया कि हनन्याह झूठा भविष्यद्वक्ता था, क्योंकि दो वर्ष के बाद यह स्पष्ट प्रकट हो जाता कि उसने व्यर्थ ही वह बात कही थी जो उसने परमेश्वर के आत्मा से नहीं पाई थी। और मूसा के ध्यान में भी यही बात थी, जैसा मैं पहले ही समझा चुका हूँ।

अब उन भविष्यद्वक्ताओं के विषय में, जो सब युगों में होते आए थे और जिन्होंने बहुत से देशों और बड़े-बड़े राज्यों के विषय में भविष्यद्वाणी की थी, उन्हें केवल सच्चे भविष्यद्वक्ता ही समझना चाहिए: क्योंकि यद्यपि अन्यजातियों में भी कुछ भविष्यद्वक्ता हुए थे, तौभी यिर्मयाह उन्हें इतने बड़े आदर के योग्य न समझता; और यदि वह इन व्यर्थ भविष्य बतानेवालों और सच्चे भविष्यद्वक्ताओं को एक ही श्रेणी में रखता, तो यह पवित्र और अपवित्र वस्तुओं को एक में मिला देना होता। परन्तु हम जानते हैं कि परमेश्वर के सब सेवकों ने अपना वचन चुनी हुई प्रजा की ओर ही लक्षित किया था, फिर भी वे परदेशी राज्यों और दूर-दूर के देशों के विषय में भी बोलते थे; और यह बात अकारण ही स्पष्ट रूप से नहीं कही गई; क्योंकि जब वे किसी राजसत्ता के विषय में बोलते थे, तब वे अपने आप से अनुमान नहीं लगा सकते थे कि क्या होगा: इसलिए आवश्यक था कि वे पवित्र आत्मा की प्रेरणा से ही इस प्रकार बोलें।

यदि मैं उचित से अधिक का दावा करना चाहूँ, और यह बहाना करूँ कि मुझ में भविष्यद्वाणी करने का कोई विशेष वरदान है, तो यदि मैं केवल एक ही नगर के विषय में, और अपनी आँखों के सामने खुली हुई परिस्थिति के विषय में बोलूँ, तो मैं उसकी अपेक्षा अधिक सहजता से झूठ बोल सकता और धोखा दे सकता हूँ, जितना कि यदि मैं अपनी भविष्यद्वाणियों को दूर-दूर के देशों तक फैलाऊँ: इसलिए जब यिर्मयाह कहता है कि भविष्यद्वक्ताओं ने अनेक और विशाल देशों के विषय में, और अत्यन्त शक्तिशाली राज्यों के विषय में कहा था, तो वह संकेत करता है कि उनकी भविष्यद्वाणियाँ मानवीय अनुमानों का फल नहीं मानी जा सकती थीं; क्योंकि चाहे किसी में बड़ी से बड़ी तीक्ष्ण बुद्धि हो, और चाहे वह समझ में स्वर्गदूतों से भी बढ़कर हो, तौभी वह यह नहीं बता सकता कि समुद्र पार के देशों में आगे क्या घटित होगा। परन्तु भविष्यद्वक्ताओं ने जो कुछ पहले से कहा था, उसे परमेश्वर ने समय की घटनाओं के द्वारा पुष्ट किया। अतः यह परिणाम निकलता है कि साथ ही उनकी बुलाहट भी पुष्ट हो गई; अर्थात् जब परमेश्वर ने मानो स्वर्ग से उस बात पर मुहर लगा दी जो उन्होंने पृथ्वी पर कही थी।

इसलिए चाहे भविष्यद्वक्ताओं ने शान्ति के, अर्थात् समृद्धि के विषय में कहा हो, चाहे युद्ध, अकाल और मरी के विषय में, जब अनुभव ने उनके कहे को सत्य सिद्ध किया, तब साथ ही उनका अपना अधिकार भी पुष्ट हो गया, मानो परमेश्वर ने दिखा दिया हो कि वे उसी के भेजे हुए थे।

हमें {,}באמתbeamet शब्द पर भी ध्यान देना चाहिए; वह कहता है कि परमेश्वर ने उन्हें सच्चाई से भेजा था। यहाँ वह उस ढिठाई को दोषी ठहराता है जो छली लोग सदा धारण करते हैं; क्योंकि भेजे जाने की डींग मारने में वे परमेश्वर के विश्वासयोग्य सेवकों से भी बढ़ जाते हैं। अतः जब वे इस प्रकार उद्दण्ड थे, और अपने पद पर बुलाए जाने का झूठा दिखावा करके असावधान मनुष्यों को धोखा देते थे, तब भविष्यद्वक्ता ने यहाँ यह वाक्यांश जोड़ा, जिससे संकेत होता है कि वे सब सच्चाई से नहीं भेजे गए थे। इस प्रकार उसने इन सिद्धान्तहीन मनुष्यों को एक प्रकार की बुलाहट तो मान ली, परन्तु फिर भी दिखा दिया कि वे परमेश्वर के सेवकों से कितने भिन्न थे, जिनकी बुलाहट पर स्वयं परमेश्वर ने मुहर लगाई थी। आगे लिखा है,—

यिर्मयाह 28:10-11

10. तब हनन्याह भविष्यद्वक्ता ने उस जूए को यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता की गर्दन पर से उतारकर तोड़ दिया।

10. Et abstulit Chananias propheta ligamen illud (vinculum) e collo Jeremiae prophetae, et confregit illud.

11. और हनन्याह ने सब लोगों के सामने कहा, यहोवा यों कहता है, कि इसी प्रकार मैं पूरे दो वर्ष के भीतर बाबुल के राजा नबूकदनेस्सर के जूए को सब जातियों की गर्दन पर से उतारकर तोड़ दूँगा। तब यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता अपना मार्ग लेकर चला गया।

11. Et dixit Chananias in oculis totius populi (hoc est, coram toto populo loquutus est,) dicendo, Sic dicit Jehova, In hunc modum confringam jugum Nebuchadnezer, regis Babylonii cum adhuc (id est simulae) fuerunt duo anni dierum e collo omnium gentium: et profectus est Jeremias propheta per viam suam.

उस छली के लिए इतना पर्याप्त न था कि वह परमेश्वर के पवित्र सेवक का उसके मुँह पर विरोध करे, जब तक कि वह उस दृश्य चिह्न पर भी अपवित्र हाथ न डाले, जिसके द्वारा परमेश्वर को यह प्रमाणित करना भाया था कि भविष्यद्वक्ता का सन्देश सच्चा है। क्योंकि लोगों की ऐसी सुस्ती, वरन ऐसी जड़ता थी, कि वे शब्दों से अधिक प्रभावित नहीं हो सकते थे; इसलिए परमेश्वर ने एक चिह्न भी जोड़ दिया, क्योंकि यिर्मयाह अपनी गर्दन पर रस्सियाँ या बन्धन पहने फिरता था: और यह मनुष्यों के सामने निन्दा का चिह्न था, तौभी लोगों के मन को छूने के लिए उसने उस निन्दा को सहने से इनकार नहीं किया।

अतः यिर्मयाह की गर्दन पर का बन्धन एक संस्कार के समान था; क्योंकि वह उसके सन्देश की विश्वसनीयता स्थापित करने के लिए एक दृश्य चिह्न था। और हनन्याह ने क्या किया? यिर्मयाह के विरुद्ध उद्दण्डता से बोलने और लोगों को दो वर्ष के बाद छुटकारे की प्रतिज्ञा देने के बाद, उसने उस रस्सी या बन्धन को, जो यिर्मयाह अपनी गर्दन पर पहने था, बलपूर्वक उतारकर तोड़ डाला।

इससे हम देखते हैं कि जिन्हें शैतान उकसाता है उनका क्रोध कितना बड़ा और कितना प्रचण्ड होता है: क्योंकि जब वे एक बार ढिठाई की उस सीमा तक पहुँच जाते हैं कि परमेश्वर के वचन का विरोध करने का, और यदि सम्भव हो तो उसे उसके अपने सिंहासन से गिरा देने का साहस करते हैं, तब वे उसकी सामर्थ और महिमा के किसी भी चिह्न को नहीं छोड़ते। हमें हनन्याह के इस पागलपन पर विशेष ध्यान देना चाहिए; क्योंकि उसने न केवल परमेश्वर के सेवक का विरोध किया, और उसकी भविष्यद्वाणी को उलट देने का यत्न किया, वरन उन बन्धनों को भी छीन लिया, जिससे वह सच्चे संस्कार के विरोध में शैतान का झूठ खड़ा करे। यह चिह्न, जैसा हम कह चुके हैं, उस भविष्यद्वाणी को पुष्ट करने के लिए था जिसे हम सुन चुके हैं; परन्तु हनन्याह ने क्या किया? उसने न केवल उस चिह्न को हटा दिया, वरन बन्धनों को तोड़कर मनुष्यों का ध्यान अपनी ओर खींचा, और ऐसे प्रदर्शन के द्वारा उन्हें यह विश्वास दिलाया कि दो वर्ष में छुटकारा होगा। अतः हनन्याह ने अपना उन्मत्त जोश दो प्रकार से प्रकट किया; क्योंकि उसने उस चिह्न को अपवित्र किया जिसे यिर्मयाह ने परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार अपनाया था, और उसने उसे हटा भी दिया, मानो वह परमेश्वर से ऊपर होना और उसकी सच्चाई को उलट देना चाहता हो, और उस पर जय मनाना चाहता हो।

यही बात हम आज पोपतन्त्र में होती हुई देखते हैं: क्योंकि हम जानते हैं कि जो कुछ मसीह ने आज्ञा दी थी, उसे उन्होंने या तो बिगाड़ दिया है, या धुँधला कर दिया है, या मिटा डाला है; और उन्होंने गढ़े हुए संस्कार और असंख्य आडम्बरपूर्ण विधियाँ भी रच ली हैं, जिनके द्वारा वे मूर्ख और भोले-भाले मनुष्यों को मोहित करते हैं। हनन्याह ने भी यही किया; और इसलिए पोपवादी उसके चेले और अनुकरण करनेवाले हैं; जो न केवल परमेश्वर की ओर से आई हुई गवाहियों को ठुकराते या घटाते हैं, वरन अहंकार से अपनी ही युक्तियों और गढ़ी हुई बातों को आगे लाकर उसके संस्कारों का खुला अनादर करते हैं।

हमें यह भी देखना चाहिए कि इस छली ने कितनी चतुराई से अपने आप को लोगों के मन में बैठाया; क्योंकि वह परमेश्वर के सच्चे भविष्यद्वक्ताओं का अनुकरण करता हुआ दिखाई देता था, क्योंकि उसने लोगों के सामने एक चिह्न रखा, और फिर उसके साथ शिक्षा जोड़ी। पोपवादियों के पास अपने खोखले चिह्न हैं, परन्तु वे केवल आँखों को प्रसन्न करते हैं, जबकि कानों की उन्हें कोई चिन्ता या परवाह नहीं। परन्तु हनन्याह परमेश्वर के सेवकों के और भी निकट आ गया, ताकि वह उन लोगों को भी धोखा दे सके जो मूर्ख न थे। सचमुच, इस मनुष्य में हम इससे अधिक और क्या चाह सकते थे कि वह एक चिह्न प्रस्तुत करे? उसने परमेश्वर का नाम भी जोड़ा और बताया कि उसका अभिप्राय क्या था, इसी प्रकार मैं नबूकदनेस्सर के जूए को तोड़ूँगा: और उसने अपने नाम से नहीं कहा, वरन परमेश्वर का रूप धारण किया, यहोवा यों कहता है, मैं नबूकदनेस्सर के जूए को तोड़ूँगा।

परन्तु जैसा हम अन्यत्र कह चुके हैं, शैतान का यह उलटा अनुकरण भक्त मनों को विचलित न करे; क्योंकि परमेश्वर अपने लोगों को सदा विवेक की आत्मा प्रदान करता है, यदि वे नम्रता से उससे प्रार्थना करें। और इसलिए जब-जब यिर्मयाह ने भविष्यद्वक्ता शब्द को दोहराया, जिसे उसने हनन्याह के लिए स्वीकार कर लिया, क्योंकि हनन्याह स्वयं यह नाम धारण करता था, क्योंकि जब-जब वह हनन्याह के विषय में बोला, उसने उसे इसी नाम से सम्मानित किया, अर्थात् कि वह भविष्यद्वक्ता था,—तब वह पवित्र जन इस बात से अनजान न था कि यह कितनी बड़ी ठोकर का कारण था, जब कोई भविष्यद्वक्ता, जो परमेश्वर की कलीसिया में ऐसा माना जाता है, फिर भी शैतान का सेवक, झूठा और छली हो। परन्तु उसका उद्देश्य हमें समय रहते चेतावनी देना था, ताकि जब कोई भविष्यद्वक्ता की उपाधि की डींग मारे, तो नई बात हमें भयभीत न कर दे। इसी प्रकार पोपवादी डींग मारते हैं कि वे धर्माध्यक्ष और बिशप हैं, और घमण्ड करते हैं कि वे प्रेरितों के उत्तराधिकारी हैं: परन्तु उनका प्रधान शैतान है, जो अपने आप को पृथ्वी पर मसीह का प्रतिनिधि कहता है। अतः यिर्मयाह ने जान-बूझकर हनन्याह को इतनी बार भविष्यद्वक्ता कहा, ताकि जब हमारे साथ ऐसी कोई बात हो, तो हमारा विश्वास डगमगा न जाए, मानो कोई नई बात घटित हुई हो। आज मैं इस पद के अन्तिम भाग को समाप्त नहीं कर सकता।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वर दे कि जब तू हमारे विश्वास की दृढ़ता को इस प्रकार परखना चाहता है कि शैतान को अपने झूठ को तेरे पवित्र सत्य में मिलाने की अनुमति देता है, तब भी हम उनमें उलझ न जाएँ, वरन उस ज्योति की ओर ध्यान लगाए रहें जिसे तू हमारे सामने रखता है, और जिसके द्वारा तू हमें उद्धार के मार्ग पर ले चलता है; और हम सीखने की नम्र आत्मा में अपने आप को इस प्रकार तेरे शासन के अधीन सौंप दें, कि तू भी हमारा विश्वासयोग्य और अचूक अगुवा बन जाए, जब तक कि हम अन्त में उस अनन्त जीवन को प्राप्त न कर लें, जो तेरे एकलौते पुत्र के लहू के द्वारा हमारे लिए प्राप्त किया गया है।—आमीन।

एक सौ आठवाँ व्याख्यान

हनन्याह ने यिर्मयाह के बन्धन तोड़ने के बाद भविष्यद्वाणी की कि परमेश्वर यहूदियों को और अन्य जातियों को भी राजा नबूकदनेस्सर के जूए के नीचे से छुड़ाएगा; और अन्त में यह जोड़ा गया है कि यिर्मयाह अपना मार्ग लेकर चला गया; इन शब्दों से भविष्यद्वक्ता संकेत करता है कि उसने वह स्थान छोड़ दिया, क्योंकि वह एक उग्र मनुष्य से, वरन एक वन-पशु से, झगड़ालू ढंग से विवाद करना नहीं चाहता था; क्योंकि यह सम्भव है, वरन निश्चित रूप से निष्कर्ष निकाला जा सकता है, कि मन्दिर में हनन्याह का बड़ा प्रभाव था, क्योंकि उसकी भविष्यद्वाणियाँ मनभावनी थीं। क्योंकि मनुष्य सदा चापलूसी ढूँढ़ते हैं, इसलिए जब उन्होंने सुना कि उनसे वही बात प्रतिज्ञा की जा रही है जो विशेष रूप से वांछनीय थी, अर्थात् दो वर्ष के बाद उनकी सब विपत्तियों और संकटों का अन्त, तब उन सब ने उस छली की कही हुई बात को लालच से ग्रहण कर लिया। इसके अतिरिक्त, यिर्मयाह के विरुद्ध न केवल उसकी जीभ लड़ी, वरन उसके हाथ भी, क्योंकि जब उसने उस पवित्र जन के बन्धन तोड़े तब उसने उस पर बलपूर्वक आक्रमण किया। इसलिए यिर्मयाह इसके सिवा और कुछ नहीं कर सकता था कि मानो आँधी से हटकर एक ओर हो जाए; और उसने यह भय के कारण नहीं किया, परन्तु इसलिए कि उसने देखा कि वाद-विवाद में उसका विरोधी उस पर भारी पड़ेगा, और न उसे यह आशा थी कि शोर और कोलाहल के बीच उसकी सुनी जाएगी; क्योंकि उसने देखा कि यदि वह बोलना आरम्भ करे तो तुरन्त बड़ा उपद्रव मच जाएगा। इसलिए उसने लोगों के बीच से हट जाना आवश्यक समझा।

इससे हमें स्मरण दिलाया जाता है कि हमें बुद्धिमानी से विचार करना चाहिए कि अवसर क्या माँगते हैं; क्योंकि सदा और सब कहीं बोलना न तो उचित है और न लाभदायक। इसलिए जब प्रभु हमारा मुँह खोलता है, तब कोई भी कठिनाई हमें ऐसा न रोके कि हम हियाव से न बोलें; परन्तु जब भलाई करने की कोई आशा न हो, तब कभी-कभी किसी लाभ के बिना एक बड़ी भीड़ को भड़काने की अपेक्षा चुप रहना अच्छा है। पौलुस का यह कथन तो सचमुच सत्य है कि हमें असमय भी तत्पर रहना चाहिए, (2 तीमुथियुस 4:2;) परन्तु उसका अर्थ यह है कि मसीह के सेवक, यद्यपि वे कभी-कभी बहुतों के मन को ठेस पहुँचाएँ और चिढ़ाएँ, तौभी उन्हें रुकना नहीं, वरन लगे रहना चाहिए। परन्तु यिर्मयाह के कोई सुननेवाले न थे, और सारी प्रजा इतनी भड़की हुई थी कि यदि वह अपने आप को मृत्यु के मुँह में भी डाल देता, तौभी उस छली के विरुद्ध कुछ न कर सकता। इसलिए वह चुप रहा, क्योंकि वह अपने पद के कर्तव्यों को पहले ही पूरा कर चुका था; उसने इसलिए भी हट जाना उचित समझा होगा कि वह नए सन्देशों से सुसज्जित होकर, और इस प्रकार नए अधिकार से युक्त होकर आए, जैसा कि वास्तव में आगे की बातों से प्रकट होता है,—

यिर्मयाह 28:12-13

12. जब हनन्याह भविष्यद्वक्ता ने यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता की गर्दन पर से जूआ उतारकर तोड़ दिया, उसके बाद यहोवा का यह वचन यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता के पास पहुँचा,

12. Et fuit sermo Jehovae ad Jeremiam, postquam confregit Chananiah propheta jugum (aut, vinculum) e collo Jeremiae prophetae, dicendo,

13. जाकर हनन्याह से यह कह, यहोवा यों कहता है, कि तू ने काठ के जूए तो तोड़ दिए; परन्तु तू उनकी सन्ती लोहे के जूए बनाएगा।

13. Vade et loquere cum Chanania, dicendo, (alloquere Chananiam, dicendo,) Sic dicit jehova, Vincula lignea fregisti; fac autem tibi loco illorum vincula ferrea.

इससे प्रकट होता है कि यिर्मयाह केवल प्रजा के सामान्य हित का ध्यान रखता था, और उसने बुद्धिमानी से कुछ समय तक चुप्पी साधी, ताकि वह सूअरों के आगे मोती न डाले, और इस प्रकार एक रीति से परमेश्वर के पवित्र नाम को दुष्टों की उद्दण्डता के आगे न खोल दे। इसलिए वह तब तक ठहरा रहा जब तक कि वह नए सन्देशों के साथ फिर निकल न सके, और इस प्रकार अपने लिए अधिक विश्वसनीयता प्राप्त न कर ले। क्योंकि यदि वह हनन्याह से और अधिक विवाद करता, तो चारों ओर झगड़े भड़क उठते, कोलाहल में कोई सुनवाई न होती, और यहूदी उस समय उसकी कही किसी भी बात की पूरी तरह उपेक्षा कर देते। परन्तु जब वह भीड़ से हट गया था, और बाद में परमेश्वर की ओर से भेजा गया, तब यहूदी उसका या उसकी शिक्षा का इतनी ढिठाई से तिरस्कार नहीं कर सकते थे। अतः यही कारण था कि वह थोड़े समय के लिए चुप रहा।

यदि वह इन उपद्रवों के बीच डरा और काँपा, तो परमेश्वर ने ठीक समय पर उसे नई आज्ञाएँ देकर दृढ़ किया: वह कहता है, यहोवा का वचन यिर्मयाह के पास पहुँचा, जब हनन्याह ने उसकी गर्दन पर से बन्धन तोड़ डाला। इन शब्दों से वह संकेत करता है कि दुष्ट लोग, चाहे वे परमेश्वर के विरुद्ध कितनी भी उद्दण्डता से उठें, सदा लज्जा और निन्दा के साथ ही विदा होते हैं। क्योंकि हनन्याह ने न केवल अपने शब्दों और अपनी जीभ से यिर्मयाह का विरोध किया था, वरन उसकी गर्दन पर से रस्सियाँ या बन्धन भी तोड़ डाले थे। अतः भविष्यद्वक्ता अब इसे इसलिए दोहराता है कि वह मानो उँगली से दिखा दे कि हनन्याह ने अपनी ढिठाई से कुछ भी नहीं पाया, सिवाय इसके कि उसने अपनी व्यर्थता को और अधिक कुख्यात कर दिया।

अब जब वह कहता है, जाकर हनन्याह से बोल, और कह, यहोवा यों कहता है, तू ने काठ के बन्धन तोड़ दिए; परन्तु अपने लिए लोहे के बन्धन बना; तो यह एक अधूरा-सा वाक्य है; यिर्मयाह एक ही बात पर स्थिर नहीं रहता; क्योंकि पहले वाक्यांश में वह बताता है कि उसे हनन्याह से क्या कहने की आज्ञा दी गई थी; और दूसरे में वह बताता है कि परमेश्वर ने उसे क्या करने की आज्ञा दी थी, अर्थात् लोहे के बन्धन। परन्तु अर्थ के विषय में कोई अस्पष्टता नहीं है; क्योंकि निःसन्देह भविष्यद्वक्ता अपने शब्दों को इस प्रकार क्रम दे सकता था, "तू ने मेरी गर्दन पर से बन्धन तोड़ दिए; परन्तु परमेश्वर ने मुझे लोहे के नए बन्धन बनाने की आज्ञा दी है।" अतः यद्यपि यिर्मयाह यहाँ हमें केवल इतना ही बताता है कि परमेश्वर ने उसे लोहे के बन्धन बनाने की आज्ञा दी, तौभी सहज ही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जब उसने काठ के बन्धनों के विषय में कहा, तब साथ ही उसने वह बात भी जोड़ी जो वह लोहे के बन्धनों के विषय में बताता है, परन्तु एक भिन्न सम्बन्ध में। अब व्याख्या आती है,—

199 ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ सच्चा पाठ केवल सेप्टुआजिन्ट (Sept.) ने ही सुरक्षित रखा है, जहाँ "बनाना" क्रिया उत्तम पुरुष में दी गई है; अन्तर केवल {;{י के जोड़ने का है; तब वाक्य यह होगा,— काठ के जूए तो तू ने तोड़ दिए, परन्तु मैं ने उनकी सन्ती लोहे के जूए बना दिए हैं। अथवा यदि वाव को परिवर्तक (conversive) माना जाए, तो पंक्ति यह होगी,— परन्तु मैं उनकी सन्ती लोहे के जूए बनाऊँगा। किसी खण्ड की आवश्यकता हमारी सबसे अच्छी मार्गदर्शकों में से एक है।— सं.

यिर्मयाह 28:14

14. क्योंकि इस्राएल का परमेश्वर, सेनाओं का यहोवा यों कहता है, मैं ने इन सब जातियों की गर्दन पर लोहे का जूआ रखा है, कि वे बाबुल के राजा नबूकदनेस्सर के अधीन रहें; और वे उसके अधीन रहेंगी: और मैं ने मैदान के जीवजन्तु भी उसे दे दिए हैं।

14. Quoniam sic dicit Jehova exercituum, Deus Israel, jugum ferreum imposui super collum omnium gentium istorum, ut serviant Nevuchadnezer, regi Babylonis, et servient ei, atque etiam bestiam agri dedi illi.

यदि यिर्मयाह केवल अपनी गर्दन पर लोहे का बन्धन ही लेकर आता, तो यह एक व्यर्थ तमाशा होता; परन्तु जब उसने उस चिह्न की व्याख्या भी जोड़ दी, तो निःसन्देह उसने बहुतों को अपनी भविष्यद्वाणी की प्रतीति करने के लिए राज़ी कर लिया, और उन्हें निरुत्तर ठहराया जिन्होंने अपनी दुष्टता में अपने आप को कठोर कर लिया था। परन्तु यह ध्यान देने योग्य है कि परमेश्वर ने काठ के बन्धनों के स्थान पर लोहे के बन्धन रखे; और उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि सारी प्रजा ने अपनी मूर्खतापूर्ण और दुष्ट सहमति से उस छली के पागलपन का समर्थन किया था, जिसने उस चिह्न को अपवित्र करने का साहस किया था जिसके द्वारा परमेश्वर ने प्रमाणित किया था कि वह व्यर्थ नहीं, वरन गम्भीरता से अपने सेवक के मुँह से बोल रहा था।

इससे एक लाभदायक शिक्षा निकाली जा सकती है,—कि दुष्ट लोग परमेश्वर के विरुद्ध भौंककर कुछ नहीं पाते, सिवाय इसके कि वे उसके क्रोध को और अधिक भड़काते हैं, और इस प्रकार अपनी विपत्तियों को दुगना कर लेते हैं, उस कुत्ते के समान जो फन्दे में फँसकर हठपूर्वक उससे छूटने और उसे झटक देने का यत्न करता है, और इस प्रकार अपना ही गला घोंट लेता है। इसी प्रकार दुष्ट लोग जितना अधिक परमेश्वर का विरोध करते हैं, उतना ही भारी दण्ड अपने ऊपर लाते हैं। और इसलिए जब कभी परमेश्वर हमसे कहता है कि वह हमारे पापों से अप्रसन्न है, तब हमें सावधान रहना चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि जब हम काठ के बन्धन तोड़ने का यत्न करें, तब वह हमारे लिए लोहे के बन्धन तैयार कर और गढ़ रहा हो। हमारी दशा सदा बिगड़ती ही जाएगी, जब तक कि परमेश्वर का क्रोध प्रकट होते ही हम नम्रता से उसके टल जाने की विनती न करें, और जब वह हमारे अपराधों के लिए हमें ताड़ना दे, तब धीरज से उसकी कोड़ों के अधीन न हो जाएँ। अतः काठ और लोहे के बन्धनों के विषय में हमें यह बात स्मरण रखनी चाहिए।

वह आगे कहता है, इन सब जातियों की गर्दन पर। यहूदी, जैसा बताया जा चुका है, आशा करते थे कि नबूकदनेस्सर क्षण भर में फरात के पार खदेड़ दिया जा सकता है, और उसे उन दूसरे देशों को भी छोड़ना पड़ेगा जिन पर उसने अधिकार कर लिया था; और आसपास की सब जातियों ने षड्यन्त्र रचा था, और इधर-उधर दूत भेजे थे; और जब एमोरियों, मोआबियों और अन्य जातियों ने यहूदियों को प्रोत्साहन दिया, तब उन्होंने भी बदले में दूसरों को उभारा, ताकि वे सब मिलकर बाबुलियों पर आक्रमण करें। अतः जब ऐसे गुप्त षड्यन्त्र ने यहूदियों को साहस दिया, तो यही कारण था कि भविष्यद्वक्ता ने अन्य जातियों के विषय में कहा। वह कहता है, और वे उसके अधीन रहेंगी। उसने सचमुच इन सब देशों को पहले ही वश में कर लिया था; परन्तु भविष्यद्वक्ता का अर्थ यह है कि बाबुल के राजा का प्रभुत्व बना रहेगा, यद्यपि हनन्याह ने कहा था कि वह केवल दो वर्ष तक ही टिकेगा। अतः स्थायित्व को अल्पकाल के विरोध में रखा गया है, मानो भविष्यद्वक्ता ने कहा हो, "जातियाँ चाहे जितना कुढ़ें और झुँझलाएँ, परन्तु वे राजा नबूकदनेस्सर के जूए के नीचे बनी रहेंगी, और व्यर्थ ही वे अपने आप को छुड़ाने का यत्न करेंगी, क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें दासत्व में सौंप दिया है।"

इस दासत्व की व्याख्या साथ ही एक दूसरी रीति से भी की जा सकती है; इन जातियों की दशा तब तक सहने योग्य थी जब तक नबूकदनेस्सर केवल कर चुकाने की आज्ञा देता था; और जब वह अपने अधिपतियों को भेजता था, तो उसका उद्देश्य अपना अधिकार बनाए रखने के सिवा और कुछ न था; परन्तु जब उसने पाया कि वे कठोर दासत्व के बिना और किसी रीति से वश में नहीं किए जा सकते, तब वह बड़ा अत्याचार करने लगा, यद्यपि पहले वह सहने योग्य स्वामी रहा था। यही बात यहूदियों के विषय में भी कही जा सकती है; क्योंकि हम जानते हैं कि वे बाबुल के राजा को कर देनेवाले रहे थे; और जब तक उसने उन पर दया की, तब तक उसकी उदारता को एक प्रकार की स्वतन्त्रता समझा जा सकता था; परन्तु जब उसने पाया कि कठोर लकड़ी कठोर फन्नी के बिना नहीं चिर सकती, तब वह उन पर और अधिक कठोरता से अत्याचार करने लगा। तभी वह दासत्व आरम्भ हुआ जिसका यहाँ उल्लेख है। अतः यहूदी तभी वास्तव में बाबुल के राजा के अधीन होने लगे, जब उसने देखा कि वे उस सहने योग्य जूए को सहन नहीं करेंगे जो उसने उन पर रखा था, वरन अपने हठ और घमण्ड में सदा उसके विरुद्ध संघर्ष करते रहेंगे।

भविष्यद्वक्ता आगे कहता है, मैं ने मैदान के जीवजन्तु भी उसे दे दिए हैं। इन शब्दों से वह परोक्ष रूप से यहूदियों को, जैसा हम पहले स्मरण दिला चुके हैं, उनकी हठीली दुष्टता के लिए उलाहना देता है, क्योंकि उन्होंने यह नहीं पहचाना कि यह परमेश्वर का धर्ममय न्याय था कि नबूकदनेस्सर एक विजेता के रूप में उन पर व्यवस्थाएँ थोपता था; क्योंकि, जैसा मूसा ने कहा है, यदि वे अपने आप को उससे वंचित न करते, तो एक स्वर्गीय सहायता के द्वारा उनकी रक्षा होती। (व्यवस्थाविवरण 29:25।) अतः क्योंकि उन्होंने बहुत समय से परमेश्वर की सुरक्षा को ठुकरा दिया था, इसी कारण नबूकदनेस्सर ने उनके देश पर चढ़ाई की और उन्हें जीत लिया। जब वे अब भी अपनी लगाम को काटते और चबाते रहे, तब भविष्यद्वक्ता उनके पागलपन को उघाड़ देता है; क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के सामर्थी हाथ के नीचे अपने आप को दीन नहीं किया, जबकि बुद्धि और समझ से रहित वन-पशुओं ने भी जान लिया कि यह परमेश्वर के गुप्त और अद्भुत विधान के द्वारा हुआ कि नबूकदनेस्सर ने इन देशों पर अधिकार कर लिया। अतः यही कारण है कि भविष्यद्वक्ता ने स्पष्ट रूप से वन-पशुओं का उल्लेख किया, मानो उसने कहा हो कि यहूदी इतने हठीले थे कि उनमें सिंहों, भालुओं और ऐसे ही पशुओं से भी कम विवेक, दीनता और चिन्ता थी; क्योंकि परमेश्वर की गुप्त प्रेरणा से वन-पशु तो राजा नबूकदनेस्सर के अधिकार के अधीन हो गए, जबकि यहूदी और भी अधिक उद्दण्ड होते गए। जब जंगली और हिंसक पशुओं के द्वारा यह किया जा रहा था, तब परमेश्वर के न्याय को स्वीकार न करना पराकाष्ठा का पागलपन था। आगे लिखा है,—

यिर्मयाह 28:15

15. तब यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता ने हनन्याह भविष्यद्वक्ता से कहा, हे हनन्याह, सुन ले; यहोवा ने तुझे नहीं भेजा; परन्तु तू इन लोगों को झूठ पर भरोसा दिलाता है।

15. Et dixit jeremias propheta Chananiae prophetae, Audi agedum Chanania, non misit to Jehova, et tu confidere fecisti populum hunc super mendacio (vel, in mendacio.)

यदि यिर्मयाह अपने विरोधी का सामना न करता, तो उसकी सीधी-सादी शिक्षा में पर्याप्त बल न होता, जैसा कि आज हमारे साथ भी होता है; जब उद्दण्ड और सिद्धान्तहीन मनुष्य उठ खड़े होते हैं और अपनी निन्दा की बातें उगलने का साहस करते हैं, जिनके द्वारा वे सच्चे धर्म की शिक्षाओं को धुँधला और हीन करते हैं, तब हम उनसे संघर्ष करने के लिए विवश होते हैं, नहीं तो जो कुछ हम सिखाते हैं वह निष्फल हो जाएगा; क्योंकि बहुतों के मन, मेरा अभिप्राय भोले लोगों से है, जब वे दो विरोधी पक्षों के बीच बड़ा संघर्ष देखते हैं, तब असमंजस में पड़ जाते और डगमगाते हैं। इसलिए उस पवित्र जन के लिए आवश्यक था कि वह हनन्याह के झूठ को उघाड़ दे, क्योंकि वह सदा अपनी बड़ाई करता और अपनी भविष्यद्वाणियों पर घमण्ड करता था।

परन्तु यिर्मयाह ने क्या कहा? यहोवा ने तुझे नहीं भेजा। जब कभी हम शैतान के सेवकों और झूठे शिक्षकों से संघर्ष करें, तब इस खण्डन पर ध्यान देना चाहिए; क्योंकि वे चाहे जो बहाना करें, और चाहे जिन मुखौटों से अपने झूठ को ढाँपें, उनकी डींगों का अन्त करने के लिए यह एक ही बात पर्याप्त से भी अधिक होनी चाहिए,—कि वे प्रभु के भेजे हुए नहीं हैं। यिर्मयाह एक लम्बे भाषण में हनन्याह से विवाद कर सकता था, क्योंकि पवित्र आत्मा के सुझाने और इस विषय पर जो कुछ आवश्यक था उसे बोलवाने के द्वारा वह पर्याप्त रूप से वाक्पटु बनाया जा सकता था; परन्तु इस सधी हुई संक्षिप्तता ने उससे कहीं अधिक प्रभाव उत्पन्न किया जितना कि यदि वह बड़ा प्रदर्शन करता और बहुत से शब्दों का प्रयोग करता। अतः यह बात स्मरण रखी जाए कि जहाँ कहीं धर्म के विषय में विवाद हो, वहाँ हमें सदा पूछना चाहिए कि जो बोल रहा है क्या वह परमेश्वर का भेजा हुआ है; क्योंकि वह चाहे जो बकवास करे, चाहे वह अत्यन्त तीक्ष्ण बुद्धिवाला हो, और चाहे वह ऐसी बातें कहे जो भोले लोगों के मन को आश्चर्य से भर दें, तौभी जब उसकी शिक्षा परमेश्वर की ओर से नहीं है, तब यह सब धुएँ के सिवा और कुछ नहीं। इसी प्रकार आज हमें भी पोप के उन भाड़े के कुत्तों से संक्षेप में निपटना चाहिए जो सुसमाचार के शुद्ध सत्य के विरुद्ध भौंकते हैं; हमें इस संक्षिप्त उत्तर से सन्तुष्ट रहना चाहिए,—कि परमेश्वर उनका स्वामी और शिक्षक नहीं है। परन्तु क्योंकि हमारी दशा अब प्राचीन प्रजा की दशा से भिन्न है, इसलिए हमें ध्यान रखना चाहिए कि प्रभु का भेजा हुआ केवल वही है जिसकी शिक्षा व्यवस्था, भविष्यद्वक्ताओं और सुसमाचार के नियम के अनुसार है।

अतः यदि हम जानना चाहते हैं कि प्रभु ने किसे भेजा है, और वह किन्हें अपने सेवकों के रूप में स्वीकार करता है, तो आओ, हम पवित्रशास्त्र के पास आएँ, और पूरी-पूरी जाँच हो; जो व्यवस्था, भविष्यद्वक्ताओं और सुसमाचार के अनुसार बोलता है, उसके पास अपनी ईश्वरीय बुलाहट का निश्चित और निःसन्देह प्रमाण है; परन्तु जो यह सिद्ध नहीं कर सकता कि जो कुछ वह प्रस्तुत करता है उसे वह इन्हीं सोतों से निकालता है, वह चाहे जो दिखावा करे, उसे झूठा भविष्यद्वक्ता मानकर ठुकरा देना चाहिए। इससे हम देखते हैं कि इस खण्ड में कितनी महत्वपूर्ण शिक्षा निहित है।

फिर वह आगे कहता है, तू ने इन लोगों को झूठ पर भरोसा दिलाया है। जो लोग इन शब्दों का यह अनुवाद करते हैं, "तू ने झूठ-मूठ इन लोगों को निश्चिन्त कर दिया है," वे भविष्यद्वक्ता के अर्थ को बिगाड़ते हैं, कम से कम वे उस बात को आधा घटा देते हैं जो भविष्यद्वक्ता व्यक्त करना चाहता था; क्योंकि हनन्याह को केवल इसलिए दोषी नहीं ठहराया गया कि उसने व्यर्थ और झूठ-मूठ परमेश्वर के नाम का बहाना किया, वरन {,}שקרshicor शब्द लाया गया है, जो ठीक वही वस्तु है जिसका प्रयोग किया गया; मानो उसने कहा हो, "तू इन लोगों को एक व्यर्थ आशा से खिलाता है जिसे तू ने अपनी ही बुद्धि में गढ़ा है; इसलिए तेरी कल्पनाएँ इन लोगों को भटकाती हैं।"

अतः यिर्मयाह ने इस छली पर केवल यही दोष नहीं लगाया कि वह अपनी कल्पनाओं से लोगों को धोखा देता था, वरन यह भी कि वह अपनी भविष्यद्वाणियाँ परमेश्वर के नाम से प्रस्तुत करता था; और इन्होंने उनका भय दूर कर दिया और उन्हें कुछ आशा दे दी, यहाँ तक कि लोग अपनी निश्चिन्तता में जड़ हो गए।

आओ, हम इस खण्ड से सीखें कि जब भरोसे के आधार का विषय हो, तब हमें विशेष रूप से सावधान रहना चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि हम किसी खोखली या नाशवान वस्तु पर भरोसा करें, उन अभागे कपटियों के समान जो केवल छायाओं को निगलते हैं, और बाद में अपनी कल्पनाओं में कुछ भी ठोस नहीं पाते। परन्तु जब हम भरोसे की बात करें, तब कोई ठोस वस्तु हो जिस पर हम सुरक्षित रूप से टिक सकें; और हम जानते हैं कि यदि हम सब बातों के लिए परमेश्वर की ओर देखें, यदि हम केवल उसकी दया पर ही आश्रित रहें, तो हम कभी निराश नहीं हो सकते; क्योंकि मसीह को छोड़ और कहीं हमारे लिए न विश्राम है और न शान्ति। अतः आओ, हम भरोसे के इसी विषय को थामे रहें, और यही हमारा एकमात्र सहारा हो। आगे लिखा है,—

यिर्मयाह 28:16

16. इसलिए यहोवा यों कहता है, देख, मैं तुझे पृथ्वी के ऊपर से फेंक दूँगा: इसी वर्ष तू मरेगा, क्योंकि तू ने यहोवा के विरुद्ध फिर जाने की शिक्षा दी है।

16. Propterea sic dicit Jehova, Ecce ego emitto to (hoc est, projicio) e superficie terrae hujus (vel, terrae; potius indefinite accipitur hoc loco pro tota terra: {}השנה videtur quidem paulo post notare certum annum; sed in voce {}האדמהputo exprimi speciialiter Judaem, imo potius totum orbem, atque hoc facile colligitur, quia denunciat Jeremias sublatum iri Chananiam e medio, et non fore amplius superstitem mundo: morieris, ergo, hoc anno, quia defectionem loquutus es contra Jehovam.

यहाँ वह दण्ड जोड़ा गया है जिसने यिर्मयाह की भविष्यद्वाणी को पुष्ट किया; क्योंकि परमेश्वर का यह अभिप्राय था कि वह उन बहुतों की अज्ञानता का ध्यान रखे जो अन्यथा ठोकर खाते, या अपनी अज्ञानता को बहाना बनाते, क्योंकि वे यह निर्णय नहीं कर सकते थे कि दोनों में से कौन परमेश्वर का भेजा हुआ है, हनन्याह या यिर्मयाह। अतः परमेश्वर की यह योजना थी कि वह अपनी पितृतुल्य कोमलता में उनकी ओर अपना हाथ बढ़ाए, और साथ ही विशेष रीति से उन अविश्वासियों को निरुत्तर ठहराए जिन्होंने मानो अपने आप को पहले ही शैतान को सौंप दिया था; क्योंकि अधिकांश लोग इतनी स्मरणीय घटना से भी प्रभावित नहीं हुए; क्योंकि तुरन्त आगे लिखा है,—

यिर्मयाह 28:17

17. सो हनन्याह भविष्यद्वक्ता उसी वर्ष के सातवें महीने में मर गया।

17. Et mortuus est Chananias propheta anno illo, mense septimo.

जितनों ने यिर्मयाह की उपेक्षा की थी, उन सब ने मानो अपनी आँखों के सामने परमेश्वर का न्याय देखा। यदि यहूदियों में रत्ती भर भी समझ होती, तो वे इससे बढ़कर कोई निश्चित पुष्टि की आशा नहीं कर सकते थे कि उस छली को केवल यिर्मयाह के वचन से मारा गया देखें; क्योंकि उसने उसे उँगली तक न लगाई, और न उसे दण्ड के लिए ले जाने का प्रबन्ध किया, यद्यपि वह इसके योग्य था; परन्तु उसने केवल अपनी जीभ के शब्द से उसे संसार से निकाल दिया। अतः जब उस पवित्र भविष्यद्वक्ता के वचन में स्वर्गीय और ईश्वरीय सामर्थ थी, मानो स्वयं परमेश्वर ने स्वर्ग से वज्रपात किया हो, या हथियारबन्द हाथ से उस दुष्ट मनुष्य को मार डाला हो, तो उनका अन्धापन कितना बड़ा था कि वे प्रभावित न हुए!

तौभी वे प्रभावित न हुए; इसलिए कुछ रब्बी, अपनी रीति के अनुसार अपनी जाति की निन्दा को छिपाना चाहते हुए, यह कल्पना करते हैं कि हनन्याह के चेलों ने गुप्त रूप से उसका शव उठा लिया, और इस कारण लोगों को उसकी मृत्यु के विषय में कुछ पता न चला। परन्तु ऐसे बहाने की क्या आवश्यकता है? क्योंकि यिर्मयाह ऐसी कोई बात नहीं कहता, वरन उस घटना के विषय में ऐसे बोलता है जैसे वह सर्वविदित हो; वह सचमुच उसकी अपनी बुलाहट की निश्चित गवाही थी। इससे यह परिणाम निकलता है कि यह यहूदियों से छिपी न थी; और फिर भी शैतान ने उनमें से अधिकांश को ऐसा अन्धा कर दिया था कि उन्होंने उस पवित्र जन पर पहले से अधिक ध्यान नहीं दिया; इसके विपरीत, उन्होंने उन धमकियों की पूरी तरह उपेक्षा की जिनका वह साक्षी और घोषक रहा था।

200 इस पद के अन्तिम वाक्यांश की यहाँ व्याख्या नहीं की गई है। कैल्विन का अनुवाद है, "तू ने यहोवा के विरुद्ध विद्रोह की बात कही है;" वल्गेट (Vulg.), "तू ने प्रभु के विरुद्ध कहा है;" सुरियानी (Syr.), "तू ने प्रभु के सामने अधर्म की बात कही है;" और टारगम (Targ.), "तू ने यहोवा के सामने टेढ़ी बात कही है।" ब्लेनी का अनुवाद है, "तू ने यहोवा के विषय में छल की बात कही है।" गैटेकर इसका अनुवाद कैल्विन के समान ही करता है, और इसे इस प्रकार समझाता है,—"क्योंकि तू ने अपनी झूठी कहानियों से मनुष्यों को परमेश्वर के वचन के विरुद्ध, और उसके भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा दी गई उसकी चेतावनियों और धमकियों के विरुद्ध डटे रहने के लिए हियाव और प्रोत्साहन दिया है।" हेनरी भी यही दृष्टिकोण देता है। ब्लेनी कहता है कि {{סרה का ठीक अर्थ सीधे मार्ग से, अर्थात् सत्य और धार्मिकता के मार्ग से, हट जाना या मुड़ जाना है, और यहाँ इसका अर्थ यह ढिठाई है कि कोई मनुष्य उस बात को परमेश्वर की ओर से प्रकाशन कहकर बोले जिसके विषय में वह जानता था कि वह ऐसी नहीं है। यही वाक्यांश दो और स्थानों में आता है, व्यवस्थाविवरण 13:5; यिर्मयाह 29:32। यहाँ यहोवा से पहले आया {}אל कई हस्तलिपियों में {}על है; परन्तु ये पूर्वसर्ग कभी-कभी एक ही अर्थ रखते हैं। जो अनुवाद तीनों स्थानों पर उपयुक्त बैठेगा वह यह होगा:—"क्योंकि तू ने यहोवा के विपरीत भटक जाने की बात कही है," अर्थात् उसकी प्रकट इच्छा या आज्ञा के विपरीत। इसका अर्थ इस प्रकार भी व्यक्त किया जा सकता है,—"क्योंकि तू ने परमेश्वर की स्पष्ट आज्ञा के विपरीत आज्ञा-उल्लंघन को प्रोत्साहन दिया है।"— सं.

परन्तु यह कैसे प्रकट होता है? प्रजा का अधिकांश भाग बार-बार उसके विरुद्ध ऐसे उठ खड़ा हुआ मानो वह मनुष्यों में सबसे दुष्ट हो; उस पर अपने देश के साथ विश्वासघात करनेवाला होने का दोष लगाया गया, और जब वह अधमरा-सा होकर कालकोठरी में डाला गया, तब वह एक क्रूर राजा की दया से ही कठिनाई से बच पाया। अतः जब यहूदी इस प्रकार हठपूर्वक भड़कते रहे, तो इससे हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता उन्हें बार-बार किस बात की धमकी देता था, अर्थात् चक्कर की, और उन्माद की, और पागलपन की, और जड़ता की, और मतवालेपन की आत्मा की। इसके अतिरिक्त, यह आवश्यक था कि वह छोटा-सा भाग जो पूरी तरह असुधार्य न था, सही मार्ग पर लौटाया जाए; और यह यिर्मयाह की बुलाहट के इस प्रत्यक्ष प्रमाण के द्वारा किया गया। दूसरी ओर यह भी आवश्यक था कि अविश्वासी और अधिक रोके जाएँ, ताकि वे अपने ही विवेक के द्वारा दोषी ठहरें, जैसे पौलुस उन विधर्मियों को आत्म-दोषी कहता है जो अपनी हठीली दुष्टता में जम गए थे, और जिन्होंने स्वेच्छा से और जान-बूझकर अपने आप को शैतान के दास होने के लिए बेच दिया था।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वर दे कि जैसे तू कृपा और अनुग्रह से हमें पश्चाताप के लिए बुलाता है, वैसे ही हम तेरे क्रोध के बोध से ऐसे छू जाएँ कि अपनी हठीली दुष्टता से अपने विरुद्ध तेरे पलटा लेने की भयंकरता को और अधिक न बढ़ाएँ, वरन उस दया को थाम लें जो हमें दी जाती है, ताकि हम अपने उद्धार के लिए तेरे सत्य की सामर्थ और फल का अनुभव करें, हमारे प्रभु मसीह के द्वारा।—आमीन।

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