यिर्मयाह और विलापगीत पर टीका · खण्ड 2 · यिर्मयाह 25

यिर्मयाह 25

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यिर्मयाह 25

यिर्मयाह 25:1

1. योशिय्याह के पुत्र यहूदा के राजा यहोयाकीम के राज्य के चौथे वर्ष में, जो बाबुल के राजा नबूकदनेस्सर के राज्य का पहला वर्ष था, यहोवा का जो वचन यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता के पास यहूदा की सारी प्रजा के विषय पहुँचा;

1. Sermo qui fuit ad Jeremiam, ad omnem populum Jehudah (sed {}לעaccipitur etiam hic diverso sensu: sermo enim directus fuit ad Jeremiam ut esset illius testis ac proeco, deinde ad populum ut tandem perveniret ex ore Jeremioe ad omnes Judoeos quod uni dictum fuerat) anno quarto Joakim filii Josiae regis Jehudah: hic est annus primus Nebuchadnezer regis Babel. यह भविष्यद्वाणी निःसन्देह उस दर्शन से पहले की है जिसकी व्याख्या हमने अभी की है, और जो यिर्मयाह को तब दिखाया गया था जब यहोयाकीम मर चुका था और सिदकिय्याह यकोन्याह के स्थान पर राज्य कर रहा था; वह अन्तिम राजा होने के कारण अपने भतीजे यकोन्याह के स्थान पर बैठाया गया था। परन्तु अब वह भविष्यद्वाणी बताई जाती है जिसे प्रचार करने की आज्ञा यिर्मयाह को यहोयाकीम के चौथे वर्ष में दी गई थी; और उसने, जैसा हम आगे देखेंगे, ग्यारह वर्ष राज्य किया। इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि उसकी पुस्तक भिन्न-भिन्न सन्देशों से बनी है, परन्तु समय का क्रम सदा बनाए नहीं रखा गया। अब पूरी बात का सार यह है कि जब परमेश्वर ने देखा कि प्रजा किसी भी चेतावनी के द्वारा सुधर नहीं सकती और ठीक बुद्धि पर लौटाई नहीं जा सकती, तब उसने यहूदियों पर और आस-पास की सब जातियों पर भी अन्तिम विनाश की घोषणा की; परन्तु उसने अन्यजातियों को भी इसमें क्यों सम्मिलित किया, यह हम आगे देखेंगे।

फिर वह कहता है कि यह भविष्यद्वाणी उसे यहोयाकीम के चौथे वर्ष में सौंपी गई थी; और वह यह भी जोड़ता है कि वही वर्ष राजा नबूकदनेस्सर का पहला वर्ष था। यह अन्य स्थानों से मेल नहीं खाता प्रतीत होता, जहाँ चौथे वर्ष के स्थान पर यहोयाकीम के तीसरे वर्ष का उल्लेख है; और इस कारण नबूकदनेस्सर के पहले वर्ष के लिए लम्बा समय गिना जाता है।

परन्तु इसका समाधान कठिन नहीं है, यदि हम यह ध्यान दें कि जब नबूकदनेस्सर को उसके पिता की मृत्यु का समाचार मिला, तब वह अपने घर के मामलों को सँभालने के लिए अचानक कसदियों के देश को लौट गया; क्योंकि वह डरता था कि उसकी अनुपस्थिति में कहीं कोई उपद्रव न उठ खड़ा हो, जैसा कि प्रायः हुआ करता था। इसलिए वह अपने राज्य को सुरक्षित करने के लिए चिन्तित था; और घर के मामले सुलझाकर उसने यहोयाकीम को अपने अधीन किया, और अपने राज्य के चौथे वर्ष में उसे अपने भण्डार खोलने पर विवश किया, और जिन्हें वह चाहता था उन्हें बन्दी बनाकर ले गया। और इसी समय दानिय्येल और उसके साथी बँधुआई में ले जाए गए, और मन्दिर के बहुमूल्य पात्र हटाए गए। जहाँ तक नबूकदनेस्सर के राज्य के पहले वर्ष की बात है, उसने पहले अपने पिता के साथ राज्य किया; और फिर जब उसने अकेले राज्य किया, तब उचित ही नए राज्य के आरम्भ को पहला वर्ष कहा गया है।

इसलिए यद्यपि वह राजा बनाया गया था, तौभी जब तक उसके पिता की मृत्यु न हुई तब तक उसने सर्वोच्च अधिकार का प्रयोग नहीं किया, इस कारण उस घटना से पहले वह वास्तव में राजा नहीं था; यही कारण है कि उसके पहले वर्ष का उल्लेख किया गया है। परन्तु हमें विशेष रूप से उस बात पर ध्यान देना चाहिए जो भविष्यद्वक्ता कहता है, — कि वचन उसके पास उसके अपने लिए नहीं, वरन् इसलिए आया कि वह परमेश्वर का सार्वजनिक प्रचारक हो। अब आगे यह है, —

यिर्मयाह 25:2

2. उसे यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता ने यहूदा की सारी प्रजा से और यरूशलेम के सब निवासियों से कहा,

2. Quem sermonem protulit Jeremias Propheta ad totum populum Jehudah, et ad omnes habitatores Jerosolymae, dicendo.

इस पद में वह और भी स्पष्ट रीति से वह बात दिखाता है जो उसने अभी कही थी, — कि उसे ऊपर से इसलिए शिक्षा नहीं दी गई थी कि जो उसने सुना उसे दबा रखे, वरन् इसलिए कि वह उसे मानो परमेश्वर के मुख से प्रचार करे; और इसी कारण वह अपने आप को भविष्यद्वक्ता की आदरणीय उपाधि देता है, मानो वह कहता हो कि वह परमेश्वर की निःसन्देह आज्ञाओं से सुसज्जित होकर आया है, और साथ ही उसे भविष्यद्वक्ता के पद से सम्मानित किया गया है; और वह इस रीति से आया कि कोई भी उसकी शिक्षा को तुच्छ जानने का साहस न करे। अब उसका उपदेश आता है, —

यिर्मयाह 25:3-5

3. आमोन के पुत्र यहूदा के राजा योशिय्याह के राज्य के तेरहवें वर्ष से लेकर आज के दिन तक, अर्थात् तेईस वर्ष से यहोवा का वचन मेरे पास पहुँचता आया है; और मैं उसे बड़े यत्न के साथ तुम से कहता आया हूँ, परन्तु तुम ने उसे नहीं सुना।

3. A tertio decimo anno Josiae filii Ammon regis Jehudah ad hunc diem, hic tertius et vicesimus annus est, loquutus est Jehova ad me, et loquutus sum ad vos, surgens mane; et non audistis:

4. और यद्यपि यहोवा तुम्हारे पास अपने सारे दासों अथवा भविष्यद्वक्ताओं को भी बड़े यत्न से भेजता आया है, परन्तु तुम ने न तो सुना और न सुनने के लिए कान लगाया।

4. Et misit Jehova ad vos omnes suos servos Prophetas, mane surgens et mittens; et non audistis et non inclinastis aurem vestram ad audiendum;

5. उन्होंने कहा, अपनी-अपनी बुरी चाल और अपने-अपने बुरे कामों से फिरो, तब जो देश यहोवा ने प्राचीनकाल में तुम्हारे पितरों को और तुम को भी सदा के लिए दिया है उस पर बसे रहने पाओगे।

5. Dicendo, Revertimini agedum quisque a via sua mala eta malitia operum vestrorum; et habitate super terram, quam dedit Jehova vobis et patribus vestris a seculo et usque in seculum (et quoe sequuntur.)

अब यिर्मयाह यहूदियों से विवाद करता है, क्योंकि उन्होंने न केवल विश्वासघात करके परमेश्वर की सच्ची आराधना को छोड़ दिया था और उसकी व्यवस्था की सारी शिक्षा को तुच्छ जाना था, वरन् इसलिए भी कि उन्होंने जूआ उतार फेंका था, और जान-बूझकर, यहाँ तक कि हठपूर्वक सब चेतावनियों को ठुकरा दिया था, और न तो डाँट से और न धमकियों से ही प्रभावित होते थे। इसलिए वह उन पर केवल अभक्ति और कृतघ्नता का दोष नहीं लगाता, वरन् हठीलेपन का पाप भी जोड़ता है, कि वे ऐसे वनपशुओं के समान थे जिन्हें वश में नहीं किया जा सकता, और किसी भी रीति से उनका सुधार नहीं हो सकता था।

वह कहता है कि यहूदा के राजा योशिय्याह के तेरहवें वर्ष से लेकर उस वर्ष तक, जो तेईसवाँ वर्ष था, वह अपने को सौंपे गए पद को विश्वासयोग्यता से निभाने से नहीं रुका था, परन्तु उससे कुछ भी फल नहीं निकला। इससे प्रकट होता है कि उनकी दुष्टता कितनी असाध्य थी। हम पुस्तक के आरम्भ में देख चुके हैं कि उसे राजा योशिय्याह के तेरहवें वर्ष में परमेश्वर ने भविष्यद्वक्ता होने के लिए बुलाया था; और, जैसा वह घोषित करता है, वह अब तेईस वर्षों से अपनी बुलाहट में लगा हुआ था।

उसने अपना समय व्यर्थ गँवाया था, उसने बिना किसी फल के बहुत परिश्रम खपाया था। अतः कोई आश्चर्य नहीं कि वह अब उन पर हठीलेपन का दोष लगाता है, और वह भी परमेश्वर के नाम से; क्योंकि वह अपना निज मुकद्दमा नहीं लड़ता, वरन् यह दिखाता है कि यहूदी किस योग्य थे, यह विचार करते हुए कि परमेश्वर ने उन्हें लौटा लाने में कितना परिश्रम किया था, और उन्होंने उसकी सब चेतावनियों को ठुकराया और उसके सब उपचारों को अस्वीकार किया था। तब वह कहता है, योशिय्याह के तेरहवें वर्ष से आज के दिन तक; और फिर एक कोष्ठक में जोड़ता है कि वह तेईस वर्ष से अपना पद निभा चुका था।

हम सीखते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने ये बातें नगर और मन्दिर के विनाश से सत्रह वर्ष पहले कहीं; क्योंकि प्रजा के बँधुआई में ले जाए जाने से पहले, और जो अपने आप को सुरक्षित समझते थे उनके दुर्दशा से नष्ट होने से पहले, वह चालीस वर्ष पूरे कर चुका था।

वह योशिय्याह की मृत्यु तक सेवा करता रहा; और उसके बाद लगभग बाईस वर्ष बीते; क्योंकि यहोयाकीम ने ग्यारह वर्ष राज्य किया; और यकोन्याह के थोड़े समय को न गिनें, तो मत्तन्याह, जो सिदकिय्याह भी कहलाता था, ग्यारहवें वर्ष में हटाया गया, और अपमान और निन्दा के साथ मार डाला गया। इस प्रकार प्रकट होता है कि भविष्यद्वक्ता ने चालीस वर्ष तक निरन्तर परिश्रम किया।

इससे हम यह भी सीखते हैं कि इतनी अधिक चेतावनियों को ठुकराने में उस प्रजा का पागलपन कैसा शैतानी था। और यदि हम इसके साथ एक और बात जोड़ें, जिसका मैंने अभी उल्लेख किया, कि उन्हें बहुत से उदाहरणों के द्वारा सिखाया गया था, तो यह और भी स्पष्ट हो जाएगा कि उस प्रजा में अभक्ति का रोग पूरी रीति से असाध्य था।

परन्तु यह खण्ड विशेष ध्यान के योग्य है; क्योंकि यहाँ हम सीखते हैं कि जब परमेश्वर हमें बुलाता है तब हमें तुरन्त उसके पास लौटना चाहिए; क्योंकि विश्वास अपनी तत्परता से पहचाना जाता है।

इसलिए जैसे ही परमेश्वर बोलता है, हमें ध्यान देना उचित है, कि हम तुरन्त उसके पीछे चलें। परन्तु यदि परमेश्वर पूरे एक वर्ष तक हमें चिताने और समझाने से नहीं रुकता, और उसी समय उसकी शिक्षा तुच्छ जानी जाती है, तो हम असहनीय पाप के दोषी ठहरते हैं। इसलिए हम स्मरण रखें कि यहाँ एक प्रकार से वर्षों के साथ-साथ दिनों का भी उल्लेख है, ताकि यहूदी विचार करें कि हर एक वर्ष में कितने दिन सम्मिलित हैं; और हम यह भी जानें कि यिर्मयाह वर्षों का उल्लेख इसलिए करता है कि वे समझें कि उनके पास कोई बहाना नहीं था, क्योंकि परमेश्वर इतने लम्बे समय तक उनकी भलाई को बढ़ाने से नहीं रुका, जबकि वे इस बीच अपनी अभक्ति में बने रहे, और अन्त तक हठीले बने रहे। यही कारण है कि भविष्यद्वक्ता फिर से बताता है कि उसने कब अपना भविष्यद्वक्ता का पद निभाना आरम्भ किया, अर्थात् योशिय्याह के तेरहवें वर्ष से।

फिर वह जोड़ता है कि यह उनका अपना दोष था कि उन्होंने पश्चाताप नहीं किया; वह कहता है, यहोवा ने मुझ से बात की है, और मैंने तुम से। यह कहकर कि परमेश्वर का वचन उसे सौंपा गया था, उसका निःसन्देह यह अभिप्राय था कि वह उन अविश्वासियों के विरुद्ध अपने अधिकार की पुष्टि करे, जो चिल्लाते थे कि वह ढिठाई से परमेश्वर के नाम का दावा करता है, और कि वह परमेश्वर की ओर से भेजा नहीं गया। क्योंकि हम अन्यत्र देख चुके हैं कि उस समय कलीसिया दुर्दशा से फटी हुई थी, उसमें भीतरी झगड़े थे, और बहुत से लोग डींग मारते थे कि वे भविष्यद्वक्ता हैं; और हम आगे अन्य स्थानों में भी यही बात पाएँगे। इस प्रकार यिर्मयाह को सारी प्रजा ने ग्रहण नहीं किया, और उसके अधिकार पर विवाद किया गया। इसलिए क्योंकि उसे बहुत से अभक्त मनुष्यों से संघर्ष करना था, वह यहाँ गवाही देता है कि वह अपनी ओर से नहीं आया, वरन् भविष्यद्वक्ता का पद उसे सौंपा गया था।

अपनी बुलाहट के अधिकार की पुष्टि करने के बाद वह जोड़ता है कि उसने सारी प्रजा की भलाई को विश्वासयोग्यता से बढ़ाया था; क्योंकि जब वह कहता है कि उसने बात की और तड़के उठा, तब वह घोषित करता है कि वह कितना विश्वासयोग्य और परिश्रमी रहा था; क्योंकि तड़के उठने का अर्थ यह है कि वह अपने काम में लगातार लगा रहा। इसलिए भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि वह न तो ढीला था और न आलसी, और न उसने बहुतों के समान लापरवाही से बात की, जो परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार करते हुए तो दिखाई देते हैं, परन्तु न कोई उत्कट जोश प्रकट करते हैं और न कोई लगन। इसलिए भविष्यद्वक्ता यह घोषित करने के बाद कि वह ऊपर से भेजा गया था, जोड़ता है कि उसने विश्वासयोग्यता और परिश्रम का पालन किया था, कि उसने परमेश्वर की और उसकी कलीसिया की तन-मन से सेवा की थी।

वह कहता है, मैंने तुम से वैसे ही बात की है जैसे प्रभु ने मुझ से बात की थी, — कैसे? तड़के उठकर।

फिर वह जोड़ता है, मैंने कहा, और तुम ने नहीं सुना। वह यहाँ शिकायत करता है कि उसका परिश्रम व्यर्थ गया, और साथ ही दिखाता है कि सारा दोष प्रजा का था।

वह इसी बात की पुष्टि दूसरे शब्दों में करता है, यहोवा ने तुम्हारे पास अपने सब दासों, भविष्यद्वक्ताओं को भेजा, तड़के उठकर, इत्यादि। वह उनके पाप को और बढ़ाकर दिखाता है, — कि उन्होंने केवल एक ही भविष्यद्वक्ता को नहीं, वरन् बहुतों को ठुकराया था; क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें सिखाने के लिए केवल यिर्मयाह को ही काम में नहीं लगाया था, वरन् उसके साथ औरों को भी जोड़ा था, जिससे वे और भी कम क्षमा के योग्य थे।

इससे हम देखते हैं कि इस पद में उनके पाप को बढ़ाकर दिखाया गया है; क्योंकि यहूदियों ने न केवल एक मनुष्य के रूप में परमेश्वर को तुच्छ जाना था, वरन् उसके सब दासों को भी ठुकरा दिया था। वह, निःसन्देह, केवल इतना कह सकता था कि परमेश्वर ने अपने दासों को भेजा, परन्तु वह भविष्यद्वक्ता शब्द जोड़ता है, ताकि उनकी कृतघ्नता और भी स्पष्ट प्रकट हो। परमेश्वर के दासों की उपेक्षा करना निःसन्देह बहुत दुष्टता थी; परन्तु क्योंकि भविष्यद्वाणी एक अनमोल धन थी, और परमेश्वर के अनुग्रह का एक अनोखा बयाना और चिह्न थी, इसलिए जब उन्होंने इस प्रकार भविष्यद्वक्ताओं को तुच्छ जाना, जिनका नाम ही उनके लिए पवित्र माना जाना चाहिए था, तो यह दुगुना अपराध था।

फिर वह जो बात उसने अपने विषय में कही थी, उसे परमेश्वर पर लागू करता है, तड़के उठकर। यह निश्चित है कि परमेश्वर उठता नहीं, क्योंकि वह रात को सोता नहीं; परन्तु जब स्वयं परमेश्वर के विषय में कहा जाता है कि वह तड़के उठता है, तब यह भाषा कहीं अधिक अर्थपूर्ण और प्रभावशाली है। और भविष्यद्वक्ता ने अकारण इतने ज़ोर से बात नहीं की; क्योंकि यद्यपि यहूदी परमेश्वर के दासों की उपेक्षा करने के कारण कृतघ्नता के पर्याप्त रूप से दोषी ठहर चुके थे, तौभी परमेश्वर के प्रति कोई आदर न दिखाना एक भयानक अभक्ति थी। परन्तु जब अविश्वासी दोषी सिद्ध किए जाते हैं, तो वे सदा मनुष्यों पर ही अपनी दृष्टि लगाते हैं, “अरे! मुझे तो एक नश्वर मनुष्य से काम है; मुझ से यह दूर रहे कि मैं कभी परमेश्वर के विरुद्ध उठूँ; परन्तु जब मैं तुरन्त नष्ट नहीं होता, तो इसकी इतनी निन्दा क्यों की जाती है? जब मैं मनुष्य के इशारे पर अचानक गिराया नहीं जाता? क्या! क्या मैं जो कुछ कहा जाता है उसके हर भाग की जाँच, विचार और परख करने को स्वतन्त्र नहीं हूँ? भविष्यद्वक्ता हम से ऐसी प्रभुता से क्यों व्यवहार करते हैं, कि उनके किसी भी शब्द पर सन्देह करना उचित नहीं?” इस प्रकार अभक्त लोग बोलते थे। परन्तु परमेश्वर ने दूसरी ओर उन्हें उत्तर दिया और कहा कि उसी को तुच्छ जाना गया था, जैसा मसीह ने भी कहा, “जो तुम्हारी सुनता है, वह मेरी सुनता है, और जो तुम्हें तुच्छ जानता है, वह मुझे तुच्छ जानता है।” (लूका 10:16)

इसी प्रकार भविष्यद्वक्ता स्वयं परमेश्वर को तड़के उठते हुए, प्रजा को समझाते हुए और उसकी भलाई के लिए हर प्रकार की चिन्ता प्रकट करते हुए प्रस्तुत करता है। इसलिए इस रूपक का यही अभिप्राय है, जब वह कहता है कि परमेश्वर ने उनके पास भेजा और तड़के उठा; वह अपने दासों को भेजते समय तड़के उठा।

अब जैसे परमेश्वर अपनी शिक्षा के सब तुच्छ जाननेवालों के विरुद्ध गरजता है, वैसे ही इन शब्दों से हम कोई छोटी शान्ति नहीं पा सकते; क्योंकि हम निश्चय यह निष्कर्ष निकालते हैं कि जब कभी खरे और विश्वासयोग्य शिक्षक निकलते हैं, तब परमेश्वर हमारी सुरक्षा पर दृष्टि रखता है: यह ऐसा ही है मानो वह स्वयं स्वर्ग से उतरा, तड़के उठा, और हमारा उद्धार सुनिश्चित करने में लगा रहा। यह हम भविष्यद्वक्ता के उन्हीं शब्दों से सीखते हैं, जब वह कहता है कि परमेश्वर तड़के उठा। परन्तु जैसे हमारे प्रति परमेश्वर के अनुग्रह और पितृवत् चिन्ता की यह गवाही आनन्ददायक है, वैसे ही उतना ही भयानक वह प्रतिशोध है जो उनकी प्रतीक्षा करता है जो इस अनुग्रह की उपेक्षा करते हैं, जो सोते हैं जब परमेश्वर जागता है, जो नहीं सुनते जब वह बोलता है, जो अपने आलस्य और सुस्ती में बने रहते हैं जब परमेश्वर अपनी ही इच्छा से उनसे मिलने आता है, और कृपा और कोमलता से उन्हें अपने पास बुलाता है।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जब तू ने बचपन ही से हमें अपनी प्रजा होने के लिए चुनना पसन्द किया है, और जब हम अभागे धर्मत्यागी थे, तब तू ने अपना हाथ बढ़ाकर हमारी अगुवाई करते हुए हमें सीधे मार्ग पर लौटा लाना भी पसन्द किया है, — हाँ, यह वरदान दे कि हम न बहरे हों और न आलसी; वरन् तुझे यह भाए कि तू अपने आत्मा के द्वारा विशेष करके हमारे हृदयों के सारे हठ को सुधारे, कि हम अपने आप को तेरे आज्ञाकारी और अधीन बनाएँ: और जैसे तू हमें निरन्तर बुलाने से नहीं रुका, वैसे ही हम भी अपनी बारी में तुझे उत्तर दें, और न केवल अपनी जीभ से, वरन् अपने कामों से भी उस मार्ग पर चलें जो तू ने हमारे लिए ठहराया है, जब तक कि हम लक्ष्य तक न पहुँच जाएँ, और महिमा की उस धन्य दशा का आनन्द न लें जो तू ने स्वर्ग में हमारे लिए तैयार की है, हमारे प्रभु मसीह के द्वारा। — आमीन।

चौरानबेवाँ व्याख्यान

हमने कल यहूदियों के विरुद्ध परमेश्वर की शिकायत की व्याख्या आरम्भ की थी, — कि उसने उन्हें पूरी रीति से हठीला और बलवाई पाया था। वह एक शब्द में कहता है कि उन्होंने उसकी नहीं सुनी; परन्तु फिर वह जोड़ता है कि उन्होंने उसकी सुनने के लिए अपना कान नहीं लगाया; इस कथन-शैली के द्वारा उनका हठीलापन और भी पूर्ण रूप से प्रकट किया गया है, क्योंकि उन्होंने मानो जान-बूझकर अपने कान बन्द कर लिए थे; क्योंकि कान न लगाना न सुनने से भी बढ़कर है। इसलिए यिर्मयाह का अभिप्राय यह है कि उन्होंने भविष्यद्वक्ताओं की सिखाई हुई सब बातों के विरुद्ध अपने आप को इतना कठोर कर लिया था कि जो कुछ भी परमेश्वर के अधिकार से उनके सामने रखा गया, उसे उन्होंने जान-बूझकर ठुकरा दिया।

फिर वह समझाता है कि परमेश्वर ने उनसे क्या करने की माँग की थी, मैं तुम से विनती करता हूँ, तुम में से हर एक अपनी बुरी चाल से और अपने कामों की दुष्टता से फिरो, और उस देश में बसे रहो जो यहोवा ने तुम्हें और तुम्हारे पितरों को युग से युग तक दिया है। परमेश्वर ने जो माँगा वह निःसन्देह पूर्णतः न्यायोचित था; क्योंकि उसने यहूदियों से पश्चाताप करने के सिवाय और कुछ नहीं माँगा। उसके साथ एक प्रतिज्ञा भी जोड़ी गई थी; परमेश्वर ने उन्हें केवल पश्चाताप करने के लिए ही नहीं समझाया, वरन् वह उनसे मेल करना भी चाहता था, और उनके पापों का सारा स्मरण मिटाकर उन पर कृपा दिखाना चाहता था: यदि वे पत्थरों से भी कठोर न होते, तो ऐसे दयालु व्यवहार के द्वारा उन्हें अवश्य ही उसकी सेवा की ओर फिर जाना चाहिए था। परमेश्वर उन्हें निःसन्देह कड़ी डाँट दे सकता था, वह उन्हें धमका सकता था, संक्षेप में, वह क्षमा की हर आशा को काट सकता था; परन्तु उसने केवल उनसे पश्चाताप की माँग की, और साथ ही सेंतमेंत क्षमा की प्रतिज्ञा भी जोड़ी। इसलिए जब उन्होंने इतने बड़े अनुग्रह को तुच्छ जाना, तो इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि वे भ्रष्ट मन और असुधार्य स्वभाव के मनुष्य रहे होंगे।

जब उन्हें अपनी बुरी चाल से और अपने कामों की दुष्टता से फिरने की आज्ञा दी गई, तो यह बात को विस्तार देने के लिए किया गया था; क्योंकि भविष्यद्वक्ता उनसे बच निकलने का हर बहाना छीन लेना चाहता था, कहीं ऐसा न हो कि वे पूछें कि दुष्टता क्या थी या बुरी चाल क्या थी। इसलिए वह संकेत करता है कि वे पूरी रीति से दोषी सिद्ध हो चुके थे; और इसी उद्देश्य से उसने यह दोहराव किया। चाल से जीवन का निरन्तर क्रम सूचित होता है; परन्तु क्योंकि उन्होंने बहुत रीतियों से अपने आप को पूरी तरह हठीला प्रकट किया था, इसलिए वह उनके फलों का उल्लेख करता है, मानो वह कहता हो कि यह पूछकर कि उनकी बुरी चाल क्या रही थी, वे परमेश्वर से व्यर्थ विवाद करते थे, क्योंकि उनका सारा जीवन पर्याप्त गवाही देता था कि वे पूरी रीति से दुष्टता के वश में हो चुके थे।

अब क्रियाओं {}שבוऔर {:}ושבו में एक उल्लेखनीय अनुप्रास है; क्रिया {,}שבו shebu, कभी-कभी विद्रोह करने का अर्थ देती है, यह सही मार्ग पर लौटने का अर्थ देती है, और यह विश्राम करने या बसने का अर्थ भी देती है। वह वही क्रिया प्रयोग करता है, यद्यपि अर्थ भिन्न है, जब वह कहता है, “लौट आओ,” और “तुम बसे रहोगे।”

वह ज़ोर देकर {,}אישaish “हर एक” शब्द का भी प्रयोग करता है: इसका ठीक अर्थ है (मनुष्य), परन्तु इब्रानी भाषा में इसे हर एक या प्रत्येक के अर्थ में लिया जाता है, “हर एक अपनी बुरी चाल से।” भविष्यद्वक्ता ने किसी को भी छूट नहीं दी, कहीं ऐसा न हो कि वे यह सोचें कि यदि बुराई सर्वव्यापी न होती तो उनका दोष हलका हो जाता। इसलिए वह कहता है कि हर एक दुष्टता के वश में था; मानो वह कहता हो कि अभक्ति केवल सारी प्रजा में ही नहीं फैली थी, जैसा प्रायः होता है, वरन् हर एक भ्रष्ट हो चुका था, यहाँ तक कि सारी प्रजा में एक भी खरा या सीधा मनुष्य नहीं था।

और इस बात पर ध्यान देना चाहिए; क्योंकि हमारी यह आदत है कि जब हम दोषी सिद्ध होते हैं तब हम ठण्डे मन से अपने पापों को मान लेते हैं और परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं, सिवाय उस दशा के जब हर एक अपने निज दोष के बोध से छू जाता है, और मान लेता है कि वह उचित ही परमेश्वर के न्याय के अधीन है; क्योंकि जब तक हर एक भीड़ में मिला रहता है, तब तक ऐसा होता है कि कोई भी अपने पापों की घोरता को स्वीकार नहीं करता। इसलिए सच्चे और निष्कपट पश्चाताप के लिए यह व्यक्तिगत जाँच आवश्यक है, कि हर एक पश्चाताप करे और अपने साथियों की ओर न देखे।

जब वह कहता है, देश में बसे रहो, तो यद्यपि यह आज्ञार्थक रूप है, तौभी यह एक प्रतिज्ञा है, जिसके द्वारा परमेश्वर ने घोषित किया कि वह यहूदियों को अनुग्रह में ग्रहण करने को तैयार था, बशर्ते वे मन से उसकी ओर लौट आएँ: उसने उनके सामने अपनी पितृवत् कृपा के चिह्न के रूप में देश का अधिकार रखा; क्योंकि वह देश मानो उनके लेपालकपन का बयाना था; और यहूदी, जब तक वहाँ बसे रहते, निश्चिन्त रह सकते थे कि परमेश्वर उनका पिता है। वह जोड़ता है, युग से युग तक; मानो उसने कहा हो, “मैं न केवल एक दिन या थोड़े समय के लिए तुम्हारी भलाई करने को तैयार हूँ, वरन् युग से युग तक तुम पर कृपा दिखाने को भी तैयार हूँ। इसलिए यदि तुम सुखी न रहो, और यदि यह सुख तुम से तुम्हारे बच्चों और नाती-पोतों तक न पहुँचे, तो यह तुम्हारा ही दोष होगा।” परन्तु यह निमन्त्रण जितना अधिक आनन्ददायक था, प्रजा की अभक्ति उतनी ही अधिक घृणित हो गई, जैसा आगे बताया जाएगा। अब वह जोड़ता है, —

यिर्मयाह 25:6

128 यह पूर्णतः सही नहीं है: ये क्रियाएँ एक ही नहीं हैं, यद्यपि कुछ भावों और कालों में उनके रूप एक जैसे बनते हैं; एक {,{שבहै और दूसरी {}ישב — सं.

6. और दूसरे देवताओं के पीछे होकर उनकी उपासना और उनको दण्डवत् मत करो, और न अपनी बनाई हुई वस्तुओं के द्वारा मुझे रिस दिलाओ; तब मैं तुम्हारी कुछ हानि न करूँगा।

6. Et ne ambuletis post deos alienos ad serviendum ipsis, et ad incurvandum coram ipsis (id est, ad eos adorandos,) et ne provocetis me in opere manuum vestrarum, et non malefaciam vobis.

भविष्यद्वक्ता यहाँ एक प्रकार के पाप का उल्लेख करता है; क्योंकि यद्यपि यहूदियों ने बहुत सी, बल्कि अनगिनत रीतियों से परमेश्वर का क्रोध भड़काया था, तौभी उन्होंने विशेष रूप से अपने अन्धविश्वासों के द्वारा अपने ऊपर भारी दण्ड बुला लिया था। उन्होंने निःसन्देह व्यभिचार, चोरी और लूटपाट के द्वारा भी परमेश्वर के प्रति अपना तिरस्कार प्रकट किया, परन्तु इतनी सीधी रीति से नहीं; क्योंकि जब उन्होंने अपने आप को अन्यजातियों के अन्धविश्वासों के हवाले कर दिया, तब उन्होंने इस प्रकार परमेश्वर का जूआ उतार फेंका, मानो वे खुलेआम गवाही दे रहे हों कि वह अब उनका परमेश्वर नहीं रहा।

और हम जानते हैं कि परमेश्वर की दृष्टि में सच्ची भक्ति के प्रति निष्कपट ध्यान के समान और कुछ भी इतना मूल्यवान और ग्रहणयोग्य नहीं है; इसी कारण व्यवस्था की पहली पटिया में कलीसिया को सिखाया गया है कि उसकी आराधना किस रीति से की जाए। यही कारण है कि भविष्यद्वक्ता यहाँ यहूदियों को विशेष रूप से स्मरण दिलाता है कि वे इस विषय में परमेश्वर के विरुद्ध बलवा करते रहे थे, क्योंकि वह उन्हें उनके भ्रष्ट अन्धविश्वासों से लौटा न सका। साथ ही वह उन्हें अन्य पापों से निर्दोष नहीं ठहराता; परन्तु वह इस एक प्रकार का उल्लेख इसलिए करता है कि वे समझें कि वे केवल आंशिक रूप से नहीं, वरन् पूरी रीति से परमेश्वर के विरुद्ध बलवाई थे; क्योंकि जब उन्होंने दुष्ट अन्धविश्वासों के द्वारा उसकी आराधना को दूषित किया, तब वे पूरी रीति से उससे हट गए। इसलिए हमें स्मरण रखना चाहिए कि यहूदी किन्हीं छोटे-मोटे अपराधों के लिए दोषी नहीं ठहराए गए थे, वरन् उन पर सबसे घोर पापों का दोष लगाया गया था; क्योंकि वे वाचा तोड़नेवाले और धर्मत्यागी बन गए थे, और उन्होंने स्वयं परमेश्वर को और उसकी व्यवस्था को त्याग दिया था।

वह कहता है, पराए देवताओं के पीछे होकर उनकी उपासना और उनको दण्डवत् मत करो। उसने मानो उँगली से दिखाया कि उनकी अभक्ति कितनी घोर थी; क्योंकि उन्होंने अपने आप को मूर्तियों के हवाले कर दिया था, कि नीचता से उनकी सेवा करें; उन्होंने अपने आप को पूरी रीति से उनको अर्पित कर दिया था। इसलिए यह क्षमा के योग्य भूल नहीं, वरन् खुला विश्वासघात था।

वह जोड़ता है, अपने हाथों के काम के द्वारा मुझे रिस न दिलाओ। निःसन्देह भविष्यद्वक्ता इन शब्दों के द्वारा उस बात की पुष्टि करना चाहता था जो पहले कही जा चुकी है, कि मूर्तिपूजा परमेश्वर के सामने एक असहनीय दुष्टता है: और साथ ही वह दिखाता है कि उन्होंने अज्ञानता से पाप नहीं किया था, क्योंकि उन्हें समय रहते इस पाप की भयंकरता का स्मरण दिलाया गया था। इसलिए जब वे अपने अन्धविश्वासों से न रुके, तो वे इस प्रकार शैतानी पागलपन के दोषी सिद्ध हुए, क्योंकि वे परमेश्वर को अपने विरुद्ध भड़काने से नहीं डरे। और वह कहता है, तुम्हारे हाथों के काम के द्वारा; और इस प्रकार वह मूर्तियों के विषय में तिरस्कार से, बल्कि निन्दा के साथ बात करता है। वे उन्हें देवता कहते थे, इसलिए नहीं कि वे यह न जानते हों कि वे लकड़ी और पत्थर, या किसी अन्य पदार्थ से कारीगरी से बनाई गई मूर्तियाँ थीं; परन्तु फिर भी वे सोचते थे कि ईश्वरत्व उनसे जुड़ा हुआ है, क्योंकि वे विश्वास करते थे कि इस प्रकार परमेश्वर की ठीक आराधना होती है। अब, इसलिए, भविष्यद्वक्ता उन्हें हाथों का काम कहता है, मानो उसने कहा हो, “यदि स्वयं यहूदी कुछ नहीं हैं, तो मूर्तियाँ कुछ नहीं से भी कम हैं; क्योंकि वे केवल हाथों का काम हैं।” और यह कथन-शैली भविष्यद्वक्ताओं में प्रायः पाई जाती है, जिसके द्वारा परमेश्वर मनुष्यों की उस मूढ़ता को झकझोरना चाहता था, जो अपनी ही युक्तियों में पूरी रीति से बुद्धिहीन हो गए थे; मानो उसने कहा हो, “क्या तुम में सही समझ का एक कण भी नहीं? क्या तुम नहीं जानते कि जिसकी तुम उपासना करते हो वह तुम्हारे अपने हाथों का काम है? और तुम्हारे हाथ क्या कर सकते हैं? क्योंकि तुम स्वयं क्या हो?” अब हम समझते हैं कि इन शब्दों का प्रयोग करने में भविष्यद्वक्ता का क्या अभिप्राय था।

यहाँ फिर एक प्रतिज्ञा दी गई है, मैं तुम्हारी हानि न करूँगा। परमेश्वर इन शब्दों के द्वारा घोषित करता है कि यदि वे सच्चे धर्म के नियम के अनुसार चलते रहते, तो वे सब कष्ट और संकट से मुक्त रहते; और इस प्रकार वह संकेत करता है कि जो भी विपत्तियाँ वे सह चुके थे, और जो उन्हें आगे सहनी पड़ेंगी, उनका दोष उनके अपने हठीलेपन के सिवाय और किसी पर नहीं लगाया जा सकता था, क्योंकि परमेश्वर ने अपनी स्वतन्त्र इच्छा से उन्हें छोड़ देने की प्रतिज्ञा की थी, बशर्ते वे अपनी दुष्ट चाल से हट जाएँ। और ऐसी आशा हमें पश्चाताप करने के लिए विशेष रूप से प्रोत्साहित करनी चाहिए, क्योंकि हम देखते हैं कि परमेश्वर हमें ग्रहण करने को तैयार है और हमसे मेल-मिलाप चाहता है, और हमारे सब पापों को क्षमा करने के लिए सदा तैयार है, बशर्ते हम मन से उसकी ओर लौट आएँ; और वह ऐसा दिखाई देता है मानो दण्ड देने को अनिच्छुक हो।

यहाँ फिर से प्रजा की अभक्ति और भी पूर्ण रूप से सिद्ध होती है, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर से यह अनमोल अनुग्रह ग्रहण करने से इनकार किया। आगे यह है, —

यिर्मयाह 25:7

7. परन्तु यहोवा की यह वाणी है कि तुम ने मेरी नहीं सुनी, वरन् अपनी बनाई हुई वस्तुओं के द्वारा मुझे रिस दिलाते आए हो जिससे तुम्हारी हानि ही हो सकती है।

7. Et non audistis me, (non auscultastic mihi) dicit Jehova, ut provocaretis (hoc est, quia voluistis me irritare) in opere manuum vestrarum, in malum vobis.

वह उस बात को सिद्ध करता है जो उसने पहले कही थी, कि यहूदी पूरी रीति से आज्ञा न माननेवाले रहे थे, यद्यपि परमेश्वर ने कृपा करके प्रस्ताव रखा था और दिखाया था कि यदि वे मन से उसकी ओर फिरें तो वह उनसे मेल कर लेगा। यह तथ्य कि यह सन्देश यहूदियों ने ग्रहण नहीं किया, चरम और असुधार्य हठ का प्रमाण था। और वह यह कहकर उनके दोष को और बढ़ाता है, कि तुम मुझे रिस दिलाओ; क्योंकि वह संकेत करता है कि वे अपनी इच्छा से जान-बूझकर बुराई की ओर खिंच गए थे, मानो वे परमेश्वर को भड़काना चाहते हों।

इसलिए भविष्यद्वक्ता यह कहकर कि तुम मुझे रिस दिलाओ, उन पर जान-बूझकर की गई दुष्टता का दोष लगाता है। निःसन्देह प्रायः ऐसा होता है कि मनुष्य अज्ञानता से भटक जाते हैं, और ध्यान नहीं देते क्योंकि कोई उन्हें चिताता नहीं; परन्तु जब परमेश्वर ने यहूदियों को इतनी बार पश्चाताप करने के लिए समझाया था, तब उनके विषय में इसके सिवाय और कोई मत नहीं बनाया जा सकता था कि वे जान-बूझकर न केवल परमेश्वर को तुच्छ जानना, वरन् उसे संघर्ष के लिए भड़काना भी चाहते थे।

और इस पर हमें ध्यानपूर्वक विचार करना चाहिए, क्योंकि जिस किसी को परमेश्वर की इच्छा सिखाई गई है, यदि वह आज्ञा न माने, तो वह स्वेच्छा से किए गए हठ के दोष से बच नहीं सकता, क्योंकि उसने मानो परमेश्वर से युद्ध करने की ठान ली है। यद्यपि अभक्त लोग इसे स्वीकार नहीं करते, तौभी यह तथ्य स्पष्ट है; और परमेश्वर ने, जो धर्मी न्यायी है, घोषित किया है कि जो भविष्यद्वक्ताओं की शिक्षा को तुच्छ जानते थे वे ऐसे ही गिने गए।

और वह कहता है, तुम्हारी हानि के लिए, ताकि वे जानें कि परमेश्वर अपना निज मुकद्दमा इसलिए नहीं लड़ता था कि उसे उनकी सेवा की आवश्यकता थी, वरन् इसलिए कि उसे उनकी भलाई की चिन्ता थी। क्योंकि यहाँ एक निहित विरोध समझना चाहिए, मानो भविष्यद्वक्ता ने कहा हो, “तुम्हारे हठीलेपन से परमेश्वर की क्या हानि हुई है? तुम ने निःसन्देह उसे उसकी महिमा से वंचित करने का प्रयत्न किया है, क्योंकि तुम ने उससे छीनी हुई लूट से अपनी मूर्तियों को सजाया है; परन्तु परमेश्वर के अधिकारों में से कुछ भी घटाना मनुष्यों के वश में नहीं है; वह सदा सिद्ध बना रहता है: इसलिए जब तुम बलवा करते हो तो उसका परिणाम केवल तुम्हारा ही विनाश होता है। अतः जब परमेश्वर अब तुम्हें डाँटता है, तब वह अपने अधिकार की रक्षा नहीं करता, मानो उसे तुम से कोई लाभ या हानि होती हो; परन्तु यह उसकी दया का प्रमाण है, क्योंकि वह नहीं चाहता कि तुम नष्ट हो जाओ, यद्यपि वह देखता है कि तुम एक पागल आवेग के द्वारा विनाश की ओर ले जाए जा रहे हो।” इसके बाद यह आता है, —

यिर्मयाह 25:8-9

8. इसलिए सेनाओं का यहोवा यों कहता है, तुम ने जो मेरे वचन नहीं माने,

8. Propterea sic dicit Jehova exercituum, Eo quod non audistis ad sermones meos (hoc est, non attenti fuistis ad sermones meos:)

9. इसलिए सुनो, मैं उत्तर में रहनेवाले सब कुलों को बुलाऊँगा, यहोवा की यह वाणी है, और अपने दास बाबुल के राजा नबूकदनेस्सर को बुलवा भेजूँगा; और उन सभों को इस देश और इसके निवासियों के विरुद्ध, और इसके आस-पास की सब जातियों के विरुद्ध भी ले आऊँगा; और इन सब देशों का मैं सत्यानाश करके उन्हें ऐसा उजाड़ दूँगा कि लोग इन्हें देखकर ताली बजाएँगे; वरन् ये सदा उजड़े ही रहेंगे।

9. Ecce ego mittam et accipiam (vel, assumam) omnes cognationes (vel, familias)

Aquilonis, dicit Jehova, et Nebuchadnezer regem Babylonis servum meum, et inducam eos in terram hanc et in habitatores ejus, et in omnes gentes istas in circuitu, et perdam eas, et ponam eas in stuporem et sibilum, et in vastitares seculi (id est, perpetuas.)

यहाँ दण्ड की घोषणा आती है; भविष्यद्वक्ता कहता है कि परमेश्वर अब और शब्दों से व्यवहार नहीं करेगा, क्योंकि उनका अधर्म पक चुका था, जैसा उत्पत्ति में लिखा है, “मेरा आत्मा मनुष्य से सदा विवाद (अथवा संघर्ष) करता न रहेगा।” (उत्पत्ति 6:3.)

जब परमेश्वर मनुष्यों की दुष्टता का प्रतिशोध लेने की तैयारी करता है, तब वह कहता है कि अब विवाद करने का समय नहीं रहा। इसलिए यहाँ न्याय के अचानक क्रियान्वयन का अभिप्राय है; परन्तु साथ ही वह दण्ड का भी उल्लेख करता है। इतनी कठोरता का कारण समझाने के बाद, अर्थात् यह कि वे परमेश्वर के वचन नहीं सुनते थे, वह जोड़ता है, देखो, मैं उत्तर के सब कुलों को बुलवा भेजूँगा और ले आऊँगा, इत्यादि। मुझे कोई सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता यहाँ राजाओं की राजाज्ञाओं की ओर संकेत करता है, क्योंकि जब वे सेना इकट्ठी करना चाहते हैं तो वे अपनी राजाज्ञाएँ प्रकाशित करते हैं, और जिन्होंने अपने नाम लिखवाए हैं या जो सैनिक भरती किए गए हैं, उन्हें सब स्थानों से इकट्ठे होने की आज्ञा देते हैं। इसी प्रकार परमेश्वर अब इन शब्दों के द्वारा संकेत करता है कि कसदी उसके अधिकार में थे, यहाँ तक कि जैसे ही वह उन्हें संकेत दे, वे तैयार थे; उन अन्य कथन-शैलियों के अनुसार जिनका वह अन्य स्थानों में, परन्तु इसी अर्थ में, प्रयोग करता है, “मैं सीटी बजाऊँगा,” और यह भी, “मैं युद्ध की ललकार भेजूँगा।” पवित्रशास्त्र इस प्रकार के कथनों से भरा है, जो दिखाते हैं कि सब नश्वर मनुष्य परमेश्वर की आज्ञा मानने को तैयार रहते हैं, जब भी वह उनकी सेवाओं को काम में लाना चाहता है; इसलिए नहीं कि परमेश्वर की सेवा करना उनका उद्देश्य होता है, वरन् इसलिए कि वह एक गुप्त प्रभाव के द्वारा उन पर और उनकी जीभों पर, उनके मनों और हृदयों पर, उनके हाथों और पाँवों पर ऐसा शासन करता है कि वे, चाहें या न चाहें, उसकी इच्छा और प्रसन्नता को पूरा करने के लिए विवश होते हैं। और इसी अर्थ में वह नबूकदनेस्सर को अपना दास कहता है, क्योंकि उस क्रूर अत्याचारी ने कभी परमेश्वर को अपनी सेवा अर्पित करने का विचार नहीं किया; परन्तु परमेश्वर ने उसे अपने उपकरण के रूप में काम में लिया, मानो उसने उसे मज़दूरी पर रखा हो। और हम अन्यत्र भी देखेंगे कि उसे परमेश्वर का दास कहा गया है।

और इस पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि इससे हम यह तथ्य सीखते हैं कि बहुत से लोग परमेश्वर के दास हैं जो फिर भी इतनी आदरणीय उपाधि के पूर्णतः अयोग्य हैं; परन्तु वे अपने आप के सम्बन्ध में ऐसे नहीं कहलाते। नबूकदनेस्सर सोचता था कि जब उसने यहूदिया पर चढ़ाई की, तब वह इस्राएल के परमेश्वर से युद्ध कर रहा था; और केवल महत्त्वाकांक्षा, लोभ और क्रूरता ने उसे इतने युद्ध छेड़ने को उकसाया था। इसलिए जब हम उसके, उसकी योजनाओं और उसकी युक्तियों के विषय में सोचते हैं, तो हम नहीं कह सकते कि वह परमेश्वर का दास था; परन्तु यह केवल परमेश्वर से सम्बन्धित है, जो अपनी गुप्त और अगम्य सामर्थ्य के द्वारा शैतान और अभक्तों दोनों पर ऐसा शासन करता है कि वे अनजाने में ही, जो कुछ वह ठहराता है उसे पूरा करते हैं। इनमें और परमेश्वर के उन दासों में बड़ा अन्तर है, जो, जब उन्हें कोई आज्ञा दी जाती है, तब वह आज्ञाकारिता प्रकट करने का प्रयत्न करते हैं जो उन्हें करनी चाहिए, — ऐसे सब लोग विश्वासयोग्य दास हैं। इसलिए वे उचित ही परमेश्वर के दास कहलाते हैं, क्योंकि परमेश्वर और उनके बीच परस्पर सामंजस्य है: परमेश्वर आज्ञा देता है, और वे मानते हैं। परन्तु जब अभक्त लोग अपने मन के उद्देश्य से परे ले जाए जाते हैं, और परमेश्वर उन्हें उपकरणों के रूप में काम में लाता है जबकि वे किसी और बात का विचार और योजना करते हैं, तो वह एक अधूरी और आधी सेवा है।

साथ ही यह भी ध्यान देना चाहिए कि दास का यह नाम, यद्यपि निम्नतर अर्थ में, नबूकदनेस्सर को आदर के लिए दिया गया है, ताकि यहूदी लज्जित किए जाएँ; क्योंकि यह उनके लिए बड़ी निन्दा की बात थी कि एक अन्यजाति को परमेश्वर ने चुना था, और उसने दास की उपाधि पाई थी, जबकि वे स्वयं पराए हो गए थे। इसलिए भविष्यद्वक्ता का निःसन्देह यह अभिप्राय था कि बाबुल के राजा को इस प्रतिष्ठा तक उठाकर उन पर निन्दा डाले। एक और कारण भी था, अर्थात् यह कि यहूदी जान लें कि जो कुछ उन्हें सहना था वह परमेश्वर के हाथ से उन पर डाला जाएगा, और वे नबूकदनेस्सर को परमेश्वर के कोड़े के सिवाय और कुछ न समझें, ताकि इस प्रकार वे अपने पापों को मान लेने और सचमुच दीन होने की ओर ले जाए जाएँ। अब हम इन शब्दों का अर्थ समझते हैं।

इसके बाद वह कहता है, मैं उन्हें इस देश पर और इसके सब निवासियों पर ले आऊँगा, इत्यादि। इन शब्दों से वह उस बात की पुष्टि करता है जिसका मैं ने अभी उल्लेख किया, कि ज्योंही परमेश्वर ने यहूदियों से उनकी योग्यता के अनुसार व्यवहार करने की ठानी, त्योंही उसका पलटा तैयार था। जैसे उसने तब कहा था कि नबूकदनेस्सर और उत्तर के सब लोग उसके द्वारा भाड़े के सैनिकों के समान तैयार किए गए हैं, वैसे ही अब वह आगे कहता है कि विजय उसी के हाथ में थी — वह कहता है, मैं उन्हें इस देश पर, और चारों ओर की सब पड़ोसी जातियों पर ले आऊँगा। भविष्यद्वक्ता यहाँ अन्य जातियों पर दण्ड की घोषणा क्यों करता है, यह हम अन्यत्र देखेंगे।

यहूदी, अन्य व्यर्थ भरोसों के अतिरिक्त, अपने आप को इस बात से भी फुसलाया करते थे, कि यदि नबूकदनेस्सर दूसरों के प्रदेशों पर चढ़ाई करे, तो सब मिलकर उसके विरुद्ध एक हो जाएँगे, और ऐसे गठबन्धन के द्वारा वे सहज ही उस पर जय पा लेंगे।

अतः जब यहूदी चारों ओर दृष्टि करते थे, और जानते थे कि मिस्री उनके साथ वाचा में बंधे हैं, और उन्हें यह भी निश्चय था कि मोआबी, सोरी, अरामी और बाकी सब भी उनके संगी हो जाएँगे, तब वे निडर हो गए, और उस निश्चिन्तता में पड़े रहे जिसके द्वारा उन्होंने अपने आप को धोखा दिया। इसलिए यही कारण है कि भविष्यद्वक्ता उन जातियों को, जिनसे वे घिरे हुए थे, स्पष्ट रूप से धमकाता है — उन जातियों के निमित्त नहीं, वरन् इसलिए कि यहूदी अपना व्यर्थ भरोसा रखना छोड़ दें।

परमेश्वर कहता है कि वह यहूदियों के साथ-साथ सब जातियों को भी चकित होने का कारण, और सुसकारने का विषय, और सदा के लिए उजाड़ कर देगा। वह संकेत करता है कि यह ऐसी भयानक विपत्ति होगी कि जो कोई उसका समाचार सुनेगा वह चकित हो जाएगा। जैसा अन्यत्र कहा गया है, "केवल उसका समाचार ही भय उत्पन्न करेगा;" वैसे ही इस स्थान पर, मैं उन्हें चकित होने का कारण बनाऊँगा। जब कोई साधारण विपत्ति हमें सुनाई जाती है, तब हम निश्चय ही दया से भर जाते हैं; परन्तु जब बुराई की विशालता विश्वास से परे होती है, तब हम विस्मित खड़े रह जाते हैं, और हमारी सारी इन्द्रियाँ सुन्न हो जाती हैं। अतः भविष्यद्वक्ता का अर्थ यह है कि जो विपत्ति परमेश्वर यहूदियों पर लाएगा वह मानो ऐसी विकराल होगी कि उसका समाचार सुननेवाले सब लोग स्तब्ध हो जाएँगे।

129 "देश के ऊपर या पर," इत्यादि, न कि "के विरुद्ध;" क्योंकि शब्दशः यह है, "मैं उन्हें इस देश के ऊपर ले आऊँगा," इत्यादि। वुल्गेट में भी ऐसा ही है। — सं.

130 इन तीन शब्दों का अनुवाद सेप्टुआजिंट और अरबी में "विनाश — सुसकार — सदा की निन्दा;" वुल्गेट में "विस्मय — सुसकार — सदा के सुनसान स्थान;" टार्गुम में "उजाड़ — विस्मय — सदा के उजाड़;" और सीरियाई में "विस्मय — सुसकार — सदा के लिए उजाड़" किया गया है। पहला शब्द, {,{שמה, पहले उजाड़ या वीरानी का अर्थ देता है, और फिर उसका जो उजाड़ से उत्पन्न होता है, अर्थात् अचम्भा या विस्मय। यहाँ स्पष्ट रूप से इसका दूसरा अर्थ है, क्योंकि उजाड़ अन्तिम शब्द के द्वारा व्यक्त किया गया है; वुल्गेट, सीरियाई, और हमारे अनुवाद में इसका यही अनुवाद किया गया है, और ब्लेनी तथा अन्य लोगों ने भी ऐसा ही किया है। ये दोनों शब्द फिर ग्यारहवें पद में एक साथ पाए जाते हैं। यहाँ, जैसा प्रायः होता है, क्रम उलटा है; पहले परिणाम का उल्लेख है, फिर कारण का: विस्मय और सुसकार का कारण उजाड़ होंगे। — सं.

अन्त में वह आगे कहता है कि वे सदा के उजाड़ होंगे। वह बाद में निस्सन्देह इन शब्दों की कठोरता को कम कर देता है; क्योंकि वह परमेश्वर के पलटे को सत्तर वर्षों तक सीमित करता है। परन्तु बोलने की यह रीति पवित्रशास्त्र में सामान्य है; क्योंकि {,}עולםoulam थोड़े समय के विपरीत रखा जाता है। स्थान की परिस्थितियों के अनुसार इसे भिन्न-भिन्न अर्थों में लेना चाहिए। कभी-कभी यह अनन्तता को सूचित करता है, जैसे जब भविष्यद्वक्ता कहता है, पीढ़ी से पीढ़ी तक, अर्थात् लगातार युगों तक, या वर्षों के ऐसे क्रम तक जो सदा बना रहेगा। परन्तु युग, या {,}עולםoulam, को प्रायः उस समय के लिए लेना चाहिए जो मसीह के आगमन तक प्रजा के लिए ठहराया गया था; और कभी-कभी इसका अर्थ केवल लम्बा समय होता है, जैसा यहाँ और बहुत से अन्य स्थानों में। आगे यह आता है, —

यिर्मयाह 25:10

10. इसके अतिरिक्त मैं इनमें से हर्ष का शब्द और आनन्द का शब्द, दुल्हे का शब्द और दुल्हिन का शब्द, चक्की का शब्द और दीये का उजियाला दूर कर दूँगा।

10. Et transire faciam (hoc est, auferam) ab ipsis vocem gaudii, et vocem laetitiae, vocem sponsi et vocem sponsae, vocem molarum (id est, strepitum molarum) et lumen lucernae.

वह यहाँ उस बात की पुष्टि करता है जो मैं ने अभी कही, — कि यहूदियों को साधारण रीति से ताड़ना नहीं दी जाएगी, वरन् वे अत्यन्त संकट में डाले जाएँगे। क्योंकि यद्यपि सब बातें हमारे लिए सफल और हमारी इच्छाओं के अनुसार न हों, तौभी विवाह तो मनाए जा सकते हैं, और कुछ प्रसन्नता बनी रह सकती है; हम फिर भी खा-पी सकते हैं और जीवन की आवश्यक वस्तुओं का आनन्द ले सकते हैं, चाहे हमें कोई सुख-विलास न मिले; परन्तु भविष्यद्वक्ता यहाँ दिखाता है कि देश का उजाड़ ऐसा होगा कि विवाहों का विचार तक न रहेगा, सारी प्रसन्नता और आनन्द समाप्त हो जाएगा, भोजन की कोई तैयारी न होगी, अन्न न पीसा जाएगा, और संक्षेप में, सब भोज जो साधारणतः दीयों के उजियाले में मनाए जाते हैं, फिर न मनाए जाएँगे। अतः यहाँ वह उस उजाड़ का जीता-जागता वर्णन करता है जिसका उल्लेख पहले हो चुका था।

निस्सन्देह भविष्यद्वक्ता परोक्ष रूप से उस संवेदनहीनता की निन्दा करता है जिसके द्वारा शैतान ने लोगों के मनों को अपने वश में कर लिया था; क्योंकि यद्यपि भविष्यद्वक्ता उन्हें निरन्तर धमकाते रहे, तौभी उनकी रंगरलियों का न कोई अन्त था और न उनमें कोई संयम, जैसा यशायाह कहता है, जो ऐसी उच्छृंखलता की शिकायत करता है कि वे कहते थे, "आओ, खाएँ-पीएँ, क्योंकि कल तो मरना है;" और जो यह भी कहता है, "मैं ने तुम्हें टाट और राख के लिए बुलाया, परन्तु तुम वीणा और भोजों की ओर गए।"

(यशायाह 22:12, 13)

अतः जब भविष्यद्वक्ता यहाँ हर्ष और आनन्द के शब्द, चक्कियों के शब्द, और दीयों की चर्चा करता है, तब वह निस्सन्देह उनकी मूर्ख निश्चिन्तता के लिए उन्हें उलाहना देता है; क्योंकि वे किसी बात से न डरते थे, और उस समय भी अपने आप को सुरक्षित समझते थे जब परमेश्वर मानो बढ़ाए हुए हाथ से अपने आप को उनका पलटा लेनेवाला न्यायी प्रगट कर रहा था। आगे यह आता है, यिर्मयाह 25:11

131 क्योंकि यह पद पिछले पद से जुड़ा हुआ है, इसलिए {{ו का अनुवाद "क्योंकि" करना अच्छा होगा, — 10. क्योंकि मैं उनके बीच से उल्लास का शब्द और आनन्द का शब्द, दुल्हे का शब्द और दुल्हिन का शब्द, चक्की का शब्द और दीये का उजियाला मिटा दूँगा। पीसने का समय भोर था; भोर को सबसे पहला काम यही था, और यह प्रतिदिन किया जाता था। दीये के उजियाले का समय साँझ था; जब यह लुप्त हो जाता है, तो यह इस बात का प्रमाण है कि वहाँ कोई निवासी नहीं हैं। — सं.

11. और यह सारा देश उजाड़ और विस्मय का कारण हो जाएगा; और ये जातियाँ सत्तर वर्ष तक बाबुल के राजा की सेवा करेंगी।

11. Et erit tota terra haec in vastitatem et in stuporem, et servient gentes hae regi Babylonis septuaginta annis.

यहाँ भविष्यद्वक्ता उस सीमा का उल्लेख करता है जिसकी चर्चा मैं ने की है, और इस प्रकार वह उनके दण्ड की कठोरता को कम करता है। अतः यह एक प्रकार का सुधार है; इसलिए नहीं कि वह कुछ बदलता है, परन्तु केवल इस प्रकार के सुधार के द्वारा वह समझाता है कि सदा के उजाड़ से पहले उसका क्या अभिप्राय था।

वह कहता है, सारा देश उजाड़ और विस्मय का कारण होगा, या जैसा कुछ लोग अनुवाद करते हैं, "वीरानी।" शब्द {,}שמם का अर्थ निस्सन्देह उजाड़ करना है, और चकित करना भी; परन्तु क्योंकि उसने अभी-अभी इस शब्द का प्रयोग विस्मय के अर्थ में किया था, इसलिए मुझे यहाँ इसका अर्थ बदलने का कोई कारण नहीं दिखता, विशेष करके जब यह {,}חרבה charebe के साथ जुड़ा हुआ है। परन्तु इस स्थान के आशय के विषय में इससे अधिक अन्तर नहीं पड़ता कि हम कहें, देश उजाड़ होगा, या विस्मय का कारण; क्योंकि उसे सुनसान होना था — उजाड़ या जंगल बन जाना था।

और ये जातियाँ सत्तर वर्ष तक बाबुल के राजा की सेवा करेंगी — यहाँ भविष्यद्वक्ता प्रजा की आनेवाली विपत्ति के विषय में अपनी भविष्यद्वाणी को समाप्त करता है, अर्थात् यह कि देश ऐसा सुनसान कर दिया जाएगा कि उसमें से होकर जानेवाला हर एक चकित होगा, या यह कि अपने उजाड़ के कारण वह एक भयानक दृश्य बन जाएगा।

और यह कि सत्तर वर्ष का समय ठहराया गया, यह परमेश्वर की अपनी प्रजा के प्रति पितृवत् कृपा की साक्षी थी — सारी भीड़ के प्रति बिना भेद के नहीं, वरन् उस बचे हुए भाग के प्रति जिसके विषय में उसने अन्यत्र कहा था। अतः भविष्यद्वक्ता का अर्थ यह है कि यहूदियों ने चाहे कितना ही भारी पाप किया हो, तौभी परमेश्वर केवल अस्थायी दण्ड देगा; क्योंकि सत्तर वर्ष के बाद, जैसा हम देखेंगे, वह उन्हें उनके अपने देश में लौटा लाएगा, और जो कुछ उन्होंने खो दिया था उसकी पूर्ति करेगा, अर्थात् प्रतिज्ञा के देश में निवास, पवित्र नगर, और मन्दिर। और यह बात अगले पद में और भी पूरी रीति से व्यक्त की गई है।

यिर्मयाह 25:12

12. और जब सत्तर वर्ष पूरे हो जाएँगे, तब मैं बाबुल के राजा को और उस जाति को, यहोवा की यह वाणी है, उनके अधर्म का दण्ड दूँगा, और कसदियों के देश को भी, और उसे सदा के लिए उजाड़ कर दूँगा।

12. Et erit cum impleti fuerint septuaginta anni, visitabo super regem Babylonis et super populum ejus, dicit Jehova, iniquitatem ipsorum, et super terram Chaldaorum, et ponam eam in desolationes saeculi (id est, perpetuas.)

अब भविष्यद्वक्ता, जैसा मैं ने कहा है, अधिक स्पष्ट रूप से दिखाता है कि बँधुआई और निर्वासन का समय क्यों निर्धारित किया गया था, अर्थात् इसलिए कि विश्वासी जान लें कि परमेश्वर अपनी वाचा को नहीं भूलेगा, यद्यपि उसने प्रजा को देश के निज भाग से वंचित कर दिया।

132 क्योंकि पहले शब्द का अर्थ उजाड़ या वीरानी है, और इसका और कोई अर्थ नहीं, और क्योंकि दूसरे शब्द का अर्थ उजाड़ के साथ-साथ विस्मय भी है, इसलिए हमारे अनुवाद का, और कैल्विन का, अनुवाद अवश्य ही सही है। जैसा सामान्यतः होता है, उनका क्रम यहाँ उलटा है, और नौवें पद में जिस क्रम में वे पाए जाते हैं उससे भिन्न है। — सं.

ये शब्द सारी प्रजा को बिना भेद के सम्बोधित नहीं किए गए थे, जैसा हम पहले अन्य स्थानों में देख चुके हैं; परन्तु भविष्यद्वक्ता परमेश्वर के चुने हुए लोगों की भलाई का ध्यान रखना चाहता था, जो सदा सच्चे धर्म की चिन्ता बनाए रखते थे; क्योंकि यदि यह प्रतिज्ञा न जोड़ी जाती तो वे सौ बार निराश हो गए होते। अतः यह एक विशेष शिक्षा थी, जो परमेश्वर की सन्तान के लिए भोजन के रूप में ठहराई गई थी; क्योंकि उसने मानो अलग से केवल चुने हुओं और विश्वासियों को सम्बोधित किया।

परमेश्वर यह भी कहता है कि सत्तर वर्ष के अन्त में वह बाबुल के राजा के, और उसकी सारी प्रजा के अधर्म का दण्ड देगा। इससे हम सीखते हैं कि नबूकदनेस्सर परमेश्वर का दास इसलिए नहीं कहलाया कि वह अपनी सेवा के कारण किसी प्रतिफल के योग्य था, वरन् इसलिए कि परमेश्वर ने उसे, जब वह स्वयं अनजान था या ऐसी किसी बात का विचार भी न करता था, एक ऐसी सेवा करने को चलाया जिसे न तो वह और न उसकी प्रजा परमेश्वर के लिए की गई समझती थी। अतः यद्यपि प्रभु अपने न्याय-दण्डों को पूरा करने में दुष्टों को काम में लाता है, तौभी इस कारण उनका दोष कम नहीं होता; वे फिर भी परमेश्वर के न्याय के अधीन रहते हैं। और ये दोनों बातें आपस में भली भाँति मेल खाती हैं, — कि शैतान और सब दुष्ट परमेश्वर की सेवा करते हैं, यद्यपि अपनी इच्छा से नहीं, वरन् जब कभी वह उन्हें अपनी गुप्त सामर्थ से खींचता है, और फिर भी वे न्यायपूर्वक दण्ड पाते हैं, तब भी जब उन्होंने परमेश्वर की सेवा की हो; क्योंकि यद्यपि वे उसका काम करते हैं, तौभी इसलिए नहीं कि उन्हें ऐसा करने की आज्ञा दी गई है। इसलिए वे न्यायपूर्वक दण्ड के भागी हैं, जैसा भविष्यद्वक्ता हमें यहाँ सिखाता है।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे, कि जैसे हम हर ओर तेरे क्रोध के प्रमाण देखते हैं, और जैसे हम में से हर एक का अपना विवेक उसे दोषी ठहराता है, यहाँ तक कि हम यह मानने को विवश हैं कि हम सब, बड़े से लेकर छोटे तक, तेरे सामने अपराधी हैं, — हाँ, यह वरदान दे कि हम उचित समय पर सीधे मार्ग पर लौट आएँ, और तुझ से मेल-मिलाप करने का यत्न करें, और कभी सन्देह न करें कि जब कभी हम तेरे एकलौते पुत्र के नाम में क्षमा माँगेंगे, तब तू हम पर दयालु और अनुग्रहकारी होगा; और हमारा तुझ से ऐसा मेल-मिलाप हो कि हम जान लें कि तू अपने आत्मा के द्वारा हम पर शासन करते हुए सचमुच हमारे पिता के रूप में हमारे साथ है, जिससे तेरे नाम की अन्त तक महिमा होती रहे, हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा।

पंचानबेवाँ व्याख्यान

पिछले व्याख्यान में हमने उस पद की व्याख्या की जिसमें परमेश्वर ने घोषणा की कि वह बाबुल के राजा और उसकी प्रजा को इस्राएलियों के प्रति उनकी क्रूरता के कारण दण्ड देगा। हमने कहा कि यह विशेष रूप से चुने हुए लोगों को सम्बोधित किया गया था, क्योंकि प्रजा में से बहुत से उद्धार की आशा के बिना नष्ट हो गए। परन्तु परमेश्वर इस बीच बचे हुओं के लिए अपनी चिन्ता प्रगट करना चाहता था; और इसी कारण उसने निर्वासन का समय निर्धारित किया, और भविष्यद्वाणी की कि वह बाबुलियों का शत्रु होगा, क्योंकि वह अपनी प्रजा का पक्ष लेगा।

एक बात मैं ने नहीं समझाई, अर्थात् वह जो भविष्यद्वक्ता अनन्त निन्दाओं के विषय में कहता है।

अब ऐसा प्रतीत होता है कि यह पूरा नहीं हुआ; क्योंकि यद्यपि सत्तर वर्ष के बाद बाबुल ले लिया गया और अधीनता की दशा में पहुँचा दिया गया, तौभी वह नगर स्वयं सुरक्षित रहा, और बहुत युगों तक अपने बड़े वैभव के लिए प्रसिद्ध रहा। अतः भविष्यद्वक्ता इन उजाड़ों के विषय में बोलते हुए सत्य की सीमाओं से आगे बढ़ गया प्रतीत होता है; क्योंकि जब मादियों और फारसियों ने नगर को ले लिया तब ऐसा कुछ नहीं हुआ। परन्तु, जैसा हम अन्यत्र कह चुके हैं, जो कुछ भविष्यद्वक्ताओं ने बहुत से स्थानों में बाबुल के विनाश के विषय में कहा है उसे हमें एक ही समय तक सीमित नहीं करना चाहिए; क्योंकि परमेश्वर को यह भाया कि वह विभिन्न रीतियों से और भिन्न-भिन्न समयों में उस जाति से अपना पलटा ले; और इतिहास से यह स्पष्ट प्रगट होता है कि बाबुलियों के लिए इतनी विपत्तियाँ सहने की अपेक्षा एक ही बार में नष्ट हो जाना भला होता। क्योंकि थोड़े ही समय बाद, जब लोगों ने फारसियों से विद्रोह किया, तो ज़ोपाइरस की युक्ति और चतुराई से नगर फिर ले लिया गया; तब प्रधान लोग दासत्व में डाल दिए गए, यहाँ तक कि कोई प्रतिष्ठा न बची। बाद में सिकन्दर ने उसे ले लिया; और उसके बाद सेल्यूकस ने उस पर अधिकार कर लिया। फिर उसके खण्डहरों पर टेसिफ़ोन नगर बसाया गया, और अन्ततः वह धीरे-धीरे क्षीण हो गया। परन्तु कोई भी परिवर्तन नगर के धन-वैभव में बड़ी कमी के बिना नहीं हुआ; और उसके लिए इससे बढ़कर अपमानजनक बात और कुछ नहीं हो सकती थी कि जो अधिकार में थे वे पकड़े जाएँ और सूलियों पर लटकाए जाएँ, जैसा ज़ेनोफ़ोन और अन्य इतिहासकार बताते हैं।

अतः अब हम देखते हैं कि यह स्थान, और इसके समान अन्य स्थान, किस प्रकार समझे जाने चाहिए; क्योंकि परमेश्वर पलटे के केवल एक ही समय की बात नहीं करता, वरन् वह उन सब न्याय-दण्डों को सम्मिलित करता है जिनके द्वारा उसने अपनी प्रजा पर किए गए अन्यायों का पलटा लिया। अब आगे यह आता है, —

यिर्मयाह 25:13

13. और मैं उस देश पर अपने वे सब वचन ले आऊँगा जो मैं ने उसके विरुद्ध कहे हैं, अर्थात् वह सब जो इस पुस्तक में लिखा है, जो यिर्मयाह ने सब जातियों के विरुद्ध भविष्यद्वाणी करके कहा है।

13. Et adducam super terram illam omnes sermones meos quod loquutus sum super eam, quicquid scriptum est in libro hoc, quod prophetavit Jeremias super omnes gentes (vel in quo prophetavit, si placeat referre ad librum.)

वह उस बात की पुष्टि करता है जो उसने पहले कही थी, जब वह कहता है कि वह अपने सब वचन कसदियों पर ले आएगा; अर्थात् वह सब भविष्यद्वाणियों को पूरा करेगा, जिससे यह प्रगट हो जाए कि यिर्मयाह ने कुछ भी बिना सोचे-समझे पहले से नहीं कहा था, और कि परमेश्वर ने अपने दास के मुँह से उन्हें व्यर्थ नहीं धमकाया था। यही अर्थ है, और इससे हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता का क्या संकेत है जब वह कहता है कि परमेश्वर अपने सब वचन ले आएगा, क्योंकि वह तब कह चुका था। परन्तु क्योंकि दुष्ट लोग परमेश्वर के नाम से कही गई हर बात को खेल और ठट्ठे की वस्तु समझते हैं, और ढिठाई से सब धमकियों का उपहास करते हैं, इसलिए वचनों को ले आने का अर्थ यही है कि घटनाओं के द्वारा यह प्रमाणित करना कि परमेश्वर मनुष्यों को अपने वचन पूरे किए बिना नहीं डराता; संक्षेप में, वचनों को ले आना उनके अधिकार को प्रमाणित करना है। और, जैसा मैं ने कहा है, यह अभिव्यक्ति मनुष्यों की उस संवेदनहीनता की ओर संकेत करती है, जो परमेश्वर के वचनों पर तब तक विश्वास नहीं करते जब तक उनकी पूर्ति से उन्हें निश्चय न हो जाए; क्योंकि वे सोचते हैं कि केवल हवा पीटी जा रही है, और इस प्रकार उन्हें किसी भय का स्पर्श नहीं होता। परन्तु जब परमेश्वर वह पूरा करता है जिसकी उसने भविष्यद्वाणी की थी, तब वह अपने वचन की सामर्थ प्रमाणित करता है।

अतः हम देखते हैं कि इस पद में भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय इसके सिवा और कुछ नहीं कि जो उसने पहले कहा था उसकी पुष्टि करे। और वह कसदिया की चर्चा करता है और कहता है, उस देश पर।

और साथ ही हमें बोलने की एक और रीति पर ध्यान देना चाहिए; क्योंकि परमेश्वर कहता है कि उसने ये वचन कहे थे; फिर वह कहता है कि यिर्मयाह उसका सेवक, और मानो उसका दूत था; और वह उसे लेखक या लिखनेवाला भी कहता है। अतः परमेश्वर यहाँ घोषणा करता है कि जो कुछ यिर्मयाह ने प्रस्तुत किया था उस सब का रचयिता वही था; और फिर भी वह अपना पद अपने सेवक के लिए छोड़ता है, क्योंकि भविष्यद्वक्ताओं के लिए अधिकार सुरक्षित करना आवश्यक है; अन्यथा, जब तक परमेश्वर प्रत्यक्ष रूप से स्वर्ग से न उतरे, मनुष्य या तो जो कुछ कहा जाए उसे बिना भेद के मान लेते, और बिना विवेक के झूठ और सत्य दोनों ग्रहण कर लेते, या वे पूरी तरह से कठोर हो जाते, यहाँ तक कि भविष्यद्वाणी की शिक्षा पर कोई विश्वास न करते। वह कहता है, जो कुछ इस पुस्तक में लिखा है। निस्सन्देह भविष्यद्वक्ता ने जो कुछ सुनाया था उसका सारांश लिख लिया; क्योंकि, जैसा हम अन्यत्र कह चुके हैं, भविष्यद्वक्ताओं की यह रीति थी कि जब वे लोगों से विस्तार से बोल चुकते और विस्तारपूर्वक प्रचार कर चुकते, तब वे एक छोटा सा सारांश मन्दिर के द्वारों पर लगा देते थे। अतः यही वह खण्ड है जिसे यिर्मयाह पुस्तक कहता है, जो उसके सार्वजनिक प्रवचनों से संकलित किया गया था। साधारण भाषा में इसे सारांश कहा जा सकता है। फिर वह आगे कहता है, जिसमें, या, "जो उसने भविष्यद्वाणी की," यह दिखाने के लिए कि उसका अभिप्राय वही था जो उसने पहले कहा था; और इसका अनुवाद इस प्रकार किया जा सकता है, अर्थात् जो उसने भविष्यद्वाणी की; परन्तु दूसरी व्याख्या भी अनुपयुक्त नहीं, जिसमें यिर्मयाह ने सब जातियों के विरुद्ध भविष्यद्वाणी की है। आगे यह आता है, —

यिर्मयाह 25:14

14. क्योंकि बहुत सी जातियाँ और बड़े-बड़े राजा उनसे भी अपनी सेवा करवाएँगे; और मैं उनको उनकी करनी के अनुसार, और उनके अपने हाथों के कामों के अनुसार बदला दूँगा।

14. Quia fecerunt in illis (vel, quia coegerunt eos) in servitutem etiam ipsi, gentes multae (vel, robustae, vel, validae) et reges magni; et rependam illis secundum actionem suam et seceundum opus manuum ipsorum.

पद का आरम्भ अस्पष्ट है। जब क्रिया {,}עבדobed के बाद {,}בbeth आता है, तो वे सोचते हैं कि इसे सकर्मक रूप में लेना चाहिए, और इसका अनुवाद यह करना चाहिए, बलपूर्वक दासत्व में डालना या धकेलना। इसका उचित अर्थ है, सेवा करना; परन्तु वे सोचते हैं कि जब यह यहाँ के समान पाया जाता है तो यह सकर्मक क्रिया है। कुछ इसका अनुवाद करते हैं, "उन्होंने उन्हें काम में लगाया;" परन्तु यह फीका और अस्पष्ट है; क्योंकि मित्रों के विषय में भी कहा जा सकता है कि वे एक दूसरे को काम में लगाते हैं, जब काम परस्पर होता है; इसलिए अर्थ पर्याप्त रूप से व्यक्त नहीं होता। परन्तु अर्थ एक व्याख्यात्मक वाक्य के द्वारा दिया जा सकता है, कि उन्होंने "उन्हें बलपूर्वक दासत्व में डाल दिया।" फिर भी भविष्यद्वक्ता का अर्थ अभी पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं है; क्योंकि {,}עבדוobedu को भूतकाल या भविष्यत्काल दोनों में लिया जा सकता है। यह है तो भूतकाल में; परन्तु भूतकाल भविष्यत्काल के लिए लिया जा सकता है: इस प्रकार अर्थ भिन्न हो सकता है। यदि इसे भूतकाल में लिया जाए, तो यह बाबुलियों को छोड़ और किसी पर लागू नहीं किया जा सकता; क्योंकि वे ही थे जिन्होंने इस्राएलियों से दासों का सा व्यवहार किया था, या उन्हें बलपूर्वक दासत्व में डाला था; और {,}בםbem, "उन्हें," इस्राएलियों के विषय में समझा जा सकता है; क्योंकि हम जानते हैं कि जब कलीसिया, या परमेश्वर की चुनी हुई प्रजा, विषय होती है, तब सर्वनाम प्रायः इसी प्रकार प्रयुक्त होते हैं। तब भविष्यद्वक्ता के शब्दों का अनुवाद इस प्रकार किया जा सकता है, "क्योंकि उन्होंने उन पर," अर्थात् इस्राएलियों पर, "अत्याचारपूर्वक शासन किया है, और वे स्वयं," अर्थात् इस्राएली, अपनी बारी में शासन करेंगे — ये पिछले शब्द समझ लिए जाते हैं। परन्तु मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि अर्थ अधिक सरल होगा, यदि हम सारे वाक्य को एक साथ इस प्रकार पढ़ें, "क्योंकि वे भी स्वयं उन पर, अर्थात् बलवन्त और पराक्रमी जातियों और बड़े राजाओं पर शासन करेंगे, और मैं उन्हें बदला दूँगा," इत्यादि।

जिस कारण ने मुझे यह व्याख्या देने के लिए विवश किया है वह यह है: पिछले पद में कहा गया है कि यिर्मयाह ने सब जातियों के विरुद्ध भविष्यद्वाणी की; फिर एक व्याख्या आती है, और भविष्यद्वक्ता संक्षेप में दिखाता है, या हमें स्मरण दिलाता है, कि इन भविष्यद्वाणियों का परिणाम क्या होगा, अर्थात् यह कि वे भी स्वयं इन जातियों पर शासन करेंगे।

133 यदि पुस्तक अभिप्रेत होती, तो {,{אשר, जिसमें, के पश्चात् क्रिया के बाद एक सर्वनाम आता, जिसके पहले पूर्वसर्ग ,{}ב, में, लगा होता; क्योंकि भाषा का मुहावरा यही है। सब अनुवाद इस वाक्यांश का अनुवाद करते हैं, "जो कुछ यिर्मयाह ने भविष्यद्वाणी की," इत्यादि। — सं.

फिर {,}בםbem, जैसा मैं समझता हूँ, बाबुलियों और अन्य अन्यजाति जातियों की ओर संकेत करता है; और भविष्यद्वक्ताओं में यह एक सामान्य बात है कि जब वे प्राचीन कलीसिया की पुनःस्थापना और मसीह के आगमन की चर्चा करते हैं, तब वे परमेश्वर की सन्तान को यह सामर्थ देने की प्रतिज्ञा करते हैं कि वे सारे संसार को अपने पाँवों तले रखें। जब हम यह अनुवाद देते हैं, "वे शासन करेंगे," तो वाक्य भी अधिक सुचारु रूप से बहता है। काल के विषय में निस्सन्देह एक परिवर्तन है, परन्तु इब्रानी में यह सामान्य बात है। तो यह इस प्रकार है; क्योंकि वे उन पर, अर्थात् जातियों पर, शासन करेंगे।

यिर्मयाह ने सब अन्यजाति जातियों के विषय में कहा था; उस सब का उल्लेख हो चुका था जो उसने सब जातियों के विरुद्ध भविष्यद्वाणी की थी; और अब वह वह बात कहता है जो अविश्वसनीय प्रतीत होती थी, और इसलिए अव्यय {,}גםgam लाया गया है, "ये ही इस्राएली भी," मानो उसने कहा हो, "यद्यपि यह आशा के विपरीत होगा, यहाँ तक कि विचित्र और कपोलकल्पित प्रतीत होगा, तौभी परमेश्वर परिणाम के द्वारा दिखाएगा कि उसने यह मुझ पर व्यर्थ प्रगट नहीं किया; क्योंकि वे, अर्थात् इस्राएली भी, प्रभुता करने की अपनी बारी पाएँगे; और वे सब जातियों को अपनी आज्ञा मानने के लिए विवश करेंगे।" और जो आगे आता है वह मेरे विचार की पुष्टि करता है; क्योंकि वह आगे कहता है, बलवन्त जातियों पर, {,}גוים{ }רביםguim rebim, (क्योंकि {,}בbeth यहाँ दोहराया जा सकता है;) या हम इन शब्दों का अनुवाद "बहुत सी जातियाँ" कर सकते हैं; क्योंकि शब्द {,}רבים rebim के दोनों अर्थ हैं; परन्तु क्योंकि इसके बाद "और बड़े राजा" आता है, इसलिए मैं इन शब्दों का अनुवाद "बलवन्त जातियाँ" करना चाहता हूँ। तब वह कहता है, "क्योंकि वे बलवन्त जातियों और बड़े राजाओं पर शासन करेंगे।"

फिर वह जोड़ता है, मैं उन्हें, अर्थात् राजाओं और जातियों दोनों को, उनकी करनी के अनुसार, और उनके हाथों के काम के अनुसार बदला दूँगा, क्योंकि उन्होंने दुखी इस्राएलियों के प्रति हर प्रकार की क्रूरता की थी। इसलिए भविष्यद्वक्ता उसी विषय को आगे बढ़ाता है, — कि परमेश्वर अन्त में सचमुच दिखाएगा कि यद्यपि वह अपनी कलीसिया से क्रुद्ध हुआ था, तौभी दया की सारी आशा नष्ट नहीं हुई थी, क्योंकि वह अपनी वाचा को स्मरण रखता था। इस प्रकार वह उस बात की कठोरता को कम करता है जो उसने पहले कही थी; वह उनसे उससे कहीं उत्तम बात की प्रतिज्ञा करता है जिसकी आशा दुखी यहूदी अपनी अत्यन्त विपत्तियों में कर सकते थे।

हम भविष्यद्वक्ता के शब्दों से फिर सीख सकते हैं कि परमेश्वर ने नबूकदनेस्सर और दूसरों को इस प्रकार काम में लगाया कि उन्होंने कोई प्रशंसा के योग्य सेवा नहीं की; क्योंकि यदि वे निर्दोष होते, तो परमेश्वर ने निस्सन्देह उन्हें अन्याय से दण्ड दिया होता। अतः यह स्थान हमें सिखाता है कि यद्यपि शैतान और त्यागे हुए लोग परमेश्वर के न्याय-दण्डों को पूरा करते हैं, तौभी वे अपनी आज्ञाकारिता के लिए किसी प्रशंसा के योग्य नहीं, क्योंकि उनके सामने ऐसा कोई उद्देश्य नहीं होता। अब आगे यह आता है, —

यिर्मयाह 25:15

15. क्योंकि इस्राएल के परमेश्वर यहोवा ने मुझ से यों कहा, मेरे हाथ से इस जलजलाहट के दाखमधु का कटोरा लेकर उन सब जातियों को पिला दे जिनके पास मैं तुझे भेजता हूँ।

15. Quia sic dixit Jehova Deus Israel ad me, Sume calicem vini furoris (vel, iracundiae) Sume calicem vini furoris (vel, iracundiae) hujus e manu mea, et propina illum cunctis gentibus, ad quas ego mittam to ad eas (sed hoc secundum redundat.)

134 यिर्मयाह 27:7 को देखने से हम इस स्थान को समझ सकेंगे। शब्द एक समान हैं। उस पद में "बहुत सी जातियाँ और बड़े राजा" का अर्थ बाबुल के राजा को जीतनेवाले हैं; और निस्सन्देह यहाँ भी उनका यही अर्थ है। पिछले पद में "सब जातियाँ" वे "उत्तर के सब कुल" थे जिनका उल्लेख यिर्मयाह 25:9 में है, जो बाबुल के राजा के अधीन थे; और इस पद के आरम्भ में "उन्हें" यही जातियाँ हैं, जिनके विषय में यहाँ कहा गया है कि वे बन्धन या दासत्व में डाली जाएँगी, जबकि यिर्मयाह 27:7 में स्वयं बाबुल के राजा का उल्लेख है। क्रिया {,{עבר, जब इसके बाद ,{}ב आता है, तो उसका अर्थ सदैव दास बनाना, बन्धन में डालना, अधीन करना, या वश में करना होता है। अतः पद का अनुवाद इस प्रकार होना चाहिए, — क्योंकि उनसे, हाँ इन्हीं से, सेवा कराएँगी बहुत सी जातियाँ और बड़े राजा; और मैं उन्हें उनके काम के अनुसार, उनके अपने हाथों की करनी के अनुसार बदला दूँगा। यही अर्थ टार्गुम देता है; वुल्गेट और सीरियाई क्रिया का अनुवाद गलत करते हैं, यद्यपि दोनों में सर्वनाम "उन्हें" पिछले पद की जातियों की ओर संकेत करता है। — सं.

यिर्मयाह अब उस बात को अधिक विस्तार से समझाता है जो अपनी संक्षिप्तता के कारण अस्पष्ट प्रतीत हो सकती थी। उसने सब जातियों के विषय में कहा था, परन्तु उसका प्रवचन आकस्मिक था; क्योंकि उसने अब तक हमें खुलकर नहीं बताया था कि वह परमेश्वर की ओर से एक दूत के रूप में भेजा गया था, कि सब राजाओं और जातियों को उसके न्यायासन के सामने बुलाए, और घोषित करे कि क्या होनेवाला है। अतः क्योंकि भविष्यद्वक्ता ने इस प्रकार की किसी बात का उल्लेख नहीं किया था, इसलिए उसका प्रवचन अस्पष्ट था। परन्तु अब वह घोषणा करता है कि परमेश्वर के हाथ से एक कटोरा उसे सौंपा गया था, जिसे उसे सब जातियों को पिलाना था। इससे हम देखते हैं कि यहाँ कोई नई बात नहीं है, परन्तु भविष्यद्वक्ता मानो अपनी पिछली भविष्यद्वाणी का, जो संक्षेप में कही गई थी, व्याख्याता है।

इसके अतिरिक्त, जिससे उसकी बात का अधिक प्रभाव हो, वह एक दर्शन का वर्णन करता है, इस्राएल के परमेश्वर यहोवा ने मुझ से यों कहा, मेरे हाथ से इस जलजलाहट के दाखमधु का कटोरा ले। हम अन्य स्थानों में कह चुके हैं कि भविष्यद्वाणी के सत्य की पूर्ति पर अकारण बल नहीं दिया जाता था, और कि परमेश्वर के दास ऐसे सुसज्जित किए गए थे मानो जो कुछ वे कहते थे उसका पूरा होना निकट ही था। इसी कारण कहा जाता था कि वे नगरों को ढा देते और राज्यों को उलट देते थे, क्योंकि मनुष्यों की जड़ता ऐसी थी कि जब तक उन्हें परिणाम मानो अपनी आँखों के सामने देखने को न मिलता, वे परमेश्वर पर विश्वास न करते थे। परन्तु क्योंकि इस विषय पर अन्यत्र अधिक विस्तार से विचार किया जा चुका है, इसलिए मैं यहाँ केवल इसका संक्षेप में उल्लेख करूँगा। अतः वह कहता है कि परमेश्वर के हाथ से उसे एक कटोरा सौंपा गया था; इन शब्दों से वह संकेत करता है कि वह यहूदियों और अन्य जातियों को डराने के लिए अपनी इच्छा से आगे नहीं आया, वरन् जो कुछ उसे सौंपा गया था उसी का उसने विश्वासयोग्यता से प्रचार किया; और वह यह भी संकेत करता है कि परमेश्वर अब कुछ भी ऐसा नहीं कहता था जिसे वह शीघ्र पूरा करने का इरादा न रखता हो; और कटोरा शब्द से यही समझना चाहिए।

वह इसे जलजलाहट, या क्रोध, के दाखमधु का कटोरा कहता है। यह रूपक भविष्यद्वक्ताओं में प्रायः आता है, परन्तु भिन्न अर्थ में। क्योंकि कभी-कभी कहा जाता है कि परमेश्वर मनुष्यों को मतवाला करता है जब वह उन्हें जड़ बना देता है, और कभी उन्हें पागलपन की ओर धकेलता है, और कभी उन्हें साधारण बुद्धि और समझ से वंचित कर देता है, यहाँ तक कि वे पशुओं के समान हो जाते हैं; परन्तु यह भी कहा जाता है कि वह उन्हें मतवाला करता है, जब बाहरी विपत्तियों के द्वारा वह उन्हें विस्मय से भर देता है। सो अब भविष्यद्वक्ता विपत्ति को क्रोध का कटोरा कहता है, अर्थात् वह विपत्ति जो आग के समान उन सब के मनों को भड़काने वाली थी जिन्हें ताड़नाओं से कोई लाभ न हुआ। पागलपन का अर्थ वास्तव में और कुछ नहीं, केवल उन लोगों की निराशा है जो परमेश्वर का हाथ अपने विरुद्ध बढ़ा हुआ देखते हैं, और इस प्रकार क्रोध से भड़कते और चिल्लाते हैं, और आकाश और पृथ्वी को, अपने आप को और परमेश्वर को शाप देते हैं। क्रोध से हमें यही समझना है। वह इस क्रोध की तुलना दाखमधु से करता है, क्योंकि जो इस प्रकार परमेश्वर के हाथ से मारे जाते हैं वे मानो अपने आप से बाहर हो जाते हैं, और न पश्चाताप करते हैं, न शान्त मन से अपने पापों पर विचार करते हैं, वरन् अपने आप को उन्मत्त क्रोध के हवाले कर देते हैं। अतः अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता क्यों कहता है कि क्रोध के दाखमधु का कटोरा उसे दिया गया था।

135 मेरी समझ में वाक्य का अनुवाद इस प्रकार किया जा सकता है, — जलजलाहट के दाखमधु का कटोरा, हाँ यही, मेरे हाथ से ले। गैटेकर और वेनेमा भी वाक्य का अनुवाद ऐसा ही करते हैं, और "इस" को "जलजलाहट" की ओर नहीं, वरन् कटोरे की ओर संकेत करनेवाला मानते हैं। "जलजलाहट" के लिए जो शब्द है उसका अर्थ ताप है; इसका अर्थ है गरम, उबलता हुआ, या धधकता हुआ क्रोध, — वुल्गेट और सीरियाई में इसका अनुवाद "जलजलाहट," टार्गुम में "शाप," और सेप्टुआजिंट में "बिना मिलावट का" (इस बिना मिलावट के दाखमधु का कटोरा) किया गया है। — सं.

136 शब्दशः, "जिनके पास मैं तुझे उनके पास भेजता हूँ;" जिसका अनुवाद सेप्टुआजिंट ने लगभग शब्द-प्रति-शब्द किया है, {πρὸς} {ἅ} ({ἔθνη})-{πρὸς} {αὐτούς}; परन्तु पहला, {πρὸς}, मूल में नहीं है। यह एक भाषा की विशेषता को दूसरी भाषा में रोपने का प्रयत्न था, जैसा सेप्टुआजिंट में प्रायः होता है। वेल्श भाषा शब्दशः इब्रानी के ही समान है। — सं.

फिर वह आगे कहता है, और जिन सब जातियों के पास मैं तुझे भेजता हूँ उन्हें इसे पिला। यहाँ फिर वह उस बात की पुष्टि करता है जिसका मैं ने अभी उल्लेख किया, कि उसका पद कलीसिया के बीच शिक्षा देने से अधिक दूर तक फैला हुआ था, वरन् वह सब जातियों पर परमेश्वर के न्याय-दण्डों का दूत के समान प्रचार करने के लिए भी चुना गया था। निस्सन्देह वह यहूदियों के पास अन्यजाति जातियों से भिन्न रीति से भेजा गया था, क्योंकि वह उन पर एक शिक्षक के रूप में ठहराया गया था, और वह भी उनके उद्धार के लिए, यदि वे सुधार से परे न हों; परन्तु अन्यजातियों के पास वह विशेष रूप से इसलिए भेजा गया था कि उन्हें उस बात से धमकाए जो निकट थी। तौभी वह यहूदियों और अन्य सब जातियों दोनों के पास भेजा गया था, जैसा वह आगे उचित क्रम में अधिक स्पष्टता से दिखाएगा।

अब हम यहाँ कही गई बात का अभिप्राय और उद्देश्य देखते हैं; — अपनी पिछली भविष्यद्वाणी को अधिकार देने के लिए यिर्मयाह पहले तो उस दर्शन को प्रस्तुत करता है जो उसे दिखाया गया था; और फिर वह साक्षी देता है कि वह अपनी ओर से कुछ नहीं लाया, वरन् केवल परमेश्वर की आज्ञा मानी और विश्वासयोग्यता से उसकी आज्ञाओं को पूरा किया; और तीसरे, वह संकेत करता है कि वह न केवल परमेश्वर की कलीसिया में शिक्षक ठहराया गया था, वरन् सब जातियों पर उसके पलटे का साक्षी भी था। आगे यह आता है, —

यिर्मयाह 25:16

16. और वे पीकर उस तलवार के कारण जो मैं उनके बीच में भेजूँगा, डगमगाएँगे और बावले हो जाएँगे।

16. Et bibant et moveantur et insaniant (ad verbum legendum esset, bibent et inebriabuntur; est enim ubique, {}וconversivum; sed potius resolvi debet copula in particulum finalem, ut bibent et inebrientur et insaniant) a facie gladii, quem ego mitto in medio ipsorum (inter ipsos.)

यहाँ भविष्यद्वक्ता और भी पूरी रीति से वह दिखाता है जो हम पहले कह चुके हैं, कि जब उसने सब जातियों पर परमेश्वर के न्याय-दण्डों की घोषणा की तो वे व्यर्थ डरावे नहीं थे, क्योंकि हम उन धमकियों को बचकानी कहते हैं जो पूरी नहीं होतीं। परन्तु भविष्यद्वक्ता यहाँ घोषणा करता है कि यहूदी और दूसरे चाहे कितने ही हठ से विरोध करें, वे परमेश्वर के पलटे से किसी रीति से बच नहीं सकते, क्योंकि वह सब का न्यायी था। इसलिए भविष्यद्वक्ता को आज्ञा दी गई है कि कटोरा ले और उसे दूसरों को दे। परन्तु यहूदी फिर भी आपत्ति करके कह सकते थे, "हम तेरे हाथ से कटोरा ले तो सकते हैं, परन्तु यदि हम मना करें तो क्या? यदि जो कुछ तू हमें पीने को देता है उसे हम अपने से दूर फेंक दें तो क्या?" इसलिए भविष्यद्वक्ता कहता है कि चाहे वे चाहें या न चाहें, उन्हें कटोरा लेना ही होगा, कि जो कुछ परमेश्वर के न्याय से उनके लिए ठहराया गया था उसे वे पीएँ और पी-पीकर समाप्त करें; इसलिए वह कहता है कि वे पीएँ।

फिर वह आगे कहता है, कि वे भड़क उठें और बावले हो जाएँ। ये दोनों शब्द निस्सन्देह उनके दण्ड के भारीपन की ओर संकेत करते हैं; क्योंकि वह संकेत करता है कि वे मानो मन और बुद्धि से रहित हो जाएँगे। जब परमेश्वर कृपापूर्वक और पितृवत् संयम से हमें ताड़ना देता है, तब हम धीरज से उसके अधीन हो सकते हैं और उसकी दया की शरण ले सकते हैं; परन्तु जब हम चिल्लाते हैं और लगभग पागलपन की ओर धकेले जाते हैं, तब हम दिखाते हैं कि अत्यन्त कठोरता का अनुभव हो रहा है, और क्षमा की कोई आशा नहीं। अतः भविष्यद्वक्ता यह व्यक्त करना चाहता था कि जिन जातियों से परमेश्वर क्रुद्ध था उनकी विपत्तियाँ ऐसी भयंकर होंगी कि वे स्तब्ध और लगभग पागल हो जाएँगी; और साथ ही उन्मत्त भी, क्योंकि निराशा उनके मनों और हृदयों को ऐसा जकड़ लेगी कि वे छुटकारे की कोई आशा न रख सकेंगी, न परमेश्वर के अधीन हो सकेंगी, वरन्, जैसा त्यागे हुए लोगों में सामान्य है, परमेश्वर के विरुद्ध उठ खड़ी होंगी और अपनी निन्दाएँ उगलेंगी।

137 इन दोनों क्रियाओं के विषय में अनुवादों में भिन्नता है: सबसे अच्छा अनुवाद यह है, — और वे पीएँगे और लड़खड़ाएँगे; और वे उस तलवार के कारण व्याकुल हो जाएँगे, जो मैं उनके बीच भेजूँगा। ब्लेनी का अनुवाद लगभग वैसा ही है, "पीएँगे और डगमगाएँगे और अपनी सुध-बुध खो बैठेंगे;" परन्तु "तलवार" को केवल पिछली क्रिया से जोड़ना अच्छा है। — सं.

वह कहता है, उस तलवार के कारण जो मैं उनके बीच में भेजूँगा। {,}בינתםbintem शब्द से, जिसका अर्थ है “उनके बीच में,” यह प्रकट होता है कि आपस में संघर्ष होंगे, और वे एक-दूसरे को नष्ट करेंगे। तो परमेश्वर अपनी तलवार भेजेगा; परन्तु वह उसे कभी कसदियों तक, कभी मिस्रियों तक, कभी अश्शूरियों तक, और कभी अन्य जातियों तक बढ़ाएगा, जिससे वे उसी तलवार से एक-दूसरे से लड़ेंगे, यहाँ तक कि अन्त में वह उन सब के विनाश का कारण ठहरेगी। अब आगे लिखा है,—

यिर्मयाह 25:17

17. तब मैं ने यहोवा के हाथ से वह कटोरा लेकर उन सब जातियों को जिनके पास यहोवा ने मुझे भेजा, पिला दिया:

17. Et sumpsi calicem e manu Jehovae, et propinavi cunctis gentibus ad quas misit me Jehova ad eas (sed iterum supervacuum est hoec repetitio:)

भविष्यद्वक्ता अब यह जोड़ता है कि उसने परमेश्वर की आज्ञा का पालन किया; क्योंकि वह पहले भी बार-बार यह गवाही दे चुका था कि वह अपना पद निभाने के लिए विवश किया गया था, और यदि उसे स्वतन्त्रता होती तो वह स्वेच्छा से ऐसा न करता। परन्तु क्योंकि वह ईश्वरीय बुलाहट का पालन करने के लिए बँधा हुआ था, इसलिए यह स्पष्ट था कि दोष उसका नहीं था, और लोग उसे घोषित की गई विपत्तियों का कर्ता ठहराकर अन्याय से उस पर दोष लगाते थे। हम तो जानते ही हैं कि भविष्यद्वक्ताओं को हठीले लोगों और परमेश्वर के तिरस्कार करनेवालों की ओर से बहुत बैर और निन्दा सहनी पड़ी, मानो उनकी सारी विपत्तियाँ उन्हीं के सिर मढ़ी जानी चाहिए थीं। तो यिर्मयाह कहता है कि उसने कटोरा लेकर सब जातियों को पिलाया: वह संकेत करता है कि उसे ऐसा करने की कोई इच्छा नहीं थी, परन्तु अपना पद निभाने की अनिवार्यता उस पर डाली गई थी। फिर वह दिखाता है कि ये जातियाँ कौन थीं,—

यिर्मयाह 25:18

18. अर्थात् यरूशलेम और यहूदा के नगरों को, और उनके राजाओं और हाकिमों को, ताकि उनका देश उजाड़ हो जाए, और लोग ताली बजाएँ, और उसकी उपमा देकर शाप दिया करें, जैसा आजकल होता है;

18. Jerosolymae et urbibus Jehudah, et regibus ejus, et principibus ejus, ad ponendum eos in vastitatem (vel, solitudinem,) in stuporem, in sibulum, et maledictionem, sicut dies haec; वह यरूशलेम से आरम्भ करता है, जैसा कि अन्यत्र कहा गया है कि न्याय परमेश्वर के घर से आरम्भ होगा। (1 पतरस 4:17।) और इस स्थल के प्रसंग में इसके विरुद्ध कुछ भी नहीं है; क्योंकि यद्यपि उसने परमेश्वर की सन्तान से उन विपत्तियों के सुखद अन्त की प्रतिज्ञा की थी जिन्हें उन्हें शीघ्र ही सहना था, तौभी वह यहाँ उन सब जातियों की गिनती करता है जिन पर न्याय की घोषणा करने की आज्ञा परमेश्वर ने उसे दी थी। इस सूची में कलीसिया को पहला स्थान मिलता है; क्योंकि यद्यपि परमेश्वर सारे जगत का न्यायी है, तौभी वह उचित ही अपनी कलीसिया से आरम्भ करता है, और इसके विशेषकर दो कारण हैं—क्योंकि जैसे घर का पिता अपनी सन्तानों और सेवकों की चौकसी करता है, और यदि कुछ भी अनुचित हो तो उसकी चिन्ता विशेष रूप से प्रकट होती है; वैसे ही परमेश्वर, क्योंकि वह अपनी कलीसिया में वास करता है, उसके दोषों के लिए उसे ताड़ना दिए बिना नहीं रह सकता;—और फिर, हम जानते हैं कि वे कम क्षमा के योग्य हैं जो परमेश्वर की इच्छा सिखाए जाने पर भी अपनी अभिलाषाओं में लिप्त रहते हैं, (लूका 12:47;) क्योंकि वे अज्ञानता का बहाना नहीं कर सकते। इसी से वह पूरा होता है जो मसीह घोषित करता है, कि वे सेवक अधिक कठोरता से पीटे जाएँगे जो अपने स्वामी की इच्छा जानते हुए भी हठपूर्वक उसकी उपेक्षा करते हैं। तो कलीसिया के सदस्यों में दोहरा दोष है; और उनकी तुलना उन अविश्वासियों से नहीं की जा सकती जो घोर अन्धकार में हैं। क्योंकि परमेश्वर अपनी कलीसिया में चमकता है और मार्ग दिखाता है, जैसा मूसा कहता है, “देखो, मैं तुम्हारे सामने जीवन और मृत्यु का मार्ग रखता हूँ; इसलिए मैं आकाश और पृथ्वी को साक्षी ठहराता हूँ कि तुम्हारे लिए कोई बहाना नहीं है।” (व्यवस्थाविवरण 30:15, 19।)

तो यही दूसरा कारण है कि परमेश्वर पहले विश्वासियों के, या उनके जो विश्वासी गिने जाते हैं, पापों का दण्ड देता है।

एक बात और भी है जो उदाहरण से सम्बन्ध रखती है: परमेश्वर अपनी सन्तान को ताड़ना देता है, कहीं ऐसा न हो कि वह अपनी ढील के द्वारा दुष्टता और पाप का पक्ष लेता या उसे बढ़ावा देता हुआ दिखाई दे।

परन्तु यह तीसरा कारण एक प्रकार से आकस्मिक है; और इसलिए मैंने इसे अन्य दो कारणों से अलग रखकर बताना चाहा। इसलिए जब परमेश्वर अपनी कलीसिया से इतनी कठोरता से व्यवहार करता है, तब अविश्वासियों को यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि यदि हरे पेड़ के साथ ऐसा किया जाता है, तो सूखे के साथ क्या कुछ न किया जाएगा? (लूका 23:31।)

परन्तु जो दो बातें मैंने पहले कही हैं, उन्हें हमें इस बात के पर्याप्त कारण समझना चाहिए कि परमेश्वर क्यों, त्यागे हुओं के विषय में अपना पलटा रोके रखते हुए, चुने हुए लोगों को और उन सब को भी दण्ड देता है जो अपने आप को उसकी कलीसिया के सदस्य बताते हैं। अब हम समझते हैं कि यिर्मयाह पहले पवित्र नगर का, और फिर यहूदा के सब नगरों का, और राजाओं और हाकिमों का भी उल्लेख क्यों करता है; क्योंकि परमेश्वर ने खुली गोद से उन्हें अपने पास बुलाया था, परन्तु उन्होंने मानो ठानी हुई दुष्टता से उसकी व्यवस्था और उसके भविष्यद्वक्ताओं दोनों का तिरस्कार करके उसके क्रोध को भड़काया था।

फिर वह जोड़ता है, उन्हें उजाड़, या सुनसान बनाने के लिए। निःसन्देह यह एक भारी घोषणा थी, और हम आगे देखेंगे कि अधिकांश लोग उस पवित्र जन पर क्रोध से भड़क उठे, और अपने रोष में उसे नष्ट करने का यत्न करने लगे; तौभी उसने पूर्णतः निडर मन से वह सब घोषित किया जिसकी आज्ञा परमेश्वर ने उसे दी थी। वह जोड़ता है, विस्मय, और तीसरे स्थान पर, ताली बजाने का कारण, अर्थात् यह कि वे सब के लिए घृणित हो जाएँगे; क्योंकि ताली बजाना (सीटी बजाना) तिरस्कार, निन्दा और घृणा को सूचित करता है। चौथे स्थान पर वह शाप का उल्लेख करता है। हम पहले ही बता चुके हैं कि भविष्यद्वक्ता का इस शब्द से क्या आशय था, अर्थात् यह कि यहूदी इस विषय में एक कहावत बन जाएँगे, यहाँ तक कि जब कोई किसी दूसरे को शाप देगा, तो वह यह रूप काम में लाएगा, “परमेश्वर तुझे वैसे ही नष्ट करे जैसे उसने यहूदियों को नष्ट किया।”

फिर जोड़ा गया है, जैसा आजकल होता है। निःसन्देह भविष्यद्वक्ता नगर के विनाश के समय की ओर संकेत करता है। परमेश्वर ने तो उस समय भी लोगों को भस्म करना आरम्भ कर दिया था; परन्तु हम आगे देखेंगे कि अधिकांश लोगों के मन अब भी बहुत घमण्डी थे: यहाँ तक कि वे बार-बार सिर ऊँचा करते, नई स्थिति की बाट जोहते, और मिस्रियों की सहायता पर भरोसा रखते थे। परन्तु भविष्यद्वक्ता यहाँ उस बात का उल्लेख करता है जो अभी पूरी नहीं हुई थी, और मानो उँगली से उस दिन की ओर संकेत करता है जिसमें नगर नष्ट किया जाना और मन्दिर जला दिया जाना था, मानो वह आ ही चुका हो। तो यह उसकी भविष्यवाणी की निश्चितता से सम्बन्ध रखता है। कुछ लोग सोचते हैं कि यह यिर्मयाह के बँधुआई में ले जाए जाने के बाद लिखा गया; परन्तु इस अनुमान का कोई आधार नहीं है। मुझे इतना मान लेना पर्याप्त लगता है कि उसका उद्देश्य यहूदियों को उनकी निश्चिन्तता से जगाना था, और यह दिखाना था कि थोड़े ही समय में वह सब पूरा हो जाएगा जिसकी उसने भविष्यवाणी की थी, और कि उन्हें इसके विषय में उससे अधिक सन्देह नहीं करना चाहिए था जितना कि यदि वह विपत्ति अभी उनकी आँखों के सामने होती। आगे लिखा है,—

138 ब्लेनी इस अनुमान से सहमत है, और बिना किसी कारण के नहीं: वह मानता है कि परमेश्वर के वचन यिर्मयाह 25:16 के अन्त में टूट जाते हैं, और यिर्मयाह 25:26 के अन्तिम भाग तक फिर आरम्भ नहीं होते, जहाँ परमेश्वर फिर अपने वचन इस प्रकार जारी रखता है, “और इन सब के बाद शेशक का राजा भी पीएगा।” बीच के सब पदों को वह एक कोष्ठक में रखता है, और उन्हें या तो बारूक के द्वारा या स्वयं भविष्यद्वक्ता के द्वारा यरूशलेम के विनाश के बाद लिखा हुआ मानता है, जब उसकी भविष्यवाणियाँ संकलित की गईं: और इसी से “जैसा आजकल होता है” शब्दों का कारण समझ में आता है। परन्तु गैटेकर इस मत को अस्वीकार करता है, और मानता है कि यह भविष्यवाणी यहोयाकीम के तीसरे या चौथे वर्ष में हुए कसदियों के आक्रमण के बाद घोषित की गई थी, जिसका उल्लेख दानिय्येल 1:1 में है। उस समय हुआ विनाश बड़ा था, और अन्त में सिदकिय्याह के राज्यकाल में पूरा हुआ। — सं.

यिर्मयाह 25:19

19. मिस्र के राजा फ़िरौन और उसके कर्मचारियों, हाकिमों और सारी प्रजा को;

19. Pharaoni (pendit enim a superiori versu quod propinaverit calicem Pharaoni,) regi Egyptio, servis ejus et principibus ejus et toti ejus populo; यहाँ यह पूछा जा सकता है कि वह फ़िरौन को यहूदियों के साथ क्यों जोड़ता है, और अन्य जातियों के बदले मिस्रियों को दूसरा स्थान क्यों देता है? कारण स्पष्ट है,—क्योंकि यहूदी उन्हीं से छुटकारे की आशा रखते थे; और उनके असाध्य हठ का कारण यह था कि वे उस झूठे भरोसे से हटाए नहीं जा सकते थे जिसके द्वारा शैतान ने उन्हें एक बार मोहित कर लिया था। उन्होंने मिस्रियों को अपना मित्र बनाकर परमेश्वर को छोड़ दिया; और जब उन्होंने अपने आप को अश्शूरियों का सामना करने में असमर्थ पाया, तब उन्होंने अपनी आशा परमेश्वर की ओर नहीं, वरन् मिस्रियों की ओर लगाई; भविष्यद्वक्ताओं ने उन्हें समझाया, परन्तु कोई सफलता न मिली।

तो, क्योंकि चुनी हुई प्रजा के विनाश का अवसर मिस्र था, और क्योंकि फ़िरौन मानो यरूशलेम के और सारी प्रजा के विनाश का सोता और कारण था, इसलिए भविष्यद्वक्ता यरूशलेम और यहूदा के नगरों की चर्चा करने के बाद ठीक ही तुरन्त दूसरे स्थान पर फ़िरौन का उल्लेख करता है; क्योंकि वह यहूदियों का मित्र था, और वे आपस में ऐसे जुड़े हुए थे कि वे अनिवार्य रूप से एक साथ विनाश में खिंच गए; क्योंकि उन्होंने एक-दूसरे को भ्रष्ट किया था, और अभक्ति में एक-दूसरे को उकसाया था, और एक मन और मिले हुए हृदयों से अपने विरुद्ध परमेश्वर के क्रोध को भड़काया था। तो भविष्यद्वक्ता यहूदियों की चर्चा अकेले नहीं कर सकता था, वरन् उसे मिस्रियों को उनके साथ जोड़ना ही पड़ा, क्योंकि दोनों प्रजाओं की दशा एक ही थी।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जब हम तेरी पितृ-तुल्य करुणा का दुरुपयोग करना नहीं छोड़ते, यहाँ तक कि जब तू कुछ समय तक हमें छोड़ देता है, तब हम उसे पाप में और अधिक ढिठाई और स्वच्छन्दता का अवसर बना लेते हैं,—हे प्रभु, यह वरदान दे कि हम तेरी ताड़नाओं से ऐसे वश में किए जाएँ कि बिना विलम्ब तेरी ओर लौट आएँ, और तेरे एकलौते पुत्र के लोहू के द्वारा तुझ से मेल-मिलाप खोजें, और अपनी बुराइयों से ऐसे अप्रसन्न हों कि हृदय से तेरे अधीन हो जाएँ, और तेरे पवित्र आत्मा के द्वारा चलाए जाएँ, जब तक कि अपनी सारी मलिनता से शुद्ध होकर हम उस धन्य महिमा में न पहुँचें जो तू ने स्वर्ग में हमारे लिए तैयार की है, और जो उसी, तेरे पुत्र यीशु मसीह, के लोहू के द्वारा हमारे लिए प्राप्त की गई है।—आमीन।

छियानबेवाँ व्याख्यान

यिर्मयाह 25:20

20. और सब दोगली जातियों को, और ऊस देश के सब राजाओं को, और पलिश्तियों के देश के सब राजाओं को, और अश्कलोन, अज्जा और एक्रोन को, और अश्दोद के बचे हुए लोगों को,

139 गैटेकर का कथन है कि बचने की हर आशा को मिटा देने के लिए राजा के साथ कर्मचारियों, हाकिमों और प्रजा का भी उल्लेख किया गया है; क्योंकि हो सकता था कि राजा हटा दिया जाए और देश बहुत अधिक अशान्त हुए बिना छोड़ दिया जाए। — सं.

20. Et promiscuae multitudini, et cunctis regibus terrae Uz, et cunctis regibus terrae Philistim et Ascalon et Gazae et Echron, et reliquiis Azoth, यिर्मयाह, अपनी जाति और मिस्रियों की चर्चा करने के बाद, अब अन्य जातियों का उल्लेख करता है जो सम्भवतः सुनी-सुनाई बातों से यहूदियों को ज्ञात थीं; क्योंकि हम सूची में कुछ ऐसी जातियाँ देखते हैं जो दूर थीं। तो वह केवल पड़ोसी जातियों की ही नहीं, वरन् दूसरों की भी चर्चा करता है। संक्षेप में, उसका उद्देश्य यह दिखाना था कि परमेश्वर का पलटा निकट था, जो इधर-उधर फैलकर यहूदियों को ज्ञात सारे जगत को घेर लेगा।

हमने कल वह कारण बताया था कि उसने मिस्रियों को यहूदियों के साथ क्यों जोड़ा; परन्तु अब इन जातियों में से प्रत्येक के विषय में कोई निश्चित कारण नहीं बताया जा सकता; केवल सामान्य रूप से इतना कहा जा सकता है कि इस प्रकार यहूदियों को स्मरण दिलाया गया, कि वे न केवल अपने प्रति परमेश्वर के न्याय को उसके क्रोध का प्रमाण मानें, वरन् अपने विचारों को और आगे बढ़ाकर उन सब विपत्तियों को, जो दूर और निकट की जातियों पर आनेवाली थीं, उसी दृष्टि से देखें, ताकि वे जान लें कि मनुष्यों की घटनाएँ संयोग से नहीं घूमतीं, वरन् परमेश्वर धर्मी न्यायी है, और वह मनुष्यों को उनके पापों के लिए ताड़ना देने को स्वर्ग में विराजमान है।

एक प्रचलित कहावत है कि दुखियों के लिए अपने समान बहुतों को देखना सान्त्वना होती है; परन्तु भविष्यद्वक्ता के मन में कुछ और ही बात थी; क्योंकि उसका उद्देश्य यह दिखाकर अपनी प्रजा के दुःख को हल्का करना नहीं था कि कोई भी जाति विपत्तियों से मुक्त न रहेगी; परन्तु उसका अभिप्राय यह था कि उन्हें समय रहते दिखाए कि जो कुछ भी होगा वह परमेश्वर की ओर से होगा; क्योंकि यदि यह भविष्यवाणी न की गई होती कि कसदी सारे पूर्व पर प्रभुता करेंगे, तो आम तौर पर यह कहा जाता कि जगत अन्धे भाग्य के शासन में है, और इस प्रकार मनुष्य अपनी अभक्ति में और भी अधिक कठोर हो जाते; क्योंकि जब मनुष्य यह कल्पना करते हैं कि सब बातें संयोग से होती हैं, तब यही हठ का कारण बन जाता है। और इसी कारण परमेश्वर उन लोगों को कठोरता से डाँटता है जो यह स्वीकार नहीं करते कि युद्ध, अकाल और मरी वही भेजता है, और कि उसके न्याय के बिना कोई भी विपरीत घटना नहीं होती। इसलिए यहूदियों को समय से पहले यह सीखना था कि जब परमेश्वर उन्हें और अन्य जातियों को दुःख दे, तब वे जान लें कि इसकी भविष्यवाणी की जा चुकी थी, और इसलिए परमेश्वर ही इन विपत्तियों का कर्ता था, और वे अपने आप को भी जाँचें ताकि अपने पापों को मान लें; क्योंकि जो यह स्वप्न देखते हैं कि जगत अपनी बुराइयों के विषय में भाग्य के द्वारा मनमाने ढंग से चलाया जाता है, वे यह नहीं समझते कि परमेश्वर उनसे अप्रसन्न है; और इसलिए जो कुछ वे सहते हैं उसे वे न्यायोचित दण्ड नहीं मानते।

बहुत-से लोग तो परमेश्वर को दण्ड देनेवाला मान लेते हैं, तौभी उसके विरुद्ध कुड़कुड़ाते हैं। परन्तु इन दो बातों को स्मरण रखना चाहिए,—कि कोई भी विपत्ति संयोग से नहीं आती, वरन् परमेश्वर उन सब बातों का कर्ता है जिन्हें मनुष्य बुराइयाँ समझते हैं,—और कि वह ऐसा इसलिए है क्योंकि वह धर्मी न्यायी है; यह दूसरी बात है। तो परमेश्वर, सब घटनाओं का प्रबन्ध अपने लिए दावे से रखते हुए, और यह घोषित करते हुए कि जगत उसकी इच्छा से चलाया जाता है, न केवल यह घोषित करता है कि प्रधान सामर्थ और सर्वोच्च शासन उसी के हाथ में है, वरन् और आगे बढ़कर यह दिखाता है कि जो बातें सफलता से होती हैं वे उसकी भलाई और न्याय के प्रमाण हैं, और विपत्तियाँ यह सिद्ध करती हैं कि वह मनुष्यों के पापों को सह नहीं सकता, वरन् उन्हें दण्ड देना ही उसे उचित है। यही बात प्रकट करना भविष्यद्वक्ता का उद्देश्य था।

वह कहता है कि परमेश्वर ने सारी मिश्रित भीड़ को धमकी दी। {,}ערב शब्द का अर्थ है मधुमक्खियों का झुण्ड; और इसका अर्थ किसी भी प्रकार का मिश्रण भी है; और इसी कारण, जब मूसा ने कहा कि लोगों के साथ बहुत-से (मिली-जुली भीड़ के लोग) भी गए, तब उसने यही शब्द प्रयोग किया। (निर्गमन 12:38।)

नहेम्याह भी कहता है कि उसने ऐसे मिश्रित लोगों को परमेश्वर की प्रजा से अलग कर दिया, कहीं ऐसा न हो कि वे, जो पतित हो चुके थे, सच्चे धर्म को भ्रष्ट कर दें। (नहेम्याह 13:3।)

तो, ताकि कलीसिया सच्ची और विश्वासयोग्य बनी रहे, वह कहता है कि उसने दूर कर दिया, अर्थात् इस मिश्रण को। अब इस स्थल के विषय में मुझे कोई सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता इस प्रकार सामान्य रूप से साधारण लोगों की चर्चा करता है; और मैं इस नाम को उन सब राज्यों तक बढ़ाता हूँ जिनकी वह आगे चर्चा करेगा। फिर वह जोड़ता है, और ऊस देश के सब राजाओं को। हम जानते हैं कि यह एक पूर्वी देश था। मैं नहीं जानता कि जेरोम ने इसका अनुवाद “Ausitis” क्यों किया, और वैसा क्यों नहीं जैसा अय्यूब की पुस्तक में है, क्योंकि वही शब्द वहाँ भी मिलता है, (अय्यूब 1:2) और हम पाते हैं कि अय्यूब जगत के पूर्वी भाग में जन्मा था, क्योंकि उसे उसके पड़ोसियों ने लूटा, जो पूर्व के लोग थे। कुछ लोग सोचते हैं कि यह आर्मीनिया था; परन्तु यह कठिनता से इतना दूर का देश हो सकता था, क्योंकि यहूदिया की दृष्टि से किलिकिया उन दोनों के बीच में था। इसलिए मैं यही अधिक सोचता हूँ कि ऊस यहूदिया के ठीक पूर्व में था।

वह जोड़ता है, और पलिश्तियों के देश के सब राजाओं को। उस समय पलिश्तीन में बहुत-से राजा थे या नहीं, यह अनिश्चित है; यह सम्भव तो प्रतीत होता है; परन्तु जो बात मुझे सन्दिग्ध लगती है, उसे मैं वैसी ही छोड़ देता हूँ। यह कोई आपत्ति नहीं कि वह सब राजाओं का उल्लेख करता है, क्योंकि आगे वह सोर और सीदोन के सब राजाओं की चर्चा करता है, यद्यपि न तो सोर के और न सीदोन के बहुत-से राजा थे; क्योंकि वे केवल दो नगर थे। तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता ने देश के सब राजाओं की चर्चा करते हुए यह अभिप्राय रखा कि यद्यपि वे एक के बाद एक आते रहे, तौभी स्वर्ग में यह ठहराया जा चुका था कि ये सब जातियाँ नष्ट होंगी। इसलिए उसने हर सन्देह को दूर करना चाहा; क्योंकि भविष्यवाणी तुरन्त पूरी नहीं हुई; परन्तु जिन जातियों की वह अब चर्चा करता है, उन्होंने कुछ समय तक अपनी स्थिति बनाए रखी, जिससे भविष्यद्वक्ता अपनी भविष्यवाणियों में झूठा दिखाई दे सकता था। इसलिए वह स्पष्ट रूप से सब राजाओं का उल्लेख करता है, ताकि विश्वासी तब तक अपना निर्णय स्थगित रखें जब तक परमेश्वर के पलटे का ठहराया हुआ समय न आ जाए।

इसके बाद वह अश्कलोन का उल्लेख करता है; जो समुद्र-तट का नगर नहीं था, यद्यपि समुद्र से दूर भी नहीं था। फिर वह {,}עזהoze जोड़ता है, जिसे हम गाज़ा कहते हैं, क्योंकि यूनानी अनुवादकों ने इसका यही अनुवाद किया है। परन्तु यूनानी और लातीनी लेखकों ने जो सोचा, कि इसका नाम गाज़ा इसलिए पड़ा क्योंकि कुस्रू ने इधर-उधर युद्ध करते समय अपना खज़ाना वहाँ रखा था, वह सर्वथा बेतुका है; और यह एक तुच्छ अनुमान था जो उनके मन में इसलिए आया क्योंकि गाज़ा का अर्थ खज़ाना है, और यूनानी अनुवादकों ने ओज़े का अनुवाद गाज़ा किया; परन्तु इसे बिना अधिक विचार के मान लिया गया। नगर की स्थिति भली-भाँति ज्ञात है। फिर वह एक्रोन का उल्लेख करता है, जो एक पड़ोसी नगर था, अज़ोतुस से दूर नहीं, जिसका नाम भी लिया गया है। भविष्यद्वक्ता अश्दोद कहता है, जिसका अनुवाद यूनानियों ने अज़ोतुस किया है, और लातीनियों ने उन्हीं का अनुसरण किया है। इससे हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता देश के उस भाग की ओर संकेत करता है जो सीरिया की ओर था।

परन्तु यह पूछा जा सकता है कि वह अश्दोद के बचे हुओं का नाम क्यों लेता है? कुछ लोग सोचते हैं कि वह आसपास के कम प्रसिद्ध नगरों की ओर संकेत करता है, जैसे गत, जिसका नाम अन्यत्र लिया गया है, परन्तु जो कम विख्यात था। परन्तु यह व्याख्या मुझे खींचतान की और बेतुकी लगती है। सम्भावना यह है कि अश्दोद जीत लिया गया था, परन्तु अपनी लाभदायक स्थिति के कारण वह पूरी तरह छोड़ा नहीं गया था। क्योंकि {,}שאריתsharit का अर्थ है वह जो किसी संहार के बाद बचा या शेष रह जाता है। तो अश्दोद में जो कुछ बचा रह गया था, उसे उसने परमेश्वर की तलवार के हवाले कर दिया, ताकि वह नष्ट किया जाए। आगे लिखा है,—

140 वेनेमा और ब्लेनी इन शब्दों को पिछले पद से जोड़ते हैं, और मानते हैं कि मिस्र में रहनेवाली मिश्रित प्रजा से अभिप्राय है; और यही सबसे अधिक सम्भव है। सेप्टुआजिन्ट भी ऐसा ही है, “और वे सब जो उनके साथ मिले हुए हैं।” सुरियानी में है, “और उसकी सब सीमाएँ,” अर्थात् मिस्र की। वल्गेट एक भावानुवाद है, “और सब को सामान्य रूप से।” — सं.

यिर्मयाह 25:21

21. और एदोमियों, मोआबियों और अम्मोनियों को;

21. Edom et Moab et filiis Ammon,

वही शब्द सदा दोहराए जाने चाहिए, कि यिर्मयाह ने इन सब जातियों को कटोरा पिलाया। वह एदोमियों का, जो एसाव के वंशज थे, और मोआबियों का भी, जो लूत के वंशज थे, उल्लेख करता है, जैसे कि अम्मोनी भी थे। इन तीनों जातियों और इस्राएलियों के बीच एक रिश्ता था; इसलिए प्रतीत होता है कि भविष्यद्वक्ता ने जान-बूझकर इन तीनों जातियों को एक साथ जोड़ा है। वह जोड़ता है—

यिर्मयाह 25:22

22. और सोर के सब राजाओं को, और सीदोन के सब राजाओं को, और समुद्र पार के द्वीपों के राजाओं को;

22. Et omnibus regibus Tyri et omnibus regibus Sidonis, et omnibus regibus insulae, quae est (vel, qui sunt; nam verbum nullum ponitur; potest igitur hoc tam ad reges ipsos quam ad insulam referri; qui sunt ergo) ultra mare, द्वीप शब्द के विषय में, वचन बदल देना चाहिए; क्योंकि भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय एक द्वीप से नहीं, वरन् समुद्र पार के देशों से है। कुछ लोग इस संकेत को साइप्रस, क्रेते, मितिलेनी और भूमध्य सागर के अन्य द्वीपों तक सीमित करते हैं; परन्तु इब्रानी में समुद्र पार के सब देशों को द्वीप कहना बोलचाल का एक सामान्य ढंग है।

द्वीपों के राजा आएँगे।” (भजन संहिता 72:10।)

उस स्थल में भविष्यद्वक्ता उन्हें द्वीपों के राजा कहता है जो जहाज़ों में यहूदिया आएँगे। इसी प्रकार इस स्थान में भी हम द्वीपों के राजाओं से उन सब को समझ सकते हैं जो समुद्र पार थे।

अब हम देखते हैं कि केवल एक ही युग के राजा परमेश्वर के न्यायासन के सामने नहीं बुलाए जाते; क्योंकि भविष्यद्वक्ता सोर के सब राजाओं और सीदोन के सब राजाओं का उल्लेख क्यों करता है?

क्या यह सम्भव था कि इन दो नगरों में एक ही समय चार या दो राजा हों? परन्तु हमें वह बात स्मरण रखनी चाहिए जो मैं पहले कह चुका हूँ,—कि परमेश्वर की सन्तान को चेतावनी दी गई, कहीं ऐसा न हो कि वे इस भविष्यवाणी के पूरे होने के विषय में अत्यधिक उतावली अपेक्षा रखें। तो यह ऐसा ही है मानो उसने कहा हो, “यद्यपि परमेश्वर का पलटा सोर या सीदोन के वर्तमान राजा पर न भी आए, तौभी वह सब राजाओं के ऊपर लटका हुआ है, और अपने समय पर प्रकट होगा।” हम जानते हैं कि सोर और सीदोन फ़ीनीके के नगर थे, और बहुत विख्यात थे; और सोर के दूर-दूर तक बहुत-से उपनिवेश थे, जिनमें प्रमुख कार्थेज था; और कार्थेजवासी प्रति वर्ष उसे सम्मानपूर्ण भेंटें चढ़ाते थे, यह दिखाने के लिए कि वे उसी के वंशज हैं। और इतिहासकारों के अनुसार स्वयं सोर सीदोन का एक उपनिवेश था; परन्तु वह ऐसा फला-फूला कि मानो बेटी ने माँ को निगल लिया। परन्तु यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि यशायाह और यिर्मयाह के समय में वहाँ राजा थे, यद्यपि सिकन्दर के समय में दोनों नगर गणराज्य थे; क्योंकि उस अवधि में उनमें बहुत-से परिवर्तन हो चुके थे। अब भविष्यद्वक्ता केवल इतना कहता है कि सोर और सीदोन उस दण्ड में फँसेंगे जिसकी घोषणा उसने राजाओं और प्रजा दोनों पर की थी। आगे लिखा है—

141 यहूदा के राजाओं और अन्य देशों के राजाओं का भी उल्लेख मिलता है; और इसका कारण यह प्रतीत होता है कि उन पर धमकाई गई विपत्तियाँ एक ही पीढ़ी पर एक साथ नहीं, वरन् क्रमशः एक के बाद एक पीढ़ियों पर आईं। यहूदा के विषय में भी ऐसा ही हुआ, और अन्य राज्यों के विषय में भी; एक के बाद एक आक्रमण होते रहे, जब तक कि अन्त में वे पूरी तरह अधीन न कर लिए गए। क्योंकि यशायाह 23:2 में हम सोर के लोगों को “द्वीप के निवासी” कहा गया पाते हैं, इसलिए हम इस पद का अनुवाद इस प्रकार कर सकते हैं,— 22. और सोर के सब राजाओं को, और सीदोन के सब राजाओं को, अर्थात् उस द्वीप के सब राजाओं को जो समुद्र के किनारे है। यह दोहराव सोर की सामर्थ और धन-सम्पत्ति के कारण किया गया, जो अजेय समझा जाता था। देखिए यशायाह 23। — सं.

यिर्मयाह 25:23

23. और ददान, तेमा और बूज़ को, और जितने अपने गाल के बालों को मुँड़ा डालते हैं;

23. Et Dedan et Thema et Buz, et cunctis terminatis in angulo (alii vertunt, atonsos coma, sicut etiam 9, Cap; sed illic de hac voce dixi quantum ferebat locus,)

अब मैं केवल संक्षेप में कोने में रहनेवाले छोर के लोगों की, या उनकी जो एक कोने से घिरे हुए थे, चर्चा करूँगा, जो अपनी दूरी के कारण यहूदियों के लिए लगभग अज्ञात थे। इतनी अधिक दूर की जातियों की चर्चा करने के बाद, ताकि वह विस्तार से उबाऊ न हो जाए, वह कोने के सब छोर के लोगों का उल्लेख करता है, अर्थात् उनका जो सबसे दूर की सीमाओं से घिरे हुए थे। ददान, तेमा और बूज़ के विषय में, हम जानते हैं कि इन देशों ने अपने नाम अपने संस्थापकों से पाए। ददान कौन था, यह हम मूसा से सीखते हैं, और यह भी कि तेमा और बूज़ कौन थे। (उत्पत्ति 25:3,15; 1 इतिहास 5:14।) इनमें से दो कतूरा के द्वारा अब्राहम के वंशज थे। इन देशों के विषय में और कहने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि आज हम उन्हें नहीं जानते, और भूगोलवेत्ताओं से हम इनमें से किसी भी देश का विस्तार नहीं सीख सकते; क्योंकि जिस समय अन्यजाति लेखकों ने अपने वृत्तान्त लिखने आरम्भ किए, उस समय शायद ही कोई स्थान ऐसा था जिसने बहुत पहले अपना नाम न बदल लिया हो। तौभी हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि ये पूर्वी देश थे।

आगे लिखा है—

यिर्मयाह 25:24

24. और अरब के सब राजाओं को, और जंगल में रहनेवाली दोगली जातियों के सब राजाओं को;

24. Et omnibus regibus Arabiae, et omnibus regibus (vertunt iterum) Arabiae (sed mihi non placet, neque unquam mihi persuadebunt interpretes, qui tamen in hoc consentiunt, repieti proprium Arabiae nomen; cunctos reges, potius vertam, promiscui vulgi, vel, gentium hinc inde collectarum) qui habitant in deserto, भविष्यद्वक्ता अब अरब के राजाओं का उल्लेख करता है, जो एक ओर यहूदियों के पड़ोसी थे। अब तक उसने समुद्र की ओर की जातियों का उल्लेख किया है; उसने बहुत-से समुद्र-तटीय नगरों के नाम लिए हैं, और दूसरों के भी जो समुद्र से कुछ दूरी पर थे, तौभी दूर नहीं थे; क्योंकि वे यहूदिया और सीरिया या किलिकिया के बीच के, या किलिकिया की ओर झुकते हुए, नगर और देश थे। अब वह अरब की चर्चा करता है, जो मिस्र और बाबुल के बीच था। और यद्यपि अरब तीन भागों में बँटा हुआ था, तौभी जहाँ उसकी सीमा यहूदिया से मिलती थी वहाँ वह बंजर था; इसलिए उसे जंगल कहा जा सकता था।

परन्तु भविष्यद्वक्ता पहले स्थान पर अरब के राजाओं का उल्लेख करता है, और फिर, जैसा हम उन्हें कह सकते हैं, मिश्रित राजाओं का, अर्थात् उनका जो जंगली प्रदेशों में शासन करते थे और जिनकी शायद ही कोई प्रतिष्ठा थी; हम तो जानते हैं कि वे छोटे-मोटे लुटेरे थे; और इन अरबों को कभी-कभी स्केनाइट कहा जाता था, क्योंकि वे तम्बुओं में रहते थे। इसलिए मैं मानता हूँ कि इन्हें तिरस्कार के रूप में मिश्रित भीड़ के राजा कहा गया, जो न तो प्रतिष्ठा में और न धन में श्रेष्ठ थे; और इसी से भविष्यद्वक्ता जोड़ता है कि वे जंगल में रहते थे, क्योंकि वे घुमन्तू लोग थे। आगे लिखा है,—

142 देखिए खण्ड 1, पृ. 506 की टिप्पणी। 143 यह पूर्णतः ठीक नहीं है। ददान—इस नाम के दो व्यक्तियों का उल्लेख है, उत्पत्ति 10:7, और उत्पत्ति 25:3; यहाँ सम्भवतः दूसरे से अभिप्राय है। तेमा इश्माएल के वंश का था, उत्पत्ति 25:15। देखिए अय्यूब 6:19, और यशायाह 21:14 भी।—बूज़ नाहोर के वंशजों में से था, उत्पत्ति 22:21; और इसी कुल का एलीहू था, जो अय्यूब के मित्रों में सबसे उल्लेखनीय था; वह बूज़ी था। अय्यूब 32:1-6। — सं.

यिर्मयाह 25:25

25. और जिम्री के सब राजाओं को, और एलाम के सब राजाओं को, और मादै के सब राजाओं को;

25. Et omnibus regibus Zimri, et omnibus regibus Elam, et omnibus regibus Medorum, अब वह अधिक दूर की जातियों का उल्लेख करता है, परन्तु जिनकी कीर्ति यहूदियों में अधिक ज्ञात थी। हम तो जानते हैं कि एलामी, जो मादै और फ़ारस के बीच रहते थे, सदा बड़ी प्रतिष्ठा के लोग रहे थे। मादै के विषय में, वह एक बहुत बड़ा और धनी राज्य था, सब प्रकार के विलास की वस्तुओं से भरपूर; और हम यह भी जानते हैं कि मादी लोग आडम्बर के कितने प्रेमी थे। जिम्री के विषय में, वह एलामियों और मादियों की तुलना में एक अप्रसिद्ध जाति थी। तौभी भविष्यद्वक्ता संकेत करता है कि पृथ्वी का हर भाग, यहाँ तक कि यहूदियों को ज्ञात सबसे छोटा राज्य भी, परमेश्वर के न्याय से दण्डित होगा, जिससे हर दिशा में सारी पृथ्वी इस बात की साक्षी बन जाएगी कि परमेश्वर न्यायी के रूप में स्वर्ग में विराजमान है। आगे लिखा है,—

यिर्मयाह 25:26

26. और क्या निकट क्या दूर के उत्तर दिशा के सब राजाओं को एक संग, और धरती भर में रहनेवाले जगत के राज्यों के सब लोगों को पिलाया। और इन सब के बाद शेशक का राजा भी पीएगा।

26. Et omnibus regibus Aquilonis tam iis ui propinqui sunt quam qui remoti, viro (hoc est, cuique) contra fratrem suum, et omnibus regnis terrae, quae sunt super faciem terrae (mutatur quidem nomen, ponit {,}הארףponit {:}חאדמהet rex Sesach bibet post eos.

भविष्यद्वक्ता अब उत्तर के उन राजाओं की चर्चा करता है जिनकी सीमा बाबुल के राजा से मिलती थी; क्योंकि यहूदिया की दृष्टि से बाबुल उत्तर की ओर था। वह उन सब को जो कसदिया की ओर थे उत्तर के राजा कहता है। फिर वह कहता है, क्या निकट क्या दूर, हर एक अपने भाई के विरुद्ध होगा, और संक्षेप में, पृथ्वी के ऊपर के पृथ्वी के सब राज्य। इसमें कोई सन्देह नहीं, जैसा हम देखेंगे, कि भविष्यद्वक्ता ने अन्तिम स्थान पर कसदियों और उनके राजा को रखा। इसलिए सम्भव है कि जो कुछ वह यहाँ भविष्यवाणी करता है, वह बाबुल के राजा के हाथ और सामर्थ के द्वारा पूरा होना था, जिसने इन सब जातियों पर परमेश्वर का पलटा लिया। तो परमेश्वर ने कसदिया के राजा को अपने लिए एक कोड़े के रूप में चुना, और यहाँ उल्लिखित सब देशों को दण्ड देने में अपने हाथ से उसकी अगुवाई की।

मैं पहले ही आपको स्मरण दिला चुका हूँ कि यह भविष्यवाणी यहूदियों के लिए इसलिए नहीं की गई थी कि वे साथी होने की परिस्थिति से अपने दुःख में कुछ राहत पाएँ, क्योंकि दूसरों की दशा भी कुछ अच्छी न थी; परन्तु परमेश्वर का अभिप्राय कुछ और था, अर्थात् यह कि सब बातों की इतनी बड़ी गड़बड़ी में, जब, जैसा कहते हैं, आकाश और पृथ्वी आपस में मिल गए थे, वे जान लें कि भाग्य की अन्धी इच्छा से कुछ भी नहीं होता। क्योंकि परमेश्वर ने अपने दास के मुँह से पहले ही गवाही दे दी थी कि वह क्या करेगा, और इस भविष्यवाणी से यह निष्कर्ष निकालना सरल था कि ये सब परिवर्तन और प्रचण्ड उथल-पुथल परमेश्वर के न्याय के परिणाम थे।

144 ब्लेनी जिम्री को जिम्रान के समान मानता है, जो कतूरा से उत्पन्न अब्राहम के पुत्रों में से एक था, और वह और उसके भाई “पूर्वी देश” में भेज दिए गए थे। (उत्पत्ति 25:2, 6।) प्लिनी द्वारा उल्लिखित ज़ामेरेनी, जो अरब के किसी भाग में रहते थे, सम्भवतः जिम्री के वंशज थे। — सं.

भविष्यद्वक्ता, यह दिखाने के बाद कि अत्यन्त भारी विपत्तियाँ उन सब जातियों के निकट थीं जो यहूदियों की पड़ोसी थीं, और जिनकी कीर्ति उन तक पहुँच चुकी थी, अन्तिम स्थान पर कहता है कि शेशक का राजा उनके बाद पीएगा। अब तक ऐसा प्रतीत होता है कि भविष्यद्वक्ता ने बाबुल के राजा को सब कष्ट और संकट से छूट दे दी थी; क्योंकि उसने सब जातियों का उल्लेख किया है, और न केवल उनकी जो यहूदियों के निकट थीं, वरन् फ़ारसियों, मादियों और अन्यों की भी चर्चा की है। तो यदि बाबुल के राजा को छोड़ दिया जाता, तो इस सब का क्या उद्देश्य हो सकता था? यह पूछा जा सकता था कि यह कैसे उचित और संगत हो सकता है कि यह अत्याचारी दण्ड से बच जाए, यद्यपि वह सब में सबसे अधिक क्रूर और सबसे अधिक दुष्ट था? इसलिए भविष्यद्वक्ता अब कहता है कि बाबुल का राजा, चाहे उसका उपद्रव सब जातियों में कितना ही प्रबल रहा हो और बिना दण्ड के भड़कता रहा हो, तौभी अपने समय पर हिसाब देने के लिए लाया जाएगा। तो अर्थ यह है कि परमेश्वर कसदियों के दण्ड को तब तक टाले रखेगा जब तक वह उनसे उन सब जातियों का विनाश न करा ले जिनकी चर्चा यिर्मयाह ने अब तक की है।

बाबुल के राजा को शेशक का राजा कहे जाने के विषय में एक प्रश्न उठाया गया है, और कुछ लोग सोचते हैं कि किसी अज्ञात राजा से अभिप्राय है; क्योंकि हम जानते हैं कि यह शब्द एक व्यक्तिवाचक नाम है, जैसा पवित्रशास्त्र के कुछ स्थलों से प्रकट होता है। (1 राजा 11:40; 2 इतिहास 12:2।) परन्तु इस मत का ठीक आधार नहीं है; क्योंकि निःसन्देह भविष्यद्वक्ता यहाँ किसी उल्लेखनीय राजा की चर्चा करता है; और इसमें भी कोई सन्देह नहीं कि उसने उन्हें किसी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण घटना का स्मरण दिलाया, ताकि विलम्ब के कारण विश्वासियों के मन उदास होने का कोई कारण न रहे, यद्यपि उन्होंने देखा कि यह शेशक बाकी लोगों के साथ तुरन्त दण्डित नहीं हुआ। अन्य लोग अनुमान करते हैं कि शेशक कसदिया का एक विख्यात नगर था। परन्तु हमें ऐसे हल्के और तुच्छ अनुमानों को अपनाने की कोई आवश्यकता नहीं। मुझे कोई सन्देह नहीं कि जिस मत का अनुसरण कसदी भाष्यकार ने किया है वही सच्चा है, अर्थात् यह कि शेशक बाबुल था। क्योंकि जिस प्रकार की वर्णमाला को यहूदी आज {,}אתבשatbash कहते हैं, वह कोई नया आविष्कार नहीं है; जेरोम से प्रकट होता है कि वह बहुत समय से ज्ञात थी; उसने तो अक्षरों को, यों कहें, उलटी ओर से गिनने की प्रथा को बड़ी प्राचीनता से निकाला।

वे अन्तिम अक्षर {,}ת को पहले अक्षर {,}א के स्थान पर रखते थे, और फिर {}ש को {,}ב के स्थान पर, और {}כ को, जो अक्षरों के बीच में है, {;}ל के स्थान पर रखा जाता था; और इस प्रकार उन्होंने बाबेल को शेशक कहा। और बाबुल को एक अस्पष्ट नाम से सूचित करना भविष्यद्वक्ता के उद्देश्य के अनुकूल था। परन्तु इसी भविष्यद्वक्ता के एक अन्य स्थल से हर सन्देह दूर हो जाता है,

शेशक ढा दिया गया! सारी पृथ्वी की कीर्ति (या प्रशंसा) कैसे गिर गई! बाबुल कैसे उलट दिया गया!”

(यिर्मयाह 51:40।)

वहाँ निःसन्देह भविष्यद्वक्ता स्वयं अपना अर्थ स्पष्ट करता है; इसलिए किसी अन्य व्याख्या को खोजने की आवश्यकता नहीं। जैसा हम जानते हैं, भविष्यद्वक्ताओं में यह सामान्य बात है कि वे एक ही बात को दूसरे शब्दों में दोहराते हैं; क्योंकि उसने पहले वाक्यांश में शेशक का उल्लेख किया था, इसलिए किसी भी सन्देह को रोकने के लिए उसने बाद में बाबुल का उल्लेख किया।

145 वेनेमा और गैटेकर दोनों इसे रब्बियों की सनकों में से एक मानते हैं, यद्यपि जेरोम ने इसका समर्थन किया है। बाबुल को शेशक कहे जाने के विभिन्न कारण बताए गए हैं। कुछ लोग इस शब्द को {,{שיש से निकालते हैं, जिसका अर्थ सुरियानी में बसना, विश्राम करना है, और K को एक रचनात्मक अक्षर मानते हैं; और फिर वे इसका अनुवाद “एक बड़ा निवास-स्थान” करते हैं। अन्य लोग इसे एक अरबी धातु से निकालते हैं जिसका अर्थ है तेज़ होना या तेज़ी से आगे बढ़ना—जो सूर्य या अग्नि का स्वभाव है, जिसे देवता बनाया गया था। तीसरा दल कहता है कि इसका अर्थ एक पर्व है, सैटर्नेलिया के समान, जिसे कसदी {σακέαν} (कहते थे); क्योंकि एक पर्व के समय ही बाबुल ले लिया गया था, जिससे उसे इस पर्व का राजा कहकर इसका संकेत दिया गया। देखिए यिर्मयाह 51:39। परन्तु सबसे सम्भावित वृत्तान्त वह है जो गैटेकर ने दिया है, कि बाबुल को यह नाम नगर में अत्यन्त प्रतिष्ठित एक मूरत के कारण दिया गया, जिसका नाम शेशक या शाक था, और कि इसी मूरत के पर्व के दिन नगर ले लिया गया। इसी से समझ में आता है कि उसे यह नाम तब क्यों दिया गया, जब विशेषकर उसके विनाश की ओर संकेत किया जाता है। मीशाएल, जिसके अन्त में परमेश्वर का नाम था, बदलकर मेशक, या ठीक कहें तो मीशक, कर दिया गया, जिसमें बाबुल की मूरत का नाम था। (दानिय्येल 1:7।)

परन्तु यहाँ एक प्रश्न उठता है: भविष्यद्वक्ता ने कसदी जाति के साथ-साथ राजा पर भी खुलकर और स्पष्ट रूप से विनाश की घोषणा क्यों नहीं की? बहुत से लोग सोचते हैं कि यह बुद्धिमानी से किया गया, ताकि वह अपनी ही प्रजा के प्रति बैर उत्पन्न न करे; और जेरोम पौलुस का एक वचन प्रस्तुत करता है, परन्तु बेतुके ढंग से, जहाँ वह कहता है, “जब तक धर्म का त्याग न हो ले” (2 थिस्सलुनीकियों 2:3); परन्तु वह उस वचन को समझा ही नहीं, क्योंकि उसने सोचा कि पौलुस रोमी साम्राज्य के विषय में बोल रहा था। एक भूल दूसरी भूल को जन्म देती है; उसने यह मान लिया कि पौलुस सावधानी बरत रहा था कि कहीं रोमी सम्राट का क्रोध कलीसिया के विरुद्ध न भड़क उठे; परन्तु ऐसी कोई बात नहीं थी। अब जो लोग उस मत को अस्वीकार करते हैं, जो सबसे अधिक ठीक है, कि शेशक बाबुल ही था, वे यह तर्क देते हैं,—कि भविष्यद्वक्ता बाबुल का नाम लेने से नहीं डरता था, क्योंकि उसके विषय में जो कुछ उसे कहना था वह उसने खुलकर कह दिया था, जैसा हम अन्य स्थानों में देख चुके हैं, और जैसा आगे और भी स्पष्ट रूप से प्रकट होगा।

परन्तु मैं यह स्वीकार नहीं करता कि भविष्यद्वक्ता बाबुल का नाम लेने से डरता था, क्योंकि हम पाते हैं कि उसने निडर होकर परमेश्वर की आज्ञा मानी, यहाँ तक कि वह, कहा जाए तो, अनेक मृत्युओं के बीच भी दृढ़ खड़ा रहा; परन्तु मैं समझता हूँ कि उसने किसी दूसरे कारण से नाम को छिपाया, अर्थात् इसलिए कि यहूदी जान लें कि उनके पास उतावली करने का कोई कारण नहीं है, यद्यपि बाबुल के दण्ड की भविष्यद्वाणी की जा चुकी थी; क्योंकि वह भविष्यद्वाणी मानो गाड़ दी गई थी, इस कारण कि भविष्यद्वक्ता ने बाबुल का नाम तक रोक रखा। अतः उसका उद्देश्य न तो कलीसिया की शान्ति का प्रबन्ध करना था, और न वह कसदियों से डरता था कि कहीं वह परमेश्वर की प्रजा के विरुद्ध उनका क्रोध न भड़का दे; उसके मन में ऐसी कोई बात नहीं थी, वरन् वह अत्यधिक उतावली को रोकना चाहता था।

और यह प्रसंग से प्रकट होता है; वह कहता है, उनके बाद शेशक का राजा पीएगा; अर्थात् परमेश्वर के बाबुल के राजा को छूने से पहले इन सब जातियों को पीना होगा। अतः वह इन सब विपत्तियों का निठल्ला दर्शक नहीं रहेगा, वरन् उसकी कठोरता सब देशों में से होकर तब तक आगे बढ़ती जाएगी जब तक वह अपने शिखर तक न पहुँच जाए; और तब, वह कहता है, यह राजा बाकी सबके बाद पीएगा। अब यह एक तुच्छ सान्त्वना प्रतीत हो सकती थी कि परमेश्वर इतने लम्बे समय तक बाबुल के राजा को छोड़े रखेगा; तौभी परमेश्वर की सब सन्तानों को उस चेतावनी में सन्तुष्ट रहना चाहिए था जो उन्हें दी गई थी, कि यद्यपि उन्हें यह स्मरण रखना था कि इन जातियों में से प्रत्येक को परमेश्वर के हाथ से दण्ड मिलना है, तौभी उन्हें यह विश्वास करना था कि बाबुल के राजा की भी बारी आएगी, और इसलिए उन्हें अपने आप को रोके रखना था, और उसके दण्ड की बाट जोहने की अत्यधिक उतावली इच्छा में बह न जाना था, वरन् उन पर रखे गए अत्याचार के जूए को धीरज से सहना था, जब तक वह उपयुक्त समय न आ जाए जिसकी उन्हें याद दिलाई गई थी। आगे लिखा है, यिर्मयाह 25:27

27. तब तू उन से यह कहना, सेनाओं का यहोवा जो इस्राएल का परमेश्वर है, यों कहता है, पीओ, और मतवाले हो, और छाँट करो, और गिर पड़ो, और फिर कभी न उठो, उस तलवार के कारण जो मैं तुम्हारे बीच में भेजूँगा।

27. Et dices ad eos, Sic dicit Jehova exercituum, Deus Israel, Bibite et inebriamini, vomite et cadite, et ne surgatis a facie gladii, quem ego mitto inter vos.

यहाँ भविष्यद्वक्ता अपने पहले के कथन पर लौट आता है। उसने कहा था कि परमेश्वर के हाथ से उसकी ओर एक कटोरा बढ़ाया गया, कि वह उसे सब जातियों को पिलाए। अब वह उसी बात को दोहराता और पुष्ट करता है, इस अर्थ में नहीं कि वह सचमुच यह सन्देश सब जातियों के पास ले गया; क्योंकि हम कह चुके हैं कि इन भविष्यद्वाणियों से होनेवाला लाभ केवल यहूदियों का था। न तो सोरियों ने और न सीदोनियों ने कभी यह जाना कि जब उनके शत्रुओं ने उन्हें लूटा तब वे परमेश्वर के हाथ से दण्डित हो रहे थे; यह बात कभी उनके मन में आई ही नहीं, और न यह उन्हें कभी सिखाई गई थी। भविष्यद्वक्ता उनका शिक्षक नियुक्त नहीं किया गया था; उसका कर्तव्य केवल अपनी जाति को चिताना था।

तौभी भविष्यद्वक्ता, इसलिए कि उसकी भविष्यद्वाणियों को अधिक अधिकार प्राप्त हो, यहाँ परमेश्वर के दूत के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो सब जातियों पर विनाश की घोषणा करता है: इसलिए तू उनसे कहना, यहोवा यों कहता है, इत्यादि। ये अन्यजातियाँ सच्चे परमेश्वर को नहीं जानती थीं, सिवाय इसके कि उन्होंने सुना था कि यहूदिया में परमेश्वर की उपासना होती है; परन्तु साथ ही वे सच्चे धर्म को तुच्छ जानती थीं, वरन् उससे घृणा करती थीं। परन्तु, जैसा मैं कह चुका हूँ, भविष्यद्वक्ता ने अपनी ही प्रजा को, अर्थात् केवल यहूदियों को सम्बोधित किया, यद्यपि वह परदेशियों और दूर की जातियों के विषय में बोला। अब मैं इससे आगे नहीं बढ़ सकता।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जब हमारी आँखों के सामने तेरे न्यायों और तेरी भलाई के इतने अधिक प्रमाण हैं, तो हम तेरे नाम के भय में बढ़ते जाएँ, और अपने विरुद्ध तेरे क्रोध को और अधिक न भड़काते रहें, वरन् सच्चे पश्चाताप से छुए जाकर तुझसे मेल-मिलाप करने का यत्न करें; और उन अनेक बुराइयों पर तरस खाकर, जिनसे आज संसार पीड़ित है, हम उन्हें भी सीधे मार्ग पर लौटा लाने का प्रयत्न करें जो अपने आप को अपने ही विनाश के हाथ सौंपते प्रतीत होते हैं; जिससे जो अब दूर और परदेशी हैं उन्हें तेरी ओर फेरकर, तेरा नाम और अधिक महिमा पाए और हम सबके द्वारा एक मन से प्रचारित किया जाए; हमारे प्रभु मसीह यीशु के द्वारा।—

आमीन।

सत्तानवेवाँ व्याख्यान

कल हमने उस पद की व्याख्या आरम्भ की थी जिसमें यिर्मयाह सब जातियों को आज्ञा देता है कि वे कटोरे में से तब तक पीएँ जब तक मतवाली न हो जाएँ। कटोरे के रूपक की व्याख्या पहले ही की जा चुकी है: उसका कारण यह है कि परमेश्वर अपनी असीम बुद्धि में जानता था कि हर एक किस योग्य है, अथवा कभी हल्के और कभी भारी परिमाण में ताड़ना देना कितना न्यायसंगत है। अतः जब नाप एक-सा नहीं है, तो कटोरे की उपमा सबसे अधिक उपयुक्त है। फिर, परमेश्वर कभी-कभी पीने के लिए ऐसा कटोरा देता है कि जो भारी दण्ड सह नहीं सकता वह केवल उसका स्वाद ही चखे। क्योंकि हम जानते हैं कि परमेश्वर बलवानों और हठीलों के साथ अधिक कठोरता से व्यवहार करता है; परन्तु जब कोई निर्बल होता है, तब उसके साथ अधिक कोमलता का व्यवहार किया जाता है, और उसे कटोरे में से केवल घूँट भरने या चखने दिया जाता है।

परन्तु भविष्यद्वक्ता यहाँ कहता है कि उन्हें तब तक पीना था जब तक वे मतवाले न हो जाएँ, उसके अनुसार जो एक दूसरे स्थान में कहा गया है, जहाँ अन्यजातियों की चर्चा है, “वे तलछट तक भी पी जाएँगे।” और परमेश्वर मनुष्यों को मतवाला करता है, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, तब भी जब वह उन्हें अन्धा कर देता है और उन्हें चक्कर या जड़ता की आत्मा देता है।

(ओबद्याह 26 [sic]।) परन्तु मतवालेपन का शब्द बाहरी ताड़नाओं की ओर संकेत करता है। तो पीओ और मतवाले हो; अर्थात् “यह न सोचो कि जब परमेश्वर तुम्हें दण्ड देना आरम्भ करता है और तुम्हें केवल एक घूँट देता है, तो तुम सब कुछ भुगत चुके; वरन् प्रभु तुम्हें पूरी रीति से मतवाला कर देगा।” और इसी कारण वह आगे कहता है, छाँट करो और गिर पड़ो; क्योंकि जो अति करते हैं और अपने आप को यहाँ तक भर लेते हैं कि मानो फटने पर हों, उन्हें अवश्य उगलना पड़ता है। और उल्टी मस्तिष्क को अस्त-व्यस्त कर देती है, यहाँ तक कि पाँव फिर अपना काम नहीं कर पाते, और शरीर का कोई अंग अपना बल स्थिर नहीं रख पाता। तो अर्थ यह है कि चूँकि परमेश्वर ने बहुत समय तक अपने न्याय को टाल रखा था, और जब उसकी सहनशीलता उन्हें पश्चाताप के लिए बुला रही थी तब सब जातियों ने अपने आप को कठोर कर लिया था, इसलिए अब अत्यन्त भयानक पलटा उन सब के निकट था, ऐसा पलटा जो उस विलम्ब की अथवा सहन करने की उस लम्बी अवधि की पूरी भरपाई कर देगा।

कुछ व्याख्याकार इससे यह निष्कर्ष निकालते हैं कि जिन सब जातियों के विषय में भविष्यद्वक्ता अब बोलता है, उनका दण्ड उनके लिए किसी काम का न होगा; परन्तु यह मुझे ठोस आधार पर टिका हुआ नहीं लगता। क्योंकि उसने चुनी हुई प्रजा के विषय में भी कहा है; और यह निश्चित है कि उनमें से कुछ ने पश्चाताप किया, चाहे उनकी संख्या कितनी ही थोड़ी क्यों न रही हो; और हम यह भी देखेंगे कि परमेश्वर के न्यायों के पूरे होने के बाद अन्यजातियों से भी क्षमा और उद्धार की प्रतिज्ञा की गई है। इसलिए मैं इन शब्दों की सीधी-सादी व्याख्या यों करता हूँ,—कि वे कटोरे का केवल स्वाद ही नहीं चखेंगे, वरन् इतना अधिक पीएँगे कि मतवाले मनुष्यों के समान, पूरी रीति से सुध-बुध खोए हुए हो जाएँगे, क्योंकि उनके दण्ड का भारीपन उनकी बुद्धि छीन लेगा। जेरोम का दिया हुआ कारण भी किसी प्रकार अधिक ठोस नहीं है, जब वह कहता है कि भविष्यद्वक्ता का कथन ठुकराए हुओं के विषय में है, क्योंकि वह आगे जोड़ता है, और फिर कभी न उठो। जेरोम ने सोचा कि इस वाक्यांश से चरम निराशा का संकेत किया गया है। परन्तु मेरी समझ में भविष्यद्वक्ता का अर्थ इसके सिवा और कुछ नहीं था कि सब जातियों पर परमेश्वर का पलटा इतना बड़ा होगा कि उसके चिह्न बहुत समय बाद तक बने रहेंगे; जैसा एक पियक्कड़ के साथ होता है, जो अपनी अति के प्रभावों से एक रात या एक दिन में छुटकारा नहीं पाता, वरन् कुछ समय तक सुध-बुध खोया रहता है, या उन्मत्त हो जाता है। भविष्यद्वक्ता का यही अर्थ है जब वह कहता है, और वे फिर न उठेंगे।

अब आगे लिखा है, उस तलवार के कारण जो मैं तुम्हारे बीच भेजता हूँ। अब वह बिना रूपक के वही बात व्यक्त करता है जो उसने मतवालेपन और उल्टी के विषय में कही थी, अर्थात् कि उनके मन पर इतना बड़ा आतंक छा जाएगा कि वे पूरी रीति से सुध-बुध खोकर पड़े रहेंगे।

परन्तु परमेश्वर घोषणा करता है कि वह उनके विरुद्ध तलवार भेजेगा, ताकि यहूदी समझ लें, जैसा पहले बताया जा चुका है, कि जब सब कुछ लगभग पूरी अव्यवस्था की दशा में होगा, तब भी परमेश्वर का न्याय संयम की सीमाओं के भीतर रहेगा। अब आगे लिखा है—

यिर्मयाह 25:28

28. और यदि वे तेरे हाथ से यह कटोरा लेकर पीने से इन्कार करें, तो उन से कहना, सेनाओं का यहोवा यों कहता है, तुम को निश्चय पीना पड़ेगा।

28. Et erit, si rennerint ad sumendum (hoc est, sumere) calicem e manu tua ad bibendum, tunc dices ad eos (copula enim debetg resolvi in adverbium temporis,)

Sic dicit Jehova exercituum, Bibendo bibetis.

इस पद में भविष्यद्वक्ता संकेत करता है कि जातियाँ चाहे कितनी ही हठीली क्यों न हों, तौभी अपने हठ से वे कुछ भी भला न कर सकेंगी, क्योंकि चाहे वे चाहें या न चाहें, उन्हें कटोरे में से पीने के लिए विवश होना पड़ेगा। परन्तु बात को और भी प्रभावशाली बनाने के लिए वह उन्हें इन्कार करते हुए प्रस्तुत करता है: यदि वे कटोरा लेने से इन्कार करें, तो तू उनसे कहना, परमेश्वर कहता है, पीते हुए तुम पीओगे। हम पहले कह चुके हैं कि भविष्यद्वक्ता अन्यजातियों पर शिक्षक नियुक्त नहीं किया गया था: अतः जो कुछ वह यहाँ घोषित करता है उसका सम्बन्ध परदेशियों से नहीं था, वरन् उसका सारा लाभ परमेश्वर की कलीसिया का था। इसलिए जो कहा गया है वह परमेश्वर की प्रजा के लिए कहा गया था, अर्थात् इसलिए कि वे जान लें कि जब परमेश्वर ने मनुष्यों की दुष्टता को दण्ड देने का निश्चय कर लिया था, तो जिन पर न्याय की धमकी दी गई थी उनमें से कोई भी किसी प्रकार बच नहीं सकता था। मनुष्य तो प्रायः अड़ियल घोड़ों के समान होते हैं, जो लातें मारते और भड़कते हैं, और अपने सवार पर उग्र होते हैं, और काटते भी हैं; परन्तु भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि परमेश्वर के पास ऐसे हठ को दबाने के लिए पर्याप्त सामर्थ्य है। तौभी वह हमें स्मरण दिलाता है कि परमेश्वर के हाथ से ताड़ना पाने पर अधिकांश लोग, वरन् लगभग सब के सब, कितने विद्रोही होंगे। यह सचमुच विरला उदाहरण है कि जिसने पाप किया है वह स्वेच्छा से और शान्त मन से परमेश्वर के अधीन हो जाए, और मान ले कि उसे न्यायपूर्वक दण्ड मिला है; वरन् जो यह स्वीकार करते हैं कि वे किसी भारी दण्ड के योग्य हैं, वे भी परमेश्वर के विरुद्ध कुड़कुड़ाते हैं; क्योंकि वे उसके पलटे से डरते हैं, और उसकी दया को नहीं पहचानते, और अपने आप से किसी क्षमा की आशा नहीं रखते। तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि भविष्यद्वक्ता यहाँ दुष्ट मनुष्यों पर, चाहे यहूदी हों या परदेशी, ऐसी कठोर और विद्रोही आत्मा का आरोप लगाता है कि वे परमेश्वर का विरोध करेंगे, और उसके हाथ से अपने आप को छुड़ाने का प्रयत्न करेंगे; संक्षेप में, कि वे हर सम्भव उपाय से उसके न्याय से बचने का प्रयत्न करेंगे।

146 अच्छा यह है कि, जैसा यिर्मयाह 25:16 में, “तलवार” को इस अन्तिम क्रिया के साथ जोड़ा जाए: तब पद यों पढ़ा जाएगा,—27. और तू उनसे कह, सेनाओं का यहोवा, इस्राएल का परमेश्वर, यों कहता है, पीओ और मतवाले हो, छाँट भी करो और गिर पड़ो; और तुम उस तलवार के सामने, जिसे मैं तुम्हारे बीच भेजूँगा, उठ न सकोगे। चित्रण यह है कि वे इतने मतवाले हो जाएँगे कि अपने पाँवों पर खड़े न रह सकेंगे, और गिर जाने के बाद वे उठकर उन पर किए गए आक्रमण का कोई विरोध न कर सकेंगे। — सं.

यही कारण है कि वह कहता है, यदि वे तेरे हाथ से कटोरा लेने से इन्कार करें। इससे हम देखते हैं कि हमें इन शब्दों को उनके शाब्दिक अर्थ में नहीं लेना है: क्योंकि भविष्यद्वक्ता ने परदेशियों से बात नहीं की, वरन् उसकी दृष्टि में स्वयं घटना थी, अथवा यों कहें कि लोगों का स्वभाव था। इन जातियों के पास सचमुच कुछ सामर्थ्य था, और निःसन्देह उन्होंने अपनी सुरक्षा की दृढ़ता से रक्षा की; और भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय इसी इन्कार करने से था। क्योंकि जब शत्रु ने मोआबियों पर आक्रमण किया, तब वे तुरन्त हार नहीं मान बैठे; और दूसरों के साथ भी ऐसा ही हुआ। सोर लगभग अजेय था, क्योंकि वह समुद्र में बसा हुआ था, जहाँ शत्रुओं के निकट आने को रोकना सहज था। अतः जब उन्होंने दृढ़ता से अपने शत्रुओं का सामना किया था, तो कहा गया है कि उन्होंने परमेश्वर के हाथ से कटोरा लेने से इन्कार किया, क्योंकि वे सोचते थे कि वे आनेवाली विपत्ति को दूर रख सकते हैं। परन्तु वे अपने आप को चाहे कितना ही अजेय समझते रहे हों, और अपनी सामर्थ्य पर चाहे कितना ही भरोसा रखते रहे हों, तौभी परमेश्वर कहता है कि उनके प्रयत्न व्यर्थ और निष्फल होंगे: पीते हुए, वह कहता है, तुम पीओगे। कारण आगे दिया गया है—

यिर्मयाह 25:29

29. देखो, जो नगर मेरा कहलाता है, मैं उसी पर विपत्ति डालने लगा हूँ, फिर क्या तुम लोग पूरी रीति से निर्दोष ठहरोगे? तुम निर्दोष न ठहरोगे, क्योंकि मैं पृथ्वी के सब रहनेवालों पर तलवार चलाने के लिए बुलाऊँगा, सेनाओं के यहोवा की यही वाणी है।

29. Quia ecce in urbe in qua invocatum nomen meum super eam, ego incipio ad malefaciendum (ad malum inferendum,) et vos inoxii eritis? Non eritis innoxii; quia gladium ego advoco super incolas terrae, dicit Jehova exercituum.

छोटे और बड़े की तुलना करके एक प्रमाण जोड़ा गया है; क्योंकि भविष्यद्वक्ता यों तर्क करता है,—“यदि परमेश्वर उस नगर को नहीं छोड़ता जिसमें उसने अपने लिए एक मन्दिर चुना है, और ठहराया है कि वहाँ उसका नाम पुकारा जाए, तो वह उन परदेशियों को कैसे छोड़ सकता है जिनसे उसने कभी कोई प्रतिज्ञा नहीं की, क्योंकि वह उन्हें पराया समझता था? तो यदि हरा पेड़ भस्म हो जाता है, तो सूखा कैसे सुरक्षित रह सकता है?” इस वचन का आशय यही है। प्रेरित दूसरे शब्दों में यही तर्क प्रयोग करता है; क्योंकि यह कहने के बाद कि न्याय परमेश्वर के घर से आरम्भ होगा, वह तुरन्त दिखाता है कि परमेश्वर का वह पलटा कितना भयानक होगा जो उसके खुले शत्रुओं की बाट जोह रहा था! (1 पतरस 4:17।)

147 अथवा हम इन शब्दों का अनुवाद ज्यों का त्यों शाब्दिक रूप में कर सकते हैं,—पीओ,—तुम पीओगे। पहली क्रिया आज्ञार्थक है, और दूसरी भविष्यत् काल में है, और उसका अनुवाद “तुम्हें पीना ही होगा” किया जा सकता है, क्योंकि भविष्यत् काल का अनुवाद प्रायः इसी प्रकार किया जा सकता है। — सं.

इससे हम एक उपयोगी शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं। चूँकि परमेश्वर केवल यही घोषणा नहीं करता कि वह बिना भेदभाव के दुष्टता का पलटा लेनेवाला होगा, वरन् अपनी कलीसिया को भी, जिसे उसने चुना है, सबसे पहले अपने न्यायासन के सामने बुलाता है, इसलिए उसकी दशा परदेशी जातियों की दशा से बुरी प्रतीत हो सकती है। अतः भक्तों के मन, जब वे बातों को इस दृष्टि से देखते हैं, बहुत उदास हो सकते हैं। यह परमेश्वर का एक विशेष अनुग्रह प्रतीत होता है कि वह हमें अपने साथ जोड़ता है; परन्तु तौभी यह आदर मानो केवल दण्ड की ओर ही ले जाता प्रतीत होता है: क्योंकि परमेश्वर अन्यजातियों की दुष्टता को अनदेखा करता है, और मानो उन्हें विस्मृति में गाड़ देता है; परन्तु ज्यों ही हम पाप में गिरते हैं, हमें उसके क्रोध के चिह्न दिखाई देने लगते हैं। तो अच्छा यही होता कि हम उससे दूर रहें, और वह हमारी देखभाल में इतना चिन्तित न रहे।

इस प्रकार विश्वासी अविश्वासियों को अपने से अच्छी दशा में देखते हैं। परन्तु यह शिक्षा उस शोक की सारी तीक्ष्णता को कम कर देती है, जो अन्यथा बड़ी कड़वाहट उत्पन्न कर सकता था। क्योंकि जब हमारे सामने यह रखा जाता है कि परमेश्वर अपनी कलीसिया से आरम्भ करता है, ताकि अविश्वासियों को बहुत समय तक सहने के बाद उन्हें और भी भारी दण्ड दे, और इस प्रकार उनके साथ विश्वासियों की अपेक्षा कहीं अधिक कठोर व्यवहार किया जाए, जैसे सूखा पेड़ हरे की अपेक्षा कहीं शीघ्र भस्म हो जाता है,—तो जब यह हमारे सामने रखा जाता है, तब निःसन्देह हमारे पास सान्त्वना का आधार है, और वह भी न छोटा और न साधारण।

इससे हम देखते हैं कि यिर्मयाह ने यह क्यों जोड़ा,—कि जातियाँ परमेश्वर का चाहे कितना ही विरोध करें, तौभी उन्हें, चाहे वे चाहें या न चाहें, झुकने के लिए विवश होना पड़ेगा, क्योंकि परमेश्वर उनसे अधिक सामर्थी था; और इस कारण से कि जब परमेश्वर अपनी चुनी हुई प्रजा को भी नहीं छोड़ेगा, तो अन्यजातियाँ किसी भी प्रकार दण्ड से बच नहीं सकती थीं, और ऐसा नहीं हो सकता था कि वे उसे जगत का न्यायी न पाएँ। तो जब कभी हमारा शरीर हमें कुड़कुड़ाने या अधीर होने की ओर ले जाए, तब हम इस सत्य को स्मरण रखें; क्योंकि हमारे लिए यह अच्छा है कि परमेश्वर हम से आरम्भ करे, क्योंकि अन्त में दुष्ट भी अपनी बारी में नष्ट किए जाएँगे, और यह कि हम सांसारिक विपत्तियाँ सहें, ताकि परमेश्वर अन्त में हमें उठाकर अपने पितृ-अनुग्रह के आनन्द में पहुँचाए। और इसी कारण पौलुस भी कहता है कि जब विश्वासी अनेक विपत्तियों में डाले जाते हैं, तो यह परमेश्वर के सच्चे न्याय का प्रमाण है (2 थिस्सलुनीकियों 1:4, 5): क्योंकि जब परमेश्वर अपनी सन्तानों को ताड़ना देता है, जिनकी आज्ञाकारिता को वह फिर भी स्वीकार करता है, तो क्या हम मानो दर्पण में वह नहीं देखते जो अभी छिपा हुआ है? अर्थात् वह भयानक दण्ड जो सब अविश्वासियों की बाट जोह रहा है। अतः परमेश्वर आज उन पितृवत् ताड़नाओं के द्वारा, जिनसे वह हमारी सुधि लेता है, हमारे सामने अपने शत्रुओं के विनाश का चित्र प्रस्तुत करता है; और वे उस न्याय का निश्चित प्रमाण अथवा जीवन्त प्रदर्शन हैं, जिससे अविश्वासी नहीं डरते, वरन् बिना सोचे-समझे उसका उपहास करते हैं।

अब वह कहता है, देखो, मैं विपत्ति डालने लगा हूँ, इत्यादि। क्रिया {,}הרעero का ठीक अर्थ है बुराई करना; और यह कहना एक विचित्र बात होती कि परमेश्वर बुराई करता है, यदि सामान्य प्रयोग इसका अर्थ स्पष्ट न कर देता। जो पवित्रशास्त्र से थोड़ा भी परिचित हैं, वे जानते हैं कि विपत्तियों को बुराइयाँ कहा जाता है, अर्थात् मनुष्यों की समझ के अनुसार। अतः प्रभु के विषय में यह कहा जाता है कि वह मनुष्यों पर बुराई लाता है, इसलिए नहीं कि वह उनकी हानि करता है या उनके साथ अन्याय और क्रूरता का व्यवहार करता है, वरन् इसलिए कि जो कुछ मनुष्यों के मन के प्रतिकूल है वह उन्हें बुराई प्रतीत होता है, और बुराई कहलाता है। फिर वह कहता है, मैं उस नगर में बुराई करने लगा हूँ जिस पर मेरा नाम पुकारा जाता है। किसी प्रजा पर परमेश्वर का नाम तब पुकारा जाता है जब वह उनका रक्षक और बचानेवाला होने की प्रतिज्ञा करता है; और उसका नाम मनुष्यों पर पुकारा गया तब कहा जाता है जब वे उसकी रक्षा और शरण में आ जाते हैं।

148 शाब्दिक अनुवाद यह है, “जो उस पर मेरा नाम कहलाता है:” और सेप्टुआजिंट ने यूनानी मुहावरे से असंगत होते हुए भी “उस पर” को बनाए रखकर इब्रानी मुहावरे का अनुकरण करने का प्रयत्न किया; परन्तु वल्गेट लातीनी की प्रकृति को बनाए रखता है, और इस वाक्यांश का अनुवाद करता है, “जिस पर मेरा नाम पुकारा जाता है।” वेल्श अनुवाद अपने मुहावरे के अनुसार शब्दशः इब्रानी ही है। — सं.

परन्तु हमें वास्तविक अर्थ पर ध्यान देना चाहिए,—कि किसी प्रजा पर परमेश्वर का नाम तब पुकारा जाता है जब वे उसकी रक्षा और देखरेख के अधीन समझे जाते हैं; जैसे अब्राहम की सन्तान पर परमेश्वर का नाम पुकारा गया, क्योंकि उसने उनका परमेश्वर होने की प्रतिज्ञा की थी; और वे घमण्ड करते थे कि वे उसकी निज प्रजा हैं, और यह उनके लेपालकपन ही के कारण था।

इसी प्रकार यरूशलेम पर परमेश्वर का नाम पुकारा गया, क्योंकि वहाँ मन्दिर और वेदी थी; और चूँकि परमेश्वर उसे अपना विश्रामस्थान या निवासस्थान कहता था, इसलिए उसका नाम वहाँ भली-भाँति जाना जाता था, उसके अनुसार जो हम फ्रांसीसी में कहते हैं, Se reclamer, il se reclame d'un tel, अर्थात् अमुक व्यक्ति इसको या उसको अपना संरक्षक बताता है, जिससे वह उसकी रक्षा की आड़ में शरण लेता है।

इसी प्रकार प्राचीन काल में यहूदी परमेश्वर का नाम पुकारते थे, जब वे कहते थे कि वे उसकी प्रजा होने के लिए चुने गए हैं: वरन् यह बात मनुष्यों पर भी लागू की जा सकती है; क्योंकि याकूब, इसहाक और अब्राहम का नाम बारह गोत्रों पर पुकारा गया, और इसी कारण से,—क्योंकि जब वे परमेश्वर की वाचा पर भरोसा रखने का प्रयत्न करते थे, तब वे अपने मूल पर ध्यान देते थे, क्योंकि वे उन पवित्र पूर्वजों के वंशज थे जिनके साथ परमेश्वर ने अपनी वाचा बाँधी थी, और जिनसे उसने प्रतिज्ञा की थी कि वह सदा उनका परमेश्वर रहेगा। सब इस्राएली अब्राहम का नाम पुकारते थे, इसलिए नहीं कि वे उसकी उपासना करते थे, वरन् इसलिए कि वे उसके वंश होने के कारण न्यायोचित रूप से निश्चिन्त हो सकें कि वह अनुग्रह की वाचा, जिसके द्वारा परमेश्वर ने उन्हें अपना लेपालक बनाया था, उन तक पहुँचाई गई है। परन्तु इस पुकारे जाने को एक दूसरे अर्थ में भी लिया जा सकता है, अर्थात् इसलिए कि वे प्रतिदिन बलिदानों और प्रार्थनाओं के द्वारा परमेश्वर को शान्त करते थे: जब वे अपनी सुरक्षा परमेश्वर को सौंपते थे, तब सदा एक बलिदान भी साथ जोड़ा जाता था, और मेल-मिलाप की प्रतिज्ञा भी दी जाती थी। तो पुकारा जाना या आह्वान किया जाना, {,}נקראnukora, इस अर्थ में लिया जा सकता है, अर्थात् कि वे जानते थे कि जब वे मन से पश्चाताप करते थे तब परमेश्वर उनसे मेल कर लेता था। तो जब उस नगर में परमेश्वर का नाम पुकारा जाता था, तो यह कैसे सम्भव था कि अन्यजातियाँ उस न्याय से बच निकलें जिसके अधीन पवित्र नगर को किया जाना था?

परन्तु पहला मत मुझे सबसे अच्छा प्रतीत होता है; और इसमें कोई सन्देह नहीं कि परमेश्वर यहाँ उस स्वतन्त्र लेपालकपन की ओर संकेत करता है जिसके द्वारा उसने उस प्रजा को अपने लिए चुन लिया था: इसी से वह आह्वान अथवा वह घमण्ड उत्पन्न हुआ जिसके विषय में वह अब बोलता है।

परन्तु चूँकि यहूदियों को भविष्यद्वक्ता की कही हुई बात पर विश्वास दिलाना कठिन था, इसलिए वह इस विषय पर ठहरता है, और उसे दोहराता है जो पहले ही पर्याप्त स्पष्ट था। वह केवल यही नहीं कहता, क्या तुम्हें निर्दोष ठहराया जाएगा? वरन् वह शब्द को दो बार कहता है, क्या तुम निर्दोष ठहराए जाकर निर्दोष ठहराए जाओगे? और इस प्रकार उसने उस टेढ़े हठ को डाँटा जिससे अन्यजातियाँ भरी हुई थीं, जब वे अपने धन, अपनी संख्या और अन्य बातों पर दृष्टि करती थीं, और साथ ही उन सब बातों की उपेक्षा करती थीं जिनका प्रचार भविष्यद्वक्ता यरूशलेम में करते थे, मानो उनसे उनका कोई सम्बन्ध ही न हो। यह प्रश्न अपने आप में बलपूर्ण है, “क्या तुम किसी भी प्रकार निर्दोष ठहराए जा सकते हो?” यह क्रिया निर्दोष होने का अर्थ देती है, परन्तु इसे दण्ड पर लागू किया जाता है; जैसे शब्द {,}עוןon, जिसका अर्थ अधर्म है, दण्ड को सूचित करने के लिए प्रयोग किया जाता है। अतः जो परमेश्वर के न्याय से अपने आप को छुड़ा नहीं सकता, और न उससे मुक्त हो सकता है, उसके विषय में कहा जाता है कि वह निर्दोष नहीं है।

149 शाब्दिक रूप से यह है,—“और तुम—क्या तुम छुटकारा पाकर छूट जाओगे? तुम न छूटोगे।” यहाँ एक न्यायिक कार्यवाही की ओर संकेत है, जिसका स्पष्ट उल्लेख 31वें पद में हुआ है (यिर्मयाह 25:31)। — सं.

वह इस कथन की पुष्टि करता है जब वह कहता है, क्योंकि मैं पृथ्वी के सब रहनेवालों पर तलवार बुला रहा हूँ, सेनाओं का यहोवा कहता है। यह पुष्टि किसी भी प्रकार अनावश्यक नहीं है, क्योंकि परमेश्वर की सहनशीलता के कारण जातियों की ढिठाई बढ़ गई थी; क्योंकि वे बहुत समय तक, वरन् अनेक युगों तक, चैन की दशा में रही थीं, और अपने भोग-विलास में लिप्त रही थीं, और मानो अपनी ही तलछट पर सोती रही थीं, जैसा एक अन्य स्थान में कहा गया है। अतः भविष्यद्वक्ता अब कहता है कि परमेश्वर पृथ्वी के सब रहनेवालों पर तलवार बुला रहा था। क्योंकि उसने अपनी प्रजा को अक्सर और विभिन्न रीतियों से ताड़ना दी थी, जबकि अन्यजातियाँ किसी संकट में न थीं और कष्टों से मुक्त थीं। (यिर्मयाह 48:11।) परन्तु अब वह कहता है कि वह उन सब को नष्ट करने के लिए तलवार बुला रहा था जिन्हें उसने मानो क्षमा कर दिया था।

परन्तु कहा गया है कि परमेश्वर ने तलवार के साथ-साथ मनुष्यों को भी बुलाया; क्योंकि नबूकदनेस्सर के विषय में कहा गया है कि वह परमेश्वर के झण्डे के नीचे लड़ा; उसके विषय में कहा गया है कि वह एक भाड़े के सैनिक के समान था। परन्तु परमेश्वर अब तलवार की बात करता है, ताकि हम जान लें कि जब कभी उसे भाए तब युद्धों को भड़काना और शान्त करना उसी के अधिकार में है, और इस प्रकार तलवार, यद्यपि मनुष्य के हाथ से चलाई जाती है, तौभी मनुष्य की इच्छा से नहीं, वरन् परमेश्वर की गुप्त सामर्थ्य से बुलाई जाती है। आगे लिखा है,—

यिर्मयाह 25:30

30. इसलिए तू इन सब बातों की भविष्यद्वाणी उनके विरुद्ध कर, और उनसे कह, यहोवा ऊपर से गरजेगा, और अपने पवित्र धाम में से अपना शब्द सुनाएगा; वह अपने निवासस्थान के विरुद्ध जोर से गरजेगा; वह पृथ्वी के सारे निवासियों के विरुद्ध भी दाख रौंदनेवालों की नाईं ललकारेगा।

30. Et tu prophetabis ad eos (vel, contra eos) omnia verba haec, et dices illis, Jehova ab excelso rugiet, et ex habitaculo sanctitatis suae edet vocem suam; rugiendo rugiet super habitaculum suum; celeusma (clamorem potius generaliter) quasi prementium torcular respondebit super cunctos incolas terrae.

शब्द {,}הידדeidad का अनुवाद celeusma, अर्थात् ललकार, किया गया है; परन्तु कुछ लोग इसका अनुवाद शोकपूर्ण गायन करते हैं; और यह प्रायः तब आता है जब दाख की फसल की चर्चा होती है। Celeusma, जैसा सब जानते हैं, मल्लाहों की ललकार है। इसकी व्युत्पत्ति का अर्थ तो सचमुच सामान्य है; क्योंकि {κελεύειν} का अर्थ है उकसाना, उत्साहित करना; और फिर संज्ञा का अर्थ है उत्साहवर्धन। परन्तु चूँकि यह शब्द केवल मल्लाहों के विषय में प्रयोग होता है, इसलिए मैं ध्वनि, या ऊँचे कोलाहल, शब्द को अपनाना अधिक पसन्द करता हूँ।

फिर वह कहता है, तू इन सब बातों की भविष्यद्वाणी उनके विरुद्ध कर, और उनसे कह, इत्यादि।

मैं आपको पहले ही स्मरण दिला चुका हूँ कि भविष्यद्वक्ता को यह आज्ञा नहीं दी गई थी कि वह अन्यजातियों के पास जाए और उनमें से प्रत्येक जाति को सम्बोधित करे, या दूसरे शब्दों में, उनके बीच अपना भविष्यद्वक्ता का पद निभाए। परन्तु यद्यपि उसने नगर से एक पग भी नहीं हटाया, तौभी उसकी भविष्यद्वाणी का प्रभाव पृथ्वी के हर क्षेत्र तक पहुँचा। अतः यिर्मयाह का प्रचार व्यर्थ नहीं था, क्योंकि यहूदियों ने घटित घटनाओं से समझ लिया कि उस पवित्र जन की वाणी में सब भक्तों के उद्धार के लिए और सब अविश्वासियों के विनाश के लिए आत्मा की सामर्थ्य थी। तो इसी अर्थ में परमेश्वर उसे फिर से आज्ञा और आदेश देता है कि वह सब जातियों के विरुद्ध भविष्यद्वाणी करे और उनसे बोले, इसलिए नहीं कि उसने वास्तव में उन्हें सम्बोधित किया; वरन् जब उसने यहूदियों को शिक्षा दी, तब उसकी शिक्षा का प्रभाव सब जातियों पर पड़ा।

और वह कहता है, यहोवा ऊपर से गरजेगा, और अपनी पवित्रता के निवासस्थान से अपना शब्द सुनाएगा। गरजने का रूपक पर्याप्त प्रचलित है। परमेश्वर पर इसे लागू करना सचमुच अनुपयुक्त प्रतीत होता है; परन्तु हम जानते हैं कि मनुष्य कितने मन्द होते हैं, और किस प्रकार अपनी ही जड़ता में पड़े रहते हैं, तब भी जब परमेश्वर उन्हें धमकाता है। इसलिए परमेश्वर अतिशयोक्तिपूर्ण बोलने की रीति अपनाकर उनकी मूढ़ता को डाँटता है, क्योंकि जब तक वह संयम की सीमाओं को पार न करे, तब तक वह उन्हें हिला नहीं सकता। तो यही कारण है कि वह अपनी तुलना सिंह से करता है, इसलिए नहीं कि हम यह कल्पना करें कि उसमें कुछ भी जंगलीपन या क्रूरता है; वरन्, जैसा मैं कह चुका हूँ, मनुष्य तब तक हिलाए नहीं जा सकते जब तक परमेश्वर दूसरा रूप धारण करके सिंह के समान प्रकट न हो, जबकि वह दूसरे स्थान में व्यर्थ ही यह गवाही नहीं देता कि वह क्रोध करने में धीमा, दया करने को तत्पर और सहनशील है। (भजन संहिता 86:5, 15।) तो हम जान लें कि वह अधर्मी तिरस्कार, जिससे अधिकांश मनुष्य मोहित हैं, इसी प्रकार दोषी ठहराया जाता है, जब परमेश्वर मानो इस रीति से अपना रूप बदल लेता है, और अपने आप को सिंह के रूप में प्रस्तुत करने के लिए विवश होता है।

तो वह कहता है, यहोवा ऊपर से गरजेगा, और अपनी पवित्रता के निवासस्थान से अपना शब्द सुनाएगा। जब वह ऊपर की बात करता है, तो सम्भवतः स्वर्ग से अभिप्राय है; और उसकी पवित्रता का निवासस्थान प्रायः पवित्रस्थान या मन्दिर के लिए लिया जाता है; परन्तु अन्य स्थानों में, जब ये ही शब्द दोहराए जाते हैं, तब उसकी पवित्रता के निवासस्थान से स्वर्ग का भी अभिप्राय होता है। तौभी यदि हम कहें कि भविष्यद्वक्ता यहाँ मन्दिर की ओर संकेत करता है, और वह इस अभिप्राय से उसकी ओर संकेत करता है कि यहूदियों के मनों को ऊपर उठाए, जिनके विचार दृश्य मन्दिर पर टिके हुए थे, तो इसमें कुछ भी अनुपयुक्त नहीं है: वरन् प्रसंग यही माँगता प्रतीत होता है। वे सचमुच मूर्खता से सोचते थे कि परमेश्वर उनसे बँधा हुआ है, क्योंकि कहा गया था, “यह सदा के लिए मेरा विश्रामस्थान है; यहाँ मेरा नाम और सामर्थ्य वास करेंगे।” (भजन संहिता 132:14)

वे विचित्र रीति से सोचते थे कि उसके सिवा कोई परमेश्वर नहीं जो उस दृश्य और बाहरी पवित्रस्थान में घिरा हुआ था। इसी से वह घमण्ड उत्पन्न हुआ जिसे यशायाह डाँटता और कठोरता से दोषी ठहराता है, जब वह कहता है, “मेरे विश्राम का स्थान कहाँ है? आकाश मेरा सिंहासन और पृथ्वी मेरे चरणों की चौकी है; तो तुम मेरे लिए कौन-सा स्थान बनाओगे?” (यशायाह 66:1।)

भविष्यद्वक्ता वहाँ केवल अन्धविश्वास के विरुद्ध नहीं बोलता, जैसा बहुत से लोग सोचते हैं; वरन् वह उस मूर्खतापूर्ण अहंकार को गिराता है, क्योंकि लोग सोचते थे कि परमेश्वर कभी भौतिक मन्दिर से अलग नहीं किया जा सकता। फिर भी यह व्यर्थ नहीं था कि मन्दिर को परमेश्वर का राजसिंहासन होने का नाम मिला था, बशर्ते कि बुराइयाँ दूर कर दी जाएँ। इसी प्रकार अब भविष्यद्वक्ता, यद्यपि परमेश्वर को आकाशों से भी ऊपर उठाता है, तौभी दृश्य पवित्रस्थान की ओर संकेत करता है, जब वह कहता है, “यहोवा ऊपर से गरजेगा, और अपनी पवित्रता के निवासस्थान से अपना शब्द सुनाएगा;” अर्थात् यद्यपि अन्यजातियाँ सोचती हैं कि परमेश्वर एक कोने में बैठा और विश्राम करता है, तौभी उसका सिंहासन स्वर्ग में है: उसने अपने लिए एक पार्थिव निवासस्थान चुना है, यह इस बात का कोई कारण नहीं कि सारी पृथ्वी का शासन उसके हाथों में न हो; और इसलिए वह सब जातियों के प्रति अपने पलटे के प्रमाण प्रकट करता है; परन्तु अपनी कलीसिया के निमित्त वह मानो अपने मन्दिर में से निकलेगा: और वह फिर दोहराता है, वह अपने वासस्थान पर, या निवासस्थान पर, गरजते हुए गरजेगा। जेरोम प्रायः अन्तिम शब्द का अनुवाद आभूषण, शोभा करता है; तौभी यह वचन, और साथ ही अनेक अन्य वचन, पर्याप्त रूप से सिद्ध करते हैं कि इसका अर्थ निवासस्थान के सिवा और कुछ नहीं हो सकता।

इसके बाद वह एक दूसरी तुलना की ओर बढ़ता है, वह पृथ्वी के सब रहनेवालों के विरुद्ध दाख रौंदनेवालों के समान ललकार का उत्तर देगा। यह दोहराव और यह विविधता उस बात की पुष्टि करते हैं जो मैंने कही है,—कि परमेश्वर ने निश्चिन्त और जड़ लोगों को आतंक से भर देने के लिए अतिशयोक्ति के साथ अपनी वाणी की प्रचण्डता को प्रकट किया। और भविष्यद्वक्ता यहाँ यह संकेत करता प्रतीत होता है कि यद्यपि उत्साह बढ़ानेवाला कोई न होगा, तौभी परमेश्वर की वाणी पर्याप्त सामर्थी होगी। क्योंकि जो दाख का कुण्ड रौंदते हैं, वे ललकारकर एक दूसरे का उत्साह बढ़ाते हैं; एक दूसरे को पुकारता है, और इस प्रकार वे अपने आप को परिश्रम के लिए जगाते हैं। मल्लाहों में भी, जब वे अपनी ललकारें देते हैं, और उन कारीगरों में भी जो दाख के कुण्ड में अंगूर रौंदते हैं, एक पारस्परिक मेल होता है। परन्तु यद्यपि परमेश्वर को जगानेवाला कोई न होगा, तौभी वह स्वयं पर्याप्त होगा; वह ललकार का उत्तर देगा। भविष्यद्वक्ता कोई दूसरा शब्द प्रयोग कर सकता था; परन्तु वह कहता है, वह उत्तर देगा,—किसको? स्वयं अपने आप को; अर्थात् यद्यपि सब मिलकर परमेश्वर के पलटे को बुझाने के लिए एक हो जाएँ, तौभी वह विजेता होकर निकलेगा, और उसे किसी सहायता की आवश्यकता न होगी। अब आगे लिखा है,—

150 अथवा “अपने निवासस्थान के विरुद्ध,” या “विश्रामस्थान के विरुद्ध,” जैसा ब्लेनी ने अनुवाद किया है; सेप्टुआजिंट में “उसका स्थान” है; और सुरियानी में “उसका निवासस्थान” है। वल्गेट जेरोम का अनुवाद है। — सं.

यिर्मयाह 25:31

31. पृथ्वी की छोर तक भी कोलाहल होगा, क्योंकि सब जातियों से यहोवा का मुकद्दमा है; वह सब मनुष्यों से वादविवाद करेगा, और दुष्टों को तलवार के वश में कर देगा, यहोवा की यही वाणी है।

31. Pervenit (hoc est, perveniet) sonitus (vel, impetus) ad extremitatem terrae; quia lis Jehovae cum gentibus, judicium (id est, contentio, vel, disceptatio) ei contra omnem carnem: impios dabit (tradet) ipsos ad gladium, dicit Jehova.

वह उसी विषय को आगे बढ़ाता है; वह कहता है कि एक भयानक आक्रमण होगा, और वह पृथ्वी के अन्तिम भागों तक फैल जाएगा। शब्द {,}שאוןshaun का अर्थ कोलाहल या ध्वनि है; परन्तु इसे उपद्रव या आक्रमण के अर्थ में भी लिया जाता है; और यहाँ दोनों में से कोई भी अर्थ अनुपयुक्त न होगा। तो ध्वनि, या आक्रमण, पृथ्वी के अन्तिम भागों तक पहुँचेगा। फिर आगे लिखा है कि परमेश्वर का सब जातियों से विवाद था; और यहाँ भविष्यद्वक्ता मानो एक ऐसे प्रश्न का पहले से निवारण करता प्रतीत होता है जो उठाया जा सकता था, “इसका क्या अर्थ है? कि परमेश्वर इतने युगों तक शान्त और चुप रहने के बाद, अपने पलटे का कोई लक्षण दिखाए बिना, अचानक हलचल मचा देगा?” क्योंकि हम कह चुके हैं कि यहाँ उल्लिखित जातियाँ बहुत समय से चैन की दशा में थीं। इसलिए भविष्यद्वक्ता इस अनकही आपत्ति का उत्तर देता है और कहता है कि परमेश्वर का उनसे विवाद था।

विवाद करने का समय सदा नहीं रहता: जो मनुष्य अपने विरोधी को तुरन्त न्यायी के सामने नहीं ले जाता, वरन् उसके साथ कृपा का व्यवहार करता है, और मेल-मिलाप से उससे वह प्राप्त करना चाहता है जो उचित है, वह इस कारण उस वस्तु को नहीं छोड़ देता जो न्याय से उसकी है; परन्तु जब वह देखता है कि उसके विरोधी का हठ ऐसा है कि उसकी कृपा से कुछ नहीं होता, तब वह उस पर मुकद्दमा चला सकता है। यही बात अब भविष्यद्वक्ता प्रकट करता है, अर्थात् यह कि परमेश्वर अब जातियों से विवाद करेगा और सब प्राणियों से मुकद्दमा लड़ेगा। परमेश्वर तो ठीक-ठीक कहें तो जगत का न्यायी है; और न स्वर्ग में न पृथ्वी पर कोई ऐसा पंच या न्यायी पाया जाता है जिसके सामने वह मुकद्दमा लड़ सके; तौभी बोलने की इस रीति पर विशेष ध्यान देना चाहिए; क्योंकि इस प्रकार परमेश्वर उन सब शिकायतों का मुँह बन्द कर देता है जो मनुष्य उसके विरुद्ध किया करते हैं। वे भी, जो सौ बार दोषी सिद्ध हो चुके हैं, जब परमेश्वर उन्हें कठोरता से दण्ड देता है तब उसके विरुद्ध शिकायत करते हैं, और कहते हैं कि उन्हें उनकी योग्यता से अधिक दुःख भोगना पड़ रहा है। इसी कारण परमेश्वर कहता है कि जब वह दण्ड देता है तब वह अत्याचारी शक्ति का प्रयोग नहीं करता, वरन् मानो पापियों से मुकद्दमा लड़ता है। साथ ही वह उस उद्देश्य को प्रस्तुत करके जो उसके सामने है, अपनी भलाई को प्रकट करता है; क्योंकि दुष्टता को कठोरता से दण्ड देने में उसका लक्ष्य इसके सिवा और कुछ नहीं कि वह अपना अधिकार प्राप्त करे; और जब वह कृपा के उपायों से इसे प्राप्त नहीं कर सकता, तब वह मानो व्यवस्था की सहायता से उसे वसूल करता है। 151 यह पद केवल यहूदियों से सम्बन्ध रखता प्रतीत होता है, और अगला पद जातियों से, उनके दण्ड के विषय में। इस पद के अन्तिम भाग में परमेश्वर को अपनी ही प्रजा के विरुद्ध सब जातियों की ललकार का उत्तर देते हुए दिखाया गया है, — वह अपने ही निवास-स्थान के विरुद्ध गरज-गरजकर गरजेगा; दाख रौंदनेवालों की सी ललकार से वह पृथ्वी के सब निवासियों को उत्तर देगा। यह अनुवाद {,{אל को कोई असामान्य अर्थ देने की आवश्यकता को दूर कर देता है, जैसा कि सामान्यतः किया जाता है। कोक्सियुस इस स्थल का यही अर्थ लेता है। — सं.

तो आइए हम ध्यान दें कि जब यह कहा जाता है कि परमेश्वर मनुष्यों से वाद-विवाद या मुकद्दमा करता है, तब परमेश्वर की सामर्थ और अधिकार में से कुछ भी घटाया नहीं जाता; वरन् इस रीति से वे सब कोलाहल रोके जाते हैं जो भक्तिहीन उसके विरुद्ध उठाते हैं, मानो वह उन पर अपरिमित क्रोध करता हो; और साथ ही इस प्रकार सब दण्ड का उद्देश्य भी दिखाया जाता है, अर्थात् यह कि परमेश्वर विरोधी पक्ष का रूप धारण करने तक झुक जाता है, और इसके सिवा कुछ नहीं चाहता कि जो उचित और न्यायसंगत है वही माँगे, उस मनुष्य के समान जिसका न्यायी के सामने मुकद्दमा हो, और जो यदि सम्भव हो तो पहले ही अपने विरोधी से स्वेच्छा से समझौता कर लेता; परन्तु जब वह कोई आशा नहीं देखता, तब उस उपाय का सहारा लेता है। इसी प्रकार परमेश्वर हमसे विवाद करता है; क्योंकि यदि हम पूर्णतः असुधार्य न होते, तो हम उसके अनुग्रह में फिर से लौटाए जा सकते थे; और यदि हम उसे केवल उसका अधिकार दे देते, तो मेल-मिलाप हमारे लिए तैयार रहता।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अनुग्रह कर कि जैसे तू निरन्तर नाना प्रकार से हमें अपने पास लौटा लाने का यत्न करता है, — हाँ, ऐसा अनुग्रह कर कि हम अपनी अदम्य हठीलेपन से तेरी पवित्र और कृपामय चेतावनियों का विरोध न करें, और न अपनी तन्द्रा में सुस्त पड़े रहें, वरन् व्याकुल होकर तेरी शरण में भागें, और ऐसी दीनता से क्षमा की याचना करें कि इस प्रकार प्रकट कर सकें कि हम सचमुच और स्थायी रूप से मन फिराते हैं, जिससे तेरे नाम की हर प्रकार से महिमा हो, जब तक कि हम तेरी स्वर्गीय महिमा में न पहुँचें, हमारे प्रभु मसीह यीशु के द्वारा। — आमीन।

अट्ठानबेवाँ व्याख्यान

यिर्मयाह 25:32

32. सेनाओं का यहोवा यों कहता है, देखो, विपत्ति एक जाति से दूसरी जाति में फैलेगी, और पृथ्वी की छोर से बड़ी आँधी उठेगी।

32. Sic dicit Jehova exercituum, Ecce malum egredietur a gente in gentem, et tempestas magna excitabitur a lateribus terrae.

यिर्मयाह उसी विषय को आगे बढ़ाता है जिसकी व्याख्या हमने पिछले व्याख्यान में आरम्भ की थी।

उसने पहले परमेश्वर के उन न्यायदण्डों के विषय में भविष्यद्वाणी की थी जो बहुत सी जातियों के निकट थे, और जो यहूदियों के आस-पास के और उनके जाने-पहचाने लगभग सब देशों से, और कुछ दूर के देशों से भी सम्बन्ध रखते थे। जो कुछ कहा गया है उसका सार यह है, — कि परमेश्वर, जिसने बहुत समय तक मनुष्यों की दुष्टता को सहा था, अब पलटा लेनेवाला बनेगा, जिससे खुलकर प्रकट हो जाए कि यद्यपि उसने दण्ड को टाल रखा था, तौभी वह भक्तिहीनों को बच निकलने न देगा, क्योंकि उचित समय और अवसर पर उनसे लेखा माँगा जाएगा।

इसी आशय से वह यहाँ यह जोड़ता है, एक जाति से दूसरी जाति में विपत्ति निकलेगी।

कुछ लोग इसकी व्याख्या यह करते हैं कि एक जाति दूसरी जाति से युद्ध करेगी, और इस प्रकार वे आपसी संघर्षों से एक दूसरे को नष्ट कर डालेंगी; और यह अर्थ माना जा सकता है। परन्तु मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि भविष्यद्वक्ता का आशय कुछ और था, अर्थात् यह कि परमेश्वर का पलटा एक छूत के रोग के समान सब देशों में फैलता जाएगा। और इसी विचार के अनुसार वह एक रूपक, अर्थात् तूफ़ान, आँधी या बवण्डर की उपमा जोड़ता है; क्योंकि जब आँधी उठती है, तब वह एक ही प्रदेश तक सीमित नहीं रहती, वरन् दूर-दूर तक फैल जाती है। इसलिए भविष्यद्वक्ता अब दिखाता है कि यद्यपि परमेश्वर एक ही समय में सब जातियों को दण्ड न देगा, तौभी अन्त में वह सब का न्यायी होगा, क्योंकि वह आँधी के समान दूर-दूर तक फैल जाएगा। अतः मैं इस स्थल का अर्थ यह नहीं लेता कि जातियाँ एक दूसरे से युद्ध करेंगी, वरन् यह कि जब परमेश्वर एक जाति पर अपना न्याय पूरा कर चुकेगा, तब वह आगे दूसरी जाति की ओर बढ़ेगा, यहाँ तक कि जब तक वह उस सब को पूरा न कर ले जो यिर्मयाह ने पहले से बताया था, तब तक वह अन्त न करेगा। 152 ये शब्द न्यायालय के शब्द हैं, — 31. शब्द पृथ्वी की छोर तक पहुँच गया है; क्योंकि यहोवा का जातियों से मुकद्दमा था, वह सब प्राणियों के साथ न्याय में उतरा है; दुष्टों को — उसने उन्हें तलवार के वश में कर दिया, यहोवा की यही वाणी है। स्पष्ट है कि यहाँ भूतकाल भविष्यकाल के लिए प्रयुक्त हुआ है। तो "शब्द" को निकलना था, और उन कारणों से जो यहाँ बताए गए हैं, — परमेश्वर का सब से विवाद होगा, वह मानो न्यायिक कार्यवाही द्वारा मामले की जाँच करेगा, और दोषी ठहराए हुओं को, अर्थात् दुष्टों को, तलवार के वश में कर देगा। इस वर्णन का उद्देश्य कैल्विन ने बहुत ठीक बताया है। — सं.

और यह विचार पद के दूसरे भाग से और भी स्पष्ट प्रतीत होता है, क्योंकि इसकी व्याख्या घरेलू युद्धों के विषय में नहीं की जा सकती, पृथ्वी की छोरों से आँधी उठेगी। इससे हम देखते हैं कि अर्थ यह है कि परमेश्वर मनुष्यों को न्याय के लिए बुलाना आरम्भ करके थक न जाएगा, वरन् उन सबसे दूर रहनेवालों को भी सम्मिलित करेगा, जो अपने आप को संकट की पहुँच से बाहर समझते थे। जैसे जब आँधी उठती है, तो पहले वह देश के एक छोटे से भाग ही को धमकाती दिखाई देती है, परन्तु शीघ्र ही फैलकर सारे आकाश को ढक लेती है; वैसे ही परमेश्वर भी कहता है कि उसका पलटा पृथ्वी की छोरों से, अर्थात् सबसे दूर के स्थानों से आएगा, यहाँ तक कि कोई दूरी उस बात के पूरा होने में बाधा न डालेगी जो उसने अपने दास के द्वारा पहले से कही थी।

परन्तु यह बात हम पर भी लागू की जा सकती है; क्योंकि जब कभी हम देखते हैं कि यह या वह जाति किसी विपत्ति से पीड़ित है, तब हमें यह सत्य स्मरण रखना चाहिए कि परमेश्वर हमें समय रहते चिताता है, जिससे हम उसकी सहनशीलता का दुरुपयोग न करें, वरन् इससे पहले कि उसका कोड़ा पृथ्वी के किसी कोने से हम तक पहुँचे, हम आगे बढ़कर उसके पास आ जाएँ। संक्षेप में, ज्यों ही परमेश्वर अपने क्रोध का कोई चिह्न प्रकट करे, त्यों ही हमें तुरन्त यह ध्यान आना चाहिए कि वह क्षण भर में पृथ्वी की सब छोरों तक फैल सकता है, यहाँ तक कि कोई कोना बचा न रहेगा। क्योंकि यदि वह बवण्डर या आँधी में अपनी सामर्थ प्रकट करता है, तो तब क्या होगा जब वह मानो दृश्य रीति से अपना हाथ बढ़ाकर अपने न्याय को और भी पूर्ण और निकट रूप से प्रकट करेगा? तो इस पद का आशय यही है। इसके बाद यह आता है, —

यिर्मयाह 25:33

33. उस समय यहोवा के मारे हुए पृथ्वी की एक छोर से दूसरी छोर तक पड़े रहेंगे; उनके लिए कोई रोने-पीटनेवाला न होगा, और न वे बटोरे जाएँगे और न मिट्टी दिए जाएँगे; वे भूमि के ऊपर खाद के समान पड़े रहेंगे।

33. Et erunt interfecti Jehovae, in die illa ab extremitate terrae ad extremitatem terrae: non plangentur, et non colligentur, et non sepelientur; stercus in supereficie terrae erunt (id est, pro stercore.)

यह पद उस बात की व्याख्या करता है जो मैंने अभी कही है; और इससे यह भी प्रकट होता है कि भविष्यद्वक्ता एक जाति द्वारा दूसरी जाति पर किए गए आपसी संहार के विषय में नहीं बोला, वरन् उसने केवल यह घोषित किया कि परमेश्वर का क्रोध आँधी के समान फैलेगा, यहाँ तक कि सब जातियों और देशों तक पहुँचेगा। निस्सन्देह भविष्यद्वक्ता उसी विषय को आगे बढ़ाता है; और हम देखते हैं कि वह यहाँ क्यों कहता है, और उस दिन यहोवा के मारे हुए होंगे, इत्यादि; वह हमारा ध्यान केवल परमेश्वर की ओर लगाता है; आगे चलकर वह दूसरी रीति से बोलेगा, परन्तु यहाँ वह परमेश्वर के पलटे के सेवकों को हमारे सामने नहीं रखता, वरन् स्वयं परमेश्वर को अपने ही द्वारा कार्य करते हुए दिखाता है।

इसलिए वह कहता है, यहोवा के मारे हुए; कुछ लोग "घायल" पढ़ते हैं; और {,}חלל chelal का अर्थ घायल करना और मार डालना दोनों है; परन्तु यहाँ "मारे हुए" अधिक उपयुक्त है। तो यहोवा के मारे हुए पृथ्वी की एक छोर से दूसरी छोर तक होंगे; मानो उसने कहा हो कि परमेश्वर तीन या चार जातियों को दण्ड देकर सन्तुष्ट न होगा, वरन् पृथ्वी के सब देशों का न्यायी होकर अपने आप को प्रकट करेगा।

अब यह स्थल विशेष ध्यान देने योग्य है; क्योंकि हम प्रायः आश्चर्य करते हैं कि परमेश्वर मनुष्यों के किए हुए इतने अपराधों की ओर से आँखें क्यों मूँद लेता है, जिन्हें हममें से कोई भी सहन न करता। परन्तु यदि हम विचार करें कि वह आँधी कितनी भयानक थी जिसके विषय में भविष्यद्वक्ता अब बोल रहा है, तो हमें जान लेना चाहिए कि परमेश्वर कुछ समय तक इसलिए ठहरा रहता है कि भक्तिहीन और दुष्ट और भी कम बहाना बना सकें। साथ ही निस्सन्देह वह एक दुःखद दृश्य था, जब इतने सारे प्रदेश और प्रान्त निरन्तर नाना प्रकार की विपत्तियाँ भोग रहे थे, जब एक जाति अपने आप को अपने पड़ोसियों से अच्छी दशा में समझती थी, परन्तु शीघ्र ही पाती थी कि उसके साथ और भी अधिक क्रूरता का व्यवहार हो रहा है। और फिर भी सामान्यतः ऐसा ही हुआ, क्योंकि परमेश्वर का क्रोध पृथ्वी की छोरों तक फैल गया।

वह तीन बातों का उल्लेख करके उस विपत्ति की भयंकरता को और बढ़ाकर बताता है, — उनके लिए न विलाप किया जाएगा, न वे बटोरे जाएँगे, न मिट्टी दिए जाएँगे; परन्तु वे खाद के समान होंगे, और इस प्रकार भूमि के ऊपर पड़े रहेंगे। हम अन्य स्थानों में कह चुके हैं कि विलाप से मरे हुओं का कुछ भला नहीं होता; परन्तु क्योंकि मनुष्यता यही माँगती है, इसलिए उसका अभाव ठीक ही सांसारिक दण्ड माना जाता है। इसी प्रकार जब किसी को गाड़े जाने से वंचित किया जाता है, तो निश्चय ही मरे हुए के लिए इसका कोई महत्त्व नहीं कि उसकी देह कब्र में न रखी जाए; क्योंकि हम जानते हैं कि परमेश्वर के पवित्र दास बहुधा या तो जलाए गए, या फाँसी पर लटकाए गए, या वन-पशुओं के आगे डाल दिए गए; और सारी कलीसिया शिकायत करती है कि यरूशलेम के चारों ओर लोथें पड़ी थीं और आकाश के पक्षियों और पृथ्वी के पशुओं का आहार बन गई थीं। परन्तु ये बातें इस तथ्य का खण्डन नहीं करतीं कि मिट्टी दिया जाना मनुष्यों के प्रति परमेश्वर की पितृतुल्य कृपा का प्रमाण है। क्योंकि उसने यह क्यों ठहराया कि पशुओं के बदले मनुष्य गाड़े जाएँ, इसके सिवा कि उसकी इच्छा थी कि यह अमर जीवन का संकेत हो? तो जब मिट्टी दिया जाना परमेश्वर के अनुग्रह का चिह्न है, तो कोई आश्चर्य नहीं कि वह बहुधा निकम्मे ठहराए हुओं से कहता है कि उनकी लोथें फेंक दी जाएँगी, यहाँ तक कि उन्हें कब्र का सम्मान भी न मिलेगा।

परन्तु हमें यह सत्य स्मरण रखना चाहिए, — कि सांसारिक दण्ड परमेश्वर की सन्तानों और परायों पर समान रूप से आते हैं; परमेश्वर बिना किसी भेद के अपनी सन्तानों और अविश्वासियों पर सांसारिक दण्ड डालता है, और यह इसलिए कि यह प्रकट हो जाए कि हमारी आशा इस संसार पर टिकी न होनी चाहिए। परन्तु यह बात चाहे जैसी हो, तौभी यह सच है कि जब परमेश्वर अविश्वासियों को इस रीति से दण्ड देता है, तब वह साथ ही कोई ऐसी बात भी जोड़ देता है जिससे समझा जा सके कि यह व्यर्थ या अनजाने में नहीं होता कि वे लोग गाड़े जाने से वंचित किए जाते हैं, जो इस योग्य हैं कि परमेश्वर उन्हें पृथ्वी पर से मिटा डाले, और उनका स्मरण भी मिटा दिया जाए, यहाँ तक कि वे मनुष्यों में गिने न जाएँ। परन्तु हम दूसरे स्थान पर यह भी कह चुके हैं कि ऐसे कथनों का एक और अर्थ भी हो सकता है, जो पहले अर्थ के विरुद्ध नहीं, वरन् उससे जुड़ा हुआ है, और वह यह कि संहार इतना बड़ा होगा कि कोई ऐसा न बचेगा जो अपने मित्र, या अपने पड़ोसी, या अपने भाई के प्रति यह कृपा दिखाए। क्योंकि जब चार या दस या सौ लोग मरते हैं, तो वे गाड़े जा सकते हैं; परन्तु जब परमेश्वर एक ही दिन में बहुत बड़ी संख्या को तलवार से घात करता है, तब मरे हुओं को गाड़ने की चिन्ता करनेवाला कोई नहीं मिलता, क्योंकि थोड़े ही जीवित बचते हैं, और वे भी अपने शत्रुओं से डरते हैं। इसलिए जब भविष्यद्वक्ता कहते हैं कि जिन्हें परमेश्वर ने घात किया वे बिना विलाप और बिना गाड़े पड़े रहेंगे, तब वे संकेत करते हैं कि उनकी संख्या इतनी बड़ी होगी कि सब भूमि पर पड़े रहेंगे; क्योंकि कोई भी मरे हुओं के प्रति यह मानवीय कार्य करने का साहस न करेगा, और यदि सब के सब भरसक प्रयत्न भी करते, तो भी वे ऐसा न कर पाते, क्योंकि संख्या इतनी बड़ी होगी।

इस प्रकार यिर्मयाह उस बात की पुष्टि करता है जो हमने कही है, — कि परमेश्वर का पलटा सब देशों और सब जातियों तक फैलेगा, यहाँ तक कि वह साधारण लोगों के साथ-साथ प्रतिष्ठित लोगों को भी विनाश में फँसा देगा, और थोड़े ही लोगों को बचा रहने देगा।

इसी उद्देश्य से वह आगे की बात जोड़ता है, कि वे भूमि के ऊपर खाद के समान होंगे। यह तिरस्कार के रूप में जोड़ा गया है। उस समय यह विश्वास करना कठिन था कि इतनी प्रसिद्ध, धनी और शक्तिशाली जातियाँ इस प्रकार इतने थोड़े समय में नष्ट की जा सकती हैं। परन्तु भविष्यद्वक्ता इस झूठे भ्रम को झाड़ देने के लिए कहता है कि वे खाद के समान हो जाएँगी, कि उनकी प्रतिष्ठा और शक्ति, उनका धन और बल चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो, तौभी वे परमेश्वर के हाथ से बच न सकेंगी, क्योंकि वह सारे जगत की महिमा को शून्य कर देगा। अब हम भविष्यद्वक्ता का वास्तविक अर्थ समझते हैं। इसके बाद यह आता है —

यिर्मयाह 25:34

34. हे चरवाहो, हाय-हाय करो और चिल्लाओ; हे झुण्ड के प्रधानो, राख में लोटो; क्योंकि तुम्हारे वध होने और तुम्हारे तितर-बितर किए जाने के दिन पूरे हो गए हैं; और तुम मनोहर बरतन के समान गिर पड़ोगे।

34. Ulalate pastores, et clamate, et volutate vos eximii gregis; quia impleti sunt dies vestri ad mactandum, et dispersiones vestrae (vel, afflictiones, confractiones;) et cadetis tanquam vas desiderii (id est, pretiosum.)

मुझे कोई सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता अब अपनी बात विशेष रूप से अपनी ही जाति की ओर मोड़ता है, जिस पर व्याख्याकारों ने ध्यान नहीं दिया, और इसलिए वे भविष्यद्वक्ता का अर्थ नहीं समझ पाए। उसने परमेश्वर के न्यायदण्डों के विषय में भविष्यद्वाणी की थी, जिससे यहूदी जान लें कि वे व्यर्थ ही दण्ड से बच निकलने की आशा करते हैं, क्योंकि प्रभु उन अज्ञानियों और सब सच्चे ज्ञान से रहित लोगों को भी क्षमा न करेगा, जो अपनी अज्ञानता को बहाने के रूप में प्रस्तुत कर सकते थे; और यह भी कि यह सान्त्वना भक्तों के मन को सम्भाले रहे कि अन्यजाति, जो उसी दोष में फँसे हुए हैं, उसी न्याय के अधीन किए जाएँगे; और अन्त में यह कि वे अपने और अन्य जातियों के बीच के भेद को जानकर परमेश्वर की दया की शरण में भागें, और क्षमा की आशा रखकर मन फिराने के लिए उत्साहित हों। तो इस सामान्य विषय का विवेचन कर चुकने के बाद वह अब उन लोगों की ओर लौटता है जिनके ऊपर वह शिक्षक ठहराया गया था। वह सचमुच किसी ऊँचे स्थान से यह घोषणा कर सकता था कि सारी पृथ्वी पर क्या होनेवाला है; क्योंकि परमेश्वर ने उसे जो घोषक का पद सौंपा था वह इतना व्यापक था। तो वह अपने पद के अधिकार से सब जातियों पर विनाश की घोषणा कर सकता था; परन्तु उसे चुनी हुई प्रजा के प्रति अपनी विशेष चिन्ता की उपेक्षा नहीं करनी थी। और इसलिए मैं इस स्थल की व्याख्या इसी प्रकार करता हूँ; क्योंकि वह अब फिर से अपनी बात यहूदियों की ओर लगाता है।

इसलिए वह कहता है, हे चरवाहो, हाय-हाय करो और चिल्लाओ, इत्यादि। चरवाहों से उसका तात्पर्य राजा और उसके मन्त्रियों, याजकों और अन्य शासकों से है; और झुण्ड के चुने हुओं से वह धनवानों को समझता प्रतीत होता है, जिनकी दशा साधारण लोगों से अच्छी थी।

कुछ लोग अधिक सूक्ष्मता से यह मानते हैं कि झुण्ड के चुने हुए वे थे जो ज्ञान से रहित थे, शास्त्रियों और याजकों और राजा के मन्त्रियों के विपरीत; परन्तु यह विचार सुदृढ़ आधार पर टिका नहीं प्रतीत होता। इसलिए मैं वह अर्थ अपनाता हूँ जो अधिक सम्भव है, — कि झुण्ड के चुने हुए वे थे जो धनी थे और जनता में बड़े आदर के पात्र थे, तौभी राज्य में या कलीसिया में अधिकार का कोई पद नहीं रखते थे। यह बात चाहे जैसी हो, भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि ज्यों ही परमेश्वर यहूदियों को दण्ड देने के लिए अपना हाथ बढ़ाने लगेगा, त्यों ही मनुष्यों का कोई वर्ग विलाप से अछूता न रहेगा, क्योंकि वह चरवाहों और झुण्ड के चुने हुओं से आरम्भ करेगा।

वह यह भी जोड़ता है कि उनके दिन पूरे हो गए थे। यहाँ वह परोक्ष रूप से उस दुष्ट निश्चिन्तता की निन्दा करता है जिसने बहुत समय से उन्हें कठोर बना दिया था, यहाँ तक कि वे सब धमकियों को तुच्छ जानते थे; क्योंकि परमेश्वर अब बहुत वर्षों से उन्हें पुकार रहा था, और अपने भविष्यद्वक्ताओं को एक के बाद एक भेजता रहा था; जब उन्होंने देखा कि न्याय का पूरा होना उनके ऊपर टला हुआ है, तब उन्होंने उसे केवल एक हौआ समझा, "अच्छा, भविष्यद्वक्ता यदि चाहें तो अपनी डरावनी बातें सुनाते रहें, परन्तु उनसे कुछ न होगा।" इस प्रकार भक्तिहीनों ने परमेश्वर की सहनशीलता को अपने हठ का अवसर बना लिया। तो क्योंकि यह बुराई यहूदियों में सामान्य थी, इसलिए भविष्यद्वक्ता अब पहले से उत्तर देते हुए कहता है कि उनके दिन पूरे हो गए थे। क्योंकि यहाँ यह विरोधाभास समझना चाहिए, कि परमेश्वर ने उन्हें छोड़ रखा था, इसलिए नहीं कि उसकी आँखें बन्द थीं, या उसने उनके दुष्ट कामों को नहीं देखा था, वरन् इसलिए कि वह उन्हें मन फिराने का समय देना चाहता था; परन्तु जब उसने देखा कि उनकी दुष्टता असाध्य है, तब वह अब कहता है कि उनके दिन पूरे हो गए। और वह जोड़ता है, घात किए जाने या मारे जाने के लिए। मुझे आश्चर्य है कि विद्वान व्याख्याकार इसका अनुवाद यह करते हैं, "कि वे एक दूसरे को घात करें।" कुछ जोड़ने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि भविष्यद्वक्ता का आशय ऐसा कोई विचार प्रकट करने का नहीं था, और न यह कि जो कुछ वह यहाँ यहूदियों के विरुद्ध घोषित करता है उसे आन्तरिक या घरेलू युद्धों तक सीमित करे; इसके विपरीत, हम जानते हैं कि वे परदेशियों के द्वारा, अर्थात् कसदियों के द्वारा, घात किए गए। तो यह अर्थ खींचतान का है, और इतिहास से भी मेल नहीं खाता। फिर यह जोड़ा गया है, और तुम्हारे तितर-बितर होने भी पूरे हो गए हैं, या तुम्हारे टूटने। क्रिया {,}פוףputs का अर्थ तितर-बितर करना या छिन्न-भिन्न करना है, और पीड़ित करना, फाड़ना भी; और मैं यहाँ फाड़ने या तोड़ने का अर्थ अधिक पसन्द करता हूँ। और वह जोड़ता है, और तुम बहुमूल्य बरतन के समान गिर पड़ोगे। यह उपमा बहुत उपयुक्त प्रतीत नहीं होती, क्योंकि वह उनकी तुलना मिट्टी के बरतन से क्यों न करता, जिसका कोई मूल्य नहीं और जो सहज ही टूट जाता है?

परन्तु उसका उद्देश्य उनकी दो दशाओं के बीच के भेद को दिखाना था, कि यद्यपि परमेश्वर ने उन्हें अनोखे विशेषाधिकारों से सम्मानित किया था, तौभी उनकी सारी श्रेष्ठता उन्हें सुरक्षित न रख सकेगी; क्योंकि बहुधा ऐसा होता है कि बरतन, चाहे कितना ही बहुमूल्य हो, टूट जाता है। और वह सोने या चाँदी के बरतनों की नहीं, वरन् भंगुर बरतनों की बात करता है, जो कभी बड़े आदर में थे।

तो उन्हें और भी गहरी चोट पहुँचाने के लिए वह कहता है कि वे अब तक बहुमूल्य बरतन, या एक बहुमूल्य बरतन, रहे थे; क्योंकि वह उन सब के विषय में एकवचन में बोलता है, और कि वे तोड़े जानेवाले थे; और इस प्रकार वह उस बात की पुष्टि करता है जो मैंने पिछले पद पर कही थी, कि कपटी लोग व्यर्थ ही अपने वर्तमान सौभाग्य पर, या परमेश्वर की श्रेष्ठ आशीषों पर भरोसा रखते थे, क्योंकि जो कुछ महिमा उसने उन्हें दी थी, उसे वह लज्जा में बदल सकता था। इसके बाद यह आता है, —

यिर्मयाह 25:35

35. उस समय न तो चरवाहों के भागने के लिए कोई मार्ग रहेगा, और न झुण्ड के प्रधानों के बच निकलने का।

153 यह शब्द सेप्टुआजिंट में छोड़ दिया गया है, और कैल्विन का अनुवाद वुल्गेट का है, और सीरियाई तथा टार्गुम में यह भी पहले शब्द के समान एक क्रिया है। इसके विपरीत, दोनों शब्द संज्ञाएँ हैं, और उनका अनुवाद संज्ञा के रूप में ही होना चाहिए, — 34. हे चरवाहो, हाय-हाय करो और चिल्लाओ, और हे झुण्ड के प्रतिष्ठितो, धूल में लोटो, क्योंकि तुम्हारे दिन पूरे हो गए हैं वध के लिए और तुम्हारे तितर-बितर किए जाने के लिए; और तुम बहुमूल्य बरतन के समान गिर पड़ोगे। शब्द {,{`` באפר "धूल में,"'' यहाँ प्रयुक्त क्रिया के साथ यिर्मयाह 6:26 और यहेजकेल 27:30 में जुड़ा हुआ है, और यहाँ वुल्गेट और टार्गुम उसे जोड़ देते हैं। सेप्टुआजिंट इस पंक्ति का अनुवाद यों करता है, — और हे झुण्ड के मेढ़ो, विलाप करो। परन्तु इस क्रिया का लोटने के सिवा कोई और अर्थ नहीं, यद्यपि दूसरे शब्द का अनुवाद "मेढ़े" किया जा सकता है, क्योंकि वह पुल्लिंग में है। वेनेमा यह अनुवाद देता है, — हे चरवाहो, हाय-हाय करो और ऊँचे शब्द से चिल्लाओ, और हे झुण्ड के प्रतिष्ठितो, अपने ऊपर धूल डालो; क्योंकि बलि किए जाने के लिए तुम्हारे दिन पूरे हो गए हैं; और तुम्हारा टूटना होगा, और तुम बहुमूल्य बरतन के समान गिर पड़ोगे। वह पहली और चौथी पंक्ति को, और दूसरी और तीसरी को, परस्पर जुड़ी हुई मानता है; चरवाहों को तोड़ा जाना था, और झुण्ड के प्रतिष्ठितों को बलि के रूप में घात किया जाना था। इस प्रकार देखने पर भागों में निश्चय ही एक सामंजस्य है। — सं.

35. Et peribit fuga a pastoribus, et evasio ab eximiis gregis.

वह उस बात को समझाता है जिस पर हमने अभी ध्यान दिया है, क्योंकि उसने चरवाहों को हाय-हाय करने की और झुण्ड के चुने हुओं को धूल में लोटने या औंधे मुँह गिरने की आज्ञा दी थी; अब वह इसका कारण बताता है, अर्थात् यह कि वे अपने प्राण नहीं बचा सकेंगे, नहीं, अपमानजनक भाग जाने के द्वारा भी नहीं। यह सचमुच बड़ी दयनीय दशा है जब कोई मनुष्य निर्वासन ढूँढ़ने के सिवा और किसी रीति से अपना प्राण नहीं बचा सकता, जहाँ उसे दरिद्र, कंगाल और तुच्छ होकर रहना पड़ता है; परन्तु भविष्यद्वक्ता राजा और उसके मन्त्रियों को, और साथ ही सारे नगर और सारे देश के धनवानों को, यह भी नहीं मिलने देता: वह कहता है, उनसे भागना नष्ट हो जाएगा। बोलने की यह रीति इब्रानी में सामान्य है: दाऊद कहता है, "भागना मुझसे नष्ट हो गया है," (भजन संहिता 142:5;) अर्थात् मुझे बच निकलने का कोई मार्ग नहीं मिलता। इसी प्रकार यहाँ, भागना नष्ट हो जाएगा; अर्थात् जब वे संकट से बचने के लिए इधर-उधर देखेंगे, तब वे हर ओर से ऐसे घेर लिए जाएँगे कि वे अवश्य ही अपने शत्रुओं के शिकार बन जाएँगे। इसके बाद यह आता है, —

यिर्मयाह 25:36

36. चरवाहों की चिल्लाहट का शब्द और झुण्ड के प्रधानों का हाय-हाय करना सुनाई देगा; क्योंकि यहोवा ने उनकी चराई को उजाड़ दिया है।

36. Vox clamoris pastorum et ululatus eximoirum gregis, quia perdidit jehova pascua eorum.

वह केवल वही बात दूसरे शब्दों में नहीं दोहराता, वरन् कुछ और भी अधिक दुःखदायी बात जोड़ता है, कि परमेश्वर उनकी चराइयों को उजाड़ कर देगा। वह उसी रूपक को आगे बढ़ाता है; क्योंकि जैसे उसने राजा के मन्त्रियों और याजकों के विषय में बोलते हुए इस उपमा का प्रयोग किया था, वैसे ही अब भी करता है; और चराइयों से उसका तात्पर्य समाज से, अर्थात् नगर और देहात की प्रजा से है; मानो उसने कहा हो कि वे अब तक उस देश पर शासन करते आए थे जो धनी और उपजाऊ था, और जिसमें वे अधिकार और प्रतिष्ठा का सुख भोगते थे, परन्तु अब वे इन सब लाभों से वंचित कर दिए जाएँगे।

इसके बाद वह यह जोड़ता है, —

यिर्मयाह 25:37

37. और यहोवा के भड़के हुए कोप के कारण शान्ति के निवास-स्थान काट डाले गए हैं।

37. Et peribunt (vel, succidentur, vertunt alii) pascua pacis (tuguria pacis, hos est, tranquilla) a facie excandescentiae (vel, furoris) irae Jehovae.

वह उसी विषय को आगे बढ़ाता है, कि वे डेरे, जो पहले शान्त थे, नष्ट या उजाड़ दिए जाएँगे। और वह जान-बूझकर उनके निवासों को शान्तिमय कहता है; क्योंकि यहूदियों ने यह पाकर कि उनके शत्रुओं ने पहले उन्हें नहीं सताया था, भविष्य में भी अपने लिए उसी सौभाग्य की आशा बाँध रखी थी।

और विश्वासी लोग सचमुच इस प्रकार ठीक ही करते हैं, और परमेश्वर के पिछले उपकारों से न्यायपूर्वक यह निष्कर्ष निकालते हैं कि वह उनके प्रति वैसा ही कृपालु रहेगा जैसा वह सदा से रहा है; परन्तु कपटी लोग, यद्यपि वे मन नहीं फिराते, तौभी मूर्खता से सोचते हैं कि परमेश्वर उनसे बँधा हुआ है; और यद्यपि वे प्रतिदिन उसके क्रोध को भड़काते हैं, तौभी वे निश्चिन्त होकर शान्ति पाने के अपने भरोसे में बने रहते हैं। तो क्योंकि परमेश्वर ने उस समय तक अपने क्रोध की भीषणता को टाल रखा था, इसलिए भविष्यद्वक्ता कहता है कि यद्यपि उनके डेरे शान्तिमय रहे थे, तौभी ज्यों ही परमेश्वर के क्रोध का प्रकोप निकलेगा, त्यों ही वे विनाश से बच न सकेंगे। इन शब्दों में से एक का प्रयोग करना पर्याप्त हो सकता था, या तो {,}חרון cherun का, या {,}אףaph का; परन्तु भविष्यद्वक्ता ने दोनों का, प्रकोप और क्रोध का, प्रयोग किया, जिससे वह दुष्टों को और भी अधिक भय से भर दे; क्योंकि जैसे वे अपनी दुष्टता में हठीले थे, वैसे ही वे तब तक विचलित न होते थे जब तक परमेश्वर अपने प्रहारों को दुगना न कर दे और अपने क्रोध की चरम सीमा प्रकट न कर दे। इसके बाद यह आता है, — 154 इसी प्रकार टार्गुम इस वाक्य का अनुवाद करता है, "क्योंकि प्रभु ने उनकी प्रजा को नष्ट कर दिया है।" — सं. 155 जिस शब्द का अनुवाद "डेरे" किया गया है उसका अर्थ कभी निवास या बसेरे होता है, और कभी चराइयाँ; और हमारे अनुवाद में प्रसंग की आवश्यकता के अनुसार इसका विभिन्न प्रकार से अनुवाद किया गया है। क्योंकि पिछले पद में "चराइयों" का उल्लेख है, इसलिए यहाँ डेरे या निवास सबसे अच्छा शब्द होगा, और प्रयुक्त क्रिया के लिए अधिक उपयुक्त भी, जिसका अर्थ है चुप करा देना, या समतल करना, अर्थात् भूमि के बराबर, और इसलिए ढा देना। वुल्गेट का अनुवाद "खेत — arva" है, परन्तु सीरियाई और टार्गुम का "निवास"। वेनेमा और ब्लेनी "भेड़शालाएँ" रखते हैं, जो सम्भवतः वही निवास हैं जिनका अभिप्राय है। — सं.

यिर्मयाह 25:38

38. उसने सिंह के समान अपना ठौर छोड़ दिया है; क्योंकि अन्धेर करनेवाले की प्रचण्डता और उसके भड़के हुए कोप के कारण उनका देश उजाड़ हो गया है।

38. Dereliquit tanquam leo tabernaculum suum; quia redacta est terra eorum in vastitatem a facie irae oppressoris (aut, praedonis) et a facie excandescentiae irae ejus.

भविष्यद्वक्ता अन्तिम पद में हमें स्मरण दिलाता है कि यहूदी व्यर्थ ही परमेश्वर की रक्षा पर भरोसा रखते थे, क्योंकि वह अपने मन्दिर को और नगर को भी त्याग देगा। उनमें यह मानो एक सामान्य कहावत थी, "उसने कहा है, यह सदा के लिए मेरा विश्रामस्थान है।" (भजन संहिता 132:14।)

परन्तु कपटी लोगों ने यह विचार न किया कि वह अपनी प्रतिज्ञाओं के प्रति विश्वासयोग्य बना रह सकता था, यद्यपि वह उन्हें बिना दण्ड के न छोड़ता। इसलिए वे इन दो बातों को एक साथ न जोड़ सके, — कि परमेश्वर अपनी वाचा को सदा स्मरण रखेगा, — और फिर भी वह अपनी कलीसिया का न्यायी होगा।

यही कारण है कि भविष्यद्वक्ता अब कहता है कि परमेश्वर सिंह के समान अपने डेरे को त्याग देगा। कुछ लोग यह व्याख्या देते हैं कि वह थोड़े समय के लिए बाहर निकलेगा, जैसा भूखे सिंह किया करते हैं; परन्तु यह बहुत दूर की कल्पना है। इसलिए मुझे कोई सन्देह नहीं कि परमेश्वर सिंह के रूप में अपनी सामर्थ को प्रस्तुत करता है; क्योंकि यदि परमेश्वर ने मानो अपना स्थान न बदला होता, तो यहूदियों से उनके सब शत्रु डरते। परन्तु क्योंकि उन्होंने अपनी बुराइयों से उसे निकाल दिया था, यहाँ तक कि उनके बीच उसका कोई निवास न रहा, इसी कारण वे सब जातियों की लूट के लिए खुले पड़ गए। तो इस स्थल का आशय यह है कि जब तक परमेश्वर मन्दिर में वास करता था, तब तक वह सिंह के समान था, यहाँ तक कि वह केवल अपनी गरज से सब जातियों को दूर रखता था और अब्राहम की सन्तान की रक्षा करता था; परन्तु अब, यद्यपि उसने अपना स्वभाव नहीं बदला था, और न उसकी सामर्थ में से कुछ छीना या घटाया गया था, तौभी यहूदी सुरक्षित न रहेंगे, क्योंकि वह उन्हें त्याग देगा।

और इसका कारण जोड़ा गया है, जो कही हुई बात की स्पष्ट पुष्टि करता है, क्योंकि उनका देश (वह यहूदियों की ओर संकेत करता है) उजाड़ हो जाएगा। परन्तु यहूदिया पर यह उजाड़ कहाँ से आया, सिवा इसके कि वह परमेश्वर की रक्षा से वंचित हो गया था? क्योंकि यदि परमेश्वर उसकी रक्षा करता, तो वह केवल एक संकेत से सब शत्रुओं को खदेड़ सकता था। परन्तु क्योंकि वह चला गया था, इसी कारण उन्हें सहज प्रवेश मिल गया, और देश इस प्रकार उजाड़ कर दिया गया।

156 शाब्दिक रूप से यह है, "यहोवा के क्रोध की जलन के कारण।" शब्द "रोष", जिससे इसका अनुवाद प्रायः किया जाता है, किसी भी प्रकार उपयुक्त नहीं। अनुवादों में भिन्नता है: "प्रकोप का क्रोध" सेप्टुआजिंट है; "रोष का क्रोध" वुल्गेट; "उबलता हुआ क्रोध" सेप्टुआजिंट; और "क्रोध का रोष" टार्गुम। यही शब्द अगले पद के अन्त में भी आते हैं। — सं.

157 बहुत से लोग दूसरा विचार रखते हैं, कि परमेश्वर की तुलना उस सिंह से की गई है जो शिकार के लिए अपना ठौर छोड़ता है; ऐसा ही ग्रोटियुस, गेटेकर, लाउथ, हेनरी और एडम क्लार्क मानते हैं। स्कॉट कैल्विन के विचार से सहमत प्रतीत होता है; और आगे की बात इसी का समर्थन करती प्रतीत होती है, "क्योंकि उनका देश उजाड़ हो गया है," इत्यादि; यद्यपि यह दूसरे विचार से भी मेल खा सकती है, क्योंकि यह इस बात के प्रमाण के रूप में कहा गया हो सकता है कि परमेश्वर शिकार ढूँढ़ते हुए सिंह के समान निकला था; अर्थात् उन्हें नष्ट करने के लिए। — सं.

फिर यह जोड़ा गया है, अन्धेर करनेवाले के प्रकोप के कारण। कुछ लोग अन्तिम शब्द का अनुवाद "कबूतरी" करते हैं, परन्तु यह ठीक नहीं। तौभी उन्होंने एक सूक्ष्म अर्थ गढ़ लिया है, कि परमेश्वर को उसकी कृपा और नम्रता के कारण कबूतरी कहा गया है, यद्यपि उसका क्रोध भड़का हुआ है, क्योंकि जब वह देखता है कि अपनी उदारता से वह मनुष्यों के प्रति कुछ नहीं कर सकता, तब उनकी हठीलेपन के कारण उसे विवश होकर दूसरे का रूप धारण करना पड़ता है। परन्तु यह दूर की कल्पना है। क्रिया {,}ינהinc का अर्थ है अन्धेर करना, बलपूर्वक छीन लेना; और क्योंकि यह अधिकतर बुरे अर्थ में लिया जाता है, इसलिए मैं इसे यहाँ स्वयं परमेश्वर के बदले शत्रुओं पर लागू करना अधिक पसन्द करता हूँ। सचमुच बहुत से लोग इसकी व्याख्या परमेश्वर के विषय में करते हैं, परन्तु मैं उनका विचार स्वीकार नहीं कर सकता; क्योंकि यिर्मयाह दो बातों को एक साथ जोड़ता है, कि परमेश्वर अपने मन्दिर को ऐसे त्याग देगा जैसे सिंह अपने ठौर से चला जाता है, और यह भी कि शत्रु आकर उस स्थान को नंगा और सूना पाएँगे; संक्षेप में, वह संकेत करता है कि वे अपने शत्रुओं की इच्छा और लूट के लिए खुले छोड़ दिए जाएँगे, क्योंकि उस समय वे परमेश्वर की सहायता से रहित होंगे। और जैसे उसने पहले परमेश्वर के क्रोध के प्रकोप की बात कही थी, वैसे ही अब वह यही बात उनके शत्रुओं पर आरोपित करता है, और यह उचित ही है, क्योंकि उन्हें उसके न्यायदण्डों को पूरा करना था; जो बात ठीक-ठीक परमेश्वर की है वह उन पर आरोपित की गई है, क्योंकि उन्हें उसके सेवक होना था।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अनुग्रह कर कि जैसे तुझे यह भाया है कि तू हमें इकट्ठा करे, जिससे हम तेरी रक्षा और देखभाल के अधीन रहें, और तू अपने आप को हमारा चरवाहा होने के लिए प्रस्तुत करे, वरन् अपने एकलौते पुत्र के द्वारा अपने आप को ऐसा ही प्रकट भी करे, — हाँ, ऐसा अनुग्रह कर कि हम स्वेच्छा से तेरी आज्ञा मानें और उस चरवाहे का शब्द सुनें जिसे तूने हमारे ऊपर ठहराया है, जिससे हम तेरी भलाई और सामर्थ के द्वारा अन्त तक सुरक्षित रखे जाएँ, और कभी तुझसे भटक न जाएँ और न अपनी अभिलाषाओं से बहकाए जाएँ, वरन् तेरे पंखों की छाया तले ऐसे बने रहें कि तू सदा हमारे साथ उपस्थित रहे और हमारे शत्रुओं को रोके रखे, जिससे हम जीवन भर और मृत्यु में भी तेरी रक्षा में सुरक्षित बने रहें, उसी मसीह यीशु हमारे प्रभु के द्वारा। — आमीन।

158 कई हस्तलिपियाँ हैं जिनमें {,{חרב तलवार है, ,{}חרון जलन या प्रकोप के स्थान पर, और ऐसा ही सेप्टुआजिंट और टार्गुम में है; और "अन्धेर करनेवाली तलवार," {}היונה{, }חרב यिर्मयाह में दो और स्थानों में पाया जाता है, 46:16 और यिर्मयाह 1:16 में। यह भी ध्यान देने योग्य है कि {}חרון का प्रयोग ,{}אף के साथ जुड़े बिना बहुत ही कम होता है, और वह हमें अगले वाक्यांश में फिर मिलता है। तो सबसे अधिक सम्भव है कि सही पाठ .{}חרב है। तब पद यों होगा, — 38. उसने सिंह के समान अपना ठौर छोड़ दिया है; क्योंकि उनका देश उजाड़ हो गया है अन्धेर करनेवाली तलवार के कारण, और उसके क्रोध की जलन के कारण। {}כי का अनुवाद "क्योंकि" के स्थान पर किसी अन्य रूप में किया जा सकता है; और इस प्रकार अर्थ अधिक स्पष्ट हो जाएगा। देखिए यिर्मयाह 25:30-31, जहाँ सिंह की सी "गरज" और "तलवार" दोनों का उल्लेख है; और यह यहाँ दिए गए विचार की पुष्टि करता है। अन्तिम दो पंक्तियों में पहले "अन्धेर करनेवाली" या "उजाड़नेवाली तलवार" का उल्लेख है, — दृश्य परिणाम, और फिर "उसके क्रोध की जलन" — कारण; यह ऐसा क्रम है जो भविष्यद्वक्ताओं में बहुधा देखा जाता है। — सं.

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