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यिर्मयाह 33
यिर्मयाह 33:1-6
1. जिस समय यिर्मयाह पहरे के आँगन में बन्द था, उस समय यहोवा का वचन दूसरी बार उसके पास पहुँचा,
1. Et fuit sermo Jehovae ad Jeremiam secundo, cum ipse adhuc captivus esset in atrio custodiae, dicendo,
2. यहोवा जो उसका कर्ता है, यहोवा जो उसे स्थिर करने के लिये उसका रचनेवाला है, यों कहता है; यहोवा उसका नाम है;
2. Sic dicit Jehova, faciens ipsam, Jehova formans ipsam, ad stabiliendum ipsam; Jehova nomen ejus;
3. मुझे पुकार, और मैं तुझे उत्तर दूँगा, और तुझे बड़ी-बड़ी और गूढ़ बातें बताऊँगा जिन्हें तू नहीं जानता।
3. Clama ad me, et respondebo tibi, et annunciabo tibi res magnificas et reconditas, quas non novisti:
4. क्योंकि इस्राएल का परमेश्वर यहोवा इस नगर के घरों के विषय में, और यहूदा के राजाओं के घरों के विषय में, जो दमदमों और तलवार के द्वारा ढा दिए गए हैं, यों कहता है;
4. Quia sic dicit Jehova, Deus Israel, super domibus urbis hujus, super domibus regum Jehudah, quae dirutae fuerunt catapultis (vel, balistis, vel, machinis aliis) et gladio, (alii autem vertunt, ad catapultas, vel, balistas, vel, alias munitiones, et ad gladium; dicemus postea de sensu: hoec omnia legenda sunt uno contextu)
5. वे कसदियों से लड़ने को आते हैं, परन्तु यह इसलिये होता है कि वे उन्हें उन मनुष्यों की लोथों से भरें जिन्हें मैं ने अपने कोप और अपनी जलजलाहट में मार डाला है, और जिनकी सारी दुष्टता के कारण मैं ने इस नगर से अपना मुख छिपा लिया है।
5. Venerunt ad praeliandum cum Chaldaeis, et ad replendas ipsas (domos) cadaveribus hominum, quos percussi in ira mea et indignatione mea, et quia abscondi faciam meam ab hac urbe propter universam malitiam ipsorum;
6. देख, मैं उसे स्वास्थ्य और चंगाई दूँगा, और मैं उन्हें चंगा करूँगा, और उन पर शान्ति और सच्चाई की बहुतायत प्रगट करूँगा।
6. Ecce ego adduco illi restitutionem et sanationem, et sanabo eos, et aperiam ipsis multitudinem pacis et veritatis (alii vertunt, orationem)
यह भविष्यद्वाणी उसी विषय से सम्बन्ध रखती है; और इसमें कोई आश्चर्य की बात न थी कि परमेश्वर ने एक ही बात के विषय में इतना अधिक कहा, क्योंकि यहूदियों को निरुत्तर ठहराना आवश्यक था, क्योंकि वे सदा अज्ञानता का बहाना करते थे, जब तक कि परमेश्वर बार-बार दोहराता न रहे। और यही कारण था कि पौलुस ने कहा कि दो या तीन गवाहों के मुँह से हर एक बात ठहराई जाएगी, जब उसने कहा कि वह दूसरी और तीसरी बार कुरिन्थुस को आएगा। (2 कुरिन्थियों 13:1) उसने यह संकेत किया कि उसका आना व्यर्थ न होगा, क्योंकि यदि वे मन न फिराते, तो अज्ञानता का बहाना करके बच न सकते, जैसा कपटी लोग करने के आदी होते हैं। तो परमेश्वर का अभिप्राय यह था कि जो कुछ उसने लोगों के पुनःस्थापन के विषय में एक बार साक्षी दी थी, उसे बहुत सी भविष्यद्वाणियों के द्वारा दृढ़ करे; परन्तु उसे विश्वासियों की विशेष चिन्ता थी, कि वे उन बहुत सी परीक्षाओं के नीचे, जो इतने लम्बे समय तक बनी रहनेवाली थीं, शिथिल होकर हार न मान लें; क्योंकि जब कुछ लोग निर्वासन में मर गए, तो वे परमेश्वर की वाचा को भूल सकते थे, और इस प्रकार आत्मा भी देह के साथ नाश हो सकती थी। और जिन्हें अपने देश को लौटना था, उन्हें किसी साधारण सहारे की नहीं वरन् असाधारण सहारे की आवश्यकता थी, जिससे वे सत्तर वर्ष तक दृढ़ बने रहें, और भरोसे के साथ परमेश्वर की दया पर आश्रित रहें। तो अब हम समझते हैं कि परमेश्वर ने लोगों के लौटने के विषय में शिक्षा को क्यों दोहराया।
कहा गया है कि यहोवा का वचन यिर्मयाह के पास उस समय पहुँचा जब वह अभी बन्दीगृह में था
तब भविष्यद्वक्ता को आज्ञा दी गई कि वह अपने शत्रुओं के हित का ध्यान रखे, और उनकी भलाई को बढ़ाए, चाहे वे अपनी कृतघ्नता के कारण कितने ही अयोग्य क्यों न थे; क्योंकि यद्यपि उन सब ने उसकी मृत्यु की माँग नहीं की थी, तौभी उनमें से अधिकांश ने कोलाहल मचाकर उसे दोषी ठहराया था, और वह बड़ी कठिनाई से छुड़ाया गया था, और अब बन्दीगृह में पड़ा था। यह बड़ी क्रूरता थी कि जब वह विश्वासयोग्यता से अपना भविष्यद्वक्ता का पद निभा रहा था, तब लोग उसके विरुद्ध इस प्रकार उन्मत्त होकर भड़क उठें। तौभी उसे आज्ञा दी गई है कि वह अपने पद के कर्तव्यों में आगे बढ़ता रहे, उन्हें शान्ति दे, उनके शोक को हल्का करे, और उनकी बुराइयों और दुःखों में उन्हें कुछ राहत पहुँचाए।
इसमें भी कोई सन्देह नहीं कि यह स्वयं यिर्मयाह के लिये भी लाभदायक था; क्योंकि यह अत्यन्त अन्यायपूर्ण प्रतिफल था कि जब वह विश्वासयोग्यता और शुद्ध विवेक से परमेश्वर की सेवा कर रहा था, तब उसे अपमान के साथ बन्दीगृह में डाला जाए, और इतने लम्बे समय तक वहाँ बन्दी रखा जाए। तो यह उसके शोक में कुछ कमी थी कि परमेश्वर उसी बन्दीगृह में उस पर प्रगट हुआ; यह इस बात का प्रमाण था कि परमेश्वर उसे सब यहूदियों से बढ़कर आदर देता था। उस समय परमेश्वर मन्दिर में नहीं बोलता था, न सारे नगर में कहीं। तब बन्दीगृह ही परमेश्वर का पवित्रस्थान था, और वहीं वह अपने भविष्यद्वक्ता को उत्तर देता था, यद्यपि पहले वह ऐसा प्रायश्चित्त के ढकने से, वाचा के सन्दूक से, किया करता था। इससे हम देखते हैं कि वह आदर कितना बड़ा था जो परमेश्वर ने उस समय मानो एक बन्दीगृह को प्रदान करना चाहा, जब उसने अपने ही मन्दिर को त्याग दिया था।
अब भविष्यद्वाणी आती है, जिसका सार यह है कि यद्यपि नगर बाबुल के राजा के हाथ में सौंप दिया जानेवाला था, तौभी वह विपत्ति सदा की न होगी, क्योंकि परमेश्वर अन्त में, सत्तर वर्ष पूरे होने के बाद, उसे फिर से स्थापित करेगा। परन्तु यह प्रतिज्ञा क्यों दी गई, यह पहले ही बताया जा चुका है: यह इसलिये दी गई कि विश्वासी धीरज से परमेश्वर के अधीन हो जाएँ, और शान्त मन से अपने आप को ताड़ना सहने दें, और साथ ही उस आशा पर टिके रहें जो प्रतिज्ञा ने उन्हें दी थी, और इस प्रकार यह निश्चय रखें कि जैसे वे परमेश्वर के हाथ से मारे गए हैं, वैसे ही उनका दण्ड उनके लिये औषधि और उनके उद्धार में सहायक सिद्ध होगा। तो अब हम समझते हैं कि यह भविष्यद्वाणी क्या है, और यह भी कि यह किस उद्देश्य से दी गई।
परन्तु लोगों के लौटने के विषय में कोई प्रतिज्ञा करने से पहले, परमेश्वर ने एक भूमिका के द्वारा भविष्यद्वक्ता के मन को दृढ़ किया, और भक्तों को भी अच्छी आशा रखने के लिये उत्साहित और प्रेरित किया। भूमिका यह है कि परमेश्वर ने यरूशलेम को सृजा और रचा। तो इसमें कोई सन्देह नहीं था कि वह अन्त में उसे शत्रुओं के हाथ से छुड़ाएगा; वरन् वह उसे अधोलोक से भी उठा खड़ा करेगा। इसे प्रमाणित करने के लिये वह कहता है कि वह यहोवा है। इससे हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने प्रतिज्ञा सुनाने से पहले परमेश्वर को भव्य उपाधियों से क्यों सम्मानित किया। परन्तु यह सन्देहपूर्ण है कि जब कहा गया है, यहोवा उसका कर्ता, यहोवा उसका रचनेवाला, तो भूतकाल समझा जाए या वर्तमान काल; क्योंकि दोनों ही उपयुक्त होंगे, — अर्थात् यह कि परमेश्वर ने आरम्भ में यरूशलेम को बनाया और वही उसका संस्थापक था, या यह कि उसने उसे फिर से सृजने और नये सिरे से रचने का निश्चय किया था। यदि भूतकाल लिया जाए, तो अर्थ यह है कि वह नगर, जो परमेश्वर के द्वारा बनाया गया था, किसी भी प्रकार नाश नहीं हो सकता था, क्योंकि उसकी इच्छा यह थी कि वह सदा बना रहे। और यही विचार भविष्यद्वक्ताओं में, और भजन संहिता में भी, बार-बार आता है। क्योंकि परमेश्वर का अभिप्राय यह था कि वह यरूशलेम का संस्थापक माना जाए, ताकि वह उसे संसार के सब दूसरे नगरों से अलग ठहराए। हम जानते हैं कि सूर्य के नीचे कुछ भी सदा का नहीं है, क्योंकि सारा संसार नाना प्रकार के परिवर्तनों के अधीन है; वरन्, जैसा पौलुस कहता है, “इस संसार की रीति और व्यवहार बदलते जाते हैं।” (1 कुरिन्थियों 7:31)
तो जब सब नगरों में ऐसे नाना प्रकार के परिवर्तन होते हैं, परमेश्वर ने एक विशेष अधिकार के द्वारा यरूशलेम को इस सामान्य दशा से अलग रखा; और इसलिये भविष्यद्वक्ता सच्चाई और बुद्धिमानी से यह निष्कर्ष निकालता है कि नगर का विनाश सदा का न होगा, क्योंकि परमेश्वर ने उसे रचा था। और इससे उसका भावी पुनःस्थापन पर्याप्त रूप से प्रमाणित हो जाता है।
परन्तु यदि कोई वर्तमान काल को अधिक पसन्द करे, तो अर्थ यह होगा कि जिसने यरूशलेम को सृजने और रचने का निश्चय किया है, वह यहोवा, सेनाओं का परमेश्वर है: तो कोई उसके काम में बाधा नहीं डाल सकता। चूँकि यह अर्थ अनुपयुक्त नहीं है, इसलिये मैं इसे अस्वीकार नहीं करता, यद्यपि मैं पहले अर्थ का अनुसरण करता हूँ। साथ ही हमें यह सिद्धान्त स्मरण रखना चाहिए, — कि यहूदियों से पुनःस्थापन की प्रतिज्ञा इसलिये की गई है कि यरूशलेम मानो परमेश्वर के द्वारा चुना गया था, यहाँ तक कि उसने उसे अपनी देखरेख और रक्षा में ले लिया था, कि वह उसे सदा बनाए रखे। तो चाहे हम इन शब्दों को भूतकाल में लें या वर्तमान काल में, कि परमेश्वर यरूशलेम का सृष्टिकर्ता और रचनेवाला है, हम देखते हैं कि छुटकारे की प्रतिज्ञा परमेश्वर की दया पर आधारित है, अर्थात् इसलिये कि उसने यरूशलेम को अपने निवास के लिये चुना था, जैसा भजन संहिता में लिखा है, “उसकी नींव पवित्र पर्वतों पर है।” (भजन संहिता 87:1)
और वहाँ भी परमेश्वर के नाम के स्थान पर सर्वनाम का प्रयोग हुआ है, जैसे यहाँ नगर के नाम के स्थान पर, यहोवा, जिसने उसे सृजा है, जिसने उसे रचा है, कि उसे स्थिर करे, यों कहता है। यहाँ यरूशलेम का नाम नहीं लिया गया; परन्तु यदि उसका नाम लिया जाता तो कथन जितना प्रभावशाली होता, उससे कहीं अधिक प्रभावशाली यह है, जैसा कि उस स्थान में भी जिसे हमने अभी उद्धृत किया है, “परमेश्वर” शब्द नहीं दिया गया, और न, यदि मैं भूल नहीं करता, यशायाह के सैंतीसवें अध्याय में (यशायाह 37) “कलीसिया” शब्द। जब भविष्यद्वक्ता कहता है, “उसकी नींव पवित्र पर्वतों पर है,” तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि “परमेश्वर” शब्द समझा जाना चाहिए, यद्यपि वह व्यक्त नहीं किया गया।
सो यहाँ भी, नगर के विषय में बोलते हुए, वह कहता है कि यहोवा ने उसे रचा, या वह उसे रचेगा।
वह आगे कहता है, यहोवा उसका नाम है। यहाँ वह परमेश्वर की सामर्थ्य को ऊँचा उठाता है, ताकि यहूदी उसके विरुद्ध वह बात खड़ी न करें जो अन्यथा उन्हें भयभीत कर सकती थी, और मानो उन्हें निर्जीव दशा में पहुँचा सकती थी, और उन्हें पूरी रीति से मूर्छित कर सकती थी। इसलिये वह परमेश्वर की सामर्थ्य को उनकी आँखों के सामने रखता है, मानो उसने कहा हो कि कोई ऐसी बाधा न होगी जो परमेश्वर के काम में विलम्ब कर सके, क्योंकि उसने अपने नगर को उसके ढा दिए जाने के बाद नये सिरे से रचने और सृजने का निश्चय किया था; संक्षेप में, यह ऐसा ही है मानो उसने लोगों को आज्ञा दी हो कि वे अपनी आँखें और अपने सारे विचार परमेश्वर की ओर फेरें, उसकी अपार सामर्थ्य पर विचार करें, और इस प्रकार आशा रखें, और इस रीति से मानो ऊँचाई से उन सब बाधाओं को नीचे देखें जो अन्यथा उनके भरोसे को पूरी रीति से निर्बल कर सकती थीं।
इसके बाद वह कहता है, मुझे पुकार, और मैं तुझे उत्तर दूँगा, और मैं तुझे भव्य और गूढ़ बातें बताऊँगा, जिन्हें तू नहीं जानता था। यह बात भविष्यद्वक्ता के लिये इतनी नहीं जितनी दूसरों के लिये कही गई थी। क्योंकि भविष्यद्वक्ता ने निःसन्देह मन लगाकर प्रार्थना की थी, और उसके बन्दीगृह ने अवश्य ही उसके उत्साह को ऐसा प्रज्वलित किया होगा कि वह निरन्तर परमेश्वर से विनती करता रहे। तो परमेश्वर यहाँ, मुझे पुकार, कहकर उसकी सुस्ती या आलस्य को नहीं डाँटता; परन्तु जैसा मैंने कहा है, यह वचन भविष्यद्वक्ता की ओर इस प्रकार निर्देशित है कि परमेश्वर सब भक्तों को प्रार्थना के लिये उभारता है। वास्तव में यहाँ एक छिपी हुई डाँट है, मानो उसने कहा हो कि यह उनका अपना दोष था कि परमेश्वर ने किसी आनन्दमय और सुखद सन्देश से उनके मनों को हर्षित नहीं किया, क्योंकि उन्होंने अपने ही विरुद्ध द्वार बन्द कर लिया था, जिससे परमेश्वर उन्हें वह शान्ति न दे सके जिसकी वे फिर भी विशेष रूप से कामना करते थे; परन्तु मनुष्य, यद्यपि यह आशा रखते हैं कि परमेश्वर उन पर कृपालु हो, तौभी उसके अनुग्रह को भीतर आने नहीं देते, क्योंकि वे मानो अविश्वास से अपने हृदयों पर ताला लगा देते हैं। इससे हम देखते हैं कि यह क्यों कहा गया, मुझे पुकार, और मैं तुझे उत्तर दूँगा।
परन्तु इस स्थान पर विशेष ध्यान देना चाहिए; क्योंकि इससे हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि जब कभी हम शोक में घुलते हैं, या क्लेश से थक जाते हैं, तो यह हमारा अपना दोष है, क्योंकि हम प्रार्थना करने में धीमे और सुस्त हैं: क्योंकि जो कोई पुकारता है वह मान लेता है कि परमेश्वर सदा निकट है, जैसी वह भजन संहिता में प्रतिज्ञा करता है, उन सबके लिये जो सच्चाई से उसे पुकारते हैं।
तो यह कि हम कभी-कभी लम्बे शोक से थक जाते हैं, और हमें कोई शान्ति नहीं मिलती, हमें जानना चाहिए कि यह हमारी उपेक्षा और आलस्य के कारण होता है, क्योंकि हम परमेश्वर को नहीं पुकारते, जो हमें उत्तर देने के लिये सदा तैयार है, जैसी वह यहाँ प्रतिज्ञा करता है।
और वह कहता है, मैं तुझे बड़ी बातें, और छिपी हुई बातों में से, बताऊँगा, तू नहीं जानता। शब्द शाब्दिक रूप से ऐसे ही हैं; परन्तु उनका इस प्रकार उपयुक्त अनुवाद नहीं किया जा सकता: तब हम यों पढ़ सकते हैं, “और छिपी हुई बातें जिन्हें तू नहीं जानता,” या, “मैं तुझे उन छिपी हुई बातों से परिचित कराऊँगा जो तुझे अज्ञात हैं।” तौभी यह पूछा जा सकता है कि परमेश्वर ने उन बातों को छिपी हुई क्यों कहा, जिनके विषय में यिर्मयाह पहले ही भविष्यद्वाणी कर चुका था? उत्तर स्पष्ट है, — कि उन्होंने मानो परमेश्वर की सब प्रतिज्ञाओं को व्यर्थ कर दिया था, और वह पवित्र जन भी घबरा सकता था, जब उसने देखा कि परमेश्वर का अनुग्रह इस प्रकार ठुकराया जा रहा है; क्योंकि यह निष्कर्ष निकालना उचित था कि जब लोग हठ करके छुटकारे की आशा को ठुकराते थे, तो उनका सब कुछ समाप्त हो चुका था, और उनकी दशा मानो आशाहीन थी। इससे हम देखते हैं कि बहुधा वे बातें हमसे छिपी रहती हैं जिन्हें परमेश्वर ने हम पर बार-बार प्रगट किया है; क्योंकि या तो वे तुरन्त हमारे मनों में प्रवेश नहीं करतीं, या उनकी स्मृति बुझ जाती है, या हममें विश्वास उतना सबल नहीं होता जितना होना चाहिए, या हमारे मार्ग में डाली गई बाधाओं से हम व्याकुल और घबराए हुए हो जाते हैं। 312 सेप्टुआजिंट वर्तमान काल देता है, “जो बनाता है,” इत्यादि; वल्गेट भविष्यत्, “जो बनाएगा,” इत्यादि; और सुरियानी तथा तर्गूम भूतकाल में, “जिसने बनाया,” इत्यादि। इस पद का अनुवाद इस प्रकार किया जा सकता है, — यहोवा यों कहता है, — यहोवा ने उसे बनाया है, उसे स्थिर करने के लिये उसे रचकर; यहोवा उसका नाम है। यह कि नगर अभिप्रेत है, इस पर विवाद नहीं किया जा सकता, क्योंकि चौथे पद (यिर्मयाह 33:4) में, और पाँचवें पद के अन्त में, यह शब्द स्वयं आया है। सेप्टुआजिंट में यह “देश” है, “जो देश को बनाता है,” और सुरियानी में, “जिसने तुझे बनाया:” ये दोनों निःसन्देह गलत हैं। — सं.
अब वह बताता है कि ये छिपी हुई बातें क्या थीं, घरों के विषय में, वह कहता है, (शाब्दिक रूप से ऐसा ही है) इस्राएल का परमेश्वर यहोवा यों कहता है, इस नगर के घरों के विषय में, और यहूदा के राजाओं के घरों के विषय में। सम्बन्धसूचक अव्यय {,}על, “ऊपर,” का अर्थ बहुधा होता है, के सम्बन्ध में, के विषय में। वह राजाओं के घरों का नाम लेता है, क्योंकि यहूदा के राजा, जैसा सब जानते हैं, एक ही महल से सन्तुष्ट न थे, वरन् नगर के बाहर उनके बहुत से घर थे। घरों के विषय में, वह कहता है, जो ढा दिए गए थे। इसकी व्याख्या अलग-अलग प्रकार से की जाती है; कुछ कहते हैं कि घर युद्ध-यन्त्रों के लिये ढाए गए थे, अर्थात् इसलिये कि उनकी सामग्री से ये यन्त्र बनाए जाएँ, और तलवार के लिये।
तौभी अर्थ अधिक स्पष्ट प्रतीत होगा यदि हम यह विचार लें कि घर युद्ध-यन्त्रों के द्वारा, और तलवार के द्वारा भी, अर्थात् शत्रुओं की हिंसा के द्वारा, ढा दिए गए थे। {}סללתsallut शब्द का अनुवाद, जैसा पहले बताया जा चुका है, कुछ लोग किलेबन्दी करते हैं; परन्तु जब नगरों पर धावा करने की बात होती है, तो इसका अर्थ निःसन्देह युद्ध के यन्त्र हैं, जैसे भाले फेंकने के यन्त्र, या दीवार तोड़ने के यन्त्र: परन्तु हम नहीं जानते कि यहूदी और कसदी उन्हें किस रूप में बनाते थे।
इस भविष्यद्वाणी के दो भाग हैं, — कि यहूदी अपने ही दोष से नाश होनेवाले थे, — और कि वे केवल परमेश्वर के अनुग्रह और भलाई से पुनःस्थापित किए जानेवाले थे। तो यहाँ पहले भविष्यद्वक्ता लोगों के झूठे भरोसे को दोषी ठहराता है, जो ढिठाई से कसदियों का सामना करते थे। वह कहता है, वे कसदियों से लड़ने को आए; परन्तु युद्ध का परिणाम क्या होगा? यही, वह कहता है, कि वे अपने ही घरों को मनुष्यों की लोथों से भरें। जब वह कहता है कि यहूदी आए थे, तो वह उस बात के विषय में बोलता है जो मानो पहले ही घट चुकी थी। वास्तव में यह वर्तमान काल का कृदन्त है, आते हुए; परन्तु भविष्यद्वक्ता यहाँ जो होनेवाला था उसे उनकी आँखों के सामने रखता है, मानो उसने कहा हो, “यहूदी साहस के साथ आगे झपटेंगे, और अपने आप को कसदियों के बराबर, वरन् उनसे भी बढ़कर समझेंगे; इस प्रकार वे युद्ध के लिये अपने आप को साहस से सुसज्जित करेंगे।” तब वह यह बात लोगों की ढिठाई का उपहास करने के लिये कहता है। फिर युद्ध का दुःखद परिणाम आता है, अर्थात् उनके अपने घरों का मनुष्यों की लोथों से भर जाना। समुच्चयबोधक अव्यय अतिरिक्त है, या उसे व्याख्यात्मक मानकर “अर्थात्” अनुवाद करना चाहिए। तो वे लड़ने को आएँगे, अर्थात् इसलिये कि अपने ही घरों को लोथों से भरें, और इस प्रकार अपने शत्रुओं के क्रोध को भड़काएँ। क्योंकि इसी से ऐसा हुआ कि कसदियों ने और अधिक लहू बहाया, और लोगों की भीड़ को न छोड़ा; क्योंकि हम जानते हैं कि जब कोई नगर बलपूर्वक जीता जाता है, तो अधिक क्रूरता की जाती है, और संहार कहीं अधिक बड़े हो जाते हैं। यदि यहूदी स्वेच्छा से आत्मसमर्पण कर देते, तो उन्हें अपने विजेताओं के हाथ से अधिक मानवीय व्यवहार मिलता; परन्तु कसदी अशान्त हो गए, क्योंकि उनके विरुद्ध लड़नेवाले लोगों के हठ ने उनके क्रोध को भड़का दिया था। साथ ही परमेश्वर दिखाता है कि कसदी अपने पराक्रम से विजयी न होंगे, वरन् इसलिये कि वह स्वयं यहूदियों को मारेगा या घात करेगा। तब वह उस विपत्ति का कारण अपने ही पलटा लेने को ठहराता है जो कसदियों की ओर से आती हुई प्रतीत हो सकती थी; क्योंकि यिर्मयाह लोगों को मन फिराने का उपदेश नहीं दे सकता था जब तक कि वह यह न दिखाता कि यह धर्मी न्याय के द्वारा हुआ कि कसदी उनके विरुद्ध इतनी क्रूरता से भड़क उठे। परन्तु शेष बातों को हमें कल तक के लिये टालना होगा।
313 ये दोनों पद अनुचित रूप से अलग कर दिए गए हैं, जिससे {,{`` באים“आनेवाले,” बिना किसी सम्बन्ध के अकेला खड़ा रह जाता है; उसे “तलवार” के साथ सम्बन्धकारक में होना चाहिए। अनुवाद अलग-अलग हैं, परन्तु कोई भी सहनीय अर्थ नहीं देता। इन पदों का अनुवाद इस प्रकार किया जा सकता है, — 4. क्योंकि इस्राएल का परमेश्वर यहोवा यों कहता है, इस नगर के घरों के विषय में, और यहूदा के राजाओं के घरों के विषय में, — जो यन्त्रों के द्वारा ढा दिए गए हैं, 5. और उनकी तलवार के द्वारा जो युद्ध करने आते हैं, अर्थात् कसदी, और उन्हें [अर्थात् घरों को] उन मनुष्यों की लोथों से भरने आते हैं, जिन्हें मैं ने अपने कोप में, और अपनी जलजलाहट में मारा है, और जिनकी सारी दुष्टता के कारण मैं ने इस नगर से अपना मुख छिपा लिया है, — 6. देख, मैं लाऊँगा, इत्यादि, इत्यादि। चौथे और पाँचवें पदों में वर्तमान और भूतकाल भविष्यत् के स्थान पर प्रयुक्त हुए हैं, जैसा भविष्यद्वाणियों में बहुधा होता है। — सं.
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जब कभी तू हमें ताड़ना दे, तब हम तेरे बलवन्त हाथ के नीचे अपने आप को ऐसा दीन करना सीखें कि अपने दुःखों में मूर्छित न हो जाएँ, वरन् और अधिक भरोसे के साथ तेरी दया की शरण में भागें, और अपने पापों को मान लेकर अपने आप से ऐसे अप्रसन्न हो जाएँ कि तेरी दया का स्वाद कभी न खोएँ, वरन् अपनी कमर ऐसी कसें कि अच्छी आशा रखें, और तुझे पुकारते रहें, जब तक कि अन्त में परिणाम से यह न जान लें कि हमारी प्रार्थनाएँ व्यर्थ नहीं हैं; और हम अपनी विपत्तियों में सदा इसी प्रकार शान्ति पाते रहें, जिससे अन्त में उस सिद्ध आनन्द का उपभोग करें जो तू ने स्वर्ग में हमारे लिये तैयार किया है, हमारे प्रभु मसीह के द्वारा। — आमीन।
एक सौ तैंतीसवाँ व्याख्यान
कल मुझे पाँचवें पद के दूसरे वाक्यांश पर रुकना पड़ा, जहाँ परमेश्वर घोषित करता है कि यहूदी, जब वे विरोध करने के लिये अपना सारा बल लगा रहे थे, तब उसके द्वारा मारे गए। फिर वह कहता है कि वह संहार नगर पर और लोगों पर इसलिये आया क्योंकि उन्होंने उसके विरुद्ध पाप किया था। परन्तु वह पहले कहता है, मैं ने उन्हें मार डाला है, और फिर, मैं ने इस नगर से अपना मुख छिपा लिया है, और वह कारण भी जोड़ता है, उनकी सारी दुष्टता के कारण। तब वह घोषित करता है कि वही उस संहार का कर्ता था, और यह भी दिखाता है कि उसने धर्मी न्याय से लोगों की दुष्टता का दण्ड दिया।
क्योंकि जब वे बहुत समय से उसके पलटे को भड़काने से कभी न रुके थे, तो वह यहाँ दिखाता है कि वे उसी प्रतिफल के योग्य थे, अर्थात् यह कि उनका नगर कसदियों के द्वारा बलपूर्वक ले लिया जाए, और वे हर स्थान पर मारे जाएँ, और उनके घर लोथों से भर जाएँ।
इसके बाद वह कहता है, देख, मैं नवीनीकरण और चंगाई लाऊँगा, और मैं उन्हें चंगा करूँगा। जैसा कहा जाता है, इस स्थान में यही मुख्य बात है। वह अब तक यह दिखा रहा था कि यहूदी इतने भारी दण्ड के योग्य थे, क्योंकि अपने हठ के कारण वे परमेश्वर को अपने विरुद्ध भड़काने से नहीं रुके थे। परन्तु वह यहाँ प्रतिज्ञा करता है कि उन्हें संयम से सुधारने के बाद वह उन पर कृपालु होगा। क्योंकि हमने कहा है कि इस भविष्यद्वाणी का उद्देश्य यहूदियों को सम्भाले रखना था, जिससे वे निराश न हों, वरन् अनुग्रह की प्रतिज्ञा पर भरोसा रखें, चाहे निर्वासन कितना ही कड़वा क्यों न हो। तब वह कहता है, मैं नवीनीकरण, या पुनःस्थापन, और चंगाई लाऊँगा।
और आगे कहा गया है, मैं उनके लिये शान्ति और सच्चाई की बहुतायत खोल दूँगा। कुछ लोग अन्तिम शब्द, {,}אמתamet, का अनुवाद “प्रार्थना” करते हैं; क्योंकि क्रिया {}אמןamen का अर्थ कभी-कभी प्रार्थना करना और बढ़ाना भी होता है। तो इसके दो अर्थ हो सकते हैं; पहला यह कि परमेश्वर उनके लिये प्रार्थना का मार्ग खोल देगा; क्योंकि लोगों में दशा इतनी आशाहीन थी कि किसी को एक शब्द भी कहने का साहस न था। स्वयं यिर्मयाह को भी प्रार्थना करने से मना किया गया था, (यिर्मयाह 11:14) क्योंकि परमेश्वर ने उन अभागे मनुष्यों को नष्ट करने का निश्चय कर लिया था जिनके मन फिराने की कोई आशा न थी। इसलिये कुछ लोग यह समझते हैं कि यहाँ प्रार्थना के मार्ग की प्रतिज्ञा की गई है, जिससे विश्वासी और परमेश्वर के दास नगर की समृद्धि के लिये प्रार्थना कर सकें। परन्तु यह व्याख्या मुझे बहुत दूर की खींची हुई प्रतीत होती है। इसलिये मैं एक सरल व्याख्या लेता हूँ, — कि परमेश्वर उन्हें शान्ति की बहुतायत, वरन् शान्ति का लम्बा होना या बना रहना देगा। शान्ति से अभिप्राय है, जैसा सब जानते हैं, एक सुखी दशा। तब परमेश्वर उस यरूशलेम से, जो अत्यन्त दुःखों में पहुँचा दिया गया था, आनन्द की बातों की प्रतिज्ञा करता है, कि वह आगे चलकर समृद्धि से रहेगा; और वह “सच्चाई” शब्द जोड़ता है, जिसे यहाँ स्थिरता के अर्थ में लेना चाहिए, जैसा वास्तव में पवित्रशास्त्र में सर्वत्र होता है, मानो उसने कहा हो कि नगर की समृद्ध दशा एक महीने या थोड़े समय के लिये नहीं, वरन् निरन्तर और सदा की होगी, जैसा वह अगले पद में घोषित करता है। 314 जिस शब्द का अनुवाद “नवीनीकरण” किया गया है, उसका अर्थ है लम्बा करना, अर्थात् मनुष्य के जीवन का; इसलिये इसे स्वस्थ होने के अर्थ में लिया जाता है, — “मैं उसके लिये स्वास्थ्य-लाभ और चंगाई लाऊँगा।” देखिए यिर्मयाह 8:22। — सं.
यिर्मयाह 33:7
7. और मैं यहूदा और इस्राएल के बंधुओं को लौटा ले आऊँगा, और उन्हें ऐसा बसाऊँगा जैसे वे पहले बसे थे।
7. Et reducam captivitatem Jehudah, et captivitatem Israel, et aedificabo cos sicuti a principio.
“बनाने” शब्द से परमेश्वर का अभिप्राय यह है कि वे इस उद्देश्य से अपने देश को लौटेंगे, — कि वे उसमें सुरक्षित बने रहें। और यह प्रतिज्ञा बहुत आवश्यक थी, क्योंकि यहूदी चारों ओर से शत्रुओं से घिरे हुए थे; क्योंकि उनके सब पड़ोसी उनके विरुद्ध एक हो गए थे, और अत्यन्त बैरी थे, यहाँ तक कि वे नये-नये उपद्रव खड़े करने से कभी न रुकते थे। इसी कारण बनाने का उल्लेख किया गया है, मानो भविष्यद्वक्ता ने कहा हो कि नगर की समृद्धि टिकाऊ होगी, क्योंकि उसकी नींव ऐसी डाली जाएगी कि वह किसी भी प्रकार के आक्रमण से न गिरेगा न डगमगाएगा।
परन्तु वह केवल यहूदा के गोत्र से ही नहीं, वरन् इस्राएल के सारे राज्य से भी छुटकारे की प्रतिज्ञा करता है। यद्यपि बहुत थोड़े लोग लौटे, तौभी परमेश्वर ने वह उपकार जिसकी उसने प्रतिज्ञा की थी, सब को समान रूप से दिया: और फिर, जैसा बहुधा कहा जा चुका है, इस प्रतिज्ञा को मसीह के आगमन तक बढ़ाया जाना चाहिए। क्योंकि परमेश्वर ने अपने अनुग्रह को उन थोड़े से वर्षों तक सीमित नहीं रखा जिनमें यहूदियों को स्वतन्त्रता दी गई, जब वे बाबुल के निर्वासन से लौटे; वरन् उसने उस अनन्त उद्धार को भी इसमें सम्मिलित किया जो उनके लिये शेष रखा गया था, जिसकी पूर्व-झलक उनका लौटना था। अब हम आगे बढ़ें, —
यिर्मयाह 33:8
8. और मैं उनको उनके सारे अधर्म से, जो उन्होंने मेरे विरुद्ध किया है, शुद्ध करूँगा; और उनके सारे अधर्म के कामों को, जो उन्होंने मेरे विरुद्ध किए हैं और जिनके द्वारा उन्होंने मेरा अपराध किया है, मैं क्षमा करूँगा।
8. Et purgabo eos ab omni iniquitate eorum, qua peccarunt mihi (hoc est, in me) et ignoscam omnibus iniquitatibus eorum quibus peccarunt in me, et quibus scelerate egerunt contra me.
वह पहले कहता है कि वह उन्हें सारे अधर्म से शुद्ध करेगा, और फिर यह कि वह उनके सारे अधर्म के कामों पर कृपालु होगा। निःसन्देह वह एक ही बात को दोहराता है; परन्तु ये शब्द व्यर्थ नहीं हैं, क्योंकि यहूदियों को उनकी बहुत सी बुराइयों का गम्भीरता से स्मरण दिलाना आवश्यक था, जिनके विषय में वे वास्तव में सचेत थे, तौभी उन्होंने मन नहीं फिराया था। तो जब वे हठ करके अपनी ही इच्छाओं के पीछे चलते थे, तो भविष्यद्वक्ता के लिये आवश्यक था कि वह उन्हें तीखेपन से कोंचे, जिससे वे जानें कि यदि परमेश्वर की दया, और वह भी किसी प्रकार साधारण नहीं, उनकी सहायता को न आए, तो वे अनन्त विनाश के अधीन पड़े हुए हैं। तो यहाँ वह उनके पापों की महानता का वर्णन करता है, ताकि दूसरी ओर वह परमेश्वर की दया की बड़ाई करे। 315 यहाँ इसके लिये सबसे अच्छा शब्द, जैसा सुरियानी देता है, सुरक्षा है; “और मैं उनके लिये शान्ति और सुरक्षा की बहुतायत खोल दूँगा।” — सं.
“शुद्ध करने” शब्द से कोई नये जन्म को समझ सकता है, और यह उन लोगों को सम्भव प्रतीत हो सकता है जो पवित्रशास्त्र की भाषा से भली-भाँति परिचित नहीं हैं; परन्तु {,}טהרtheer का ठीक अर्थ प्रायश्चित्त करना है। तो यह नये जन्म से नहीं, वरन् क्षमा से सम्बन्ध रखता है, इसलिये मैंने कहा है कि भविष्यद्वक्ता यहाँ एक ही अर्थ में दो बातों का उल्लेख करता है, — कि परमेश्वर उन्हें अधर्म से शुद्ध करेगा, — और कि वह उनके सारे अधर्म के कामों को क्षमा करेगा। अब हम वह कारण देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने यह साक्षी देने में कि परमेश्वर उन पर ऐसा दयालु होगा कि उनके पापों को क्षमा करे, इतने अधिक शब्दों का प्रयोग क्यों किया, अर्थात् इसलिये कि वे, यद्यपि बहुत सी बुराइयों से लदे हुए थे, तौभी उनकी जघन्यता को हल्का ठहराते थे, जैसा कपटी सदा करते हैं। तो यहूदी परमेश्वर के अनुग्रह का मूल्य कभी न समझते, यदि उनके दोष की भयंकरता उन पर स्पष्ट रूप से प्रगट न की जाती। और यही कारण भी था कि उसने कहा, मैं उनके सारे अधर्म के कामों को क्षमा करूँगा। उसने पहले कहा था, मैं उन्हें सारे अधर्म से शुद्ध करूँगा; फिर उसने जोड़ा, मैं उनके सारे अधर्म के कामों को क्षमा करूँगा। क्योंकि वचन के इस परिवर्तन के द्वारा भविष्यद्वक्ता उनके पापों का ढेर और उनकी विविधता दिखाता है, मानो उसने कहा हो कि बुराइयों के ढेर इतने बढ़ गए थे कि उन्हें अनुग्रह में ग्रहण करने के लिये परमेश्वर में किसी साधारण दया की नहीं, वरन् असाधारण दया की आवश्यकता थी।
वह आगे कहता है, जिनके द्वारा उन्होंने मेरे विरुद्ध पाप किया है, और जिनके द्वारा उन्होंने मेरे विरुद्ध दुष्टता की है। ये शब्द उस बात की पुष्टि करते हैं जो मैं पहले कह चुका हूँ, कि भविष्यद्वक्ता ने यहूदियों को कड़ाई से डाँटा, ताकि वे पहले इस पर विचार और मनन करें कि वे किस योग्य थे; और दूसरे, ताकि वे परमेश्वर के अनुग्रह की उसके मूल्य के अनुसार बड़ाई करें।
साथ ही हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि यहूदियों का ध्यान भरोसे के पहले और मुख्य आधार की ओर लगाया गया, जिससे उन्हें पुनःस्थापन की कुछ आशा हो; क्योंकि परमेश्वर की सब आशीषों का मूल, या वह सोता जिससे सब अच्छी वस्तुएँ बहती हैं, परमेश्वर का वह अनुग्रह है जिससे वह हमसे मेल कर लेता है। वह वास्तव में हमें जो कुछ हम चाहें वह बहुतायत से दे सकता है, जबकि वह स्वयं हमसे विमुख रहता है, जैसा हम दुष्टों के विषय में देखते हैं, जिनके पास बहुधा सब अच्छी वस्तुओं की बहुतायत होती है; और इसलिये वे घमण्ड करते और डींग मारते हैं मानो उन्होंने परमेश्वर को किसी रीति से अपने साथ बाँध रखा हो। परन्तु परमेश्वर दुष्टों को जो कुछ देता और प्रदान करता है, उसे ठीक-ठीक कहें तो उसके अनुग्रह और कृपा का प्रमाण नहीं माना जा सकता; वरन् वह उनके साथ इतनी नरमी का व्यवहार करके उन्हें और भी अधिक निरुत्तर बना देता है। तो उद्धार देनेवाली कोई भलाई नहीं है, सिवाय उसके जो परमेश्वर के पितृवत् प्रेम से बहती है।
अब हमें देखना चाहिए कि परमेश्वर हम पर कैसे कृपालु होता है। वह तब कृपालु होता है जब वह हमारे पापों को हमारे विरुद्ध नहीं गिनता। क्योंकि जब तक क्षमा पहले न आए, तब तक अवश्य है कि वह हमारे विरोध में रहे; क्योंकि जब तक वह हमें वैसा ही देखता है जैसे हम हैं, तब तक वह हममें दण्ड के योग्य बातों को छोड़ और कुछ नहीं पाता। इसलिये जब तक वह हमारे पापों को गाड़ न दे, तब तक हम परमेश्वर के सामने सदा शापित हैं। इसलिये मैंने कहा है कि जिन अच्छी वस्तुओं की आशा की जानी है उन सब का पहला सोता यहाँ संक्षेप में यहूदियों पर प्रगट किया गया है, अर्थात् परमेश्वर का वह सेंतमेंत अनुग्रह जिससे वह उन्हें अपने साथ मेल कराता है। तो आओ हम सीखें कि जब कभी हम उस वस्तु को खोजें जो हमें आवश्यक प्रतीत होती है, तब अपने सब विचार परमेश्वर की दया की ओर लगाएँ। क्योंकि यदि हम मानो परमेश्वर की आशीषों पर झपटें, और यह विचार न करें कि वे कहाँ से आती हैं, तो हम चारे में फँस जाएँगे: जैसे मछलियाँ अपने लालच के कारण अपना गला घोंट लेती हैं, (क्योंकि वे काँटे पर ऐसे झपटती हैं मानो वह भोजन हो) वैसे ही दुष्ट भी, जो लालच से परमेश्वर की आशीषों को पकड़ लेते हैं, और इसकी चिन्ता नहीं करते कि वह उन पर कृपालु हो; वे उन्हें मानो अपने ही विनाश के लिये निगल जाते हैं। तो इसलिये कि सब बातें हमारे उद्धार के लिये हों, आओ हम सदा परमेश्वर के पितृवत् प्रेम से आरम्भ करना सीखें, और यह जानें कि उस प्रेम का कारण उसकी अपार भलाई है, जिसके द्वारा ऐसा होता है कि वह हमारे पापों को हमारे विरुद्ध न गिनकर हमें सेंतमेंत अपने साथ मेल कराता है।
इस स्थान से हम एक और शिक्षा भी पा सकते हैं, — कि यदि हमारे पापों की गम्भीरता हमें भयभीत करे, तौभी सब अविश्वास पर जय पाई जानी चाहिए, क्योंकि परमेश्वर अपनी दया की प्रतिज्ञा केवल उन्हीं पापियों से नहीं करता जो अज्ञानता या भूल से थोड़ा-सा गिर गए हैं, वरन् उनसे भी जिन्होंने पाप पर पाप का ढेर लगाया है। इसलिये कोई कारण नहीं कि हमारे पापों की महानता हमें दबा दे; वरन् हम सदा क्षमा की आशा की ओर भागने का साहस कर सकते हैं, क्योंकि हम देखते हैं कि वह बिना भेदभाव के सब को दी जाती है, उनको भी जो परमेश्वर के सामने अत्यन्त दुष्ट रहे थे, और जिन्होंने केवल पाप ही नहीं किया था, वरन् एक प्रकार से धर्मत्यागी भी हो गए थे, यहाँ तक कि वे हर प्रकार से परमेश्वर के पलटे को भड़काने से न रुके। आगे लिखा है, —
यिर्मयाह 33:9
9. और वह मेरे लिये पृथ्वी की सारी जातियों के सामने हर्ष का नाम, और प्रशंसा और शोभा का कारण होगा, जो उस सारी भलाई का समाचार सुनेंगी जो मैं उनके लिये करता हूँ; और वे उस सारी भलाई और उस सारी समृद्धि के कारण जो मैं उसके लिये करता हूँ, डरेंगी और थरथराएँगी।
9. Et erit mihi in nomen, laetitiam (alii in constructione vertunt, in nomen laetitiae) in laudem et in decorem (vel, gloriam) apud omnes gentes terrae, quae audient omnem beneficentiam, quam ego exercuero erga ipsos (quam ego facio ipsis, ad verbum) et pavebunt et contremiscent super omni beneficentia, et super onmi pace, quam ego facio illi (mutat humerum; dixerat, {}אותםnunc dicit, {,}עשה{ }להet refertur hoc pronomen ad urbem ipsam)
यहाँ परमेश्वर साक्षी देता है कि उसका अनुग्रह ऐसा होगा कि सारे संसार में प्रशंसा के योग्य हो, या, जो एक ही बात है, कि उसकी उदारता स्मरण रखे जाने के योग्य होगी।
इसलिये वह कहता है कि वह सब जातियों के बीच उसके लिये एक नाम ठहरेगा; परन्तु चूँकि उसका अभिप्राय अपनी महिमा की महानता की बड़ाई करना था, इसलिये वह जोड़ता है, प्रशंसा और आदर, या महिमा; और बल देकर यह जोड़ा गया है, सब जातियों के बीच। और यह स्थान हमें दिखाता है कि भविष्यद्वक्ता ने केवल लोगों के लौटने के विषय में नहीं कहा, और कि इस भविष्यद्वाणी को नगर की उस दशा तक सीमित नहीं रखना चाहिए जैसी वह मसीह के आगमन से पहले थी; क्योंकि यद्यपि परमेश्वर का अनुग्रह कसदियों और कुछ अन्य जातियों में ज्ञात था, तौभी वह अभी सारे संसार में ज्ञात नहीं हुआ था, क्योंकि वह कहता है, पृथ्वी की सब जातियों के बीच; और निःसन्देह परमेश्वर ने संसार के सब भागों को इसमें सम्मिलित किया। तो इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि जिस अनुग्रह के विषय में भविष्यद्वक्ता बोलता है, वह मसीह के राज्य से सम्बन्ध रखता है, क्योंकि परमेश्वर ने उस समय सब जातियों के बीच अपने लिये नाम प्राप्त नहीं किया था, वरन्, जैसा सब जानते हैं, केवल पूर्व के कुछ भागों में। इसलिये जब वह कहता है कि जो अनुग्रह वह अपनी प्रजा पर दिखाएगा वह उसके लिये एक नाम ठहरेगा, तो वह निःसन्देह उस छुटकारे की प्रतिज्ञा करता है जो अन्त में मसीह के द्वारा लाया गया।
और जो आगे आता है उसे भी इसी अर्थ में लेना चाहिए, क्योंकि वे सुनेंगी, इत्यादि; क्योंकि सम्बन्धवाचक {}אשרasher यहाँ कारणवाचक है, क्योंकि भविष्यद्वक्ता यहाँ उस रीति और प्रकार को प्रगट करता है जिससे परमेश्वर को अपनी प्रजा के छुटकारे के कारण महिमा और आदर मिलेगा, अर्थात् इसलिये कि जातियाँ इसके विषय में सुनेंगी; और यह सुसमाचार के प्रचार के द्वारा हुआ है, क्योंकि केवल तभी यहूदियों के प्रति परमेश्वर की भलाई हर स्थान पर प्रगट हुई, जब व्यवस्था का ज्ञान और भविष्यद्वाणी का सत्य उन परदेशियों तक पहुँचा जिन्होंने पहले धर्म की सच्ची शिक्षा के विषय में कुछ भी न सुना था। तो अब हम पवित्र आत्मा का अभिप्राय समझते हैं।
इसके अतिरिक्त, इन शब्दों के द्वारा परमेश्वर सब को कृतज्ञता के लिये उभारता है; क्योंकि जब कभी परमेश्वर की आशीषों का सोता हमें दिखाया जाता है, तब हमें उदासीन नहीं रहना चाहिए, वरन् उसका धन्यवाद करने के लिये उत्तेजित होना चाहिए। इसलिये जब परमेश्वर घोषित करता है कि उसकी प्रजा का छुटकारा सब जातियों के बीच उसके लिये एक नाम ठहरेगा, तो इस प्रकार वह भक्तों को दिखाता है कि उन्हें सुस्त नहीं रहना चाहिए, वरन् उसकी भलाई का प्रचार करना चाहिए। और साथ ही यह पुष्टि का भी काम करता है, जब परमेश्वर संकेत करता है कि वह अपनी प्रजा का छुड़ानेवाला इसलिये होगा कि अपने लिये एक नाम प्राप्त करे, क्योंकि यहाँ एक विरोध समझा जाना चाहिए, कि इस कृपा में वह इस पर ध्यान न देगा कि यहूदी किस योग्य थे, वरन् उसका कारण अपने ही में खोजेगा, जैसा दूसरे स्थान में और अधिक पूर्णता से व्यक्त किया गया है, “हे इस्राएल के घराने, मैं यह तुम्हारे निमित्त नहीं करता,” (यहेजकेल 36:22) और विश्वासी अपनी ओर से गाते हैं, “हे यहोवा, हमारे निमित्त नहीं, वरन् अपने नाम के निमित्त।” (भजन संहिता 79:9; भजन संहिता 115:1)
तो हम देखते हैं कि परमेश्वर अपना ही नाम आगे रखता है, ताकि यहूदी आशा बनाए रखें, चाहे वे कितने ही दोषी क्यों न रहे हों, और चाहे वे स्वयं को अनन्त विनाश के योग्य मानें।
यदि हम यह पढ़ें, “यह मेरे लिए आनन्द का नाम होगा,” तो अर्थ यह होगा, “ऐसा नाम जिसमें मैं प्रसन्न होता हूँ।” यदि हम शब्दों को अलग-अलग पढ़ें, “नाम और आनन्द के लिए,” तो भी अर्थ वही रहेगा; और न यह अनुचित समझा जाना चाहिए कि परमेश्वर साक्षी देता है कि यह उसके लिए आनन्द का कारण होगा। क्योंकि यद्यपि वह हमारी नाईं प्रभावित और विचलित नहीं होता, तौभी बोलने का यह ढंग अन्यत्र भी अपनाया गया है, जैसे भजन संहिता 104:31 में, “यहोवा अपने कामों से आनन्दित होगा।”
तो परमेश्वर के विषय में कहा गया है कि वह भलाई करने में प्रसन्न होता है, क्योंकि वह अपने स्वभाव ही से भलाई और दया की ओर झुका हुआ है।
इसके बाद वह कहता है, वे सारी भलाई के कारण डरेंगे और थरथराएँगे, इत्यादि। शब्द {}כלcal, “सारी,” महानता को सूचित करता है, और इसे बलपूर्वक लेना चाहिए। तौभी ये शब्द पहली दृष्टि में विचित्र प्रतीत हो सकते हैं, “वे सारी भलाई के कारण डरेंगे और थरथराएँगे,” इत्यादि; क्योंकि यह उचित नहीं लगता कि जब मनुष्य परमेश्वर की भलाई को स्वीकार करें, तब वे डरें, क्योंकि इसके विपरीत यह तो आनन्द और भरोसे का कारण है। यह वाक्यांश कभी-कभी अधर्मियों पर लगाया जाता है, क्योंकि उन्हें परमेश्वर की कृपा का कोई स्वाद नहीं कि वे उससे हर्षित हों, वरन् इसके विपरीत जब परमेश्वर अपनी प्रजा पर कृपालु दिखाई देता है, तब वे कुढ़ते और दाँत पीसते हैं; क्योंकि जब वे देखते हैं कि वे उन आशीषों के उपभोग से वंचित किए गए हैं, जो, जैसा अन्यत्र कहा गया है, परमेश्वर का भय माननेवालों के लिए रख छोड़ी गई हैं, तब वे खिन्न होते हैं। परन्तु मुझे तनिक भी सन्देह नहीं कि जब भविष्यद्वक्ता कहता है, वे सारी भलाई के कारण डरेंगे और थरथराएँगे, इत्यादि, तब उसका अभिप्राय अन्यजातियों के मन फिराने से है; मानो उसने कहा हो कि न केवल परमेश्वर का नाम जातियों में जाना जाएगा, यहाँ तक कि वे प्रचार करेंगी कि उसने अपनी प्रजा पर दया की है, वरन् साथ ही यह उसके अनुग्रह का फल और प्रभाव होगा कि जातियाँ परमेश्वर की आज्ञाकारी बन जाएँगी। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर की उपासना और भय को भय, त्रास और थरथराहट के शब्दों से सूचित करना एक सामान्य बात है। क्योंकि यद्यपि विश्वासी परमेश्वर की उपस्थिति से भयभीत नहीं होते, वरन् जब कभी वह उन्हें बुलाता है, वे प्रसन्नता से उसके सम्मुख उपस्थित होते हैं, और पूरे भरोसे के साथ उसे पुकारते हैं, तौभी कोई कारण नहीं कि जब वे उसके प्रताप पर विचार करें तब न थरथराएँ। क्योंकि ये दोनों बातें एक साथ जुड़ी हुई हैं, अर्थात् वह भय और थरथराहट जो हमें परमेश्वर के सामने दीन करती है, और वह भरोसा जो हमें ऐसा उठाता है कि हम निःसंकोच उसके निकट आने का साहस करें। तो यहाँ अन्यजातियों का मन फिराना दिखाया गया है; मानो भविष्यद्वक्ता ने कहा हो कि कलीसिया को छुटकारे का अनुग्रह न केवल इसी उद्देश्य से लाभदायक होगा कि अन्यजातियाँ परमेश्वर की भलाई का प्रचार करें, वरन् इसका यह फल भी होगा कि वे उसके अधिकार के अधीन आ जाएँगी, ताकि वे एकमात्र सच्चे परमेश्वर के रूप में उसका आदर करें और उसका भय मानें। वह फिर शान्ति शब्द जोड़ता है, परन्तु उसी अर्थ में जैसा पहले: वह भलाई का, जो समृद्धि का कारण है, उल्लेख करता है, और फिर उसके फल के रूप में शान्ति या समृद्धि को जोड़ता है। इसके बाद लिखा है,—
यिर्मयाह 33:10-11
10. यहोवा यों कहता है, यह स्थान जिसके विषय तुम लोग कहते हो कि यह तो उजाड़ हो गया है, इसमें न तो मनुष्य रहा और न पशु, अर्थात् यहूदा देश के नगर और यरूशलेम की सड़कें जो ऐसी सुनसान पड़ी हैं कि उनमें न तो कोई मनुष्य रहता है और न कोई पशु, उन्हीं में फिर सुनाई पड़ेगा,
10. Sic dicit Jehova, Adhuc audietur in loco hoc, de quo vos dicitis, Exterminatus est (vel, traditus exitio) ab homine (hoc est, ut non supersit homo) neque supersit jumentum in urbibus Jehudah et in compitis Jerusalem, quae in solitudinem redacta sunt, ut non sit homo et non sit habitator, et non sit animal (vel, jumentum)
11. कि हर्ष और आनन्द का शब्द, दुल्हे-दुल्हिन का शब्द, और इस बात के कहनेवालों का शब्द, कि सेनाओं के यहोवा का धन्यवाद करो, क्योंकि यहोवा भला है, और उसकी करुणा सदा की है! और यहोवा के भवन में धन्यवादबलि लानेवालों का भी शब्द सुनाई देगा; क्योंकि मैं इस देश की दशा पहले की नाईं ज्यों की त्यों कर दूँगा, यहोवा का यही वचन है।
11. Vox laetitiae et vox gaudii, vox sponsi et vox sponsae, vox dicentium, celebrate Jehovam exercituum, quia bonus Jehova, quia in seculum misericordia (vel, clementia) ejus, afferentium laudem (hoc est, testimonium gratiarum actionis, pro sacrificio hic capitur) in domum Jehovae, quia reducam captivitatem terrae sicut ab initio, dicit Jehova.
ये दोनों पद एक साथ जुड़े हुए हैं, और अनुचित रूप से विभाजित किए गए हैं, क्योंकि वाक्य पूरा नहीं होता। पहले हमारे सामने यह है, फिर सुनाई पड़ेगा, परन्तु क्या? हर्ष का शब्द, इत्यादि, जैसा हम अगले पद में पाते हैं। यिर्मयाह विस्तार से उस बात को दृढ़ करता है जो उसने प्रजा के लौटने के विषय में सिखाई थी, क्योंकि बहुत से और दृढ़ सहारों की आवश्यकता थी, ताकि विश्वासी भरोसे के साथ अपने मार्ग पर आगे बढ़ते रहें। इतनी बड़ी विपत्ति में साहस जुटाना सचमुच कठिन था; और यदि थोड़े समय के लिए उन्हें साँस लेने का अवकाश मिल भी जाता, तौभी निरन्तर उठनेवाली नई परीक्षाएँ उन्हें गिराकर भूमि पर पटक सकती थीं। तो कोई आश्चर्य नहीं कि भविष्यद्वक्ता यहाँ उस अनुग्रह के विषय में विस्तार से बोलता है जो अविश्वसनीय समझा जाता था; और फिर, यदि बार-बार पुष्टि न दी जाती, तो उसकी स्मृति विश्वासियों के हृदयों में सदा स्थिर न रहती।
वह फिर परमेश्वर को वक्ता के रूप में प्रस्तुत करता है, ताकि प्रतिज्ञा का प्रभाव अधिक हो।
फिर वह कहता है, इस स्थान में — अर्थात् यहूदा के नगरों में और यरूशलेम की सड़कों में — सुनाई पड़ेगा हर्ष का शब्द, इत्यादि। वह उसी बात को दोहराता है जिस पर हमने कल ध्यान दिया था, कि यहूदियों ने अपनी पुनःस्थापना के मार्ग में जितनी बाधाएँ डाल सकते थे, डालीं। हम जानते हैं कि हमारे हृदयों की संकीर्णता मानो परमेश्वर के अनुग्रह के लिए प्रवेश का मार्ग बन्द कर देती है; क्योंकि अविश्वास से भरे हुए, वरन् फूले हुए होकर, हम परमेश्वर के अनुग्रह को अपने भीतर प्रवेश करने नहीं देते। इसी प्रकार यहूदियों ने निराश होकर और यह कल्पना करके कि उनकी विपत्ति असाध्य है, और किसी उपचार की आशा नहीं की जानी चाहिए, जहाँ तक उनसे हो सका, छुटकारे के प्रतिज्ञात अनुग्रह को ठुकरा दिया। तो भविष्यद्वक्ता फिर से उन्हें इसी बात के लिए उलाहना देता है, अर्थात् कि उन्होंने कहा था कि सारा देश और सब नगर नष्ट हो गए हैं, यहाँ तक कि न मनुष्य बचा और न पशु। उस समय वास्तव में यही स्थिति थी, और यहूदियों ने ठीक ही कहा था; परन्तु जैसा कल कहा गया था, अधर्मी परमेश्वर के कोड़ों को अनुभव करते ही निराशा में सिर के बल गिर पड़ते हैं। तो जिस बात की निन्दा की गई है वह यह है, कि यहूदियों ने सोचा कि वे छुटकारे की किसी आशा के बिना नाश होने को थे।
इसलिए भविष्यद्वक्ता यहाँ उनके अविश्वास को डाँटता है, और साथ ही उन्हें आशा रखने के लिए उपदेश देता है। परन्तु वह साक्षी देता है कि परमेश्वर का अनुग्रह उनकी सारी दुष्टता से बढ़कर होगा।
तो हर्ष का शब्द और आनन्द का शब्द, दुल्हे का शब्द और दुल्हिन का शब्द सुनाई पड़ेगा; अर्थात् फिर से विवाह मनाए जाएँगे।
और भविष्यद्वक्ताओं में बोलने का यह ढंग प्रायः पाया जाता है जब वे नगर और प्रजा की आनन्दमय दशा का उल्लेख करते हैं; क्योंकि शोक के समयों में कोई पत्नी ब्याहने का विचार नहीं करता, इसलिए तब विवाह-भोज और सब पर्व समाप्त हो जाते हैं। तो भविष्यद्वक्ता संक्षेप में दिखाता है कि परमेश्वर प्रजा की विपत्तियों का अन्त करेगा, और कुछ समय तक उनके पापों का दण्ड देने के बाद उन्हें आनन्दित होने के कारण देगा।
परन्तु वह यह भी दिखाता है कि उनका आनन्द किस प्रकार का होगा, उनका शब्द जो कहेंगे, सेनाओं के यहोवा की स्तुति करो। यहाँ वह विश्वासियों और अधर्मियों के बीच भेद करता है, क्योंकि जब उन पर समृद्धि आती है, तब आनन्द दोनों में समान होता है; क्योंकि जब प्रभु स्वयं को उदार पिता के रूप में उन पर प्रकट करता है, तब परमेश्वर की सन्तान आनन्द मना सकती है।
परन्तु अपवित्र लोग असंयमी आनन्द में उछलते हैं, और साथ ही परमेश्वर का कोई उल्लेख नहीं करते, क्योंकि वे केवल वर्तमान वस्तुओं पर जीते हैं; परन्तु विश्वासी अपने विचारों को परमेश्वर की ओर उठाते हैं, और धन्यवाद के बिना कभी आनन्द नहीं मनाते। इस प्रकार वे अपने आनन्द को समर्पित और पवित्र करते हैं, जबकि अधर्मी परमेश्वर की आशीष को अशुद्ध करके अपने आनन्द को भी दूषित कर देते हैं। तो हमें इस भेद पर विशेष ध्यान देना चाहिए जिसकी ओर भविष्यद्वक्ता यहाँ संकेत करता है, अर्थात् भक्तिपूर्ण और अपवित्र आनन्द के बीच का भेद; क्योंकि इस संसार की सन्तान सचमुच उछलती तो है, परन्तु, जैसा हमने कहा है, अपने आनन्द में असंयम से; और वे परमेश्वर के प्रति कृतघ्न हैं, और उसकी भलाई पर कभी उचित रूप से विचार नहीं करते; वरन् वे जान-बूझकर अपनी आँखें और अपने विचार परमेश्वर से फेर लेते हैं; परन्तु जब कभी विश्वासियों का भला होता है, तब वे सदा परमेश्वर की ओर दृष्टि रखते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि हर वस्तु केवल परमेश्वर की भलाई ही से उन तक पहुँचती है।
इसलिए वह कहता है, उनका शब्द सुनाई पड़ेगा जो कहेंगे, यहोवा की स्तुति करो, क्योंकि वह भला है, इत्यादि। भविष्यद्वक्ता यहाँ गाने की उस प्रचलित रीति की ओर संकेत करता है जिसका उल्लेख पवित्र इतिहास में किया गया है। क्योंकि हम जानते हैं कि जब मन्दिर का समर्पण हुआ, तब परमेश्वर की स्तुति की गई, और लेवीय सदा यह गाते थे, क्योंकि उसकी करुणा सदा की है। वे पहले दूसरों को परमेश्वर की स्तुति करने के लिए उभारते थे, और हर वाक्य के साथ यह दोहराव जोड़ा जाता था, “क्योंकि उसकी करुणा सदा की है।” तो जो बात पहले सामान्य प्रचलन में थी, भविष्यद्वक्ता उसी का उल्लेख करता है: तो वह परिचित गीत फिर सुनाई पड़ेगा, यहोवा की स्तुति करो, क्योंकि उसकी करुणा सदा की है।
फिर वह जोड़ता है, उनका जो यहोवा के भवन में स्तुति लाएँगे; क्योंकि मैं देश की बँधुआई को लौटा लाऊँगा। वह बलिदानों का उल्लेख करता है, क्योंकि व्यवस्था के अनुसार उपासना यह माँग करती थी कि कृतज्ञता के प्रमाण के रूप में ये भी जोड़े जाएँ। परमेश्वर को सचमुच बलिपशुओं की कोई आवश्यकता नहीं थी, और न वह बाहरी प्रदर्शनों से प्रसन्न होता था; परन्तु धर्म के ये अभ्यास एक अनगढ़ प्रजा के लिए आवश्यक थे, जो अब तक सत्य की प्रारम्भिक बातें ही सीख रही थी।
तो भविष्यद्वक्ता यहाँ एक विशेष समय के सम्बन्ध में बोलता है; जब वह बलिदानों को स्तुति और धन्यवाद के साथ जोड़ता है, तौभी वह दिखाता है कि परमेश्वर ने किस उद्देश्य से माँग की थी कि उस समय उसे बलिदान चढ़ाए जाएँ, कहीं ऐसा न हो कि यहूदी सोचें कि एक बछड़ा बलि किए जाने पर परमेश्वर शान्त हो गया। तो वह दिखाता है कि यह सब उनके लिए इसी उद्देश्य से ठहराया और आज्ञा दिया गया था — कि वे स्वयं को कृतज्ञ प्रकट करें।
तो बोलने के इस लक्षणात्मक ढंग पर सावधानी से ध्यान देना चाहिए; क्योंकि इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि बलिदान अपने आप में किसी महत्त्व के न थे, वरन् परमेश्वर को केवल इसी कारण ग्रहणयोग्य और सुखदायक सुगन्ध थे — क्योंकि वे कृतज्ञता के प्रमाण थे।
फिर वह जोड़ता है, यहोवा के भवन में। अब अन्त में इस पर भी ध्यान देना चाहिए, — कि किसी के लिए केवल परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ होना पर्याप्त नहीं, वरन् सार्वजनिक धन्यवाद भी आवश्यक है, ताकि हम एक दूसरे को उभारें। और हम यह भी जानते हैं कि अंगीकार को विश्वास से अलग नहीं किया जाना चाहिए; जैसे विश्वास का आसन हृदय में है, वैसे ही बाहरी अंगीकार उसी से निकलता है; और इसलिए यह हो ही नहीं सकता कि भीतरी भावना प्राण से फूट न निकले, और जीभ हृदय से जुड़ी न हो। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि वे सब झूठ के दोषी हैं जो कहते हैं कि उनके भीतर विश्वास है, परन्तु साथ ही मौन रहते हैं, और जहाँ तक उनसे होता है, परमेश्वर के उपकारों को अयोग्य रीति से गाड़ देते हैं। और जैसा मैंने कहा है, यह उत्साह सब भक्तों से अपेक्षित है, ताकि वे एक दूसरे को परमेश्वर की स्तुति करने के लिए उभारें; क्योंकि इसी प्रयोजन और इसी कारण मन्दिर का स्पष्ट उल्लेख किया गया है; अर्थात् ताकि विश्वासी समझें कि परमेश्वर की उपासना केवल निजी रूप से और बन्द द्वारों के भीतर ही नहीं की जानी चाहिए, वरन् सार्वजनिक अंगीकार भी किया जाना चाहिए, ताकि वे एक साथ एक मन होकर उसके उपकारों और आशीषों का गुणगान करें और उन्हें स्वीकार करें।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, ऐसा अनुग्रह कर कि जैसे हम बार-बार अपने आप को तुझ से अलग करना नहीं छोड़ते, वैसे ही हम कम से कम यह जानें कि हमारे लिए मेल-मिलाप तैयार है, यदि हम उसे तेरे एकलौते पुत्र पर सच्चे और निष्कपट विश्वास के द्वारा खोजें, और ऐसे तेरी ओर लौटें कि अपने पापों के कारण सचमुच अपने आप से घृणा करें, और तेरी अनन्त दया पर भरोसा रखते हुए हम कभी सन्देह न करें कि तू हम से मेल कर लेगा, जब तक कि अन्त में अपने इस वर्तमान जीवन की दौड़ पूरी करके, और शरीर की सारी मलिनताओं से शुद्ध होकर, हम उस स्वर्गीय महिमा को पहिन न लें, जो तेरे पुत्र ने अपनी मृत्यु और पुनरुत्थान के द्वारा हमारे लिए प्राप्त की है। — आमीन।
एक सौ चौंतीसवाँ व्याख्यान
यिर्मयाह 33:12-13
12. सेनाओं का यहोवा कहता है, सब गाँवों समेत यह स्थान जो ऐसा उजाड़ है कि इसमें न तो मनुष्य रह गया है और न पशु, इसी में फिर भेड़-बकरियाँ बैठानेवाले चरवाहे बसेंगे।
12. Sic dicit Jehova exercituum, Adhuc erit in loco hoc destructo, ut non sit homo et jumentum, et in omnibus urbibus ejus, habitaculum pastorum accubare facientium oves:
13. पहाड़ी देश में और नीचे के देश में, दक्खिन देश के नगरों में, बिन्यामीन देश में, और यरूशलेम के आसपास, अर्थात् यहूदा देश के सब नगरों में भेड़-बकरियाँ फिर गिननेवाले के हाथ के नीचे से होकर चलेंगी, यहोवा का यही वचन है।
13. In urbibus montis (hoc est, montanis) et in urbibus planicei (campestribus) et in urbibus Austri (id est, quae vergunt ad meridiem) et in terra Benjamin, et per circuitus Jerusalem, et in urbibus Jehudae, adhuc transibunt oves per manus numerantis, dicit Jehova.
यिर्मयाह अब भी उसी विषय का अनुसरण करता है; परन्तु यहाँ वह प्रजा की स्थिर सुख-समृद्धि के विषय में बोलता है, मानो उसने कहा हो कि इस्राएलियों के लिए यह डरने का कोई कारण नहीं था कि परमेश्वर उनके लिए अपने देश को लौटने का मार्ग न खोलेगा, और लौटने के बाद उनकी रक्षा और रखवाली न करेगा। परन्तु उनकी शान्त और चैन की दशा का वर्णन करते हुए वह चरवाहों की बात करता है; क्योंकि हम जानते हैं कि जब भेड़-बकरियाँ और गाय-बैल निडर होकर मैदानों में ले जाए जाते हैं, तब यह शान्ति का निश्चित चिह्न है। क्योंकि शत्रु सदा लूट के लिए मुँह बाए रहते हैं, और युद्धों का अनुभव इसे प्रमाणित करता है; क्योंकि जब कभी शत्रु आक्रमण करते हैं, तब वे भेदिए भेजते हैं कि जानें कि कहीं चरवाहे या पशुओं के रखवाले हैं या नहीं; और तब वे जान लेते हैं कि उनके लिए लूट तैयार है। तो जैसे शत्रुओं के आक्रमण का भय होने पर चरवाहे बाहर निकलने का साहस नहीं करते, और तब कोई स्वतन्त्रता नहीं रहती, वैसे ही भविष्यद्वक्ता, यह संकेत करने के लिए कि यहूदी शान्त दशा में होंगे, कहता है, इस स्थान में फिर चरवाहों का निवास होगा, जो अपनी भेड़ों को, या अपने झुण्ड को, बैठाएँगे।
अब हम भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय समझते हैं; क्योंकि जो पवित्रशास्त्र से भली-भाँति परिचित नहीं, वह यह प्रश्न उठा सकता है, क्या यह प्रतिज्ञा चरवाहों और ग्वालों तक ही सीमित है? परन्तु, जैसा मैं संकेत कर चुका हूँ, उत्तर स्पष्ट है, — प्रतिज्ञा सामान्य है, परन्तु इस रीति से व्यक्त की गई है, — कि परमेश्वर अपनी प्रजा का रखवाला होगा, यहाँ तक कि चरवाहे अपने झुण्डों को, और ग्वाले अपने पशुओं को, इधर-उधर पूर्ण सुरक्षा में और किसी संकट के भय के बिना हाँकेंगे।
और अगले पद में यिर्मयाह उसी बात को दृढ़ करता है, जहाँ वह पहले की नाईं पहाड़ों के नगरों और मैदानों के नगरों का, और फिर दक्खिन के नगरों का उल्लेख करता है, और बिन्यामीन के देश को भी जोड़ता है, जो देश का एक भिन्न भाग था, और वह सामान्य रूप से यरूशलेम के आसपास और यहूदा के नगरों का उल्लेख करता है। तो क्या? वह कहता है, भेड़-बकरियाँ गिननेवाले के हाथ के नीचे से होकर चलेंगी।
यहाँ फिर एक बड़ी सुरक्षा दिखाई गई है, क्योंकि चरवाहे मानो चोरी-छिपे अपनी भेड़ों को बाहर न ले जाएँगे, और बाद में उन्हें हड़बड़ी में न बटोरेंगे, जैसा सामान्यतः तब किया जाता है जब किसी संकट का भय हो। वह कहता है, भेड़ें गिननेवाले के हाथ के नीचे से होकर चलेंगी। यह पूर्ण शान्ति और चैन के समय के अतिरिक्त हो ही नहीं सकता था; क्योंकि जहाँ भय होता है, वहाँ चरवाहे अपने झुण्डों को बाहर भेजने का कठिनाई से ही साहस कर सकते हैं, और तब वे उन्हें गिनने का साहस नहीं करते, वरन् उन्हें बन्द रखते हैं; और उन्हें प्रायः अपने झुण्डों को छिपाने के लिए वनों और निर्जन स्थानों में हाँकने को विवश होना पड़ता है। इसलिए जब यिर्मयाह उनकी गिनती का उल्लेख करता है, तब वह संकेत करता है कि सारा देश शान्ति की दशा में होगा, जैसा वह शीघ्र ही दूसरे शब्दों में, और बिना किसी अलंकार के, हमें बताएगा। परन्तु भविष्यद्वक्ता ने इस रीति से परमेश्वर के उपकारों की महिमा की, और साथ ही निर्बलों के मनों को दृढ़ किया, क्योंकि जैसा कहा गया है, यहूदी ऐसी निराशाजनक दशा में रहते हुए इस अनुग्रह का कठिनाई से ही स्वाद ले सकते थे। तो भविष्यद्वक्ता ने भेड़-बकरियों और गाय-बैलों की बात करते समय एक घरेलू और साधारण शैली का प्रयोग किया। अब आगे लिखा है —
यिर्मयाह 33:14
14. यहोवा की यह भी वाणी है, देख, ऐसे दिन आनेवाले हैं कि कल्याण का जो वचन मैं ने इस्राएल और यहूदा के घरानों के विषय में कहा है, उसे पूरा करूँगा।
14. Ecce dies veniunt, dicit Jehova, et excitabo (vel, stabilium) sermonum meum benum, quem loquutus sum (vel, pronuntiavi) ad domum Israel et ad domum Jehudah.
यिर्मयाह अब दिखाता है कि परमेश्वर ने क्यों प्रतिज्ञा की थी कि चरवाहों के लिए शान्त निवास होगा, यहाँ तक कि कोई बलपूर्वक उनके झुण्ड न छीनेगा। क्योंकि परमेश्वर घोषणा करता है कि उसकी प्रतिज्ञा व्यर्थ न होगी, क्योंकि उसके फल शीघ्र ही प्रकट होंगे, अर्थात् जब उसकी दया दस गोत्रों और यहूदा के राज्य को ज्ञात होगी। इसलिए वह कहता है, दिन आएँगे; क्योंकि विश्वासियों के लिए उचित था कि वे अपनी वर्तमान दशा से आगे दृष्टि करें। जब वे उस समय घात के लिए खुले पड़े थे, यद्यपि अविश्वासी अब भी व्यर्थ आशाएँ बाँधे हुए थे, तौभी परमेश्वर की सन्तान हज़ारों मृत्यु देखती थी; इसलिए यह हो ही नहीं सकता था कि भय उन्हें लगभग निराशा तक न ले जाए; और अपने निर्वासन में उन्होंने देखा कि वे अपने देश से बहुत दूर हटा दिए गए हैं, और लौटने की कोई आशा नहीं।
तो इसलिए कि भविष्यद्वक्ता इन्हें अब भी सँभाले रहे, वह उन्हें अपने विचारों को भविष्य के समय तक फैलाने की आज्ञा देता है; और जैसा हम पहले देख चुके हैं, उसने सत्तर वर्ष ठहरा दिए थे। तो यह ऐसा ही है मानो उसने कहा हो कि जिस अनुग्रह की वह भविष्यद्वाणी करता है उसे तब तक पकड़ा नहीं जा सकता, जब तक विश्वासी अपने मनों को प्रतीक्षा में न रखें, और प्रतिज्ञात छुटकारे का समय आने तक धीरज से बाट न जोहें।
तो दिन आ रहे हैं, और मैं जगाऊँगा, या जैसा कुछ लोग अनुवाद करते हैं, “और मैं स्थिर करूँगा;” और दोनों अर्थ उपयुक्त हो सकते हैं; क्योंकि {}קוםkum का अर्थ उठना है, परन्तु यहाँ सक्रिय या सकर्मक अर्थ में इसका अर्थ उठाना है। तौभी इसका अर्थ कभी स्थिर करना, और कभी जगाना होता है, ताकि जो पहले छिपा था वह प्रकट हो जाए। और परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं के विषय में बोलने का यह ढंग उपयुक्त रूप से अपनाया गया है; क्योंकि वे कुछ समय तक बिना किसी प्रभाव के सोई हुई सी प्रतीत होती हैं, या लुप्त या अदृश्य होती हुई सी दिखाई देती हैं। इसलिए प्रतिज्ञाओं की स्थिरता तब प्रकट होती और दिखाई देती है जब परमेश्वर उन्हें उठाता है, जबकि वे पहले विश्वासियों से छिपी और गुप्त थीं। भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय यह है कि परमेश्वर अन्त में अपने वचन को पूरा करके उसकी सामर्थ्य को प्रकट करेगा।
परन्तु बोलने के इस ढंग से एक उपयोगी शिक्षा निकाली जा सकती है: क्योंकि इससे हमें स्मरण दिलाया जाता है कि परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ सदा इतनी प्रकट नहीं होतीं कि उनका फल या पूर्ति हमें स्पष्ट दिखाई दे, वरन् इसके विपरीत वे मरी हुई और व्यर्थ प्रतीत हो सकती हैं। जब ऐसा हो, तो आइए हम विश्वास और धीरज का अभ्यास करना सीखें, ताकि हमारे प्राण न काँपें, यद्यपि परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ हर क्षण वास्तव में पूरी होकर अपनी सामर्थ्य प्रकट न करें। संक्षेप में, भविष्यद्वाणी के सत्य का सच्चा प्रयोग यह है कि हम परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को तब तक कभी पकड़ते और वास्तव में अपनाते नहीं, जब तक हम आनेवाले दिनों की ओर दृष्टि न करें, अर्थात् जब तक हम परमेश्वर द्वारा ठहराए गए समय की धीरज से बाट न जोहें: और आगे, जब तक हमारा विश्वास प्रतिज्ञाओं पर उस समय भी टिका न रहे जब वे सोई हुई सी प्रतीत हों, तब तक वह दृढ़ नहीं है, और उसकी न जड़ें हैं न नींव; क्योंकि जैसे वृक्ष का पोषण करनेवाली जड़ दिखाई नहीं देती, वरन् भूमि में छिपी रहती है, और जैसे घर की नींव हमारी आँखों को दिखाई नहीं देती, वैसे ही हमारे विश्वास की भी नींव डाली जानी चाहिए, और उसे परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं में गहरी जड़ें जमानी चाहिए, ताकि उसकी दृढ़ता हवा में न हो, न उसका कोई दिखाई देनेवाला ऊपरी तल हो, वरन् एक छिपी हुई नींव हो। तो इस शिक्षा का आशय और उचित प्रयोग यही है। 316 वुल्गेट में भी ऐसा ही है, “suscitabo,” “मैं जगाऊँगा,” या उठाऊँगा; और सेप्टुआजिन्ट और तर्गुम में भी। — सं.
परन्तु परमेश्वर इसे अपना भला वचन कहता है, क्योंकि उसने अपनी प्रजा का छुड़ानेवाला होने की प्रतिज्ञा की थी। परमेश्वर का वचन, जब वह हर प्रकार की मृत्यु की घोषणा करता है, और उसमें भयों के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता, तब भी सदा भला है, यदि भलाई को उस अर्थ में लिया जाए जो न्यायसंगत और उचित है; और इसीलिए परमेश्वर यहेजकेल के द्वारा यहूदियों को डाँटता है, क्योंकि उसका वचन उन्हें कड़वा लगता था, और कहता है, “क्या प्रभु की चाल टेढ़ी और काँटेदार है? टेढ़े तो तुम हो,” वह कहता है, “न कि मेरा वचन।” (यहेजकेल 18:25)
परन्तु यहाँ वचन की भलाई को प्रजा के छुटकारे के अर्थ में लेना चाहिए; क्योंकि जब परमेश्वर अपनी व्यवस्था का तिरस्कार करनेवालों को भय से कँपाता है, तब उसके फल के कारण उसका वचन बुरा कहलाता है। साथ ही, जैसा मैं कह चुका हूँ, चाहे परमेश्वर हमें अपनी कृपा और दया प्रदान करे, या अविश्वासियों पर पलटा लेने की घोषणा करे, उसका वचन सदा भला और उचित है, यद्यपि वह सुखद न हो। तो जब वह कहता है, मैं अपने भले वचन को जगाऊँगा, या स्थिर करूँगा, तब यह मनुष्यों की समझ से सम्बन्ध रखता है।
इसके बाद वह जोड़ता है, जो मैं ने कहा है; इस वाक्यांश के द्वारा वह यिर्मयाह की शिक्षा को दृढ़ करता है, क्योंकि वह दिखाता है कि वह स्वयं उसका रचयिता था, और यिर्मयाह अपनी ओर से कुछ नहीं लाया, वरन् जो आदेश उसे मिला था उसके अनुसार उसने विश्वासयोग्यता से उसकी दया और प्रजा के छुटकारे की साक्षी दी। साथ ही हमें स्मरण दिलाया जाता है कि जब तक परमेश्वर न बोले, तब तक हमें ढिठाई से किसी बात की आशा नहीं करनी चाहिए। तो आइए हम उसकी प्रतिज्ञाओं को अपनाना सीखें, ताकि हम में से कोई इस या उस बात की बाट न जोहे, वरन् यह जाने कि वह हम पर तभी अनुग्रहकारी होगा जब हम उसके वचन पर टिके रहें। इसके बाद वह इस्राएल के राज्य और यहूदा के राज्य की बात करता है, यह संकेत करने के लिए कि वह सारी प्रजा पर दया करेगा, यद्यपि दस गोत्र बहुत समय से यहूदा के गोत्र से और बिन्यामीन के आधे गोत्र से अलग हो चुके थे, जैसा अन्यत्र बताया गया है। आगे लिखा है —
यिर्मयाह 33:15
15. उन दिनों में और उस समय मैं दाऊद के वंश में धर्म की एक डाल उगाऊँगा; और वह इस देश में न्याय और धर्म के काम करेगा।
15. Diebus illis et termpore illo germinare faciam Davidi germen justitiae; et faciet judicium et justitiam in terra.
यहाँ भविष्यद्वक्ता वह दिखाता है जिसके विषय में पौलुस ने बाद में कहा है, कि परमेश्वर की सब प्रतिज्ञाएँ मसीह में हाँ और आमीन हैं, (2 कुरिन्थियों 1:20) अर्थात् जब तक मसीह बीच में आकर उन्हें पक्का या दृढ़ न करे, तब तक वे हमारे लिए न टिक सकती हैं और न मान्य हो सकती हैं। तो परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं की प्रभावशीलता केवल मसीह पर निर्भर है। और इसीलिए भविष्यद्वक्ता, जब परमेश्वर के अनुग्रह की बात करते हैं, तब अन्त में मसीह तक पहुँचते हैं, क्योंकि उसके बिना सब प्रतिज्ञाएँ लुप्त हो जातीं। आइए हम यह भी जानें कि यहूदियों को ऐसी शिक्षा दी गई थी कि वे सदा परमेश्वर की वाचा की शरण लें; क्योंकि सब विशेष प्रतिज्ञाएँ सामान्य वाचा पर निर्भर थीं। उदाहरण के लिए, यिर्मयाह अब तक प्रायः प्रजा को उनके पापों का दण्ड देने के बाद उन पर परमेश्वर की दया की भविष्यद्वाणी करता रहा है; अब यह प्रतिज्ञा विशेष थी। तो यहूदी और इस्राएली कैसे विश्वास कर सकते थे कि वे अपने देश को लौटेंगे? यह विशेष प्रतिज्ञा किसी महत्त्व की न होती, यदि वह वाचा का परिशिष्ट न होती, अर्थात् इस कारण कि परमेश्वर ने उन्हें अपनी प्रजा के रूप में लेपालक बनाया था। तो जैसे यहूदी जानते थे कि वे निज प्रजा के रूप में चुने गए हैं, और परमेश्वर उनका पिता है, इसी से सब प्रतिज्ञाओं पर उनका विश्वास था। अब फिर हमें स्मरण रखना चाहिए कि वाचा केवल मसीह पर स्थापित थी; क्योंकि परमेश्वर ने अब्राहम से न केवल यह प्रतिज्ञा की थी कि वह उसके वंश का पिता होगा, वरन् यह बयाना या प्रतिभूति भी जोड़ी थी कि एक छुड़ानेवाला आएगा।
तो अब हम कारण समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता, जब उन्होंने विश्वासियों को उद्धार की आशा में दृढ़ करना चाहा, तब मसीह को क्यों प्रस्तुत किया, क्योंकि सामान्य वाचा के बिना प्रतिज्ञाओं में कोई निश्चितता न थी। और आगे, जैसे सामान्य वाचा मसीह के अतिरिक्त न टिक सकती थी, न उसकी कोई मान्यता हो सकती थी, यही वह बात है जिस पर यिर्मयाह अब ध्यान देता है, जैसा हम अन्य स्थानों में भी देख चुके हैं, विशेषकर तेईसवें अध्याय में, जहाँ से वह इस भविष्यद्वाणी को दोहराता है।
तो परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की थी कि उसकी प्रजा फिर से बसाई जाएगी; उसने यह भी प्रतिज्ञा की थी कि वह उन पर ऐसा अनुग्रहकारी होगा कि उन्हें अपनी प्रजा के रूप में सुरक्षित रखेगा: अब वह जोड़ता है —
उन दिनों में और उस समय मैं उठाऊँगा, मैं उगाऊँगा; तेईसवें अध्याय में क्रिया {,}הקמתיekamti है, मैं उठाऊँगा; परन्तु यहाँ, “मैं उगाऊँगा;” और वहाँ हम पढ़ते हैं, “एक धर्मी डाल,” परन्तु यहाँ, “धर्म की एक डाल,” जिसका अर्थ वही है। परन्तु भविष्यद्वक्ता अब दाऊद के वंश की बात क्यों करता है? यह कोई आकस्मिक वाक्य नहीं है; और कारण यह है, कि यदि मसीह को आगे न रखा जाता, जिस पर परमेश्वर की अनन्त और अपरिवर्तनीय वाचा स्थापित थी, तो विश्वासियों के मन सदा डगमगाते रहते। परन्तु यदि वे न जानते कि वह उन्हें सेंतमेंत चुन चुका है, तो वे परमेश्वर के अनुग्रह का कोई स्वाद न ले सकते थे। तो लेपालकपन वाचा की नींव था; और फिर मसीह वाचा का, और सेंतमेंत लेपालकपन का भी, बयाना और प्रतिभूति था। इसी कारण भविष्यद्वक्ता ने अपनी भविष्यद्वाणी पर मुहर लगाने और उसे दृढ़ करने की इच्छा से विश्वासियों को मसीह की ओर दृष्टि करने की आज्ञा दी।
वह कहता है, उन दिनों में और उस समय; क्योंकि, जैसा कहावत में कहा गया है, “जब हमारी इच्छाएँ उत्कट हों, तब शीघ्रता भी विलम्ब ही है,” वैसे ही अब लम्बा विलम्ब इस्राएलियों में थकान उत्पन्न कर सकता था। तो इसलिए कि वे अत्यधिक उतावली से बह न जाएँ, वह उन दिनों और उस समय का उल्लेख करता है। ताकि यदि परमेश्वर समय को टाले, तो वे अपने आप को रोके रखें, वह कहता है, मैं दाऊद के लिए एक धर्मी डाल उगाऊँगा।
यह खण्ड, निस्सन्देह, मसीह के विषय में समझा जाना चाहिए। हम जानते हैं कि यहूदियों में यह एक सामान्य बात थी कि जब कभी भविष्यद्वक्ता उनसे दाऊद के वंश की प्रतिज्ञा करते, तब वे अपना ध्यान मसीह की ओर लगाते। तो शिक्षा देने का यह ढंग यहूदियों को भली-भाँति परिचित था। भविष्यद्वक्ताओं ने तो कभी-कभी स्वयं दाऊद का उल्लेख किया, न कि उसके पुत्र का, “मैं दाऊद को खड़ा करूँगा,” इत्यादि। (यहेजकेल 34:23)
अब दाऊद मर चुका था, और उसका शरीर धूल और राख हो चुका था; परन्तु दाऊद के व्यक्तित्व के अधीन भविष्यद्वक्ताओं ने मसीह को प्रस्तुत किया। तो इस खण्ड के विषय में, यदि यहूदी टालमटोल करें और इसे मसीह के अतिरिक्त किसी और पर लगाने का प्रयत्न करें, तो उन्हें अत्यन्त हास्यास्पद रीति से अपनी निर्लज्जता प्रकट करनी पड़ेगी। ऐसा होने के कारण, यदि कोई अब यहूदियों से पूछे कि यह भविष्यद्वाणी कैसे पूरी हुई है, तो उन्हें या तो मसीह को स्वीकार करना पड़ेगा, या परमेश्वर पर, और यिर्मयाह पर भी, विश्वास करने से इनकार करना पड़ेगा। यह तो निश्चित है कि यिर्मयाह यहाँ छुटकारे के अनुग्रह का गुणगान विशेषकर इसी कारण करता है, क्योंकि एक छुड़ानेवाला शीघ्र आनेवाला था। क्योंकि यहूदियों का अपने देश को लौटना, वह क्या था? हम जानते हैं कि वे अपनी पुनःस्थापना के तुरन्त बाद भी दयनीय दशा में थे, यद्यपि तब उनकी दशा बाद की अपेक्षा कहीं अच्छी थी; क्योंकि बाद के समयों में अन्तियोकस और सीरिया के अन्य राजाओं ने उनके साथ क्रूर व्यवहार किया: वे सदा अपने चारों ओर की अन्यजातियों के आगे खुले पड़े रहे, यहाँ तक कि वे मनमाने ढंग से उन्हें सताते और लूटते रहे। तो मसीह के आगमन से पहले के उस सारे समय में परमेश्वर ने वह पूरा नहीं किया जिसकी प्रतिज्ञा उसने यिर्मयाह और अपने अन्य सेवकों के द्वारा की थी। अब उनकी दशा क्या है? सारे संसार में तितर-बितर; और मसीह के मरे हुओं में से जी उठने के बाद से पन्द्रह सौ वर्षों से अधिक समय से वे ऐसे ही हैं; और हम देखते हैं कि वे अपनी विपत्तियों के नीचे घुलते जाते हैं, यहाँ तक कि उनका शाप सब को भयानक प्रतीत होता है। परमेश्वर ने सचमुच मूसा के द्वारा कहा था, और फिर अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा उसे दोहराया था, “तुम सब जातियों के लिए सुसकार और शाप का कारण ठहरोगे।” (व्यवस्थाविवरण 28:37; यिर्मयाह 25:18)
परन्तु वह दण्ड एक समय के लिए होना था। इसलिए यहूदी जो कुछ दावा करते हैं उसका कोई आधार नहीं है। इससे प्रकट होता है कि वे सारी विश्वसनीयता से पूर्णतः रहित हैं, और केवल हठपूर्वक न जाने क्या-क्या बहाने बनाते हैं, ताकि उनके कथन में कुछ दिखावा हो, यद्यपि वह पूर्णतः कपटपूर्ण है। परन्तु जहाँ तक हमारा सम्बन्ध है, हम देखते हैं कि मसीहा के आगमन के विषय में प्रतिज्ञा व्यर्थ नहीं की गई; और हम यह भी जानते हैं कि परमेश्वर की अद्भुत युक्ति से ऐसा हुआ कि यहूदियों ने वह पूर्ण और वास्तविक सुख नहीं भोगा जिसकी प्रतिज्ञा मसीह के आगमन पर की गई थी, कहीं ऐसा न हो कि वे सोचें कि परमेश्वर के सब सेवकों ने जिसकी प्रतिज्ञा की थी वह तभी पूरी हो गई: क्योंकि हम जानते हैं कि मनुष्य सांसारिक वस्तुओं से सन्तुष्ट हो जाने की ओर कितने झुके हुए हैं। तो यहूदी सोच सकते थे कि उनका सुख पूरा हो गया है, यदि परमेश्वर ने उन्हें बहुत से क्लेशों में न डाला होता, ताकि वे सदा मसीह के प्रकट होने की ओर दृष्टि लगाए रहें।
वह इसे विरोधाभास के रूप में धर्म की डाल कहता है, क्योंकि दाऊद की सन्तान पतित हो गई थी; और परमेश्वर ने उन्हें लगभग शापित ठहरा दिया था, क्योंकि अधिकांश राजा परमेश्वर के अनुग्रह से रहित थे। तो धर्म की केवल एक ही डाल थी, अर्थात् मसीह। हम आगे यह भी जानते हैं कि मसीह का धर्म कितना व्यापक और विस्तृत है, क्योंकि वह उसे हम पर प्रदान करता है। परन्तु हमें उस धर्म से आरम्भ करना चाहिए जिसका मैंने उल्लेख किया है, अर्थात् वह जो उन अनेक परिवर्तनों के विपरीत है जो दाऊद के वंशजों पर आए, क्योंकि प्रायः बातें बहुत गिरी हुई दशा में थीं। यद्यपि दाऊद के लिए, {}לדודLadavid, को प्रायः इस अर्थ में लिया जाता है, “मैं दाऊद की डाल को उगाऊँगा,” तौभी परमेश्वर यहाँ उस प्रतिज्ञा की ओर संकेत करता प्रतीत होता है जो उसने दाऊद से की थी, जैसा बहुत से खण्डों में कहा गया है कि परमेश्वर ने अपने दास दाऊद से शपथ खाई। (भजन संहिता 89:3; 132:11)
आगे लिखा है, और वह देश में न्याय और धर्म के काम करेगा। इन शब्दों के द्वारा उचित शासन सूचित किया गया है; क्योंकि जब ये दोनों शब्द एक साथ जोड़े जाते हैं, तब धर्म निर्दोषों की रक्षा से, और न्याय अधर्म के दण्ड से सम्बन्ध रखता है; क्योंकि यदि दुष्टों को व्यवस्था के भय से रोका न जाए, तो वे सारी व्यवस्था को भंग कर देंगे। न्याय, जब अकेला हो, तब सचमुच व्यवस्था के उचित प्रशासन का अर्थ देता है; परन्तु जैसा मैं कह चुका हूँ, धर्म और न्याय में भलों की रक्षा, और दुष्टों का नियन्त्रण भी, सम्मिलित है, जो स्वेच्छा से या अपनी इच्छा से आज्ञाकारी नहीं बनते। संक्षेप में, प्रतिज्ञा यह है कि जिस राजा की यहाँ चर्चा है वह खरा और धर्मी होगा, यहाँ तक कि हर प्रकार से सिद्ध होगा, और सर्वश्रेष्ठ राजाओं का आदर्श प्रस्तुत करेगा।
परन्तु हमें सदा दाऊद के अन्य वंशजों और मसीह के बीच के विरोध पर ध्यान देना चाहिए। क्योंकि यहूदियों ने दाऊद के वंश में अत्यन्त दुःखद दृश्य देखे थे: उनमें से बहुत से धर्मत्यागी थे, और उन्होंने परमेश्वर की उपासना को बिगाड़ दिया; अन्य भविष्यद्वक्ताओं और सब भले मनुष्यों के विरुद्ध भड़क उठे, और लोभ और लूट-खसोट से भी भरे हुए थे, और सब प्रकार की वासनाओं में लिप्त थे। तो जब उनके राजाओं ने इतने अपराधों से अपने आप को भ्रष्ट कर लिया था, तब यहाँ एक ऐसे राजा की प्रतिज्ञा की गई है जो अपना पद ऐसे निभाएगा कि परमेश्वर के सच्चे सेवक के रूप में माना जाएगा।
साथ ही मसीह के राज्य के स्वरूप को स्मरण रखना आवश्यक है। हम जानते हैं कि वह आत्मिक है; परन्तु वह एक सांसारिक और नागरिक शासन की छवि या रूप में प्रस्तुत किया गया है; क्योंकि जब कभी भविष्यद्वक्ता मसीह के राज्य की बात करते हैं, तब वे हमारे सामने एक सांसारिक रूप रखते हैं, क्योंकि बिना किसी रूपक के आत्मिक सत्य अपनी बाल्यावस्था में पड़ी एक अनगढ़ प्रजा द्वारा पर्याप्त रूप से समझा नहीं जा सकता था। तो कोई आश्चर्य नहीं कि भविष्यद्वक्ता, अपने शब्दों को यहूदियों की समझ के अनुकूल बनाने की इच्छा से, मसीह के राज्य के विषय में ऐसे बोलें कि उसे उनके सामने एक सांसारिक और नागरिक शासन के रूप में चित्रित करें। परन्तु हमारे लिए यह विचार करना आवश्यक है कि वह किस प्रकार का राज्य है। तो जब वह आत्मिक है, तब जिस धर्म और न्याय की भविष्यद्वक्ता बात करता है, वे केवल नागरिक और बाहरी व्यवस्था से ही सम्बन्ध नहीं रखते, वरन् उस खराई से सम्बन्ध रखते हैं जिसके द्वारा मनुष्य परमेश्वर के स्वरूप के अनुसार, जो धार्मिकता और सत्य में है, नये बनाए जाते हैं। तो मसीह के विषय में कहा गया है कि वह हम पर धर्म और न्याय से राज्य करता है, केवल इसलिए नहीं कि वह व्यवस्थाओं के द्वारा हमें हमारे कर्तव्य की सीमा में रखता है, और भलों और निर्दोषों की रक्षा करता है, और दुष्टों के दुस्साहस को दबाता है; वरन् इसलिए कि वह अपने आत्मा के द्वारा हम पर शासन करता है। और आत्मा के विषय में हम जानते हैं कि स्वयं मसीह क्या घोषणा करता है, “आत्मा संसार को धार्मिकता और न्याय के विषय में निरुत्तर करेगा,” इत्यादि। (यूहन्ना 16:8) इसलिए यदि हम समझना चाहते हैं कि वह धर्म क्या है जिसका यहाँ उल्लेख है, तो हमें आत्मिक अधिकार-क्षेत्र तक आना होगा: जो न्याय जोड़ा गया है वह भी इसी प्रकार का है। इसके बाद लिखा है,—
यिर्मयाह 33:16
16. उन दिनों में यहूदा बचा रहेगा और यरूशलेम निडर बसा रहेगा: और उसका नाम यह रखा जाएगा, अर्थात् यहोवा हमारी धार्मिकता।
16. Diebus illis servabitur Jehudah, et Jerusalem habitabitur secure; et hoc nomen quo vocabitur ipsa, Jehova justitia nostra.
यहाँ भविष्यद्वक्ता राज्य की आशीषों को सारे यहूदियों तक फैलाता है, और दिखाता है कि जिस राज्य की उसने प्रतिज्ञा की थी उससे कितनी बड़ी आशा रखी जानी थी; क्योंकि उसमें सिद्ध सुख और कुशल पाया जाएगा। यदि यह बात न जोड़ी गई होती, तो धर्मी राजा के विषय में जो कुछ हमने सुना है वह फीका और नीरस प्रतीत होता; क्योंकि कभी-कभी ऐसा होता है कि राजा चाहे कितना ही न्याय और धर्म क्यों न करे, तौभी प्रजा दुःखी ही बनी रहती है। परन्तु भविष्यद्वक्ता यहाँ यह गवाही देता है कि जब प्रजा उस राजा के द्वारा शासित होगी जिसके आने की प्रतिज्ञा की गई थी, तब वह हर प्रकार से धन्य और सुखी होगी। इसलिए वह कहता है, उन दिनों में यहूदा उद्धार पाएगा। वह यहूदियों को उद्धार की प्रतिज्ञा देता है, यद्यपि, जैसा प्रायः होता है, इस नाम के अन्तर्गत दस गोत्र भी सम्मिलित हैं। वह यरूशलेम को भी जोड़ता है, परन्तु उसी अर्थ में, यरूशलेम निडर बसा रहेगा, अर्थात् शान्ति की दशा में रहेगा। बोलने की यह रीति मूसा से ली गई है; क्योंकि भविष्यद्वक्ता जब कभी परमेश्वर की आशीषों के विषय में बोलते थे, तो अपनी शिक्षा उसी सोते से लेने के अभ्यस्त थे। अतः वह कहता है कि प्रजा उद्धार पाएगी, और फिर यह कि वह शान्ति और चैन से रहेगी।
अब यह उचित होगा कि मैं उस बात को दोहराऊँ जिसका मैं पहले ही उल्लेख कर चुका हूँ,—कि यहाँ जिस उद्धार का वर्णन है वह मसीह के राज्य से सम्बन्ध रखता है। यदि वह किसी पार्थिव या सांसारिक शासन के विषय में बोल रहा होता, तो उद्धार भी अवश्य सांसारिक ही होता।
परन्तु जब मसीह का आत्मिक और स्वर्गीय राज्य ही प्रतिज्ञा का विषय है, तो जिस उद्धार का वर्णन है वह स्वर्ग तक पहुँचना ही चाहिए। इसलिए उसकी सीमाएँ सारे संसार से भी कहीं अधिक विस्तृत हैं। सारांश यह कि जिस उद्धार की भविष्यद्वाणी यिर्मयाह अब करता है, वह इस नाशमान जीवन की सीमाओं में बाँधा नहीं जाना चाहिए, और न उसे इस संसार में ढूँढ़ना चाहिए जहाँ उसका कोई ठिकाना नहीं; परन्तु यदि हम जानना चाहें कि वह क्या है, तो हमें अपने विचारों को ऊपर की ओर, संसार से और यहाँ की हर वस्तु से ऊपर उठाना सीखना होगा।
यह अनन्त उद्धार है। इस बीच मसीह इस जीवन में भी हमें इस उद्धार का कुछ पूर्वस्वाद देता है, जैसा कहा गया है, "भक्ति इस समय के और आनेवाले जीवन की भी प्रतिज्ञाएँ रखती है।" (1 तीमुथियुस 4:8)
परन्तु जब यह प्रतिज्ञा मसीह के राज्य पर लागू की जानी चाहिए, तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि वह सदा की है, और उसे हमारे विचारों को स्वयं स्वर्ग तक उठाना चाहिए।
उद्धार के साथ निडरता भी जोड़ी गई है; क्योंकि यदि विश्वासी सदा डरते और काँपते रहें, तो उनका उद्धार कहाँ होगा? और हम जानते हैं कि मसीह के द्वारा हमें मिलनेवाला सुख शान्ति के बिना अन्य किसी रीति से ग्रहण नहीं किया जा सकता, जैसा पवित्रशास्त्र हमें बार-बार सिखाता है: पौलुस कहता है, "जब हम धर्मी ठहरे, तो परमेश्वर के साथ हमारा मेल है।" (रोमियों 5:1)
और फिर जब वह उसी पत्री के चौदहवें अध्याय में परमेश्वर के राज्य के विषय में बोलता है, तो कहता है कि वह आनन्द और शान्ति में है; और एक अन्य स्थान पर वह कहता है, "परमेश्वर की शान्ति, जो समझ से बिलकुल परे है, तुम्हारे हृदयों में विजय पाए।" (फिलिप्पियों 4:7)
इसलिए ये बातें, उद्धार और शान्ति, आपस में जुड़ी हुई हैं; इसका यह अर्थ नहीं कि हम संसार में इस आनन्दमय और शान्त दशा का भोग करते हैं; क्योंकि जो लोग यहाँ ऐसी चैन की दशा का स्वप्न देखते हैं वे अपने आप को बड़ा धोखा देते हैं, क्योंकि हमें निरन्तर युद्ध करना है, जब तक कि परमेश्वर अन्त में हमें धन्य विश्राम के भोग के लिए इकट्ठा न कर ले। इसलिए हमें इस संसार में संघर्ष करना और लड़ना ही होगा। इस प्रकार विश्वासी सदा बहुत से क्लेशों के सामने खुले रहेंगे; और इसीलिए मसीह अपने चेलों को स्मरण दिलाता है, "मुझ में तुम्हें शान्ति मिले; परन्तु संसार में"—क्या? दुःख और क्लेश। (यूहन्ना 16:33)
अतः अब हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने उद्धार के साथ निडरता या सुरक्षा को क्यों जोड़ा, अर्थात् इसलिए कि हम अन्य किसी रीति से नहीं जान सकते कि हम उद्धार पाएँगे, जब तक हमें पूरा निश्चय न हो कि परमेश्वर हमारे उद्धार की ऐसी चिन्ता करता है कि अपनी सामर्थ्य से हमारी रक्षा करता है, और कि जब कभी आवश्यकता होगी उसकी सहायता सदा तैयार रहेगी।
अन्त में वह जोड़ता है, और यह वह नाम है जिससे वे उसे पुकारेंगे, यहोवा हमारी धार्मिकता। अध्याय 23 (यिर्मयाह 23) में यह नाम मसीह को दिया गया है, और ठीक-ठीक वह केवल उसी का है; परन्तु यहाँ वह कलीसिया पर लागू किया गया है, क्योंकि जो कुछ सिर का है वह सब अंगों में साझा कर दिया जाता है। क्योंकि हम निश्चय जानते हैं कि मसीह के पास केवल अपने लिए कुछ नहीं है; क्योंकि जैसे वह धार्मिकता ठहराया गया है, वैसे ही वह हमारी है, जैसा पौलुस कहता है, "वह हमारे लिए धार्मिकता, और छुटकारा, और पवित्रता, और ज्ञान ठहरा।" (1 कुरिन्थियों 1:30)
अतः जब पिता ने हमारे निमित्त अपने निज पुत्र को धार्मिकता प्रदान की, तो कोई आश्चर्य नहीं कि जो उसके अधिकार में है वह हम पर भी लागू किया जाए। इसलिए जो कुछ हमने तेईसवें अध्याय में पाया वह उचित रीति से कहा गया था, क्योंकि यह विशेष रूप से मसीह का है कि वह परमेश्वर हमारी धार्मिकता है। परन्तु जब हम इस धार्मिकता के भागी होते हैं, जब वह हमें उन सब आशीषों में सहभागी कर लेता है जिनसे पिता ने उसे सुशोभित और समृद्ध किया है, तो इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यह बात सारी कलीसिया की भी है, अर्थात् यह कि परमेश्वर उसकी धार्मिकता है। इसलिए भविष्यद्वक्ता ने बुद्धिमानी से कहा है कि यह सारी कलीसिया का नाम होगा, जो सम्भव न होता यदि उसने मसीह को पहिन न लिया होता, ताकि परमेश्वर वहाँ धार्मिकता से राज्य करे; क्योंकि मसीह की धार्मिकता सब विश्वासियों तक पहुँचती है; और मसीह भी उनमें वास करता है, यहाँ तक कि वे न केवल मसीह के मन्दिर हैं, परन्तु मानो उसका एक भाग हैं; और पौलुस तो स्वयं कलीसिया को भी मसीह कहता है: वह कहता है, "जैसे मनुष्य की देह में बहुत से अंग हैं, वैसे ही मसीह भी है।" (1 कुरिन्थियों 12:12)
यह बात मसीह के व्यक्तित्व पर लागू नहीं की जा सकती, परन्तु वह इस प्रकार लक्षणा (metonymy) के द्वारा कलीसिया को ऐसा कहता है, उस सहभागिता के कारण जिसका मैंने उल्लेख किया है।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जैसे तूने उद्धारकर्ता को भेजकर यहूदियों से की हुई अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करना उचित समझा, और बीच की अलग करनेवाली दीवार को ढाकर हमें भी उसी अनमोल आशीष का सहभागी बनाने की इच्छा की,—हे प्रभु, यह वरदान दे कि हम सच्चे विश्वास से उसे ग्रहण करें, और निरन्तर उसमें बने रहें, और तुझे अपने पिता के रूप में ऐसा जानें कि तेरे पुत्र के आत्मा के द्वारा नये होकर हम अपने आप को पूर्ण रूप से तुझे अर्पित कर दें, और तेरी सेवा के लिए अपने आप को समर्पित करें, जब तक कि अन्त में जो हम में आरम्भ हुआ है वह पूरा न हो जाए, और हम उस महिमा से भर न जाएँ जिसकी ओर तेरा पुत्र, हमारा प्रभु, हमें प्रतिदिन बुलाता है।—आमीन।
एक सौ पैंतीसवाँ व्याख्यान
यिर्मयाह 33:17-18
17. यहोवा यों कहता है, दाऊद के कुल में इस्राएल के घराने की गद्दी पर विराजनेवाले सदैव बने रहेंगे;
317 तीसरे खण्ड की प्रस्तावना देखिए। — सं.
17. Quia sic dicit Jehova, non exeidetur Davidi vir qui sedeat super solium domus Israel;
18. और लेवीय याजकों के कुल में प्रतिदिन मेरे लिये होमबलि चढ़ानेवाले और अन्नबलि जलानेवाले और मेलबलि चढ़ानेवाले सदैव बने रहेंगे।
18. Et sacerdotibus Levitis non excidetur vir coram facie mea, qui aecendat holocaustum, adoleat oblationem et faciat sacrificium cunctis diebus.
भविष्यद्वक्ता कलीसिया के पुनःस्थापन के विषय में बोल चुका था; अब वह उसी सत्य की पुष्टि करता है, क्योंकि वह प्रतिज्ञा करता है कि राज्य और याजकपद सदा बने रहेंगे। जैसा भली-भाँति ज्ञात है, प्रजा की कुशल इन्हीं दो बातों पर टिकी थी; क्योंकि राजा के बिना वे एक अधूरी या अपंग देह के समान थे, और याजकपद के बिना विनाश के सिवा कुछ न था; क्योंकि याजक मानो परमेश्वर और प्रजा के बीच मध्यस्थ था, और राजा परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता था। अतः अब हम भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय समझते हैं कि वह यहाँ स्पष्ट रूप से राज्य और याजकपद के विषय में क्यों बोलता है, क्योंकि अन्यथा प्रजा के पास खड़े रहने का कोई आधार न होता। इसलिए वह घोषणा करता है कि प्रजा की दशा सुरक्षित रहेगी, क्योंकि दाऊद के वंश में से सदा कोई न कोई होगा जो उन पर शासन करने के लिए उत्तराधिकारी होगा, और लेवी के वंश में से सदा कोई न कोई होगा जो बलिदान चढ़ाए।
परन्तु इस अंश पर ध्यान से विचार करना चाहिए, क्योंकि इससे हम यह सीखते हैं कि चाहे और सब वस्तुएँ हमारी इच्छा के अनुसार हमें दे दी जाएँ, तौभी हम सदा दुःखी ही रहेंगे, जब तक मसीह हमारा सिर होकर राजा और याजक का पद न निभाए। अतः कलीसिया का एकमात्र सच्चा सुख यही है कि वह मसीह के अधीन रहे, ताकि वह हमारे प्रति यहाँ वर्णित दोनों पदों का निर्वाह करे। इससे हम यह भी सीखते हैं कि ये सच्ची कलीसिया के दो चिह्न हैं, जिनके द्वारा वह उन सब गुटों से अलग पहचानी जाए जो परमेश्वर के नाम का झूठा अंगीकार करते हैं और अपने आप को कलीसियाएँ होने का घमण्ड करते हैं। क्योंकि जहाँ मसीह का राज्य और याजकपद पाया जाता है, वहाँ निःसन्देह कलीसिया है; परन्तु जहाँ मसीह राजा और याजक के रूप में माना नहीं जाता, वहाँ गड़बड़ी के सिवा कुछ नहीं, जैसा पोपतन्त्र में है; क्योंकि यद्यपि वे मसीह के नाम का दिखावा करते हैं, तौभी जब वे न उसके शासन और व्यवस्थाओं के अधीन होते हैं, और न उसके याजकपद से सन्तुष्ट हैं, परन्तु उन्होंने अपने लिए अनगिनत संरक्षक और सहायक गढ़ लिए हैं, तो यह बिलकुल प्रकट है कि पोपतन्त्र के बड़े वैभव के होते हुए भी वह परमेश्वर के सामने घृणित वस्तु के सिवा कुछ नहीं। अतः जब हम कलीसिया की दशा और शासन के विषय में बोलें, तो आइए हम राज्य और याजकपद से आरम्भ करना सीखें।
अब हम जानते हैं कि दाऊद में एक आत्मिक राज्य की प्रतिज्ञा की गई थी, क्योंकि दाऊद मसीह के प्रतिरूप के सिवा और क्या था? अतः जब परमेश्वर ने दाऊद में अपने एकलौते पुत्र का एक जीवित प्रतिरूप दिया, तो हमें सदा सांसारिक राज्य से अनन्त राज्य की ओर, दृश्य से आत्मिक की ओर, पार्थिव से स्वर्गीय की ओर बढ़ना चाहिए। यही बात याजकपद के विषय में भी कही जानी चाहिए; क्योंकि कोई भी नाशमान मनुष्य परमेश्वर का मनुष्यों से मेल नहीं करा सकता, और न पापों का प्रायश्चित्त कर सकता है; और फिर, बैलों और बकरों का लहू परमेश्वर के क्रोध को शान्त नहीं कर सकता था, और न धूप, और न जल का छिड़काव, और न विधि-सम्बन्धी व्यवस्था की कोई भी वस्तु; वे काँपते हुए विवेकों को शान्त करने के लिए उद्धार की आशा नहीं दे सकती थीं। तब यह निष्कर्ष निकलता है कि वह याजकपद छाया-मात्र था, और लेवीय मसीह के आने तक उसका प्रतिनिधित्व करते थे।
परन्तु भविष्यद्वक्ता यहाँ अपने समय की परिस्थितियों के अनुसार बोलता है, जब वह कहता है, दाऊद से वह पुरुष नाश न किया जाएगा जो इस्राएल के घराने की गद्दी पर बैठे; और फिर, याजकों, अर्थात् लेवियों से वह पुरुष नाश न किया जाएगा जो होमबलि जलाए, अन्नबलि का धूप दे, इत्यादि। वह सामान्य रूप से सारी प्रजा के विषय में क्यों नहीं बोलता? वह यह प्रतिज्ञा क्यों नहीं करता कि बारहों गोत्र उद्धार पाएँगे? क्योंकि यह तो और भी बड़े महत्त्व की बात होती। परन्तु जैसा हम कह चुके हैं, हमें यह सिद्धान्त समझना चाहिए कि यहाँ हर प्रकार की आशीष सम्मिलित है, यहाँ तक कि जब तक मनुष्य मसीह के द्वारा शासित न हों और उसे अपना याजक न मानें, वे सदा दुःखी दशा में रहते हैं।
परन्तु यहाँ यह पूछा जा सकता है कि यह भविष्यद्वाणी घटनाओं से कैसे मेल खाती है? क्योंकि जिस समय यिर्मयाह ने ऐसी दशा की प्रतिज्ञा की, तब से दाऊद का कोई उत्तराधिकारी नहीं हुआ। यह सच है कि जरुब्बाबेल प्रजा के बीच एक अगुवा था, परन्तु उसके पास न राजकीय उपाधि थी और न राजकीय प्रतिष्ठा। जिस समय से प्रजा बाबुल की बँधुआई से लौटी, न कोई सिंहासन था, न मुकुट, न राजदण्ड; तौभी परमेश्वर ने यिर्मयाह के मुख से गवाही दी कि दाऊद के वंश में से ऐसे लोग होंगे जो निरन्तर उत्तराधिकार में प्रजा पर शासन करेंगे। वह यह नहीं कहता कि वे प्रधान या अगुवे होंगे, परन्तु वह उन्हें राजकीय उपाधि से सुशोभित करता है। वह कहता है, सिंहासन पर बैठने के लिए कोई न कोई सदा बना रहेगा। मैं कह चुका हूँ कि कोई सिंहासन नहीं रहा।
परन्तु हमें स्मरण रखना चाहिए कि यहेजकेल क्या कहता है, कि राज्य में बीच का विराम इस भविष्यद्वाणी के, अर्थात् राज्य की सदा की स्थिरता या निरन्तर उत्तराधिकार के, विरुद्ध नहीं है (यहेजकेल 21:27); क्योंकि उसने भविष्यद्वाणी की थी कि मुकुट गिरा दिया जाएगा, जब तक दाऊद का वैध उत्तराधिकारी न आए। इसलिए यह आवश्यक था कि राजमुकुट गिरकर भूमि पर डाल दिया जाए, या, जैसा भविष्यद्वक्ता कहता है, उलट दिया जाए, जब तक मसीह प्रकट न हुआ। अतः जब यह घोषित किया जा चुका था, तो अब जब हमारा भविष्यद्वक्ता दाऊद के उत्तराधिकारी राजाओं के विषय में बोलता है, तो हमें उसकी बात को इस प्रकार समझना चाहिए कि वह बात भी सत्य बनी रहे जो गिराए गए राजमुकुट के विषय में कही गई थी। अतः परमेश्वर ने राजमुकुट को तब तक गिरा दिया जब तक वैध उत्तराधिकारी न आया। यहेजकेल केवल यह नहीं कहता, "उसे उलटकर गिरा दो," परन्तु वह इन शब्दों को तीन बार दोहराता है, जिससे यह संकेत करता है कि वह विराम लम्बा होगा। इसलिए जब कोई शासन, न कोई प्रतिष्ठा, न कोई सामर्थ्य रहा, तब ठोकर खाने का कोई कारण नहीं था; क्योंकि उस राजा की बाट जोहना आवश्यक था जिसे राजमुकुट, अर्थात् राजकीय किरीट, लौटाया जाना था।
अतः अब हम देखते हैं कि दाऊद के वंश में से सदा ऐसे लोग कैसे रहे जो सिंहासन पर बैठे; यद्यपि यह छिपा हुआ था, तौभी यह अन्य भविष्यद्वाणी की गवाहियों से समझा जा सकता है। क्योंकि आमोस, जब वह मसीह के आगमन के विषय में बोलता है, यह घोषणा करता है, "उस समय एक आएगा जो दाऊद के तम्बू के खण्डहरों की मरम्मत करेगा।" (आमोस 9:11)
इसलिए यह आवश्यक था कि जब मसीह प्रकट हुआ तब राज्य मानो ढा दिया गया हो। फिर हम जानते हैं कि यशायाह क्या कहता है, "यिशै के ठूँठ में से एक डाली फूट निकलेगी।" (यशायाह 11:1) 318 "नाश किया जाना" अनुवादित क्रिया का गौण अर्थ अपनाना अधिक अच्छा है, जैसा सुरियानी अनुवाद और तर्गूम में किया गया है, अर्थात् कमी होना या घटना,— 17. क्योंकि यहोवा यों कहता है,— दाऊद के लिए कभी कमी न होगी किसी पुरुष की, जो इस्राएल के घराने के सिंहासन पर बैठे; 18. और याजकों, अर्थात् लेवियों के लिए, कभी कमी न होगी मेरे सामने किसी पुरुष की, जो होमबलि जलाए, और अन्नबलि का धूप दे, और सब दिन बलिदान चढ़ाए। — सं.
वहाँ वह दाऊद का नाम नहीं लेता, परन्तु एक साधारण व्यक्ति का, जो दीन, एकान्त और ग्रामीण जीवन से सन्तुष्ट था; क्योंकि, जैसा भली-भाँति ज्ञात है, दाऊद का पिता यिशै एक किसान और चरवाहा था। सारांश यह कि जब कभी भविष्यद्वक्ता घोषणा करते हैं कि दाऊद का राज्य सदा का होगा, तो वे यह प्रतिज्ञा नहीं करते कि बिना किसी विराम के उत्तराधिकार चलता रहेगा; परन्तु इसे उस स्थिरता से जोड़ना चाहिए जो अन्त में केवल मसीह में ही प्रकट हुई। हम अन्यत्र कह चुके हैं कि लौटने के समय को मसीह के आगमन से किस प्रकार जोड़ना चाहिए। क्योंकि ऊर्ध्वगामी रूपकार्थ (anagogical sense) को लाना न आवश्यक है और न उचित, जैसा व्याख्याकार करने के अभ्यस्त हैं, कि प्रजा के लौटने को किसी उच्चतर बात का, अर्थात् मसीह के द्वारा हुए छुटकारे का, प्रतीक बताएँ; क्योंकि इसे परमेश्वर का एक ही और वही अनुग्रह समझना चाहिए, अर्थात् यह कि वह अपनी प्रजा को बँधुआई से लौटा लाया, ताकि जब दाऊद का राज्य फिर से स्थापित हो जाए तब वे अन्त में स्थिर और ठोस सुख का भोग करें।
याजकपद के विषय में भी यही कठिनाई उठाई जा सकती है, क्योंकि हम जानते हैं कि याजकपद भ्रष्ट हो गया; वरन् अधिकांश याजक न केवल पतित हो गए, परन्तु पूरी रीति से पवित्र वस्तुओं के अपवित्र करनेवाले बन गए। इसलिए याजकीय नाम ही सब पवित्र वस्तुओं के नीच और दुष्ट अपवित्रीकरण के सिवा और कुछ न रहा। परन्तु परमेश्वर का अभिप्राय इसी रीति से यह दिखाना था कि किसी दूसरे याजक की बाट जोहनी थी, और कि मनुष्यों को आकृतियों और प्रतिरूपों पर दृष्टि नहीं लगानी थी, परन्तु अपने विचारों को और ऊँचा उठाना था, अर्थात् उसकी ओर जो परमेश्वर का मनुष्यों से मेल कराने के लिए एकमात्र सच्चा मध्यस्थ होनेवाला था।
यह कहकर कि जो होमबलि जलाए, इत्यादि, वह कुछ विशेष बातों का, अर्थात् याजक के पद के कुछ भागों का, उल्लेख करता है, क्योंकि भविष्यद्वक्ताओं ने अपने प्रवचनों को अपने युग और समय के मनुष्यों के अनुकूल बनाया, और मसीह के राज्य और याजकपद का वर्णन उन बाहरी चिह्नों के द्वारा किया जो उस समय प्रचलित थे। इसलिए उचित है कि हम व्यवस्था की विधियों को उस वास्तविकता का, अर्थात् जिसे वे सूचित करती थीं, बोधक समझें। क्योंकि मसीह ने न बछड़े चढ़ाए, न कोई धूप, परन्तु उन सब बातों को पूरा किया जो उस समय प्रजा के सामने चिह्नों के द्वारा रखी गई थीं। और वह अन्नबलि, {,}מנחהmeneche, के जलाने या धूप देने की बात कहता है, क्योंकि यद्यपि अन्नबलि पूरी की पूरी बनी रहती थी, तौभी लोबान के द्वारा धूप दिया जाता था, और मैदे का थोड़ा सा भाग जलाया जाता था। अतः यह बोलने की एक रीति है, जिसमें भाग को पूरे के स्थान पर कहा जाता है। आगे यह आता है—
यिर्मयाह 33:19-21
19. फिर यहोवा का यह वचन यिर्मयाह के पास पहुँचा,
19. Et fuit sermo Jehovae ad Jeremiam, dicendo,
20. यहोवा यों कहता है, मैंने दिन और रात के विषय में जो वाचा बाँधी है, जब तुम उसको ऐसा तोड़ सको कि दिन और रात अपने अपने समय में न हों,
20. Sic dicit Jehova, Si irritum feceritis foedus meum diei et foedus meum noctis, ut non sint dies et nox suis temporibus; 21. तब ही जो वाचा मैंने अपने दास दाऊद के संग बाँधी है टूट सकेगी, कि तेरे वंश की गद्दी पर विराजनेवाले फिर न रहें; और मेरी वह वाचा जो मैंने अपने सेवक लेवीय याजकों के संग बाँधी है, टूट जाएगी।
21. Etiam foedus meum abolebitur (hoc est, irritum fiet) cum Davide servo meo, ut non sit ei filius, qui regnet supra solium ejus et cum Levitis sacerdotibus ministris meis.
वह उसी बात की पुष्टि करता है, परन्तु एक उपमा देकर; क्योंकि वह दिखाता है कि इस्राएल की प्रजा के साथ परमेश्वर की वाचा प्रकृति के स्थिर क्रम से कम दृढ़ न होगी। सूर्य, चन्द्रमा और तारों की गति निरन्तर है; दिन और रात का एक दूसरे के बाद आना लगातार चलता है। वस्तुओं की यह स्थिर दशा इतनी अटल है कि इतनी बड़ी और इतनी अनेक प्रकार की विविधता में भी कोई परिवर्तन नहीं होता। कभी हमारे यहाँ वर्षा होती है, तो कभी खुला मौसम, और ऋतुओं में भी अनेक परिवर्तन होते हैं; परन्तु सूर्य अपना दैनिक मार्ग चलता ही रहता है, चन्द्रमा हर महीने नया होता है, और दिन और रात का चक्र, जिसे परमेश्वर ने ठहराया है, कभी नहीं रुकता; और यह अटूट क्रम, जैसा उन्नीसवें भजन में कहा गया है, परमेश्वर की अद्भुत बुद्धि का बखान करता है। अतः भविष्यद्वक्ता यहाँ प्रकृति का क्रम हमारे सामने रखता है, और कहता है कि अपनी कलीसिया के साथ परमेश्वर की वाचा उससे कम स्थिर और अपरिवर्तनीय न होगी जो जगत के शासन के सम्बन्ध में मनुष्यजाति के साथ है।
अब हम भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय समझते हैं जब वह कहता है, यदि तुम दिन और रात के विषय में मेरी वाचा को व्यर्थ कर सको, तो दाऊद और लेवियों के साथ मेरी वाचा भी मिट जाएगी। अब वह परोक्ष रूप से प्रजा की दुष्टता को छूता है; क्योंकि यहूदियों ने, जहाँ तक उनसे हो सका, अपने कुड़कुड़ाने और शिकायतों के द्वारा परमेश्वर की वाचा को उलट दिया; क्योंकि विपत्तियों में वे तुरन्त यह विचार मन में लाते और कह भी देते थे कि परमेश्वर अपनी वाचा को भूल गया है। अतः भविष्यद्वक्ता इसी अविश्वास की ओर संकेत करता है, मानो उसने कहा हो, "ये शिकायतें क्यों? यह तो ऐसा ही है मानो तुम सूर्य और चन्द्रमा को आकाश से नीचे खींच लाना चाहते हो, और दिन और रात के भेद को उलट देना, और प्रकृति के सारे क्रम को उथल-पुथल कर देना चाहते हो; क्योंकि मैं वही परमेश्वर हूँ जिसने दिन और रात का क्रम ठहराया है, और प्रतिज्ञा की है कि कलीसिया सदा बनी रहेगी: इसलिए दाऊद के साथ मेरी वाचा को तुम प्रकृति की सामान्य व्यवस्था से अधिक नहीं मिटा सकते।" अतः अब हम भविष्यद्वक्ता का उद्देश्य समझते हैं: क्योंकि यह बात बिना डाँट के नहीं कही गई; क्योंकि जब वे कलीसिया की सदा की दशा के विषय में दी गई प्रतिज्ञा के सम्बन्ध में परमेश्वर की सच्चाई और स्थिरता पर सन्देह करते थे, तब वे परमेश्वर के प्रति अति दुष्ट और कृतघ्न थे। सारांश यह कि वह संकेत करता है कि जब वे इस प्रकार परमेश्वर की वाचा पर विश्वास करने में हिचकिचाते थे, तब वे मानो अन्धे पागलपन में बहे जा रहे थे, मानो वे सारे जगत को उलट देने का प्रयत्न कर रहे हों, यहाँ तक कि उजियाले और अन्धकार में कोई भेद न रहे।
इसलिए वह कहता है, मेरे दास दाऊद के साथ मेरी वाचा मिट जाएगी, कि वह मेरा पुत्र न रहे, इत्यादि। वह उसी बात को दोहराता है जो उसने कही थी, अर्थात् यह कि ऐसा हो ही नहीं सकता कि दाऊद का वंश राज्य न पाए, और हम जानते हैं कि यह मसीह में पूरा हुआ है। जिसे उसने पहले इस्राएल के घराने का सिंहासन कहा था, उसे अब वह दाऊद का सिंहासन कहता है; परन्तु उसका अर्थ एक ही है। उसे इस्राएल के घराने का सिंहासन इसलिए कहा गया है कि राजा और प्रजा परस्पर सम्बन्ध से जुड़े हुए हैं, और इसलिए भी कि दाऊद का वंश अपने लिए नहीं, परन्तु सबकी भलाई के लिए राज्य करता था।
वह जोड़ता है, और लेवियों, अर्थात् याजकों, मेरे सेवकों के साथ। उसने दाऊद को अपना दास कहा था, अब वह लेवियों को अपने सेवक कहता है। शब्द {}שרתsheret सर्वविदित है, और मूसा लेवीय याजकपद के विषय में बोलते समय इसका प्रायः प्रयोग करता है। इसका अर्थ है सेवा करना। वह आगे कहता है—
यिर्मयाह 33:22
22. जैसा आकाश की सेना की गिनती और समुद्र की बालू के किनकों का परिमाण नहीं हो सकता है उसी प्रकार मैं अपने दास दाऊद के वंश और अपने सेवक लेवियों को बढ़ाकर अनगिनत कर दूँगा।
22. Sicut non numeratur exercitus coelorum, et non mensuratur (in futureo tempore ponuntur hoec verba, sed ira resolvi debent, sicutli non potest numerari exercitus coelorum, et non petest modum habere; {}מדדsignificat metiri; mensurare non est Latinum verbum, qualiquam cogimur uti; sicut ergo non mensuratur) arena maris; sic multiplicabo semen Davidis servi mei, et Levitarum ministrorum meorum (non dicit sicuti proximo versu, uno verbo, {,}משרתיsed dicit {,}משרתי{ }אותיhoc est, qui ministrant mihi, sed idem est sensus)
आरम्भ में एक लोप है; तुलना का निपात छोड़ दिया गया है, क्योंकि {}אשרasher को {}כאשרcaasher के अर्थ में नहीं लिया जा सकता: जैसे आकाश की सेनाएँ गिनी नहीं जा सकतीं, और न समुद्र की बालू, वैसे ही परमेश्वर प्रतिज्ञा करता है कि वह दाऊद के वंश को, और लेवियों को भी, बढ़ाएगा। यह प्रतिज्ञा, जैसी अब्राहम को दी गई थी, सारी प्रजा के समूह से सम्बन्ध रखती थी; क्योंकि जब अब्राहम को बाहर जाकर आकाश की ओर देखने की आज्ञा दी गई, तब परमेश्वर ने उससे यह प्रतिज्ञा की, "यदि तू गिन सके तो तारों को, और समुद्र की बालू को गिन; तेरा वंश ऐसा ही होगा।" इससे हम देखते हैं कि यह आशीष अब्राहम के सारे वंश तक, और विशेष करके बारह गोत्रों तक फैली हुई थी। और अब यह दाऊद के घराने और लेवीय गोत्र तक सीमित कर दी गई है।
परन्तु जिस बात का हम उल्लेख कर चुके हैं उसे स्मरण रखना चाहिए,—कि प्रजा की कुशल राज्य और याजकपद पर आधारित थी। अतः जैसे राजा अपने लिए राज्य नहीं करते थे, और न याजकीय प्रतिष्ठा लेवियों को उनके निजी लाभ के लिए दी गई थी, परन्तु प्रजा के निमित्त, वैसे ही अब भविष्यद्वक्ता भाग को पूरे के स्थान पर कहकर यह संकेत करता है कि जब राजकीय और याजकीय प्रतिष्ठा फूले-फलेगी, तब सारी प्रजा सुरक्षित और कुशल से रहेगी। अतः परमेश्वर की प्रतिज्ञा में से कुछ भी घटाया नहीं गया, मानो अन्य गोत्र बढ़नेवाले न हों; परन्तु जो गवाही यिर्मयाह दाऊद के घराने और लेवीय गोत्र के विषय में देता है, वह बिना किसी भेद के सारी कलीसिया पर लागू की जानी चाहिए। तौभी दाऊद और लेवी का विशेष उल्लेख अकारण नहीं किया गया; क्योंकि, जैसा कहा जा चुका है, सिर के बिना और मध्यस्थ के बिना कलीसिया अवश्य ही दुःखी दशा में होती।
तौभी इसमें कोई सन्देह नहीं कि यिर्मयाह ने उसी अंश की ओर संकेत किया जिसे हम पहले उद्धृत कर चुके हैं (उत्पत्ति 15:5; रोमियों 4:18), और इस प्रकार उसने प्रजा के अविश्वास को डाँटा; क्योंकि वे परमेश्वर की सच्चाई पर दोष लगाए बिना कलीसिया के पुनःस्थापन पर सन्देह नहीं कर सकते थे, मानो उसने अब्राहम से केवल व्यर्थ बातें कही हों, जब उसने कहा, "यदि तू गिन सके तो आकाश के तारों को, और समुद्र की बालू को गिन; तेरा वंश ऐसा ही होगा।"
इसलिए वह दिखाता है कि परमेश्वर उस प्रतिज्ञा में सच्चा और विश्वासयोग्य ठहरेगा, यहाँ तक कि वह अपनी कलीसिया को आकाश के तारों और समुद्र की बालू के समान बढ़ाएगा। आगे यह आता है—
यिर्मयाह 33:23-24
23. फिर यहोवा का यह वचन यिर्मयाह के पास पहुँचा,
23. Et fuit sermo Jehovae ad Jeremiam, dicendo,
24. क्या तूने नहीं देखा कि ये लोग क्या कहते हैं, कि जो दो कुल यहोवा ने चुन लिए थे उन दोनों से उसने अब हाथ उठाया है? यह कहकर कि ये मेरी प्रजा को तुच्छ जानते हैं और कि यह जाति उनकी दृष्टि में अब गिनी नहीं जाती।
24. An non vidisti quomodo populus hic loquantur? Duas familias quas elegit Jehova in ipsis, reprobavit eas (sed abundat particula {}בהםdeinde copula etiam supervacua est, nisi vertatur in adverbium temporis, nunc; nunc ergo objecit eas) et populum meum spreverunt, ut non sit amplius gens in conspectu ipsorum (hoc est, ipsorum judicio)
अब वह इसका कारण बताता है कि उसने प्रजा के छुटकारे और उसके सदा के संरक्षण के विषय में इतने विस्तार से क्यों कहा था, अर्थात् इसलिए कि परमेश्वर की प्रतिज्ञा की हुई आशीष को अविश्वासी अनिश्चित समझते थे। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर न केवल अपने भविष्यद्वक्ता को स्मरण दिलाता है कि उसने उसे एक ही बात को इतनी बार दोहराने की आज्ञा क्यों दी, परन्तु प्रजा के निमित्त भी बोलता है, ताकि वे जान लें कि यह दोहराना व्यर्थ नहीं था, क्योंकि उनकी हठीली दुष्टता के विरुद्ध संघर्ष करना आवश्यक था; क्योंकि उन्होंने अपने मनों और हृदयों को निराशा से ऐसा भर लिया था कि वे परमेश्वर की सब प्रतिज्ञाओं को ठुकराते थे, और विश्वास या आशा को कोई स्थान नहीं देते थे।
कुछ लोग इस अंश की व्याख्या कसदियों के विषय में करते हैं, जो प्रजा को बड़ी घृणा की दृष्टि से देखते थे। परन्तु यह व्याख्या फीकी और निरर्थक है। मुझे कोई सन्देह नहीं कि परमेश्वर यहाँ इस्राएलियों से विवाद करता है, क्योंकि उन्होंने छुटकारे की आशा छोड़ दी थी; क्योंकि यिर्मयाह कसदियों के विषय में यों न कहता, क्या तूने इस प्रजा को नहीं देखा? वह यिर्मयाह से विवाद करता है, क्योंकि वह नगर से हटा नहीं था। तब वह, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, दिखाता है कि उसके लिए यह आवश्यक क्यों था कि जो बात प्रजा के लौटने के विषय में पहले इतनी स्पष्टता से कही जा चुकी थी, उसकी वह बार-बार पुष्टि करे। वह कहता है, क्या तूने नहीं देखा कि यह प्रजा कैसे बोलती है? कहती है, जिन दो कुलों को यहोवा ने चुना था उन्हें वह अब त्याग देता है, अर्थात् इस्राएल के राज्य और यहूदा के राज्य को।
यह सचमुच एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी कि प्रजा दो भागों में बँट गई थी; क्योंकि उन्हें एक ही जाति होना चाहिए था। परन्तु यद्यपि दस गोत्रों के अलग हो जाने से प्रजा की देह फट गई थी, तौभी भविष्यद्वक्ता बोलने की सामान्य रीति के अनुसार कहता है कि दो कुल चुने गए थे। परमेश्वर का चुनाव तो वास्तव में भिन्न था, अर्थात् यह कि अब्राहम का वंश एक ही हो: क्योंकि जैसे सिर एक ही है, वैसे ही देह भी एक ही होनी चाहिए। परन्तु परमेश्वर ने दस गोत्रों को पूरी रीति से त्याग नहीं दिया था, यद्यपि वे दुष्टता और अधर्म से दाऊद के घराने से फिर गए थे। अतः वह प्रचलित भाषा के अनुसार कहता है कि दोनों कुल ठुकरा दिए गए थे, अर्थात् इस्राएल का राज्य और यहूदा का राज्य। अब प्रजा कहती थी कि दोनों ठुकरा दिए गए हैं, जो सच था, परन्तु उस अर्थ में नहीं जो उनका अभिप्राय था; क्योंकि, जैसा पहले कहा जा चुका है, वे सोचते थे कि कोई आशा शेष नहीं रही, मानो परमेश्वर की वाचा पूरी रीति से मिट गई हो, जबकि वह ठुकराया जाना केवल कुछ समय के लिए था।
इससे हम देखते हैं कि परमेश्वर ने प्रजा की सामान्य बोलचाल में किस बात को डाँटा, अर्थात् इसलिए कि वे दया और क्षमा की कोई आशा नहीं रखते थे; क्योंकि विस्मय से चकित होकर, जब उन्होंने देखा कि उन्हें बँधुआई में जाना है, तब उन्होंने परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं का हर विचार त्याग दिया। क्योंकि जैसे पहले उन्होंने धमकियों के विरुद्ध अपने आप को कठोर कर लिया था, वैसे ही अब निराशा ने तुरन्त उनके मनों को जकड़ लिया, यहाँ तक कि वे परमेश्वर की भलाई और दया की कोई कल्पना भी न कर सके। वह जोड़ता है कि प्रजा उनकी दृष्टि में तुच्छ थी, यहाँ तक कि वह अब कोई जाति न रही। इस प्रकार तीसरे स्थान पर वह वही सिखाता है जो हम पहले देख चुके हैं।
यिर्मयाह 33:25-26
25. यहोवा यों कहता है, यदि दिन और रात के विषय मेरी वाचा अटल न रहे, और यदि आकाश और पृथ्वी के नियम मेरे ठहराए हुए न रह जाएँ,
25. Sic dicit Jehova, Si non foedus meum diei et noctis, leges coelorum et terrae non posuero (repetendum est {}אםsi, si non posuero leges, vel, statuta, coelorum et terrae:)
26. तो मैं याकूब के वंश से हाथ उठाऊँगा, और अपने दास दाऊद के वंश से भी हाथ उठाऊँगा, और इब्राहीम, इसहाक और याकूब के वंश पर प्रभुता करने के लिये अपने दास दाऊद के वंश में से किसी को फिर न ठहराऊँगा; क्योंकि मैं उनको बँधुआई से लौटा लाऊँगा, और उन पर दया करूँगा।
26. Etiam semen Jacob et Davidis servi mei reprobabo, ut non assumam ex semine ejus qui dominetur super semine Abrahae, Isaac et Jacob; quia reducam captivitatem eorum, et miserabor eorum.
यहाँ परमेश्वर उनके हठीले कुड़कुड़ाने के सामने, जिसकी उसने शिकायत की थी, अपनी सच्चाई की स्थिरता को रखता है; और वह फिर वही उपमा प्रस्तुत करता है जो पहले दी जा चुकी थी: "यदि मैंने अपनी वाचा को स्थिर नहीं किया, या यदि दिन और रात के विषय में कोई वाचा नहीं है,—यदि आकाश और पृथ्वी के विषय में कोई नियम नहीं हैं, तो मैं अब याकूब के वंश और दाऊद के वंश को त्याग दूँगा: परन्तु यदि प्रकृति के नियमों के विषय में मेरी स्थिरता सदा प्रत्यक्ष है, तो यह कैसे है कि तुम मुझे मेरा उचित आदर नहीं देते? क्योंकि मैं वही परमेश्वर हूँ जिसने आकाश और पृथ्वी को सृजा, जिसने प्रकृति के वे सब नियम ठहराए जो अपरिवर्तनीय बने रहते हैं, और जिसने अपनी कलीसिया के साथ वाचा भी बाँधी है। यदि प्रकृति के नियमों के विषय में मेरी सच्चाई नहीं बदलती, तो वह उस पवित्र वाचा के विषय में क्यों बदले जो मैंने अपनी चुनी हुई प्रजा के साथ बाँधी है?"
अब हम इसका कारण देखते हैं कि परमेश्वर ने एक ऐसी बात की जो अपने आप में पर्याप्त स्पष्ट थी, इतनी बार पुष्टि क्यों की, अर्थात् इसलिए कि प्रजा की हठीली निराशा के साथ संघर्ष कठिन था। क्योंकि वे सोचते थे कि वे छुटकारे की किसी आशा के बिना ठुकरा दिए गए हैं, जबकि परमेश्वर उन्हें उनकी दुष्टता के कारण केवल कुछ समय के लिए दण्ड दे रहा था; क्योंकि वे अपनी बँधुआई को ऐसी समझते थे जिससे लौटना ही नहीं।
वह पहले याकूब के वंश का उल्लेख करता है, क्योंकि अब्राहम से कहा गया था, तेरे वंश के लिए, और वही प्रतिज्ञा याकूब से दोहराई गई थी। (उत्पत्ति 26:4; उत्पत्ति 28:14)
इसके बाद वह दाऊद के वंश को जोड़ता है, क्योंकि बाद में दाऊद को एक विशेष प्रतिज्ञा दी गई थी (2 शमूएल 7:12, 13)। वह कहता है, तो मैं दाऊद के वंश को भी ठुकरा दूँगा, कि अब्राहम, इसहाक और याकूब के वंश पर प्रभुता करने के लिए उसके वंश में से किसी को न लूँ: अब वह उचित रीति से उन बातों को एक साथ जोड़ता है जो असम्बद्ध प्रतीत हो सकती थीं; क्योंकि वह कहता है कि दाऊद के वंश में से सदा कोई न कोई होगा जो सब गोत्रों पर प्रभुता करे।
इसलिए परमेश्वर ने अपनी कलीसिया को इस प्रकार सुरक्षित रखा जब उसने अपनी कलीसिया पर एक राजा ठहराया; अथवा, जैसा हम कह चुके हैं, राज्य प्रजा की कुशल से अलग नहीं किया जा सकता।
अन्त में वह जोड़ता है, क्योंकि मैं उनकी बँधुआई को लौटा दूँगा। इससे प्रजा के अविश्वास का उत्तर दिया गया: क्योंकि एक आपत्ति तैयार खड़ी थी, "इसका क्या अर्थ हो सकता है? क्योंकि दस गोत्र तो पहले ही दूर-दूर के देशों में ले जाए जा चुके हैं, और तितर-बितर हो गए हैं; यहूदा के राज्य का भी एक भाग काट डाला गया है; और जो शेष है वह पूर्ण विनाश से दूर नहीं।"
इसलिए परमेश्वर उनका ध्यान छुटकारे की आशा की ओर खींचता है, मानो उसने कहा हो कि वे मूर्खता का काम कर रहे थे, क्योंकि वे इस प्रकार उतावले थे, जबकि उनकी आशा ठहराए हुए समय तक, अर्थात् सत्तर वर्षों के अन्त तक, ठहरी रहनी चाहिए थी, जैसा हम पहले देख चुके हैं जब भविष्यद्वक्ता ने उन छलियों के विरुद्ध कहा जो शीघ्र लौटने का घमण्ड करते थे। इसलिए वह उनसे कहता है कि उन्हें धीरज से अपनी बँधुआई सहनी चाहिए, जब तक उनके छुटकारे का पूरा समय न आ जाए। और वह उनके छुटकारे के सोते या कारण की ओर संकेत करता है जब वह कहता है, मैं उन पर दया करूँगा, मानो उसने कहा हो कि जिस उद्धार की उसने प्रजा से प्रतिज्ञा की वह स्वयं उसकी सेंतमेंत दया पर निर्भर था।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जैसे तू प्रतिदिन आकाश में और पृथ्वी पर हमारे सामने न केवल अपनी सामर्थ्य और बुद्धि का, परन्तु अपनी भलाई और सच्चाई का भी एक प्रत्यक्ष उदाहरण रखता है,—हे प्रभु, यह वरदान दे कि हम अपने विचारों को और भी ऊँचा, अर्थात् उस आशा तक उठाना सीखें जो हमारे लिए स्वर्ग में रखी हुई है, और कि यद्यपि हम इस संसार के अनेक परिवर्तनों से डगमगाए जाएँ, तौभी हमारी आशा तुझ में स्थिर बनी रहे, और जो कुछ भी हो, हमें पूरा निश्चय रहे कि तू ऐसी रीति से हमारा पिता होगा कि हम अन्त में उस धन्य विश्राम का भोग करेंगे, जो तेरे एकलौते पुत्र के लहू के द्वारा हमारे लिए प्राप्त किया गया है।—आमीन।
