यिर्मयाह और विलापगीत पर टीका · खण्ड 2 · विलापगीत 1

विलापगीत 1

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विलापगीत 1

विलापगीत

पहला व्याख्यान

विलापगीत 1:1

1. जो नगरी लोगों से भरपूर थी वह अब कैसी अकेली बैठी हुई है! वह क्यों एक विधवा के समान बन गई? वह जो जातियों की दृष्टि में महान और प्रान्तों में रानी थी, अब क्यों कर देनेवाली हो गई है!

1. Quomodo sedet solitaria civitas, quae abundavit populo! facta est tanquam vidua, quae magna fuit in gentibus! Quae dominataest in provinciis, redacta est ad tributum!

भविष्यद्वक्ता उस विपत्ति की भीषणता को अपने विस्मय को प्रकट किए बिना पर्याप्त रूप से व्यक्त नहीं कर सकता था। इसलिए वह ऐसे व्यक्ति का रूप धारण करता है जो कोई नई और अनपेक्षित बात देखकर आश्चर्य से भर जाता है। यह सचमुच एक अविश्वसनीय बात थी; क्योंकि वह स्थान परमेश्वर के निवास के लिए चुना गया था, और यरूशलेम नगर न केवल परमेश्वर का राजसिंहासन था, वरन् मानो पृथ्वी पर उसका पवित्रस्थान भी था, इसलिए यह समझा जा सकता था कि वह नगर हर प्रकार के संकट से मुक्त है। चूँकि यह कहा गया था, “यह युग युग के लिए मेरा विश्रामस्थान है; यहीं मैं रहूँगा” (भजन संहिता 132:14), इसलिए ऐसा प्रतीत होता था कि परमेश्वर ने उस नगर को बादलों से भी ऊपर उठा दिया है, और उसे पृथ्वी के सब उलट-फेरों से मुक्त कर दिया है। हम निश्चय जानते हैं कि संसार में कुछ भी स्थिर और निश्चित नहीं है, और बड़े से बड़े साम्राज्य भी मिट्टी में मिल गए हैं; परन्तु यरूशलेम की दशा न तो मनुष्यों की रक्षा पर, न उसके राज्य के विस्तार पर, न जनसंख्या की बहुतायत पर, और न किसी अन्य प्रकार के गढ़ों पर निर्भर थी, वरन् वह स्वर्गीय आज्ञा द्वारा, परमेश्वर की उस प्रतिज्ञा द्वारा स्थापित की गई थी जो किसी परिवर्तन के अधीन नहीं है। इसलिए जब वह नगर अपनी नींवों से उखड़कर ऐसा गिर पड़ा कि कुछ भी शेष न रहा, जब मन्दिर अपमानपूर्वक लूटा गया और फिर शत्रुओं द्वारा जला दिया गया, और इसके अतिरिक्त जब राजा बँधुआई में हाँक दिया गया, उसकी आँखों के सामने उसके पुत्र और हाकिम भी घात किए गए, और जब प्रजा इधर-उधर तितर-बितर होकर हर प्रकार के अपमान और निन्दा का पात्र बनी, तो क्या यह एक भयानक और विकराल बात नहीं थी?

इसलिए भविष्यद्वक्ता ने अकारण ही कैसी! कहकर पुकार नहीं की; क्योंकि कोई कभी सोच भी नहीं सकता था कि ऐसा कुछ होगा; और फिर, घटना हो जाने के बाद, कोई भी शान्त मन से ऐसे दृश्य को नहीं देख सकता था, क्योंकि उनके मन में असंख्य परीक्षाएँ उठी होंगी; और विशेषकर यह विचार सब के विश्वास को डगमगा देता होगा,— “परमेश्वर का अभिप्राय क्या है? यह कैसे हुआ कि उसने प्रतिज्ञा की थी कि यह नगर सदा बना रहेगा? और अब नगर का कोई चिह्न भी नहीं है, और भविष्य में पुनःस्थापना की कोई आशा भी नहीं।” इसलिए, चूँकि ऐसा अत्यन्त दुःखद दृश्य भक्त मनों को न केवल व्याकुल कर सकता था, वरन् उन्हें डगमगाकर निराशा की गहराइयों में डुबा भी सकता था, भविष्यद्वक्ता पुकार उठता है, कैसी! और फिर कहता है, जो नगरी लोगों से भरपूर थी वह कैसी अकेली बैठी है!

यहाँ वह एक तुलना के द्वारा इस घटना की अपमानजनकता को बढ़ाकर दिखाता है; क्योंकि एक ओर वह विपत्ति से पहले यरूशलेम की समृद्ध दशा का उल्लेख करता है, और दूसरी ओर वह दिखाता है कि वह स्थान मानो अन्धकार में बदल गया था। क्योंकि यह परिवर्तन, जैसा मैंने कहा है, ऐसा था मानो सूर्य आकाश से गिर पड़ा हो; क्योंकि सूर्य आकाश में उससे अधिक दृढ़ता से स्थित नहीं है जितना यरूशलेम पृथ्वी पर स्थित था, क्योंकि उसका बना रहना परमेश्वर की अनन्त सच्चाई से जुड़ा हुआ था। तब वह कहता है कि यह नगर लोगों से भरपूर था, परन्तु अब वह अकेला बैठा था। “बैठना” क्रिया इब्रानी में अच्छे और बुरे दोनों अर्थों में ली जाती है। राजाओं के विषय में कहा जाता है कि वे अपने सिंहासनों पर बैठते हैं; परन्तु बैठने का अर्थ कभी-कभी औंधे मुँह पड़े रहना भी होता है, जैसा हम पहले बहुत-से स्थानों में देख चुके हैं। तब वह कहता है कि यरूशलेम अकेला पड़ा था, क्योंकि वह उजाड़ और त्यागा हुआ था, यद्यपि पहले उसमें असंख्य लोग थे।

वह आगे कहता है, वह क्यों बन गई, इत्यादि; क्योंकि “कैसी” शब्द, {,}אכהaike, दोहराया जाना चाहिए, और दोनों उपवाक्यों पर लागू किया जाना चाहिए। तो, वह जो जातियों में महान थी, कैसी विधवा के समान बन गई है! वह कहता है कि यरूशलेम न केवल नागरिकों से भरा हुआ था, वरन् उसने अपना प्रभुत्व बहुत-सी जातियों पर फैलाया था; क्योंकि यह सुविदित है कि दाऊद और सुलैमान के अधीन बहुत-सी पड़ोसी जातियाँ उसे कर देती थीं। और इसी अभिप्राय से यह भी है जो आगे आता है, वह जो प्रान्तों में शासन करती थी, कर देनेवाली हो गई है! अर्थात् कर के अधीन हो गई है। यह वाक्यांश व्यवस्थाविवरण 28 से लिया गया है, क्योंकि भविष्यद्वक्ता उस प्रधान शिक्षक और भविष्यद्वक्ता मूसा से स्वतन्त्रतापूर्वक शब्द-प्रयोग उधार लेने के अभ्यस्त थे, जैसा हम अभी फिर देखेंगे।

अब हम भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय देखते हैं। वह यरूशलेम नगर के विनाश पर आश्चर्य करता है, और उसे एक ऐसी अद्भुत अनहोनी समझता है जिसने मनुष्यों के मनों को न केवल व्याकुल किया, वरन् एक प्रकार से उन्हें हक्का-बक्का कर दिया। और इस प्रकार बोलकर वह मानवीय दुर्बलता का कुछ अंश प्रकट करता है; क्योंकि वे हर प्रकार की संवेदना से रहित होंगे जो ऐसे शोकपूर्ण दृश्य को देखकर विस्मय से न भर जाएँ। इसलिए भविष्यद्वक्ता ने केवल अपनी भावनाओं के अनुसार ही नहीं, वरन् अन्य सब लोगों की भावनाओं के अनुसार भी बात की; और उसने मानो सब की ओर से उस विपत्ति पर विलाप किया। परन्तु आगे चलकर वह इस विस्मय का उपचार करेगा। क्योंकि जब हम इस प्रकार विपत्तियों को बढ़ा-चढ़ाकर कहते हैं, तो साथ ही अपने शोक को और तीखा कर देते हैं; और इस प्रकार ऐसा होता है कि अन्त में हम निराशा में डूब जाते हैं; और निराशा क्रोध को भड़काती है, यहाँ तक कि मनुष्य परमेश्वर के विरुद्ध चिल्लाने लगते हैं। परन्तु भविष्यद्वक्ता ने इस रीति से विलाप किया, और ऐसी रीति से विस्मित हुआ, कि उसने फिर भी अपने शोक को खुली छूट नहीं दी और न अपने विस्मय को पोसा; वरन्, जैसा हम देखेंगे, उसने अपने आप को रोके रखा, कहीं ऐसा न हो कि उसकी भावनाओं की अधिकता उसे उचित सीमाओं से बाहर ले जाए। फिर आगे लिखा है,—

483 प्राचीन अनुवादों में यह शब्द दोहराया नहीं गया है, और न ब्लेनी तथा हेण्डरसन ने इसे दोहराया है। शब्द {,{איכה का ठीक अर्थ है, “कहाँ से ऐसा?” और इसका अनुवाद “यह क्या है?” किया जा सकता है, और तब यह खण्ड अधिक प्रभावशाली होगा,— 1. यह क्या है? अकेली बैठी है वह नगरी जो लोगों से भरपूर थी! विधवा के समान है वह जो जातियों में महान थी! प्रान्तों में रानी कर के अधीन है! 2. रोते-रोते वह रात को रोती है, और उसका आँसू उसके गाल पर है! उसके सब प्रेमियों में से उसे शान्ति देनेवाला कोई नहीं! उसके सब मित्रों ने उससे विश्वासघात किया है, वे उसके शत्रु बन गए हैं! ये वे विविध बातें थीं जिन्होंने भविष्यद्वक्ता में विस्मय उत्पन्न किया।— सं.

विलापगीत 1:2

2. रात को वह फूट फूटकर रोती है, उसके आँसू गालों पर ढलकते हैं; उसके सब यारों में से अब कोई उसे शान्ति नहीं देता; उसके सब मित्रों ने उससे विश्वासघात किया, और उसके शत्रु बन गए हैं।

2. Plorando ploravit noctu, et lachrymae ejus super genas ejus, non est ei consolator ex omnibus amicis ejus, et omnes socii ejus Perfide egerunt cum ea, fuerunt illi inimici.

यिर्मयाह अब भी उसी विषय को आगे बढ़ाता है, क्योंकि ऐसी कड़वी और शोकपूर्ण बातों के विषय में वह संक्षेप में और थोड़े शब्दों में नहीं बोल सकता था; और ऐसा प्रतीत होता है कि उसने अपने देश के विनाश को गहराई से अनुभव किया। और जब हम उन लोगों के हृदयों तक पहुँचना चाहते हैं जिनका शोक हम हल्का करना चाहते हैं, तो आवश्यक है कि वे समझें कि हम उनके साथ सहानुभूति रखते हैं। क्योंकि जब कोई व्यक्ति, जो दूसरे से अधिक दृढ़ है, दूसरे के शोक को कम करना चाहता है, तो यदि उसकी कही बातें किसी निर्दय कठोरता से निकली हुई जान पड़ें तो उसकी उपेक्षा की जाएगी। इसलिए यदि यिर्मयाह मानो तिरस्कार से बोलता, तो उसे अपनी शिक्षा से किसी फल की आशा कठिनाई से ही हो सकती थी, क्योंकि यहूदी उसे सब मानवीय भावनाओं से रहित समझते। इसलिए यही कारण है कि वह प्रजा में से एक के समान नगर की विपत्ति पर विलाप करता है। फिर भी उसने अपने वर्णन किए हुए इतिहास में किसी भी प्रकार का कपट नहीं किया; परन्तु हम जानते हैं कि परमेश्वर के सेवक जब सच्चे मन से बोलते हैं, तब भी विवेक को नहीं भूलते; क्योंकि वे इस विषय में यह देखते हैं कि क्या लाभदायक है; और उनकी शिक्षा को एक प्रकार से इस रीति से नियमित किया जाना चाहिए कि वह सुननेवालों पर प्रभाव डाले।

तब वह कहता है कि यरूशलेम का रोना निरन्तर था; क्योंकि वह पहले कहता है, रोते-रोते वह रोई, और फिर, रात को; इन शब्दों से उसका अभिप्राय यह है कि उसमें कोई विराम न था। क्योंकि रात हमें विश्राम के लिए दी गई है, और परमेश्वर रात और दिन के अदल-बदल के द्वारा मनुष्यों को कुछ विश्राम देना चाहता है। इसलिए जब भविष्यद्वक्ता कहता है कि यरूशलेम रात को रोते-रोते रोई, तो वह संकेत करता है कि उसका शोक, जैसा मैंने कहा है, निरन्तर था। फिर वह आगे कहता है, उसके आँसू उसके गालों पर हैं। कुछ लोग इसका अनुवाद “जबड़े” करते हैं, परन्तु अनुचित रूप से; शब्द {,}לחיlachi, का अर्थ सचमुच जबड़ा है, परन्तु इसे गालों या गाल की हड्डियों के अर्थ में लिया जाना चाहिए। तब उसका अभिप्राय यह है कि आँसू इतनी बहुतायत से बहे कि सारा मुख भीग गया। रोते समय आँसुओं को रोकना सम्भव है; परन्तु जब वे सारे मुख पर बह निकलते हैं और गालों को ढक लेते हैं, तो यह बड़े शोक का प्रमाण है। इसलिए यही कारण है कि भविष्यद्वक्ता कहता है कि आँसू उसके गालों पर थे; क्योंकि वह दिखाना चाहता था कि आँसू बहुतायत से बहाए गए।

वह आगे कहता है, उसे कोई शान्ति देनेवाला नहीं। और इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए, क्योंकि शोक में इससे बढ़कर समयोचित और कुछ नहीं कि मित्र हमारे निकट हों जो हम पर कृपा दिखाएँ, दुःख में सहभागी हों, और जो सान्त्वनाएँ मिल सकती हैं उन्हें हम पर लागू करें।

परन्तु जब हमारी विपत्तियों में कोई हमारे साथ सहानुभूति नहीं रखता, तो हमारा शोक और भी अधिक बढ़ जाता है। इसलिए भविष्यद्वक्ता कहता है कि कोई ऐसा न था जो यरूशलेम के दुःखों को शान्त करने का प्रयत्न करता।

वह आगे कहता है, उसके सब मित्रों में से। यदि यरूशलेम सदा से त्यागा हुआ होता, तो कोई शान्ति देनेवाला न होने पर वह इसे अधिक सहजता से सह लेता। क्योंकि हम देखते हैं कि दीन-दुखी मनुष्य, जब उन पर अत्यन्त भारी विपत्तियाँ आती हैं, तो इतने कोमल और नाज़ुक नहीं होते; वे इधर-उधर इस बाट में नहीं देखते कि मित्र उनके पास आएँ; और क्यों? क्योंकि उनकी सदा से उपेक्षा होती आई है। इसलिए बड़ी से बड़ी विपत्तियों में भी, कोई ऐसा न होना जो उन पर कृपा का कोई चिह्न दिखाए, उनके लिए कोई नई बात नहीं है। परन्तु जब वे लोग, जिनके बहुत-से मित्र रहे हैं, और जो समझते थे कि वे उनकी सहायता करने को सदा तैयार रहेंगे,— जब वे अपने आप को त्यागा हुआ देखते हैं, तो उनका शोक कहीं अधिक दुःखदायी हो जाता है। इसलिए भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय यही है जब वह कहता है कि बहुत-से मित्रों में से कोई भी न था जो यरूशलेम को उसके दुःखों में शान्ति देता।

फिर भी इसमें कोई सन्देह नहीं कि उसने परोक्ष रूप से यरूशलेम को डाँटा; और {,}אהבים aebim, से उसका अभिप्राय प्रेमियों (यारों) से था, जैसा हम अन्य स्थानों में देख चुके हैं; क्योंकि वे अधर्मी सन्धियों के द्वारा अपने आप को सुरक्षित समझते थे, इसलिए भविष्यद्वक्ता कहते हैं कि वे उन वेश्याओं के समान थे जो हर स्थान पर अपने आप को बेचती हैं और अपनी कामुकता से कमाई करती हैं, और चारों ओर से प्रेमियों को लुभाती हैं। इसलिए भविष्यद्वक्ता का इस स्थान पर यहूदियों को उस दुष्टता का स्मरण दिलाना उचित था, अर्थात् यह कि उन्होंने कभी मिस्रियों को, और कभी अश्शूरियों को, एक निर्लज्ज स्त्री के समान अपनी ओर मिलाया था, जो अपने पति से सन्तुष्ट न रहकर सब ओर से प्रेमियों को खींच लाती है। जो भी हो, निस्सन्देह मित्रों से उसका अभिप्राय उन लोगों से है जिन्होंने उनके साथ वाचा बाँधी थी; और वे कौन थे? वे ही जिनके साथ यहूदियों ने परमेश्वर की उपेक्षा करके सम्बन्ध जोड़ा था; क्योंकि भविष्यद्वक्ताओं ने उन्हें पर्याप्त चेतावनी दी थी कि वे अन्यजातियों से सम्बन्ध न जोड़ें। परन्तु साथ ही यिर्मयाह यह कहकर इस बात की भयानकता को प्रकट करता है कि उसके सब मित्रों में से कोई भी यरूशलेम को शान्ति देनेवाला न था, क्योंकि उसके सब मित्रों ने विश्वासघात किया था। आगे लिखा है,—

विलापगीत 1:3

3. यहूदा दुःख और कठिन दासत्व के कारण बँधुआई में चली गई; वह अन्यजातियों में रहती है, और चैन नहीं पाती; उसके सब खदेड़नेवालों ने उसे सकेती में पकड़ लिया है।

3. Migravit (tanquam in exilium) Jehudah prae magnitudine servitutis; ipsa sedet in gentibus, (ad verbum, sedens in gentibus,) non invenit requiem, (vel, in praesenti tempore, non invenit;) omnes apprehensores ejus apprehenderunt eam inter angustias.

व्याख्याकार इसे प्रजा की बँधुआई पर लागू करते हैं, परन्तु मेरी दृष्टि में अनुचित रूप से; इसके विपरीत, भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय यह है कि यहूदी तितर-बितर हो गए थे और, जब वे अपने शत्रुओं के अत्याचार से सताए जाते थे, जैसा प्रायः होता था, तब शरणस्थान ढूँढ़ते थे; और फिर वह धीरे-धीरे उनकी बँधुआई की ओर बढ़ता है; क्योंकि वह सब बातें एक ही समय में नहीं कह सकता था। इसलिए जिस क्रम में वह बोलता है उस पर ध्यान दिया जाए: उनकी बँधुआई पर विलाप करने से पहले वह कहता है कि यहूदा तितर-बितर हो गया था; क्योंकि बहुत-से लोग शत्रुओं की क्रूरता से भागकर स्वेच्छा से परदेश चले गए। हम पहले देख चुके हैं कि बहुतों ने मोआबियों के बीच अपने आप को छिपाया; और इसमें भी कोई सन्देह नहीं कि बहुत-से मिस्र चले गए: संक्षेप में, ऐसा कोई देश न था जिसमें कुछ यहूदी शरणार्थी न हों।

इसलिए यहाँ भविष्यद्वक्ता का वास्तविक अभिप्राय यह है कि यहूदियों ने देश छोड़ दिया था, अर्थात् अपना देश छोड़कर दूसरे देशों में भाग गए थे, क्योंकि वे दुःखों और क्रूर दासत्व के अधीन कर दिए गए थे।

कुछ लोग इन शब्दों को कर्मवाच्य अर्थ में लेते हैं, अर्थात् यह कि यहूदा ने देश छोड़ा, क्योंकि उन्होंने अपने दासों पर निर्दयता से अत्याचार किया था। परन्तु मुझे सन्देह है कि किस बात ने उन्हें भटकाया: उन्होंने समझा कि यहाँ बँधुआई का अर्थ है; और फिर एक भूल दूसरी भूल को जन्म देती है; क्योंकि यह कहना बेतुका होता कि यहूदी दुःख के कारण बँधुआई में चले गए, और स्वेच्छा से चले गए; क्योंकि हम जानते हैं कि कसदियों ने उन्हें बलपूर्वक हाँककर निकाला। इसलिए वे स्वेच्छा से नहीं गए। जब ये दोनों बातें एक साथ नहीं जोड़ी जा सकीं, तो उन्होंने समझा कि यहाँ यहूदियों की उस क्रूरता का उल्लेख है जो उन्होंने अपने ही भाइयों पर की थी। परन्तु जिस देश-त्याग की भविष्यद्वक्ता बात करता है, उसे, जैसा मैंने कहा है, अनुचित रूप से बँधुआई पर लागू किया जाता है; इसके विपरीत, उसका अभिप्राय उन लोगों से है जो संसार के विभिन्न भागों में चले गए थे, क्योंकि यह उनके अपने देश की दशा की अपेक्षा अधिक सहनीय था। और इससे हम सीखते हैं कि कसदियों ने उन्हें कितनी कठोरता से सताया था, क्योंकि वे स्वेच्छा से भाग गए थे, यद्यपि, जैसा हम जानते हैं, परदेशवास कठिन होता है। इसलिए हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि वह एक बर्बर और हिंसक अत्याचार था, क्योंकि भविष्यद्वक्ता कहता है कि यहूदी इस प्रकार अपनी इच्छा से परदेश चले गए, और मिस्र में, या मोआब देश में, या अन्य पड़ोसी जातियों के बीच छिपने के स्थान ढूँढ़े।

इसके बाद वह एक और विपत्ति जोड़ता है, कि उन्होंने कभी चैन नहीं पाया; और अन्त में, कि उनके शत्रुओं ने उन्हें सकेती में पकड़ लिया था, यहाँ तक कि बच निकलना सम्भव न था। प्रजा के लिए परदेश में रहना एक दुःखद दशा रही होगी; क्योंकि हम जानते हैं कि ऐसा अनिश्चित जीवन मृत्यु से बहुत कम भिन्न होता है; और ऐसी कोई पड़ोसी जाति न थी जो यहूदियों से घृणा न करती हो। इसलिए जब वे ऐसे लोगों के पास भागे, तो यह कोई छोटी विपत्ति न थी। परन्तु जब उन्हें कहीं भी शान्त निवास न मिला, तो अपमान और भी बड़ा था, और यही वह बात है जिसका भविष्यद्वक्ता अब उल्लेख करता है। परन्तु जब हम भागते हैं और काँपते हुए इधर-उधर मुड़ते हैं, तो शत्रुओं के हाथ में पड़ जाना, और जब हम मानो दो दीवारों के बीच, या किसी सँकरे मार्ग में, जैसा कुछ लोग इस शब्द की व्याख्या करते हैं, घिरे हों, तब उनके द्वारा पकड़ा जाना, सबसे बड़ी विपत्तियों में से एक है। आगे लिखा है,—

विलापगीत 1:4

4. सिय्योन के मार्ग विलाप कर रहे हैं, क्योंकि नियत पर्वों में कोई नहीं आता; उसके सब फाटक सुनसान पड़े हैं, उसके याजक कराहते हैं; उसकी कुमारियाँ शोकित हैं, और वह आप कड़वाहट में है।

4. Viae Sion lugentes a non venientibus (ad verbum; quia non sint qui veniant) ad solennitatem; omnes portae ejus solitariae (vastatae, {);}שוממיןsacerdotes ejus plorantes, virgines ejus afflictae, et ipsa amaritudo ei (hoc est, ipsa in amaritudine, ut vertit Hieronymus

यिर्मयाह यहाँ शोक के एक और कारण का उल्लेख करता है, कि परमेश्वर की उपासना रुक गई थी, क्योंकि वह बाधित हो गई थी; वरन् ऐसा प्रतीत होता था कि वह सदा के लिए मिट गई है।

तब वह कहता है कि सिय्योन के मार्ग विलाप करते थे, क्योंकि पर्वों में कोई नहीं आता था।

ये शब्द आलंकारिक हैं, क्योंकि हम जानते हैं कि भावनाएँ मार्गों की नहीं होतीं; परन्तु भविष्यद्वक्ता निर्जीव वस्तु पर भावना का आरोप करता है। और इस प्रकार का मानवीकरण इससे अधिक प्रभावशाली है कि वह प्रजा को विलाप करते हुए प्रस्तुत करता। परन्तु जब यहूदियों ने देखा कि परमेश्वर की उपासना गिर गई है, तो यह उनके लिए बाल-बच्चों या पत्नियों से वंचित हो जाने, या अपनी सारी सम्पत्ति लुट जाने से भी अधिक दुःखदायी था; क्योंकि परमेश्वर की उपासना उनके लिए जितनी अधिक बहुमूल्य थी, और धर्म को, जिसमें उनके प्राणों का अनन्त उद्धार निहित था, जितना अधिक महत्त्व दिया जाता था, उतना ही अधिक कठोर और शोकपूर्ण यह देखना था कि कलीसिया ऐसी तितर-बितर हो गई कि परमेश्वर की उपासना और उससे प्रार्थना फिर न की जा सके।

484 ब्लेनी और हॉर्सली इस मत से सहमत हैं; परन्तु गैटेकर, हेनरी और हेण्डरसन पहले वाला मत लेते हैं, अर्थात् यह कि यहूदा उस अत्याचार के कारण, जो वे करते थे, और उस बढ़े हुए दासत्व के कारण, जो वे दूसरों से करवाते थे, बँधुआई में गया, विशेषकर उस दासत्व या गुलामी के कारण जिसके अधीन दास रखे जाते थे, जैसा यिर्मयाह 34 में लिखा है। जो बात इस मत की पुष्टि करती है वह शब्द “यहूदा” है, जो अधिकांश लोगों का बोध कराता है, और इसलिए उन तुलनात्मक रूप से थोड़े लोगों पर लागू नहीं किया जा सकता जो स्वेच्छा से देश छोड़कर गए। 3. अत्याचार के कारण और बहुत दासत्व के कारण यहूदा देश से निकाला गया है; वह जातियों के बीच रहती है और चैन नहीं पाती; उसके सब पीछा करनेवालों ने उसे सकेती में पकड़ लिया। तर्गुम “अत्याचार” की व्याख्या अनाथों और विधवाओं का उल्लेख करके करता है, और “दासत्व” की व्याख्या उस बात की ओर संकेत करके करता है जिसके अधीन दास रखे जाते थे, जैसा यिर्मयाह 34 में वर्णित है। ये वे पाप थे जिनके कारण यहूदियों को बार-बार देश-निकाले की धमकी दी गई थी। “सतानेवाले” के स्थान पर “पीछा करनेवाले” ठीक है; और “सकेती में (या, सकेती के बीच) पकड़ा जाना,” जैसा लाउथ कहता है, शिकारियों से लिया गया रूपक है, जो शिकार को सँकरे स्थानों में खदेड़ते हैं, जहाँ से बच निकलने का कोई मार्ग नहीं होता। हूबिगां प्रस्ताव करता है कि “अत्याचार और दासत्व” को पहले के शब्दों से नहीं, वरन् बाद के शब्दों से जोड़ा जाए,— यहूदा देश से निकाला गया है; अत्याचार के कारण और बहुत दासत्व के कारण वह जातियों के बीच रहती है और चैन नहीं पाती।— सं.

यह सच है कि परमेश्वर की उपासना विधियों से बँधी हुई न थी; क्योंकि दानिय्येल ने प्रार्थना करना कभी नहीं छोड़ा, और अपनी बँधुआई में उसकी प्रार्थना उतनी ही सुनी गई जितनी तब सुनी जाती जब वह बड़ी धूमधाम से मन्दिर में भेंट चढ़ाने के लिए बलिदानों में आता। यह निस्सन्देह सत्य है; परन्तु चूँकि परमेश्वर ने धर्म के इन कर्तव्यों और विधियों को व्यर्थ ठहराया न था, इसलिए भविष्यद्वक्ता उस वस्तु को उसके चिह्नों के द्वारा प्रस्तुत करता है। इसलिए, चूँकि पर्व परमेश्वर के अनुग्रह की गवाहियाँ थे, यह ऐसा ही था मानो एक झण्डा खड़ा करके यहूदियों को एकत्र बुलाया जाता हो, और मानो परमेश्वर उनके बीच प्रकट होता हो। इसलिए भविष्यद्वक्ता इन बाहरी चिह्नों का उल्लेख करके दिखाता है कि परमेश्वर की उपासना एक प्रकार से समाप्त हो गई थी।

उसके फाटक अकेले, या उजाड़ पड़े हैं; उसके याजक शोक में हैं, उसकी कुमारियाँ दुःख में हैं; वह कड़वाहट में है। अब यह खण्ड हमें स्मरण दिलाता है कि जब परमेश्वर अपनी कलीसिया को दुःख देता है, तो चाहे निर्दोष मनुष्यों को घात होते, अन्धाधुन्ध लहू बहते, और स्त्री-पुरुष दोनों को बिना भेदभाव के मारे जाते देखना कितना भी दुःखदायी हो; और चाहे घरों को लुटते और उजड़ते, खेतों को उजाड़ होते, और सब बातों को गड़बड़ी में देखना एक दुःखद दृश्य हो, तौभी जब इन सब बातों की तुलना परमेश्वर की उपासना के मिट जाने से की जाती है, तो यह खण्ड हमें स्मरण दिलाता है कि ये सब बातें हमें हल्की जान पड़नी चाहिए। यद्यपि दाऊद ने अपनी दशा पर बहुत विलाप किया, क्योंकि वह मन्दिर से निर्वासित था और पहले की नाईं वहाँ सभा की अगुवाई नहीं करता था, जब कि परमेश्वर के पवित्रस्थान से केवल वही निकाला गया था; तौभी जब स्वयं पवित्रस्थान वेदी समेत नष्ट कर दिया गया, जब न बलिदान रहे, न धन्यवाद, न स्तुति; संक्षेप में, न प्रार्थना, तब यह निश्चय ही कहीं अधिक कड़वा था।

इसलिए भविष्यद्वक्ता के इस विलाप पर ध्यानपूर्वक विचार किया जाना चाहिए, जब वह कहता है कि सिय्योन के मार्ग विलाप करते थे, कि कोई पर्वों में ऊपर न जाता था। जो आगे है उसे मैं छोड़ देता हूँ; जब हम इस वर्णन के अन्त की ओर बढ़ेंगे, तब मैं इन बातों पर अधिक विस्तार से ठहरूँगा।

विलापगीत 1:5

5. उसके द्रोही प्रधान हो गए, उसके शत्रु उन्नति कर रहे हैं, क्योंकि यहोवा ने उसके बहुत-से अपराधों के कारण उसे दुःख दिया है; उसके बाल-बच्चों को शत्रु बँधुआई में ले गए।

5. Fuerunt inimici ejus in caput; hostes ejus feliciter egerunt (fuerunt in pace, {);}שלוquia Jehova afflixit eam super magnitude scelerum, ejus; parvuli ejus (शत्रु।) Profecti sunt in exilium coram adversario.

पहले वह कहता है कि उसके शत्रु सिर बन गए थे; और इस अभिव्यक्ति से उसका अभिप्राय निस्सन्देह सामर्थ्य से है; और यह बोलने की रीति उसने मूसा से उधार ली, क्योंकि उसके शब्द ये हैं, “तू पूँछ नहीं, वरन् सिर ही ठहरेगा; ऊँचे स्थान पर, न कि अप्रसिद्ध।” (व्यवस्थाविवरण 28:13)

485 इस पूरे पद में कृदन्तों का प्रयोग किया गया है, जो वस्तुओं की वर्तमान दशा को प्रकट करते हैं,— सिय्योन के मार्ग विलाप कर रहे हैं, क्योंकि पर्वों में कोई नहीं आ रहा; उसके सब फाटक उजाड़ कर दिए गए हैं, उसके याजक कराह रहे हैं; उसकी कुमारियाँ दुःखित हैं, और वह, कड़वाहट उसी की है।— सं.

तब वह कहता है कि शत्रु सिर थे, अर्थात् उन पर शासन करते थे। और इसका विपरीत भी समझा जाना चाहिए, अर्थात् यह कि वे पूँछ बन गए थे, यानी मानो अपने शत्रुओं के पाँवों तले थे। और वह कहता है कि उसके शत्रु सफल हुए, क्योंकि यहोवा ने उसे दुःख दिया था। यहाँ वह सामान्य रीति के अनुसार विलाप करता है, जैसा अधर्मी मनुष्य किया करते हैं; परन्तु वह अपने विलाप में शिक्षा मिलाता है, और दिखाता है कि ऐसी उथल-पुथल और गड़बड़ी की दशा में परमेश्वर एक धर्मी न्यायी के रूप में प्रकट हुआ। तब उसने उन्हें परमेश्वर के हाथ पर विचार करने के लिए वापस बुलाया, जब उसने कहा कि उसके शत्रु सफल हुए, क्योंकि परमेश्वर ने उसे दुःख दिया था। जेरोम इन शब्दों का अनुवाद करता है, “क्योंकि यहोवा ने कहा है।” वह इस क्रिया को {,}הגהege, से निकालता है, जिसका अर्थ है बोलना या मनन करना। परन्तु यह एक स्पष्ट भूल है, जैसी एक और भूल हम इसी अध्याय में अभी पाएँगे। इसमें कोई सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता संकेत करता है कि सब विपत्तियों का कारण यह था कि परमेश्वर ने उसे दुःख दिया था, अर्थात् उसकी अधर्मताओं, या उसके पापों की अधिकता के कारण। तो अब वह यह दिखाना आरम्भ करता है कि यहूदियों के शोक और निराशा में डूब जाने का कोई कारण नहीं है, यदि वे केवल यह विचार करें कि उनकी विपत्तियाँ कहाँ से आईं। इस प्रकार वह उनका ध्यान परमेश्वर के न्याय की ओर खींचना आरम्भ करता है। यह सचमुच अपने आप में पर्याप्त न होता; परन्तु बाद में वह सान्त्वना का एक फलदायी स्रोत बताता है।

परन्तु हम इन बातों को उनके उचित क्रम में वर्णित होते देखेंगे।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि, जैसे आज के दिन तेरी कलीसिया की कुरूपता हम सब का साहस तोड़ देने के लिए पर्याप्त है, वैसे ही हम तेरे हाथ की ओर देखना सीखें, और जानें कि हमें हमारे पापों का प्रतिफल दिया जा रहा है; और हम इसमें सन्देह न करें कि यदि हम तेरी दया की शरण में भागें, तो तू हमारे घाव को चंगा करने के लिए हमारा वैद्य होगा; और तू हमें अपनी भलाई और पितृतुल्य चिन्ता के निश्चय में ऐसा स्थिर रख कि हम घोर विपत्तियों में भी तेरे एकलौते पुत्र के नाम से तुझे पुकारने में न हिचकें, जब तक कि हम अनुभव से यह न जान लें कि जो लोग तेरी प्रतिज्ञाओं पर भरोसा रखकर, घोर विपत्तियों में, और स्वयं मृत्यु में भी, धीरज से केवल तुझी से उपाय की बाट जोहते हैं, उनकी प्रार्थनाएँ कभी व्यर्थ नहीं होतीं।— आमीन।

दूसरा व्याख्यान

कल हमने उस खण्ड की व्याख्या आरम्भ की थी जहाँ भविष्यद्वक्ता कहता है कि यरूशलेम के शत्रु सिर बन गए थे और सफल हुए थे। यह एक ऐसी परीक्षा थी जिसने विश्वासियों के मनों पर भारी आक्रमण किया होगा, जब उन्होंने अपने शत्रुओं को, जैसा लोग सामान्यतः कहते हैं, भाग्य को मानो अपनी मुट्ठी में रखे हुए देखा; क्योंकि ऐसा प्रतीत होता था मानो परमेश्वर उन पर कृपालु हो। इसलिए भविष्यद्वक्ता कारण बताता है, कहीं ऐसा न हो कि विश्वासी धर्म और परमेश्वर के भय से फिर जाएँ, और कहता है कि यह सब परमेश्वर के न्यायपूर्ण पलटे से हुआ, क्योंकि उसका उद्देश्य अपनी ही कलीसिया को दुःख देना था; और वह केवल इतना ही नहीं कहता, वरन् यह भी जोड़ता है, उसके अधर्मों की अधिकता के कारण। क्योंकि अधर्मी मनुष्य कभी-कभी मान लेते हैं कि उनका सम्बन्ध परमेश्वर से है, परन्तु फिर भी वे कुड़कुड़ाते हैं और परमेश्वर को अन्यायी और क्रूर समझते हैं। इसलिए भविष्यद्वक्ता ने यहूदियों को केवल यही नहीं सिखाया कि जो विपत्तियाँ हुई थीं उनका कर्ता परमेश्वर था, वरन् साथ ही उन्हें स्मरण दिलाया कि वे ऐसे प्रतिफल के योग्य थे, केवल इसलिए नहीं कि उन्होंने अपराध किया था, वरन् इसलिए कि उन्होंने पापों पर पाप बढ़ाए थे; क्योंकि अधर्मों की अधिकता से उसका यही अभिप्राय है।

परन्तु वह अभी इस वाक्य को दोहराएगा और उस पर विस्तार करेगा: इसलिए अभी उसका उद्देश्य बता देना पर्याप्त है। तो, जैसा वह कहता है, इसी कारण से उसके बाल-बच्चे द्रोही के सामने बँधुआई में चले गए।

यह सचमुच एक ऐसा अपमान था जो विश्वासियों के मनों को कड़वा कर देने योग्य था, कि वे न केवल अपने जवानों को, वरन् दूधपीते बच्चों को भी ऐसी क्रूरता से सताए जाते देखें। क्योंकि मनुष्य सदा यह सोचते हैं कि उनके पास परमेश्वर से विवाद करने का कोई न्यायसंगत कारण है, और विशेषकर जब बच्चों का मामला सामने लाया जाता है; तब कौन यह कहने को तैयार न होगा कि परमेश्वर का पलटा अपनी उचित सीमाओं से बढ़ जाता है? वे कहते हैं, “यदि उसका उद्देश्य मनुष्यों को उनकी दुष्टता का दण्ड देना है, तो वह निर्दोषों के विषय में अपने क्रोध को क्यों नहीं रोकता? क्योंकि बेचारे बच्चों ने क्या पाप किया है?” परन्तु भविष्यद्वक्ता यहाँ ऐसी धृष्टता को रोकता है, और कहता है कि परमेश्वर के पास अपने पलटे को बाल-बच्चों तक भी पहुँचाने के न्यायसंगत कारण थे। अब आगे लिखा है,—

विलापगीत 1:6

6. और सिय्योन की पुत्री का सारा प्रताप जाता रहा है। उसके हाकिम ऐसे हरिणों के समान हो गए हैं जो कुछ चराई नहीं पाते; और वे खदेड़नेवाले के सामने से बलहीन होकर चले गए हैं।

6. Et egressus est a filia Sion omnis decor ejus; fuerunt principes ejus tanquam cervi qui non inveniunt pascuum: et profecti sunt abaque Virtute coram persequutore.

वह उसी विषय को आगे बढ़ाता है। वह यहाँ कहता है कि सिय्योन की पुत्री अपने सब आभूषणों से रहित कर दी गई। अब हम जानते हैं कि उस प्रजा का सम्मान या प्रतिष्ठा क्या थी; क्योंकि मूसा परमेश्वर के अनुग्रह की महानता को प्रकट करने के लिए पुकार उठता है, “आकाश के नीचे कौन-सी जाति ऐसी प्रतिष्ठित है!” (व्यवस्थाविवरण 4:7)

इसलिए, चूँकि परमेश्वर के अनोखे वरदान उस प्रजा को दिए गए थे, यह एक अत्यन्त दुःखद दृश्य था कि वह नगर, जिसके पास कभी सर्वोच्च महिमा थी, अपने सारे सम्मान से वंचित और लज्जा से ढका हुआ देखा जाए, जैसा हम आगे देखेंगे। तब वह कहता है कि सिय्योन की पुत्री से उसकी सारी महिमा छीन ली गई।

अब यरूशलेम नगर को प्राप्त सम्मान या महिमा के सब प्रकारों को गिनाने की आवश्यकता नहीं है। परन्तु पहले यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर ने वहाँ अपने लिए एक निवासस्थान चुना था; और फिर वहाँ एक याजकीय राज्य था,— प्रजा परमेश्वर के लिए पवित्र थी,— वे उसका निज भाग थे,— वहाँ परमेश्वर ने अपनी वाचा रखी थी,— वह सब यहूदियों को अपनी सन्तान मानता था, और उसकी इच्छा थी कि वे बदले में उसे अपना पिता मानें। इसलिए, चूँकि वे इतने अधिक और ऐसे श्रेष्ठ आभूषणों से धनी किए गए थे, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि भविष्यद्वक्ता ने नगर की उस दशा पर विलाप किया जब वह अपनी सारी महिमा से वंचित कर दिया गया।

तब वह आगे कहता है कि उसके हाकिम भूखे हरिणों के समान थे; क्योंकि हरिण, जो स्वभाव से ही फुर्तीले होते हैं, जब अभाव से दबाए जाते हैं तो ऐसे दौड़ते हैं मानो उड़ रहे हों। इसलिए, चूँकि उस पशु की फुर्ती इतनी बड़ी है, भविष्यद्वक्ता कहता है कि हाकिम, जो इतनी गम्भीरता से चलने और बड़े अधिकार का रूप धारण करने के अभ्यस्त थे, भूख से पीड़ित हरिणों के समान फुर्तीले हो गए थे; क्योंकि वे भी हर वस्तु के अभाव से पीड़ित थे। वह आगे कहता है कि अन्त में वे चले गए, अर्थात् अपने पीछा करनेवालों के सामने से बलहीन होकर भाग गए। इन शब्दों से वह संकेत करता है कि उन्होंने अपने शत्रुओं से लड़ने का साहस नहीं किया, वरन् वे इतने भयभीत थे कि भाग गए, और इस प्रकार प्रमाणित किया कि वे पूरी रीति से हताश और निर्जीव हो गए थे। आगे लिखा है,—

486 5. उसके सतानेवाले सिर बन गए हैं, उसके शत्रु सफल हुए हैं; क्योंकि यहोवा ने उसके अपराधों की बहुतायत के कारण उसे दुःख दिया है; उसके बाल-बच्चे सतानेवाले के सामने बँधुआई में चले गए हैं। शब्द {{צר का अर्थ “विरोधी” नहीं, वरन् सतानेवाला है, अर्थात् वह जो दूसरे को सकेती में डालता और उस पर अत्याचार करता है।— सं.

विलापगीत 1:7

7. यरूशलेम ने अपने दुःख और संकट के दिनों में, जब उसके लोग शत्रु के हाथ में पड़े और उसका कोई सहायक न रहा, अपनी सब मनभावनी वस्तुओं को जो प्राचीनकाल से उसकी थीं स्मरण किया; द्रोहियों ने उसे देखा, और उसके विश्रामदिनों का ठट्ठा किया।

7. Recordata est Jerusalem diebus afflictionis suae et penuriae suae, omnium desiderabilium suorum quae fuerunt a diebus antiquis, cum caderet populus ejus in manu hostis et nullus auxiliator ei: viderunt hostes, subsannarunt (vel, riserunt) super sabbatio (vel, cessatione) ejus.

वह पिछले पद की पुष्टि करता है जब वह कहता है कि यरूशलेम ने अपनी मनभावनी वस्तुओं को तब स्मरण किया जब वह परमेश्वर के हाथ से दुःखित की गई, और घोर अभाव की दशा में पहुँचा दी गई।

और इन शब्दों से वह संकेत करता है कि जब यरूशलेम अपने वैभव में था, तब उसने परमेश्वर की आशीषों पर पर्याप्त विचार नहीं किया; क्योंकि परमेश्वर का तिरस्कार करनेवाले उसकी उदारता से जो कुछ भी बहता है उससे अपने आप को ठूँस-ठूँसकर भर लेते हैं, फिर भी उसे स्वीकार नहीं करते; क्योंकि कृतघ्नता एक अथाह गड्ढे के समान है जो परमेश्वर की आशीषों की सारी परिपूर्णता को निगल जाती है। तब भविष्यद्वक्ता संकेत करता है कि जब यरूशलेम धन और सब वस्तुओं की बहुतायत में फल-फूल रहा था, जब वह अनोखे वरदानों से सुशोभित था, तब वह मानो मतवाला हो गया, और उसने उन उपकारों पर, जो परमेश्वर ने उस पर किए थे, कभी वैसा विचार नहीं किया जैसा उसे करना चाहिए था। और अब, जब वह अभाव की दशा में पहुँचा दिया गया और घोर दुःखों से घिर गया, तब उसने अपनी मनभावनी वस्तुओं को, अर्थात् पहले बताई गई महिमा को, स्मरण किया; क्योंकि मनभावनी वस्तुओं से उसका अभिप्राय उन वरदानों से है जिनमें यरूशलेम तब तक श्रेष्ठ रहा जब तक परमेश्वर ने अपने आप को उसके प्रति एक उदार पिता के रूप में प्रकट किया।

मुझे आश्चर्य है कि सब ने यह अनुवाद कैसे दिया है, “यरूशलेम ने उन दिनों को स्मरण किया,” इत्यादि।

कुछ लोग इस खण्ड की ठीक व्याख्या करते हैं, परन्तु सब एक गलत अनुवाद देने में सहमत हैं। परन्तु अर्थ पर्याप्त रूप से स्पष्ट है, यरूशलेम ने अपने दुःख और अपने अभाव के दिनों में, या अपने कराहने के, या अपने देश-निकाले के दिनों में, अपनी मनभावनी वस्तुओं को स्मरण किया; क्योंकि कुछ लोग इस शब्द को {,}רודrud, से निकालते हैं, जिसका अर्थ है शिकायत करना, या एक स्थान से दूसरे स्थान को जाना।

इसलिए वे इसका अनुवाद “देश-निकाला” या प्रवास करते हैं। परन्तु दूसरे इसका अनुवाद “शिकायत” करते हैं। फिर अन्य लोग इसे {,}מרדmered, से निकालते हैं, जिसका अर्थ कभी-कभी घट जाना होता है, और इसका अनुवाद “अभाव” या दरिद्रता करते हैं। कुछ लोगों ने इसका अनुवाद “अधर्म” क्यों किया है, मैं नहीं जानता, और ऐसे अनुवाद का कोई कारण नहीं है। मैं “शिकायत” को स्वीकार नहीं करता; देश-निकाला या अभाव सबसे उपयुक्त शब्द है।

दुःख के दिनों को वह और अधिक स्पष्टता से व्यक्त करता है जब वह कहता है, जब प्रजा शत्रु के हाथ में पड़ी, और कोई सहायक न था। अब हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता का क्या अभिप्राय है, अर्थात् यह कि जब परमेश्वर ने यरूशलेम को दुःख दिया, तब वह मानो अपनी मूर्च्छा से जगाया गया। क्योंकि जैसे मतवाले लोग तृप्त होने के बाद अपनी अति में ऐसे सो जाते हैं कि उन्हें कुछ भी ज्ञात नहीं होता और कुछ भी अनुभव नहीं होता, वरन् वे अधमरे-से जान पड़ते हैं; वैसे ही समृद्धि ने यरूशलेम को बहुत समय तक मतवाला बनाए रखा; परन्तु अन्त में जागकर उसने जाना कि वह कहाँ से गिरा है। इसलिए जब तक वह सम्मान के अपने ऊँचे स्थान पर खड़ा रहा, तब तक उसने अपने प्रति परमेश्वर की कृपालुता पर विचार नहीं किया; परन्तु जब वह अपनी सब आशीषों से वंचित किया गया, और गहरे दुःख में पड़ा, तब उसने अपनी मनभावनी वस्तुओं को स्मरण किया, अर्थात् अन्त में वह यह समझने लगा कि उसने क्या खो दिया है, क्योंकि वह परमेश्वर के अनुग्रह से गिर गया था।

487 यहाँ विचार कुछ भिन्न है: हाकिमों की तुलना उन हरिणों से की गई है जो अकाल से घटकर दुर्बल हो गए थे, यहाँ तक कि उनके शत्रु उन्हें पालतू पशुओं के झुण्ड के समान हाँक ले गए।— सं.

488 यहाँ अनुवाद और तर्गुम स्पष्ट रूप से गलत हैं, और एक-दूसरे से मेल नहीं खाते। इसके सिवा कोई अर्थ नहीं बनता कि {{ב को “दिनों” ,{`` }ימי से पहले समझा हुआ माना जाए। आलोचकों में केवल .{}מרוד के अर्थ के विषय में मतभेद है। इसका कोई भिन्न पाठ नहीं है। सेप्टुआजिंट ने इसका अनुवाद “ठुकराए जाने— {ἀπωσμῶν}” किया है, वल्गेट ने “विश्वासघात,” और सुरियानी ने “दण्ड।” पार्कहर्स्ट और ब्लेनी इसे ,{}ירד, उतरना, नीचे आना, से निकालते हैं। इसका अर्थ वे पतन या अपमान हैं जिनके अधीन यरूशलेम किया गया था, और विलापगीत 3:19 में भी इसका यही अर्थ है। “उसके दुःख और उसके अपमान के दिनों में।”— सं.

इससे हम एक उपयोगी शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं; क्योंकि जो बात भविष्यद्वक्ता यरूशलेम के विषय में बताता है, वह लगभग सारी मानवजाति में देखी जाती है; परन्तु हमें चौकस रहना चाहिए कि यह हमारे विषय में सच न हो। क्योंकि परमेश्वर ने अब तक हमारे साथ न केवल सामान्य रीति से उदारता का व्यवहार किया है, वरन् उसे यह भी भाया है कि वह हम पर पिता से भी बढ़कर अनुग्रह के प्रमाण दिखाए; उसने हमें अविश्वासियों से अलग किया है, और हम पर अपनी बहुत-सी आशीषें उण्डेली हैं।

इसलिए अब हम चौकस रहें कि जब परमेश्वर हमारे साथ उदारता का व्यवहार करता है तब हम जड़बुद्धि न हो जाएँ; वरन्, इसके विपरीत, आओ हम परमेश्वर की आशीषों का मूल्य समझना सीखें, और उस उद्देश्य पर विचार करें जिसके लिए वे हमें दी गई हैं; नहीं तो जो बात यहाँ यरूशलेम के विषय में कही गई है वह हम पर भी घटेगी; क्योंकि बहुत देर से जागकर हम जानेंगे कि जब परमेश्वर ने अपने आप को हमारे लिए पिता के रूप में प्रकट किया, तब हम धन्य थे। यही बात हम पहले मनुष्य आदम के उदाहरण में देखते हैं; क्योंकि यद्यपि परमेश्वर ने उसे उत्तम वरदानों से सुशोभित किया था, तौभी अपने भाग से सन्तुष्ट न रहकर उसने अपने आप को उचित सीमाओं से बाहर ऊँचा उठाना चाहा; जब वह गिर पड़ा और घोर अभाव की दशा में पहुँचा दिया गया, तब वह जानने लगा कि वह पहले क्या था, और अपने पतन के द्वारा क्या बन गया था। (उत्पत्ति 1:26, 27; 3:6, 7) परन्तु चूँकि भविष्यद्वक्ता की यह गवाही विशेष रूप से कलीसिया पर लागू होती है, इसलिए हम जान लें कि यरूशलेम के उदाहरण के द्वारा हमें चेतावनी दी गई है, ताकि जब परमेश्वर हम पर अपनी उदारता प्रकट करे, तब उसके वरदानों का वैसा ही मूल्य समझा जाए जिसके वे योग्य हैं, कहीं ऐसा न हो कि बहुत देर हो जाने पर हम अन्त में यह मानने लगें कि हमारी पिछली दशा कितनी मनभावनी थी। तो, संक्षेप में, यिर्मयाह यहाँ प्रजा की उस जड़ता को डाँटता है, जिसके कारण वे तब तक न जान पाए कि उनकी दशा कितनी मनभावनी थी जब तक वे अपनी सब आशीषों से वंचित और लूटे न गए। वह यह भी कहता है, प्राचीनकाल से। इन शब्दों से वह सम्भवतः यह संकेत करता है कि परमेश्वर की कृपा का क्रम निरन्तर बना रहा था; क्योंकि परमेश्वर उस प्रजा पर थोड़े समय के लिए ही उदार न रहा था, वरन् उसने उन पर लगातार और निरन्तर अनुग्रह किए थे।

जब उसके लोग गिरे, इत्यादि। यह और भी भारी दुर्दशा थी, क्योंकि वे इतने लम्बे समय तक फलते-फूलते रहे थे। आगे कहा गया है, उसके शत्रुओं ने उसे देखा, उन्होंने उसके सब्त पर, अर्थात् उसके विराम पर, हँसी उड़ाई, और यह अर्थ मुझे अप्रिय नहीं। परन्तु जो इसका अनुवाद "अवकाश" या आलस्य करते हैं, वे भविष्यद्वक्ता के अर्थ को या तो बिगाड़ देते हैं या बहुत धुँधला कर देते हैं। "विराम" शब्द में व्यंग्य है, क्योंकि शत्रु केवल विराम पर ही नहीं हँसे, वरन् उन्होंने ठट्ठे में ऐसा किया, क्योंकि उन्होंने इस अवसर का लाभ उठाकर उन्हें उनके धर्म के कारण ताने दिए। हम जानते हैं कि यहूदियों के सब्त से अन्यजाति सदा घृणा करते थे; और इस कारण उन्हें बहुत-सी निन्दाएँ सहनी पड़ती थीं; क्योंकि वे निन्दा के रूप में यहूदियों को "सब्तवादी" कहते थे। और जब वे व्यवस्था के अधीन परमेश्वर की सारी उपासना को अपमानपूर्वक बदनाम करना चाहते थे, तो उसे "सब्त" कहकर पुकारते थे। अतः इसमें कोई सन्देह नहीं कि अन्यजाति यहूदियों को इसलिए निन्दापूर्वक ताने देते थे कि वे सब्त मानते थे: "देखो, अब परमेश्वर की उपासना करने का समय है।" और हम यह भी देखते हैं कि परमेश्वर ने भी इसी प्रकार यहूदियों को उलाहना देकर कहा, "देश अपने विश्रामकालों को मानता रहेगा।" (लैव्यव्यवस्था 26:43)

क्योंकि जब यहूदियों को (जब कोई शत्रु उन्हें सताता न था) परमेश्वर की उपासना करने का अवसर और अवकाश था, तब उन्होंने तिरस्कारपूर्वक सब्तों को अपवित्र किया था।

अतः जब परमेश्वर की उपासना की उन्होंने ऐसी लज्जाजनक उपेक्षा की थी, तो परमेश्वर ने कहा, "तुम्हारे स्थान पर देश स्वयं सब्त मानेगा;" किस प्रकार? न तो उसमें हल चलाया जाएगा, न वह फल उत्पन्न करेगा। (लैव्यव्यवस्था 26:34, 35) उस विराम को परमेश्वर ने सब्त कहा, परन्तु बिना ताने के नहीं; क्योंकि उसने यहूदियों को सब्तों का उल्लंघन करने के कारण तीखी डाँट दी, जैसा कि यिर्मयाह ने भी किया था। (यिर्मयाह 17:22, 27)

इसलिए मुझे यह सम्भव प्रतीत होता है कि शत्रुओं ने यहूदियों पर यह ताना कसा कि अब तो उन्हें एक लम्बा और निरन्तर सब्त मिल गया है, जबकि नगर उजाड़ पड़ा था और उसमें कोई निवास नहीं करता था। क्योंकि यह कहना फीका और निरर्थक होता कि शत्रु उसके विराम पर हँसे। यदि भविष्यद्वक्ता का उद्देश्य परमेश्वर की उपासना के विषय में शत्रुओं की निन्दा को दिखाना होता, तो वह निःसन्देह कोई दूसरा शब्द प्रयोग करता। अतः शत्रुओं ने उसका विराम देखा और उस पर हँसे; परन्तु इस विराम को वे निन्दा के रूप में "सब्तवादी" कहते थे। आगे लिखा है,—

विलापगीत 1:8

8. यरूशलेम ने बड़ा पाप किया है; इसलिए वह हटा दी गई है: जितने उसका आदर करते थे वे सब उसका तिरस्कार करते हैं, क्योंकि उन्होंने उसकी नंगाई देखी है: हाँ, वह कराहती है, और पीछे की ओर मुड़ जाती है।

8. Peccatum peccavit Jerusalem (hoc est, scelerate egit;) proterea in migrationem (vel, commotionem) facta est (hoc est, Reddita fuit instabilis;) omnes qui honore eam persequebantur, spreverunt eam, quia viderunt turpitudinem (vel, foeditatem) ejus; etiam ipsa gemens, et conversa est retrorsum.

यहाँ भविष्यद्वक्ता उस बात को अधिक स्पष्टता और बल के साथ व्यक्त करता है जिसका उल्लेख उसने संक्षेप में किया था, अर्थात् यह कि यहूदियों ने जो भी विपत्ति भोगी वह सब परमेश्वर के प्रतिशोध से निकली थी, और वे ऐसे दण्ड के योग्य थे, क्योंकि उन्होंने हल्का-सा अपराध नहीं किया था, वरन् अपने लिए भयानक न्याय का ढेर लगा लिया था, क्योंकि उन्होंने हर प्रकार से अपने आप को अभक्ति के हाथ सौंप दिया था। जो कहा गया है उसका सार यही है। इससे हम सीखते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने यह गीत अपने देश की विपत्ति पर उस रीति से विलाप करने के लिए नहीं रचा जैसे अन्यजाति किया करते थे। अन्यजातीय विलाप का एक उदाहरण हमें वर्जिल में मिलता है:—"वह महान दिन और दार्दानिया का अटल समय आ पहुँचा है: हम ट्रॉयवासी थे; इलियम था, और ट्यूक्रियनों की महान महिमा थी: क्रूर जुपिटर ने सब कुछ आर्गोस को सौंप दिया है: जले हुए नगर में दानाई राज्य करते हैं।"

489 इस पद में चार पंक्तियाँ हैं, जबकि शेष सब में केवल तीन हैं; परन्तु यह मानने का कोई आधार नहीं कि यह बाद में जोड़ी गई है, जैसा कि कुछ लोगों ने सोचा है; क्योंकि यह हर इब्रानी प्रति में और अनुवादों में तथा तर्गुम में पाई जाती है। अन्तिम शब्द का अनुवाद सेप्टुआजिंट में "निवास" है, या अलेक्ज़ेंड्रियाई प्रति के अनुसार "देश-निकाला;" वल्गेट में "सब्त;" और सीरियाई में "शोक।" यह शब्द कहीं भी सब्त के अर्थ में नहीं मिलता। यह या तो {,{שבה "बन्दी बनाकर ले जाना" से है, जैसा पार्कहर्स्ट का विचार है, और इसका अर्थ है बँधुआई, देश-निकाला; या ,{}שבת "रुकना, अन्त को पहुँचना" से, ब्लेनी और हेंडरसन के अनुसार, और इसका अनुवाद "समाप्ति," अर्थात् एक जाति या राज्य के रूप में, या "विनाश" किया जा सकता है। परन्तु पहला अर्थ, जो सेप्टुआजिंट से मेल खाता है, अधिक उचित है,— जब गिरे उसके लोग, और उसका कोई सहायक न था, देखा उसे सतानेवालों ने, वे उसकी बँधुआई पर हँसे। — सं.

490 "Venit summa dies et ineluctabile tempus Dardaniae: fuimus Troes; fuit Ilium et ingens Gloria Teucrorum: ferus omnia Jupiter Argos Transtulit: incensa Danai dominantur in urbe." वर्जिल, AEn. 2.

वह इसी भाव को दूसरे शब्दों में भी दोहराता है:—"हे जन्मभूमि! हे इलियम, देवताओं के धाम! और युद्ध में विख्यात दार्दानियों की शहरपनाह! क्रूर जुपिटर ने सब कुछ आर्गोस को सौंप दिया है।"

इस प्रकार वह ट्रॉय के विनाश पर शोक करता है; परन्तु वह परमेश्वर की क्रूरता की शिकायत करता है, और उसे क्रूर जुपिटर कहता है, क्योंकि वह स्वयं क्रोध से भरा था, और फिर भी बोलनेवाला अपोलो का याजक पैन्थियस था। इससे हम देखते हैं कि अविश्वासी लोग, जब अपनी विपत्तियों पर विलाप करते हैं, तब परमेश्वर के विरुद्ध निन्दा उगलते हैं, क्योंकि शोक उन्हें चिढ़ा देता है। भविष्यद्वक्ता की शिकायत अधर्मियों की शिकायत से बहुत भिन्न है; क्योंकि जब वह अपने लोगों के दुःखों पर विलाप करता है, तब साथ ही यह भी जोड़ता है कि परमेश्वर धर्मी प्रतिशोध लेनेवाला है। अतः वह परमेश्वर पर क्रूरता या अत्यधिक कठोरता का दोष नहीं लगाता, वरन् लोगों को स्मरण दिलाता है कि वे परमेश्वर के सामने अपने आप को दीन करें और मान लें कि वे अपनी सब विपत्तियों के न्यायपूर्वक योग्य थे।

अविश्वासी लोग कभी-कभी कुछ ऐसे शब्द अवश्य मिला देते हैं जिनसे वे परमेश्वर की महिमा करते प्रतीत होते हैं; परन्तु वे क्षणिक होते हैं, क्योंकि वे शीघ्र ही अपनी हठधर्मिता की ओर लौट जाते हैं। वे कभी-कभी संयमित होते हैं, "यदि तू किसी विनती से मन फिराता है।" उस दशा में वे परमेश्वर से वाद-विवाद करते हैं, मानो वह अपने दासों की प्रार्थनाओं के प्रति बहरा हो। अन्त में वे खुली निन्दा में फूट पड़ते हैं,—"देवताओं को यह अच्छा लगा कि एशिया के राज्य को और प्रियम की निर्दोष जाति को उलट दें।"—

जिस जाति का नाश किया गया था उसे वे ऐसे दण्ड के अयोग्य समझते थे; उन्होंने उसे निर्दोष जाति कहा। अब, हम समझ लेते हैं कि अविश्वासियों और परमेश्वर की सन्तानों में क्या अन्तर है। क्योंकि विपत्तियों में शोक करना सब में साधारण है; परन्तु अविश्वासियों के शोक का अन्त हठधर्मिता है, जो अन्त में क्रोधोन्माद में फूट पड़ती है, जब वे अपनी विपत्तियों को अनुभव करते हैं, और इस बीच वे परमेश्वर के सामने अपने आप को दीन नहीं करते। परन्तु विश्वासी अपने शोक में अपने आप को कठोर नहीं करते, वरन् अपने आप पर विचार करते हैं और अपने जीवन को जाँचते हैं, और स्वेच्छा से परमेश्वर के सामने दण्डवत् करते हैं, और दण्ड की आज्ञा के अधीन मन से हो जाते हैं, और मान लेते हैं कि परमेश्वर न्यायी है।

इससे अब हम देखते हैं कि हमें कलीसिया की विपत्ति पर किस प्रकार विलाप करना चाहिए, अर्थात् हमें इस सिद्धान्त की ओर लौटना है कि परमेश्वर न्यायी प्रतिशोध लेनेवाला है, और वह केवल साधारण अपराधों का ही नहीं, वरन् सबसे बड़े पापों का दण्ड देता है, और जब वह हमें चरम संकट तक पहुँचा देता है, तब वह हमारे पापों की बड़ाई के कारण ऐसा करता है, जैसा कि दानिय्येल ने भी अंगीकार किया। क्योंकि उसने थोड़े शब्दों में यह घोषित नहीं किया कि लोग देश-निकाले के और उस दण्ड के योग्य थे जिसे उन्होंने भोगा; वरन् उसने शब्दों का ढेर लगा दिया, "हम लोगों ने पाप किया है, अभक्ति की है, दुष्टता की है, हम अपराधी हुए हैं।" (दानिय्येल 9:5)

और भविष्यद्वक्ता इस गणना के बिना सन्तुष्ट न हुआ, क्योंकि उसने देखा कि लोगों की अभक्ति कितनी बड़ी थी, और उनकी हठ कितनी पागलपन भरी थी, कुछ वर्षों तक नहीं, वरन् उस लम्बे समय तक, जिसके बीच भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा उन्हें चेतावनी दी गई थी, और फिर भी उन्होंने मन नहीं फिराया, वरन् सदा बुरे से बुरे होते गए। अतः यहाँ अपनाई गई वर्णन-शैली ऐसी ही है।

491 "O patria! O divum domus Ilium! Et inclyta bello Moenia Dardanidum! Ferus omnia Jupiter Argos Transtulit." — वर्जिल, AEn. 2. 492 "Postquam res Asiae, Priamique everterre gentem Immeritam visum Superis." — वर्जिल, AEn. 3.

वह कहता है कि वह डाँवाँडोल कर दी गई, अर्थात् वह अपने देश से हटा दी गई। ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ उस विश्राम के, जिसकी प्रतिज्ञा यहूदियों से की गई थी, और भटकते, आवारा देश-निकाले के बीच एक विरोध निहित है; क्योंकि, जैसा हम देख चुके हैं, यहूदी न केवल निर्वासित किए गए थे, वरन् उनका कहीं भी शान्त निवास न था; वह तो डाँवाँडोल दशा ही थी। साथ ही इसे व्यवस्था के शाप से भी जोड़ा जा सकता है, क्योंकि वे डाँवाँडोल होने के लिए ठहराए गए थे—क्योंकि अविश्वासी भी उन पर सिर हिलाते थे। परन्तु {,}נידהnide शब्द को ठीक-ठीक उनके देश-निकाले पर लागू किया जाना चाहिए, जब यहूदी अस्थिर और आवारा हो गए। आगे कहा गया है कि उन सब ने जो पहले उसे मान देते और उसका आदर करते थे, उसका तिरस्कार किया और उसके साथ निन्दापूर्ण व्यवहार किया। इस बात ने भी उसकी विपत्ति की कठोरता को थोड़ा नहीं बढ़ाया; उसके मित्रों ने, जिनके द्वारा वह पहले मूल्यवान समझी जाती और आदर पाती थी, उसे त्याग दिया था।

इसका कारण बताया गया है, क्योंकि उन्होंने उसकी नंगाई देखी। परन्तु इस शब्द का ठीक अर्थ कलंक या अपमान है। अन्त में यह जोड़ा गया है कि वह कराहती भी थी और पीछे की ओर मुड़ गई; अर्थात् वह शोक से ऐसी दबी हुई थी कि किसी उपचार की आशा न रही; क्योंकि पीछे की ओर मुड़ने का अर्थ वही है जो पुनःस्थापना की सारी आशा से वंचित हो जाना। अब आगे लिखा है,—

विलापगीत 1:9

9. उसकी मलिनता उसके आँचल में है; वह अपने अन्त को स्मरण नहीं करती; इसलिए वह आश्चर्यजनक रीति से नीचे गिरी: उसको कोई शान्ति देनेवाला न था। हे यहोवा, मेरे दुःख पर दृष्टि कर: क्योंकि शत्रु ने अपने आप को बड़ा किया है।

9. Ignominia ejus in fimbriis ejus, non est recordata finis sui; et descendit mirabiliter, nemo consolator ei; vide, Jehova, afflic tionem meam, quia magnifice se effert hostis (ad verbum, magnificatus est hostis.)

जैसा मैं समझता हूँ, वह यहाँ उसी विषय को आगे बढ़ाता है; उसने पिछले पद के अन्त में कहा था कि यरूशलेम में कलंक या नीचता देखी गई है; और अब वह कहता है कि वह उसके छोरों या आँचल तक पर थी। ऐसा प्रतीत होता है कि भविष्यद्वक्ता ऋतुमती स्त्रियों की ओर संकेत करता है, जो अपनी अशुद्धता को जहाँ तक हो सके छिपाती हैं; परन्तु ऐसा करना व्यर्थ है, क्योंकि प्रकृति को अपनी गति से चलना ही है। संक्षेप में, भविष्यद्वक्ता संकेत करता है कि यहूदी किसी साधारण मात्रा में नहीं वरन् अत्यधिक मलिन हो गए थे, और ऐसे दुःखित थे कि उनकी अशुद्धता उनके आँचल पर प्रकट हो गई। भविष्यद्वक्ता का यही अर्थ प्रतीत होता है। व्याख्याकार सोचते हैं कि यिर्मयाह लोगों के पापों के विषय में बोलता है, परन्तु वे भूल करते हैं; क्योंकि मुझे सन्देह नहीं कि यहाँ संकेत उनके दण्ड की ओर है। वे कहते हैं कि मलिनता आँचल पर थी, क्योंकि लोगों ने निर्लज्जता से अपने आप को हर प्रकार की दुष्टता के हाथ बेच दिया था, और कि उन्होंने अपने अन्त को स्मरण नहीं किया, क्योंकि वे पूरी रीति से मूर्ख बन गए थे, उसके अनुसार जो मूसा के गीत में कहा गया है, "भला होता कि ये बुद्धिमान होते, और अपने अन्त का विचार करते!" (व्यवस्थाविवरण 32:29)

परन्तु यदि कोई भविष्यद्वक्ता के उद्देश्य पर भली-भाँति विचार करे, तो वह तुरन्त मुझसे सहमत होगा कि वह दोष के विषय में नहीं, वरन् इसके विपरीत दण्ड के विषय में बोलता है।

493 सेप्टुआजिंट में "डाँवाँडोलपन;" वल्गेट में "instable" (अस्थिर); तर्गुम में "आवारा," या भटकनेवाली; और सीरियाई में "भय।" क्रिया का अर्थ है हटाना; और यहाँ संकेत स्पष्ट रूप से देश-निकाले की ओर है, न कि अशुद्धता की ओर, जैसा कुछ लोग इसे लेते हैं, क्योंकि यह संज्ञा कभी-कभी इस अर्थ में ली जाती है, क्योंकि अशुद्धता के कारण व्यक्तियों को समाज से अलग कर दिया जाता था। — सं.

494 "पीछे मुड़ना" या पीछे की ओर फिरना, एक ऐसा मुहावरा है जिसे कुछ लोग लज्जा का सूचक मानते हैं, क्योंकि जो लज्जा अनुभव करते हैं वे लोगों की दृष्टि से हट जाते और अपने आप को छिपा लेते हैं। — सं. 495 "वह अपने दण्ड की बड़ाई में अपने पापों के चिह्न लिए हुए है," यह लोथ की टिप्पणी है, जो इस विचार का समर्थन करती प्रतीत होती है। — सं.

अतः भविष्यद्वक्ता कहता है कि यहूदियों की निन्दा उनके आँचल पर थी, क्योंकि वे अपनी लज्जा को छिपा न सके। क्योंकि लज्जा प्रायः मनुष्यों से उनकी विपत्तियों को छिपवाती और चुपचाप सहन करवाती है, क्योंकि वे अपने आप को शत्रुओं के ठट्ठे के लिए खोलना नहीं चाहते। परन्तु भविष्यद्वक्ता कहता है कि लोगों के दुःख छिपे नहीं रह सकते थे, वरन् वे सब पर प्रकट हो गए, जैसा उन स्त्रियों के साथ होता है जो स्राव से ग्रस्त हैं—वह उनके वस्त्रों के छोरों तक निकल आता है।

और जब वह कहता है कि वह अपने अन्त को स्मरण नहीं करती थी, तो मैं इसका यह अर्थ समझता हूँ कि यहूदी निराशा से ऐसे दब गए थे कि उन्होंने अपने विचारों को परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं की ओर नहीं उठाया; क्योंकि यह सान्त्वना का कोई साधारण स्रोत नहीं, और साधारण बुद्धि भी हमें यही सिखाती है, कि चरम विपत्तियों में साँस लें, और अपने विचारों को आगे तक फैलाएँ, क्योंकि दुःख सदा हमें नहीं दबाए रहेगा—कोई न कोई भला परिवर्तन होगा। अतः जैसे मनुष्य विपत्तियों में इस प्रकार अपने आप को सँभाले रखते हैं, वह कहता है कि यहूदियों ने अपने अन्त को स्मरण नहीं किया; अर्थात् वे अपने शोक से ऐसे बावले हो गए कि सुन्न पड़ गए, और भविष्य के विषय में कोई आशा न रखी।

संक्षेप में, इन शब्दों से वह चरम निराशा को सूचित करता है; क्योंकि यहूदी ऐसे सुन्न हो गए थे कि वे अपने मनों को किसी आशा की ओर उठा न सके।

और इसका कारण बताया गया है, क्योंकि वे आश्चर्यजनक रीति से नीचे गिरे थे, अर्थात् क्योंकि वे असाधारण रीति से गिराए गए थे। यहाँ क्रियाविशेषण के स्थान पर संज्ञा रखी गई है, और वह भी पुल्लिंग में, {}צפלאיםpelaim; कभी-कभी हमें {,}פלאותpelaut मिलता है, परन्तु उसी अर्थ में। अतः वह कहता है कि यहूदी मानो चमत्कारिक रीति से डूब गए थे; परन्तु चमत्कार से उसका अर्थ एक अद्भुत अनर्थ है, शब्द बुरे अर्थ में लिया गया है; तब यरूशलेम चमत्कारिक रीति से नीचे गिरा है। इसका परिणाम यह हुआ कि वह अपने दुःखों के नीचे दब गया, यहाँ तक कि वह अपने विचारों को किसी आशा की ओर न मोड़ सका, न किसी दूसरे अन्त की कल्पना कर सका; वरन् अपने दुःखों में सुन्न हो गया, जैसे मनुष्य प्रायः हताश हो जाते हैं जब वे सोचते हैं कि उनके लिए कोई छुटकारा नहीं। वह उसी बात को दोहराता है जो उसने पहले कही थी, कि कोई शान्ति देनेवाला न था।

इन बातों पर सावधानी से ध्यान देना चाहिए, क्योंकि शैतान आज के दिन हमें निराशा में ले जाने के लिए विभिन्न उपाय काम में लाता है। हमें परमेश्वर के अनुग्रह पर सारे भरोसे से फेरने के लिए वह हमारे सामने चरम विपत्तियाँ रखता है। और जब शोक हमारे मनों को ऐसा जकड़ लेता है कि अनुग्रह की आशा चमकती नहीं, तब उस असीम शोक से अधीरता उत्पन्न होती है, जो हमें पागलपन तक धकेल सकती है। इसी से ऐसा होता है कि हम कुड़कुड़ाते हैं, और फिर परमेश्वर के विरुद्ध चिल्लाते हैं। अतः जैसे आज के दिन शैतान हमारे मनों को सताने के लिए सामग्री जुटाता है, ताकि हम अपने दुःखों के नीचे दब जाएँ, वैसे ही हम स्मरण रखें कि भविष्यद्वक्ता क्या कहता है, कि यरूशलेम, जो उस समय संसार में परमेश्वर की एकमात्र सच्ची कलीसिया थी, इतनी अधिक और इतनी बड़ी विपत्तियों से दब गई थी कि उसने अपने अन्त को स्मरण नहीं किया। निश्चय ही इसे बाहरी परिस्थितियों के विषय में समझना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर ने निःसन्देह भक्तों के मनों को सँभाले रखा, और उनके शोक को सदा ऐसा हल्का किया कि वे अपने अन्त की ओर ध्यान रखते रहे। परन्तु जब भविष्यद्वक्ता कहता है कि यहूदियों ने अपने अन्त को स्मरण नहीं किया, तो संकेत सामान्य रूप से लोगों की ओर, और बातों के बाहरी रूप की ओर भी है।

अब वह उन्हें प्रार्थना करने के लिए उत्साहित करता है, और उन्हें शब्द सुझाता है, क्योंकि वह सब की ओर से बोलता है: हे यहोवा, मेरे दुःख पर दृष्टि कर, क्योंकि शत्रु ने अपने आप को बहुत ऊँचा उठाया है। यद्यपि भविष्यद्वक्ता यहाँ कलीसिया का प्रतिनिधित्व करता है, तौभी निःसन्देह वह अपने पद के कर्तव्यों के अनुसार उन्हें अच्छी आशा रखने के लिए उपदेश देता है, और प्रार्थना करने के लिए उत्साहित करता है, क्योंकि सच्ची और हार्दिक प्रार्थना विश्वास के बिना नहीं की जा सकती; क्योंकि जब परमेश्वर के अनुग्रह का स्वाद खो जाता है, तब यह सम्भव नहीं कि हम मन से प्रार्थना कर सकें; और केवल प्रतिज्ञाओं के द्वारा ही हम परमेश्वर की पितृतुल्य भलाई का स्वाद पा सकते हैं। अतः इसमें कोई सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता यहाँ यहूदियों से निश्चित छुटकारे की प्रतिज्ञा करता है, यदि वे परमेश्वर की ओर फिरें, और विश्वास करें और पूरी रीति से निश्चय रखें कि वह उनका छुड़ानेवाला होगा।

अब, हम देखते हैं कि शिक्षा देने की सही रीति क्या है, अर्थात् यह कि मनुष्यों को दीन किया जाए, और उनके सामने उनका न्यायोचित दण्ड रखा जाए, और उन्हें आशा रखने के लिए उत्साहित भी किया जाए, और उनकी ओर हाथ बढ़ाया जाए, ताकि वे परमेश्वर से प्रार्थना करें, और चरम विपत्तियों में उससे सहायता की न केवल आशा रखने में वरन् उसे माँगने में भी संकोच न करें। भविष्यद्वक्ता ने यही क्रम अपनाया है; हमें विपत्तियों में सदा अपने आप तक उतर आना, और अपना दोष मान लेना सीखना चाहिए; और फिर जब हम गहरे डूब जाएँ, तब हमें विश्वास के द्वारा अपने मनों को ऊपर उठाना सीखना चाहिए, ताकि वहाँ से वह प्रार्थना उठे जिसके द्वारा हमारा उद्धार प्राप्त होना है।

एक बात मुझसे छूट गई है; भविष्यद्वक्ता, अनुग्रह प्राप्त करने के लिए, कहता है कि शत्रुओं ने अपने आप को बहुत ऊँचा उठाया था। और यह विशेष ध्यान देने योग्य है; क्योंकि जो बात हमें निराशा का कारण प्रतीत होती है, उसे इसके विपरीत हमें अच्छी आशा रखने के लिए उत्साहित करना चाहिए, अर्थात् जब शत्रु ढीठ होते हैं और बड़े अहंकार से चलते और हमारा अपमान करते हैं। अतः जितना अधिक उनका घमण्ड हो और जितना कम वह सहने योग्य हो, उतने ही अधिक भरोसे से हम परमेश्वर को पुकार सकते हैं, क्योंकि पवित्र आत्मा ने हमें यह सत्य व्यर्थ नहीं सिखाया कि परमेश्वर हम पर कृपालु होगा जब शत्रु इस प्रकार अपने आप को बहुत ऊँचा उठाते हैं, अर्थात् जब वे सीमा से बाहर घमण्डी हो जाते हैं, और हर प्रकार के तिरस्कार में बेलगाम हो जाते हैं। आगे लिखा है,—

विलापगीत 1:10

10. द्रोही ने उसकी सब मनभावनी वस्तुओं पर अपना हाथ बढ़ाया है: क्योंकि उसने देखा है कि अन्यजाति उसके पवित्रस्थान में घुस आए, जिनके विषय में तू ने आज्ञा दी थी कि वे तेरी मण्डली में प्रवेश न करें।

10. Manum suam extendit hostis ad omnia desiderabilia ejus; quia vidit gentes quum ingresse sunt sanctuarium ipsius, de quibus praeceperas, ne ingrederentur in congregationem tibi (hoc est, quae tibi sacrata est.)

भविष्यद्वक्ता फिर से सब पवित्र वस्तुओं के अपवित्र किए जाने पर विलाप करता है; और यह शिकायत, जैसा मैंने कहा है, अत्यन्त कड़वे शोक से निकली थी; क्योंकि यद्यपि विश्वासियों के लिए अपनी सारी सम्पत्ति खो देना, देश-निकाले में भटकना और सब वस्तुओं का अभाव सहना दुःखद बात थी, तौभी मन्दिर को अशुद्ध होते, और सारे धर्म को लज्जा के लिए खुला पड़ा देखना उनके लिए इससे भी अधिक कष्टदायक रहा होगा। अतः भविष्यद्वक्ता इस विपत्ति पर फिर विलाप करता है, जब वह कहता है कि शत्रुओं ने सब मनभावनी वस्तुओं के विरुद्ध अपना हाथ बढ़ाया था। अब, मनभावनी वस्तुओं से उसका अर्थ धन नहीं, न कोई ऐसी वस्तु जो पार्थिव और नश्वर जीवन की दशा से सम्बन्ध रखती हो, वरन् वे अमूल्य निधियाँ जिन्हें परमेश्वर ने चुने हुए लोगों के पास धरोहर के रूप में रखा था। अतः शत्रु ने वेदी के विरुद्ध, मेज़ के विरुद्ध, वाचा के सन्दूक के विरुद्ध, सब पवित्र पात्रों के विरुद्ध अपना हाथ बढ़ाया था।

फिर यह अपमान और बढ़ गया, क्योंकि यरूशलेम ने अन्यजातियों को उसके पवित्रस्थान में प्रवेश करते देखा; क्योंकि सर्वनाम स्त्रीलिंग में है। परन्तु यरूशलेम का पवित्रस्थान परमेश्वर का मन्दिर था; क्योंकि यद्यपि ठीक-ठीक कहें तो वह केवल परमेश्वर का पवित्रस्थान था, तौभी साथ ही वह लोगों का भी पवित्रस्थान था, क्योंकि परमेश्वर ने मन्दिर को अपने लाभ के लिए नहीं, वरन् अपने लोगों के लाभ के लिए बनवाया था। अतः जो कुछ परमेश्वर ने अपने लिए पवित्र ठहराया था, उसे उचित ही लोगों का पवित्रस्थान कहा गया है। वह अपमान को और भी बढ़ाता है, क्योंकि परमेश्वर ने अन्यजातियों को पवित्रस्थान में प्रवेश करने से मना किया था; परन्तु वे बलपूर्वक वहाँ घुस आए थे। तौभी वे परमेश्वर की उपासना करने के लिए भीतर नहीं गए, क्योंकि उसकी आज्ञा थी कि उन्हें पवित्र सभा से दूर रखा जाए; वरन् वे मन्दिर को अपवित्र करने के लिए, और परमेश्वर की सारी उपासना को मिटा देने के लिए, और धर्म को हर प्रकार के ठट्ठे के लिए खुला छोड़ देने के लिए बलपूर्वक घुसे थे।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, ऐसा अनुग्रह कर कि जैसे आज के दिन हम तेरी कलीसिया को दयनीय रीति से पीड़ित देखते हैं, वैसे ही हम अपनी आँखों को इस प्रकार लगाएँ कि अपने ही पापों को देखें, और तेरे सिंहासन के सामने अपने आप को ऐसा दीन करें कि फिर भी आशा रखना न छोड़ें, और मृत्यु के बीच जीवन की बाट जोहें; और यह भरोसा हमारा मुँह खोले, कि हम हियाव के साथ तेरे नाम को पुकारने में लगे रहें, हमारे प्रभु मसीह के द्वारा।—आमीन।

तीसरा व्याख्यान

विलापगीत 1:11

11. उसके सब लोग कराहते हैं, वे रोटी ढूँढ़ते हैं; उन्होंने प्राण बचाने के लिए अपनी मनभावनी वस्तुएँ भोजन के बदले दे दी हैं: हे यहोवा, दृष्टि कर, और ध्यान दे; क्योंकि मैं तुच्छ हो गई हूँ।

11. Totus populus ejus gementes, quae rentes panem, diderunt desiderabilia sua (hoc est, quicquid habebant pretiosum) Pro cibo ad revocandum animan: vide, Jehova, et aspice, quia facta sum vilis (aut, contempta.)

भविष्यद्वक्ता यहाँ शिकायत करता है कि यरूशलेम के सब नागरिक अभाव और अकाल के कारण निरन्तर कराह रहे थे। पहले वह कहता है कि सब कराह रहे थे। शब्द समूहवाचक है, और इसलिए वह बहुवचन का प्रयोग करता है, {,}נאנחיםץnanechim।

फिर वह कहता है कि वे सब कराह रहे थे; परन्तु वह इसका कारण भी बताता है, क्योंकि वे रोटी ढूँढ़ रहे थे। रोटी ढूँढ़ना तो सब में साधारण है; परन्तु इस शब्द से वह चरम अभाव को सूचित करता है, मानो वह कह रहा हो कि वे रोटी की भीख माँगते थे।

अतः वह उनकी तुलना भिखारियों से करता है, जो इधर-उधर रोटी ढूँढ़ते फिरते हैं।

वह यह भी कहता है कि उन्होंने प्राण को फिर से जिलाने के लिए भोजन के बदले सबसे बहुमूल्य वस्तुएँ दे दीं। यहाँ वह और भी स्पष्ट रीति से अकाल की ओर संकेत करता है, क्योंकि वह कहता है कि वे एक प्रकार से अभाव भोग रहे थे। दूसरे लोग अन्तिम वाक्यांश का अनुवाद करते हैं, "प्राण को तृप्त करने के लिए," जो अनुचित नहीं है।

परन्तु भविष्यद्वक्ता का निःसन्देह यह अर्थ था कि जीवन-निर्वाह के साधनों की कमी को सूचित करे, जब उसने कहा कि उनके पास जो भी बहुमूल्य वस्तु थी वह उन्होंने अपने प्राणों को मानो मृत्यु से जीवन में लौटाने के लिए दे दी।

इसके बाद एक प्रार्थना आती है, हे यहोवा, दृष्टि कर, और देख, क्योंकि मैं तुच्छ हो गई हूँ। हमने कल कहा था कि वे शिकायतें, जिन्होंने विश्वासियों को दीन किया, और साथ ही उन्हें अच्छी आशा तक ऊपर उठाया, और प्रार्थनाओं का द्वार भी खोला, परमेश्वर के आत्मा के द्वारा दी गई थीं। अन्यथा, जब मनुष्य शोक में डूबे रहते हैं, और अपने आप को सताते हैं, तब वे चिढ़ जाते हैं; और फिर इस चिढ़ से भड़क उठना एक प्रकार का पागलपन है। इसलिए भविष्यद्वक्ता, शोक की तीव्रता और अधीरता के उफान को शान्त करने के लिए, विश्वासियों को फिर से प्रार्थना की ओर बुलाता है। और जब यरूशलेम परमेश्वर से दृष्टि करने और देखने की विनती करती है, तो दोनों शब्दों के प्रयोग में एक विशेष बल अभिप्रेत है; और दिया गया कारण भी इसे और अधिक पूर्णता से दिखाता है, क्योंकि वह तुच्छ हो गई थी; इस प्रकार कलीसिया ने परमेश्वर को दया की ओर फेरने के लिए उसके सामने अपने दुःखों के अतिरिक्त और कुछ नहीं रखा। अतः उसने अपनी सेवाओं को आगे नहीं रखा, वरन् केवल अपने दुःखों पर विलाप किया, ताकि वह परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त करे। आगे लिखा है,—

496 इस पद का अनुवाद इस प्रकार किया जा सकता है,— सतानेवाले ने उसकी सब मनभावनी वस्तुओं पर अपना हाथ फैलाया है; निश्चय उसने देखा: जातियाँ उसके पवित्रस्थान में घुस आईं; यद्यपि तू ने यह आज्ञा दी थी, "वे तेरी सभा में न आएँ।" "मनभावनी वस्तुएँ" पवित्र वस्तुएँ थीं, और इनका अनुवाद ऐसा भी किया जा सकता है। उन पर हाथ फैलाना उन्हें छीन लेना, उन पर अधिकार कर लेना था। — सं. 497 अर्थात् उसके साथ तुच्छ या निकम्मी वस्तु का सा व्यवहार किया गया: सेप्टुआजिंट में "अपमानित" है। — सं. 498 सेप्टुआजिंट, वल्गेट और तर्गुम ने इसे स्पष्ट रूप से {{לו के रूप में लिया है; परन्तु सीरियाई ने निषेधवाचक के रूप में, और वाक्य को प्रश्न के रूप में लिया गया है: और इससे सबसे अच्छा अर्थ निकलता है। — सं.

विलापगीत 1:12

12. हे सब बटोहियो, क्या यह तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं? दृष्टि करो, और देखो कि क्या मेरे दुःख के समान कोई दुःख है, जो मुझ पर पड़ा है, जिससे यहोवा ने अपने भड़के हुए क्रोध के दिन मुझे दुःख दिया है।

12. Non ad voc omnes qui transitis per viam? Aspicite et videte, an sit dolor sicut dolor meus, qui factus est mihi, quia affixit me (vel, dolore affecit) Jehova in die excandescentiae irae suae.

पद के आरम्भ की व्याख्या भिन्न-भिन्न प्रकार से की जाती है। कुछ इसे प्रश्नवाचक रूप में पढ़ते हैं, "हे मार्ग से होकर जानेवालो, क्या यह तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं?" दूसरे अधिक सरलता से, "मैं देखती हूँ कि तुम्हें मेरी कोई चिन्ता नहीं; तुम्हारे लिए मेरा दुःख कुछ भी नहीं।" फिर कुछ इस प्रकार पढ़ते हैं, "यह तुम्हारे लिए दुःख न हो;" और दूसरे, "तुम पर दुःख न पड़े," अर्थात् जो मुझ पर पड़ा है वह तुम पर न पड़े; इस प्रकार यह शुभकामना व्यक्त करनेवाली प्रार्थना है।

जिसे मैं अधिक पसन्द करता हूँ वह प्रश्नवाचक रूप है, हे मार्ग से होकर जानेवालो, क्या यह तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं? क्योंकि अक्षर {,}הHe, जो प्रश्न का चिह्न है, प्रायः छोड़ दिया जाता है। परन्तु यदि इसे सकारात्मक रूप में पढ़ा जाए, तो भी अर्थ अनुचित न होगा: "हे पास से होकर जानेवालो, इससे तुम्हें कोई सरोकार नहीं," मानो यरूशलेम अपने विलापों में इस बात से दुःखी थी कि जितने पास से होकर जाते थे उनमें से कोई भी न दया से और न शोक से द्रवित हुआ।

परन्तु उसने पास से होकर जानेवालों को सम्बोधित किया, ताकि वह अपनी विपत्ति की बड़ाई को और भी पूर्णता से प्रकट करे। क्योंकि यदि उसने अपने शब्द केवल पड़ोसियों से कहे होते, तो उनमें इतना बल न होता; परन्तु जब उसने परदेशियों से बात की, तो इस प्रकार उसने दिखाया कि उसकी विपत्ति इतनी बड़ी थी कि उसे सुदूर देशों के मनुष्यों की सहानुभूति को भी, उनकी यात्रा के बीच ही, जगा देना चाहिए था। और वह उनसे दृष्टि करने और देखने को कहती है। क्रम उलट दिया गया है, क्योंकि उसने पहले कहा था, "हे यहोवा, देख, और दृष्टि कर।" तब यरूशलेम ने परमेश्वर से विनती की कि पहले वह अपनी आँखें उसकी विपत्तियों को देखने की ओर लगाए, और फिर ध्यान से उन पर विचार करे: परन्तु अब दूसरे उद्देश्य से वह कहती है, तुम दृष्टि करो और देखो, अर्थात् विचार करो कि मेरी विपत्ति कितनी प्रत्यक्ष है, जो अन्यथा कुछ हद तक तुमसे छिपी रह सकती थी। वह कहती है, दृष्टि करो, क्या मेरे दुःख के समान कोई दुःख है? वह जोड़ती है, जो मुझ पर आ पड़ा है: कुछ लोग इन शब्दों का कर्तृवाच्य में अनुवाद करते हैं, "जो यहोवा ने मुझ पर डाला है;" परन्तु दूसरा अनुवाद अधिक सही है, क्योंकि वह अधिक शाब्दिक है। जेरोम का अनुवाद है, "जिसने मुझे बीन लिया है;" और {}צעללolal का अर्थ कभी-कभी बीनना होता है, और मैं इस व्याख्या को अस्वीकार नहीं करना चाहता। परन्तु जो आगे आता है उसका अनुवाद जेरोम ने, जैसा पहले एक स्थान पर भी, गलत किया है, "जिसके विषय में यहोवा ने कहा है:" क्योंकि उसने इस क्रिया को, जैसा पहले बताया गया, {,}הגהege से निकाला; परन्तु यह {,}יגהige से आती है, जैसा कि अक्षर {,}וvau के डाले जाने से स्पष्ट है। अतः इसमें कोई सन्देह नहीं कि कलीसिया संकेत करती है कि परमेश्वर ही उस दुःख का कर्ता था जिस पर वह विलाप कर रही थी।

और यह जानना आवश्यक है, ताकि मनुष्य अपने शोक में अति की ओर बह न जाएँ, जैसा प्रायः होता है। क्योंकि जब हम समझते हैं कि हमारा काम परमेश्वर से है, तब परमेश्वर का प्रताप हम पर अंकुश लगाता है। निश्चय ही इसका सरल और कोरा ज्ञान पर्याप्त नहीं, क्योंकि, जैसा कहा गया है, अधर्मी लोग यह जानते हुए भी कि उनके दुःख परमेश्वर की ओर से आते हैं, उसके विरुद्ध कुड़कुड़ाते हैं: परन्तु फिर भी जब हम परमेश्वर की ओर ध्यान देते हैं, तब यही धीरज और नम्रता का आरम्भ है। अतः इसी कारण यरूशलेम ने कहा कि वह परमेश्वर के द्वारा दुःखित की गई थी।

और आगे जोड़ा गया है, उसके कोप के रोष के दिन। यहाँ भविष्यद्वक्ता कोप के रोष का उल्लेख करके परमेश्वर के प्रतिशोध की कठोरता को व्यक्त करना चाहता था। कुछ लोग {,}חרוםcherun का अनुवाद "प्रचण्ड क्रोध" करते हैं; परन्तु चूँकि "प्रचण्ड क्रोध" शब्द बहुत कठोर है, इसलिए "रोष," या बड़ी जलन (excandescentia) शब्द अनुचित नहीं है। तौभी हमें भविष्यद्वक्ता के उद्देश्य को स्मरण रखना चाहिए, जो यह दिखाना था कि परमेश्वर का प्रतिशोध ऐसा भयानक था, मानो उसका सारा क्रोध यरूशलेम के विरुद्ध धधक उठा हो: और यह अगले पद में और भी पूर्णता से पुष्ट होता है,—

विलापगीत 1:13

13. उसने ऊपर से मेरी हड्डियों में आग भेजी है, और वह उन पर प्रबल होती है: उसने मेरे पैरों के लिए जाल फैलाया है, उसने मुझे पीछे की ओर फेर दिया है: उसने मुझे दिन भर उजाड़ और निर्बल कर दिया है।

13. E sublimi misit ignem in ossa mea, et dominatus est in ipso (est mutatio numeri, refertur quidem ad oss, sed perinde est ac Si diceret, dominatus est ignis in unoquoque ossium;) extendit rete suum pedibus meis, convertet me retrorsum; dedit me (reddidit me, vel, posuit) vastam vel, desolatam) toto die dolentem (vel, infirmam.)

भविष्यद्वक्ता उसी विषय को आगे बढ़ाता है, कि परमेश्वर का प्रतिशोध यरूशलेम के विरुद्ध अत्यन्त भयानक रीति से भड़का था। परन्तु एक रूपक का प्रयोग करते हुए वह कहती है कि उसकी हड्डियों में आग भेजी गई थी। जो लोग हड्डियों का अर्थ गढ़वाले स्थान लगाते हैं, वे भविष्यद्वक्ता के अर्थ को निर्बल कर देते हैं। मैं हड्डियों को उनके ठीक अर्थ में लेता हूँ, मानो यह कहा गया हो कि परमेश्वर की आग भीतरी से भीतरी भागों तक घुस गई थी। पवित्रशास्त्र में यह कथन-शैली प्रायः आती है। हड्डियों से बल या पराक्रम सूचित होता है। इसलिए दाऊद कभी-कभी विलाप करता था कि उसकी हड्डियाँ व्याकुल या बेचैन हैं। (भजन संहिता 6:2) और हिजकिय्याह ने अपने गीत में कहा, "वह सिंह के समान मेरी सब हड्डियों को तोड़ता है।" (यशायाह 38:13)

इसी अर्थ में भविष्यद्वक्ता अब कहता है कि परमेश्वर की ओर से आग भेजी गई थी, जो उसकी हड्डियों पर प्रभुता करती थी, अर्थात् जिसने न केवल चमड़ी और मांस को जलाया, वरन् हड्डियों को भी भस्म कर दिया। {,}רדהrede का अर्थ ले लेना या ग्रहण करना भी होता है: परन्तु चूँकि पहला अनुवाद सबसे अधिक माना जाता है, इसलिए मैं उसी का अनुसरण करना चाहता हूँ—कि आग ने उसकी हड्डियों पर प्रभुता की।

एक और उपमा जोड़ी गई है, कि परमेश्वर ने उसके पैरों के आगे जाल फैलाया था; और इस प्रकार उसने बच निकलने का हर उपाय छीन लिया था। वह संकेत करती है (क्योंकि बोलनेवाली यरूशलेम है) कि वह परमेश्वर के न्यायदण्डों में ऐसी फँस गई थी कि विनाश के लिए बँध गई, मानो वह फन्दों या जालों में पड़ गई हो। तीसरे स्थान पर यह कहा गया है कि वह दिन भर उजाड़ थी, यहाँ तक कि वह निरन्तर शोक करती रही। दिन भर का अर्थ है लगातार। अतः यह कहा गया है कि वह बिना अन्त के, सीमा से बाहर शोक करती रही, क्योंकि वह परमेश्वर के जालों के द्वारा पीछे की ओर फेर दी गई थी, और उसकी हड्डियाँ स्वर्गीय आग से भस्म हो गई थीं: क्योंकि ऊपर से, {,}ממרוםmemerumn, यह अभिव्यक्ति विशेष बलवाली है, क्योंकि भविष्यद्वक्ता का अर्थ है कि वह कोई साधारण या मानवीय जलन न थी; क्योंकि जो परमेश्वर से जोड़ा जाता है वह मानवीय या पार्थिव से बढ़कर होता है। अतः यह मानो ऐसा है कि उसने कहा हो, कि वह ऐसा प्रतिशोध था जो परमेश्वर की भयानक सामर्थ्य को प्रकट करता था; क्योंकि यह ऐसा ही था मानो परमेश्वर ने स्वर्ग से गर्जन किया हो। अब हम शब्दों का आशय समझ गए हैं। आगे लिखा है,—

विलापगीत 1:14

14. मेरे अपराधों का जूआ उसके हाथ से बाँधा गया है: वे बटे हुए हैं, और मेरी गर्दन पर चढ़ आए हैं: उसने मेरे बल को गिरा दिया है, प्रभु ने मुझे उनके हाथों में सौंप दिया है, जिनके सामने से मैं उठ नहीं सकती।

14. Ligatumest (hic vertit Hieronymus, vigilavit, namhallucinatus est inpuncto duntaxat {}צנשקדet legendum est {}צנשקדquia est punctum sinistrum, quod significat ligave, ligatum est igitur) jugum iniquitatum mearum in manu ejus; implicitae sunt (vel, perplexae,) ascenderunt super collum meum; corruere fecit (vel, debilitavit) robur meum; dedit me Dominus in manus eorum (est in regimine, et tamen nulla sequitur additio, quae respondeat, sed apparet aliquid esse subaudiendum, in manus ergo hostium) ex quibus non potero surgere.

यहाँ, फिर से, यरूशलेम अंगीकार करती है कि परमेश्वर उचित ही अप्रसन्न हुआ था। उसने अपनी भोगी हुई विपत्तियों को परमेश्वर के प्रतिशोध का कारण बताया था; परन्तु अब वह उस अप्रसन्नता या क्रोध का कारण व्यक्त करती है। इसलिए वह कहती है कि उसके अधर्म के कामों का जूआ परमेश्वर के हाथ में बाँधा गया था। यद्यपि व्याख्याकार इन शब्दों की व्याख्या करते हैं, तौभी वे भविष्यद्वक्ता के अर्थ को छूते तक नहीं; क्योंकि वे ध्यान नहीं देते कि यहाँ एक निरन्तर रूपक है। अतः हमें दोनों वाक्यांशों को स्मरण रखना चाहिए,—कि परमेश्वर का हाथ जूए को बाँधे हुए थामे था, और यह भी कि वह जूआ यरूशलेम की गर्दन के चारों ओर बँधा था। जैसे एक किसान बैलों पर जूआ बाँधने के बाद लगाम थामे रहता है, और उसे अपने हाथ के चारों ओर लपेट लेता है, ताकि बैल न केवल जूए को उतार न सकें, वरन् उन्हें उस हाथ की आज्ञा भी माननी पड़े जो लगाम थामे है; वैसे ही यह भी कहा गया है कि अधर्म के कामों का जूआ कसकर बाँधा गया था: वह कहती है, "मैं जूआ उठाए हूँ, परन्तु वह बँधा है, और ऐसा कसा हुआ है कि उसे झटककर उतारा नहीं जा सकता; और फिर, मैं चाहे कितनी ही उग्र होऊँ, या लात मारूँ, परमेश्वर उस बँधे हुए जूए को अपने हाथ से ऐसा थामे है कि मुझे उसे उठाने के लिए विवश करता है।"

अब, हम भविष्यद्वक्ता के शब्दों का उद्देश्य और आशय देखते हैं, कि परमेश्वर यरूशलेम पर उचित ही क्रुद्ध था, और उसने उचित ही इतनी कठोरता का प्रयोग किया था। साथ ही दण्ड की भयंकरता भी व्यक्त की गई है, यद्यपि वह पूर्णतः न्यायसंगत था; क्योंकि एक ओर, यरूशलेम शिकायत करती है कि उसकी गर्दन पर एक जूआ रखा गया, जो बँधा और कसा हुआ था, और यह भी कि वह परमेश्वर के हाथ से बाँधा गया था, मानो वह कह रही हो कि वह ऐसी विवशता में थी कि कोई ढील न थी। अतः एक ओर, वह अपनी विपत्ति की कठोरता पर विलाप करती है; और दूसरी ओर, वह मान लेती है कि जो कुछ उसने भोगा उसके वह पूरी रीति से योग्य थी; और इस प्रकार उसने अपने आप पर दोष लगाया, ऐसा न हो कि कोई सोचे कि वह परमेश्वर के विरुद्ध चिल्लाती थी, जैसा शोक में प्रायः होता है।

499 सब अनुवाद {{נשקד का अनुवाद जागते रहने के अर्थ में करने में एकमत हैं; और जब वे एकमत होते हैं, तो यह मानने का प्रबल आधार होता है कि वे सही हैं। और सब इस विषय में भी एकमत हैं कि {}על एक सम्बन्धबोधक अव्यय है, न कि संज्ञा, "जूआ," केवल वल्गेट को छोड़कर, जो मुश्किल से ही कोई अर्थ देता है। रब्बियों ने इस क्रिया के लिए एक नया अर्थ गढ़ लिया है, जो इसका किसी और स्थान में नहीं है, और कुछ लोगों ने

आगे जोड़ा गया है, उसने गिरा दिया है, या निर्बल कर दिया है, इत्यादि। क्रिया {,}כשלcashel का अर्थ हिफ़िल में, जैसा सर्वविदित है, ठोकर खाना, या ठोकर खिलाना या गिराना है। अतः उसने मेरे बल को निर्बल कर दिया है; प्रभु ने मुझे मेरे शत्रुओं के हाथ में सौंप दिया है, जिनके सामने से मैं उठ न सकूँगी; अर्थात् उसने मुझे ऐसा अधीन कर दिया है, और मेरे शत्रुओं के हाथों के नीचे ऐसा गिरा दिया है, कि फिर उठने की कोई आशा नहीं। यदि कोई पूछे, "तो फिर वह प्रार्थना क्यों करती है, और फिर बार-बार प्रार्थना करेगी?" उत्तर यह है कि जब वह यहाँ कहती है कि वह फिर उठ न सकेगी, तो संकेत बातों की बाहरी दशा की ओर किया गया है: इस बीच, परमेश्वर का अनुग्रह गिनती में नहीं लिया गया, और यह सब मानवीय उपायों से परे है। अतः वह कहती है कि शरीर के विचारों के अनुसार उसे कोई आशा न थी, क्योंकि उठने का कोई उपाय दिखाई नहीं देता था। परन्तु फिर भी वह इस बात से निराश न हुई कि परमेश्वर अन्त में अपनी सर्वशक्तिमान सामर्थ्य से उसे घातक विनाश से उठाएगा। और यह एक ऐसी कथन-शैली है जिसे स्मरण रखना चाहिए; क्योंकि आशा उन बातों को देखती है जो छिपी हैं। परन्तु साथ ही विश्वासी बातों के साधारण रूप के अनुसार बोलते हैं, और जब वे निराश प्रतीत होते हैं, तब वे उसी पर ध्यान देते हैं जो उनके अपने अवलोकन और विवेक के अन्तर्गत आता है। अतः यरूशलेम अब कहती है कि वह उठ नहीं सकती, जब तक परमेश्वर अपनी असाधारण सामर्थ्य को प्रकट न करे, जो सब मानवीय उपायों से कहीं बढ़कर है। आगे लिखा है,

विलापगीत 1:15

15. प्रभु ने मेरे बीच में मेरे सब पराक्रमी पुरुषों को पाँवों तले रौंद डाला है: उसने मेरे जवानों को कुचलने के लिए मेरे विरुद्ध एक सभा बुलाई है: प्रभु ने यहूदा की कुमारी कन्या को मानो कोल्हू में रौंदा है।

15. Calcavit omnes fortes meos Dominus in medio mei; vocavit super me diem (hoc est, edixit statum diem, alii vertunt congregationem; et {,}מועדtam coetum ipsum significat, quam condictum tempus,) ad conterendos adolescentes meos (vel, electos;) torcular calcavit Adonai super virginem (vel, puellam,) filiam Jehudah.

वह पहले कहती है कि उसके सब शूरवीर पाँवों तले रौंदे गए। अब हम जानते हैं कि यहूदी अपने पुरुषों पर उस समय तक कितना भरोसा रखते रहे, जब तक वे पूरी रीति से वश में न कर लिए गए। सो जब उन्होंने भविष्यद्वक्ताओं के प्रति इतना ढीठपन और घमण्ड दिखाया था, तो इसी से यह और भी अधिक शोक का कारण बन गया, जब यरूशलेम ने स्वयं देखा कि वह हर प्रकार की रक्षा से रहित है, और उसके शूरवीर पाँवों तले रौंदे गए हैं। वह कहती है, मेरे बीच में। और इस पर ध्यान देना चाहिए; क्योंकि यदि वे रणभूमि में गिरे होते, यदि शत्रुओं ने उन्हें मैदानों में पकड़ लिया होता, तो यह बात इतनी दुःखदायी न होती; परन्तु यह कि वे नगर की ठीक गोद में इस प्रकार गिरा दिए गए, सचमुच ऊपर से आए पलटे का चिह्न था। अब हम देखते हैं कि यह बात व्यर्थ नहीं कही गई, कि यरूशलेम के सब शूरवीर उसी के बीच में गिरा दिए गए।

फिर यह कहा गया है कि वह ठहराया हुआ समय था, जब परमेश्वर ने उसके चुने हुए पुरुषों को, अर्थात् उसके जवानों को नष्ट किया। यदि किसी को {,}מועדmuod को सभा के अर्थ में लेना अधिक उचित लगे, तो मुझे आपत्ति नहीं; तौभी मैं इस अर्थ को स्वीकार नहीं करता, क्योंकि यह खींचतान-सा प्रतीत होता है।

उनके पीछे चले हैं। सेप्तुआजिन्त इसे अकर्मक रूप में “पहरा दिया गया है” अनुवाद करता है, परन्तु वल्गेट “उसने पहरा दिया है।” “अपराधों पर पहरा देना” दानिय्येल 9:14 के “बुराई पर (या उसके ऊपर) पहरा देना” के समान है; इसका अर्थ है उन्हें दण्ड देने के लिए उन पर दृष्टि लगाए रहना। पूरे पद का अनुवाद मैं यों करता हूँ, — 14. उसने मेरे अपराधों पर पहरा दिया है, उसके हाथ से वे गूँथे गए हैं; उसका जूआ मेरी गर्दन पर है, उसने मेरे बल को घटा दिया है; हाँ, प्रभु ने मुझे अन्धेर करनेवाले के हाथों में सौंप दिया है, मैं ठहर नहीं सकती। “हाथों” शब्द सम्बन्धसूचक रूप में है, जिससे प्रकट होता है कि एक शब्द छूट गया है। “मैं ठहर नहीं सकती,” अर्थात् अन्धेर करनेवाले के सामने; मैं सामना नहीं कर सकती। भविष्यत् काल वर्तमान के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है; शब्दशः यह है, “मैं ठहर न सकूँगी,” या सामना न कर सकूँगी। वेल्श भाषा में भी ठीक ऐसा ही है; रूप भविष्यत् काल का है, परन्तु उसे वर्तमान को व्यक्त करनेवाला समझा जाता है। पहली पंक्ति में “उसके हाथ” को सब अनुवादों में “गूँथे गए” अर्थात् एक साथ बटे हुए के साथ जोड़ा गया है। — सं.

प्रसंग से यह अधिक मेल खाता है कि इसे ठहराया हुआ समय माना जाए, अर्थात् वह समय जिसे परमेश्वर ने सब बलवन्तों को नष्ट करने के लिए पहले से ठहरा रखा था।

फिर एक और रूपक प्रयुक्त हुआ है, — कि परमेश्वर ने सिय्योन की पुत्री के विषय में दाखरस का कुण्ड रौंदा है। यह अलंकार अन्यत्र भी आता है, जैसे यशायाह 63:1 में, “यह कौन है जो एदोम से चला आता है? और उसके वस्त्र क्यों लाल हैं?”

क्योंकि भविष्यद्वक्ता आश्चर्य करता है कि परमेश्वर लहू से छिड़का हुआ एदोम से कैसे निकल आया। परमेश्वर उत्तर देता है, “मैं ने अकेले ही दाखरस के कुण्ड में दाख रौंदी है;” अर्थात् इसलिए कि उसने अपनी प्रजा पर किए गए अन्याय का पलटा लिया था। क्योंकि हम जानते हैं कि एदोमी सदा अभागे यहूदियों के विरुद्ध भड़के रहते थे। तब परमेश्वर, यह दिखाने के लिए कि वह अपनी कलीसिया का रक्षक है, कहता है कि वह एदोम से आया, और लहू से छिड़का हुआ, वरन् भीगा हुआ था। जैसे कोई दाखरस के कुण्ड में परिश्रम करने के बाद दाखरस से लाल हो जाता है, वैसा ही चित्रण इस स्थान में भी है। हम यिर्मयाह 51:33 में भी देख चुके हैं कि बाबुल खलिहान के समान था। रूपक तो भिन्न है, परन्तु वर्तमान रूपक से समानता रखता है। सो जैसे परमेश्वर के विषय में कहा जाता है कि वह रौंदता या दाँवता है, जब वह किसी देश को दुःख देता है, वैसे ही उसके विषय में कहा जाता है कि वह दाखरस का कुण्ड रौंदता है, जैसा कि यहाँ।

आगे लिखा है, —

विलापगीत 1:16

16. इन बातों के कारण मैं रोती हूँ; मेरी आँखों से आँसू की धारा बहती रहती है; क्योंकि जिस शान्तिदाता के कारण मेरा जी हरा भरा हो जाता था, वह मुझ से दूर हो गया; मेरे लड़केबाले अकेले हो गए, क्योंकि शत्रु प्रबल हुआ है।

16. Propter id ego plorans, oculus meus, oculus meus, descendunt aquae, (hoc est, defluit in aquas,) quia remotus est a me consolator, qui animam revocet, (vel, recreat animam, {);}משיבFuerunt filii mei desolati, quia praevaluit hostis.

वह यरूशलेम की विपत्तियों का विस्तार से वर्णन करता है। परन्तु इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि भविष्यद्वक्ता ने अपनी बात को इस प्रकार लम्बा किया; क्योंकि हम जानते हैं कि जो लोग भारी बोझ से दबे होते हैं, वे विलाप और शोक करते-करते कभी तृप्त नहीं होते। यदि हम उचित रीति से विचार करें कि वे विपत्तियाँ कितनी बड़ी थीं, तो भविष्यद्वक्ता हमें बहुभाषी नहीं लगेगा, और न उसका विस्तार हमें उबाऊ लगेगा। क्योंकि जब कोई यरूशलेम की समृद्ध दशा की तुलना उस उजाड़ विनाश से करता है जिस पर भविष्यद्वक्ता विलाप करता है, तो उसे निश्चय ही प्रतीत होगा कि कितने ही शब्द क्यों न हों, वे उसकी वास्तविकता को पूरी रीति से व्यक्त नहीं कर सकते; वरन् चाहे ये वचन अतिशयोक्तिपूर्ण प्रतीत हों, तौभी वे उस विपत्ति की महानता से बढ़कर नहीं हैं। इस बात की ओर संक्षेप में इसलिए संकेत किया गया है, कि कोई भविष्यद्वक्ता द्वारा प्रयुक्त उन विविध कथन-शैलियों से ऊब न जाए, जबकि वह एक ही बार में कह सकता था कि यरूशलेम नष्ट हो गया।

वह कहता है, इसी कारण मैं रोऊँगी। वह आदि से अन्त तक एक स्त्री का रूप धारण किए रहता है; क्योंकि यरूशलेम स्वयं बोल रहा है, यिर्मयाह नहीं। वह कहती है, मैं इसी कारण रोऊँगी; मेरी आँख, मेरी आँख! वह जल बनकर बह निकलेगी। कुछ लोग पढ़ते हैं, “मेरी आँखों से जल बहेगा;” परन्तु ऐसा अनुवाद बहुत ढीला है। सो मुझे सन्देह नहीं कि यरूशलेम यह कहती है कि उसकी आँखें जल के सोतों के समान होंगी। वह एकवचन में बोलती है, और शब्दों को दोहराती है, मेरी आँख! मेरी आँख! वह उतरेगी, या जल के समान बहेगी, अर्थात् मानो वे दो सोते हों, क्योंकि मुझ से अलग हो गया, या मुझ से दूर है, शान्तिदाता, जो मेरे प्राण को फिर से जिलाए। इन शब्दों से वह संकेत करती है कि वह मूर्छित हो रही थी, और मानो मर रही थी, और कोई पास न था जो शान्ति दे, जिससे उसका प्राण फिर से जी उठे। जैसा पहले प्रकट हुआ, कि जब कोई मित्र दुःख को हल्का करके मानवता का कर्तव्य निभानेवाला न हो, तो यह अत्यन्त बड़ी बुराई समझी जाती है; वैसे ही अब फिर यरूशलेम वही शिकायत दोहराती है, और कहती है कि उसके सब पुत्र नष्ट हो गए, क्योंकि शत्रु प्रबल हुआ। आगे लिखा है, —

500 यदि इस शब्द का अनुवाद “सभा” या मण्डली किया जाए, तो अर्थ होगा कसदियों की सभा, और जैसा गैटेकर कहता है, यहाँ लोगों को उनके पर्वों के लिए बुलाए जाने की ओर संकेत है। सेप्तुआजिन्त और वल्गेट इसे “समय” अनुवाद करते हैं, परन्तु सुरियानी अनुवाद “सभा।” किसी के विरुद्ध या उस पर कोई ठहराया हुआ समय बुलाना कोई उपयुक्त अभिव्यक्ति नहीं है। हमारा अंग्रेज़ी अनुवाद निःसन्देह ठीक है; और ब्लेनी तथा हेण्डरसन भी उससे सहमत हैं। — सं.

501 शब्द इस प्रकार हैं, — प्रभु ने कुमारी, अर्थात् यहूदा की पुत्री के विषय में दाखरस का कुण्ड रौंदा है। {{ל का अर्थ कभी-कभी “के विषय में” या “के सम्बन्ध में” होता है। “यहूदा की पुत्री” “कुमारी” का समानाधिकरण है। — सं.

विलापगीत 1:17

17. सिय्योन हाथ फैलाए हुए है, उसे कोई शान्ति नहीं देता; यहोवा ने याकूब के विषय में यह आज्ञा दी है कि उसके चारों ओर के निवासी उसके द्रोही हो जाएँ; यरूशलेम उनके बीच अशुद्ध स्त्री के समान हो गई है।

17. Expandit Sion in manibus suis (id est, manus suas, vel, complosit manibus suis, alii vertunt, confregit,) nullus consolator ei; mandavit Jehova super Jacob per circuitus ejus adversarios ejus; facta est Jerusalem in abominationem inter ipsos (vel, tanquam immunda, vel, menstruata, {,}נדהenim vocater mulier menstruata apud Moseu.)

भविष्यद्वक्ता पहले कहता है कि यरूशलेम ने शोक के चिह्न के रूप में अपने हाथ फैलाए, या इसलिए कि वह चारों ओर से मित्रों को ढूँढे; क्योंकि जब हम मनुष्यों को दया के लिए उभारना चाहते हैं, तब हम अपनी बाँहें फैलाते हैं। मुझे आश्चर्य है कि कुछ लोगों के मन में यह कहने की बात कैसे आई कि यरूशलेम ने अपने हाथों से रोटी तोड़ी। यह अत्यन्त बचकानी बात है।

कुछ लोगों ने इन शब्दों का अनुवाद यह किया है कि उसने अपने हाथों से तोड़ा, और इससे वे यह समझते हैं कि उसने अपने हाथों से ताली बजाई। परन्तु यह कथन की कठोर रीति है; मैं सबसे उपयुक्त अर्थ को ही रखता हूँ, कि यरूशलेम ने अपने हाथ फैलाए। {,}פרשperesh शब्द का अर्थ बिखेरना या तितर-बितर करना भी है; परन्तु निःसन्देह भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय हाथों के फैलाने से है, मानो यरूशलेम ने कहा हो कि वह उस स्त्री के समान है जो अपनी विपत्तियों पर विलाप करती है, और चारों ओर ऐसे मित्रों को ढूँढती है जो उसे कुछ शान्ति दें। और हम भविष्यद्वक्ता का अर्थ इस स्थल ही से निकाल सकते हैं: कहा गया है कि सिय्योन हाथ फैलाकर अपने मित्रों को पुकारती है, और कोई शान्तिदाता नहीं: इन उपवाक्यों को एक साथ पढ़ना चाहिए, अर्थात् सिय्योन ने अपने हाथ फैलाए, तौभी किसी ने शान्ति देकर उसके दुःख को हल्का करने के लिए उत्तर नहीं दिया।

आगे लिखा है कि यहोवा ने याकूब के विषय में आज्ञा दी थी, कि उसके चारों ओर द्रोही उसे दुःख दें। भविष्यद्वक्ता फिर हमें स्मरण दिलाता है कि ये विपत्तियाँ मनुष्यों के कारण नहीं आईं, परन्तु परमेश्वर ने इसी रीति से प्रजा की हठीली अभक्ति का दण्ड देने का निश्चय किया था। सो कहीं ऐसा न हो कि यहूदी अपने दुःख को उँडेलते हुए उसे कसदियों पर डाल दें, जैसा कि सामान्यतः किया जाता था, वह उनका ध्यान स्वयं परमेश्वर की ओर लौटाता है, और कहता है कि कसदी, चाहे कितने ही क्रूर क्यों न थे, तौभी उन्होंने केवल अपनी प्रेरणा से कुछ नहीं किया, परन्तु परमेश्वर की आज्ञा से किया। वह जोड़ता है, चारों ओर, कि यहूदी जान लें कि बच निकलने का कोई मार्ग नहीं, क्योंकि परमेश्वर ने उन सब को मानो बन्द करके घेर रखा था। क्योंकि हम मनुष्यों के हाथों से तो विविध रीतियों से बच सकते हैं; परन्तु जब परमेश्वर हमारा शत्रु है, तब हम व्यर्थ ही छिपने के स्थान ढूँढते हैं। सो भविष्यद्वक्ता हमें सिखाता है कि बहाने और बचाव यहूदियों के किसी काम न आए, क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें हर ओर से बन्द कर रखा था।

502 यद्यपि सेप्तुआजिन्त और वल्गेट “आँख” को नहीं दोहराते, तौभी तर्गुम में “मेरी दोनों आँखें” है, और सुरियानी में “मेरी आँखें।” अधिकांश प्रतियों में यह दोहराव है, और यह बहुत बलपूर्ण है। ऐसा ही एक उदाहरण यिर्मयाह 4:9 में देखिए। 16. इन बातों के कारण मैं रोती हूँ: मेरी आँख! मेरी आँख! वह जल बहाती है; क्योंकि शान्तिदाता मुझ से दूर है, जो मेरे प्राण को फिर से जिलानेवाला है; मेरे पुत्र उजड़ गए हैं, क्योंकि शत्रु प्रबल हुआ है। — सं.

अन्त में वह कहता है कि यरूशलेम ऋतुमती स्त्री के समान थी, या घृणित वस्तु थी; क्योंकि {,}נדהnede का अनुवाद अशुद्धता या घृणित वस्तु किया जा सकता है, और यह प्रायः संज्ञा होता है; और मैं इसका यही अनुवाद करना चाहता हूँ, अर्थात् यरूशलेम मैल के समान समझी गई, मानो भविष्यद्वक्ता ने कहा हो कि यहूदियों के शत्रुओं में कोई मानवता या संयम न था, क्योंकि वे मनुष्य नहीं, वरन् कूड़ा-करकट, घृणित मैल के समान गिने गए।

अब, यदि प्राचीन कलीसिया के साथ ऐसा हुआ, तो हम आश्चर्य न करें यदि आज के दिन भी परमेश्वर हमारे साथ हमारी इच्छा से अधिक कठोरता से व्यवहार करे। सचमुच यह बहुत कड़वी बात है कि कलीसिया को इतना दुःखी देखा जाए कि अभक्त उसकी विपत्तियों पर आनन्द से फूले न समाएँ, और परमेश्वर की सन्तान संसार के कूड़े और मैल के समान हो। परन्तु आइए, हम ऐसी दशा को धीरज से सहें; और जब हमारे शत्रु हमारे साथ इस प्रकार तिरस्कार का व्यवहार करें, तो हम जानें कि परमेश्वर हमें दण्ड देकर हमारी सुधि ले रहा है, और दुष्ट परमेश्वर के विधान के बिना कुछ नहीं करते, क्योंकि उसकी इच्छा है कि हमारे विश्वास को परखे, और इस प्रकार अपने आप को धर्मी न्यायी प्रकट करे: क्योंकि यदि हम ठीक विचार करें कि हमने कितनी रीतियों से और कितनी हठ के साथ उसके क्रोध को भड़काया है, तो हम आश्चर्य न करेंगे यदि आज के दिन हम भी घृणित वस्तु और शाप गिने जाएँ। आगे लिखा है, —

विलापगीत 1:18

18. यहोवा सच्चा है, क्योंकि मैं ने उसकी आज्ञा का उल्लंघन किया है; हे सब लोगो, सुनो, और मेरी पीड़ा को देखो! मेरी कुमारियाँ और जवान बँधुआई में चले गए हैं।

18. Justus ipse Jehova, quia os ejus exacerbavi: Audite agedum omnes populii, videte dolorem meum; virgines meae et adolescentes mei profecti sunt in captivitatem.

यरूशलेम फिर मान लेती है, और अधिक स्पष्टता से व्यक्त करती है, कि उसने उचित दण्ड भोगा। वह पहले स्वीकार कर चुकी थी कि उसके शत्रु परमेश्वर की आज्ञा से क्रूर थे; परन्तु उस क्रूरता का कारण फिर से बताना आवश्यक था, अर्थात् यह कि उसने बहुत समय तक परमेश्वर के क्रोध को भड़काया था।

वह पहले कहती है कि परमेश्वर न्यायी, या धर्मी था, क्योंकि उसने उसके मुँह को भड़काया था। परमेश्वर के मुँह से हमें भविष्यद्वक्ताओं की शिक्षा समझनी चाहिए, जैसा कि भली भाँति ज्ञात है। परन्तु यह वाक्यांश बलपूर्ण है, क्योंकि जब परमेश्वर का वचन भविष्यद्वक्ताओं के मुँह से प्रचार किया गया, तब उसे खोखली ध्वनि समझकर तुच्छ जाना गया। सो जब भविष्यद्वाणी की शिक्षा को उसका अपना प्रताप नहीं दिया जाता, तब परमेश्वर जो कुछ उसके दास घोषित करते हैं उसे अपना मुँह कहता है। कथन की यह रीति मूसा से ली गई है, और उसके लेखों में प्रायः पाई जाती है। सो यहोवा न्यायी है; कैसे? क्योंकि मैं ने उसके मुँह को भड़काया है। और केवल परमेश्वर को ठेस पहुँचाने की अपेक्षा परमेश्वर के मुँह को भड़काना अधिक गम्भीर और कम क्षमा-योग्य था। अभक्त प्रायः अज्ञानता में पड़े रहकर परमेश्वर को ठेस पहुँचाते हैं; परन्तु जब प्रभु भटके हुओं को लौटा लाने और उद्धार का मार्ग दिखाने के लिए अपना मुँह खोलना चाहता है, और तब मनुष्य मानो जान-बूझकर पापों में सिर के बल दौड़ पड़ते हैं, तो यह निश्चय ही चरम अभक्ति का चिह्न है। इसी से हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता परमेश्वर के मुँह का, या भविष्यद्वक्ताओं की शिक्षा का उल्लेख क्यों करता है, अर्थात् यरूशलेम की दुष्टता को और भी बढ़ाकर दिखाने के लिए, जिसने अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा बोलनेवाले परमेश्वर की इतनी हठ से उपेक्षा की थी।

504 “धर्मी वह, यहोवा:” क्रिया “है” के स्थान पर सर्वनाम का प्रयोग हुआ है, — इब्रानी में यह एक सामान्य बात है। — सं.

503 यही शब्द, {{נדה, विलापगीत 1:8 में आता है, केवल वहाँ उसमें एक {}י है; और वाक्यांश अपने रूप में समान है। सुरियानी और तर्गुम को छोड़कर अन्य अनुवाद वहाँ इसे भटकने का अर्थ देते हैं, परन्तु यहाँ अशुद्धता का। इस परिवर्तन का कोई कारण प्रतीत नहीं होता; और अगले पद का अन्त भटकने के विचार के पक्ष में है: यरूशलेम अपने अन्धेर करनेवालों के बीच भटकनेवाली या भगोड़ी बन गई थी, — 17. सिय्योन ने अपने हाथ फैलाए हैं, उसके लिए कोई शान्तिदाता नहीं; यहोवा ने याकूब के विषय में आज्ञा दी है, कि उसके चारों ओर के लोग उस पर अन्धेर करनेवाले हों; यरूशलेम उनके बीच भटकनेवाली बन गई है। {}נד शब्द का अर्थ भगोड़ा, भटकनेवाला है, और क्योंकि यरूशलेम स्त्रीलिंग है, इसलिए {}ה जोड़ा गया है, जो स्त्रीलिंग प्रत्यय है। यहाँ “यरूशलेम” का अर्थ, विलापगीत 1:8 के समान, उसके नागरिक हैं। — सं.

उसके शोक की महानता पर फिर विलाप किया गया है; और आगे जो कहा गया है वह सब जातियों को सम्बोधित है, हे सब लोगो, सुनो; मेरी पीड़ा को देखो। और इस महान शोक का कारण क्या था? वह कहती है, क्योंकि मेरी कुमारियाँ और मेरे जवान बँधुआई में हाँक दिए गए हैं। यह एक हल्की बात प्रतीत हो सकती है; क्योंकि पहले अन्य विपत्तियों का वर्णन किया जा चुका है, जो कहीं अधिक कठोर थीं; और देश-निकाला अपने आप में केवल साधारण दण्ड है। परन्तु हमें वह स्मरण रखना चाहिए जो हम पहले कह चुके हैं, कि यहूदी उस देश में ऐसे बसे थे मानो परमेश्वर के हाथ ने उन्हें वहाँ बसाया हो, कि यरूशलेम उनके लिए सदा का विश्रामस्थान होना था, जो उन्हें ऊपर से दिया गया था; संक्षेप में, कि वह मानो अनन्त मीरास का बयाना था। सो जब वे बँधुआई में हाँक दिए गए, तो यह वैसा ही था मानो परमेश्वर ने उन्हें स्वर्ग से नीचे गिरा दिया हो, और अपने राज्य से निकाल दिया हो। क्योंकि यदि परमेश्वर ने उन्हें त्याग न दिया होता और उनसे अपना विमुख होना प्रकट न किया होता, तो यहूदी उस देश से वंचित न किए जाते। सो यह त्यागपत्र देकर निकाल देने के समान था। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि यरूशलेम ने इतना अधिक विलाप किया, क्योंकि उसके पुत्र और उसकी पुत्रियाँ देश-निकाले में हाँक दिए गए थे।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जैसे तू ने अब तक हम पर ऐसी दया का व्यवहार किया है, वैसे ही हम तेरे भयानक न्याय से पहले ही सचेत हो जाएँ; और यदि तू हमें और भी कठोरता से ताड़ना दे, तौभी हम हियाव न छोड़ें, वरन् तेरे बलवन्त हाथ के नीचे दीन होकर तेरी दया की शरण में भागें, और अपने हृदयों में यह आशा संजोए रखें कि तू हमारा पिता होगा, और तुझे निरन्तर पुकारने में संकोच न करें, जब तक कि सब बुराइयों से छुड़ाए जाकर हम अन्त में तेरे स्वर्गीय राज्य में इकट्ठे न किए जाएँ, जिसे तेरे एकलौते पुत्र ने अपने ही लहू से हमारे लिए प्राप्त किया है। — आमीन।

चौथा व्याख्यान

विलापगीत 1:19

19. मैं ने अपने मित्रों को पुकारा परन्तु उन्होंने भी मुझे धोखा दिया; जब मेरे याजक और पुरनिये इसलिए भोजनवस्तु ढूँढ़ रहे थे कि खाने से उनका जी हरा हो जाए, तब नगर ही में उनके प्राण छूट गए।

19. Clamavi ad amicos nucos, ipsi deceperunt me: sacerdotes mei et seniores mei in urbe obierunt, quia quaesierint cibum sibi et refocillarunt (ad verbum, hoc est, ut refocillarent) animam suam (ad verbum, ut redire facerent, quemadmodum Gallice dicimus, faire revenir le coeur.)

यहाँ परमेश्वर की प्रजा एक स्त्री के रूप में, जैसा हम पहले देख चुके हैं, शिकायत करती है कि अपनी विपत्ति में वह हर प्रकार की शान्ति से रहित छोड़ दी गई। और यह बात दुःख को बढ़ाती है, जब अभागों पर कोई कृपा दिखाने के लिए पास न हो; क्योंकि जब मित्र अपनी कृपापूर्ण सेवाएँ अर्पित करते हैं, और जहाँ तक उनसे हो सके, बुराई की कठोरता को घटाने का यत्न करते हैं, तो इससे शोक में कोई छोटी राहत नहीं मिलती।

परमेश्वर की कलीसिया अब कहती है कि वह मित्रों द्वारा ऐसी त्यागी गई कि अपने विलाप और शोक में घुलने के लिए अकेली छोड़ दी गई। तौभी यहाँ लज्जाजनक और अशुद्ध सम्बन्धों की ओर संकेत हो सकता है; क्योंकि इस शब्द, मित्र, से आत्मा प्रायः मिस्रियों की, और उन अन्य लोगों की भी ओर संकेत करता है जिन पर इस्राएलियों ने मूर्खता से भरोसा किया था; क्योंकि हम जानते हैं कि इसी रीति से वे वैवाहिक विश्वासयोग्यता से भटक गए थे।

परमेश्वर ने उन्हें अपने साथ बाँध लिया था, कि वे केवल उसी की कृपा में सन्तुष्ट रहें; और इस प्रकार सन्तुष्ट रहना ही उनकी आत्मिक पवित्रता थी। सो पवित्रशास्त्र ठीक ही मिस्रियों और अश्शूरियों दोनों की तुलना वेश्याओं से करता है, जब कभी इस्राएलियों ने उनसे सहायता माँगी। परन्तु क्योंकि यह व्याख्या बहुत सूक्ष्म प्रतीत होती है, इसलिए मैं इस कथन को केवल एक शिकायत के रूप में देखकर सन्तुष्ट हूँ, कि परमेश्वर की प्रजा, यद्यपि चारों ओर देखती रही, तौभी संसार में कोई शान्ति न पा सकी। वह कहती है, मैं ने अपने मित्रों को पुकारा; उन्होंने मुझे धोखा दिया।

फिर आगे जोड़ा गया है, मेरे याजक और मेरे पुरनिये नगर में मर गए। यदि वे युद्ध में मारे जाते, तो कोई आश्चर्य न होता; क्योंकि जो शत्रु के विरुद्ध जाते हैं, वे मानो मृत्यु से मिलने जाते हैं। परन्तु यहाँ परमेश्वर की प्रजा इससे अधिक दुःखदायी बुराई पर विलाप करती है, कि याजक नगर में मरे, शत्रुओं की तलवार से नहीं, वरन् अकाल से, जो मानो बुराइयों की चरम सीमा है। सो कहा गया है कि याजक और पुरनिये दोनों अकाल से नष्ट हुए, क्योंकि वे भोजन न पा सके। और जब यह कहा गया है कि उन्होंने प्राण को तृप्त करने के लिए भोजन ढूँढा, तो यहाँ साधारण भोजन और अकाल के उपचार के बीच एक विरोध समझना चाहिए; क्योंकि जब कभी हमें भूख लगती है, तो हम स्वभाव से भोजन ढूँढते हैं; परन्तु भविष्यद्वक्ता यहाँ इससे कुछ अधिक की ओर संकेत करता है, अर्थात् याजकों और पुरनियों ने भोजन ढूँढा, क्योंकि लम्बे उपवास ने उन्हें विवश किया था; और यह बहुत दुःखद बात थी कि याजक, जो आदर में श्रेष्ठ थे, और पुरनिये भी, इस प्रकार अभाव की दशा में पहुँचा दिए गए। यदि ऐसा साधारण लोगों के साथ होता, तो यह इतनी आश्चर्य की बात न होती; क्योंकि नगर के लम्बे घेरे ने उनकी सारी भोजन-सामग्री को समाप्त कर दिया था। परन्तु जब याजक, और वे भी जिनके पास धन था, भूख से इस प्रकार दबे हुए थे, तो हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि जिस अभाव का वर्णन भविष्यद्वक्ता करना चाहता था, वह चरम सीमा का था। आगे लिखा है, —

विलापगीत 1:20

20. हे यहोवा, देख, मैं संकट में हूँ, मेरी अन्तड़ियाँ ऐंठी जाती हैं, मेरा हृदय उलट गया है, क्योंकि मैं ने बहुत बलवा किया है। बाहर तो मैं तलवार से निर्वंश होती हूँ; और घर में मृत्यु विराज रही है।

20. Vide Jehova, quia afflictio mihi, (vel, augustia,) viscera mea conturbata sunt (alii, contracta;) eversum est cor meum interme, quia rebellando rebellavi; fris orbat gladius, domi tanquam mors.

प्रजा फिर परमेश्वर से प्रार्थना करने की ओर मुड़ती है: और जो पहले कहा जा चुका है उसे स्मरण रखना चाहिए, कि यिर्मयाह के ये विलाप अभक्तों की शिकायतों से भिन्न हैं; क्योंकि विश्वासी पहले तो यह मान लेते हैं कि वे परमेश्वर के हाथ से उचित रीति से ताड़ना पा रहे हैं, और दूसरे, वे उसकी दया पर भरोसा रखते और उसकी सहायता की विनती करते हैं। क्योंकि इन्हीं दो चिह्नों से, अर्थात् पश्चाताप और विश्वास से, कलीसिया अविश्वासियों से अलग पहचानी जाती है। विपत्तियों में आहें भरना और शोक करना, और अपने दुःखों पर विलाप भी करना, दोनों में समान है; परन्तु परमेश्वर की सन्तान अभक्तों से बहुत भिन्न है, क्योंकि वे उसके बलवन्त हाथ के नीचे अपने आप को दीन करते हैं, और मान लेते हैं कि वे दण्ड भोगने के योग्य हैं; और फिर, वे उद्धार की आशा को त्याग नहीं देते, वरन् उसकी दया की विनती करते हैं। तब भविष्यद्वक्ता प्रजा को फिर से परमेश्वर से यह प्रार्थना करते हुए प्रस्तुत करता है कि वह उन पर दृष्टि करे। क्योंकि अभक्त अपनी शिकायतें हवा में उँडेलते हैं; और जब कभी स्वभाव उन्हें यह सिखाता है कि उन्हें परमेश्वर को सम्बोधित करना चाहिए, तब भी सच्चे हृदय से कोई प्रार्थना नहीं उठती।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता ने यहाँ विश्वासियों को दिखाया कि उन्हें अपने सामान्य दुःखों पर किस प्रकार विलाप करना था, अर्थात् ऐसे कि वे परमेश्वर की ताड़नाओं को धीरज से सहें, और उसी से छुटकारा भी माँगें, यद्यपि उन्होंने उसके क्रोध को भड़काया था।

क्योंकि जब हम देखते हैं कि हम परमेश्वर के हाथ से दबाए जा रहे हैं, तो हम कुड़कुड़ाते नहीं, वरन् अपने पापों का ज्ञान हमें दीन करता है, और विश्वास हमारे शोक को संयमित करता है, जो अन्यथा सीमा से बाहर चला जाता। और जब हम इस प्रकार दीनता से परमेश्वर की शरण में भागते हैं, तो हम मानो अपने दुःखों को उसकी गोद में उतार देते हैं, जैसा कि भजन संहिता में कहा गया है, “अपना बोझ (या अपनी चिन्ताएँ) यहोवा पर डाल दे।” (भजन संहिता 55:22।)

सो वह पहले कहता है, हे यहोवा, देख, क्योंकि मुझ पर क्लेश है। फिर वह क्लेश की रीति को व्यक्त करता है, कि उसकी अन्तड़ियाँ बँधी हुई या व्याकुल थीं। यह शब्द {}חמרchemer से है, जो दोहराया गया है। कुछ लोग इसे {,}חמורchemur, अर्थात् गदहे, से निकालते हैं, और इसलिए इसका अनुवाद “बँधी हुई” करते हैं, जैसे गदहे पर बोझ कसकर बाँधा जाता है। परन्तु उन लोगों का मत अधिक सम्भव है जो इस शब्द को गारे या चूने-मसाले से निकालते हैं, क्योंकि जैसे गारा चूने और बालू में जल मिलाकर और उन्हें एक साथ हिलाकर बनाया जाता है, वैसे ही रूपक के द्वारा अन्तड़ियों को हिलाई हुई या व्याकुल कहा गया है; और यह व्याख्या आगे की बात से अधिक मेल खाती है — क्योंकि आगे जोड़ा गया है, मेरा हृदय उलट गया है। कारण बताया गया है, क्योंकि प्रजा ने बलवा करके बलवा किया था, अर्थात् परमेश्वर के विरुद्ध बहुत ही बलवा किया था। हम कह चुके हैं कि भक्तों की शिकायतें अभक्तों की शिकायतों से भिन्न हैं, क्योंकि वे न केवल परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं, वरन् सच्चा अंगीकार भी करते हैं, जिससे यह प्रकट हो जाए कि वे परमेश्वर के हाथ से उचित रीति से ताड़ना पा रहे हैं। पद के आरम्भ में विश्वासियों ने प्रार्थना की, और अब वे फिर घोषित करते हैं कि जो कुछ उन्होंने सहा उसके वे योग्य थे, क्योंकि वे बहुत बलवा करनेवाले रहे थे। फिर यिर्मयाह उनके दण्ड की गम्भीरता के विषय में जो कहना आरम्भ किया था, उसे आगे बढ़ाता है, वह कहता है, बाहर, या घर से बाहर, तलवार निर्वंश करती है, और घर में मृत्यु के समान है; अर्थात्, “जब हम बाहर जाते हैं, तो तलवार हमसे आ मिलती है; और जब हम घर में छिपते हैं, तो वहाँ भी अनेक मृत्युएँ हमें घेर लेती हैं।” वह समानता-सूचक अव्यय, समान या जैसा, प्रयुक्त करता है; मानो उसने कहा हो कि घर में उन्हें प्राणघातक वस्तु के सिवा और कुछ न मिला। अब आगे लिखा है, —

विलापगीत 1:21

21. उन्होंने सुना है कि मैं कराहती हूँ, मुझे कोई शान्ति नहीं देता। मेरे सब शत्रुओं ने मेरी विपत्ति का समाचार सुना है; वे इस से हर्षित हो गए कि तू ही ने यह किया है। परन्तु जिस दिन की चर्चा तू ने प्रचार करके सुनाई है उसे तू दिखा, तब वे भी मेरे समान हो जाएँगे।

21. Audierunt quod sum gemens, (hoc est, quod sim in luctu,) nec quisquam consolator mihi; omnes inimici mei audierunt malum meum, gavisi sunt quod tu feceris, et adduxeris diem, quem tu vocasti; atqui erunt sicuti ego.

क्रिया {,}שמעוshemou दो बार रखी गई है, परन्तु आरम्भ में बिना कर्ता के: इसलिए वाक्य तब तक अधूरा रहता है, जब तक दूसरे उपवाक्य में {}איביaibi शब्द व्यक्त नहीं किया जाता। यिर्मयाह स्पष्ट रूप से कहता है कि शत्रुओं ने उन विपत्तियों के विषय में सुना था जिनके नीचे प्रजा कष्ट उठा रही थी, अर्थात् यह कि वे आहें भर रहे थे, और कोई उन पर कृपा नहीं दिखाता था; क्योंकि सामान्यतः ऐसा होता है कि अभागों के प्रति सहानुभूति प्रकट की जाती है। इस बात से वह उनके दण्ड की गम्भीरता को बढ़ाकर दिखाता है, क्योंकि, जैसा पहले कहा गया, कोई ऐसा न था जो कुछ भी शान्ति दे। परन्तु यह दोहराया गया है कि शत्रुओं ने सुना था; क्योंकि जैसे निन्दा से अधिक कड़वा कुछ नहीं, वैसे ही विपत्तियों में हम मानो मनुष्यों की दृष्टि से अपने आप को हटा लेना चाहते हैं; परन्तु हमारी बुराई विशेष रूप से दुगुनी हो जाती है, जब हम शत्रुओं के लिए तमाशा बन जाते हैं; क्योंकि वे हमारी विपत्तियों से आनन्द पाते हैं, और फिर हम पर फूले नहीं समाते। सो जब चुनी हुई प्रजा ने कहा कि शत्रुओं ने सुना है, तो उन्होंने इस प्रकार दिखाया कि उनके दुःखों में और कुछ जोड़ा नहीं जा सकता था: उन्होंने सुना है, तो, कि मैं आहें भर रही थी और कोई मुझे शान्ति नहीं देता था। किसने सुना था? मेरे सब शत्रुओं ने; और वे आनन्दित हुए हैं कि तू ने यह किया है।

505 सब अनुवादों में, और तर्गुम में भी, “व्याकुल” या अशान्त अनुवाद है। क्योंकि यह द्विरुक्त रूप है, इसलिए क्रिया का अर्थ है अत्यन्त व्याकुल या अत्यन्त विचलित, या प्रचण्ड रूप से उथल-पुथल। — सं.

506 सेप्तुआजिन्त का अनुवाद यह है, — बाहर तलवार ने मुझे निर्वंश किया है, घर में मृत्यु के समान। सुरियानी और अरबी का भी यही आशय है। पहले अकाल से होनेवाली मृत्यु का उल्लेख करके, अब वह तलवार के विनाश को जोड़ता है। — सं.

यिर्मयाह संकेत करता प्रतीत होता है कि उनके शत्रु, यह पूरा निश्चय पाकर कि परमेश्वर अपनी प्रजा से अप्रसन्न है, इसी कारण और भी खुलकर आनन्दित हुए; और साथ ही उन्होंने यह विश्वास किया कि उन अभागे लोगों का, जिनसे परमेश्वर अप्रसन्न था, सब कुछ समाप्त हो चुका है। परन्तु मैं नहीं जानता कि यह मत ठीक आधार पर टिका है या नहीं। मैं इसे अस्वीकार तो नहीं करता, और न मैं किसी से विवाद करूँगा जो यह माने कि शत्रु इसलिए आनन्दित हुए क्योंकि उन्होंने सोचा कि परमेश्वर उस प्रजा का शत्रु बन गया है, जिसे उसने पहले चुना था और जिसकी रक्षा भी की थी: और न यह मत अनुपयुक्त है; क्योंकि त्यागे हुए लोग तब पूरी रीति से विजय का उत्सव मनाते हैं जब वे यह डींग मार सकते हैं कि परमेश्वर हमारे विरुद्ध है। परन्तु जब ऐसा कोई विचार उनके मन में नहीं आता, तब भी वे यह देखकर आनन्दित होना नहीं छोड़ते कि हम दबाए और दुःखी किए जा रहे हैं। सो चाहे वे परमेश्वर के हाथ के विषय में न सोचें, तौभी वे आनन्दित होते हैं कि यह किया गया है; अर्थात् वे आनन्दित होते हैं कि हम संकट में हैं, यद्यपि वे नहीं समझते कि इसका कर्ता कौन है। सो हम इसका अर्थ सीधे-सीधे यह ले सकते हैं कि कलीसिया के शत्रु उस विपत्ति पर आनन्दित हुए, बिना यह विचार किए कि उसका कर्ता कौन था।

परन्तु यह क्यों व्यक्त किया गया है कि परमेश्वर ने यह किया था? इसलिए कि यह दिखाया जाए कि जब अभक्त सोचते हैं कि भाग्य हमारे प्रतिकूल है, तब हमारा कर्तव्य है कि अपनी आँखें परमेश्वर पर लगाएँ, क्योंकि हमें उनके अन्धेपन के अनुसार बातों का न्याय नहीं करना चाहिए। सो जब वे परमेश्वर को न्यायी न मानकर उसे वह महिमा नहीं देते जो उसकी है, तब हमारे लिए सदा उचित है कि विश्वास की आँखों से वह देखें जो मनुष्यों की स्वाभाविक समझ से छिपा है, अर्थात् यह कि परमेश्वर के धर्ममय न्याय के बिना हम पर कुछ नहीं आता। सो यद्यपि शत्रुओं में यह जानने की बुद्धि न थी कि कलीसिया किस प्रकार दुःखी की गई, तौभी कलीसिया के लिए स्वयं उचित था कि विश्वास के द्वारा ऐसी भाषा बोले, कि परमेश्वर ने यह किया है; वे आनन्दित हुए कि तू ने यह किया है।

और आगे लिखा है, तू ने वह दिन ला दिया है जिसे तू ने पुकारा, या घोषित किया था; क्योंकि {,}קראkora का कभी-कभी यही अर्थ होता है। संक्षेप में, विश्वासी अब न केवल यह मान लेते हैं कि वे परमेश्वर के हाथ से दुःखी किए गए, वरन् यह भी कि जिसकी धमकी भविष्यद्वक्ताओं ने इतनी बार दी थी, और जिसे तुच्छ जाना गया था, वह अब पूरा हो गया। क्योंकि हम देख चुके हैं कि उस प्रजा ने भविष्यद्वक्ताओं द्वारा दी गई धमकियों को कितनी हठ से ठुकराया: परमेश्वर ने बार-बार उन्हें पश्चाताप करने के लिए समझाया था, और उनके लिए एक समय भी घोषित या ठहराया था, परन्तु कोई फल न निकला। इसलिए विश्वासी अब उस बात पर विचार करते हैं जो पहले भली भाँति नहीं जानी गई थी, अर्थात् यह कि वह दिन ला दिया गया जिसकी बार-बार घोषणा की गई थी। और इस प्रकार उन्होंने न केवल यह मान लिया कि वे दण्ड के योग्य थे, वरन् यह भी कि उनके ताड़ना पाने का यही उचित समय था, क्योंकि इतनी बार चेतावनी पाने के बाद भी उन्होंने पश्चाताप नहीं किया था।

507 हमारा अंग्रेज़ी अनुवाद इस उपवाक्य को भविष्यत् काल में अनुवाद करने में भूल करता है। संकेत बाबुलियों पर पलटा लेने के दिन की ओर नहीं, वरन् पलटा लेने के उस दिन की ओर है जो परमेश्वर ने अपनी ही प्रजा पर ला दिया था। सुरियानी को छोड़कर अन्य अनुवाद क्रिया को भूतकाल में देते हैं। यहाँ {{כי के अगले उपवाक्य तक चले जाने के दो उदाहरण हैं, — 21. उन्होंने सुना है कि मैं आहें भरती हूँ, कि मेरा कोई शान्तिदाता नहीं: मेरे सब शत्रुओं ने मेरी विपत्ति का समाचार सुना है; वे आनन्दित हुए हैं कि तू ने यह किया है, कि तू वह दिन ले आया है जिसकी तू ने घोषणा की थी; परन्तु वे भी मेरे समान हो जाएँगे। — सं.

वह जोड़ता है, परन्तु वे भी मेरे समान हो जाएँगे। यहाँ भविष्यत् काल को इच्छार्थक माना जा सकता है, क्योंकि तुरन्त एक प्रार्थना आती है जो इस मत की पुष्टि करती है। परन्तु हम इसका अर्थ सीधे-सीधे यह भी ले सकते हैं, — कि विश्वासियों ने हियाव बाँधना आरम्भ किया, क्योंकि वे उस समय की बाट जोहते थे जब परमेश्वर दुष्टों को उनके घमण्डी और तिरस्कारपूर्ण आनन्द के अनुसार बदला देगा। आगे लिखा है, —

विलापगीत 1:22

22. उनकी सारी दुष्टता की ओर दृष्टि कर; और जैसा मेरे सारे अपराधों के कारण तू ने मुझे दण्ड दिया, वैसा ही उनको भी दण्ड दे; क्योंकि मैं बहुत ही कराहती हूँ, और मेरा हृदय रोग से निर्बल हो गया है।

22. Veniet (aut, veniat) omnis malitia eorum in conspectum tuum, et facias illis, quemadmodum fecisti mihi super omnibus sceleribus meis; quia multa suspiria mea, et cor meum debile (vel, moestum.)

यहाँ, निःसन्देह, विश्वासियों ने उस न्याय को अपनी शान्ति का एक भाग माना जो परमेश्वर अन्त में अभक्तों पर करेगा; और इसमें कोई सन्देह नहीं कि इस प्रकार का शाप पवित्र आत्मा ने परमेश्वर की सन्तान को इसलिए सुझाया था कि जब वे भारी संकटों से दबे हों, तब वह उन्हें सम्भाले रखे; इसलिए नहीं कि परमेश्वर ने उन्हें अपने शत्रुओं से पलटा लेने की लालसा करने की ऐसी खुली छूट दे दी, परन्तु इसलिए कि जब वे लोग नष्ट हों जिन्होंने अपनी दुर्भावना को खुली छूट दी, तब विश्वासी उनके विनाश से छुटकारे की आशा प्राप्त करें; क्योंकि त्यागे हुए लोगों पर परमेश्वर का पलटा अपने साथ चुने हुए लोगों के प्रति पितृवत् कृपा का चिह्न लाता है।

और इस शाप का क्या अर्थ है, इसे भली भाँति समझने के लिए हमें पहले यह स्मरण रखना चाहिए कि हम शत्रुओं के विरुद्ध शिकायत नहीं कर सकते, जब तक कि वे परमेश्वर के भी शत्रु न हों। क्योंकि यदि मैं किसी को हानि पहुँचाऊँ, और वह क्रोध से प्रेरित होकर मुझे सताए, तो परमेश्वर के पास मेरी शिकायत की कोई पहुँच नहीं हो सकती, और इस उदाहरण से आड़ ढूँढना मेरे लिए व्यर्थ होगा; क्यों? क्योंकि जब कभी हम परमेश्वर के सामने जाते हैं, तो जैसा मैं कह चुका हूँ, आवश्यक है कि हमारे शत्रु उसके भी शत्रु हों। परन्तु, दूसरे, यह पर्याप्त न होगा, जब तक कि हमारा उत्साह भी शुद्ध न हो; क्योंकि जब हम अपने निजी पक्ष का बचाव करते हैं, तो हमारी प्रार्थनाओं में अवश्य कुछ न कुछ अति होगी। सो हम जान लें कि हमें अपने शत्रुओं पर शाप नहीं सुनाना चाहिए, जब तक कि, पहले, वे परमेश्वर के शत्रु न हों; और, दूसरे, जब तक कि हम अपने आप को अनदेखा न करें, और अपना पक्ष न लड़ें, वरन् इसके विपरीत, सब उपद्रवी भावनाओं को एक ओर रखकर, सार्वजनिक कुशल का पक्ष अपने हाथ में न लें; और विशेष करके, जब तक कि हमारा उत्साह परमेश्वर की महिमा करने की अभिलाषा से उत्पन्न न हो। सो इन शर्तों के साथ हम प्रार्थना के उस रूप को अपना सकते हैं जो भविष्यद्वक्ता ने यहाँ हमें दिया है। परन्तु क्योंकि इस विषय की व्याख्या अन्यत्र, और बार-बार तथा बहुत विस्तार से, की जा चुकी है, इसलिए मैं यहाँ इसे केवल संक्षेप में छूता हूँ।

सो वह कहता है, उनकी सारी दुष्टता तेरे सामने आए; उनसे वैसा ही कर जैसा तू ने मुझ से किया है। यहाँ फिर विश्वासी उन सब विपत्तियों का दोष, जिन्हें वे सह रहे थे, अपने ऊपर ले लेते हैं; क्योंकि वे परमेश्वर से वाद-विवाद नहीं करते, परन्तु केवल यह प्रार्थना करते हैं कि वह सारे संसार का न्यायी बने, ताकि अन्त में अभक्तों की भी बारी आए, जब परमेश्वर अपनी सन्तान के प्रति शान्त हो जाए। परन्तु आगे वे और भी स्पष्टता से व्यक्त करते हैं कि जो कुछ उन्होंने सहा, उस सब के वे योग्य थे — मेरे सब पापों के कारण। फिर वे जोड़ते हैं, क्योंकि मेरी आहें बहुत हैं और मेरा हृदय निर्बल है।

संक्षेप में, हम देखते हैं कि विश्वासी दीनता से अपनी प्रार्थनाएँ परमेश्वर के सामने रखते हैं, और साथ ही यह मान लेते हैं कि जो कुछ वे योग्य थे वही उन्हें दिया गया है, केवल वे परमेश्वर के सामने अपना अत्यन्त शोक, सकेती, दुःख, आँसू और आहें रखते हैं। सो परमेश्वर को शान्त करने का मार्ग यह है, कि सच्चाई से यह मान लें कि उसके न्याय से हमारी उचित सुधि ली गई है, और मानो लज्जित होकर दण्डवत् पड़े रहें, और साथ ही उसकी ओर दृष्टि उठाने का साहस करें, और भरोसे के साथ उसकी दया पर निर्भर रहें। अब दूसरा शोकगीत आता है,

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