यिर्मयाह और विलापगीत पर टीका · खण्ड 2 · विलापगीत 2

विलापगीत 2

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विलापगीत 2

विलापगीत 2:1

1. प्रभु ने सिय्योन की बेटी को किस प्रकार अपने कोप के बादलों से ढाँप दिया है! उसने इस्राएल की शोभा को आकाश से धरती पर पटक दिया, और कोप के दिन अपने पाँवों की चौकी को स्मरण नहीं किया!

1. Quomodo obnubilavit in iracundia sua Dominus filiam Sion, projecit a coelo in terram decorem Israel, et non recordatus est scabelli pedum suorum in dic iracundiae!

भविष्यद्वक्ता फिर से विस्मय के साथ पुकार उठता है कि एक अविश्वसनीय बात घटित हुई है, जो मानो कोई अद्भुत अनहोनी थी; क्योंकि पहली दृष्टि में यह अत्यन्त अनुचित प्रतीत होता था कि जिस प्रजा को परमेश्वर ने न केवल अपने अनुग्रह में ग्रहण किया था, वरन् जिसके साथ उसने सदा की वाचा बाँधी थी, वह इस प्रकार उसके द्वारा त्याग दी जाए। क्योंकि चाहे मनुष्य सौ बार भी विश्वासघाती हों, तौभी परमेश्वर कभी नहीं बदलता, वरन् अपनी सच्चाई में अटल बना रहता है; और हम जानते हैं कि उसकी वाचा मनुष्यों के गुणों पर निर्भर नहीं ठहराई गई थी। इसलिए प्रजा चाहे जैसी भी रही हो, तौभी परमेश्वर को उचित था कि वह अपनी युक्ति पर स्थिर रहे और अब्राहम से की गई प्रतिज्ञा को व्यर्थ न करे। अब जब यरूशलेम उजाड़ कर दिया गया, तब मानो परमेश्वर की वाचा का पूर्ण लोप हो गया। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि भविष्यद्वक्ता यहाँ मानो किसी अनहोनी के कारण पुकार उठता है, “यह कैसे हो सकता है कि परमेश्वर ने बादल से ढाँप दिया या अन्धकारमय कर दिया” इत्यादि।

तौभी हमें साथ ही यह ध्यान देना चाहिए कि भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय यहाँ परमेश्वर की सच्चाई या स्थिरता को निर्बल ठहराना नहीं था, वरन् इस रीति से अपनी जाति का ध्यान जगाना था, जो अपने आलस्य में सुन्न हो गई थी; क्योंकि यद्यपि वे विपत्तियों के बोझ तले दबे हुए थे, तौभी वे अपने हठ में कठोर हो गए थे। परन्तु यह असम्भव था कि कोई सचमुच परमेश्वर को पुकारे, जब तक कि वह मन में दीन न किया जाए और वह बलिदान न लाए जिसकी चर्चा हम कर चुके हैं, अर्थात् दीन और पिसा हुआ मन (भजन संहिता 51:19)। अतः भविष्यद्वक्ता का उद्देश्य उस कठोरता को नरम करना था, जिसे वह जानता था कि लगभग सारी प्रजा में व्याप्त थी। यही कारण था कि उसने एक प्रकार के विस्मय में पुकारकर कहा, “परमेश्वर ने कैसे बादल से ढाँप दिया है” इत्यादि।

कुछ लोग इन शब्दों का अनुवाद यों करते हैं, “परमेश्वर ने कैसे ऊँचा उठाया है” इत्यादि; यह माना जा सकता है, बशर्ते इसे अच्छे अर्थ में न लिया जाए, क्योंकि कहा गया है, अपने कोप में; परन्तु इस दशा में ऊँचा उठाना और नीचे पटकना इन शब्दों को एक साथ पढ़ना चाहिए; क्योंकि जब कोई मिट्टी के पात्र को चकनाचूर करना चाहता है, तो वह उसे केवल भूमि पर ही नहीं पटकता, वरन् पहले उसे ऊपर उठाता है, कि वह अधिक बल से नीचे पटका जाए। तब हम यह अर्थ ले सकते हैं कि परमेश्वर ने, इसलिए कि वह अपनी प्रजा को अधिक प्रचण्डता से चकनाचूर करे, उन्हें ऊँचा उठाया था, उनका आदर करने के लिए नहीं, वरन् इसलिए कि उन्हें और भी अधिक बल से भूमि पर पटके। परन्तु क्योंकि यह अर्थ कदाचित् अत्यधिक सूक्ष्म प्रतीत होता है, मैं पहली व्याख्या से ही सन्तुष्ट हूँ, कि परमेश्वर ने अपने कोप में सिय्योन की बेटी को बादल से ढाँप दिया था; और फिर उसकी व्याख्या आती है, कि उसने उसे आकाश से धरती पर पटक दिया था। अतः परमेश्वर ने अपनी प्रजा को अन्धकार से ढाँप दिया, जब उसने उन्हें उस ऊँची प्रतिष्ठा से नीचे खींच लिया जिसका वे कुछ समय तक आनन्द उठाते रहे थे। तब उसने इस्राएल की सारी महिमा को धरती पर पटक दिया था, और अपने पाँवों की चौकी को स्मरण नहीं किया।

यहाँ भविष्यद्वक्ता परोक्ष रूप से परमेश्वर से विवाद करता हुआ प्रतीत होता है, क्योंकि उसने अपने ही पवित्रस्थान को नहीं छोड़ा था; क्योंकि परमेश्वर ने, जैसा अभी कहा गया है, सिय्योन पर्वत को अपने लिए चुन लिया था, जहाँ वह चाहता था कि उससे प्रार्थना की जाए, क्योंकि उसने वहाँ अपने नाम का स्मारक स्थापित किया था। अतः जब उसने अपने ही पवित्रस्थान को नहीं छोड़ा, तो यह उसकी स्थिरता के अनुरूप प्रतीत नहीं होता था, और ऐसा भी लगता था कि उसने इस प्रकार अपनी ही महिमा की उपेक्षा कर दी है। परन्तु भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय तो यह है कि वह प्रजा को दिखाए कि परमेश्वर का कोप कितना भड़क उठा था, जब उसने अपने पवित्रस्थान को भी नहीं छोड़ा।

क्योंकि वह इस सिद्धान्त को मानकर चलता है कि परमेश्वर कभी अकारण क्रोधित नहीं होता, और दण्ड की उचित सीमा का कभी उल्लंघन नहीं करता। अतः जब परमेश्वर का कोप इतना बड़ा था कि उसने अपने ही मन्दिर को नष्ट कर दिया, तो यह भयानक कोप का चिह्न था; और इसका कारण मनुष्यों के पापों के सिवाय और क्या था? क्योंकि परमेश्वर, जैसा मैंने कहा है, अपने न्यायों में सदा संयम बनाए रखता है। इसलिए वह प्रजा के सामने उनके पापों की घोरता को इससे बढ़कर और किसी रीति से प्रकट नहीं कर सकता था कि उनके सामने यह तथ्य रखे कि परमेश्वर ने अपने पाँवों की चौकी को स्मरण नहीं किया।

और मन्दिर को एक अत्यन्त उपयुक्त रूपक के द्वारा परमेश्वर के पाँवों की चौकी कहा गया है। निःसन्देह उसे उसका निवासस्थान भी कहा गया है; क्योंकि पवित्रशास्त्र में मन्दिर को बहुधा परमेश्वर का भवन कहा गया है। तब वह परमेश्वर का भवन, उसका निवासस्थान और उसका विश्रामस्थान था। परन्तु क्योंकि मनुष्य सदा अन्धविश्वास की ओर झुके रहते हैं, इसलिए उनके विचारों को सांसारिक तत्त्वों से ऊपर उठाने के लिए, दूसरी ओर, पवित्रशास्त्र में हमें स्मरण दिलाया गया है कि मन्दिर परमेश्वर के पाँवों की चौकी था। इसी प्रकार भजन संहिता में लिखा है, “उसके चरणों की चौकी के सामने दण्डवत् करो” (भजन संहिता 99:5); और फिर, “हम उस स्थान में दण्डवत् करेंगे जहाँ उसके पाँव खड़े रहते हैं” (भजन संहिता 132:7)।

508 यहाँ क्रिया भविष्यत्काल में है, और इस वाक्यांश का अनुवाद यों किया जा सकता है,— प्रभु अपने कोप में सिय्योन की बेटी को क्यों बादल से ढाँपे? और यदि विलापगीत 1:1 में {,{ישבה भविष्यत्काल में हो, जैसा कि सम्भव है, तो उस वाक्यांश का अनुवाद भी इसी रीति से किया जा सकता है,— जो नगरी लोगों से भरी थी, वह क्यों अकेली बैठे? फिर यहाँ, पहले उदाहरण के समान, इसका वर्णन आता है कि सिय्योन पर क्या बीता था,— उसने इस्राएल की महिमा को आकाश से धरती पर पटक दिया है, और अपने कोप के दिन अपने पाँवों की चौकी को स्मरण नहीं किया। साथ ही, इन दोनों वाक्यांशों का अनुवाद वैसा भी किया जा सकता है जैसा विलापगीत 1:1 की एक टिप्पणी में प्रस्तावित किया गया था, और क्रियाओं के काल ज्यों के त्यों रखे जा सकते हैं। यहाँ क्रिया स्पष्ट रूप से भविष्यत्काल में है, और पहले उदाहरण में भी क्रिया ऐसी हो सकती है; और इब्रानी में भविष्यत्काल को बहुधा वर्तमानकाल के रूप में लेना होता है, जैसा कि वेल्श भाषा में भी होता है। यह क्या! अपने कोप में बादल से ढाँपता है प्रभु सिय्योन की बेटी को! — सं.

अतः हम देखते हैं कि ये दोनों अभिव्यक्तियाँ, जो देखने में भिन्न लगती हैं, फिर भी भली-भाँति मेल खाती हैं, कि मन्दिर परमेश्वर का भवन और उसका निवासस्थान था, और फिर भी वह केवल उसके पाँवों की चौकी था। वह परमेश्वर का भवन था, क्योंकि विश्वासियों ने अनुभव से जान लिया था कि वह वहाँ उपस्थित था; अतः जब परमेश्वर ने अपनी उपस्थिति के चिह्न दिए, तो मन्दिर उचित ही परमेश्वर का भवन, उसका विश्रामस्थान और निवासस्थान कहलाया। परन्तु इसलिए कि विश्वासी अपने मन को दृश्य पवित्रस्थान पर न टिका दें, और इस प्रकार किसी स्थूल कल्पना में पड़कर अन्धविश्वास में न गिरें और परमेश्वर के स्थान पर कोई मूरत न रख दें, मन्दिर को परमेश्वर के पाँवों की चौकी कहा गया। क्योंकि जब वह पाँवों की चौकी था, तो विश्वासियों को उचित था कि वे और ऊपर उठें और जानें कि परमेश्वर को सचमुच तभी खोजा जाता है जब वे अपने विचारों को संसार से ऊपर उठाते हैं। अब हम समझते हैं कि इस प्रकार की वाणी का उद्देश्य क्या था।

कहा गया है कि परमेश्वर ने अपने मन्दिर को स्मरण नहीं किया, इसलिए नहीं कि उसने उसकी पूर्ण रूप से उपेक्षा कर दी थी, वरन् इसलिए कि मन्दिर का विनाश मनुष्यों के मन में कोई और धारणा उत्पन्न नहीं कर सकता था। अतः जितनों ने देखा कि मन्दिर अपवित्र हाथों से जला दिया गया है, और लूटे जाने के बाद ढा दिया गया है, उन सब ने यही सोचा कि मन्दिर परमेश्वर द्वारा त्याग दिया गया है; और वह यहेजकेल के द्वारा भी ऐसा ही कहता है (यहेजकेल 10:18)। तब यह विस्मरण, या स्मरण न करना, मनुष्यों के विचारों से सम्बन्ध रखता है; क्योंकि परमेश्वर ने चाहे मन्दिर को कितना ही स्मरण रखा हो, तौभी कुछ समय तक ऐसा प्रतीत हुआ मानो उसने उसकी उपेक्षा कर दी हो। साथ ही हमें वह बात स्मरण रखनी चाहिए जो मैंने कही है, कि भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय यहाँ परमेश्वर से विवाद करना या उससे झगड़ना नहीं था, वरन् इसके विपरीत यह दिखाना था कि प्रजा किस योग्य थी; क्योंकि परमेश्वर उनके पापों के कारण इतना क्रोधित था कि उसने अपने ही मन्दिर को अपवित्र होने दिया। यही बात राज्य के विषय में भी आगे आती है,—

विलापगीत 2:2

2. प्रभु ने याकूब की सब बस्तियों को निगल लिया है, और तरस नहीं खाया; उसने रोष में आकर यहूदा की बेटी के दृढ़ गढ़ों को ढा दिया है; उसने उन्हें मिट्टी में मिला दिया है; उसने राज्य और उसके हाकिमों को अपवित्र ठहराया है।

2. Perdidit Dominus, non pepercit (hoc est, non parcendo, absque venia) omnia habitacula Jacob; diruit in excandescentia sua munitiones filiae Jehudah; detraxit ad terram: profanavit regnum ejus et principes ejus.

वह उसी विषय को आगे बढ़ाता है, परन्तु अन्य शब्दों में। पहले वह कहता है कि परमेश्वर ने बिना क्षमा किए याकूब की सब बस्तियों को नष्ट कर दिया था; कुछ लोग पढ़ते हैं, “याकूब की सारी सुन्दरता (या शोभा)।” परन्तु दूसरा अनुवाद अधिक उपयुक्त है, कि उसने याकूब की सब बस्तियों को नष्ट कर दिया था; और फिर यह कि उसने अपने रोष में ढा दिया था, इत्यादि।

यह शब्द उस धातु से निकला है जिसका अर्थ अतिरेक है; परन्तु हम जानते हैं कि कोप को सूचित करनेवाले सब शब्द परमेश्वर पर लागू किए जाते हैं, यद्यपि वे यथार्थ में उस पर लागू नहीं होते। अतः परमेश्वर ने अपने प्रचण्ड कोप में सब गढ़ों को ढा दिया था और उन्हें भूमि पर गिरा दिया था; और इसके बाद यह कि उसने अपवित्र ठहराया था, इत्यादि।

राज्य और हाकिमों का यह अपवित्र ठहराया जाना पिछले पद से मेल खाता है, जहाँ उसने कहा था कि परमेश्वर ने अपने पाँवों की चौकी को स्मरण नहीं किया; क्योंकि हम जानते हैं कि वह राज्य याजकीय था और परमेश्वर को समर्पित था। अतः जब वह अशुद्ध किया गया, तो इसका परिणाम यह हुआ कि परमेश्वर ने एक प्रकार से अपने नाम को निन्दा के लिए खोल दिया, क्योंकि इस प्रकार सब दुष्टों का मुँह खुल गया, यहाँ तक कि वे ढिठाई से अपनी निन्दा की बातें उँडेलने लगे।

तब जब परमेश्वर ने न राज्य को छोड़ा न मन्दिर को, तो इससे यह निष्कर्ष निकला कि यहूदियों के विरुद्ध उसका कोप भयानक था। अब, क्योंकि वह धर्मी न्यायी है, इसलिए यह निष्कर्ष निकलता है कि यहूदियों के पाप इतने बड़े थे कि इस चरम अपवित्रता का दोष उन्हीं पर पड़ा; क्योंकि उन्हीं के पापों के कारण परमेश्वर का नाम मन्दिर और राज्य दोनों के विषय में निन्दा का पात्र बना।

प्रार्थना।

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अनुग्रह कर कि जैसे तू आज के दिन हमारे सामने वे प्राचीन उदाहरण रखता है, जिनके द्वारा हम देखते हैं कि तूने उन लोगों को, जिन्हें तूने गोद लिया था, कैसे भारी दण्डों से ताड़ना दी,— हाँ, ऐसा अनुग्रह कर कि हम तेरी ओर दृष्टि लगाना, और अपने सारे जीवन को सावधानी से जाँचना, और उचित रीति से यह विचार करना सीखें कि तूने आज तक कितनी कोमलता से हमारी रक्षा की है, ताकि हम सदा धीरज से तेरी ताड़नाओं को सहें, और दीन और निष्कपट मन से तेरी दया की शरण लें, जब तक कि तू अपनी कलीसिया को उस दयनीय दशा से, जिसमें वह अब पड़ी है, उठाने और उसे ऐसा पुनःस्थापित करने में प्रसन्न न हो, कि तेरा नाम तेरे एकलौते पुत्र के द्वारा सारे संसार में महिमा पाए। — आमीन।

पाँचवाँ व्याख्यान

विलापगीत 2:3

3. उसने भड़के हुए कोप में इस्राएल के सब सींग काट डाले हैं; उसने शत्रु के सामने से अपना दाहिना हाथ खींच लिया है, और उसने चारों ओर भस्म करती हुई धधकती आग की नाईं याकूब को जला दिया है।

3. Confregit in excandescentia irae suae omne cornu Israelis: retraxit (vel, redire fecit) retrorsum dexteram suam a facie inimici, et exarsit in Jacob tanquam ignis, flamma devoravit in circuitu.

यिर्मयाह एक ही बात को विभिन्न रीतियों से व्यक्त करता है; परन्तु जो कुछ वह कहता है उसका उद्देश्य यह दिखाना है कि जब प्रजा, नगर और मन्दिर नष्ट किए गए, तो यह परमेश्वर के चरम पलटा लेने का प्रमाण था। परन्तु यह ध्यान देने योग्य है कि यहाँ परमेश्वर को उस विपत्ति का कर्ता दिखाया गया है: नहीं तो भविष्यद्वक्ता अपने देश के विनाश पर व्यर्थ ही विलाप करता; परन्तु क्योंकि वह सब विपत्तियों में परमेश्वर का हाथ मानता था, इसलिए उसने आगे यह भी जोड़ा कि परमेश्वर के पास उचित कारण था कि वह अपनी प्रजा से इतना अधिक अप्रसन्न क्यों था।

फिर वह कहता है कि परमेश्वर ने हर एक सींग तोड़ डाला था। हम जानते हैं कि सींग से बल और साथ ही श्रेष्ठता या प्रतिष्ठा का अर्थ लिया जाता है, और मैं यहाँ दोनों को सम्मिलित करने के पक्ष में हूँ, यद्यपि तोड़ना शब्द बल या सामर्थ्य की ओर अधिक संकेत करता प्रतीत होता है। परन्तु सारे वाक्यांश पर ध्यान देना चाहिए, कि परमेश्वर ने अपने कोप के रोष में इस्राएल का हर एक सींग तोड़ डाला था। भविष्यद्वक्ता संकेत करता है कि परमेश्वर अपनी प्रजा से इस प्रकार क्रोधित नहीं हुआ था मानो वह छोटे-छोटे अपराधों से अप्रसन्न हुआ हो, वरन् उसके कोप का परिमाण असाधारण था, अर्थात् इसलिए कि प्रजा की अभक्ति इतनी फूट निकली थी कि परमेश्वर को जो ठेस पहुँचाई गई वह छोटी नहीं हो सकती थी। फिर, कोप के रोष से भविष्यद्वक्ता का अर्थ कोई अतिरेक नहीं है, मानो परमेश्वर किसी प्रचण्ड आवेग में आकर पलटा लेने को टूट पड़ा हो; वरन् वह यह संकेत करता है कि प्रजा इतनी दुष्ट हो गई थी कि परमेश्वर के लिए उचित नहीं था कि वह ऐसी पुरानी जमी हुई अभक्ति को साधारण रीति से दण्ड दे।

फिर वह आगे कहता है कि परमेश्वर ने शत्रु के सामने से अपना दाहिना हाथ खींच लिया था, और साथ ही वह ऐसी आग की नाईं जल उठा था जिसकी लौ ने चारों ओर सब कुछ भस्म कर दिया था। भविष्यद्वक्ता यहाँ दो बातों का उल्लेख करता है; पहली यह है कि यद्यपि परमेश्वर अपनी प्रजा की सहायता करने और उनके शत्रुओं का सामना करने का अभ्यस्त था, जैसा कि उन्होंने बड़े से बड़े संकटों में उसकी सहायता का अनुभव किया था, तौभी अब उसकी प्रजा त्याग दी गई थी और सारी आशा से रहित छोड़ दी गई थी। अतः पहला वाक्यांश यह घोषित करता है कि परमेश्वर पहले के समान अपनी प्रजा का छुड़ानेवाला नहीं होगा, क्योंकि उन्होंने उसे त्याग दिया था। परन्तु वह अलंकारिक रूप में कहता है कि परमेश्वर ने अपना दाहिना हाथ खींच लिया था; और परमेश्वर के दाहिने हाथ का अर्थ उसकी रक्षा है, जैसा कि भली-भाँति ज्ञात है। परन्तु भविष्यद्वक्ता का अर्थ किसी प्रकार भी अस्पष्ट नहीं है, अर्थात् यह कि अब आगे को यह आशा नहीं रही कि परमेश्वर अपनी प्रजा के शत्रुओं का सामना करेगा और इस प्रकार उन्हें सुरक्षित रखेगा, क्योंकि उसने अपना हाथ खींच लिया था।

परन्तु एक दूसरी बात भी जोड़ी गई है, अर्थात् यह कि परमेश्वर का हाथ आग की नाईं जल उठा। अब यह अपने आप में एक कष्टदायक बात थी कि प्रजा परमेश्वर द्वारा इस प्रकार ठुकरा दी गई थी कि उससे किसी सहायता की आशा नहीं की जा सकती थी; परन्तु इससे भी कठिन बात यह थी कि वह अपनी प्रजा को नष्ट करने के लिए हथियार बाँधकर निकल पड़ा। और आग के रूपक पर ध्यान देना चाहिए; क्योंकि यदि वह केवल यह कहता कि परमेश्वर का दाहिना हाथ उसकी प्रजा के विरुद्ध था, तो वह कथन इतना प्रबल न होता; परन्तु जब उसने परमेश्वर के दाहिने हाथ की तुलना ऐसी आग से की जो जलती थी और जिसकी लौ ने सारे इस्राएल को भस्म कर दिया, तो यह कहीं अधिक भयानक बात थी।

इसके अतिरिक्त, इन शब्दों के द्वारा इस्राएलियों को स्मरण दिलाया गया कि उन्हें अपनी विपत्तियों पर साधारण रीति से विलाप नहीं करना था, वरन् इसके विपरीत उन्हें अपनी सब बुराइयों के कारण पर गम्भीरता से विचार करना चाहिए था, अर्थात् अपने ही विरुद्ध परमेश्वर के कोप को भड़काना; और केवल इतना ही नहीं, वरन् यह भी कि परमेश्वर उनसे असाधारण मात्रा में क्रोधित था, और फिर भी न्यायपूर्वक, ऐसा कि उनके पास शिकायत करने का कोई कारण नहीं था। आगे लिखा है,

विलापगीत 2:4

4. उसने शत्रु बनकर अपना धनुष चढ़ाया, और बैरी बनकर दाहिना हाथ उठाए खड़ा रहा, और जितने देखने में मनभावने थे उन सब को सिय्योन की बेटी के तम्बू में घात किया; उसने आग की नाईं अपनी जलजलाहट उँडेल दी।

4. Extendit arcum suum tanquam inimicus, stetit dextera ejus tanquam adversarius, et occidit omnex desiderabiles aspectu (oculo) in tabernaculo filiae Sion (vel, in tabernaculum filiae Sion); effudit tanquam ignem Iracundiam suam.

अब वह एक और रूपक का प्रयोग करता है, कि परमेश्वर, जो अपनी प्रजा की रक्षा करने का अभ्यस्त था, अब उनके विरुद्ध हथियार उठा चुका था; क्योंकि अंश को पूर्ण के स्थान पर रखते हुए वह धनुष में अन्य सब हथियारों को सम्मिलित करता है। अतः जब वह कहता है कि परमेश्वर ने अपना धनुष चढ़ाया था, तो यह ऐसा ही है मानो वह कहता कि वह पूरी रीति से हथियारबन्द था। तब धनुष का अर्थ, जैसा हम पहले देख चुके हैं, हर प्रकार का हथियार है। फिर वह आगे कहता है कि उसका दाहिना हाथ बैरी के समान खड़ा रहा। यहाँ वह उस बात का और भी स्पष्ट वर्णन करता है जिसे उसने पहले छुआ था, अर्थात् यह कि परमेश्वर ने न केवल अपनी प्रजा को उनके शत्रुओं की इच्छा पर छोड़ दिया था, वरन् उसने स्वयं उनके शत्रुओं के लिए झण्डा ऊँचा किया था, और हथियारबन्द हाथ के साथ उनके आगे-आगे चला था। और इसमें कोई सन्देह नहीं कि परमेश्वर के दाहिने हाथ से उसका अर्थ उनके सब शत्रु हैं; क्योंकि प्रजा के मन पर यह तथ्य सावधानी से अंकित करना आवश्यक था कि वह युद्ध कसदियों के द्वारा नहीं लाया गया था, वरन् परमेश्वर ने उसके द्वारा प्रजा की दुष्टता को, और विशेषकर उनके निराशाजनक हठ को, दण्ड देने का निश्चय किया था, क्योंकि उसने प्रजा को सीधे मार्ग पर लौटा लाने के लिए कुछ भी उठा नहीं रखा था।

509 गैटेकर, हेनरी, ब्लेनी और हेंडरसन “दाहिने हाथ” को इस्राएल का हाथ मानते हैं,— कि परमेश्वर ने इस्राएल के दाहिने हाथ को पीछे खींच लिया या रोक दिया, यहाँ तक कि उसमें अपने शत्रुओं का सामना करने की शक्ति न रही। परन्तु स्कॉट कैल्विन से सहमत है; और इसी मत के पक्ष में प्राचीन अनुवाद भी हैं, सुरियानी (Syr.) को छोड़कर, क्योंकि वे सर्वनाम का अनुवाद “उसका अपना — suam” करते हैं: तरगुम (Targ.) भी यही मत रखता है। यदि शब्द “हाथ” होता, तो वह इस्राएल पर लागू किया जा सकता था; परन्तु वह “दाहिना हाथ” है, जिसका अर्थ सामान्यतः रक्षा है, या यों कहें कि परमेश्वर की वह सामर्थ्य जो अपनी प्रजा की रक्षा करने और शत्रुओं का सामना करने के लिए प्रकट की जाती है। इसकी और भी पुष्टि अगले पद के इस कथन से होती है कि परमेश्वर “बैरी के समान अपना दाहिना हाथ लिए खड़ा रहा।” देखिए भजन संहिता 74:11 — सं.

510 अन्तिम वाक्यांश का शाब्दिक अनुवाद यों किया जा सकता है,— और वह याकूब में आग की नाईं जल उठा, लौ ने चारों ओर भस्म कर दिया। — सं.

अतः जब कभी यहाँ परमेश्वर का उल्लेख किया जाता है, तो हम जान लें कि प्रजा को, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, स्मरण दिलाया जाता है कि उनका काम परमेश्वर से था, ऐसा न हो कि वे इसे भूल जाएँ, या यह सोचें कि यह प्रतिकूल भाग्य था, या अपनी बुराइयों के किन्हीं अन्य कारणों की कल्पना करें, जैसा कि मनुष्य इस विषय में अपने आप को धोखा देने में बहुत चतुर हुआ करते हैं।

और यह हम आगे चलकर और भी स्पष्ट रूप से देखेंगे, जहाँ कहा गया है कि परमेश्वर ने यरूशलेम की शहरपनाह को नष्ट करने की ठानी थी; परन्तु यह ठानना उसकी आज्ञप्ति के ही समान था। तब भविष्यद्वक्ता वहाँ उस बात को और भी पूरी रीति से समझाता है जो सार रूप में यहाँ भी पाई जाती है, अर्थात् यह कि परमेश्वर को इस प्रकार प्रजा के सामने लाया गया, कि वे उसके सामर्थी हाथ के नीचे अपने आप को दीन करना सीखें। परमेश्वर का हाथ वास्तव में दिखाई नहीं देता था, परन्तु भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि केवल कसदियों की ओर ही नहीं देखना था, वरन् परमेश्वर के उस गुप्त हाथ को, जिसके द्वारा वे चलाए जा रहे थे, विश्वास की आँखों से देखना चाहिए था। अतः परमेश्वर का यही हाथ प्रजा के विरुद्ध खड़ा था।

फिर आगे लिखा है, उसने सब चुने हुए पुरुषों को घात किया; कुछ लोग पढ़ते हैं, “सब मनभावनी वस्तुएँ”; परन्तु यह अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है कि यहाँ मनुष्यों को अभिप्रेत समझा जाए, मानो वह कहता कि प्रजा का फूल, अर्थात् उत्तम जन, सिय्योन की बेटी के तम्बू में परमेश्वर के हाथ से नाश हुए; यद्यपि अन्तिम वाक्यांश पद के अन्त के साथ अधिक अच्छी रीति से जुड़ेगा, कि सिय्योन की बेटी के तम्बू पर परमेश्वर ने अपना कोप, या अपना क्रोध, आग की नाईं उँडेल दिया था।

वह उस रूपक को दोहराता है जिसका प्रयोग उसने पिछले पद में किया था; और इस पर हमें सावधानी से ध्यान देना चाहिए; क्योंकि परमेश्वर यशायाह के द्वारा धमकी देता है कि वह अपने शत्रुओं को भस्म करने के लिए आग बनेगा: “इस्राएल की ज्योति तो आग ठहरेगी, और इस्राएल का पवित्र ज्वाला ठहरेगा; और वह सब झाड़-झंखाड़ और सब प्रकार की लकड़ी को भस्म कर देगी” (यशायाह 10:7)।

वहाँ परमेश्वर ने कसदियों को धमकी दी, मानो वह कहता था कि उसका पलटा भयानक होगा, जब वह अपनी प्रजा के संरक्षक और रक्षक के रूप में कसदियों से लड़ेगा। वहाँ वह अपने आप को इस्राएल की ज्योति और पवित्र कहता है; और इसीलिए उसने कहा कि वह कसदियों के लिए आग और ज्वाला ठहरेगा। परन्तु यहाँ वह क्या कहता है? यही कि परमेश्वर ने अपना कोप आग की नाईं उँडेल दिया था, कि उसकी लौ ने इस्राएल में जो कुछ देखने में सुन्दर था उसे चारों ओर भस्म कर दिया था। इससे हम देखते हैं कि प्रजा ने परमेश्वर के उस पलटे को अपने ही विरुद्ध भड़का लिया था, जो अन्यथा उनके शत्रुओं पर उँडेला जाता; और इस प्रकार प्रजा का पाप दुगना हो गया। आगे लिखा है,—

विलापगीत 2:5

5. प्रभु शत्रु बन गया, उसने इस्राएल को निगल लिया है, उसने उसके सारे महलों को निगल लिया है; उसने उसके दृढ़ गढ़ों को नष्ट कर डाला है, और यहूदा की बेटी में रोना-पीटना बहुत बढ़ाया है।

5. Fuit Dominus tanquam hostis, perdidit Israelem, perdidit omnia palatia ejus, corrupit munitiones ejus, auxit in filia Jehudah fletum Et lamentationem.

ये शब्द अनावश्यक प्रतीत हो सकते हैं, क्योंकि भविष्यद्वक्ता बार-बार दोहरा चुका है कि परमेश्वर अपनी ही प्रजा का शत्रु बन गया था; परन्तु हम आगे देखेंगे कि यद्यपि वे अत्यन्त दुःखित थे, तौभी उन्होंने ठीक से विचार नहीं किया कि उनकी विपत्ति कहाँ से उत्पन्न हुई थी। अतः क्योंकि वे अपनी बुराइयों के कारण इतने जड़ हो गए थे कि अपनी आँखें परमेश्वर की ओर नहीं फेरते थे, इस कारण उन्हें बार-बार उकसाया और उभारा गया, कि वे अन्त में अपनी बुराइयों के द्वारा समझ लें कि परमेश्वर न्यायी है। अब, क्योंकि उन्हें इस सत्य का निश्चय दिलाना कठिन था, इसलिए भविष्यद्वक्ता ने इसे संक्षेप में छू देना पर्याप्त नहीं समझा, वरन् इस पर विस्तार से ठहरना आवश्यक पाया, कि प्रजा अन्त में अपनी संवेदनहीनता से जाग उठे।

तब वह कहता है कि परमेश्वर स्वयं उनके लिए शत्रु के समान था, ऐसा न हो कि इस्राएली अपनी आँखें कसदियों पर टिका दें, और इस प्रकार यह सोचें कि वे ही युद्ध के मुख्य कर्ता थे। इसलिए वह कहता है कि उन्होंने परमेश्वर की गुप्त प्रेरणा से वह युद्ध आरम्भ किया था, और उसे सफलता से चलाया था, क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें अपनी सामर्थ्य से भर दिया था। और इससे विश्वासियों को यह निष्कर्ष निकालना चाहिए था कि परमेश्वर को अपना विरोधी बना लेने से बढ़कर कष्टदायक और कुछ नहीं हो सकता; क्योंकि जब तक उन्होंने अपने आप को परमेश्वर के हाथ से बचाए जाने दिया, तब तक वे, जैसा हम जानते हैं, अपने सब शत्रुओं पर विजयी रहे, यहाँ तक कि वे तब सब संकटों का निडर होकर सामना कर सकते थे। अब भविष्यद्वक्ता उन्हें स्मरण दिलाता है कि जैसे वे परमेश्वर की रक्षा और संरक्षण के अधीन सफल और समृद्ध रहे थे, वैसे ही अब वे दुःखी थे, और इसका कोई और कारण नहीं था सिवाय इसके कि परमेश्वर उनके विरुद्ध लड़ रहा था। परन्तु साथ ही हमें वह सत्य स्मरण रखना चाहिए जिस पर हम ध्यान दे चुके हैं, कि परमेश्वर कभी अकारण मनुष्यों से क्रोधित नहीं होता; और क्योंकि वह विशेष रूप से अपनी प्रजा पर कृपा दिखाने की ओर झुका हुआ था, इसलिए हमें समझना चाहिए कि यदि आवश्यकता ने उसे विवश न किया होता, तो वह इस प्रकार क्रुद्ध न होता।

वह कहता है, उसने इस्राएल को नष्ट कर दिया है; उसने उसके सारे महलों को नष्ट कर दिया है; और इसके बाद, उसने उसके सब गढ़ों को तितर-बितर या ध्वस्त कर दिया है; और अन्त में, उसने यहूदा की बेटी में रोना और विलाप बढ़ा दिया है; {}תאניה{ }ואניהtanie veanie, ये शब्द एक ही धातु से निकले हैं, परन्तु बात को बढ़ाकर कहने के लिए एक साथ जोड़े गए हैं, न केवल इस स्थान में, वरन् यशायाह के उनतीसवें अध्याय में और अन्य स्थानों में भी। अर्थ यह है कि परमेश्वर ने अपने पलटे का अन्त नहीं किया था, क्योंकि प्रजा ने अपनी हठीली दुष्टता का अन्त करने का निश्चय नहीं किया था। इसके बाद वह आगे कहता है,—

विलापगीत 2:6

6. और उसने अपने मण्डप को बारी के मचान की नाईं बलपूर्वक उखाड़ लिया है; उसने अपने सभा-स्थानों को नाश किया है; यहोवा ने सिय्योन में नियत पर्वों और विश्रामदिनों को भुला दिया है, और अपने भड़के हुए कोप में राजा और याजक दोनों का तिरस्कार किया है।

6. Et transtulit (vel, dissipavit, vel evertit) tanquam hortum tabernaculum suum (alii vertunt, tabernaculum suum tanquam hortum,) perdidit testimonium suum, oblitus est Jehova in Sion conven tus solemnis (vel, sacrificii) et sabbathi, et quidem sunt voces, sed ego non adeo scrupulose distinguo) regem et sacerdotem.

तब वह पहले कहता है कि परमेश्वर ने अपने मण्डप को उलट दिया था। जो लोग इसका अनुवाद “झोंपड़ी” करते हैं, वे कही गई बात को बहुत हल्का कर देते हैं; और न भविष्यद्वक्ता परमेश्वर के पवित्रस्थान की तुलना केवल एक झोंपड़ी से करता है। इसलिए मैं मण्डप को अच्छे अर्थ में लेता हूँ। क्रिया {,}חמםchemes के विषय में, क्योंकि उसका अर्थ स्थानान्तरित होना है, मेरे विचार में वे इसका ठीक अनुवाद करते हैं जो यह अर्थ देते हैं कि परमेश्वर ने अपना मण्डप हटा दिया था; और मैं मण्डप शब्द को दोहराने को भी अनुचित नहीं समझता। तब परमेश्वर ने अपने मण्डप को ऐसे हटा दिया था मानो वह बारी की एक झोंपड़ी हो। जैसा कि यशायाह के पहले अध्याय से प्रकट होता है, पहरेदारों की उस समय अपनी बारियों में झोंपड़ियाँ होती थीं, परन्तु केवल कुछ समय के लिए, जैसा कि आज भी उन लोगों के साथ होता है जो अपनी दाख की बारियों की रखवाली करते हैं; अंगूर तोड़ने के समय तक उनके पास छोटी-छोटी कोठरियाँ होती हैं जिनमें वे छिपे रहते हैं। तब भविष्यद्वक्ता कहता है कि यद्यपि परमेश्वर का मण्डप आदरणीय और ऊँची प्रतिष्ठा का था, तौभी वह बारी की एक झोंपड़ी के समान हो गया। तौभी, जैसा पहले कहा गया, यह कोई साधारण तुलना नहीं है, और इसलिए मैं उन लोगों का मत अस्वीकार करता हूँ जो इसका अनुवाद झोंपड़ी करते हैं, क्योंकि वह उपयुक्त नहीं है, और वह अर्थहीन होगा। तब परमेश्वर ने अपने मण्डप को, अर्थात् उस पवित्रस्थान को जिसमें वह निवास करता था, बारी की नाईं हटा दिया है। और उसने उसे कैसे हटाया? बारी की झोंपड़ी के समान।

और जैसे बारियों के रखवाले अपनी छोटी-छोटी झोंपड़ियाँ पेड़ों के पत्तों और हल्की सामग्री से बनाया करते थे, वैसे ही भविष्यद्वक्ता, करुणा को बढ़ाने के लिए, कहता है कि परमेश्वर का पवित्र निवासस्थान बारी की एक झोंपड़ी के समान था, क्योंकि वह एक स्थान से दूसरे स्थान पर हटा दिया गया; और इस प्रकार वह संकेत करता है कि जिसे परमेश्वर ने पहले अनुपम उत्तमताओं से सुशोभित किया था, उसे अब उसने कुछ भी न समझा।

फिर वह आगे कहता है कि परमेश्वर ने अपनी साक्षी को नष्ट कर दिया था। {,}מועדmuod शब्द से उसका अर्थ सर्वत्र एक ही है; परन्तु कुछ लोग इसे वाचा के सन्दूक तक सीमित करते हैं, और मैं इसे अनुचित नहीं समझता। तौभी हमें भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय स्मरण रखना चाहिए, जो यह दिखाना था कि मन्दिर के पूर्ण विनाश के द्वारा परमेश्वर की वाचा एक प्रकार से लोप हो गई थी। यह तो निश्चित है कि परमेश्वर अपनी सच्चाई और स्थिरता को नहीं भूला था, परन्तु उसकी वाचा का यह लोप उस बात से सम्बन्ध रखता है जो मनुष्यों को दिखाई देती थी। तब वह कहता है कि वह पवित्रस्थान, जो मानो परमेश्वर के अनुग्रह की साक्षी था, उलट दिया गया था। अब, क्योंकि वह {,}מועדmuod शब्द को फिर दोहराता है, सम्भव है कि वह इस प्रकार मिलापवाले तम्बू की ओर संकेत करता हो, या तो इसलिए कि पवित्र सभाएँ वहाँ एकत्र होती थीं, या इसलिए कि वह गम्भीरता से समर्पित किया गया था, कि परमेश्वर वहाँ अपनी प्रजा के साथ संगति रखे। क्योंकि {,}מועדmuod का अर्थ नियत समय है, इसका अर्थ सभा है, इसका अर्थ पर्व है, और कभी-कभी इसका अर्थ बलिदान होता है; और ये सब अर्थ अनुपयुक्त नहीं हैं: तौभी जब वह कहता है कि परमेश्वर ने अपनी साक्षी को नष्ट कर दिया था, तो मैं इसे स्वयं मिलापवाले तम्बू पर लागू करता हूँ, या, यदि किसी को अधिक उचित लगे, तो वाचा के सन्दूक पर; यद्यपि पहला अर्थ सबसे अधिक उपयुक्त है, क्योंकि वह, जैसा कहा गया है, पारस्परिक संगति के लिए पवित्र किया हुआ स्थान था।

511 प्राचीन अनुवादों ने {{שכו शब्द का अनुवाद ,{`` }סכו के अर्थ में किया है, अर्थात् “उसका मण्डप;” परन्तु ऐसा करके वे इसे प्रभाव में अगले वाक्यांश के ,{`` }מועדו, अर्थात् “उसका मिलाप-स्थान,” के समान बना देते हैं। क्रिया {}חמס का अर्थ कभी भी वह नहीं होता जो कैल्विन कहता है, अर्थात् स्थानान्तरित होना या हटाना, वरन् फेंक देना या गिरा देना, अर्थात् बल या प्रचण्डता के साथ। तब ,{}שר, अर्थात् बाड़ा या घेरा, वही है जो इस क्रिया के अनुकूल है,— 6. और उसने बारी के घेरे के समान अपने घेरे को गिरा दिया है, उसने अपने सभा-स्थान को नाश किया है; यहोवा ने सिय्योन में सभा और विश्रामदिन को भुला दिया है; और अपने कोप के उफान में राजा और याजक को त्याग दिया है। “घेरा” या बाड़ा उन आँगनों से सम्बन्ध रखता है जो मन्दिर को घेरे हुए थे; इसलिए वह स्थान जहाँ प्रजा एकत्र होती थी, नष्ट कर दिया गया। परमेश्वर ने उसे किसी साधारण बारी के बाड़े से अधिक नहीं समझा था। ,{}כ के बाद “बाड़ा” शब्द अध्याहार है, जो इब्रानी में कोई असामान्य बात नहीं है। — सं.

इसके बाद वह कहता है कि परमेश्वर सभा को, बलिदान को, या मिलापवाले तम्बू को भूल गया था; क्योंकि यह फिर वही शब्द है, परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि यह उसी अर्थ में नहीं लिया गया। तब मेरे विचार में {,}מועדmuod को यहाँ सभा के अर्थ में लेना चाहिए। जैसे उसने पहले कहा था कि वह स्थान जहाँ पवित्र सभाएँ एकत्र होती थीं, उलट दिया गया या नष्ट कर दिया गया था, वैसे ही अब वह कहता है कि परमेश्वर को उन सब सभाओं की कोई चिन्ता नहीं रही, मानो वे सदा के विस्मरण में गाड़ दी गई हों; क्योंकि वह विश्रामदिन का भी उल्लेख करता है, जो इस विषय से मेल खाता है। तब परमेश्वर सब सभाओं को और विश्रामदिन को भी भूल गया था। इस अन्तिम शब्द के विषय में फिर से अंश को पूर्ण के स्थान पर रखा गया है, क्योंकि निःसन्देह इस शब्द का उद्देश्य सब पर्वों को सम्मिलित करना था। तब इस खण्ड का अर्थ यह है कि प्रजा की अभक्ति इतनी बड़ी हो गई थी कि परमेश्वर ने, मानो अपनी वाचा को भूलकर, ऐसा भयानक दण्ड दिया कि धर्म कुछ समय के लिए एक प्रकार से पाँवों तले रौंद दिया गया।

अन्त में वह कहता है कि राजा और याजक परमेश्वर द्वारा तज दिए गए थे।

हम पहले ही कह चुके हैं कि ये परमेश्वर के पितृवत् अनुग्रह की मानो दो प्रतिज्ञा-मुद्राएँ थीं; क्योंकि एक ओर, जो दाऊद के वंश में से राज्य करता था वह मसीह का जीवित प्रतिरूप था; और दूसरी ओर, मनुष्यों का परमेश्वर से मेल कराने के लिए हारून के वंश में से सदा एक महायाजक रहता था। अतः यह ऐसा ही था मानो परमेश्वर ने अपने चुने हुए लोगों पर हर प्रकार से अपने को कृपालु प्रकट किया हो। तब उनका सच्चा सुख राज्य और याजकपद पर आधारित था; क्योंकि राज्य मानो उनकी रक्षा के लिए परमेश्वर के अनुग्रह का चिह्न था, और याजकपद उनके लिए वह साधन था जिसके द्वारा परमेश्वर से मेल-मिलाप प्राप्त होता था। इसलिए जब परमेश्वर ने राजा और याजक दोनों की पूर्णतः उपेक्षा की, तो इससे यह स्पष्ट हो गया कि वह अपने लोगों से अत्यन्त अप्रसन्न था, क्योंकि उसने इस प्रकार अपने उपकारों को मानो मिटा डाला था। आगे लिखा है,—

विलापगीत 2:7

7. प्रभु ने अपनी वेदी मन से उतार दी, उसने अपने पवित्रस्थान से घृणा की है; उसके भवनों की शहरपनाहों को उसने शत्रु के हाथ में कर दिया है; उन्होंने यहोवा के भवन में ऐसा कोलाहल मचाया मानो नियत पर्व का दिन हो।

7. Abominatus est Dominus altare suum, repulit (vel, rejecit procul ab animo suo) sanctuarium suum, tradidit in manum hostis muros palatiorum ejus, vocem ediderunt in domo Jehovae tanquam in die sacri conventus (vel, solemnis; iterum ponitur nomen {}מועדtamen accipitur vel pro conventu vel pro die festo.)

वह उसी विषय को आगे बढ़ाता है, और वैसे ही शब्दों का प्रयोग करता है। पहले वह कहता है कि परमेश्वर ने अपनी वेदी से घृणा की थी; यह कथन ठीक-ठीक उचित तो नहीं, परन्तु भविष्यद्वक्ता किसी और रीति से यहूदियों को पूरी तरह यह नहीं दिखा सकता था कि वे किस योग्य थे; क्योंकि यदि वह केवल नगर, भूमि, भवनों, दाख की बारियों, और संक्षेप में उनकी सारी सम्पत्ति की ही चर्चा करता, तो वह बात कहीं हल्की होती; परन्तु जब वह कहता है कि परमेश्वर ने उनकी सब पवित्र वस्तुओं को—वेदी, मन्दिर, वाचा का सन्दूक, और पर्व के दिनों को—कुछ भी न गिना, अर्थात् जब वह कहता है कि परमेश्वर ने इन वस्तुओं की, जो फिर भी उसका अनुग्रह प्राप्त कराने में विशेष रूप से प्रभावशाली थीं, न केवल उपेक्षा की, वरन् उन्हें अपने पास से दूर भी फेंक दिया, तो लोगों को, यदि वे अत्यन्त जड़बुद्धि न होते, इससे यह समझ लेना चाहिए था कि उन्होंने अपने ऊपर परमेश्वर के क्रोध को कितनी गम्भीरता से भड़काया था; क्योंकि यह ऐसा ही था मानो आकाश और पृथ्वी आपस में मिला दिए गए हों। यदि सब वस्तुएँ उलट-पुलट हो जातीं, यदि सूर्य अपना स्थान छोड़कर अन्धकार में डूब जाता, यदि पृथ्वी ऊपर उठ जाती, तो भी वह गड़बड़ी शायद ही उससे अधिक भयानक होती, जितनी तब हुई जब परमेश्वर ने इस प्रकार पवित्रस्थान, वेदी, पर्व के दिनों, और उनकी सब पवित्र वस्तुओं के विरुद्ध अपना हाथ बढ़ाया। परन्तु हमें उस कारण पर ध्यान देना चाहिए कि ऐसा क्यों किया गया, अर्थात् इसलिए कि मन्दिर बहुत समय से लोगों के अधर्म के कामों से अशुद्ध हो चुका था, और सब पवित्र वस्तुएँ दुष्टता और लज्जाजनक रीति से अपवित्र की गई थीं। अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने ऐसे विषय पर, जो अपने आप में पर्याप्त स्पष्ट था, इतना विस्तार क्यों किया।

इसके बाद वह जोड़ता है, उसने सब भवनों को सौंप दिया, इत्यादि; मानो वह कहता कि नगर शत्रुओं के पराक्रम से नहीं लिया गया था, वरन् कसदी परमेश्वर के अधिकार और झण्डे के नीचे लड़े थे। संक्षेप में, वह यह संकेत करता है कि यहूदी दुर्दशा के साथ नष्ट हुए, क्योंकि वे अपने ही दोष से नष्ट हुए; और कि कसदी युद्ध में विजयी हुए और उन्होंने नगर को ले लिया, अपने साहस या कौशल से नहीं, वरन् इसलिए कि परमेश्वर ने उस भक्तिहीन और दुष्ट जाति को दण्ड देने की ठान ली थी। 512 हमारा अनुवाद, “उतार दी (cast off),” क्रिया का वास्तविक अर्थ देता है। — सं.

अन्त में यह आता है कि शत्रुओं ने परमेश्वर के मन्दिर में ऐसा कोलाहल मचाया मानो पर्व का दिन हो। यहाँ भी भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि यदि इस्राएली इस सब के योग्य न होते, तो परमेश्वर शत्रुओं को कभी भी स्वयं मन्दिर में ढिठाई से आनन्द मनाने और रंगरलियाँ करने न देता; क्योंकि उनके शत्रुओं की ढिठाई परमेश्वर से छिपी न थी, और यदि वह चाहता तो उसे सहज ही रोक सकता था। तो फिर उसने इन अपवित्र शत्रुओं को इतनी छूट क्यों दी? इसीलिए कि यहूदियों ने स्वयं पहले मन्दिर को अशुद्ध कर दिया था, यहाँ तक कि वह उनकी सब पवित्र सभाओं से घृणा करने लगा, जैसा कि वह यशायाह के द्वारा भी घोषित करता है कि वह उनके पर्वों, विश्रामदिनों और नये चाँदों से घृणा करता था। (यशायाह 1:13, 14।) परन्तु यह कैसा भयानक परिवर्तन था, जब शत्रु उस स्थान में घुस आए जिसे परमेश्वर ने अपने लिए पवित्र ठहराया था, और वहाँ ढिठाई से डींग मारने और परमेश्वर के विरुद्ध नीच और दुष्ट निन्दा की बातें कहने लगे! परन्तु वह दृश्य जितना अधिक दुःखद था, उतनी ही अधिक घृणित लोगों की वह अभक्ति दिखाई दी, जो इतनी बड़ी विपत्तियों का कारण बनी थी। क्योंकि हमें सदा स्मरण रखना चाहिए, जो मैंने बहुधा कहा है, कि भविष्यद्वक्ता ने इन परिस्थितियों का उल्लेख इसलिए किया कि लोग अन्ततः इन सब विपत्तियों के विषय में अपने आप को दोषी मान लें, जिन्हें वे अन्यथा कसदियों पर डाल देते। अतः कसदियों ने जो मन्दिर को अशुद्ध किया, और सब पवित्र वस्तुओं को पाँवों तले रौंदा, भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि यह सब स्वयं यहूदियों के सिर पर डाला जाना चाहिए, जिन्होंने अपने ही चालचलन से कसदियों के लिए मन्दिर खोल दिया था, और सब पवित्र वस्तुओं को उनकी इच्छा और मनमानी के लिए छोड़ दिया था। आगे लिखा है,

विलापगीत 2:8

8. यहोवा ने सिय्योन की पुत्री की शहरपनाह को नष्ट करने की ठानी है; उसने डोरी डाली है, उसने नाश करने से अपना हाथ नहीं खींचा; इसलिए उसने किले और शहरपनाह दोनों से विलाप करवाया; वे दोनों एक साथ शिथिल हो गए।

8. Cogitavit Jehova ut perderet murum filiae Sion, extendit lineam, non retraxit manum suam a dissipatione; itaque luxit antemurale, et murus; pariter corruerunt (vel, eversi sunt.)

“सोचना” क्रिया में उससे अधिक बल है जितना सामान्यतः उसे दिया जाता है; क्योंकि यह कहना बहुत फीका होगा कि परमेश्वर ने नष्ट करने की सोची; परन्तु यहाँ “सोचने” का अर्थ है ठानना या आज्ञा ठहराना। यह एक बात है। और फिर हमें इसके और उन झूठी कल्पनाओं के बीच के विरोध को ध्यान में रखना चाहिए, जिनके द्वारा मनुष्य प्रायः भटका दिए जाते हैं, यहाँ तक कि वे यह विश्वास नहीं करते कि परमेश्वर जैसे समृद्धि में वैसे ही विपत्तियों में भी उपस्थित रहता है। अतः जैसे मनुष्य नाना प्रकार के झूठे विचारों के द्वारा जान-बूझकर भटक जाते हैं, और इस प्रकार मानो जान-बूझकर अपने को परमेश्वर से अलग कर लेते हैं, वैसे ही भविष्यद्वक्ता यहाँ कहता है कि यरूशलेम की शहरपनाहें संयोग से नहीं गिरी थीं, वरन् ईश्वरीय आज्ञा के द्वारा ढा दी गई थीं, क्योंकि परमेश्वर ने ऐसा ही ठहराया था, उसके अनुसार जो हम यिर्मयाह की पुस्तक में बहुत से स्थानों पर देख चुके हैं: “देखो, ये वे विचार हैं जो परमेश्वर ने यरूशलेम के विषय में सोचे हैं, जो उसने बाबुल के विषय में सोचे हैं।” अतः भविष्यद्वक्ता ने उन स्थानों में जो शिक्षा दी थी, उसी की वह अब इस स्थान में पुष्टि करता है, कि जब यरूशलेम नगर नष्ट किया गया, तो वह संयोग से हुई घटना न थी; वरन् इसलिए हुआ कि परमेश्वर ने कसदियों को वहाँ पहुँचाया था, और नगर को लेने और नष्ट करने में उन्हें अपने औज़ारों के रूप में काम में लाया था: अतः परमेश्वर ने सिय्योन की पुत्री की शहरपनाह को नष्ट करने की सोची है। यह सच है कि कसदियों ने बड़े उत्साह से युद्ध चलाया था, और नगर को लेने के लिए युद्ध-कौशल की कोई बात न छोड़ी थी: परन्तु भविष्यद्वक्ता यहाँ यहूदियों का ध्यान एक भिन्न विचार की ओर दिलाता है, कि वे मान लें कि वे अपने पापों के कारण न्यायसंगत रूप से दुःख भोग रहे थे, और कि उस युद्ध का मुख्य कर्ता परमेश्वर था, और कसदियों को भाड़े के सैनिक समझा जाना चाहिए।

513 यह क्रिया बहुधा इस गौण अर्थ में प्रयुक्त होती है, अर्थात् सोच-विचार के परिणामस्वरूप ठानना, निश्चय करना या ठहराना। Vulg. और Targ. बहुत अनुचित रूप से इसका मूल अर्थ बनाए रखते हैं, परन्तु Syr. ठानने या ठहराने का अर्थ देता है। — सं.

इसके बाद वह जोड़ता है कि परमेश्वर ने डोरी या नापने की रस्सी फैलाई थी, जैसा कि भवनों को अलग-अलग करने में सामान्यतः किया जाता है। और फिर वह कहता है, उसने तितर-बितर करने से अपना हाथ पीछे नहीं खींचा; और इस प्रकार ऐसा हुआ कि किलों और शहरपनाहों ने विलाप किया, और वे एक साथ ढह गईं। अब हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता का उद्देश्य यहूदियों को इस बात का पूरा विश्वास दिलाना था कि यह विनाश कसदियों पर नहीं, वरन् इसके विपरीत परमेश्वर पर डाला जाना चाहिए। साथ ही यहाँ सिखाई गई बात का एक और भाग भी जोड़ा जाना चाहिए, कि यदि लोगों ने अपने पापों से परमेश्वर को अत्यन्त न भड़काया होता, तो वह उस पवित्र नगर से, जिसे उसने चुना था, इतना अप्रसन्न न होता। अब आगे लिखा है,

विलापगीत 2:9

9. उसके फाटक भूमि में धँस गए हैं; उसने उसके बेण्डों को नाश करके तोड़ डाला है; उसके राजा और हाकिम अन्यजातियों के बीच में हैं; व्यवस्था अब नहीं रही; उसके भविष्यद्वक्ता भी यहोवा से कोई दर्शन नहीं पाते।

9. Demersae sunt in terra portae ejus, perdidit et confregit vectes ejus, rex ejus et principes ejus in gentibus (vel, ad gentes;) nulla lex, etiam Prophetae non reperiunt visionem a Jehova.

वह फिर से अन्य शब्दों में वही बात बताता है जो उसने कही थी, कि यरूशलेम की शहरपनाहें गिर गई थीं। परन्तु अब वह फाटकों की चर्चा करता है और कहता है कि वे भूमि में धँस गए थे, या भूमि में गड़ गए थे; क्योंकि इसकी व्याख्या दोनों रीतियों से की जा सकती है; मानो वह कहता कि फाटक शत्रुओं के लिए कोई बाधा न बने कि उन्हें नगर में प्रवेश करने से रोक सकें। इस प्रकार वह लोगों के उस मूर्खतापूर्ण भरोसे का उपहास करता है, जो अपनी किलेबन्दी पर भरोसा रखते थे और नगर को अजेय समझते थे। तब वह कहता है कि फाटक धँस गए थे, या भूमि में गड़ गए थे

फिर वह कहता है कि परमेश्वर ने उसके बेण्डों को नाश करके तोड़ डाला था; क्योंकि निःसन्देह फाटकों के बेण्डे दृढ़ और मज़बूत थे। तब वह कहता है कि जब परमेश्वर ने कसदियों की ओर अपना हाथ बढ़ाया कि उन्हें नगर के भीतर ले आए, तब न फाटक और न बेण्डे पर्याप्त सिद्ध हुए। इसके बाद वह जोड़ता है कि राजा और हाकिम दोनों बँधुआई में खदेड़ दिए गए थे; क्योंकि जब वह कहता है, जातियों के बीच, या जातियों के पास, तो वह संकेत करता है कि अब कोई राजा न रहा, क्योंकि वह और राजवंश और हाकिम बँधुआई में चले गए थे। शेष बात मैं कल तक के लिए छोड़ता हूँ।

514 यह विनाश की वह डोरी थी जिसका उल्लेख यशायाह 34:11 में है, जो यह दिखाने के लिए थी कि क्या-क्या नष्ट किया जाना था। — सं.

515 क्रियाएँ {,{אבלविलाप करना, और ,{}אסלमूर्छित होना, शिथिल पड़ना, जब निर्जीव वस्तुओं पर लागू की जाती हैं, तो उनका अर्थ होता है उजाड़ होना और क्षीण होना। अतः इस वाक्यांश का अनुवाद इस प्रकार होना चाहिए,—अतः उसने किले और शहरपनाह को उजाड़ कर दिया है, वे एक साथ पूरी तरह क्षीण हो गए हैं। प्रसंग दिखाता है कि यहाँ “इसलिए” का अनुवाद “यहाँ तक कि” होना चाहिए; और क्योंकि अन्तिम क्रिया का अन्तिम अक्षर दोहरा है, इसलिए “पूरी तरह” शब्द जोड़ा जाना चाहिए। — सं.

प्रार्थना।

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जब आज के दिन तेरे क्रोध के इतने चिह्न हमारे सामने आते हैं, तो हम बिना विलम्ब तेरी ओर लौटें, और सच्चे पश्चाताप में तेरे ऐसे अधीन हो जाएँ कि साथ ही तुझ से मेल-मिलाप करने का यत्न करें; और जब हमें तेरे पास ले चलने के लिए एक मध्यस्थ दिया गया है,—तो हे प्रभु, यह वरदान दे कि हम सच्चे विश्वास से उसे खोजें, और जहाँ कहीं वह हमें बुलाए वहाँ उसके पीछे चलें, कि सब अशुद्धताओं से शुद्ध होकर हम तेरे द्वारा, जो हमारा पिता है, महिमा पाएँ, और तुझे ऐसे पुकारें कि अपनी सब विपत्तियों में तेरे अनुग्रह को उपस्थित पाएँ। आमीन।—

छठा व्याख्यान

यरूशलेम की उन विपत्तियों में से, जिन पर भविष्यद्वक्ता विलाप करता है, वह इसे भी एक बताता है, कि न व्यवस्था रही न शिक्षा। कसदी भावानुवादक ने सोचा कि यहाँ दण्ड की ओर संकेत है, परन्तु वह भविष्यद्वक्ता के शब्दों को बिगाड़ देता है। इसके बाद एक विस्तार आता है; यह कहने के बाद कि व्यवस्था नहीं रही, वह जोड़ता है, उसके भविष्यद्वक्ताओं ने भी यहोवा से कोई दर्शन नहीं पाया। अतः इसमें कोई सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता का अर्थ यह है कि लोगों के दुःखों में यह सब से बड़ा था, कि वे शिक्षा या उपदेश से रहित थे, और भविष्यद्वक्ताओं से रहित थे। {,}תורהture शब्द वास्तव में बहुधा विशेष श्रेष्ठता के अर्थ में व्यवस्था को सूचित करने के लिए प्रयुक्त होता है, परन्तु उसका अर्थ शिक्षा या उपदेश भी है; और यहाँ अर्थ वही है, मानो भविष्यद्वक्ता कहता कि यहूदी परमेश्वर द्वारा ऐसे त्याग दिए गए थे कि अपनी विपत्तियों में उन्हें कोई सान्त्वना न मिलती थी। यह भजन संहिता की एक ऐसी ही शिकायत से और अच्छी तरह समझा जा सकता है: “हम को हमारे निशान नहीं देख पड़ते; अब कोई नबी नहीं रहा, न हमारे बीच कोई जानता है।” (भजन संहिता 74:9।)

वहाँ विश्वासी कहते हैं कि वे निराशाजनक दशा में थे, क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें अपने अनुग्रह का कोई चिह्न नहीं दिखाया; और चिह्न तब दिए जाते थे जब परमेश्वर उन पर कृपालु प्रकट होता था। अब, क्योंकि परमेश्वर ने साक्षी दी थी कि लोगों की अगुवाई करने के लिए सदा विश्वासयोग्य शिक्षक रहेंगे, इसलिए वे शिकायत करते थे कि कोई भविष्यद्वक्ता नहीं रहा, कि अब कोई ऐसा न रहा जिसे दर्शन मिलता हो। और इसी प्रकार इस स्थान में भविष्यद्वक्ता कहता है कि व्यवस्था नहीं रही, और भविष्यद्वक्ता दर्शन से रहित थे, इसीलिए कि परमेश्वर ने मानो थककर लोगों की देखभाल छोड़ दी थी: क्योंकि उसका पितृवत् अनुग्रह इस प्रमाण से बढ़कर और किसी बात से प्रकट न हो सकता था कि उसने उनके पास भविष्यद्वक्ता भेजे; और यह निश्चित है कि जब लोग बँधुआई में खदेड़ दिए गए, तब सब भविष्यद्वाणियाँ बन्द हो गईं।

बहुत समय पश्चात् दानिय्येल ने विश्वासियों को लौटने की आशा रखने के लिए उत्साहित करना आरम्भ किया; और इसी कारण यशायाह के द्वारा कहा गया है, “तुम्हारा परमेश्वर यह कहता है, मेरी प्रजा को शान्ति दो, शान्ति दो।”

(यशायाह 40:1।)

वहाँ यशायाह संकेत करता है कि एक अस्थायी मौन रहेगा; क्योंकि सब भविष्यद्वक्ता गूँगे हो जाएँगे, कि लोग निराशाजनक दशा में पड़े रहें, और इस कारण से, कि उन्होंने बहुत समय तक परमेश्वर के धीरज का दुरुपयोग किया था, और उस अनोखी आशीष की उपेक्षा की थी, जब परमेश्वर ने अपने दासों के द्वारा प्रकट किया कि वह उनके कुशल और रक्षा के लिए चिन्तित था, जैसा कि उसने बहुधा कहा था कि वह तड़के उठकर भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा उनकी ओर अपना हाथ बढ़ाता रहा। अतः जैसे भविष्यद्वाणी का वरदान लोगों के लिए न केवल परमेश्वर के अनुग्रह की, वरन् उस चिन्ता की भी जो वह उनके लिए रखता था, एक निश्चित प्रतिज्ञा-मुद्रा था; वैसे ही जब उसने लोगों से भविष्यद्वक्ताओं को रोक लिया, तो वह उनके बीच से अपना स्थान मानो छोड़कर उनसे दूर चला गया।

अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता का क्या अर्थ था जब उसने कहा कि अब कोई शिक्षा न रही, और कि यरूशलेम के भविष्यद्वक्ताओं को यहोवा से अब कोई दर्शन नहीं मिलता था; क्योंकि जब उसका वचन बहुत समय तक अपवित्र किया जा चुका, तब परमेश्वर मौन हो गया, और कुछ समय तक अपना पवित्र मुँह खोलने की कृपा न की, क्योंकि उसने देखा था कि उसका ठट्ठा उड़ाया गया था।

अब यह खण्ड हमें सिखाता है कि विपत्तियों में परमेश्वर की इस प्रतिज्ञा के होने से बढ़कर, कि वह अन्त में हम पर दया करेगा, न कोई बात अधिक वांछनीय है, और न कोई उत्तम उपाय। क्योंकि जब परमेश्वर की कोई प्रतिज्ञा हमारे सामने रखी जाती है, तो वह अन्धकार में जलाई गई एक छोटी ज्योति के समान होती है। अतः चाहे हमारा दुःख घने अन्धकार के समान ही क्यों न हो, तौभी जब परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं के द्वारा अनुग्रह का कोई चिह्न दिखाता है, तो वह हमें आशा और आनन्द देने के लिए पर्याप्त होना चाहिए। दूसरी ओर, जब परमेश्वर की कोई प्रतिज्ञा हमारे सामने नहीं आती, तो वह त्याग का निश्चित चिह्न है, सिवाय इसके कि वह कभी-कभी इस प्रकार हमें परखता है, जैसा हम यहाँ पढ़ते हैं। परन्तु स्वयं विश्वासी भी, जब वे उसकी प्रतिज्ञाओं में परमेश्वर के पितृवत् अनुग्रह का कोई प्रमाण नहीं पाते, तो मानो निराशाजनक दशा में होते हैं, और सब से निचली गहराइयों में डूबे रहते हैं।

अतः केवल तभी हम मृत्यु से जीवन की ओर उठते हैं, और ऐसा सहारा पाते हैं कि निराशा से अभिभूत न हों, जब परमेश्वर हम से बोलना उचित समझता है। अब आगे लिखा है,

विलापगीत 2:10

10. सिय्योन की पुत्री के पुरनिये भूमि पर बैठे हैं और चुप हैं; उन्होंने अपने सिरों पर धूल उड़ाई है; उन्होंने टाट की कमर बाँधी है; यरूशलेम की कुमारियों ने अपने सिर भूमि तक झुका लिए हैं।

10. Sedent ad terram, silent senes filiae Sion, attollunt pulverem super caput suum, accincti sunt saccis; demiserunt (vel, demittunt) ad terram caput suum virgines (aut, puellae) Jerusalem.

भविष्यद्वक्ता यहाँ लोगों की विपत्ति की गम्भीरता को प्रभावशाली रीति से चित्रित करता है, जब वह कहता है कि पुरनिये मानो पूर्ण निराशा में भूमि पर पड़े थे, कि उन्होंने अपने सिरों पर धूल डाली, कि वे टाट पहने हुए थे, जैसा कि अत्यन्त गहरे शोक में सामान्यतः किया जाता था, और कि कुमारियों ने अपने सिर भूमि तक झुका लिए थे।

अर्थ यह है कि पुरनियों को नहीं सूझता था कि क्या करें, और वे दूसरों को भी व्यर्थ और दीन विलाप के कामों में अपने साथ सम्मिलित करते थे। हम वास्तव में जानते हैं कि युवतियाँ अपने रूप और सौन्दर्य के विषय में अत्यधिक सावधान रहती हैं, और सुख-विलास में लिप्त रहती हैं; और कि जब वे अपने मुख और केशों समेत भूमि पर लोटती हैं, तो यह अत्यन्त शोक का चिह्न है। भविष्यद्वक्ता का यही अर्थ है।

वे वास्तव में पश्चाताप के चिह्न के रूप में टाट पहना करते थे, और अपने सिरों पर धूल डाला करते थे; परन्तु उनके मन बहुधा ऐसे व्याकुल होते थे कि वे इस प्रकार केवल अपना शोक और दुःख प्रकट करते थे, और परमेश्वर की ओर उनका कोई ध्यान न होता था; और कपटी, जब टाट पहनते थे, तो पश्चाताप करने का ढोंग करते थे, परन्तु वह झूठा बहाना था। अब इस स्थान में भविष्यद्वक्ता का यह अर्थ नहीं कि पुरनियों ने इन रीतियों को अपनाकर पश्चाताप करने और नम्रता से क्षमा माँगने का अंगीकार किया; वरन् वह इन्हें केवल शोक के चिह्नों के रूप में बताता है; मानो वह कहता कि पुरनियों के पास कोई उपाय न रहा, और युवतियों के पास न कोई आशा रही न आनन्द। क्योंकि पुरनिये भूमि पर पड़े रहते थे, जैसा उन लोगों में सामान्य है जिनके पास कोई उपचार नहीं रहता। अब हम भविष्यद्वक्ता का अर्थ समझते हैं। आगे लिखा है,—

516 “व्यवस्था नहीं।” गैटेकर ने इसका अर्थ यह समझा कि पत्थर की पटियाओं पर लिखी हुई व्यवस्था, जो मन्दिर में रखी गई थी, कसदियों द्वारा नष्ट कर दिए जाने के कारण खो गई थी। अन्य लोग कहते हैं कि मन्दिर के नष्ट हो जाने से परमेश्वर की उपासना के विषय में “कोई व्यवस्था” पालन नहीं की जाती थी। व्यवस्था—नैतिक, विधि-सम्बन्धी और न्याय-सम्बन्धी—इस्राएल को दी गई थी, और वही वह शर्त थी जिस पर वे देश के अधिकारी होनेवाले थे। जब वे निकाल दिए गए, क्योंकि उन्होंने व्यवस्था का पालन नहीं किया, तो बँधुआई में मानो उनके पास कोई व्यवस्था न रही; देश के विषय की वाचा, जो व्यवस्था पर निर्भर थी, बँधुआई के समय व्यर्थ ठहराई गई या स्थगित कर दी गई। — सं.

विलापगीत 2:11

11. मेरी आँखें आँसुओं से धुँधली पड़ गई हैं, मेरी अन्तड़ियाँ व्याकुल हैं, मेरे लोगों की पुत्री के विनाश के कारण मेरा कलेजा भूमि पर उण्डेला गया है; क्योंकि बच्चे और दूधपिउवे नगर के चौकों में मूर्छित होते हैं।

11. Defecerunt in lachrymis oculi mei, conturbata sunt viscera mea, effusum est ad terram jecur meum, propter contritionem filiae populi mei, dum evanuit parvalus et sugens Ubera in compitis urbis.

अब भविष्यद्वक्ता स्वयं बोलता है, और कहता है कि लोगों की विपत्तियों के कारण रोते-रोते उसकी आँखें आँसुओं से क्षीण हो गई थीं: सब से गहरे दुःख में भी आँसू अन्ततः सूख जाते हैं; परन्तु जब रोने का कोई अन्त नहीं होता, तो वह शोक, जो मानो कभी पकता ही नहीं, अवश्य ही बहुत कड़वा होता है। अतः यिर्मयाह अब अपने दुःख की प्रचण्डता को प्रकट करता है जब वह कहता है कि आँसू बहाते-बहाते उसकी आँखें धुँधली पड़ गईं। उसने यिर्मयाह 9 में कहा था, “भला होता कि मेरी आँखें सोते होतीं?” अर्थात् कौन मेरी आँखों को सोतों में बदल देगा, कि वे निरन्तर बहती रहें? और यह उसने इसलिए कहा, क्योंकि उसने देखा कि हठीलों पर परमेश्वर का कैसा भयानक पलटा मँडरा रहा था।

परन्तु अब, जब वह उस बात को पूरी होते देखता है जिससे वह डरता था, तो कहता है कि रोते-रोते उसकी आँखें क्षीण हो गईं।

इसी आशय की वह बात है जो वह जोड़ता है, कि उसकी अन्तड़ियाँ व्याकुल हो गई थीं। यह वही क्रिया है जो हम पहले देख चुके हैं, {,}חמרמרוchemermeru; जिसका कुछ लोग अनुवाद करते हैं जैसा हमने तब भी कहा था। मैं नहीं जानता कि एक व्याख्याकार ने उस बात को क्यों बदल दिया जो उसने अन्यत्र ठीक कही थी; वह यहाँ रखता है, “मेरी अन्तड़ियाँ सूज गई हैं।” परन्तु मुझे कोई कारण नहीं दिखता कि यहाँ इस क्रिया को भिन्न अर्थ में क्यों लिया जाए, क्योंकि तुरन्त बाद आता है, मेरा कलेजा भूमि पर उण्डेला गया है। सम्भव है कि उसने अंश को सम्पूर्ण के स्थान पर रखकर अंतड़ियों के अन्य भागों को भी सम्मिलित किया हो। यहाँ यह शब्द ठीक-ठीक कलेजे का अर्थ देता है, जैसे जब सुलैमान कहता है, “उसने मेरा कलेजा छेद दिया।” (नीतिवचन 7:23।)

परन्तु संक्षेप में, यिर्मयाह दिखाता है कि उसकी सारी शक्तियाँ दुःख से ऐसी जकड़ ली गई थीं कि कोई भाग उससे बचा न था। तब वह कहता है कि उसका कलेजा उण्डेला गया, परन्तु उसी अर्थ में जिसमें उसने कहा था कि उसकी अन्तड़ियाँ व्याकुल थीं। ये वास्तव में अतिशयोक्तिपूर्ण कथन हैं; परन्तु अर्थ के विषय में, यिर्मयाह सीधे अपनी भावनाएँ प्रकट करता है; क्योंकि इसमें कोई सन्देह नहीं कि इतनी बड़ी विपत्ति के कारण वह अविश्वसनीय रूप से चिन्तित और शोकित था; क्योंकि उसने न केवल उस विपत्ति पर असाधारण रीति से विलाप किया, वरन् यह भी विचार किया कि वह हठ कितना दुष्ट था जिसमें लोगों ने लगभग पचास वर्ष तक अपने को कठोर कर रखा था; क्योंकि उसने व्यर्थ ही अपने को खपा दिया था, थोड़े समय तक नहीं, वरन् लगभग पचास वर्ष तक वह उनसे बोलना कभी बन्द न करता था। अतः निःसन्देह उसने मन ही मन सोचा कि लोग किस योग्य थे, यहाँ तक कि उसे परमेश्वर के पलटे का कोई साधारण भय न था। अतः यही कारण था कि उसने कहा कि उसकी अन्तड़ियाँ व्याकुल थीं और उसका कलेजा उण्डेला गया। फिर भी वह अपने शोक का कारण बताता है, अर्थात् अपने लोगों की पुत्री का टूटना या विनाश; और वह विशेष रूप से एक बात का उल्लेख करता है, क्योंकि बच्चा और जो स्तन चूसता था, वे नगर के चौकों में लुप्त हो गए; क्योंकि मैं {,}עתףotheph क्रिया का यही अनुवाद करता हूँ, जिसका ठीक अर्थ ढाँपना है; परन्तु उसका गौण अर्थ लुप्त हो जाना है, जैसा हम अभी फिर देखेंगे। यह वास्तव में एक दयनीय दृश्य था, जब न केवल पुरुष और स्त्रियाँ हर जगह घात किए गए, वरन् जब अकाल के कारण छोटे बच्चे भी मूर्छित हो गए। हम वास्तव में जानते हैं कि शिशु हमारी दया को जगाते हैं, क्योंकि भूखे बच्चे के आँसू हमारे अन्तरतम मन तक पैठ जाते हैं। इसलिए जब छोटे बच्चे और वे जो अपनी माताओं के स्तनों से लगे रहते थे, नगर के चौकों में चिल्लाते थे, तो इसने सब से लोहे जैसे कठोर हृदयों को भी छू लिया होगा। अतः यिर्मयाह ने अकारण ही इस बात का विशेष उल्लेख नहीं किया, कि छोटे बच्चे और दूधपिउवे किसी सुनसान और बंजर देश में नहीं, वरन् स्वयं नगर के चौकों में लुप्त हो गए। आगे लिखा है,—

517 इस पद का अनुवाद इस प्रकार किया जा सकता है,— 10. वे भूमि पर बैठे हैं, वे चुप हैं, सिय्योन की पुत्री के पुरनिये; उन्होंने अपने सिर पर धूल डाली है, उन्होंने टाट की कमर बाँधी है; उन्होंने अपना सिर भूमि तक झुका लिया है, यरूशलेम की पुत्रियों ने। — सं.

विलापगीत 2:12

12. वे अपनी माताओं से कहते हैं, अन्न और दाखमधु कहाँ हैं? जब वे नगर के चौकों में घायल मनुष्य की नाईं मूर्छित होते थे, जब उनके प्राण उनकी माताओं की गोद में उण्डेले जाते थे।

12. Matribus suis dicunt, Ubi triticum et vinum? cum evanescunt (in evanescendo ipsos, ad verbum) tanquam vulneratus (aut, mortuus; dum evanescunt Ergo tanquam vulnerati, aut, mortui; est numeri enallage) in compitis urbis (iterum repetit,) et cum se effundit (vel, effunditur) anima eorum in sinum matrum ipsorum.

भविष्यद्वक्ता के शब्दों में या तो मानवीकरण है, या वह अब किसी दूसरे वर्ग की चर्चा करता है, क्योंकि यहाँ वह उन बच्चों की ओर संकेत नहीं कर सकता जो अपनी माताओं का दूध पीते थे, क्योंकि वे स्पष्ट रूप से यह नहीं कह सकते थे कि अन्न और दाखमधु कहाँ हैं? और शिशुओं के लिए दाखमधु का प्रयोग उचित नहीं है। अतः भविष्यद्वक्ताओं के शब्द और आगे तक जाते हैं, क्योंकि ऐसा शिशु नहीं, वरन् कुछ बड़े हो चुके बच्चे ही कह सकते थे। और इस दृष्टि से इसमें कुछ भी अनुचित या खींचतान वाला नहीं है, क्योंकि उसने छोटे बच्चों की चर्चा की थी, और छोटे बच्चों के साथ उसने शिशुओं को भी जोड़ा था। और अब वह केवल एक ही वर्ग की ओर संकेत करता है, अर्थात् वे बच्चे, जो अब बोल सकते थे, अपनी माताओं से शिकायत करते थे कि न रोटी है न दाखमधु, अर्थात् जीवन-निर्वाह का कोई साधन नहीं, कोई भोजन नहीं।

तौभी यदि कोई मानवीकरण को अधिक पसन्द करे, तो मुझे आपत्ति नहीं; और यह दृष्टिकोण भी अनुपयुक्त न होगा, कि शिशु भी अपने मौन से भोजन के लिए पुकारते थे; क्योंकि बच्चों के आँसू इससे अधिक प्रभावशाली रूप से बोलते हैं जितना कोई शब्दों का उच्चारण करके बोलता है।

जो भी हो, भविष्यद्वक्ता संकेत करता है कि अकाल ऐसा था कि बच्चे अपनी माताओं की गोद में मर गए, और व्यर्थ ही भोजन ढूँढ़ते और चिल्लाते रहे कि उनके पास कोई सहारा नहीं। तब वह कहता है कि उन्होंने अपनी माताओं से कहा; इस कथन से उसका अर्थ यह है कि उनकी शिकायतें और भी अधिक दयनीय थीं, क्योंकि उनकी माताएँ उन्हें कोई सहायता न दे सकती थीं। और हम जानते हैं कि माताओं की भावनाएँ कितनी कोमल और स्नेहपूर्ण होती हैं, क्योंकि माता अपने बच्चे को न केवल अपने दूध से, वरन् यदि हो सके तो अपने प्राण से भी, प्रसन्नता से पालती। इसलिए जब भविष्यद्वक्ता कहता है कि बच्चे अपनी माताओं से चिल्लाते थे, तो वह एक दुःखद दृश्य चित्रित करना चाहता है, जो उचित रूप से सब के मन में भय उत्पन्न करे। वह कहता है, रोटी और दाखमधु कहाँ है? ठीक तब जब वे चौकों में मरे हुए मनुष्य की नाईं लुप्त हो गए (कुछ कहते हैं “मूर्छित हो गए,” परन्तु जैसा मैंने कहा है, मैं यही अनुवाद अधिक पसन्द करता हूँ); और फिर, जब उन्होंने उण्डेला, जो और भी दुःखद बात है,—जब उन्होंने अपने प्राण अपनी माताओं की गोद में उण्डेल दिए। अब आगे लिखा है,— 518 यहाँ की क्रियाएँ सब भूतकाल में हैं, और अनुवाद उन्हें वैसा ही प्रस्तुत करते हैं। हमारा अनुवाद, और ब्लेनी और हेंडरसन के अनुवाद भी, उन्हें वर्तमान काल में देने में गलत हैं; क्योंकि भविष्यद्वक्ता वर्णन कर रहा है कि जब उसने यरूशलेम का विनाश देखा तब उसे कैसा लगा,— 11. आँसुओं से क्षीण हो गईं मेरी आँखें, व्याकुल हो गईं मेरी अन्तड़ियाँ, भूमि पर उण्डेला गया मेरा कलेजा, मेरे लोगों की पुत्री के टूटने के कारण, जब नगर के चौकों में बच्चा और दूधपिउवा मूर्छित हो गए। — सं.

519 कि छोटे बच्चों और शिशुओं की चर्चा की गई है, यह पद के अन्त से स्पष्ट है; एक चौकों में मरा, और दूसरा माता की गोद में। प्रश्न, “अन्न कहाँ है,” इत्यादि, बच्चों के विषय में, अर्थात् छोटे लड़कों और लड़कियों के विषय में, समझा जाना चाहिए। — सं.

520 पिछले पद से मेल रखने के लिए, अनुवाद इसे यों देते हैं, “उन्होंने अपनी माताओं से कहा।” क्रिया वास्तव में भविष्यत् काल में है, और इसका अनुवाद यों किया जा सकता है, “अपनी माताओं से वे कहा करते;” क्योंकि इब्रानी भविष्यत् काल का अनुवाद इस प्रकार किया जा सकता है,— 12. अपनी माताओं से वे

विलापगीत 2:13

13. हे यरूशलेम की पुत्री, मैं तेरे लिए किस बात की साक्षी दूँ? मैं तेरी उपमा किस से दूँ? हे सिय्योन की कुमारी पुत्री, मैं किस वस्तु को तेरे बराबर ठहराकर तुझे शान्ति दूँ? क्योंकि तेरा घाव समुद्र के समान बड़ा है: तुझे कौन चंगा कर सकता है?

13. Quid contestabor tibi (vel, adducam tibi testes, vel, testificabor tecum?) quid simile tibi filia Jerusalem (vel, cur? {}מהpotest trans ferri utroque modo;) quid (vel, cur) aequabo tibi quiequam (est repetitio, sed diverso verbo) ut te Consoler, virgo filia Sion? Quia magna sicut mare contritio tua; quis sanabit te?

जब हम किसी के शोक को हल्का करना चाहते हैं, तब हम प्रायः ऐसे उदाहरण सामने रखते हैं जो उस स्थिति से कुछ मिलते-जुलते हों। क्योंकि जब कोई किसी रोगी को शान्ति देना चाहता है, तो वह कहेगा, “तू न पहला है न अन्तिम, तेरे समान बहुत से हैं; तू अपने आप को इतना क्यों सताता है? क्योंकि यह तो लगभग सब मनुष्यों की सामान्य दशा है।” इसलिए जैसे उदाहरण प्रस्तुत करना शोक को हल्का करने की एक सामान्य रीति है, वैसे ही भविष्यद्वक्ता कहता है, “मैं तेरे सामने कौन से उदाहरण रखूँ? अर्थात् मैं तुझ से इस या उस मनुष्य की चर्चा क्यों या किस प्रयोजन से करूँ जो तेरे समान है? अथवा, मैं तेरे लिए किसे गवाह ठहराऊँ, या तुझे क्या साक्षी दूँ?” परन्तु मैं यह अनुवाद अधिक उचित समझता हूँ, “मैं किस प्रयोजन से तेरे पास ऐसे गवाह लाऊँ जो कहें कि उन्होंने भी कुछ ऐसा ही देखा है? क्योंकि ये बातें तुझे कुछ भी लाभ न पहुँचाएँगी।”

अतः भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय यह है कि जो सान्त्वनाएँ प्रायः दुखियों को दी जाती हैं, वे कुछ भी लाभ की न होतीं, क्योंकि यरूशलेम की विपत्ति अन्य सब उदाहरणों से बढ़कर थी; मानो उसने कहा हो, “संसार में ऐसी बात कभी नहीं हुई; परमेश्वर ने इससे पहले किसी जाति के विरुद्ध ऐसा भयंकर गर्जन कभी नहीं किया; इसलिए यदि मैं तेरे सामने उदाहरण लाना चाहूँ, तो मैं पूरी रीति से असमंजस में पड़ जाऊँगा; क्योंकि जब मैं तेरी तुलना अन्य दुखियों से करता हूँ, तो पाता हूँ कि तू उन सब से बढ़कर है।” अब हम भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय समझते हैं: वह इस प्रकार की वाणी से यरूशलेम की विपत्ति की गम्भीरता को बढ़ाकर दिखाना चाहता था, क्योंकि वह ऐसी रीति से पीड़ित की गई थी जो असाधारण थी और पहले कभी सुनी न गई थी; मानो उसने कहा हो कि यहूदी अन्य सब जातियों से बढ़कर दुखी हो गए हैं। तो मैं तेरे सामने गवाह क्यों लाऊँ? और किसी को तेरे समान क्यों ठहराऊँ? अन्य दुखी लोगों को तेरे बराबर क्यों करूँ? वह कारण या उद्देश्य जोड़ता है (क्योंकि यहाँ {,}וvau का यही अनुवाद होना चाहिए), कि मैं तुझे शान्ति दूँ, अर्थात् मनुष्यों की सामान्य रीति के अनुसार। फिर वह आगे कहता है, क्योंकि तेरा घाव (या तेरा टूटना) समुद्र के समान बड़ा है; अर्थात्, “तेरी विपत्ति अथाह गहराई है: इसलिए मुझे सारे संसार में कोई नहीं मिलता जिससे मैं तेरी तुलना करूँ, क्योंकि तेरी विपत्ति सब विपत्तियों से बढ़कर है; और ऐसी कोई बात नहीं जो तेरे सामने रखी जा सके, यहाँ तक कि तू सब युगों के लिए एक स्मरणीय उदाहरण बन गई है।” [“अन्न और दाखमधु कहाँ है?” जब वे नगर के चौकों में घायल मनुष्य के समान मूर्च्छित होते थे, जब वे अपनी माताओं की गोद में अपने प्राण छोड़ते थे। — सं.]

521 अधिक सरल अनुवाद यह होगा, “मैं तुझ से क्या साक्षी दूँ (या क्या कहूँ)?” सेप्टुआजिन्ट भी ऐसा ही कहता है: अथवा, “मैं तेरे लिए किसे गवाह ठहराऊँ?” — सं.

परन्तु जब हम भविष्यद्वक्ता को इस प्रकार बोलते हुए सुनते हैं, तो हमें स्मरण रखना चाहिए कि हम उस प्राचीन प्रजा के स्थान पर आए हैं। इसलिए जैसे परमेश्वर ने पूर्वकाल में अपनी चुनी हुई प्रजा के पापों को इतनी कठोरता से दण्डित किया था, वैसे ही हमें सावधान रहना चाहिए कि हम आज अपनी हठीली दुष्टता से उसे चरम सीमा तक न भड़काएँ, क्योंकि वह सदा अपने ही समान बना रहता है। परन्तु जब कभी ऐसा हो कि हम उसके हाथ से भारी रीति से पीड़ित और कुचले जाएँ, तब भी हम यह जानें कि सबसे निचली गहराई में डूबे होने पर भी हमारे लिए कुछ न कुछ सान्त्वना अब भी शेष है। भविष्यद्वक्ता यहाँ निश्चय ही प्रजा की विपत्तियों को बढ़ाकर दिखाता है; परन्तु उसने पहले ही विश्वासियों को आशा रखने के लिए उत्साहित करना आरम्भ कर दिया था; और वह फिर से वही शिक्षा दोहराएगा। परन्तु भविष्यद्वक्ता के लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग करना तब तक आवश्यक था, जब तक वे लोग, जो अब तक अपने पापों में सुन्न पड़े थे और परमेश्वर के पलटा लेने के उद्देश्य पर भली भाँति विचार नहीं करते थे, सचमुच दीन न हो जाएँ। वह आगे कहता है,—

विलापगीत 2:14

14. तेरे भविष्यद्वक्ताओं ने तेरे लिए व्यर्थ और मूर्खता के दर्शन देखे हैं; और उन्होंने तेरा अधर्म प्रगट नहीं किया, कि तेरी बंधुआई को फेर देते; परन्तु उन्होंने तेरे लिए झूठे भार और देश से निकाले जाने के कारण देखे हैं।

14. Prophetae tui viderunt tibi vanitatem et insulsitatem (vel, insipidum,) et non aperuerunt super iniquitate tua (hoc est, non revelarunt tibi; aut, manifestarunt iniquitatem tuam,) ut converterent captivitatem tuam (alii vertunt, aversionem tuam, vel, defectionem) et viderunt tibi prophetias vanitatis, et expulsiones.

यहाँ भविष्यद्वक्ता यहूदियों को उस स्वेच्छाचार के लिए दोषी ठहराता है जिसके द्वारा उन्होंने, मानो जान-बूझकर, अपने आप को नष्ट कर लिया था, मानो उन्होंने अपनी इच्छा से मीठा विष पी लिया हो। वे उन छलों से मतवाले हो गए थे जिन्हें हम देख चुके हैं, जब धोखेबाज़ उन्हें सुख-समृद्धि की दशा की प्रतिज्ञा देते थे; क्योंकि हम देख चुके हैं कि झूठे भविष्यद्वक्ता प्रायः ढिठाई से यह घोषणा करते थे कि यिर्मयाह ने जो कुछ धमकी दी, वह कुछ भी नहीं है। इसलिए जब यहूदी ऐसी चापलूसियों से मतवाले हो गए, और परमेश्वर के न्याय की उपेक्षा करते रहे, और स्वतन्त्रता से अपनी बुराइयों में लिप्त रहे, तो परिणाम यह हुआ कि परमेश्वर का क्रोध उनके द्वारा सदा और निरन्तर भड़कता रहा। अब यिर्मयाह उन्हें ऐसे स्वेच्छाचार के लिए डाँटता है, क्योंकि वे स्वयं धोखा खाना चाहते थे, और अपने लिए चापलूसों को शिक्षक बनाकर लालसा के साथ फन्दों में कूद पड़े थे। मीका भी उन्हें इसी बात के लिए डाँटता है, कि वे ऐसे भविष्यद्वक्ताओं को ढूँढ़ते थे जो उन्हें फलदायक दाख-तुड़ाई और भरपूर कटनी की प्रतिज्ञा देते थे। (मीका 2:10.) यिर्मयाह का अभिप्राय भी यही है।

वह कहता है कि भविष्यद्वक्ताओं ने उनके लिए भविष्यद्वाणी की थी, या उनके लिए व्यर्थ बातें देखी थीं; परन्तु यह क्रिया भविष्यद्वाणियों की ओर संकेत करती है, जैसे भविष्यद्वक्ता दर्शी कहलाते हैं। तब वह कहता है कि भविष्यद्वक्ताओं ने व्यर्थता और फीकापन देखा था। इससे प्रजा का दोष कम नहीं हुआ; और यिर्मयाह यहाँ प्रजा की चापलूसी नहीं करता, मानो वे दूसरों के दोष के कारण नष्ट हुए हों; यद्यपि यह एक सामान्य बहाना था, क्योंकि जब अधिकांश लोग धोखा खा जाते थे, तो वे शिकायत करते थे कि वे भटका दिए जाने के कारण गिर पड़े, और यह भी कि जब चतुर लोग उनके लिए फन्दे बिछा रहे थे तब वे पर्याप्त सावधान न रहे। परन्तु भविष्यद्वक्ता यहाँ यहूदियों को दोषी ठहराता है, क्योंकि वे झूठे भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा धोखा खा गए थे, और यह उनके घमण्ड और महत्वाकांक्षा का उचित प्रतिफल था। क्योंकि उनके कान बहुत कोमल थे, और खुली डाँट वे सह नहीं सकते थे; संक्षेप में, जब उन्होंने सब खरी शिक्षा को ठुकरा दिया, तो अवश्य ही परमेश्वर के स्थान पर शैतान आ गया, जैसा कि पौलुस भी कहता है, “कि वे लोग उचित रीति से दण्डित हुए जिन्हें परमेश्वर ने अन्धा कर दिया कि वे झूठ की प्रतीति करें, क्योंकि उन्होंने सत्य को ग्रहण नहीं किया।” (2 थिस्सलुनीकियों 2:11, 12.)

522 खाने की वस्तुओं के विषय में प्रयुक्त होने पर इसका यही अर्थ है, परन्तु शब्दों के विषय में प्रयुक्त होने पर इसका अर्थ मूर्खता या बेतुकापन है। यह {,{נפל अर्थात् “गिरना” से निकला है, सड़ने या बिगड़ने के अर्थ में। यह वह है जो न बुद्धिमानी की बात है न सच्ची। इसलिए सेप्टुआजिन्ट ने इसका अनुवाद … किया है; वल्गेट ने “मूर्खतापूर्ण”; और तारगुम ने “सारहीन”। — तेरे भविष्यद्वक्ताओं ने व्यर्थता और मूर्खता देखी है। जो कुछ उन्होंने देखा था, वह “व्यर्थ” अर्थात् निकम्मा, और “मूर्खतापूर्ण” अर्थात् बेतुका, दोनों था। — सं.

अब हम भविष्यद्वक्ता का उद्देश्य समझते हैं: वह कहता है कि यहूदी झूठे भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा सचमुच धोखा खा गए थे; परन्तु यह उनके अपने ही दोष से हुआ था, क्योंकि वे परमेश्वर की आज्ञा मानने के लिए अधीन नहीं हुए, क्योंकि उन्होंने खरी शिक्षा को ठुकरा दिया था, क्योंकि वे उसकी सब सम्मतियों के विरुद्ध बलवा करते रहे थे। साथ ही, इस प्रकार न केवल उनका अपराध बढ़ाकर दिखाया गया जान पड़ता है, वरन् उनकी लज्जा भी उनके सामने रखी गई,—क्योंकि उन्होंने यिर्मयाह और परमेश्वर के अन्य दासों के विरुद्ध इन धोखेबाज़ों को खड़ा करने का साहस किया था; क्योंकि जब कभी वे परमेश्वर के विरुद्ध उछलना चाहते थे, तब वे अपने इन झूठे भविष्यद्वक्ताओं पर बड़ा घमण्ड करते थे। यह कैसा बड़ा ढीठपन था! जब झूठे भविष्यद्वक्ताओं ने उन्हें सुरक्षा की प्रतिज्ञा दी, तब वे तुरन्त यिर्मयाह पर अहंकार के साथ विजय मनाने लगे, मानो वे जीत गए हों। इसलिए जब परमेश्वर के विरुद्ध उनकी दुष्टता और अहंकार ऐसा था, तो भविष्यद्वक्ता उचित रीति से उन्हीं पर पलटकर कहता है, “अब अपने झूठे भविष्यद्वक्ताओं को देखो; क्योंकि जब उन्होंने हाल ही में तुम्हें हर प्रकार की समृद्धि की प्रतिज्ञा दी, तब मेरे साथ निर्दयता का व्यवहार किया गया, और तुमने तिरस्कार के साथ मेरी बुलाहट को ठुकरा दिया; अब तुम्हारे झूठे भविष्यद्वक्ता आगे आएँ: अन्त में अपनी विपत्तियों से बुद्धिमान बनो, और मान लो कि परमेश्वर और उसके दासों के विरुद्ध इतना अहंकार से व्यवहार करने का क्या अर्थ है।” अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता क्यों कहता है, “उन्होंने तुम्हारे लिए व्यर्थता और फीकापन देखा है।”

वह आगे कहता है, उन्होंने नहीं खोला, या प्रगट नहीं किया, इत्यादि। सम्बन्धसूचक अव्यय {,}עלol यहाँ अतिरिक्त है; शब्द ये हैं, “उन्होंने तेरे अधर्म पर प्रगट नहीं किया।” उस भाषा में इन शब्दों में सचमुच एक उपयुक्तता है, अर्थात् उन्होंने अपने प्रकाशनों को प्रजा के अधर्मों पर लागू नहीं किया था, क्योंकि यदि करते तो प्रजा इस प्रकार सही मार्ग पर लौट आती, और इस प्रकार परमेश्वर के पलटा लेने को टाल देती।

अब इस वचन पर ध्यान से विचार करना चाहिए: यिर्मयाह ने झूठे भविष्यद्वक्ताओं के छलों के विषय में कहा, जिन्हें उसने फीका बताया: अब वह प्रगट करता है कि उन्होंने प्रजा को किस प्रकार धोखा दिया था, अर्थात् इस कारण कि उन्होंने उनके अधर्मों को प्रगट नहीं किया। तो हम यह जानें कि चेतावनी पाने से अधिक आवश्यक कुछ भी नहीं, कि अपने अधर्मों का बोध पाकर हम पश्चाताप करें। और भविष्यद्वक्ताओं की शिक्षा से प्राप्त होनेवाला मुख्य लाभ यही था। क्योंकि दूसरा भाग, अर्थात् भविष्य की बातों की भविष्यद्वाणी, बहुत थोड़ा ही प्रभाव डालती, यदि भविष्यद्वक्ता परमेश्वर के पलटा लेने के विषय में प्रचार न करते,—यदि वे प्रजा को पश्चाताप के लिए न उकसाते,—यदि वे उन्हें विश्वास के द्वारा परमेश्वर की दया को ग्रहण करने की आज्ञा न देते। इस प्रकार यिर्मयाह एक तरह से उन लोगों की झूठी शिक्षाओं का भेद खोल देता है जिन्होंने भविष्यद्वाणी की शिक्षा को बिगाड़ दिया था, यह कहकर कि उन्होंने अधर्मों को प्रगट नहीं किया। तो आओ, हम इस चिह्न के द्वारा परमेश्वर के विश्वासयोग्य दासों और धोखेबाज़ों के बीच भेद करना सीखें। क्योंकि प्रभु अपने वचन के द्वारा हमें अपने न्याय-आसन के सामने बुलाता है, और चाहता है कि हमारे अधर्म प्रगट किए जाएँ, कि हम अपने आप से घृणा करें, और इस प्रकार दया के लिए द्वार खोलें। परन्तु जब जो कुछ हमारे सामने रखा जाता है वह केवल हमारे कानों को गुदगुदाता और हमारी जिज्ञासा को पोषित करता है, और साथ ही हमारे सब अधर्मों को दबा देता है, तब हम जान लें कि वे परिष्कृत बातें जो मनुष्यों को अत्यन्त भाती हैं, फीकी और निकम्मी हैं। इसलिए पश्चाताप की शिक्षा हमें स्वीकार्य हो, वह शिक्षा जो हमें परमेश्वर के न्याय-आसन तक ले जाती है, ताकि अपने आप में गिराए जाकर हम उसकी दया की शरण लें।

फिर वह आगे कहता है, कि वे तेरी बंधुआई को फेर देते; कुछ लोग “तेरा भटक जाना” पसन्द करते हैं—और यह अर्थ अनुचित नहीं है; परन्तु मुझे कोई सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता अपराध की अपेक्षा दण्ड की ओर संकेत करता है। तब प्रजा की बंधुआई पलट दी जाती यदि प्रजा समय रहते पश्चाताप करती; क्योंकि पश्चाताप के द्वारा हम परमेश्वर के क्रोध को टालते हैं: पौलुस कहता है, “यदि हम अपने आप को जाँचते, तो दण्ड न पाते।” (1 कुरिन्थियों 11:31.) इसलिए जब दुखी मनुष्य अपने आप के न्यायी बनकर परमेश्वर के न्याय से पहले ही उपाय कर लेते हैं, तो भविष्यद्वक्ता अकारण नहीं कहता कि झूठे भविष्यद्वक्ताओं ने उनके अधर्मों को प्रगट नहीं किया, जिससे वे अपने ही देश में चैन से रह सकते, और कभी बंधुआई में न खदेड़े जाते। यह कैसे? क्योंकि इस प्रकार परमेश्वर शान्त हो जाता, अर्थात् यदि प्रजा स्वेच्छा से उसकी ओर फिरती, जैसा कि यशायाह में कहा गया है, “और फिरकर चंगे हो जाते।” (यशायाह 6:10.)

अतः वहाँ कहा गया है कि मन फिराव चंगाई की ओर ले जाता है; क्योंकि जैसे ईंधन हटा लेने पर आग बुझ जाती है, वैसे ही जब हम पाप करना छोड़ देते हैं, तब परमेश्वर के क्रोध को ईंधन नहीं मिलता। अब हम भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय समझते हैं; वह संक्षेप में यह संकेत करता है कि प्रजा इसलिए नष्ट हुई क्योंकि वह झूठी बातों को ढूँढ़ती थी, जबकि झूठे भविष्यद्वक्ता व्यर्थ ही उसकी चापलूसी करते थे; क्योंकि यदि भविष्यद्वक्ता साहस के साथ प्रजा को पश्चाताप के लिए उकसाते, तो वे समय रहते इतनी बड़ी विपत्तियों से बच निकलते।

फिर वह आगे कहता है, और उन्होंने तेरे लिए व्यर्थता की भविष्यद्वाणियाँ और निष्कासन देखे। यद्यपि {,}משאתmeshat शब्द प्रायः बुरे अर्थ में भार के लिए लिया जाता है, अर्थात् ऐसी कठोर भविष्यद्वाणी जो दिखाती है कि परमेश्वर का पलटा निकट है, तौभी यह सन्देहजनक है कि भविष्यद्वक्ता यहाँ इसे इस अर्थ में लेता है या नहीं, क्योंकि वह उन भविष्यद्वाणियों की चर्चा करता है जो प्रजा को दण्ड से बच निकलने की आशा देती थीं; और ये {,}משאותmeshaut नहीं थीं, अर्थात् वे भारी और भयानक भविष्यद्वाणियाँ नहीं थीं। परन्तु जब सब बातों पर भली भाँति विचार किया जाए, तो स्पष्ट हो जाएगा कि यिर्मयाह ने अकारण यह शब्द नहीं अपनाया; क्योंकि वह आगे इसकी व्याख्या भी जोड़ता है। {,}משאהmeshae शब्द कभी-कभी किसी भी प्रकार की भविष्यद्वाणी के अर्थ में लिया जाता है, परन्तु इसका ठीक अर्थ वह है जो धमकी से भरा हो। परन्तु अब यिर्मयाह क्या कहता है? उन्होंने तेरे लिए ऐसे भार देखे जिनसे तू बच निकली थी।

क्योंकि उस पवित्र जन की शिक्षा को घृणित ठहराने के लिए वे, एक कहावत के अनुसार, जो कुछ वह सिखाता था उसे भार कहते थे। इस प्रकार वे यह कहकर उस पवित्र जन के विरुद्ध पूर्वाग्रह उत्पन्न करते थे कि उसकी सब भविष्यद्वाणियों में आतंक और क्लेश के सिवाय और कुछ नहीं है। अब भविष्यद्वक्ता मानो उनकी बात मानते हुए कहता है, “वे स्वयं सचमुच तुम्हारे लिए भविष्यद्वक्ता रहे हैं, और उन्होंने देखा, परन्तु अन्त में भार ही देखे।”

इसलिए जब झूठे भविष्यद्वक्ता प्रजा को दण्ड से छूट जाने की प्रतिज्ञा देते थे, तब वे चापलूस थे, और कोई भार दिखाई नहीं देता था, अर्थात् कोई क्लेश नहीं; परन्तु अन्त में ये भविष्यद्वाणियाँ उन सब धमकियों से कहीं अधिक भारी हो गईं जिनसे यिर्मयाह ने उन्हें डराया था; और इसी विचार के अनुरूप वह है जो तुरन्त आगे आता है, निष्कासन।

523 जिस क्रिया का अनुवाद “फेर देना” किया गया है, उसका अर्थ हटा देना या एक ओर कर देना भी है, और सुरियानी अनुवाद ने यहाँ उसे यही अर्थ दिया है, और यही इस वचन के लिए सबसे उपयुक्त है,—और उन्होंने तेरा अधर्म प्रगट न किया, कि तेरी बंधुआई को टाल दें। अर्थात्, जैसा सुरियानी अनुवाद व्यक्त करता है, उसे दूर हटा दें। — सं.

क्योंकि मुझे कोई सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता यहाँ दिखाता है कि उन व्यर्थ चापलूसियों का, जिनसे प्रजा ने धोखा खाना चुना था, क्या फल निकला: क्योंकि इसी से ऐसा हुआ कि वे अपने देश से निकाल दिए गए और बंधुआई में खदेड़ दिए गए। क्योंकि यदि यह कारण पूछा जाता कि प्रजा अपने ही निज भाग से क्यों वंचित की गई, तो स्पष्ट उत्तर यह होता, कि उन्होंने धोखा खाना चुना था, कि उन्होंने झूठी बातों और व्यर्थ प्रतिज्ञाओं के द्वारा अपने आप को हठ में कठोर कर लिया था।

इसलिए जब उनकी बंधुआई झूठी शिक्षा का फल थी, तो यिर्मयाह अब कहता है कि इन धोखेबाज़ों ने व्यर्थता के भार देखे, परन्तु ऐसे जो अन्त में भार ले आए; और फिर उन्होंने {}מדוחיםmeduchim, अर्थात् निष्कासन देखे, अर्थात् वे बातें जो निष्कासन या बंधुआई का कारण बनी थीं।

प्रार्थना।

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, ऐसा अनुग्रह कर कि यद्यपि तू हमें हमारी योग्यता के अनुसार ताड़ना देता है, तौभी हमारे बीच सत्य की ज्योति कभी बुझने न पाए, वरन् हम अन्धकार में भी कम से कम कुछ चिनगारियाँ सदा देखते रहें, जिनके द्वारा हम तेरी पितृ-सुलभ भलाई और दया को निहार सकें, ताकि हम विशेष करके तेरे सामर्थी हाथ के नीचे दीन किए जाएँ, और पश्चाताप की गहरी अनुभूति के द्वारा सचमुच भूमि पर गिराए जाकर अपनी आशाओं को स्वर्ग की ओर उठाएँ, और कभी सन्देह न करें कि जब हम तुझे तेरे एकलौते पुत्र में खोजेंगे, तब तू अन्त में हम से मेल कर लेगा।—आमीन।

सातवाँ व्याख्यान।

विलापगीत 2:15

15. सब बटोही तुझ पर ताली बजाते हैं; वे यरूशलेम की पुत्री पर ताना मारते और सिर हिलाकर कहते हैं, क्या यह वही नगरी है जिसे लोग परम सुन्दरी और सारी पृथ्वी के हर्ष का कारण कहते थे?

15. Plauserunt super te manibus suis (id est, comploserunt manus suas) omnes transcuntes per viam, sibilarunt, et moverunt caput suum super filia Jerusalem, An haec urbs de qua dixcrunt, perfecta decore, gaudium totius terrae?

यहाँ भविष्यद्वक्ता यहूदियों को उन विपत्तियों का स्मरण दिलाता है जिनसे वे पहले ही चरम सीमा तक पीड़ित हो चुके थे, यहाँ तक कि ये शब्द अनावश्यक और कुछ कठोर-से जान पड़ते हैं; क्योंकि जब कोई मानो विपत्तियों से थककर पड़ा हो, तब डाँटना असमय होता है। जब प्रजा की दशा ऐसी थी, तो भविष्यद्वक्ता को उनके शोक को और कड़वा नहीं करना चाहिए था। परन्तु हम इसका कारण पहले ही बता चुके हैं, अर्थात् यह कि यहूदी, यद्यपि अपनी विपत्तियों में विलाप करते और अत्यन्त शोकित थे, तौभी इस पर विचार नहीं करते थे कि उनकी विपत्तियाँ कहाँ से आईं। इसलिए यह आवश्यक था कि वे अधिक से अधिक जगाए जाएँ; क्योंकि जब तक कोई परमेश्वर के न्याय पर ध्यान न दे, तब तक उसके विपत्तियाँ सहने से उसे बहुत थोड़ा ही लाभ होता है। इससे हम भविष्यद्वक्ता का उद्देश्य समझते हैं, कि वह उन विपत्तियों के विषय में, जो सब को दिखाई देती थीं और उन यहूदियों की दृष्टि से छिप नहीं सकती थीं जो उनसे लगभग दबे जा रहे थे, इतने विस्तार से क्यों बोलता है; क्योंकि उनके लिए अपनी विपत्तियों का अनुभव करना ही पर्याप्त न था, जब तक वे उनके कारण पर भी विचार न करें।

524 इस शब्द में {{ד के स्थान पर ,{}ר की भूल जान पड़ती है, ये दोनों अक्षर बहुत मिलते-जुलते हैं; क्योंकि तारगुम, सुरियानी और अरबी अनुवादों ने अवश्य ही इस शब्द को इसी प्रकार पढ़ा होगा, क्योंकि वे इसका अनुवाद ऐसे अर्थ में करते हैं जो धोखा देनेवाला, छलपूर्ण या काल्पनिक हो। अन्तिम में इसका अनुवाद “छायाभास” किया गया है। यह शब्द यिर्मयाह 22:14 में आता है, और उन कोठरियों के लिए प्रयुक्त हुआ है जिनमें से वायु या हवा स्वतन्त्रता से बहती थी। यहाँ इसका अनुवाद हवाएँ या हवाई बातें किया जा सकता है। उनकी भविष्यद्वाणियों का स्वरूप ऐसा ही था। यह वचन के लिए सेप्टुआजिन्ट और वल्गेट द्वारा दिए गए “निष्कासन” या “त्याग” की अपेक्षा कहीं अधिक उपयुक्त है। — सं.

तब वह कहता है, सब बटोहियों ने ताली बजाई और सीटी बजाई और सिर हिलाया, या तो उपहास के चिह्न के रूप में, या घृणा के, जो अधिक सम्भव है। फिर वह कहता है कि उन्होंने यरूशलेम की पुत्री पर सिर हिलाया या झटका,

क्या यह वही नगरी है जिसके विषय में वे कहते थे, यह सुन्दरता में सिद्ध है, और सारी पृथ्वी का हर्ष है? मैं नहीं जानता कि कुछ लोग {,}כלילתcalibat का अनुवाद मुकुट क्यों करते हैं; जैसा सब जानते हैं, यह {}כללcalal से निकला है, जिसका अर्थ परिपूर्णता या कोई ठोस वस्तु है। तब वह कहता है कि यरूशलेम सुन्दरता में सिद्ध रही थी, क्योंकि परमेश्वर ने उसे अनुपम वरदानों से सजाया था; विशेष करके उसने उसे अपने नाम से कहलाने के अतुलनीय सम्मान से अनुगृहीत किया था। इसलिए यरूशलेम एक प्रकार से परमेश्वर का पार्थिव राजभवन था, अर्थात् मन्दिर के कारण; और इसके अतिरिक्त, उद्धार की शिक्षा वहीं पाई जाती थी; और यह प्रतिज्ञा उल्लेखनीय थी, “सिय्योन से व्यवस्था, और यरूशलेम से यहोवा का वचन निकलेगा।” (यशायाह 2:3.)

परमेश्वर ने यहेजकेल से भी प्रतिज्ञा की थी कि यह नगरी सारे संसार के लिए उद्धार का सोता और उद्गम होगी। (यहेजकेल 47:1-12.) इसलिए जब यरूशलेम ऐसे उल्लेखनीय वरदानों से सजाई गई थी, तो भविष्यद्वक्ता यहाँ परदेशियों को लाता है, जो पूछते हैं, “क्या ऐसा हो सकता है कि सुन्दरता के लिए इतनी प्रसिद्ध नगरी उजाड़ बन गई हो?”

वह उसे सारी पृथ्वी का हर्ष भी कहता है; क्योंकि परमेश्वर ने वहाँ अपने वरदान इतनी उदारता से उण्डेले थे कि वह सब के लिए आनन्द का कारण थी। क्योंकि हम सुन्दर वस्तुओं में आनन्दित होते हैं; और जहाँ कहीं परमेश्वर के वरदान प्रगट होते हैं, वहाँ हमारे हृदय आनन्द से भर जाने चाहिए। कुछ लोग अधिक सूक्ष्म व्याख्या देते हैं—कि यरूशलेम सारी पृथ्वी का हर्ष थी, क्योंकि जब तक परमेश्वर मनुष्यों पर अनुग्रहकारी न हो, उन्हें शान्ति नहीं मिलती; और वहीं परमेश्वर ने अपनी कृपा की साक्षी और बयाना रखा था: और इस प्रकार यरूशलेम ने सारे संसार को आनन्दित किया, क्योंकि उसने सब जातियों को परमेश्वर के पास आने का निमन्त्रण दिया। यह पहली दृष्टि में विश्वसनीय लगता है; परन्तु मुझे यह ठोस होने की अपेक्षा अधिक सूक्ष्म जान पड़ता है। इसलिए मैं इस सरल विचार से सन्तुष्ट हूँ, कि यरूशलेम सारी पृथ्वी का हर्ष थी, क्योंकि परमेश्वर ने ठहराया था कि उसकी कृपा वहाँ प्रगट हो, जो उचित रीति से सारे संसार को आनन्द मनाने के लिए उभार सकती थी। इसके बाद आता है,—

विलापगीत 2:16

16. तेरे सब शत्रुओं ने तुझ पर मुँह पसारा है; वे ताना मारते और दाँत पीसते हैं; वे कहते हैं, हम उसे निगल गए हैं! जिस दिन की बाट हम जोहते थे, निश्चय यही है; वह हम को मिल गया, हम उसको देख चुके हैं!

16. Aperuerunt super te os suum cuncti hostes tui, sibilarunt et frenduerunt dente (vel, dentibus;) dixerunt, Devorabimus; utique hic dies quem expectavimus; 525 यिर्मयाह उस बात का वर्णन करता है जो घटित हो चुकी थी, क्योंकि क्रियाएँ भूतकाल में हैं। हमारा (अंग्रेज़ी) अनुवाद क्रियाओं का वर्तमानकाल में अनुवाद करने में ठीक नहीं है। प्राचीन अनुवाद इब्रानी का अनुसरण करते हैं। — सं.

526 इन शब्दों का अनुवाद यह किया जा सकता है, “सारे देश का हर्ष,” अर्थात् इस्राएल देश का; जो पूर्णतः सत्य था। — सं.

527 यह पद {,{פ से आरम्भ होता है और अगला ;{}ע से; इस प्रकार वर्णक्रम बिगड़ गया है। अगले दो अध्यायों में भी यही बात पाई जाती है, यद्यपि पहले अध्याय में अक्षरों का सामान्य क्रम बना रहता है। इस विषय पर अनेक अनुमान लगाए गए हैं, परन्तु कोई सन्तोषजनक कारण नहीं बताया गया। तारगुम और प्राचीन अनुवाद, सुरियानी को छोड़, तीनों स्थानों पर वर्तमान पाठ का अनुसरण करते हैं; केवल सेप्टुआजिन्ट, बड़ी विचित्रता से, अक्षरों को उनके वर्णक्रम में आगे लगा देता है, और तौभी पदों को वैसे ही देता है जैसे वे अब हैं। जब इसके साथ हम यह भी पाते हैं कि अर्थ वर्तमान क्रम के पक्ष में है, तो हम यह निष्कर्ष निकाले बिना नहीं रह सकते कि यही मूल क्रम था, यद्यपि यह कारण अब नहीं जाना जा सकता कि यिर्मयाह ने इन दो अक्षरों के विषय में, और वह भी तीन स्थानों पर, वर्णक्रम क्यों बदला। — सं.

invenimus, vidimus.

यहाँ भी भविष्यद्वक्ता शत्रुओं को प्रजा की विपत्तियों पर ढिठाई से आनन्द मनाते हुए प्रस्तुत करता है। वह पहले कहता है कि उन्होंने मुँह खोला था, अर्थात् इसलिए कि वे ऊँचे स्वर से उनकी निन्दा करें; क्योंकि जो केवल बोलता है उसके विषय में यह नहीं कहा जाता कि उसने मुँह खोला, वरन् उसके विषय में जो ढिठाई और बेरोकटोक अपनी निन्दा की बातें उगलता है। परमेश्वर के विषय में भी कभी-कभी बल देकर कहा जाता है कि उसने अपना मुँह खोला, जब वह कोई ऐसी बात घोषित करता है जो विशेष ध्यान के योग्य हो; और इसी प्रकार मत्ती कहता है कि जब मसीह ने सच्चे धन्य होने के विषय में बात की, तब उसने अपना मुँह खोला। (मत्ती 5:2.) परन्तु इस स्थान पर और अन्य स्थानों पर शत्रु के विषय में कहा गया है कि उसने मुँह खोला, जो मानो भरे मुँह से उस पर ताना मारता है जिसे वह विपत्तियों से थका हुआ देखता है। इसलिए जब वह कहता है कि शत्रुओं ने अपना मुँह खोला था, तो वह उद्दण्डता या ढिठाई की ओर संकेत करता है

फिर वह आगे कहता है कि उन्होंने सीटी बजाई थी। सीटी बजाने से उसका अर्थ निःसन्देह ठट्ठा करना या ताना मारना है; क्योंकि तुरन्त आगे आता है कि उन्होंने दाँत पीसे थे, मानो उसने कहा हो कि शत्रुओं ने न केवल उन्हें दोष दिया और दोषी ठहराया, वरन् अत्यन्त घृणा के चिह्न भी दिखाए; क्योंकि जो दाँत पीसता है वह इस प्रकार अपने मन की कड़वाहट, वरन् क्रोधोन्माद, प्रगट करता है; क्योंकि दाँत पीसना जंगली पशु का काम है। तब भविष्यद्वक्ता कहता है कि शत्रुओं ने प्रजा को न केवल तानों और ठट्ठों से सताया था, वरन् उनके साथ क्रूरता, वरन् उन्मत्तता से व्यवहार किया था। अब हम जानते हैं कि उदार मनवाले मनुष्यों के लिए ऐसा व्यवहार मृत्यु से भी कठिन होता है: क्योंकि बहुत से लोग युद्ध में गिरना कठिन बात समझते हैं—और हम देखते हैं कि योद्धा किस प्रकार अपने आप को बड़े से बड़े संकट में डालते हैं; परन्तु अपमानजनक मृत्यु कहीं अधिक कड़वी होती है। अतः भविष्यद्वक्ता निःसन्देह इस परिस्थिति के द्वारा प्रजा की विपत्तियों को बढ़ाकर दिखाता है, कि वे चारों ओर से तानों द्वारा सताए गए थे। और वह यह बात जान-बूझकर कहता है, क्योंकि भविष्यद्वक्ताओं की डाँट को उन्होंने ग्रहण नहीं किया था; क्योंकि हम जानते हैं कि जब भविष्यद्वक्ता परमेश्वर के नाम से यहूदियों को डाँटते थे, तब वे कितनी हठीली रीति से उनके विरुद्ध बलवा करते थे। इसलिए जब वे परमेश्वर की पितृ-सुलभ डाँट को सहना नहीं चाहते थे, तो इस प्रकार वे शत्रुओं की निन्दा सहने, और अपने घमण्ड और ढिठाई का उचित प्रतिफल पाने के लिए विवश किए गए। और जैसा मैंने कहा है, इसमें कोई सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता ने इस प्रकार की निन्दाओं और शत्रुओं के ठट्ठों का वर्णन इसलिए किया, कि प्रजा अन्त में जान ले कि वे ऐसी विपत्तियों के वश में इसलिए किए गए थे, क्योंकि उन्होंने भविष्यद्वक्ताओं द्वारा दी गई डाँट को घमण्ड से ठुकरा दिया था।

वह कहता है कि शत्रुओं ने इस प्रकार कहा, हम निगल गए हैं; निश्चय यही वह दिन है जिसकी हम बाट जोहते थे; मानो वे यह देखकर विजय मना रहे थे कि उन्होंने जीत पा ली है, और वे प्रजा के साथ जो चाहें कर सकते हैं। और जैसा मैंने कहा है, यह अपने आप में प्रजा के लिए बहुत कड़वी बात थी; परन्तु जब भविष्यद्वक्ता ने, मानो शत्रुओं के मुख से, वह बात कही जो उन्हें पहले से भली भाँति ज्ञात थी, तो प्रजा को उस कारण को स्मरण करना चाहिए था जिससे वे इतनी कठोरता से पीड़ित किए गए थे; और यही बात भविष्यद्वक्ता अगले पद में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करता है; क्योंकि वह आगे कहता है,—

विलापगीत 2:17

17. यहोवा ने जो कुछ ठाना था वही किया भी है, जो वचन वह प्राचीनकाल से कहता आया है वही उसने पूरा भी किया है; उसने तुझे निर्दयता से ढा दिया है, उसने शत्रुओं को तुझ पर आनन्दित किया, और तेरे द्रोहियों के सींग को ऊँचा किया है।

17. Fecit Jehova quod cogitaverat, complevit sermonem suum quam praeceperat a diebus anitiquis: diruit (vel, evertit) et non perpercit; et exhilaravit super te inimicum, et extulit corum hostium tuorum.

यदि भविष्यद्वक्ता केवल शत्रुओं की डींगों का वर्णन करता, तो प्रजा सम्भवतः अपने शोक में और भी कठोर हो जाती। परन्तु अब, दूसरी ओर, वह एक भिन्न रूप धारण करता है। यह दिखाने के बाद कि शत्रुओं ने कितनी ढिठाई से व्यवहार किया, वह अब कहता है, यहोवा ने जो ठाना था वही किया है; और इस प्रकार शत्रुओं के तानों से हटाकर वह प्रजा का ध्यान परमेश्वर के न्याय की ओर लगाता है। क्योंकि जब शत्रु हमारा अपमान करते हैं, तब हमें सचमुच चोट लगती है, परन्तु बाद में शोक एक प्रकार से हमारी भावनाओं को कुण्ठित कर देता है। इसलिए हमारा सबसे अच्छा उपाय यह है कि हम अपने विचार मनुष्यों की ढिठाई पर न टिकाएँ, वरन् वह जानें जिसका पवित्रशास्त्र हमें बार-बार स्मरण दिलाता है, कि दुष्ट परमेश्वर के कोड़े हैं जिनसे वह हमें ताड़ना देता है। तो यही वह विषय है जिसे भविष्यद्वक्ता अब उठाता है। वह कहता है कि परमेश्वर ने किया है, इत्यादि; मानो उसने कहा हो कि शत्रु चाहे कितनी ही मर्यादा का उल्लंघन करें, तौभी यदि प्रजा परमेश्वर की ओर ध्यान देती, तो उनके लिए अपने आप को दीन करने का उचित कारण था।

वह पहले कहता है कि यहोवा ने वही किया जो उसने ठाना था: क्योंकि सोचना शब्द परमेश्वर पर ठीक रीति से लागू नहीं होता, तौभी ऐसा प्रायः किया जाता है, जैसा हम पहले देख चुके हैं।

फिर वह कहता है कि उसने वह वचन पूरा किया है जिसकी आज्ञा उसने पूर्वकाल में दी थी; क्योंकि यदि भविष्यद्वक्ता केवल परमेश्वर की गुप्त युक्ति का ही उल्लेख करता, तो यहूदी सन्देह में रह जाते कि वह क्या थी। और निश्चय ही, जब हमारी बुद्धि उस गहरे अथाह कुण्ड में प्रवेश नहीं कर सकती, तो परमेश्वर के छिपे हुए न्यायों के विषय में उसका बोलना व्यर्थ होता।

इसलिए यह आवश्यक था कि वह उस शिक्षा पर उतर आए, जिसके द्वारा परमेश्वर, जहाँ तक उचित है, हम पर वह प्रगट करता है जो अन्यथा न केवल छिपा हुआ, वरन् समझ से भी परे होता; क्योंकि यदि हम परमेश्वर के न्यायों की छानबीन करें, तो हम गहराई में डूब जाएँगे। परन्तु जब हम अपने मनों को उसकी ओर लगाते हैं जो परमेश्वर ने हमें सिखाया है, तब हम पाते हैं कि वह हम पर वह सब प्रगट करता है जिसका जानना आवश्यक है; और यद्यपि उसके वचन के द्वारा भी हम उसके छिपे हुए न्यायों को पूर्ण रूप से नहीं जान सकते, तौभी हम उन्हें अंश में जान सकते हैं, और जैसा मैंने कहा है, उतना जितना हमारे लिए उचित है। तो यही कारण है कि भविष्यद्वक्ता, परमेश्वर की युक्तियों और आदेशों के विषय में कहने के बाद, वचन शब्द जोड़ता है

तो आओ, हम इस नियम को दृढ़ता से थामे रहें, अर्थात् परमेश्वर के गुप्त न्यायों के विषय में जो कुछ हम जानना चाहते हैं, उसे व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं और सुसमाचार से ही खोजें; क्योंकि यदि हम उस शिक्षा से, जो हमें दी गई है, थोड़ा सा भी हटें, तो परमेश्वर की महिमा की अपारता तुरन्त हमारे सब विचारों को निगल लेगी; और अनुभव पर्याप्त रूप से सिखाता है कि इस विषय में अपने आप को उचित से अधिक स्वतन्त्रता देने से बढ़कर कुछ भी अधिक खतरनाक, वरन् घातक नहीं है। तो आओ, हम सीखें कि जब हम परमेश्वर के गुप्त न्यायों के विषय में बोलें तब सब जिज्ञासा पर लगाम लगाएँ, और तुरन्त अपने मनों को स्वयं वचन की ओर लगाएँ, कि वे एक प्रकार से उसी में घिरे रहें। इसके अतिरिक्त, भविष्यद्वक्ता इस रीति से उस बात को भी अधिक सरलता से रोक सका जिस पर यहूदी अन्यथा आपत्ति करने को तैयार रहते: क्योंकि हम जानते हैं कि वे सदा कुड़कुड़ाने के आदी थे, और ज्यों ही भविष्यद्वक्ता बोलते, वे अनेक आपत्तियाँ प्रस्तुत करते थे, जिनके द्वारा वे उनकी शिक्षा का खण्डन करने का प्रयत्न करते थे।

सो जब वे ऐसी प्रजा थे जो सिखाई नहीं जा सकती थी, तो यिर्मयाह ने केवल परमेश्वर के गुप्त न्यायों की ही चर्चा नहीं की, जिनके विषय में कुछ सन्देह उठाया जा सकता था; परन्तु विवादों और झगड़ों का हर एक अवसर काट डालने के लिए उसने स्वयं वचन का उल्लेख किया; और इस प्रकार उसने यहूदियों को मानो दोषी ठहराकर पकड़ रखा; क्योंकि, जैसा मूसा कहता है, वे यह आपत्ति करके नहीं कह सकते थे, “कौन स्वर्ग पर चढ़ेगा? कौन गहिरे में उतरेगा? कौन समुद्र पार जाएगा?” (व्यवस्थाविवरण 30:12-14;) क्योंकि परमेश्वर का वचन उनके मुँह में था, अर्थात् परमेश्वर ने अपने न्यायों को भली-भाँति प्रकट कर दिया था, यहाँ तक कि वे अस्पष्टता की शिकायत नहीं कर सकते थे। सो अब हम एक और कारण समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने परमेश्वर के न्यायों और आज्ञाओं या युक्ति के साथ वचन को क्यों जोड़ा।

परन्तु वह कहता है कि यह वचन प्राचीनकाल से प्रकाशित किया गया था; और यहाँ वह प्रजा के अदम्य हठ को छूता है; क्योंकि यदि उन्हें कुछ ही दिन या थोड़े ही समय पहले चिताया गया होता, तो वे परमेश्वर से वाद-विवाद कर सकते थे; और यह कुछ ऊपरी दिखावा हो सकता था कि परमेश्वर ने मानो अपनी कठोरता में बहुत अधिक उतावली की। परन्तु जब एक के बाद एक भविष्यद्वक्ता भेजे गए थे, और जब वह बहुत वर्षों तक, वरन् बहुत युगों तक, उन्हें मन फिराने का उपदेश देने से, और उन्हें धमकाने से भी, कि वे मन फिराएँ, नहीं रुका था, तो इसी से उनकी पुरानी अभक्ति और भी पूरी रीति से प्रकट हो गई। यही कारण है कि भविष्यद्वक्ता अब उन प्राचीन दिनों का उल्लेख करता है, जिनमें परमेश्वर ने अपना वचन प्रकाशित किया था।

अन्त में वह जोड़ता है, उसने ढा दिया है और तरस नहीं खाया। यहाँ वह परमेश्वर पर अत्यधिक कठोरता का दोष नहीं लगाता, वरन् वह यहूदियों को डाँटता है, ताकि वे अपने दण्ड की भारीपन से जान लें कि उनका अधर्म कितना असहनीय रहा था।

सो वह चाहता है कि वे अपने दण्ड से अपने पापों का अनुमान लगाएँ, क्योंकि परमेश्वर मनुष्यों के प्रति अन्याय नहीं करता। इससे यह निकलता है कि जब हम उसके हाथ से कठोरता से दुःख पाते हैं, तो यह इस बात का प्रमाण है कि हम बहुत दुष्ट रहे हैं।

फिर वह यह निष्कर्ष निकालता है कि परमेश्वर ही था जिसने उनके शत्रुओं को आनन्दित किया, और उनके सींग को ऊँचा किया। इन शब्दों से वह उस शिक्षा की पुष्टि करता है, जिसे मैं पहले ही छू चुका हूँ, कि जब मनुष्य हमारे प्रति ढिठाई करते हैं, और हमारी दुर्दशा पर फूले नहीं समाते, तब हमें अपनी आँखें परमेश्वर की ओर फेरनी चाहिए; क्योंकि अन्यथा ऐसी नामधराई हमें पूरी रीति से डुबो सकती है।

परन्तु जब हम विचार करते हैं कि हमें परमेश्वर ताड़ना दे रहा है, और यह कि दुष्ट लोग, चाहे वे हमारे साथ कितना ही उद्दण्डता से व्यवहार करें, फिर भी परमेश्वर के कोड़े ही हैं, तब हम शान्त और समर्पित मन से वह सहने का निश्चय करते हैं जो अन्यथा अपनी कड़वाहट से हमें थका डालता। आगे लिखा है,

विलापगीत 2:18

18. वे प्रभु की ओर मन से पुकारते हैं! हे सिय्योन की कुमारी की शहरपनाह, अपने आँसू रात दिन नदी की नाईं बहाती रह! तनिक भी विश्राम न ले, तेरी आँख की पुतली चैन न ले!

18. Clamavit cor corum ad Dominum; Mure filiae Sion, deducas tanquam fluvium lachrymas (vel, tanquam fluvius) die et nocte; ne des requiem Tibi, ne silcat (hoc est, ne quiescat) pupilla oculi tui.

उसका यह अर्थ नहीं कि उनका मन सचमुच परमेश्वर की दोहाई देता था, क्योंकि उनके मन में कोई पुकार नहीं थी; परन्तु इस कथन के द्वारा वह उनके शोक की प्रचण्डता को प्रकट करता है, मानो उसने कहा हो कि प्रजा का मन इतने दुःख से दबा हुआ था कि उनकी भावनाएँ फूटकर चिल्लाहट बन गईं; क्योंकि चिल्लाना अत्यन्त शोक से उत्पन्न होता है, और जब कोई चिल्लाता या रोता है, तो उसका अपने ऊपर वश नहीं रहता। चुप रहना धीरज का चिह्न है; परन्तु जब शोक किसी पर प्रबल हो जाता है, तब वह मानो अपने आप को भूलकर अवश्य ही चिल्ला उठता है। यही कारण है कि वह कहता है कि उनका मन यहोवा की दोहाई देता था। 528 शब्दशः यह है, — और उसने शत्रु को तुझ पर आनन्दित किया है, उसने तेरे सतानेवालों का सींग ऊँचा किया है। — सं.

परन्तु हमें ध्यान देना चाहिए कि यहाँ प्रजा की भक्ति की प्रशंसा नहीं की गई, मानो उन्होंने सच्चाई से और खरे मन से परमेश्वर के सामने अपनी विपत्तियों की शिकायत की हो: इसके विपरीत, भविष्यद्वक्ता का अर्थ यह है कि यह एक साधारण पुकार थी, जो प्रायः निकम्मे ठहराए हुए लोग भी करते हैं; क्योंकि स्वभाव ही एक प्रकार से यह सिखाता है कि जब हम विपत्तियों से दबे हों तब हमें परमेश्वर की शरण लेनी चाहिए; और जिनमें परमेश्वर का भय नहीं है, वे भी अपनी अत्यन्त दुर्दशा में चिल्ला उठते हैं, “परमेश्वर हम पर दया करे।” और, जैसा मैं कह चुका हूँ, ऐसी पुकार किसी सही भावना से या परमेश्वर के सच्चे भय से नहीं निकलती, परन्तु स्वभाव के प्रबल और गँदले आवेग से निकलती है: और इस प्रकार परमेश्वर ने आदि से सब मनुष्यों को निरुत्तर ठहराया है। सो अब भविष्यद्वक्ता कहता है कि यहूदियों ने परमेश्वर की दोहाई दी, या उनके मन ने दोहाई दी; इसलिए नहीं कि उन्होंने परमेश्वर की ओर वैसे देखा जैसे उन्हें देखना चाहिए था, या उन्होंने अपने दुःख उसके पास सौंप दिए और उन्हें उसकी गोद में डाल दिया, जैसा करने के लिए भविष्यद्वक्ता हमें उत्साहित करता है; परन्तु इसलिए कि उन्हें संसार में कोई उपाय नहीं मिला — क्योंकि जब तक मनुष्यों को संसार में कोई शान्ति या सहायता मिलती है, तब तक वे उसी से सन्तुष्ट रहते हैं। तो फिर परमेश्वर की यह दोहाई कहाँ से आई? इसी से कि संसार ने उन्हें ऐसा कुछ नहीं दिया जिसमें वे ठहर सकें; क्योंकि यह मानो हमारे स्वभाव (अर्थात् बिगड़े हुए स्वभाव) में जन्मजात है कि जब कोई विपत्ति हमें दबाती है तब हम इधर-उधर देखते हैं। अब, जब हमें, जैसा मैं कह चुका हूँ, सहायता के रूप में कुछ भी मिल जाता है, चाहे वह एक खोखली छाया ही क्यों न हो, तो हम उसी से लिपट जाते हैं, और अपनी आँखें कभी परमेश्वर की ओर नहीं उठाते। परन्तु जब आवश्यकता हमें विवश करती है, तब हम परमेश्वर की दोहाई देने लगते हैं। सो भविष्यद्वक्ता का अर्थ यह है कि प्रजा अत्यन्त संकट में पहुँचा दी गई थी, जब वह कहता है कि उनके मन ने परमेश्वर की दोहाई दी।

इसके बाद वह यरूशलेम की शहरपनाह की ओर मुड़ता है, और एक निर्जीव वस्तु में समझ का आरोपण करता है। वह कहता है, हे यरूशलेम की शहरपनाह, आँसू बहा मानो तू नदी हो; या, नदी की नाईं; क्योंकि दोनों अर्थ स्वीकार किए जा सकते हैं। परन्तु अंश को सम्पूर्ण के स्थान पर रखकर वह शहरपनाह शब्द के अन्तर्गत सारे नगर को सम्मिलित करता है, जैसा भली-भाँति विदित है। और फिर भी यहाँ मानवीकरण बना रहता है, क्योंकि न घर, न शहरपनाह, न फाटक, न सड़कें आँसू बहा सकती थीं; परन्तु यिर्मयाह इस अतिशयोक्तिपूर्ण भाषा के बिना उनकी पुकार की सीमा को पर्याप्त रूप से व्यक्त नहीं कर सकता था। यही कारण था कि उसने स्वयं नगर की शहरपनाह को सम्बोधित किया, और उसे नदी की नाईं आँसू बहाने की आज्ञा दी।

ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ खण्डहरों की ओर कुछ संकेत है; क्योंकि नगर की शहरपनाह ऐसे ढा दी गई थी मानो वह पिघल गई हो। और फिर भविष्यद्वक्ता प्रजा की पहले की कठोरता की ओर भी संकेत करता प्रतीत होता है, क्योंकि उनके मन अत्यन्त जड़ हो गए थे।

सो जब वे कभी भी झुकनेवाले न थे, चाहे उन्हें शिक्षा से, या उपदेशों से, या धमकियों से सम्बोधित किया गया, तो अब वह परोक्ष रूप से उनके विपरीत नगर की शहरपनाह को सामने रखता है, मानो उसने कहा हो, “अब तक परमेश्वर का कोई भी दास तुम्हारी आँखों से एक आँसू भी न निकलवा सका, तुम्हारी कठोरता इतनी बड़ी थी; परन्तु अब स्वयं शहरपनाह रोती है, क्योंकि वह ऐसे घुलती जाती है मानो जल की नदियाँ बहाएगी। इसलिए स्वयं पत्थर आँसू बन जाते हैं, क्योंकि तुम अब तक परमेश्वर के और भविष्यद्वाणी की सारी शिक्षा के विरुद्ध कठोर बने रहे हो।”

529 वल्गेट द्वारा सुझाया गया अर्थ सबसे उपयुक्त है। इन शब्दों का अनुवाद यों किया जा सकता है, — उनके मन ने प्रभु की दोहाई दी, “हाय सिय्योन की पुत्री की शहरपनाह!” — धारा की नाईं आँसू बहा, रात और दिन; अपने आप को विश्राम न दे। तेरी आँख की पुत्री न रुके। उनकी पुकार यह थी, “हाय शहरपनाह,” इत्यादि। फिर अध्याय के अन्त तक यिर्मयाह के शब्द आते हैं; परन्तु रोने और मन फिराने का उपदेश सिय्योन की पुत्री को दिया गया है, शहरपनाह को नहीं। “आँख की पुत्री” आँसू हो सकता है, जैसा ब्लेनी ने सुझाया है और हॉर्सली ने स्वीकार किया है; और यहाँ यह अधिक उपयुक्त होगा। — सं.

इसके बाद वह जोड़ता है, अपने आप को न छोड़, दिन या रात अपने आप को विश्राम न दे, और तेरी आँख की पुत्री, या तेरी आँख की पुतली, न रुके, शब्दशः, चुप न रहे; परन्तु चुप रहना रूपक के रूप में रुकने या विश्राम करने के अर्थ में लिया गया है। वह संकेत करता है कि निरन्तर विलाप का अवसर होगा, वरन् अब भी था; और इसलिए उसने उन्हें दिन और रात रोने का उपदेश दिया; मानो उसने कहा हो कि दुःख बिना रुके बना रहेगा, क्योंकि उनकी विपत्तियों में कोई ढील न होगी। परन्तु हमें वह स्मरण रखना चाहिए जो हम पहले कह चुके हैं, कि भविष्यद्वक्ता ने प्रजा के दुःख को और कड़वा करने के लिए ऐसा नहीं कहा। हम निश्चय जानते हैं कि विपत्तियों के समय मनुष्यों के मन बहुत कोमल और नाज़ुक होते हैं, और तब वे सिर के बल अधीरता में दौड़ पड़ते हैं; परन्तु जब तक वे सच्चे पश्चाताप तक नहीं पहुँचाए गए थे, तब तक वह उनके सामने वह दण्ड रखता है जो परमेश्वर ने दिया था, ताकि उसके द्वारा वे अपने ही पापों पर विचार करने की ओर फिरें। आगे लिखा है, —

विलापगीत 2:19

19. रात के हर पहर के आरम्भ में उठकर चिल्लाया कर! प्रभु के सम्मुख अपने मन की बातों को जल की नाईं उण्डेल! तेरे बालबच्चे जो हर एक सड़क के सिरे पर भूख के कारण मूर्छित हो रहे हैं, उनके प्राण के निमित्त अपने हाथ उसकी ओर फैला।

19. Surge, Clama nocte principio excubiarum (custodiarum ad verbum, sed significat vigilias nocturnas;) effunde tanquam aquas cor tuum coram facie Domini; attolle ad ipsum manus tuas propter Animam parvulorum tuorum, qui deficiunt fame in capite omnium compitorum.

भविष्यद्वक्ता अब अपनी बात और स्पष्ट रीति से समझाता है, और जो मैंने अभी कहा था उसकी पुष्टि करता है, कि उसने प्रजा की विपत्तियों का उल्लेख केवल इसी उद्देश्य से किया, कि जो लगभग जड़ हो गए थे वे अपनी आँखें परमेश्वर की ओर उठाने लगें, और अपने जीवन को भी जाँचें, और स्वेच्छा से अपने आप को दोषी ठहराएँ, ताकि इस प्रकार वे परमेश्वर के कोप से बच निकलें।

सो भविष्यद्वक्ता उन्हें उठने और चिल्लाने की आज्ञा देता है। निःसन्देह उनके शत्रुओं ने उन्हें बलपूर्वक एक लम्बी यात्रा करने को विवश किया था: तो फिर वह उन्हें उठने की आज्ञा क्यों देता है, जो अपने ही देश से भगोड़े हो गए थे, और भेड़ों की नाईं हाँक दिए गए थे? जैसा मैं कह चुका हूँ, वह उनके मनों के आलस्य को ध्यान में रखता है, क्योंकि वे अब भी अपने पापों में सुन्न पड़े हुए थे। सो उन्हें इस संवेदनहीनता से जगाना आवश्यक था; और भविष्यद्वक्ता का यही अभिप्राय था जब उसने कहा, उठ। और फिर वह उन्हें पहरों के आरम्भ में चिल्लाने की आज्ञा देता है, अर्थात् ठीक तब जब नींद आने लगती है, और समय अधिक शान्त होता है; क्योंकि जब मनुष्य बिछौने पर जाते हैं, तब नींद आती है, और वही मुख्य विश्राम है। परन्तु भविष्यद्वक्ता यहाँ यहूदियों को आज्ञा देता है कि वे ठीक उसी समय चिल्लाएँ, और अपनी बेचैनी में अपनी शिकायतें कहें, जब दूसरे लोग विश्राम करते हैं। तौभी वह नहीं चाहता था कि वे बिना सोचे-समझे अपना विलाप हवा में उण्डेल दें, परन्तु उसने उन्हें अपनी प्रार्थनाएँ परमेश्वर के सामने रखने की आज्ञा दी। फिर उस समय की परिस्थितियों के विषय में वह वही दोहराता है जो हम पहले देख चुके हैं, कि उनकी विपत्तियों का ढेर इतना बड़ा था कि उसने प्रजा को कोई ढील न दी; संक्षेप में, वह संकेत करता है कि यह निरन्तर दुःख था।

परन्तु, जैसा मैं कह चुका हूँ, वह चाहता था कि यहूदी केवल चिल्लाएँ ही नहीं, वरन् उन्हें अपने मन जल की नाईं उण्डेलने का उपदेश देने के बाद वह जोड़ता है, यहोवा के सम्मुख। क्योंकि अविश्वासी लोग चिल्ला-चिल्लाकर अपना गला लगभग बैठा लेते हैं, परन्तु वे केवल निर्बुद्धि पशुओं के समान हैं; या यदि वे परमेश्वर का नाम लेते हैं, तो, जैसा कहा जा चुका है, वे यह एक उतावले और अन्धाधुन्ध आवेग से करते हैं। इसलिए भविष्यद्वक्ता यहाँ परमेश्वर के चुने हुए लोगों और निकम्मे ठहराए हुए लोगों में भेद करता है, जब वह उन्हें आज्ञा देता है कि वे अपने मन और अपनी पुकारें परमेश्वर के सामने उण्डेलें, ताकि उससे राहत खोजें, जो नहीं हो सकता था यदि उन्हें यह निश्चय न होता कि वही उनकी सारी विपत्तियों का कर्ता है; और इसी से पश्चाताप भी उत्पन्न होता है, क्योंकि परमेश्वर के न्याय और मनुष्यों के पापों के बीच परस्पर सम्बन्ध है। सो जो कोई परमेश्वर को न्यायी मानता है, वह साथ ही अपने आप को जाँचने और अपने पापों के विषय में पूछताछ करने को विवश होता है। अब हम भविष्यद्वक्ता के शब्दों का अर्थ समझते हैं।

530 गैटेकर के अनुसार सरल अर्थ यह है, अपने बिछौने से “उठ”; क्योंकि उसे रात में चिल्लाने का उपदेश दिया गया है। — सं.

इसी उद्देश्य से वह जोड़ता है, अपने हाथ उसकी ओर उठा। यह रीति अपने आप में निश्चय ही पर्याप्त नहीं; परन्तु पवित्रशास्त्र प्रायः बाहरी चिह्नों के द्वारा वास्तविक बात की ओर संकेत करता है। सो हाथों को उठाना, इस स्थान पर और अन्य स्थानों पर, प्रार्थना के समान ही अर्थ रखता है; और सब युगों में स्वर्ग की ओर हाथ उठाने की रीति रही है, और यह कथन भजन संहिता में प्रायः आता है, (भजन संहिता 28:2; भजन संहिता 134:2;) और जब पौलुस हर जगह प्रार्थना करने की आज्ञा देता है, तो वह कहता है, “मैं चाहता हूँ कि पुरुष बिना क्रोध और विवाद के पवित्र हाथों को उठाकर प्रार्थना किया करें।” (1 तीमुथियुस 2:8.)

निःसन्देह परमेश्वर ने ही मनुष्यों को यह रीति सुझाई है, कि पहले, जब वे उसे खोजें तो सारे संसार से परे जाएँ; और दूसरे, कि इस प्रकार वे अपने आप को भरोसा रखने के लिए उकसाएँ, और सब सांसारिक अभिलाषाओं को भी उतार फेंकें; क्योंकि यदि यह रीति हमारे मनों को ऊपर न उठाती, (क्योंकि हम स्वभाव से अन्धविश्वास की ओर झुके हुए हैं,) तो हर कोई परमेश्वर को या तो अपने पाँवों के पास या अपनी बगल में खोजता।

सो परमेश्वर ने मनुष्यों में यह भावना रोप दी है, अर्थात् अपने हाथ ऊपर की ओर उठाना, ताकि वे, जैसा मैं कह चुका हूँ, सारे संसार से परे जाएँ, और इस प्रकार सब व्यर्थ अन्धविश्वास को उतार फेंककर स्वर्ग से भी ऊपर चढ़ें।

मैं मानता हूँ कि यह रीति वास्तव में अविश्वासियों में भी सामान्य है; और इस प्रकार उनसे सारा बहाना छीन लिया गया है। सो यद्यपि अविश्वासी स्थूल और उन्मत्त कल्पनाओं से भरे हुए हैं, यहाँ तक कि वे परमेश्वर को मूर्तियों और चित्रों से जोड़ देते हैं, तौभी स्वर्ग की ओर हाथ उठाने की यह आदत उनकी सब भ्रान्त धारणाओं का खण्डन करने के लिए पर्याप्त होनी चाहिए थी। परन्तु इस संसार से परे परमेश्वर को खोजना पर्याप्त न होगा, ताकि कोई अन्धविश्वास हमारे मनों पर अधिकार न करे, जब तक कि हमारे मन सब सांसारिक अभिलाषाओं से भी मुक्त न किए जाएँ। क्योंकि हम अपनी अभिलाषाओं में उलझे हुए रहते हैं, और तब हम वही खोजते हैं जो शरीर को भाता है, और इस प्रकार, अधिकांशतः, मनुष्य परमेश्वर को अपने अधीन करने का यत्न करते हैं। सो हाथों का उठाना यह भी दिखाता है कि जब कभी हम परमेश्वर को पुकारते हैं, तब हमें अपने आप का इन्कार करना है, और मानो अपने आप से बाहर निकल जाना है। इस विधि या रीति के उपयोग के विषय में संक्षेप में यही बातें कही जा सकती हैं।

परन्तु हमें वह स्मरण रखना चाहिए जिसकी ओर मैंने संकेत किया है, कि जब भविष्यद्वक्ता उन्हें परमेश्वर की ओर हाथ उठाने की आज्ञा देता है, तब वह एक बाहरी चिह्न के द्वारा स्वयं वास्तविक बात को सूचित करता है।

इसके बाद वह इसकी आवश्यकता दिखाता है, तेरे बालबच्चों के प्राण के कारण, जो भूख से मूर्छित होते हैं; परन्तु {,}בbeth यहाँ अतिरिक्त है, — जो, तब, भूख के कारण मूर्छित होते या क्षीण होते हैं, और वह भी खुले रूप में। क्योंकि ऐसा हो सकता था कि जिनके पास भोजन न था वे घर में ही घुलते जाते, और इस प्रकार मूर्छित हो जाते क्योंकि कोई उन्हें सहायता न देता, इसलिए कि उनका अभाव किसी को विदित न था। परन्तु जब शिशुओं ने सार्वजनिक स्थानों में भूख से अपने प्राण छोड़े, तो इसी से निराशा की वह चरम दशा प्रकट हुई, जिसे भविष्यद्वक्ता यहाँ हर एक सड़क के सिरे पर का उल्लेख करके प्रस्तुत करना चाहता था। 531 बल्कि, “जो भूख के कारण मूर्छित हुए;” क्योंकि वह उस बात की ओर संकेत करता है जो घट चुकी थी। — सं.

आगे लिखा है, —

विलापगीत 2:20

20. हे यहोवा दृष्टि कर, और ध्यान से देख कि तू ने यह सब किस से किया है? क्या स्त्रियाँ अपना फल अर्थात् अपनी गोद के बच्चों को खा डालें? क्या याजक और भविष्यद्वक्ता प्रभु के पवित्रस्थान में घात किए जाएँ?

20. Vide, Jehova, et aspice cui feceris sic; an comedent mulieres fructum suum (hoc est, foetus suos,) parvulos educationis? An occidetur in sanctuario Domini sacerdos et propheta?

यहाँ भी यिर्मयाह यहूदियों को शब्द, या प्रार्थना का एक रूप, बोलकर लिखाता है। और यह शिकायत दया उत्पन्न करने में सहायक थी, कि परमेश्वर ने इस प्रकार परदेशियों को नहीं, परन्तु उस प्रजा को दुःख दिया था जिसे उसने गोद लिया था। व्याख्याकार निश्चय ही एक और व्याख्या देते हैं, “देख, हे यहोवा, तू ने यह किस से किया है?” अर्थात्, क्या कभी किसी प्रजा को इतना कठोर दुःख दिया गया है? परन्तु मैं नहीं समझता कि यहाँ वह तुलना की गई है जिसे वे करना चाहते हैं, परन्तु यह कि प्रजा केवल परमेश्वर के सामने वह वाचा रखती है जो उसने उनके पुरखाओं से बाँधी थी, मानो वे कहते हों, “हे प्रभु, यदि तू परदेशियों पर इस प्रकार निर्दयता से भड़कता, तो इसमें कुछ भी इतना अचम्भे की बात न होती; परन्तु जब हम तेरा निज भाग हैं, और अब्राहम का धन्य वंश हैं, जब तुझे यह भाया कि हमें अपनी निज प्रजा होने के लिए चुने, तो इसका क्या अर्थ हो सकता है कि तू हमसे इतनी कठोरता का व्यवहार करता है?”

सो अब हम भविष्यद्वक्ता का वास्तविक अर्थ समझते हैं, जब वह प्रजा की ओर से यों कहता है, देख, और ध्यान कर, हे यहोवा, कि तू ने यह किस से किया है; क्योंकि तेरा काम तो अपने ही बच्चों से पड़ा है: इसलिए नहीं कि यहूदी किसी योग्यता का दावा कर सकते थे; परन्तु परमेश्वर का सेंतमेंत चुनाव दया को खींच लाने के लिए भरपूर पर्याप्त होना चाहिए था। और विश्वासी यहाँ परमेश्वर से केवल देखने की ही विनती नहीं करते, परन्तु वे एक और शब्द जोड़ते हैं, ध्यान कर। इन दो शब्दों के द्वारा वे जो कुछ हुआ था उसकी अनुचितता को और भी पूरी रीति से व्यक्त करते हैं, मानो वे कहते हों कि यह एक अद्भुत अनर्थ के समान था कि परमेश्वर की प्रजा, जिसे उसने चुना था, इतना कठोर दुःख पाए: सो देख, तू ने यह किस से किया है। और प्रार्थना की यह रीति बहुत सामान्य थी, जैसा हम भजन संहिता में कहा हुआ पाते हैं, “जो जातियाँ तुझे नहीं जानतीं, और जिन राज्यों के लोग तेरा नाम नहीं लेते, उन्हीं पर अपनी सब जलजलाहट भड़का।” (भजन संहिता 79:6.)

और ऐसा ही एक स्थान हम पहले अपने भविष्यद्वक्ता में देख चुके हैं। (यिर्मयाह 10:25.)

जो कुछ कहा गया है उसका सार यह है, कि परमेश्वर के दया की ओर फिरने, और इस प्रकार अपनी प्रजा से मेल कर लेने का एक उचित कारण था, क्योंकि उसका काम परायों से नहीं, परन्तु अपने ही घराने से पड़ा था, जिसे गोद लेना उसे भाया था। परन्तु शेष बातें मैं कल तक के लिए छोड़ता हूँ।

प्रार्थना।

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जैसे आज के दिन तेरी कलीसिया बहुत-सी विपत्तियों से दबी हुई है, वैसे ही हम न केवल अपनी आँखें और अपने हाथ, वरन् अपने मन भी तेरी ओर उठाना सीखें, और अपना ध्यान तुझ पर ऐसा लगाएँ कि केवल तुझ ही से उद्धार की बाट जोहें; और यद्यपि पृथ्वी पर निराशा हमें घेर ले, तौभी तेरी भलाई की आशा स्वर्ग से हम पर सदा चमकती रहे, और उस मध्यस्थ पर भरोसा रखकर जिसे तू ने हमें दिया है, हम तेरी दोहाई निरन्तर देने में न हिचकें, जब तक कि हम अनुभव से सचमुच यह न पा लें कि हमारी प्रार्थनाएँ व्यर्थ नहीं हुईं, जब तू ने अपनी कलीसिया पर तरस खाकर अपना हाथ बढ़ाया है, और हमें आनन्द करने का कारण दिया है, और हमारे विलाप को आनन्द में बदल दिया है, हमारे प्रभु मसीह के द्वारा। — आमीन।

आठवाँ व्याख्यान

कल हमने भविष्यद्वक्ता की उस शिकायत की व्याख्या की, जब उसने परमेश्वर के सामने उसकी अपनी वाचा रखी। क्योंकि यह अनुचित प्रतीत हो सकता था कि परमेश्वर उस कलीसिया से, जिसे उसने गोद लिया था, इतनी कठोरता का व्यवहार करे। इसलिए भविष्यद्वक्ता ने कहा, देख, हे यहोवा, तू ने यह किस से किया है। अब वह कुछ ऐसी बातों का उल्लेख करता है जो रोंगटे खड़े कर देनेवाली हैं, और इस प्रकार परमेश्वर से क्षमा प्राप्त करने के योग्य हैं, क्या स्त्रियाँ अपना ही फल खाएँ? अर्थात् अपना ही गर्भफल, दूध पिलाए जानेवाले शिशुओं को? यह, जैसा मैं कह चुका हूँ, एक भयानक बात थी: क्योंकि हम देखते हैं कि माताएँ अपने शिशुओं की रक्षा की चिन्ता में प्रायः अपना प्राण तक भूल जाती हैं। सो यह कि कोई बच्चा अपनी ही माता के द्वारा खाया जाए, अत्यन्त घिनौनी बात थी; और फिर भी हम जानते हैं कि ऐसा किया गया। इससे प्रकट होता है कि इस्राएली, जब परमेश्वर ने उन्हें अन्धा कर दिया, तो इस बर्बरता में गिर पड़े थे: क्योंकि ऐसा शोमरोन के घेरे में हुआ, जैसा पवित्र इतिहास बताता है; और भविष्यद्वक्ता अब उसी बात का उल्लेख करता है कि वह उसके समय में घटी थी, और वह चौथे अध्याय में उसी को दोहराता है। और योसेफुस भी कहता है कि जब तीतुस ने नगर को घेर लिया था, तब दशा ऐसी थी कि माताओं ने अपने ही बच्चों को खाने के लिए आपस में ठहराव किया, और उन्होंने चिट्ठी डाली कि कौन पहले अपने बच्चे को मारे, और वे एक-दूसरे से टाँग या बाँह चुरा लेती थीं। यद्यपि यह इतनी अमानवीय बात थी, तौभी भविष्यद्वक्ता ऐसे बड़े घोर कर्म को प्रस्तुत करके परमेश्वर को दया की ओर फेरना चाहता है। सो वह कहता है कि यह किसी भी रीति से उचित नहीं था कि माताएँ अपने ही बच्चों को, दूध पिलाए जानेवाले, या पाले-पोसे जानेवाले बच्चों को खाएँ।

इसके बाद वह जोड़ता है, क्या याजक और भविष्यद्वक्ता प्रभु के पवित्रस्थान में घात किए जाएँ? यह एक और अनुचितता थी, जिसके द्वारा उसने परमेश्वर को दया दिखाने की ओर ले जाना चाहा।

हम निश्चय जानते हैं कि याजक और भविष्यद्वक्ता पवित्र माने जाते थे; और भजन संहिता में, जहाँ अब्राहम, इसहाक और याकूब का उल्लेख है, परमेश्वर यह दिखाने के लिए कि उनका कितना आदर किया जाना चाहिए, कहता है, “मेरे अभिषिक्तों को मत छुओ, और न मेरे भविष्यद्वक्ताओं की हानि करो।” (भजन संहिता 105:15.)

सो जब याजक और भविष्यद्वक्ता विशेष रूप से परमेश्वर की सुरक्षा में थे, तो जो यहाँ कहा गया है वह एक असहनीय अत्याचार था। परन्तु जब इसके साथ मन्दिर का अपवित्र किया जाना भी जुड़ गया, तो यह और भी बड़ा अनर्थ था। सो यिर्मयाह केवल यही शिकायत नहीं करता कि याजक और भविष्यद्वक्ता घात किए गए, परन्तु यह कि वे पवित्रस्थान में घात किए गए। अब आगे लिखा है, —

532 Educationum. हमारा अनुवाद लगभग वल्गेट जैसा है। सेप्तुआजिन्त इसका भावानुवाद करता है, “जो स्तन चूसते हैं;” और टार्गुम में है, “जो रेशमी वस्त्र पहने हुए हैं।” ब्लेनी ठीक कहता है कि {{טפח हथेली का खुला भाग है; और वह शब्दों का शाब्दिक अनुवाद यह देता है, “हथेलियों के बच्चे;” अर्थात् इतनी आयु के बच्चे कि उन्हें गोद में उठाकर घुमाया जा सके। इस पंक्ति का उसका अनुवाद है, “हाथों पर दुलराए जानेवाले नन्हे बच्चे।” हॉर्सली इस अर्थ को स्वीकार करता है। इससे पहले का शब्द, ,{}פדים अधिकांश लोगों के लिए कठिनाई रहा है, क्योंकि अन्तिम मेम पुल्लिंग है। “फल,” सन्तान के अर्थ में, पुरुषों पर भी उतना ही लागू होता है जितना स्त्रियों पर। हम ,{}נשים के अन्तिम मेम को सर्वनाम के रूप में ले सकते हैं, “उनकी पत्नियाँ;” वही लोग अभिप्रेत हैं जो विलापगीत 2:18 में, “उनका शब्द,” अर्थात् यरूशलेम के नागरिक। इस प्रकार वाक्य-रचना पूरी रीति से व्याकरण-सम्मत होगी। क्या उनकी अपनी पत्नियाँ अपनी सन्तान को खाएँ, हाथों पर दुलराए जानेवाले शिशुओं को! क्या प्रभु के पवित्रस्थान में घात किए जाएँ, याजक और भविष्यद्वक्ता! यह दीन भाव से की गई विनती-भरी शिकायत की भाषा है। — सं.

विलापगीत 2:21

21. सड़कों में लड़के और बूढ़े दोनों भूमि पर पड़े हैं; मेरी कुमारियाँ और जवान तलवार से गिर गए हैं; तू ने कोप करने के दिन उन्हें घात किया; तू ने वध किया और तरस नहीं खाया।

21. Jacuerunt in terra per compita puer et senex; virgines meae et adolescentes mei ceciderunt gladio; occidisti in die irae tuae; mactasti et non pepercisti.

यहाँ वह कलीसिया की ओर से एक और विपत्ति का वर्णन करता है, कि लड़के और बूढ़े सड़कों में गिरे पड़े थे; और वह बालकों को बूढ़ों के साथ जोड़ता है, यह दिखाने के लिए कि आयु के विषय में कोई भेद न था। फिर वह कहता है कि सार्वजनिक स्थानों में लोथें बिना भेद के पड़ी थीं। वह जोड़ता है कि कुमारियाँ और जवान तलवार से गिर गए थे; जिसके द्वारा वह पहले वाक्यांश की पुष्टि करता है, क्योंकि यहाँ कोई नई बात नहीं कही गई, केवल वह रीति दिखाई गई है जिससे वे घात किए गए थे; क्योंकि जवान पुरुष और जवान स्त्रियाँ बिना किसी भेद के तलवार से घात किए गए थे; साथ ही शत्रुओं ने बूढ़ों को भी नहीं छोड़ा था, जबकि उन्होंने प्रजा के ठीक फूल को मार डाला।

परन्तु भविष्यद्वक्ता साथ ही यह दिखाता है कि यह सब परमेश्वर ही के कारण माना जाना चाहिए, इसलिए नहीं कि यहूदी उससे वाद-विवाद करें, परन्तु इसलिए कि वे अपनी विपत्तियों पर व्यर्थ विलाप करना छोड़ दें, और इसके विपरीत परमेश्वर की ओर फिरें।

इसलिए वह यह नहीं कहता कि लड़के और बूढ़े शत्रुओं के द्वारा घात किए गए थे, परन्तु स्वयं परमेश्वर के द्वारा। परन्तु यहूदियों को इसका निश्चय कराना कठिन था, क्योंकि वे अपने शत्रुओं के विरुद्ध इतने क्रोध से भरे हुए थे कि वे अपने विचार परमेश्वर के न्यायों पर मनन करने की ओर नहीं फेर सकते थे। सो यही कारण है कि भविष्यद्वक्ता परमेश्वर को उनकी सारी विपत्तियों का कर्ता ठहराता है; वह कहता है, तू ने अपने कोप के दिन घात किया है; तू ने वध किया और तरस नहीं खाया। और यद्यपि यहाँ प्रजा एक प्रकार से परमेश्वर से वाद-विवाद करती प्रतीत होती है, तौभी हमें भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय स्मरण रखना चाहिए, अर्थात् प्रजा को यह सिखाना कि वे स्वयं परमेश्वर की ओर देखें, ताकि वे जान लें कि उनका काम उसी से पड़ा है। क्योंकि एक सत्य से दूसरे सत्य की ओर बढ़ना चाहिए, ताकि मनुष्य, अपने पापों को जानते हुए, पहले परमेश्वर की महिमा करें, और फिर दीनता से उस कोप को टालने की विनती करें जिसके वे योग्य ठहरे हैं। अन्त में आगे लिखा है, —

विलापगीत 2:22

22. तू ने मेरे भय के कारणों को चारों ओर से ऐसा बुलाया जैसे पर्व के दिन भीड़ को बुलाते हैं; और यहोवा के कोप के दिन न तो कोई भाग निकला और न कोई बच रहा; जिनको मैं ने गोद में लेकर पाला-पोसा था, मेरे शत्रु ने उनका अन्त कर डाला है।

22. Vocasti tanquam ad diem festum terrores meos undique, et nou fuit in die indignationis Jehovae superstes ac residuus; quos enutrivi et educavi, hostis meus consumpsit cos (sed abundat relativum.)

यहाँ वह एक अत्यन्त उपयुक्त रूपक का प्रयोग करता है, यह दिखाने के लिए कि प्रजा सबसे सँकरे संकट में पहुँचा दी गई थी; क्योंकि वह कहता है कि भयों ने उन्हें चारों ओर से ऐसे घेर लिया था, जैसे किसी पवित्र सभा को बुलाया जाता है। जब कोई पर्व निकट होता था, तब वे नरसिंगे फूँकते थे, कि सब लोग मन्दिर में आएँ। सो जैसे पर्व के दिनों में बहुत-से दल यरूशलेम में आया करते थे — क्योंकि जब नरसिंगे फूँके जाते थे, तब सब बुलाए जाते थे — वैसे ही भविष्यद्वक्ता कहता है कि परमेश्वर ने अभागी प्रजा को संकट में डालने के लिए हर ओर से भय भेजे थे: सो तू ने मेरे भयों को चारों ओर से बुलाया है, — कैसे? मानो पर्व के दिन को, सभा के दिन को; क्योंकि {,}מועד muod का अर्थ सभा भी है और स्थान तथा ठहराया हुआ समय भी।

परन्तु हमें सदा वह स्मरण रखना चाहिए जिसकी ओर मैं पहले ही संकेत कर चुका हूँ, कि यद्यपि शत्रुओं ने यहूदियों को भयभीत किया, तौभी यह परमेश्वर ही के कारण माना जाना था, ताकि हर कोई अपने लिए यह स्वीकार करे कि कसदी संयोग से नहीं आए थे, परन्तु परमेश्वर की गुप्त प्रेरणा से आए थे। इसके बाद वह जोड़ता है, यहोवा के कोप के दिन (वह पुरुष बदलता है) कोई जीवित, या बचा हुआ न था; वरन्, वह कहता है, जिन्हें मैंने पाला-पोसा और बड़ा किया था उन्हें शत्रु ने नष्ट कर डाला है। यहाँ वह शत्रुओं पर वह बात डालता है जिसे उसने पहले परमेश्वर के द्वारा किया हुआ कहा था, परन्तु इस अर्थ में कि वह परमेश्वर को मुख्य कर्ता, और कसदियों को उसके पलटे के सेवक समझता था। अब आगे लिखा है, —

533 बुलाने या एकत्र करने की क्रिया भविष्यत् काल में है, और विलापगीत के वर्णमाला-क्रम को बनाए रखने के लिए उसे ऐसा ही होना चाहिए, परन्तु सब अनुवादों में उसका अनुवाद भूतकाल के रूप में किया गया है, किन्तु इसका कारण प्रकट नहीं होता। इब्रानी में भविष्यत् काल का अनुवाद प्रायः सम्भावनार्थक, शक्यतासूचक या इच्छार्थक रूप में किया जाना चाहिए: सो यहाँ, — क्या तू, मानो पर्व के दिन, मेरे भयों को चारों ओर से एकत्र करे! — और यहोवा के कोप के दिन न कोई भगोड़ा था और न कोई बचा हुआ; जिन्हें मैंने दुलराया और पाला-पोसा, मेरे शत्रु ने उन्हें नष्ट कर डाला है। पहली दो पंक्तियाँ एक प्रकार की विनती-भरी शिकायत हैं: “मेरे भय” का अर्थ है मुझे भयभीत करनेवाले, वल्गेट के अनुसार, मूर्त के स्थान पर अमूर्त। — सं.

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