यिर्मयाह और विलापगीत पर टीका · खण्ड 2 · यिर्मयाह 23

यिर्मयाह 23

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यिर्मयाह 23

यिर्मयाह 23:1-3

1. उन चरवाहों पर हाय जो मेरी चराई की भेड़-बकरियों को नष्ट करते और तितर-बितर करते हैं! यहोवा की यही वाणी है।

1. Vae Pastoribus qui perdunt et dissipant gregem pascuorum meorum! dicit Jehova.

2. इस कारण इस्राएल का परमेश्वर यहोवा अपनी प्रजा के चरानेवाले चरवाहों के विरुद्ध यों कहता है: तुम ने मेरी भेड़-बकरियों को तितर-बितर किया और उन्हें बरबस निकाल दिया है, और उनकी सुधि नहीं ली; देखो, मैं तुम्हारे बुरे कामों का दण्ड तुम्हें दूँगा, यहोवा की यही वाणी है।

2. Propterea sic dicit Jehova, Deus Israel, super Pastores pascentes populum meum, Vos dissipastis gregem meum et dispulistis, et non visitastis eos (vel, oves meas;) Ecce ego visitans (hoc est, visitabo) super vos malitiam actionum vestrarum, dicit Jehova:

3. तब मैं अपनी बची हुई भेड़-बकरियों को उन सब देशों में से, जिन में मैं ने उन्हें बरबस भेज दिया है, इकट्ठा करूँगा, और उन्हें फिर उनकी भेड़शालाओं में लौटा ले आऊँगा; और वे फूलें-फलेंगी और बढ़ेंगी।

3. Ego autem colligam residuum ovium mearum ex omnibus terris, ad quas expulero eas, et reverti faciam eas ad caulas suas, et fructificabunt et multiplicabuntur.

यहाँ भविष्यद्वक्ता कलीसिया की पुनर्स्थापना की प्रतिज्ञा करता है; परन्तु वह कपटियों को, विशेषकर राजा, उसके मन्त्रियों और याजकों को, स्मरण दिलाता है कि इस कारण उनके पास अपने आप को फुसलाने का कोई आधार न था। इसलिए यह भविष्यद्वाणी प्रतिज्ञाओं और धमकियों का मिश्रण है; क्योंकि परमेश्वर प्रतिज्ञा करता है कि वह अभागे यहूदियों को ताड़ना देने के बाद उन पर कृपालु होगा, ताकि अब्राहम का वंश पूरी रीति से काट न डाला जाए; तौभी वह कपटियों से उनका व्यर्थ भरोसा छीन लेता है, ताकि वे उद्धार की उस आशा को झूठमूठ अपने ऊपर लागू न करें जिससे उन्होंने अपनी अभक्ति के द्वारा स्वयं को वंचित कर लिया था। और यही बात ध्यान देने योग्य है; क्योंकि ज्यों ही परमेश्वर की दया प्रस्तुत की जाती है, कपटी लोग परमेश्वर की हर प्रतिज्ञा को अपने ऊपर लागू कर लेते हैं, और अधिकाधिक ढीठ होते जाते हैं, मानो उन्होंने उसे अपने प्रति बाँध रखा हो; क्योंकि दण्ड से बचे रहना उन्हें पाप करने की और अधिक छूट लेने को उकसाता है। इसी कारण वे डींग मारते हैं कि वे सुरक्षित हैं, क्योंकि वे अपने आप को परमेश्वर की प्रजा समझते हैं। इसलिए भविष्यद्वक्ता यहाँ यह सिखाता है कि परमेश्वर जो कुछ प्रतिज्ञा करता है वह उसके चुने हुए लोगों का है; कि वह बिना भेदभाव सब का नहीं है, न उसे उन कपटियों तक फैलाया जाना चाहिए जो झूठमूठ उसके नाम का दावा करते हैं; वरन वह विशेष रूप से चुने हुए लोगों का ही है, चाहे वे गिनती में थोड़े हों और चाहे वे तुच्छ समझे जाते हों।

वह पहले कहता है, उन चरवाहों पर हाय जो नष्ट करते हैं, इत्यादि। यहाँ परस्पर-विरोधी बातें हैं — चरवाहा और नाश करनेवाला! परन्तु वह उन्हें वह नाम दे देता है जो आदर का था; और तौभी वह उनकी झूठी डींग की हँसी उड़ाता है, क्योंकि वे सोचते थे कि वे इस झूठमूठ धारण की हुई आड़ के नीचे अपने अपराध छिपा सकते हैं। सो यद्यपि वह उन्हें चरवाहे कहता है, तौभी वह उनका मुखौटा उतार देता है, और इस प्रकार दिखाता है कि जब वे चरवाहों का नाम धारण करते थे तब वे व्यर्थ डींग मारते थे। वह कहता है, "तुम चरवाहे हो, और तुम नाश करनेवाले हो! जो मेरी चराइयों की भेड़-बकरियों को उजाड़ते या तितर-बितर करते हो।"

यहाँ परमेश्वर वह कारण दिखाता है कि वह इन चरवाहों से इतना अधिक अप्रसन्न क्यों था; क्योंकि प्रजा पर अत्याचार करके उन्होंने न केवल मनुष्यों की हानि की, वरन परमेश्वर की भी हानि और अनादर किया, जिसने अपनी चुनी हुई प्रजा को अपनी रक्षा में ले लिया था। यह सच है कि वे ऐसे तितर-बितर किए जाने के योग्य थे; क्योंकि हम बहुत स्थानों में पहले ही देख चुके हैं कि जब प्रजा दुष्ट और विश्वासघाती अगुवों के द्वारा भरमाई गई, तब उसे किसी भी प्रकार निर्दोष नहीं ठहराया जा सकता था; क्योंकि इस रीति से उन्हें, छोटे से लेकर बड़े तक, अपने विरुद्ध परमेश्वर का क्रोध भड़काने का पूरा पिछला प्रतिफल दिया गया। परन्तु इस कारण दुष्ट चरवाहों की अभक्ति क्षमा के योग्य न थी; क्योंकि उन्हें यह विचार करना चाहिए था कि यह भार उन पर किस प्रयोजन से रखा गया था, और यह भी कि उन्हें किसने नियुक्त किया था। अतः परमेश्वर सूचित करता है कि जब प्रजा इस प्रकार अपमानपूर्वक तितर-बितर की गई, तब उसकी बड़ी हानि हुई। वह स्वयं प्रधान चरवाहा था; उसने मानो अपने ही स्थान पर राजा और उसके मन्त्रियों और याजकों को भी रखा था। इसलिए वह अब उचित ही उन्हें दोषी ठहराता है, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर की भेड़-बकरियों को नष्ट कर दिया था, जैसा दूसरे स्थान में कहा गया है, "कि उन्होंने उसकी दाख की बारी को बिगाड़ दिया था।"

(यिर्मयाह 12:10; यशायाह 5:3)

संक्षेप में, जब परमेश्वर यहूदियों को अपनी चराई की भेड़-बकरियाँ कहता है, तब वह इस पर ध्यान नहीं देता कि वे किस योग्य थे या वे क्या थे; वरन इसके विपरीत वह उस अनुग्रह को सामने रखता है जो अब्राहम के वंश पर किया गया था। इसलिए यहाँ वह अपने सेंतमेंत लेपालकपन पर दृष्टि रखता है, यद्यपि यहूदियों ने अपने आप को ऐसे उपकार के अयोग्य बना लिया था।

इसके बाद वह आगे कहता है, इस्राएल का परमेश्वर यहोवा उन चरवाहों से जो मेरी प्रजा को चराते हैं यों कहता है। जिस अर्थ में उसने पहले उन्हें अपनी चराई की भेड़-बकरियाँ कहा था, उसी अर्थ में वह अब उन्हें अपनी प्रजा कहता है। उन्होंने अपने आप को परमेश्वर से अलग कर लिया था, और उसने अपने ही आदेश से उन्हें पहले ही त्याग दिया था; और परमेश्वर एक दृष्टि से उन्हें पराया समझ सकता था; तौभी वाचा की दृष्टि से उसने उन्हें अपना माना; और इसी कारण वह उन्हें अपनी प्रजा कहता है। अतः वह अब उस बात की पुष्टि करता है जिस पर हम पहले ध्यान दे चुके हैं, कि ये चरवाहे न केवल चोर और डाकू थे, वरन पवित्र वस्तुओं के लुटेरे भी थे; क्योंकि उन्होंने न केवल भेड़-बकरियों के प्रति क्रूरता की थी, वरन जहाँ तक उनसे हो सका, स्वयं परमेश्वर की भी हानि और अनादर किया था, जिसने उस प्रजा की देखभाल का भार अपने ऊपर लिया था।

73 सेप्टुआजिन्ट और सुरियानी में यह एक विस्मयादिबोधक है, "आह! चरवाहे," इत्यादि; परन्तु वल्गेट और टारगम में यह दण्ड की घोषणा है, "चरवाहों पर हाय," इत्यादि। मूल का अनुवाद दोनों रीतियों से किया जा सकता है; यहाँ दूसरा सबसे अधिक उपयुक्त है। — सं.

74 इब्रानी में यह शब्द एकवचन है, "चराई," या चराना। — सं.

परन्तु यहाँ दोहरी रियायत है: वह उन्हें चरवाहे कहता है, और कहा जाता है कि वे प्रजा को चराते हैं। उसने पहले कहा था कि वे भेड़-बकरियों को नष्ट और तितर-बितर करते थे, और अब वह कहता है कि वे उन्हें चराते थे; परन्तु किस अर्थ में, यह हम भली-भाँति जानते हैं; क्योंकि इस प्रकार के व्यंग्य के द्वारा वह उन्हें डाँटना चाहता था; वे डींग मारते थे कि वे चरवाहे हैं, और सोचते थे कि ऐसे आवरण के द्वारा उनके अपराध परमेश्वर की दृष्टि में भी वैसे ही दब जाएँगे जैसे मनुष्यों की दृष्टि में। इसी प्रकार जब हम आज के दिन पोप और उसके मुकुटधारी अध्यक्षों और गन्दे पादरी-वर्ग की चर्चा करते हैं, तब हम वे ही शब्द प्रयोग करते हैं जो सामान्यतः प्रचलित हैं। परन्तु मसीह-विरोधी पिता के सिवाय और सब कुछ है; और हम जानते हैं कि जो लोग अध्यक्ष की उपाधि धारण करते हैं वे वास्तव में अध्यक्ष होने से कितनी दूर हैं; और जहाँ तक पादरी-वर्ग (क्लर्जी) की बात है, नाम तो पवित्र है, परन्तु वे परमेश्वर का निज भाग होने से बहुत दूर हैं। निश्चय ही हम इन खोखली उपाधियों को कुछ नहीं समझते। परन्तु यह उनके दोष को बहुत बढ़ा देता है कि वे शैतान होकर स्वर्गदूतों के नाम धारण करें, कि वे भेड़िये और डाकू और पवित्र वस्तुओं के लुटेरे होकर झूठमूठ परमेश्वर के नाम का दावा करें, और नकली उपाधियों के द्वारा अपने आप को सराहें, मानो वे चरवाहे, अध्यक्ष, मठाधीश, धर्माध्यक्ष और न जाने क्या-क्या हों।

अतः हमारा भविष्यद्वक्ता जिन्हें दोषी ठहराता है उन्हें ताने के रूप में चरवाहे कहता है, और कहता है कि वे चराते थे, अर्थात् वे इसी उद्देश्य से बुलाए गए थे कि यह काम करें। परन्तु इसके बाद वह आगे कहता है, तुम ने मेरी भेड़-बकरियों को तितर-बितर किया, और निकाल दिया, और उनकी सुधि नहीं ली।

निश्चय ही भेड़ों की कोई चिन्ता न करना चराना नहीं था। सुधि लेने को यहाँ निगरानी के कर्तव्य के हर भाग तक फैलाया जाना चाहिए, मानो उसने कहा हो कि उन्होंने भेड़-बकरियों की उपेक्षा की, उन्हें पकड़वा दिया और उन्हें छोड़ दिया। इससे हम देखते हैं कि उन्होंने अपने चरवाही के पद की पूरी तरह उपेक्षा की थी। परन्तु अन्य दो बातें और भी बुरी हैं, क्योंकि उन्होंने भेड़-बकरियों को तितर-बितर किया और निकाल दिया था। भेड़-बकरियों की उपेक्षा करने में उनका आलस्य सहने योग्य न था; परन्तु जब उन्होंने इतनी क्रूरता की कि भेड़-बकरियों को ऐसे तितर-बितर कर दिया मानो वे उनके प्राणघातक शत्रु हों, तब यह और भी असहनीय था; और तौभी यिर्मयाह इन्हीं बातों के लिए उन्हें दोषी ठहराता है। इससे हम देखते हैं कि जब उसने उन्हें चराने का पद सौंपा, तब उसमें एक छिपा हुआ ताना था।

75 अर्थ यह प्रतीत होता है कि उन्होंने अपने बुरे आचरण के द्वारा भेड़-बकरियों को तितर-बितर और निकाल दिए जाने का कारण बनाया था, क्योंकि उन्होंने उनकी देखभाल नहीं की, जैसा अन्तिम क्रिया का अर्थ है। पहली दो क्रियाएँ वास्तव में हिफ़ील में हैं, और उनका अनुवाद प्रेरणार्थक रूप में इस प्रकार किया जा सकता है, — तुम ने मेरी भेड़ों को तितर-बितर करवाया है, और उन्हें निकलवा दिया है; और तुम ने उनकी चिन्ता नहीं की। अन्तिम क्रिया हिफ़ील में नहीं है, और वह कारण बताती है कि भेड़ें क्यों तितर-बितर हुई थीं। इसका अर्थ है निगरानी करना, देखभाल करना, ध्यान देना। तितर-बितर होना चरवाहों की उस उपेक्षा के कारण था जो उन्होंने भेड़ों की देखभाल में की। तितर-बितर होना या बिखर जाना उनका निर्वासन था; जिसके विषय में परमेश्वर तीसरे पद में कहता है कि वह उनकी दुष्टता के दण्ड के रूप में उसका अपना कार्य था; परन्तु बिखरने का कारण चरवाहों का आचरण था। यहाँ हम उस क्रम का एक उदाहरण देखते हैं जिसमें भविष्यद्वक्ता प्रायः विचारों को प्रस्तुत करते हैं। तितर-बितर होना, यद्यपि पहले उल्लिखित है, अन्तिम कार्य है, जो सबसे अधिक प्रत्यक्ष है; देश से निकाल दिया जाना उससे पहले का कार्य था; और क्रम में जो पहला था, यद्यपि अन्त में कहा गया, वह चरवाहों का उनकी निगरानी करने में उपेक्षा करना था। यह परिणाम से आरम्भ करके कारण की ओर लौटना है। "तुम ने उन्हें सब देशों में तितर-बितर करवाया है, तुम ने उन्हें उनके अपने देश से निकलवा दिया है, और तुम ने उनकी देखभाल करने की उपेक्षा की है।" ये दोषारोपण की तीन बातें हैं, परन्तु उलटे क्रम में कही गई हैं। इस प्रकार की व्यवस्था के उदाहरण निरन्तर मिलते हैं। — सं.

फिर वह उन पर दण्ड की घोषणा करता है, मैं तुम्हारे कामों की दुष्टता का दण्ड तुम्हें दूँगा। यहाँ परमेश्वर घोषणा करता है कि वह उन चरवाहों को दण्ड देगा, जिन पर प्रजा के तितर-बितर होने का दोष उचित ही लगाया गया था। क्योंकि यद्यपि कोई भी दोष से मुक्त न था, जैसा पहले कहा जा चुका है, तौभी मुख्य दोष इन्हीं चरवाहों का था। अतः यही कारण है कि परमेश्वर घोषणा करता है कि वह पलटा लेगा; क्योंकि वह नहीं चाहता था कि उसकी भेड़-बकरियाँ बिना दण्ड के तितर-बितर की जाएँ।

फिर आगे आता है, और मैं अपनी भेड़-बकरियों को इकट्ठा करूँगा। जैसे उन्होंने प्रजा को निकाल दिया था, वैसे ही परमेश्वर प्रतिज्ञा करता है कि उन्हें इकट्ठा करना उसकी चिन्ता होगी। और तौभी वह अपने ऊपर वही बात लेता है जो उसने उन पर लगाई थी — कि उसने अपनी भेड़-बकरियों को निकाल दिया था, परन्तु भिन्न अर्थ में; चरवाहों ने भेड़-बकरियों को न केवल अपने आलस्य से, वरन अपनी क्रूरता से भी तितर-बितर किया था, क्योंकि वे फाड़नेवाले भेड़िये बन गए थे; परन्तु परमेश्वर ने प्रजा को दण्ड दिया था, क्योंकि वे सब ऐसे तितर-बितर किए जाने के पूरे योग्य थे। इससे हम देखते हैं कि अभक्त लोग परमेश्वर के न्याय को पूरा करते हैं; परन्तु इस कारण वे निर्दोष नहीं ठहराए जा सकते, मानो वे परमेश्वर के सेवक हों, क्योंकि उनके मन में इससे कम और कुछ नहीं होता। न ही परमेश्वर उनके पाप में फँसता है, जब वह इस प्रकार अपने प्रयोजन को पूरा करने के लिए उन्हें काम में लाता है। संक्षेप में, प्रजा का तितर-बितर होना परमेश्वर की ओर से एक न्यायपूर्ण दण्ड था, क्योंकि वे सब विश्वास से फिर गए थे, उन्होंने वाचा के उस पवित्र बन्धन को तोड़ दिया था जिसके द्वारा परमेश्वर ने उन्हें अपने साथ बाँधा था। यह चरवाहों का भी दोष था, क्योंकि उन्होंने लोभ और क्रूरता से उन पर अत्याचार किया था। जैसा मैं कह चुका हूँ, चरवाहे केवल याजक ही नहीं, वरन राजा और उसके मन्त्री भी थे।

वह कहता है, मैं इकट्ठा करूँगा, भेड़-बकरियों को नहीं, वरन भेड़ों के बचे हुओं को। परमेश्वर यहाँ सूचित करता है कि वह ऐसा दयालु होगा कि सब को बिना भेदभाव नहीं, वरन एक छोटी संख्या को, जो चुने हुए लोग हैं, अपने अनुग्रह में ग्रहण करेगा। और इसी कारण पौलुस ने प्रजा और अनुग्रह से बचे हुओं, या सेंतमेंत बचे हुओं, के बीच सावधानी से भेद किया; क्योंकि ऐसा प्रतीत होता था कि मसीह ने अपने आगमन के द्वारा उस वाचा को रद्द कर दिया है जिसके द्वारा परमेश्वर ने अब्राहम की सन्तान को लेपालक बनाया था; परन्तु पौलुस यह स्वीकार नहीं करता। अब, यदि कोई आपत्ति करके कहे कि प्रजा का अधिकांश भाग काट डाला गया था, तो वह इसे मान लेता है; परन्तु वह कहता है कि वाचा बचे हुओं में स्थिर बनी रहती है, और वह उदाहरण भी प्रस्तुत करता है, जैसा यह है जिसकी हम अभी चर्चा कर रहे हैं। अतः परमेश्वर सदा अपनी कलीसिया का रक्षक रहा है; और इस प्रकार उसका सेंतमेंत लेपालकपन, जिसके द्वारा उसने अब्राहम के वंश को चुना था, कभी विफल नहीं होता। परन्तु यह लेपालकपन केवल बचे हुओं के सम्बन्ध में ही प्रभावी है।

जहाँ तक बचे हुए शब्द की बात है, इससे न केवल उन लोगों की थोड़ी संख्या सूचित होती है जिन्हें परमेश्वर ने इकट्ठा करने का निश्चय किया था, वरन वह पलटा भी जो समय के अनुसार पहले आ चुका था; क्योंकि जब यहूदी विभिन्न देशों में निकाल दिए गए, तब ऐसा प्रतीत होता था कि परमेश्वर ने उन्हें नष्ट कर डाला है, क्योंकि उनका कोई नाम शेष न रहा, राज्य और याजकपद मिटा दिए गए। इसलिए वह एक प्रकार की मृत्यु थी, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ; परन्तु परमेश्वर यहाँ घोषणा करता है कि कुछ बचे हुए रहेंगे, जैसा यशायाह 10:22 में कहा गया है कि परमेश्वर ने मानो सत्यानाश में से थोड़ों को बचा लिया; क्योंकि वहाँ वह उन बहुत थोड़े लोगों का उल्लेख करता है जो जीवित बचे रहे, जब वे सोचते थे कि सारी प्रजा का अन्त हो चुका है, कि पुनर्स्थापना की कोई आशा नहीं रही।

वह कहता है, मैं अपनी भेड़ों के बचे हुओं को उन सब देशों में से इकट्ठा करूँगा जिन में मैं ने उन्हें निकाल दिया होगा। वह फिर उस बात की पुष्टि करता है जो मैं कह चुका हूँ, कि जब तक वह अपनी कलीसिया को उसकी बहुत सी गन्दी अशुद्धताओं से शुद्ध न कर ले, तब तक दया के लिए कोई स्थान न होगा। अतः प्रजा का विभिन्न देशों में तितर-बितर होना कलीसिया का शुद्धिकरण था, जैसा परमेश्वर कहता है कि अपनी प्रजा को ताड़ना देते समय वह कूड़े और भूसी को गेहूँ से अलग करेगा; क्योंकि जैसे गेहूँ फटकते समय भूसी और कूड़ा इधर-उधर उड़ा दिया जाता है, और केवल गेहूँ ही रह जाता है और बाद में खत्ते में रखा जाता है, वैसे ही जब परमेश्वर ने अपनी प्रजा को विभिन्न देशों में निकाल दिया, तब उसने अपनी कलीसिया को शुद्ध किया। यदि कोई आपत्ति करके कहे, "तो फिर बचे हुओं के साथ भी कूड़े के समान व्यवहार किया गया," तो जहाँ तक व्यक्तियों की बात है यह सच है; परन्तु परमेश्वर यहाँ अपने आप पर दृष्टि रखता है, जब वह उन्हें अपनी भेड़ें कहता है, जो तौभी ऐसे आदर के अयोग्य थे।

फिर वह आगे कहता है कि वह उन्हें उनकी भेड़शालाओं में लौटा लाएगा, ताकि वे फूलें-फलें, अर्थात् सन्तान उत्पन्न करें और बढ़ें, और गिनती में बहुत हो जाएँ। भेड़शालाओं से उसका अभिप्राय निःसन्देह कनान देश है; क्योंकि उस समय संसार में ऐसा कोई धन न था जिसे यहूदी उस मीरास से बढ़कर समझते जिसकी प्रतिज्ञा उनसे की गई थी; सारा संसार उनके लिए निर्वासन था। क्योंकि परमेश्वर ने वह देश चुना था जिसमें वे बसते थे, और उसे अपने लिए पवित्र किया था, और उसने उसे अनन्त मीरास के बयाने या प्रतिज्ञा-चिह्न के रूप में उन्हें दिया था। अतः वह अब उचित ही उस देश को भेड़शालाएँ कहता है, क्योंकि वे वहाँ उसकी देखरेख और रक्षा में रहते थे। मन्दिर मानो चरवाहे की लाठी था; वे जानते थे कि परमेश्वर वहाँ वास करता है, ताकि उसकी सामर्थ्य से सुरक्षित रहकर वे निरापद बने रहें। अतः जब कनान देश में परमेश्वर की रक्षा के अधीन उनके लिए सुरक्षा थी, तो वह उसे उनकी भेड़शाला कहता है। फिर वह कहता है, ताकि वे फूलें-फलें और बढ़ें; क्योंकि अन्य आशीषों में उनकी वृद्धि सबसे छोटी आशीष न थी। इसके बाद वह आगे कहता है, —

यिर्मयाह 23:4

4. और मैं उनके ऊपर ऐसे चरवाहे खड़े करूँगा जो उन्हें चराएँगे; और वे फिर न डरेंगी, न विस्मित होंगी, और न उन में से कोई खो जाएगी, यहोवा की यही वाणी है।

4. Et excitabo super eos pastores, et pascent eos (hoc est, qui pascant,) et non timebunt amplius, et non pavebunt, et non deficient, dicit Jehova.

वह प्रतिज्ञा की पुष्टि करता है, क्योंकि वह उन्हें विश्वासयोग्य और सच्चे चरवाहे देगा, जो अपने पद का कार्य जैसा उचित है वैसा ही पूरा करेंगे; क्योंकि यह पर्याप्त न होता कि भेड़ें अपनी भेड़शालाओं में लौटा दी जाएँ, जब तक कि उन्हें चराया न जाए। हम जानते ही हैं कि भेड़ एक भोला-भाला प्राणी है, और इसलिए उसे ऐसे चरवाहे की आवश्यकता है जो उस पर शासन करे और उसकी अगुवाई करे।

अतः परमेश्वर इन शब्दों के द्वारा सूचित करता है कि अपनी भेड़-बकरियों को भेड़शाला में इकट्ठा करने के बाद वे उसकी निरन्तर चिन्ता का विषय होंगी; क्योंकि वह ऐसे चरवाहे नियुक्त करेगा जो भेड़ियों और पवित्र वस्तुओं के लुटेरों से बिल्कुल भिन्न रीति से अपना पद निभाएँगे। फिर वह उनकी सुरक्षा के विषय में एक प्रतिज्ञा जोड़ता है, जिस पर हम कल विचार करेंगे।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, ऐसा अनुग्रह कर कि जैसे तूने प्राचीनकाल में अपनी पुरानी प्रजा की अभक्ति से ऐसा भारी पलटा लिया कि तूने उन राजाओं को भी नहीं छोड़ा जो मसीह के प्रतिनिधि थे, न उनके मन्त्रियों को, — वैसे ही हम पर अनुग्रह कर कि हम आज के दिन तेरे वचन की आज्ञाकारिता में बने रहें, और अपनी कृतघ्नता से अपने विरुद्ध तेरे पलटे को ऐसा न भड़काएँ कि तुझे हमें उस दुःखद और भयानक उजाड़ से दण्ड देने को उकसाएँ जिसकी घोषणा तूने प्राचीनकाल में अपनी प्रजा पर व्यर्थ नहीं की थी; वरन तेरी कलीसिया अधिकाधिक फलवन्त होती जाए, जिससे हम जान लें कि तू सचमुच हम पर अनुग्रहकारी है; और इस प्रकार हम शान्ति से तेरा धन्यवाद करें, और अपने आप को तेरे द्वारा, हाँ, तेरे एकलौते पुत्र के हाथ के द्वारा, शासित होने दें, जब तक कि हम इस संसार में अपने तितर-बितर होने से उस अनन्त विश्राम में इकट्ठे न किए जाएँ जिसे उसने अपने ही लहू के द्वारा हमारे लिए प्राप्त किया है। — आमीन।

76 सेप्टुआजिन्ट और अरबी में है, "उनकी अपनी चराई में"; वल्गेट में, "उनके अपने देश में"; सुरियानी में, "उनकी अपनी भेड़शाला में"; टारगम में, "उनके अपने स्थानों में।" इब्रानी में है, "उनकी अपनी भेड़शालाओं में"; यह शब्द बहुवचन है, और सामान्यतः "निवास-स्थानों" का अर्थ देता है, चाहे मनुष्यों के लिए, चाहे गाय-बैलों के लिए, चाहे पशुओं के लिए। क्योंकि भेड़ों का उल्लेख है, इसलिए निःसन्देह "भेड़शालाएँ" ही उचित शब्द है। — सं.

पचासीवाँ व्याख्यान

हमने अपने कल के व्याख्यान में कहा था कि जब प्रभु ने चरवाहे देने की प्रतिज्ञा की, तब उसने इस कथन-शैली के द्वारा अपने अनुग्रह के बने रहने की ओर संकेत किया; मानो उसने कहा हो कि वह न केवल अपनी प्रजा का छुड़ानेवाला होगा, वरन उन लोगों की सुरक्षा की भी चिन्ता करेगा जिन्हें उसने निर्वासन से छुड़ाया था। निश्चय ही ये दोनों बातें आवश्यक हैं; क्योंकि यदि परमेश्वर का हाथ एक बार उनके पक्ष में बढ़ाया जाता, परन्तु वह अन्त तक उन पर अपनी कृपाएँ बनाए न रखता, तो इससे उन्हें कुछ लाभ न होता। अतः पूरे का सार यह है कि यहूदी अपने देश में लौटा दिए जाने के बाद परमेश्वर की रक्षा में रहेंगे, जिससे उनकी सुरक्षा निश्चित होगी, और वह स्थायी होगी, क्षणिक नहीं।

यह जोड़कर कि वे न डरेंगे, न भयभीत होंगे, न घटेंगे, या कम किए जाएँगे, वह सूचित करता है कि यहूदी उन चरवाहों के अधीन जिन्हें वह उन पर नियुक्त करेगा, शान्त दशा में रहेंगे। और हम जानते हैं कि सच्चे चरवाहे का कर्तव्य दो भागों से बना है; क्योंकि उसके लिए भेड़ों पर शासन करना और उनकी अगुवाई करना पर्याप्त नहीं, जब तक कि वह सब प्रकार की हिंसा से, डाकुओं और भेड़ियों के आक्रमणों से, उनकी रक्षा भी न करे। अब यह शान्ति उस बेचैनी के विपरीत रखी गई है जिससे यहूदी बहुत समय से सताए जा रहे थे; क्योंकि हम जानते हैं कि अपने शत्रुओं के निरन्तर आक्रमणों के कारण वे बड़ी चिन्ताओं से उछाले जाते रहे थे। अतः जैसे वे युद्ध की अफ़वाहें सुनकर निरन्तर काँपते रहते थे, वैसे ही परमेश्वर यहाँ उनसे एक उत्तम दशा की प्रतिज्ञा करता है, जैसा हम आगे और अधिक स्पष्टता से देखेंगे। अब आगे आता है, —

यिर्मयाह 23:5-6

5. यहोवा की यह वाणी है, देखो, ऐसे दिन आते हैं जब मैं दाऊद के लिये एक धर्मी अंकुर उगाऊँगा, और एक राजा राज्य करेगा और भाग्यवान होगा, और पृथ्वी पर न्याय और धर्म के काम करेगा।

5. Ecce dies veniunt, dicit Jehova, et suscitabo Davidi germen justum; et regnabit rex, et prudenter (vel, prospere) aget: faciet judicium et justitiam in terra.

6. उसके दिनों में यहूदा उद्धार पाएगा, और इस्राएल निडर बसा रहेगा: और उसका यह नाम होगा जिससे वह पुकारा जाएगा, यहोवा हमारी धार्मिकता।

6. Diebus ejus servabitur Jehudah, et Israel habitabit in fiducia (hoc est, tranquille: et hoc nomen, quo vocabunt eum, Jehova justitia nostra.

भविष्यद्वक्ता उस बात की पुष्टि करता है जो उसने पहले कलीसिया के नवीकरण के विषय में कही थी; क्योंकि केवल यह कहना अपने आप में पर्याप्त दृढ़ न होता कि "मैंने ऐसे चरवाहों की प्रतिज्ञा की है जो अपना कर्तव्य विश्वासयोग्यता से पूरा करेंगे," जब तक कि वह एकमात्र सच्चा चरवाहा उनके सामने न रखा जाता, जिस पर परमेश्वर की वाचा की नींव रखी गई थी, और जिससे उन प्रतिज्ञाओं की पूर्ति की आशा की जानी थी जिनकी वे बाट जोहते थे। और सब भविष्यद्वक्ताओं की यह रीति थी कि जब कभी वे प्रजा को उद्धार की आशा देते, तब मसीह के आगमन को सामने लाते; क्योंकि परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ सदा उसी में हाँ और आमीन रही हैं। (2 कुरिन्थियों 1:20.) निश्चय ही यह बात अब सुसमाचार के अधीन पहले की अपेक्षा अधिक स्पष्ट दिखाई देती है; परन्तु पूर्वजों का विश्वास पूर्ण नहीं हो सकता था जब तक कि वे अपने विचारों को मसीह की ओर न लगाते। अतः क्योंकि न तो परमेश्वर का प्रेम पूर्वजों के लिए निश्चित किया जा सकता था, और न उसकी कृपा और पितृ-अनुग्रह की गवाही मसीह के बिना पुष्ट की जा सकती थी, यही कारण है कि भविष्यद्वक्ता, जब कभी अभागे लोगों में अच्छी आशा जगाना चाहते थे, तब मसीह को उनकी आँखों के सामने रखा करते थे, नहीं तो वे शोक से दब जाते और निराशा में धकेल दिए जाते।

77 सेप्टुआजिन्ट और अरबी में यह क्रिया छोड़ दी गई है, और वल्गेट में इसका अनुवाद है, "उनकी गिनती में से किसी को ढूँढ़ा न जाएगा"; सुरियानी में, "न भटकेंगे"; टारगम में, "न डगमगाएँगे।" हमारे अंग्रेज़ी अनुवाद ने मोंटानुस के अनुवाद का अनुसरण किया है, "न उन में से कोई घटेगा।" वेनेमा और गेटेकर इसका अनुवाद करते हैं, "न उन में से कोई खोया हुआ पाया जाएगा"; और ब्लेनी, "न उनकी सुधि ली जाएगी," अर्थात् न्याय के साथ। परन्तु यह क्रिया घट जाने या खो जाने के अर्थ में प्रयुक्त होती है, देखिए गिनती 31:49; 1 शमूएल 25:7; 15:21; और यही अर्थ इस स्थल के लिए सबसे उपयुक्त है, — और मैं उनके ऊपर चरवाहे ठहराऊँगा, और वे उन्हें चराएँगे; और वे फिर न डरेंगे, न घबराएँगे, न उन में से कोई खोएगा, यहोवा की यही वाणी है। — सं.

इसलिए भविष्यद्वक्ताओं में जो बात इतनी बार आती है वह विशेष ध्यान के योग्य है, ताकि हम जान लें कि परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ हमारे लिए निष्फल हो जाएँगी, या रुकी रहेंगी, या लुप्त भी हो जाएँगी, जब तक कि हम अपने सब विचार मसीह की ओर न उठाएँ, और उसी में वह न खोजें जो अन्यथा हमारे लिए निश्चित और दृढ़ न होता।

इसी सिद्धान्त के अनुसार भविष्यद्वक्ता अब कहता है कि ऐसे दिन आएँगे जिनमें परमेश्वर दाऊद के लिए एक धर्मी अंकुर उगाएगा। उसने चरवाहों के विषय में सामान्य रूप से कहा था; परन्तु यहूदी फिर भी सन्देह में रह सकते थे, और यह विश्वास करने में हिचक सकते थे कि ऐसी किसी बात की आशा की जा सकती है; इसलिए परमेश्वर यहाँ उनका ध्यान मसीह की ओर लगाता है; मानो उसने कहा हो कि उस मध्यस्थ के सिवाय, जिसकी प्रतिज्ञा उनसे की गई थी, उद्धार की कोई आशा नहीं रखी जा सकती, और इसलिए जब तक वे अपने मन उसकी ओर न लगाएँ तब तक वे पर्याप्त बुद्धिमान नहीं हैं। फिर, क्योंकि उद्धार की पूर्ति की आशा मध्यस्थ के द्वारा ही की जानी थी, परमेश्वर दिखाता है कि यह प्रतिज्ञा, कि वह उन्हें चरवाहे देगा, सन्देह के योग्य नहीं है।

इससे प्रकट होता है कि मैंने आरम्भ में ठीक कहा था कि पिछली शिक्षा की पुष्टि इस स्थल से होती है, जिसमें परमेश्वर मध्यस्थ के आगमन की प्रतिज्ञा करता है। और निर्देशक अव्यय, देखो, जैसा हम अन्यत्र देख चुके हैं, निश्चयता दिखाने के लिए है; और यहूदियों को इस प्रकार दृढ़ किया जाना आवश्यक था, क्योंकि वह समय अभी नहीं आया था, और हम जानते हैं कि यदि उन्हें कोई सहारा न होता तो इतनी अधिक और इतनी लम्बी परीक्षाओं से उनका विश्वास बुरी तरह डगमगा जाता। अतः परमेश्वर मानो उँगली से उस घटना की ओर संकेत करता प्रतीत होता है, यद्यपि वह अभी बहुत दूर थी। वह थोड़े समय की सूचना नहीं देता, परन्तु वह बात को निश्चित करने के लिए ऐसा कहता है, ताकि वे लम्बी प्रतीक्षा के कारण मूर्छित न हो जाएँ। अतः वह कहता है, वे दिन आएँगे जिनमें वह दाऊद के लिए एक धर्मी अंकुर उगाएगा।

यद्यपि अव्यय {,}לlamed, प्रायः अनावश्यक होता है, तौभी इस स्थान में मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर उस वाचा की ओर संकेत करता है जो उसने दाऊद के साथ बाँधी थी।

और भविष्यद्वक्ता ने यह जान-बूझकर किया, क्योंकि यहूदी इस योग्य न थे कि परमेश्वर उनकी ओर कुछ भी ध्यान दे; परन्तु वह यहाँ प्रतिज्ञा करता है कि वह उस वाचा के प्रति विश्वासयोग्य रहेगा जो उसने एक बार दाऊद के साथ बाँधी थी, क्योंकि दाऊद स्वयं भी विश्वासयोग्य था और उसने अपने से की गई प्रतिज्ञा को सच्चे विश्वास से ग्रहण किया था। अतः परमेश्वर, मानो उसे उस हठीली और न सुधरनेवाली प्रजा से नहीं, वरन अपने दास दाऊद से काम हो, कहता है, "मैं दाऊद के लिए एक धर्मी अंकुर उगाऊँगा"; मानो उसने कहा हो, "यद्यपि तुम सौ बार भी इस योग्य न थे कि तुम्हें कोई छुड़ानेवाला मिले, तौभी दाऊद का स्मरण मेरे पास सदा पूर्ण बना रहेगा, क्योंकि वह मेरी वाचा के पालन में सिद्ध और विश्वासयोग्य था।" अब इसमें सन्देह नहीं किया जा सकता कि भविष्यद्वक्ता यहाँ मसीह के विषय में कहता है।

यहूदी इस भविष्यद्वाणी को धुँधला करने के लिए चाहते हैं कि इसे दाऊद के सब वंशजों पर लागू किया जाए; और इस प्रकार वे एक पार्थिव राज्य की कल्पना करते हैं, जैसा वह सुलैमान और अन्यों के अधीन था। परन्तु निश्चय ही ऐसी बात भविष्यद्वक्ता के शब्दों से नहीं निकाली जा सकती; क्योंकि वह यहाँ बहुत से राजाओं के विषय में नहीं, वरन केवल एक के विषय में कहता है। मैं मानता हूँ कि "अंकुर" शब्द समूहवाचक अर्थ में लिया जा सकता है; परन्तु बाद में क्या कहा गया है? एक राजा राज्य करेगा। वे इसे भी तोड़-मरोड़ सकते हैं, क्योंकि "राजा" शब्द प्रायः किसी राज्य के उत्तराधिकारियों के लिए लिया जाता है। यह सच तो है; परन्तु हमें पूरे प्रसंग पर विचार करना चाहिए। कहा गया है, उसके दिनों में। इससे स्पष्ट प्रकट होता है कि किसी विशेष राजा से अभिप्राय है, और इन शब्दों को बहुतों पर लागू नहीं किया जाना चाहिए। और अन्तिम वाक्यांश इसकी और भी पुष्टि करता है, उसका यह नाम होगा, जिससे वे उसे पुकारेंगे, यहोवा हमारी धार्मिकता। यहाँ भी यहूदी शब्दों को तोड़-मरोड़ते हैं, क्योंकि वे परमेश्वर को क्रिया का कर्ता बना देते हैं, मानो शब्द ये हों, "यहोवा उसे हमारी धार्मिकता कहेगा"; परन्तु यह सारे तर्क के विरुद्ध है, क्योंकि सब को दिखाई देना चाहिए कि यह एक खींचा-ताना और बलपूर्वक गढ़ा हुआ अनुवाद है। इस प्रकार ये अभागे लोग अपनी ही हठधर्मिता प्रकट करते हैं; क्योंकि वे बिना किसी लज्जा के मसीह के पक्ष की सब गवाहियों को तोड़-मरोड़ देते हैं; और वे समझते हैं कि जो कुछ उन्हें कड़ाई से दबाता है उससे किसी प्रकार बच निकलना ही पर्याप्त है।

अतः अब हमें समझना चाहिए कि इस स्थल की व्याख्या केवल मसीह के सिवाय किसी और के विषय में नहीं की जा सकती। पवित्र आत्मा का अभिप्राय हम पहले ही समझा चुके हैं; परमेश्वर ने आरम्भ से ही, जब कभी वह अपनी प्रतिज्ञाओं में विश्वास को दृढ़ करना चाहता था, यह बयाना सामने रखा था; क्योंकि मसीह के बिना परमेश्वर मनुष्यों का पिता और उद्धारकर्ता नहीं हो सकता; न ही उसका यहूदियों से मेल हो सकता था, क्योंकि वे उससे फिर गए थे। निश्चय ही, प्रायश्चित के बिना वे अनुग्रह में कैसे ग्रहण किए जा सकते थे? और जब तक उनका उससे मेल न होता, वे कैसे आशा रख सकते थे कि परमेश्वर उनका पिता होगा? इसलिए मसीह के बिना वे उद्धार की प्रतिज्ञाओं पर भरोसा नहीं कर सकते थे। अतः मैंने ठीक ही कहा है कि यह स्थल मसीह के व्यक्तित्व तक ही सीमित रखा जाना चाहिए।

और हम निश्चय जानते हैं कि केवल वही धर्मी अंकुर था; क्योंकि यद्यपि हिजकिय्याह और योशिय्याह वैध उत्तराधिकारी थे, तौभी जब हम दूसरों के विषय में सोचते हैं, तो हमें कहना पड़ता है कि वे राक्षस थे। निःसन्देह, तीन या चार को छोड़कर, वे सब के सब कुलहीन और वाचा तोड़नेवाले थे; हाँ, मैं कहता हूँ, कुलहीन, क्योंकि उनमें दाऊद के साथ कुछ भी समान न था, जिसे उन्हें भक्ति के आदर्श के रूप में अपनाना चाहिए था।

अतः क्योंकि वे अपने पिता दाऊद से बिल्कुल भिन्न थे, वे धर्मी अंकुर नहीं कहलाए जा सकते थे। वे वास्तव में विश्वासघाती और धर्मत्यागी थे, क्योंकि वे परमेश्वर और उसकी व्यवस्था से फिर गए थे। इससे हम देखते हैं कि यहाँ मसीह और उन सब कुलहीन सन्तानों के बीच एक छिपा हुआ विरोध है, जो दाऊद के वंश से उत्पन्न तो हुए थे, तौभी अपनी अभक्ति के कारण ऐसे आदर के बिल्कुल अयोग्य थे। इसलिए क्योंकि इन राजाओं ने प्रजा के विरुद्ध परमेश्वर का क्रोध भड़काया था, और उनके निर्वासन का कारण बने थे, भविष्यद्वक्ता अब कहता है कि अन्त में एक धर्मी अंकुर होगा; अर्थात् यद्यपि उन्होंने अपने दुष्ट कामों के द्वारा परमेश्वर की वाचा को उलट देने के लिए जो कुछ कर सकते थे सब किया, तौभी अन्त में सच्चा और एकमात्र पुत्र आएगा, जिसे अन्यत्र सारे संसार में पहिलौठा कहा गया है, (भजन संहिता 89:27,) और वह एक धर्मी अंकुर होगा।

78 सेप्टुआजिन्ट और अरबी में है, "एक धर्मी सूर्योदय — {ἀνατολὴν} {δίκαιαν}"; वल्गेट में, "एक धर्मी अंकुर"; सुरियानी में, "धार्मिकता की एक किरण।" केवल वल्गेट ही ठीक है, क्योंकि मूल शब्दों के विषय में कोई सन्देह नहीं हो सकता। — सं.

और इस बात पर सावधानी से ध्यान दिया जाना चाहिए; क्योंकि न तो हिजकिय्याह, न योशिय्याह, न उनके जैसा कोई और, जब अपने आप में देखा जाए, इस पवित्र विशिष्टता के योग्य था, ... "मैं उसे पृथ्वी पर पहिलौठा ठहराऊँगा"; और फिर, "तू मेरा पुत्र है।" (भजन संहिता 2:7.)

यह बात किसी नश्वर मनुष्य के विषय में, अपने आप में देखे जाने पर, नहीं कही जा सकती थी। और फिर कहा गया है, "मैं उसका पिता ठहरूँगा, और वह मेरा पुत्र ठहरेगा"; और प्रेरित हमें बताता है कि यह स्वर्गदूतों पर भी लागू नहीं किया जा सकता। (इब्रानियों 1:5.) अतः क्योंकि यह प्रतिष्ठा स्वर्गदूतों की महिमा से भी ऊँची है, यह निश्चित है कि दाऊद के उत्तराधिकारियों में से कोई भी ऐसे आदर के योग्य न था। इसलिए मसीह उचित ही धर्मी अंकुर कहलाता है। साथ ही, जैसा मैं तुम्हें पहले ही स्मरण दिला चुका हूँ, भविष्यद्वक्ता मसीह की सिद्ध खराई को उन लोगों की अभक्ति के विरोध में रखता प्रतीत होता है जिन्होंने झूठे बहाने से अधिकार चलाया था, मानो वे उसी पवित्र वंश के हों जिसके विषय में कहा गया था, "मैं उसका पिता ठहरूँगा, और वह मेरा पुत्र ठहरेगा।"

आगे आता है, — और एक राजा राज्य करेगा। यह भी बिना कारण नहीं जोड़ा गया, जबकि यकोन्याह को निर्वासन में भेजे अभी थोड़ा ही समय हुआ था, और सारा राजवंश भी हर प्रकार की निन्दा का पात्र बना दिया गया था। मुकुट तो, जैसा पहले ही प्रकट हो चुका है, भूमि पर फेंक दिया गया था और पाँवों तले रौंदा गया था। अतः जब अब्राहम का वंश मानो लुप्त हो गया था, तब भविष्य के किसी राज्य की कोई आशा न थी। यही कारण है कि परमेश्वर उस बात की प्रतिज्ञा करता है जो हम अब सिंहासन की पुनर्स्थापना के विषय में सुनते हैं; और सब भविष्यद्वक्ताओं ने जो कुछ कहा है उससे हम सहज ही यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि प्रजा का उद्धार उनके राजा के व्यक्तित्व पर निर्भर था; और जब कभी परमेश्वर ने प्रजा को आशा रखने को कहा, तब उसने एक राजा को उनकी आँखों के सामने रखा। परमेश्वर के शासन के अधीन एक राजा को उनका सिर होना था। अब हम भविष्यद्वक्ता का यह कहने में अभिप्राय देखते हैं कि एक राजा राज्य करेगा।

कुछ लोग सोचते हैं कि राजा को अत्याचारी के विरोध में समझा जाना चाहिए, क्योंकि बहुत से राजा अपने कर्तव्य से हट गए थे, और उस आकर्षक अधिकार की आड़ में लूटपाट करते थे। मुझे कोई सन्देह नहीं कि राजा शब्द इसलिए स्पष्ट रूप से कहा गया, कि कहीं प्रजा इस भविष्यद्वाणी की पूर्ति पर सन्देह न करे; क्योंकि यदि केवल इतना कहा गया होता, "मैं दाऊद के लिए एक धर्मी अंकुर उगाऊँगा, और वह राज्य करेगा," तो वे कुछ आशा तो रख सकते थे, परन्तु वह थोड़ी होती, पूर्ण और भरपूर नहीं। हम जानते ही हैं कि जरुब्बाबेल और अन्य लोग कुछ बातों में श्रेष्ठ थे, और दाऊद के कारण उनका बड़ा आदर होता था; परन्तु उस समय कोई राज्य न था। इसलिए परमेश्वर ने यहाँ स्पष्ट रूप से यह गवाही देना चाहा कि राज्य का उच्च विशेषाधिकार होगा, ताकि यहूदियों को किसी बात की घटी न रहे, क्योंकि मसीह की सामर्थ्य दाऊद की सामर्थ्य से कम न होगी। अतः एक राजा राज्य करेगा; अर्थात् वह महिमा के साथ राज्य करेगा, जिससे प्राचीन प्रतिष्ठा के केवल कुछ अवशेष ही न रहें, वरन एक राजा फले-फूलेगा, बलवन्त होगा और पूर्णता को पहुँचेगा, जैसा वह दाऊद और सुलैमान के अधीन था, और उससे भी कहीं अधिक उत्तम।

आगे आता है, — और वह बुद्धिमानी से काम करेगा, और देश में न्याय और धर्म करेगा; या, "वह भाग्यवान होगा," क्योंकि {,}שכלshecal, के दोनों अर्थ हैं; तौभी भविष्यद्वक्ता यहाँ सफलता की अपेक्षा उचित विवेक के विषय में बोलता प्रतीत होता है, क्योंकि दोनों वाक्यांश एक साथ पढ़े जाने चाहिए, "वह बुद्धिमानी से काम करेगा," और "वह न्याय और धर्म करेगा।"

79 हम इन शब्दों को अपनी भाषा में शब्दों को इस प्रकार बदले बिना व्यक्त नहीं कर सकते, "और एक शासक शासन करेगा," या, "एक राज्य करनेवाला राज्य करेगा।" बोशार्ट कहता है कि एक ही शब्द का यह दोहरा प्रयोग, संज्ञा और क्रिया के रूप में, इब्रानी में बल-वृद्धि का भाव देता है, जैसा कैल्विन यहाँ कहता है। वह राजा सचमुच का राजा होनेवाला था, पूर्ण सामर्थ्य और प्रतिष्ठा के साथ, और एक विशाल साम्राज्य के साथ। वेल्श भाषा इन शब्दों को अक्षरशः व्यक्त करती है, — A breniniaetha brenin. और यूनानी में भी इसका अनुवाद इसी प्रकार है, — {Καὶ} {βασιλεύσει} {βασιλεὺς} — सं.

अतः ऐसा प्रतीत होता है कि संक्षेप में उसका अभिप्राय यह है, — कि मसीह बुद्धि के आत्मा से, और साथ ही सीधाई और निष्पक्षता के आत्मा से भी, सम्पन्न होगा, जिससे उसमें सब योग्यताएँ होंगी, और वह एक भले और सिद्ध राजा के सब कर्तव्य पूरे करेगा।

और सबसे पहले, बुद्धि या विवेक आवश्यक है; क्योंकि राजा में केवल सच्चाई पर्याप्त न होगी। निजी व्यक्तियों में तो वह निश्चय ही कुछ कम मूल्य की नहीं; परन्तु राजा में बुद्धि के बिना सच्चाई से बहुत थोड़ा लाभ होगा; इसलिए भविष्यद्वक्ता यहाँ पहले मसीह की उत्तम विवेक-शक्ति की सराहना करता है, और फिर निष्पक्षता और न्याय के लिए उसके उत्साह का उल्लेख करता है। यह सच है कि ऐसे शब्दों से मसीह की श्रेष्ठताएँ पर्याप्त रूप से प्रकट नहीं होतीं; परन्तु यह उपमा मनुष्यों से ली गई है; क्योंकि राजा का पहला गुण बुद्धि है, और दूसरे स्थान पर खराई। और हम जानते हैं कि मसीह की तुलना प्रायः पार्थिव राजाओं से की जाती है, या वह हमारे सामने एक पार्थिव राजा के स्वरूप में प्रस्तुत किया जाता है, जिसमें हम उसे देख सकें; क्योंकि परमेश्वर अपने आप को हमारी अज्ञानता के अनुकूल बना लेता है। अतः क्योंकि हम मसीह की अवर्णनीय धार्मिकता या उसकी बुद्धि को समझ नहीं सकते, इसलिए परमेश्वर, ताकि वह हमें धीरे-धीरे मसीह के ज्ञान तक ले जाए, इन आकृतियों या प्रतिरूपों के द्वारा उसकी छाया हमें दिखाता है। अतः यद्यपि यहाँ जो कहा गया है वह मसीह की सिद्धता तक नहीं पहुँचता, तौभी इस तुलना को अनुचित नहीं समझा जाना चाहिए; क्योंकि परमेश्वर हमारी समझ की सीमा के अनुसार हम से बात करता है, और थोड़े से शब्दों में एक साथ पूरी रीति से यह व्यक्त नहीं कर सकता था कि मसीह क्या है। परन्तु हमें स्मरण रखना चाहिए कि पार्थिव राजाओं से हमें मसीह तक ऊपर चढ़ना चाहिए; क्योंकि यद्यपि उसकी तुलना उनसे की जाती है, तौभी उनमें कोई समानता नहीं; प्रतिरूप में उतना देख लेने के बाद जितना हमारे मन समझ सकते हैं, हमें और आगे और बहुत ऊँचे चढ़ना चाहिए।

इसलिए यहाँ मसीह की धार्मिकता और राजाओं की धार्मिकता के बीच का अन्तर ध्यान देने योग्य है। जो भली रीति से शासन करते हैं, वे धार्मिकता और न्याय का प्रबन्ध केवल इसी प्रकार कर सकते हैं कि वे हर एक को उसका भाग देने में सावधान रहें, और वह भी दुष्टों की ढिठाई को रोककर और भलों तथा निर्दोषों की रक्षा करके; पृथ्वी के राजाओं से केवल इतनी ही आशा की जा सकती है। परन्तु मसीह इनसे बहुत भिन्न है; क्योंकि वह न केवल ऐसा बुद्धिमान है कि जो उचित और सर्वोत्तम है उसे जानता है, वरन् वह अपने लोगों को भी बुद्धि और ज्ञान से सम्पन्न करता है; वह न्याय और धार्मिकता केवल इसलिए नहीं करता कि वह निर्दोषों की रक्षा करता, उत्पीड़ितों की सहायता करता, दुखियों को सहारा देता और दुष्टों को रोकता है; वरन् वह धार्मिकता इसलिए करता है कि वह अपने आत्मा के द्वारा हमें नया जन्म देता है, और न्याय भी इसलिए करता है कि वह मानो शैतान पर लगाम लगाता है। अब हम समझते हैं कि मैं ने जो कहा उसका अभिप्राय क्या था, कि हमें पृथ्वी के राजाओं पर मसीह की श्रेष्ठता को, और साथ ही उनकी समानता को भी, ध्यान में रखना चाहिए; क्योंकि इनमें कुछ समानता भी है और कुछ अन्तर भी: मसीह और अन्य राजाओं के बीच अन्तर बहुत बड़ा है, फिर भी कुछ बातों में समानता है; और पृथ्वी के राजा हमारे सामने उसके प्रतिरूपों और छायाओं के रूप में रखे गए हैं।

फिर यह आता है कि इस राजा के दिनों में यहूदा का उद्धार होगा। दिनों से हमें केवल मसीह के उस जीवन को नहीं समझना है जो उसने इस संसार में बिताया, वरन् उस निरन्तरता को जिसके विषय में यशायाह बोलता है, जब वह आश्चर्य से पूछता है, "उसके समय के लोगों का वर्णन कौन करेगा?" (यशायाह 53:8;) क्योंकि वह एक ही बार मरा, कि परमेश्वर के लिए जीवित रहे, जैसा पौलुस कहता है। (रोमियों 6:10।) अतः जब मसीह संसार में प्रकट हुआ और मनुष्यों के बीच रहा, तब वह जीवन का केवल एक छोटा सा आरम्भ था; परन्तु उसका जीवन सदा तक बना रहेगा। तो यह ऐसा ही है मानो भविष्यद्वक्ता ने कहा हो कि जब मसीह आएगा और पिता के पास से उतरेगा, तब कलीसिया का उद्धार होगा। 80 क्रिया {{שכל का पहला अर्थ है बुद्धिमान या विवेकी होना, और हिफिल में, जैसा यहाँ है, समझना, बुद्धिमानी या विवेक से काम करना; और दूसरा, बुद्धि के स्वाभाविक फल के रूप में, इसका अर्थ कभी-कभी सफल होना भी है। परन्तु यहाँ सब अनुवाद इसे पहला अर्थ देते हैं: "और समझेगा," सेप्टुआजिंट है; "और बुद्धिमान होगा," वुल्गेट; "और विवेक से काम करेगा," सीरियाई। हमारा अनुवाद टार्गुम के अनुसार है; ब्लेनी कैल्विन के समान ही भाव देता है, "और बुद्धिमानी से काम करेगा;" और निस्सन्देह यही सही है। — सं.

यदि अब पूछा जाए, "उसका उद्धार कब तक होगा?" तो उत्तर यह है, "जब तक स्वयं राजा बना रहेगा; और उसके राज्य का अन्त नहीं।" अतः इससे यह निकलता है कि कलीसिया का उद्धार सदा का होगा। सम्पूर्ण का आशय यही है।

अब, यद्यपि भविष्यद्वक्ता लोगों के छुटकारे की बात करता है, तौभी इसमें कोई सन्देह नहीं कि वह विशेष रूप से उस बात को प्रस्तुत करता है जो वास्तव में मसीह के राज्य से सम्बन्ध रखती है। वह हमारे ऊपर राजा ठहराया गया है कि वह हमारा उद्धारकर्ता हो; और उसका उद्धार, यद्यपि वह हमारे शरीरों तक भी पहुँचता है, तौभी उसे मुख्यतः हमारे प्राणों से सम्बन्धित समझना चाहिए; क्योंकि मसीह का राज्य आत्मिक है, और उससे जुड़ी हर बात भी आत्मिक है।

इसलिए जब भविष्यद्वक्ता कहता है कि यहूदा का उद्धार होगा, तो यह ऐसा ही है मानो उसने प्रतिज्ञा की हो कि मसीह के अधीन कलीसिया का आनन्द वास्तविक और ठोस होगा।

वह आगे कहता है, इस्राएल निडर बसा रहेगा; क्योंकि सुखी जीवन में पहली बात यह है कि हमारे मन शान्त और स्थिर हों; क्योंकि प्राचीन लोगों ने अकारण ही शान्ति की प्रशंसा नहीं की। जब वे सब वस्तुएँ इकट्ठी कर दी जाएँ जिनका मनुष्य लालच करते हैं, और जिन्हें वे सुख के लिए आवश्यक समझते हैं, तब भी यदि उनके मन ठीक दशा में न हों तो वे दुखी ही रहेंगे। इसलिए जब उद्धार की चर्चा की जाती है, तब शान्ति का जोड़ा जाना अकारण नहीं है। और अनुभव स्वयं हमें सिखाता है कि हमारा कोई उद्धार नहीं, जब तक हम मध्यस्थ मसीह पर भरोसा रखकर परमेश्वर के साथ मेल न रखें, जैसा पौलुस भी इसे विश्वास का फल बताता है, और दिखाता है कि अन्यथा हम सदा दुखी ही रहेंगे: वह कहता है, हमारा परमेश्वर से मेल है। (रोमियों 5:1।) इसी से वह यह भी निष्कर्ष निकालता है कि हमारे दुःख भी हमारे उद्धार में सहायक होते हैं; क्योंकि क्लेश धीरज को परखते हैं, धीरज आशा का अभ्यास कराता है, और आशा हमें कभी लज्जित नहीं होने देती; और इसका प्रमाण भी जोड़ा गया है, क्योंकि इस प्रकार परमेश्वर सचमुच दिखाता है कि वह हमारे साथ उपस्थित है।

इससे हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता कितनी उपयुक्त रीति से मन की शान्ति को सुख के साथ जोड़ता है।

इसके अतिरिक्त यह निश्चित है कि हम अभी तक वैसे उद्धार या शान्ति का आनन्द नहीं उठाते जैसी यहाँ प्रतिज्ञा की गई है; परन्तु आइए, हम विश्वास के द्वारा सीखें कि उद्धार क्या है, और यह भी कि उन उथल-पुथलों के बीच भी विश्राम क्या है जिनके सामने हम निरन्तर खड़े रहते हैं; क्योंकि जब हम अपना लंगर स्वर्ग में डालते हैं, तब हम परमेश्वर पर टिके रहते हैं। तो जब भविष्यद्वक्ता यहाँ कहता है कि यहूदा का उद्धार होगा और इस्राएल शान्त दशा में रहेगा, तब हमें जानना चाहिए कि वह आरम्भ से अन्त तक मसीह के सम्पूर्ण राज्य को सम्मिलित करता है, और इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि वह उस पूर्ण आनन्द की बात करता है, जिसका पहला फल अभी केवल दिखाई देता है।

फिर वह आगे कहता है, और उसका यह नाम रखा जाएगा: यहोवा हमारी धार्मिकता। इन शब्दों के द्वारा भविष्यद्वक्ता और भी स्पष्ट रूप से दिखाता है कि वह सामान्य रूप से दाऊद के वंशजों की बात नहीं करता, चाहे वे कितने ही श्रेष्ठ रहे हों, वरन् उस मध्यस्थ की, जिसकी प्रतिज्ञा की गई थी और जिस पर लोगों का उद्धार निर्भर था; क्योंकि वह कहता है कि उसका यह नाम होगा, यहोवा हमारी धार्मिकता।

वे यहूदी, जो दूसरों की अपेक्षा अधिक विनम्र दिखाई देते हैं, और हठीली जिद के कारण इस वचन को बिगाड़ने का साहस नहीं करते, वे भी इस उपाधि को मसीह पर लागू करने से कतरा जाते हैं, यद्यपि यह उसके लिए उपयुक्त है; क्योंकि वे कहते हैं कि यह नाम उसे इसलिए दिया गया है कि वह परमेश्वर के न्याय का सेवक है, मानो यह कहा गया हो कि जब कभी यह राजा प्रकट होगा, तब सब लोग परमेश्वर के न्याय को उसमें चमकता हुआ स्वीकार करेंगे। और वे ऐसे ही अन्य वचन प्रस्तुत करते हैं, जैसे जब मूसा वेदी को "यहोवा निस्सी" अर्थात् यहोवा मेरा झण्डा, या मेरा रक्षक, कहता है। (निर्गमन 17:15।) परन्तु वेदी और मसीह में कोई भी समानता नहीं है। इसी उद्देश्य से वे एक और वचन का हवाला देते हैं, जहाँ कहा गया है, "और यरूशलेम का यह नाम रखा जाएगा, यहोवा हमारी शान्ति।" (यहेजकेल 48:35)

अब मूसा का अभिप्राय इसके सिवा और कुछ न था कि वह वेदी परमेश्वर की रक्षा का स्मारक थी; और यहेजकेल केवल यह सिखाता है कि कलीसिया मानो एक दर्पण होगी जिसमें परमेश्वर की दया दिखाई देगी, क्योंकि वह तब मानो प्रत्यक्ष रूप से चमकेगी।

परन्तु यह इसी कारण से मसीह पर लागू नहीं किया जा सकता; वह यहाँ एक छुड़ानेवाले के रूप में प्रस्तुत किया गया है, और उसे एक नाम दिया गया है, — कौन सा नाम? परमेश्वर का नाम। परन्तु यहूदी आपत्ति करते हैं और कहते हैं कि वह परमेश्वर का सेवक था, और इसलिए यह किसी अर्थ में उस पर लागू किया जा सकता था, यद्यपि वह मनुष्य से बढ़कर कुछ न था।

परन्तु जो लोग बिना झगड़े और पूर्वाग्रह के बातों का न्याय करते हैं, वे सहज ही देख सकते हैं कि यह नाम मसीह पर उपयुक्त रीति से लागू होता है, क्योंकि वह परमेश्वर है; और दाऊद का पुत्र होना उस पर इसलिए लागू होता है कि वह मनुष्य है। दाऊद का पुत्र और यहोवा एक ही छुड़ानेवाला है।

वह दाऊद का पुत्र क्यों कहलाता है? इसीलिए कि उसका उस घराने में जन्म लेना आवश्यक था। तो फिर वह यहोवा क्यों कहलाता है? इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि उसमें कुछ ऐसा है जो मानवीय से अधिक श्रेष्ठ है; और वह यहोवा इसलिए कहलाता है कि वह परमेश्वर का एकलौता पुत्र है, और पिता के साथ एक ही सार, महिमा, अनन्तता और ईश्वरत्व का है।

इसलिए उन सब के लिए जो निष्पक्षता और विचारपूर्वक न्याय करते हैं, यह स्पष्ट है कि मसीह यहाँ अपने दोहरे स्वरूप में प्रस्तुत किया गया है, कि भविष्यद्वक्ता हमारे सामने उसके ईश्वरत्व की महिमा और उसकी मनुष्यता की वास्तविकता दोनों को रखता है। और हम जानते हैं कि मसीह का परमेश्वर और मनुष्य होकर प्रकट होना कितना आवश्यक था; क्योंकि उद्धार की आशा परमेश्वर को छोड़ किसी और रीति से नहीं की जा सकती; और मसीह को हम पर उद्धार प्रदान करना है, न कि केवल उसका सेवक होना। और फिर, क्योंकि वह परमेश्वर है, वह हमें धर्मी ठहराता है, हमें नया जन्म देता है, हमें अनन्त जीवन की आशा में ज्योति देता है; पाप और मृत्यु पर जय पाना निस्सन्देह ऐसा काम है जो केवल ईश्वरीय सामर्थ से ही हो सकता है। इसलिए यदि मसीह परमेश्वर न होता, तो वह वह कार्य पूरा न कर सकता जिसकी हमें उससे आशा रखनी थी। यह भी आवश्यक था कि वह मनुष्य बने, कि वह हमें अपने साथ जोड़ ले; क्योंकि जब तक हम मसीह के मित्र न बनें, हमारी परमेश्वर तक पहुँच नहीं; और भाईचारे की एकता के सिवा हम ऐसे कैसे बनाए जा सकते हैं? अतः भविष्यद्वक्ता ने बिना अत्यन्त प्रबल कारण के ऐसा नहीं किया कि वह यहाँ मसीह को हमारे सामने सच्चे मनुष्य और दाऊद के पुत्र के रूप में, और साथ ही परमेश्वर अथवा यहोवा के रूप में भी रखता है, क्योंकि वह परमेश्वर का एकलौता पुत्र है, और बुद्धि और महिमा में पिता के साथ सदा एक समान है, जैसा यूहन्ना यिर्मयाह 17:5, 11 में गवाही देता है।

अब हम इस वचन के सरल और वास्तविक अर्थ को समझते हैं, अर्थात् यह कि परमेश्वर अपनी कलीसिया को फिर से स्थापित करेगा, क्योंकि जो प्रतिज्ञा उसने एक छुड़ानेवाले के विषय में की थी, वह दृढ़ और अटल बनी रही। फिर वह यह जोड़ता है कि यह छुड़ानेवाला कैसा होगा और उससे क्या आशा रखनी थी; वह घोषित करता है कि वह सच्चा परमेश्वर होगा और फिर भी दाऊद का पुत्र; और वह हमें यह भी आज्ञा देता है कि हम उससे धार्मिकता की, और पूर्ण तथा सिद्ध आनन्द के लिए आवश्यक हर वस्तु की आशा रखें।

81 इस खण्ड की प्रस्तावना देखिए।

परन्तु परमेश्वर हमारी धार्मिकता कहकर भविष्यद्वक्ता और भी पूर्ण रूप से दिखाता है कि धार्मिकता मसीह में इस प्रकार नहीं है मानो वह केवल उसी की हो, वरन् वह हमारी भी उसके साथ साझी है, क्योंकि उसके पास हमसे अलग कुछ भी नहीं। निश्चय ही परमेश्वर को सदा धर्मी ही माना जाना चाहिए, चाहे सारे संसार में अधर्म फैल जाए; और मनुष्य, चाहे वे सब के सब दुष्ट हों, परमेश्वर की धार्मिकता पर आक्षेप करने या उसे बिगाड़ने के लिए कुछ नहीं कर सकते। तौभी परमेश्वर हमारी धार्मिकता इस अर्थ में नहीं है कि वह अपने आप में धर्मी है, या उसकी अपनी विशेष धार्मिकता है; और क्योंकि वह हमारा न्यायी है, उसकी अपनी धार्मिकता हमारे विरुद्ध है। परन्तु मसीह की धार्मिकता दूसरे प्रकार की है: वह हमारी है, क्योंकि मसीह केवल अपने लिए धर्मी नहीं, वरन् ऐसी धार्मिकता रखता है जिसे वह हमें प्रदान करता है। इससे हम देखते हैं कि यहाँ मसीह का सच्चा स्वरूप प्रस्तुत किया गया है, यह नहीं कि वह ईश्वरीय न्याय को प्रकट करने आएगा, वरन् ऐसी धार्मिकता लाने को जो मनुष्यों के उद्धार के लिए प्रभावी होगी। क्योंकि यदि हम परमेश्वर को उसके अपने आप में देखें, जैसा मैं कह चुका हूँ, तो वह निश्चय ही धर्मी है, परन्तु हमारी धार्मिकता नहीं। अतः यदि हम चाहते हैं कि परमेश्वर हमारी धार्मिकता हो, तो हमें मसीह को खोजना होगा; क्योंकि यह उसके सिवा और कहीं नहीं मिल सकती। परमेश्वर की धार्मिकता मसीह में हमारे सामने प्रस्तुत की गई है; और जो उससे मुँह मोड़ लेते हैं, चाहे वे कितने ही घुमावदार मार्ग अपनाएँ, परमेश्वर की धार्मिकता को कभी नहीं पा सकते। इसलिए पौलुस कहता है कि वह हमारे लिए धार्मिकता दिया गया या ठहराया गया है, — किस उद्देश्य से? कि हम उसमें होकर परमेश्वर की धार्मिकता बन जाएँ। (1 कुरिन्थियों 1:30।) तो जब मसीह हमारी धार्मिकता ठहराया गया है, और हम उसमें परमेश्वर की धार्मिकता गिने जाते हैं, तो इससे हम सीखते हैं कि यह कितने उचित और उपयुक्त रूप से कहा गया है कि वह यहोवा होगा, न केवल इसलिए कि उसके ईश्वरत्व की सामर्थ हमारी रक्षा करे, वरन् इसलिए भी कि हम उसमें धर्मी बन जाएँ; क्योंकि वह केवल अपने लिए धर्मी नहीं, वरन् वह हमारी धार्मिकता है।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, ऐसा अनुग्रह कर कि हम, जो सब के सब पाप और अधर्म के दास थे, परन्तु तेरे एकलौते पुत्र के आत्मा के द्वारा नया जन्म पा चुके हैं, सच्चाई से और निष्कपट अभिलाषा के साथ केवल तेरी ही सेवा और आराधना करने का यत्न करें, और अपने आप को तुझे ऐसा समर्पित करें कि यह प्रकट हो कि हम मसीह के नाम का झूठा अंगीकार नहीं करते, वरन् सचमुच उसके अंग हैं, और उस नए जीवन के भागी हैं जो वह हमारे लिए लाया; और हम उसमें ऐसी उन्नति करें कि पृथ्वी पर अपनी दौड़ पूरी करके अन्त में जीवन और आनन्द की उस परिपूर्णता तक पहुँचें, जो उसके द्वारा हमारे लिए प्राप्त की गई है, और जो स्वर्ग में हमारे लिए रखी हुई है। — आमीन।

छियासीवाँ व्याख्यान

यिर्मयाह 23:7-8

7. सो देख, यहोवा की यह वाणी है, ऐसे दिन आएँगे जिन में लोग फिर यह न कहेंगे कि यहोवा जो हम इस्राएलियों को मिस्र देश से छुड़ा ले आया उसके जीवन की सौगन्ध; 82 "यह राजा," वेनेमा कहता है, "सच्चा परमेश्वर है, हमारी धार्मिकता का योग्यता-मूलक कारण और उसकी जमानत, और सारी पवित्रता, भक्ति और सद्गुण का कार्यकारी कारण और आदर्श भी।" वह मानता है कि यहाँ केवल मसीहा की ही चर्चा है, और ग्रोशियस को इस बात का दोष देता है कि उसने इस वचन को पहले जरुब्बाबेल पर लागू किया, और दृढ़ता से कहता है कि जो यहाँ कहा गया है वह मसीहा को छोड़ और किसी पर लागू नहीं किया जा सकता। इसके प्रमाण में वह उसके नाम का उल्लेख करता है — "एक धर्मी अंकुर;" उसकी राजकीय प्रतिष्ठा का — "एक राजा राज्य करेगा;" उसकी उपाधि का — "यहोवा हमारी धार्मिकता," और उसकी समृद्धि तथा उसके राज्य की सुरक्षा का। ये सब बातें किसी और के स्वरूप से मेल नहीं खातीं, केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह के स्वरूप से। — सं.

7. Propterea ecce dies veniunt, (venient,) dicit Jehova, quibus non dicetur (ad verbum, et non dicetur, --- non dicent) amplius, Vivit Jehova, qui eduxit filios Israel e terra Egypti;

8. वरन् यह कहेंगे कि यहोवा जो इस्राएल के घराने को उत्तर देश से और उन सब देशों से भी जहाँ उसने हमें बरबस निकाल दिया था छुड़ा ले आया, और वे अपने ही देश में बसे रहेंगे, उसके जीवन की सौगन्ध।

8. Quin potius, Vivit Jehova, qui eduxit et adduxit (ascendere fecit et introduxit, ad verbum) semen domus Israel e terra Aquilonis, et ex omnibus terris, ad quas expuleram eos illue; et habitabunt super terram suam.

भविष्यद्वक्ता, उस छुड़ानेवाले के विषय में कहने के बाद जो भेजा जानेवाला था, अब परमेश्वर के उस बड़े अनुग्रह का ऊँचे शब्दों में वर्णन करता है, और कहता है कि वह ऐसा अद्भुत और महिमामय होगा कि इसकी महानता और श्रेष्ठता के सामने पहला छुटकारा कुछ भी न रहेगा। जब इस्राएली मिस्र से निकाल लाए गए, तब, जैसा हम जानते हैं, परमेश्वर ने बहुत से आश्चर्यकर्मों के द्वारा अपनी सामर्थ प्रगट की, ताकि अपनी प्रजा पर उसका यह अनुग्रह और भी प्रसिद्ध दिखाई दे; और भविष्यद्वक्ताओं ने ठीक ही विश्वासियों को उस समय किए गए कामों का स्मरण दिलाकर अच्छी आशा रखने के लिए उपदेश और प्रोत्साहन दिया। परन्तु हमारा भविष्यद्वक्ता इस तुलना के द्वारा दूसरे छुटकारे की महिमा बढ़ाता है, कि आगे से परमेश्वर की वह कृपा, जो उसने अपनी प्रजा पर उस समय की जब उसने उन्हें मिस्र के दासत्व से छुड़ाया, स्मरण न की जाएगी, वरन् कुछ और अधिक अद्भुत काम किया जाएगा, ऐसा कि सब उसी की चर्चा करेंगे, और सब उस अपार उपकार का प्रचार करेंगे जो परमेश्वर उन्हें बाबुल की बँधुआई से छुड़ाकर उन पर करेगा।

फिर वह कहता है कि ऐसे दिन आएँगे जिनमें यह न कहा जाएगा, यहोवा जीवित है, जो अपनी प्रजा को मिस्र से निकाल लाया, वरन् जो अपनी प्रजा को उत्तर देश से निकाल लाया। तौभी उसका यह अभिप्राय नहीं कि इस्राएलियों पर परमेश्वर के उस अनुग्रह का स्मरण, जब वह उन्हें मिस्र से निकाल लाया, मिटा दिया जाए; वरन् वह यहाँ छोटे से बड़े की ओर तर्क करता है, मानो उसने कहा हो कि जब उसने अपनी प्रजा को मिस्र देश से छुड़ाया, तब वह परमेश्वर के अनुग्रह का ऐसा प्रमाण था जिसकी पर्याप्त प्रशंसा नहीं की जा सकती, कि यदि उसे अकेले लिया जाए तो वह सदा स्मरण किए जाने के योग्य था; परन्तु दूसरे छुटकारे से तुलना करने पर वह लगभग कुछ भी न दिखाई देगा। तात्पर्य यह है कि दूसरा छुटकारा पहले से इतना अधिक अद्भुत होगा कि वह उसके स्मरण को धुँधला कर देगा, यद्यपि उसे मिटा नहीं देगा।

और यह वचन विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है, क्योंकि इससे हम सीखते हैं कि हमें उस छुटकारे का कितना अधिक मूल्य समझना चाहिए जो हमें परमेश्वर के एकलौते पुत्र के द्वारा प्राप्त हुआ है। और इसी से यह भी निकलता है कि हम व्यवस्था के अधीन रहे पूर्वजों की अपेक्षा परमेश्वर के अधिक ऋणी हैं, क्योंकि उसने हमारे साथ कहीं अधिक उदारता का व्यवहार किया है, और हमारे पक्ष में अपनी सामर्थ को और भी पूर्ण और प्रभावशाली रूप से प्रगट किया है। हम आगे यह भी सीखते हैं कि भविष्यद्वक्ता इस भविष्यद्वाणी में केवल थोड़े से वर्षों को नहीं, वरन् मसीह के सम्पूर्ण राज्य और उसकी सम्पूर्ण प्रगति को सम्मिलित करता है। वह निश्चय ही लोगों के अपने देश को लौटने की बात करता है, और यह मान लेना चाहिए, यद्यपि मसीही लोग इस विषय में अत्यधिक कठोर रहे हैं; क्योंकि लोगों के लौटने और मसीह के आगमन के बीच के सारे समय को छोड़कर उन्होंने भविष्यद्वाणियों को बड़ी जबरदस्ती आत्मिक छुटकारे की ओर मोड़ दिया है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता बँधुआई से लोगों की स्वतन्त्र वापसी से आरम्भ करता है; परन्तु जैसा मैं कह चुका हूँ, मसीह के छुटकारे को इससे अलग नहीं करना चाहिए, नहीं तो प्रतिज्ञा की पूर्ति हमें दिखाई न देगी, क्योंकि केवल थोड़े से भाग ही अपने देश को लौटे। हम यह भी जानते हैं कि वे बहुत सी और निरन्तर विपत्तियों से सताए गए, यहाँ तक कि उनकी दशा सदा दयनीय रही, क्योंकि अशान्ति की दशा से बुरा कुछ नहीं। हम यह भी जानते हैं कि वे लूटे गए, और बार-बार लूटे गए, और दासत्व की दशा में भी पहुँचा दिए गए। हम जानते हैं कि कभी मिस्रियों ने और कभी अराम के राजाओं ने उनके साथ कैसी क्रूरता का व्यवहार किया। तो यिर्मयाह ने उससे अधिक की प्रतिज्ञा की जितना परमेश्वर ने वास्तव में पूरा किया, जब तक हम इस भविष्यद्वाणी में मसीह के राज्य को सम्मिलित न करें। परन्तु क्योंकि परमेश्वर ने कुस्रू के हाथ से अपनी कलीसिया को इस प्रकार फिर से स्थापित किया कि वह आनेवाले और सिद्ध छुटकारे की एक प्रकार की भूमिका हो, इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि भविष्यद्वक्ता, जब कभी लोगों की वापसी और उनकी बँधुआई के अन्त की बात करते थे, तब मसीह और उसके आत्मिक राज्य की ओर दृष्टि लगाते थे।

83 ये दोनों पद सेप्टुआजिंट और अरबी अनुवाद में यहाँ छोड़ दिए गए हैं, परन्तु अध्याय के अन्त में दिए गए हैं। — सं.

84 यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि जो कुछ परमेश्वर ने अपने विधान के क्रम में पूरा किया, वह उससे अधिक अद्भुत था, और अधिक आश्चर्यजनक बताया गया है, जो उसने बहुत से और अद्भुत आश्चर्यकर्मों के द्वारा किया: मनुष्यों के मनों पर उसके विधान का गुप्त कार्य अधिक आश्चर्यजनक है और उसकी उस सामर्थ से भी बड़े काम करता है जो प्रकृति के क्रम को उलटने के लिए प्रगट की जाती है। यद्यपि वह अब आश्चर्यकर्म नहीं करता, तौभी वह ऐसी रीति से कार्य करता है जो उससे भी अधिक अद्भुत है मानो वह आश्चर्यकर्म करता। यदि हम प्रकाशित आँखों से घटनाओं के क्रम पर ध्यान दें, तो हम इसे देखे बिना नहीं रह सकते। — सं.

85 पद {,{לכן से आरम्भ होता है, जिसका अनुवाद वुल्गेट, सीरियाई और हमारे अपने अनुवाद ने "इसलिए," या "इस कारण," किया है; परन्तु ब्लेनी ने "इसके बाद," और गैटेकर ने "इसके अतिरिक्त।" इसका अनुवाद "निश्चय," या निस्सन्देह, भी किया जा सकता है, जैसा वेनेमा ने किया है, — निश्चय, देखो, यहोवा की यह वाणी है, ऐसे दिन आ रहे हैं, जब वे फिर न कहेंगे, यहोवा जीवित है, इत्यादि। ,{`` }ו का अनुवाद हमारे अनुवाद के समान "कि" करने की अपेक्षा "जब" करना अच्छा है। सेप्टुआजिंट और वुल्गेट इसे "और" अनुवाद करते हैं, जिसका किसी भी भाषा में कोई अर्थ नहीं बनता। कैल्विन सीरियाई का अनुसरण करता है, और "जिनमें" अर्थ देता है। — सं.

तो अब हम भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय देखते हैं, जब वह कहता है कि ऐसे दिन आएँगे जिनमें लोग अपने पहले छुटकारे की चर्चा परमेश्वर के अनुग्रह और सामर्थ के किसी अद्भुत या मुख्य प्रमाण के रूप में न करेंगे, क्योंकि उनका दूसरा छुटकारा उससे कहीं बढ़कर होगा।

जहाँ तक बोलने के इस सूत्र या ढंग का प्रश्न है, यहोवा जीवित है, हम जानते हैं कि प्राचीन लोग गम्भीर शपथ खाते समय, और जब कभी वे विपत्तियों में अपने आप को आशा से उभारना चाहते थे, ऐसे शब्दों का प्रयोग करते थे। तो जब कभी वे अपने आप को इतना दबा हुआ पाते कि परमेश्वर के अनुग्रह को छोड़ उनके पास विपत्ति से बचने का और कोई मार्ग न रहता, तब वे प्रायः कहते थे कि वह परमेश्वर जो पहले अपनी प्रजा का छुड़ानेवाला रहा था, अब भी जीवित है, और उसकी सामर्थ में कोई कमी नहीं हुई, कि वह आवश्यकता पड़ने पर दस बार, या सौ बार, या हज़ार बार भी अपनी कलीसिया और उसके हर एक सदस्य की सहायता कर सकता है।

वह कहता है, उन सब देशों से जहाँ मैं ने उन्हें निकाल दिया होगा, और यह वह दो कारणों से कहता है, जिन्हें हम अभी बताएँगे। पुरुष के बदलने से अर्थ धुँधला नहीं होता: वह कहता है, यहोवा जीवित है, जो अपनी प्रजा को उत्तर देश से, और उन सब देशों से जहाँ मैं ने उन्हें निकाल दिया था, निकाल और ले आया; परन्तु अर्थ में कोई सन्दिग्धता नहीं है।

जहाँ तक विषय का प्रश्न है, ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर का पहला उद्देश्य यहूदियों को उनके पापों का स्मरण दिलाना था, क्योंकि यह ज्ञान पश्चाताप का मार्ग, या उसकी तैयारी होना था। क्योंकि यदि उन्हें यह निश्चय न होता कि वे अपने पापों के कारण परमेश्वर के हाथ से ताड़ना पा रहे हैं, तो वे या तो यह सोचते कि उनकी बँधुआई संयोग से हुई, या कुड़कुड़ाने और शिकायत करने में पड़ जाते, जैसा वे प्रायः करते थे। परन्तु परमेश्वर यहाँ घोषित करता है कि वही उनकी बँधुआई का कर्ता था, ताकि यहूदी जान लें कि परमेश्वर ने उनके बहुत से और गम्भीर पापों के लिए उन्हें न्यायपूर्वक दण्ड दिया। परन्तु दूसरे, परमेश्वर दिखाता है कि जिन्हें उसने दुःख दिया था, उन्हें जब चाहे फिर से स्थापित करना उसके वश में था। यह वैसा ही था जैसे उन्हें मृत्यु से जिलाना जिन्हें उसने मार डाला था, उस वचन के अनुसार जो अन्यत्र कहा गया है, "यहोवा मारता है और जिलाता भी है।" (1 शमूएल 2:6।)

बहुत से लोग नाश तो कर सकते हैं, परन्तु जो घाव उन्होंने किया हो उसे चंगा नहीं कर सकते। परन्तु परमेश्वर के विषय में यह है कि वह धर्मी न्यायी भी है और दयालु उद्धारकर्ता भी।

तो जैसे जब वह मनुष्यों को उनकी दुष्टता का दण्ड देता है तब मृत्यु उसके वश में है, वैसे ही जब वह दया दिखाना चाहता है तब जीवन भी उसके हाथ में और उसकी आज्ञा के अधीन है।

अब हम समझते हैं कि यह कहने में कि यहूदी परमेश्वर के द्वारा निकाले गए थे, भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय क्या था।

इसके बाद वह आगे कहता है, वे अपने ही देश में बसे रहेंगे। यह आवश्यक था कि मसीह के आगमन तक यहूदी इस सहारे से सम्भाले जाएँ, क्योंकि उन्होंने देखा कि वे उस निज भाग में रहेंगे जिसकी प्रतिज्ञा पूर्वजों से अनन्त जीवन और स्वर्गीय राज्य की बयाने के रूप में की गई थी। अब आगे आता है, —

यिर्मयाह 23:9

9. भविष्यद्वक्ताओं के विषय मेरा हृदय भीतर ही भीतर फटा जाता है, मेरी सब हड्डियाँ थरथराती हैं; यहोवा ने जो पवित्र वचन कहे हैं, उनको सुनकर मैं ऐसे मनुष्य के समान हो गया हूँ जो दाखमधु के नशे में चूर हो गया हो।

9. Propter prophetas (alii, ad prophetas, et potest legi ita ad verbum) contritum est (vel, confractum est) cor meum in medio mei; commota sunt (vel, concussa) omnia ossa mea (proprie, luxata sunt, quia de ossibus agitur; quantum ad verbum spectat, significat agitari, et moveri; sed quoniam nunc loquitur de ossibus, sermo erit aptior, luxata esse ossa;) fui tanquam vir ebrius super quem transiit vinum (hoc est tanquam vir obrutus vino) a facie Jehovae, et a facie sermonum sanctitatis ejus.

भविष्यद्वक्ता यहाँ फिर लोगों की दुष्टता के विरुद्ध कड़ी बातें कहता है; परन्तु क्योंकि भविष्यद्वक्ताओं ने उस समय अपनी चापलूसी से राजा और उसके हाकिमों को, और लोगों को भी, भटका दिया था, इसलिए भविष्यद्वक्ता ने अपना सन्देश उन्हीं की ओर किया, और कहता है कि भविष्यद्वक्ताओं के कारण उसका हृदय व्याकुल था। हम जानते हैं कि जब कोई मनुष्यों को कड़ाई से नहीं डाँटता, तब वे अपने आप को आधा निर्दोष समझने लगते हैं। इसलिए जब भविष्यद्वक्ताओं ने अपना काम छोड़ दिया, तब सारी प्रजा में ऐसी निश्चिन्तता छा गई कि उनमें परमेश्वर का कुछ भी भय न रहा। यही कारण है कि भविष्यद्वक्ता अब कहता है कि इतनी उदासीनता के कारण उसका हृदय व्याकुल था; क्योंकि भविष्यद्वक्ता, जैसा अन्यत्र कहा गया है, गूँगे कुत्तों के समान थे; वे अत्यन्त गम्भीर और अत्यन्त घोर पापों को अनदेखा कर देते थे, और लोगों को सही मार्ग पर लौटाने का कोई प्रयत्न न करते थे। तो वह कहता है, भविष्यद्वक्ताओं के कारण मेरा हृदय व्याकुल है; उनके लिए और भी भारी दण्ड ठहरा था, क्योंकि उन्हें परमेश्वर के आत्मा के साधन, उसके न्यायों के घोषणा करनेवाले होना चाहिए था; उन्हें उपदेश, डाँट और धमकियों के द्वारा उसके पक्ष का समर्थन करना चाहिए था।

तौभी इसमें कोई सन्देह नहीं कि जो कहा गया है वह सारी प्रजा पर लागू होना चाहिए। परन्तु यिर्मयाह भविष्यद्वक्ताओं से आरम्भ करना चाहता था, मानो उसने कहा हो कि यह भयानक बात थी कि भविष्यद्वक्ता डींग मारते थे कि वे परमेश्वर के सेवक हैं, और फिर भी इतनी दुष्टता के बीच गूँगे बने रहते थे। वह कहता है, भविष्यद्वक्ताओं के कारण मेरा हृदय टूट गया है। फिर वह कहता है कि उसकी हड्डियाँ अपने जोड़ों से उखड़ गईं। उत्पत्ति के पहले अध्याय में, जब मूसा आत्मा के जल के ऊपर मण्डराने की बात करता है, तब वह यही क्रिया प्रयोग करता है, परन्तु एक भिन्न धातु-रूप में। जो भी हो, यह कहना सबसे उपयुक्त है कि उसकी हड्डियाँ अपने जोड़ों से उखड़ गईं। और हम जानते हैं कि हड्डियाँ नसों से एक साथ बँधी रहती हैं, ताकि वे अपने स्थान से न हिलें; क्योंकि एक हड्डी का ढीला होना सारे शरीर को लगभग निकम्मा कर देता है। तो बोलने के इस ढंग से उसका अभिप्राय मन की अत्यन्त पीड़ादायक व्याकुलता प्रगट करना था, मानो उसने कहा हो कि जो कुछ उसके पास सबसे दृढ़ और सबसे बलवान वस्तु के रूप में था, वह निर्बल और बिलकुल शक्तिहीन हो गया था।

इसके बाद वह अपनी तुलना एक मतवाले मनुष्य से करता है; इस रूपक से वह यह समझाता है कि वह पूरी तरह से हक्का-बक्का हो गया था, और उसकी सारी इन्द्रियाँ उससे छिन गई थीं। और वह आगे कहता है, जिसके ऊपर से दाखमधु गुज़र गया हो। क्रिया {,}עבר, ओबेर, का अर्थ है पार चले जाना; परन्तु यहाँ इसका अर्थ ऊपर से गुज़र जाना है। जो अत्यधिक पीने से पराजित हो जाता है, वह ऐसा दिखाई देता है मानो डूब गया हो; क्योंकि जब कोई पानी में गिरता है, तो वह उससे अधिक नहीं डूबता जो अपने मस्तिष्क को दाखमधु में डुबो देता है; क्योंकि मतवालापन एक कब्र के समान है, इस कारण कि वह सारे मनुष्य को अपने वश में रखता है। तौभी भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय इसके सिवा और कुछ न था कि इस भयानक बात ने उन्हें चकित कर दिया जो स्वस्थ और ठीक बुद्धि के थे, और इसने सब अंगों को भी हिला दिया और जोड़ों से उखाड़ दिया, और उन मनों को भयभीत और व्याकुल कर दिया जो अन्यथा शान्त और स्थिर थे। क्योंकि निश्चय ही यिर्मयाह बुद्धिमान मनुष्य था, और साहस से भी सम्पन्न था, यहाँ तक कि वह हर विपत्ति के सामने, चाहे वह बड़ी ही क्यों न हो, घबरा न जाता; और न वह मतवाले मनुष्य के समान सहज ही जड़ता से अभिभूत हो सकता था। इसलिए इन तुलनाओं के द्वारा वह दिखाता है कि यह कितनी भयानक और विकट बात थी कि भविष्यद्वक्ता इतने बेपरवाह थे कि एक शब्द भी न बोलते थे, जब वे देखते थे कि अभक्ति और परमेश्वर का तिरस्कार इतना फैल गया है, जब वे देखते थे कि सारा देश हर प्रकार की दुष्टता से अशुद्ध हो गया है, जैसा हम अभी देखेंगे।

फिर वह कहता है, यहोवा के कारण, और उसके पवित्र वचनों के कारण।

यहोवा के कारण कहकर वह परमेश्वर को उनके सामने न्यायी और पलटा लेनेवाले के रूप में लाता है; मानो उसने कहा हो, "यदि वे विश्वास करते हैं कि स्वर्ग में एक परमेश्वर है, तो आश्चर्य है कि वे ऐसे पशु-समान हैं कि उसके नाम पर घमण्ड करने का साहस करते हैं, और फिर भी चुपचाप स्वर्ग और पृथ्वी को आपस में गड़बड़ हो जाने देते हैं। तो उनकी बुद्धि कहाँ है, जब वे इतनी लापरवाही से ऐसे भयानक और भययोग्य नाम का अंगीकार करने का साहस करते हैं? क्योंकि जब कभी परमेश्वर के नाम का उल्लेख होता है, तब उनके मन में न केवल उसकी भलाई और दया, वरन् उसकी कठोरता भी, और फिर उसकी सामर्थ भी आनी चाहिए, जो सब दुष्टों के लिए भयानक है। तो जब ये लोग इस प्रकार परमेश्वर से खिलवाड़ करने का साहस करते हैं, तो क्या उनकी मूर्खता भयानक नहीं होगी?" तो भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय यह है, — कि यह आश्चर्य की बात थी कि भविष्यद्वक्ताओं ने अपना पद तो ग्रहण किया, फिर भी उन्हें परमेश्वर की महिमा की कोई चिन्ता न थी।

86 सेप्टुआजिंट में ये शब्द पिछले पद से जोड़े गए हैं, जहाँ इनका कोई अर्थ नहीं प्रतीत होता। वुल्गेट इन्हें आगे आनेवाली बात के शीर्षक के रूप में रखता है, और ब्लेनी ने भी ऐसा ही किया है, "भविष्यद्वक्ताओं के विषय में।" सीरियाई इन्हें आगे के शब्दों से जोड़ता है, जैसा कैल्विन करता है, और हमारा अनुवाद, और अरबी तथा टार्गुम भी। सबसे उपयुक्त अनुवाद यह होगा, — भविष्यद्वक्ताओं के कारण मेरा हृदय मेरे भीतर टूट गया है। अन्यथा वाक्य मुश्किल से पूरा होता है। इसका अनुवाद "भविष्यद्वक्ताओं के सम्बन्ध में," इत्यादि भी किया जा सकता है। — सं.

87 यहाँ इस क्रिया को सामान्यतः हिलने या काँपने का भाव दिया जाता है: "हिलाई गई हैं," सेप्टुआजिंट; "काँप उठी हैं," वुल्गेट, सीरियाई और टार्गुम। "काँपना" शब्द सबसे उपयुक्त है। — सं.

और वह आगे कहता है, उसके पवित्र वचनों के कारण। यदि परमेश्वर अपने वचन के द्वारा मनुष्यों को न जगाता, तो वे आराम ही खोजते। परन्तु क्योंकि व्यवस्था यहूदियों के लिए लिखी गई थी, क्योंकि ये झूठे भविष्यद्वक्ता जानते थे कि यदि वे अपना काम ठीक से करना चाहते, तो उन्हें व्यवस्था के व्याख्याता होना चाहिए था — क्योंकि ये बातें भली भाँति ज्ञात थीं, इसलिए भविष्यद्वक्ता यहाँ उचित ही परमेश्वर के वचन का उल्लेख करता है, मानो वह उनके मुँह में लगाम डालना चाहता हो, कि वे अपनी सामान्य रीति के अनुसार उस बात से बच न निकलें जो परमेश्वर के नाम का केवल अंगीकार ही उन पर डालता था। तो जब परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था में गवाही दी थी कि वह अपनी प्रजा का शासन किस प्रकार चाहता है, तो यह कैसे हुआ कि ये भविष्यद्वक्ता परमेश्वर के वचनों से भयभीत न हुए? और क्योंकि कपटी न केवल स्वयं परमेश्वर को तुच्छ जानते और उसकी महिमा को घटाते हैं, वरन् उसकी व्यवस्था की शिक्षा की भी उपेक्षा करते हैं, इसलिए भविष्यद्वक्ता परमेश्वर के वचनों को एक विशेष प्रशंसा से सुशोभित करता है, और उसके वचनों को उसकी पवित्रता के वचन कहता है। और इस प्रकार वह परमेश्वर के वचनों को पवित्र, और इसलिए अनुल्लंघनीय, कहता है, ताकि अभक्त लोग जान लें कि एक भयानक पलटा उनके निकट था, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर और उसके पवित्र वचनों दोनों की उपेक्षा की। आगे आता है —

यिर्मयाह 23:10

10. क्योंकि देश व्यभिचारियों से भरा है; इस पर ऐसा शाप पड़ा है कि यह विलाप कर रहा है; वन की चराइयाँ भी सूख गईं। लोग बड़ी दौड़ तो दौड़ते हैं, परन्तु बुराई ही की ओर; और वीरता तो करते हैं, परन्तु अन्याय ही के साथ।

10. Quia adulteriis referta est terra, quia a facie jurisjurandi (vel, perfidae) luxit terra, aruerunt speciosa deserti (vel, caulae deserti; nam pluribus modis vertunt;) et fuit cursus eorum malus, et robur eorum non rectum.

यिर्मयाह अब इसका कारण बताता है कि वह भविष्यद्वक्ताओं में देखी गई जड़ता से इतना भयभीत क्यों था। यदि बातें ठीक व्यवस्था में होतीं, या कम से कम सहने योग्य होतीं, तो भविष्यद्वक्ता यहूदियों से अधिक शान्ति से बात करते; क्योंकि जब मनुष्य स्वेच्छा से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं, तब बड़ा कोलाहल मचाने की क्या आवश्यकता है?

इसलिए जब हमारा काम नम्र और विनयी मनुष्यों से पड़ता है, तब उग्रता मूर्खता है; और जो इस प्रकार उत्तेजित होते हैं, और बड़ी महत्वाकांक्षा के कारण बिना आवश्यकता के अत्यन्त प्रचण्ड उत्साह दिखाना चाहते हैं, वे नकलची बन्दरों के सिवा कुछ नहीं; परन्तु जब बातें अव्यवस्था और गड़बड़ी में हों, तब उग्रता की आवश्यकता होती है। यिर्मयाह अब घोषित करता है कि बातें इतनी अधिक बिगड़ चुकी थीं कि भविष्यद्वक्ता चुप नहीं रह सकते थे, जब तक वे लकड़ी के लट्ठों के समान न होते।

अतः ये दो बातें एक साथ जोड़ी जानी चाहिए, — कि भविष्यद्वक्ता गूँगे थे, — और कि वे उस समय गूँगे थे जब बोलने की सबसे बड़ी आवश्यकता थी; क्योंकि उन्होंने देश को व्यभिचारों से भरा हुआ देखा। यद्यपि वह व्यभिचारियों का नाम लेता है, तौभी वह उस अपराध को दोषी ठहराता है। अतः जब देश व्यभिचारों और झूठी शपथों से अशुद्ध हो गया था, जब वे सब के सब बुराई करने में लग गए थे, तब यह किसी भी रीति से सहने योग्य न था कि भविष्यद्वक्ता क्रोधित न हों, मानो सब बातें सुव्यवस्थित और शान्त थीं।

इससे हम देखते हैं कि परमेश्वर अपने वचन के सेवकों में, अर्थात् उनमें जिन्हें वह अपनी कलीसिया में शिक्षक ठहराता है, आलस्य से कितनी घृणा करता है, जब वे दुष्टता की ओर से आँखें मूँद लेते हैं, और व्यभिचारों, और वेश्यागमनों, और झूठी शपथों, और छल-कपट, और अन्य प्रकार के अन्यायों को लापरवाही से अनदेखा कर देते हैं; क्योंकि यदि उनके हृदयों में धर्म का थोड़ा-सा कण भी होता, तो वे निश्चय ही विचलित होते, और एक क्षण के लिए भी चुप न रह सकते।

क्योंकि यदि वह उत्साह परमेश्वर की सब सन्तानों में होना चाहिए जो भजनकार में था, "तेरे घर की धुन ने मुझे खा लिया है, और जो तेरी निन्दा करते हैं उनकी निन्दा मुझ पर आ पड़ी है," (भजन संहिता 69:10,) तो भविष्यद्वक्ताओं की उदासीनता कितनी अक्षम्य होगी, जब वे परमेश्वर के नाम को उपहास का पात्र बना हुआ देखते हैं, और जब वे हर प्रकार की दुष्टता को प्रबल होते देखते हैं? अब हम न केवल यह देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता इस स्थल में क्या सिखाता है, वरन् उसकी शिक्षा की उपयोगिता भी, और यह भी कि उसे किस प्रकार लागू किया जाना चाहिए। तो आइए, हम यह सीखें कि मनुष्य पाप करने में जितनी अधिक छूट लेते हैं, और उनकी अभक्ति और परमेश्वर के प्रति उनका तिरस्कार जितने अधिक दुस्साहस से फूट निकलते हैं, उतनी ही अधिक कठोरता से भविष्यद्वक्ताओं और विश्वासयोग्य शिक्षकों को उन्हें डाँटना और दोषी ठहराना चाहिए; और कि जब संसार इस प्रकार ढिठाई और उन्माद के साथ परमेश्वर के विरुद्ध उठ खड़ा होता है, तब लड़ने का समय होता है।

भविष्यद्वक्ता कुछ प्रकार की बुराइयों का उल्लेख करता है, फिर भी सब प्रकारों की गिनती नहीं करता; परन्तु व्यभिचारों और झूठी शपथों के अन्तर्गत वह अन्य अपराधों को भी सम्मिलित करता है। जहाँ तक शब्द {,}אלהale का प्रश्न है, उसका ठीक अर्थ शपथ खाना है; परन्तु चूँकि शाप देना प्रायः उसके साथ जुड़ा रहता है, इसलिए कुछ लोग यहाँ इसका अनुवाद "धिक्कार" करते हैं। परन्तु मैं यह अधिक उचित समझता हूँ कि यहाँ झूठी शपथ अभिप्रेत है, और कि शपथ खाना यहाँ बुरे अर्थ में लिया गया है, जिसका अर्थ है परमेश्वर के नाम से झूठी शपथ खाना।

वह कहता है, देश विलाप कर रहा है, और जंगल की चराइयाँ सूख गई हैं। यहाँ भविष्यद्वक्ता बड़े प्रभावशाली ढंग से दिखाता है कि वह जड़ता, जिसकी वह चर्चा करता है, कितनी लज्जाजनक थी, क्योंकि स्वयं देश चिल्ला उठा था; और न केवल वह भूमि जो जोती-बोई जाती थी और जिस पर बहुत से मनुष्य बसते थे, वरन् स्वयं पहाड़ और उनके एकान्त कोने भी। वह कहता है कि देश विलाप कर रहा था, क्योंकि परमेश्वर ने खेतों को बंजर करके, और अन्य साधनों से जिनका वह दण्ड के रूप में उपयोग करता था, हर स्थान पर अपने न्याय प्रकट किए थे। और यह बोलने का बड़ा ही प्रभावशाली ढंग है, जब भविष्यद्वक्ता देश के विलाप का उल्लेख करता है, मानो देश ने शोक करनेवाले का रूप धारण कर लिया हो, जब उसने परमेश्वर को मनुष्यों की दुष्टता के कारण क्रोधित देखा। यह वास्तव में एक प्रकार का मानवीकरण है, यद्यपि वह देश को बोलते हुए प्रस्तुत नहीं करता; परन्तु वह उस विलाप का वर्णन करता है जो देश की बंजरता में, और ओलों और आँधियों में, असमय की वर्षा में, सूखे में, और अन्य विपत्तियों में दिखाई देता था।

88 प्राचीन अनुवाद और तर्गुम इस शब्द के विषय में भिन्न हैं: सेप्टुआजिंट, सीरियाई और अरबी में "इनके कारण" है, अर्थात् व्यभिचारियों के कारण; वुल्गेट में "शाप के कारण," अर्थात् परमेश्वर के शाप के कारण; तर्गुम में "झूठी शपथ के कारण।" ब्लेनी कहता है कि यहाँ शपथ खाने के विषय में कुछ भी नहीं है, और इन शब्दों का अनुवाद "इनके कारण" करता है: परन्तु 14वाँ पद (यिर्मयाह 23:14) इस प्रश्न का निर्णय कर देता है, जहाँ "व्यभिचार" और "झूठ पर चलना" उन्हीं व्यक्तियों पर, अर्थात् भविष्यद्वक्ताओं पर, आरोपित किए गए हैं। कि {{אלה का अर्थ कभी-कभी "झूठी शपथ" होता है, यह होशे 4:2 से स्पष्ट है; और होशे 10:4 में इसके साथ "झूठमूठ" शब्द जोड़ा गया है। उनकी झूठी शपथ परमेश्वर की वाचा के प्रति उनका विश्वासघात था, अर्थात् मूरतों की उपासना करके उनका धर्मत्याग। और "व्यभिचारी" होने का आरोप उनके आत्मिक व्यभिचार — उनकी मूर्तिपूजा — की ओर संकेत करता प्रतीत होता है, न कि, जैसा कैल्विन और अन्य लोग सोचते हैं, शारीरिक व्यभिचार की ओर। प्रसंग की हर बात इस विचार के पक्ष में है; उनकी दुष्टता परमेश्वर के भवन में पाई गई, पद 11 (यिर्मयाह 23:11); और उनकी तुलना शोमरोन के भविष्यद्वक्ताओं से की गई है, पद 14 (यिर्मयाह 23:14)। इस पद की वाक्य-रचना भी हमें इसी निष्कर्ष पर पहुँचाती है: जब दो {}כי एक के बाद एक आते हैं, जैसा यहाँ है, तो उनका अनुवाद "जैसे" और "वैसे" किया जा सकता है, — जैसे देश व्यभिचारियों से भर गया है, वैसे ही झूठी शपथ के कारण देश विलाप करता है, जंगल की चराइयाँ मुरझा गई हैं; और उनकी दौड़ विपत्तिमय हो गई है, और उनका बल स्थिर नहीं, (अर्थात् अपनी दौड़ दौड़ने के लिए।) हूबिगाँ और हॉर्सले ने पूरे पद को फिर से व्यवस्थित किया है, और कई स्थानान्तरण किए हैं। यदि इन विद्वान पुरुषों ने एक क्षण के लिए भी विचार किया होता कि शब्दों का ऐसा स्थान-परिवर्तन, जैसा वे मानते हैं, कैसे हो सकता था, तो वे निस्सन्देह अपनी नवीनता लानेवाली प्रवृत्तियों को रोक लेते। — सं.

अतः जब कभी परमेश्वर मनुष्यों को उनके पापों का दण्ड देने के लिए अपना हाथ उठाता है, यदि वे स्वयं उसे नहीं पहचानते, तो स्वयं भूमि, जो बुद्धि और अनुभूति से रहित है, उन्हें उनके उन्माद के लिए लज्जा से भर देनी चाहिए; क्योंकि स्वयं भूमि में विलाप दिखाई देता है, मानो वह जानती हो कि परमेश्वर उससे अप्रसन्न है। इसलिए जब मनुष्य अपने पापों में सोए रहते हैं, और इस प्रकार परमेश्वर के प्रतिशोध की अवहेलना करते हैं, तो उनकी जड़ता कितनी भयंकर होगी! और यदि यह साधारण लोगों में असहनीय है, तो उन भविष्यद्वक्ताओं के विषय में क्या कहा जा सकता है, जिन्हें ऐसे वचनों का प्रचार करना चाहिए था, जैसे, — "शापित है वह जो इस व्यवस्था की आज्ञाओं का उल्लंघन करता है" — "शापित है वह जिसने परमेश्वर की उपासना को भ्रष्ट किया है" — अथवा, "जिसने अपने पड़ोसी के साथ अन्याय किया है," — और जो कुछ भी व्यवस्था में और लिखा है? (व्यवस्थाविवरण 27:26; व्यवस्थाविवरण 28:47, 58।) अब हम समझते हैं कि ये शब्द कितने प्रभावशाली हैं जब भविष्यद्वक्ता कहता है, देश विलाप कर रहा है। और वह यह कहकर इसी बात को विस्तार देता है, जंगल के सुहावने स्थान सूख गए हैं; मानो वह कहता हो कि परमेश्वर के न्याय सबसे दूर के स्थानों में भी देखे जाते थे; न केवल मैदानों में, जहाँ मनुष्यों की अधिकांश संख्या बसती थी, भूमि विलाप करती थी; वरन् यदि कोई पहाड़ों पर चढ़ता, जहाँ केवल चरवाहे अपनी भेड़-बकरियों के साथ मिलते थे, तो वहाँ भी परमेश्वर का क्रोध दिखाई देता था; और स्वयं पहाड़ चिल्लाकर कहते थे कि परमेश्वर क्रोधित है; और फिर भी मनुष्य अपने आप को धोखा देते रहे, — वे ही जो उसी समय व्यवस्था के व्याख्याता थे, जो परमेश्वर का मुख थे, और जिन्हें उसने डाँटने का पद सौंपा था; परन्तु वे गूँगे थे! अब हम समझते हैं कि इन शब्दों में क्या निहित है, और उनसे क्या सीखना है।

वह जोड़ता है कि उनकी दौड़ बुरी थी, और उनका बल ठीक न था। दौड़ से उसका अभिप्राय निस्सन्देह उनके काम और उनके सब कार्य हैं, और वह सहारा भी जिसे वे अपने लिए ठहराते थे; क्योंकि हमारा जीवन दौड़ कहलाता है, इसलिए कि परमेश्वर ने हमें इसलिए नहीं रचा कि हम एक ही स्थान पर पड़े रहें, वरन् उसने हमारे सामने एक लक्ष्य रखा है जिसके लिए हमें जीना है। इसलिए दौड़ से पवित्रशास्त्र का अभिप्राय हमारे सब काम हैं, और स्वयं वह लक्ष्य भी जिसके लिए हमें जीना है। फिर वह कहता है कि उनका सारा बल बिगड़ गया था; अर्थात् उन्होंने अपनी सारी शक्तियाँ बुराई करने में लगा दी थीं। अतः इससे प्रकट होता है कि यदि भविष्यद्वक्ता विश्वासघाती न होते, तो वे समझते कि चिल्लाने का समय भरपूर आ पहुँचा है, जब मनुष्य अपनी दुष्ट चाल में इतने दुस्साहस से परमेश्वर को क्रोध दिला रहे थे। आगे लिखा है, —

यिर्मयाह 23:11

11. क्योंकि भविष्यद्वक्ता और याजक दोनों भक्तिहीन हैं; हाँ, अपने भवन में भी मैं ने उनकी बुराई पाई है, यहोवा की यही वाणी है।

11. Quia tam propheta quam sacerdos impia egerunt; etiam in domo mea deprehendi (vel, reperi) malitiam ipsorum, dicit Jehova.

वह यहाँ जोड़ता है कि यह विचित्र नहीं लगना चाहिए कि भविष्यद्वक्ता उस समय चुप रहे जब उन्हें ऊँचे स्वर से चिल्लाना चाहिए था, क्योंकि वे स्वयं दोषी थे: और बोलने का साहस शुद्ध विवेक के सिवा और कहाँ से आ सकता है? कपटी, जो अपने आप को छूट देते हैं, वास्तव में प्रायः दूसरों के प्रति कठोर होते हैं, और आवश्यकता से भी अधिक; परन्तु दुष्टता के विरुद्ध सच्चाई से चिल्लाने का साहस कोई नहीं कर सकता, सिवा उसके जो निर्दोष है। क्योंकि जो दूसरों को दोषी ठहराता है, वह मानो अपने लिए व्यवस्था बनाता है, जैसा एक अन्यजाति लेखक ने कहा है, (Cicero in Salustium।) तब भविष्यद्वक्ता यहाँ हमें दिखाता है कि वे भविष्यद्वक्ता क्यों न केवल आलसी थे, वरन् लकड़ी और पत्थर के समान भी थे; क्योंकि दुष्टता के विरुद्ध बोलने के लिए, पहले उनके लिए अपने आप को सुधारना आवश्यक था; क्योंकि उनका जीवन पूरी रीति से भ्रष्ट था। अतः जब वे सबसे अधिक दुष्ट थे, तो वे दूसरों के विरुद्ध साहस से चिल्ला नहीं सकते थे; और इसलिए भविष्यद्वक्ता उन्हें दोषी ठहराता है, क्योंकि उनकी अपनी अभक्ति ने उन्हें अपना कर्तव्य पूरा करने से रोक दिया।

89 कि इस शब्द का अर्थ "दौड़" है, यह यिर्मयाह 8:6 से स्पष्ट है, जहाँ इसका और कोई अर्थ नहीं हो सकता। सेप्टुआजिंट और वुल्गेट में इसका यही अनुवाद किया गया है। ब्लेनी इसे दूसरा अर्थ देता है, — उनकी इच्छा भी दुष्टता रही है, और उनकी शक्ति न्याय-रहित। वह इसे {,{רצה, चुनना, से निकालता है, न कि ,{}ריף, दौड़ना, से: परन्तु अन्तिम पंक्ति का अर्थ कठिनाई से समझ में आता है। — सं.

यह सचमुच सम्भव है कि कोई संयम, ईमानदारी और न्याय से जीवन बिताए, और फिर भी दूसरों की दुष्टता की ओर से आँखें मूँद ले; परन्तु भविष्यद्वक्ता यहाँ भविष्यद्वक्ताओं और याजकों को दो कारणों से दोषी ठहराता है, — गूँगे रहने के लिए, और परमेश्वर का पक्ष न लेने के लिए जब उन्होंने देश को सब प्रकार की अशुद्धताओं से अपवित्र होते देखा; और फिर वह इस बुराई का स्रोत दिखाता है, अर्थात् वह कारण जिससे वे आलसी और पूरी रीति से उदासीन थे, और वह यह था कि वे उन अपराधों के विरुद्ध एक शब्द भी कहने का साहस न करते थे जिनके वे स्वयं दोषी थे, हाँ, जिनसे वे साधारण लोगों से भी अधिक लदे हुए थे। अब हम भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय समझते हैं जब वह कहता है कि याजकों और भविष्यद्वक्ताओं दोनों ने अभक्ति से काम किया था; यह दिखाने के लिए कि परमेश्वर के प्रति उनके तिरस्कार ने, जिसके लिए वे कुख्यात थे, और उनकी दुष्टता ने भी, उनसे कार्य करने की सारी शक्ति और स्वतन्त्रता छीन ली थी।

आगे यह जोड़ा गया है, अपने भवन में भी मैं ने उनकी बुराई पाई है। वह उनकी अभक्ति के विषय में कही हुई बात को और बढ़ाता है; क्योंकि वे न केवल साधारण जीवन में, दूसरी पटिया के कर्तव्यों के विषय में, कुख्यात और दुष्ट थे; वरन् उन्होंने परमेश्वर की सारी सेवा को भी भ्रष्ट कर दिया था, और सच्चे भविष्यद्वक्ताओं का वे उपहास करते थे। क्योंकि मन्दिर में याजकों की दुष्टता इसके सिवा और क्या पाई गई कि वे याजकपद की आड़ में एक प्रकार का व्यापार करते थे? और फिर भविष्यद्वक्ताओं ने परमेश्वर की उपासना को बिगाड़ा और उसमें मिलावट की; और उनके लिए धर्म नीच कमाई या लाभ के साधन के सिवा और क्या था?

अतः जब भविष्यद्वक्ताओं ने इस प्रकार परमेश्वर की सेवा को पाँवों तले रौंदा, और लाभ कमाने या अधिकार प्राप्त करने के लिए व्यवस्था को भ्रष्ट और विकृत किया, तो उनकी अभक्ति न केवल दैनिक जीवन के आचरण में, वरन् परमेश्वर के मन्दिर में भी, अर्थात् याजकीय पद के सम्बन्ध में, दिखाई देती थी।

90 यह क्रिया यिर्मयाह 3:1, 2, और 9 में तीन बार प्रयुक्त हुई है, और हर बार देश को व्यभिचार से अशुद्ध करने के अर्थ में, और अन्तिम दो पदों में आत्मिक व्यभिचार — मूर्तिपूजा — के अर्थ में। सेप्टुआजिंट और वुल्गेट ने यहाँ इसका कर्मवाच्य में अनुवाद किया है, "अशुद्ध हो गए हैं;" परन्तु यह अधिकतर सकर्मक अर्थ में प्रयुक्त होता है; और जूनियस और ट्रेमेलियस यहाँ इसका ऐसा ही अनुवाद करते हैं, और इसके बाद "उसे", अर्थात् देश को, अध्याहृत मानते हैं; और यह प्रसंग के साथ सबसे अधिक संगत है, — क्योंकि भविष्यद्वक्ता और याजक दोनों ने उसे अशुद्ध किया है: अपने भवन में भी मैं ने पाई है उनकी दुष्टता, यहोवा की यही वाणी है। परमेश्वर का "भवन" यहाँ भूमि या देश के विपरीत रखा गया है; और यिर्मयाह 23:15 में स्पष्ट कहा गया है कि यरूशलेम से अशुद्धता सारे देश में फैल गई थी। स्पष्ट है कि इस पूरे स्थल में, पद 9 से 15 तक (यिर्मयाह 23:9-15), मूर्तिपूजा ही अभिप्रेत है। इस क्रिया के विषय में कैल्विन ने सीरियाई अनुवाद का अनुसरण किया है। — सं.

अब, चूँकि व्यवस्था के अधीन जो कुछ हुआ उसके विषय में यह सत्य है, तो कोई आश्चर्य नहीं कि आज के दिन भी ऐसा नीच उदाहरण देखने में आए। और इससे पोप के अनुयायियों की मूर्खता भी प्रकट होती है, जो सोचते हैं कि वे पोप और उसके गन्दे पादरी-वर्ग के अपराधों के विषय में हर आपत्ति से चतुराई से बच निकलते हैं, यह कहकर कि पोप वास्तव में दुष्ट हो सकता है, जैसे उनमें से लगभग सब रहे हैं, और कि यही बात उनके मुकुटधारी अध्यक्षों के विषय में भी कही जा सकती है; परन्तु कि पोप, पोप होने के नाते, भूल नहीं कर सकता, और कि अध्यक्ष, अध्यक्ष होने के नाते, अर्थात् अपने शासन और पद में, पवित्र आत्मा के द्वारा संचालित होते हैं, क्योंकि वे कलीसिया का प्रतिनिधित्व करते हैं। परन्तु क्या वे इन प्राचीन याजकों से अच्छे हैं, जिन्हें स्वयं परमेश्वर ने स्पष्ट रूप से नियुक्त किया था, और जिनकी आज्ञा मानने की आज्ञा उसने सारी प्रजा को दी थी? परन्तु भविष्यद्वक्ता यहाँ न केवल यह कहता है कि वे दुष्ट थे, कि वे अपने पड़ोसियों के प्रति अभक्ति और दुष्टता से व्यवहार करते थे, कि वे लूटपाट और डकैतियाँ करते थे, कि वे हिंसा और लोभ में लगे रहते थे, कि उन्होंने अपने आप को व्यभिचार और हर अन्य अपराध के हवाले कर दिया था; वरन् वह यह भी कहता है कि उनकी दुष्टता स्वयं मन्दिर में, अर्थात् स्वयं पवित्र पद में, पाई गई; क्योंकि न केवल उनका जीवन दुष्ट था, वरन् उन्होंने अभक्ति और विश्वासघात से परमेश्वर की शिक्षा को भी भ्रष्ट किया और उसकी उपासना को उलट दिया।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जैसे तू ने अपने एकलौते पुत्र में हमारे सामने हर पूर्णता का आदर्श रखना उचित समझा है, वैसे ही हम उसका अनुकरण करते हुए अपने आप को ढालने का यत्न करें, और इस प्रकार न केवल उसका पालन करें जो उसने ठहराया है, वरन् उसका भी जो उसने सचमुच करके दिखाया, जिससे हम अपने आप को सचमुच उसके अंग प्रमाणित करें, और इस प्रकार अपने लेपालकपन को दृढ़ करें; और हम अपने जीवन के सारे मार्ग में इस प्रकार आगे बढ़ते जाएँ कि अन्त में उस धन्य विश्राम में एकत्र किए जाएँ जो उसी, तेरे एकलौते पुत्र, ने अपने ही लहू के द्वारा हमारे लिए प्राप्त किया है। — आमीन।

सत्तासीवाँ व्याख्यान

यिर्मयाह 23:12

12. इस कारण उनका मार्ग उनके लिए अन्धकार में फिसलनेवाले मार्गों के समान होगा; वे ढकेले जाएँगे, और उसमें गिर पड़ेंगे: क्योंकि मैं उन पर विपत्ति, अर्थात् उनके दण्ड का वर्ष, ले आऊँगा, यहोवा की यही वाणी है।

12. Propterea erit via eorum ipsis tanquam lubricitates, in caligine impingent, et cadent in ea; quia inducam super eos malum, annum visitationis eorum, dicit Jehova.

यहाँ वह झूठे भविष्यद्वक्ताओं और विश्वासघाती याजकों से घोषणा करता है कि प्रभु का न्याय निकट आ पहुँचा था, क्योंकि उन्होंने लोगों को धोखा दिया था। परन्तु वह लाक्षणिक रूप से बोलता है जब वह कहता है कि उनका मार्ग उनके लिए फिसलन के समान होगा। मार्ग से वह उन साधनों को समझता है जिन्हें वे सबसे उत्तम प्रकार के समझते थे, जैसे अन्यत्र, लगभग इसी अर्थ में, जो कुछ सुखद समझा जाता है, या जो जीवन को सँभालने में सहायक होता है, वह दुष्टों की "मेज़" कहलाता है। (भजन संहिता 69:22।) तब अर्थ यह है कि जब वे सब बातों को सफल समझते थे, मानो कोई समतल मैदान में से अपना मार्ग बना रहा हो, तब वे अपने आप को फिसलनेवाली भूमि पर पाएँगे। अतः उनका मार्ग उनके लिए फिसलन के समान होगा, अर्थात् जब वे सुरक्षित युक्ति करते और इतनी बुद्धिमानी से सब बातों को व्यवस्थित करते प्रतीत होते थे कि उन पर कोई अनिष्ट न आ सके, तब उनका मार्ग फिसलनेवाला हो जाएगा, और वह भी अन्धकार में। वह बुराई को दुगना करता है; क्योंकि कोई फिसलनेवाली भूमि पर खड़ा हो सकता है, और फिर भी संकट को देखकर अपनी चौकसी कर सकता है; परन्तु जब फिसलनेवाली भूमि के साथ अन्धकार भी जुड़ जाता है, तो जो न खड़ा रह सकता है और न चल सकता है, वह इस ओर या उस ओर गिरने के सिवा कठिनाई से और कुछ कर सकता है: इसलिए वह कहता है, वे ठोकर खाएँगे और उसमें गिर पड़ेंगे।

कारण आगे आता है, अर्थात् यह कि प्रभु उनसे अप्रसन्न था। अतः वे विनाश से बच नहीं सकते थे, क्योंकि उनका पाला परमेश्वर से था। परन्तु चूँकि अधर्मी परमेश्वर की सहनशीलता से झूठा भरोसा प्राप्त करते हैं, यहाँ तक कि वे अपनी दुष्टता पर घमण्ड करने का साहस करते हैं, इसलिए वह जोड़ता है, उनके दण्ड का वर्ष। अतः यद्यपि परमेश्वर उन्हें दण्ड देने के लिए तुरन्त अपना हाथ न बढ़ाता, तौभी उनका समय आनेवाला था; क्योंकि दण्ड के वर्ष का अर्थ वह उपयुक्त समय है जिसे परमेश्वर ने अपने भीतर ठहरा रखा है। वह वास्तव में दण्ड को टालता है; परन्तु जब कपटी और उसका तिरस्कार करनेवाले बहुत समय तक उसकी सहनशीलता का दुरुपयोग कर चुकते हैं, तब वह अचानक उनके विरुद्ध गरजने लगता है; और यही दण्ड का वर्ष है।

91 शब्दशः यह शब्द ऐसा ही है; परन्तु यहाँ एक लोप है, जो इब्रानी में असामान्य नहीं; "फिसलनों" या फिसलनेवाली वस्तुओं से पहले मार्ग शब्द छोड़ दिया गया है। यह शब्द बहुवचन और द्विरुक्त होने के कारण चरम स्थिति को व्यक्त करता है — "अत्यन्त फिसलनेवाला," या पूरी रीति से फिसलनेवाला, — 12. इसलिए उनका मार्ग उनके लिए होगा, घोर अन्धकार में पूरी रीति से फिसलनेवाले मार्ग के समान; वे आगे ढकेले जाएँगे और उसमें गिर पड़ेंगे; क्योंकि मैं उन पर विपत्ति ले आऊँगा — उनके दण्ड का वर्ष, यहोवा की यही वाणी है। यह अन्धकार नहीं, वरन् घोर अन्धकार है जो इस शब्द का अर्थ है; और तर्गुम ने, तथा सीरियाई को छोड़ सब अनुवादों ने, इसे पिछले शब्दों के साथ जोड़ा है; सीरियाई का ब्लेनी ने इस प्रकार अनुसरण किया है, — अन्धकार में वे ढकेले जाएँगे और उसमें गिर पड़ेंगे। परन्तु इससे स्थल का सारा बल नष्ट हो जाता है: उनका मार्ग पूरी रीति से फिसलनेवाला होना था, और वह भी घोर अन्धकार में; जिस पर वे जल्दी से आगे बढ़ाए जाएँगे, या फिसलेंगे, या ढकेले जाएँगे, और उसका अनिवार्य परिणाम गिरना होगा। — सं.

आगे लिखा है, —

यिर्मयाह 23:13-14

13. और मैं ने शोमरोन के भविष्यद्वक्ताओं में मूर्खता देखी है; वे बाल के नाम से भविष्यद्वाणी करते थे, और मेरी प्रजा इस्राएल को भटका देते थे।

13. In prophetis (Et in prophetis) Samariae vidi fatuitatem (vel, insulsum, aut, insulsitatem;) prophetant in Baal, et errare faciunt (vel, decipiunt) populum meum Israel.

14. मैं ने यरूशलेम के भविष्यद्वक्ताओं में भी एक भयानक बात देखी है: वे व्यभिचार करते, और झूठ पर चलते हैं; वे कुकर्मियों के हाथों को भी दृढ़ करते हैं, यहाँ तक कि कोई अपनी दुष्टता से नहीं फिरता: वे सब के सब मेरी दृष्टि में सदोम के समान, और उसके निवासी अमोरा के समान हो गए हैं।

14. Et in prophetis Jerusalem vidi pravitatem, adulterando et ambulando in fallacia; et roborant manus improborum, ut non revertantur quisque a malitia sua; erunt mihi onmes tanquam Sodoma, et habitatores ejus tanquam Gomorrha.

ये दोनों पद एक साथ पढ़े जाने चाहिए; क्योंकि इसमें कोई सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता यहाँ उन झूठे भविष्यद्वक्ताओं की, जिन्होंने इस्राएल के राज्य में परमेश्वर की उपासना को भ्रष्ट किया था, तुलना यरूशलेम के उन भविष्यद्वक्ताओं से करता है जो अधिक पवित्र और अधिक सिद्ध दिखाई देना चाहते थे। और वह उनकी तुलना इसलिए करता है कि उन लोगों को, जो परमेश्वर के विश्वासयोग्य सेवक समझे जाना चाहते थे, कहीं अधिक बुरे ठहराकर प्रस्तुत करे; क्योंकि वह कहता है कि उसने शोमरोन के भविष्यद्वक्ताओं में मूढ़ता पाई थी, परन्तु यरूशलेम के भविष्यद्वक्ताओं में भ्रष्टता।

इसलिए मेरे विचार में वे भूल करते हैं जो {,}תפלהtephle को भी भ्रष्टता के अर्थ में लेते हैं; क्योंकि वे इस बात पर ध्यान नहीं देते कि वह यहाँ तुलना के द्वारा उन लोगों की दुष्टता को बढ़ाकर दिखाता है जो, जैसा वे कहते हैं, अपने आप को बिना अपवाद के सबसे उत्तम समझते थे।

जहाँ तक शोमरोन के भविष्यद्वक्ताओं का प्रश्न है, वे बहुत पहले ही दोषी ठहराए जा चुके थे; और यरूशलेम में कोई ऐसा न था जो खुलेआम उनका पक्ष लेने का साहस करता; क्योंकि वे परमेश्वर की उपासना से हट गए थे, और लोगों को एकमात्र सच्चे मन्दिर और वेदी से दूर ले गए थे।

अतः उस समय यहूदा के राज्य में वे धर्मत्यागी, विश्वासघाती और सिद्धान्तहीन माने जाते थे। परन्तु यहूदा का राज्य अब भी शुद्ध और निर्दोष समझा जाना चाहता था; और वहाँ के भविष्यद्वक्ता घमण्ड करते थे कि वे अभ्रष्ट और हर कलंक से मुक्त हैं। इसलिए भविष्यद्वक्ता कहता है कि शोमरोन के भविष्यद्वक्ताओं में, अर्थात् उनमें जिन्होंने दस गोत्रों को भ्रष्ट किया था और वहाँ परमेश्वर की शुद्ध उपासना को बिगाड़ दिया था, मूढ़ता पाई गई थी; परन्तु यरूशलेम और यहूदा के राज्य के भविष्यद्वक्ताओं में अधिक दुष्टता थी, क्योंकि वे न केवल मूर्ख थे, वरन् जान-बूझकर सारे धर्म को उलट देते थे, और सब प्रकार की दुष्टता में छूट देते थे, यहाँ तक कि वे मानो हर प्रकार के अधर्म के समर्थन में झण्डा उठाए फिरते थे। इससे हम देखते हैं कि यिर्मयाह का उद्देश्य यह दिखाना था कि यहूदा के राज्य के भविष्यद्वक्ता अभक्ति में उन्हीं भविष्यद्वक्ताओं से बढ़ गए थे जिन्हें वे घमण्ड से दोषी ठहराते थे; क्योंकि वे न केवल मूढ़ और मूर्ख थे, वरन् उन्होंने जान-बूझकर मानो परमेश्वर के विरुद्ध षड्यन्त्र रचा था, और न केवल धर्म के, वरन् सब व्यवस्थाओं के खुले शत्रु बन गए थे।

जहाँ तक इन शब्दों का प्रश्न है कि उसने शोमरोन के भविष्यद्वक्ताओं में मूढ़ता पाई, वह परमेश्वर के व्यक्तित्व में बोलता है, जो एकमात्र योग्य न्यायी है। और वह उनकी बुद्धिहीनता का कारण जोड़ता है, क्योंकि वे बाल के नाम से भविष्यद्वाणी करते थे, और इस्राएल की प्रजा को भटका देते थे। यदि यिर्मयाह केवल इन्हीं के विषय में बोलता, तो वह निस्सन्देह उनके पाप का वर्णन करने में अधिक कठोर शब्दों का प्रयोग करता; परन्तु चूँकि वह उनकी तुलना उनसे कर रहा था जो उनसे भी बुरे थे, इसलिए उसने मूढ़ता शब्द से ही सन्तोष किया; मानो वह कहता हो, "यदि कोई उन पर अलग से विचार करे, तो वे वास्तव में बहुत दुष्ट थे, और सबसे कठोर दण्ड के योग्य थे; परन्तु यदि उनकी तुलना यहूदा के भविष्यद्वक्ताओं से की जाए, तो वे केवल मूढ़ और जड़बुद्धि ही समझे जाएँगे।" तब समुच्चयबोधक का अनुवाद इस प्रकार किया जाना चाहिए, "मैं ने, वास्तव में, शोमरोन के भविष्यद्वक्ताओं में मूढ़ता देखी है;" और फिर अगले वाक्यांश में भिन्न रीति से, "परन्तु यहूदा के भविष्यद्वक्ताओं में मैं ने भ्रष्टता देखी है।" इस पद में इसे विरोधवाचक रूप में, और पिछले पद में स्वीकृतिवाचक रूप में पढ़ा जाना चाहिए।

तब यरूशलेम के भविष्यद्वक्ताओं में मैं ने भ्रष्टता देखी है।

आगे लिखा है, वे व्यभिचार करते हैं, और छल पर चलते हैं। व्याख्याकार सोचते हैं कि यहाँ वचन का परिवर्तन है; परन्तु क्या हो यदि ये शब्द लोगों पर लागू किए जाएँ? मानो यिर्मयाह ने कहा हो, "जब कोई व्यभिचारी होता है, जब कोई छल पर चलता है, अर्थात् जब कोई कपटी होता है, तब वे दुष्टों के हाथों को दृढ़ करते हैं।" और निस्सन्देह यही अर्थ यहाँ सबसे सही प्रतीत होता है। तब यिर्मयाह दिखाता है कि वे अभक्ति में अन्य भविष्यद्वक्ताओं से कैसे बढ़ गए थे, अर्थात् इसलिए कि जब उन्होंने एक ओर व्यभिचारों को, और दूसरी ओर छल-कपट, लूटपाट और झूठी शपथों को प्रबल होते देखा, तब उन्होंने अनदेखा करने का ढोंग किया; और इतना ही नहीं, वरन् उन्होंने दुष्टों का संरक्षण अपने ऊपर लिया, और अधर्मियों के हाथों को दृढ़ किया, और उनके उन्माद में दुस्साहस जोड़ दिया। क्योंकि जैसे भय हाथों को दुर्बल कर देता है, वैसे ही लज्जा भी; अतः जैसे इन भविष्यद्वक्ताओं ने दुष्टों और अधर्मियों से लज्जा और भय दोनों को दूर कर दिया, वैसे ही उन्होंने उनके हाथों को दृढ़ किया; अर्थात् उन्होंने उन्हें अधिक भरोसा दिया, यहाँ तक कि वे और अधिक स्वच्छन्दता और अधिक छूट के साथ हर बुराई में सिर के बल कूद पड़े।

92 सेप्टुआजिंट में इसका अनुवाद "अधर्म" है; वुल्गेट में "मूढ़ता"; सीरियाई में "झूठ"; और तर्गुम में "अभक्ति"। ब्लेनी में "वह जो घृणित था" है। यह शब्द, जैसा यहाँ है, केवल दो अन्य स्थानों में पाया जाता है, अय्यूब 1:22; अय्यूब 24:12। इसका अर्थ "घृणित" नहीं, वरन् जो कच्चा, फीका, बिना मसाले का हो, और इसलिए लाक्षणिक रूप से, जो अनुचित, बेतुका, मूढ़तापूर्ण, मूर्खतापूर्ण हो। अय्यूब में इसका अनुवाद "मूर्खता" किया गया है। वुल्गेट, जिसका कैल्विन ने अनुसरण किया है, यहाँ इसका सबसे उत्तम अर्थ देता है — "मूढ़ता"। बाल के नाम से भविष्यद्वाणी करना मोह-अन्धता का परिणाम था: यह एक बेतुकी और मूढ़तापूर्ण बात थी। यह उस काम का अपने आप में स्वरूप था; और इस मूढ़ता से जो बुराई उत्पन्न हुई, वह लोगों को भटका देना था। — सं.

93 अथवा "दुष्टता — pravitatem," सेप्टुआजिंट में "भयानक बातें" अनूदित, और सीरियाई में "मूर्खता"। वुल्गेट और तर्गुम पूरी रीति से भटक गए हैं। इस शब्द का ठीक अर्थ भयावहता, घिनौनापन, या एक भयानक वस्तु है, और इसका अनुवाद घोर अनर्थ किया जा सकता है। तर्गुम और अनुवादों में इस शब्द के विषय में, और आगे आनेवाले शब्दों के अनुवाद की रीति के विषय में जो भिन्नता पाई जाती है, उससे प्रतीत होता है कि यह स्थल समझा नहीं गया। मैं निम्नलिखित अनुवाद प्रस्तुत करता हूँ, — 14. परन्तु यरूशलेम के भविष्यद्वक्ताओं में मैं ने एक भयानक बात देखी है — व्यभिचार करना और झूठ पर चलना; और उन्होंने दुष्ट के हाथ को दृढ़ किया है, कि वे न फिरें, हर एक अपनी दुष्टता से: वे सब के सब मेरी दृष्टि में सदोम के समान, और उसके निवासी अमोरा के निवासियों के समान हो गए हैं। जिस क्रिया का अनुवाद मैं "व्यभिचार करना" करता हूँ, वह बिना पूर्वसर्ग का एक क्रियार्थक संज्ञा-रूप है; हमारी भाषा में इसका और किसी प्रकार अनुवाद नहीं हो सकता, परन्तु वेल्श भाषा में इसका शब्दशः अनुवाद, बिना पूर्वसर्ग के क्रियार्थक रूप में, किया जा सकता है, यद्यपि उस भाषा में साधारणतः, इब्रानी के समान, क्रियार्थक रूप के पहले पूर्वसर्ग रहता है। "भयानक बात" व्यभिचार, अर्थात् मूर्तिपूजा, थी, जो "झूठ पर चलने" के साथ, अर्थात् परमेश्वर के नाम से भविष्यद्वाणी करने के झूठे दावे के साथ, जुड़ी हुई थी, जिसका आगे और अधिक स्पष्ट उल्लेख किया गया है। भविष्यद्वक्ताओं के बीच यही अन्तर था: शोमरोन के भविष्यद्वक्ता मूर्तिपूजक थे, और अपनी बात के अनुरूप वे बाल के नाम से भविष्यद्वाणी करते थे; परन्तु यरूशलेम के भविष्यद्वक्ता न केवल मूर्तिपूजक थे, वरन् उन्होंने इस पाप में यह घोर अनर्थ और जोड़ दिया कि वे जो कुछ करते थे उसका समर्थन यह दावा करके करते थे कि वे प्रभु के भविष्यद्वक्ता हैं। यही वह भयानक बात थी। भ्रम का समर्थन करना बड़ा पाप है, परन्तु यह प्रभु के नाम से, या उसके वचन को तोड़-मरोड़कर करना, एक भयानक बात है। अन्तिम पंक्ति उस लोप का एक उदाहरण प्रस्तुत करती है जिसका उल्लेख 12वें पद की टिप्पणी में किया गया है। अमोरा से पहले "निवासी" शब्द अध्याहृत समझा जाना चाहिए। — सं.

वह कहता है, कि वे फिरें नहीं, हर एक अपनी दुष्टता से। यह व्याख्या के लिए जोड़ा गया है; क्योंकि, जैसा मैं कह चुका हूँ, या तो परमेश्वर का भय या मनुष्यों की लज्जा उनके दुस्साहस को रोक सकती थी; परन्तु जब उन्हें दृढ़ किया गया और उनका पक्ष लिया गया, तब वे सब प्रकार की अति में फूट पड़े, और अपनी हठ में अपने आप को कठोर कर लिया: कि वे फिरें नहीं, हर एक अपनी दुष्टता से।

अन्त में वह जोड़ता है, वे सब के सब मेरी दृष्टि में सदोम के समान, और उसके निवासी अमोरा के समान होंगे। हम देखते हैं कि अन्तिम वाक्यांश यरूशलेम के नागरिकों तक सीमित है। तब परमेश्वर कहता है कि ये भविष्यद्वक्ता सदोमियों के समान होंगे, और यरूशलेम के नागरिक अमोरा के नागरिकों के समान। यह केवल अपराधों के विषय में नहीं, वरन् दण्ड के विषय में भी समझा जाना चाहिए; मानो उसने कहा हो कि उनके लिए क्षमा की उससे अधिक आशा नहीं रही जितनी सदोमियों के लिए थी, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के क्रोध को चरम सीमा तक भड़का दिया था, यहाँ तक कि वह अब उन्हें छोड़ नहीं सकता था। फिर आगे लिखा है, —

यिर्मयाह 23:15

15. इस कारण सेनाओं का यहोवा भविष्यद्वक्ताओं के विषय में यों कहता है: देख, मैं उनको नागदौना खिलाऊँगा, और विष का जल पिलाऊँगा: क्योंकि यरूशलेम के भविष्यद्वक्ताओं के कारण सारे देश में भक्तिहीनता फैल गई है।

15. Propterea sic dicit Jehova exercituum super (vel, ad) prophetas istos, Ecce ego cibabo eos amaritudine (aut, veneno; alii vertunt, absynthio, ,{}הנעלsed nomen absynthii non videtur quadrare; ubicumque enim ponitur hoec vox, significat amaritudinem noxiam et virulentem et mortiferam,) et potabo eos aquis veneni (alii vertunt, fellis; diximus alibide hac voce, (,{}שארquoniam a prophetis Jerusalem egressa est impietas in totam terram.

यह पद यहूदा के राज्य के भविष्यद्वक्ताओं को सम्बोधित है, जैसा हम इसके अन्त से जानते हैं; और इस प्रकार जो व्याख्या मैं ने दी है उसकी पुष्टि होती है, अर्थात् यह कि परमेश्वर यरूशलेम के भविष्यद्वक्ताओं के विषय में, जो अधिक पवित्रता का घमण्ड करते थे, बोलते हुए अन्य भविष्यद्वक्ताओं के दोष को हल्का करता है। परन्तु वह घोषणा करता है कि उनके लिए भोजन के स्थान पर विष और पेय के स्थान पर पित्त होगा; मानो उसने कहा हो, "मैं हर प्रकार के दण्ड से उनका पीछा करूँगा।" वह स्पष्ट रूप से वही बात व्यक्त करता है जिसकी ओर मैं पहले संकेत कर चुका हूँ, कि उनकी मेज़ उनके लिए फन्दा बन जाएगी। (भजन संहिता 69:22।) अधर्मी, वास्तव में, सदा सोचते हैं कि वे अपनी चालों से बच निकल सकते हैं; दूसरी ओर परमेश्वर घोषणा करता है कि यद्यपि उनके लिए मेज़ तैयार भी हो, तौभी वे उस पर भोजन के लिए विष और पीने के लिए पित्त के सिवा और कुछ न पाएँगे। क्योंकि जैसे परमेश्वर की सन्तानों और विश्वासयोग्य दासों के लिए बुराइयाँ भी उनके लाभ में बदल जाती हैं; वैसे ही अधर्मियों और उसके दुष्ट तिरस्कार करनेवालों के लिए सब बातें अनिवार्य रूप से उनके विनाश का कारण बनती हैं, यहाँ तक कि भोजन और पेय, और उनके जीवन का मार्ग, और एक शब्द में, हर वस्तु।

94 यह सीरियाई का अनुवाद है, परन्तु यह अर्थ नहीं है; सेप्टुआजिंट, वुल्गेट और अरबी में इसका उचित अनुवाद "अशुद्धता," या मलिनता, किया गया है, परन्तु तर्गुम में अनुचित रूप से चापलूसी। जिस क्रिया से यह निकला है उसका अनुवाद साधारणतः अशुद्ध करना किया जाता है; देखिए यशायाह 24:5; मीका 4:11। हमारे अनुवाद का "अपवित्रता" और ब्लेनी का "टेढ़ापन" अशुद्ध प्रतीत होते हैं; यह शब्द इन दोनों में से किसी अर्थ में प्रयुक्त नहीं होता। यहाँ की अशुद्धता मूर्तिपूजा के द्वारा थी — अर्थात् पहले कहा गया व्यभिचार। यह अशुद्धता यरूशलेम से सारे देश में फैल गई थी। — सं.

कारण आगे आता है, क्योंकि यरूशलेम के भविष्यद्वक्ताओं से अभक्ति सारे देश में फैल गई है। इन शब्दों से वह घोषणा करता है कि वे सब बुराइयों के रचयिता थे, यहाँ तक कि उनकी तुलना में शोमरोन के भविष्यद्वक्ता एक प्रकार से धर्मी समझे जा सकते थे। परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि यह घोषणा अत्यन्त कठोर समझी गई; तौभी हम देखते हैं कि किस विवशता से यिर्मयाह को इस प्रकार बोलने के लिए बाध्य होना पड़ा; क्योंकि परमेश्वर का दीपक अब तक यरूशलेम में बना हुआ था, जैसा अनेक स्थलों में कहा गया है, और न खरी शिक्षा का प्रकाश पूरी रीति से बुझाया गया था। वे यह दावा करते थे कि वे व्यवस्था का पालन करते रहे हैं; और साथ ही वे दूसरों से कहीं अधिक बुरे थे, क्योंकि न केवल मन्दिर में और नगर में परमेश्वर की उपासना भ्रष्ट हो गई थी, वरन् व्यभिचार, छल-कपट, लूटपाट और सब प्रकार की दुष्टता हर स्थान पर प्रबल थी। वह आगे जोड़ता है, —

यिर्मयाह 23:16

16. सेनाओं का यहोवा यों कहता है: इन भविष्यद्वक्ताओं की बातों की ओर जो तुम से भविष्यद्वाणी करते हैं कान मत लगाओ: वे तुम को व्यर्थ बनाते हैं; वे यहोवा के मुख से नहीं, अपने ही मन का दर्शन बोलते हैं।

16. Sic dicit Jehovah exercituum, Ne audiatis verba prophetarum, qui prophetant vobis; evanescere faciunt ipsi vobis, visionem cordis sui loquuntur, non ex ore Jehovae.

जो यहाँ कहा गया है, वह अवश्य ही बहुत कठोर प्रतीत हुआ होगा, और उसने लोगों को बहुत ठेस पहुँचाई होगी; क्योंकि यिर्मयाह ने उन्हें भविष्यद्वक्ताओं की शिक्षा सुनने से मना किया।

वह वास्तव में उन्हें भविष्यद्वक्ता का नाम देना स्वीकार करता है, जो एक पवित्र नाम था; परन्तु फिर भी वह उनकी साख गिराता है, और उनसे सारी प्रतिष्ठा छीन लेता है। वह उन जादूगरों या धोखेबाज़ों के विषय में नहीं बोलता जो परमेश्वर की प्रजा के लिए पराए थे; वह मिस्रियों, या कसदियों, या उनके समान किसी के विषय में नहीं बोलता, और न वह शोमरोन के भविष्यद्वक्ताओं के विषय में बोलता है, परन्तु उनके विषय में जो प्रतिदिन मन्दिर में दिखाई देते थे और घमण्ड करते थे कि वे ईश्वरीय रूप से चुने गए हैं, प्रकाशन के आत्मा से सम्पन्न हैं, और कि वे उसके सिवा और कुछ नहीं लाते जो परमेश्वर ने उन्हें सौंपा है। अतः जब यिर्मयाह ने उन्हें इनकी सुनने से मना किया, तो अवश्य ही सब के मन में, विशेषकर भोले लोगों के मन में, बड़ी उलझन उत्पन्न हुई होगी, — "इसका क्या अर्थ है? परमेश्वर इन सिद्धान्तहीन मनुष्यों को मन्दिर में स्थान ग्रहण करने, और वहाँ भविष्यद्वक्ता का पद चलाने क्यों देता है, जबकि वे साथ ही धोखेबाज़, झूठी शपथ खानेवाले और कपटी हैं?"

इसी प्रकार हम देखते हैं कि आज के दिन बहुत से लोग उन फूटों के कारण उलझन में हैं जिनसे कलीसिया सताई जाती है, और मानो टुकड़े-टुकड़े की जाती है। हमें उन लोगों से संघर्ष करने के लिए विवश होना पड़ता है जो अपने लिए काथलिक कलीसिया का नाम हथिया लेते हैं, जो घमण्ड करते हैं कि वे अध्यक्ष, मसीह के प्रतिनिधि, प्रेरितों के उत्तराधिकारी हैं। अतः जब अज्ञानी लोग स्वयं कलीसिया की गोद में ऐसे शत्रुतापूर्ण संघर्ष देखते हैं, तो वे अवश्य ही भयभीत होते हैं, और ऐसी ठोकर उनके विश्वास को भयंकर रूप से हिला देती है। इसलिए इस स्थल पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए; क्योंकि यद्यपि आरम्भ में अज्ञानी लोग इस प्रकार के निषेध से व्याकुल हो सकते हैं, तौभी हर एक जो सचमुच परमेश्वर का भय मानता है, अपने मन को इस प्रकार साधेगा कि वह झूठे और सच्चे भविष्यद्वक्ताओं में भेद कर सके; और परमेश्वर अपने चुने हुए लोगों को न्याय और विवेक के आत्मा से कभी वंचित न छोड़ेगा, जब शिक्षक दोनों ओर से संघर्ष करते हैं, और उपद्रव कलीसिया को लगभग उलट देते हैं; तब भी, जैसा मैं कह चुका हूँ, परमेश्वर अपने चुने हुओं की रक्षा करेगा, यदि हम भक्ति और नम्रता से उसके वचन के अधीन होने का यत्न करें; वह अपने हाथ से हमारी अगुवाई भी करेगा, जिससे हम धोखा न खाएँ। अतः जब परमेश्वर ने यिर्मयाह को आज्ञा दी थी कि वह लोगों को झूठे भविष्यद्वक्ताओं की सुनने से मना करे, तो आज के दिन हम इस पर आश्चर्य न करें कि विश्वासयोग्य शिक्षक, जो सच्ची शिक्षा और खरी भक्ति को बनाए रखना चाहते हैं, अपने आप को इन उपाधिधारी मनुष्यों का विरोध करने के लिए विवश पाते हैं, जो पासबानों, और प्रधानों, और अध्यक्षों के नकाबपोश नामों की आड़ में छिपते हैं, जिससे वे असावधानों और अज्ञानियों को धोखा दें; वह कहता है, उन भविष्यद्वक्ताओं की बातें मत सुनो जो तुम से भविष्यद्वाणी करते हैं।

वह जोड़ता है, वे तुम को व्यर्थ बनाते हैं; अर्थात्, वे तुम्हें मोह में अन्धा कर देते हैं। परन्तु यह पर्याप्त न होता, यदि वह वह बात न जोड़ता जिसने इसकी और अधिक पुष्टि की। इसलिए यिर्मयाह कहता है कि वे अपने ही मन का दर्शन प्रस्तुत करते थे, और वह नहीं बोलते थे जो परमेश्वर के मुख से निकला था। यह एक ऐसा चिह्न है जो हमें कभी धोखा नहीं दे सकता, जब तक हम स्वेच्छा से अपने आप को शैतान के फन्दों और षड्यन्त्रों में न डाल दें, जैसा बहुत से लोग करते हैं जो जान-बूझकर धोखा खाना चाहते हैं, और झूठी बातों की खोज में भी रहते हैं; परन्तु जो कोई अपना मन सत्य के अध्ययन में लगाता है, वह कभी धोखा नहीं खा सकता, यदि वह इस चिह्न के द्वारा, जो हमारे सामने रखा गया है, भविष्यद्वक्ताओं और भविष्यद्वक्ताओं में भेद करे; क्योंकि हर एक जो केवल अपने ही मन की प्रेरणाओं के अनुसार बोलता है, अवश्य ही कपटी है।

तो किसी को भी खरा शिक्षक न समझा जाए, सिवाय उसके जो परमेश्वर के मुख से बोलता है।

परन्तु यहाँ यह प्रश्न उठाया जा सकता है, कि साधारण लोग कैसे समझ सकते हैं कि कुछ लोग परमेश्वर के मुख से बोलते हैं, और दूसरे अपनी ही व्याख्याएँ प्रस्तुत करते हैं? मैं उत्तर देता हूँ, कि उस समय व्यवस्था की शिक्षा लोगों के मनों की अगुवाई करने के लिए पर्याप्त थी, यदि वे अपनी आँखें बन्द न करते; और यदि उस समय व्यवस्था पर्याप्त थी, तो परमेश्वर अब निश्चय ही अपने नबियों के द्वारा, और विशेषकर अपने सुसमाचार के द्वारा, हमें और भी स्पष्ट ज्योति देता है। अतः जब परमेश्वर ने एक बार हमें अपनी साक्षी दे दी है, तो हर एक को चाहिए कि ज्यों ही वह जान ले कि क्या उचित है, उसे किस बात का अनुसरण करना चाहिए, और किस बात से बचना चाहिए, त्यों ही वह उसकी आज्ञा माने।

तो अब हम देखते हैं कि यह खण्ड कितना उपयोगी है; क्योंकि मनुष्यों के लिए इससे अधिक दयनीय कुछ नहीं कि वे इधर-उधर उछाले जाएँ, और उद्धार के मार्ग से भटका दिए जाएँ। इसलिए इस मार्ग को निश्चय के साथ जानने से अधिक वांछनीय और कुछ नहीं है। अब, परमेश्वर यहाँ मानो उँगली से हमें मार्ग दिखाता है; क्योंकि वह कहता है कि जो उसके मुख से बोलते हैं उनकी बात निश्चिन्त होकर सुनी जा सकती है; परन्तु दूसरों को ठुकरा देना चाहिए, चाहे वे नबी होने का कितना ही घमण्ड क्यों न करें, और इस प्रकार अधिकार की आड़ में मनुष्यों के मनों को बन्दी बनाकर अपने अधीन करने का प्रयत्न क्यों न करें। और आज के दिन सब विवादों का अन्त करने के लिए यह पर्याप्त होना चाहिए; क्योंकि निस्सन्देह आज संसार में जो लगभग हर प्रश्न उठाया जा रहा है, वह इसी पर निर्भर है। पोपवादी चाहते हैं कि उनकी अपनी गढ़ी हुई बातें दैववाणी के समान मानी जाएँ, और वे कलीसिया होने का दावा करते हैं; परन्तु हम, इसके विपरीत, कहते हैं कि सिद्ध ज्ञान केवल व्यवस्था में, नबियों में, और सुसमाचार में ही पाया जाता है।

तो यदि हम परमेश्वर के मुख की ओर ध्यान देते, तो हमारे बीच के सब विवादों को सुलझाना सरल होता। इससे यह भी निकलता है कि पोपवादी धोखा खाए हुए हैं, क्योंकि वे परमेश्वर के मुख से पूछने की कृपा नहीं करते, वरन् यह जाँचने के बजाय कि परमेश्वर को क्या भाता है, मनुष्यों के और अपने ही झूठों के दास बनना पसन्द करते हैं; क्योंकि उसने स्वयं बोला है, और छिपकर नहीं बोला, न सन्देहपूर्ण रीति से, न अस्पष्ट रीति से; क्योंकि उसकी शिक्षा से अधिक स्पष्ट कुछ नहीं है, यदि मनुष्य जान-बूझकर अन्धे न बन जाएँ। फिर वह आगे कहता है, — 95 सेप्टुआजिंट यह अनुवाद देता है, “क्योंकि वे अपने लिए व्यर्थ दर्शन गढ़ते हैं; वे अपने मन से बोलते हैं, और प्रभु के मुख से नहीं।” यद्यपि अर्थ दे दिया गया है, तौभी यह सही अनुवाद नहीं है। वुल्गेट और सीरियाई मूल के अधिक निकट रहते हैं, और पहले वाक्यांश का अनुवाद करते हैं “और वे तुम्हें धोखा देते हैं।” शब्दशः शब्द ये हैं, “तुम्हें मूर्ख बनानेवाले हैं वे।” पूरा पद इस प्रकार है, — 16. सेनाओं का यहोवा यों कहता है, उन नबियों के वचनों की ओर कान न लगाओ, जो तुम से भविष्यद्वाणी करते हैं; वे तुम्हें मूर्ख बनानेवाले हैं; वे अपने ही मन का दर्शन कहते हैं, और यहोवा के मुख से नहीं। अन्तिम पंक्ति का “और” कई प्रतियों में दिया गया है, और सेप्टुआजिंट तथा सीरियाई में भी है। ब्लेनी के समान “से” का अनुवाद “के अनुसार,” अर्थात् “मुख के अनुसार” इत्यादि करना कोई सुधार नहीं है। “प्रभु के मुख से” बोलना अत्यन्त प्रभावशाली है। सब अनुवाद “से” सम्बन्धसूचक को बनाए रखते हैं, और तर्गुम “मुख” के स्थान पर “वचन” देता है। — सं.

यिर्मयाह 23:17-18

17. जो लोग मेरा तिरस्कार करते हैं उनसे ये सदा कहते रहते हैं कि यहोवा ने कहा है, तुम्हारा कल्याण होगा; और जितने लोग अपने मन के हठ पर चलते हैं, उन सब से ये कहते हैं, तुम पर कोई विपत्ति न पड़ेगी।

17. Dicentes dicendo iis qui me contemnunt, Loquutus est Jehova, Pax erit vobis, et omnibus qui ambulant (cunctis ambulantibus; est quidem singularis numerus, ad verbum, cuique ambulanti) in pravitate cordis sui, dicunt, Non veniet super vos malum.

18. क्योंकि कौन यहोवा की गुप्त सभा में खड़ा होकर उसका वचन समझने और सुनने पाया है? किस ने उसके वचन पर ध्यान देकर उसे सुना है?

18. Nam quis stetit in consilio Jehovae? et vidit et audivit sermonem ejus? Quis attendit ad sermonem ejus et audivit?

यिर्मयाह एक और चिह्न प्रस्तुत करता है जिससे झूठे नबी सच्चे नबियों से भिन्न पहचाने जा सकते थे, — वे अभक्तों की और परमेश्वर का तिरस्कार करनेवाले दुष्टों की चापलूसी करते थे। इस प्रकार वह वही बात दोहराता है जो उसने पहले कही थी, कि वे दुष्टों के हाथों को दृढ़ करते थे, यहाँ तक कि वे अपनी अभक्ति में कठोर हो जाते थे, और पश्चाताप की सारी चिन्ता को एक ओर फेंक देते थे। यद्यपि वह भिन्न शब्दों का प्रयोग करता है, तौभी अर्थ वही है, कि वे परमेश्वर का तिरस्कार करनेवालों से शान्ति, या समृद्धि, की प्रतिज्ञा करते थे, क्योंकि शब्द {,}שלום शालूम का अर्थ है भली-भाँति या सुख से जीना।

तो वे उनसे कहते हैं जो मेरा तिरस्कार करते या मुझे ठुकराते हैं; क्योंकि {,}נאףनात्स का अर्थ दोनों है।

“कहने” के शब्द का दोहराया जाना भी बलपूर्ण है, {,}אמרים{ }אמורअमरीम अमूर: क्योंकि हम जानते हैं कि झूठे नबी कितने अहंकार और भरोसे के साथ अपने स्वप्नों की घोषणा करने का साहस करते थे; क्योंकि वे घमण्ड के आत्मा से चलाए जाते थे, इसलिए कि वे शैतान की सन्तान थे। तो यहीं से उनका वह भरोसा था, कि वे अपनी घोषणाएँ ऐसे करते थे मानो वे स्वर्ग से उतरी हों। तो वे कहते हुए कहते हैं; अर्थात्, वे प्रतिज्ञा करते हैं, और वह भी बड़ी ढिठाई से, कि परमेश्वर का तिरस्कार करनेवाले सब लोगों को शान्ति मिलेगी; और केवल इतना ही नहीं, वरन् वे परमेश्वर के नाम का बहाना करते थे, यहोवा ने कहा है। वे पवित्र आत्मा के साधन या कार्यकर्ता समझे जाना चाहते थे, जबकि, जैसा कहा जा चुका है, वे व्यर्थ ही अपनी कल्पनाओं की घोषणा कर रहे थे। और इसलिए यिर्मयाह ने, यद्यपि अनुचित रूप से, उन पर दर्शन शब्द लागू किया, वे अपने मन का दर्शन कहते हैं। इस शब्द का प्रयोग करके वह एक छूट देता है; क्योंकि वह केवल इतना कह सकता था कि वे निरी व्यर्थ बातें ही प्रस्तुत करते थे, अर्थात् वे झूठ जिन्हें उन्होंने स्वयं गढ़ा था, परन्तु वह शब्द {,}חזוןखेज़ून का उल्लेख करता है, जो अपने आप में बड़े महत्त्व का समझा जाना चाहिए। तौभी उसका अभिप्राय यह है कि जब वे दर्शनों की बकबक करते थे और भरोसे के साथ घोषणा करते थे कि वे आत्मा के प्रकाशन प्रस्तुत कर रहे हैं, तब वे नबियों की नकल करनेवाले बन्दर मात्र थे। तो वह उनके लिए, यद्यपि अनुचित रूप से, यह मान लेता है कि उन्होंने दर्शन देखे; परन्तु उन्होंने क्या देखा? यही कि यहोवा ने कहा है, तुम्हारा कल्याण होगा। 96 कुछ लोग, जैसे वेनेमा और ब्लेनी, सोचते हैं कि {{אמריםपिछले पद से सम्बन्ध रखता है; परन्तु यह इब्रानी मुहावरे के अनुकूल न होगा, जिसमें कृदन्त प्रायः भविष्यत् काल की क्रिया के पहले आता है, परन्तु कभी उसके बाद नहीं आता; और न किसी अनुवाद या तर्गुम से इसका समर्थन होता है। जैसे ये शब्द अभी हैं, वे सचमुच असामान्य हैं; सम्भावना यह है कि {}אמור को ,{}אמרו होना चाहिए, और सब अनुवाद इसे ऐसा ही देते हैं, “वे कहते हैं।” तब यह होगा, “कहते हुए वे कहते हैं;” जो झूठे नबियों के दुस्साहस और भरोसे को सूचित करता है; अर्थात्, “वे निडर होकर कहते हैं।” — सं.

97 इस वाक्यांश के विषय में प्राचीन अनुवादों में भिन्नता है; सेप्टुआजिंट और अरबी में यह पिछले भाग से जोड़ा गया है, “वे उनसे कहते हैं जो प्रभु के वचन को ठुकराते हैं,” इत्यादि, और ब्लेनी ने इसी व्यवस्था का अनुसरण किया है। वुल्गेट, सीरियाई, और तर्गुम इसे एक अलग वाक्यांश मानते हैं, और इसका अनुवाद यहाँ के समान करते हैं। इब्रानी निस्सन्देह दोनों रचनाओं की अनुमति देती है, परन्तु बोलनेवाला प्रभु प्रतीत होता है, और इसलिए दूसरी रचना को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, — 17. वे निडर होकर उनसे कहते हैं जो मेरा तिरस्कार करते हैं, यहोवा ने कहा है, “तुम्हारा कल्याण होगा;” और हर एक से जो अपने मन के निश्चयों पर चलता है, वे कहते हैं, “तुम पर विपत्ति न आएगी।” यह अनुवाद उस बात से भी अधिक मेल खाता है जो यिर्मयाह 23:25 में कही गई है, कि नबी परमेश्वर के नाम से झूठी भविष्यद्वाणी करते थे। — सं.

फिर वह कहता है, जो अपने मन की दुष्टता पर चलते हैं उनसे वे प्रतिज्ञा करते हैं कि उनके लिए सब बातें भली होंगी, तुम पर कोई विपत्ति न पड़ेगी; मानो उसने कहा हो, “वे सब दुष्टों से दण्ड से छूट जाने की प्रतिज्ञा करते हैं।”

जो पद इसके बाद आता है उसकी व्याख्या साधारणतः इस प्रकार की जाती है, कि यिर्मयाह झूठे शिक्षकों को उनकी लापरवाही के लिए दोषी ठहराता है, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के वचन पर ध्यान नहीं दिया, और व्यवस्था में जो कुछ लिखा था उसे कुछ भी न समझा। परन्तु मुझे लगता है कि व्याख्याकारों ने इस विचार में निश्चय ही बड़ी भूल की है; क्योंकि यिर्मयाह इस पूरे खण्ड में यह दिखाता है कि झूठे शिक्षक परमेश्वर के सच्चे और विश्वासयोग्य दासों का दुस्साहस से विरोध करने में कितनी उद्दण्डता और अहंकार से व्यवहार करते थे, कौन यहोवा की गुप्त सभा में खड़ा हुआ है? निस्सन्देह वे सच्चे नबियों के विषय में ताना मारते हुए यों कहते थे, “क्या! ये तुम्हें मरी, युद्ध, अकाल की सूचना देते हैं, मानो वे परमेश्वर के द्वारा स्वर्ग से भेजे गए स्वर्गदूत हों; क्या वे परमेश्वर की गुप्त सभा में खड़े हुए हैं?” इस प्रकार मैं इस पद को पिछले पद से जोड़ता हूँ, क्योंकि मुझे पूरा निश्चय है कि वह यहाँ उस अहंकार की ओर संकेत करता है जो झूठे शिक्षकों ने सच्चे शिक्षकों के प्रति प्रकट किया।

हमारे समय के उदाहरण इस खण्ड की स्पष्ट व्याख्या कर देते हैं। क्योंकि जब पोपवादी अपने आप को संकट की अन्तिम सीमा तक धकेला हुआ पाते हैं, जब शोर-गुल और झूठ से उनका कुछ बस नहीं चलता, तब वे इस प्रकार के बहाने की ओर दौड़ते हैं, “अरे! यदि हमें धर्म में हर बात का निर्णय व्यवस्था, नबियों, और सुसमाचार के द्वारा करना हो, तो क्या निश्चितता मिल सकती है? पवित्रशास्त्र मोम की नाक के समान है, क्योंकि उसे किसी भी ओर मोड़ा जा सकता है, और उससे निश्चय के साथ कोई अर्थ नहीं निकाला जा सकता; इस प्रकार यदि अधिकार केवल पवित्रशास्त्र का ही हो, तो सब बातें उलझी और सन्देहपूर्ण बनी रहेंगी।” तो हम देखते हैं कि आज के दिन सत्य के शत्रु, जब वे और किसी रीति से अपनी गन्दगी को ढाँप नहीं पाते, तब सब बातों को गड़बड़ी में डालने का, और परमेश्वर के वचन को बदनाम करने का, और ऐसा अन्धकार लाने का परिश्रम करते हैं कि उजला काले से अलग पहचाना न जा सके, कि ज्योति अन्धकार में मिल जाए।

झूठे शिक्षकों की हठीली दुष्टता भी इसी के समान थी। क्योंकि यिर्मयाह और उसके साथी, जब वे आगे आए, तो उन्होंने घोषणा की कि परमेश्वर का पलटा अब और टाला नहीं जा सकता, क्योंकि लोग उसे भड़काते ही रहे; और उन्होंने अपने आप को परमेश्वर के दूत और उसकी गुप्त युक्ति के साक्षी घोषित किया; परन्तु इन सिद्धान्तहीन मनुष्यों ने, इसलिए कि वे मनुष्यों के विवेक को सुला दें, वरन् सुन्न कर दें, कहा, “अरे! कौन यहोवा की गुप्त सभा में खड़ा हुआ है? किस ने सुना है? किस ने ध्यान दिया है? किस ने देखा है? ये सब बातें अनिश्चित हैं; और यद्यपि ये तुम्हें मरी, युद्ध, और अकाल की कड़ी धमकी देते हैं, तौभी कोई कारण नहीं कि तुम डरो। इसलिए निश्चिन्त रहो, और चैन से और आनन्द से सुख भोगो, क्योंकि वे परमेश्वर की युक्ति को नहीं समझते।” और इस अर्थ की पुष्टि हम शीघ्र ही उस बात से होती देखेंगे जो पद 22 में कही गई है, {,}ואםעמדו{ }בסודיवेइम ओमदू बेसूदी, “और यदि वे मेरी गुप्त सभा में खड़े होते।” तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि जिस बात का वे हठपूर्वक घमण्ड करते थे, उसी को वह उनके विरुद्ध मोड़ देता है। परन्तु अब आगे लिखा है, — 98 जो बात इस विचार के विरोध में प्रतीत होती है वह यह तथ्य है, कि ये झूठे नबी स्वयं ईश्वरीय प्रकाशन का दावा करते थे; वे अपने सन्देश की घोषणा ऐसे करते थे मानो वह परमेश्वर की ओर से आया हो। इसलिए ये प्रश्न उनके दावों का खण्डन करते प्रतीत होते हैं। वह मानो कहता है, “तुम में से कौन यहोवा की गुप्त सभा में रहा है?” ब्लेनी जो संशोधन प्रस्तावित करता है उनका सहारा लिए बिना भी पुनरुक्ति से बचा जा सकता है, — परन्तु (तुम में से) कौन यहोवा की गुप्त सभा में खड़ा हुआ है? और उसके कार्य को देखा और समझा है? किस ने उसके वचन पर कान लगाकर उसे सुना है? हम जानते हैं कि {{דברका अर्थ केवल वचन ही नहीं, वरन् वस्तु, विषय, कार्य, बात, कोई भी प्रस्तुत की गई या कल्पना की गई बात भी है। “देखना” क्रिया, जो दर्शन को सूचित करती है, यह प्रमाणित करती है कि यहाँ इसका अर्थ दूसरा है। फिर अन्तिम पंक्ति में इसका अर्थ सन्देश है, क्योंकि वह वही था जिस पर कान लगाया गया और जिसे सुना गया। परन्तु क्रिया ,{}שמע पहले वाक्यांश में देखने से मेल खाती है, और समझना वह अर्थ है जो इसका कभी-कभी होता है; और अन्तिम वाक्यांश में यह कान लगाने से मेल खाती है, जो सुनने से सम्बन्धित है। नबी एक दर्शन और एक सन्देश की ओर संकेत करता है, या उस कार्य की ओर जो किसी ऐसे व्यक्ति के सामने रखा जाता है जिसे उसके राजा के मन्त्रणा-कक्ष में प्रवेश मिला हो, (क्योंकि यही चित्रण है,) और उस सन्देश की ओर जो उसे दिया जाता है जिसे वह कार्य पूरा करने का भार सौंपा गया है। पवित्रशास्त्र में एक ही खण्ड में किसी शब्द का दो भिन्न अर्थों में प्रयोग करना कोई असामान्य बात नहीं है; परन्तु आसपास का प्रसंग विषय को स्पष्ट करने के लिए सदा पर्याप्त होता है। — सं.

यिर्मयाह 23:19

19. देखो, यहोवा की आँधी जलजलाहट के साथ निकल पड़ी है, हाँ, एक भयंकर आँधी; वह दुष्टों के सिर पर भयंकर रीति से गिरेगी।

19. Ecce turbo (vel, tempestas) Jehovae cum furore (vel, cum iracundia) egreditur, et turbo impendens super caput impiorum cadet (vel, turbo cadens cadet; est participium {,}מתחוללet postea est simplex verbum, sed eadem est radix utriusque.)

इस पर विचार मैं अगले व्याख्यान तक टाल दूँगा। कल कोई व्याख्यान न होगा, क्योंकि, जैसा तुम जानते हो, उपाधियाँ प्रदान करने का समारोह हमें व्यस्त रखेगा।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे, कि जब हम फँसानेवाली चापलूसियों के द्वारा बहक जाने की ओर सदा झुके रहते हैं, और इस प्रकार अपने लिए मृत्यु और अन्तिम विनाश ढूँढ़ते हैं, — तो हमें यह वरदान दे कि हम नबियों के द्वारा घोषित उन धमकियों से काँपना सीखें, जिनके द्वारा तू हम पर अपना क्रोध प्रकट करता है, जिससे हम सच्चे पश्चाताप के लिए जगाए जाएँ, और तेरी सहनशीलता के कारण बुराई में अपने आप को कठोर न करें, वरन् अपनी स्वर्गीय यात्रा में आगे बढ़ते रहें, जब तक कि अन्त में अपनी सब बुराइयों को उतारकर हम उस सिद्ध रूप में पुनःस्थापित न किए जाएँ जिसमें तेरा पवित्र स्वरूप पूर्ण रूप से चमकता है, हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा। —

आमीन।

अट्ठासीवाँ व्याख्यान

जो पद मैंने अपने पिछले व्याख्यान के अन्त में पढ़ा था उसे अब तुम्हारे सामने दोहराना आवश्यक है, देखो, यहोवा की आँधी (या बवण्डर)! वह जलजलाहट के साथ निकलेगी; हाँ, वह मँडराता हुआ बवण्डर! वह अभक्तों के सिर पर ठहरेगा, या गिरेगा; क्योंकि {,}יחול इखूल का अर्थ दोनों है। नबी अब झूठे शिक्षकों पर और भी अधिक प्रचण्डता से आक्रमण करता है, क्योंकि वे लगभग जड़बुद्धि हो गए थे। निश्चय ही कोई भी परमेश्वर का विरोध करने का इतना दुस्साहस नहीं दिखा सकता, सिवाय उस समय के जब वह शैतान के द्वारा पूरी रीति से अन्धा कर दिया गया हो। इसलिए हमारा नबी झूठे शिक्षकों से ऐसा व्यवहार करता है मानो वे उन्मादी हों या पूरी तरह जड़ हो गए हों: वह उनसे कहता है कि परमेश्वर बवण्डर के समान आएगा। चाहे हम इसका अनुवाद बवण्डर करें या आँधी, इसमें अधिक अन्तर नहीं है। और वह आगे कहता है कि वे बच नहीं सकते थे, क्योंकि परमेश्वर का क्रोध उन पर मँडरा रहा था, और अन्त में उन पर ठहर जाएगा।

अब, पवित्रशास्त्र में यह सामान्य बात है कि कपटियों से, और विशेषकर झूठे शिक्षकों से, बड़ी कठोरता के साथ व्यवहार किया जाए, क्योंकि शैतान उनमें भयानक मात्रा में राज्य करता है। और निस्सन्देह, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, जब तक कोई व्यक्ति भ्रमों से मोहित न हो जाए, वह परमेश्वर का विरोध करने का साहस नहीं कर सकता। तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि नबी इन अभक्त शिक्षकों के विरुद्ध गरजता है; क्योंकि लोगों को धोखा देने के लिए परमेश्वर के पवित्र नाम का बहाना करना उनके लिए खेल और तमाशे के सिवा और कुछ न था। इसके बाद वह आगे कहता है, —

99 यहाँ “आँधी,” या तूफ़ान, सबसे उपयुक्त है। यहोवा के बाद आनेवाला शब्द {,{חמה उसी से सम्बन्ध रखता प्रतीत होता है — “गर्म आँधी;” संकेत दक्षिण की झुलसानेवाली हवाओं की ओर है। देखिए यिर्मयाह 4:11, 12। इस पद का अनुवाद इस प्रकार किया जा सकता है, — देखो, यहोवा की झुलसानेवाली आँधी! वह निकलेगी, हाँ, एक गर्भवती आँधी; वह दुष्टों के सिर पर फट पड़ेगी। आँधी या तूफ़ान “झुलसानेवाला” होगा, और “गर्भवती” भी, अर्थात् प्रसव-पीड़ा में, जैसा इस शब्द का अर्थ है; और मानो प्रसव-पीड़ा में होकर वह “फट पड़ेगी,” या शब्दशः, दुष्टों के सिर पर जन्म देगी। यह क्रिया ,{}יחל से नहीं, वरन् ,{}חול से है, जिसका अर्थ केवल प्रसव-पीड़ा में होना ही नहीं, वरन् जन्म देना भी है। “वह आएगी,” यह सेप्टुआजिंट और वुल्गेट का पाठ है; हमारा अंग्रेज़ी अनुवाद तर्गुम का है। — सं.

यिर्मयाह 23:20

20. जब तक यहोवा अपना काम न कर चुके, और अपने मन की युक्तियों को पूरी न कर चुके, तब तक उसका क्रोध न लौटेगा; अन्त के दिनों में तुम इस बात को भली-भाँति समझोगे।

20. Non revertetur iracundia Jehovae usque dum fecerit, et usque dum stabilierit cogitationes cordis sui: in extremitate dierum intelligetis hoc intelligentia (hoc est, intelligetis hujus rei intelligentiam, ad verbum.)

वह उस बात की पुष्टि करता है जो उसने कही थी, ऐसा न हो कि जिन कपटियों से उसका काम पड़ा था, वे यह सोचें कि उनका दण्ड हल्का होगा और शीघ्र टल जाएगा। क्योंकि यद्यपि उन्होंने देखा होगा कि परमेश्वर का हाथ उनके विरुद्ध हथियारबन्द था, तौभी वे ढाढ़स बाँधते थे, क्योंकि वे आशा करते थे कि यह थोड़े ही समय के लिए होगा। इसलिए यिर्मयाह यहाँ उन्हें स्मरण दिलाता है कि यदि वे सोचते थे कि जो पलटा निकट था उसे वे बादल के समान छितरा सकते हैं, तो वे बड़े धोखे में थे; क्योंकि परमेश्वर उन्हें दण्ड देना तब तक न छोड़ेगा जब तक वह उन्हें नष्ट न कर दे।

एक और निश्चिन्तता थी जिसने अभक्तों को धोखा दिया: वे नबी की धमकियों से भयभीत नहीं होते थे, क्योंकि वे सोचते थे कि जब कभी परमेश्वर विनाश की घोषणा करता है, तब वह मानो उनके साथ खिलवाड़ कर रहा होता है। और निस्सन्देह, दुष्ट लोग इतनी निश्चिन्तता से अपने आप को भोग-विलास में न छोड़ सकते, यदि वे यह विश्वास न करते कि परमेश्वर का वचन पूरा न होगा। तो जब परमेश्वर की धमकियों ने कपटियों को भय से न मारा, तब नबी यहाँ घोषणा करता है कि उनके पास यह व्यर्थ आशा पालने का कोई कारण न था कि परमेश्वर केवल शब्द बोलता है, और उसके पलटे का कोई निष्पादन न होगा।

वह कहता है, यहोवा का क्रोध तब तक न लौटेगा जब तक वह अपने मन की युक्तियों को पूरा और स्थिर न कर चुके। यिर्मयाह दिखाता है कि परमेश्वर ने अपने दासों के द्वारा व्यर्थ नहीं बोला था, जैसा मनुष्य करते हैं, जो प्रायः बिना सोचे बोलते हैं, क्योंकि उनकी जीभ बहुधा उनके अभिप्राय से आगे दौड़ जाती है। परन्तु वह उन्हें यहाँ स्मरण दिलाता है कि परमेश्वर मनुष्यों से बहुत भिन्न है, क्योंकि वह सदा गम्भीरता से बोलता है, और उसका भविष्यद्वाणी का वचन उसकी गुप्त युक्ति का निश्चित प्रमाण है, जैसा शीघ्र ही फिर घोषित किया जाएगा। यही कारण है कि वह उसके मन की युक्तियों का उल्लेख करता है।

तौभी हमें यह न सोचना चाहिए कि परमेश्वर हमारे समान है, मानो वह इस बात पर और उस बात पर विचार करता हो, और बहुत सी योजनाएँ बनाता हो, जबकि कभी एक बात और कभी दूसरी बात उसके मन में आती हो; नहीं, ऐसा स्थूल विचार मन में नहीं रखा जा सकता, और परमेश्वर के स्वभाव से मेल नहीं खा सकता।

परन्तु यिर्मयाह एक प्रकार के रूपक के द्वारा परमेश्वर की युक्ति को उसकी युक्तियाँ (विचार) कहता है, अर्थात् वह स्थिर और अपरिवर्तनीय युक्ति, जिसे उसने अपने नबियों के द्वारा घोषित किया। कभी-कभी, निश्चय ही, परमेश्वर ने मनुष्यों को पश्चाताप की ओर लौटा लाने के लिए धमकी दी; परन्तु हमें स्मरण रखना चाहिए कि वह न तो स्वयं बदलता है और न अपना अभिप्राय बदलता है। तो जो कुछ नबियों ने उसके नाम से घोषित किया, वह उसकी गुप्त युक्ति से निकला, और यह वैसा ही था मानो उसने अपना मन हम पर प्रकट कर दिया हो। और भविष्यद्वाणी की शिक्षा के लिए यह कोई छोटी प्रशंसा नहीं कि परमेश्वर ने मानो अपने मन को अपने मुख से जोड़ दिया।

परमेश्वर का मुख स्वयं शिक्षा है; और अब वह कहता है कि वह उसके मन की गहराई से निकली थी। इससे यह निकलता है कि परमेश्वर के वचन में, जैसा वे कहते हैं, कुछ भी व्यर्थ (छलपूर्ण) नहीं है; क्योंकि वह यहाँ घोषित करता है कि जो कुछ उसने अपने दासों को सौंपा था वे उसके मन की युक्तियाँ थीं। और पुष्टि करना, या स्थिर करना, उसकी युक्तियों के निष्पादन पर लागू किया जाना चाहिए।

पूरी बात का सार यह है, कि परमेश्वर अब लोगों के विरुद्ध ऐसा दण्डादेश सुनाता है जो पलटा नहीं जा सकता था; क्योंकि उसने एक ही बार सदा के लिए उन मनुष्यों को नष्ट करने की आज्ञा ठहरा दी थी जो अपने पापों में हठीले बने रहे।

परन्तु वह शब्द {,}יחולइखूल की ओर संकेत करता प्रतीत होता है, जिसका अर्थ, जैसा मैं कह चुका हूँ, गिरना है, और ठहरना या ऊपर पड़े रहना भी है। इस अर्थ के अनुसार, वह अब कहता है कि परमेश्वर का क्रोध अपना मार्ग बदलने के लिए न लौटेगा, जब तक कि वह उस बात को पूरा न कर ले जो पहले से ठहराई जा चुकी थी, अर्थात् वह जो परमेश्वर ने लोगों के विनाश के विषय में निश्चय किया था।

फिर वह आगे कहता है, दिनों की अन्तिम सीमा पर तुम इस बात का ज्ञान समझोगे। शब्दशः यही है; परन्तु हम इसका एक सरल अनुवाद दे सकते हैं, “तुम इस विषय का ज्ञान प्राप्त करोगे,” या “तुम जानोगे कि इसका अर्थ क्या है।” निस्सन्देह नबी उन लोगों की संवेदनहीनता पर विजय-भाव से व्यंग्य करता है जो ऐसी भयानक चेतावनियों से भी हिलाए नहीं जा सकते थे। हम जानते हैं कि अभक्तों की कठोरता कितनी बड़ी है, विशेषकर जब शैतान उनके मनों और हृदयों पर अधिकार कर लेता है। निश्चय ही कोई लोहा और कोई पत्थर ऐसा नहीं जिसमें उतनी कठोरता हो जितनी हठीले दुष्टों में होती है; और वे मानो बड़ी से बड़ी हठधर्मिता से परमेश्वर पर आक्रमण करते हैं, मानो वे विजयी हों, क्योंकि वे उसकी सब चेतावनियों और धमकियों का तिरस्कार करते हैं। इसलिए नबी उनकी उद्दण्डता का, वरन् उनके पागलपन का, उपहास करता है, और कहता है, “तुम समझोगे,” परन्तु बहुत देर से; क्योंकि दिनों की अन्तिम सीमा से उसका अभिप्राय उस समय से है जिसे परमेश्वर ने अपने क्रोध के लिए ठहराया था। तौभी परमेश्वर ने उन्हें उचित समय पर चेतावनी दे दी थी कि उसका न्याय आने से पहले वे पश्चाताप करें। तो अब यह वैसा ही था मानो उसने उन्हें उनकी अपनी जड़ता में छोड़ दिया हो, और कहा हो कि वे अपने हठ के द्वारा परमेश्वर के हाथ से बच नहीं सकते, जैसा पौलुस कहता है, “यदि कोई न जाने, तो न जाने।” (1 कुरिन्थियों 14:38।)

निस्सन्देह वह उन लोगों के अहंकार को रोकता है जिन्होंने हर खरी शिक्षा और सब उचित परामर्शों को ठुकरा दिया।

तो इस प्रकार नबी हमें यहाँ सिखाता है कि कपटी परमेश्वर के विरोध में अपनी हठधर्मिता और अहंकार को खड़ा करके कुछ नहीं पाते, क्योंकि वे जान लेंगे, यद्यपि बहुत देर से, कि परमेश्वर ने व्यर्थ नहीं बोला। तो हम देखते हैं कि दिनों की अन्तिम सीमा से वह समय समझा जाना चाहिए जब द्वार बन्द कर दिया जाएगा, क्योंकि जब परमेश्वर ने उन्हें अपने पास बुलाया, और उनके सामने उद्धार की आशा रखी, तब उन्होंने उचित समय पर उसे उत्तर नहीं दिया।

100 शब्दशः, “दिनों के पिछले भाग में,” अर्थात् किसी आनेवाले समय में, किसी विशेष अवधि को निर्दिष्ट किए बिना; यह “आगे चलकर” के समान है। जो शब्द इसके बाद आते हैं उनका अनुवाद हमारी भाषा में शब्दशः कठिनाई से किया जा सकता है — “तुम उसे विवेक से परखोगे।” “उसे” का पूर्ववर्ती क्या है, जो {,{ה, एक स्त्रीलिंग है? वेनेमा कहता है कि इसे नपुंसकलिंग के रूप में लेना चाहिए; परन्तु यदि ऐसा है, तो यह किस ओर संकेत करता है? मुझे प्रतीत होता है कि इस खण्ड में ऐसा कुछ नहीं जिसकी ओर इसका संकेत माना जा सके, सिवाय पिछले पद की “आँधी” के, जो स्त्रीलिंग है; वे किसी आनेवाले समय में उस आँधी का अर्थ समझेंगे, कि वह प्रभु की ओर से उनके पापों के दण्ड के रूप में थी। यह बात वे उस समय नहीं समझते थे। ये दोनों पद लगभग इन्हीं शब्दों में यिर्मयाह 30 के अन्त (30:23, 24) में पाए जाते हैं: वहाँ अन्तिम शब्द छोड़ दिया गया है, — “दिनों के पिछले भाग में तुम उसे परखोगे,” या उसे समझोगे, या उस पर विचार करोगे। यहाँ वुल्गेट का पाठ है, “अन्तिम दिनों में तुम उसकी युक्ति समझोगे;” सेप्टुआजिंट का, “दिनों के अन्त में तुम उसे समझोगे;” और तर्गुम का, “दिनों के अन्त में तुम समझ के द्वारा इसे समझोगे।”

यहाँ हमें एक और सत्य भी सिखाया गया है, कि जब तक परमेश्वर मिल सकता है तब तक हम उसे ढूँढ़ें, और जब तक वह निकट है तब तक उसे पुकारें। (यशायाह 55:6।) क्योंकि यदि हम उसकी सहनशीलता का दुरुपयोग करें और आज हमसे बोलनेवाले का तिरस्कार करें, तो हम बहुत देर से, और अत्यन्त गहरे शोक के बिना नहीं, यह जान लेंगे कि हमें शैतान ने धोखा दिया है, क्योंकि हमने अपने बुलानेवाले परमेश्वर की ओर ध्यान नहीं दिया। आगे लिखा है, —

यिर्मयाह 23:21

21. ये नबी बिना मेरे भेजे दौड़ जाते थे; मैं ने उनसे कुछ न कहा, तौभी वे भविष्यद्वाणी करने लगते थे।

21. Non misi prophetas, et ipsi concurrerunt; non loquutus sum ad eos, et ipsi prophetarunt.

नबी फिर से यहूदियों को चेतावनी देता है कि वे झूठे शिक्षकों की चापलूसियों से भ्रष्ट न हों, और परमेश्वर की धमकियों की उपेक्षा न करें। हम पहले ही कह चुके हैं कि उस समय लोगों के मन झूठे शिक्षकों के द्वारा सुला दिए गए थे, जो उनसे दण्ड से छूट जाने की प्रतिज्ञा करते थे। और इससे बुरी कोई बुराई नहीं जब झूठे शिक्षक परमेश्वर के नाम से हमारी चापलूसी करते हैं, और हमारे प्राणों के लिए सारे भय और चिन्ता को दूर भगा देते हैं। यह बुराई प्राचीन प्रजा में फैली हुई थी, जैसी आज के दिन भी है। निश्चय ही संसार का अधिकांश भाग सदा चापलूसों को ढूँढ़ता रहा है, और जब परमेश्वर देखता है कि मनुष्य इस प्रकार अपने आप को भोग में छोड़ देते हैं, और मानो अपने लिए फन्दे ढूँढ़ते हैं, तब वह शैतान और उसके सेवकों की लगाम ढीली कर देता है, कि वे उन अभागे मनुष्यों को धोखा दें जो इस प्रकार जान-बूझकर धोखा खाना चाहते हैं। तो यिर्मयाह का उद्देश्य लोगों को बार-बार स्मरण दिलाना था कि सब चापलूसियाँ शैतान की चालों के सिवा और कुछ नहीं, या कोई घातक विष है जो उनकी सब इन्द्रियों को सुन्न कर देता है। क्योंकि जब कोई किसी व्यक्ति को ऐसा विष देता है जो शरीर की इन्द्रियों और मन की शक्तियों को बुझा देता है, तो उस अभागे का, जिसे इस प्रकार नशीली वस्तु दी गई हो, सब कुछ समाप्त हो जाता है। हम झूठे शिक्षकों के द्वारा भी ऐसा ही काम होते देखते हैं, जो अभागे पापियों को सान्त्वना देते और उनसे शान्ति की प्रतिज्ञा करते हैं, जैसा हमने अपने पिछले व्याख्यान में देखा। तो जब मनुष्यों को इस जड़ता से जगाना कठिन था, जो मानो उनमें जन्मजात हो गई थी, और जब शैतान सदा वही षड्यन्त्र काम में लाता है, तब पवित्र नबी के लिए आवश्यक था कि वह अपनी शिक्षा पर अधिकाधिक ज़ोर दे।

परमेश्वर अब कहता है कि उसने नबियों को नहीं भेजा, तौभी वे दौड़ गए। क्योंकि यिर्मयाह के विरुद्ध यह आपत्ति पर्याप्त प्रतीत हो सकती थी, — कि वह अकेला था, और दूसरे नबी संख्या में बहुत थे। निश्चय ही सामान्य बुद्धि का यह आदेश है कि हमें एक की अपेक्षा सौ व्यक्तियों का विश्वास करना चाहिए। तो यिर्मयाह अकेला था, और झूठे नबियों की बड़ी संख्या थी; और नबी का नाम उन सब में समान था। इसलिए इस आपत्ति का सामना करना आवश्यक था, जो परमेश्वर के विश्वासयोग्य दास को तुच्छ ठहराने के योग्य थी। इसलिए वह उन झूठे शिक्षकों के, जिनसे वह संघर्ष कर रहा था, और अपने बीच के अन्तर का उल्लेख करता है, मानो उसने कहा हो, “मैं सचमुच अकेला हूँ, परन्तु परमेश्वर का भेजा हुआ हूँ; और मुझे अपनी वैध बुलाहट का पूरा निश्चय है, और मैं यह प्रमाणित करने के लिए भी तैयार हूँ कि मैं अपने मस्तिष्क की कोई गढ़ी हुई बात नहीं लाता; इसलिए एक मनुष्य की एक बड़ी भीड़ से की गई झूठी तुलना तुम्हें धोखा न दे। क्योंकि यहाँ प्रश्न मनुष्यों का या उनके अधिकार का नहीं है, वरन् हमें यह पूछना चाहिए कि उन्हें कौन भेजता है? यदि परमेश्वर मेरे भेजे जाने का कर्ता है, तो मैं, अकेला होकर भी, सारे संसार से श्रेष्ठ हूँ; और यदि वे परमेश्वर के द्वारा बुलाए नहीं गए, तो चाहे वे जितने हैं उससे सौ गुना अधिक भी होते, तौभी वे जिस किसी बात का घमण्ड करते हैं उसका कोई अर्थ नहीं, क्योंकि हमें केवल परमेश्वर पर ही विश्वास करना चाहिए।” अब हम नबी का यह अभिप्राय देखते हैं जब वह कहता है कि नबी दौड़े, परन्तु भेजे नहीं गए थे, कि उन्होंने भविष्यद्वाणी की, परन्तु परमेश्वर से कोई आज्ञा नहीं पाई थी।

अब यह खण्ड विशेष रूप से हमें सिखाता है कि कोई भी सुने जाने के योग्य नहीं, जब तक कि वह परमेश्वर का सच्चा सेवक न हो। परन्तु किसी व्यक्ति को ऐसा प्रमाणित करने के लिए दो बातें आवश्यक हैं — ईश्वरीय बुलाहट, और विश्वासयोग्यता तथा खराई। तो जो कोई अपने आप को घुसा देता है, चाहे वह नबी के नाम का कितना ही बहाना करे, उसे निश्चिन्त होकर ठुकराया जा सकता है, क्योंकि सुने जाने का अधिकार परमेश्वर केवल अपने लिए ही माँगता है। तौभी एक सादी और निरी बुलाहट पर्याप्त नहीं है; वरन् जो बुलाया गया है उसे अपने परमेश्वर के लिए विश्वासयोग्यता से परिश्रम भी करना चाहिए; और ये दोनों बातें यहाँ सूचित की गई हैं, क्योंकि वह कहता है कि नबी दौड़े, यद्यपि वे भेजे नहीं गए थे, और कि उन्होंने भविष्यद्वाणी की, यद्यपि उनके पास परमेश्वर की कोई आज्ञा न थी। मैं निश्चय ही मानता हूँ कि यहाँ, इब्रानी में सामान्य प्रयोग के अनुसार, वही बात भिन्न शब्दों में दोहराई गई है; तौभी दूसरे वाक्यांश में अधिक प्रबल अभिव्यक्ति पाई जाती है, क्योंकि भेजना ठीक-ठीक बुलाहट से सम्बन्ध रखता है, और आज्ञा देना पद के निर्वाह से। क्योंकि परमेश्वर ने पहले अपने नबियों को चुना, और उन्हें सिखाने का पद सौंपा, और फिर उसने उन्हें आज्ञा दी कि क्या कहना है, और मानो उन्हें अपना सन्देश लिखवाया, ताकि वे अपनी गढ़ी हुई कोई बात प्रस्तुत न करें, वरन् केवल उसके दूत हों, जैसा अन्यत्र प्रकट हो चुका है।

इससे हम यह भी सीखते हैं कि हमारे कान उन धोखेबाज़ों के लिए खुले न हों, जो निडर होकर परमेश्वर के नाम का बहाना करते हैं, वरन् हमें सच्चे और झूठे शिक्षकों में भेद करना चाहिए; क्योंकि यिर्मयाह यहाँ थोड़े से मनुष्यों से नहीं बोलता, वरन् वह सारी प्रजा को सम्बोधित करता है। और वह यह दिखाना चाहता था कि जो लोग खरी शिक्षा की ओर ध्यान नहीं देते थे, वे अज्ञानता के बहाने से बच निकलने का व्यर्थ प्रयत्न करते थे; क्योंकि यदि वे जान-बूझकर परमेश्वर और उसके वचन की उपेक्षा न करते, तो वे जान सकते थे कि किसका विश्वास करें।

इससे यह निकलता है कि वह बहाना निरर्थक है जिसे आज के दिन बहुत से लोग मानो अपना पवित्र शरणस्थान समझते हैं; क्योंकि वे अपने पक्ष में यह दलील देते हैं कि उन्हें झूठे शिक्षकों ने धोखा दिया है। परन्तु हमें देखना और जाँचना चाहिए कि क्या परमेश्वर ने उन्हें भेजा है, और क्या वे उसकी पाठशाला से आए हुओं के समान सिखाते हैं, और क्या वे उसके सिवा कुछ और लाते हैं जो उन्होंने उसके मुख से पाया है।

मैं यहाँ परमेश्वर की बुलाहट के विषय में विस्तार से नहीं बोलूँगा; परन्तु यदि कोई बहुत छोटी परिभाषा चाहे, तो वह यह ले: बुलाहट दो प्रकार की होती है; एक आन्तरिक है और दूसरी व्यवस्था से सम्बन्ध रखती है, और इसलिए उसे बाहरी या कलीसियाई कहा जा सकता है।

परन्तु बाहरी बुलाहट कभी वैध नहीं होती, जब तक कि उसके पहले आन्तरिक बुलाहट न हो; क्योंकि नबियों, या प्रेरितों, या पास्टरों को बनाना हमारा काम नहीं, क्योंकि यह पवित्र आत्मा का विशेष कार्य है। तो चाहे किसी को मनुष्यों ने सौ बार बुलाया और चुना हो, तौभी वह वैध सेवक नहीं समझा जा सकता, जब तक कि वह परमेश्वर के द्वारा बुलाया न गया हो; क्योंकि नबी के, प्रेरित के, और पास्टर के पद के लिए विशेष वरदान आवश्यक हैं, जो मनुष्यों की सामर्थ्य में या उनकी इच्छा पर निर्भर नहीं हैं। इससे हम देखते हैं कि किसी के नबी, या प्रेरित, या पास्टर बनने के लिए परमेश्वर की गुप्त बुलाहट सदा आवश्यक है। परन्तु दूसरी बुलाहट व्यवस्था से सम्बन्ध रखती है; क्योंकि परमेश्वर चाहता है कि हमारे द्वारा सब बातें व्यवस्थित रूप से और बिना गड़बड़ी के की जाएँ। (1 कुरिन्थियों 14:40।) इसी से चुनाव करने की रीति निकली है। परन्तु प्रायः ऐसा होता है कि परमेश्वर की बुलाहट पर्याप्त होती है, विशेषकर कुछ समय के लिए। क्योंकि जब कोई कलीसिया नहीं होती, तब उस बुराई का कोई उपाय नहीं, सिवाय इसके कि परमेश्वर असाधारण शिक्षकों को खड़ा करे। तो सामान्य बुलाहट, जिसकी चर्चा हम अभी कर रहे हैं, सुव्यवस्थित दशा पर निर्भर है। जहाँ कहीं परमेश्वर की कलीसिया है, उसके अपने नियम हैं, उसकी अनुशासन की एक निश्चित रीति है: वहाँ किसी को भी अपने आप को नबी या पास्टर के पद का निर्वाह करने के लिए घुसाना न चाहिए, चाहे वह पवित्रता में सब स्वर्गदूतों के बराबर ही क्यों न हो। परन्तु जब कोई कलीसिया नहीं होती, तब परमेश्वर असामान्य रीति से शिक्षकों को खड़ा करता है, जो मनुष्यों के द्वारा चुने नहीं जाते; क्योंकि जहाँ कोई कलीसिया स्थापित नहीं हुई, वहाँ ऐसा काम नहीं किया जा सकता।

101 यहाँ क्रम नबियों की सामान्य शैली के अनुसार है; सबसे प्रत्यक्ष कार्य का उल्लेख पहले किया गया है — नबी बिना भेजे दौड़े; फिर पहले के कार्य की ओर संकेत किया गया है, — परमेश्वर ने उनसे कभी बात नहीं की, तौभी उन्होंने भविष्यद्वाणी की। वे ऐसे दौड़े मानो परमेश्वर ने उन्हें कुछ बताया हो; परन्तु परमेश्वर ने न तो उनसे बात की और न उन्हें भेजा। उनके पास परमेश्वर की ओर से न कोई भेजा जाना था और न कोई सन्देश। अगले पद में, अब भी पवित्रशास्त्र की शैली के अनुरूप, क्रम उलट दिया गया है। सन्देश की ओर पहले संकेत किया गया है, और फिर भेजे जाने की ओर। उनके पास कोई सन्देश न था, क्योंकि वे परमेश्वर की गुप्त सभा में कभी “खड़े” या उपस्थित नहीं हुए थे; और फिर वे लोगों को उनकी बुरी चाल से फेरने के उद्देश्य से आगे नहीं गए। — सं.

यह विषय निश्चय ही कहीं अधिक विस्तार से विचार किए जाने योग्य है; परन्तु क्योंकि मेरी आदत विशेष बातों की ओर भटक जाने की नहीं है, इसलिए मेरे लिए इतना कहना पर्याप्त है जितना वर्तमान खण्ड चाहता है, जो यह प्रतीत होता है, — कि कलीसिया में किसी को भी परमेश्वर के दास और शिक्षक के रूप में स्वीकार न किया जाए, सिवाय उनके जो परमेश्वर के द्वारा भेजे गए हैं, और जिनकी ओर उसने मानो अपना हाथ बढ़ाकर उन्हें अपना कार्यभार सौंपा है। परन्तु क्योंकि परमेश्वर की आन्तरिक बुलाहट को हम निश्चय के साथ नहीं जान सकते, इसलिए हमें देखना और जाँचना चाहिए कि जो बोलता है वह पवित्र आत्मा का अंग या साधन है या नहीं। क्योंकि जो कोई अपनी कल्पनाएँ और युक्तियाँ प्रस्तुत करता है, वह ध्यान दिए जाने के योग्य नहीं। इसलिए जो बोलता है वह वास्तव में दिखाए कि वह परमेश्वर का राजदूत है; परन्तु वह यह कैसे दिखा सकता है? स्वयं परमेश्वर के मुख से बोलने के द्वारा; अर्थात्, वह अपनी ओर से कुछ न लाए, वरन् जो कुछ उसने परमेश्वर से पाया है उसे मानो हाथों-हाथ विश्वासयोग्यता से सौंप दे। परन्तु क्योंकि इस विषय में अब भी कुछ उलझन हो सकती थी, इसलिए आगे लिखा है —

यिर्मयाह 23:22

22. परन्तु यदि ये मेरी गुप्त सभा में खड़े होते, और मेरी प्रजा को मेरे वचन सुनाते, तो वे उन्हें उनकी बुरी चाल से और उनके बुरे कामों से फेर देते।

22. Quod si stetissent in concilio meo, certe (copula enim ita resolvi debet) udire fecissent verba mea populum meum (hoc est, docuissent populum meum sermones meos) et reduxissent eos a via sua mala, et a malitia studiorum ipsorum.

यह पद मानो पहले पद की व्याख्या है; क्योंकि यदि उनसे केवल इतना ही कहा जाता कि योग्य और वैध शिक्षक कोई नहीं हैं सिवाय उनके जो भेजे गए हैं और जिन्हें वह सौंपा गया है जिसकी आज्ञा परमेश्वर ने दी थी, तो बहुत से लोग उलझन में पड़ सकते थे। इसलिए भविष्यद्वक्ता यहाँ हमारा ध्यान उस सत्य की ओर दिलाता है जो निश्चित और प्रकट है; क्योंकि परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था में सम्पूर्ण सत्य का सार सौंप दिया था। अतः जब बुद्धि की परिपूर्णता व्यवस्था में पाई जाती थी, जिससे भविष्यद्वक्ताओं ने वह सब कुछ लिया जो हम उनके लेखों में पढ़ते हैं, तो इस प्रकार के कोई बहाने स्वीकार नहीं किए जा सकते थे, — “हम कैसे जान सकते हैं कि भविष्यद्वक्ता परमेश्वर के मुख से बोलते हैं, कि वे अपनी गढ़ी हुई कोई बात नहीं लाते, कि उनके पास वे निर्देश हैं जिन्हें परमेश्वर स्वीकार करता है?”

अतः भविष्यद्वक्ता यहूदियों का ध्यान व्यवस्था की ओर दिलाता है, मानो उसने वैसा ही कहा हो जैसा मूसा ने कहा था, “बादलों के ऊपर चढ़ने, या गहिराइयों में उतरने, या समुद्र के पार दौड़ने की कोई आवश्यकता नहीं; क्योंकि व्यवस्था और वचन तेरे निकट, तेरे मुँह में है, अर्थात् जो कुछ जानना आवश्यक और लाभदायक है, वह सब परमेश्वर ने तुम्हारे सामने रख दिया है।” (व्यवस्थाविवरण 30:12-14; रोमियों 10:6।)

अतः यह तुम पर पूरी रीति से प्रगट किया गया है, और यदि तुम व्यवस्था पर ध्यान दो, तो किसी भी आवश्यक बात का ज्ञान तुम्हारे लिए धुँधला न रहेगा। इसलिए तुम्हारी भूल का कारण केवल तुम्हारा आलस्य ही नहीं, वरन् तुम्हारी हठीली टेढ़ाई भी है; क्योंकि तुम जान-बूझकर व्यवस्था की उपेक्षा करते हो, और सन्देह में पड़े रहकर पूछते हो, “मार्ग कौन सा है?” मूसा ने कहा, “मार्ग यही है, इसी पर चलो।” (व्यवस्थाविवरण 5:33।)

अब हम समझते हैं कि यिर्मयाह का अभिप्राय क्या था: उसने पहले कहा था कि किसी की बात पर ध्यान न दिया जाए, सिवाय उनके जो भेजे गए थे और परमेश्वर के मुख से बोलते थे; परन्तु अब वह स्पष्ट करता है कि उसका अर्थ क्या था, अर्थात् यह कि व्यवस्था में बुद्धि का सम्पूर्ण सार समाया हुआ था। परन्तु जैसे उसने पहले झूठे भविष्यद्वक्ताओं को परमेश्वर के सच्चे और विश्वासयोग्य दासों का ढिठाई से उपहास करते हुए प्रस्तुत किया था, जो उन पर आपत्ति करके कहते थे, “परमेश्वर की सभा में कौन खड़ा हुआ था? ये लोग समझते हैं कि वे बादलों से उतर आए हैं, ये भयानक धमकियों से तुम्हें डराते हैं, मानो वे स्वर्ग से आए दूत हों,” — इसलिए, जब झूठे भविष्यद्वक्ता परमेश्वर के दासों के विषय में इस प्रकार तिरस्कार से बोलने के अभ्यस्त थे, और यह दावा करते थे कि वे परमेश्वर की सभा में खड़े नहीं हुए, तो अब यिर्मयाह उन्हीं पर पलटकर वार करता है, और परमेश्वर के नाम से बोलते हुए कहता है, यदि वे मेरी सभा में खड़े होते, तो निःसन्देह वे मेरी व्यवस्था से बोलते; मानो उसने कहा हो, “वे मेरे दासों की प्रतीति नहीं करते, क्योंकि वे मनुष्य हैं, स्वर्गदूत नहीं; इसलिए वे इनकार करते हैं कि वे मेरी सभा के हैं: इस प्रकार वे सारी प्रजा को उद्धार की शिक्षा को तुच्छ जानने के लिए उकसाते हैं। फिर भी कुछ भविष्यद्वक्ता हैं जिन्हें मैंने भेजा है: अब, यदि वे भेजे हुए माने जाना चाहते हैं, तो वे अपने आप को ऐसा प्रमाणित करें।” सच्चा प्रमाण क्या है?

यदि वे मेरी सभा में खड़े होते, तो निःसन्देह वे मेरी प्रजा को मेरा वचन सुनाते। वह वचन क्या है? इसकी परिभाषा आगे आती है, अर्थात् व्यवस्था का वचन, वे भटकती हुई प्रजा को उसकी बुरी चाल से फेर देते।

यह खण्ड अस्पष्ट प्रतीत हो सकता है, परन्तु प्रसंग से ही हम यह समझ सकते हैं कि भविष्यद्वक्ता का वास्तविक उद्देश्य झूठे शिक्षकों को दोषी ठहराना था, ताकि वे फिर परमेश्वर के नाम पर घमण्ड न करें, और झूठमूठ यह बहाना न करें कि उन्हें भविष्यद्वक्ता का पद प्राप्त है, और उस प्रतिष्ठा पर गर्व न करें। वह कहता है कि यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण था कि वे परमेश्वर के भविष्यद्वक्ता नहीं थे, क्योंकि जो कुछ उन्हें व्यवस्था से लेना चाहिए था, उसे वे विश्वासयोग्यता से नहीं सिखाते थे।

यह तो निश्चित है कि कोई भी परमेश्वर का मन्त्री नहीं रहा, जैसा पवित्रशास्त्र अनेक स्थानों में कहता है, जब उद्देश्य उन लोगों के अहंकार को रोकना होता है जो अपनी जिज्ञासा में परमेश्वर के गुप्त न्यायों की थाह लेने का प्रयत्न करते हैं, (यशायाह 40:13;) और पौलुस, परमेश्वर के अनन्त चुनाव के विषय में बोलते हुए, जो अगम्य है, पुकार उठता है, उसका मन्त्री कौन हुआ? (रोमियों 11:34।) वह कुरिन्थियों की पहली पत्री में भी ऐसी ही भाषा का प्रयोग करता है, (1 कुरिन्थियों 2:16:) और क्यों? इसलिए कि वह मानव-मन की उस ढिठाई को रोके जो उचित सीमा से आगे बढ़ने का साहस करती है। परन्तु बाद में पौलुस सुधार के रूप में जोड़ता है, “परन्तु हम में मसीह का मन है:” वह कैसे? क्योंकि उसने अपनी युक्ति हम पर प्रगट की है। अतः जब झूठे भविष्यद्वक्ताओं ने इनकार किया कि परमेश्वर के दास उसके मन्त्री हैं, तो वे उन्हें केवल नश्वर मनुष्य समझकर सचमुच ऐसा कह सकते थे; परन्तु उनका उद्देश्य परमेश्वर के वचन को बदनाम और व्यर्थ करना था; जिससे वे न केवल मनुष्यों पर, वरन् स्वयं परमेश्वर पर भी अंकुश लगाना चाहते थे। यह परमेश्वर का असहनीय अपमान था। 102 Sept. में पद के आरम्भ के “यदि” के अनुरूप कोई उपवाक्य नहीं है। Vulg. और Targ., हमारे अनुवाद के समान, “फेरने” को ऐसा उपवाक्य बनाते हैं, परन्तु विचित्र रीति से उसका अनुवाद उत्तम पुरुष एकवचन में करते हैं, “तब मैं उन्हें फेर देता,” इत्यादि। कैल्विन का अनुवाद सबसे उपयुक्त है, केवल ,{}אם के बाद आए {{ו का अनुवाद “निश्चय” के स्थान पर “तब” करना अधिक अच्छा होता, — परन्तु यदि वे मेरी सभा में खड़े होते, तो वे मेरी प्रजा को मेरे वचन सुनाते, और उन्हें उनकी बुरी चाल से, और उनके कामों की बुराई से फेर देते। ब्लेनी भी इस पद का अनुवाद इसी प्रकार करता है, और अनुरूप उपवाक्य को दूसरी पंक्ति से आरम्भ करता है। — सं.

इसके अतिरिक्त भविष्यद्वक्ता अब मानो उन्हीं पर पलटकर कहता है, “तो क्या संसार में परमेश्वर का कोई भविष्यद्वक्ता है ही नहीं!” परन्तु वह वचन अटल था कि कुछ भविष्यद्वक्ता सदा रहेंगे; और यहूदियों में से कोई भी यह इनकार करने का साहस नहीं कर सकता था कि मूसा ईश्वरीय प्रेरणा से बोलता था। अतः यह बात मान लेने पर, भविष्यद्वक्ता अब परोक्ष रूप से उन्हें डाँटता है, “परमेश्वर के भविष्यद्वक्ता कहाँ हैं?” और क्योंकि वे इस प्रतिष्ठा का दावा करते थे, वह कहता है, “निःसन्देह तुम परमेश्वर की सभा में खड़े नहीं हो। यह कैसे? क्योंकि परमेश्वर की युक्ति उसकी व्यवस्था में समाई हुई है; और क्योंकि तुम सच्चे धर्म की शिक्षा से हट गए हो, क्योंकि तुम्हें शिक्षा देने की कोई चिन्ता नहीं, क्योंकि तुम्हारी शिक्षा न तो मनुष्यों को परमेश्वर का भय सिखाती है, न पश्चाताप की ओर ले जाती है, इसलिए यह निष्कर्ष निकलता है कि तुम न तो परमेश्वर के मन्त्री हो, न उसके भविष्यद्वक्ता।” परन्तु यह बात और भी स्पष्ट हो, इसके लिए हमें स्मरण रखना चाहिए कि मूसा ने क्या कहा, कि परमेश्वर की अपनी गुप्त बातें हैं, परन्तु जो कुछ व्यवस्था में सिखाया गया है वह हमारा और हमारे बच्चों का है। (व्यवस्थाविवरण 29:29।) इसलिए परमेश्वर के सच्चे भविष्यद्वक्ताओं के विषय में खोज करना कठिन होने का कोई कारण नहीं; क्योंकि जो उसकी व्यवस्था के विश्वासयोग्य व्याख्याता हैं, वे निर्विवाद रूप से परमेश्वर के दूतों के समान सुने जाने के योग्य हैं; परन्तु जो हमें व्यवस्था से दूर ले जाते हैं, उन्हें दृढ़ता और साहस के साथ ठुकरा देना चाहिए।

परन्तु हमें उस परिभाषा को भी ध्यान में रखना चाहिए जो यह कहकर दी गई है कि उन्हें प्रजा को उसकी बुरी चाल से, और उसके कामों की बुराई से फेरना चाहिए था। हम जानते ही हैं कि सबसे बुरे मनुष्य भी ढिठाई से परमेश्वर का वचन प्रचार करने का दिखावा करते हैं, जैसा आज के दिन पोप के अनुयायी करते हैं: यद्यपि उन्होंने अपनी अधर्मी और उन्मत्त शिक्षाओं से सारे संसार को मतवाला कर दिया है, तौभी वे घमण्ड करते हैं कि वे परमेश्वर के दास हैं। इसलिए भविष्यद्वक्ता, परमेश्वर के वचन के विषय में सामान्य रूप से बोलने के बाद, एक विशेष भेद जोड़ता है, — कि परमेश्वर की शिक्षा वह है जो उन्नति करती है, जो सिखाती है और मनुष्यों को पश्चाताप और परमेश्वर के भय की ओर ले जाती है, जैसा पौलुस कहता है कि पवित्रशास्त्र इन्हीं उद्देश्यों के लिए लाभदायक है, (2 तीमुथियुस 3:16;) क्योंकि ऐसा कहकर उसका अभिप्राय पवित्रशास्त्र के सब झूठे व्याख्याताओं को दोषी ठहराना था, क्योंकि उस समय बहुत से ऐसे थे जो घमण्ड करते थे कि वे सबसे उत्तम शिक्षक हैं, जबकि वे केवल खुजलाते कानों को प्रसन्न करते थे। अतः जब बहुत से ऐसे थे जो उन्नति पर नहीं, वरन् दिखावे पर ध्यान देते थे, तो पौलुस कहता है कि पवित्रशास्त्र लाभदायक है; और इसलिए उसने उन सब व्याख्याओं को तिरस्कार के साथ ठुकरा दिया जिनमें कुछ भी लाभदायक न था। इसी प्रकार इस स्थान में भी भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि पवित्रशास्त्र का सही और वैध उपयोग तब होता है जब उसे मनुष्यों को उनकी बुरी चाल से लौटा लाने के लिए काम में लाया जाए।

यहाँ वास्तव में अंश के द्वारा सम्पूर्ण को व्यक्त करने का एक उदाहरण है: क्योंकि यदि हम मनुष्यों को केवल पश्चाताप करने के लिए समझाएँ, तो कोई बड़ा फल न होगा; और हमारी शिक्षा अधूरी रहेगी, क्योंकि विश्वास के बिना और परमेश्वर के नाम को पुकारे बिना पश्चाताप की शिक्षा निष्फल होगी। परन्तु भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय यहाँ खरी और लाभदायक शिक्षा के प्रत्येक अंग का उल्लेख करना नहीं था; उसने इतना ही पर्याप्त समझा कि उन झूठे शिक्षकों का खण्डन करे जो चाहते थे कि केवल उन्हीं की प्रतिष्ठा हो, जबकि उन्हें प्रजा की उन्नति की कोई चिन्ता न थी; क्योंकि वे सब बातों को अव्यवस्था में देखते थे, वे हर कहीं अपराधों को प्रबल होते देखते थे, वे परमेश्वर का भयानक तिरस्कार देखते थे, परन्तु इन बातों के प्रति वे पूर्णतः अन्धे थे। अतः इससे सहज ही यह निष्कर्ष निकाला जा सकता था कि उन्होंने न तो परमेश्वर के लिए विश्वासयोग्यता से परिश्रम किया, न कलीसिया की सुरक्षा के लिए कोई चिन्ता दिखाई; क्योंकि इस प्रकार उन्होंने उन अभागे प्राणों को धोखा दिया, जिनका विनाश वे निकट देख रहे थे। 103 उनकी “बुरी चाल” उनकी मूर्तिपूजा थी, और “उनके कामों की बुराई” उनका अन्याय और अनैतिक आचरण था। — सं.

अब हम भविष्यद्वक्ता का सम्पूर्ण उद्देश्य देखते हैं। परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि उसने बुरी चाल के साथ उनके कामों की बुराई इसलिए जोड़ी, कि वह उन लोगों की संवेदनहीनता को और भी पूरी रीति से प्रगट करे जो ऐसी विवशता के समय भी चुप और निष्क्रिय बने रहे। कभी-कभी संयमित डाँट की आवश्यकता होती है; परन्तु जब लोग दुष्टता में चरम स्वच्छन्दता अपना लेते हैं, जब हर कहीं दण्ड से छूट मिली रहती है, और जब ऐसी भ्रष्टताएँ सर्वत्र फैल जाती हैं कि कुछ भी निष्कलंक नहीं बचता, यदि तब शिक्षक की जीभ चुप और मानो बँधी रहे, तो क्या उसे उचित ही आलसी और गूँगा कुत्ता नहीं कहा जाएगा? और इस प्रकार भविष्यद्वक्ता उस संवेदनहीनता को और बढ़ाकर दिखाता है जिसके लिए वह झूठे शिक्षकों को दोषी ठहराता है; वे ऐसे चुप रहे मानो सब कुछ ठीक व्यवस्था में हो, जबकि उन्हें केवल सामान्य अपराध ही नहीं, वरन् सब प्रकार के अपराधों का विशाल ढेर देखना पड़ता था; क्योंकि प्रजा ने अपने आप को केवल एक ही प्रकार की दुष्टता के नहीं, वरन् सब प्रकार की दुष्टताओं के हवाले कर दिया था, और परमेश्वर तथा उसकी व्यवस्था को पूर्णतः तुच्छ जाना था। आगे लिखा है, —

यिर्मयाह 23:23-24

23 यहोवा की यह वाणी है, क्या मैं ऐसा परमेश्वर हूँ जो निकट ही का है, और दूर का परमेश्वर नहीं?

23. An Deus e propinquo, dicit Jehova? Et non Deus e longinquo?

24. फिर यहोवा की यह वाणी है, क्या कोई ऐसे गुप्त स्थानों में छिप सकता है कि मैं उसे न देख सकूँ?

यहोवा की यह वाणी है, क्या स्वर्ग और पृथ्वी दोनों मुझ से परिपूर्ण नहीं हैं?

24. An absonderit vir in latebris et ego non videbo eum, dicit Jehova? An non coelos et terram impleo, dicit Jehova?

यहाँ वह विशेष रूप से कपटियों के आत्म-धोखों को झाड़ देता है; क्योंकि वे अपनी बुराइयों में सुन्न पड़े थे, क्योंकि वे सोचते थे कि वे किसी प्रकार परमेश्वर की आँखों को अन्धा कर सकते हैं। निःसन्देह वे ऐसा कहते नहीं थे; परन्तु मनुष्यों की लापरवाह निश्चिन्तता कभी इतनी बड़ी न होती जितनी वह है, यदि वे यह विश्वास करते कि परमेश्वर से कुछ भी छिपा नहीं, वरन् वह हृदय के भीतरी से भीतरी कोनों तक पैठ जाता है, कि वह विचारों और भावनाओं को परखता है, और गूदे तक को बिना देखे नहीं छोड़ता। अतः यदि यह सत्य सब के हृदयों में जमा होता, तो वे निश्चय ही अधिक श्रद्धा से परमेश्वर की आज्ञा मानते, और उसकी धमकियों से भी डरते।

अतः जब वे इतने लापरवाह होकर सुन्न पड़े हैं, तो यह निष्कर्ष निकलता है कि वे परमेश्वर की कल्पना ऐसे करते हैं मानो उसकी दृष्टि स्पष्ट नहीं, जो केवल अपने निकट की वस्तुओं को देखता है, उस मनुष्य के समान जिसकी दृष्टि कमज़ोर हो, जो पास की वस्तु तो देख सकता है, परन्तु दूर की नहीं। कपटी परमेश्वर को ऐसा ही समझने का स्वप्न देखते हैं, जो मनुष्यों की रीति पर या तो बातों को अनदेखा करता है, या अन्धा है, या कम से कम पास की वस्तु के सिवाय कुछ स्पष्ट नहीं देखता। अब हम भविष्यद्वक्ता का यह कहने का उद्देश्य समझते हैं कि यहोवा निकट का परमेश्वर ही नहीं, वरन् दूर का परमेश्वर भी है।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जब उद्धार के लिए जानने योग्य कोई भी आवश्यक बात तेरे पवित्र और स्वर्गीय वचनों में घटी नहीं है, तो हम ध्यानपूर्वक और परिश्रम से उनका अध्ययन करें, और उस अनुग्रह पर भरोसा रखते हुए, जो मसीह में हमें दिया गया है, तेरे नाम के भय में उन्नति करने का यत्न करें, ताकि हम तेरे वचन के पढ़ने और सुनने से सच्चा फल प्राप्त करें; और हम यह भी सीखें कि सब कुछ उन्नति के लिए काम में लाएँ, जिससे तेरा नाम हम में सचमुच महिमा पाए, और हम अपने जीवन के सम्पूर्ण क्रम में विश्वास और पश्चाताप में उन्नति करते जाएँ, जब तक कि हम अन्त में उस सिद्ध पवित्रता तक न पहुँचें, जिसके लिए तू हमें प्रतिदिन बुलाता है, जब हम अपने शरीर की सारी मलिनता से पूर्णतः छूटकर तेरे पुत्र, हमारे प्रभु, के स्वरूप में पूरी रीति से नए बन जाएँगे। —

आमीन।

नवासीवाँ व्याख्यान

यहोवा की यह वाणी है, क्या मैं निकट ही का परमेश्वर हूँ? और दूर का परमेश्वर नहीं? यहोवा की यह वाणी है, क्या कोई मनुष्य अन्धकार में, या छिपने के स्थानों में छिपेगा, और मैं उसे न देखूँगा, या ऐसा कि मैं उसे न देख सकूँ? यहोवा की यह वाणी है, क्या मैं स्वर्ग और पृथ्वी को नहीं भरता? यहाँ भविष्यद्वक्ता उन कपटियों को अत्यन्त तीखेपन से डाँटता है, जो सोचते थे कि उनका परमेश्वर से कोई लेना-देना नहीं, जैसा उन लोगों के साथ सदा होता है जो अपने पापों में अपने आप को धोखा देते हैं। यद्यपि वे यह सत्य सदा मानते हैं कि परमेश्वर जगत का न्यायी है, और कि किसी न किसी समय उसे लेखा देना पड़ेगा; तौभी बाद में वे सोचते हैं कि वे किसी बहाने से बच निकलेंगे, जिससे परमेश्वर उन्हें क्षमा कर देगा। संक्षेप में, कपटियों की यह रीति है कि वे परमेश्वर के साथ मानो बच्चों का सा खिलवाड़ करते हैं। इसी कारण परमेश्वर उनसे अत्यन्त अप्रसन्न है, और घोषणा करता है कि वह उससे बहुत भिन्न है जैसा वे उसकी कल्पना करते हैं। क्योंकि जब वे इस प्रकार अपने आप को पंच बना लेते हैं, जिससे वे परमेश्वर को अपने ही नियमों के अधीन कर देते हैं, तो वे उसे मानो आशंकाओं से भरा समझते हैं, और यह कि वह कुछ नहीं, या कम से कम बहुत थोड़ा देखता है; वह कहता है कि वह केवल निकट का परमेश्वर ही नहीं, वरन् दूर का भी है।

कुछ लोग इसे समय पर लागू करते हैं, मानो उसने इनकार किया हो कि वह हाल ही में अस्तित्व में आया; और इस प्रकार वे सोचते हैं कि एकमात्र सच्चे और अनन्त परमेश्वर की तुलना उन मूरतों से की गई है जिन्हें मनुष्य ढिठाई से अपने लिए गढ़ लेते हैं। परन्तु दूसरा अर्थ कहीं अधिक उपयुक्त है, — अर्थात् कि वह दूर का परमेश्वर है; क्योंकि जैसा अन्यत्र कहा गया है, “यद्यपि वह ऊँचे पर वास करता है, तौभी पृथ्वी पर जो कुछ होता है वह सब देखता है।” (भजन संहिता 102:19)

अतः जब कुछ भी उसकी दृष्टि से नहीं बचता, तो उसे दूर का परमेश्वर कहा गया है, जबकि कपटी उसे केवल निकट का परमेश्वर समझते थे, जैसा हम फ्रांसीसी में कहते हैं, De courte veue, अर्थात् छोटी दृष्टि वाला, जो केवल निकट की वस्तुएँ, मानो आँखों के सामने की वस्तुएँ ही देखता है। परन्तु प्रश्न में इससे कहीं अधिक बल है कि यदि यह कहा जाता कि वह केवल निकट का परमेश्वर नहीं; और बोलने की यह रीति डाँट प्रगट करती है; क्योंकि कपटी उसकी महिमा को बहुत घटाते हैं, जब वे इस प्रकार अपनी ही धारणाओं के अनुसार कल्पना करते हैं कि वह एक नश्वर मनुष्य से अधिक नहीं देख सकता। निःसन्देह वे इस प्रकार बोलने का साहस न करते; परन्तु जब कोई उनकी सारी युक्तियों और उनके कामों की जाँच करता, तो वह पाता कि वे इतना दुस्साहस कभी न दिखा सकते, यदि उन्होंने इस व्यर्थ धारणा से अपने आप को धोखा न दिया होता कि परमेश्वर को धोखा दिया जा सकता है। और इसलिए यिर्मयाह उनके शब्दों को नहीं दोहराता, वरन् उस दुष्टता की ओर संकेत करता है जो उनके कामों में भली-भाँति प्रगट होती थी, यद्यपि वे अपनी जीभ से कुछ और ही मानते थे। 104 “क्या मैं यहाँ पृथ्वी पर का परमेश्वर नहीं, जो मुझ से अधिक दूर प्रतीत होती है, और साथ ही स्वर्ग का भी, जो मेरे विशेष निवास-स्थान होने के कारण मेरे अधिक निकट प्रतीत होता है? क्या तुम सोचते हो कि क्योंकि मेरा महल स्वर्ग में है, इसलिए पृथ्वी पर जो कुछ होता है उस पर मैं ध्यान नहीं देता?” — गैटेकर। यही अर्थ प्रतीत होता है; क्योंकि वह आगे कहता है, “क्या मैं स्वर्ग और पृथ्वी को नहीं भरता?” शब्दशः ये शब्द यों प्रतीत होते हैं, — 21. यहोवा की यह वाणी है, क्या मैं निकटता का परमेश्वर हूँ? और दूरी का परमेश्वर नहीं? — सं.

105 वेनेमा कहता है, “पवित्रशास्त्र प्रायः उस बात को प्रकाश में लाता और दोषी ठहराता है, जिसे मनुष्य मानते हैं वह नहीं, वरन् वह जो उनके कामों से अनुमान किया जा सकता है।” — सं.

और यही अर्थ है, यह अगले पद से और भी स्पष्ट होता है, जिसे इसके साथ जोड़कर पढ़ना चाहिए; क्या कोई मनुष्य छिपने के स्थानों में छिपेगा, कि मैं उसे न देखूँ? यह पद व्याख्या के रूप में जोड़ा गया है; अतः दूर और निकट शब्दों के विषय में कोई सन्देह नहीं हो सकता, — कि परमेश्वर को दूर का परमेश्वर कहा गया है; क्योंकि उसकी आँखें सबसे निचली गहिराइयों तक पैठ जाती हैं, जिससे कुछ भी उससे बच नहीं सकता।

यह आश्चर्य की बात है कि यूनानी अनुवादकों ने इतनी बड़ी भूल की; क्योंकि उन्होंने अर्थ को पूरी तरह बदल दिया, — कि परमेश्वर निकट का परमेश्वर है, परन्तु दूर का नहीं। पहले तो उन्होंने प्रश्न पर विचार नहीं किया, और फिर, क्योंकि उन्होंने खण्ड के आशय को नहीं देखा, उन्होंने अपनी ही बुद्धि से वह गढ़ लिया जो भविष्यद्वक्ता के शब्दों से पूर्णतः दूर है। यह विचार कि परमेश्वर निकट है और दूर नहीं, निःसन्देह सत्य है; परन्तु यहाँ अभिप्राय बिलकुल दूसरी बात है, — कि परमेश्वर मनुष्यों से बहुत भिन्न रीति से देखता है, क्योंकि जो उससे सबसे दूर है उसे भी वह पूरी और सिद्ध रीति से देखता है, उस खण्ड के अनुसार जिसे हमने भजन संहिता 102:19 से उद्धृत किया है; और एक दूसरा खण्ड भजन संहिता 139:7-12 में है, जहाँ भजनकार कहता है, “मैं तेरे सामने से किधर भागूँ? यदि मैं आकाश पर चढ़ूँ, तो तू वहाँ है; यदि मैं अधोलोक में अपना बिछौना बिछाऊँ, तो वहाँ भी तू अपना हाथ बढ़ाता है; यदि मैं भोर की किरणों पर चढ़कर बादलों तक उड़ जाऊँ, तो वहाँ भी तेरा हाथ मुझे पकड़ लेगा; यदि मैं छिपने के स्थान ढूँढ़ूँ, तो रात भी तेरे सामने उजियाले के समान है, और अन्धियारा उजियाले के समान चमकता है।”

अतः यदि हम इन दोनों खण्डों को एक साथ मिलाएँ, तो यिर्मयाह के शब्दों में कुछ भी सन्दिग्ध न दिखाई देगा, — अर्थात् कि परमेश्वर अपनी आँखों से सबसे निचली गहिराइयों तक पैठ जाता है, जिससे उससे कुछ भी छिपा नहीं।

परन्तु यिर्मयाह केवल पिछले पद का अर्थ ही स्पष्ट नहीं करता, वरन् उसका व्यावहारिक उपयोग भी करता है; वह कहता है, क्या कोई छिपने के स्थानों में छिपेगा कि मैं उसे न देखूँ? परमेश्वर के देखने का सम्बन्ध उसके न्याय से है। अतः सब व्यर्थ अटकलों को एक ओर कर देना चाहिए, क्योंकि पवित्रशास्त्र कहता है कि परमेश्वर सब कुछ देखता है; परन्तु हमें विशेष रूप से इस पर विचार करना चाहिए कि वह किस उद्देश्य से सब कुछ देखता है; और वह स्पष्टतः यह है, — कि अन्त में वह मनुष्यों के किए हुए प्रत्येक काम को न्याय में लाए। अतः यहाँ इस शिक्षा का हमारी दशा पर प्रयोग है; क्योंकि इससे हम सीखते हैं कि जो कुछ हम करते, सोचते और बोलते हैं, वह सब परमेश्वर को ज्ञात है।

छिपने के स्थानों, या गुप्त ठिकानों, से उसका अभिप्राय वे सब गुप्त छल हैं जिन्हें मनुष्य सोचते हैं कि वे ढाँप सकते हैं; परन्तु ऐसे प्रयत्न से वे भारी दण्ड के सिवाय कुछ नहीं पाते। अतः छिपने के स्थानों से हमें वे सब व्यर्थ विचार समझने चाहिए जिन्हें कपटी अपने मन में रखते हैं; क्योंकि वे सोचते हैं कि वे अपने आप को ऐसा छिपा सकते हैं कि परमेश्वर उनकी युक्तियों को न देख सके।

इसलिए परमेश्वर उनका उपहास करता है, और मानो यह कहता है, “वे अपने छिपने के स्थानों में घुस जाएँ, वे जितना चाहें अपने आप को छिपा लें, तौभी मैं उन्हें उनके छिपने के स्थानों में उतनी ही स्पष्टता से देखता हूँ मानो वे मेरे बिलकुल पास हों।”

इसकी पुष्टि के लिए वह जोड़ता है, यहोवा की यह वाणी है, क्या मैं स्वर्ग और पृथ्वी को नहीं भरता? इसकी व्याख्या बारीकी से परमेश्वर के असीम तत्त्व के विषय में नहीं करनी चाहिए। यह निःसन्देह सत्य है कि उसका तत्त्व स्वर्ग और पृथ्वी में व्याप्त है, क्योंकि वह असीम है। परन्तु पवित्रशास्त्र नहीं चाहता कि हम व्यर्थ और निष्फल धारणाओं पर पलें; वह केवल वही सिखाता है जो सच्चे धर्म को बढ़ाने में सहायक है। इसलिए परमेश्वर यहाँ जो घोषणा करता है कि वह स्वर्ग और पृथ्वी को भरता है, उसे उसके विधान और उसकी सामर्थ्य पर लागू करना चाहिए; मानो उसने कहा हो कि वह स्वर्ग की बातों में ऐसा उलझा नहीं कि पृथ्वी की चिन्ताओं की उपेक्षा करे, जैसा अधर्मी मनुष्य स्वप्न देखते हैं; वरन् कहा गया है कि वह स्वर्ग और पृथ्वी को भरता है, क्योंकि वह सब बातों का शासन करता है, क्योंकि सब बातें उसकी दृष्टि में हैं, क्योंकि, संक्षेप में, वह जगत का न्यायी है। 106 यहाँ भविष्यत् काल का अनुवाद सम्भाव्य अर्थ में किया जाना चाहिए, — क्या कोई मनुष्य छिपने के स्थानों में छिप सकता है, कि मैं उसे न देखूँ, यहोवा की यह वाणी है? क्या मैं आकाशमण्डलों और पृथ्वी को नहीं भरता, यहोवा की यह वाणी है? पहली पंक्ति का अनुवाद और भी शब्दशः यों किया जा सकता है, — क्या कोई मनुष्य गुप्त स्थानों में अपने आप को गुप्त कर सकता है? वेल्श भाषा में, — A lecha dyn mewn llechveydd? अन्तिम पंक्ति में “स्वर्ग” नहीं, वरन् “आकाशमण्डल” (बहुवचन) शब्द होना चाहिए; और ब्लेनी भी ऐसा ही अनुवाद करता है। दृश्य और अदृश्य दोनों आकाश अभिप्रेत हैं। — सं.

अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता का क्या अर्थ है; और यह खण्ड विशेष ध्यान के योग्य है, क्योंकि अपने समान परमेश्वर की कल्पना करने की यह भूल लगभग हम सब में जन्मजात है। इसी कारण मनुष्य अपने आप को इतनी स्वच्छन्दता देते हैं; क्योंकि वे परमेश्वर के प्रति अपना कर्तव्य निभाना एक हल्की बात समझते हैं, क्योंकि वे यह नहीं सोचते कि वह कैसा है, वरन् अपनी ही समझ और स्वभाव के अनुसार उसके विषय में सोचते हैं। अतः जब हम अपने विचारों में ऐसे स्थूल हैं, तो हमें उचित है कि इस खण्ड पर ध्यानपूर्वक विचार करें, जहाँ परमेश्वर घोषणा करता है कि वह केवल निकट का परमेश्वर ही नहीं, अर्थात् वह हमारे समान नहीं जिनकी देखने की शक्ति सीमित है, वरन् वह घोर अन्धकार में भी उतना ही देखता है जितना सबसे स्पष्ट प्रकाश में; और इसलिए उन लोगों को अपने आप को धोखा देने से कुछ लाभ नहीं जो अपने लिए गुफाएँ खोदते हैं, जैसा यशायाह में कहा गया है, और गहरी भूलभुलैयों में छिप जाते हैं। (यशायाह 2:21।) इस प्रकार वह इनकार करता है कि उन्हें कुछ लाभ होता है, और इसका यह कारण देता है, “क्योंकि वह स्वर्ग और पृथ्वी को भरता है;” अर्थात् उसका विधान, उसकी सामर्थ्य और उसका न्याय सर्वत्र ऐसे फैले हुए हैं कि मनुष्य कहीं भी चले जाएँ, उनके लिए उससे छिपे रहना असम्भव है। आगे लिखा है, —

यिर्मयाह 23:25

25. मैं ने इन भविष्यद्वक्ताओं की बातें भी सुनी हैं जो मेरे नाम से झूठी भविष्यद्वाणी करते हुए कहते हैं, मैं ने स्वप्न देखा है, स्वप्न देखा है।

25. Audivi quod dicunt (vel, quid dicant,) prophetae prophetantes in nomine meo, dicendo, somniavi, somniavi.

यिर्मयाह फिर उन धोखेबाज़ों की ओर लौटता है जो अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों से प्रजा को बहलाते थे। जब कभी यिर्मयाह और उसके समान लोग, जो विश्वासयोग्यता से अपना पद निभाते थे, प्रजा को उसके पापों के लिए डाँटकर और धमकाकर कठोरता से व्यवहार करते, तब ये सिद्धान्तहीन मनुष्य उनके विरुद्ध उठ खड़े होते, और भविष्यद्वक्ताओं के नाम से परमेश्वर के अधर्मी तिरस्कार करनेवालों की चापलूसी करते थे। जैसा हम पहले कह चुके हैं, यह अत्यन्त भारी परीक्षा थी, जब स्वयं कलीसिया के भीतर ही शैतान के सेवक इस प्रकार झूठमूठ परमेश्वर के नाम का बहाना करते थे। अन्यजातियों के व्यर्थ भविष्यद्वक्ता जो कुछ घमण्ड करते, उसे यहूदी बिना हिचक तुच्छ जानते और उसकी हँसी उड़ाते; क्योंकि वे जानते थे कि उन्हें परमेश्वर का कोई ज्ञान न था; परन्तु जब वे झूठे भविष्यद्वक्ता, जिनके विषय में वह अब बोलता है, कलीसिया में स्थान पाए हुए थे, और ऊँचे शब्दों में घमण्ड करते थे कि वे परमेश्वर के दास हैं, तो यह निर्बलों को बहुत व्याकुल कर देता और उनके विश्वास को डगमगा देता, वरन् पूरी तरह उलट देता, यदि परमेश्वर ने अपना हाथ न बढ़ाया होता। अतः इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि यिर्मयाह इस विषय पर इतना ठहरता है; क्योंकि यह ऐसी बुराई थी जो सहज ही दूर नहीं की जा सकती थी; यदि वह केवल इतना कहता कि उनका आदर नहीं करना चाहिए, तो निर्बलों को सन्तोष न होता। इसलिए उसके लिए यह आवश्यक था कि वह इस सत्य को बार-बार दोहराए, कि सब यह जान लें कि विवेक और परख की आवश्यकता है, और कि जो परमेश्वर के नाम का बहाना करते हैं उन्हें बिना भेद किए उसके भविष्यद्वक्ता नहीं मान लेना चाहिए।

फिर वह उसी बात को दोहराता है जो हम पहले देख चुके हैं, परन्तु दूसरे शब्दों में, — परमेश्वर कहता है, मैं ने सुना है कि वे भविष्यद्वक्ता क्या कहते हैं जो मेरे नाम से भविष्यद्वाणी करते हैं। यहाँ एक आपत्ति का पहले से उत्तर दिया गया है, क्योंकि यह कहा जा सकता था, “इसका क्या अर्थ है? भविष्यद्वक्ता आपस में असहमत हैं! और इन मतभेदों में क्या किया जाए? जो भिन्न मत रखते हैं वे एक तेजस्वी उपाधि से हमारी आँखों को चौंधिया देते हैं, और साहस से दावा करते हैं कि वे परमेश्वर की ओर से भेजे गए हैं। अतः जब भविष्यद्वक्ताओं में ऐसा संघर्ष है, तो हम क्या करें?” परमेश्वर इस आपत्ति का सामना करता है, और घोषणा करता है कि झूठे भविष्यद्वक्ता जिस बात का घमण्ड करते थे, वह उससे अज्ञात न थी। वह जोड़ता है कि वे उसके नाम से भविष्यद्वाणी करते थे। परमेश्वर के नाम के इस अपवित्रीकरण के विषय में सुनना एक ठोकर थी, जिसने निर्बल मनों को अवश्य ही बहुत दुःख दिया होगा। क्योंकि जैसे हमें उचित है कि जो कुछ परमेश्वर से निकलता है उसे श्रद्धा से ग्रहण करें, वैसे ही जब परमेश्वर के नाम का झूठा और कपटपूर्ण बहाना किया जाता है, तो यह कोई छोटा संकट नहीं। अतः जब भलाई के इस झूठे बहाने से वे बहुत व्याकुल हो सकते थे, तो यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि उन्होंने परमेश्वर के नाम का प्रयोग किया था, परन्तु वह जोड़ता है, झूठमूठ।

इससे हम उस बात की सच्चाई देखते हैं जो मैंने कही है, कि जो दावा करते हैं कि वे भविष्यद्वक्ता हैं और दिखावे के साथ परमेश्वर के नाम का बहाना करते हैं, उन्हें बिना भेद किए ग्रहण नहीं करना चाहिए, वरन् परख से काम लेना चाहिए; क्योंकि परमेश्वर की इच्छा हर युग में यह रही है कि वह शैतान और उसके सेवकों को अपने पवित्र नाम का झूठा बहाना करने की छूट देकर अपने दासों के विश्वास को परखे। और जब हम देखते हैं कि कलीसिया सदा इस बुराई के सामने खुली रही है, तो आज के दिन जब वही बात होती है, हमारे व्याकुल होने का कोई कारण नहीं, क्योंकि यह कोई नई बात नहीं। इसलिए आओ, हम ऐसी परीक्षाओं के विरुद्ध अपने आप को दृढ़ करना सीखें; और जब कभी झूठे भविष्यद्वक्ता हमारे विश्वास को परखें, तो हम इस सिद्धान्त को थामे हुए स्थिर बने रहें, — कि हमें बुद्धिमानी से विचार करना चाहिए कि क्या स्वयं परमेश्वर बोलता है, या मनुष्य झूठमूठ उसके दास होने का घमण्ड करते हैं।

स्वप्न देखना यहाँ अच्छे अर्थ में लिया जाना चाहिए; क्योंकि, जैसा हम अन्यत्र देख चुके हैं, परमेश्वर स्वप्नों के द्वारा अपने दासों पर अपने आप को प्रगट किया करता था। अतः यहाँ हर प्रकार के स्वप्न नहीं समझने चाहिए, वरन् ऐसे स्वप्न जो ऊपर से थे।

झूठे भविष्यद्वक्ता, निःसन्देह, यह भाषा प्रयोग करके वह कहते थे जो सत्य न था; क्योंकि यह ऐसा ही था मानो वे गवाही देते कि वे अपनी गढ़ी हुई बातें नहीं लाते, वरन् जो उन्होंने परमेश्वर से पाया था उसे विश्वासयोग्यता से सुनाते हैं। जैसे आज के दिन पोप घोषणा करता है कि वह मसीह का प्रतिनिधि और पतरस का उत्तराधिकारी है, जबकि वह कलीसिया पर अत्याचार करता है; वैसे ही ये भी एक लुभावने बहाने से भोले लोगों को यह कहकर धोखा देते थे कि वे कोई मानवीय बात नहीं लाते, वरन् केवल परमेश्वर के वचनों के साक्षी हैं। आगे लिखा है, —

यिर्मयाह 23:26-27

26. जो भविष्यद्वक्ता झूठ की भविष्यद्वाणी करते हैं, यह बात कब तक उनके मन में रहेगी? हाँ, वे अपने ही मन के छल के भविष्यद्वक्ता हैं;

26. Quosque erit in corde prophetarum prophetantium mendacium, et prophetarum doli cordis sui?

107 अधिक शब्दशः अनुवाद यह है, — 25. मैं ने सुना है कि भविष्यद्वक्ताओं ने क्या कहा है, जिन्होंने मेरे नाम से झूठी भविष्यद्वाणी की है, यह कहते हुए, — “मैं ने स्वप्न देखा है, मैं ने स्वप्न देखा है।” — सं.

27. जो अपने अपने स्वप्नों के द्वारा, जिन्हें वे एक दूसरे को सुनाते हैं, मेरी प्रजा से मेरा नाम भुलवाने की युक्ति करते हैं, जैसे उनके पुरखा बाल के कारण मेरा नाम भूल गए थे।

27. Cogitantes ut faciant oblivisci populum meum nominis mei per somnia sua (vel, in somniis suis, ad verbum,) qua narrant quisque socio suo; quemadmodum obliti sunt patres eorum nominis mei in Baal.

यहाँ परमेश्वर झूठे भविष्यद्वक्ताओं को डाँटता है, और साथ ही अपनी प्रजा से उस बात की प्रतिज्ञा भी करता है जो विशेष रूप से वांछनीय थी, — कि वह अपनी कलीसिया को ऐसी अशुद्धताओं से शुद्ध करेगा।

फिर वह दिखाता है कि पलटा लेना उसका उद्देश्य था, क्योंकि झूठे भविष्यद्वक्ताओं ने ऐसी अधर्मी और ढीठ रीति से उसके पवित्र नाम का दुरुपयोग करने का साहस किया था। क्योंकि उनके मन में सदा यह बात आती थी, “यह कैसे है कि परमेश्वर इसे होने देता है? क्या इसलिए कि उसे अपनी प्रजा की सुरक्षा की चिन्ता नहीं? या क्या उसे इसमें कोई आनन्द मिलता है जब वह सत्य को झूठ के साथ, और ज्योति को अन्धकार के साथ मिला हुआ देखता है?” इसलिए परमेश्वर यहाँ दिखाता है कि उसने कुछ समय तक उस पवित्र-वस्तु-हरण के समान दुस्साहस को सह लिया जो झूठे भविष्यद्वक्ता करते थे, परन्तु उसने उसे ऐसा अनदेखा नहीं किया कि अन्त में उन्हें दण्ड न दे।

वह कहता है, कब तक? जो ऐसा ही है मानो उसने कहा हो, “यह सदा न रहेगा; यद्यपि मैं विलम्ब कर सकता हूँ, तौभी वे जान लेंगे कि उन्होंने चरम टेढ़ाई से मेरी सहनशीलता का दुरुपयोग किया है।” और वह यह कहकर उनके अपराध को और भी बढ़ाकर दिखाता है, भविष्यद्वक्ताओं के मन में झूठी भविष्यद्वाणी करना कब तक रहेगा? बोलने की इस रीति से वह संकेत करता है कि उन्होंने अज्ञानता से भूल नहीं की, जैसा बहुत से लोग करते हैं, जो ज्ञान की कमी के कारण ऐसी बातें कह देते हैं जिन्हें वे समझते नहीं; परन्तु परमेश्वर यहाँ शिकायत करता है कि ये भविष्यद्वक्ता मानो जान-बूझकर सत्य को दबाने के लिए उठ खड़े हुए। फिर मन से विचार या संकल्प समझना चाहिए; मानो उसने कहा हो कि वे जान-बूझकर उसके नाम का झूठा बहाना करते थे, कि प्रजा को धोखा देना उनका दृढ़ संकल्प था।

वह जोड़ता है कि वे अपने ही मन के छल के भविष्यद्वक्ता थे। मन का यह छल सच्ची शिक्षा के विपरीत रखा गया है; और इस प्रकार परमेश्वर संकेत करता है कि मनुष्य जो कुछ अपनी ओर से लाते हैं वह छलपूर्ण है, क्योंकि उनसे व्यर्थता के सिवाय कुछ नहीं निकल सकता। फिर भी इसमें कोई सन्देह नहीं कि वह उस मूर्खतापूर्ण अहंकार की निन्दा करता है जिसका झूठे भविष्यद्वक्ता घमण्ड से बखान करते थे, कि केवल वे ही बुद्धिमान हैं, जैसा अब पोप-तन्त्र में होता है; जब कभी सिद्धान्तहीन मनुष्य अपनी कल्पनाओं के विषय में बोलते हैं, तो वे कितने अहंकार से बकबक करते हैं? इससे अधिक मूर्खतापूर्ण कुछ नहीं हो सकता, तौभी वे सोचते हैं कि वे तीक्ष्णता और ऊँचे चिन्तन में स्वर्गदूतों से भी बढ़कर हैं। प्राचीन काल के झूठे भविष्यद्वक्ताओं ने भी ऐसा ही अहंकार दिखाया था। परन्तु परमेश्वर घोषणा करता है कि मनुष्य जो कुछ गढ़ते हैं, और जो कुछ युक्ति करते हैं, जिसे उन्होंने उसके मुख से नहीं पाया, वह केवल मन का छल है।

और इस पर ध्यानपूर्वक विचार करना चाहिए; क्योंकि बहुत सी लुभावनी बारीकियाँ हैं जिनमें कुछ भी ठोस नहीं, वरन् वे निरी व्यर्थ बातें हैं। अतः यदि किसी समय ये व्यर्थ विचार हमें भले लगें, तो हम स्मरण रखें कि यिर्मयाह यहाँ क्या कहता है, कि जो कुछ परमेश्वर से नहीं निकलता वह मन का छल है; और फिर, यद्यपि सारा संसार झूठ और धोखों की प्रशंसा करे, तौभी हमें जानना चाहिए कि हर वह बात छल है जिसका रचयिता स्वयं परमेश्वर नहीं। 108 संशोधकों ने किसी हस्तलिपि या प्राचीन अनुवादों के प्रमाण के बिना इस पद के आरम्भिक शब्दों को सुधारने में बड़ा परिश्रम किया है। जब कोई अर्थ हो, और वह भी प्रभावशाली, तो केवल अनुमान पर आधारित संशोधन निश्चय ही ठुकरा दिए जाने चाहिए। हौबिगाँ, ब्लेनी और हॉर्सले के अपने-अपने संशोधन हैं, परन्तु हम उनके बिना काम चला सकते हैं। अनुमानित संशोधनों की प्रेरणा का कारण ;{}יש के आगे लगा {{ה प्रतीत होता है; परन्तु गैटेकर ने यह कठिनाई दूर कर दी; उसका अनुवाद सारतः यह है, — कब तक! — क्या इन भविष्यद्वक्ताओं के मन में है, कि वे झूठी भविष्यद्वाणी करते रहें, और अपने ही मन के छल की भविष्यद्वाणी करते रहें? “मन में” होने का अर्थ है निश्चय करना, कोई उद्देश्य या संकल्प बाँधना। देखिए यशायाह 63:4। यह ऐसा ही है मानो कहा गया हो, “क्या इन भविष्यद्वक्ताओं ने निश्चय कर लिया है?” “मन में” होने का अर्थ किसी बात में आनन्द लेना भी है। देखिए भजन संहिता 40:8। तब अर्थ यह हो सकता है, “क्या इन भविष्यद्वक्ताओं को इसमें आनन्द मिलता है?” इत्यादि। परन्तु पहला अर्थ सबसे उपयुक्त है। “कब तक!” उनके दुष्ट मार्ग में उनकी दृढ़ता पर आश्चर्य का उद्गार है। उन्हें बार-बार चेतावनी दी गई थी, तौभी वे लगे रहे। फिर एक प्रश्न आता है, कि क्या झूठी भविष्यद्वाणी करते रहना उनका दृढ़ संकल्प था? — सं.

इसके बाद एक और स्पष्ट परिभाषा आती है, कि उन्होंने अपने स्वप्नों के द्वारा उसकी प्रजा से उसका नाम भुलवा दिया, जैसे उनके पुरखाओं ने बाल के कारण उसे भुला दिया था। इस पद से हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं, कि जिन लोगों से यिर्मयाह का विवाद था, वे खुले रूप से व्यवस्था के शत्रु नहीं थे; क्योंकि वे सच्चे धर्म के बहुत से सिद्धान्तों को मानते थे। वे परमेश्वर के सच्चे और निष्कपट उपासकों के साथ मिलकर यह सत्य मानते थे, — कि केवल एक सच्चे परमेश्वर की ही उपासना की जानी चाहिए; और यह भी, — कि केवल एक ही वैध वेदी है जिस पर व्यवस्था के अनुसार बलिदान चढ़ाए जाने चाहिए। अतः इन बातों पर कोई विवाद नहीं था। फिर भी वे अपनी चापलूसियों से लोगों को धोखा देते थे; क्योंकि उन्होंने अपने भविष्यद्वक्ता के पद को लाभ का साधन बना लिया था। इसलिए यिर्मयाह उन्हें दोषी ठहराता है, क्योंकि उन्होंने अपने स्वप्नों के द्वारा परमेश्वर का नाम भुलवा दिया, जैसे उनके पुरखाओं ने बाल के कारण उसे भुला दिया था; मानो वह कह रहा हो, “ये स्वप्न उन मनगढ़न्त और खोटी उपासना-विधियों के समान हैं, जिनके द्वारा पहले सच्चा धर्म उलट दिया गया था; क्योंकि उनके पुरखा बाल और बाल देवताओं की उपासना करते थे: उन्होंने अपने लिए ये झूठे देवता खड़े किए, और इस प्रकार अपनी ही युक्तियों से परमेश्वर की महिमा को उलट दिया।” यिर्मयाह के समय में रहनेवाले झूठे भविष्यद्वक्ताओं की अभक्ति वास्तव में इतनी स्थूल नहीं थी; फिर भी वह एक परोक्ष धर्मत्याग था, क्योंकि वे अपने स्वप्नों को आगे रखते थे, और झूठ-मूठ यह दावा करते थे कि वे परमेश्वर के सेवक हैं, यद्यपि उसने उन्हें कोई आदेश नहीं दिया था।

हम अन्यत्र कह चुके हैं (यिर्मयाह 23:21) कि उनका अपराध दोहरा था; पहला, वे बिना बुलाए और बिना भेजे दौड़ पड़े; और दूसरा, वे परमेश्वर का वचन नहीं, वरन् अपनी ही कल्पनाएँ प्रस्तुत करते थे। और इस खण्ड पर ध्यानपूर्वक विचार करना चाहिए; क्योंकि यहाँ हम सीखते हैं, कि परमेश्वर न केवल खुले धर्मत्याग को सहन नहीं कर सकता, वरन् उन परोक्ष विकृतियों को भी नहीं, जो चुपके-चुपके हमें परमेश्वर के भय से दूर खींच ले जाती हैं। अतः यदि हम परमेश्वर की आज्ञाकारिता में पूर्ण बने रहना चाहते हैं, तो कलीसिया में इन दोनों बुराइयों से सावधानीपूर्वक बचना चाहिए। एक बुराई तो भली-भाँति जानी-पहचानी है, अर्थात् जब सत्य खुले रूप से झूठ में बदल दिया जाता है, जब मनुष्य मूर्तिपूजा और घिनौने अन्धविश्वासों की ओर खींच लिए जाते हैं, या जब प्राचीन लोग, जैसा यिर्मयाह कहता है, बाल के कारण परमेश्वर का नाम भूल गए।

परन्तु दूसरी बुराई अधिक छिपी हुई है, और इसलिए अधिक भयानक है, अर्थात् जब सच्चे धर्म का कुछ रूप तो बनाए रखा जाता है, फिर भी मनुष्य कपटपूर्वक परमेश्वर के भय और उसकी सच्ची उपासना से, और खरी शिक्षा से दूर खींच लिए जाते हैं, जैसा कि आज के दिन हम उन कलीसियाओं में देखते हैं, जो यह दावा करती हैं कि उन्होंने सुसमाचार की शिक्षा को अपनाने के लिए पोप-तन्त्र से अपने को अलग कर लिया है: उनमें बहुत से ऐसे हैं जो कपटपूर्वक सुसमाचार की सरल और खरी शिक्षा को भ्रष्ट करते हैं। हम देखते हैं कि इस समय कितने जिज्ञासु मनुष्य हैं, जो अपने ही आविष्कारों से सब कुछ अस्त-व्यस्त कर देते हैं, और कितने लोग कैसी मूर्खता से बारीकियाँ ढूँढ़ते हैं, और कितने लोग कैसे आत्मविश्वास के साथ अपने ही आविष्कारों को ईश्वरीय वाणी के समान प्रस्तुत करते हैं! अतः हमें चौकस रहना उचित है, न केवल इसलिए कि हम खुले घृणित कामों से बचें, वरन् इसलिए भी कि हम परमेश्वर के शुद्ध और सच्चे वचन को थामे रहें, ताकि झूठे कार्यकर्ताओं को कपटपूर्वक किसी भी बात को भ्रष्ट और दूषित करने न दें। आगे लिखा है, —

109 कैल्विन इस पद का आरम्भ हमारे अनुवाद के समान करता है, “जो सोचते हैं,” इत्यादि। Sept. भी ऐसा ही करता है; Vulg. में है, “जो चाहते हैं (या इच्छा करते हैं), volunt।” Blayney का अनुवाद है, “जो यत्न करते हैं।” इस क्रिया का अर्थ कभी-कभी पक्ष और विपक्ष के कारणों को गिनकर किसी बात की युक्ति करना या उसका संकल्प करना होता है। यहाँ इसका अनुवाद “जो योजना बनाते हैं” किया जा सकता है। Syriac में है, “जिनकी युक्ति यह है।” उनकी योजना और अभिप्रेत उद्देश्य यह था कि अपने स्वप्नों के द्वारा लोगों से परमेश्वर का नाम भुलवा दें। परन्तु उसका नाम कैसे भुलवाएँ? क्योंकि वे तो यह दावा करते थे कि वे अपने स्वप्न उसी के नाम से सुनाते हैं। यहाँ परमेश्वर के नाम का अर्थ स्पष्टतः उसका प्रकट किया हुआ नाम है, अर्थात् वह स्वयं जैसा अपने वचन में प्रकट हुआ है। — सं.

यिर्मयाह 23:28

28. जिस भविष्यद्वक्ता ने स्वप्न देखा हो, वह स्वप्न कह सुनाए; और जिसके पास मेरा वचन हो, वह मेरा वचन सच्चाई से सुनाए। यहोवा की यह वाणी है, कहाँ भूसा और कहाँ गेहूँ?

28. Propheta apud quem est somnium, narrabit somnium; et apud quem est sermo meus, narrabit sermonem meum veritatis: quid palae ad triticum, dicit Jehova?

हमें इस पद को भी ध्यानपूर्वक पढ़ना चाहिए, क्योंकि निःसन्देह इसमें एक विशेष रूप से उपयोगी शिक्षा है। मैं पहले ही कह चुका हूँ, कि परमेश्वर के मन्दिर में संघर्ष देखकर बहुतों का विश्वास डगमगा सकता था, और यह संघर्ष केवल साधारण लोगों के बीच ही नहीं, वरन् परमेश्वर के भविष्यद्वक्ताओं के बीच भी था। परमेश्वर स्वर्ग से प्रकट नहीं हुआ, न उसने अपने स्वर्गदूतों को भेजा, वरन् उसकी इच्छा यह थी कि उसकी वाणी मनुष्यों के द्वारा सुनी जाए। जो लोग मन्दिर में आते थे, वे आशा रखते थे कि भविष्यद्वक्ता उन्हें शिक्षा देंगे। वहाँ शैतान के सेवक प्रकट हुए, जिन्होंने सब कुछ भ्रष्ट और विकृत कर दिया। थोड़े ही लोग थे जो निष्कपटता से परमेश्वर का सत्य सुनाते थे, और जो कुछ परमेश्वर ने आज्ञा दी थी उसे विश्वासयोग्यता से समझाते थे। ऐसी दशा में वे बेचारे मनुष्य क्या कर सकते थे, जो आज्ञा मानने को तैयार थे, और जिनका मन सीखने योग्य था?

इसी कारण बहुतों ने धर्म की सारी चिन्ता को एक ओर फेंक दिया, और अपने को निराशा के हवाले कर दिया: “इस सब का क्या अर्थ है? इतनी फूट, इतने विवाद, इतने झगड़े, इतनी निन्दा क्यों है? अब हम कहाँ जाएँ? अच्छा यही है कि अब किसी बात की चिन्ता ही न करें।” इस प्रकार बहुतों ने अपनी उदासीनता में लिप्त रहने का अवसर ढूँढ़ लिया, और कष्टदायक तथा काँटेदार विवादों में अपने को उलझाने के बदले, उन्होंने यह चुना कि अब और अपने को न थकाएँ, और न यह खोजें कि परमेश्वर क्या है, उसकी इच्छा क्या है, उनके लिए उद्धार है या नहीं, कोई आशा है या नहीं।

यिर्मयाह के समय में ऐसी ही परीक्षा विद्यमान थी। इसलिए उसने उचित समय पर उपयुक्त उपाय किया और कहा, जिस भविष्यद्वक्ता के पास स्वप्न है, अर्थात् जिसके पास स्वप्न है, वह स्वप्न कह सुनाएगा; और फिर, जिस भविष्यद्वक्ता के पास मेरा वचन है, वह मेरा वचन सुनाएगा; मानो परमेश्वर ने कहा हो, कि झूठ के द्वारा सत्य का मार्ग रोकना अत्यन्त दुष्टता की बात है। परन्तु प्रायः यही होता है, जैसा मैं कह चुका हूँ; क्योंकि जहाँ शैतान के कारिन्दे होते हैं, वहाँ हमारे मार्ग में ऐसी बाधा प्रतीत होती है जो हमें सच्चे धर्म के मार्ग में आगे बढ़ने और चलते रहने से रोकती है। क्योंकि जब सीधे मनवाले लोग, जैसा हम कह चुके हैं, स्वयं भविष्यद्वक्ताओं को लड़ते, विवाद करते और झगड़ते देखते हैं, तो वे ठिठक जाते हैं, वरन् पीछे हट जाते हैं। अब परमेश्वर दिखाता है कि यह अत्यन्त अनुचित है। तो इसका अर्थ यह है, मानो उसने कहा हो, “झूठे भविष्यद्वक्ता अपने छलों के द्वारा परमेश्वर के सेवकों के मार्ग में बाधा न डालें, कि वे आगे न बढ़ सकें, और उसका वचन श्रद्धा के साथ न सुना जाए।”

जब तक हम इस बात पर ध्यान न दें जो भविष्यद्वक्ता के मन में थी, तब तक यह खण्ड अर्थहीन प्रतीत होगा। इसे प्रायः उद्धृत किया गया है, परन्तु निश्चय ही इस परिस्थिति पर ध्यान नहीं दिया गया। अतः हमें सदा यह विचार करना चाहिए, कि कोई बात क्यों कही गई है। यह पद पिछली बातों पर निर्भर है; और परमेश्वर यहाँ एक ऐसे प्रश्न का उत्तर देता है, जो उठाया जा सकता था, — “तो हम क्या करें, क्योंकि झूठ सत्य से टकरा रहा है?” परमेश्वर उत्तर देता है, कि इस परिस्थिति के कारण उसके वचन की कोई हानि नहीं होनी चाहिए; मानो उसने कहा हो, “कोई भी बात मेरे भविष्यद्वक्ताओं को शिक्षा देने से न रोके; मैं आज्ञा देता हूँ कि उनकी सुनी जाए।”

110 सभी प्राचीन अनुवाद और Targ. अन्तिम क्रिया का अनुवाद आज्ञार्थक रूप में करते हैं, “वह सुनाए,” इत्यादि। और अधिकांश आधुनिक व्याख्याकार भी ऐसा ही करते हैं। — सं.

अतः हम यह निष्कर्ष निकालते हैं, कि वे लोग परमेश्वर के साथ अन्याय करते हैं, जो उन विवादों का बहाना बनाते हैं जिनके द्वारा धर्म फाड़ा जाता है और मानो चिथड़े-चिथड़े किया जाता है, और सोचते हैं कि इस प्रकार उन्हें अपनी अभक्ति में लिप्त रहने की छूट मिल जाती है; क्योंकि यह कोई ऐसा कारण नहीं जो उनके काम आ सके, कि शैतान और उसके सेवक परमेश्वर और उसके सेवकों के अधिकार को बदनाम करने का परिश्रम करते हैं।

यद्यपि ये झूठे भविष्यद्वक्ता घुस आते हैं, यद्यपि वे परमेश्वर के सच्चे और विश्वासयोग्य सेवकों के विरुद्ध अपने को खड़ा कर सकते हैं, तौभी स्वप्न, अर्थात् भविष्यद्वाणी-सम्बन्धी प्रकाशन, अपना महत्त्व बनाए रखें, और जिसके पास परमेश्वर का वचन है, वह परमेश्वर का वचन सुनाए, ताकि वह सुना जाए। यह वाक्यांश सुननेवालों से सम्बन्ध रखता है; उन्हें व्यवस्था की आज्ञा मानने से पीछे नहीं हटना था, चाहे शैतान उसकी एकता को नष्ट करने का प्रयत्न करके उनके विश्वास को उलटने का कितना ही यत्न क्यों न करे।

इसके बाद लिखा है, कहाँ भूसा और कहाँ गेहूँ? यह जोड़ भी पूर्णतः आवश्यक था, क्योंकि बहुत से लोग फिर आपत्ति करके कह सकते थे, कि उनमें सच्चे और झूठे भविष्यद्वक्ताओं के बीच भेद करने की पर्याप्त विवेक-शक्ति नहीं है। परमेश्वर यहाँ यह उत्तर देता है, कि जो ध्यानपूर्वक जाँच करता है, उसके लिए सच्ची और झूठी शिक्षा के बीच का अन्तर गेहूँ और भूसे के अन्तर से कुछ कम नहीं है। और इस तुलना के द्वारा वह दिखाता है कि बहुत से लोग कैसी मूर्खता और बेतुकेपन से इस बहाने व्यवस्था के अधिकार को घटाते हैं, कि बहुत से लोग उसकी झूठी व्याख्या करते हैं। क्योंकि जब कोई गेहूँ को इसलिए फेंक देता है कि वह भूसे से ढका है, तो क्या वह भूख से नष्ट होने के योग्य नहीं है? और उस पर कौन तरस खाएगा जो कहता है कि उसके खलिहान में गेहूँ तो है, परन्तु वह भूसे से मिला हुआ है, और इसलिए भोजन के योग्य नहीं? तो फिर, हे मूर्ख मनुष्य, तू भूसे को गेहूँ से अलग क्यों नहीं करता? परन्तु तू गेहूँ को साफ करके उसे अपना भोजन बनाने के बदले अभाव से नष्ट होना चुनता है। इसी प्रकार मन्दिर में भी गेहूँ प्रायः भूसे से मिला रहता है, परमेश्वर का शुद्ध सत्य प्रायः बहुत सी टीकाओं और व्यर्थ कल्पनाओं से दूषित कर दिया जाता है; फिर भी, यदि हमारा ही दोष न हो, तो हम गेहूँ और भूसे के बीच भेद कर सकेंगे। परन्तु यदि हम लापरवाह हों, और यह सोचें कि परमेश्वर के वचन को तुच्छ जानने के लिए यह पर्याप्त बहाना है कि शैतान अपने छल ले आता है, तो हम अपने आलस्य में उस मनुष्य के समान नष्ट हो जाएँगे जो अपने गेहूँ को साफ करने की उपेक्षा करता है जिससे वह उसकी रोटी बना सके। परन्तु समय मुझे और कहने की अनुमति नहीं देता।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे, कि जैसे तू प्रतिदिन अनुग्रहपूर्वक अपनी निश्चित और अटल इच्छा हमारे सामने रखने में प्रसन्न होता है, वैसे ही हम अपनी आँखें और कान खोलें, और अपने सारे विचारों को उस ओर उठाएँ जो न केवल हम पर यह प्रकट करता है कि क्या उचित है, वरन् हमें स्थिर मन में दृढ़ भी करता है, ताकि हम सच्चे धर्म के मार्ग पर चलते रहें, और कभी भटककर अलग न हों, चाहे शैतान और उसके सेवक हमारे विरुद्ध कुछ भी युक्ति क्यों न रचें, वरन् हम दृढ़ खड़े रहें और स्थिर बने रहें, जब तक कि अपना युद्ध पूरा करके हम अन्त में उस धन्य विश्राम में न पहुँच जाएँ जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा स्वर्ग में हमारे लिए तैयार किया गया है।

111 भूसे और गेहूँ के बीच का अन्तर वही है जिसकी ओर Sept. और Vulg. संकेत करते हैं, “भूसे का गेहूँ से क्या सम्बन्ध?” परन्तु Syr. का विचार दूसरा है, “तुम भूसे को गेहूँ के साथ क्यों मिलाते हो?” इब्रानी का शाब्दिक अनुवाद है, “भूसे के साथ गेहूँ क्यों?” ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ मिलावट ही अभिप्रेत है। Gataker और Blayney का भी यही विचार था, जिन्होंने इसका अनुवाद किया, “भूसे का गेहूँ से क्या काम?” अर्थात्, तुम उन्हें एक साथ क्यों मिलाते हो? और Adam Clarke भी इस वाक्यांश को इसी दृष्टि से देखता है। Venema, Henry, Scott, और Lowth पहला अर्थ लेते हैं, जो हमारे अनुवाद का भी है; परन्तु दूसरा अर्थ मूल पाठ के अधिक अनुकूल है। — सं.

नब्बेवाँ व्याख्यान

हमने कल देखा कि यद्यपि झूठे भविष्यद्वक्ताओं ने सच्ची शिक्षा को भ्रष्ट कर दिया, तौभी भविष्यद्वक्ता का पद अपने अधिकार की किसी हानि के बिना अपने सम्मान में बना रहा। इसलिए यिर्मयाह ने कहा कि उनके सारे छल विश्वासयोग्य लोगों के लिए बाधा न बनें, कि वे अपनी बुलाहट के मार्ग में आगे बढ़ने से रुक जाएँ, और कोई यह आपत्ति करके न कहे, कि ऐसी अस्त-व्यस्त दशा में वह नहीं जान सकता कि किस बात से बचे और किसका अनुसरण करे; उसने कहा कि गेहूँ और भूसे का अन्तर सहज ही पहचाना जा सकता है, बशर्ते मनुष्य जान-बूझकर अन्धे न बनें। अब वह आगे कहता है, —

यिर्मयाह 23:29

29 यहोवा की यह वाणी है, क्या मेरा वचन आग के समान नहीं है? और क्या वह ऐसे हथौड़े के समान नहीं जो चट्टान को चकनाचूर कर देता है?

29. An non ut sit sermo meus quasi ignis (hoc est, an non sermo meus tanquam ignis) dicit Jehova? Et tanquam malleus conterens saxum (vel, rupem.)

वह भूसे और गेहूँ के विषय में कही हुई बात की पुष्टि करता है, परन्तु भिन्न शब्दों में। यह उचित तुलना थी जब यिर्मयाह ने परमेश्वर के वचन की तुलना गेहूँ से, और मनुष्यों की कल्पनाओं की तुलना भूसे से की। परन्तु क्योंकि यहूदियों ने अपनी कृतघ्नता के द्वारा परमेश्वर के वचन को निष्फल कर दिया था, जिससे वह उनके लिए आत्मिक आहार न बना, इसलिए भविष्यद्वक्ता कहता है कि वह आग के समान और हथौड़े के समान हो जाएगा; मानो उसने कहा हो, कि यद्यपि यहूदी विवेकहीन थे, क्योंकि वे अपनी दुष्टता में कठोर हो गए थे, तौभी परमेश्वर का वचन व्यर्थ नहीं किया जा सकता, या कम से कम उसकी सामर्थ्य छीनी नहीं जा सकती; क्योंकि जैसा पौलुस कहता है, “यदि वह जीवन के लिए जीवन की सुगन्ध नहीं है, तो नाश होनेवालों के लिए मृत्यु के लिए मृत्यु की गन्ध है,” (2 कुरिन्थियों 2:16) और उसी प्रेरित ने दूसरे स्थान पर भी कहा है, कि परमेश्वर के सेवकों के अधिकार में पलटा लेना है, क्योंकि वे आत्मिक तलवार धारण करते हैं, ताकि हर एक ऊँची बात को, जो मसीह के विरुद्ध सिर उठाती है, ढा दें; परन्तु वह आगे कहता है, “जब” विश्वासियों की “आज्ञाकारिता पूरी हो जाए।” (2 कुरिन्थियों 10:6)

परमेश्वर के वचन का पहला और मानो स्वाभाविक उपयोग मनुष्यों के लिए उद्धार लाना है; और इसी कारण वह भोजन कहलाता है; परन्तु त्यागे हुए लोगों के लिए वह विष बन जाता है: और इतनी बड़ी भिन्नता का यही कारण है।

उसने पहले कहा, कि परमेश्वर का वचन गेहूँ है, क्योंकि उसके द्वारा प्राणों का स्वर्गीय जीवन के लिए पोषण होता है; और इस तुलना से अधिक मनोहर और कुछ नहीं हो सकता। परन्तु अब वह उसे आग और हथौड़ा घोषित करता है। इन शब्दों में कुछ विरोधाभास दिखाई देता है; परन्तु सुननेवालों के विषय में भेद करना आवश्यक है, क्योंकि जो लोग परमेश्वर के वचन को, जैसा उन्हें उचित है, श्रद्धा से और विश्वास की सच्ची शिक्षणीयता के साथ ग्रहण करते हैं, वे उसे अपने लिए भोजन पाते हैं; परन्तु अभक्त लोग, क्योंकि वे ऐसे उपकार के अयोग्य हैं, उसे बिलकुल भिन्न पाते हैं। क्योंकि जो वचन अपने आप में जीवनदायक है, वह आग में बदल जाता है, जो उन्हें भस्म करती और निगल जाती है; और वह हथौड़ा भी बन जाता है जो उन्हें तोड़े, टुकड़े-टुकड़े करे, और नष्ट कर दे।

112 इस पद के आरम्भ में आनेवाला अव्यय {{כה, जिसका अनुवाद कैल्विन ने ut किया है, अर्थहीन प्रतीत होता है। Vulg. में यह छोड़ दिया गया है, और Sept. तथा Syr. में इसका अनुवाद “देखो” किया गया है, मानो यह .{}חנה हो। Venema ने इसे या तो एक संज्ञा, जलन, माना जो ,{}כוה जलाना, से बनी है, या ,{}כח बल, ओज, सामर्थ्य, की छपाई की भूल माना। अन्तिम अर्थ Blayney ने अपनाया है, और Horsley ने इसका समर्थन किया है, और Targ. भी इसका पक्ष लेता है, “क्या मेरे सब वचन आग के समान प्रबल नहीं हैं?” Blayney का अनुवाद है, — क्या मेरे वचन की सामर्थ्य आग के समान नहीं है? यही सबसे सम्भावित अर्थ है; यद्यपि कोई भिन्न पाठ नहीं है, तौभी इन दोनों अक्षरों के बीच का अन्तर बहुत थोड़ा है।

पूरी बात का आशय यह है, कि परमेश्वर का वचन सदा अपनी गरिमा बनाए रखता है; क्योंकि यदि मनुष्य उसे तुच्छ भी जानें, तौभी वह अपने ओज और प्रभावशीलता से वंचित नहीं किया जा सकता; यदि वह भोजन के लिए हितकारी न हो, तो वह आग के समान या हथौड़े के समान होगा। अतः ये दोनों तुलनाएँ दुष्टों से सम्बन्ध रखती हैं, क्योंकि विश्वासियों के सम्बन्ध में जब परमेश्वर का वचन आग कहलाता है, तो उसका दूसरा अर्थ होता है, अर्थात् इसलिए कि वह शरीर की अभिलाषाओं को सुखाता और भस्म करता है, जैसे चाँदी और सोना आग से शुद्ध किए जाते हैं। इसलिए विश्वासियों के सम्बन्ध में भी परमेश्वर का वचन उचित और यथार्थ रूप से आग कहलाता है; परन्तु भस्म करनेवाली नहीं, वरन् शुद्ध करनेवाली आग। परन्तु जब वह त्यागे हुए लोगों के पास आता है, तो उसे अवश्य ही उनका नाश करना पड़ता है, क्योंकि वे उस अनुग्रह को ग्रहण नहीं करते जो वह उन्हें प्रदान करता है। उसे हथौड़ा भी कहा जा सकता है, क्योंकि वह चुने हुए लोगों में भी शरीर की भ्रष्ट अभिलाषाओं को, और उन अभिलाषाओं को जो परमेश्वर के विरोधी हैं, वश में करता है; परन्तु वह चुने हुए लोगों को तोड़ता नहीं, क्योंकि वे अपने को उसके वश में होने देते हैं।

परन्तु कहा गया है कि यह हथौड़ा पत्थर या चट्टान को तोड़ता है, क्योंकि त्यागे हुए लोग सुधारे जाने की बात सुनना नहीं चाहते; इसलिए उनका तोड़ा जाना और नष्ट किया जाना अनिवार्य है।

इसी कारण पौलुस भी हठीले लोगों के विषय में बोलते हुए कहता है, “यदि कोई अज्ञानी हो, तो अज्ञानी ही रहे।” (1 कुरिन्थियों 14:38)

क्योंकि इन शब्दों से उसका अभिप्राय यह है कि वे अन्त में जान लेंगे कि उस वचन की कठोरता कितनी बड़ी है जिससे वे अपने मन की हठधर्मिता के कारण लड़ने का साहस करते हैं। परन्तु जो खण्ड मैंने पहले उद्धृत किया है, वह यिर्मयाह की इस बात को भली-भाँति समझाता है, अर्थात् कि सत्य अपने आप में हितकारी है, परन्तु नाश होनेवालों के लिए वह मृत्यु के लिए मृत्यु की गन्ध बन जाता है। (2 कुरिन्थियों 2:16।) पौलुस वास्तव में सुसमाचार के विषय में बोलता है, परन्तु यह व्यवस्था पर भी लागू किया जा सकता है। अब आगे लिखा है, —

यिर्मयाह 23:30-32

30. इसलिए यहोवा की यह वाणी है, देखो, जो भविष्यद्वक्ता मेरे वचन एक दूसरे से चुरा लेते हैं, मैं उनके विरुद्ध हूँ।

30. Propterea ecce ego ad (vel, super) prophetas, dicit Jehova, qui furantur sermones meos, quisque a socio suo:

31. यहोवा की यह वाणी है, देखो, जो भविष्यद्वक्ता अपनी जीभ चलाकर कहते हैं, “वह कहता है,” मैं उनके विरुद्ध हूँ।

31. Ecce ego ad (vel, super, vel, contra) prophetas, dicit Jehova, qui mollificant (vel, tollunt) linguam suam, et dicunt, sermo (vel, dictio:)

32. यहोवा की यह वाणी है, देखो, जो झूठे स्वप्नों की भविष्यद्वाणी करते हैं, और उनका वर्णन करके अपने झूठ और अपनी ओछेपन से मेरी प्रजा को भरमाते हैं, मैं उनके विरुद्ध हूँ; तौभी मैंने उन्हें न भेजा, और न आज्ञा दी: इसलिए उनसे इन लोगों को कुछ भी लाभ न होगा, यहोवा की यही वाणी है।

32. Ecce ego super (vel, ad, vel, contra) prophetantes somnia mendacii, dicit Jehova, et narrant illis et decipiunt populum meum in mendaciis suis et levitate sua; et ego (hoc est, quanquam ego) non miserim ipsos, neque mandaverim illis, et utilitate non proderunt (proficiendo non afferent utilitatem) populo huic, dicit Jehova.

यिर्मयाह फिर से झूठे शिक्षकों की ओर लौटता है, जो सब बुराइयों की जड़ थे; क्योंकि उन्होंने अपनी चापलूसियों से लोगों पर ऐसा मोहजाल डाल दिया था कि खरी और स्वर्गीय शिक्षा का सारा आदर लगभग बुझ गया था। परन्तु जब परमेश्वर यह घोषित करता है कि वह उनसे पलटा लेनेवाला है, तो वह लोगों को दण्ड से मुक्त नहीं करता। हम निश्चय जानते हैं कि त्यागे हुए लोगों को उचित प्रतिफल मिला, जब परमेश्वर ने शैतान के सेवकों की लगाम ढीली छोड़ दी कि वे बेरोक-टोक उन्हें धोखा दें। परन्तु क्योंकि लोग उन झूठे प्रलोभनों में सन्तुष्ट हो गए थे, इसलिए जब यिर्मयाह ने झूठे शिक्षकों को इतनी कठोरता से डाँटा, तो वह लोगों को स्मरण दिलाता है कि वे कैसी मूर्खता से उन मनुष्यों की छाया तले शरण लेकर अपने को सुरक्षित समझते थे।

वह पहले कहता है, देखो, जो भविष्यद्वक्ता मेरे वचन एक दूसरे से चुरा लेते हैं, मैं उनके विरुद्ध हूँ। बहुत से लोग इस पद की ऐसी व्याख्या करते हैं मानो परमेश्वर उन झूठे भविष्यद्वक्ताओं को दोषी ठहराता है, जो सच्चे भविष्यद्वक्ताओं से कुछ उधार ले लेते थे, ताकि वे उनके प्रतिद्वन्द्वी और मानो उनके नकलची बन सकें; और निःसन्देह अभक्त शिक्षक आरम्भ से ही कुछ बातें अपना लेते आए थे, ताकि वे परमेश्वर के सेवक समझे जाएँ। परन्तु यह विचार खींचतान का प्रतीत होता है, कि वे सच्चे भविष्यद्वक्ताओं से वचन चुराते थे, क्योंकि शब्द कुछ और ही बात प्रकट करते हैं, अर्थात् कि हर एक अपने मित्र से चुराता था; यिर्मयाह परमेश्वर के विश्वासयोग्य सेवकों को इस नाम से न पुकारता। मैं तो यह समझता हूँ कि यहाँ उनकी गुप्त चालों की ओर संकेत किया गया है, कि वे गुप्त रूप से और जान-बूझकर आपस में षड्यन्त्र रचते थे, और फिर अपनी सामान्य रीति के अनुसार अपनी कल्पनाएँ फैलाते थे। क्योंकि अभक्त और विश्वासघाती लोग, सीधे-सादे और असावधान लोगों में विश्वास पाने के लिए, आपस में सम्मति करते थे और अपनी सारी योजनाएँ चतुराई से गढ़ते थे, ताकि वे तुरन्त पकड़े न जाएँ; और इस प्रकार एक दूसरे से वह ले लेता था जिसे वह बाद में घोषित और प्रकाशित करता था। और इसी को यिर्मयाह चोरी कहता है, क्योंकि वे गुप्त रूप से सम्मति करते थे, और फिर जो कुछ आपस में तय करते थे उसे लोगों के सामने घोषित करते थे; और वे ऐसा करते थे मानो हर एक ने अपनी ईश्वरीय वाणी स्वर्ग से पाई हो। इसलिए मुझे कोई सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता इन छिपी हुई सम्मतियों को दोषी ठहराता है, जब वह कहता है कि हर एक ने अपने पड़ोसी से चुराया।

हम आज पोप-तन्त्र में भी यही बात देखते हैं, क्योंकि सन्यासियों और उसी प्रकार के सिद्धान्तहीन मनुष्यों की अपनी झूठी शिक्षाएँ हैं; और जब वे प्रचार-मंच पर चढ़ते हैं, तो हर एक ऐसे बोलता है मानो उसे कोई विशेष वरदान मिला हो; फिर भी वे हर एक अपने मित्र से चुराते हैं, क्योंकि वे उन भावी कहनेवालों या ज्योतिषियों के समान हैं, जो आपस में अपने झूठ गढ़ते थे, और केवल वही बाहर लाते थे जिसे वे साधारण लोगों को भरमाने के लिए आवश्यक समझते थे। अतः यह उन दोषों में से एक था जिनके विषय में भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि वे झूठे शिक्षकों में फैले हुए थे, — कि कोई भी परमेश्वर की वाणी पर ध्यान नहीं देता था, वरन् हर एक अपने मित्र से चोरी-छिपे वह ले लेता था जिसे वह बाद में खुले रूप से घोषित करता था।

113 इस वाक्य की विविध व्याख्याएँ की गई हैं: कुछ लोग कहते हैं कि उन्होंने सच्चे भविष्यद्वक्ताओं की रीति अपना ली, और उनके शब्दों का प्रयोग किया, जिसका एक उदाहरण यिर्मयाह 28:1-4 में मिलता है; और यही Scott का विचार है; दूसरों का मत है कि “यहोवा यों कहता है” कहने में की गई नकल की ओर संकेत है। यह भी सुझाव दिया गया है कि यहाँ वे अभिप्रेत हैं — जो सत्य को जानते हुए उसे लोगों से रोक रखते थे; और जो वे जानते थे उसे रोक रखना यहाँ चोरी के रूप में प्रस्तुत किया गया है। परन्तु इनमें से कोई भी विचार यहाँ प्रयुक्त शब्दों, “जो मेरे वचन हर एक अपने पड़ोसी से चुराते हैं,” की पर्याप्त व्याख्या नहीं करता। वे परमेश्वर के वचन थे जो लोगों को सौंपे गए थे, और इन भविष्यद्वक्ताओं ने उन्हें चुरा लिया, अर्थात् अपने झूठ और व्यर्थ स्वप्नों के द्वारा उन्हें निष्फल करके, जैसे कहा गया है कि शैतान मार्ग के किनारे के सुननेवाले के हृदय में बोया हुआ बीज चुरा ले जाता है। यही विचार Grotius, Venema, और Gataker का है। — सं.

वह दूसरे, आगे कहता है, देखो, मैं उन भविष्यद्वक्ताओं के विरुद्ध हूँ, जो अपनी जीभ को कोमल बनाते हैं। लगभग सभी व्याख्याकार {,}לקהlekech, का अर्थ मीठा या कोमल बनाना लेते हैं; और वे यह समझते हैं कि झूठे भविष्यद्वक्ता इसलिए दोषी ठहराए गए हैं, क्योंकि वे लाभ के लिए दुष्टों की चापलूसी करते थे; क्योंकि यदि वे उन्हें अप्रसन्न करते या चिढ़ाते, तो वे उन्हें अपने साथ जोड़ न सकते। तब वे सोचते हैं कि यहाँ जीभ को कोमल बनाने का अर्थ यह है कि उन्होंने अपनी जीभ का प्रयोग चिकनी-चुपड़ी और चापलूसी की बातें कहने में किया। परन्तु दूसरे लोग एक और व्याख्या देते हैं, — कि उन्होंने अपनी जीभ को इसलिए कोमल बनाया क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के सेवकों की नकल में अपने शब्दों को चमकाया, जिससे उनकी बोली मधु से भी अधिक मीठी हो गई। परन्तु क्योंकि {,}לקהlekech, का अर्थ ग्रहण करना और लेना है, और कभी-कभी ऊँचा उठाना, और कभी-कभी उठाकर ले जाना, तो मैं नहीं देखता कि इसे इसके उचित अर्थ में क्यों न लिया जाए। मुझे निश्चय ही इसके अर्थ को रूपक में बदलने का कोई कारण नहीं दिखता, जब इसे अपनी जीभ ऊँची करने के सरल अर्थ में लिया जा सकता है; वे अपने को ऊँचा उठाते थे, और बड़े-बड़े शब्दों में डींग मारते थे कि शिक्षा देने का पद उन्हें सौंपा गया है, क्योंकि हम जानते हैं कि झूठे शिक्षक कितने घमण्ड से अपने को ऊँचा उठाते हैं।

इसलिए इस पद को इस प्रकार लिया जा सकता है, कि परमेश्वर उन धोखेबाजों को दण्ड देगा जो अपनी जीभ ऊँची करते थे, अर्थात् जो घमण्ड से डींग मारते थे और साहसपूर्वक अपने लिए अधिकार का दावा करते थे, मानो वे स्वर्ग से आए दूत हों।

इसके बाद लिखा है, और वे कहते हैं, {,}נאםnam, वह कहता है। हम जानते हैं कि सब भविष्यद्वक्ताओं के लिए यह जोड़ना एक सामान्य बात थी, {,}נאם{ }יהוהnam Jeve, यहोवा की वाणी, या यहोवा का वचन, ताकि यह दिखाएँ कि वे कुछ भी नहीं कहते सिवाय उसके जो उन्होंने ऊपर से पाया था। और यदि हम इस पद को एक साथ जुड़ा हुआ पढ़ें, तो हम पाएँगे कि जो मैंने कहा है वह सत्य है — कि क्रिया {,}לקהlekech, का अर्थ प्रयुक्त चिकनाहट या चापलूसी नहीं, वरन् झूठे शिक्षकों की ऊँची डींग है, जो पवित्र आत्मा के साधन समझे जाना चाहते थे, और परमेश्वर का सारा अधिकार अपने लिए ले लेते थे। क्योंकि उनका घमण्ड यही था, कि वे आत्मविश्वास के साथ डींग मारते थे कि स्वयं परमेश्वर ने कहा है, और कहते थे कि यह वाणी है; और वे ऐसा इसलिए करते थे, कि जो कुछ वे बकबक करें वह निर्विवाद प्रतीत हो, यद्यपि यह पर्याप्त रूप से स्पष्ट था कि वे झूठ-मूठ परमेश्वर के नाम का बहाना करते थे।

वह तीसरे, आगे कहता है, देखो, मैं उनके विरुद्ध हूँ जो झूठ के स्वप्नों की भविष्यद्वाणी करते हैं। यहाँ यह कहना वास्तव में आवश्यक था, कि यद्यपि झूठे शिक्षक वह अपने लिए ले लेते थे जो केवल परमेश्वर के सेवकों का था, तौभी वे झूठे थे। इसके बाद वह आगे कहता है, वे उनका वर्णन करते हैं, और अपने झूठ और अपने ओछेपन से मेरी प्रजा को भरमाते हैं। इसका अर्थ यह है, कि वे भविष्यद्वक्ताओं के नाम का कितने ही घमण्ड से दावा क्यों न करते, फिर भी वे धोखेबाज थे, जो लोगों को अपने झूठे स्वप्न सुनाकर उन्हें धोखा देते थे। स्वप्न शब्द यहाँ अच्छे अर्थ में लिया गया है, परन्तु उसके साथ जोड़ा गया शब्द दिखाता है कि वे ऐसे स्वप्नों की डींग मारते थे जो केवल उनके अपने थे; और इसकी फिर पुष्टि होती है जब यिर्मयाह कहता है, कि वे अपने झूठ के द्वारा लोगों को धोखा देते थे; और वह आगे कहता है, अपने ओछेपन के द्वारा, जिसका अनुवाद कुछ लोग “चापलूसी” करते हैं। मुझे सन्देह नहीं कि इसका अर्थ उनकी कल्पनाएँ हैं, जो व्यर्थ थीं, क्योंकि वे केवल व्यर्थ ढिठाई से निकलती थीं। 114 कुछ लोग हैं जो Houbigant के साथ यह मानते हैं कि इस शब्द में अक्षरों का स्थानान्तरण हुआ है, अर्थात् {{ח पहले होने के बदले अन्त में रखा गया है; और तब इसका अर्थ चिकना बनाना होगा। परन्तु यह इस खण्ड के अनुकूल नहीं है। सम्भावित विचार वह है जो Sept. ने भावानुवाद के रूप में दिया है, “जो जीभ की भविष्यद्वाणियाँ भेजते हैं;” वे अपनी भविष्यद्वाणियाँ अपने ही हृदयों और अपनी ही जीभों से निकालते थे, और कहते थे कि वे परमेश्वर की ओर से आई हैं। वे केवल अपनी जीभों को लेते या प्रयोग करते थे, और साथ ही परमेश्वर के वचन बोलने का दावा करते थे। या हम जीभ के लेने या प्रयोग करने का अर्थ केवल दावा करना मान सकते हैं, मानो यह कहा गया हो, “जो दावा करते और कहते हैं, ‘वह कहता है।’” Syr. में है, “जो अपनी ही जीभों को विकृत करते हैं,” जिसका अर्थ है कि वे उनका झूठा प्रयोग करते थे; और Targ. में, “जो अपने ही हृदय की इच्छा के अनुसार भविष्यद्वाणी करते हैं।” — सं.

वह आगे कहता है, यद्यपि मैंने उन्हें न भेजा और न आज्ञा दी। इस निषेध पर विशेष ध्यान देना चाहिए; क्योंकि परमेश्वर दिखाता है कि जब सच्चे और झूठे शिक्षकों के विषय में प्रश्न उठे, तो हमें किस प्रकार निर्णय करना है। इसलिए जो कुछ परमेश्वर की आज्ञा के बिना है, वह वायु के समान है, और आप ही उड़ जाएगा। अतः परमेश्वर की आज्ञा को छोड़ और किसी बात में दृढ़ता नहीं है। इससे यह निकलता है, कि जो लोग अपनी ही कल्पनाओं के अनुसार बोलते हैं वे सब झूठे हैं, और जो कुछ वे प्रस्तुत करते हैं उसमें कोई वज़न नहीं; क्योंकि परमेश्वर इन दोनों बातों को एक दूसरे के विरोध में रखता है; एक ओर झूठ और ओछापन है, और दूसरी ओर उसकी आज्ञा और उसकी बुलाहट। इससे यह निकलता है, कि कोई भी, जब तक वह सीधे-सीधे परमेश्वर की आज्ञा न माने और जो कुछ उसने उससे पाया है उसे विश्वासयोग्यता से घोषित न करे, किसी गिनती में नहीं हो सकता; क्योंकि उसका सारा वज़न एक पंख से भी हल्का है, और उसकी सारी दिखावटी बुद्धि झूठ है।

अन्त में वह कहता है, कि उनसे उसकी प्रजा को कोई लाभ न होगा। इन शब्दों में वह लोगों को चेतावनी देता है कि वे उनसे महामारी के समान बचें। परन्तु हम देखते हैं कि संसार इस विषय में अपने को कैसी छूट देता है; क्योंकि जो ऊँघते हैं वे अज्ञानता के बहाने अपने को निर्दोष ठहराना चाहते हैं, और सारा दोष अपने चरवाहों पर डाल देते हैं, मानो वे स्वयं संकट की पहुँच से बाहर हों। परन्तु प्रभु ने यहाँ लोगों को स्मरण दिलाया, कि जिन शिक्षकों को उन्होंने ग्रहण किया था वे विनाशकारी थे; यद्यपि एक और कारण से उसने यह साक्षी दी कि वे निकम्मे थे, और यह इसलिए कि वह यहूदियों के व्यर्थ भरोसे को झाड़ दे, जो परमेश्वर की सब धमकियों के विरुद्ध यह ढाल खड़ी करने के आदी थे, कि उनके झूठे शिक्षक उनसे अद्भुत बातों की प्रतिज्ञा करते हैं। आगे लिखा है, —

यिर्मयाह 23:33

33. और जब ये लोग, या कोई भविष्यद्वक्ता, या कोई याजक तुझ से पूछे, कि यहोवा का भार क्या है? तब तू उनसे कहना, कौन सा भार? यहोवा की यह वाणी है, मैं तुम को त्याग दूँगा।

33. Quod si interrogaverint to populus hic, vel Propheta, vel Sacerdos, dicendo. Quod onus Jehovae? Tunc dices illis, Quod onus? Derelinquam vos, inquit Jehova.

इस खण्ड से यह पर्याप्त रूप से स्पष्ट होता है, — कि यहूदियों का हठ इतना बड़ा था, कि वे अपनी संवेदनहीनता के लिए हर ओर से कोई न कोई बहाना ढूँढ़ते थे, मानो वे उसके वचन को ठुकराकर परमेश्वर को बेरोक-टोक तुच्छ जान सकते हों। क्योंकि शैतान अपनी चाल से त्यागे हुए लोगों पर मोहजाल डालता है, जब वह परमेश्वर के वचन को या तो घृणित या तुच्छ बना देता है; और जब कभी वह उनके मनों को ऐसा चिढ़ा देता है कि वे परमेश्वर का वचन घृणा और कड़वाहट के बिना सुनते ही नहीं, तब वह अपना उद्देश्य पूरी रीति से पा लेता है। अतः यहूदी ऐसी मनोदशा में पहुँचा दिए गए थे, कि वे परमेश्वर के वचन को घृणा की दृष्टि से देखते थे; और इस प्रकार वे सारी शिक्षणीयता से और धर्म की हर चिन्ता से दूर हो गए थे। संक्षेप में, भविष्यद्वक्ता, जैसा भली-भाँति ज्ञात है, सर्वत्र {,}משאmesha, शब्द का प्रयोग करते हैं, जिसका अर्थ है भार।

115 Sept. इस शब्द का अनुवाद “भ्रम” करता है; Vulg. “आश्चर्यकर्म”; Syr. “लम्पटता”; और Targ. “उतावलापन।” यह एक ऐसी क्रिया से निकला है जिसका अर्थ है फूलना, उमड़ना। स्त्रीलिंग संज्ञा के रूप में यह केवल यहीं मिलता है, और कृदन्त संज्ञा के रूप में दो स्थानों पर, न्यायियों 9:4, और सपन्याह 3:4, जिन स्थानों पर इसका अर्थ स्पष्टतः लम्पट मनुष्य है; और मैंने एक बार सोचा था कि यहाँ प्रयुक्त होकर इसका अर्थ लम्पटता है; देखिए छोटे भविष्यद्वक्ताओं पर खण्ड 4 में सपन्याह 3:4 पर टिप्पणी: परन्तु अब मैं समझता हूँ कि यहाँ सबसे उपयुक्त अर्थ शब्दों में अति या उमड़ाव है — डींग भरी शेखी। झूठे भविष्यद्वक्ता डींग मारते थे कि वे परमेश्वर के नाम से भविष्यद्वाणी कर रहे हैं; वे झूठ बोल रहे थे, और डींग मार रहे थे कि वे परमेश्वर के भेजे हुए हैं। इस प्रकार वे लोगों को भटकाने में सफल हुए। Venema इसका अनुवाद “व्यर्थ शेखी” करता है। देखो, मैं उनके विरुद्ध हूँ जो भविष्यद्वाणी करते हैं झूठे स्वप्नों की, यहोवा की यह वाणी है; और जो उनका वर्णन करते हैं, ताकि भटका दें मेरी प्रजा को अपने झूठ और अपनी डींगों के द्वारा। इसके बाद उनकी डींगों का वास्तविक खण्डन आता है, क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें “न भेजा” और न “आज्ञा दी” थी; और पद का निष्कर्ष उनके झूठ की ओर संकेत करता है, क्योंकि जो कुछ वे कहते थे उससे लोगों को “कुछ लाभ न” होता। इस प्रकार हम इस पद में और अगले पद में कही गई बातों के बीच पूर्ण संगति देखते हैं, और क्रम भविष्यद्वक्ताओं की सामान्य शैली के अनुसार है, अर्थात् उत्तरार्ध में वह उलट दिया गया है; उनकी डींगें झूठी थीं, क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें नहीं भेजा था; और उनके झूठ व्यर्थ थे, क्योंकि उनसे लोगों को कोई लाभ न होता। — सं.

अब, भार का अर्थ है ऐसी भविष्यद्वाणी जो परमेश्वर को तुच्छ जाननेवालों को पलटे की धमकी देकर भयभीत करती है। अतः क्योंकि उनके मन चिढ़े हुए थे, वे घृणा के कारण परमेश्वर के वचन को भार कहते थे, और इसे एक कहावत के रूप में प्रयोग करते थे, “यह भार है, भार।” उन्हें परमेश्वर की धमकियों से प्रभावित होना चाहिए था, और यह सुनकर काँपना चाहिए था कि वह उनसे क्रोधित है। अतः भार शब्द से उन्हें नम्र होना चाहिए था; परन्तु इसके विपरीत, वे चिढ़ गए, पहले तो घमण्ड के कारण, फिर अदम्य हठ के कारण, और तीसरे, वे क्रोध से भड़क उठे। इससे हम देखते हैं कि यह कथन कैसे उत्पन्न हुआ, कि भविष्यद्वक्ता अपनी भविष्यद्वाणियों को भार कहते थे। परमेश्वर अब इस उन्माद को कठोरता से दोषी ठहराता है, क्योंकि उन्होंने इस प्रकार खुलेआम अपनी ढिठाई दिखाने में संकोच नहीं किया। निश्चय ही यह अत्यन्त लज्जा की बात थी, कि मार्गों और गलियों में परमेश्वर का वचन इस प्रकार घृणा और तिरस्कार से पुकारा जाए; क्योंकि इस प्रकार वे परमेश्वर के विरुद्ध घृणा और ढिठाई से व्यवहार करते थे; क्योंकि यह ऐसा ही था मानो वे उसके वचन का खुला तिरस्कार करते हों। अतः इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि उसने इतनी प्रचण्डता से इस उन्माद को डाँटा, यह कहकर, परन्तु यदि ये लोग तुझ से पूछें, यहोवा का भार क्या है?

पूछने का यह ढंग पूर्णतः उपहासपूर्ण था, जब वे यिर्मयाह से और परमेश्वर के अन्य सेवकों से कहते थे, “भार क्या है?” अर्थात्, “तू हमारे पास क्या लाया है, हम पर कौन सी विपत्ति आनेवाली है?” इस प्रकार वे न केवल परमेश्वर के वचन के विषय में तिरस्कार से बोलते थे, वरन्, मानो यह दुष्टता पर्याप्त न थी, वे, जैसा मैं कह चुका हूँ, चिढ़ गए और क्रुद्ध हो गए। तो यदि वे तुझ से पूछें, भार क्या है?

और वह केवल साधारण लोगों के विषय में नहीं, वरन् स्वयं भविष्यद्वक्ताओं और याजकों के विषय में भी बोलता है।

इससे हम सीखते हैं कि उस समय परमेश्वर के प्रति कितना बड़ा तिरस्कार फैला हुआ था, कि न तो याजकीय वर्ग में और न भविष्यद्वक्ताओं के वर्ग में कोई खराई थी। यह वास्तव में आश्चर्य की बात है कि वे कैसी निर्लज्जता से अपने को परमेश्वर के सेवक कहकर डींग मारने का साहस करते थे, जबकि वे इतनी ढिठाई से बोलते थे! परन्तु हमारे दिनों में भी संसार में यही होता है; क्योंकि हम देखते हैं कि शैतान के सेवक संसार को किसी और रीति से अपने वश में नहीं रखते, सिवाय अभक्त लोगों के मनों को लुभाने के; और साथ ही वे परमेश्वर के वचन को घृणित बना देते हैं, और कहते हैं कि वह न केवल विपत्तियाँ, वरन् यातनाएँ भी लाता है।

तो जब ऐसे सिद्धान्तहीन लोग, जो इस प्रकार सच्ची शिक्षा को घृणा और तिरस्कार की दृष्टि से देखते हैं, प्रचार-मंचों पर अधिकार जमाए बैठे हैं, तो हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए कि यही बुराई प्राचीन कलीसिया में भी फैली हुई थी।

आगे यह लिखा है: यदि कोई नबी या याजक तुझ से पूछे, यहोवा का भार क्या है? तो तू उनसे कहना, कौन सा भार? मैं तुझे त्याग दूँगा, यहोवा की यही वाणी है। यह एक अत्यन्त भयंकर धमकी थी, परन्तु इस पर भली-भाँति विचार नहीं किया गया और इसे ठीक से समझा नहीं गया; क्योंकि व्याख्याकारों ने उस निहित विरोध की ओर ध्यान नहीं दिया जो परमेश्वर की उपस्थिति और उसकी अनुपस्थिति के बीच है। यहूदियों को परमेश्वर की चुप्पी से बढ़कर और कुछ भी प्रिय न हो सकता था। और फिर भी वह किसी और रीति से इतनी स्पष्टता से यह नहीं दिखाता कि वह हमारा पिता है और हमारे उद्धार की चिन्ता करता है, जितना हम से घनिष्ठता के साथ बातें करके दिखाता है। इसलिए जब कभी नबूवत का वचन सुनाया जाता है, तब हमारे पास परमेश्वर की उपस्थिति का एक निश्चित और स्पष्ट प्रमाण होता है, मानो वह हम से जुड़ा रहना चाहता हो। परन्तु जब दुष्ट लोग इतने बड़े उपकार को न केवल ठुकराते हैं, वरन् जहाँ तक उनसे बन पड़ता है ऐसे अनुग्रह को क्रोध में आकर दूर धकेलते हैं, तब वे परमेश्वर की अनुपस्थिति की इच्छा करते और उसी को ढूँढ़ते हैं। इसलिए परमेश्वर कहता है, “तुम मेरा वचन सह नहीं सकते, जिस चिह्न के द्वारा मैं दिखाता हूँ कि मैं तुम्हारे बीच उपस्थित हूँ; मैं तुम्हें त्याग दूँगा;” अर्थात्, “मैं यह अपमान अब और न सहूँगा, वरन् तुम्हारे पास से चला जाऊँगा; आगे से कोई नबूवत न होगी।”

पहली दृष्टि में यहूदियों को यह भारी बात न लगी; क्योंकि, जैसा मैं कह चुका हूँ, दुष्ट लोग इससे बढ़कर और कुछ नहीं चाहते कि परमेश्वर चुप रहे, और जब वे अपने विवेक को सुलाकर अपनी गन्दगी में मग्न रहते थे, तब वे समझते थे कि उन्होंने अपना सबसे बड़ा सुख पा लिया है। तब उनकी सबसे बड़ी इच्छा यही थी कि परमेश्वर उनके पास से चला जाए। परन्तु फिर भी इससे बढ़कर डरने योग्य और कुछ न था। इसलिए नबी यहाँ दिखाता है कि वे अत्यन्त मूढ़ हो गए थे और शैतान ने उन्हें पूरी रीति से मोहित कर लिया था, क्योंकि वे इससे अधिक भयानक कोई बात नहीं चाह सकते थे कि परमेश्वर उनके पास से चला जाए; मानो वह कहता हो, “मेरा वचन तुम्हें उबाऊ लगता है, और अब मैं भी बदले में अपना पलटा लूँगा, क्योंकि मैं तुम्हें सहते-सहते थक गया हूँ, जब मैं देखता हूँ कि तुम किसी भी रीति से चंगे नहीं हो सकते; और जैसे मैं अब तक तुम्हें सिखाने में लगा रहा, और तुम्हें सीखने के अयोग्य पाया, वैसे ही अब मैं भी बदले में तुम्हें छोड़ दूँगा।” आगे लिखा है, —

यिर्मयाह 23:34

34. और जो नबी या याजक या साधारण मनुष्य “यहोवा का भार” ऐसा कहे, उस मनुष्य को और उसके घराने को मैं दण्ड दूँगा।

34. Et propheta et sacerdos et populus qui dixerit, Onus Jehovae, visitabo super virum illum (hoc est, quicunque fuerit, sive propheta, sive sacerdos, sive homo quispiam vulgaris, visitabo super virum illum,) et super domum ejus.

नबूवत को निःसन्देह भार कहा जा सकता था, जब कोई दुःखद बात सुनाई जाती थी; परन्तु उसे तब भी ऐसा कहा जा सकता था, जब मनुष्यों को परमेश्वर का भय मानने के लिए जगाया जाता था, या जब उन्हें मन फिराने का उपदेश दिया जाता था। परन्तु परमेश्वर यहाँ उस दुष्ट अभक्ति की ओर संकेत करता है, जब मनुष्य उपहास में किसी भी नबूवत को भार कहने का दुस्साहस करते थे। और इससे प्रकट होता है कि वे सब अपने पापों के ऐसे वश में हो गए थे कि परमेश्वर के न्याय का नाम भी उन्हें घृणित लगता था। तो अब हम नबी का अभिप्राय समझते हैं जब उसने कहा कि परमेश्वर उन सब को दण्ड देगा जो उसके वचन को भार कहते थे; क्योंकि स्वयं नबी भी ऐसा कहा करते थे; और हम पाते हैं कि यिर्मयाह ने बहुत से स्थानों में इस शब्द का प्रयोग किया है। इसलिए वह यहाँ सामान्य रूप से नहीं बोलता, वरन् मानो उँगली से एक ऐसे दोष की ओर संकेत करता है जो फैला हुआ था; क्योंकि यहूदियों ने खरी शिक्षा के प्रति बैर में अपने आप को ऐसा कठोर कर लिया था कि वे कहते थे, “अरे! ये नबी धमकियाँ देकर और हम पर विनाश की घोषणा करके हमें डराने के सिवाय और कुछ नहीं करते; और इस सब का अन्त क्या होगा?” परमेश्वर कहता है कि जो कोई इस प्रकार बोलता था, उन सब को और उनके सारे घरानों को वह दण्ड देगा।

116 पद के उत्तरार्ध का अनुवाद सेप्टुआजिंट इस प्रकार करता है, “तुम ही वह ग्रहण किया हुआ (भार) हो, ({λὢμμα},) मैं तुम्हें चकनाचूर कर दूँगा, प्रभु की यही वाणी है;” वुल्गेट, “तुम ही वह भार हो, मैं निश्चय तुम्हें फेंक दूँगा, प्रभु की यही वाणी है;” सीरियाई, “यह प्रभु का वचन है; मैं तुम्हें उखाड़ दूँगा, प्रभु की यही वाणी है;” और तर्गुम, “नबूवत ऐसी ही है; मैं तुम्हें फेंक दूँगा, प्रभु की यही वाणी है।” ब्लेनी का विचार है कि इन शब्दों {}מח-{}משא{ }אתको इस प्रकार क्रमबद्ध किया जाना चाहिए {}המשא{, }אתם, जो सब अनुवादों और तर्गुम के अनुकूल है; अक्षर वही हैं, केवल भिन्न रीति से जोड़े गए हैं। निःसन्देह यही सही पाठ है, यद्यपि यह किसी हस्तलिखित प्रति में नहीं मिलता; क्योंकि अनुवाद और अर्थ दोनों इसके पक्ष में हैं। फिर क्रिया के विषय में, यहाँ सबसे उपयुक्त अर्थ है त्याग देना, जैसा ब्लेनी इसका अनुवाद करता है। तब पद इस प्रकार पढ़ा जाएगा, — 33. और जब यह प्रजा, या कोई नबी या याजक तुझ से यह पूछे, “यहोवा का भार क्या है?” तब उनसे कहना, “तुम ही भार हो;” और मैं तुम्हें त्याग दूँगा, यहोवा की यही वाणी है। ठट्ठा करनेवालों के लिए, जो मानो सच्चे नबियों को खेल बनाते थे, यह एक उचित उत्तर था। — सं.

इससे प्रकट होता है कि वह इस निन्दा से कितनी घृणा करता था; और इससे हम यह भी देखते हैं कि परमेश्वर की दृष्टि में उसके वचन का आदर कितना बहुमूल्य है; क्योंकि परमेश्वर हर प्रकार के पाप के विषय में ऐसा नहीं कहता कि वह अपना पलटा सन्तान तक पहुँचाएगा। यह ऐसा ही है मानो यिर्मयाह ने कहा हो, “जब मनुष्य परमेश्वर के वचन के विरुद्ध चिढ़ जाते और क्रोध से भर जाते हैं, तो यह सर्वथा असहनीय है।” और फिर भी यह बुराई केवल एक ही युग की बुराई नहीं है।

हम देखते हैं कि इस्राएली परमेश्वर की कठोरता की सदा शिकायत करते रहे; इसी से यह कथन है, “प्रभु की चाल टेढ़ी नहीं, वरन् हे इस्राएल के घराने, तुम्हारी ही चाल टेढ़ी है।” (यहेजकेल 18:25)

और यहाँ हमें मनुष्य के मन की दुष्टता पर ध्यान देना चाहिए; क्योंकि, जैसा पहले कहा जा चुका है, परमेश्वर हमें अपने पास बुलाकर इसके सिवाय और कोई उद्देश्य नहीं रखता कि हमें अनन्त जीवन और उद्धार का भागी बनाए। इसलिए परमेश्वर की यह योजना है कि हमारा उद्धार करने के लिए हमें ग्रहण करे; सब नबियों का यही अभिप्रेत लक्ष्य है; और इसी कारण नबी ने पहले परमेश्वर के वचन को गेहूँ कहा था; परन्तु मनुष्य क्या करते हैं? वे इस अनुग्रह को तुच्छ जानते हैं; और इतना ही नहीं, वरन् भोजन को विष बना देते हैं और परमेश्वर के क्रोध को भड़काने से नहीं रुकते। इसलिए वह उन्हें धमकाने को विवश हुआ। जब वह हमें सीखने के योग्य पाता है, तो वह पिता की सी कृपा के साथ भी हमें अपनी ओर खींचता है। परन्तु जब हम उसे क्रोध दिलाते हैं, तो हम उसे एक प्रकार से दूसरा स्वरूप धारण करने को विवश करते हैं, उसके इस कथन के अनुसार कि वह टेढ़े के साथ टेढ़ाई करेगा। (भजन संहिता 18:26) फिर भी जब परमेश्वर हमारे साथ कठोरता से व्यवहार करता है, तो हम शिकायत करते हैं। हम उससे लड़ते रहने से नहीं रुकते; परन्तु जब वह हमारी ढिठाई को रोकता और दबाता है, तो हम तुरन्त उससे वाद-विवाद करने लगते हैं, मानो वह अत्यन्त कठोर हो और उसका वचन हमें ठोकर खिलाता हो। यह ठोकर कहाँ से आती है? हमारी हठीली दुष्टता ही से। यदि मनुष्य अपने पापमय मार्ग का अन्त कर दें, तो प्रभु उनके साथ अपने व्यवहार की रीति बदल देगा, और उनके साथ कोमलता से व्यवहार करेगा और उन्हें अपने पंखों के नीचे चूज़ों के समान पालेगा; परन्तु वे ऐसा होने नहीं देते; वरन् जहाँ तक उनसे बन पड़ता है ऐसे व्यवहार को ठुकरा देते हैं। इसी से ऐसा होता है कि वे परमेश्वर के नाम से और उसके वचन से घृणा करते हैं। तो जब वे कहते हैं कि परमेश्वर अत्यन्त कठोर है, मानो उसका वचन भार हो, तो उनकी इस शिकायत का क्या बहाना है? कोई नहीं; क्योंकि वे स्वयं परमेश्वर के विरुद्ध हठीले हैं, और इस प्रकार उसका वचन उनके सिरों को तोड़ने, उन्हें चूर-चूर करने और नष्ट करने के लिए हथौड़ा बन जाता है। अब हम कारण देखते हैं कि परमेश्वर क्यों न केवल यह घोषणा करता है कि वह अपने वचन के इन दुष्ट तिरस्कार करनेवालों पर क्रोधित था, वरन् उनकी सन्तान पर भी वही पलटा लेने की घोषणा करता है।

यिर्मयाह 23:35

35. तुम लोग एक दूसरे से और अपने अपने भाई से यों पूछना, यहोवा ने क्या उत्तर दिया है? और यहोवा ने क्या कहा है?

35. Sic dicetis quisque ad socium suum, et quisque ad fratrem suum, Quid respondit Jehova? Et quid loquutus est Jehova?

यहाँ नबी अपनी बात को और स्पष्टता से समझाता है; वह दिखाता है कि परमेश्वर क्यों नहीं चाहता था कि उसके वचन को भार कहा जाए। क्यों? क्योंकि उन्होंने एक प्रकार से मार्ग बन्द कर दिया था, जिससे उन्हें परमेश्वर के वचन से कोई लाभ न मिलता था, क्योंकि वे उसे तिरस्कार और घृणा की दृष्टि से देखते थे; क्योंकि “भार” शब्द एक रुकावट था, जिससे वे परमेश्वर को कोई प्रवेश न देते थे, और न उसका वचन सुनने के लिए अपने कान खोलते थे। इसलिए परमेश्वर उन्हें खाली और निष्कपट हृदय के साथ आने की आज्ञा देता है; क्योंकि जब हम मान लेते हैं कि हमें परमेश्वर के वचन पर विश्वास करना चाहिए, और जब हम किसी ऐसी टेढ़ी भावना के वश में नहीं होते जो पूर्वाग्रह उत्पन्न करती और एक प्रकार से हमें बाँधे रखती है, जिससे हम ठीक निर्णय करने के लिए स्वतन्त्र नहीं रहते, तब यही सीखने योग्य आत्मा की सच्ची तैयारी है।

117 इस पद का आरम्भ पिछले पद के साथ जोड़कर, “तुम” के समानाधिकरण में, जिन्हें प्रभु ने त्याग देने की धमकी दी थी, अधिक अच्छा पढ़ा जाएगा, — तब उनसे कहना, “तुम ही भार हो;” और मैं तुम्हें त्याग दूँगा, यहोवा की यही वाणी है — 34. अर्थात् नबी और याजक और प्रजा: जो कोई कहेगा, “यहोवा का भार,” हाँ, मैं उस मनुष्य को और उसके घराने को दण्ड दूँगा। यहाँ शब्दों के क्रम में परिवर्तन पर ध्यान दो; पिछले पद में हम पाते हैं “प्रजा और नबी और याजक;” परन्तु यहाँ, “नबी और याजक और प्रजा।” चाहे वह कोई भी हो, चाहे नबी या याजक या प्रजा में से कोई एक, उस मनुष्य को दण्ड मिलना था। — सं.

तो इस खण्ड का आशय यह है, कि यहूदियों को अपनी निन्दाओं को त्यागकर परमेश्वर का वचन श्रद्धा के साथ सुनने के लिए अपने आप को तैयार करना था, क्योंकि सुनना परमेश्वर का हक है; और फिर यह कि यह वचन निष्कपट हृदयों से सुना जाना था, ताकि न ऊब, न घमण्ड, न घृणा, न कोई भ्रष्ट भावना उसके वचन पर सब के विश्वास करने और उसे श्रद्धा से सुनने में बाधा डाले। तो नबी का यही अभिप्राय है जब वह कहता है, “तुम आगे से अपनी अधर्मी बोली बदल डालोगे, और कहोगे, यहोवा ने क्या उत्तर दिया है? यहोवा ने क्या कहा है?” अर्थात्, वे स्वयं द्वार बन्द नहीं करेंगे, वरन् नम्र और सीखने योग्य होकर स्वेच्छा से परमेश्वर की पाठशाला में आएँगे, ताकि कोई बात उन्हें परमेश्वर का आदर करने और उसके वचन को ग्रहण करने से न रोके, कि वे उसकी धमकियों से भयभीत हों, और उसकी प्रतिज्ञाओं से आकर्षित होकर अपने आप को पूरी रीति से उसे समर्पित कर दें।

प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे, कि जैसे तेरे वचन पर निर्भर रहने से बढ़कर हमारे लिए कुछ भी उत्तम या हमारे परम सुख के लिए अधिक आवश्यक नहीं है, क्योंकि वह हमारे प्रति तेरी कृपादृष्टि का निश्चित बयाना है, — हाँ, यह वरदान दे, कि जैसे तूने हम पर ऐसा अनोखा उपकार किया है, जिसे तू प्रतिदिन हम पर प्रकट करता है, वैसे ही हम ध्यान लगाकर तेरी सुनें और सच्चे भय, नम्रता और दीनता के साथ अपने आप को तेरे अधीन करें, ताकि जो कुछ तुझ से निकलता है उसे ग्रहण करने के लिए हम नम्रता की आत्मा में तैयार रहें, और इस प्रकार तेरा वचन हमारे लिए न केवल बहुमूल्य, वरन् मधुर और आनन्ददायक भी हो, जब तक कि हम उस जीवन की सिद्धता का आनन्द न लें, जिसे तेरे एकलौते पुत्र ने अपने ही लहू से हमारे लिए प्राप्त किया है। — आमीन।

इक्यानवेवाँ व्याख्यान

यिर्मयाह 23:36

36. और “यहोवा का भार” इसका तुम फिर कभी उल्लेख न करना; क्योंकि हर एक मनुष्य का अपना वचन ही उसका भार होगा; क्योंकि तुम ने जीवित परमेश्वर, सेनाओं के यहोवा, हमारे परमेश्वर के वचनों को बिगाड़ दिया है।

36. Et oneris, Jehovae non recordabimini amplius, quia onus erit cuique sermo ejus; et pervertistis sermones Dei vivi, Jehovae exercituum, Dei nostri.

यिर्मयाह उसी विषय को आगे बढ़ाता है, कि हर एक को चाहिए कि शान्ति और नम्रता से परमेश्वर को बोलते हुए सुने; उसने कहा, जैसा हमने कल देखा, कि नबियों से यह पूछा जाना चाहिए कि परमेश्वर ने क्या कहा है और क्या उत्तर दिया है; इसके द्वारा उसने संकेत किया कि सीखने की तत्परता होनी चाहिए, ताकि परमेश्वर का वचन हमारे बीच विश्वास, अधिकार और आदर प्राप्त करे। वह फिर दोहराता है कि परमेश्वर “भार” शब्द को सह नहीं सकता था; क्योंकि, जैसा हमने कल समझाया, यहूदी इस शब्द का प्रयोग सामान्यतः घृणा या तिरस्कार प्रकट करने के लिए करते थे, क्योंकि वे खरी शिक्षा ग्रहण करने को तैयार न थे।

उन्हें “भार” शब्द का उल्लेख करने से मना करना ऐसा ही था मानो उसने कहा हो, “बोलने की यह रीति तुम्हारे बीच अब और प्रचलित न रहे।” फिर वह आगे कहता है, क्योंकि हर एक का अपना वचन ही उसका भार होगा। इन शब्दों के द्वारा वह दिखाता है कि नबूवतों में जो कड़वाहट है वह मानो आकस्मिक है; क्योंकि परमेश्वर मनुष्यों से बातें करने में इसके सिवाय और कोई उद्देश्य नहीं रखता कि उन्हें उद्धार के लिए बुलाए। इसलिए परमेश्वर का वचन अपने आप में मधुर और आनन्ददायक समझा जाना चाहिए। तो उसके प्रति यह कड़वाहट और घृणा कहाँ से आती है? केवल मनुष्यों की दुष्टता ही से। जैसे कोई रोगी अत्यन्त पौष्टिक भोजन खाकर भी पाता है कि वह विष बन गया है, और इसका कारण उसी में होता है; वैसे ही हमारे साथ भी है, यह हमारा ही दोष है कि परमेश्वर का वचन भार बन जाता है। इसके अतिरिक्त, नबी का अभिप्राय यह दिखाना था कि यहूदियों के पास यह शिकायत करने का कोई कारण न था कि नबूवतें उनके लिए दुःखदायी थीं और सदा किसी विपत्ति की घोषणा करती थीं; क्योंकि परमेश्वर मनुष्यों से कोमलता और कृपा के साथ बातें करना चाहता है, परन्तु उनकी दुष्टता के कारण वह उनके साथ कड़ाई से व्यवहार करने को विवश होता है। तौभी नबी इससे भी आगे जाता प्रतीत होता है, मानो उसने कहा हो, “यद्यपि नबूवतें बन्द हो जाएँ, तौभी हर एक अपने लिए आप ही नबी होगा; क्योंकि जब वे परमेश्वर के विरुद्ध कुड़कुड़ाते हैं, और उसका न्याय सह नहीं सकते, तो परमेश्वर के सेवक चाहे कितने ही चुप क्यों न रहें, फिर भी वे, जो इस प्रकार परमेश्वर के विरुद्ध उठने का दुस्साहस करते हैं, अपने दण्ड के लिए पर्याप्त कारण आप ही दे देंगे।”

अब हम नबी का अभिप्राय देखते हैं जब वह कहता है, तुम यहोवा के भार का फिर उल्लेख न करना; अर्थात्, “यह लज्जाजनक कहावत, जो परमेश्वर के वचन पर कलंक लगाती है, तुम फिर काम में न लाना; यह दुष्ट रीति बन्द हो जाए, क्योंकि नहीं तो तुम में से हर एक का अपना वचन ही उसका भार होगा;” इस प्रकार कारणवाचक अव्यय {,}כיki का अनुवाद किया जाना चाहिए। परन्तु यदि कोई दूसरा अर्थ अधिक पसन्द किया जाए, तो मुझे कोई आपत्ति नहीं, अर्थात् यह कि उन्हें उस कारण पर विचार करना चाहिए था कि परमेश्वर ने उनके साथ अधिक नम्रता से व्यवहार क्यों नहीं किया; और वह कारण यह था, कि उनका स्वभाव टेढ़ा था, और इस प्रकार उन्होंने उस पिता की सी कृपा को ठुकरा दिया जिसे वह दिखाने को तैयार था, यदि वे उसे ग्रहण करते।

यह खण्ड विशेष ध्यान देने योग्य है, क्योंकि हम देखते हैं कि अधिकांश लोग धमकियों और भयों को, जब वे उन्हें सुनाए जाते हैं, सह नहीं सकते। इसलिए वे स्वर्गीय शिक्षा के प्रति तिरस्कार और घृणा रखते हैं; और फिर भी कोई इस पर विचार नहीं करता कि परमेश्वर अपने वचन में उन्हें इतनी बार क्यों धमकाता और डराता है। क्योंकि यदि मनुष्य पाप करना छोड़ दें, तो परमेश्वर भी उनसे विवाद करना छोड़ देगा; परन्तु जब वे लगातार उसे क्रोध दिलाते हैं, तो क्या वह चुप रहे? और फिर, क्या उसके नबी जो कुछ न्यायसंगत है उस सब का उल्लंघन होने दें, और स्वयं परमेश्वर को तुच्छ जाना जाने दें? तो हम यह जान लें कि जब परमेश्वर हमारे साथ कठोरता से व्यवहार करता प्रतीत होता है, तो दोष हम में है, क्योंकि हम उसे वैसी पिता की सी भाषा बोलने नहीं देते जैसी वह सदा बोलता, यदि हम मार्ग में रुकावट न डालते।

नबी यह भी जोड़ता है, क्योंकि तुम ने जीवित परमेश्वर, सेनाओं के यहोवा, हमारे परमेश्वर के वचनों को बिगाड़ दिया है। शब्दों का अनुवाद इसी प्रकार किया जाना चाहिए। यहाँ वह उचित रूप से उन पर यह दोष लगाता है कि उन्होंने परमेश्वर के वचनों को बिगाड़ दिया, और वह भी दो प्रकार से: क्योंकि उन्होंने अपनी दुष्टता से परमेश्वर को उसकी इच्छा के विरुद्ध और प्रकार से बोलने के लिए विवश किया, और इसलिए भी कि वे उसके कार्यों के उलटे व्याख्याकार थे। क्योंकि यद्यपि परमेश्वर हमें कठोर ताड़ना दे, तौभी हमारा कर्तव्य है कि हम उसकी डाँट को नम्र आत्मा से ग्रहण करें, क्योंकि वह हमारे लिए आवश्यक है; परन्तु जब हम कुड़कुड़ाते और हठीले हो जाते हैं, तब हम परमेश्वर के वचन को बिगाड़ते हैं। इससे हम देखते हैं कि परमेश्वर का वचन केवल एक ही प्रकार से नहीं बिगाड़ा जाता, वरन् जब हम क्रोध में आकर उसका विरोध करते हैं, तब हम उसे अपने साथ कोमलता और कृपा से व्यवहार करने से रोकते हैं; और जब हम उसकी डाँट के अधीन नहीं होते, वरन् जब कभी वह हमें न्याय के लिए बुलाता है तब उसके विरुद्ध भड़क उठते हैं, तब भी हम यही करते हैं। और क्योंकि इस विषय में उनकी उच्छृंखलता इतनी बड़ी थी, इसलिए नबी यहाँ स्पष्ट शब्दों में परमेश्वर की सामर्थ्य को उनके विरुद्ध खड़ा करता है।

118 सेप्टुआजिंट और वुल्गेट में दिया गया यह वाक्य वही अर्थ रखता है जिसका उल्लेख कैल्विन ने पहले किया है, परन्तु सीरियाई में दिया गया एक दूसरा अर्थ है, “क्योंकि वचन, वह मनुष्य के लिए उसकी नबूवत हो,” अर्थात् प्रभु की नबूवत। इसका अर्थ यह प्रतीत होता है, कि भार, या नबूवत, हर मनुष्य को परमेश्वर का वचन समझना चाहिए, या उसे उसका वचन कहना चाहिए; उसे आगे भार नहीं, वरन् परमेश्वर का वचन कहा जाना था। कैल्विन और बहुत से अन्य लोगों के अनुसार इसका अर्थ यह है, “वह वचन, या वह वाक्यांश,” प्रभु का भार, “जिसका प्रयोग तुम उपहास में करते हो, सचमुच तुम्हारे लिए भार होगा।” इस दशा में {{כיका अनुवाद “नहीं तो” या “अन्यथा” किया जाना चाहिए। परन्तु आगे के शब्द भली-भाँति नहीं जुड़ते; और क्योंकि यहाँ दी गई आज्ञा की अवहेलना करने पर मिलनेवाले दण्ड का बाद में विशेष रूप से उल्लेख किया गया है, इसलिए यहाँ उसका उल्लेख करना अनुचित प्रतीत होता है। इसलिए मैं अन्तिम दो वाक्यांशों को निषेध के कारणों के रूप में मानने की ओर झुकता हूँ; और मैं यह अनुवाद देता हूँ, 36. और “यहोवा का भार” इसका उल्लेख तुम फिर न करना; क्योंकि भार, वह हर एक के लिए उसका वचन बन गया है; और तुम ने जीवित परमेश्वर के, सेनाओं के यहोवा, हमारे परमेश्वर के वचनों को बिगाड़ दिया है। “भार” शब्द का प्रयोग सब करते थे, वह एक सामान्य शब्द बन गया था; और उपहास में उसका प्रयोग करके उन्होंने जीवित परमेश्वर के वचनों को उसके वचन मानकर ग्रहण करने और उनका पालन करने के बजाय उन्हें तिरस्कार का विषय बना दिया। प्रक्रिया यह थी, पहले उन्होंने उनका उपहास किया, और फिर उन्हें तुच्छ जाना और उनकी उपेक्षा की। इसलिए परमेश्वर ने “यहोवा का भार” इस अभिव्यक्ति के प्रयोग का निषेध किया। ऊपर दिए गए अनुवाद पर एकमात्र आपत्ति यह है, कि ,{}היה जो भविष्यत् काल है, उसका अनुवाद वर्तमान काल में “बन गया है” किया गया है; परन्तु ऐसा प्रायः किया जाता है। इसके अतिरिक्त, {}כי भी कभी-कभी .{}ו के समान परिवर्तक होता है। — सं.

वह पहले कहता है कि वह जीवित परमेश्वर है; और इस शब्द के द्वारा उसने उन्हें स्मरण दिलाया कि वे दुष्ट, जो इस प्रकार उसके विरुद्ध अपनी निन्दाएँ उगलते थे, बिना दण्ड के न छूटेंगे; वह कहता है, “देखो, तुम्हारा किस से काम पड़ा है; क्योंकि तुम जीवित परमेश्वर से विवाद करते हो; यह दुस्साहस तुम्हारे ही सिरों पर लौट आएगा; इसलिए तुम एक घातक युद्ध छेड़ रहे हो।” दूसरे, वह जोड़ता है कि वह सेनाओं का यहोवा है; इस अभिव्यक्ति के द्वारा वह फिर अपनी सामर्थ्य दिखाता है। और तीसरे, वह कहता है कि वह उस प्रजा का परमेश्वर है; मानो उसने कहा हो कि उनकी अभक्ति न केवल परमेश्वर से विवाद करने का दुस्साहस करने में पागलपन थी, वरन् उसके साथ कृतघ्नता भी जुड़ी थी; क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें अपनी प्रजा के रूप में गोद लिया था, और उनका परमेश्वर होने की प्रतिज्ञा की थी।

तो अब हम नबी का अभिप्राय देखते हैं; पहले उसने उन्हें चेतावनी दी कि वे नबूवत की शिक्षा के प्रति अपने हृदयों में घृणा न रखें; दूसरे, उसने दिखाया कि सारा दोष उन्हीं में था, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर को अपने साथ कठोरता से व्यवहार करने के लिए विवश किया; और फिर, कि उन्होंने परमेश्वर के वचन को बिगाड़ दिया, क्योंकि वे उसके झूठे व्याख्याकार थे, और जब वह सब भक्तों और सीखने योग्य लोगों को निमन्त्रण देता था तब उन्होंने उसकी कृपा के लिए द्वार बन्द कर दिया; और अन्त में, वह परमेश्वर की सामर्थ्य को ऊँचा उठाता और उसकी भलाई की प्रशंसा करता है, ताकि इस प्रकार वह प्रजा के पाप को और भारी ठहराए, कि उन्होंने स्वयं परमेश्वर से युद्ध करने का दुस्साहस किया, और उन पर किए गए अनुग्रह को तुच्छ जाना। आगे लिखा है, —

यिर्मयाह 23:37

37. तू नबी से यों पूछना, यहोवा ने तुझे क्या उत्तर दिया है? और यहोवा ने क्या कहा है?

37. Sic dices Prophetae, Quid respondit tibi Jehova? Et quid loquutus est tibi Jehova?

वह वही बात दोहराता है जिस पर हमने कल ध्यान दिया था, और लगभग उन्हीं शब्दों में। इसका अर्थ यह है, कि यदि हम परमेश्वर की पाठशाला में लाभ उठाना चाहते हैं, तो हमें सावधान रहना चाहिए कि हमारे मन पर पहले से कोई भ्रष्ट भावना अधिकार न जमा ले। क्योंकि ऐसा क्यों होता है कि परमेश्वर का वचन हमें स्वादिष्ट नहीं लगता, या हम में कड़वी आत्मा उत्पन्न करता है? इसी कारण कि हम किसी पापमय अभिलाषा या वासना से दूषित हैं जो हमारे विवेक को पूरी रीति से भ्रष्ट कर देती है। इसलिए परमेश्वर चाहता है कि हम हर दुष्ट प्रवृत्ति से मुक्त होकर उसके पास आएँ, और ऐसे सीखने योग्य बनें कि केवल यही पूछें कि वह क्या सिखाता है, वह हमें क्या उत्तर दे; क्योंकि जो कोई इस प्रकार उलझनों से छूटकर स्वतन्त्र हो जाता है, वह निःसन्देह नबूवत की शिक्षा को अपने लाभ के लिए पाएगा।

तो इसका केवल एक ही कारण है कि परमेश्वर का वचन हमें लाभ नहीं पहुँचाता, वरन् इसके विपरीत हमारे लिए हानिकारक और घातक होता है, और वह यह है, कि हम यह नहीं ढूँढ़ते कि परमेश्वर क्या कहता है, अर्थात्, कि हम सीखने योग्य नहीं हैं, और न सीखने के लिए आते हैं, वरन् आलस्य, या तिरस्कार, या कृतघ्नता, या हठ, या इसी प्रकार की कोई और बात हम पर राज्य करती है।

अब वह यहाँ कहता है, कि नबियों से यह पूछा जाना चाहिए कि परमेश्वर क्या कहता है, या वह क्या उत्तर दे। इन शब्दों में वह परमेश्वर के विश्वासयोग्य सेवकों को निर्दोष ठहराता है; क्योंकि यदि सुननेवाला आज्ञा मानने को तैयार हो, तो वह विश्वासयोग्य शिक्षक से वह पाएगा जो उचित रूप से उसे प्रसन्न करे और उसका भला करे। संक्षेप में वह दिखाता है कि जब नबियों की शिक्षा हमें अच्छी नहीं लगती, तो इसमें नबियों का कोई दोष नहीं, वरन् ऐसा इसलिए होता है कि हम उस बात पर ध्यान नहीं देते जो यिर्मयाह यहाँ हमें स्मरण दिलाता है, कि हमें परमेश्वर की सुननी चाहिए ताकि हम सीखें, और ताकि हम उसकी वाणी का पालन करें। आगे लिखा है, —

यिर्मयाह 23:38-39

38. परन्तु यदि तुम “यहोवा का भार” कहोगे; तो यहोवा यों कहता है, इसलिए कि तुम यह वचन “यहोवा का भार” कहते हो, यद्यपि मैं ने तुम्हारे पास यह कहला भेजा था कि “यहोवा का भार” मत कहना;

38. Quod si onus Jehovae dixeritis, propterea sic dicit Jehovah, Ne dicatis hoc verbum (hoc est, ne proferatis hunc sermonem) onus Jehovae; et misi ad vos (sed debet resolvi oratio, quum miserium ad vos,) et ne dicatis, onus Jehovae:

39. इस कारण देखो, मैं, हाँ मैं ही, तुम को पूरी रीति से भूल जाऊँगा, और तुम को और इस नगर को जिसे मैं ने तुम्हें और तुम्हारे पुरखाओं को दिया था, त्यागकर अपने सामने से दूर कर दूँगा;

39. Propterea ecce ego et tollam vos tollendo (vel, obliviscar vestri obliviscendo, ut alii vertunt; tertia est sententia, obliviscar vestri, ut tollam, vel, ad tollendum,) et evellam vos (vel, projiciam, melius; alii vertunt, relinquam, male,) et urbem hanc, quam dedi vobis et patribus vestris, a facie mea.

यहाँ नबी अपनी कही हुई बात की पुष्टि करता है, क्योंकि ऐसा प्रतीत हो सकता था कि परमेश्वर एक छोटी सी अभिव्यक्ति से इतना गम्भीर रूप से अप्रसन्न होकर आवश्यकता से अधिक क्रुद्ध हो गया है। यहूदियों ने यह बात स्वयं नबियों से उधार ली थी, जब वे नबूवतों को भार कहते थे, जैसा हम पहले कह चुके हैं, और जैसा हम बहुत से स्थानों में पाते हैं। अब क्योंकि भाषा बहुत फिसलनेवाली होती है, इसलिए यद्यपि यहूदियों ने एक शब्द के विषय में भूल की हो, तौभी यह उस दण्ड के लिए अपर्याप्त कारण प्रतीत हो सकता था जिसे देने की धमकी परमेश्वर ने दी थी। परन्तु नबी यहाँ दिखाता है कि परमेश्वर का उन पर क्रोधित होना न्यायसंगत था, क्योंकि उसने उनके पास दूत भेजे थे, और उन्हें बार-बार चेतावनी दी थी कि बोलने की इस रीति का प्रयोग न करें, जो उनकी अभक्ति का स्पष्ट प्रमाण थी। तो जब उन्होंने इस प्रकार परमेश्वर और उसकी चेतावनियों की अवहेलना की थी, तो क्या यह क्षमा के योग्य भूल थी? संक्षेप में, यिर्मयाह दिखाता है कि उन्होंने बिना सोचे-समझे भूल नहीं की थी, जैसा प्रायः उनके साथ होता है जो उतावली और असावधानी से बोलते हैं, वरन् बोलने की यह टेढ़ी रीति ठानी हुई दुष्टता से, परमेश्वर के वचन पर कलंक का कोई चिह्न लगाने की इच्छा से निकली थी; और इस प्रकार वे स्वयं परमेश्वर के प्रति तिरस्कार का व्यवहार करते थे। तो शब्दों का आशय यही है।

यदि तुम कहोगे, अर्थात् तब भी जब मैं तुम्हें इस रीति से न बोलने की चेतावनी देता हूँ; तो यदि तुम इस हठ में बने रहोगे, तो देखो मैं, इत्यादि; परमेश्वर यहाँ घोषणा करता है कि वह पलटा लेगा। इस वाक्य के विषय में, अधिकांश व्याख्याकार क्रिया को {,}נשה nushe से निकालते हैं, और {,}הhe को अन्तिम अक्षर बनाते हैं; परन्तु मुझे इसके सही होने में सन्देह है; तौभी यदि यह व्याख्या अपनाई जाए, तो भी हमें यह मानना होगा कि नबी उस क्रिया की ओर संकेत करता है, अर्थात् “उठा ले जाना,” जो तुरन्त बाद आती है। परन्तु मैं एक दूसरा विचार अपनाने की ओर झुकता हूँ, कि परमेश्वर उन्हें हटाते हुए हटा देगा। यह ध्यान देना चाहिए कि {,}משא mesha शब्द, जिसका बार-बार उल्लेख किया गया है, उसी धातु से निकला है; {,}משאmesha, अर्थात् भार, {,}נשאnusha से निकला है, जिसका अर्थ है हटाना या उठा ले जाना। इसलिए क्योंकि यह कहावत सामान्य रूप से प्रचलित थी कि नबूवत की शिक्षा सदा कोई भार और विपत्ति लाती है, परमेश्वर उत्तर देता है, “मैं तुम्हें उठा ले जाऊँगा;” अर्थात्, “तुम अनुभव से जान लोगे कि तुम्हारी दुष्टता मेरे लिए कितनी दुःखदायी और भारी है, वह तुम्हारे ही सिरों पर लौट आएगी; तुम ने मेरे वचन पर भार लादा और उसका अपमान किया है, और मैं भी तुम्हारा अपमान करूँगा,” परन्तु किस रीति से? मैं तुम्हें उठा ले जाते हुए उठा ले जाऊँगा।

119 “तू नबी से यों पूछना,” अर्थात् तुम में से हर एक। एकवचन का प्रयोग, जैसा प्रायः होता है, बहुवचन के स्थान पर किया गया है। सीरियाई तो बहुवचन ही अपनाता है, “तुम यों पूछना,” इत्यादि। यहाँ उन्हें बताया गया है कि वे किसी नबी को किस प्रकार सम्बोधित करें। — सं.

यदि किसी को भूल जाने का अर्थ अधिक अच्छा लगे, तो वह अपने ही निर्णय का अनुसरण करे; परन्तु मुझे वह व्याख्या, “मैं तुम्हें भूल जाऊँगा,” अर्थहीन प्रतीत होती है, जब तक कि {,}נשא nusha को दूसरे स्थान पर उठा ले जाने के अर्थ में न लिया जाए: “मैं तुम्हें भूल जाऊँगा, ताकि तुम्हें उठा ले जाऊँ।”

वह आगे कहता है, और मैं तुम्हें उखाड़ डालूँगा; जिसका अनुवाद कुछ लोग करते हैं, “मैं तुम्हें त्याग दूँगा,” परन्तु वे यह समझते प्रतीत नहीं होते कि नबी का अभिप्राय क्या था; क्योंकि जब वह कहता है, मैं तुम्हें उखाड़ डालूँगा, तो वह पहले से भी अधिक दुःखदायी और भयानक बात की घोषणा करता है; और फिर भी यह अर्थ मुझे सन्तुष्ट नहीं करता। क्रिया {,}נטשnuthash का अर्थ है फैलाना, और लाक्षणिक रूप से दूर फेंक देना; और दूर फेंक देना या निकाल फेंकना इस खण्ड के लिए सबसे उपयुक्त प्रतीत होता है। तो परमेश्वर यहूदियों को न केवल उनके अपने स्थान से हटाएगा या उठा ले जाएगा, वरन् उन्हें दूर-दूर के देशों में फेंक भी देगा। इस प्रकार वह उन पर ऐसे निर्वासन की घोषणा करता है, जिसके द्वारा वे मानो एक दूसरे संसार में खदेड़ दिए जाने को थे। क्योंकि यदि वे पास-पड़ोस में बसते, तो यह उनके लिए अधिक सहनीय होता, परन्तु क्योंकि वे मानो किसी प्रचण्ड आँधी के द्वारा सबसे दूर और सबसे सुदूर देशों में खदेड़े जाने को थे, इसलिए यह कहीं अधिक दुःखदायी था।

इसके बाद वह कहता है, और उस नगर को भी जिसे मैं ने तुम्हें और तुम्हारे पुरखाओं को दिया था। फेंक देना और उखाड़ डालना, ये क्रियाएँ पत्थरों पर भली-भाँति नहीं बैठतीं; परन्तु अर्थ के विषय में, यह ठीक ही कहा जा सकता है कि परमेश्वर नगर को उसके निवासियों समेत उठा ले जाएगा, मानो वे आँधी से उड़ा दिए गए हों। और यह जानबूझकर जोड़ा गया था, क्योंकि यहूदी इस प्रतिज्ञा पर भरोसा करके, “यह सदा के लिए मेरा विश्रामस्थान है, यहीं मैं वास करूँगा,” यह सोचते थे कि परमेश्वर के पवित्रस्थान का कभी नष्ट होना असम्भव है। तो क्योंकि इस व्यर्थ भरोसे ने उन्हें धोखा दिया, कि जिस नगर को परमेश्वर ने अपने निवास के लिए चुना था वह सदा स्थिर रहेगा, इसलिए नबी स्पष्ट रूप से जोड़ता है कि स्वयं नगर भी नष्ट हो जाएगा।

और यह भी जोड़ा गया है, कि वह उन्हें और उनके पुरखाओं को दिया गया था। वह सब आपत्तियों का पहले से उत्तर देता है, और यहूदियों से उस व्यर्थ आशा को झाड़ देता है जिससे वे मतवाले हो गए थे, अर्थात् यह कि नगर उन्हें सदा के लिए दिया गया था, और परमेश्वर उनकी रक्षा करने के लिए वहाँ वास करता था; वह कहता है, “यह दान न तुम्हें और न स्वयं नगर को विनाश से बचाएगा।” वह जोड़ता है, अपने सामने से; क्योंकि जब वे नबियों की धमकियों के विरुद्ध अपने हृदयों को कठोर करना चाहते थे, तब परमेश्वर के नाम का बहाना करना उनकी रीति थी; परन्तु परमेश्वर यहाँ उन्हें उत्तर देता है और कहता है, अपने सामने से; मानो उसने कहा हो, “तुम नगर और मन्दिर के सदा बने रहने का जो विचार मन में पालते हो वह व्यर्थ है; क्योंकि यह मेरी इच्छा और सुप्रसन्नता पर निर्भर है। इसलिए जब तुम वैसे ही खड़े रहते या गिरते हो जैसा मुझे उचित लगता है, तो मैं अब घोषणा करता हूँ कि तुम निकाल दिए जाओगे और मेरे सामने से पूरी रीति से हटा दिए जाओगे।” आगे लिखा है, —

120 इस वाक्यांश के विषय में अनुवादों में जो भिन्नता है, और व्याख्याकारों ने इसकी जो भिन्न-भिन्न रचनाएँ दी हैं, वे पाठ में किसी गड़बड़ी का संकेत करती प्रतीत होती हैं; और पाठ स्वयं, जैसा वह अब है, (और इसके कोई भिन्न पाठ नहीं हैं,) इब्रानी मुहावरे के अनुसार नहीं है; क्योंकि {,{הנני, “देख, मैं,” के बाद सामान्यतः, यदि सदा नहीं, एक कृदन्त आता है और फिर भूतकाल में परिवर्तक {}ו से पहले आनेवाली एक क्रिया आती है। देखिए यिर्मयाह 9:7; यिर्मयाह 10:18; यिर्मयाह 16:16। यहाँ ऐसा नहीं है। इसके अतिरिक्त, जब एक क्रिया और वही क्रिया क्रियार्थक संज्ञा के रूप में एक साथ रखी जाती हैं, जो कोई असामान्य बात नहीं है, तो सामान्यतः, यदि सदा नहीं, क्रियार्थक संज्ञा क्रिया से पहले आती है; यहाँ ऐसा नहीं है, यदि हम ,{}נשיתי को, जैसा अधिकांश लोग करते हैं, .{}נשא से निकला हुआ मानें। ये असंगतियाँ पाठ में, जैसा वह अब है, स्पष्ट हैं। मान लीजिए कि एक शब्द अपने स्थान से हट गया है, और {}נשא को ,{}הנני के बाद रखिए, तो वाक्य व्याकरण की दृष्टि से पूरी रीति से शुद्ध हो जाएगा, और अनुवाद इस प्रकार होगा, — इस कारण, देखो, मैं तुम्हें उठा ले जाऊँगा और छोड़ दूँगा; हाँ, मैं तुम्हें और उस नगर को, जिसे मैं ने तुम्हें और तुम्हारे पुरखाओं को दिया था, अपने सामने से विदा कर दूँगा। भार की ओर संकेत करते हुए, वह कहता है कि वह उन्हें ऐसे उठा ले जाएगा जैसे कोई भार उठाता है, और फिर उन्हें छोड़ देगा, या नीचे पटक देगा: क्रिया {}נשה का अर्थ है ढीला करना, किसी वस्तु से अपने आप को छुड़ाना, छोड़ देना, जाने देना। फिर {}נמש का भी ऐसा ही अर्थ है, खोल देना, ढीला करना, मुक्त करना, विदा करना, निकाल फेंकना; जो यह सूचित करता है कि वह उन्हें मानो अपने सामने बने रहने न देगा। यह वही क्रिया है जो यिर्मयाह 23:33 में है। — सं.

यिर्मयाह 23:40

40. और मैं तुम पर सदा की नामधराई और सदा का अपमान डालूँगा, जो कभी भुलाया न जाएगा।

40. Et ponam super vos opprobrium aeternum, et opprobria (est quidem aliud verbum, dedecora) aeterna, quod oblivioni non tradetur (potest referri ad utrunque membrum: nam in plurali numero ponit {,}כלמות121 et postea addit verbum singulare, oblivioni non tradetur; sed potest, quemadmodum dixi, hoc extendi ad totum complexum.

यहाँ जो बात कही गई है वह यह है, कि यद्यपि यहूदी कुछ समय तक परमेश्वर की निज प्रजा होने पर उचित रूप से घमण्ड करते थे, तौभी इससे उन्हें कुछ लाभ न होगा, क्योंकि उन्होंने सच्चे धर्म को त्यागकर अपने आप को उस आदर से वंचित कर दिया था जिसमें वे श्रेष्ठ थे। इसलिए नबी यहाँ यहूदियों से उस मूर्खतापूर्ण घमण्ड को छीन लेता है जिससे वे फूले हुए थे जब वे कहते थे कि वे परमेश्वर की प्रजा हैं, और धमकी देता है कि परमेश्वर उनकी महिमा छीनकर उन्हें सदा की लज्जा के नीचे पड़े रहने देगा।

साथ ही हम जानते हैं कि ऐसी धमकियों को समय की दृष्टि से सीमित समझना चाहिए, वे केवल मसीह के आगमन तक फैली हुई हैं; क्योंकि परमेश्वर की कलीसिया अनन्त नामधराई के लिए ठहराई नहीं जा सकती थी। परन्तु कपटियों के विषय में, जैसे उनमें कोई मन फिराव न था, वैसे ही उन्हें कभी क्षमा न मिली; परन्तु जब छुड़ानेवाला मसीह प्रकट हुआ, तब परमेश्वर ने अपने लोगों को अनन्त नामधराई से छुड़ा लिया; तौभी इन शब्दों को परमेश्वर के दुष्ट तिरस्कार करनेवालों से उचित रूप से कहा हुआ समझना चाहिए। अब आगे लिखा है, —

121 यह तीन हस्तलिखित प्रतियों में, और सब प्राचीन अनुवादों में, और तर्गुम में एकवचन है; और आगे आनेवाली क्रिया की माँग है कि यह ऐसा ही हो, — 40. और मैं तुम पर सदा की नामधराई, और सदा की लज्जा डालूँगा, जो कभी भुलाई न जाएगी। पार्कहर्स्ट हमें बताता है कि “लज्जा” का शब्द “नामधराई” के शब्द से अधिक प्रबल है; परन्तु लज्जा वह भावना है, और इसका अनुवाद कभी-कभी “घबराहट” किया जाता है, और नामधराई वह है जो बाहरी रूप से अपमानजनक है। सेप्टुआजिंट और वुल्गेट में नामधराई और अपमान है, जिससे यह भेद प्रकट नहीं होता। नामधराई या अपमान ऐसा होना था कि वह ऐसी लज्जा उत्पन्न करे जो कभी भुलाई न जाए। बाहरी नामधराई का उल्लेख पहले है, और फिर उस लज्जा का जो वह उत्पन्न करेगी। — सं.

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