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यिर्मयाह 42
यिर्मयाह 42:1-3
1. तब सब दलों के प्रधान और कारेह का पुत्र योहानान, और होशायाह का पुत्र याजन्याह, और छोटे से लेकर बड़े तक सब लोग निकट आए,
1. Et accesserunt cuncti duces copiarum, et Joannes filius Kareah, et Jezaniah filius Ozamae, et totus populus a parvo usque ad magnum,
2. और यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता से कहने लगे, हमारी विनती ग्रहण करके हम बचे हुओं के लिये, अर्थात् इन सब बचे हुओं के लिये अपने परमेश्वर यहोवा से प्रार्थना कर; (क्योंकि तू अपनी आँखों से देख रहा है कि हम जो पहले बहुत थे, अब थोड़े ही बच गए हैं:)
2. Et dixerunt ad Jeremiam prophetam, Cadat Agedum precatio nostra coram facie tua, et ores pro nobis Jehovam Deum tuum pro omnibus reliquiis istis, quia relicti sumus exiguum e magno, sicuti oculi tui vident nos;
3. कि तेरा परमेश्वर यहोवा हम को बताए कि हम किस मार्ग से चलें, और कौन सा काम करें।
3. Et annuntiet nobis Jehova Deus tuus viam, per quam ambulemus, et rem quam faciamus.
मैं कह चुका हूँ कि योहानान, उसके साथियों और सारी प्रजा ने भविष्यद्वक्ता के पास आकर उससे कहीं अधिक दोष का काम किया, जितना यदि वे न आते और सीधे मिस्र को चले जाते तो करते; क्योंकि या तो वे कपट से आए थे, और इस प्रकार जान-बूझकर झूठ बोले, या वे अत्यन्त मूढ़ थे, और कपट ने उनकी समझ को पूरी रीति से हर लिया था। वे भविष्यद्वक्ता के पास सम्मति पूछने आए; वरन् इसलिए कि वह उनके लिए परमेश्वर का व्याख्याता हो, और वे इस प्रकार जान सकें कि क्या करना चाहिए; और उन्होंने आज्ञा मानने की प्रतिज्ञा भी की, जैसा हम आगे देखेंगे। बात चाहे जो रही हो, उन्होंने ऐसी ईश्वरवाणी माँगी जिसमें सन्तुष्ट रहना उनका कर्तव्य था, जब तक कि वे खुल्लमखुल्ला जूआ उतार फेंकने और अपने आप को परमेश्वर के घोर और अधर्मी तिरस्कार करनेवाले दिखाने का निश्चय न कर लें। वे भविष्यद्वक्ता के पास आए, जबकि उनका दृढ़ निश्चय यही था, जैसा हम देखेंगे, कि मिस्र को चले जाएँ।
जो सम्मति पूछता है, उसे पहले यह देखना चाहिए कि वह कोई पूर्वाग्रह लेकर न आए, वरन् स्वतन्त्र और सच्चे मन का हो; परन्तु यह तो बहुत ही साधारण दोष है कि मनुष्य जब पहले ही ठान चुके होते हैं कि क्या करना है, तब विचार-विमर्श करते और सम्मति पूछते हैं; वरन् इससे अधिक साधारण कुछ भी नहीं; क्योंकि जो परामर्श लेते हैं वे प्रायः यह सीखना नहीं चाहते कि क्या उचित है, परन्तु यह चाहते हैं कि दूसरे उनकी अपनी इच्छाओं के अनुकूल हो जाएँ। जिसने इस या उस बात का निश्चय कर लिया है, वह ऐसा दिखावा करता है मानो वह सन्देह में और असमंजस में पड़ा हो; वह पूछता है कि क्या करना चाहिए: यदि उत्तर उसकी इच्छा के अनुसार हो, तो वह कही हुई बात को अपना लेता है; परन्तु यदि जिससे परामर्श लिया गया है वह उस बात को अस्वीकार करे जिसे वह पहले ही करने का निश्चय कर चुका है, तो वह दी हुई सम्मति को ठुकरा देता है। ऐसा ही वह कपट था जिसका वर्णन भविष्यद्वक्ता करता है, जब सेना के प्रधान और सारी प्रजा उसके पास आए।
वह पहले सेना के प्रधानों का, और फिर कारेह के पुत्र योहानान और होशायाह के पुत्र याजन्याह का उल्लेख करता है। वह इन दोनों को अन्त में जोड़ता है; परन्तु यह उन्हें आदर देने के लिए था, जैसे स्वर्गदूत ने कहा, "जाओ, उसके चेलों और पतरस से कहो।" (मरकुस 16:7)
उसने पतरस को इसलिए अलग नहीं किया मानो वह बाकी सब से छोटा हो; परन्तु सब के विषय में सामान्य रूप से कहने के पश्चात् आदर के कारण वह उसका नाम लेता है। इसी प्रकार यहाँ भी भविष्यद्वक्ता प्रधानों का सामान्य रूप से नाम लेता है, परन्तु क्योंकि कारेह का पुत्र योहानान और याजन्याह मुख्य पुरुष थे, इसलिए वह स्पष्ट रूप से उनके नाम बताता है। वह जोड़ता है, छोटे से लेकर बड़े तक सारी प्रजा। इसका सम्बन्ध आयु से नहीं है; परन्तु उसका अर्थ यह है कि हर पद के सब लोग एक मन होकर यिर्मयाह के पास आए। तो यह थोड़े से मनुष्यों का षड्यन्त्र नहीं था, परन्तु छोटे से लेकर बड़े तक सब ने मिस्र जाने का निश्चय कर लिया था; और तौभी वे मानो सच्चे उद्देश्य से भविष्यद्वक्ता के पास आए; क्यों? वे चाहते थे कि उनकी अपनी टेढ़ी युक्ति परमेश्वर से स्वीकृत हो जाए, और इस प्रकार परमेश्वर को अपनी इच्छा और मनमौज के अधीन कर दें; क्योंकि वे अपने आप को उसके आत्मा के द्वारा चलाए जाने नहीं देते थे, परन्तु ढिठाई से उसके वचन की अवहेलना करते थे। इसलिए भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि वे सब एक ही पाप में फँसे हुए थे।
आगे कहा गया है कि उन्होंने, मानो आज्ञा मानने को तैयार हों, कहा, हमारी विनती तेरे सामने गिरे। जैसा हम कह चुके हैं, जब यह परमेश्वर से कहा जाता है तो यह दीनता का प्रमाण है; परन्तु यहाँ यह मनुष्य पर लागू किया गया है; और जब इब्रानी लोग दीनता से कोई निवेदन करते हैं, तो कहते हैं, "मेरी विनती तेरे सामने गिरे," अर्थात् जो कुछ मैं गिड़गिड़ाकर और दीनता से माँगता हूँ उसे सुन। उन्होंने कहा, हमारे लिए अपने परमेश्वर यहोवा से प्रार्थना कर। उन्होंने उसे यिर्मयाह का परमेश्वर कहा, इसलिए नहीं कि वे अपने आप को उसके अधिकार से अलग करना चाहते थे; उनका यह अर्थ नहीं था कि वे परमेश्वर से पराए हो गए हैं; परन्तु इस रीति से उन्होंने यिर्मयाह की बड़ाई की, और उसे परमेश्वर का सच्चा और वैध भविष्यद्वक्ता मान लिया। संक्षेप में, यह कथन भविष्यद्वक्ता के पद से सम्बन्ध रखता है, मानो उन्होंने कहा हो कि यिर्मयाह ने अब तक अपनी बुलाहट को ऐसा पक्का किया है कि यह स्पष्ट रूप से प्रकट है कि वह ऊपर से भेजा गया था।
इससे हम देखते हैं कि उन्होंने यहोवा को यिर्मयाह का परमेश्वर क्यों कहा; इसलिए नहीं कि उन्होंने परमेश्वर को त्याग दिया था, और मानो वह यिर्मयाह के साथ-साथ उनका भी परमेश्वर न था, परन्तु उन्होंने यह मान लिया कि भविष्यद्वक्ता को अधिक ऊँचा आदर प्राप्त है, और उसकी विश्वासयोग्यता और खराई विवाद से परे है।
परन्तु यह स्वीकारोक्ति उचित ही उनके अपने सिर पर लौट पड़ी; क्योंकि यदि यिर्मयाह परमेश्वर का भविष्यद्वक्ता था, तो यह जानकर कि जो कुछ उसने विश्वासयोग्यता से उन्हें बताया वह उसने परमेश्वर से पाया था, उन्होंने तुरन्त उसकी बात क्यों न मानी? और उन्होंने क्यों ढिठाई और क्रूरता से उसका विरोध किया और उस पर झूठ का दोष लगाया? इसलिए उनकी अपनी स्वीकारोक्ति सच्ची न थी, परन्तु धोखा देनेवाली चापलूसी थी, जैसा सब कपटियों के साथ होता है, जो कभी सच्चाई और सत्य से नहीं बोलते।
फिर उन्होंने आगे जोड़ा, इन सब बचे हुओं के लिए प्रार्थना कर, क्योंकि हम जो बहुत थे उनमें से थोड़े ही बचे हैं।
यह उन्होंने दया उपजाने के लिए जोड़ा, ताकि जो वे माँग रहे थे वह यिर्मयाह से और सहज में पा सकें; और यह कठिन भी न था; परन्तु क्योंकि उनका मन उन्हें दोषी ठहराता था, इसलिए उन्होंने चापलूसी के द्वारा भविष्यद्वक्ता का अनुग्रह पाना चाहा। यदि वे बिना छल के उससे माँगते, तो वे जानते थे कि वह स्वयं ही प्रजा का भला चाहने को तत्पर था; परन्तु क्योंकि वे दुचित्ते थे, इसलिए उन्होंने अपनी दयनीय दशा उसके सामने रखी, जो भविष्यद्वक्ता को उनके लिए परमेश्वर से विनती करने को और भी अधिक उभार सकती थी। और इसी कारण उन्होंने जोड़ा, जैसा तेरी आँखें हमें देखती हैं। और उन्होंने यह दुःखद दृश्य उसके सामने रखा, ताकि भविष्यद्वक्ता में सहानुभूति उत्पन्न हो। और फिर आगे आता है, और तेरा परमेश्वर यहोवा हमें वह मार्ग दिखाए जिस पर हमें चलना है। अब उन्होंने और स्पष्ट रूप से समझाया कि वे क्यों चाहते थे कि उनके लिए प्रार्थना की जाए, अर्थात् इसलिए कि परमेश्वर उत्तर दे और दिखाए कि वह उनसे क्या करवाना चाहता है।
तो, जैसा कहा जा चुका है, वे ऐसे आए मानो आज्ञा मानने को तैयार हों; और फिर उन्होंने दीनता प्रकट की, क्योंकि वे कोई काम उतावली से नहीं करना चाहते थे, परन्तु केवल वहीं चलना चाहते थे जहाँ परमेश्वर उन्हें बुलाए। यदि वे हृदय से बोलते, तो इस प्रकार उलझनों में परमेश्वर की शरण लेना और अपने आप को उसके वचन के द्वारा चलाए जाने देना एक दुर्लभ सद्गुण होता; परन्तु हम देखेंगे कि यह सब दिखावा था। तो यहाँ उस प्रजा का कपट हमारे सामने रखा गया है, ताकि हम सीखें कि जब कभी हम पूछें कि परमेश्वर को क्या भाता है, तो हम शुद्ध और सच्चा हृदय लेकर आएँ, जिससे कोई बात हमें उसे तुरन्त अपनाने से न रोके और न बाधा डाले जो कुछ परमेश्वर हमें आज्ञा दे। परन्तु उनका कपट और भी अधिक नीच प्रकट होता है, जब भविष्यद्वक्ता आगे कहता है, यिर्मयाह 42:4
4. तब यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता ने उन से कहा, मैं ने तुम्हारी सुनी है; देखो, मैं तुम्हारे वचनों के अनुसार तुम्हारे परमेश्वर यहोवा से प्रार्थना करूँगा, और जो उत्तर यहोवा तुम्हारे लिये देगा वह मैं तुम को बताऊँगा; मैं तुम से कोई बात न छिपाऊँगा।
4. Et dixit illis Jeremias Propheta, Audivi, ecce ego orabo Jehovam Deum vestrum secundum sermones vestros, et erit quemcunque sermonem responderit Jehova vobis, annuntiabo vobis, non celabo a vobis quicquam.
उन्हें आज्ञा मानने के लिए तैयार करने को उसने गवाही दी कि वह परमेश्वर का विश्वासयोग्य दूत होगा; क्योंकि इसमें कोई सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता, जैसा हम देखेंगे, उन्हें सन्देह की दृष्टि से देखता था। इसलिए कि वे परमेश्वर से अपेक्षित उत्तर के प्रति सीखने को तैयार और आज्ञाकारी रहें, उसने पहले ही कह दिया कि वह भविष्यद्वक्ता के रूप में अपना पद ईमानदारी और विश्वासयोग्यता से निभाएगा।
मैं ने सुना है, वह कहता है; यहाँ वह दिखाता है कि वह ध्यान देने को कितना तत्पर था, और उनके कल्याण के लिए उपयोगी किसी बात की उपेक्षा नहीं करता था। मैं ने सुना है, वह कहता है, देखो, मैं तुम्हारे वचनों के अनुसार प्रार्थना करूँगा। इसमें कोई सन्देह नहीं कि इसके द्वारा उसने संकेत किया कि वह उनका भला चाहता था; और यह जानना कि भविष्यद्वक्ता प्रेम से प्रेरित था, उन्हें ईश्वरवाणी के प्रति और अधिक ध्यान देनेवाला बना सकता था। और न इसमें कोई सन्देह है कि भविष्यद्वक्ता ने उनके प्रति अपना प्रेम इसलिए प्रकट किया कि बाद में उसकी शिक्षा का उन पर अधिक प्रभाव पड़े।
यह कहकर कि, जो कुछ तुम्हारा परमेश्वर उत्तर देगा, उसका यह अर्थ नहीं था कि ईश्वरवाणी सब पर प्रकट की जाएगी, क्योंकि वे वचन भविष्यद्वक्ता के सिवा और किसी रीति से समझाए नहीं जा सकते थे, जो सारी प्रजा को खुले रूप से वह बताता जो उसने परमेश्वर के मुख से सुना था। परन्तु वह कहता है कि उत्तर उन्हें दिया जाएगा, क्योंकि परमेश्वर वह उत्तर देगा जो सब को सुनाया जाना था; जैसा कहा गया है कि परमेश्वर ने मूसा से, और सारी प्रजा से भी बातें कीं, क्योंकि वह शिक्षा सब के लिए थी।
मूसा ने व्यवस्था, और न उसकी व्याख्या, अपने निजी रूप में पाई, परन्तु इसलिए कि प्रजा जाने कि क्या उचित है। इसी प्रकार यिर्मयाह ने यहाँ किया; जो उत्तर उसने परमेश्वर से पाया, उसे उसने सारी प्रजा के साझे का जानकर प्रकट किया।
परन्तु परमेश्वर को उनका परमेश्वर कहने में उसका अभिप्राय उनकी चापलूसी करना या उनकी भक्ति की प्रशंसा करना नहीं था, परन्तु उन्हें उपदेश देना था कि वे अपने आप को पूरी रीति से परमेश्वर के हाथ सौंप दें और उसी को अर्पित कर दें; मानो उसने कहा हो कि उनका काम परमेश्वर से है, जिसने उन्हें अपनी निज प्रजा के रूप में अपनाकर अपने साथ बाँध लिया था, और फिर उन्हें इतनी आशीषों से अनुगृहीत किया था। इसलिए जब परमेश्वर ने अपने आप को उन पर प्रकट किया था, तो वे दण्ड से बचे रहकर उसकी सम्मति को ठुकरा नहीं सकते थे, क्योंकि अज्ञानता का कोई बहाना न था। इससे हम देखते हैं कि इस तुम्हारा परमेश्वर में कितना भार है; क्योंकि यिर्मयाह ने उन्हें स्मरण दिलाया कि वे दण्ड से बचे रहकर परमेश्वर से खिलवाड़ नहीं कर सकते, क्योंकि वे अपने नहीं थे, परन्तु परमेश्वर की प्रजा होने के लिए चुने गए थे, और इसी शर्त पर कि वे पूरी रीति से उसके अधिकार के अधीन रहें। तो पूरी बात का सार यह है कि भविष्यद्वक्ता विश्वासयोग्यता से यहूदियों तक वह उत्तर पहुँचाएगा जो परमेश्वर उन्हें देगा; और उसने यह इसलिए कहा कि उसकी शिक्षा का उनके बीच अधिक अधिकार हो। अब आगे आता है, ---
यिर्मयाह 42:5-6
5. तब उन्होंने यिर्मयाह से कहा, यदि तेरा परमेश्वर यहोवा तेरे द्वारा हमारे पास कोई वचन पहुँचाए और यदि हम उसके अनुसार न करें, तो यहोवा हमारे बीच में सच्चा और विश्वासयोग्य साक्षी ठहरे।
5. Ipsi antem dixerunt ad Jeremiam, Erit Jehova inter nos in testem (vel, testis) fidei et veritatis (testis fidelis et verax,) nisi secundum omnem sermonem quem miserit (id est, pro quo miserit) Jehova Deus tuus ad nos, sic facturi sumus;
6. चाहे वह भली बात हो चाहे बुरी, तौभी हम अपने परमेश्वर यहोवा की आज्ञा, जिसके पास हम तुझे भेजते हैं, मानेंगे, जिस से जब हम अपने परमेश्वर यहोवा की बात मानें तब हमारा भला हो।
6. Sive bonum, sive malum, voci Jehovae Dei nostri, pro qua nos mittimus te ad ipsum, obediemus (audiemus vocem, ad verbum, sed tantundem valet, audire vocem atque obedire voci,) ut bene sit nobis, cum obediverimus voci Dei nostri.
इससे प्रकट होता है कि प्रजा ने समझ लिया था कि यिर्मयाह ने परमेश्वर से पूछने से पहले किस उद्देश्य से उन्हें अपनी विश्वासयोग्यता और सच्चाई का निश्चय दिलाया था; क्योंकि उन्होंने अकारण ही परमेश्वर की आज्ञा मानने की प्रतिज्ञा नहीं की; परन्तु जब उन्होंने देखा कि यिर्मयाह उन पर सच्चे न होने का सन्देह करता है, और उसने सच्चा और विश्वासयोग्य शिक्षक होने की प्रतिज्ञा की थी, तो उन्होंने भी अपनी ओर से घोषणा की कि वे सच्चे चेले होंगे, और जो कुछ परमेश्वर उन्हें आज्ञा दे उसे ग्रहण करेंगे। परन्तु उन्होंने शीघ्र ही अपना विश्वासघात प्रकट कर दिया, क्योंकि जब उन्होंने सुना कि जो वे करने का निश्चय कर चुके थे वह परमेश्वर को नहीं भाता, तो उन्होंने न केवल परमेश्वर और भविष्यद्वक्ता की सम्मति को ठुकराया, परन्तु उसके साथ ढिठाई का व्यवहार किया, और उस पवित्र जन पर निन्दा की बौछार भी की, मानो उसने उन्हें झूठ बताया हो। साथ ही उनका कपट हमारे लिए शिक्षा होना चाहिए, कि जब परमेश्वर अपने विशेष अनुग्रह से विश्वासयोग्य उपदेशकों और योग्य शिक्षकों के द्वारा हमें ठीक चलने का मार्ग दिखाने में प्रसन्न हो, तब हम उनके समान न हों, परन्तु सीखने को तैयार और आज्ञा मानने को तत्पर रहें, और इसे केवल मुँह से नहीं परन्तु अपने कामों से भी प्रमाणित करें।
फिर भविष्यद्वक्ता कहता है कि उन्होंने इस प्रकार कहा, परमेश्वर हमारे बीच विश्वासयोग्य और सच्चा साक्षी हो। एक साधारण कथन से सन्तुष्ट न होकर उन्होंने परमेश्वर के नाम को बीच में लाने का साहस किया; और इस प्रकार हम देखते हैं कि कपट कितना अन्धा है। क्योंकि यदि मनुष्य भली-भाँति तौलें कि परमेश्वर के नाम को अपवित्र करना क्या है, तो निश्चय वे हर प्रकार की झूठी शपथ से डरेंगे और घृणा करेंगे। तो जब वे इतनी ढिठाई से शपथ खाने को दौड़ पड़े, तो यह प्रकट है कि वे मानो जड़ हो गए थे; और कोई ऐसा मतवालापन नहीं जो मनुष्यों के मन और उनकी सब इन्द्रियों को इतना भ्रमित कर दे जितना कपट करता है।
फिर उन्होंने जोड़ा, जो कोई वचन तेरा परमेश्वर यहोवा हमारे पास भेजेगा, उसी के अनुसार हम करेंगे, अर्थात् जो कुछ यहोवा तेरे द्वारा हमें आज्ञा देगा; क्योंकि कहा जाता है कि परमेश्वर मनुष्यों के पास भेजता है, जब वह अपनी आज्ञाएँ पहुँचाने के लिए अपने नाम से कोई दूत भेजता है।
तो यिर्मयाह मानो एक मध्यस्थ जन था जो परमेश्वर के नाम से प्रजा से बात करे, मानो वह स्वर्ग से भेजा गया हो। इसलिए उन्होंने कहा कि जो कुछ परमेश्वर आज्ञा देगा वे वही करेंगे। इसके बाद एक और भी दृढ़ वचन आता है, चाहे भला हो चाहे बुरा, हम अपने परमेश्वर यहोवा की वाणी मानेंगे। यहाँ उन्होंने परमेश्वर के वचन पर अनुचित होने का दोष नहीं लगाया, मानो उसमें कुछ अन्यायपूर्ण हो; परन्तु उन्होंने भला शब्द आनन्ददायक के अर्थ में, और बुरा शब्द दुःखद या कष्टदायक के अर्थ में प्रयोग किया; मानो उन्होंने कहा हो कि वे और कुछ नहीं माँगते केवल यह कि परमेश्वर बता दे कि उसे क्या भाता है, और वे इतने अधीन हैं कि कुछ भी अस्वीकार न करेंगे, चाहे वह शरीर के विरुद्ध ही क्यों न हो। यदि यह घोषणा हृदय से निकली होती, तो यह सच्ची भक्ति की गवाही होती; क्योंकि भक्तों के मन ऐसे गढ़े हुए होने चाहिए कि वे बिना किसी अपवाद के परमेश्वर की आज्ञा मानें, चाहे वह उनके उद्देश्य के विरुद्ध आज्ञा दे, या उन्हें वहाँ ले जाए जहाँ वे जाना नहीं चाहते; क्योंकि जो परमेश्वर से ऐसी वाचा बाँधना चाहते हैं कि वह उनसे केवल वही माँगे जो उन्हें रुचिकर हो, वे दिखाते हैं कि वे नहीं जानते कि परमेश्वर की सेवा करना क्या है। इसलिए विश्वास की आज्ञाकारिता विशेष रूप से यह माँगती है कि मनुष्य अपनी अभिलाषाओं को त्याग दे, कि वह परमेश्वर के वचन के विरुद्ध अपनी युक्तियाँ और इच्छाएँ खड़ी न करे, न आपत्ति करके कहे, यह कठिन है, वह अधिक रुचिकर नहीं। तो चाहे वह भला हो या बुरा, अर्थात् चाहे वह शरीर की भावनाओं के विरुद्ध ही क्यों न हो, तौभी जो कुछ परमेश्वर माँगता और आज्ञा देता है उसे हमें अपनाना चाहिए: यही सच्चे धर्म का नियम है।
क्योंकि यहूदियों ने ऐसा रूप धारण करके जो उनका न था, कपट से बात की, इसलिए उन्होंने परमेश्वर के नाम को अपवित्र किया। परन्तु यदि हम परमेश्वर के प्रति अपनी विश्वासयोग्यता प्रमाणित करना चाहते हैं, तो काम करने का एकमात्र मार्ग यह है कि उसके वचन को बाध्यकारी मानें, चाहे वह रुचिकर हो या न हो, और कभी न कुड़कुड़ाएँ, जैसा अभक्त करते हैं; क्योंकि जब परमेश्वर उन पर जूआ रखना चाहता है, तो वे शिकायत करते हैं कि उसकी शिक्षा बहुत कठोर और भारी है। तो यदि हम अपनी विश्वासयोग्यता का निश्चित प्रमाण देना चाहते हैं, तो उन सब बातों को दूर करें जो परमेश्वर के वचन को हमारे लिए अप्रिय बना सकती हैं। इसलिए उन्होंने कहा, चाहे वह भला हो या बुरा, जो कुछ परमेश्वर ठहराएगा, हम उसकी वाणी मानेंगे।
फिर उन्होंने जोड़ा, जिसके लिए हम तुझे उसके पास भेजते हैं। यहाँ वे अपने आप को और भी अधिक फन्दों में डालते हैं। यिर्मयाह ने स्पष्ट शब्दों में उनसे शपथ खाने की माँग नहीं की थी; तौभी उन्होंने शपथ खाई; और फिर अनेक प्रकार से अपने आप को और भी अधिक दण्ड के लिए बाँध लिया, यदि वे झूठी शपथ खानेवाले ठहरें। अब वे दिखाते हैं कि यदि वे परमेश्वर की आज्ञा न मानें तो यह दोहरा अपराध होगा; कैसे? यदि भविष्यद्वक्ता उनके पास भेजा गया होता, तो वे बहाने बना सकते थे; चाहे वे व्यर्थ होते, तौभी उनके पास कहने को कुछ तो होता; परन्तु जब उन्होंने अपनी इच्छा से परमेश्वर से पूछा, जब उन्होंने स्वयं ऐसा करने का प्रस्ताव रखा, और सब बातों में आज्ञाकारी रहने की प्रतिज्ञा की, तो यह प्रकट है कि यदि वे बाद में अपने दिए हुए वचन के अनुसार न चलते, तो वे और भी अधिक निरुत्तर ठहरते, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर की परीक्षा की: क्योंकि किसने उन्हें भविष्यद्वक्ता के पास आने को प्रेरित किया था? इससे हम देखते हैं कि परमेश्वर ने उनसे वह बात उगलवाई जिसने उनके अपराध को दुगना कर दिया। परन्तु कपटी जितना अधिक भेस बदलकर अपनी अभक्ति को छिपाने का प्रयत्न करते हैं, उतना ही अधिक वे अपने आप को कसकर बाँधते हैं, और अपने विरुद्ध परमेश्वर के क्रोध को और भी भड़काते हैं।
फिर उन्होंने जोड़ा, जिससे जब हम यहोवा की वाणी मानें तब हमारा भला हो। इस बात से भी उन्होंने अपने अपराध को और भारी बना दिया। क्योंकि यदि भविष्यद्वक्ता ने उन्हें सुखद परिणाम की प्रतिज्ञा दी होती, तो सम्भव था कि वे विश्वास न करते; उस दशा में उन्होंने पाप तो अवश्य किया होता; परन्तु उनकी दुष्टता उससे अधिक सहनीय होती जितनी तब, जब उन्होंने स्वयं ऐसे बात की मानो वे पवित्र आत्मा के साधन हों; उन्होंने स्वयं कहा, हमारा भला होगा; परमेश्वर की वाणी के पीछे चलना और उसकी आज्ञा मानना हमारा सबसे बड़ा सुख होगा। तो जब उन्होंने इस प्रकार परमेश्वर और भविष्यद्वक्ता के सामने दृढ़ता से कहा, ताकि वे परमेश्वर के विश्वासयोग्य सेवक दिखाई दें, तो उन्होंने अपने ऊपर और भी बड़ा दण्ड ले लिया; क्योंकि यदि वे विश्वास करते थे कि परमेश्वर की आज्ञा के बिना कुछ भी शुभ न होगा, तो वे परमेश्वर के अधीन क्यों न हुए? उन्होंने उस बात को क्यों तुच्छ जाना जो बाद में भविष्यद्वक्ता ने कही? परन्तु जैसा हम कह चुके हैं, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर से छल करके और उसके पवित्र नाम को अपवित्र करके अपने आप को धोखा दिया, इसलिए हम सीखें और जानें कि हम अपने सब कामों में शुभ परिणाम की आशा किसी और रीति से नहीं, केवल परमेश्वर की वाणी मानकर ही कर सकते हैं; क्योंकि जो कुछ मनुष्य अपनी ओर से करने का प्रयत्न करें, वह परमेश्वर के सामने शापित होगा। तो हमारी एकमात्र निश्चित आशा यही है कि जब हम ऐसा कुछ भी करने का प्रयत्न न करें जो परमेश्वर के वचन के अनुसार न हो, तो अच्छा और शुभ परिणाम होगा, चाहे बहुत सी बातें हमारी आशा या विचार के विपरीत ही क्यों न घटें।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, ऐसा अनुग्रह कर कि जैसे हम यहाँ इधर-उधर उछाले जाते हैं, अनिश्चित और सन्देह में पड़े रहते हैं, जब तक तेरे वचन के द्वारा हमारा मार्गदर्शन न हो, और घोर अन्धकार में अन्धे हैं, --- ऐसा अनुग्रह कर कि जब तू अपनी व्यवस्था और अपने सुसमाचार के द्वारा हम पर चमकता है, तब हमारे मन तेरे पवित्र आत्मा के द्वारा प्रकाशित हों, जिससे हम अपने आप को पूरी रीति से तुझे सौंप दें, और उस सीधे मार्ग से कभी न भटकें जो तू ने हम पर प्रकट किया है, परन्तु जीवन भर ऐसे अपनी दौड़ दौड़ें कि अन्त में उस धन्य जीवन तक पहुँचें, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा स्वर्ग में हमारे लिए तैयार किया गया है। --- आमीन।
एक सौ सत्तावनवाँ व्याख्यान
यिर्मयाह 42:7-10
353 हमारे अनुवाद में है, "जिसके पास हम तुझे भेजते हैं," और यह ठीक भी है: शब्दशः यह है, "जिसे हम तुझे भेजते हैं उसके पास," जो इब्रानी में और वेल्श में भी एक साधारण मुहावरा है, "yr hwn y danfonwn di atto." वल्गेट में है, "जिसके पास हम तुझे भेजते हैं;" और ऐसा ही सुरियानी और तर्गुम में भी है; परन्तु सेप्टुआजिन्ट ने इब्रानी की नकल करने का प्रयत्न किया, और कोई अर्थ नहीं दिया गया। — सं.
7. दस दिन के बीतने पर यहोवा का वचन यिर्मयाह के पास पहुँचा।
7. Et fuit a fine decem dierum datus est sermo Jehovae ad Jeremiam.
8. तब उसने कारेह के पुत्र योहानान को, और उसके साथ के दलों के सब प्रधानों को, और छोटे से लेकर बड़े तक सब लोगों को बुलाकर,
8. Et vocavit Joannem filium Kareah et omnes duces copiarum, qui cum eo erant, et totum populum a parvo usque ad magnum,
9. उन से कहा, इस्राएल का परमेश्वर यहोवा, जिसके पास तुम ने मुझ को इसलिये भेजा कि मैं तुम्हारी विनती उसके आगे कह सुनाऊँ, वह यों कहता है;
9. Et dixit illis, Sic dicit Jehova, Deus Israel, ad quem misistis me (ad verbum, ad quem misistis me ad ipsum,) ut prosternerem preca-tionem vestram coram facie ejus, ---
10. यदि तुम इसी देश में रह जाओ, तब तो मैं तुम को नाश नहीं करूँगा वरन् बनाए रखूँगा; और तुम्हें न उखाड़ूँगा, वरन् रोपे रखूँगा; क्योंकि तुम्हारी जो हानि मैं ने की है उससे मैं पछताता हूँ।
10. Si habitando habitaveritis in terra hac, tunc, aedificabo vos, et non diruam, et plantabo vos et non evellam; quia poenitet me mali quod intuli vobis (vel, satiatus sum malo.)
यहाँ यिर्मयाह बताता है कि उसे परमेश्वर से क्या उत्तर मिला; और उसने उसके नाम से वह उत्तर सेना के प्रधानों और सारी प्रजा को दिया। उत्तर यह था कि वे उसी देश में बने रहें; क्योंकि इसी में उनका भला होगा। हम आगे देखेंगे कि उन्होंने परमेश्वर से झूठे मन से सम्मति माँगी थी, जिसकी आज्ञा न मानने का वे निश्चय कर चुके थे, जैसा पहले ही कहा जा चुका है। परन्तु भविष्यद्वक्ता फिर और भी स्पष्ट रूप से दिखाता है कि जब परमेश्वर ने उन्हें शान्त बने रहने, और विशेष करके मिस्र को न जाने की आज्ञा दी, उसके बाद उन्होंने कितनी हठधर्मिता से काम किया।
अब वह कहता है कि दसवें दिन परमेश्वर ने उसे उत्तर दिया। वह तुरन्त भी ऐसा कर सकता था, परन्तु उसने विलम्ब किया, ताकि भविष्यद्वाणी का अधिक भार हो। यदि भविष्यद्वक्ता से जीवन के सामान्य नियम के विषय में कोई प्रश्न पूछा गया होता, तो व्यवस्था के विश्वासयोग्य व्याख्याता के रूप में वह उन्हें समझा सकता था कि उनका कर्तव्य क्या है; परन्तु क्योंकि उससे एक विशेष विषय पर पूछा गया था, इसलिए वह उन्हें तुरन्त उत्तर नहीं दे सकता था। और परमेश्वर ने, जैसा मैं कह चुका हूँ, उन्हें कुछ समय तक असमंजस में रखा; केवल इसलिए नहीं कि भविष्यद्वक्ता का उत्तर बिना आडम्बर के दिया जाए, परन्तु इसलिए भी कि प्रजा जो कुछ भविष्यद्वक्ता कहे उसे परमेश्वर की ओर से आया हुआ मानकर ग्रहण करे; क्योंकि उसकी शिक्षा पर सन्देह नहीं किया जा सकता था, क्योंकि उसने अपने ही सिर में उपजी बात को तुरन्त सामने नहीं रखा, परन्तु प्रार्थनापूर्वक यह जानने की बाट जोही कि परमेश्वर को क्या भाता है, और अन्त में उसकी आज्ञाएँ सुनाईं। तो अब हम विलम्ब का कारण समझते हैं, कि परमेश्वर ने अपने दास तक अपेक्षित उत्तर तुरन्त क्यों नहीं पहुँचाया।
साथ ही हम इस स्थल से सीखें कि यदि परमेश्वर हमें सब उलझन और सन्देह से तुरन्त नहीं छुड़ाता, तो हमें धीरज से बाट जोहनी चाहिए, पौलुस के निर्देश के अनुसार, जिसने शिक्षा के विषय में बोलते हुए विश्वासियों को चिताया कि जब तक वह बात जिसे वे नहीं जानते उन पर प्रकट न की जाए, तब तक सन्तुष्ट रहें। (फिलिप्पियों 3:15।) तो जब हम किसी विशेष बात के विषय में सम्मति माँगते हैं, तब हमें और भी अधिक ऐसा करना चाहिए।
जब परमेश्वर जो हम माँगते हैं उसे तुरन्त हम पर प्रकट नहीं करता, तब, जैसा मैं पहले ही कह चुका हूँ, हमें शान्त और समर्पित मन से उस समय और ऋतु की बाट जोहनी चाहिए जब वह हम पर प्रकट किया जाएगा।
यिर्मयाह कहता है कि उसने योहानान और सेना के अन्य प्रधानों और छोटे से लेकर बड़े तक सारी प्रजा को बुलाया। यह इसलिए कहा गया है कि हम जानें कि यह भविष्यद्वाणी एक या दो जनों के दोष से तुच्छ नहीं जानी गई, परन्तु सारी प्रजा एक साथ मिली हुई थी। तो प्रजा स्वयं यह बहाना नहीं कर सकती थी कि वह दोष से मुक्त है; क्योंकि हम देखते हैं कि वे सब इसमें फँसे हुए थे। प्रधानों का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है, और दूसरी ओर प्रजा का, ताकि न तो प्रधान आपत्ति करके कह सकें कि वे लोगों के उपद्रव के कारण विवश किए गए, और न प्रजा दोष प्रधानों पर डाल सके। तो भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि उन सब ने परमेश्वर से बलवा किया, और कोई अपवाद न था।
फिर वह कहता है कि जो कुछ परमेश्वर ने आज्ञा दी थी वह उसने विश्वासयोग्यता से उन्हें सुनाया, इस्राएल का परमेश्वर यहोवा, जिसके पास तुम ने मुझे भेजा, यों कहता है। इस बात के द्वारा वह दिखाता है कि वे आज्ञा मानने के लिए और भी अधिक बँधे हुए थे; क्योंकि यदि परमेश्वर ने अपने भविष्यद्वक्ता को उनके पास भेजा होता, तो भी उन्हें उसकी वाणी माननी चाहिए थी; परन्तु जब वे अपनी इच्छा से उसके पास आए और अनुग्रह के लिए विनती की, और चाहा कि परमेश्वर की इच्छा उन पर प्रकट की जाए, तो जब उन्होंने परमेश्वर के नाम से दिए गए उत्तर को ठुकराया, तब वे दुगने दोषी ठहरे। और वह जोड़ता है, कि मैं तुम्हारी विनती को परमेश्वर के सामने डाल दूँ, या गिराऊँ। हम बता चुके हैं कि बोलने की इस रीति का क्या अर्थ है; परन्तु एक भेद ध्यान देने योग्य है, क्योंकि उससे यह निवेदन किया गया था कि वह गिड़गिड़ाकर परमेश्वर से माँगे; और वह यहाँ कहता है कि उसने न केवल प्रार्थना की थी, परन्तु सारी प्रजा की प्रार्थना प्रस्तुत की थी, क्योंकि वह सबकी ओर से काम कर रहा था; और फिर वह परमेश्वर और प्रजा के बीच मध्यस्थ जन था। इसी कारण वह कहता है कि वह प्रजा की प्रार्थना परमेश्वर के सामने प्रस्तुत करने के लिए भेजा गया था, क्योंकि उसने अपने लिए कुछ नहीं माँगा, परन्तु उन सब की ओर से काम किया, और परमेश्वर से प्रार्थना की कि वह प्रजा को उत्तर दे।
अब वह जोड़ता है, यदि तुम ठहरे रहकर इस देश में रहोगे, तो मैं तुम्हें बनाऊँगा और रोपूँगा, मैं तुम्हें न ढाऊँगा और न उखाड़ूँगा। यहाँ भविष्यद्वक्ता गवाही देता है कि जो सम्मति उसने परमेश्वर के नाम से उन्हें दी वह उनकी भलाई के लिए होगी; और जो बात भली या लाभदायक है, उसे मनुष्य, जब वे, जैसा कहा जाता है, तर्क-वितर्क करते हैं, बड़े मूल्य की समझते हैं। परमेश्वर का केवल अधिकार ही वास्तव में पर्याप्त होना चाहिए था; और यदि परमेश्वर ने एक ही शब्द में उन्हें ठहरने की आज्ञा दी होती, तो उन्हें मान लेना चाहिए था। परन्तु यहाँ परमेश्वर ने उनकी निर्बलता के अनुसार अपने आप को ढाल लिया, और उनके कल्याण को बढ़ाने के लिए, एक प्रकार से, अपने आप को नीचा करने में प्रसन्न हुआ, और अपने अधिकार और प्रभुतापूर्ण सामर्थ्य के अनुसार आज्ञाकारिता की माँग नहीं की, जैसा वह उचित ही कर सकता था। इससे हम देखते हैं कि परमेश्वर ने इस प्रजा के साथ कितनी कृपा से व्यवहार किया, क्योंकि उसने वह माँग नहीं की जो वह कर सकता था, परन्तु अपनी सम्मति दी, और गवाही दी कि यह उनके लिए भली और लाभदायक होगी।
जब वक्ता किसी को मनाने के लिए लाभदायक बात प्रस्तुत करते हैं, तो वे अनुमानों का सहारा लेते हैं, मानवीय तर्क देते हैं; परन्तु भविष्यद्वक्ता ने यहाँ परमेश्वर के नाम से प्रतिज्ञा की कि यदि वे ठहरे रहें तो यह उनकी भलाई के लिए होगा। तो यहाँ अनुमानों और तर्कों के स्थान पर परमेश्वर की प्रतिज्ञा प्रस्तुत की गई है। इसलिए प्रजा का हठ निरुत्तर था, जब उन्होंने परमेश्वर के अधिकार को ठुकराया; और फिर उसकी सम्मति को तुच्छ जाना, और उसकी प्रतिज्ञा पर अविश्वास भी किया। तो परमेश्वर के तिरस्कार में अविश्वास भी जुड़ गया: और हम जानते हैं कि परमेश्वर का इससे बड़ा अपमान नहीं किया जा सकता कि मनुष्य उस पर विश्वास न करें।
यहाँ प्रयुक्त रूपक पवित्रशास्त्र में प्रायः आते हैं। कहा जाता है कि परमेश्वर मनुष्यों को बनाता है, जब वह उन्हें स्थिर दशा में दृढ़ करता है; और इसी अर्थ में कहा जाता है कि वह उन्हें रोपता है। यह हम पहले देख चुके हैं, और यह विशेष रूप से भजन संहिता 44:2 से प्रकट है, जहाँ कहा गया है कि परमेश्वर ने उस प्रजा को, जिसे वह मिस्र से निकाल लाया था, कनान देश में "रोपा"। तो उसने प्रतिज्ञा की कि यदि वे केवल अपना स्थान न बदलें, तो प्रजा की दशा सुरक्षित, निरापद और स्थायी होगी। जब वह जोड़ता है, मैं न ढाऊँगा और न उखाड़ूँगा, तो वह उस रीति का अनुसरण करता है जो इब्रानी में साधारण है। न लातीनी और न यूनानी लोग इस प्रकार बोलते हैं; परन्तु इब्रानी में इस प्रकार के निषेधवाचक वचन पुष्टि का काम करते हैं, मानो भविष्यद्वक्ता ने कहा हो, "परमेश्वर तुम्हें ऐसा रोपेगा कि तुम्हारी जड़ बनी रहेगी। तो जब तुम परमेश्वर के हाथ से रोपे जाओगे तब उखाड़े जाने का कोई भय न रहेगा; और जब वह तुम्हें अपने ही हाथ से बना चुकेगा, तब वह तुम्हें उलटने या ढाए जाने न देगा।" तो जिस बात की उन्हें विशेष रूप से खोज करनी चाहिए थी, उसकी प्रतिज्ञा परमेश्वर ने उन्हें सेंतमेंत दी, अर्थात् देश में सुरक्षित और निश्चिन्त रहना; क्योंकि भविष्यद्वक्ता का विशेष अभिप्राय यही था।
इसके बाद आता है, क्योंकि जो विपत्ति मैं तुम पर लाया हूँ उससे मैं पछताता हूँ। क्रिया {,}נחםnuchem कभी-कभी पछताने का, और प्रायः शान्ति देने का अर्थ रखती है; परन्तु पहला अर्थ इस स्थल से अधिक मेल खाता है, कि परमेश्वर विपत्ति से पछताया। तौभी यदि हम यह अनुवाद पसन्द करें, "क्योंकि मुझे शान्ति मिल गई है," तो अर्थ यह होगा, "मैं उस दण्ड से सन्तुष्ट हूँ जिससे मैंने तुम्हारे पापों का पलटा लिया है;" क्योंकि जिन्हें सन्तुष्टि दी जाती है, उनके विषय में कहा जाता है कि उन्हें शान्ति मिली है। तो क्योंकि परमेश्वर यहूदियों पर डाले हुए दण्ड से सन्तुष्ट था, इसलिए इन शब्दों का अनुवाद इस प्रकार किया जा सकता है, "क्योंकि मुझे विपत्ति से सन्तुष्टि मिल गई है," या, "मैं विपत्ति से तृप्त हूँ," इत्यादि। तौभी दूसरा अर्थ अधिक सामान्य रूप से लिया जाता है, कि परमेश्वर विपत्ति से पछताया। परन्तु बोलने की यह रीति वास्तव में कुछ कठोर है, तौभी इसमें सत्य के विरुद्ध कुछ नहीं है; क्योंकि हम जानते हैं कि परमेश्वर प्रायः उन बातों को अपने ऊपर लागू करता है जो विशेष रूप से मनुष्य की हैं। तो परमेश्वर में पश्चाताप और कुछ नहीं केवल यह है कि शान्त हो जाने पर वह मनुष्यों का अन्त तक पीछा नहीं करता कि उनसे वह दण्ड माँगे जिसके वे उचित रूप से योग्य हैं। इसी प्रकार परमेश्वर उस विपत्ति से पछताया जो वह प्रजा पर लाया था, जब वह उनके पापों की पर्याप्त ताड़ना कर चुका, उसके अनुसार जो हम यशायाह में पढ़ते हैं, जहाँ परमेश्वर कहता है कि उसने उनके पापों का दुगना दण्ड लिया है। (यशायाह 40:2।) उसने अपने दिए हुए दण्ड को दुगना कहा, इसलिए नहीं कि वह उचित माप से बढ़ गया था, परन्तु उसने अपनी पितृवत् भावना के अनुसार कहा कि उसने अपनी प्रजा के साथ उससे अधिक कठोर व्यवहार किया जितना वह चाहता था, जैसे एक पिता जो अपने बच्चों के प्रति बहुत कठोर हो जाने पर अपने आप से भी अप्रसन्न होता है।
तो अब हम समझते हैं कि यहाँ दिए गए कारण का क्या अर्थ है, कि यहूदियों को देश में रहने से डरना नहीं था, क्योंकि परमेश्वर उनकी पर्याप्त ताड़ना कर चुका था, और वह ऐसा शान्त हो गया था कि वह आगे कठोरता से उनका पीछा न करेगा। साथ ही यिर्मयाह हमें स्मरण दिलाता है कि जो कोई विपत्तियाँ हम पर आती हैं, उन्हें परमेश्वर के न्याय का फल मानना चाहिए, न कि प्रतिकूल भाग्य का। इससे हम देखते हैं कि इन शब्दों के द्वारा प्रजा को पश्चाताप करने का उपदेश दिया गया; क्योंकि जैसे उन्हें अच्छी आशा रखने को कहा गया, क्योंकि उनकी सुरक्षा परमेश्वर के हाथ में थी, वैसे ही भविष्यद्वक्ता यह भी दिखाता है कि बीते समय में उन्होंने संयोग से कुछ नहीं सहा था, परन्तु इसलिए दण्ड पाया था कि उन्होंने परमेश्वर के क्रोध को भड़काया था। आगे आता है, ---
354 यह वाक्यांश प्रायः आता है, और इसका सदा यही अर्थ है; और निःसन्देह यहाँ भी यही अर्थ है, यद्यपि सेप्टुआजिन्ट और वल्गेट दूसरा अर्थ अपनाते हैं। अनुवाद प्रायः एक ही वाक्यांशों को भिन्न-भिन्न अर्थ देते हैं, जिससे वे असुरक्षित मार्गदर्शक बन जाते हैं। — सं.
यिर्मयाह 42:11-12
11. बाबुल के जिस राजा से तुम डरते हो, उससे मत डरो; यहोवा की यह वाणी है, उससे मत डरो, क्योंकि मैं तुम्हारे साथ हूँ, कि तुम को उसके हाथ से बचाऊँ और छुड़ाऊँ।
11. Ne timearis a facie regis Babylonis, quem vos timetis a facie ejus (hoc est, a cujus facie vos timetis) ne timeatis ab ipso, dicit Jehova; quia vobiscum ego sum ad servandum vos, et ad eripiendum vos e manu ejus;
12. मैं तुम पर दया करूँगा, कि वह भी तुम पर दया करके तुम को तुम्हारे देश में फिर से लौटा दे।
12. Et dabo vobis misericordias, et miserabitur vestri et habitare faciet in terra vestra.
भविष्यद्वक्ता उस सन्देह को दूर करता है जो प्रजा के मन को दुःखी या व्याकुल कर सकता था। उन्हें तो वास्तव में केवल परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर ही टिके रहना चाहिए था; परन्तु ऐसी अनिश्चित और उलझी हुई दशा में सन्देहों से मुक्त रहना कठिन था; क्योंकि बाबुल का राजा, जैसा कहा जा चुका है, देश के अधिपति के मारे जाने पर अत्यन्त क्रुद्ध हुआ था। राजा को प्रजा की ओर से अन्याय सहना पड़ा था, और हाल की विजय के बाद युद्ध की गर्मी अभी ठण्डी नहीं हुई थी। तो वे उचित ही डरते थे, क्योंकि उन्हें उस बुराई का बोध था जो की गई थी; और फिर उनका सामना एक घमण्डी और क्रूर शत्रु से था। इसलिए परमेश्वर ने उनसे यह सन्देह दूर किया; और इस प्रकार उसने उस पितृवत् चिन्ता की पुष्टि की जो उसने उनके प्रति दिखाई थी, कृपा करके उन्हें हर भय से मुक्त करके, और भय का हर कारण दूर करके।
यद्यपि नबूकदनेस्सर क्रुद्ध हुआ था, और अपने साथ हुए अन्याय का बदला ले सकता था, तौभी परमेश्वर ने इसे रोकने की प्रतिज्ञा की, और घोषणा की कि वह उसे यहूदियों की कुछ भी हानि करने न देगा। वह कहता है, “तुम नबूकदनेस्सर से डरते हो, परन्तु ऐसा करना छोड़ दो; यह भय दूर कर दो, क्योंकि वह तुम्हारी हानि न करेगा।” और कारण भी जोड़ा गया है, क्योंकि मैं तुम्हारे साथ हूँ कि तुम्हें बचाऊँ और उसके हाथ से छुड़ाऊँ। यहाँ उसने यहूदियों को शुभ आशा रखने की आज्ञा दी, क्योंकि उसकी सुरक्षा पर भरोसा रखते हुए वे सुरक्षित रहेंगे: क्योंकि जब परमेश्वर घोषणा करता है कि वह हमारे पक्ष में खड़ा रहेगा, तब सन्देह करने का कोई कारण नहीं रह जाता। क्योंकि यदि वह हमारा है, तो हम निश्चिन्त रह सकते हैं, जैसे दाऊद था, जब उसने कहा, “मनुष्य मेरा क्या कर सकता है, मैं न डरूँगा; क्योंकि हे परमेश्वर,” वह कहता है, “तू मेरे साथ है;” और यह भी, “चाहे सेनाएँ चारों ओर से मुझे घेर लें, तौभी मैं न डरूँगा।”
(भजन संहिता 23:4; भजन संहिता 27:3)
अतः हमें पूर्ण रूप से निश्चित रहना चाहिए कि परमेश्वर की सहायता सब प्राणियों की सहायता से बढ़कर है। इस प्रकार, चाहे सारा संसार हमारे विरुद्ध उठ खड़ा हो, तौभी हम मानो किसी सुरक्षित और निरापद स्थान से सब प्रयत्नों, शक्तियों और तैयारियों को निश्चिन्त होकर देख सकते हैं।
तो यहाँ जो कहा गया है उसका सार यही है; और यह उसी के अनुसार है जो मसीह कहता है, “मेरा पिता, जिसने तुम्हें मुझे दिया है, सब से बड़ा है।”
यदि यहूदियों में विश्वास का एक कण भी होता, तो वे इस प्रतिज्ञा को थाम लेते; और यदि वे इसे दृढ़ता से पकड़े रहते, मानो जहाज़ टूटने पर कोई तख़्ता हो, तो यह उन्हें सुरक्षित बन्दरगाह तक पहुँचा देती। अतः जब परमेश्वर हमारे पक्ष में खड़े रहने की प्रतिज्ञा करता है, तो यह सब चिन्ताओं को झटक देने, सब भयों को भगा देने, और हर अविश्वास को दूर कर देने के लिए पर्याप्त होना चाहिए। वह कहता है, मैं तुम्हारे साथ हूँ कि तुम्हें बचाऊँ, और वह जोड़ता है, कि छुड़ाऊँ। वह उन्हें बचाने की रीति और ढंग को प्रकट करता है; क्योंकि वे फिर भी आपत्ति करके कह सकते थे, “यह उद्धार क्या होगा? क्योंकि नबूकदनेस्सर तो क्रोधित सिंह के समान है; तो हम कैसे बच सकते हैं, जबकि हम यही सोच सकते हैं कि वह हम पर कोप करेगा?” इसके उत्तर में परमेश्वर रीति बताता है, कि वह उन्हें उसके हाथ से छुड़ाएगा।
वह दूसरे शब्दों में उसी बात की पुष्टि करता है, मैं तुम पर दया करूँगा। कुछ लोग इसका अर्थ यह बताते हैं कि परमेश्वर उन पर दयालु होगा; और मैं मानता हूँ कि यही पहला कारण है जिससे उन्हें आशा रखनी चाहिए थी; परन्तु मुझे सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता यहाँ नबूकदनेस्सर की ओर संकेत करता है, मानो उसने कहा हो, “मैं बाबुल के राजा के मन को दया की ओर फेर दूँगा, जिससे वह तुम्हारे साथ दया का व्यवहार करेगा।”
क्योंकि परमेश्वर के विषय में कहा जाता है कि वह दया दिखाता है, जब वह क्षमा करता है, और जब वह पाप करनेवालों का अपने साथ मेल कराता है; परन्तु यह भी कहा जाता है कि वह दया दिखाता है, जब वह मनुष्यों के मन को दया की ओर झुकाता है। इसी कारण याकूब कहता है, “परमेश्वर उस पुरुष के सामने तुम पर दया करे।”
(उत्पत्ति 43:14)
परन्तु ऐसी बात पर, जो भली-भाँति ज्ञात होनी चाहिए, मैं और प्रमाण देने से रुकता हूँ।
अतः कही गई बात का सार यह है कि नबूकदनेस्सर यहूदियों के प्रति मानवीय और दयालु होगा, क्योंकि उसके मन को बदलना परमेश्वर के वश में था। क्योंकि हम जानते हैं कि परमेश्वर मनुष्यों के मन को जिधर चाहता है उधर फेरता है; और वह प्रायः भेड़ियों को भेड़ों में बदल देता है। अतः अर्थ यह है कि यद्यपि नबूकदनेस्सर लोगों के प्रति घृणा से खौल रहा था, और बचे हुओं को पूरी तरह नष्ट करने को तैयार था, तौभी परमेश्वर के हाथ में उपाय होगा, क्योंकि वह उसकी कठोरता को कोमल कर सकता, उसके कोप को शान्त कर सकता, और उसे एक जंगली हिंसक पशु से बदलकर मानो अपने बच्चों के प्रति दयालु पिता बना सकता था।
अब यह खण्ड हमें सिखाता है कि मनुष्यों के मन और उनकी युक्तियाँ ऊपर की एक शक्ति के द्वारा शासित होती हैं, इसलिए शत्रु, चाहे वे सबसे बुरे हों, जब हमारे विरुद्ध भड़कते हैं, तब वे केवल अपनी भावनाओं से ही नहीं, वरन परमेश्वर के गुप्त कार्य से भी, और उसकी युक्ति के अनुसार प्रेरित होते हैं, क्योंकि वह चाहता है कि वे इस प्रकार हमारे विश्वास को परखें। क्योंकि यदि परमेश्वर उन्हें, जो क्रोध और कोप से खौलते हैं, संयमित करता है, और उन्हें हमारे प्रति शान्त कर देता है; तो वैसे ही वह उनकी लगाम भी ढीली छोड़ देता है जो हमारे विरुद्ध भड़कते हैं, और केवल इतना ही नहीं, वरन जब उसका उद्देश्य हमारे पापों के लिए हमें दण्ड देना होता है, तब वह उन्हें उभारता भी है, उस शिक्षा के अनुसार जो पवित्रशास्त्र में सर्वत्र हमें सिखाई गई है। इसी प्रकार भजन संहिता 106 में कहा गया है कि परमेश्वर ने अन्यजातियों के मन को फेर दिया कि वे उसकी प्रजा से बैर रखें। परन्तु यहाँ, इसके विपरीत, परमेश्वर प्रतिज्ञा करता है कि नबूकदनेस्सर कृपालु और मानवीय होगा, जिससे वह यहूदियों को छोड़ देगा, क्योंकि वह उसके मन को वश में रखेगा, और राजा को लोगों को क्षमा करने की ओर झुकाकर उन पर दया दिखाएगा।
अतः इस बात पर ध्यानपूर्वक विचार करना चाहिए; क्योंकि जब हम अपने आप को हर ओर से उन दुष्टों से घिरा हुआ देखते हैं जिन्हें शैतान पागलपन तक पहुँचा देता है, यहाँ तक कि वे हमें अपने पैरों तले रौंदने के सिवा और कुछ नहीं चाहते, विशेषकर जब उनके पास हमें नष्ट करने की शक्ति हो, तब यदि हम पूर्ण रूप से निश्चित न हों कि उनके मन, उनकी भावनाएँ और उनके सब विचार परमेश्वर के हाथ में हैं, तो हमारा पूर्ण रूप से हताश हो जाना अनिवार्य है। इसलिए हमारे सब भयों को कम करने के लिए यह सुनना हमारे लिए बहुत लाभदायक है कि मनुष्यों के मन परमेश्वर की इच्छा के अनुसार फेरे और शासित किए जाते हैं। अब आगे लिखा है,—
यिर्मयाह 42:13-17
13. परन्तु यदि तुम यह कहकर कि हम इस देश में न रहेंगे, अपने परमेश्वर यहोवा की बात न मानो,
13. Quod si dixeritis vos, Non habitabimus in terra hac, non obediendo voci Jehovae Dei vestri;
14. और कहो, नहीं, हम तो मिस्र देश जाकर वहीं रहेंगे, क्योंकि वहाँ हम न तो युद्ध देखेंगे, न नरसिंगे का शब्द सुनेंगे, और न हम को भोजन की घटी होगी:
14. Dicendo, Non, quia (vel, sed) in terram Aegypti ibimus (nam {}יכpotest adversative capi,) ubi non videbimus proelium, et vocem tubae non audiemus, et ad panem non esuriemus, et habitabimus illic:
15. तो, हे बचे हुए यहूदियो, अब यहोवा का वचन सुनो; इस्राएल का परमेश्वर, सेनाओं का यहोवा यों कहता है: यदि तुम सचमुच मिस्र की ओर जाने का मुँह करो, और वहाँ परदेशी होकर रहने के लिए जाओ;
15. Nunc propterea audite sermonem Jehovae, residuum Jehudah, quia sic dicit Jehova exercituum, Deus Israel, Si vos ponendo posueritis facies vestras ad ingrediendum Aegyptum (ut ingrediamini in Aegyptum,) et ingressi fueritis illic ad peregrinandum;
16. तो ऐसा होगा कि जिस तलवार से तुम डरते हो, वही वहाँ मिस्र देश में तुम को जा लेगी, और जिस अकाल का भय तुम खाते हो, वह मिस्र में तुम्हारा पीछा न छोड़ेगा; और वहीं तुम मरोगे।
16. Erit (accidet) ut gladius quem vos timetis ab eo (hoc est, a quo metuitis) illic apprehendat vos (vel, occurrat vobis illic, nempe) in terra Aegypti, et fames a qua extimescitis (hoc est, propter quam estis anxii, (vel, quam expaveseitis, nam significat) illic apprehendet vos (vel, adhaerebit vobis, sed ad verbum, apprehendet post vos, vel, persequetur vos, nempe) in terra Aegypti, et illic moriemini.
17. जितने मनुष्य मिस्र में परदेशी होकर रहने के लिए उसकी ओर मुँह करें, वे सब तलवार, अकाल और मरी से मरेंगे; और जो विपत्ति मैं उन पर डालूँगा, उससे कोई बचा न रहेगा और न कोई छूटेगा।
17. Et erunt omnes viri qui posuerint facies suas ut veniant in Aegyptum ad peregrinandum illuc morientur gladio, fame et peste, et non erit illis superstes aut evasor (id est, qui evadat) a facie mali quod ego adduco super eos.
परमेश्वर ने यह प्रतिज्ञा करके कि जो सम्मति उसने यहूदियों को दी वह भली और सुरक्षित होगी, अब दूसरी ओर उन्हें धमकी देता है कि यदि वे आज्ञा न मानेंगे, तो जो कुछ वे करने का प्रयत्न करेंगे उसका अन्त दुःखद होगा। उन्होंने स्पष्ट रूप से यह नहीं पूछा था कि मिस्र जाना उनके भले के लिए होगा या नहीं, या यह परमेश्वर को भाएगा या नहीं; परन्तु परमेश्वर ने, जो सब छिपी युक्तियों में प्रवेश करता है, उनसे पहले ही बात कही, और घोषणा की कि यदि वे मिस्र को भागेंगे तो उनका जाना अभागा होगा। इससे हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने, वरन स्वयं परमेश्वर ने, जो अपने सेवक के द्वारा बोला, उन्हें कर्तव्य के मार्ग में बनाए रखने के लिए सब प्रकार से प्रयत्न किया।
तब वह कहता है, यदि तुम कहो, हम इस देश में न रहेंगे, तो तुम्हारा बुरा होगा, वह कहता है: परन्तु दण्ड की घोषणा करने से पहले, उसने दिखाया कि यदि वे मिस्र को जाएँ तो वे नष्ट किए जाने के योग्य थे; क्योंकि यदि वह बात अपने आप में उचित भी होती, तौभी परमेश्वर की स्पष्ट इच्छा के विरुद्ध ऐसा कुछ करने का प्रयत्न करना, जैसा हम जानते हैं, एक अधर्मी और शैतानी ढिठाई और दुस्साहस था। परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था में उन्हें विशेष रूप से मना किया था कि वे कभी मिस्र पर मन न लगाएँ, (व्यवस्थाविवरण 17:16;) और उसने अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा बार-बार उसी बात की पुष्टि की थी, (यशायाह 30:2; यशायाह 31:1;) और अब फिर वह पहले की भविष्यद्वाणियों पर मुहर लगाता है, क्योंकि वह उन्हें मिस्र जाने से स्पष्ट रूप से मना करता है। तब भविष्यद्वक्ता यह अपराध उनकी आँखों के सामने रखता है: “यदि तुम मिस्र को भागते हो, तो तुम्हें कौन-सी बात विवश करती है? केवल यही कि तुम परमेश्वर की आज्ञा मानना नहीं चाहते।” अतः इन शब्दों में बड़ा भार है, न अपने परमेश्वर यहोवा की बात मानो; मानो उसने कहा हो कि वे मिस्र के विषय में तब तक सोच ही नहीं सकते थे जब तक कि वे मानो जान-बूझकर परमेश्वर के अधिकार को ठुकरा न दें और उसकी युक्ति का विरोध न करें।
वह आगे कहता है, और कहो, नहीं; हम तो मिस्र देश को जाएँगे, जहाँ हम युद्ध न देखेंगे, इत्यादि; यहाँ भविष्यद्वक्ता विद्रोह के मूल स्रोत को प्रकट करता है, अर्थात यह कि उन्होंने परमेश्वर के अनुग्रह की कुछ भी परवाह न की। निश्चय ही वे अपने देश में बहुत से संकटों के सामने थे, जिनसे भय और कँपकँपी उत्पन्न होती थी, और उसका उजाड़ भी उन्हें भय और थकान से भर सकता था; परन्तु जब परमेश्वर ने घोषणा की थी कि उनकी सुरक्षा की चिन्ता वह स्वयं करेगा, तो उस सहायता को, जिसकी उसने सेंत-मेंत प्रतिज्ञा की थी, कुछ न समझना कितनी बड़ी और कितनी नीच कृतघ्नता थी! अतः भविष्यद्वक्ता उनकी आज्ञा-उल्लंघन की निन्दा करते हुए साथ ही उसका कारण भी दिखाता है, अर्थात यह कि अविश्वास ने उन्हें परमेश्वर की आज्ञा मानने से दूर कर दिया। तो यदि तुम कहो, नहीं,—यह शब्द उनकी हठधर्मिता का प्रमाण था; परन्तु वह आगे कहता है, हम मिस्र को जाएँगे, जहाँ हम युद्ध न देखेंगे, जहाँ हम नरसिंगे का शब्द न सुनेंगे, मानो परमेश्वर की प्रतिज्ञा सचमुच झूठी या व्यर्थ हो। परन्तु भविष्यद्वक्ता यहाँ उनकी छिपी हुई अधर्मता को प्रकट करता है, कि वे परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर भरोसा नहीं रखते थे। तब उन्होंने मिस्र में अपने लिए शान्तिमय जीवन की आशा बाँधी। क्या इसे पूरा करना उनके वश में था? और परमेश्वर—वह क्या कर सकता था? उसने घोषणा की थी कि वे कनान देश में सुरक्षित और निश्चिन्त रहेंगे। मिस्र में विश्राम की आशा रखना, और उस देश में जहाँ परमेश्वर ने उन्हें चैन से रहने की आज्ञा दी थी, उपद्रवों के सिवा और कुछ की कल्पना न करना, परमेश्वर पर झूठ का दोष लगाना था।
अब हम देखते हैं कि वह क्यों कहता है, हम मिस्र को जाएँगे, जहाँ हम न युद्ध देखेंगे, न नरसिंगे का शब्द सुनेंगे, न रोटी के लिए भूखे रहेंगे। उन्होंने अपने लिए सब आशीषों की बहुतायत की आशा बाँधी, क्योंकि मिस्र देश उपजाऊ था। परन्तु क्या परमेश्वर उन्हें अभाव से पीड़ित नहीं कर सकता था? हम जानते हैं कि मिस्री भी कभी-कभी अकाल से पीड़ित हुए थे। इससे हम देखते हैं कि परमेश्वर ने लोगों की मिस्र जाने की योजना की इतनी निन्दा क्यों की; क्योंकि वे व्यर्थ आशाएँ रखते थे, और साथ ही परोक्ष रूप से परमेश्वर पर झूठ का दोष लगाते थे।
वह आगे कहता है, हे बचे हुए यहूदियो, यहोवा का वचन सुनो। यिर्मयाह ने इस प्रकार उन्हें सम्बोधित करके निःसन्देह उन्हें आज्ञाकारिता की ओर ले जाने का प्रयत्न किया। हम निश्चय जानते हैं कि समृद्धि में मनुष्य मानो मतवाले हो जाते हैं, इसलिए उन्हें सही सम्मति मानने के लिए सहज में राज़ी नहीं किया जा सकता। क्योंकि ऐसा क्यों होता है कि संसार के राजा और हाकिम अपने आप को इतनी छूट देते हैं, और अपनी अभिलाषाओं को इतनी स्वच्छन्दता देते हैं? केवल इसलिए कि उनके भाग्य का वैभव उन्हें मतवाला कर देता है। इसी प्रकार साधारण लोग भी, जब सब कुछ उनकी इच्छा के अनुसार सफल होता है, तब वे अपनी तलछट पर जमे रहते हैं; इसी कारण उन पर शासन करना कठिन होता है। इसके विपरीत भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि उनके लिए घमण्ड करने का कोई कारण नहीं है। वह कहता है, तुम थोड़े से हो, और परमेश्वर ने तुम्हें अद्भुत रीति से बचाया है। तो, हे बचे हुए यहूदियो, सुनो। संक्षेप में, उन्हें उनकी दीन और दयनीय दशा का स्मरण दिलाया जाता है, ताकि वे अधिक सीखने योग्य बनें। परन्तु यह भी बिना किसी फल के हुआ, जैसा हम आगे देखेंगे।
इस्राएल का परमेश्वर, सेनाओं का यहोवा यों कहता है। इन शब्दों के विषय में हम अन्यत्र कह चुके हैं। परमेश्वर को उसकी सामर्थ के कारण प्रायः सेनाओं का परमेश्वर कहा जाता है: इसलिए इस उपाधि के द्वारा परमेश्वर अपनी महानता को प्रकट करता है। फिर जब उसे इस्राएल का परमेश्वर कहा जाता है, तो हम जानते हैं कि इस प्रकार लोगों को लेपालकपन के उपकार का स्मरण दिलाया गया; क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें विशेष रूप से अपनी प्रजा बनाया था, और मानो उन्हें अपने साथ बाँध लिया था। अतः यह विश्वासयोग्यता और आज्ञाकारिता का अत्यन्त पवित्र बन्धन होना चाहिए था। इसलिए भविष्यद्वक्ता ने ऐसा आदर के लिए नहीं कहा, वरन इस्राएलियों को परमेश्वर के प्रति उनकी कठोरता और कृतघ्नता के लिए डाँटने के लिए कहा। वह आगे कहता है, यदि तुम मिस्र जाने का मुँह करो, और वहाँ परदेशी होकर रहने के लिए प्रवेश करो, तो ऐसा होगा कि जिस तलवार से तुम डरते हो वह तुम से आ मिलेगी, इत्यादि। यहाँ उनके दण्ड का वर्णन है, और शब्दों में कुछ भी अस्पष्ट नहीं है। परमेश्वर दिखाता है कि यदि वे सोचते थे कि मिस्र में वे समृद्ध होंगे, तो वे बहुत धोखे में थे; क्योंकि परमेश्वर के अनुग्रह और आशीष के बिना किसी समृद्धि की आशा नहीं की जा सकती; और जब परमेश्वर ने देखा कि वे उसके वचन से रोके न जाएँगे, तब उसने उनकी सब टेढ़ी युक्तियों पर शाप सुनाया।
अतः यदि हम परमेश्वर के निषेध के विरुद्ध कुछ भी करने का प्रयत्न करें, तो उसका असफल होना अनिवार्य है; और क्यों? क्योंकि सारी समृद्धि का कारण परमेश्वर का अनुग्रह है, और इसलिए उसका शाप सदा सब परिणामों को दुःखद और अभागा बना देता है: और जो कुछ हम परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध आरम्भ करते हैं, वह आरम्भ में चाहे कितना ही सफल क्यों न हो, तौभी उसका अन्त दुःखी और दयनीय होगा, उसी के अनुसार जो भविष्यद्वक्ता यहाँ सिखाता है।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जैसे तूने केवल एक ही बार हमें वह मार्ग और वह लक्ष्य नहीं दिखाया जिसकी ओर हमें बढ़ना चाहिए, वरन तू प्रतिदिन हमारी ओर अपना हाथ बढ़ाने में प्रसन्न होता है, और अपने निरन्तर उपदेशों के द्वारा हमें आगे बढ़ने के लिए बुलाता और उभारता है,—हाँ, यह वरदान दे कि हम तेरी वाणी पर ध्यान दें, और अपने शरीर की सब भ्रष्ट इच्छाओं और अभिलाषाओं को ऐसा त्याग दें कि कोई भी बात हमें पूर्ण रूप से तेरे अधीन होने से, और जहाँ कहीं तू हमें बुलाए वहाँ तेरे पीछे चलने से न रोके, ताकि हम अन्त में उस धन्य विश्राम में पहुँचें, जो तूने हमारे प्रभु मसीह के द्वारा स्वर्ग में हमारे लिए तैयार किया है।—
आमीन।
एक सौ अट्ठावनवाँ व्याख्यान
यिर्मयाह 42:18
18. क्योंकि इस्राएल का परमेश्वर, सेनाओं का यहोवा यों कहता है: जिस प्रकार से मेरा कोप और जलजलाहट यरूशलेम के निवासियों पर भड़क उठी थी, उसी प्रकार से यदि तुम मिस्र में जाओ, तो मेरी जलजलाहट तुम्हारे ऊपर ऐसी भड़क उठेगी कि लोग चकित होंगे, और तुम्हारी उपमा देकर शाप दिया करेंगे और तुम्हारी निन्दा किया करेंगे, और तुम श्राप और नामधराई का कारण होगे; और तुम इस स्थान को फिर न देखने पाओगे।
18. Quoniam sic dicit Jehova exercituum, Deus Israel, Sicuti fusa est iracundia mea et excandescentia mea super habitatores Jerusalem, sic fundetur excandescentia mea super vos cum veneritis in Aegyptum; et eritis in execrationem et in stuporem et in maledictum et in probrum; et non videbitis amplius locum hunc.
भविष्यद्वक्ता जो कुछ वह पहले कह चुका था उसकी पुष्टि परमेश्वर के प्रतिशोध के एक उदाहरण के द्वारा करता है, जो हाल ही में यहूदियों पर प्रकट हुआ था; क्योंकि यद्यपि नगर और मन्दिर के विनाश की भविष्यद्वाणी उनसे बार-बार की गई थी, तौभी वे परमेश्वर की धमकियों के प्रति सुन्न हो गए थे। परन्तु परमेश्वर ने बहुत समय तक ठहरे रहने के बाद, अन्त में वह पूरा किया जिसकी उसने धमकी दी थी। तब उन्होंने वह भयानक उदाहरण देखा था, जो उन्हें, और उनके वंशजों को भी, भय से भर देना चाहिए था। तब भविष्यद्वक्ता ने, यह देखकर कि वे इतने मन्द और मूर्ख थे कि बिना सोचे-समझे परमेश्वर की धमकियों का उपहास करते थे, उन्हें स्मरण दिलाया कि उन्होंने हाल ही में क्या देखा था। वह कहता है, “तुम जानते हो कि परमेश्वर की जलजलाहट यरूशलेम के निवासियों पर कैसे उण्डेली गई थी; वैसी ही वह उन पर भी उण्डेली जाएगी जो मिस्र को भागेंगे।”
अब यिर्मयाह अधिकार के साथ बोल सकता था, क्योंकि वह उसी प्रतिशोध का दूत रहा था जिसका अब उल्लेख किया गया है। यदि किसी दूसरे ने परमेश्वर के नाम से घोषणा की होती कि क्या हुआ था, तो वे आपत्ति करके कह सकते थे कि परमेश्वर ने निश्चय ही उन्हें उचित दण्ड दिया था, परन्तु इससे यह नहीं निकलता कि जो वह कहता है वह सत्य है; परन्तु जब भविष्यद्वक्ता ने चालीस वर्ष तक बार-बार और निरन्तर उन पर वही बात सुनाई थी जिसे अन्त में उन्होंने वास्तव में और अनुभव से ऊपर से अपने लिए पहले से कही हुई पाया, तब वह परमेश्वर के वैसे ही न्याय को सर्वोच्च अधिकार के साथ दोहरा सकता था, जैसा वह अब करता है।
वह कहता है, यहोवा यों कहता है, जैसे मेरी जलजलाहट उण्डेली गई, इत्यादि। यह उपमा या तो जल से या धातुओं से ली गई है: इसलिए कुछ लोग इसका यह अनुवाद करते हैं, “जैसे मेरी जलजलाहट बह निकली;” परन्तु यिर्मयाह द्वारा प्रयुक्त क्रिया का ठीक अर्थ उण्डेलना है। तौभी, जैसा मैंने कहा, यह जल पर लागू की जा सकती है, जो उण्डेले जाने पर फैल जाता है, या धातुओं पर, जो पिघलकर इधर-उधर फैल जाती हैं। तब उसका अर्थ यह है कि जितने मिस्र को जाएँगे वे सब दुःखी और दयनीय होंगे; क्योंकि वे जहाँ कहीं भी अपने आप को छिपाने का प्रयत्न करें, परमेश्वर का प्रतिशोध उन्हें निर्वासित होने पर भी ढूँढ़ निकालेगा, क्योंकि वह जल-प्रलय के समान सब निवासियों पर फैल जाएगा, जिससे वे व्यर्थ ही छिपने के स्थान ढूँढ़ेंगे। अब हम भविष्यद्वक्ता का उद्देश्य देखते हैं। अर्थ यह है कि जैसे यहूदियों ने अपनी विपत्ति के द्वारा जान लिया था कि नगर और मन्दिर के विनाश की पूर्वघोषणा करने में वह परमेश्वर का सच्चा और विश्वासयोग्य सेवक था, वैसे ही अब वे पाएँगे, यदि वे पश्चाताप न करें, कि जिस सन्देश के द्वारा उसने दूसरे विनाश की धमकी दी थी वह भी परमेश्वर ही की ओर से आया था। वह कहता है, जब तुम मिस्र में आओगे तब मेरा क्रोध तुम पर उण्डेला जाएगा।
इसके बाद वह व्यवस्था से एक वचन जोड़ता है, जो भविष्यद्वक्ताओं में प्रायः आता है, कि वे शाप-वाक्य, विस्मय, श्राप और नामधराई ठहरेंगे। शब्द {,}אלהale, जिसका अनुवाद हमने “शाप-वाक्य” किया है, ठीक-ठीक शपथ का अर्थ रखता है; परन्तु जब हम चाहते हैं कि हमारी बात पर विश्वास किया जाए, तब प्रायः उसके साथ कोसना भी जोड़ दिया जाता है, इसलिए इसे शाप-वाक्य के अर्थ में भी समझा जाता है। तब वह कहता है कि वे शाप-वाक्य ठहरेंगे, अर्थात कोसने का एक सूत्र, जैसा हमने अन्यत्र समझाया है। तो जो कोई भी शाप देना चाहता, वह, जैसा भविष्यद्वक्ता कहता है, इस सूत्र का एक सामान्य कहावत के रूप में प्रयोग करता, “परमेश्वर तुझे वैसा ही शाप दे जैसा उसने यहूदियों को दिया,”—“मैं वैसे ही नष्ट हो जाऊँ जैसे यहूदी नष्ट हुए।” संक्षेप में, वह संकेत करता है कि दण्ड इतना भयानक होगा कि मनुष्य उसे एक सामान्य कहावत बना लेंगे; वह आगे कहता है, और विस्मय, अर्थात परमेश्वर का प्रतिशोध इतना भयंकर होगा कि सब लोग विस्मय से भर जाएँगे। वह और भी जोड़ता है, और श्राप और नामधराई। कही गई बात का सार यह है कि परमेश्वर यहूदियों पर कोई साधारण दण्ड नहीं, वरन ऐसा दण्ड लाएगा जो सब अन्यजातियों के बीच स्मरण किया जाएगा, ताकि यह प्रकट हो कि भविष्यद्वाणी के वचन को हठपूर्वक ठुकराने में उनकी दुष्टता हल्की नहीं थी।
अन्त में वह जोड़ता है कि वे अपने देश को फिर कभी न देखेंगे; क्योंकि यहूदियों का उद्देश्य सदा के लिए मिस्र में रहना नहीं था; क्योंकि वे यह दिखावा करते थे कि वे परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर अपने भरोसे में दृढ़ और स्थिर बने हुए हैं, और घमण्ड करते थे कि उन्हें लौटने की आशा है, क्योंकि परमेश्वर ने उनके निर्वासन के लिए सत्तर वर्ष ठहराए थे। अतः जब वे इस प्रकार मूर्खतापूर्वक घमण्ड करते थे कि वे प्रतिज्ञा किए गए अनुग्रह के लिए परमेश्वर पर आशा रखते हैं, तब वह कहता है कि वे लौटने की हर आशा से वंचित कर दिए गए थे; क्योंकि यद्यपि परमेश्वर पूर्व में तितर-बितर हुए दूसरे बन्दियों को लौटा लाएगा, तौभी मिस्र के अतिथियों का अपने निर्वासन में ही मरना ठहराया गया था। अतः यह उनसे हर आशा काट देना था, ताकि वे जान लें कि वे पूर्ण रूप से त्याग दिए गए हैं, और परमेश्वर की प्रजा के बीच उनका फिर कोई स्थान न रहेगा, चाहे वे स्वयं को सबसे प्रथम समझे जाने की कितनी ही इच्छा क्यों न रखें। आगे लिखा है,—
यिर्मयाह 42:19-21
19. हे बचे हुए यहूदियो, यहोवा ने तुम्हारे विषय में कहा है कि मिस्र में मत जाओ: तुम निश्चय जानो कि मैंने आज तुम को चिताकर यह बात बता दी है।
19. Loquutus est Jehova contra vos, reliquiae Jehudah, Ne eatis in Aegyptum; sciendo sciatis quod contestatus fuerim vos hodie:
20. क्योंकि जब तुम ने मुझ को यह कहकर अपने परमेश्वर यहोवा के पास भेज दिया कि हमारे निमित्त हमारे परमेश्वर यहोवा से प्रार्थना कर, और जो कुछ हमारा परमेश्वर यहोवा कहे उसी के अनुसार हम को बता और हम वैसा ही करेंगे, तब तुम ने अपने मन में छल किया।
20. Quoniam fefellistis animus vestras (aut, fallaces fuistis in animabus vestris) quando misistis me ad Jehovam Deum vestrum, dicendo, Ora pro nobis Jehovam Deum nostrum; et secundum omnia quae locutus Jehova Deus noster fuerit, sic annuntia nobis et faciemus.
21 और मैं आज तुम को बता भी चुका हूँ; परन्तु तुम ने अपने परमेश्वर यहोवा की बात नहीं मानी, और न कोई बात मानी जिसके लिए उसने मुझे तुम्हारे पास भेजा है।
21. Ego autem annuntiavi vobis hodie, et non audivistis vocem Jehovae Dei vestri, et secundum omnia propter quae misit me ad vos.
यहाँ भविष्यद्वक्ता उनके पाप को और अधिक पूर्णता से समझाता है; क्योंकि यदि उनकी अधर्मता अधिक स्पष्ट रूप से प्रकट न की जाती, तो उनका दण्ड अत्यधिक प्रतीत हो सकता था। अतः वह कहता है कि इस दण्ड को अत्यधिक कठोर नहीं समझना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर ने केवल एक बार ही यहूदियों के विरुद्ध गवाही नहीं दी थी और उन्हें गम्भीर रीति से और गवाहों के सामने चिताया था; परन्तु उन्होंने अन्त तक न केवल उसकी सम्मति और चेतावनियों को तुच्छ जाना, वरन घमण्ड से उन्हें ठुकरा भी दिया। और वह जोड़ता है कि उन्होंने परमेश्वर के साथ झूठ और विश्वासघात का व्यवहार किया, क्योंकि उन्होंने यह दिखावा किया कि परमेश्वर की इच्छा ज्ञात होते ही वे आज्ञाकारी होंगे; परन्तु उन्होंने दिखा दिया कि वास्तव में उनका ऐसा कोई उद्देश्य न था; क्योंकि जब भविष्यद्वक्ता ने परमेश्वर के नाम से उन्हें उत्तर दिया, तब उनकी अपनी व्यर्थता और छल ने उन पर पूरा अधिकार कर लिया; और न उनमें परमेश्वर की आज्ञा मानने की इच्छा थी।
अब हम शब्दों पर विचार करें: हे बचे हुए यहूदियो, यहोवा ने तुम्हारे विरुद्ध कहा है। वह फिर उन्हें बचे हुए कहता है, ताकि वे स्मरण रखें कि अब उनके पास घमण्ड करने का कोई कारण नहीं था। हम जानते हैं कि यहूदी समृद्धि के समय भविष्यद्वक्ताओं की कैसे उपेक्षा करते थे; क्योंकि वे अपने सौभाग्य से मतवाले थे। परन्तु परमेश्वर ने उस घमण्ड को तितर-बितर कर दिया था, जिससे वे पहले भरे हुए थे। भविष्यद्वक्ता ने उनके सामने वह अनुग्रह भी रखा था जिसके द्वारा वे छुड़ाए गए थे, ताकि वे आगे से परमेश्वर और उसके वचन के अधीन होना सीखें। इसी कारण उसने उन्हें बचे हुए कहा, अर्थात उन्हें अधिक ध्यान देनेवाला और सीखने योग्य बनाने के लिए। परन्तु यह बिना किसी लाभ के हुआ; क्योंकि यद्यपि उनकी दशा लगभग निराशाजनक थी, और वे लगभग कुछ भी नहीं रह गए थे, तौभी उन्होंने अपना ऊँचा मन नहीं छोड़ा था। वे तब भी झूठे भरोसे से फूले हुए थे। परन्तु यह चेतावनी उन्हें और भी अधिक निरुत्तर ठहराने में सफल हुई।
वह कहता है, यदि तुम मिस्र में प्रवेश करो, तो जानते हुए जान लो, या, जानते हुए तुम जान लोगे। क्रिया भविष्यत् काल में है, यद्यपि इसे आज्ञार्थक भी माना जा सकता है। परन्तु भविष्यत् काल सबसे उपयुक्त है, जानते हुए तुम जान लोगे, अर्थात घटना स्वयं तुम्हें सिखाएगी, परन्तु बहुत देर से, जैसे मूर्ख विपत्ति आ पड़ने के बाद ही बुद्धिमान होते हैं।
जानते हुए तुम जान लोगे कि मैंने आज तुम्हारे विरुद्ध गवाही दी है। परमेश्वर कहता है कि यहूदियों को सही बुद्धि पर लाने के लिए उसने कुछ भी करना बाकी न छोड़ा था; क्योंकि गवाही प्रायः गम्भीर रीति से, गवाहों को बुलाकर दी जाती है, जिससे कोई यह बहाना न कर सके कि वह अज्ञानता के कारण भटक गया। अतः हर बहाने का आधार हटा देने के लिए गवाहों को बुलाने की रीति थी। इसलिए परमेश्वर सामान्य प्रथा के अनुसार और न्यायालय के अर्थ में बोलता है, और कहता है कि उसने यहूदियों के विरुद्ध गवाही दी थी, कहीं ऐसा न हो कि वे संयोग से ज्ञान के अभाव के कारण अपराध करें। तब इससे यह निकलता है कि वे जान-बूझकर नष्ट हुए, मानो उन्होंने स्वयं अपना विनाश ढूँढ़ा हो।
अब वह एक और परिस्थिति जोड़ता है, कि उन्होंने अनोखी भक्ति का दिखावा करके उसे भेजा था, मानो वे हर प्रकार से परमेश्वर की आज्ञा मानने को तैयार हों।
परन्तु वह पहले कहता है कि उन्होंने अपने आप को धोखा दिया था, या वे धोखा खा गए थे। क्रिया {,}תעהtoe, जिससे हिथपाएल रूप बनता है, का अर्थ है भूल करना या भटक जाना। परन्तु व्याख्याकार इस पर सहमत नहीं हैं; क्योंकि कुछ लोग यह व्याख्या देते हैं कि उन्होंने अपने मन में भविष्यद्वक्ता को धोखा दिया, अर्थात उन्होंने चतुराई से मिस्र जाने की अपनी टेढ़ी योजना को बनाए रखा, और साथ ही यह स्वीकार किया कि वे आज्ञा मानने को तैयार हैं। परन्तु चूँकि यहाँ भविष्यद्वक्ता का नाम नहीं लिया गया है, यह व्याख्या अस्वाभाविक प्रतीत होती है।
इसलिए मैं दूसरी व्याख्या को उत्तम समझता हूँ, कि उन्होंने अपने आप को धोखा दिया; और {,}ב beth, यहाँ अतिरिक्त है, जैसा बहुत से स्थानों में होता है: वह कहता है, तो तुमने अपने ही प्राणों को धोखा दिया, जब तुमने मुझे यहोवा के पास भेजा। भविष्यद्वक्ता संकेत करता है कि जब उन्होंने चतुराई से काम लेना चाहा, तब वे स्वयं धोखा खा गए; क्योंकि परमेश्वर की यह रीति है कि वह धूर्तों को प्रकट कर देता है, और जब वे यह या वह युक्ति रचते हैं, तब वे केवल अपने ही लिए फन्दे और जाल बुनते हैं; और हम देखते हैं कि धूर्तता सदा दुष्टों को विनाश तक पहुँचाती है। इस अर्थ के अनुसार भविष्यद्वक्ता चतुराई के उस टेढ़े दिखावे का उपहास करता है, जब दुष्ट परमेश्वर को धोखा देना चाहते हैं; और वह कहता है कि उन्होंने अपने आप को धोखा दिया, जैसा हम भी प्रतिदिन देखते हैं। फिर वह कहता है कि वे स्वयं उस बुराई के कारण बने थे, क्योंकि जब उन्होंने उसे यहोवा के पास भेजा, तब उन्होंने अपनी धूर्त और कपटपूर्ण युक्ति से अपने आप को विनाश में डाल दिया था।
{,}כיki, को यहाँ समय-सूचक क्रियाविशेषण के रूप में लेना चाहिए, जब तुमने मुझे अपने परमेश्वर यहोवा के पास यह कहकर भेजा, कि हमारे लिए प्रार्थना कर।
355 सब प्राचीन अनुवाद और तरगूम, और आधुनिक लेखक भी, इन दो पदों, 19वें और 20वें, की वाक्य-रचना के विषय में मतभेद रखते हैं। मैं निम्नलिखित अनुवाद प्रस्तुत करता हूँ,— 19. हे यहूदा के बचे हुए लोगो, तुम्हारे लिए यहोवा का वचन यह है, मिस्र में प्रवेश न करो; जानते हुए जान लो (या, निश्चय जान लो,) कि मैं आज के दिन तुम्हें यह चेतावनी देता हूँ। 20. सचमुच, तुम अपने ही विरुद्ध बहुत भटक रहे हो; क्योंकि तुमने मुझे अपने परमेश्वर यहोवा के पास भेजा, इत्यादि, इत्यादि। पहला वाक्यांश Vulg. के अनुसार है। स्पष्ट सन्देश यह था कि मिस्र में प्रवेश न करें। जो बात उन्हें जाननी और स्मरण रखनी थी वह वह चेतावनी थी जो उसने उन्हें दी। फिर 20वें पद में वह उन पर असंगति का दोष लगाता है, कि वे अपनी ही प्रतिज्ञाओं से भटक गए, और उसके बाद वह विशेष रूप से बताता है कि उन्होंने क्या प्रतिज्ञा की थी। इस दृष्टिकोण के अनुसार पूरे खण्ड में संगति है। “प्राण” शब्द प्रायः व्यक्ति के अर्थ में लिया जाता है: “तुम्हारे अपने ही विरुद्ध” का शाब्दिक अर्थ है “तुम्हारे अपने ही प्राणों के विरुद्ध।” इस वाक्यांश का अर्थ यह है कि उन्होंने अपने ही कथन को झुठलाया, जैसा आगे की बातों से स्पष्ट है। इब्रानी में भूतकाल का अनुवाद प्रायः वर्तमान काल से किया जा सकता है, क्योंकि वह वर्तमान तक और वर्तमान सहित समय की ओर संकेत करता है। इब्रानी में भविष्यत् काल का अनुवाद भी वर्तमान काल से किया जा सकता है, क्योंकि वह प्रायः उस बात की ओर संकेत करता है जो अभी है और बनी रहती है। — सं.
वह उन्हें केवल विश्वासघात के लिए ही नहीं, वरन पवित्र वस्तु के अपमान के लिए भी डाँटता है, क्योंकि उन्होंने दुष्टता से परमेश्वर के नाम को अपवित्र किया। क्योंकि यह सहने योग्य न था कि वे धर्म के प्रति आदर का दिखावा करें, और गवाही दें कि वे परमेश्वर की आज्ञा मानेंगे, और साथ ही अपने मन में वह टेढ़ा अभिप्राय पालें जिसे उन्होंने बाद में प्रकट किया। और इसलिए वह केवल यही नहीं बताता कि उसे भेजा गया था, वरन यह भी कि उससे उनके लिए विनती करने का अनुरोध किया गया था। तो यह दोहरा अपमान था, क्योंकि उन्होंने पूछा था कि परमेश्वर को क्या भाएगा, और बाद में भविष्यद्वाणी की उपेक्षा की,—और फिर उन्होंने प्रार्थना चढ़ाई, और जब परमेश्वर ने अपने सेवक के द्वारा उन्हें उत्तर दिया, तब उन्होंने उसे कुछ न समझा! अब हम समझते हैं कि यिर्मयाह ने इन दो बातों का इतना स्पष्ट उल्लेख क्यों किया।
हमारे परमेश्वर से हमारे लिए प्रार्थना कर, और जो कुछ हमारा परमेश्वर यहोवा कहे, वह सब तू हमें बता: लोग अद्भुत सच्चाई से काम करते हुए प्रतीत होते थे; उन्होंने भविष्यद्वक्ता को उपदेश दिया कि वह कुछ न छिपाए, कुछ न जोड़े और कुछ न घटाए। इससे बढ़कर और क्या चाहा जा सकता है कि मनुष्य सब दुविधा और सब टालमटोल को छोड़ दें, और न चाहें कि परमेश्वर के वचन बिगाड़े जाएँ? और यहूदियों ने यह बात ऊँचे शब्दों में व्यक्त की, जो कुछ हमारा परमेश्वर यहोवा उत्तर दे, वह तू हमें बता। यहाँ वे स्वयं यिर्मयाह से भी अधिक उत्साही प्रतीत होते थे; क्योंकि उन्होंने उस पर यह नियम ठहराया कि वह कुछ न जोड़े और कुछ न घटाए, वरन परमेश्वर की इच्छा का विश्वासयोग्य व्याख्याता बने। अतः वे आधे स्वर्गदूत प्रतीत होते थे। बाद में उन्होंने गवाही दी कि जो कुछ परमेश्वर उन्हें आज्ञा दे वह सब वे करेंगे।
अन्त में वह जोड़ता है, और मैंने आज तुम्हें यह बता दिया है। यहाँ वह अपनी विश्वासयोग्यता प्रस्तुत करता है, घमण्ड करने के लिए नहीं, वरन इसलिए कि उनकी अधर्मता की भर्त्सना हो, जिन्होंने अन्त में परमेश्वर की उस वाणी को तुच्छ जाना जिसे मानने का उन्होंने घमण्ड किया था। वह कहता है, तुमने अपने परमेश्वर यहोवा की वाणी नहीं सुनी, और न उन सब बातों के अनुसार किया जिनके लिए उसने मुझे तुम्हारे पास भेजा है। भविष्यद्वक्ता फिर इस सत्य की पुष्टि करता है कि यहूदियों ने जो उचित था, और जो उनके भले के लिए भी था, उसका अनुसरण नहीं किया, यह उनका अपना ही दोष था, क्योंकि जो कुछ परमेश्वर ने आज्ञा दी थी वह उसने विश्वासयोग्यता से उन्हें सौंप दिया था। अब वह आगे कहता है,—
यिर्मयाह 42:22
22. इसलिए अब तुम निश्चय जानो कि जिस स्थान में तुम परदेशी होकर रहने की इच्छा करके जाना चाहते हो, उसमें तुम तलवार, अकाल और मरी से मर जाओगे।
22. Et nunc sciendo scitote (hic {}תדעוimperative sumendum est sine controversia) quod gladio et fame et peste moriemini in loco ad quem appetitis ire, ad peregrinandum illic.
भविष्यद्वक्ता अन्त में अपना प्रवचन समाप्त करता है, उन कारणों का उल्लेख करने के बाद जिनसे परमेश्वर उनके साथ इतनी कठोरता से व्यवहार करेगा, अर्थात इसलिए कि उनका विश्वासघात, अधर्मता, कृतघ्नता और हठीली अवहेलना असहनीय थी। तो यह दिखाने के बाद कि उनके पास ऐसा विवाद करने का कोई कारण न था मानो परमेश्वर अत्यधिक कठोर हो, अन्त में वह घोषणा करता है कि उनका क्या अन्त होनेवाला था, अर्थात यह कि वे तलवार, अकाल या मरी से मरेंगे, अर्थात उनके लिए बचाव की कोई आशा न होगी, क्योंकि यदि वे तलवार से बच निकलते, तो अकाल उन्हें घेर लेता, और यदि वे अकाल से बच जाते, तो मरी से नष्ट हो जाते। जैसा सब जानते हैं, भविष्यद्वक्ताओं में बोलने की यह एक सामान्य रीति है कि जब वे संकेत करते हैं कि दुष्ट व्यर्थ ही दण्ड से छूटने की आशा रखते हैं, तब वे परमेश्वर को ऐसा प्रस्तुत करते हैं मानो सब प्रकार के दण्ड उसकी आज्ञा के अधीन हों।
वह कहता है, तो तुम उसी स्थान में मरोगे जिसे तुम अपने प्रवास के लिए ढूँढ़ते हो; वह फिर लोगों के उद्देश्य को दिखाता है, क्योंकि वे सदा के लिए मिस्र में रहने का विचार नहीं रखते थे, वरन केवल कुछ समय के लिए, जब तक अपने देश को लौटने की स्वतन्त्रता न मिल जाए। संक्षेप में, वे मानो परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध पुनःस्थापित होना चाहते थे; और फिर भी वे झूठे रूप से परमेश्वर का नाम आगे रखने से नहीं रुके, जैसा कपटी लोग, जो परमेश्वर का उपहास करते हैं, सदा करते हैं।
अब आगे लिखा है,—
