यह हिन्दी संस्करण UECF.NET के लिए AI-सहायता से किए गए पूर्ण अनुवाद और सम्पादकीय गुणवत्ता-समीक्षा के द्वारा तैयार किया गया है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।
यिर्मयाह 26
निन्यानबेवाँ व्याख्यान
यिर्मयाह 26:1-2
1. योशिय्याह के पुत्र यहूदा के राजा यहोयाकीम के राज्य के आरम्भ में यहोवा की ओर से यह वचन पहुँचा,
1. Principio regni Joakim filii Josiae, regis Jehudah, fuit sermo hic a Jehova, dicendo,
2. यहोवा यों कहता है: यहोवा के भवन के आँगन में खड़ा होकर यहूदा के उन सब नगरों के लोगों से, जो यहोवा के भवन में दण्डवत् करने को आते हैं, वे सब वचन कह, जिन्हें उनसे कहने की आज्ञा मैं तुझे देता हूँ; उनमें से एक भी वचन घटा न देना।
2. Sic dicit Jehova, Sta in atrio templi Jehovae, et loquere ad omnes urbes Jehudah (id est, omnes cives urbium Jehudah) quae veniunt ad orandum in templum Jehovae hos omnes sermones quas mandavero tibi ad loquendum ad ipsos (hoc est, loquaris ipsis;) ne diminuas verbum.
इस अध्याय में एक उल्लेखनीय इतिहास है, जिसके साथ एक अत्यन्त उपयोगी शिक्षा जुड़ी हुई है; क्योंकि यिर्मयाह पश्चाताप के विषय में बोलता है, जो सच्चे धर्म के मुख्य विषयों में से एक है, और साथ ही वह यह दिखाता है कि लोगों को परमेश्वर ने इसलिए त्याग दिया था कि उन्होंने हठपूर्वक सब चेतावनियों को तुच्छ जाना, और किसी भी उपाय से वे सही मन पर लाए न जा सके। ये दोनों बातें हम इस अध्याय में पाएँगे।
वह कहता है कि यह वचन उसके पास यहोयाकीम के राज्य के आरम्भ में पहुँचा, जिस राजा के विषय में हम अन्य स्थानों में कह चुके हैं, जहाँ यिर्मयाह ने उसके राज्यकाल में दिए गए अन्य उपदेशों का वर्णन किया। इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि यह पुस्तक किसी नियमित क्रम में संकलित नहीं की गई, वरन् अध्याय एकत्र किए गए, और उन्हीं से यह ग्रन्थ बनाया गया।
तौभी यहाँ समय का उल्लेख व्यर्थ नहीं दोहराया गया है; क्योंकि हम जानते हैं कि दुःखी लोग नई घटनाओं से कुछ आशा बाँध लेते हैं। जब मनुष्य बहुत समय तक क्लेश सहते रहे हों और अपनी विपत्तियों में मानो लगभग सड़ गए हों, तब भी जब कोई परिवर्तन होता है तो वे सोचते हैं कि अब वे सुखी होंगे, और अपने आप को व्यर्थ आशाएँ दिलाते हैं। सम्भवतः जब यहोयाकीम राज्य करने लगा, तब लोगों का भी ऐसा ही भरोसा था; क्योंकि वे सोच सकते थे कि उसके द्वारा सब बातें फिर से अच्छी दशा में आ जाएँगी। एक और परिस्थिति भी ध्यान देने योग्य है: यद्यपि उनकी दशा लगभग आशा से परे थी, तौभी उन्होंने परमेश्वर के विरुद्ध अपने आप को कठोर कर लिया, यहाँ तक कि वे हठपूर्वक भविष्यद्वक्ताओं का विरोध करते रहे। इससे प्रकट होता है कि त्यागे हुए लोग परमेश्वर के कोड़ों से और भी अधिक चिढ़ गए थे, और कभी सच्चे और वास्तविक रूप से दीन नहीं हुए थे। यही कारण था कि यिर्मयाह ने परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार इतनी कड़ाई से बात की।
अन्य बातों को छोड़कर मैं इन शब्दों पर आता हूँ, कि यहोवा का वचन उसके पास पहुँचा। इस प्रकार उसने अपने लिए कुछ भी नहीं लिया; वरन् वह यह साक्षी देता है कि, विशेषकर ऐसे हठीले लोगों के बीच, यह कितना आवश्यक था कि वह अपनी ओर से कुछ न लाए, वरन् स्वर्ग से आया हुआ सत्य सुनाए। यहाँ एक सामान्य विषय पर विचार किया जा सकता था, अर्थात् यह कि कलीसिया में केवल परमेश्वर ही की सुनी जानी चाहिए, और यह भी कि कोई अपने ऊपर भविष्यद्वक्ता या शिक्षक का नाम न ले, सिवाय उसके जिसे प्रभु ने गढ़ा और नियुक्त किया हो, और जिसे उसने अपना सन्देश सौंपा हो; परन्तु इन बातों पर अन्यत्र, और बार-बार, और बहुत विस्तार से विचार किया जा चुका है; और मैं सामान्य विषयों पर देर तक ठहरना पसन्द नहीं करता। अतः इतना ध्यान में रखना पर्याप्त है कि यिर्मयाह किस उद्देश्य से कहता है कि यहोवा का वचन उसके पास पहुँचा, अर्थात् इसलिए कि वह अपने लिए अधिकार प्राप्त करे; वह न अपनी बुद्धि पर, न किसी मानवीय या सांसारिक बात पर घमण्ड करता है, वरन् केवल यह कहता है कि उसने वही कहा जिसकी आज्ञा प्रभु ने उसे दी थी।
वह आगे कहता है, यहोवा यों कहता है, यहोवा के भवन के आँगन में खड़ा हो (शब्दशः ऐसा ही है, परन्तु भवन से मन्दिर अभिप्रेत है)। लोगों को मन्दिर के भीतर प्रवेश करने की अनुमति नहीं थी; इसलिए भविष्यद्वक्ता को आज्ञा दी गई कि वह आँगन में ठहरे, जहाँ सब लोग उसकी सुन सकें।
जैसा हम देख चुके हैं, वह याजकीय वर्ग का था; परन्तु केवल लेवियों से बात करने से बहुत थोड़ा लाभ होता। इसलिए आवश्यक था कि वह बाहर जाकर सारी प्रजा को परमेश्वर की वे आज्ञाएँ सुनाए जिनका यहाँ वर्णन है; और उसे यह काम केवल यरूशलेम के नागरिकों के लिए ही नहीं, वरन् सब यहूदियों के लिए करना था; और यही स्पष्ट रूप से अपेक्षित है, यहूदा के सब नगरों से कह; और फिर यह जोड़ा गया है, जो यहोवा के मन्दिर में दण्डवत् करने को आते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर ने जान-बूझकर उन लोगों की ढिठाई को पहले ही रोक दिया, जो यह सोचते थे कि जब उन्हें इतनी कड़ाई से डाँटा जाता है तो उनके साथ अन्याय होता है: “क्या! हम अपनी पत्नियों और बच्चों को छोड़कर यहाँ परमेश्वर की उपासना करने आए हैं; हमने अपने निजी लाभ की सारी चिन्ता एक ओर रख दी है, और असुविधा उठाकर भी यहाँ आए हैं; हम घर पर चैन से रह सकते थे और अपनी आशीषों का आनन्द ले सकते थे; हमने बड़ा व्यय उठाया है, लम्बी और थकानेवाली यात्रा की है, बलिदान लाए हैं, और अपने दैनिक भोजन में भी अपने आप को रोका है, ताकि परमेश्वर की उपासना हो; और फिर भी तू हम पर कड़ा प्रहार करता है, और हम तेरे मुँह से भयंकर बातों के सिवाय और कुछ नहीं सुनते; क्या यह उचित है? क्या परमेश्वर अपने दासों को ऐसा प्रतिफल देता है?”
इस प्रकार वे भविष्यद्वक्ता से विवाद कर सकते थे; परन्तु वह इन आपत्तियों को पहले ही रोक देता है, और वह बात मान लेता है जिसका वे तर्क दे सकते थे, कि वे बलिदान चढ़ाने को मन्दिर में आए थे; परन्तु वह यह संकेत करता है कि परमेश्वर कुछ और ही चाहता था, और यह कि मन्दिर में आने से उन्होंने अपने कर्तव्य पूरे नहीं किए, जब तक कि वे परमेश्वर और उसकी व्यवस्था का सच्चाई से पालन न करें। अब हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने क्यों कहा कि वह उनके पास भेजा गया था जो परमेश्वर की उपासना करने को यरूशलेम आते थे। वह काम अपने आप में निन्दनीय नहीं हो सकता था; वरन् यह अत्यन्त प्रशंसा के योग्य था कि वे इस प्रकार परमेश्वर की उपासना में आया करते थे; परन्तु क्योंकि यहूदियों ने उस उद्देश्य पर ध्यान नहीं दिया जिसके लिए परमेश्वर ने अपने लिए बलिदान चढ़ाने की आज्ञा दी थी, और उस उद्देश्य पर भी नहीं जिसके लिए उसने ये सब बाहरी विधियाँ ठहराई थीं, इसलिए आवश्यक था कि वह भ्रम दूर किया जाए जिसमें वे फँसे हुए थे। 159 वास्तव में उसका सन्देश याजकों या झूठे भविष्यद्वक्ताओं के लिए नहीं, वरन् उन लोगों के लिए प्रतीत होता है जो उपासना करने आते थे, मानो उनसे बात करना व्यर्थ था। विश्वासघाती और भ्रष्ट याजकों और झूठे भविष्यद्वक्ताओं के समान निराशाजनक दशा में और कोई नहीं होता; उनके द्वारा भटकाए गए लोग फिर से सुधारे जा सकते हैं, परन्तु उनकी अपनी दशा लगभग आशा से परे होती है। यहाँ यही संकेत किया गया प्रतीत होता है; क्योंकि उन्हें छोड़ दिया गया है, जबकि लोगों से बात की गई है। — सं.
वह कहता है, वे सब वचन कह जिन्हें उनसे कहने की आज्ञा मैंने तुझे दी है।
भविष्यद्वक्ता फिर से इस बात की पुष्टि करता है कि जो कुछ वह सिखाता था उसका रचयिता वह स्वयं नहीं था, वरन् केवल एक सेवक था, जो विश्वासयोग्यता से वही सुनाता था जो परमेश्वर ने उसे सौंपा था; और इस प्रकार लोग उस पर यह आपत्ति नहीं कर सकते थे कि वह अपनी ही कल्पनाएँ प्रस्तुत करता है, क्योंकि उसने ऐसे लांछन को दूर कर दिया। झूठे भविष्यद्वक्ता भी ऐसी ही बातें कह सकते थे; परन्तु यिर्मयाह के पास अपनी बुलाहट के निश्चित प्रमाण थे, इसलिए यहूदी उसे अस्वीकार करके अपने आप को दोषी ठहराते थे, क्योंकि उनके अपने विवेक उन्हें पूर्ण रूप से दोषी सिद्ध करते थे। परन्तु इस खण्ड से, और ऐसे ही बहुत से खण्डों से, हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं, — कि कोई भी, चाहे वह मन की शक्तियों में, या ज्ञान में, या बुद्धि में, या पद में कितना ही श्रेष्ठ क्यों न हो, तब तक सुनने योग्य नहीं है जब तक वह यह प्रमाणित न करे कि वह परमेश्वर का सेवक है।
इसके बाद वह कहता है, तू एक भी वचन न घटाना। कुछ लोग पढ़ते हैं, “तू न रोकना,” जो कठोर अनुवाद है। क्रिया, {,}גרעgaro, का ठीक अर्थ है घटना और क्षीण होना। और मूसा ने व्यवस्थाविवरण 12:32 में यही शब्द प्रयोग किया है, जब वह व्यवस्था के विषय में कहता है, “तू न तो कुछ बढ़ाना, और न घटाना,” जिस व्यवस्था में लोगों को किसी मानवीय कल्पना से उसे बिगाड़े बिना सन्तुष्ट रहना था। अतः घटाने का अर्थ था वचन में से कुछ निकाल लेना। परन्तु हमें यह विचार करना चाहिए कि यह बात यिर्मयाह से क्यों कही गई; उस पवित्र पुरुष के मन में परमेश्वर के वचन में मिलावट करने का विचार कभी नहीं आया था; परन्तु परमेश्वर यहाँ उसे साहस दिलाता है, ताकि वह निडर होकर उसकी आज्ञाओं को पूरा करे। अतः वचन में से कुछ घटाने का अर्थ था, जो कठोर प्रतीत होता उसे नरम कर देना, या जो ठेस पहुँचा सकता उसे दबा देना, या जो बात बलपूर्वक कहे बिना प्रभाव नहीं डाल सकती थी उसे घुमा-फिराकर या ठण्डेपन से कहना। अतः इसमें कोई सन्देह नहीं कि परमेश्वर यहाँ उस बुराई को पहले ही रोकता है, जिससे विश्वासयोग्य शिक्षक भी बहुत हद तक जूझते हैं; क्योंकि जब वे मनुष्यों के कानों को कोमल और नाज़ुक पाते हैं, तो वे उनके दोषों को प्रबलता से डाँटने, धमकाने और दोषी ठहराने का साहस नहीं करते। यही कारण है कि परमेश्वर ने यह जोड़ा, एक भी वचन न घटाना; मानो उसने कहा हो, “जो कुछ तूने मेरे मुँह से सुना है उसे आँखें मूँदकर और निडरता से सुना दे, और जो कुछ तेरे साहस को घटाने की ओर ले जाए उसकी चिन्ता न कर।”
अब हम इस शिक्षा का उपयोग सरलता से सीख सकते हैं; भविष्यद्वक्ता उन अधर्मी मनुष्यों के पास नहीं भेजा गया था जो खुलेआम अपनी अभक्ति प्रकट करते थे, या घोर पापों में जीवन बिताते थे; वरन् वह परमेश्वर के उन्हीं उपासकों के पास भेजा गया था, जो उसकी बाहरी उपासना को बहुत आदर देते थे, और इसी कारण पत्नियों और बच्चों को छोड़कर मन्दिर में आते थे और न परिश्रम से पीछे हटते थे न व्यय से। अतः जब वह उनके पास भेजा गया था, तो हमें सावधान रहना चाहिए कि कहीं हम अपने दोषों में सोते न रहें और यह न सोचें कि जब हमने ऊपर से भक्ति के कुछ प्रमाण दे दिए तो हमने परमेश्वर के प्रति अपना कर्तव्य पूरा कर दिया; क्योंकि जब तक हम सचमुच और सच्चे मन से परमेश्वर की आज्ञा न मानें, तब तक बाकी सब बातें उसकी दृष्टि में कुछ मूल्य नहीं रखतीं। इसके बाद यह आता है, — 160 क्योंकि यह “बढ़ाना” के विपरीत रखा गया है, इसलिए “घटाना” या “निकाल लेना” सबसे उपयुक्त शब्द होगा। सेप्टुआजिंट, वुल्गेट और सीरियाई अनुवाद में ऐसा ही शब्द प्रयोग हुआ है; तर्गुम में “कम करना” है, जो हमारे अनुवाद का शब्द है। — सं.
यिर्मयाह 26:3
3. सम्भव है कि वे सुनें, और अपनी अपनी बुरी चाल से फिरें, और मैं उस विपत्ति से पछताऊँ जो मैं उनके बुरे कामों के कारण उन पर डालने की कल्पना कर रहा हूँ।
3. Si forte audiant et convertantur quisque a via sua mala, et poeniteat me mali quod ego cogitans ad faciendum (id est, cogito facere) ipsis propter (a facie, ad verbum) malitiam actionurn ipsorum.
इस पद में परमेश्वर संक्षेप में दिखाता है कि उसने अपने भविष्यद्वक्ता को किस उद्देश्य से भेजा। क्योंकि उसके लिए यह पर्याप्त न होता कि वह अपनी शिक्षा सुना दे, जब तक यह ज्ञात न हो कि यह परमेश्वर की इच्छा थी। अतः यहाँ परमेश्वर यह घोषित करता है कि वह लोगों पर तब तक कृपालु न होगा जब तक वे उसकी माँग पूरी न करें, अर्थात् पश्चाताप न करें। इस प्रकार वह साक्षी देता है कि जो शिक्षा दी गई वह उनके लिए लाभदायक होगी, क्योंकि उसका सम्बन्ध उनकी कुशलता से था; और कोई सत्य हमारे प्रेम के उससे अधिक योग्य नहीं ठहराया जा सकता जब हम यह जानते हैं कि वह हमारी भलाई को बढ़ाने के लिए है। इसलिए परमेश्वर ने, जब उसने देखा कि लोग अन्धी निराशा में होकर हर प्रकार की अभक्ति में सिर के बल दौड़े जा रहे हैं, यह परखना चाहा कि उनमें से कुछ चंगे होने योग्य हैं या नहीं; मानो उसने कहा हो, “हे अभागे लोगो, तुम क्या कर रहे हो? अभी तुम्हारा पूरी तरह अन्त नहीं हुआ है; केवल मेरी आज्ञा मानो, और तुम्हारी सब विपत्तियों का उपचार तुम्हारे हाथ के पास तैयार है।” अब हम देखते हैं कि परमेश्वर का अभिप्राय क्या था, अर्थात् यह कि वह उन यहूदियों को, जो सर्वथा असुधार्य थे, दया की आशा देना चाहता था, ताकि यह सुनकर कि उसकी शिक्षा उनकी भलाई के लिए है, वे उसे अस्वीकार न करें।
परन्तु इससे हम एक सामान्य शिक्षा निकाल सकते हैं: कि जब परमेश्वर हम पर विशेष रूप से अप्रसन्न होता है, तब भी यह उसकी पितृतुल्य कृपा का प्रमाण है कि वह हमें भविष्यद्वाणी की शिक्षा प्रदान करता है, क्योंकि वह निष्फल न होगी, जब तक कि यह हमारे अपने दोष से न हो। परन्तु साथ ही यदि हम उस औषधि को अस्वीकार करें जो निश्चय हमें जीवन देती, तो हम और भी अधिक निरुत्तर ठहरते हैं। अतः हम समझ लें कि भविष्यद्वक्ता यहाँ कहता है कि वह इसलिए भेजा गया था कि परखे कि यहूदी पश्चाताप करेंगे या नहीं; क्योंकि परमेश्वर उन्हें अनुग्रह में ग्रहण करने को तैयार था।
{,}אוליauli, “सम्भव है,” कहकर उसने बोलने की एक सामान्य रीति का प्रयोग किया। परमेश्वर को तो सब घटनाओं का पूर्ण ज्ञान है, और जब भविष्यद्वक्ता अपने कर्तव्य पूरे कर चुकते, तब क्या होगा इस विषय में उसे कोई सन्देह नहीं था; परन्तु यहाँ जिस बात की ओर संकेत किया गया है, और जिसे दोषी भी ठहराया गया है, वह लोगों का हठ है; मानो उसने कहा हो कि जो लोग अपनी बुराइयों में सड़ गए थे उन्हें चंगा करना सचमुच कठिन था, तौभी वह ऐसा करने का यत्न करेगा। और इस प्रकार परमेश्वर अपनी अवर्णनीय भलाई प्रकट करता है, कि वह उन मनुष्यों को भी पूरी तरह नहीं त्यागता जो लगभग उपचार से परे हैं, और जिनके रोग असाध्य प्रतीत होते हैं। वह अपने भविष्यद्वक्ता को भी दृढ़ करता है; क्योंकि लम्बे अनुभव से वह यह सोचने लग सकता था कि उसका सारा परिश्रम व्यर्थ होगा; इसलिए परमेश्वर यह जोड़ता है, ताकि वह अपनी बुलाहट के मार्ग में आगे बढ़ना न छोड़े; क्योंकि जो अविश्वसनीय प्रतीत होता था, वह उसकी आशा से परे फिर भी घटित हो सकता था।
अब हम देखते हैं कि यह क्यों कहा गया, सम्भव है कि वे सुनें।
फिर यह जोड़ा गया है, और फिरें, इत्यादि। प्रसंग से हम सीखते हैं कि विश्वास के समान पश्चाताप भी सिखाए गए सत्य से उत्पन्न होता है: क्योंकि यह कैसे होता है कि जो परमेश्वर से दूर हो गए हैं वे लौट आते हैं, अपने पापों को मान लेते हैं, और अपना स्वभाव, मन और संकल्प बदल लेते हैं? यह सत्य का फल है; यह नहीं कि सत्य सब दशाओं में प्रभावशाली होता है, परन्तु यहाँ वह चुने हुए लोगों के विषय में कहता है: अथवा यदि वे सब चंगे होने योग्य होते, तौभी परमेश्वर दिखाता है कि उसके सत्य का उपयोग और फल मनुष्यों को फेरना है, जैसा भविष्यद्वक्ता ने भी कहा है (मलाकी 4:6), और लूका के पहले अध्याय में दोहराया गया है, “वह इस्राएलियों में से बहुतों को फेरेगा।” (लूका 1:6।)
जो आगे आता है वह भी महत्त्वहीन नहीं है, अपनी अपनी बुरी चाल से; क्योंकि परमेश्वर संकेत करता है कि यह पर्याप्त नहीं था कि सारी प्रजा दिखावे के लिए अपने पापों को मान ले, वरन् प्रत्येक से यह अपेक्षित था कि वह अपने आप को जाँचे: क्योंकि जब हम भीड़ में परमेश्वर को खोजते हैं, और एक दूसरे के पीछे चलता है, तो प्रायः यह बिना किसी सच्ची भावना के किया जाता है। अतः पश्चाताप तभी सच्चा और खरा होता है जब प्रत्येक जन अपनी दशा को खोजने लगता है; क्योंकि उसका भीतरी और गुप्त स्थान हृदय में है। यही कारण है कि वह कहता है, यदि कोई मनुष्य, अर्थात् यदि प्रत्येक जन अपनी बुरी चाल से फिरे।
परमेश्वर के पछताने के विषय में, जिसका उल्लेख किया गया है, लम्बी व्याख्या की कोई आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर में कोई परिवर्तन नहीं होता; परन्तु जब यह कहा जाता है कि परमेश्वर अपना क्रोध दूर कर देता है, तो इसे मनुष्यों की समझ के योग्य अर्थ में समझना चाहिए: इसी प्रकार हमें इन शब्दों को भी समझना है कि वह पछताता है। (भजन संहिता 85:5; 110:4।) साथ ही यह पर्याप्त रूप से स्पष्ट है कि परमेश्वर का यहाँ क्या अभिप्राय है, अर्थात् यह कि जैसे ही मनुष्य सच्चे मन से उसकी ओर फिरते हैं, वह मेल करने को तैयार है: और इस प्रकार हम देखते हैं कि मनुष्यों को तब तक पश्चाताप के लिए बुलाया नहीं जा सकता जब तक परमेश्वर की दया उनके सामने न रखी जाए। इससे यह भी निकलता है कि ये दो बातें, पश्चाताप और विश्वास, आपस में जुड़ी हुई हैं, और उन्हें अलग करना बेतुका और अधर्मी अपवित्रीकरण है; क्योंकि जब तक पापी यह अनुभव न करे कि परमेश्वर उस पर कृपालु होगा, तब तक परमेश्वर का भय नहीं माना जा सकता: क्योंकि जब तक हम परमेश्वर के क्रोध से आशंकित रहते हैं, हम उसके न्याय से डरते हैं; और इस प्रकार हम उसके विरुद्ध उफनते हैं, और अवश्य ही सबसे निचले अथाह गड्ढे में सिर के बल धकेले जाते हैं; इसी कारण पोप-तन्त्र में वे पश्चाताप के विषय में न केवल मूर्खता से, वरन् ठण्डेपन से भी बोलते हैं; क्योंकि वे प्राणों को सन्देह और उलझन में छोड़ देते हैं, वरन् वे हर प्रकार की निश्चयता छीन लेते हैं। अतः हम उस कारण को समझ लें जिसके लिए पवित्र आत्मा हमें सिखाता है कि पश्चाताप की शिक्षा तब तक सही और लाभदायक रूप से नहीं दी जा सकती, जब तक यह न जोड़ा जाए कि परमेश्वर दुःखी मनुष्यों पर, जब कभी वे उसकी ओर फिरें, कृपालु होगा।
जहाँ तक “मैं कल्पना करता हूँ” शब्द का सम्बन्ध है, मैं पहले ही कह चुका हूँ कि परमेश्वर परस्पर विरोधी संकल्प नहीं करता; परन्तु यह उन मनुष्यों के विषय में है जो उसके भयानक प्रतिशोध के योग्य थे; यह ऐसा ही है मानो उसने कहा हो, — “उनका अधर्म पक चुका है; इसलिए अब मैं उनसे पलटा लेने को तैयार हूँ: तौभी वे मेरी ओर लौट आएँ, और वे मुझे पिता पाएँगे। अतः उनके निराश होने का कोई कारण नहीं, यद्यपि मैं अपने प्रतिशोध के चिह्न प्रकट कर चुका हूँ।” यही अर्थ है; परन्तु वह अपने क्रोध का कारण दोहराता है, उनके बुरे कामों के कारण; क्योंकि हम जानते हैं कि वे घमण्डी और हठीले थे; इसलिए आवश्यक था कि उनके मुँह बन्द किए जाएँ, नहीं तो वे कोलाहल मचाते, और कहते कि परमेश्वर अन्याय से क्रोधित है, या वह सब सीमाओं को लाँघ गया है। अतः जो भी विपत्तियाँ निकट थीं, परमेश्वर संक्षेप में दिखाता है कि वे उन्हीं से आई थीं, कि उनका कारण उनकी अपनी दुष्टता थी। इसके बाद यह आता है, —
यिर्मयाह 26:4-6
4. इसलिए तू उनसे कह, यहोवा यों कहता है: यदि तुम मेरी सुनकर मेरी व्यवस्था के अनुसार, जो मैंने तुम्हारे सामने रखी है, न चलो,
4. Dices ergo ad eos, Sic dicit Jehova, Si non audieritis me, ut ambuletis in lege mea, quam posui coram conspectu vestro,
5. और न मेरे दास भविष्यद्वक्ताओं के वचनों पर कान लगाओ, जिन्हें मैं तुम्हारे पास बड़ा यत्न करके भेजता आया हूँ, परन्तु तुमने उनकी नहीं सुनी;
5. Ad audiendum sermonem (hoc est, ut audiatis sermones) servorum meorum prophetarum, quos ego mitto ad vos, et mane surgendo et mittendo, neque tamen audistis (hoc postremum lego parenthesin;)
6. तो मैं इस भवन को शीलो के समान कर दूँगा, और इस नगर को पृथ्वी की सारी जातियों के लिए शाप ठहरा दूँगा।
6. Et (id est, tunc) ponam domum hanc (id est, templum) sicuti Silo, et urbem hanc ponam maledictionem cunctis gentibus terrae.
भविष्यद्वक्ता अब संक्षेप में वह सब समेट लेता है जो वह सिखाता आया था, अर्थात् वह बात जिसे लोगों के सामने घोषित करने की आज्ञा उसे दी गई थी। निःसन्देह उसने उनसे अधिक विस्तार से बात की थी; परन्तु उसने थोड़े शब्दों में यह दिखाना पर्याप्त समझा कि उसे क्या सौंपा गया था। और उसका सार यह था कि जब तक यहूदी ऐसी रीति से न सुनें कि परमेश्वर की व्यवस्था पर चलें, और भविष्यद्वक्ताओं के अधीन न रहें, तब तक मन्दिर और नगर का अन्तिम विनाश निकट था। यही अर्थ है: परन्तु प्रत्येक बात पर विचार करना लाभदायक होगा।
इन शब्दों के द्वारा, यदि तुम मेरी सुनकर मेरी व्यवस्था पर न चलो, परमेश्वर संकेत करता है कि वह मुख्य रूप से आज्ञाकारिता चाहता है, और किसी वस्तु को उसके बराबर मूल्यवान नहीं समझता, जैसा वह कहता है कि वह सब बलिदानों से उत्तम है। (1 शमूएल 15:22।) इस विषय पर सातवें अध्याय में विस्तार से विचार किया गया था, जहाँ उसने कहा, “जब मैं तुम्हारे पुरखाओं को मिस्र देश से निकाल लाया, तब क्या मैंने उन्हें अपने लिए बलिदान चढ़ाने की आज्ञा दी थी? मैंने केवल यही चाहा था, कि मेरी वाणी सुनो।” (यिर्मयाह 7:22, 23)
इससे हम देखते हैं कि भक्ति, न्याय, पवित्रता और सीधाई से जीवन बिताने का एकमात्र मार्ग यह है कि हम अपने आप को प्रभु के शासन के अधीन रहने दें। यह एक बात है। फिर जो आगे आता है वह ध्यान देने योग्य है, मेरी व्यवस्था पर चलना। परमेश्वर यहाँ साक्षी देता है कि उसकी इच्छा अस्पष्ट या सन्दिग्ध नहीं है, क्योंकि उसने अपनी व्यवस्था में ठहरा दिया है कि क्या उचित है। अतः यदि परमेश्वर सौ बार भी स्वर्ग से उतरे, तो वह इस सन्देश के सिवाय और कुछ न लाएगा, कि जो कुछ जानना आवश्यक है वह उसने कह दिया है, और उसकी व्यवस्था सबसे सिद्ध बुद्धि है। यदि उसने केवल इतना कहा होता, “मेरी सुनो,” तो मनुष्य फिर भी बच निकल सकते थे और अपने आप को सीखने के लिए तैयार बता सकते थे। इसलिए परमेश्वर यहाँ कपटियों का मुँह बन्द करता है, और कहता है कि वह अपनी व्यवस्था का अनुसरण करने के सिवाय और कुछ नहीं चाहता था। और इसी उद्देश्य से वह आगे की बात जोड़ता है, जो मैंने तुम्हारे सामने रखी है: क्योंकि बोलने की यह रीति संकेत करती है कि व्यवस्था की शिक्षा किसी भी प्रकार अस्पष्ट या सन्दिग्ध नहीं थी, जैसा मूसा ने कहा, “मैं आज आकाश और पृथ्वी दोनों को साक्षी बनाता हूँ, कि मैंने जीवन और मृत्यु को तुम्हारी आँखों के सामने रखा है।” (व्यवस्थाविवरण 30:19) 161 मैं इस पद का अनुवाद इस प्रकार करता हूँ, — 3. सम्भव है कि वे सुनें और प्रत्येक अपनी उस चाल से फिरे जो बुरी है; तब मैं उस बुराई के विषय में पछताऊँगा जो मैं उनके बुरे कामों के कारण उन पर लाने की कल्पना करता हूँ। यहाँ “बुराई के बदले बुराई” है, अर्थात् पाप की बुराई के बदले दण्ड की बुराई। यह शब्द प्रायः इन दोनों अर्थों में प्रयुक्त होता है। सेप्टुआजिंट में इसे बदला गया है, {κάκων} और {πονήρων}; और वुल्गेट में, ``malum`` और ``malitia.'' गेटेकर कहता है, “इस प्रकार बुराई बुराई को जन्म देती है, अर्थात् बुराई के बदले बुराई का न्यायपूर्ण प्रतिफल। अधर्म की बुराई और दण्ड की बुराई सुई और धागे के समान हैं; एक आगे जाती है और दूसरी के लिए मार्ग बनाती है; और जब एक को रास्ता मिल जाता है तो वह दूसरी को अपने पीछे खींच लाती है।” — सं.
और एक अन्य स्थान में उसने कहा, “यह न कहना कि कौन बादलों के ऊपर चढ़ेगा? या, कौन अथाह गड्ढे में उतरेगा? या, कौन समुद्र के पार जाएगा? वचन तेरे हृदय में और तेरे मुँह में है,” (व्यवस्थाविवरण 30:12-14; रोमियों 10:6-8) मानो उसने कहा हो, “परमेश्वर ने तुम से हर बहाना छीन लिया है, क्योंकि सन्देह करने का कोई कारण नहीं, जब कि उसने तुमसे इतनी आत्मीयता से बात की है, और जो कुछ जानना आवश्यक है वह सब समझा दिया है।”
और इससे पोप के अनुयायियों की उस अधर्मी निन्दा का खण्डन होता है, जो निर्लज्जता से यह दावा करते हैं कि न केवल व्यवस्था अस्पष्ट है, वरन् सुसमाचार भी। और पौलुस भी ऊँचे स्वर से घोषित करता है कि सुसमाचार केवल उन्हीं के लिए छिपा है जो नाश हो रहे हैं, और जिनके हृदयों पर परदा पड़ा है, क्योंकि उन पर दण्डस्वरूप अन्धापन आया है। परन्तु व्यवस्था के विषय में, जिसमें सुसमाचार के समान ऐसी स्पष्टता नहीं है, हम देखते हैं कि यिर्मयाह यहाँ क्या पुष्टि करता है, कि वह सबकी आँखों के सामने रखी गई थी, ताकि वे उससे सीखें कि परमेश्वर को क्या भाता है, और क्या न्यायपूर्ण और उचित है।
परन्तु जो अगले पद में आता है उस पर विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए; क्योंकि ये दो बातें अनिवार्य रूप से जुड़ी हुई हैं, — कि परमेश्वर अपनी व्यवस्था के प्रति आज्ञाकारिता के सिवाय और कुछ नहीं चाहता था, — और कि उसकी इच्छा थी कि उसके भविष्यद्वक्ताओं की सुनी जाए, — वह कहता है, मेरे दास भविष्यद्वक्ताओं के वचनों पर कान लगाना, जिन्हें मैं तुम्हारे पास भेजता हूँ (यह मध्यम पुरुष में है)। यहाँ कुछ असंगति प्रतीत होती है; क्योंकि यदि परमेश्वर की व्यवस्था पर्याप्त थी, तो भविष्यद्वक्ताओं की क्यों सुनी जाए? परन्तु ये दोनों बातें भली-भाँति मेल खाती हैं: केवल व्यवस्था पर ध्यान देना था, और भविष्यद्वक्ताओं पर भी, क्योंकि वे उसके व्याख्याकार थे। क्योंकि परमेश्वर ने अपने भविष्यद्वक्ताओं को व्यवस्था को सुधारने, उसमें कुछ बदलने, कुछ जोड़ने या घटाने के लिए नहीं भेजा; क्योंकि यह एक अटल आज्ञा थी कि उसमें न कुछ बढ़ाया जाए और न उसमें से कुछ घटाया जाए। तो फिर भविष्यद्वक्ताओं को भेजने से क्या लाभ था? यही कि व्यवस्था और अधिक प्रकट की जाए, और लोगों की परिस्थितियों पर लागू की जाए। अतः जब भविष्यद्वक्ताओं ने कोई नई शिक्षा नहीं गढ़ी, वरन् वे व्यवस्था के विश्वासयोग्य व्याख्याकार थे, तो परमेश्वर ने अकारण नहीं इन दोनों बातों को एक साथ जोड़ा, — कि उसकी व्यवस्था की सुनी जाए और उसके भविष्यद्वक्ताओं की भी; क्योंकि व्यवस्था की महिमा ने भविष्यद्वक्ताओं के अधिकार में से कुछ भी नहीं घटाया; और क्योंकि भविष्यद्वक्ता व्यवस्था की पुष्टि करते थे, इसलिए यह हो ही नहीं सकता था कि वे व्यवस्था में से कुछ निकाल लें।
वरन् यह खण्ड हमें सिखाता है कि वे सब जो प्रतिदिन सीखने के कर्तव्य को ठुकराते हैं, अधर्मी मनुष्य हैं, और जहाँ तक उनसे हो सकता है आत्मा के अनुग्रह को बुझा देते हैं; हमारे समय में पुनर्बपतिस्मावादियों (एनाबैप्टिस्टों) में ऐसे बहुत से उन्मादी हुए हैं, जो हर प्रकार की शिक्षा को तुच्छ जानते थे। वे घमण्ड करते थे कि व्यवस्था की शिक्षा तो केवल वर्णमाला है; और वे इस स्वप्न में भी मग्न थे कि जब मनुष्य शिक्षा पर ध्यान देते हैं तो पवित्र आत्मा का अपमान होता है। और कुछ लोग और भी भद्दे ढंग से अपनी निन्दाएँ उगलने का साहस करते हैं; वे कहते हैं कि पवित्रशास्त्र हमारे लिए पर्याप्त है, वरन् ये दो बातें ही, “परमेश्वर का भय मान और अपने पड़ोसी से प्रेम रख।” परन्तु जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, हमें यह विचार करना चाहिए कि परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था के द्वारा किस प्रकार बात की है; क्या उसने मार्ग बन्द कर दिया, ताकि भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा अपनी इच्छा को और अधिक स्पष्ट न करे, और जो बात अन्यथा कम प्रभावशाली होती उसे वर्तमान उपयोग पर लागू न करे? अथवा क्या उसका यह अभिप्राय था कि उस सोते से बहनेवाली शिक्षा को विभिन्न नालियों के द्वारा निरन्तर खींचता रहे? परन्तु अब, जब परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था दी थी, और व्यवस्था के साथ अपने भविष्यद्वक्ताओं को भी जोड़ दिया था, तो हर एक जो भविष्यद्वक्ताओं को अस्वीकार करता था, निश्चय ही व्यवस्था को भी कोई अधिकार नहीं देता था। ठीक इसी प्रकार अब, जो लोग आज यह नहीं समझते कि मसीह की पाठशाला में ज्ञान खोजना और उसके वचन के सुनने का लाभ उठाना उनका कर्तव्य है, वे निःसन्देह अपने हृदयों में परमेश्वर को तुच्छ जानते हैं, और न व्यवस्था को, न भविष्यद्वक्ताओं को, न सुसमाचार को कुछ मूल्य देते हैं। अतः यह खण्ड उल्लेखनीय है; यह दिखाता है कि प्रभु चाहता है कि उसकी व्यवस्था हमारी अगुवा और शिक्षक हो, और फिर भी वह अपने भविष्यद्वक्ताओं को भी जोड़ता है।
वह आगे कहता है, जिन्हें मैंने तड़के उठकर भेजते हुए तुम्हारे पास भेजा। यहाँ वह यहूदियों को उनकी सुस्ती और संवेदनहीनता के लिए उलाहना देता है; क्योंकि उसने उन्हें तड़के जगाया, और वह भी एक बार नहीं वरन् बार-बार, और फिर भी उसका परिश्रम व्यर्थ गया। तड़के उठना, जब परमेश्वर पर लागू किया जाता है, तो इसका अर्थ है कि उसने इन मनुष्यों को उचित समय पर बुलाया, मानो उसने कहा हो कि यहूदी जो कुशलता के सीधे मार्ग से हट गए थे, उसमें उसका कोई दोष नहीं था, क्योंकि वह उनकी भलाई के लिए यत्नपूर्वक चिन्तित रहा था, और उचित समय पर उन्हें चिताया था। इससे हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने किस प्रकार उनकी ढिलाई और उदासीनता को, और फिर उनकी कठोरता को, और भेजते हुए कहकर दोषी ठहराया; क्योंकि यह दोहराव या लगन का संकेत करता है।
उसने पहले कहा था, “जिन्हें मैंने तड़के उठकर तुम्हारे पास भेजा;” अब जब वह कहता है और भेजते हुए, तो उसका अर्थ है कि उसने एक ही भविष्यद्वक्ता को, या एक ही समय में बहुतों को नहीं भेजा, वरन् एक के बाद एक को निरन्तर भेजा, और फिर भी उससे कोई लाभ नहीं हुआ। पद के अन्त को मैं कोष्ठक में पढ़ता हूँ, (परन्तु तुमने नहीं सुनी।) वास्तव में जो आगे आता है वह पिछले पदों से जुड़ा हुआ है।
तो मैं कर दूँगा, इत्यादि: यहाँ संयोजक को समयवाचक क्रियाविशेषण के रूप में अनुवाद करना चाहिए।
जो अभी कहा गया था, “परन्तु तुमने नहीं सुनी,” वह पूर्वानुमान के रूप में था; क्योंकि यहूदी बड़े अहंकार से फूले हुए तुरन्त कह सकते थे, “अरे! तू कौन सी नई बात लाता है? यहोवा कहता है, यदि तुम मेरी व्यवस्था पर, जो मैंने तुम्हारे सामने रखी है, चलने के लिए मेरी वाणी न सुनो, — मानो यह सब हमारे बीच बच्चों तक को भली-भाँति ज्ञात न हो; और फिर भी तू किसी असाधारण भविष्यद्वाणी का दूत होने का दिखावा करता है; निश्चय ही सब बुद्धिमान लोग ऐसे घमण्ड को बचकाना समझेंगे।” इस प्रकार वे बोल सकते थे, परन्तु भविष्यद्वक्ता यहाँ संक्षेप में ऐसी मूर्खतापूर्ण आलोचना की धृष्टता को रोक देता है, परन्तु तुमने नहीं सुनी; मानो उसने कहा हो कि वह किसी मानो नई और असामान्य बात के विषय में बोलने को व्यर्थ नहीं भेजा गया था, क्योंकि यहूदियों ने सारी व्यवस्था को भ्रष्ट कर दिया था, वे आज्ञा न माननेवाले, शिक्षा ग्रहण न करनेवाले और अविश्वासी हो गए थे, और उन्होंने परमेश्वर की व्यवस्था और उसके भविष्यद्वक्ताओं दोनों को तुच्छ जाना था।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, जैसे तुझे यह भाया कि तू न केवल एक बार व्यवस्था के द्वारा अपनी इच्छा प्रकट करे, वरन् अपने पवित्र भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा और भी अधिक ज्योति प्रदान करे, और फिर अपने सुसमाचार के द्वारा हमें सिद्ध ज्योति दे, और जैसे तू हमें प्रतिदिन उन लोगों के द्वारा सीखने को बुलाता है जिन्हें तूने भेजा है, — हे परमेश्वर, ऐसा अनुग्रह कर कि हम सुनने में न बहरे हों और न धीमे, वरन् तत्परता से अपने आप को तेरे अधीन कर दें, और अपने आप को तेरे वचन के द्वारा ऐसे शासित होने दें, कि अपने सारे जीवन भर हम यह साक्षी दें कि तू सचमुच हमारा परमेश्वर है, और हम तेरी प्रजा हैं, जब तक कि हम अन्त में उस स्वर्गीय राज्य में एकत्र न किए जाएँ, जिसे तेरे एकलौते पुत्र हमारे प्रभु ने हमारे लिए मोल लिया है। — आमीन।
162 कोष्ठक को “भविष्यद्वक्ताओं” शब्द के बाद आरम्भ करना अधिक अच्छा है; मैं इन तीनों पदों का अनुवाद इस प्रकार करता हूँ, — 4. और उनसे कह, यहोवा यों कहता है, यदि तुम मेरी न सुनोगे, कि 5. मेरी व्यवस्था पर, जो मैंने तुम्हारे सामने रखी है, चलो, और मेरे दास भविष्यद्वक्ताओं के वचनों पर कान लगाओ, (जिन्हें मैं तुम्हारे पास भेजता आया हूँ, वरन् तड़के उठकर भेजता रहा; परन्तु तुमने नहीं सुनी;) 6. तो मैं इस भवन को शीलो के समान कर दूँगा, और इस नगर को पृथ्वी की सारी जातियों के लिए शाप ठहरा दूँगा। वुल्गेट और सीरियाई अनुवाद सारतः ऊपर दिए गए अनुवाद के समान ही हैं। — सं.
सौवाँ व्याख्यान
समय न मिलने के कारण कल हम भविष्यद्वक्ता के शब्दों को समाप्त न कर सके। हमने कहा था कि भविष्यद्वक्ता ने लोगों पर परमेश्वर के प्रतिशोध की घोषणा इस रीति से की कि उस कठोरता को कुछ सान्त्वना से नरम कर दिया, ताकि कहीं निराशा उन लोगों को और भी हठीला न बना दे जिन्हें वह आज्ञाकारिता की ओर फेरना चाहता था; हमने यह भी कहा था कि वचन के सेवक पश्चाताप के विषय में तब तक सही और लाभदायक रीति से नहीं बोल सकते जब तक वे उसके साथ परमेश्वर की दया की प्रतिज्ञा को न जोड़ें। परन्तु क्योंकि भविष्यद्वक्ता का काम हठीले मनुष्यों और परमेश्वर का तिरस्कार करनेवालों से था, इसलिए उसके लिए उचित था कि वह वह बात घोषित करे जो वह अन्त में जोड़ता है, अर्थात् यह कि यदि वे पश्चाताप न करें तो मन्दिर और नगर का विनाश निकट था।
और वह कहता है कि वह भवन शीलो के समान हो जाएगा, ताकि इस उदाहरण से वह उनके हृदयों को छू सके; क्योंकि परमेश्वर का सन्दूक बहुत समय तक शीलो में रहा था, और वह स्थान प्राचीन होने के कारण आदरणीय समझा जा सकता था। यरूशलेम तो प्रसिद्ध था ही, परन्तु शीलो समय में उससे पहले था। वह स्थान अब त्याग दिया गया था; वरन् वह एक दुःखद और हीन दृश्य प्रस्तुत करता था। इस प्रकार उसने उनकी आँखों के सामने परमेश्वर के प्रतिशोध का एक उदाहरण रखा, जैसा प्रतिशोध उनकी बाट जोह रहा था। यही संकेत हम यिर्मयाह 7:12 में देख चुके हैं, जहाँ भविष्यद्वक्ता कहता है, “शीलो को जाओ, जहाँ वाचा का सन्दूक था,” इत्यादि; परन्तु अब वह अधिक संक्षेप में बोलता है, क्योंकि निःसन्देह वह एक ही बातें बार-बार दोहराता था।
फिर वह कहता है, मैं इस नगर को पृथ्वी की सारी जातियों के लिए शाप, या धिक्कार, ठहरा दूँगा। यहूदियों के लिए यह सुनना और भी असहनीय था जो यिर्मयाह यहाँ कहता है, — कि इतना बड़ा नगर, जो परमेश्वर का पवित्रस्थान और राजसिंहासन था, अन्यजातियों के लिए शाप बन जाएगा; और फिर भी क्योंकि परमेश्वर ने उसे यह कहने की आज्ञा दी थी, उसने निडर होकर अपना कर्तव्य पूरा किया। अब उसे जो प्रतिफल मिला उसका वर्णन आता है, —
यिर्मयाह 26:7-8
7. जब यिर्मयाह ये वचन यहोवा के भवन में कह रहा था, तब याजक और भविष्यद्वक्ता और सब साधारण लोग सुन रहे थे।
7. Et audierunt sacerdotes et prophetae et totus populus Jeremiam loquentem sermones hos in templo Jehovae.
8. जब यिर्मयाह सब कुछ, जिसे सारी प्रजा से कहने की आज्ञा यहोवा ने दी थी, कह चुका, तब याजकों और भविष्यद्वक्ताओं और सब साधारण लोगों ने यह कहकर उसको पकड़ लिया, “निश्चय तू मार डाला जाएगा।”
8. Et factum est, cum finesset Jeremias loqui quaecunque mandaverat Jehova, ut loqueretur toti populo, ut loqueretur toti populo, comprehenderunt ipsum sacerdotes et prophetae et totus populus, dicendo, Morte morieris.
यहाँ भविष्यद्वक्ता बताता है कि जब उसने परमेश्वर का सन्देश घोषित किया, और परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार धमकियाँ जोड़कर लोगों को विश्वासयोग्यता से चिताया, तब उसके साथ क्या हुआ। वह पहले कहता है कि उसकी सुनी गई; इसे प्रशंसा की बात नहीं समझना चाहिए, मानो याजकों और भविष्यद्वक्ताओं ने उसकी शिक्षा को धीरज से सुना हो; क्योंकि उनमें सीखने की कोई आत्मा नहीं थी, और न वे सीखने को तैयार होकर आए थे, वरन् वे बहुत समय से हठ में लिप्त रहे थे, यहाँ तक कि यिर्मयाह उनका खुला शत्रु बन गया था; और वे उसकी सब धमकियों का भी दुस्साहस से विरोध करते थे।
परन्तु यद्यपि वे भविष्यद्वक्ता की बातों को अस्वीकार करने में लज्जित नहीं हुए, तौभी उन्होंने एक प्रकार की औपचारिकता बनाए रखी, जैसा कपटियों में सामान्य है; क्योंकि, जैसा कहा जाता है, वे औपचारिक बातों में आवश्यकता से अधिक सटीक होते हैं, परन्तु जो बातें वास्तव में महत्त्वपूर्ण हैं उनकी उपेक्षा करते हैं। इससे हम देख सकते हैं कि याजक और भविष्यद्वक्ता इस बात के लिए किसी प्रशंसा के योग्य नहीं थे कि उन्होंने अपने आप को रोके रखा, मानो वे मुकद्दमे के जाने जाने तक अपना निर्णय टाल रहे हों; परन्तु क्योंकि सारी प्रजा उपस्थित थी, इसलिए वे कुछ समय तक संयमी दिखाई दिए; तौभी वह बनावटी संयम था, क्योंकि उनके हृदय अभक्ति और परमेश्वर के तिरस्कार से भरे थे, जैसा वास्तव में प्रकट हो गया।
परन्तु यह ध्यान देना चाहिए कि वह कहता है कि याजकों और भविष्यद्वक्ताओं ने सुना।
जहाँ तक याजकों का सम्बन्ध है, कोई आश्चर्य नहीं कि वह उन्हें ऐसा कहता है, यद्यपि वे हर प्रकार से दुष्ट थे, क्योंकि यह एक पैतृक पद-सम्मान था। परन्तु यह विचित्र है कि वह भविष्यद्वक्ताओं का उल्लेख करता है। साथ ही हमें जानना चाहिए कि यिर्मयाह उन लोगों को इस प्रकार पुकारता है जो घमण्ड करते थे कि वे ऊपर से भेजे गए हैं। तेईसवें अध्याय में वह उन्हें विस्तार से डाँटता है; और बहुत से अन्य स्थानों में वह झूठ-मूठ परमेश्वर का अधिकार अपने ऊपर लेने की उनकी निर्लज्जता को दोषी ठहराता है। अतः उसने उन्हें एक आदरणीय उपाधि दी, परन्तु उसे कुछ नहीं समझा; जैसा हम भी आज कर सकते हैं, जो बिना किसी हानि के उन धर्माध्यक्षों, बिशपों या पास्टरों को, जो पोप-तन्त्र में ऐसे समझे जाना चाहते हैं, व्यंग्य से वैसा कह सकते हैं, बशर्ते कि हम साथ ही उनके मुखौटे उतार दें। परन्तु ये लोग उपाधि को पकड़ लेते हैं, और इस प्रकार परमेश्वर के सत्य को दबाना चाहते हैं, मानो बिशप कहलाना इससे भी अधिक भारी बात हो कि कोई स्वर्गदूत स्वर्ग से उतर आए। और फिर भी यदि कोई स्वर्गदूत स्वर्ग से उतरे, तो हमें उसे शैतान ही समझना चाहिए, यदि वह ऐसी घिनौनी और घृणित निन्दाएँ प्रस्तुत करे, जिनसे हम देखते हैं कि आज संसार इन सिद्धान्तहीन मनुष्यों के द्वारा अशुद्ध किया गया है। अतः यह खण्ड, और ऐसे ही अन्य खण्ड, स्मरण रखने योग्य हैं, क्योंकि वे दिखाते हैं कि उपाधियाँ पर्याप्त नहीं हैं, जब तक कि उन्हें धारण करनेवाले वास्तव में यह न दिखाएँ कि वे वैसे ही हैं जैसा उनकी बुलाहट सूचित करती है। इस प्रकार यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता कहलाता था, और वे धोखेबाज़ भी भविष्यद्वक्ता कहलाते थे जिनका एकमात्र धर्म व्यवस्था की शिक्षा को भ्रष्ट करना और बिगाड़ना था, परन्तु उन्हें लोगों की दृष्टि से ऐसा कहा जाता था। इस बीच यह आवश्यक है कि हम भविष्यद्वक्ताओं या शिक्षकों के बीच बुद्धिमानी से भेद करें, जैसा प्रेरित भी हमें स्मरण दिलाता है कि हमें परखना चाहिए कि उनकी आत्मा परमेश्वर की ओर से है या नहीं। (1 यूहन्ना 4:1।)
अन्त में वह कहता है कि याजकों, और भविष्यद्वक्ताओं, और सारी प्रजा ने उसे दोषी ठहराया; साथ ही उसने ये शब्द भी जोड़े कि उसने वह सब कहा था जिसकी आज्ञा प्रभु ने उसे दी थी। इस प्रकार उसने संक्षेप में उन लोगों के अन्याय को प्रकट किया जिन्होंने उसे दोषी ठहराया; क्योंकि उन्हें इस बात की कोई चिन्ता नहीं थी कि उचित क्या है, जैसा हम अभी देखेंगे। परन्तु क्योंकि वे अपने साथ पहले से ठाना हुआ बैर लेकर आए थे, इसलिए जो वे और अधिक रोक न सके उसे उन्होंने उगल दिया। इसके बाद यह आता है, —
यिर्मयाह 26:9
9. तूने क्यों यहोवा के नाम से यह भविष्यद्वाणी की कि “यह भवन शीलो के समान हो जाएगा, और यह नगर ऐसा उजड़ जाएगा कि उसमें कोई न रह जाएगा”? और सब लोग यहोवा के भवन में यिर्मयाह के विरुद्ध इकट्ठे हो गए।
9. Quare prophetasti in nomine Jehovae, dicendo, Tanquam Silo erit domus haec, et urbs haec perdetur, ut non sit habitator? (congregatus autem totus populus ad
Jeremiam in templo Jehovae.) (Hoc per parethesin legendum est, et refertur ad sequentem contextum, ut suo loco dicemus.)
यहाँ यिर्मयाह के दोषी ठहराए जाने का कारण जोड़ा गया है, कि उसने पवित्र नगर और मन्दिर को इतनी कड़ाई से धमकाने का साहस किया था। उन्होंने यह पूछताछ नहीं की कि क्या परमेश्वर ने ऐसा करने की आज्ञा दी थी, क्या उसके पास ऐसा करने का कोई उचित कारण था; वरन् उन्होंने यह सिद्धान्त मान लिया कि जब मन्दिर की प्रतिष्ठा के विरुद्ध कुछ कहा जाता है तो परमेश्वर के साथ अन्याय होता है, और यह भी कि नगर पवित्र था, और इसलिए परमेश्वर की बहुत सी और विशेष प्रतिज्ञाओं को घटाए बिना उसके विरुद्ध कुछ भी नहीं कहा जा सकता था, क्योंकि उसने साक्षी दी थी कि वह सदा सुरक्षित रहेगा, क्योंकि वह उसके बीच में वास करता था। इससे हम देखते हैं कि याजकों और भविष्यद्वक्ताओं ने किस अधिकार से, और किस बहाने से यिर्मयाह को दोषी ठहराया।
और यह कहकर कि उसने यहोवा के नाम से ऐसा कहा, उन्होंने निःसन्देह उस पर छली या झूठा दावा करनेवाला होने का दोष लगाया, क्योंकि उसने कहा था कि यह आज्ञा परमेश्वर की ओर से दी गई है; और वे ऐसी बात को असम्भव और बेतुकी समझते थे। परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की थी कि यरूशलेम सदा उसका निवास-स्थान रहेगा; और यिर्मयाह के वचन ये थे, “मैं इस नगर को शीलो के समान कर दूँगा।” तब ऊपर से देखने में ऐसा लगता था कि परमेश्वर अपने आप से असंगत है: “यह युग युग के लिये मेरा विश्रामस्थान है,” और “यह उजाड़ हो जाएगा।” इससे हम देखते हैं कि याजकों और भविष्यद्वक्ताओं के पास यिर्मयाह को दोषी ठहराने के लिए कुछ आकर्षक बहाना अवश्य था। इसलिए उनके इस कथन में कुछ वज़न था, “क्या तू परमेश्वर को अपने ही विरुद्ध नहीं ठहराता? क्योंकि जो कुछ तू उसके नाम से सुनाता है, वह खुले और सीधे रूप में उसकी प्रतिज्ञाओं के विरुद्ध है; परन्तु परमेश्वर सदा अपने आप से संगत रहता है; अतः तू छली और झूठा है, और इस कारण उन झूठे भविष्यद्वक्ताओं में से एक है जिन्हें परमेश्वर अपनी कलीसिया में सहन नहीं करता।” फिर भी जिस बात पर वे घमण्ड करते थे वह सर्वथा निःसार थी; क्योंकि परमेश्वर ने यह प्रतिज्ञा इसलिए नहीं की थी कि मन्दिर सदा बना रहे, कि लोगों को हर प्रकार की दुष्टता में लिप्त होने की छूट मिल जाए। तब परमेश्वर का यह उद्देश्य नहीं था कि वह अपने आप को अभक्त मनुष्यों से बाँध ले, जिससे वे उसके नाम को खुली निन्दा का पात्र बना दें। इससे स्पष्ट है कि भविष्यद्वक्ता और याजक केवल कपट कर रहे थे, जब उन्होंने उस बात को निश्चित मान लिया जिसे शर्त के साथ समझा जाना चाहिए था, अर्थात् यदि वे उसकी आज्ञा के अनुसार सच्चाई से उसकी आराधना करें। क्योंकि जिन दो बातों को परमेश्वर ने जोड़ दिया था उन्हें अलग करना उचित नहीं था; उसने लोगों से भक्ति और आज्ञाकारिता चाही थी, और उसने यह प्रतिज्ञा भी की थी कि वह नगर का रक्षक होगा, और मन्दिर उसकी सुरक्षा में सुरक्षित रहेगा। परन्तु यहूदी, जिनमें न विश्वास था न पश्चाताप, उस बात पर घमण्ड करते थे जो मन्दिर के विषय में कही गई थी; वरन्, जैसा हम अन्यत्र देख चुके हैं, वे डींग मारते और झूठी बातें बोलते थे; और इसी कारण भविष्यद्वक्ता ने तीन बार दोहराकर उनका उपहास किया, “यहोवा का मन्दिर, यहोवा का मन्दिर, यहोवा का मन्दिर,” (यिर्मयाह 7:4) मानो वह यह कह रहा हो, — “यही तुम्हारी मूर्खतापूर्ण बकवाद है; तुम सदा घमण्ड के साथ चिल्लाते हो, ‘परमेश्वर का मन्दिर;’ परन्तु इससे तुम्हें कुछ भी लाभ न होगा।”
फिर आगे लिखा है, कि लोग इकट्ठे हुए। यहाँ यिर्मयाह वृत्तान्त के एक अन्य भाग पर आता है, क्योंकि उसने स्मरण दिलाया कि हाकिमों और राजा के मन्त्रियों को मन्दिर में चढ़ आने के लिए अकारण नहीं उभारा गया था।
163 यह उत्तम प्रतीत होता है कि इस वाक्य को अगले पद के साथ इस प्रकार जोड़ा जाए, — 10. जब सारी प्रजा यहोवा के भवन में यिर्मयाह के विरुद्ध इकट्ठी थी, तब यहूदा के हाकिमों ने ये बातें सुनीं, और वे राजा के भवन से यहोवा के भवन में चढ़ आए, इत्यादि। यह एक अन्य खण्ड का आरम्भ प्रतीत होता है। दोहराए गए {{ו का अनुवाद प्रायः इसी प्रकार किया जाना चाहिए, “जब” या “जिस समय,” और “तब;” और वास्तव में हमारी भाषा में “तब” को कभी-कभी छोड़ा भी जा सकता है। यदि यहाँ दोनों स्थानों पर इसका अनुवाद “और” किया जाए, तो भी अर्थ वही रहेगा, केवल ऊपर दिए गए अनुवाद में सम्बन्ध अधिक स्पष्ट दिखाई देता है; यिर्मयाह के विरुद्ध इकट्ठे हुए लोगों का समाचार हाकिमों तक पहुँचा। — सं.
यदि यह विवाद थोड़े-से लोगों के बीच होता, तो या तो यिर्मयाह मार डाला जाता, या किसी न किसी रीति से बीच ही में रोक लिया जाता, या ऐसा भी हो सकता था कि हाकिम राजा और उसके मन्त्रियों को धोखा देते, और इस प्रकार वह पवित्र जन गुप्त रूप से कुचल दिया जाता। परन्तु यहाँ उसने ये शब्द रखे हैं, कि सारी प्रजा उसके विरुद्ध इकट्ठी हुई थी। इसी कारण यह समाचार राजा के दरबार तक पहुँचा; और इसलिए हाकिमों और मन्त्रियों को आने की आज्ञा दी गई। संक्षेप में, यिर्मयाह यह कारण बताता है कि हाकिम मन्दिर में क्यों आए; यह इसलिए था कि जब यह समाचार फैला कि कोई नई और असहनीय बात सुनाई गई है, तब सारा नगर हर ओर उथल-पुथल में पड़ गया। इसलिए राजा इस उपद्रव की उपेक्षा नहीं कर सकता था; क्योंकि जनता के उपद्रव को प्रबल होने देना एक संकटपूर्ण बात है। और इसलिए यिर्मयाह आगे यह जोड़ता है, —
यिर्मयाह 26:10
10. जब यहूदा के हाकिमों ने ये बातें सुनीं, तब वे राजा के भवन से यहोवा के भवन में चढ़ आए, और यहोवा के भवन के नये फाटक के द्वार में बैठ गए।
10. Et audierunt principes Jehudah sermones hos, et ascenderunt e domo regis in domum Jehovae (hoc est, a palatio regis in Templum,) et sederunt in foribus portae
Templi Jehovae novae.
हम कह चुके हैं कि हाकिम जनता के कोलाहल के कारण उभारे गए थे; और इसमें कोई सन्देह नहीं कि राजा ने उन्हें उपद्रव को शान्त करने के लिए भेजा था। विशेष रूप से यह ध्यान देने योग्य है कि वे अन्य कामों में लगे हुए थे, क्योंकि ऐसा कम ही होता था कि दरबारी लोग भविष्यद्वक्ताओं को सुनने में अपना समय लगाएँ। यह सच है कि जिन पर राज्य की देखभाल का भार है, जो न्याय करते हैं, और जिन्हें सार्वजनिक सुरक्षा का प्रबन्ध करना पड़ता है, उनके काम पवित्र हैं; परन्तु उन्हें अपने समय को इस प्रकार बाँटना उचित है कि वे उसका कुछ भाग परमेश्वर को समर्पित कर सकें।
परन्तु दरबारी लोग अपने आप को मानो किसी विशेषाधिकार के द्वारा छूट-प्राप्त समझते हैं, जबकि वास्तव में सत्य की आवश्यकता उन्हें साधारण लोगों से भी अधिक है; क्योंकि उनमें से प्रत्येक पर न केवल घर के मुखिया का कर्तव्य है, वरन् प्रभु ने उन्हें सारी प्रजा के ऊपर भी ठहराया है। सो यदि साधारण मनुष्यों को प्रतिदिन शिक्षा पाने की आवश्यकता है, जिससे वे अपने आप पर और अपने परिवारों पर विश्वासयोग्यता से शासन और मार्गदर्शन कर सकें, तो उन शासकों को क्या करना चाहिए जो मानो राज्य के पिता हैं? परन्तु जैसा मैं कह चुका हूँ, ऐसे मनुष्य प्रायः अपने आप को विश्वासियों के जूए से मुक्त कर लेते हैं।
इसी कारण ऐसा हुआ कि जब यिर्मयाह को अपना सन्देश सुनाने की आज्ञा दी गई थी, तब हाकिमों में से कोई भी उपस्थित नहीं था; और यह उस दिन नहीं जब थोड़े ही लोग मन्दिर में आए थे, वरन् उस समय जब वे यहूदा के सब नगरों से यरूशलेम में बलि चढ़ाने के लिए आए थे।
यह वास्तव में घोर तिरस्कार का एक अत्यन्त लज्जाजनक चिह्न था कि राजा के मन्त्रियों में से कोई भी मन्दिर में दिखाई न दिया, जबकि दूर-दूर के स्थानों से वे लोग वहाँ उपस्थित थे जिन्हें धर्म और बलि चढ़ाने की इच्छा वहाँ ले आई थी। परन्तु वह कहता है कि वे उपद्रव का कारण जानने के लिए आए; क्योंकि लिखा है कि वे नये फाटक पर बैठे, जिसके विषय में कुछ लोग कहते हैं कि वह पूर्व की ओर था; और वे अनुमान करते हैं कि उसे नया इसलिए कहा गया क्योंकि उसका जीर्णोद्धार किया गया था; राजा का महल भी पूर्व की ओर था, और पूर्वी फाटक उसका न्यायासन था। मैं इस मत को स्वीकार करने की ओर झुका हुआ हूँ कि वे पूर्वी फाटक पर बैठे। अब आगे लिखा है, —
यिर्मयाह 26:11
11. तब याजकों और भविष्यद्वक्ताओं ने हाकिमों और सब लोगों से कहा, यह मनुष्य प्राणदण्ड के योग्य है, क्योंकि इसने इस नगर के विरुद्ध ऐसी भविष्यद्वाणी की है जिसे तुम अपने कानों से सुन चुके हो।
11. Et dixerunt sacerdotes et prophetae principibus et toti populo, dicendo, judicium mortis est viro huic, uia prophetavit contra urbem hanc quemadmodum audistis auribus vestris.
इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि लोगों ने याजकों और भविष्यद्वक्ताओं के निर्णय में सहमति देकर अपनी समझ के अनुसार कुछ भी नहीं किया था, वरन् हर वर्ग के सब लोगों ने एक प्रचण्ड आवेग में आकर यिर्मयाह को दोषी ठहराया। और क्योंकि याजकों और भविष्यद्वक्ताओं ने अपनी बात लोगों की ओर भी कही, इससे स्पष्ट है कि लोग उन्हीं के बहकाए चल रहे थे, यहाँ तक कि उन्होंने बिना सोचे-समझे और असावधानी से अपनी सहमति दे दी; क्योंकि भीड़ में प्रायः ऐसा होता है कि लोग चिल्ला उठते हैं, “ऐसा ही हो, ऐसा ही हो; आमीन, आमीन।” यिर्मयाह ने यह तो कहा है कि सारी प्रजा ने उसे दोषी ठहराया; परन्तु यह ध्यान देना चाहिए कि जनता समुद्र के समान है, जो अपने आप में शान्त और स्थिर रहता है; परन्तु ज्यों ही कोई वायु उठती है, त्यों ही बड़ी हलचल मच जाती है, और लहरें एक दूसरे से टकराने लगती हैं; वैसा ही हाल जनता का है, जो उकसाए बिना शान्त और मेल से रहती है; परन्तु जब कोई ऐसे मनुष्यों को भड़काता है जो विचारहीन और चंचल हैं, और जो, उसी उपमा को बनाए रखें तो, जल के समान बहनेवाले हैं, तब सहज ही बलवा खड़ा हो जाता है। सो यिर्मयाह अब यही संकेत करता है।
परन्तु एक और बात ध्यान देने योग्य है, — कि साधारण लोग अपने आप को हर दिशा में खिंच जाने देते हैं; परन्तु, जैसा कहा गया है, वे सहज ही फिर से सही मन में लौटाए भी जा सकते हैं। वर्जिल कहता है, “जब वे भक्ति और भले कामों के लिए प्रसिद्ध किसी मनुष्य को देखते हैं, तब वे चुप हो जाते हैं और कान लगाकर सुनते हैं।” वहाँ वह (एनीड, 1) जनता के एक उपद्रव का वर्णन करता है, जिसकी तुलना वह आँधी से करता है; और वह ठीक ही आँधी की बात करता है; परन्तु उसने यह उपमा सामान्य प्रयोग के अनुसार जोड़ी।
164 वर्तमान इब्रानी पाठ है, “यहोवा का नया फाटक।” यहोवा से पहले “भवन” बहुत-सी हस्तलिपियों में पाया जाता है, और सेप्टुआजिंट को छोड़ सब अनुवादों में दिया गया है; सेप्टुआजिंट में “भवन” के साथ-साथ “यहोवा” भी छोड़ दिया गया है। निःसन्देह सही पाठ है, “यहोवा का भवन।” गैटेकर कहता है कि उसे “नया फाटक” इसलिए कहा गया क्योंकि योताम ने उसका जीर्णोद्धार किया था। देखिए 2 राजाओं 15:35। तर्गुम में इसका अनुवाद “पूर्वी फाटक” किया गया है। कुछ लोगों के अनुसार इसी फाटक की ड्योढ़ी में बड़ी न्याय-सभा बैठा करती थी। — सं.
यही बात अब भविष्यद्वक्ता हमारे सामने रखता है; याजक और भविष्यद्वक्ता, जो समझते थे कि केवल वे ही अपनी शक्ति पर घमण्ड कर सकते और अधिकार के साथ बोल सकते हैं, एक प्रकार से लोगों को ऊपरी तौर पर सहमति देने के लिए विवश कर रहे थे। अब जब राजा के मन्त्री उपस्थित हुए, तो लोग मानो गूँगे हो गए; याजकों ने यह भाँप लिया, और परिणाम से हम देखेंगे कि जो बात वही कवि कहता है, वह घटित हुई, “वह अपने वचनों से उनके हृदयों पर शासन करता और उनके मनों को कोमल करता है।” क्योंकि राजा के मन्त्रियों के लिए एक शब्द से भी लोगों के इस मूर्खतापूर्ण उन्माद को शान्त करना सहज हो गया। हम शीघ्र ही देखेंगे कि उन्होंने बिना हिचकिचाए कहा, “यह मनुष्य प्राणदण्ड के योग्य नहीं है।” इससे स्पष्ट है कि अज्ञानी मनुष्य कितनी सहजता से अपने आप से असंगत बनाए जा सकते हैं; परन्तु इसका कारण उनकी अस्थिरता है; और जो मैंने कहा है वह भी ध्यान देने योग्य है, कि वहाँ कोई वास्तविक सहमति नहीं थी, क्योंकि वहाँ कोई विवेक-बुद्धि काम में नहीं लाई गई थी। याजकों के अधिकार ने उन्हें दबा लिया था; और फिर उन्होंने दासों के समान वही मान लिया जो उन्होंने देखा कि उनके हाकिमों को भाता है, उस गधे के समान जो अपने कानों से सिर हिलाता है।
अब जब इस विषय पर ठीक से विचार किया जाए, तो यह प्रकट होता है कि केवल याजकों और भविष्यद्वक्ताओं ने ही हाकिमों और सारी प्रजा दोनों से यह कहा कि यिर्मयाह प्राणदण्ड के योग्य है, क्योंकि उसने नगर के विरुद्ध भविष्यद्वाणी की थी। हम कह चुके हैं कि वे उन प्रतिज्ञाओं पर भरोसा रखते थे जिन्हें वे बेतुके ढंग से अपनी ही अभक्ति को पुष्ट करने के लिए लागू करते थे, अर्थात् यह कि परमेश्वर ने उस नगर को इसलिए चुना था कि वहाँ उसकी आराधना की जाए। यह एक झूठा सिद्धान्त था; और उनकी भूल कहाँ से उत्पन्न हुई? केवल अज्ञानता से नहीं, वरन् ढिठाई से; क्योंकि कपटी लोग तभी धोखा खाते हैं जब वे परमेश्वर की आज्ञा न मानने और जहाँ तक उनसे हो सके उसके न्याय-वचनों को ठुकराने का निश्चय कर लेते हैं। इसलिए जब वे किसी टेढ़े और दुष्ट आवेग से बह जाते हैं, तब वे सदा कोई न कोई आकर्षक बहाना ढूँढ़ ही लेते हैं; परन्तु वह केवल एक आवरण होता है, जैसा हम इस वृत्तान्त से स्पष्ट देखते हैं। आगे लिखा है, —
यिर्मयाह 26:12
12. तब यिर्मयाह ने सब हाकिमों और सब लोगों से कहा, जो वचन तुमने सुने हैं, उन सबको इस भवन और इस नगर के विरुद्ध भविष्यद्वाणी करके सुनाने के लिए यहोवा ही ने मुझे भेजा है।
12. Et dixit Jeremias cunctis principibus et toti populo, dicendo, Jehova misit me ad prophetandum contra domum hanc et contra urbem hanc cunctos sermones quos audistis.
यिर्मयाह केवल अपनी बुलाहट और परमेश्वर की आज्ञा को ही अपने पक्ष में प्रस्तुत करता है; और इस प्रकार वह उस बेतुके आरोप का खण्डन करता है जो उन्होंने अत्यन्त निर्लज्जता से उस पर लगाया था।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि वह विस्तार से बोल सकता था, परन्तु उसने अपने बचाव का सार प्रस्तुत कर देना ही पर्याप्त समझा। यदि वह लम्बा भाषण देता, तो मुख्य बात अधिक धुँधली हो सकती थी। अब वह दोनों पक्षों में प्रश्न की स्थिति को स्पष्ट रूप से प्रकट करता है। याजकों ने अपने ही अधिकार से यिर्मयाह को दोषी ठहराया, क्योंकि [उनके विचार में] उसने परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को व्यर्थ कर दिया था, इसलिए कि उसने नगर और मन्दिर के विनाश की धमकी दी थी; परन्तु यिर्मयाह दूसरी ओर उत्तर देता है कि उसने और कुछ नहीं, केवल वही सुनाया है जिसकी आज्ञा परमेश्वर ने दी थी। प्रमाण की आवश्यकता थी, जब याजक यह मानते थे कि उस नगर पर विनाश की घोषणा करने में, जिसकी रक्षा और सुरक्षा का भार परमेश्वर ने अपने ऊपर लिया था, परमेश्वर अपने आप से असंगत ठहरता है। परन्तु इसका खण्डन हाथ में ही था, — कि परमेश्वर ने कभी अपने आप को कपटियों और अभक्त मनुष्यों से नहीं बाँधा था; वरन् नगर की सारी महिमा और मन्दिर का सारा प्रताप उसकी आराधना पर निर्भर था; और इसमें कोई सन्देह नहीं कि यिर्मयाह ने ये बातें प्रस्तुत की थीं। परन्तु क्योंकि मुख्य बात यही थी, इसलिए उसने इतना कहना पर्याप्त समझा कि वह परमेश्वर की ओर से भेजा गया था।
इस प्रकार उसने अप्रत्यक्ष रूप से उनकी इस व्यर्थ डींग को दोषी ठहराया, — कि परमेश्वर उनके पक्ष में है; परन्तु वह कहता है, “मैं परमेश्वर की आज्ञा के बिना नहीं आया।” अब यद्यपि वह संक्षेप में और स्पष्ट रूप से घोषित करता है कि वह परमेश्वर की ओर से भेजा गया था, तौभी वह हर बात को प्रमाणित करने के लिए अपने आप को तैयार प्रस्तुत करता है; और जैसा मैं कह चुका हूँ, इसमें कोई सन्देह नहीं कि उसने उस निःसार प्रश्न का, जिस पर याजक इतना ज़ोर देते थे, उत्तर दिया और उस पर विवाद किया।
165 शब्दशः ये शब्द हैं, “मृत्यु का न्याय (या दण्डाज्ञा) इस मनुष्य के लिए है,” या “इस मनुष्य का” है, अर्थात् वह उसके योग्य है। ऐसा प्रतीत होता है कि वे अब न्यायालय के सामने थे, हाकिम न्यायियों या न्यायाधीशों के रूप में बैठे थे; और याजकों और भविष्यद्वक्ताओं द्वारा लगाया गया आरोप यही था; उनके पास स्वयं दण्डाज्ञा सुनाने का अधिकार नहीं था, उन्होंने केवल उसे मृत्यु के योग्य घोषित किया। — सं.
यह भी ध्यान देने योग्य है कि उसने हाकिमों और लोगों दोनों को सम्बोधित किया; और इस प्रकार उसने संकेत किया कि याजक और भविष्यद्वक्ता बहरे थे, और इस योग्य नहीं थे कि उनसे बात की जाए; क्योंकि उन्होंने घमण्ड के साथ परमेश्वर को तुच्छ जानने और मानो खुलेआम उसके सेवकों से युद्ध करने का निश्चय कर लिया था; अन्यथा निःसन्देह वह आनन्द से उन्हें उद्धार के मार्ग पर लौटाने का प्रयत्न करता। परन्तु जब उसने देखा कि उन्होंने अपने ही विरुद्ध द्वार बन्द कर लिया है, तो उसने उन्हें छोड़ दिया। यही कारण है कि वह कहता है कि उसने हाकिमों और लोगों से बात की, और उन्हें छोड़ दिया जिन पर उसे व्यर्थ परिश्रम करना पड़ता। और निश्चय ही जब उन्होंने कहा कि वह मृत्यु के योग्य है, तब उन्होंने ऐसी ढिठाई से यह सिद्ध कर दिया कि वे उससे शिक्षा पाना नहीं चाहते थे; और उनकी क्रूरता ने भी उन्हें सीखने योग्य बनने से रोक दिया। परन्तु भविष्यद्वक्ता ने बुराई के मूल स्रोत पर ध्यान दिया, क्योंकि उनका उद्देश्य हठपूर्वक परमेश्वर और उसके सब भविष्यद्वक्ताओं का विरोध करना था।
यह कहकर कि वह वे सब बातें भविष्यद्वाणी करके सुनाने के लिए भेजा गया था जो उन्होंने सुनी थीं, उसने उन्हें न्यायी बना दिया, यद्यपि उसने हाकिमों के साथ-साथ उन्हें सम्बोधित नहीं किया; क्योंकि हम देख चुके हैं कि हाकिम राजा के महल में थे, और जब किसी उपद्रव का भय हुआ तब उन्हें बुलवाया गया था। परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि वह भाषण फिर से दोहराया गया।
सो यिर्मयाह ने उन्हें न्यायी और पंच बना दिया, जब उसने कहा कि वह कुछ भी वापस नहीं लेता, वरन् जो कुछ उन्होंने सुना था, वह उसने परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार विश्वासयोग्यता से सुनाया था। आगे लिखा है, —
यिर्मयाह 26:13
13. इसलिए अब अपना चालचलन और अपने काम सुधारो, और अपने परमेश्वर यहोवा की बात मानो; तब यहोवा उस विपत्ति के विषय में, जिसकी चर्चा उसने तुमसे की है, पछताएगा।
13. Et nunc bonificate (bonas facite) vias vestras et studia vestra, et obtemperate voci Jehovae Dei vestri, et poenitebit Jehovam omnis mali quod pronunciavit contra vos.
वह यहाँ न केवल अपनी सिखाई हुई बात की पुष्टि करता है, वरन् याजकों और भविष्यद्वक्ताओं की कठोरता और हठीली दुष्टता को भी डाँटता है; क्योंकि यद्यपि उसने हाकिमों और लोगों को सम्बोधित किया, तौभी निःसन्देह उसका उद्देश्य उन अभक्त मनुष्यों को अधिक तीखेपन से छूना था जो परमेश्वर के विरुद्ध खड़े हो गए थे; और साथ ही उसकी बात उन सब पर लागू होती थी, जब उसने कहा, “मैंने कैसे पाप किया है? मैंने तुम्हारे उद्धार को बढ़ाने का प्रयत्न किया है; तो क्या इसलिए मुझे मरना होगा?” इससे हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने न केवल अपनी कही हुई बात की पुष्टि की, वरन् अपने विरोधियों पर कृतघ्नता का दोष भी लगाया; क्योंकि इससे बढ़कर कृपालु और इससे अधिक ग्रहणयोग्य और कुछ नहीं हो सकता था कि उन्हें पश्चाताप के लिए बुलाया जाए, जिससे वे परमेश्वर से दया पाएँ: “मेरी शिक्षा का उद्देश्य क्या था? यही कि तुम पश्चाताप करो; और पश्चाताप क्या लाता है? उद्धार; क्योंकि परमेश्वर तुम्हें क्षमा करने को तैयार है। अब तुम यह सुनना भी सहन नहीं कर सकते कि परमेश्वर तुम पर दया करेगा। यह कैसा पागलपन है?” सो अब हम भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय देखते हैं।
और यह खण्ड ध्यान देने योग्य है; क्योंकि परमेश्वर सब अभक्तों को उनका उचित प्रतिफल देगा; केवल इसलिए नहीं कि वे हर शिक्षा के विरुद्ध अपने आप को कठोर कर लेते हैं, वरन् इसलिए भी कि वे अपने ही उद्धार के प्रकट और मानो शपथ खाए हुए शत्रु हैं, क्योंकि वे आवश्यक उपचार को ठुकराते हैं, और अपने आप को सीधे मार्ग पर लौटाए जाने नहीं देते, जिससे उन्हें क्षमा मिल सके। सो जो बात वह अब कहता है वह बहुत ही गम्भीर है, कि उसकी शिक्षा में कोई दोष नहीं पाया जा सकता था, सिवाय इसके कि वह दुष्टों को चुभती थी; परन्तु वे तब भी शान्ति प्राप्त कर सकते थे, यदि वे परमेश्वर से मेल-मिलाप चाहते।
वह आगे कहता है, यहोवा की बात मानो, यह दिखाने के लिए कि उसने लोगों से कोई नई बात नहीं चाही, कि उसने उन पर कोई कठिन जूआ नहीं रखा, वरन् केवल उन्हें व्यवस्था का पालन करने के कर्तव्य की ओर बुलाया; और इसके साथ वह जोड़ता है, अपने परमेश्वर, जिससे उनसे हर बहाना छीन लिया जाए, कहीं ऐसा न हो कि वे आपत्ति करें और कहें कि जो कुछ यिर्मयाह प्रस्तुत करता है वह उनके लिए अनजाना है। सो यहाँ वह विजयी भाव से घोषित करता है कि उसने उन्हें ऐसी कोई बात नहीं सिखाई थी जो व्यवस्था से पराई हो, और यह कि यहूदी, जो यहोवा को अपना परमेश्वर मानते थे और फिर भी उसकी वाणी पर कान नहीं लगाते थे, जो उनके लिए सुपरिचित होनी चाहिए थी, निरुत्तर थे।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जब तू ने हमें न केवल एक बार अनन्त मीरास की आशा के लिए बुलाया है, वरन् हमें निरन्तर पश्चाताप के लिए निमन्त्रण देता है, जबकि हम अपने निरन्तर पापों के द्वारा तुझसे दूर हटना नहीं छोड़ते, — आह, यह वरदान दे कि हम बहरे कानों से तेरी वाणी को न ठुकराएँ, वरन् तेरे प्रति नम्र और अधीन बने रहें, और यह भी कि हम जूआ उठाने के ऐसे अभ्यस्त हो जाएँ कि अपने सारे जीवन भर यह प्रमाणित करें कि हम तेरी भेड़ें हैं, और यह कि मसीह, तेरा एकलौता पुत्र, जिसे तू ने हमारे ऊपर ठहराया है, सचमुच हमारा चरवाहा है, जब तक हम उस राज्य में इकट्ठे न किए जाएँ जिसे उसने अपने ही लहू से हमारे लिए प्राप्त किया है। — आमीन।
एक सौ एकवाँ व्याख्यान
यिर्मयाह 26:14-15
14. देखो, मैं तो तुम्हारे वश में हूँ; जो कुछ तुम्हारी दृष्टि में भला और ठीक हो वही मेरे साथ करो।
14. Et ego, ecce ego in manu vestro, facite mihi sicuti bonum, vel sicuti rectum erit in oculis vestris.
15. पर यह निश्चय जानो, कि यदि तुम मुझे मार डालोगे, तो निर्दोष का लहू अपने ऊपर, और इस नगर और इसके निवासियों के ऊपर लाओगे; क्योंकि सचमुच यहोवा ने मुझे तुम्हारे पास ये सब वचन तुम्हारे कानों में सुनाने के लिए भेजा है।
15. Veruntamen sciendo seite, quod si vos occideritis me, sanguinem purum (vel, innoxium) vos ponetis super vos et super urbem hanc, et super habitatores ejus; quia in veritate misit me Jehova ad vos, ut loqueror in auribus vestris cunctos istos sermones.
यिर्मयाह, हाकिमों, याजकों और सारी प्रजा को पश्चाताप करने के लिए समझाने के बाद, और उन्हें यह दिखाने के बाद कि उनकी बुराई का उपचार है, जब तक कि वे अपने हठ के द्वारा परमेश्वर के क्रोध को और भी अधिक न भड़काएँ, अब अपने विषय में बोलता है, और उन्हें चेतावनी देता है कि वे उसे मार डालने के अपने निश्चय पर चलकर अपनी क्रूरता को खुली छूट न दें; क्योंकि उन्होंने यह निर्णय सुना दिया था कि वह मरने के योग्य है। तब उसने देखा कि उनका क्रोध इतना प्रचण्ड है कि वह अपने प्राण से लगभग निराश हो गया; परन्तु वह यहाँ घोषित करता है कि यदि वे अन्याय से उस पर अपना क्रोध उतारेंगे, तो परमेश्वर पलटा लेनेवाला होगा।
166 शब्द ये हैं, — 13. और अब अपने मार्गों और अपने कामों को भला बनाओ, इत्यादि; या, परन्तु अब, इत्यादि। यह हमारे अनुवाद के “इसलिए” से, जो वुल्गेट से लिया गया है, अधिक अच्छा पढ़ा जाता है। सेप्टुआजिंट में “और” है, और तर्गुम में भी। हमारे अनुवाद का “सुधारो” सीरियाई अनुवाद का है; “भला बनाओ” अन्य प्राचीन अनुवादों का अनुवाद है। वह जो बात क्रम में बाद की है उसका उल्लेख पहले करता है; परमेश्वर की वाणी सुनना क्रम में हमारे मार्गों को भला बनाने से पहले आता है; परन्तु यह भविष्यद्वक्ताओं द्वारा प्रायः अपनाई गई रीति के अनुसार है। — सं.
फिर भी वह दिखाता है कि वह अपने प्राण के विषय में इतना चिन्तित नहीं था कि अपने कर्तव्य की उपेक्षा करे, क्योंकि उसने अपने आप को उनकी इच्छा के हवाले कर दिया; वह कहता है, “मेरे साथ जो चाहो सो करो; तौभी देखो कि तुम क्या करते हो; क्योंकि प्रभु निर्दोष का लहू बहाए जाने को दण्ड दिए बिना न छोड़ेगा।”
यह कहकर कि वह उनके वश में है, उसका अर्थ यह नहीं कि वह परमेश्वर की देखरेख में नहीं था। मसीह ने भी ऐसा ही कहा जब उसने अपने चेलों को समझाया कि वे उनसे न डरें जो शरीर को घात कर सकते हैं। (मत्ती 10:28।) इसमें कोई सन्देह नहीं कि परमेश्वर के सामने हमारे सिर के बाल भी गिने हुए हैं; इसलिए यह हो नहीं सकता कि अत्याचारी, चाहे वे कितना ही क्रोध करें, हमें छू सकें, नहीं, अपनी छोटी उँगली से भी नहीं, जब तक उन्हें अनुमति न दी जाए। सो यह निश्चित है कि हमारा प्राण कभी मनुष्यों के हाथ में नहीं हो सकता, क्योंकि परमेश्वर उसका विश्वासयोग्य रखवाला है; परन्तु यिर्मयाह ने मनुष्य की रीति पर कहा कि उसका प्राण उनके हाथ में है; क्योंकि परमेश्वर का विधान हमसे छिपा है, और हम उसे विश्वास की आँखों के बिना पहचान नहीं सकते। इसलिए जब शत्रु ऐसा शासन करते दिखाई देते हैं कि बचने का कोई मार्ग नहीं रहता, तब पवित्रशास्त्र रियायत के रूप में कहता है कि हम उनके हाथों में हैं, अर्थात् जहाँ तक हम देख पाते हैं। फिर भी हमें यह समझना चाहिए कि हम किसी भी रीति से दुष्टों की इच्छा के ऐसे अधीन नहीं हैं कि वे हमारे साथ जो चाहें कर सकें; क्योंकि परमेश्वर उन्हें एक छिपी लगाम से रोके रखता है, और उनके हाथों और उनके हृदयों पर शासन करता है। यह सत्य सदा अटल बना रहना चाहिए कि हमारा प्राण परमेश्वर की रखवाली और सुरक्षा में है।
सो अब हम देखते हैं कि यिर्मयाह ने किस अर्थ में अपने प्राण को अपने शत्रुओं के हाथ में समझा; यह नहीं कि वह अपने आप को परमेश्वर द्वारा त्यागा हुआ समझता था, वरन् यह कि उसने स्वीकार किया कि दुष्टों को उसके विरुद्ध क्रोध करने के लिए ढीली लगाम दी गई है। परन्तु साथ ही हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि उसने यह क्यों कहा; यह मान लेने के बाद कि उसका प्राण उनके हाथ में है, वह जोड़ता है, तौभी यह निश्चय जानो कि यदि तुम मुझे मार डालोगे, तो निर्दोष का लहू अपने ऊपर लाओगे। परन्तु उसने पहले कहा था कि जो उन्हें भला और ठीक लगे वही वे कर सकते हैं। यहाँ “भला और ठीक” को न्याय के नियम के अनुसार बनाए गए निर्णय के अर्थ में नहीं लिया जाना चाहिए, वरन् उस निर्णय के अर्थ में जो उनकी अपनी इच्छा के अनुसार अन्याय से बनाया गया हो। यह इब्रानी में बोलने की एक सामान्य रीति है। सो यिर्मयाह गवाही देता है कि वह अपने प्राण के विषय में चिन्तित नहीं था, क्योंकि यदि उसके शत्रुओं का क्रोध इतनी दूर तक जाए, तो वह मानो बलिदान के रूप में अपने आप को अर्पित करने को तैयार था। परन्तु उन्हें परमेश्वर के प्रतिशोध से सावधान रहने की चेतावनी देने में उसका उद्देश्य अपनी सुरक्षा नहीं था, वरन् उन्हें पश्चाताप के लिए उकसाना था। सो वह साफ़-साफ़ कहता है कि वह मृत्यु से नहीं डरता, क्योंकि प्रभु तुरन्त अपने आप को उसका पलटा लेनेवाला प्रकट करेगा, और यह भी कि उसका लहू परमेश्वर की दृष्टि में इतना बहुमूल्य होगा कि यदि वे उसके साथ अन्याय करें, तो लोगों समेत सारा नगर दण्ड पाएगा।
परन्तु आइए जो आगे आता है उस पर ध्यान दें, अर्थात् यह कि परमेश्वर ने उसे भेजा था। अब वह इस सिद्धान्त को मान लेता है कि यह हो नहीं सकता कि परमेश्वर अपने सेवकों को त्याग दे, जिनसे उसने प्रतिज्ञा की है कि जब अभक्त लोग उन पर अत्याचार करें तब वह उनकी सहायता करेगा। परमेश्वर वास्तव में अपने सेवकों को सदा धीरज धरने के लिए समझाता है, और चाहता है कि जब भी आवश्यकता हो वे मृत्यु के लिए तैयार रहें; तौभी वह संकट में उनकी सहायता करने की प्रतिज्ञा करता है। सो यिर्मयाह ने इसी प्रतिज्ञा पर भरोसा रखा, और इस प्रकार उसे निश्चय था कि यह हो नहीं सकता कि परमेश्वर उसे त्याग दे; क्योंकि वह अपने लोगों को निराश नहीं कर सकता, और न उनसे बाँधी हुई अपनी वचनबद्धता को तोड़ सकता है। सो जब उसे अपनी बुलाहट का पूरा निश्चय था, और वह जानता था कि उसके सारे प्रचार का रचयिता परमेश्वर है, तब उसने साहस के साथ यह निष्कर्ष निकाला कि उसका लहू दण्ड के बिना बहाया नहीं जा सकता। सब विश्वासयोग्य शिक्षकों को अपने पद के कर्तव्यों को परिश्रम से पूरा करने के लिए इसी भरोसे से अपने आप को प्रोत्साहित करना चाहिए, — कि जिस परमेश्वर ने उन्हें उनका पद सौंपा है, वह उन्हें कभी नहीं त्याग सकता, वरन् जहाँ तक आवश्यक हो, सदा उनकी सहायता करेगा। अब आगे लिखा है, —
167 “और इस नगर के ऊपर,” इत्यादि, हमारे अनुवाद और सब प्राचीन अनुवादों तथा कैल्विन के अनुवाद के अनुसार; परन्तु सम्बन्धसूचक अव्यय भिन्न है, और इसका अनुवाद “के विरुद्ध” किया जा सकता है: उसे मार डालकर वे निर्दोष के लहू का दोष अपराधी होने के नाते अपने ऊपर, और ऐसे काम को होने देने और उसका समर्थन करने के कारण नगर और उसके निवासियों के विरुद्ध ले आते। — सं.
168 हमारे अनुवाद में “उचित” सही शब्द नहीं है; यह शब्द उसका बोध कराता है जो न्यायसंगत और ठीक है। सेप्टुआजिंट इस वाक्यांश का बहुत ढीला अनुवाद करता है, “जैसा तुम्हारे लिए लाभदायक हो और जैसा तुम्हारे लिए सर्वोत्तम हो।” वुल्गेट मूल के लगभग निकट है, “जो तुम्हारी आँखों में भला और ठीक है;” शब्दशः यह है, “जैसा तुम्हारी आँखों में भला और जैसा ठीक हो।” — सं.
यिर्मयाह 26:16
16. तब हाकिमों और सब लोगों ने याजकों और भविष्यद्वक्ताओं से कहा, यह मनुष्य प्राणदण्ड के योग्य नहीं है, क्योंकि उसने हमारे परमेश्वर यहोवा के नाम से हमसे कहा है।
16. Et dixerunt principes et universus populus sacerdotibus et prophetis, Non est viro huic judicium mortis; quia in nomine Jehovae Dei nostri loquutus est nobis.
यिर्मयाह यहाँ दिखाता है कि याजकों और झूठे भविष्यद्वक्ताओं द्वारा उस पर सुनाई गई दण्डाज्ञा शीघ्र ही बदल गई। उन्होंने उसकी बात सुनी तो थी, और सीखने की इच्छा का कुछ दिखावा भी किया था, जैसा कपटियों के साथ होता है जो कुछ समय तक ध्यान देते हैं; परन्तु उन्होंने अपने आप को परमेश्वर के विरुद्ध भड़का लिया, और क्योंकि उनके मन पहले से ही द्वेषपूर्ण थे, इसलिए सुनने से वे और भी अधिक बिगड़ गए। याजकों और झूठे भविष्यद्वक्ताओं के साथ यही हुआ, और अपने अन्धे क्रोध में उन्होंने पवित्र भविष्यद्वक्ता को मृत्यु के लिए ठहरा दिया। अब वह कहता है कि हाकिमों और राजा के मन्त्रियों ने, और लोगों के मत ने भी, उसे निर्दोष ठहराया। लोगों ने वास्तव में अभी-अभी उसे दोषी ठहराया था, परन्तु वे याजकों और भविष्यद्वक्ताओं के खोखले आडम्बर और ठाट-बाट से बह गए थे; जब उन्होंने इन्हें यिर्मयाह के विरुद्ध इतना क्रुद्ध देखा, तो वे कारण की जाँच करने को अपने मन को राज़ी न कर सके। इस प्रकार साधारण लोग सदा पूर्वाग्रहों से अन्धे हो जाते हैं, यहाँ तक कि वे विषय की स्वयं जाँच नहीं करते। जब यिर्मयाह को दोषी ठहराया गया तब भी ऐसा ही हुआ। हम कह चुके हैं कि लोग अपने आप में शान्त और मेल से रहनेवाले थे; परन्तु भविष्यद्वक्ता और याजक [आग को] भड़कानेवाले थे, और इसी कारण लोगों ने तुरन्त अपनी सहमति दे दी। परन्तु हाकिमों की उपस्थिति में वे विपरीत दिशा में चल पड़े।
संक्षेप में, यह खण्ड हमें सिखाता है कि जब न्याय या खराई का कोई ध्यान नहीं रखा जाता, तब शासक कितने हानिकारक होते हैं; और यह भी सिखाता है कि ऐसे ईमानदार और संयमी शासकों का होना कितना वांछनीय है जो भले और न्यायसंगत की रक्षा करें, और दीनों और सताए हुओं की सहायता करें। परन्तु हम देखते हैं कि साधारण लोगों में कुछ भी स्थिर या दृढ़ नहीं होता; क्योंकि वे वायु के समान इधर-उधर बहाए जाते हैं, जो कभी इस दिशा से और कभी उस दिशा से बहती है।
परन्तु हमें इस वाक्यांश पर ध्यान देना चाहिए, कि यिर्मयाह मृत्यु के योग्य नहीं था, क्योंकि उसने यहोवा के नाम से बात की थी। इस प्रकार उन्होंने मान लिया कि जो कुछ परमेश्वर की ओर से आया हो उसे ग्रहण करना चाहिए था, और यह कि जो मनुष्य परमेश्वर के सेवकों का विरोध करते थे वे पागल थे, क्योंकि वे अपने आप को सिर के बल अपने ही विनाश में झोंक रहे थे।
169 शब्दशः यह वाक्यांश है, “इस मनुष्य के लिए मृत्यु का न्याय नहीं।” सेप्टुआजिंट और वुल्गेट लगभग ऐसा ही है, “इस मनुष्य के लिए मृत्यु का न्याय नहीं है।” हमारा अनुवाद सीरियाई अनुवाद का है। — सं.
इससे हम एक उपयोगी सत्य निकाल सकते हैं, कि जो कुछ परमेश्वर ने आज्ञा दी है, उसे बिना किसी अपवाद के आदर के साथ ग्रहण करना चाहिए, और यह कि उसका नाम ऐसे आदर के योग्य है कि हमें उसके सेवकों और भविष्यद्वक्ताओं के विरुद्ध कुछ भी करने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए। अब, यहोवा के नाम से बोलना और कुछ नहीं, केवल यही है कि जो कुछ परमेश्वर ने आज्ञा दी है उसे विश्वासयोग्यता से सुनाया जाए। झूठे भविष्यद्वक्ता भी परमेश्वर का नाम धारण करते थे, परन्तु वे झूठ से ऐसा करते थे; परन्तु लोग यहाँ स्वीकार करते हैं कि यिर्मयाह सच्चा भविष्यद्वक्ता था, जिसने ढिठाई से अपने आप को आगे नहीं धकेला, और न झूठ से परमेश्वर के नाम का दावा किया, वरन् सच्चाई से अपने पद के कर्तव्य पूरे किए। आगे लिखा है, —
यिर्मयाह 26:17-19
17. तब देश के पुरनियों में से कितनों ने उठकर प्रजा की सारी मण्डली से कहा,
17. Et surrexerunt viri ex senioribus terrae, (ex senibus terrae,) ac dixerunt ad totum coetum populi (vel, locuuti sunt dicendo; est quidem semper verbum, {,}אמר loquuti sunt erqo ad totum coetum) dicendo,
18. यहूदा के राजा हिजकिय्याह के दिनों में मोरेशेती मीका भविष्यद्वाणी कहता था, और उसने यहूदा के सारे लोगों से कहा, सेनाओं का यहोवा यों कहता है कि सिय्योन खेत के समान जोता जाएगा, और यरूशलेम खण्डहरों का ढेर हो जाएगा, और भवनवाला पर्वत वन के ऊँचे स्थानों के समान हो जाएगा।
18. Micha Morasthites fuit prophetans diebus Ezechiae regis Jehudah, et dixit ad totum populum Jehudah, dicendo, Sic dicit Jehova exercituum, Sion ager (sed subaudienda est particula similitudinis, Sion ut ager) arabitur, et Jerusalem solitudines (vel, acervi) erit (hoc est, erit in solitudines, vel, in acervos, vel, in ruinas,) et mons domus (id est templi) in excelsa sylvae.
19. क्या यहूदा के राजा हिजकिय्याह ने और सारे यहूदा ने उसे कभी मार डाला? क्या उसने यहोवा का भय न माना, और यहोवा से बिनती न की, और क्या यहोवा उस विपत्ति के विषय में, जिसकी चर्चा उसने उनके विरुद्ध की थी, न पछताया? इस प्रकार हम अपने प्राणों पर बड़ी विपत्ति ला सकते हैं।
19. An occidendo occidit eum Ezechias rex Jehudah, et totus Jehudah? an non timuit Jehovam? et deprecatus est faciem Jehovae, et poenituit Jehovam mali, quod loquutus fuerat contra eos: et nos facimus malum grande adversus animas nostras.
यह निश्चित नहीं है कि जो बात यहाँ सुनाई गई है वह यिर्मयाह के छुटकारे से पहले कही गई थी या नहीं; क्योंकि पवित्रशास्त्र घटनाओं का वर्णन करने में सदा ठीक-ठीक क्रम नहीं रखता। फिर भी यह सम्भावित है कि जब वे अभी विचार ही कर रहे थे और लोगों के मन पर्याप्त रूप से शान्त नहीं हुए थे, तब पुरनियों ने बीच में पड़कर भीड़ को शान्त करने, और उनके चिढ़े हुए मनों को कोमल करने, और उन लोगों का यिर्मयाह से मेल कराने का प्रयत्न किया जो पहले मूर्खता से उस पर क्रुद्ध हो गए थे; क्योंकि निःसन्देह याजकों और झूठे भविष्यद्वक्ताओं ने हर युक्ति से भोले लोगों को भविष्यद्वक्ता के विरुद्ध भड़काने का प्रयत्न किया था; और इसलिए एक से अधिक प्रकार के उपचार की आवश्यकता थी। सो जब पुरनियों ने देखा कि लोगों में क्रोध अब भी धधक रहा है, और उनके मन कृपा दिखाने को तैयार नहीं हैं, तब उन्होंने यह बात कही। उन्होंने अपना तर्क उदाहरण से लिया, — कि यिर्मयाह भयानक प्रतिशोध का पहला साक्षी और दूत नहीं था, क्योंकि परमेश्वर उससे पहले, और बीते समय में, अपने अन्य भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा नगर और मन्दिर के विरुद्ध बोलता आया था।
याजकों और भविष्यद्वक्ताओं ने वास्तव में यिर्मयाह पर नई बात गढ़ने का आरोप लगाया था, और इसके अतिरिक्त यह बहाना किया था कि वे सामान्य न्याय के आधार पर उसका इतना उग्र विरोध कर रहे हैं।
यिर्मयाह ने कहा था कि परमेश्वर न पवित्र नगर को छोड़ेगा न मन्दिर को। यह असहनीय था, क्योंकि मन्दिर के विषय में कहा गया था, “यह युग युग के लिये मेरा विश्रामस्थान है; यहीं मैं रहूँगा।” (भजन संहिता 132:14।)
इससे हम देखते हैं कि यिर्मयाह मानो इस एक कथन से दबा दिया गया था, जबकि याजक और झूठे भविष्यद्वक्ता आपत्ति करते हुए कहते थे, “तो तू परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को व्यर्थ ठहराता है; तू मन्दिर की पवित्रता को कुछ भी नहीं समझता।”
और इसके अतिरिक्त उन्होंने यह बहाना किया कि भविष्यद्वक्ताओं में से किसी ने भी कभी इस प्रकार नहीं कहा था।
परन्तु अब पुरनिये क्या उत्तर देते हैं? यही कि अन्य भविष्यद्वक्ता भी हुए थे जिन्होंने नगर और मन्दिर पर विनाश की घोषणा की थी, और यह कि [यिर्मयाह पर] झूठ से यह कलंक लगाया गया था कि वही परमेश्वर के न्याय की घोषणा करनेवाला पहला व्यक्ति था। अब हम विषय की स्थिति समझते हैं: यिर्मयाह का बचाव किया जाता है, क्योंकि उसने अकेले और पहले-पहल नगर को धमकी नहीं दी थी, वरन् उसके पहले अन्य लोग भी इसके प्रवर्तक थे, जिनके मुँह से उसने बात की थी, और जो परमेश्वर के माने हुए सेवक भी थे, जिन पर विश्वास करने से इन्कार नहीं किया जा सकता था, जैसे मीका।
अब, जो बात यहाँ बताई गई है वह मीका 3:12 में पाई जाती है। भविष्यद्वक्ता मीका का भी याजकों और भविष्यद्वक्ताओं के साथ वैसा ही संघर्ष था जैसा यिर्मयाह का; क्योंकि वे कहते थे कि यह असम्भव है कि परमेश्वर पवित्र नगर और मन्दिर पर अपना प्रतिशोध उण्डेले।
वे कहते थे, “क्या यहोवा हमारे बीच में नहीं है?” और वे यह भी कहते थे, “कोई विपत्ति हम पर न आएगी।” वे ऐसी निश्चिन्तता से मतवाले थे कि वे अपने आप को संकट की पहुँच से परे समझते थे; और वे भविष्यद्वक्ताओं की सब धमकियों की उपेक्षा करते थे, क्योंकि वे कल्पना करते थे कि परमेश्वर उनसे बँधा हुआ है। हम जानते हैं कि कपटी लोग सदा उस प्रतिज्ञा पर भरोसा रखते थे, “यहीं मैं रहूँगा;” और वे परमेश्वर के मुँह से शब्द लेकर और उधार लेकर छलियों के समान उन्हें बिगाड़ते थे: “परमेश्वर हमारे बीच में रहता है; इसलिए हम पर कोई विपत्ति नहीं आ सकती।” परन्तु भविष्यद्वक्ता ने कहा, (वे ही शब्द हैं जिन्हें हमने अभी दोहराया है,) “तुम्हारे कारण सिय्योन खेत के समान जोता जाएगा, और यरूशलेम खण्डहरों का ढेर हो जाएगा, और इस भवन का पर्वत वन के ऊँचे स्थानों के समान हो जाएगा।”
170 कुछ लोग इस वाक्यांश का अनुवाद इस प्रकार करते हैं, “सिय्योन, खेत बनकर, जोता जाएगा;” खेत बन जाने पर वह जोता जाएगा। इस दशा में “खेत” से पहले {,{כ, “के समान,” रखने की आवश्यकता नहीं है; और न यहाँ, न मीका में कोई भिन्न पाठ है, यद्यपि प्राचीन अनुवादों में इसकी पूर्ति की गई है, सीरियाई को छोड़कर, जिसमें है, “सिय्योन घटकर खेत बना दिया जाएगा।” — सं.
171 शब्दशः ये शब्द हैं, “तब देश के पुरनियों में से मनुष्य उठे।” — सं.
परन्तु अब आइए हम हर एक वाक्यांश पर विचार करें। पहले यह कहा गया है कि देश के लोगों में से पुरनिये उठे। सम्भव है कि उन्हें पुरनिये, अन्य स्थानों के समान, अपने पद के कारण नहीं, वरन् अपनी आयु के कारण कहा गया। यह निश्चित है कि वे अधिकार रखनेवाले मनुष्य थे; तौभी मुझे सन्देह नहीं कि वे बहुत वृद्ध थे, क्योंकि वे लोगों को वह बता सकते थे जो बहुत वर्ष पहले हुआ था। जैसा आगे जोड़ा गया है कि उन्होंने प्रजा की सारी मण्डली से बात की, इससे हम वह निष्कर्ष निकाल सकते हैं जो मैं पहले कह चुका हूँ, — कि लोग इतने उग्र थे कि उनके आवेश को कम करने के लिए एक शान्त भाषण की आवश्यकता थी; और निश्चय ही जब एक बार उपद्रव उठ खड़ा होता है और भड़क उठता है, तो उसे तुरन्त शान्त करना सहज काम नहीं है। इसलिए जब कृपालु पुरनियों ने देखा कि लोगों के मन अब भी चिढ़े हुए हैं, तब उन्होंने संयमित भाषा का प्रयोग किया, और कहा, मोरेशेती मीका (उन्होंने उसके देश का नाम लिया) ने यहूदा के राजा हिजकिय्याह के दिनों में भविष्यद्वाणी की, इत्यादि।
हमें समय पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि यह विचित्र लग सकता है कि जब वह पवित्र राजा परमेश्वर की सच्ची आराधना को बढ़ाने में यत्नपूर्वक लगा हुआ था, तब बातें इतनी अव्यवस्थित दशा में थीं कि ऐसी कठोर घोषणा की आवश्यकता पड़ी। यदि कभी कोई राजा सचमुच और गम्भीरता से धर्म के कार्य के प्रति समर्पित था, तो निःसन्देह वह पहला और प्रमुख आदर्श था; उसने कोई परिश्रम नहीं छोड़ा, और जब भी धर्म ने इसकी माँग की, तब वह किसी संकट या कष्ट से पीछे हटता हुआ कभी दिखाई न दिया; परन्तु हम पाते हैं कि उसने कितना ही परिश्रम क्यों न किया हो, वह अपने उत्साह और दृढ़ता से सारी प्रजा को अपने अगुवे के रूप में अपने पीछे चलाने में सफल न हो सका। तब क्या होगा, जब वे लोग जिन्हें दूसरों को सीधा मार्ग दिखाना चाहिए, उदासीन और आलसी हों? इस बीच भले हाकिमों को हिजकिय्याह के उदाहरण से दृढ़ता मिली, जिससे जब उन्होंने देखा कि उसके परिश्रम के पीछे तुरन्त सफलता या कोई फल नहीं आया, तो वे अपने मन में हताश या शिथिल न हुए। क्योंकि यह एक भारी परीक्षा है, और ऐसी बात है जो सबसे साहसी लोगों को भी हिला देती है, जब वे सोचते हैं कि उनके प्रयत्न व्यर्थ हैं, उनके परिश्रम निष्फल हैं, हाँ, कि वे अपना समय व्यर्थ गँवा रहे हैं; और इसी प्रकार बहुत लोग पीछे हट जाते हैं। परन्तु उन्हें हिजकिय्याह का यह उदाहरण स्मरण रखना चाहिए, जिससे वे आगे बढ़ते रहें, चाहे किसी सफल परिणाम की आशा दिखाई न दे; क्योंकि हिजकिय्याह पीछे न हटा, यद्यपि शैतान ने विभिन्न रीतियों से मार्ग में बहुत-सी बाधाएँ डालीं, और ऊपर से देखने में उसके सारे परिश्रमों को उलट भी दिया, यहाँ तक कि उनसे कोई फल उत्पन्न न हुआ। जिस समय का उल्लेख किया गया है, उसके विषय में इतना ही।
पुरनियों ने कहा कि मीका ने सारी प्रजा से यह कहा था, यहोवा यों कहता है, सिय्योन खेत के समान जोता जाएगा। हम पहले ही देख चुके हैं कि मीका ने किस अवसर पर इतनी कठोरता से बात की थी; यह तब हुआ जब कपटियों ने अपना झूठा भरोसा खड़ा किया और झूठमूठ परमेश्वर का नाम अपने ऊपर ले लिया, मानो उन्होंने उसे अपने साथ बाँध रखा हो। उसने कहा, तुम्हारे कारण सिय्योन खेत के समान जोता जाएगा। उसने मन्दिर से आरम्भ किया, और फिर जोड़ा, और यरूशलेम खण्डहरों का ढेर, अर्थात् उजाड़, हो जाएगा; और अन्त में उसने कहा, और भवन का पर्वत, अर्थात् मन्दिर का, इत्यादि। उसने वही बात दोहराई जो वह अभी कह चुका था, क्योंकि मन्दिर का पर्वत सिय्योन के सिवा और क्या था? परन्तु यह भविष्यद्वाणी यहूदियों को कठिनाई से ही विश्वसनीय लगती, इसलिए भविष्यद्वक्ता ने उसकी पुष्टि के लिए वही बात दो बार कही। अतः हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि यह व्यर्थ का दोहराव नहीं था, वरन् इसलिए था कि वह उन कपटियों को भय से कँपा दे जिन्होंने परमेश्वर की धमकियों के विरुद्ध अपने आप को कठोर कर लिया था, और सारा संसार नाश हो जाने पर भी अपने आप को सुरक्षित समझते थे।
मीका ने जो कुछ सुनाया था उसका वर्णन करने के बाद उन्होंने यह जोड़ा, क्या यहूदा के राजा हिजकिय्याह ने और सारे यहूदा ने उसे मार ही डाला? भक्त राजा हिजकिय्याह के उदाहरण से उन्होंने प्रजा को कोमलता और नम्रता दिखाने के लिए उभारा, और दिखाया कि परमेश्वर की ताड़नाओं और धमकियों पर क्रोधित न होना, चाहे वे कितनी ही तीखी चुभें या कितना ही गहरा घाव करें, परमेश्वर का और उसके भविष्यद्वक्ताओं का सम्मान करना है। परन्तु उन्होंने आगे यह भी जोड़ा, क्या उसने यहोवा का भय न माना? और यहोवा के मुख से बिनती न की? और क्या यहोवा न पछताया?
उन्होंने उस बात की पुष्टि की जो यिर्मयाह ने पहले कही थी, कि इसके सिवा और कोई उपाय नहीं था कि वे शान्त मन से भविष्यद्वक्ता की शिक्षा के अधीन हो जाएँ, और साथ ही परमेश्वर की दया की शरण लें; क्योंकि यहाँ परमेश्वर के भय से सच्चा मन फिराव अभिप्रेत है; परमेश्वर का भय उस आदर के सिवा और क्या है, जिसके द्वारा हम दिखाते हैं कि हम उसकी इच्छा के अधीन हैं, क्योंकि वह पिता और प्रभुतासम्पन्न स्वामी है? इसलिए जो कोई परमेश्वर को पिता और स्वामी मानता है, वह मन से उसकी सुइच्छा के अधीन हुए बिना नहीं रह सकता। अतः पुरनियों का अभिप्राय यह था कि हिजकिय्याह और सारी प्रजा सचमुच परमेश्वर की ओर फिरे। अब पश्चाताप में, जैसा कि भली-भाँति ज्ञात होना चाहिए, दो भाग होते हैं — पापी अपनी बुराइयों के कारण अपने आप से अप्रसन्न हो जाता है — और शरीर की सब दुष्ट अभिलाषाओं को त्यागकर वह अपने सारे जीवन और अपने कामों को परमेश्वर की धार्मिकता के नियम के अनुसार ढालने की इच्छा करता है।
172 केरी में {,{מיכה पढ़ा गया है, और कई हस्तलिपियाँ इसका समर्थन करती हैं, और निस्सन्देह यही सच्चा पाठ है, न कि ,{}מיכיה जैसा वर्तमान प्रचलित पाठ में है। — सं.
परन्तु उन्होंने यह भी जोड़ा कि उसने बिनती की, इत्यादि। यद्यपि यिर्मयाह एकवचन का प्रयोग करता है, तौभी वह प्रजा और राजा दोनों को सम्मिलित करता है; फिर भी ऐसा जान पड़ता है कि उसने जान-बूझकर एकवचन का प्रयोग किया, ताकि राजा की प्रशंसा करे, जिसकी भक्ति असाधारण और लगभग अतुलनीय थी। इसमें कोई सन्देह नहीं कि उसने दूसरों को सही मार्ग दिखाया, कि वे पश्चाताप करें, और यह भी कि उसने दीनता से उस पलटे के टल जाने के लिए बिनती की, जिससे उनके मन उचित रूप से भय से भर गए थे। उसने निश्चय ही यह विशेषकर भक्त राजा को ही दिया; परन्तु यही चिन्ता प्रधानों और सारी प्रजा तक भी फैलाई जानी चाहिए, जैसा हम अभी देखेंगे; तो क्या उसने यहोवा के मुख से बिनती न की?
यह दूसरा वाक्यांश विशेष ध्यान देने योग्य है; क्योंकि पापी तब तक कभी परमेश्वर की ओर नहीं लौटेगा जब तक उसे क्षमा और उद्धार की आशा न हो, जैसे हम परमेश्वर की उपस्थिति से सदा डरते ही रहेंगे, जब तक मेल-मिलाप की आशा हमें न दी जाए। इसलिए पवित्रशास्त्र जब कभी पश्चाताप की बात करता है, साथ ही विश्वास को भी जोड़ता है। वे निश्चय ही पूर्णतः भिन्न बातें हैं, तौभी परस्पर विरोधी नहीं, और उन्हें कभी अलग नहीं किया जाना चाहिए, जैसा कुछ लोग बिना विचारे करते हैं। क्योंकि पश्चाताप सारे जीवन का परिवर्तन है, और मानो एक नवीनीकरण है; और विश्वास दोषियों को परमेश्वर की दया की शरण लेना सिखाता है। फिर भी हमें ध्यान देना चाहिए कि पश्चाताप और विश्वास में भेद है; तौभी वे इस प्रकार एक साथ जुड़े हैं कि जो एक को दूसरे से तोड़कर अलग करता है, वह दोनों को पूरी तरह खो देता है।
यही वह क्रम है जिसका पालन भविष्यद्वक्ता अब यह कहने में करता है कि हिजकिय्याह ने यहोवा के मुख से बिनती की। क्योंकि प्रार्थना करने की इच्छा विश्वास के सिवा और कहाँ से आती है? अतः किसी के लिए इतना ही पर्याप्त नहीं कि वह अपने पापों से घृणा और अप्रसन्नता अनुभव करे, और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप होने की लालसा करे, जब तक वह मेल-मिलाप और क्षमा के विषय में न सोचे। इसलिए पुरनियों ने उपाय बताया, और मानो उँगली से उसे दिखाया; क्योंकि यदि प्रजा हिजकिय्याह और दूसरों के उदाहरण पर पश्चाताप करती, तो उन्हें परमेश्वर की दया की शरण लेनी थी, और परमेश्वर से उन पर कृपालु होने की प्रार्थना करके अपना विश्वास प्रकट करना था।
इसका परिणाम यह हुआ कि यहोवा उस विपत्ति से पछताया जो उसने उनके विरुद्ध कही थी। भविष्यद्वक्ता अब बहुवचन का प्रयोग करता है; इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि उसने पहले केवल राजा हिजकिय्याह के नाम के अन्तर्गत सारी प्रजा को सम्मिलित किया था। तब परमेश्वर उस विपत्ति से पछताया। बोलने की इस रीति के विषय में मैं अभी विस्तार से नहीं कहूँगा। हम जानते हैं कि परमेश्वर में कोई परिवर्तन नहीं होता; क्योंकि पछतावा इसके सिवा और कहाँ से आता है — कि बहुत सी बातें अनपेक्षित रूप से घट जाती हैं जो हमें अपना उद्देश्य बदलने को विवश करती हैं? किसी ने कुछ करने की ठानी थी; परन्तु उसने सोचा था कि वह होगा जो कभी हुआ ही नहीं; इसलिए उसके लिए आवश्यक है कि जो उसने ठाना था उसे रद्द करे। अतः पछतावा अज्ञानता का साथी है। अब, जैसे परमेश्वर से कुछ भी छिपा नहीं, वैसे ही यह कभी हो नहीं सकता कि वह पछताए। ऐसा क्यों? क्योंकि उसने अपने निश्चित पूर्वज्ञान के अनुसार ही सब कुछ ठहराया है, क्योंकि सब बातें उसकी आँखों के सामने हैं। परन्तु बोलने की यह रीति, कि परमेश्वर पछताता है, अर्थात् जो उसने घोषित किया है उसे पूरा नहीं करता, उस बात से सम्बन्ध रखती है जो मनुष्यों को दिखाई देती है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि परमेश्वर इस प्रकार झुककर हम से बात करता है; परन्तु जहाँ यह सरलता कोमल और नाज़ुक कानों को ठेस पहुँचाती है, वहाँ हम इसके विपरीत परमेश्वर की उस कृपा पर अचम्भा करते हैं कि वह इस प्रकार हम तक उतर आता है, और हमारी दुर्बल समझ की पहुँच के अनुसार बात करता है। अब हम समझते हैं कि परमेश्वर के विषय में यह कैसे कहा जा सकता है कि वह पछताता है, जब वह उसे पूरा नहीं करता जो उसने सुनाया था। उसका उद्देश्य इस बीच अटल बना रहता है, और जैसा याकूब कहता है, “उसमें न तो कोई परिवर्तन हो सकता है, और न अदल बदल के कारण उस पर छाया पड़ती है।” (याकूब 1:17)
173 सेप्टुआजिंट और सीरियाई, और तर्गुम भी, अर्थ तो देते हैं, परन्तु उचित शब्द नहीं, “और प्रभु उन विपत्तियों से रुक गया,” इत्यादि। — सं.
परन्तु फिर यह प्रश्न उठाया जा सकता है, तो परमेश्वर उस विपत्ति से कैसे पछताया जिसकी धमकी उसने राजा और प्रजा दोनों को दी थी? इसी कारण कि उसने अपना पलटा टाल दिया; क्योंकि परमेश्वर ने अपनी आज्ञा या अपनी घोषणा को रद्द नहीं किया, वरन् हिजकिय्याह और उस समय जीवित प्रजा को छोड़ दिया। अतः परमेश्वर के पलटे का टल जाना उसका पछताना कहलाता है; क्योंकि हिजकिय्याह ने वह अनुभव नहीं किया जिसका उसे भय था, इसलिए कि उसने न तो नगर का विनाश देखा और न वह दुःखद और भयानक घटना जिसकी भविष्यद्वाणी मीका ने की थी।
अब यह भी ध्यान देने योग्य है — कि यहाँ पवित्र आत्मा भक्त राजा की प्रशंसा करता है, कि उसने अपने आप को कड़ी ताड़ना सहने दी, यद्यपि, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, वह स्वयं दोषी नहीं था। उसमें निश्चय ही धधकती हुई धुन थी, और वह परमेश्वर की सच्ची आराधना को बढ़ाने में कोई भी कष्ट सहने को तैयार था; तौभी जब भविष्यद्वक्ता ने नगर और मन्दिर के विनाश की बात की, तब उसने शान्ति और धीरज से उसे सह लिया, क्योंकि उसने देखा कि उसे ऐसे सहायक की आवश्यकता थी। क्योंकि भक्त शासक परमेश्वर की महिमा को बढ़ाने में चाहे कितनी ही बुद्धिमानी से परिश्रम करें, शैतान उनका विरोध करता ही है। इसलिए वे सदा इसे कोई छोटी बात न समझकर यह चाहते हैं कि उनके पास सच्चे और विश्वासयोग्य शिक्षक हों जो उनकी सहायता करें, उन्हें सहारा दें और दृढ़ करें, और उनके विरोधियों का सामना भी करें; क्योंकि यदि शिक्षक चुप रहें या कपट करें, तो भले शासकों और न्यायियों के प्रति अधिक बैर रखा जाता है; क्योंकि जब वे खींची हुई तलवार से परमेश्वर की महिमा और उसकी आराधना की रक्षा करते हैं, और शिक्षक स्वयं गूँगे कुत्ते बने रहते हैं, तब सब चिल्ला उठेंगे, “ओह! इस कठोरता का क्या अर्थ है? हमारे शिक्षक तो हमारे कानों को छोड़ देते हैं, परन्तु ये तो हमारे लहू को भी नहीं छोड़ते।” इसलिए भले और भक्त राजाओं के लिए यह सदा वांछनीय बात है कि उनके पास निडर और उत्साही शिक्षक हों, जो ऊँचे स्वर से पुकारें और अपने शासकों के प्रयत्नों को दृढ़ करें। भक्त हिजकिय्याह की भावना ऐसी ही थी, जैसा हम इस स्थल से निष्कर्ष निकाल सकते हैं। शेष मुझे आगे के लिए टालना होगा।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जब तूने हमें अपने लिए एक प्रजा के रूप में इकट्ठा करने में प्रसन्नता पाई है, और यह प्रतिज्ञा की है कि हम तेरे वास करने के लिए एक आत्मिक मन्दिर के समान होंगे — हाँ, यह वरदान दे कि हम अपने बीच तेरे लिए सदा का निवास-स्थान पवित्र करें, और अपने जीवन के सारे मार्ग में अपने आप को तुझे अर्पित करने का ऐसा यत्न करें, कि तेरा अनुग्रह और तेरी आशीष हम से कभी दूर न हो, वरन् हम अधिकाधिक यह अनुभव करें कि जो सच्चाई से और निष्कपट मन से तुझ पर भरोसा रखते हैं वे तेरी रक्षा से कभी वंचित नहीं होते, जिससे तेरे एकलौते पुत्र के द्वारा हम में तेरे नाम की अधिकाधिक महिमा हो। — आमीन।
एक सौ दोवाँ व्याख्यान
कल हमने वह उदाहरण देखा जो पुरनियों ने यिर्मयाह को मृत्यु से बचाने के लिए प्रस्तुत किया था — कि वह पहला व्यक्ति नहीं था जिसने नगर और मन्दिर को विनाश की धमकी दी हो, क्योंकि हिजकिय्याह के राज्य में मीका ने भी यही किया था और उसे मार नहीं डाला गया था। इससे उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि यदि वे यिर्मयाह को मार डालें तो यह एक घोर अपराध होगा, और वह दण्ड पाए बिना न रहेगा। तब उन्होंने संकेत किया कि यदि प्रजा यिर्मयाह को मार डाले तो वह अत्यन्त गम्भीर अपराध करेगी; और उन्होंने यह भी जोड़ा कि पलटा अवश्य आएगा, क्योंकि यदि वे पवित्र भविष्यद्वक्ता से इस प्रकार क्रूरता का व्यवहार करें तो प्रभु उन्हें उनका उचित प्रतिफल देगा। अब आगे लिखा है —
यिर्मयाह 26:20-23
20. फिर शमायाह का पुत्र ऊरिय्याह नाम किर्यत्यारीम का एक पुरुष था जो यहोवा के नाम से भविष्यद्वाणी करता था, और उसने भी इस नगर और इस देश के विरुद्ध ठीक ऐसी ही भविष्यद्वाणी की जैसी यिर्मयाह ने अभी की है:
20. Atque etiam vir fuit prophetans in nomine Jehovae, Urias, filius Semeah ex
Cariath-iarim, et prophetavit contra urbem hanc et contra terram hanc secundum sermones Jeremiae:
21. और जब यहोयाकीम राजा और उसके सब वीरों और सब हाकिमों ने उसके वचन सुने, तब राजा ने उसे मरवा डालने का यत्न किया; और ऊरिय्याह यह सुनकर डर के मारे भागा, और मिस्र में चला गया;
21. Et audivit rex Joakim et omnes magnates ejus et Proceres sermones ejus, et quaesivit rex interficere ipsum, et audivit Urias et timuit, et fugit et transivit (vel, concessit) in Egyptum;
22. तब यहोयाकीम राजा ने मिस्र को लोग भेजे, अर्थात् अकबोर के पुत्र एलनातान को और उसके संग और कितने पुरुषों को मिस्र में भेजा।
22. Et misit rex Joakim viros in Egyptum, Elnathan filium Achobor et viros cure eo in Egyptum:
23. और वे ऊरिय्याह को मिस्र से निकालकर यहोयाकीम राजा के पास ले आए; और उसने उसे तलवार से मरवाकर उसकी लोथ को साधारण लोगों की कबरों में फिंकवा दिया।
23. Et eduxerunt Uriam ex Egypto, et adduxerunt eum ad regem Joakim, qui percussit eum gladio, et projecit cadaver ejus in sepulchra populi (vel, plebis potius.)
यहाँ एक और उदाहरण प्रस्तुत किया गया है, जो कुछ भिन्न और कुछ समान है — राजा के विषय में भिन्न, और भविष्यद्वक्ता के विषय में समान। यहाँ जिस ऊरिय्याह का उल्लेख है, उसने अपना पद विश्वासयोग्यता से निभाया; परन्तु यहोयाकीम उसका प्रचार सह न सका, और इसलिए उसने उसे मार डाला। कुछ लोग इस सारे भाग की व्याख्या इसी प्रकार करते हैं, मानो पुरनिये यह दिखाना चाहते थे कि दुष्ट लोग परमेश्वर के भविष्यद्वक्ताओं का विरोध करके कुछ नहीं पा सकते, सिवाय इसके कि विवाद करके वे अपने आप को अधिकाधिक दोषी बना लेते हैं। परन्तु दूसरे सोचते हैं कि यह भाग विरोधी पक्ष द्वारा प्रस्तुत किया गया था, और शब्द, “और भी,” {,}וגםugam, इस मत के पक्ष में हैं; क्योंकि उन्हें विरोधसूचक अर्थ में लिया जा सकता है, मानो उन्होंने कहा हो, “परन्तु एक और भविष्यद्वक्ता था, जिसने नगर के विनाश और मन्दिर के नाश की बात की और दण्ड से नहीं बचा।” और इस मत की पुष्टि उस बात से होती जान पड़ती है जो अध्याय के अन्तिम पद में आती है, तौभी अहीकाम का हाथ, इत्यादि; शब्द {,}אךak, का ठीक अर्थ तौभी है; परन्तु कभी-कभी इसका अर्थ कम से कम, या केवल होता है। परन्तु इस स्थान में, जैसा मैं अभी फिर दिखाऊँगा, मेरी समझ में यह अपना ठीक अर्थ बनाए रखता है; क्योंकि भविष्यद्वक्ता घोषित करता है कि यद्यपि वह बड़े संकट में था, तौभी अहीकाम उसके लिए इतनी वीरता से लड़ा कि अन्ततः उसने उसका मुकद्दमा जीत लिया।
परन्तु जहाँ तक वर्तमान स्थल की बात है, दोनों व्याख्याएँ स्वीकार की जा सकती हैं; अर्थात् या तो यह कि द्वेषियों ने यिर्मयाह को दबा देने के लिए ऊरिय्याह की मृत्यु का उदाहरण दिया — या यह कि परमेश्वर के विश्वासयोग्य अनुयायी यह दिखाना चाहते थे कि इस प्रकार काम करने का कोई कारण नहीं था, क्योंकि स्थिति और भी बिगड़ गई थी, जब से राजा यहोयाकीम ने परमेश्वर के सेवक को क्रूरता से मार डाला था।
परन्तु समय पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए। हम देख चुके हैं कि यह भविष्यद्वाणी यिर्मयाह को यहोयाकीम के राज्य के आरम्भ में सौंपी गई थी, और तभी प्रचारित भी की गई थी; परन्तु इस आरम्भ को पहले या दूसरे वर्ष तक सीमित नहीं करना चाहिए; परन्तु क्योंकि वह बाबुल के राजा को कर देनेवाला बन गया, और बाद में उसने जूआ उतार फेंकने का यत्न किया और अन्ततः अपमान के साथ सिंहासन से उतार दिया गया; इसलिए उसके राज्य का आरम्भ वह समय मानना चाहिए जब उसका अधिकार अखण्ड था। अतः जब यहोयाकीम अपनी प्रतिष्ठा बनाए हुए था, तब यिर्मयाह को यह सन्देश सुनाने की आज्ञा दी गई। जो भी हो, राजा यहोयाकीम उस समय शान्ति से राज्य कर रहा था; वह यरूशलेम में था।
इसलिए यहाँ यह नहीं कहा गया कि ऊरिय्याह ने उसके दिनों में नगर को धमकी दी थी; परन्तु यह इतिहास एक वर्तमान बात के रूप में दिया गया है। अतः एक बात स्पष्ट है, कि यह भाषण तब दिया गया जब राजा यहोयाकीम दूर नहीं था। उसका महल मन्दिर के निकट था; उसके मन्त्री उपस्थित थे, जो, जैसा हम देख चुके हैं, उपद्रव के कारण नीचे उतर आए थे। क्योंकि यह मामला छिपा नहीं रह सकता था; क्योंकि याजक और झूठे भविष्यद्वक्ता हर कहीं प्रजा का क्रोध भड़का रहे थे। इसलिए राजा के मन्त्री उपद्रव शान्त करने आए। यदि भाषण का यह भाग यिर्मयाह के पक्षधरों का माना जाए, तो उनमें बड़ा साहस और दृढ़ता रही होगी कि वे राजा पर एक जघन्य हत्या का आरोप लगाएँ, और उसे पवित्र वस्तु के अपमान का दोषी भी ठहराएँ, क्योंकि उसने न केवल एक पवित्र भविष्यद्वक्ता की हानि की थी, वरन् सीधे परमेश्वर ही का विरोध किया था। दोनों पक्षों में सम्भावित अनुमान हैं; क्योंकि यदि हम इस मत को मानें, कि परमेश्वर के सेवकों ने, जो यिर्मयाह के पक्ष में थे और उसे संकट से छुड़ाना चाहते थे, ये शब्द कहे, तो यह आपत्ति की जा सकती है और कहा जा सकता है कि ऐसी कोई बात व्यक्त नहीं की गई। परन्तु वर्णन लगातार आगे बढ़ता है, और एक पुरुष भी था, इत्यादि। अब जब भिन्न-भिन्न व्यक्ति बोलते हैं और एक दूसरे का विरोध करते हैं, तो परिवर्तन को चिह्नित करने की रीति है। अतः ऐसा जान पड़ता है कि सारा भाग जोड़कर पढ़ा जाना चाहिए, कि जिन्होंने पहले मीका का उदाहरण दिया, उन्होंने फिर दूसरी ओर यह जोड़ा कि ऊरिय्याह ने निश्चय ही दण्ड भोगा, परन्तु इस प्रकार अपराध पर अपराध जोड़ा गया, कि यहोयाकीम ने परमेश्वर के भविष्यद्वक्ता को रोष से सताकर कुछ नहीं पाया। और यह कि उन्होंने परिणामों की बात नहीं की, विचित्र न लगना चाहिए, क्योंकि नगर और प्रजा की दशा सब को ज्ञात थी, और एक और भी गम्भीर संकट निकट था। इसलिए वे भली-भाँति एक साधारण वर्णन दे सकते थे; और क्योंकि वे राजा के मन को उत्तेजित करने का साहस नहीं करते थे, इसलिए उस भाग को अछूता छोड़ना और भी आवश्यक था।
परन्तु यदि दूसरा मत अधिक मान्य हो, कि यिर्मयाह के शत्रु यहाँ उसके विरुद्ध उठे, और ऊरिय्याह का मामला प्रस्तुत किया, तो इसके पक्ष में भी कुछ तर्कसंगतता दिखाई देती है; राजा जीवित था, उसके मन्त्री उपस्थित थे, जैसा हम कह चुके हैं। तो यह हो सकता है कि जो यिर्मयाह की मृत्यु चाहते थे, उन्होंने उसे नष्ट करवाने के लिए इस हाल के उदाहरण का उल्लेख किया — “वह क्यों बच निकले, जब ऊरिय्याह को अभी हाल ही में मार डाला गया, क्योंकि मामला ठीक वैसा ही है? ऊरिय्याह यिर्मयाह से आगे नहीं बढ़ा; वरन् ऐसा जान पड़ता है कि उसने उसी के मुँह से शब्द ले लिए थे। तो जब राजा ने उसे मार डाला, तो यिर्मयाह को क्यों छोड़ा जाए? वह उस दण्ड से क्यों बच निकले जो दूसरे ने भोगा, जब उसका अपराध और भी गम्भीर है?” इससे प्रकट होता है कि इस मत का बिना किसी बेतुकेपन के समर्थन किया जा सकता है, अर्थात् यह कि यिर्मयाह के शत्रुओं ने ऊरिय्याह को राजा द्वारा दिए गए दण्ड का उल्लेख करके, जिसका मामला उससे भिन्न नहीं था, उसके मामले को और भारी बनाने का यत्न किया; और मैं इस मत को अस्वीकार नहीं करता।
यदि कोई दूसरे मत को स्वीकार करे, कि यह भाग यिर्मयाह के पक्षधरों द्वारा कहा गया था, तो मैं उसे सहर्ष मान लेता हूँ; परन्तु मैं अब भी इस विचार को पूरी तरह अस्वीकार करने का साहस नहीं करता कि ऊरिय्याह का मामला प्रस्तुत करके यिर्मयाह के विरुद्ध पूर्वाग्रह का बोझ लादा गया, जिसे राजा ने नगर और मन्दिर के विरुद्ध भविष्यद्वाणी करने के कारण मार डाला था।
अब हम शब्दों पर विचार करें; एक पुरुष भी था जो यहोवा के नाम से भविष्यद्वाणी करता था, इत्यादि। यदि हम उन लोगों का मत स्वीकार करें जो सोचते हैं कि यहाँ यिर्मयाह के शत्रु बोल रहे हैं, तो यहोवा का नाम एक झूठे बहाने के रूप में लिया जाना चाहिए, मानो उन्होंने कहा हो, “परमेश्वर के नाम का बहाना करना तो बहुत साधारण बात है; क्योंकि जो कोई सिखाने का पद अपने ऊपर लेता है, वह डींग मारता है कि वह ऊपर से भेजा गया है, और जो वह कहता है वह परमेश्वर ने उसे सौंपा है।” इस प्रकार उन्होंने परोक्ष रूप से यिर्मयाह को दोषी ठहराया; क्योंकि उसके लिए परमेश्वर के नाम का दावा करना पर्याप्त नहीं था, क्योंकि ऊरिय्याह ने भी, जिसकी वे बात कर रहे थे, अत्यन्त ऊँचे स्वर से यह दावा किया था कि वह परमेश्वर का भविष्यद्वक्ता है, कि वह अपनी ओर से कुछ नहीं लाया, और कि उसकी बुलाहट निश्चित थी। परन्तु यदि यह भाग परमेश्वर के सच्चे उपासकों का माना जाए, जिनका उद्देश्य यिर्मयाह की रक्षा और बचाव करना था, तो यहोवा के नाम से बोलने का अर्थ, जैसा हमने कल कहा, केवल भविष्यद्वक्ता के पद के कारण घमण्ड करना नहीं था, वरन् विश्वासयोग्यता और खराई का प्रमाण देना भी था, जिससे वह सचमुच और अपने कार्य से सिद्ध करे कि वह परमेश्वर का भविष्यद्वक्ता था, जैसा वह समझा जाना चाहता था।
फिर उन्होंने जोड़ा, उसने इस नगर और इस देश के विरुद्ध यिर्मयाह के सब वचनों के अनुसार भविष्यद्वाणी की। यदि यिर्मयाह के विरोधी बोलनेवाले थे, तो हम देखते हैं कि वह इस प्रकार दबा दिया गया कि उसके बाद उसके मामले के विषय में और कुछ जानना व्यर्थ था; क्योंकि एक और व्यक्ति पहले ही दोषी ठहराया जा चुका था, जिसका मामला किसी प्रकार भिन्न या अलग नहीं था; “उसने यिर्मयाह के वचनों के अनुसार कहा, और वह दोषी ठहराया गया, तो अब हम यिर्मयाह के विषय में क्यों हिचकिचाएँ?” हम देखते हैं कि उन्होंने कितने द्वेष से इस उदाहरण को यिर्मयाह के विरुद्ध मोड़ दिया, मानो वह दूसरे व्यक्ति में पहले ही दोषी ठहराया जा चुका हो। परन्तु यदि ये भक्त लोगों के शब्द थे, तो उनका अर्थ दूसरी रीति से समझाया जाना चाहिए; संकेत यह है कि यदि यिर्मयाह मार डाला जाता, तो परमेश्वर का पलटा भड़क उठता; क्योंकि एक भविष्यद्वक्ता का निर्दोष लहू बहाना ही आवश्यकता से कहीं अधिक था।
174 इस विषय पर दो और मत रखे जाते हैं; कुछ कहते हैं कि दूसरा उदाहरण, अर्थात् ऊरिय्याह का, वृत्तान्त के लेखक ने प्रस्तुत किया, चाहे वह स्वयं यिर्मयाह हो या बारूक, और इसका उल्लेख यह दिखाने के लिए किया गया कि इस पूर्व-उदाहरण के अनुसार यिर्मयाह भी मार डाला जाता, यदि अहीकाम बीच में न पड़ता। यह मत गैटेकर और ब्लेनी का है। परन्तु जो मत सारे स्थल से सबसे अधिक मेल खाता जान पड़ता है, वह वेनेमा का है; वह मानता है कि 17वाँ पद (यिर्मयाह 26:17) अपने स्थान से, जो 19वें और 20वें पद (यिर्मयाह 26:19-20) के बीच था, हटा दिया गया है, और कि “हाकिमों” ने यिर्मयाह के पक्ष में मीका के मामले का उल्लेख किया, और “देश के पुरनियों” ने उसके विरुद्ध ऊरिय्याह का मामला प्रस्तुत किया, और कि इसके होते हुए भी अन्त में यह जोड़ा गया है कि हाकिमों में से एक, अहीकाम, उसे छुड़ाने में सफल हुआ। कि इस पुस्तक में अध्यायों का क्रम बदल गया है, यह निर्विवाद है; पदों के विषय में भी यही बात हो सकती है। तब यह स्थल इस प्रकार पढ़ा जाएगा, — 16. तब हाकिमों और सब लोगों ने याजकों और भविष्यद्वक्ताओं से कहा, “यह मनुष्य मृत्यु-दण्ड के योग्य नहीं है, क्योंकि 18. उसने यहोवा के नाम से हम से (या हमारे विरुद्ध) कहा है। मोरेशेती मीका यहूदा के राजा हिजकिय्याह के दिनों में भविष्यद्वक्ता था, और उसने यहूदा के सब लोगों से कहा, ‘सेनाओं का यहोवा यों कहता है, सिय्योन खेत होकर जोता जाएगा, और यरूशलेम खण्डहरों का ढेर हो जाएगा, और भवन का पर्वत वन के ऊँचे 19. स्थानों के समान हो जाएगा।’ क्या यहूदा के राजा हिजकिय्याह ने और सारे यहूदा ने उसे मार ही डाला? क्या उसने यहोवा का भय न माना और यहोवा से अनुग्रह की बिनती न की? तब यहोवा उस विपत्ति से पछताया जो उसने उनके विरुद्ध सुनाई थी; परन्तु हम अपने ही प्राणों के विरुद्ध बड़ी बुराई कर रहे हैं।” 17. तब देश के पुरनियों में से कितने पुरुष उठकर प्रजा की सारी 20. सभा से कहने लगे, “परन्तु एक पुरुष भी था, जो यहोवा के नाम से भविष्यद्वाणी करता था, शमायाह का पुत्र ऊरिय्याह,” इत्यादि इत्यादि। यह व्यवस्था सारे वृत्तान्त को स्पष्ट, क्रमबद्ध और सुसंगत बना देती है। निष्कर्ष स्वाभाविक रूप से आता है, कि “पुरनियों” के विरोधी भाषण के होते हुए भी यिर्मयाह हाकिमों में से एक, अहीकाम, के प्रभाव से बच गया। — सं.
फिर आगे लिखा है, और जब यहोयाकीम राजा, और उसके सब वीरों और हाकिमों ने उसके वचन सुने, इत्यादि। यह पद उन लोगों के मत के पक्ष में जान पड़ता है जो यह निष्कर्ष निकालते हैं कि बोलनेवाले भक्त लोग थे; क्योंकि उन्होंने राजा और उसके मन्त्रियों के विषय में अपमानजनक बात कही; राजा ने और उसके वीरों ने सुना, (शब्दशः, बलवन्त पुरुषों ने,) और सब हाकिमों ने भी; और राजा ने उसे मार डालने का यत्न किया। तौभी ये शब्द अभक्तों और दुष्टों के भी माने जा सकते हैं, क्योंकि वे पहले राजा का और फिर वीरों और हाकिमों का उल्लेख करके साधारण लोगों को डराना चाहते थे। और उसे मार डालने का यत्न करना भी क्षम्य ठहराया जा सकता था, अर्थात् यह कि राजा ऐसी निन्दा का बदला लिए बिना उसे सह नहीं सकता था; क्योंकि उसने देखा कि भविष्यद्वक्ता ने ऐसी स्वतन्त्रता ले ली थी कि उसने न तो पवित्र नगर को छोड़ा और न मन्दिर को: तो राजा ने, और उसके वीरों और हाकिमों ने सुना; और फिर, राजा ने उसे मार डालने का यत्न किया।
परन्तु ऊरिय्याह यह सुनकर डर गया और भागा। यह स्थल हमें सिखाता है कि परमेश्वर के विश्वासयोग्य सेवक भी, जो सच्चाई से अपना पद पूरा करने का यत्न करते हैं, सदा इतने साहसी नहीं होते कि निडर होकर सब संकटों को तुच्छ जानें; क्योंकि कहा गया है कि भविष्यद्वक्ता डर गया; परन्तु इस कारण वह दोषी नहीं ठहराया गया। यह भय निश्चय ही निर्दोष नहीं था; परन्तु उसका भय ऐसा था कि तौभी वह अपनी बुलाहट में बना रहा। वह निश्चय ही राजा को प्रसन्न कर सकता था, परन्तु वह ऐसे विश्वासघात से मृत्यु से भी अधिक डरता था। इसलिए वह इस प्रकार डरा कि वह सही मार्ग से नहीं मुड़ा, न उसने सत्य का इनकार किया, न अपनी प्रतिष्ठा या अपने धारण किए हुए पद के अयोग्य कोई बात स्वीकार की। अतः उसका भय, यद्यपि अनुचित था, तौभी भविष्यद्वक्ता पर ऐसा अधिकार न कर सका कि वह अपनी बुलाहट में परमेश्वर के प्रति सदा विश्वासयोग्य न रहे। फिर आगे लिखा है कि वह मिस्र में चला गया। इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि राजा का क्रोध और उसकी क्रूरता इतनी बड़ी थी कि उस पवित्र जन को सारे यहूदिया देश में, और न आसपास के अन्य प्रदेशों में ही, छिपने के लिए कोई कोना मिल सका। इसलिए उसे विवश होकर मिस्र में छिपने का स्थान ढूँढ़ना पड़ा।
इसके बाद जोड़ा गया है कि राजा ने लोगों को भेजा, अर्थात् दूतमण्डल के प्रधान एलनातान को, दूसरों के साथ। इसमें कोई सन्देह नहीं कि यहोयाकीम ने मिस्र के राजा के पास सन्देश भेजा और शिकायत की कि एक उपद्रवी मनुष्य भाग गया है, और उससे बिनती की कि वह उसे भगोड़े के रूप में सौंप दे। इस प्रकार वह बलपूर्वक नहीं, वरन् एक घृणित समझौते के द्वारा लौटा लाया गया, क्योंकि मिस्र के राजा ने उसके साथ विश्वासघात किया।
175 इस पद में जो पुनरुक्ति जान पड़ सकती है उससे बचने के लिए ब्लेनी मिस्र के लिए आए शब्द का अनुवाद “विरोधी” करता है, — “परन्तु यहोयाकीम राजा ने विरोधियों को, अकबोर के पुत्र एलनातान को, और उसके संग कितने पुरुषों को, मिस्र में भेजा।” यदि शब्दों का शब्दशः अनुवाद किया जाए, तो यह दोहराव उन बहुत से दोहरावों से भिन्न न जान पड़ेगा जो हमें मिलते हैं; “तब राजा यहोयाकीम ने अकबोर के पुत्र एलनातान के साथ पुरुषों को मिस्र में भेजा, अर्थात् उसके संग पुरुषों को मिस्र में।” ऐसा जान पड़ता है कि इस दोहराव का उद्देश्य यह दिखाना था कि भविष्यद्वक्ता को पकड़ने के लिए एक मनुष्य नहीं, वरन् एक बलवन्त दल भेजा गया था, और यह दल मिस्र तक भी जाने को था। सेप्टुआजिंट का अनुवाद है, “और राजा ने मिस्र में लोग भेजे;” वुल्गेट और तर्गुम हमारे अनुवाद के समान हैं; परन्तु सीरियाई में है, “और राजा यहोयाकीम ने एक मिस्री को, अकबोर के पुत्र एलनातान को, और उसके संग कुछ लोगों को, मिस्र में भेजा।” यह विचित्र बात है कि एक हस्तलिपि में ,{}מצרים के स्थान पर, जिसका अनुवाद प्रायः मिस्र किया जाता है, शब्द {,{מרגלים खोजी, भेदिए, पाया जाता है, यद्यपि वह एक ऐसी धातु से निकला है जिसका अर्थ कसकर बाँधना, घेरना, चारों ओर से घेर लेना है; और इस प्रकार हिफ़ील कृदन्त के रूप में इसका अर्थ घेरनेवाले, या पकड़नेवाले होगा — आधुनिक भाषा में, “बमबेलिफ़” (कुर्की-सिपाही), जो “बाउण्ड बेलिफ़” (बँधे हुए बेलिफ़) का बिगड़ा हुआ रूप है। यह अर्थ इस स्थल पर ठीक बैठेगा, “तब राजा यहोयाकीम ने पुरुषों को, पकड़नेवालों को, अकबोर के पुत्र एलनातान के साथ, अर्थात् इन पुरुषों को उसके संग मिस्र में भेजा।” — सं.
अन्त में यह जोड़ा गया है कि वे ऊरिय्याह को मिस्र से ले आए, और उसे राजा यहोयाकीम के पास पहुँचाया, जिसने उसे तलवार से मार डाला, और उसकी लोथ को साधारण लोगों की कबरों में फिंकवा दिया, अपमान के लिए; क्योंकि यिर्मयाह यहाँ उन्हें साधारण लोगों की कबरें कहता है, जैसे हम फ्रांसीसी में उन्हें des charniers (अस्थि-गृह) कहते हैं। आज के दिन धनी लोग आदर और धूमधाम से गाड़े जाते हैं, और हर एक की अपनी कबर होती है; परन्तु जब बहुत बड़ी संख्या होती है, तो शव एक साथ डाल दिए जाते हैं, क्योंकि हर एक के लिए कबर खोदना बहुत खर्चीला होगा। ऐसा जान पड़ता है कि यहूदिया में भी ऐसी प्रथा थी, और कि परमेश्वर का भविष्यद्वक्ता इसी अपमानजनक रीति से गाड़ा गया।
इस प्रकार बोलनेवालों ने संकेत किया कि राजा का क्रोध ऐसा भड़का कि उसने न केवल उसे मार डाला, वरन् अपना बदला आगे भी जारी रखा, यहाँ तक कि मरने पर भी भविष्यद्वक्ता का एक नया अपमान हुआ, क्योंकि वह अज्ञात और नीच साधारण लोगों के बीच फेंक दिया गया।
मैंने अब तक इस स्थल की व्याख्या इस प्रकार की है कि यह सन्देहास्पद बना रहे कि सम्भावना यह है कि बोलनेवाले यिर्मयाह के शत्रु थे या उसके पक्षधर। और यद्यपि, जैसा मैं दो-तीन बार घोषित कर चुका हूँ, मैं उस मत को अस्वीकार नहीं करता जो मेरे माने हुए मत से भिन्न है, तौभी मुझे सबसे अधिक सम्भावित यही जान पड़ता है कि ये शब्द उन भक्त लोगों ने कहे जिन्होंने यिर्मयाह के पक्ष की रक्षा की। जो विभिन्न कारण मुझे इस निष्कर्ष तक ले जाते हैं, उन सब का मैं यहाँ उल्लेख नहीं करूँगा; क्योंकि हर एक स्वयं देख सकता है कि मैं इस मत को क्यों अधिक पसन्द करता हूँ। लगभग सब व्याख्याकारों की सामान्य सहमति भी मुझे प्रभावित करती है, जिससे मैं अलग होना नहीं चाहता, जब तक कोई आवश्यकता मुझे विवश न करे, या बात स्वयं यह स्पष्ट न कर दे कि उनसे भूल हुई थी। परन्तु हम आरम्भ से देख चुके हैं कि दोनों उदाहरण लगातार एक दूसरे के बाद आते हैं, और बीच में कुछ नहीं आता; इससे यह माना जा सकता है कि यिर्मयाह के शत्रु पहले ही अपनी भूमिका निभा चुके थे। अतः शब्द स्वयं दिखाते हैं कि जिन्होंने भाषण आरम्भ किया, वे ही उसे आगे बढ़ाते रहे। और यह कि उन्होंने वह कारण नहीं बताया कि उन्होंने यह उदाहरण क्यों प्रस्तुत किया, कोई आश्चर्य की बात नहीं; क्योंकि राजा की अप्रसन्नता का भय था, और उसने पवित्र भविष्यद्वक्ता के साथ अपने व्यवहार में इसका कोई साधारण प्रमाण नहीं दिया था कि वह अपनी प्रतिष्ठा को छूनेवाली किसी भी बात को कितनी अधीरता से सहता था। इसलिए उन्होंने सावधानी से बात का वर्णन किया, और जो उन्होंने व्यक्त नहीं किया उसे सुननेवालों के समझने के लिए छोड़ दिया। परन्तु उनके शब्दों से यह जानना सरल था कि उनका अभिप्राय क्या था — कि परमेश्वर के पलटे से डरना चाहिए; क्योंकि एक भविष्यद्वक्ता मार डाला जा चुका था; यदि क्रूरता का कोई अन्त ही न हो तो क्या? जब उसके सेवकों से इतना अनुचित व्यवहार किया जाता, तो क्या परमेश्वर अन्ततः न्याय करने को न उठता? अतः, क्योंकि शब्द पूरे नहीं किए गए, मुझे यह सम्भावित जान पड़ता है कि परमेश्वर के सच्चे सेवकों ने इस प्रकार संयम और सावधानी से बात की, क्योंकि वे अपने विचार खुलकर व्यक्त करने का साहस नहीं करते थे।
इसके अतिरिक्त, ये शब्द, राजा ने उसे मार डालने का यत्न किया, और राजा ने लोगों को भेजा, इत्यादि, अभक्तों और दुष्टों की अपेक्षा यिर्मयाह के रक्षकों द्वारा कहे गए मानने पर अधिक उपयुक्त हैं; और उन्होंने एलनातान का नाम भी लिया, ताकि वे उसके नाम को अपकीर्ति के साथ आनेवाली पीढ़ियों तक पहुँचा दें। और अन्त में उन्होंने जोड़ा कि भविष्यद्वक्ता मिस्र से लाया गया। जो बात अत्यन्त लज्जाजनक थी, वह निश्चय ही यहाँ हमारे सामने रखी गई जान पड़ती है, कि वह उस देश से, जहाँ वह शरण पाने के लिए भागा था, बलपूर्वक लौटा लाया गया, और यह भी कि वह राजा के पास लाया गया, कि उसने उसे तलवार से मारा, अर्थात् क्रूरता से मार डाला; और फिर, इस बर्बर कार्य से सन्तुष्ट न होकर, उसने उसे अपमान के साथ गड़वाया। ये सब बातें, जैसा मैं कह चुका हूँ, यह दिखाती जान पड़ती हैं कि ये शब्द उसके शत्रुओं की अपेक्षा उन पवित्र जनों पर अधिक उपयुक्त रूप से लागू हो सकते हैं जिन्होंने यिर्मयाह के पक्ष की रक्षा की। अब आगे लिखा है —
यिर्मयाह 26:24
24. परन्तु शापान का पुत्र अहीकाम यिर्मयाह की सहायता करने लगा, और वह लोगों के वश में मार डाले जाने के लिए नहीं दिया गया।
24. Veruntamen manus Achicam, filii Saphan, fuit cum Jeremia, ne traderetur ipse (vel, ne traderent ipsum) in manum populi ad interficiendum ipsum.
यहाँ एक विरोधसूचक अव्यय है, और वह अकारण नहीं; क्योंकि यह उस विवाद की ओर संकेत करता है जो इतना भड़क उठा था कि पवित्र भविष्यद्वक्ता को संकट से निकालना कठिन हो गया। इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि यिर्मयाह इतने बड़े संकट में था कि अहीकाम ने बड़े और कठिन परिश्रम से ही उसे बचाया। पवित्र इतिहास में इस पुरुष का बार-बार उल्लेख है, और आगे कई स्थानों में उसका नाम मिलेगा, और नगर के ढाए जाने के बाद प्रजा के बचे हुओं पर शासन करने के लिए वह छोड़ा गया। (2 राजा 25:22; यिर्मयाह 39:14) और इसमें कोई सन्देह नहीं कि उसने धर्म में उन्नति की थी और वह एक खरा मनुष्य था, और उसके सद्गुणों को नबूकदनेस्सर ने इतना मूल्यवान समझा कि उसने उसे ऐसा सम्मान दिया। इसके कुछ ही समय बाद अभक्तों और दुष्टों ने उसे मार डाला; परन्तु उसके विषय में ऐसी कोई बात नहीं बताई गई जो उसके लिए सम्मानजनक न हो। निश्चय ही यह साहस का एक असाधारण कार्य था कि उसने सारी प्रजा के रोष का सामना करने का साहस किया, और उन याजकों और झूठे भविष्यद्वक्ताओं को रोका जिन्होंने उस पवित्र जन को मार डालने का षड्यन्त्र रचा था।
यही कारण है कि अन्त में यह जोड़ा गया है कि अहीकाम का हाथ यिर्मयाह के साथ था; यद्यपि प्रजा रोष में थी, और याजक किसी भी प्रकार उस पवित्र जन को सताने से रोके नहीं जा सकते थे, तौभी अहीकाम अपने पवित्र उद्देश्य से हटाया न जा सका, वरन् एक अच्छे पक्ष की रक्षा में तब तक डटा रहा जब तक यिर्मयाह सकुशल बच न निकला। इसलिए कहा गया है कि उसका हाथ यिर्मयाह के साथ था; क्योंकि पवित्रशास्त्र में हाथ से प्रयत्न (conatus) अभिप्रेत है; क्योंकि जहाँ कुछ करना हो, या कोई कठिनाई हो, वहाँ पवित्रशास्त्र हाथ शब्द का प्रयोग करता है। परन्तु क्योंकि अहीकाम ने न केवल अपने शब्दों से पवित्र भविष्यद्वक्ता की सहायता करने में, वरन् प्रजा के रोष को दबाने में, और याजकों और झूठे भविष्यद्वक्ताओं का निडर होकर सामना करने में भी पूरी शक्ति लगा दी, इसलिए इस स्थान में हाथ का अर्थ सहायता है; उसका हाथ यिर्मयाह के साथ था, अर्थात् उसने उसकी सहायता या मदद की, जिससे वह प्रजा के हाथ में सौंपा न गया।
इससे यह भी प्रकट होता है, जैसा हमने कल कहा, कि प्रजा का उपद्रव तुरन्त शान्त नहीं हुआ, क्योंकि झूठे भविष्यद्वक्ताओं और याजकों ने उनका विष इतना भड़का दिया था कि उन्हें शान्त करना लगभग असम्भव हो गया था। अतः यहाँ हमारे सामने साहस और दृढ़ता का एक उदाहरण रखा गया है; क्योंकि हमारे लिए इतना पर्याप्त नहीं कि जब हम सुरक्षित रहकर एक अच्छे पक्ष की रक्षा कर सकें तभी करें, जब तक हम सब बैर की उपेक्षा न करें और सब संकटों को तुच्छ न जानें, और दुष्टों के रोष का सामना न करें, और जब कभी आवश्यक हो परमेश्वर के सेवकों के लिए विवाद और संकट न सहें। साथ ही हमें यह भी सिखाया जाता है कि एक मनुष्य के प्रभाव का कितना महत्त्व होता है, जब वह निडर होकर एक अच्छे पक्ष की रक्षा करता है और दुष्टों के उन्माद के आगे नहीं झुकता, वरन् परमेश्वर के सत्य और उसके सेवकों से विश्वासघात करने की अपेक्षा चरम संकटों को झेलने का जोखिम उठाता है। अब आगे लिखा है —
176 यह उसका पुत्र गदल्याह था, न कि वह स्वयं। — सं.
