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लूथर का हृदय मानो धावा बोलकर जीत लिया गया।
उसने विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराए जाने की शिक्षा को समझना और ग्रहण करना सीखा—अरस्तू की उस नैतिक प्रणाली के विपरीत, जो उस समय सर्वत्र प्रचलित थी, जो आदर्श नैतिकता के उस पुराने मूर्तिपूजक विचार की शिक्षा देती थी जिसे सुकरात ने दो हज़ार वर्ष पहले एथेन्स की गलियों में सिखाया था, और जिसे लूथर ने विद्यालयों में आत्मसात किया था।
परन्तु इस समय से लूथर ने परमेश्वर के अनुग्रह को अपनी आशा का मुख्य लंगर मानकर थामे रखा।
फिर भी, जो कुछ ऊपर कहा गया है, उससे शायद ही कोई यह कल्पना करेगा कि लूथर मठ की विशेष रीति-विधियों के पालन में ढीला था।
"यदि ऑगस्टीन एक मठ की दीवारों से सीधा स्वर्ग गया, तो मुझे भी ऐसा ही करना चाहिए था : मेरे सब भाई मेरे विषय में यह गवाही देंगे।
मैंने अपने आप को मारा-पीटा, मैंने मठवासियों की सारी कठोरताओं का पालन किया, यहाँ तक कि मैंने अपने आप को सचमुच बीमार कर डाला।"
"सुसमाचार के फिर से प्रकाश में आने से पहले, यदि पोप-तन्त्र के अधीन कभी कोई ऐसा था जिसने पोप और कलीसियाई पिताओं की परम्पराओं का सच्चे मन से आदर किया हो, और निष्कपट उत्साह से उनके लिए संघर्ष किया हो, तो मैं कह सकता हूँ कि मैंने विशेष रूप से ऐसा किया; मैं बड़ी लगन और सच्चाई से उनके लिए लड़ता रहा, और उनकी ऐसी रक्षा करता रहा मानो वे स्वयं पवित्रता हों।"
"मैं एक भक्त भिक्षु था, और अपने संघ के नियमों का इतनी कड़ाई से पालन करता था कि मैं घोषणा कर सकता हूँ कि यदि कभी किसी भिक्षु ने मठवासी अभ्यासों के द्वारा उद्धार पाया होता, तो मैं भी उसे पा लेता।
इस बात में मेरे सब मठवासी साथी, जो मुझे जानते थे, मेरी गवाही देंगे; क्योंकि यदि मैं और अधिक समय तक ऐसा करता रहता, तो जागरण करते, प्रार्थनाएँ बोलते, पढ़ते और अन्य कर्म करते-करते मैं अपने आप को सताकर मार डालता।"
मठ के नियमों द्वारा उस पर डाले गए दायित्वों को सहन करने में लूथर को कुछ कठिनाई होती थी।
यह सहज ही समझा जा सकता है कि उसके जैसे ऊर्जावान और आवेगशील स्वभाव पर वे कितना भारी बोझ रहे होंगे।
"यदि मैंने और कुछ न किया होता," उसने अपने जीवन की साँझ में कहा, "केवल लोगों को इस अत्याचार से छुटकारा दिलाया होता, तो भी वे मेरे प्रति कृतज्ञता के बड़े ऋणी होते।"
एक नियत घड़ी पर उन्हीं ध्यान-मननों का यह निरन्तर दोहराव, प्रार्थना का यह यन्त्रीकरण, जो लूथर के अधीर मन पर इतना भारी पड़ता था, उसी को उसके समकालीन इग्नेशियस लोयोला ने कुछ समय बाद अपने अनोखे
"धार्मिक अभ्यासों" के द्वारा और भी अधिक सम्मान तक ऊँचा उठाने का प्रयत्न किया।* परन्तु 1507 में, धर्मसुधार का भावी महाबली रोमी मत के मन्दिर के प्रमुख खम्भों में से एक बनने की पूरी सम्भावना दिखा रहा था।
उसके मठ-जीवन में जो गुण सबसे प्रमुख दिखाई देते हैं, वे हैं : अपने पंथ की छोटी से छोटी और सबसे हास्यास्पद तुच्छ बातों की उसकी दृढ़ रक्षा, पोप के आज्ञप्ति-संग्रहों का उसका कठोर पालन, उसकी मठवासी आज्ञाकारिता, अपने कलीसियाई अधिकारियों के प्रति उसका आदरभाव, और उसकी निर्मम तपस्या—ऐसे लक्षण जो उस युग की सड़ी हुई नैतिकता में जितने दुर्लभ थे, उतने ही उस एकान्तवासी भिक्षु की ईमानदारी और दृढ़ विश्वासों के लिए सम्मानजनक थे।
वास्तव में इस समय लूथर का प्रज्वलित उत्साह, उसके अनेक प्रकार के परिश्रम, उसकी अधीन आत्मा, और उसकी अथक ऊर्जा, उस अत्यन्त कठोर तपस्वी से भी उत्साह-भरी * मिशले का "लूथर का जीवन", पृ. 9।
प्रशंसा निकलवा लेते जो कभी सीरिया के रेगिस्तानों की रेत पर नंगे पाँव चला हो, जिसने पेरू की खदानों की गहराइयों में लोगों को अपने मत में मिलाया हो, या मसालों के द्वीपों के तटों पर और अफ़्रीकी दास-कारवानों की मण्डियों में बर्बर भाषाओं में शिक्षा दी हो।
जियान पिएत्रो कराफ़ा उसका एक भाई और बराबरी के व्यक्ति के रूप में स्वागत करता, और इग्नेशियस लोयोला उस बहुरूपी प्रचार-तन्त्र, … के संगठन में उससे वीरतापूर्ण सहायता पाता। अब लूथर के जीवन का अध्ययन करनेवाले के लिए यह जानना रोचक हो जाता है कि वे कौन-से कारण थे जिन्होंने उस युवा मठवासी को मठवासी भक्ति के उसके स्वप्न से जगाया, और जिन्होंने उस कलीसियाई व्यवस्था के सच्चे स्वरूप के प्रति उसकी आँखें खोल दीं जिसके हितों को आगे बढ़ाने के लिए वह इतनी अन्धी लगन से संघर्ष कर रहा था।
और सबसे पहले, एक भीतरी बात थी जो लूथर को व्याकुल करती थी।
उसे "मठ की शान्ति और भिक्षुओं की सिद्धता में मन की वह शान्ति नहीं मिली जिसकी वह वहाँ आशा करता था।
वह उद्धार का निश्चय पाना चाहता था : यही उसके प्राण की बड़ी आवश्यकता थी।
उसके बिना उसके लिए कोई विश्राम न था।
परन्तु जिन भयों ने संसार में उसे व्याकुल किया था, वे उसकी कोठरी तक उसका पीछा करते रहे : नहीं, वे और भी बढ़ गए।
उसके हृदय की धीमी से धीमी पुकार मठ की मौन मेहराबों के नीचे ज़ोर से गूँज उठती थी।
परमेश्वर ने उसे वहाँ इसलिए भेजा था कि वह अपने आप को जानना सीखे, और अपनी शक्ति और सद्गुण से निराश हो जाए।
उसका विवेक, जो ईश्वरीय वचन से प्रकाशित था, उसे बताता था कि पवित्र होना क्या है; परन्तु वह यह पाकर भय से भर जाता था कि पवित्रता का वह स्वरूप, जिसे उसने परमेश्वर के वचन में प्रशंसा के साथ निहारा था, न तो उसके हृदय में है और न उसके जीवन में।
एक दुखद खोज, और ऐसी खोज जो हर सच्चा मनुष्य करता है।
न भीतर कोई धार्मिकता, न बाहर कोई धार्मिकता; सब कुछ चूक, पाप और अशुद्धता ही था।"* उस समय के भिक्षु और धर्मविज्ञानी उसे प्रोत्साहित करते थे कि वह पुण्य के कामों के द्वारा ईश्वरीय माँगों को पूरा करे।
परन्तु मठ से लिखे गए उसके पत्र दिखाते हैं कि वह आरम्भ से ही उदास और निराश था, और उसे उन पाटर-नॉस्टर (प्रभु की प्रार्थना के जापों), निरन्तर जागरणों और शारीरिक यातनाओं से कोई सान्त्वना नहीं मिलती थी जो रोमी मत के सूत्रों द्वारा पश्चाताप करनेवालों के लिए ठहराई गई थीं, और जिन्हें सन्त पतरस की जाली कुंजियों के धारक इतना प्रभावशाली घोषित करते थे।
अपने कड़वे अनुभव से उनकी निष्फलता सिद्ध करके, वह अन्ततः अन्य लोगों के मामलों में भी उनकी शक्ति पर सन्देह करने लगा।
निस्सन्देह इस विचार ने लूथर को, पोप के सिंहासन से उसे बाँधनेवाली बेड़ियों को औपचारिक रूप से तोड़ने से बहुत पहले ही, बड़ी चिन्ता और गहरा क्लेश दिया।
उस उभरते हुए सुधारक के मन और कार्य को प्रभावित करनेवाले बाहरी और अधिक प्रत्यक्ष कारणों की खोज में, यह आवश्यक होगा कि हम एक बार फिर इतिहास की ओर लौटें, और उन अनेक कलीसियाई कुरीतियों का वर्णन करें जिन्होंने सबसे पहले उसका ध्यान खींचा, और उसकी विरोधी वाक्पटुता की गर्जनाओं को भड़काया।
* डी'ऑबिन्ये, "धर्मसुधार का इतिहास", खण्ड।
1502 में, सैक्सनी के निर्वाचक फ़्रेडरिक ने, जो 'बुद्धिमान' उपनाम से प्रसिद्ध था, विटनबर्ग में उस विख्यात विश्वविद्यालय की स्थापना की जिसके प्रांगणों में धर्मसुधार का जन्म हुआ।
यह दयालु और प्रबुद्ध शासक, जिसका जन्म 1463 में टॉर्गाउ में हुआ था, 1486 में अपनी चौबीसवें वर्ष की आयु में अपने पिता अर्न्स्ट के बाद निर्वाचक-पद पर बैठा, यद्यपि वह एक बँटे हुए सिंहासन का भागी था—उसका भाई, सैक्सनी का ड्यूक जॉन, उसके राज्य के शासन में उसका सहभागी था।
यद्यपि फ़्रेडरिक ने धर्मसुधार के सिद्धान्तों को कभी खुले तौर पर स्वीकार नहीं किया, फिर भी वह प्रायः अपने सिंहासन से झुककर संकट में पड़े सुधारकों की सहायता और रक्षा करता था, और वे बदले में कृतज्ञतापूर्वक उसे "धर्मसुधार का संरक्षक" की भव्य परन्तु उस समय खतरनाक उपाधि देते थे।
विटनबर्ग विश्वविद्यालय की स्थापना से कुछ वर्ष पहले उसकी … से घनिष्ठ मित्रता हो गई थी … फ़्रेडरिक ने अपना विद्यालय स्थापित करने का निश्चय किया, तो उसने डॉ. स्टाउपित्ज़ को, और प्रचलित स्कॉलेस्टिक (विद्वत्-पंथी) प्रणाली के एक और प्रसिद्ध विरोधी, चिकित्सा, विधि और दर्शन के डॉक्टर पोलिख फ़ॉन मेलरश्टाट को चुना, और उन्हें उसकी व्यवस्था का पूरा भार सौंपा।
स्टाउपित्ज़, जो विशेष रूप से इस नए विश्वविद्यालय में धार्मिक दर्शन के अध्ययन को बढ़ावा देने के लिए उत्सुक था—ताकि वह सचमुच वही बने जो निर्वाचक ने उसके विशेषाधिकारों की पुष्टि करनेवाले अपने अधिकार-पत्र में घोषित किया था कि वह और उसकी प्रजा उसे सदा मानेंगे, अर्थात् एक दैवी वाणी का स्थान—लूथर की सच्ची भक्ति, वक्तृत्व-क्षमता, गहन विद्वत्ता और तेजस्वी प्रतिभा से परिचित होने के कारण, उस युवा ऑगस्टिनी भिक्षु को तत्त्वमीमांसा (मेटाफ़िज़िक्स) की पीठ पर बैठाने का निश्चय कर बैठा।
तदनुसार 1508 के उत्तरार्ध में फ़्रेडरिक ने लूथर को एक पत्र भेजा, जिसमें उसे विटनबर्ग के अपने विश्वविद्यालय में प्राध्यापक का चोगा धारण करने का निमन्त्रण दिया गया, और यह आज्ञा दी गई कि यदि वह नियुक्ति स्वीकार करे तो पूरी शीघ्रता से अपने पद पर पहुँचे।
इस अनुरोध को मानने का तुरन्त निर्णय करके, उसने अपना मठ इतनी जल्दी में छोड़ा कि उसे अपने सबसे घनिष्ठ मित्रों को भी अपने जीवन के इस बड़े परिवर्तन की सूचना देने का समय न मिला।
कई महीने बाद विटनबर्ग से अपने अत्यन्त प्रिय गुरु, … के पादरी जॉन ब्राउन को लिखते हुए : "मेरा प्रस्थान इतना शीघ्र हुआ कि जिनके साथ मैं रहता था वे भी उससे लगभग अनजान रहे।
मैं मानता हूँ कि मैं अब अधिक दूर हूँ, परन्तु मेरा उत्तम भाग आपके साथ ही रहता है।"
विद्वत्-पंथियों की कृत्रिम प्रणालियों की उपेक्षा करते हुए, दार्शनिकों की कुतर्की बकवाद से उलझे बिना, लूथर ने अपने मठ की स्वप्निल शान्ति में धर्मविज्ञान के अध्ययन में तीव्र प्रगति की थी।
मठ में अपने तीन वर्ष के निवास के दौरान उसने यूनानी और इब्रानी भाषाओं का गहरा ज्ञान प्राप्त कर लिया था।
उस युग के छिद्रान्वेषी तर्कशास्त्र और अरस्तू के नीतिशास्त्र का सामना करके उन पर अधिकार पा लिया था; और हाल ही में वह रोमी पीठ की सूक्ष्म कुतर्कों का परमेश्वर के वचन के साथ मेल बैठाने का प्रयत्न करने के और भी कठिन कार्य में लगा रहा था।
सम्भवतः उस युग के किसी भी धर्मविज्ञानी ने इससे अधिक सावधान और विस्तृत प्रारम्भिक प्रशिक्षण नहीं पाया था।
यह निश्चित है कि उसका धर्मविज्ञान का पाठ्यक्रम असाधारण रूप से व्यापक, पूर्ण और सम्पूर्ण था।
इस प्रकार स्वभाव से और शिक्षा से धर्मविज्ञान की ओर झुका होने के कारण, लूथर ने घोषणा की कि वह विश्वविद्यालय में उसी पीठ को सँभालना कहीं अधिक पसन्द करता; परन्तु चूँकि कुछ और ही ठहराया हुआ प्रतीत होता था, इसलिए उसे मान जाना पड़ा।
उस युग के विश्वविद्यालय प्रायः विभिन्न मठवासी संघों में से किसी एक से जुड़े होते थे, और उनमें आनेवाले विद्यार्थियों के शिक्षक भिक्षु ही होते थे।
फ़्रेडरिक ने सन्त ऑगस्टीन को विटनबर्ग विद्यालय का संरक्षक सन्त चुना था, और इसलिए वह ऑगस्टिनी भिक्षुओं की देखरेख में था।
याजक होने के नाते लूथर को अपने प्राध्यापक-पद के कारण अपने संघ के कठोर अनुशासन में ढील देने की अनुमति न थी; बल्कि एरफ़र्ट की भाँति एक कोठरी में रहते हुए, वह पहले के समान अपने खाली समय को रोमी विधि-विधान के सब आडम्बरों के अभ्यास में लगाता था।
लूथर अपने विश्वविद्यालय के कर्तव्यों और अपनी मठवासी विधियों के पालन से बचाए जा सकनेवाले हर क्षण को निजी अध्ययन में लगाता था, और उसने प्राचीन भाषाओं, विशेषकर यूनानी और इब्रानी, को पूर्ण रूप से सीखने में विशेष लगन और सफलता के साथ अपने आप को लगा दिया।
वह जीवन भर परिश्रम में अथक रहा।* उसके अध्ययन ने उसे रोमी मत के सतही नीतिशास्त्र से अधिकाधिक दूर किया, और उसे जीवित परमेश्वर की वाणियों पर भरोसा रखना सिखाया।
मार्च 1509 में उस युवा प्राध्यापक को धर्मविज्ञान की Baccalaureus tanquam ad Biblia (बाइबल का स्नातक) की उपाधि दी गई, और साथ में यह विशेष बुलावा दिया गया कि वह बाइबल-आधारित धर्मविज्ञान में अपने आप को लगाए।†
प्रतिदिन दोपहर एक बजे लूथर को विद्यार्थियों के सामने बाइबल पर व्याख्यान देने के लिए बुलाया जाता था—प्राध्यापक और उसके शिष्यों दोनों के लिए एक बहुमूल्य घड़ी, जो उन्हें उन प्रकाशनों के ईश्वरीय अर्थ में गहरे से गहरे ले जाती थी जो इतने लम्बे समय से लोगों और विद्यालयों के लिए खोए हुए थे।‡
बाइबल पर व्याख्यानों के इस क्रम के बिलकुल आरम्भ में ही लूथर ने असाधारण कौशल और शक्ति के साथ अविश्वास, अन्धविश्वास और व्यर्थ अटकलों की उस भारी-भरकम और कृत्रिम प्रणाली पर आक्रमण किया जिसे उस समय सब लोग मानते थे, और जिसे "स्कॉलेस्टिक धर्मविज्ञान
" कहा जाता था—नीतिशास्त्र की एक ऐसी प्रणाली जो कुछ तो मध्ययुगीन विद्वत्-पंथियों के रहस्यवादी लेखों से, और कुछ अरस्तू के मूर्तिपूजक दर्शन से ली गई थी।
विटनबर्ग के उस प्राध्यापक ने निडर होकर घोषणा की कि भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों के लेख, स्वयं परमेश्वर से निकले होने के कारण, अन्यजाति दार्शनिकों की खोखली
In studiis literarum, corpore ac mente indefessus. (साहित्य के अध्ययन में शरीर और मन से अथक।)
पल्लाविचीनी, Hist. Conc. Trident. (ट्रेन्ट की महासभा का इतिहास), खण्ड। † डी'ऑबिन्ये, "धर्मसुधार का इतिहास", खण्ड।
बकवाद से, या घमण्डी विद्वत्-पंथियों की बाद की कुतर्कों से, कहीं अधिक गहरे और निश्चित हैं।
आज यह चाहे जितना विचित्र लगे, इस सीधे और निर्विवाद सत्य ने उस पीढ़ी के पोप-पक्षी धर्मविज्ञानियों में क्रोध-भरा आश्चर्य और विरोध उत्पन्न किया, और
"विधर्मी" की उपाधि अनगिनत मंचों से उस दुस्साहसी भिक्षु पर फेंकी गई।
इन शिक्षाओं ने, जो इतनी नई और चौंकानेवाली थीं, आरम्भ से ही बड़ी हलचल मचा दी, और नए स्थापित विश्वविद्यालय की ओर विद्यार्थियों की भीड़ खींच ली।
वास्तव में "इस प्रकार तैयार किए गए लूथर के व्याख्यानों में उस समय तक सुनी गई बातों से बहुत कम समानता थी।
वहाँ केवल कोई वाक्पटु वक्ता, या कोई पंडिताऊ विद्वत्-पंथी नहीं बोल रहा था, बल्कि एक मसीही, जिसने प्रकट किए गए सत्यों की सामर्थ्य का अनुभव किया था—जो उन्हें बाइबल से निकालता था, अपने हृदय के भण्डार से उँडेलता था, और उन्हें जीवन से भरपूर करके अपने चकित श्रोताओं के सामने रखता था।
यह किसी मनुष्य की शिक्षा नहीं, बल्कि परमेश्वर की शिक्षा थी।"* इस साहसी प्रचार ने, यद्यपि स्कॉलेस्टिकवाद के प्रेरितों के शाप पाए, फिर भी कई प्रतिष्ठित विचारकों को उस युवा
ऑगस्टिनी भिक्षु के पक्ष में बुला लिया; दूसरों के साथ-साथ विश्वविद्यालय के पहले रेक्टर डॉ. मेलरश्टाट को भी, जिसने पहले ही लाइपज़िग में विद्वत्-पंथियों की हास्यास्पद शिक्षाओं का विरोध किया था, और जो लूथर का कोई प्रवचन ध्यान से सुनने के बाद प्रायः कहा करता था, "यह भिक्षु हमारे सब डॉक्टरों को लज्जित कर देगा, नई शिक्षाएँ स्थापित करेगा, और सारी रोमी कलीसिया का सुधार करेगा; क्योंकि वह भविष्यद्वक्ताओं * डी'ऑबिन्ये, "धर्मसुधार का इतिहास", खण्ड। और प्रेरितों के लेखों पर आधारित है, और परमेश्वर के वचन पर दृढ़ता से जमा हुआ है : इसका सफलतापूर्वक विरोध कोई नहीं कर सकता और न अन्त में इसे उलट सकता है, चाहे दर्शन से, चाहे कुतर्क से, चाहे अल्बर्टवाद, थॉमसवाद से, या प्रमाण-ग्रन्थों की सारी सेना से।"*
"जो लूथर में छिपे अनेक वरदानों और खज़ानों को विकसित करने में परमेश्वर का साधन था," … ने उस युवा भिक्षु की असाधारण वाक्पटुता, अपने श्रोताओं की भावनाओं पर उसके अधिकार, अपनी मातृभाषा के सशक्त मुहावरों और लालित्य से उसके सुन्दर परिचय, और उसकी वक्तृता की प्रबल ऊर्जा को देखकर, इस बात पर ज़ोर दिया कि वह ऑगस्टिनी भिक्षुओं के गाँव के छोटे गिरजाघर में नियमित रूप से प्रचार करे।
उस कार्य के महिमामय स्वरूप से गम्भीरता से प्रभावित होकर लूथर ने बहुत समय तक अपने संघ के विकार-जनरल के इस अनुरोध को मानने से इनकार किया।
"मंच पर चढ़ो और प्रचार करो," स्टाउपित्ज़ ने कहा।
"नहीं," उस विनम्र प्राध्यापक ने कहा, "परमेश्वर के स्थान पर मनुष्य से बोलना कोई हल्की बात नहीं है।"† "पन्द्रह तर्क, बहाने या टालमटोल," एक समकालीन बताता है,
"लूथर ने इस सेवा से अपने आप को बचाने के लिए ढूँढ़ निकाले।"
"आह, आदरणीय डॉक्टर," उसने गिड़गिड़ाकर कहा, "यह तो मेरी मृत्यु होगी।"
"तो क्या हुआ?" उत्तर मिला; "परमेश्वर के नाम में ऐसा ही हो।"‡
अन्ततः उसके कलीसियाई अधिकारी का हठ जीत गया, और वह अति-विनम्र भिक्षु प्रचार करने लगा।
* म्यूरर का "लूथर का जीवन"।
मिल्नर, मेमबूर, वारियास, द्यू पैं। † आदम का "संसार को हिला देनेवाले शब्द", पृ. 29।
