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दुविधा—पोप की चालें—निर्वाचक की दृढ़ता—लूथर को राजसभा के सामने उपस्थित होने का आदेश—लूथर वॉर्म्स के लिए निकल पड़ता है—उसके मित्रों का शोक—अशुभ पूर्वाभास—लाइपज़िग में लूथर—
एरफ़र्ट में—एक घटना—आइज़नाख में—माइन नदी के तट के फ़्रैंकफ़र्ट में—सावोनारोला का चित्र—लूथर ओपेनहाइम की ओर—फ़िफ़िंगहाइम में—"सुधारक का एल्म वृक्ष"—वॉर्म्स दिखाई देता है—लूथर का भजन—वॉर्म्स में लूथर—हलचल—राजसभा—निर्वाचक का और लूथर का "जर्मन कुलीनों से अपील"—राजसभा के सामने अपनी प्रस्तुति का लूथर का अपना वर्णन—विदा लेता है
वॉर्म्स से—वॉर्म्स में उसके आचरण पर टिप्पणियाँ—राजसभा के सामने लूथर का ऑदैं द्वारा खींचा गया चित्र। राजसभा के बाद—निर्वाचक—पोप का राजदूत—वॉर्म्स के महागिरजाघर में चार्ल्स पंचम—बहिष्कार का आदेश—कलीसिया और साम्राज्य के प्रतिबन्ध के अधीन—"त्रासदी का अन्त"—लूथर विटनबर्ग के मार्ग पर—उसकी सुरक्षा की योजनाएँ—लूथर सम्राट और राज्यों को पत्र लिखता है—दूत स्टुर्म को विदा करता है—"भिक्षु के चोगे में शैतान"—हर्शफ़ेल्ड में लूथर—आइज़नाख में—पकड़ लिया जाना—लूथर in libertate Christiana
वार्टबर्ग में लूथर—जर्मनी में उथल-पुथल—लूथर के बन्दीवास के पहले सप्ताह—मिलने आनेवाले—उदासी—लूथर का पत्र-व्यवहार—उसकी साहित्यिक सक्रियता—संघर्ष
माइन्ज़ का आर्चबिशप—पाप-क्षमा-पत्रों के व्यापारी फिर से काम पर—लूथर का क्रोध—"हाले की नई मूर्ति"—निर्वाचक के दरबार में घबराहट—स्पालाटिन का पत्र—लूथर का उत्तर—
आर्चबिशप को लूथर का पत्र—आर्चबिशप का उत्तर—फ़ैब्रिसियस कैपिटो—कैपिटो को लूथर का पत्र—पाप-अंगीकार की प्रथा—भिक्षुओं का ब्रह्मचर्य—लूथर की भूल—इस भूल का उसे बोध होना—सार्वजनिक घटनाएँ—सुधरी हुई कलीसिया द्वारा पोप-पक्षी कर्मकाण्डों को बनाए रखना—धर्मविधि में प्रस्तावित परिवर्तन—एरफ़र्ट का ऑगस्टिनी मठ—प्रतिनिधि—निर्वाचक—कार्लस्टाट की असावधानी—विस्फोट—लूथर की विटनबर्ग की संक्षिप्त यात्रा—
वार्टबर्ग लौटता है—"नए भविष्यद्वक्ता"—कट्टरता का उदय—मूर्ति-भंजक—कार्लस्टाट उनका अगुआ बनता है—लूथर की अत्यावश्यक सलाह अनसुनी—वार्टबर्ग छोड़कर खुले रूप से विटनबर्ग लौटने का निश्चय—एक प्रसंग—लूथर अपने किए की सूचना निर्वाचक को देता है—फ़्रेडरिक वार्टबर्ग लौट जाने की सलाह देता है—लूथर का इनकार—कारण—वह विटनबर्ग में फिर प्रवेश करता है—शान्ति फिर से स्थापित
लूथर नए नियम का अनुवाद पूरा करता है—1522 में उसका प्रकाशन—इससे धर्मसुधार को बड़ा लाभ—नए नियम का मूल्य—बिके हुए संस्करणों की विशाल संख्या—अनुवाद की शैली—लूथर पुराने
नियम का जर्मन भाषा में अनुवाद आरम्भ करता है—जर्मन बाइबल—जनता द्वारा उसका उत्साहपूर्ण स्वागत—रोमी संस्करण—लियो दशम की मृत्यु—रोमी व्यंग्य-रचनाएँ—पोप एड्रियन षष्ठ—नए परमधर्माध्यक्ष का अपशकुन भरा स्वागत—घटनाएँ—निर्वाचक को एड्रियन का पत्र—
न्यूरेमबर्ग की राजसभा—उसका निर्णय—सुधारकों का आनन्द—इंग्लैंड का हेनरी अष्टम लूथर पर आक्रमण करता है—विद्या का लोकतन्त्र—लूथर का भयानक उत्तर—हेनरी की खीझ—ड्यूक
जॉर्ज ऑफ़ सैक्सनी और निर्वाचक से गुहार—फ़्रेडरिक की अविचलता—इस भिड़ंत का परिणाम—एड्रियन षष्ठ की मृत्यु—क्लेमेंट सप्तम—धर्मसुधार का प्रसार—
रोम की सक्रियता—रेटिसबन का पोप-पक्षी संघ—सताव का युग—लूथर की भविष्यवाणी—कार्लस्टाट के साथ उसका विवाद—कार्लस्टाट की कट्टरता—ओर्लामुंडे में लूथर—कार्लस्टाट का निष्कासन—उसमें लूथर का हाथ—टिप्पणियाँ—
कार्लस्टाट का आगे का मार्ग—लूथर की उदासी—इरास्मस का आक्रमण—"डायट्राइब" (वाद-प्रबन्ध)—लूथर की वेदना—इरास्मस की भीरुता—लूथर के महाकाय परिश्रम—घटनाएँ—जन-शिक्षा पर लूथर—भाषाओं और साहित्य के अध्ययन के महत्व पर—लूथर का …—भिक्षु का वेश पहनना छोड़ देता है—केवल अपनी विद्वत् उपाधियों से जाना जाता है—निम्प्श का कॉन्वेंट—नौ भिक्षुणियाँ—कैथरीन वॉन बोरा—लूथर का विवाह—गहरी सनसनी—लूथर का पारिवारिक सुख
किसानों का युद्ध—भूदासों की दशा—आरम्भ में विद्रोहियों का अनोखा संयम—बारह धाराएँ—किसानों और सामन्तों के बीच मध्यस्थता के लिए लूथर को बुलाया जाना—
वह यह भूमिका स्वीकार करता है—किसानों के प्रति उसकी सहानुभूति—शासकों और विद्रोहियों के नाम उसका सम्बोधन—लूथर की राजनीतिज्ञता—उसकी सलाह व्यर्थ जाती है—किसानों का पागलपन—
विद्रोह कट्टरता में बदल जाता है—लूथर शासकों से रणभूमि में उतरने का आग्रह करता है—शासकों का एकत्र होना—फ्रैंकेनहाउज़ेन का युद्ध—विद्रोह का विनाशकारी अन्त—इस उपद्रव का लूथर के मन पर प्रभाव—निर्वाचक फ़्रेडरिक की मृत्यु—उसका चरित्र—नया निर्वाचक—संकट—लूथर का विश्वास—इरास्मस के "डायट्राइब" का लूथर द्वारा उत्तर—"De Servo Arbitrio" (दासत्व में बँधी इच्छा)—इस पुस्तिका का इरास्मस पर प्रभाव
लूथर का पारिवारिक स्वभाव—उसकी निर्धनता—एक सनक—"खरादी" के रूप में लूथर—माली के रूप में—उसकी प्रसन्नता—नन्हा जॉनी—महामारी—लूथर की दयालुता—उसकी बीमारी—उसके परिवार में वृद्धि—उसकी बेटी की मृत्यु—लूथर का शोक—जर्मन अतिथि-सत्कार—लूथर की "टेबल-टॉक" (भोजन-मेज़ की बातें)—विवाह—त्रिएकता—कलीसिया के आचार्य—मसीह-विरोधी—चित्रकला—विद्यालय—संगीत—छपाई—
प्रोटेस्टेंट शासकों के विरुद्ध रोमी संघ—तुर्कों के विरुद्ध लूथर की पुस्तिका—धर्मसुधार की सफलता—कैम्ब्रे की सन्धि—स्पायर की राजसभा—प्रोटेस्टेंट—मारबुर्ग सम्मेलन—लूथर और ज़्विंगली के बीच विवाद—उसका दुःखद अन्त—जर्मन धीरता—ऑग्सबर्ग की राजसभा—कोबर्ग में लूथर—ऑग्सबर्ग का विश्वास-अंगीकार—मेलांकथन—बायर विश्वास-अंगीकार पढ़कर सुनाता है—उसका प्रभाव—चार्ल्स द्वारा उसकी स्वीकृति का ढंग
कोबर्ग में लूथर के कार्य—मेलांकथन की भीरुता—लूथर की फटकार—पत्र—राजसभा की समाप्ति पर लूथर का उद्गार—सम्राट का पोप के नाम पत्र—श्माल्काल्ड में प्रोटेस्टेंटों की बैठकें—प्रोटेस्टेंट संघ—अभियोग—लूथर का उत्तर—ड्रेसडेन की बेनाम पुस्तिका—लूथर का लघु-ग्रन्थ—लूथर के पिता की मृत्यु—उस पर लूथर के पत्र—उसकी माता की मृत्यु—सार्वजनिक मामलों से लूथर के सम्बन्ध का अन्त—टिप्पणियाँ—लूथर प्रोटेस्टेंट सिद्धान्तों की व्याख्या में स्वयं को लगा देता है—धर्मसुधार का अनुशासन—रोमी और सुधरी हुई कलीसियाओं के बीच अन्तर—
लूथर की ऊर्जा—उसकी शारीरिक शक्ति का क्षीण होना—मृत्यु का पूर्वाभास—इरास्मस की मृत्यु—ड्यूक जॉर्ज ऑफ़ सैक्सनी की मृत्यु—लाइपज़िग में लूथर—लूथर की प्रिय बेटी मैग्डलेन की मृत्यु—इस आघात की गम्भीरता—रोम के साथ
मेल-मिलाप के सब प्रयासों में उसकी अरुचि—कारण—उसका पत्र-व्यवहार—ट्रेंट की महासभा—उसके विषय में लूथर की राय—उसकी पैनी बुद्धि—उसके मसीही प्रेम में वृद्धि—संस्कारवादियों के साथ उसके विवाद का समाधान—लूथर का घर से लगाव—उसकी उदारता—एक उदाहरण—लूथर के अंतरंग मित्र—उसकी मेज़ पर स्थान पाना बड़ा सम्मान माना जाता था—उसकी दुर्बलताओं में वृद्धि—एम्सडॉर्फ़ को पत्र—एक भविष्यवाणी—उसकी निरन्तर सक्रियता
मैन्सफ़ेल्ड के काउंटों के बीच झगड़ा—मध्यस्थ बनने के लिए लूथर को आइज़नाख बुलाया जाना—काउंट अल्बर्ट को उसका पत्र—आइज़नाख के लिए प्रस्थान—उसका आगमन—हार्दिक स्वागत—अपनी पत्नी को पत्र—काउंटों का मेल-मिलाप—आइज़नाख में लूथर की सक्रियता—
उसकी अन्तिम बीमारी—उसके मित्रों की घबराहट—उसकी पीड़ाएँ—उसकी सहृदयता—उसकी प्रार्थना—उसके अन्तिम शब्द—अन्तिम क्षण—विजयी मसीही मृत्यु—अन्त्येष्टि—मार्टिन लूथर के चरित्र का सारांश—उपसंहार
आर्किमिडीज़ ने कहा था, "मुझे संसार के बाहर एक बिन्दु दे दो, और मैं पृथ्वी को उसकी धुरियों से हिला दूँगा।"
डी'ऑबिन्ये ने ठीक ही कहा है कि मसीही धर्म ही यह बिन्दु है, "जो मनुष्य के हृदय को स्वार्थ और विषय-वासना की उसकी दोहरी धुरी से ऊपर उठाता है, और जो एक दिन सारे संसार को उसके बुरे मार्गों से फेर देगा, और उसे धार्मिकता की एक नई धुरी पर घुमाएगा।"*
कुछ लोग इधर-उधर दौड़ते हुए बड़ी उत्सुकता से मसीही धर्म के ईश्वरीय उद्गम का प्रमाण माँगते हैं।
पर्याप्त प्रमाण यह है—उसकी अविनाशिता।
अन्य सभी मत, जिन्होंने मनुष्यों की बुद्धि या हृदयों पर प्रभुत्व जमाया, अन्ततः या तो बाहरी बल के आगे या भीतरी सड़न के आगे झुक गए, और चूर-चूर होकर बिखर गए।
"वे राष्ट्रीय धर्म * डी'ऑबिन्ये, धर्मसुधार का इतिहास, खण्ड
जिनसे माता-पिता सन्तुष्ट थे, अब उनकी सन्तानों के लिए पर्याप्त सिद्ध नहीं हुए।
नई पीढ़ियाँ पुराने रूपों में सन्तोष के साथ विश्राम नहीं कर सकीं।
प्रत्येक जाति के देवता, जब रोम लाए गए, तो वहाँ उन्होंने अपनी देववाणियाँ खो दीं, जैसे स्वयं उन जातियों ने अपनी स्वतन्त्रता खो दी थी।
राजधानी में आमने-सामने लाए जाने पर उन्होंने एक-दूसरे को नष्ट कर दिया था, और उनका देवत्व लुप्त हो गया था।"*
इतिहास के धुँधले भोर से, जब कैम्बीसेस फ़ारस से उतरकर मिस्र पर गरजता हुआ चढ़ आया और उस पुराने पुरोहित-तन्त्र को अपने घोड़ों की टापों तले रौंद डाला जिसने पिरामिड बनाए और उन पर अभिलेख खुदवाए थे, उस भयानक उपज तक, "तर्क के धर्म" तक,
जिसके द्वारा फ़्रांसीसी क्रान्ति के अविश्वासी दार्शनिकों ने मसीही धर्म का स्थान लेना चाहा, वे सब मत जिनका आरम्भ मनुष्य की बुद्धि से, आम लोगों या याजकों की चतुराई से हुआ था, अन्ततः अपने ही पुराने छले हुए अनुयायियों के तिरस्कार-भरे शापों से उलट दिए गए हैं।
केवल मसीही धर्म ही हर परीक्षा में खरा उतरा है, उस "युगों की चट्टान" के समान अटल जिस पर वह स्थापित है।
वॉल्टेयर ने कहा था, "मैं यह सुनते-सुनते थक गया हूँ कि बारह मनुष्यों ने मसीही धर्म की स्थापना की।
मैं दिखा दूँगा कि उसे उलटने के लिए एक ही मनुष्य पर्याप्त है।"
परन्तु अविश्वास की वह चट्टान, जिससे यह घमण्डी विद्वान धर्म को कुचल देना चाहता था, परमेश्वर ने—जैसे यहूदी तालमूद की उस परम्परा में बाशान के राजा ओग के साथ हुआ—उसी के गले में लटका दी, और सदा के लिए वहीं जकड़ दी।
मसीही धर्म, उस क्षण से जब मसीह ने फ़िलिस्तीन के मैदानों में उसका प्रचार आरम्भ किया, विजयी * डी'ऑबिन्ये, धर्मसुधार का इतिहास, खण्ड। होकर अन्यजातियों के क्रोध, याजकों के षड्यन्त्र, सांसारिक महत्वाकांक्षा और पाण्डित्यपूर्ण कुतर्क के आक्रमणों का सामना करता आया है; और परमेश्वर ने उसे अपने को शुद्ध करने की पर्याप्त आन्तरिक शक्ति भी प्रदान की है, जब धर्माधिकारियों की लम्पटता और राजनीति की धूर्तता ने उसके मन्दिर को व्यभिचार का अड्डा या सर्राफ़ों का आश्रय बना देना चाहा।
मसीही धर्म का उद्देश्य इतने सीधे रूप से मनुष्य के स्वभाव का सुधार है कि उसके किसी भी सिद्धान्त को छिपाना, या उसकी स्वीकृति का बहाना करके बुद्धि के पूर्ण विकास और प्रयोग का विरोध करना, उसके रचयिता का विरोध करना और उसकी दया को व्यर्थ ठहराना है।
परन्तु सुसमाचार जैसी शुद्ध और उज्ज्वल व्यवस्था आत्मिक घमण्ड या धर्माधिकारियों की महत्वाकांक्षा को सहारा देने के लिए आवश्यक छल और युक्तियों के सर्वथा विपरीत है: इसलिए जब उसे ऐसे प्रयोजनों के लिए काम में लाया जाता है तो उस व्यवस्था में फेरबदल करना पड़ता है; और यह सुरक्षित रूप से हो सके, इसके लिए धर्म के नए और मूल रूप की तुलना को रोकने का हर प्रयत्न करना पड़ता है।
"रोमी परमधर्माध्यक्षों का प्रभुत्व अनेक युगों तक ऐसी सत्ता का एक स्मरणीय उदाहरण रहा जो पूर्णतः इन्हीं साधनों पर टिकी थी।
मसीही कलीसिया के सबसे प्राचीन प्रान्तों में से एक के बिशप होने के नाते वे आदर के पात्र थे, और उस अधिकार पर उनका न्यायसंगत दावा था जो मसीह ने अपने सब सेवकों को सौंपा है: परन्तु यह घमण्ड और विषयी महत्वाकांक्षा के प्रयोजनों के लिए पर्याप्त नहीं था; और जिसकी अनुमति सुसमाचार ने नहीं दी, उसे उन्हें धूर्त आविष्कारों के एक भारी-भरकम ढाँचे से सहारा देना पड़ा।
वे यहीं नहीं रुके; क्योंकि कोई भी आविष्कार जो सत्य या प्रकृति का उल्लंघन करता है, अधिक समय तक टिक नहीं सकता, यदि उसके विरुद्ध विद्यमान प्रमाण का यत्नपूर्वक पहले से ही प्रतिकार न किया जाए।
इसलिए सुसमाचार के प्रकाश को स्वतन्त्रतापूर्वक फैलने से रोकना, और बुद्धि पर—जब वह हड़पे हुए अधिकार की बाहरी चौकियों पर भी आक्रमण करने का साहस करे—प्रतिबन्ध लगा देना, यही रोम की प्रमुख नीति थी; और इसमें वह तब तक सफल रही जब तक उसने मानवजाति के लिए कोई और विकल्प न छोड़ा, सिवाय इसके कि वह सबसे कष्टदायक जुए के नीचे सदा कराहती रहे, या एक नए और पवित्र उत्साह के साथ बुद्धि के अधिकार और सुसमाचार की स्वतन्त्रता की घोषणा करे।"*
मसीह के जन्म के बाद मानवजाति के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण घटना सोलहवीं शताब्दी में हुआ वह महाकाय संघर्ष है, जो उन बुराइयों के सुधार के लिए हुआ जिन्होंने … को विकृत और कलंकित कर रखा था। सुधारकों की सफलता अत्यन्त कल्याणकारी परिणामों से भरी रही है।
उसने मानवजाति को एक शुद्ध सुसमाचार, खोज की भावना और बन्धनमुक्त होंठों की समृद्ध विरासत सौंपी है: मसीही जगत की राजनीति पर भी प्रभाव डालते हुए, उसने मसीही नागरिकता की अनेक सीमाएँ और कर्तव्य निर्धारित किए, और शासकों को सम्प्रभु सत्ता के सच्चे स्रोत और उपयोग सिखाए: उच्चतर सामाजिक नैतिकता की शिक्षा देकर, उसने एक दासवत, अज्ञानी और लम्पट जाति को, जो स्नानागारों और इत्रों में गली जा रही थी, मूर्खता और व्यभिचार में डूबी हुई थी, मनुष्यत्व और सम्मानपूर्ण जीवन के एक ऊँचे स्तर पर उठा दिया।
सभ्यता को, जिसकी प्रगति ज्ञान के प्रसार और न्यायपूर्ण नियमों की स्थापना पर निर्भर है, धर्मसुधार से—जिसने * स्टेबिंग, धर्मसुधार का इतिहास, खण्ड। विद्या के उन भण्डारों को खोल दिया जो तब तक मठों के एकान्त कक्षों में निरुपयोगी और फफूँद लगे पड़े थे—एक अद्भुत प्रेरणा मिली।
जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र न था जिस तक उसका प्रबल प्रभाव शीघ्र न पहुँचा हो और जिसे उसने ऊँचा न उठाया हो।
उसने धार्मिक बन्दीगृह के भारी द्वार खोल दिए, और आधुनिक बाबुल के भयावह रहस्यों को प्रकट कर दिया।
तब मसीही धर्म का नया जन्म हुआ: उस संक्रान्ति-युग के प्रति धर्म, विज्ञान, साहित्य और शिष्टता हृदय से ऋणी हैं।
"परमेश्वर, जो युगों तक अपने कार्य की तैयारी करता है, जब उसका समय आता है तो सबसे दुर्बल साधनों से उसे पूरा करता है।
सबसे छोटे साधनों से बड़े परिणाम उत्पन्न करना—यही परमेश्वर का नियम है।
यह नियम, जो प्रकृति में सर्वत्र लागू है, इतिहास में भी पाया जाता है।
परमेश्वर ने कलीसिया के सुधारकों को उसी वर्ग से चुना जिससे उसने प्रेरितों को लिया था।
उसने उन्हें उस निचले वर्ग में से चुना जो यद्यपि सबसे हीन नहीं, तौभी मध्यम वर्ग के स्तर तक नहीं पहुँचता।
इस प्रकार सब कुछ इसी उद्देश्य से था कि संसार पर प्रकट हो कि यह कार्य मनुष्य का नहीं, परमेश्वर का था।
ज़्विंगली आल्प्स के एक चरवाहे की झोंपड़ी से निकला; मेलांकथन, धर्मसुधार का धर्मविज्ञानी, एक शस्त्रकार की दुकान से; और लूथर एक निर्धन खनिक की कुटिया से।
एक दिन अपने मित्रों के साथ भोजन की मेज़ पर बैठे हुए, अपनी प्रिय अनोखी उपमाओं में से एक का प्रयोग करते हुए, लूथर ने कहा, "संसार ताश का एक विशाल और भव्य खेल है, जो सम्राटों, राजाओं और राजकुमारों से बना है।
पोप ने अनेक शताब्दियों तक हराया * डी'ऑबिन्ये, धर्मसुधार का इतिहास, खण्ड।
सम्राटों, राजाओं और राजकुमारों को।
वे उसके आगे झुक गए और गिर पड़े।
तब हमारा प्रभु परमेश्वर आया।
: उसने सबसे छोटा पत्ता," लूथर, "अपने लिए लिया, और उससे उसने पोप को—पृथ्वी के राजाओं के उस विजेता को—हरा दिया।
यह परमेश्वर का इक्का है।
'उसने बलवानों को उनके सिंहासनों से गिरा दिया, और दीनों को ऊँचा किया।'"* मार्टिन लूथर, धर्मसुधार का महान केन्द्रीय व्यक्तित्व, 10 नवम्बर,
1483 को† आइस्लेबेन में जन्मा, जो सैक्सनी का एक गाँव है, हार्ज़ पर्वतों के निकट स्थित, और उस समय … के काउंटों के अधीन था। अगले दिन, मंगलवार को, जो संत मार्टिन का दिन था, उसने परमेश्वर को अपने समर्पण की मुहर पाई, जिसकी स्मृति में उसके माता-पिता ने उसका नाम मार्टिन रखा।
अभी-अभी जन्मे और परमेश्वर की सेवा के लिए समर्पित इस बालक के पूर्वज किसान थे, जो थुरिंगिया के वनों के निकट मोरा गाँव में रहते थे।
मेलांकथन संकेत करता है कि लूथर परिवार प्राचीन और बड़ा था।‡
जिस मनुष्य को परमेश्वर ने नए युग के उस महान प्रवर्तक को पुत्र कहने का दुर्लभ सम्मान दिया, उसका नाम जॉन लूथर था, और वह परिवार का एक छोटा सदस्य था।
एक नाग- * लूथर की "टेबल टॉक" (भोजन-मेज़ की बातें)। † लूथर के शत्रुओं ने, जो ज्योतिष में विश्वास रखते थे, यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया कि वह 22 अक्टूबर को जन्मा था, जब—उनके कथनानुसार—ग्रहों का एक विशेष अशुभ योग था।
यह दावा किया गया कि ऐसी कुण्डली के साथ उसका विधर्मी और भ्रष्ट न बनना लगभग असम्भव था। ‡ Vetus familia est et late propagata mediocrium hominum.
मेलांकथन की "Vita Lutheri" (लूथर का जीवन)। -रिक की बेटी से, जो वुर्ज़बर्ग धर्मप्रान्त के नॉयश्टाट की थी—ग्रेटा लिन्डेमान—विवाह करके यह नवविवाहित जोड़ा थुरिंगिया के मैदानों को छोड़कर, घर और जीविका की खोज में उमंग और दृढ़ता के साथ बड़े संसार में निकल पड़ा।
अन्ततः उन्होंने आइस्लेबेन को अपना निवास-स्थान चुना।
यहाँ हार्ज़ पर्वतों की तलहटी में जॉन लूथर ने अपनी कुटिया बनाई; और व्यवसाय से खनिक होने के कारण, उसे पास की खानों में वह रोज़गार मिल गया जिसकी उसे इच्छा थी।
जॉन लूथर अपनी साधारण स्थिति और अपनी निर्धनता के होते हुए भी, जो इस समय अत्यन्त अधिक थी, एक बुद्धिमान मनुष्य और बड़ा पढ़ाकू था।
उन दिनों पुस्तकें दुर्लभ थीं; परन्तु यह खनिक उन्हें प्राप्त करने का कोई अवसर हाथ से न जाने देता था, और अपने अवकाश के समय का बड़ा भाग उन्हें पढ़ने में लगाता था।
वह सीधे और स्पष्टवादी चरित्र का मनुष्य था, तौभी इन गुणों के साथ उसमें ऐसी दृढ़ता भी मिली हुई थी जो हठ की सीमा तक पहुँचती थी।*
लूथर की माता के विषय में हमारे पास मेलांकथन की यह गवाही है कि उसमें वे सब सद्गुण थे जो एक कुलीन और … को शोभा देते हैं। पड़ोस की गृहिणियाँ उसे एक आदर्श के रूप में देखती थीं जिसका अनुकरण करने का उन्हें प्रयत्न करना चाहिए।†
यह कभी निश्चित रूप से ज्ञात नहीं हुआ कि इस योग्य दम्पति से कितनी सन्तानें उत्पन्न हुईं; परन्तु यह निश्चित है कि मार्टिन के अतिरिक्त कई और थीं, क्योंकि दो उस महामारी से मरीं जिसने यूरोप को उजाड़ दिया था
* डी'ऑबिन्ये, धर्मसुधार का इतिहास, खण्ड
1, पुस्तक II., पृ. 145. † मेलांकथन की "Vita Lutheri" (लूथर का जीवन)।
सोलहवीं शताब्दी के आरम्भ में, और एक, बेटी, का विवाह लिपिक रूहेल दे मैन्सफ़ेल्ड से हुआ, जिसका नाम लूथर के पत्र-व्यवहार में कभी-कभी आता है।*
मार्टिन अभी एक वर्ष का भी न हुआ था कि उसके माता-पिता मैन्सफ़ेल्ड की खानों की प्रसिद्धि से आकर्षित होकर आइस्लेबेन से पास के मैन्सफ़ेल्ड गाँव में चले गए।
लूथर ने स्वयं हमें बताया है कि उस समय उसके माता-पिता बहुत निर्धन थे।
वह आगे कहता है, "उन्होंने हमारे लिए अत्यन्त कठोर परिश्रम सहा।"
इस प्रकार यह छोटा बालक बचपन से ही परिश्रम और मितव्ययिता का अभ्यस्त हो गया।
परन्तु बड़े लूथर का अथक उत्साह और व्यापार-कुशलता उसे अधिक समय तक घोर दरिद्रता की गहराइयों में पड़े रहने न देती थी।
शीघ्र ही उसकी मितव्ययिता और सफलता ने उसे मैन्सफ़ेल्ड में धातु गलाने की दो भट्ठियाँ स्थापित करने के योग्य बना दिया।
उसकी ईमानदारी और नैतिक योग्यता को उसके नगरवासियों ने शीघ्र पहचान लिया, और उसे कई न्यायाधिकारी पदों पर नियुक्त किया।†
यद्यपि वह स्वयं वैसा मनुष्य न था जिसे सुसंस्कृत मन वाला कहा जाए, तौभी जॉन लूथर ने इतना ज्ञान प्राप्त कर लिया था कि वह उसके मूल्य से भली-भाँति परिचित था, और उसने आरम्भ में ही निश्चय कर लिया कि वह युवा
मार्टिन को अच्छी शिक्षा देगा, और यदि उसमें विद्या के प्रति रुचि दिखाई दे, तो उसे विद्वत् कार्यों के लिए तैयार करेगा।
जॉन लूथर ने, मैन्सफ़ेल्ड का पार्षद नियुक्त होने पर, अपने आधिकारिक पद का लाभ * ऑदैं, "Histoire de Luther" (लूथर का इतिहास)। † डी'ऑबिन्ये, धर्मसुधार का इतिहास, खण्ड।
उस संगति को प्राप्त करने में उठाया जो उसे प्रिय थी।
"विद्वान मनुष्यों के प्रति उसके मन में बड़ा आदर था, और वह प्रायः स्थान के पादरियों और शिक्षकों को अपनी मेज़ पर भोजन के लिए बुलाता था।
उसका घर उसके नगरवासियों की उन सामाजिक सभाओं का चित्र प्रस्तुत करता था, जो सोलहवीं शताब्दी के आरम्भ में जर्मनी के लिए सम्मान की बात थीं।
वह एक दर्पण था जिसमें वे अनेक छवियाँ प्रतिबिम्बित होती थीं जो उस समय के उथल-पुथल भरे रंगमंच पर एक के बाद एक आती थीं।
बालक ने उनसे लाभ उठाया।
निस्संदेह इन मनुष्यों को देखकर, जिन्हें उसके पिता के घर में इतना आदर दिया जाता था, नन्हे मार्टिन के हृदय में एक से अधिक बार यह महत्वाकांक्षी इच्छा जागी कि वह भी एक दिन शिक्षक या विद्वान बने।"*
उसके माता-पिता की कठोरता और गम्भीरता ने, उसके स्वभाव की आवेगपूर्ण विचार और अभिव्यक्ति की स्वाभाविक प्रवृत्ति पर अंकुश लगाकर, निस्संदेह
युवा लूथर पर … प्रभाव डाला।
उसे जीवन की गम्भीरता और वास्तविकता पर ध्यान देना सिखाया गया।
परन्तु यह निश्चित है कि पढ़ाई या कर्तव्य-पालन की प्रेरणा के रूप में शारीरिक दण्ड के अत्यधिक प्रयोग में उन्होंने बड़ी भूल की, क्योंकि इससे उन्हें अपनी उचित इच्छाओं का तत्पर पालन नहीं, बल्कि एक दबी-सहमी आत्मा की भयभीत सहमति ही मिली।
मार्टिन के माता-पिता उसके जीवन के आरम्भिक और सबसे संवेदनशील वर्षों में उसके प्रति बहुत कठोर थे—जानबूझकर नहीं, बल्कि केवल इसलिए कि उस युग की घरेलू रीति ही ऐसी बुरी थी।
बाद के जीवन में लूथर ने ये शब्द लिखे: "मेरे माता-पिता ने मेरे साथ कठोर व्यवहार किया, जिससे मैं बहुत डरपोक हो गया।
* डी'ऑबिन्ये, धर्मसुधार का इतिहास, खण्ड।
एक दिन चुराई हुई एक हेज़लनट के कारण मुझे इतनी कठोरता से दण्ड दिया कि खून निकल आया।
वे सचमुच सोचते थे कि वे ठीक कर रहे हैं; परन्तु वे स्वभाव को पहचान नहीं पाते थे, जो फिर भी यह जानने के लिए बहुत आवश्यक है कि दण्ड कब, कहाँ या कैसे दिया जाए।
दण्ड देना आवश्यक है; परन्तु छड़ी के पास सेब भी रखा जाना चाहिए।"* छह वर्ष की आयु में लूथर धाराप्रवाह पढ़-लिख सकता था।†
साथ ही अध्ययन के लिए बड़ी योग्यता और असाधारण वक्तृत्व-प्रतिभा दिखाने के कारण, उसके पिता ने निश्चय किया कि जब वह पर्याप्त आयु का हो जाए, तो उसे विश्वविद्यालय भेजा जाए, ताकि वह वहाँ विधि-शास्त्र के रहस्यों में दीक्षित हो, जो तब भी, जैसे आज, यश और उन्नति के प्रमुख मार्गों में से एक था।
इस बीच मार्टिन चौदह वर्ष की आयु तक मैन्सफ़ेल्ड के विद्यालय में पढ़ता रहा, और शिक्षक ने उसके साथ उससे कम कठोरता का व्यवहार न किया जितनी उसे अपने पिता के घर में मिलती थी।
उसके शिक्षक ने एक ही सुबह में उसे लगातार पन्द्रह बार कोड़े लगाए।
बाद में इस घटना का वर्णन करते हुए लूथर ने कहा, "हमें बच्चों को मारना अवश्य चाहिए, परन्तु साथ ही हमें उनसे प्रेम भी करना चाहिए।"‡
मैन्सफ़ेल्ड में उस समय की निचली पाठशालाओं में सिखाई जानेवाली साधारण प्रारम्भिक बातें—धर्मशिक्षा, प्रेरितों का विश्वास-वचन, कुछ भजन, प्रार्थना के रोमी सूत्र—सीख लेने और लैटिन व्याकरण में थोड़ा झाँक लेने के बाद, मार्टिन ने अपने पिता का आशी- * लूथर की रचनाएँ (Opp.), 22, पृ. 1785।
ऑदैं, Hist. de M. Luther (मार्टिन लूथर का इतिहास)।
‡ डी'ऑबिन्ये, धर्मसुधार का इतिहास, खण्ड।
