अध्याय 30 / 41

जनता से अपील

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परन्तु यद्यपि स्पष्ट था कि लूथर को सांसारिक वर्ग का, सामन्तों का और जनता के बड़े समूह का समर्थन प्राप्त था, फिर भी धार्मिक आकाश के हर कोने से उस पर निन्दाओं का मानो पूरा तूफ़ान टूट पड़ा।

कलीसिया के भीतर उसके पक्ष की दुर्बलता को लेकर उसे निरन्तर ताने दिए जाते थे।

उसने भविष्यद्वक्ता-जैसी गरिमा के साथ लिखा, "परन्तु कौन जानता है कि परमेश्वर ने ही मुझे इस आवश्यक काम को करने के लिए चुना और बुलाया न हो, और क्या इन बकवादियों को यह डर नहीं होना चाहिए कि मुझे तुच्छ जानकर वे स्वयं परमेश्वर को तुच्छ जानते हैं?

; नहीं, क्योंकि यहोवा मेरे साथ है।

… से प्रस्थान के समय मूसा अकेला था; राजा अहाब के राज्य में एलिय्याह अकेला था; यरूशलेम में यशायाह अकेला था; … में यहेजकेल अकेला था। परमेश्वर ने भविष्यद्वक्ता के रूप में कभी महायाजक को या किसी बड़े व्यक्ति को नहीं चुना; वरन् उसने दीन और तुच्छ जाने गए लोगों को चुना, एक बार तो चरवाहे आमोस को भी।

हर युग में संतों को अपने प्राणों को जोखिम में डालकर राजाओं, शासकों, पथभ्रष्ट याजकों और बुद्धिमानों को डाँटना पड़ा है।

"क्या नए नियम के अधीन भी ऐसा ही नहीं था?

अपने समय में एम्ब्रोस अकेला था; और ऑगस्टीन अपने साहसी हृदय के साथ अकेला ही रहा।

मैं यह नहीं कहता कि मैं भी भविष्यद्वक्ता हूँ; परन्तु मैं यह अवश्य कहता हूँ कि उन्हें ठीक इसी कारण डरना चाहिए कि मैं अकेला हूँ, जबकि अत्याचारी के पक्ष में संख्या, ऊँचा वर्ग, धन और उपहास करनेवाली विद्या है।

; परन्तु मैं शान्त खड़ा हूँ, क्योंकि मेरे साथ-साथ परमेश्वर का वचन है; और उनकी उस सारी घमण्ड भरी संख्या के होते हुए भी, यह—सब शक्तियों में सबसे बड़ी शक्ति—उनके साथ नहीं है।"*

"मुझे 'विधर्मी' और 'हुस-पन्थी' कहा जाता है।

मैं इन उपाधियों को गर्व से स्वीकार करता हूँ।

मैंने कहा है कि जॉन … के कुछ प्रस्ताव; कुछ नहीं, वरन् उसके सब के सब सिद्धान्त पूरी तरह मसीही हैं।

जॉन हुस को दोषी ठहराकर पोप ने सुसमाचार को दोषी ठहराया।

मैंने उस पवित्र शहीद से पाँच गुना अधिक किया है, फिर भी मुझे बहुत डर है कि मैंने पर्याप्त नहीं किया।

हुस ने केवल इतना कहा था कि दुष्ट पोप ईश्वरीय नियुक्ति से सर्वोच्च नहीं है; परन्तु यदि स्वयं पतरस भी आज रोम में बैठा होता, तो मैं इस बात से इनकार करता कि वह ईश्वरीय नियुक्ति से पोप है।"†

इस प्रकार लूथर के जीवन का यह महत्त्वपूर्ण अध्याय समाप्त हुआ; इस प्रकार वे जंजीरें, जो अब तक उसे पोप के सिंहासन से बाँधे हुए थीं, बिना किसी आशा के और सदा के लिए टूट गईं; इस प्रकार धर्मसुधार निश्चित रूप से बन्धनमुक्त हो गया—एक बलवन्त पुरुष के समान स्वतन्त्र होकर, जीतता हुआ और जीतने के लिए, अपनी दौड़ दौड़ने लगा।

जैसा मिशले ने सुन्दर ढंग से कहा है, यह सब सचमुच कुछ नया था।

इस युग तक, समय-समय पर उठनेवाले अधिकांश पन्थ, फूट और विधर्म गुप्त रूप से बने थे—आरम्भिक मसीहियों के समान, सर्वव्यापी रोम के तहख़ानों (कैटाकॉम्ब) में छिपकर, और यदि उनका अस्तित्व अज्ञात रहता तो वे बहुत ही प्रसन्न रहते।

परन्तु यहाँ एक साधारण भिक्षु अपने आप को उस भयानक सम्राट-समान शासक के बराबर रख रहा था, जिसके विषय में माना जाता था कि वह दोनों लोकों के स्वर्गीय द्वारों की कुंजियाँ रखता है, और अपने आप को * लूथर की रचनाएँ (L.) XVII., 338. † लूथर की रचनाएँ (L.) XVII., 339.

उस पोप के अब तक निर्विवाद कार्यों का न्यायी ठहरा रहा था।

इस प्रकार पुरानी परम्परा की जंजीर टूट गई, उसकी निरन्तरता नष्ट हो गई, बिना सीवन का वस्त्र फट गया।

न ही यह माना जा सकता है कि लूथर ने यह अन्तिम निर्णायक कदम बिना बड़ी पीड़ा के उठाया; यह अपने हृदय से उस अतीत की स्मृति को उखाड़ फेंकना था जिसका आदर करना उसे सिखाया गया था।

उसने रोमी सहभागिता से अलग होने से बचने के लिए लम्बे समय तक संघर्ष किया।

प्रेरितीय पीठ से दूर उठाया गया उसका हर कदम पूर्ण विवशता में उठाया गया था।

विफल और द्वेषपूर्ण याजकीय छल-कपट के विषैले आक्रमणों ने उसे अपना बचाव करने के लिए विवश किया।

बचाव के लिए निरन्तर चिन्तन और सिद्धान्तों तथा प्रमाणों की अत्यन्त गहरी जाँच आवश्यक थी।

चिन्तन और जाँच का अनिवार्य परिणाम था … की बचकानी और अविवेकपूर्ण दासता से मुक्ति। फिर भी अलगाव कड़वा था; और यद्यपि उसने पवित्रशास्त्र को थामे रखा, तौभी अन्ततः वह ऐसा पवित्रशास्त्र था जिसकी व्याख्या उस ढंग से भिन्न थी जैसी हज़ार वर्षों से होती आई थी।

उसके शत्रुओं ने यह बात बहुधा कही है; परन्तु उनमें से किसी ने इसे उतनी प्रभावशाली रीति से व्यक्त नहीं किया जितना उसने स्वयं किया।

नवम्बर, 1520, विटनबर्ग के ऑगस्टीनियनों को: "मैं दिन-प्रतिदिन अधिकाधिक अनुभव करता हूँ कि बचपन में मन में बैठ गए सन्देहों और संकोचों को त्यागना कितना कठिन है।

ओह, यद्यपि पवित्रशास्त्र मेरे पक्ष में था, तौभी अपने आप के सामने यह ठहराने में मुझे कितनी पीड़ा हुई कि मैं पोप के विरुद्ध अकेले खड़े होने का और उसे मसीह-विरोधी के रूप में प्रस्तुत करने का साहस करूँ।

मेरे हृदय ने कैसे-कैसे क्लेश नहीं सहे! कितनी ही बार मैंने कड़वाहट के साथ अपने आप से वह प्रश्न नहीं पूछा जो पोप-पक्षियों के होंठों पर इतना अधिक रहता था:

'क्या केवल तू ही बुद्धिमान है?

क्या बाक़ी सब लोग गलत हो सकते हैं?

और यदि अन्त में तू ही गलत निकला, और अपनी भूल में इतने सारे प्राणियों को उलझा रहा है, जो तब अनन्तकाल के लिए दण्डित होंगे, तो क्या होगा?'

इसी प्रकार मैं अपने आप से और शैतान से लड़ता रहा, जब तक कि मसीह ने अपने अचूक वचन के द्वारा मेरे हृदय को इन सन्देहों के विरुद्ध दृढ़ न कर दिया, यहाँ तक कि वह चट्टानों के तट के समान हो गया, जो उन लहरों को चुनौती देता है जो उससे व्यर्थ ही टकराती हैं।"*

अब लूथर धर्मसुधार के ऊँचे पठार पर दृढ़ता से जम चुका था।

मध्य युग की परम्परा के विरुद्ध, कलीसिया के अधिकार के विरुद्ध, उसने पवित्रशास्त्र में शरण ढूँढ़ी—जो परम्परा से पहले का और स्वयं कलीसिया से भी ऊपर है।

उसने सुसमाचार-लेखकों और पत्रियों पर अपना उपदेश-संग्रह (पोस्टिल) लिखा।

उसने भजन संहिता का अनुवाद किया; उसकी अथक लेखनी निरन्तर काम में लगी रहती थी।

उसने पाया कि युवा सम्राट चार्ल्स, जिसका अभी-अभी आख़न (एक्स-ला-शापेल) में राज्याभिषेक हुआ था, वैटिकन से इतनी निकटता से जुड़ गया था कि वह धर्मसुधार के पक्ष में किसी अपील को सुनने वाला नहीं था।

इसलिए सम्राट की सहायता पाने की आशा छोड़कर, उसने सीधे जर्मनी की देशभक्ति, सामान्य समझ और धार्मिक भावना से अपील की।

इस काम में नए विचारों के पक्ष में पुस्तक-विक्रेताओं और मुद्रकों द्वारा दिखाए गए उत्साह से उसे बड़ी सहायता मिली।

एक विरोधी समकालीन कहता है, "लूथर की पुस्तकें मुद्रक अत्यन्त सावधानी से छापते थे, बहुधा अपने ही ख़र्च पर, और उनकी बहुत बड़ी संख्या में प्रतियाँ छापी जाती थीं।

भूतपूर्व भिक्षुओं का एक पूरा दल था जो संसार में लौटकर … की रचनाएँ बेचकर जीविका चलाता था। दूसरी ओर, रोमी-पक्षी केवल पैसे के बल पर ही साम्राज्य में अपनी रचनाएँ छपवा पाते थे, और तब भी वे इतनी भूलों के साथ निकलती थीं कि वे अनपढ़ बर्बरों का काम लगती थीं।

यदि कोई मुद्रक, जो दूसरों से कुछ अधिक या कम विवेकी होता, किसी रोमी लेख के लिए कुछ भी परिश्रम करता, तो उसके सब साथी और सार्वजनिक गलियों में लोग उसे पोप-पक्षी और याजकों का दास कहकर सता-सताकर मार डालते थे।"*

निस्सन्देह कोक्लेयस के इन शब्दों को उनके पूरे अर्थ में संकोच के साथ ही ग्रहण करना चाहिए।

परन्तु यदि इस कथन में सत्य का थोड़ा-सा अंश भी हो, तो भी यह दिखाने के लिए पर्याप्त है कि सैक्सनी के उस डॉक्टर की पूरे जर्मन साम्राज्य पर कितनी ज़बरदस्त पकड़ थी।

यद्यपि लूथर पर अनेक दिशाओं से आक्रमण हुए, उसने अपने सब शत्रुओं को उपायों की अद्भुत प्रचुरता, स्पष्टता और बल के साथ, और साथ ही बुद्धि की बड़ी चमक और व्यंग्य की तीखी धार के साथ उत्तर दिया।

किसी भी मनुष्य के विषय में यह बात इससे अधिक सच्चाई से कभी नहीं कही गई कि वह अकेला ही एक पूरी सेना था।† जर्मन सामन्तों के श्रेय में यह कहना चाहिए कि नए धर्मविज्ञान के लिए नगरों का उत्साह चाहे कितना ही बड़ा था, फिर भी धर्मसुधारक की सेवा में वे ईमानदार नागरिकों से भी आगे बढ़ गए; और सचमुच लूथर को बहुधा उनके उतावले, जोशीले उत्साह को संयमित करना पड़ता था।

विटनबर्ग में यह जानने के लिए बड़ी उत्सुकता थी कि पोप के आज्ञापत्र (बुल) और लूथर के साहसी कार्य के विषय में फ़्रेडरिक का निर्णय क्या होगा।

जिस समय धर्मसुधार का यह "आउटो-दा-फे" (होलिका-दहन) हुआ, उस समय निर्वाचक अनुपस्थित था; वह आख़न (एक्स-ला-शापेल) में था, जहाँ उसने युवा स्पेनी राजा के सिर पर शार्लमेन का मुकुट रखने में भाग लिया था।*

वाइमार लौटने पर, धार्मिक क्षितिज के चौंका देनेवाले रूप से वह बहुत व्याकुल हुआ।

यह जानकर कि इरास्मस पड़ोस के कोलोन नगर में ठहरा हुआ है, उसने अपने उस पुराने मित्र को सन्देश भेजा कि वह उससे उसके निजी कक्षों में एकान्त में मिले।

बुलावे के आज्ञाकारी होकर इरास्मस तुरन्त निर्वाचक के दरबार में पहुँचा। उस प्रसिद्ध विद्वान से मिलते ही, फ़्रेडरिक ने स्पालाटिन† को छोड़ अपने सब सेवकों को विदा कर दिया, और फिर अचानक पूछा, "इस लूथर के विषय में आपका क्या विचार है?"

इरास्मस ने अपने हिचकिचाते और भीरु स्वभाव के अनुरूप अपने आप को किसी बात में बाँधने से बचने का प्रयत्न किया, और वही चुटकुला कहकर उत्तर दिया जो उसने उस समय कहा था जब

पाप-क्षमा-पत्रों पर लूथर के प्रस्ताव (थीसिस) पहली बार निचले देशों (नीदरलैंड) में उसके पास पहुँचे थे: "इस भिक्षु ने दो गम्भीर भूलें की हैं: उसने पोप के मुकुट पर और भिक्षुओं के पेटों पर आक्रमण किया है।"‡

परन्तु यद्यपि इस अनोखी चुटकी के विचित्रपन ने निर्वाचक को मुस्कराने पर विवश कर दिया, वह ऐसे उत्तर से टलने वाला नहीं था; अपने तीक्ष्ण नेत्र अपने प्रसिद्ध अतिथि के मुख पर गड़ाकर उसने गम्भीरता से कहा,

"मैं यह अधिक पसन्द करूँगा कि धरती फट जाए और मुझे निगल ले, बजाय इसके कि मैं झूठे सिद्धान्तों का पक्ष लेता पाया जाऊँ।

परन्तु यदि सत्य लूथर के पक्ष में है, तो मुझे चाहे कोई भी जोखिम उठाना पड़े, वह मुझे अपने सतानेवालों में नहीं गिनेगा।

न ही मैं अपने आप को इतने महत्त्वपूर्ण ‡ देखें अध्याय XIV., पृ. 171. विषय में न्याय करने के योग्य समझता हूँ; और इसी कारण मैं बुद्धिमान और विद्वान लोगों की राय जानना चाहता हूँ।"

इस बार इरास्मस ने स्वतन्त्रता से अपने मन की बात कहने का साहस पाया, और बड़ी गम्भीरता से उत्तर दिया, "कलीसिया की बुराइयों की आलोचना करने में लूथर सही है, क्योंकि कलीसिया का सुधार नितान्त आवश्यक है; इससे भी बढ़कर, मैं

लूथर के सिद्धान्त को मूल रूप से सत्य मानता हूँ; परन्तु उसमें नम्रता की कमी है।"

इसी आशय की कुछ और बातचीत के बाद इरास्मस चला गया; और अपने कमरे में पहुँचकर, अभूतपूर्व स्पष्टवादी साहस के एक क्षण में, वह बैठ गया और अभी-अभी समाप्त हुई भेंट का विस्तृत विवरण लिख डाला, जिसके साथ उसने अन्य बातों के अतिरिक्त ये सूत्र भी जोड़े, और पूरी पाण्डुलिपि स्पालाटिन को भेज दी:

"अत्याचार का प्रेम और विद्या से घृणा ही इन सब उपद्रवों का घिनौना स्रोत है।

"सबसे शुद्ध आचरण और सबसे पवित्र विश्वास वाले लोग ही लूथर से सबसे कम अप्रसन्न हैं।

"लूथर के विरुद्ध इस आज्ञापत्र की बर्बरता सब भले लोगों को अप्रसन्न करती है, क्योंकि यह सचमुच मसीह के एक नम्र प्रतिनिधि के योग्य नहीं है।

"इतने सारे विश्वविद्यालयों में से केवल दो विश्वविद्यालयों† ने लूथर को दोषी ठहराया है, और उन्होंने भी उसे किसी भूल का दोषी सिद्ध नहीं किया, और न ही वे अपने कारणों के विषय में आपस में सहमत हैं।

"लूथर का यह प्रस्ताव कि वह सार्वजनिक रूप से अपना बचाव करे, या अपना मामला निष्पक्ष न्यायियों के सामने रखे, विवेकी लोगों को पूरी तरह उचित लगता है। † कोलोन और लूवेन। "यह भिक्षु न पद चाहता है न लाभ, और इसलिए उस पर सन्देह करने का कारण कम है।"*

जब वह पत्र स्पालाटिन को भेज चुका, तो इरास्मस की भीरुता लौट आई, और उसने निर्वाचक के उस विश्वासपात्र से आग्रहपूर्वक विनती की कि वह उसे लौटा दे, और कारण यह बताया, "कहीं ऐसा न हो कि पोप का दूत उसकी बातों का बुरा उपयोग करे।"†

परन्तु उस डाँवाडोल डचमैन का बाद का मार्ग चाहे जो भी रहा हो, यह निश्चित है कि इस अवसर पर उसने जो कहा उसने लूथर और उसके अनुयायियों के प्रति निर्वाचक की अटल मित्रता को बहुत दृढ़ कर दिया—एक ऐसी मित्रता, जिसे पोप और सम्राट दोनों की खुली धमकियों के बावजूद उस दृढ़ सैक्सन शासक ने उसके बाद कभी डगमगाने या भयभीत होने नहीं दिया।‡

कहा गया है कि किस्से-कहानियाँ लोगों के वास्तविक निर्णय को इतिहास के पूरे-पूरे पन्नों के विवेचन से अधिक प्रकट करते हैं।

इस समय लूथर की दूर-दूर तक फैली ख्याति और उसके प्रति लोगों की सामान्य धारणा को दिखाने के लिए ये किस्से लीजिए।

अलेआंडर ने, जिसे लियो ने एक्क के सहायक के रूप में जर्मनी भेजा था, एक बार कहा, "इस लूथर को पैसे से नरम करना असम्भव है।

वह एक ऐसा पशु है जो न घूस की ओर देखता है न सम्मान की ओर; नहीं तो पोप के आदेश पर बहुत पहले ही साहूकारों के यहाँ उसे कई हज़ार चुका दिए गए होते।"‖

सैक्सनी के फ़्रेडरिक के साथ उसकी भेंट के कुछ ही समय बाद, कहा जाता है कि पोप के दूतों ने * लूथर की रचनाएँ, II.

‡ मेलांकथन का वृत्तान्त (ऐनल्स), फ़्रेडरिक बुद्धिमान पर विचार।

‖ सेकेनडॉर्फ़ में सेल्नेकर।

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