भजन संहिता पर टीका · खण्ड 1 · भजन 33

भजन 33

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भजन 33

भजन 33.

दाऊद, अथवा जो कोई भी इस भजन का रचयिता रहा हो, विश्वासियों को परमेश्वर की स्तुति के लिए उभारने के अभिप्राय से, अपनी युक्ति की नींव परमेश्वर के उस सामान्य विधान पर रखता है जिसके द्वारा वह सम्पूर्ण जगत को सँभाले रखता, उसकी रक्षा करता और उस पर शासन करता है। इसके पश्चात् वह अपनी चुनी हुई प्रजा के प्रति परमेश्वर की पितृतुल्य कृपा का गुणगान करता है, और साथ ही यह दिखाता है कि भक्तों का उसकी विशेष देखभाल के द्वारा पाला-पोसा जाना कितना आवश्यक है।

भजन 33:1-4

1. हे धर्मियो, यहोवा में आनन्दित हो; स्तुति करना सीधे लोगों को शोभा देता है। 2. वीणा पर यहोवा की स्तुति करो; सारंगी और दस तारवाले बाजे पर उसका भजन गाओ। 3. उसके लिए नया गीत गाओ; आनन्द के साथ ऊँचे स्वर से गाओ: 4. क्योंकि यहोवा का वचन सीधा है; और उसके सब काम सच्चाई में होते हैं। 671 "Ou, digne d'estre aimee par les," etc. — फ्रांसीसी हाशिया। "अथवा, उनके द्वारा प्रेम किए जाने के योग्य है।"

"Fideles, c'est, fermes et permanentes." — फ्रांसीसी हाशिया। "विश्वासयोग्य, अर्थात् दृढ़ और स्थायी।"

1. हे धर्मियो, यहोवा में आनन्दित हो। यहाँ प्रेरित लेखक विश्वासियों अथवा धर्मियों को नाम लेकर सम्बोधित करता है, क्योंकि केवल वे ही परमेश्वर की महिमा का प्रचार करने के योग्य हैं। अविश्वासी, जिन्होंने उसकी भलाई का स्वाद कभी नहीं चखा, हृदय से उसकी स्तुति नहीं कर सकते; और परमेश्वर को इसमें कोई प्रसन्नता नहीं कि उसका नाम उनकी अपवित्र जीभों से उच्चारित हो। परन्तु प्रसंग और भी स्पष्ट रूप से दिखाता है कि यह उपदेश केवल विश्वासियों ही के लिए क्यों उपयुक्त है। इसी कारण बहुत-से लोग उत्तरार्ध, स्तुति करना सीधे लोगों को शोभा देता है, की व्याख्या इस अर्थ में करते हैं कि यदि अधर्मी अथवा कपटी इस अभ्यास का प्रयत्न करें, तो वह परमेश्वर की स्तुति के बदले उसकी निन्दा और अनादर का कारण बन जाएगा; वरन् इससे भी बढ़कर, वे उसके पवित्र नाम को केवल अपवित्र ही करते हैं। इसमें सन्देह नहीं, और यह पूर्णतः सत्य है, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, कि परमेश्वर अनुग्रहपूर्ण लेपालकपन के द्वारा संसार में अपने लिए एक कलीसिया इसी स्पष्ट उद्देश्य से रचता है कि ऐसे कार्य के योग्य गवाहों के द्वारा उसके नाम की यथोचित स्तुति हो। परन्तु इस वाक्यांश, स्तुति करना सीधे लोगों को शोभा देता है, का वास्तविक अर्थ यह है कि कोई भी ऐसा अभ्यास नहीं जिसमें वे इससे बढ़कर लगाए जा सकें। और निश्चय ही, जब परमेश्वर अपने प्रतिदिन के उपकारों के द्वारा उन्हें अपनी महिमा का गुणगान करने के लिए ऐसी सामग्री प्रदान करता है, और जब उसकी असीम भलाई, जैसा हम अन्यत्र देख चुके हैं, उनके लिए एक विशेष निधि के रूप में संचित रखी गई है, तो उनका परमेश्वर की स्तुति में चुप रहना लज्जाजनक और सर्वथा अनुचित होगा। सारांश यह है कि धर्मियों को जिस प्रमुख अभ्यास में लगे रहना शोभा देता है, वह यह है कि वे मनुष्यों के बीच परमेश्वर के धर्म, भलाई और सामर्थ्य का प्रचार करें, जिनका ज्ञान उनके मनों में रोपा गया है। अन्य व्याख्याकारों का अनुसरण करते हुए मैंने इस वाक्यांश का अनुवाद "स्तुति करना शोभा देता है" किया है; परन्तु जिस शब्द का अनुवाद "शोभा देता है" किया गया है, उसका अनुवाद उचित रूप से "वांछनीय है" भी किया जा सकता है, यदि हम उसे इब्रानी शब्द אוה avah से व्युत्पन्न मानें, जिसका अर्थ है चाहना या अभिलाषा करना। और निश्चय ही, जब परमेश्वर विश्वासियों को इतनी मधुरता से अपनी ओर खींचता है, तो उचित है कि वे सम्पूर्ण हृदय से उसकी स्तुति का गुणगान करने में लगे रहें। यह भी ध्यान देने योग्य है कि जब भविष्यद्वक्ता पहले वाक्यांश में "धर्मी" उपाधि का प्रयोग करने के तुरन्त पश्चात् "सीधे लोग" शब्द जोड़ता है, जिनमें हृदय की भीतरी खराई सम्मिलित है, तो वह यह परिभाषित करता है कि सच्चा धर्म क्या है, अथवा वह किस बात में निहित है।

2. वीणा पर यहोवा की स्तुति करो। यह स्पष्ट है कि भजनकार यहाँ उस प्रबल और उत्कट भावना को व्यक्त करता है जो विश्वासयोग्य लोगों में परमेश्वर की स्तुति करते समय होनी चाहिए, जब वह इस प्रयोजन के लिए बाजों के प्रयोग की आज्ञा देता है। वह चाहता है कि विश्वासी ऐसी कोई बात न छोड़ें जो परमेश्वर की स्तुति गाने में मनुष्यों के मनों और भावनाओं को सजीव करने में सहायक हो। निःसन्देह, ठीक-ठीक कहें तो परमेश्वर के नाम का गुणगान केवल स्पष्ट उच्चारित वाणी ही से हो सकता है; तौभी दाऊद अकारण ही इसके साथ वे सहायक साधन नहीं जोड़ता जिनके द्वारा विश्वासी इस अभ्यास के लिए स्वयं को और अधिक उभारा करते थे; विशेषकर इस बात पर विचार करते हुए कि वह परमेश्वर की प्राचीन प्रजा से बात कर रहा था। तौभी यहाँ एक भेद पर ध्यान देना आवश्यक है, ताकि जो कुछ पूर्वकाल में यहूदियों को आज्ञा दी गई थी, उस सब को हम बिना विवेक के अपने ऊपर लागू न समझ लें। मुझे इसमें कोई सन्देह नहीं कि झाँझ बजाना, वीणा और सारंगी छेड़ना, और इस प्रकार का समस्त संगीत, जिसका भजनों में इतनी बार उल्लेख हुआ है, शिक्षा का एक अंग था; अर्थात् व्यवस्था की बालोचित शिक्षा का: मैं मन्दिर की नियत सेवा की बात कह रहा हूँ। क्योंकि आज भी, यदि विश्वासी बाजों के द्वारा स्वयं को प्रफुल्लित करना चाहें, तो मेरे विचार में उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि वे अपने आनन्द को परमेश्वर की स्तुति से अलग न करें। परन्तु जब वे अपनी पवित्र सभाओं में एकत्र होते हैं, तब परमेश्वर की स्तुति का गुणगान करने में बाजे उतने ही अनुपयुक्त होंगे जितना धूप जलाना, दीपक जलाना, और व्यवस्था की अन्य छायाओं को फिर से स्थापित करना। इसलिए पोपवादियों ने मूर्खतापूर्वक यह बात भी, बहुत-सी अन्य बातों के समान, यहूदियों से उधार ले ली है। जो लोग बाहरी आडम्बर के प्रेमी हैं, वे उस कोलाहल में आनन्द ले सकते हैं; परन्तु वह सरलता, जिसकी परमेश्वर प्रेरित के द्वारा हमसे अनुशंसा करता है, उसे कहीं अधिक प्रिय है। पौलुस हमें पवित्र लोगों की सार्वजनिक सभा में परमेश्वर को धन्य कहने की अनुमति केवल समझ में आनेवाली भाषा ही में देता है (1 कुरिन्थियों 14:16)। मनुष्य का स्वर, चाहे साधारण लोग उसे न भी समझें, निश्चय ही संगीत के सब निर्जीव बाजों से श्रेष्ठ है; तौभी हम देखते हैं कि अनजानी भाषा में बोलने के विषय में सन्त पौलुस क्या निर्णय देता है। तब हम उस राग-अलाप के विषय में क्या कहें, जो कानों को खोखली ध्वनि के सिवा और किसी बात से नहीं भरता? क्या कोई यह आपत्ति करता है कि संगीत मनुष्यों के मनों को जगाने और उनके हृदयों को प्रेरित करने में बहुत उपयोगी है? मैं इसे स्वीकार करता हूँ; परन्तु हमें सदा यह सावधानी रखनी चाहिए कि कोई ऐसी विकृति भीतर न घुस आए जो परमेश्वर की शुद्ध आराधना को भी अशुद्ध करे और मनुष्यों को अन्धविश्वास में भी उलझा दे। इसके अतिरिक्त, जब पवित्र आत्मा पौलुस के मुख से हमें इस संकट के विषय में स्पष्ट रूप से चेतावनी देता है, तो जितनी अनुमति वहाँ उसने हमें दी है उससे आगे बढ़ना, मुझे कहना ही पड़ता है, न केवल अविवेकपूर्ण उत्साह है, वरन् दुष्ट और टेढ़ा हठ है। "Et neant moins nous voyons ce que Sainct Paul en determine." — फ्रांसीसी.

3. उसके लिए नया गीत गाओ। क्योंकि भजनकार आगे चलकर परमेश्वर के सामर्थी कामों का, और विशेष रूप से कलीसिया की रक्षा का वर्णन करता है, इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं कि वह धर्मियों को नया, अर्थात् दुर्लभ और उत्तम गीत गाने का उपदेश देता है। विश्वासी जितनी अधिक निकटता और लगन से परमेश्वर के कामों पर विचार करते हैं, उतना ही अधिक वे उसकी स्तुति में परिश्रम करेंगे। इसलिए जिस गीत को गाने का वह उन्हें उपदेश देता है, वह कोई साधारण गीत नहीं, वरन् ऐसा गीत है जो विषय की भव्यता के अनुरूप हो। दूसरे वाक्यांश का भी यही अर्थ है, जिसमें वह उन्हें ऊँचे स्वर से गाने के लिए प्रेरित करता है। इसी अर्थ में मैं इब्रानी शब्द היתיב heytib को समझता हूँ, यद्यपि अन्य लोग इसे स्वरों के उचित संयोजन से सम्बन्धित मानते हैं।

4. क्योंकि यहोवा का वचन सीधा है। जैसा मैं अभी कह चुका हूँ, भजनकार पहले परमेश्वर के उस सामान्य विधान को प्रस्तुत करता है जिसके द्वारा वह सम्पूर्ण जगत पर शासन करता है; और वह हमें बताता है कि वह अपने कार्यों के सम्पूर्ण क्रम में अपनी सामर्थ्य को इस प्रकार प्रकट करता है कि हर स्थान पर अत्यन्त सिद्ध न्याय और सच्चाई चमकती है। कुछ लोग "वचन" और "काम" शब्दों को समानार्थी मानते हैं; परन्तु मेरे विचार में इनमें भेद है, और "वचन" का अर्थ वही है जो युक्ति या विधि का है, जबकि "काम" उसकी युक्ति के परिणाम या उसकी पूर्ति को सूचित करता है। मैं मानता हूँ कि यहाँ एक ही विषय भिन्न शब्दों में दोहराया गया है, जैसा कि अन्य स्थानों में भी होता है; परन्तु ऐसे दोहरावों में थोड़ा-सा अन्तर पाया जाएगा, ताकि एक ही बात विभिन्न रीतियों से व्यक्त की जा सके। जो कहा गया है उसका सारांश यह है कि परमेश्वर जो कुछ ठहराता और आज्ञा देता है, वह सीधा है; और जो कुछ वह वास्तविक कार्य में पूरा करता है, वह विश्वासयोग्य और सत्य है। इस बीच यह ध्यान देना चाहिए कि "वचन" शब्द को यहाँ सिद्धान्त के अर्थ में नहीं, वरन् उस रीति के अर्थ में समझना चाहिए जिससे परमेश्वर जगत पर शासन करता है।

भजन 33:5-9

5. वह धर्म और न्याय से प्रीति रखता है: पृथ्वी यहोवा की भलाई से भरपूर है। 6. यहोवा के वचन से आकाशमण्डल स्थापित हुआ; और उसके सारे गण उसके मुँह के आत्मा से। 7. उसने समुद्र के जल को मानो एक ढेर के समान इकट्ठा किया; उसने गहिरे सागरों को भण्डारों में रख छोड़ा है। 8. सारी पृथ्वी यहोवा से डरे; जगत के सब निवासी उसका भय मानें: 9. क्योंकि उसने कहा, और वह हो गया; उसने आज्ञा दी, और वह स्थिर हो गया।

5. वह धर्म और न्याय से प्रीति रखता है। यह पिछले पद की पुष्टि है, और हमें यह सूचित करती है कि परमेश्वर अपने स्वभाव ही से धर्म और न्याय से प्रेम करता है। अतः इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि टेढ़ी भावनाएँ उसे, मनुष्यों की रीति पर, बुरी युक्तियों की ओर नहीं खींच सकतीं। पहली दृष्टि में तो यह परमेश्वर की एक साधारण-सी और कम महत्त्व की प्रशंसा प्रतीत होती है, क्योंकि सब मानते हैं कि वह अपने सब कामों में धार्मिकता के अत्यन्त सिद्ध नियम का पालन करता है। तब कोई कह सकता है कि अभी-अभी नये गीत की चर्चा क्यों की गई, मानो वह किसी असाधारण विषय के सम्बन्ध में हो? हम उत्तर देते हैं: पहले तो इसलिए, कि यह अत्यन्त स्पष्ट है कि संसार का एक बड़ा भाग परमेश्वर के धर्म की ओर से कितनी दुष्टता से अपनी आँखें मूँद लेता है, क्योंकि वे या तो उसके विधान के असंख्य प्रमाणों की लापरवाही से अनदेखी करते हैं, या यह कल्पना करते हैं कि वे संयोग से घटित होते हैं। परन्तु प्रायः इससे भी बुरा एक दोष होता है; अर्थात् यह कि यदि हमारी इच्छाएँ पूरी न हों, तो हम तुरन्त परमेश्वर के धर्म के विरुद्ध कुड़कुड़ाने लगते हैं; और यद्यपि यह कहावत, "परमेश्वर सब कुछ धार्मिकता से करता है," हर मनुष्य के मुँह पर है, तौभी सौ में से कठिनता से एक भी इसे अपने हृदय में दृढ़ता से विश्वास करता है; अन्यथा, ज्यों ही यह सत्य कहा जाता कि "परमेश्वर को यही भाता है," त्यों ही हर मनुष्य आज्ञाकारिता से अपने आप को परमेश्वर की इच्छा के अधीन कर देता। अब, क्योंकि मनुष्य विपत्ति में अत्यन्त कठिनाई से इस बात तक पहुँचाए जाते हैं कि वे स्वीकार करें कि परमेश्वर न्यायी है, और समृद्धि में शीघ्र ही इस स्वीकृति से गिर जाते हैं, इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं कि भविष्यद्वक्ता, मनुष्यों को यह विश्वास दिलाने के लिए कि परमेश्वर एक सीधा शासक है, यह दृढ़ता से कहता है कि वह धर्म से प्रीति रखता है। अतः जिस किसी ने इस शिक्षा को भली-भाँति ग्रहण कर लिया है, वह जान ले कि उसने बहुत लाभ पाया है।

"C'est, le soufie, le vent." — टिप्पणी, फ्रांसीसी हाशिया। "अर्थात्, श्वास।"

अन्य लोग इसका यह अर्थ बताते हैं कि परमेश्वर मनुष्यों में धर्म से प्रीति रखता है। यह तो सत्य है; परन्तु यह पाठ के अर्थ से बहुत दूर है, क्योंकि यहाँ पवित्र आत्मा का उद्देश्य अधर्म के उस विष के विरोध में परमेश्वर की महिमा को स्थिर रखना है, जो बहुत-से हृदयों में गहराई से जमा हुआ है। पद के दूसरे वाक्यांश में भजनकार परमेश्वर की श्रेष्ठता के एक और पक्ष की प्रशंसा करता है, अर्थात् यह कि पृथ्वी उसकी भलाई से भरपूर है। परमेश्वर का धर्म उचित रूप से हमें उसकी स्तुति के लिए उभारना चाहिए, परन्तु उसकी भलाई एक और भी प्रबल प्रेरणा है; क्योंकि कोई मनुष्य उसकी उदारता और दया का जितना अधिक अनुभव करता है, उतनी ही अधिक दृढ़ता से वह उसकी आराधना के लिए प्रेरित होता है। इसके अतिरिक्त, यह चर्चा अब भी परमेश्वर के उन सब उपकारों के विषय में है जिन्हें वह सम्पूर्ण मानवजाति पर बिखेरता है। प्रेरित लेखक घोषणा करता है कि हम जहाँ कहीं अपनी आँखें फेरें, ये हमें मिलते हैं।

6. यहोवा के वचन से। हमें परमेश्वर के कामों पर और अधिक ध्यानपूर्वक विचार करने के लिए उभारने हेतु, वह स्वयं जगत की सृष्टि को हमारे सामने रखता है; क्योंकि जब तक परमेश्वर को जगत का सृष्टिकर्ता और रचयिता स्वीकार न किया जाए, तब तक कौन विश्वास करेगा कि वह मनुष्यों के कार्यों पर ध्यान देता है, और कि जगत की दशा उसकी बुद्धि और सामर्थ्य के द्वारा नियन्त्रित होती है? परन्तु जगत की सृष्टि सीधे परिणाम के रूप में हमें परमेश्वर के विधान की ओर ले जाती है। यह नहीं कि सब मनुष्य इतना ठीक तर्क करते हैं, अथवा इतनी खरी समझ से सम्पन्न हैं कि यह निष्कर्ष निकालें कि जगत आज के दिन उसी ईश्वरीय सामर्थ्य से सँभाला जा रहा है जो एक बार उसकी सृष्टि में प्रकट हुई थी: इसके विपरीत, अधिकांश लोग यह कल्पना करते हैं कि वह स्वर्ग में बैठा, पृथ्वी पर जो कुछ होता है उसका एक निष्क्रिय दर्शक मात्र है। परन्तु कोई भी मनुष्य सचमुच यह विश्वास नहीं करता कि जगत परमेश्वर के द्वारा सृजा गया, जब तक वह यह भी दृढ़ता से न माने कि वही उसे सँभाले और सुरक्षित रखे हुए है। इसलिए भविष्यद्वक्ता बुद्धिमानी और उचित रीति से हमें जगत के मूल आरम्भ तक वापस ले जाता है, ताकि प्रकृति के निरन्तर क्रम में परमेश्वर के विधान की निश्चितता को हमारे मनों में स्थिर कर दे। उपलक्षण अलंकार के द्वारा वह जगत की सम्पूर्ण रचना के लिए "आकाशमण्डल" शब्द का प्रयोग करता है, क्योंकि, जैसा मैं अन्यत्र कह चुका हूँ, आकाशमण्डल का दृश्य सृष्टि के अन्य सब भागों से बढ़कर हमें विस्मय से भर देता है। इसलिए वह तुरन्त जोड़ता है, और उसके सारे गण, और इस वाक्य-रचना से, पवित्रशास्त्र की सामान्य रीति के अनुसार, उसका अभिप्राय तारों और ग्रहों से है; क्योंकि यदि आकाशमण्डल इस शोभा से रहित होता, तो वह एक प्रकार से सूना होता। यह कहकर कि आकाशमण्डल परमेश्वर के वचन से सृजा गया, वह उसकी सामर्थ्य की बड़ी महिमा करता है, क्योंकि उसने केवल अपने संकेत मात्र से, किसी अन्य सहायता या साधन के बिना, और बिना अधिक समय या परिश्रम के, इतनी उत्तम और भव्य रचना की सृष्टि की। परन्तु यद्यपि भजनकार परमेश्वर के वचन और उसके मुँह की श्वास को सब बाहरी साधनों के, और परमेश्वर की ओर से कष्टदायक परिश्रम के हर विचार के विरोध में रखता है, तौभी हम इस खण्ड से सच्चाई और निश्चय के साथ यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि जगत परमेश्वर के अनन्त वचन, अर्थात् उसके एकलौते पुत्र, के द्वारा रचा गया। प्राचीन व्याख्याकारों ने बड़ी चतुराई से सबेलियसवादियों के विरुद्ध पवित्र आत्मा के अनन्त ईश्वरत्व के प्रमाण के रूप में इस खण्ड का प्रयोग किया है। परन्तु अन्य स्थानों से, विशेषकर यशायाह 11:4 से, यह प्रकट होता है कि मुँह की श्वास से वाणी के सिवा और कुछ अभिप्रेत नहीं। क्योंकि वहाँ मसीह के विषय में कहा गया है, "वह पृथ्वी को अपने वचन के सोंटे से मारेगा, और अपने फूँक के झोंके से दुष्ट को मिटा डालेगा।" जैसे वहाँ सामर्थी और प्रभावशाली वाणी को रूपक के रूप में उसके मुँह का सोंटा कहा गया है; वैसे ही ठीक उसके बाद के वाक्यांश में, एक अन्य प्रयोजन से, उसे उसके मुँह की श्वास कहा गया है, ताकि परमेश्वर की वाणी और मनुष्यों के मुँह से निकलनेवाली खोखली ध्वनियों के बीच जो अन्तर है, वह चिह्नित हो जाए। इसलिए पवित्र आत्मा के ईश्वरत्व को प्रमाणित करने में मैं सबेलियस के विरुद्ध इस पाठ पर बल देने का साहस नहीं करता। हमारे लिए इतना पर्याप्त समझा जाए कि परमेश्वर ने अपने वचन के द्वारा आकाशमण्डल को इस प्रकार रचा कि उससे मसीह का अनन्त ईश्वरत्व प्रमाणित होता है। यदि कोई यह आपत्ति करे कि यदि "वचन" और "श्वास" शब्द समानार्थी हों तो ये ईश्वरीय व्यक्ति भिन्न प्रकट न होंगे; तो मैं उत्तर देता हूँ कि "श्वास" शब्द का प्रयोग यहाँ उस साधारण अर्थ में नहीं हुआ जैसा अन्य स्थानों में, जहाँ स्पष्ट रूप से वचन और आत्मा के बीच भेद किया गया है; वरन् उसके मुँह की श्वास का प्रयोग लाक्षणिक रूप से स्वयं वाणी के उच्चारण के लिए हुआ है; मानो यह कहा गया हो, ज्यों ही परमेश्वर ने अपने मुँह की श्वास निकाली, अथवा जो कुछ वह कराना चाहता था उसे वचन से घोषित किया, त्यों ही आकाशमण्डल तुरन्त अस्तित्व में आ गया, और साथ ही तारों की अकल्पनीय संख्या और विविधता से सुसज्जित भी हो गया। यह तो सत्य है कि यह उपमा मनुष्यों से ली गई है; परन्तु पवित्रशास्त्र अन्य स्थानों में बार-बार यह सिखाता है कि जगत उसी अनन्त वचन के द्वारा सृजा गया, जो परमेश्वर का एकलौता पुत्र होकर, बाद में देह में प्रकट हुआ।

"Par son simple vouloir et commandement." — फ्रांसीसी. "केवल अपनी इच्छा और आज्ञा से।" "Sans aussi y employer beaucoup de temps ou travail." — फ्रांसीसी.

7. उसने समुद्र के जल को मानो एक ढेर के समान इकट्ठा किया। यहाँ भजनकार जगत के प्रत्येक भाग के विषय में जो कुछ कहा जा सकता था वह सब नहीं कहता, वरन् एक ही विभाग के अन्तर्गत शेष सब को सम्मिलित कर लेता है। तौभी वह एक विशिष्ट और उल्लेखनीय आश्चर्यकर्म का गुणगान करता है जिसे हम पृथ्वी के धरातल पर दृष्टि डालने से देखते हैं; अर्थात् यह कि परमेश्वर जल-तत्त्व को, जो तरल और अस्थिर है, एक ठोस ढेर के रूप में इकट्ठा करता है, और अपनी इच्छा के अनुसार उसे वैसा ही थामे रखता है। प्राकृतिक दार्शनिक मानते हैं, और अनुभव खुले रूप से घोषणा करता है, कि जल पृथ्वी से ऊँचा स्थान घेरे हुए है। तब यह कैसे है कि वह तरल और स्वभाव से बहने की प्रवृत्ति वाला होकर भी फैलकर पृथ्वी को ढाँप नहीं लेता, और यह कैसे है कि पृथ्वी, जो स्थिति में नीची है, सूखी बनी रहती है? इसमें हम निश्चय ही देखते हैं कि परमेश्वर ने, जो मानवजाति के कल्याण पर सदा ध्यान रखता है, जल को कुछ अदृश्य सीमाओं के भीतर घेर रखा है, और आज के दिन तक उसे बन्द किए हुए है; और भविष्यद्वक्ता सुन्दर रीति से घोषणा करता है कि वह परमेश्वर की आज्ञा से स्थिर खड़ा रहता है, मानो वह दृढ़ और ठोस पदार्थ का ढेर हो। और पवित्र आत्मा अकारण ही विभिन्न खण्डों में ईश्वरीय सामर्थ्य का यह प्रमाण प्रस्तुत नहीं करता, जैसे यिर्मयाह 5:22 और अय्यूब 38:8 में।

उत्पत्ति 1:9 में हम पढ़ते हैं, "फिर परमेश्वर ने कहा, आकाश के नीचे का जल एक स्थान में इकट्ठा हो जाए और सूखी भूमि दिखाई दे; और वैसा ही हो गया।" सम्भवतः भजनकार यहाँ उसी खण्ड की ओर संकेत करता है, क्योंकि 9वें पद में स्पष्ट रूप से उस शैली का अनुकरण है जिसमें उत्पत्ति के पहले अध्याय में परमेश्वर को सृष्टि का कार्य करते हुए वर्णित किया गया है।

पद के दूसरे भाग में वह उसी विचार को दोहराता हुआ प्रतीत होता है, परन्तु विस्तार के साथ। परमेश्वर न केवल जल के विशाल पुंज को समुद्रों में सीमित रखता है, वरन् एक रहस्यमय और अबोधगम्य सामर्थ्य के द्वारा उसे पृथ्वी के गर्भ ही में छिपाए भी रखता है। जो कोई तत्त्वों की आपस में तुलना करेगा, वह इसे प्रकृति के विपरीत समझेगा कि अथाह गहराइयाँ, अथवा जल की अपार खाइयाँ, जिनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति पृथ्वी को डुबा देने की ही है, उसके नीचे छिपी पड़ी रहें। इसलिए यह कि इतनी सारी खोखली नालियाँ और खाइयाँ पृथ्वी को हर क्षण निगल नहीं जातीं, ईश्वरीय सामर्थ्य का एक और भव्य प्रदर्शन है; क्योंकि यद्यपि कभी-कभी कुछ नगर और खेत धँस जाते हैं, तौभी पृथ्वी का शरीर अपने स्थान पर सुरक्षित बना रहता है।

8. सारी पृथ्वी यहोवा से डरे। भजनकार यह निष्कर्ष निकालता है कि इसका उचित कारण है कि सम्पूर्ण जगत श्रद्धापूर्वक परमेश्वर के शासन के अधीन हो जाए, जिसने उसे अस्तित्व दिया, और जो उसे सुरक्षित भी रखता है। यहोवा से डरने और उसका भय मानने का अर्थ बस यही है कि उसकी महान सामर्थ्य का आदर और श्रद्धा की जाए। उस परमेश्वर की उपस्थिति में न झुकना, जिससे हमें अस्तित्व मिला है और जिस पर हमारी दशा निर्भर है, घोर जड़ता का चिह्न है। भविष्यद्वक्ता इन दोनों बातों की ओर संकेत करता है, और दृढ़ता से कहता है कि ज्यों ही परमेश्वर ने कहा, जगत प्रकट हो गया, और कि वह उसकी आज्ञा से अस्तित्व में सँभला हुआ है; क्योंकि जगत का एक क्षण में सृजा जाना पर्याप्त न होता, यदि परमेश्वर की सामर्थ्य के द्वारा उसका अस्तित्व सँभाला न जाता। जगत की सृष्टि में उसने साधनों की कोई बड़ी व्यवस्था काम में नहीं ली, वरन् अपने वचन की अकल्पनीय सामर्थ्य को प्रमाणित करने के लिए उसने यह ठहराया कि ज्यों ही वह मानो वचन का उच्चारण करे, त्यों ही वह बात पूरी हो जाए। इसलिए "आज्ञा" शब्द उस बात की पुष्टि करता है जो मैंने पहले कही थी, कि उसकी वाणी एक संकेत अथवा इच्छा के सिवा और कुछ नहीं थी, और कि बोलने का अर्थ वही है जो आज्ञा देने का। तौभी यह समझना उचित है कि इस संकेत अथवा आज्ञा में परमेश्वर की अनन्त बुद्धि ने स्वयं को प्रकट किया। "Il a commande que si tost qu'il auroit comme prononce le mot, la chose aussi se trouvast faire." — फ्रांसीसी.

भजन 33:10-12

10. यहोवा जातियों की युक्ति को तितर-बितर करता है, और देश देश के लोगों की कल्पनाओं को निष्फल कर देता है। 11. यहोवा की युक्ति सदा स्थिर रहेगी, और उसके मन की कल्पनाएँ पीढ़ी से पीढ़ी तक। 12. क्या ही धन्य है वह प्रजा जिसका परमेश्वर यहोवा है, वह प्रजा जिसे उसने अपना निज भाग होने के लिए चुन लिया है। सप्तति अनुवाद (Septuagint) यहाँ एक वाक्य जोड़ता है जो इब्रानी में नहीं है, अर्थात् "Καὶἀθετεῖ βουλὰς ἀρχόντων" — "और हाकिमों की युक्तियों को निष्फल करता है।" वल्गेट, अरबी और इथियोपियाई अनुवाद, सप्तति अनुवाद की नकल करते हुए, यही अतिरिक्त वाक्य रखते हैं। परन्तु यह कसदी और सुरियानी अनुवादों में नहीं है, जो हमारी इब्रानी बाइबलों से मेल खाते हैं; और इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि यूनानी अनुवाद के अनुवादकों ने इसे भावानुवाद के रूप में जोड़ा है; यह एक ऐसी स्वतन्त्रता है जिसका प्रयोग हम उन्हें अन्य स्थानों में भी करते पाते हैं।

10. यहोवा जातियों की युक्ति को तितर-बितर करता है। जगत की सृष्टि को संक्षेप में छूने के पश्चात् भजनकार अपने पहले विषय पर लौट आता है, अर्थात् यह दिखाने के लिए कि जो घटनाएँ प्रतिदिन घटित होती हैं, वे परमेश्वर के विधान के निःसन्देह प्रमाण हैं। और इसलिए कि कोई मनुष्य इस बात से चकित न हो कि वह परमेश्वर को मनुष्यों के विरोधी के रूप में प्रस्तुत करता है, जो उनकी युक्तियों को स्थिर करने और उन्हें सुखद परिणाम तक पहुँचाने के बदले उन्हें तितर-बितर करता है, वह एक ऐसा उदाहरण चुनता है जिसमें पवित्र लोगों को सान्त्वना देने की सबसे बड़ी शक्ति थी। हम जानते हैं कि मनुष्य सब व्यवस्था और न्याय के विरुद्ध निरन्तर कितनी बातों का दुस्साहस और षड्यन्त्र करते हैं, और किस प्रकार वे अपनी युक्तियों से जगत को उलट-पुलट कर देने का प्रयत्न करते हैं, ताकि वे अत्याचारपूर्वक ऐसा अधिकार प्राप्त कर लें जिससे भले और सीधे-सादे लोगों को पाँवों तले रौंद सकें। तब यदि ऐसी नाना प्रकार की दुष्ट भावनाओं से भरे मनुष्यों को हमारे प्रति निरंकुश स्वेच्छाचार से व्यवहार करने दिया जाता, तो हमसे अधिक दुखी प्राणी और कौन होते? परन्तु जब परमेश्वर स्वर्ग से हमें यह घोषित करता है कि उनकी युक्तियों को चूर-चूर करना और उनके निश्चयों को निष्फल करना उसी का काम है, तो कोई कारण नहीं कि हम अपने आप को शान्त न रखें, उस समय भी जब वे अत्यन्त कोलाहल के साथ उठ खड़े होते हैं। इसलिए परमेश्वर के विषय में यह कहा गया है कि वह मनुष्यों की युक्तियों को उलट देता है, इसलिए नहीं कि उन्हें विफल करने में उसे जान-बूझकर आनन्द मिलता है, वरन् उनके स्वेच्छाचार को रोकने के लिए; क्योंकि यदि वे अपनी इच्छाओं के अनुसार सफल हो जाते, तो वे तुरन्त सब कुछ अव्यवस्था में डाल देते: हाँ, क्योंकि न्याय का अपमान करने में, और सीधे और निर्दोष लोगों को सताने में, वे स्वयं परमेश्वर से लड़ने से नहीं चूकते, इसलिए यह विचार करना अत्यन्त आवश्यक है कि परमेश्वर की सामर्थ्य और रक्षा उनके क्रोधोन्माद के विरोध में खड़ी की गई है। और क्योंकि मनुष्यों का बहुत बड़ा भाग, सारी मर्यादा को तुच्छ जानकर, अन्धाधुन्ध स्वेच्छाचार में सिर के बल दौड़ पड़ता है, इसलिए भविष्यद्वक्ता न केवल व्यक्तिगत मनुष्यों की, वरन् सम्पूर्ण जातियों की बात करता है; दूसरे शब्दों में, वह दृढ़ता से कहता है कि मनुष्य आपस में चाहे जितना भी षड्यन्त्र करें, और बड़ी-बड़ी सेनाओं के साथ यह या वह करने का निश्चय करें, तौभी उनके अभिप्राय निष्फल किए जाएँगे, क्योंकि यह मानो

इब्रानी: पीढ़ी से पीढ़ी तक।

परमेश्वर के लिए भीड़ की भीड़ को तितर-बितर करना उतना ही सहज है जितना थोड़े से लोगों को रोक रखना। परन्तु यद्यपि इस स्थान पर परमेश्वर का अभिप्राय यह है कि वह दुष्टों की ढिठाई के विरुद्ध हमें उत्तम आशा से दृढ़ करे, तौभी साथ ही वह हमें चेतावनी देता है कि हम उसकी आज्ञा और मार्गदर्शन के बिना कोई भी काम आरम्भ न करें।

11. यहोवा की युक्ति। भविष्यद्वक्ता परमेश्वर की असीम सामर्थ्य की प्रशंसा इस रीति से करता है कि उसकी महानता में हमारे विश्वास को उन्नत करे; क्योंकि वह यहाँ परमेश्वर की किसी ऐसी युक्ति की सराहना नहीं करता जो स्वर्ग में छिपी हुई है, और जिसका वह चाहता हो कि हम दूर ही से आदर और भय मानें। परन्तु जैसे प्रभु पवित्रशास्त्र में सर्वत्र यह साक्षी देता है कि वह धार्मिकता और सच्चाई से प्रेम रखता है; कि वह धर्मियों और भले लोगों की चिन्ता करता है; और कि जब उसके दास अन्याय से सताए जाते हैं तब वह उनकी सहायता करने को सदा तत्पर रहता है; — वैसे ही भविष्यद्वक्ता का आशय यह है कि यह सब निश्चित और अटल बना रहेगा। इस प्रकार वह घोषित करता है कि परमेश्वर किस उद्देश्य से जाति-जाति की युक्तियों को निष्फल कर देता है, अर्थात् इसलिए कि वे बिना किसी विवेक के सारी व्यवस्था को भंग करने में अन्धाधुन्ध दौड़ पड़ती हैं।

इसलिए पहले तो हम यह सीखें कि परमेश्वर की युक्ति को उसके वचन के दर्पण में देखें; और जब हम अपने आप को इस बात से सन्तुष्ट कर लें कि उसने ऐसी किसी बात की प्रतिज्ञा नहीं की जिसे पूरा करने का उसने निश्चय न किया हो, तो हम तुरन्त उस स्थिरता का स्मरण करें जिसकी चर्चा भविष्यद्वक्ता यहाँ करता है। और क्योंकि बहुत सी, वरन् कभी-कभी सारी की सारी, जातियाँ अनगिनत बाधाओं के द्वारा उसके मार्ग को रोकने का यत्न करती हैं, इसलिए हम पिछली घोषणा को भी स्मरण रखें, कि जब मनुष्य बहुत सी युक्तियाँ गढ़ लेते हैं, तब उन्हें निष्फल करना परमेश्वर के सामर्थ्य में है, और प्रायः उसकी इच्छा भी। निस्सन्देह पवित्र आत्मा का अभिप्राय यह था कि हमारा विश्वास इसी व्यावहारिक ज्ञान में अभ्यास पाए; अन्यथा जो कुछ वह यहाँ परमेश्वर की युक्ति के विषय में कहता है, वह ठण्डा और निष्फल ही होता। परन्तु जब हम एक बार अपने मन में यह निश्चय कर लेंगे कि परमेश्वर अपने उन दासों की रक्षा करेगा जो उसके नाम को पुकारते हैं, और उन्हें सब संकटों से छुड़ाएगा; तब दुष्ट उनके विरुद्ध चाहे जो भी अनर्थ रचें, उनके प्रयत्न और उपाय हमें किसी प्रकार भयभीत न करेंगे, क्योंकि ज्यों ही परमेश्वर उनकी युक्तियों के विरोध में खड़ा होता है, त्यों ही उनकी कोई भी चतुराई उसकी युक्ति को विफल न कर सकेगी।

12. क्या ही धन्य है वह जाति जिसका परमेश्वर यहोवा है। यह पद पिछले पद से भली-भाँति मेल खाता है, क्योंकि परमेश्वर की युक्ति की स्थिरता के विषय में जो कहा गया है उस पर ध्यान देने से हमें बहुत थोड़ा लाभ होगा, यदि वह युक्ति हमसे सम्बन्ध न रखती हो। इसलिए भविष्यद्वक्ता, यह घोषणा करते हुए कि वे धन्य हैं जिन्हें परमेश्वर अपनी रक्षा में ले लेता है, हमें स्मरण दिलाता है कि जिस युक्ति का उसने अभी उल्लेख किया था, वह कोई ऐसा भेद नहीं जो सदा परमेश्वर में छिपा रहता है, वरन् कलीसिया के अस्तित्व और संरक्षण में प्रकट होती है, और वहाँ देखी जा सकती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि परमेश्वर को जगत का शासक ठीक रीति से वे नहीं मानते जो उसकी सामर्थ्य के विषय में ठण्डे मन से कल्पनाएँ करते रहते हैं, परन्तु केवल वे मानते हैं जो उसे अपने वर्तमान लाभ के लिए अपने ऊपर लागू करते हैं। इसके अतिरिक्त, जब भजनकार हमारी सारी धन्यता इसी बात में रखता है कि यहोवा हमारा परमेश्वर है, तब हमारे प्रति ईश्वरीय प्रेम के सोते को छूते हुए वह एक ही शब्द में वह सब कुछ समेट लेता है जिसकी जीवन को सुखी बनाने के लिए प्रायः इच्छा की जाती है। क्योंकि जब परमेश्वर हमारे उद्धार का भार अपने ऊपर लेने, हमें अपने पंखों के तले पालने, हमारी आवश्यकताओं को पूरा करने, और हमारे सब संकटों में हमारी सहायता करने के लिए नीचे झुकता है, तो यह सब उसके द्वारा हमारे लेपालक बनाए जाने पर निर्भर है। परन्तु कहीं ऐसा न समझा जाए कि मनुष्य इतनी बड़ी भलाई अपने ही प्रयत्नों और परिश्रम से प्राप्त करते हैं, दाऊद हमें स्पष्ट रूप से सिखाता है कि हमारा परमेश्वर की प्रजा गिना जाना परमेश्वर के अनुग्रहपूर्ण चुनाव करनेवाले प्रेम के सोते से निकलता है। यह सच है कि आदम के व्यक्तित्व में मनुष्य आरम्भ में इसी उद्देश्य से सृजे गए थे कि वे परमेश्वर के पुत्र हों; परन्तु पाप के पीछे आई विमुखता ने हमें उस बड़ी आशीष से वंचित कर दिया। इसलिए जब तक परमेश्वर हमें सेंत-मेंत लेपालक न बना ले, तब तक हम सब स्वभाव से अभागे हैं, और सुख में प्रवेश करने या उसे पाने का हमारे पास इसके सिवा और कोई द्वार या साधन नहीं, कि परमेश्वर अपनी ही सुइच्छा से हमें, जो सर्वथा अयोग्य हैं, चुन ले। अतः यह प्रकट होता है कि वे इस खण्ड को कितनी मूर्खता से बिगाड़ते हैं, जो भविष्यद्वक्ता द्वारा परमेश्वर को दी गई बात को मनुष्यों पर लगा देते हैं, मानो मनुष्य परमेश्वर को अपना निज भाग चुनते हों। मैं मानता हूँ कि विश्वास ही के द्वारा हम सच्चे परमेश्वर को मूरतों से अलग पहचानते हैं; परन्तु यह सिद्धान्त सदा दृढ़ता से थामे रहना चाहिए, कि जब तक वह अपने अनुग्रह से हमसे पहले आगे न बढ़े, तब तक उसमें हमारा कोई भाग नहीं।

भजन 33:13-17

13. यहोवा ने स्वर्ग से दृष्टि की; उसने आदम की सन्तान को देखा। 14. अपने सिंहासन के निवासस्थान से उसने पृथ्वी के सब रहनेवालों पर दृष्टि की। 15. वही जिसने उन सबके हृदयों को एक साथ गढ़ा, जो उनके सब कामों को समझता है। 16. कोई राजा अपनी सेना की बहुतायत के कारण नहीं बचता, और न कोई वीर अपने बल की अधिकाई के कारण छूटता है। 17. उद्धार के लिए घोड़ा एक धोखे की वस्तु है, और वह अपने बल की अधिकाई से छुड़ा न सकेगा।

13. यहोवा ने स्वर्ग से दृष्टि की। भजनकार अब भी उसी शिक्षा को आगे बढ़ाता है, अर्थात् यह कि मनुष्यों के कार्य संयोगवश इधर-उधर उछाले नहीं जाते, परन्तु जो कुछ हम होते देखते हैं, उस सबका परमेश्वर गुप्त रूप से मार्गदर्शन और संचालन करता है। अब वह यहाँ सब वस्तुओं पर परमेश्वर की निगरानी की सराहना करता है, ताकि हम अपनी ओर से उसके अदृश्य विधान को विश्वास की आँख से देखना और उस पर मनन करना सीखें। निस्सन्देह इसके स्पष्ट प्रमाण निरन्तर हमारी आँखों के सामने रहते हैं; तौभी अधिकांश मनुष्य उनमें से कुछ भी नहीं देखते, और अपने अन्धेपन में कल्पना करते हैं कि सब वस्तुएँ अन्धे भाग्य के संचालन में हैं। वरन् जितनी अधिक बहुतायत और भरपूरी से वह अपनी भलाई हम पर उण्डेलता है, उतना ही कम हम अपने विचारों को उसकी ओर उठाते हैं, और उलटे उन्हें उन बाहरी परिस्थितियों पर अटल रूप से जमा देते हैं जो हमें घेरे रहती हैं। भविष्यद्वक्ता यहाँ इस नीच आचरण को डाँटता है, क्योंकि परमेश्वर का इससे बड़ा अपमान नहीं किया जा सकता कि उसे स्वर्ग में निकम्मेपन की दशा में बन्द कर दिया जाए। यह ऐसा ही है मानो वह किसी कब्र में गड़ा पड़ा हो। यदि परमेश्वर न तो कुछ देखता और न किसी बात की चिन्ता करता, तो परमेश्वर का जीवन कैसा जीवन होता? सिंहासन शब्द के द्वारा भी पवित्र लेखक, उसमें निहित अर्थ से, यह दिखाता है कि परमेश्वर को विचार और समझ से रहित ठहराना कैसी बेतुकी मूढ़ता है। इस शब्द से वह हमें यह समझाता है कि स्वर्ग कोई ऐसा महल नहीं जिसमें परमेश्वर निठल्ला रहकर भोग-विलास में मग्न रहता हो, जैसा एपिक्यूरी लोग स्वप्न देखते हैं, वरन् एक राजदरबार है, जहाँ से वह जगत के सब भागों पर अपना शासन चलाता है। अतः यदि उसने विश्व पर शासन करने के लिए स्वर्ग के पवित्रस्थान में अपना सिंहासन स्थापित किया है, तो इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि वह पृथ्वी के कार्यों की किसी प्रकार उपेक्षा नहीं करता, वरन् परम तर्क और बुद्धि से उन पर शासन करता है। [680 "C'est, sans en excepter un." — टिप्पणी, फ्रांसीसी हाशिया। "अर्थात्, एक को भी छोड़े बिना।"]

"Hebrews est mensonge a salut." — फ्रांसीसी हाशिया। "इब्रानी: उद्धार के लिए झूठ है।"

15. वही जिसने उन सबके हृदयों को एक साथ गढ़ा। ऐसा प्रतीत होता है कि यह इसी स्पष्ट उद्देश्य से जोड़ा गया है कि विश्वासियों को निश्चित रूप से यह भरोसा दिलाया जाए कि दुष्ट चाहे कितनी ही चतुराई, छल और गुप्त षड्यन्त्रों के द्वारा परमेश्वर की दृष्टि से अपने आप को हटाने और गुफाओं में छिपने का यत्न करें, तौभी उसकी आँखें उनके अन्धकारमय छिपने के स्थानों में भी पैठ जाएँगी। और भजनकार स्वयं सृष्टि से यह तर्क देता है कि परमेश्वर मनुष्यों की युक्तियों और कामों का लेखा और न्याय किए बिना रह ही नहीं सकता; क्योंकि यद्यपि हर मनुष्य अपने हृदय में उलझे हुए गुप्त कोने छिपाए रहता है, यहाँ तक कि इस विषय में भिन्न-भिन्न मनों में अद्भुत विविधता पाई जाती है, और यह बड़ी विविधता अत्यन्त उलझा देनेवाला अन्धकार उत्पन्न करती है; तौभी परमेश्वर की आँखें चकाचौंध या धुँधली नहीं की जा सकतीं, कि वह योग्य न्यायी न रहे और अपनी ही कृति की सुधि न ले सके। इसलिए एक साथ क्रियाविशेषण से उसका आशय यह नहीं कि मनुष्यों के हृदय समय के एक ही क्षण में बनाए गए; परन्तु यह कि वे सब के सब, एक-एक करके, बिना किसी अपवाद के गढ़े गए; इसलिए वे बड़ी मूर्खता प्रकट करते हैं जो अपने हृदयों के ज्ञान को उससे छिपाने या हटाने का यत्न करते हैं जिसने उन्हें रचा। इस कथन को इस अर्थ में भी समझा जा सकता है कि मनुष्य अपने विचारों की भटकती हुई युक्तियों के द्वारा अपने ऊपर परमेश्वर के अधिकार को घटा नहीं सकते, कि वह उन घटनाओं पर, जो उन्हें संयोग से होती प्रतीत होती हैं, अपने गुप्त विधान के द्वारा शासन न करे। हम सचमुच देखते हैं कि अपनी व्यर्थ आशाएँ गढ़ने में वे परमेश्वर को उसकी सामर्थ्य से वंचित करते हैं, और उसे सृजी हुई वस्तुओं को सौंप देते हैं, कभी इस वस्तु को और कभी उस वस्तु को, और यह समझते हैं कि जब तक वे अपनी रक्षा के लिए बाहरी साधनों और सहायताओं से सम्पन्न हैं, तब तक उन्हें उसकी सहायता की कोई आवश्यकता नहीं।

इसलिए आगे कहा गया है, कोई राजा अपनी सेना की बहुतायत के कारण नहीं बचता, इत्यादि। इसके द्वारा प्रेरित लेखक हमें यह सिखाना चाहता है कि मनुष्यों के प्राणों की सुरक्षा उनके अपने बल पर नहीं, परन्तु परमेश्वर की कृपा पर निर्भर है। वह दूसरों की अपेक्षा विशेष रूप से राजाओं और वीरों का नाम लेता है; क्योंकि वे साधारण श्रेणी के मनुष्य नहीं, वरन् ऊँची दशा के होने के कारण अपने आप को तीरों के सब संकट की पहुँच से परे समझते हैं, और यदि उन पर कोई विपत्ति आ पड़े, तो वे उससे सहज छुटकारे की आशा बाँध लेते हैं।

संक्षेप में, अपने बल के अहंकारपूर्ण भरोसे से मतवाले होकर, वे अपने आप को कठिनाई से ही नश्वर समझते हैं। साधारण लोगों की मूर्खतापूर्ण प्रशंसा उन्हें इस घमण्ड में और भी कठोर कर देती है, जो उनकी सामर्थ्य की महानता पर चकित खड़े रहते हैं। अतः यदि संकट में पड़ने पर न तो कोई राजा अपनी सेनाओं के द्वारा बचता है, और न कोई वीर अपने बल के द्वारा, तो मनुष्य व्यर्थ ही परमेश्वर के विधान की उपेक्षा करते और मनुष्य की सहायता के लिए चारों ओर ताकते हैं। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि बलवान और निर्बल दोनों की दशा तब तक दयनीय है, जब तक वे परमेश्वर की रक्षा पर भरोसा रखना न सीखें।

17. उद्धार के लिए घोड़ा एक धोखे की वस्तु है। इस पद में भजनकार ने उपलक्षण अलंकार (synecdoche) के द्वारा घोड़े के नाम से किसी भी प्रकार की सहायता का अर्थ लिया है। आशय यह है कि सामान्यतः जो लोग यह समझते हैं कि उनका जीवन पार्थिव साधनों के द्वारा भली-भाँति सुरक्षित है, वे प्रायः ठीक संकट की घड़ी में निराश होते हैं, और अपने सर्वनाश के लिए बुरी तरह धोखा खाते हैं, यहाँ तक कि परमेश्वर उसमें उन्हें उनकी मूर्खता स्पष्ट रूप से दिखा देता है। यह सच है कि राजा व्यर्थ ही तलवार से सुसज्जित नहीं होते, न घोड़ों का उपयोग अनावश्यक है, और न वे धन-सम्पत्ति और साधन अनावश्यक हैं जो परमेश्वर मनुष्यों के प्राणों की रक्षा के लिए प्रदान करता है, बशर्ते उन्हें काम में लाने की उचित रीति का पालन किया जाए। परन्तु क्योंकि अधिकांश मनुष्य जितना अधिक मानवीय सुरक्षाओं से घिरे होते हैं, उतना ही अधिक परमेश्वर से दूर हट जाते हैं, और झूठी कल्पना से अपने आप को यह विश्वास दिला लेते हैं कि वे सब उपद्रवों से सुरक्षित बन्दरगाह में हैं, इसलिए परमेश्वर इस उन्माद को निराश करने में पूर्णतः न्याय से काम करता है। यही कारण है कि उसके दान प्रायः बिना फल के बीत जाते हैं, क्योंकि जगत उन्हें देनेवाले से अलग कर देता है, इसलिए उचित ही उसकी आशीष से भी वंचित किया जाता है।

भजन 33:18-19

18. देखो, यहोवा की दृष्टि उसके डरवैयों पर, और उन पर जो उसकी करुणा की आशा रखते हैं, बनी रहती है; 19. कि वह उनके प्राण को मृत्यु से बचाए, और अकाल के समय उनको जीवित रखे।

18. देखो, यहोवा की दृष्टि उसके डरवैयों पर बनी रहती है। यह दिखा चुकने के पश्चात् कि जिन्हें मनुष्य अपनी सबसे उत्तम सुरक्षा मानते हैं, वे जब मनुष्य उन पर निर्भर रहते हैं तब प्रायः उन्हें कुछ भी लाभ नहीं पहुँचातीं, वरन् सर्वथा निकम्मी ठहरती हैं; भजनकार अब दूसरी ओर यह दिखाता है कि विश्वासी, यद्यपि वे न तो बड़े पराक्रमी और न बड़े धनवान मनुष्य हैं, तौभी केवल परमेश्वर की कृपा से पर्याप्त रूप से सुरक्षित हैं, और सदा के लिए सुरक्षित रहेंगे। उसका आशय इस तुलना से कम स्पष्ट नहीं होता, कि राजा और वीर अपने अजेय बल से कोई सहायता नहीं पाते, जबकि परमेश्वर अकाल और महँगी में पवित्र लोगों के जीवन को ऐसे सम्भाले रखता है मानो वह मरे हुओं को सचमुच फिर से जीवन दे रहा हो। फलतः हम और भली-भाँति समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता जगत के सारे बल को क्यों नीचा गिराता है; निश्चय इसलिए नहीं कि मनुष्य औंधे मुँह पड़े रहें, या ऐसे टूटे मन के हो जाएँ कि निराशा में घुलते रहें; परन्तु इसलिए कि वे अपना घमण्ड त्यागकर अपने विचार केवल परमेश्वर पर लगाएँ, और अपने आप को यह विश्वास दिलाएँ कि उनका जीवन उसकी रक्षा पर निर्भर है। इसके अतिरिक्त, यह कहकर कि परमेश्वर की दृष्टि अपने डरवैयों को बचाने के लिए उन पर लगी रहती है, वह इससे अधिक बात प्रकट करता है, जितनी यह कहने से होती कि उसका हाथ और उसकी सामर्थ्य उनकी रक्षा के लिए पर्याप्त हैं। निर्बलों के मन में यह सन्देह घुस सकता था कि क्या परमेश्वर यह रक्षा हर एक व्यक्ति तक पहुँचाएगा; परन्तु जब भजनकार उसे मानो विश्वासयोग्य लोगों की सुरक्षा पर चौकसी और पहरा देते हुए प्रस्तुत करता है, तब उनमें से किसी के भी काँपने, या एक क्षण भी और अपने मन में हिचकिचाने का कोई कारण नहीं, क्योंकि यह निश्चित है कि परमेश्वर उसकी सहायता करने के लिए उसके साथ उपस्थित है, बशर्ते वह शान्तिपूर्वक उसके विधान के अधीन बना रहे। इससे यह भी और अधिक स्पष्ट होता है कि उसने थोड़ा पहले कितना सच कहा था, कि वह जाति धन्य है जिसका परमेश्वर यहोवा है, क्योंकि उसके बिना जो कुछ बल और धन हमारे पास हो, वह सब व्यर्थ, धोखा देनेवाला और नाशवान होगा; जबकि वह एक ही दृष्टि से अपने लोगों की रक्षा कर सकता है, उनकी घटियों को पूरा कर सकता है, अकाल के समय उनका पालन कर सकता है, और जब वे मृत्यु के लिए ठहराए गए हों तब भी उन्हें जीवित रख सकता है। निस्सन्देह सारी मानव जाति परमेश्वर के विधान के द्वारा सम्भाली जाती है; परन्तु हम जानते हैं कि उसकी पितृवत् चिन्ता विशेष रूप से केवल उसकी अपनी सन्तानों को ही प्रदान की जाती है, ताकि वे अनुभव करें कि उनकी आवश्यकताओं पर वह सचमुच ध्यान देता है।

फिर, जब यह कहा जाता है कि अकाल और महँगी के समय परमेश्वर के पास भक्तों के प्राणों की रक्षा के लिए उपाय तैयार रहते हैं, तब हमें यह सिखाया जाता है कि विश्वासयोग्य लोग उसके विधान का उचित आदर तभी करते हैं जब वे घोर से घोर दरिद्रता में भी अपने हृदयों को हताश नहीं होने देते; वरन् इसके विपरीत, कब्र में से भी अपनी आशाओं को ऊपर उठाते हैं। परमेश्वर प्रायः अपने दासों को कुछ समय तक भूखा रहने देता है कि बाद में उन्हें तृप्त करे, और उन पर मृत्यु का अन्धकार फैला देता है कि बाद में उन्हें जीवन की ज्योति में लौटा लाए। हाँ, हम उस पर दृढ़ता से भरोसा रखना तभी आरम्भ करते हैं जब मृत्यु हमारी आँखों के सामने आ खड़ी होती है; क्योंकि जब तक हम अनुभव से जगत की सहायताओं की व्यर्थता को न जान लें, तब तक हमारी अभिलाषाएँ उनमें उलझी और उनसे बँधी रहती हैं। भजनकार विश्वासियों की पहचान दो चिह्नों से कराता है, जिनमें हमारे जीवन की सारी सिद्धता समाई हुई है। पहला यह, कि हम श्रद्धा के साथ प्रभु की सेवा करें; और दूसरा यह, कि हम उसके अनुग्रह पर निर्भर रहें। कपटी अपने विश्वास की बड़ी डींग मार सकते हैं, परन्तु उन्होंने ईश्वरीय भलाई को कभी थोड़ा सा भी नहीं चखा, कि वे अपनी आवश्यकता की वस्तुओं के लिए उसकी ओर ताकने को प्रेरित हों। इसके विपरीत, जब विश्वासयोग्य लोग अपने सारे हृदय से परमेश्वर की सेवा और भय में अपने आप को अर्पित करते हैं, तो यह प्रेम विश्वास से उत्पन्न होता है; वरन् उस सच्ची आराधना का, जो विश्वासयोग्य लोग परमेश्वर को अर्पित करते हैं, मुख्य भाग यही है कि वे उसकी दया पर निर्भर रहते हैं।

भजन 33:20-22

20. हमारा प्राण यहोवा की बाट जोहता है; वही हमारा सहायक और हमारी ढाल है। 21. निश्चय हमारा हृदय उसके कारण आनन्दित होगा, क्योंकि हम उसके पवित्र नाम पर भरोसा रखेंगे। 22. हे यहोवा, जैसी हम ने तुझ पर आशा रखी है, वैसी ही तेरी करुणा भी हम पर हो।

20. हमारा प्राण यहोवा की बाट जोहता है। परमेश्वर के विधान के विषय में, और विशेष रूप से उस विश्वासयोग्य रखवाली के विषय में जिसके द्वारा वह अपने लोगों की रक्षा करता है, भजनकार ने अब तक जो कुछ कहा है, वह उसने अपनी ओर से इतना नहीं जितना पवित्र आत्मा के मुख से कहा है। इसलिए अब वह सारी कलीसिया की ओर से यह घोषित करने के लिए अपना गीत ऊँचा उठाता है कि अपना कल्याण परमेश्वर को सौंप देने से उत्तम और कुछ नहीं। इस प्रकार हम देखते हैं कि पूर्वोक्त शिक्षा का फल सब सच्चे विश्वासियों के सामने रखा गया है, ताकि वे बिना हिचकिचाहट के भरोसे के साथ और प्रसन्न हृदय से अपने आप को परमेश्वर की पितृवत् देखभाल पर डाल दें। इस विषय में भजनकार विशेष रूप से अपने विषय में कुछ नहीं कहता, परन्तु उसी विश्वास को स्वीकार करने में सारे भक्तों को अपने साथ मिला लेता है। प्राण शब्द में एक विशेष बल है जिस पर ध्यान देना चाहिए; क्योंकि यद्यपि इब्रानियों में यह बोलचाल की एक साधारण रीति है, तौभी यह उत्कट अनुराग को प्रकट करती है; मानो विश्वासी कहते हों, हम सच्चे मन से अपने सारे हृदय से परमेश्वर पर निर्भर रहते हैं, और उसे अपनी ढाल और सहायक मानते हैं।

21. निश्चय हमारा हृदय उसके कारण आनन्दित होगा। क्योंकि כי ki अव्यय, जो इस पद में दो बार प्रयुक्त हुआ है, इब्रानी में विविध अर्थ रखता है, इसलिए यहाँ इसे दो प्रकार से समझा जा सकता है। यदि हम दोनों उपवाक्यों में इसकी व्याख्या निश्चयवाचक रूप में करें, तो अर्थ यह होगा कि विश्वासी अपने आनन्द और अपनी आशा दोनों पर गर्व करते हैं। और मैं इसे अनुचित नहीं समझता कि एक ही प्रसंग में इन दोनों का अलग-अलग इस प्रकार उल्लेख किया जाए: निश्चय परमेश्वर सदा हमारा आनन्द रहेगा; निश्चय उसका पवित्र नाम हमारे शरण-स्थान के लिए एक अभेद्य गढ़ के समान होगा। विश्वासी दृढ़ता से परमेश्वर को पुकारते क्यों रहते हैं, सिवाय इसके कि वे उसकी कृपा से सन्तुष्ट होकर अपने शोकों और दुःखों के बीच भी सदा यह शान्ति रखते हैं, जो उनकी प्रसन्नता को बनाए रखने के लिए पर्याप्त है? इसलिए विश्वासी उचित ही पहले यह कहते हैं कि उनका हृदय प्रभु में आनन्दित होता है; क्योंकि जगत के मोहक आकर्षणों के पीछे भटकने से मुक्त होकर, वे भाग्य के हर उलट-फेर पर न डगमगाते हैं और न हिचकिचाते हैं, परन्तु अपने जीवन का सारा सुख परमेश्वर की सेंत-मेंत और पितृवत् कृपा का आनन्द लेने में रखते हैं। फिर वे दूसरे स्थान पर यह जोड़ते हैं कि वे उसके पवित्र नाम पर भरोसा रखते हैं। तौभी यदि कोई כי ki अव्यय को कारण या हेतु बतानेवाले "क्योंकि" के अर्थ में समझना चाहे, तो इस रीति से भी अर्थ कम उचित और सुन्दर रूप में प्रकट न होगा: क्योंकि हमारी आशा परमेश्वर पर टिकी है, इसलिए वह भी अपनी ओर से हमें आनन्द का निरन्तर कारण प्रदान करने को उतना ही तत्पर रहेगा। और अनुभव निस्सन्देह यह प्रमाणित करता है कि जब मनुष्य शोक से दब जाते हैं, और चिन्ता, दुःख और व्याकुलता से घुलते जाते हैं, तो यह इसलिए होता है कि वे अपनी मूर्खता का प्रतिफल पाएँ; क्योंकि ऐसी कोई बात नहीं जिसकी ओर वे इससे अधिक कठिनाई से ले जाए जाते हों, कि वे अपनी आशा केवल परमेश्वर पर रखें, और अपनी उन धोखा देनेवाली कल्पनाओं पर, जिनसे वे अपने आप को प्रसन्न करते हैं, गर्व न करें। [682 "Ou, certes." — फ्रांसीसी हाशिया। "अथवा, निश्चय।"]

22. हे यहोवा, तेरी करुणा हम पर हो! अन्त में भजन एक प्रार्थना के साथ समाप्त होता है, जिसे पवित्र लेखक सब भक्तों की ओर से अर्पित करता है, कि परमेश्वर उन्हें उसके परिणाम से यह अनुभव कराए कि उन्होंने ईश्वरीय भलाई पर व्यर्थ भरोसा नहीं रखा। इसी बीच, आत्मा भविष्यद्वक्ता के मुख से हमें प्रार्थना का यह नियम लिखवाकर हमें सिखाता है कि ईश्वरीय अनुग्रह का द्वार हमारे लिए तब खुलता है जब उद्धार न तो किसी और ओर से ढूँढ़ा जाता है और न उसकी आशा की जाती है। यह खण्ड हमें एक और अति मधुर सान्त्वना देता है, अर्थात् यह कि यदि हमारी आशा हमारी दौड़ के बीच में मूर्च्छित न हो, तो हमें यह डरने का कोई कारण नहीं कि परमेश्वर अपनी दया को हम पर बिना रुके अन्त तक बनाए रखने में चूक जाएगा।

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