भजन संहिता पर टीका · खण्ड 1 · भजन 2

भजन 2

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भजन 2

भजन 2

दाऊद गर्व के साथ कहता है कि यद्यपि उसके राज्य पर शक्तिशाली शत्रुओं की एक विशाल भीड़ ने आक्रमण किया, तौभी वह राज्य सदा स्थिर रहेगा, क्योंकि परमेश्वर का हाथ और उसका सामर्थ्य उसे सँभाले हुए था। वह आगे कहता है कि शत्रुओं के होते हुए भी उसका विस्तार पृथ्वी की छोर तक होगा। इसलिए वह राजाओं और अन्य शासकों को उपदेश देता है कि वे अपना घमण्ड त्याग दें, और जो जूआ परमेश्वर ने उन पर रखा है उसे दीन मन से स्वीकार करें; क्योंकि उसे उतार फेंकने का प्रयत्न करना उनके लिए व्यर्थ होगा। यह सब कुछ एक प्रतिरूप था, और इसमें मसीह के आनेवाले राज्य के विषय में भविष्यद्वाणी निहित है।

भजन 2:1-3

1. जाति जाति के लोग क्यों हुल्लड़ मचाते हैं, और देश देश के लोग व्यर्थ बुड़बुड़ाते हैं? 2. पृथ्वी के राजाओं ने आपस में गठबन्धन कर लिया है, और हाकिम यहोवा के और उसके मसीह के विरुद्ध एक साथ इकट्ठे हुए हैं। 3. आओ, हम उनके बन्धन तोड़ डालें, और उनका जूआ अपने ऊपर से उतार फेंकें।

हम जानते हैं कि कितने लोगों ने दाऊद के विरुद्ध षड्यन्त्र रचा और उसे सिंहासन तक पहुँचने से रोकने का प्रयत्न किया; और यदि वह उनके शत्रुतापूर्ण प्रयासों को देह की आँख और मानवीय बुद्धि के अनुसार परखता, तो वह इतना आशंकित हो सकता था कि तुरन्त ही राजा बनने की सारी आशा छोड़ बैठता। और निःसन्देह उसे बहुत बार अत्यन्त कठोर परीक्षाओं से दुःख के साथ जूझना पड़ा। परन्तु क्योंकि उसके पास शुद्ध विवेक की यह गवाही थी कि उसने उतावली में कुछ भी करने का प्रयत्न नहीं किया था, और न ही वैसा आचरण किया था जैसा महत्त्वाकांक्षा और भ्रष्ट लालसा बहुतों को राज्यों के शासन में उलट-फेर करने के लिए उकसाती है; और क्योंकि, इसके विपरीत, उसे पूरा निश्चय था कि वह परमेश्वर के ठहराव से राजा बनाया गया है, जबकि उसने ऐसी किसी वस्तु का लालच नहीं किया था, न उसके विषय में सोचा तक था; इसलिए उसने सारे संसार के विरुद्ध परमेश्वर पर दृढ़ भरोसा रखकर अपने आप को ढाढ़स दिया, ठीक जैसे इन शब्दों में वह राजाओं और उनकी सेनाओं, दोनों को महान साहस के साथ तुच्छ ठहराता है। वह यह तो मानता है कि उसे एक कठिन युद्ध लड़ना था, क्योंकि उसके विरुद्ध षड्यन्त्र रचनेवाला कोई छोटा-सा दल नहीं, वरन् अपने-अपने राजाओं समेत सम्पूर्ण जातियाँ थीं; परन्तु वह साहस के साथ घोषणा करता है कि उनके प्रयत्न व्यर्थ थे, क्योंकि वे किसी नश्वर मनुष्य के विरुद्ध नहीं, वरन् स्वयं परमेश्वर के विरुद्ध युद्ध कर रहे थे। शब्दों से यह निश्चित नहीं होता कि वह केवल अपने ही राज्य के शत्रुओं की चर्चा करता है, या अपनी शिकायत को विदेशी आक्रमणकारियों तक भी फैलाता है। परन्तु क्योंकि वास्तव में शत्रु चारों ओर से उसके विरुद्ध उठ खड़े हुए थे, और ज्योंही उसने अपनी ही प्रजा के उपद्रवों को शान्त किया, त्योंही पड़ोसी राज्य बारी-बारी से उसके शत्रु बन गए, इसलिए मेरा झुकाव यह मानने की ओर है कि यहाँ दोनों प्रकार के शत्रु अभिप्रेत हैं, अन्यजाति भी और यहूदी भी। जब केवल एक ही जाति अभिप्रेत हो तब बहुत सी जातियों और लोगों की बात करना, और जब उसकी दृष्टि में केवल शाऊल हो तब बहुत से राजाओं की बात करना, एक विचित्र शैली होती। इसके अतिरिक्त, प्रतिरूप की पूर्णता से यह बात अधिक मेल खाती है कि भिन्न-भिन्न प्रकार के शत्रु एक साथ मिल गए थे; क्योंकि हम जानते हैं कि मसीह का सामना केवल अपने देश के शत्रुओं से ही नहीं, वरन् अन्य जातियों के शत्रुओं से भी हुआ; सारा संसार उसके विनाश के लिए एक सामूहिक षड्यन्त्र में सम्मिलित हो गया था। यह सच है कि पहले यहूदियों ने ही मसीह के विरुद्ध वैसे ही रोष करना आरम्भ किया जैसे उन्होंने पहले दाऊद के विरुद्ध किया था; परन्तु बाद में वही उन्माद अन्य जातियों पर भी छा गया। सारांश यह है कि जो लोग उसे उखाड़ फेंकने का प्रयत्न करते थे, वे चाहे शक्तिशाली सेनाओं से बलवन्त क्यों न हों, तौभी उनके उपद्रव और उनकी युक्तियाँ व्यर्थ और निष्फल सिद्ध होंगी।

लोगों पर हलचल और कोलाहल का, और राजाओं तथा शासकों पर सम्मति करने के लिए सभाएँ जुटाने का आरोप लगाकर उसने अत्यन्त उपयुक्त भाषा का प्रयोग किया है। फिर भी वह संकेत करता है कि जब राजा लम्बे समय तक और बार-बार आपस में सम्मति कर चुकेंगे, और लोग अपना सारा रोष उण्डेल चुकेंगे, तब भी वे सब मिलकर कुछ न कर पाएँगे। परन्तु हमें ऐसे भरोसे के आधार पर ध्यान से विचार करना चाहिए, और वह यह था कि उसने उतावली में या अपनी ही इच्छा से अपने आप को राजा बनने के लिए आगे नहीं बढ़ाया था, वरन् केवल परमेश्वर की बुलाहट का अनुसरण किया था। इससे वह यह निष्कर्ष निकालता है कि उसके व्यक्तित्व में परमेश्वर पर ही आक्रमण किया गया था; और परमेश्वर उस राज्य का रक्षक प्रकट हुए बिना नहीं रह सकता था जिसका संस्थापक वह स्वयं था। मसीहा, अर्थात् अभिषिक्त, की उपाधि से अपने आप को सम्मानित करके वह घोषित करता है कि वह केवल परमेश्वर के अधिकार और आज्ञा से राज्य करता था, क्योंकि शमूएल के हाथ से लाए गए तेल ने उसे, जो पहले केवल एक साधारण व्यक्ति था, राजा बना दिया था। यह सच है कि दाऊद के शत्रु यह नहीं सोचते थे कि वे परमेश्वर पर कोई प्रचण्ड आक्रमण कर रहे हैं; हाँ, वे दृढ़ता से इस बात का इन्कार करते कि उनकी ऐसी कोई मनसा है; तौभी दाऊद अकारण ही परमेश्वर को उनके विरोध में खड़ा नहीं करता, और न अकारण ऐसे बोलता है मानो वे अपने आक्रमण सीधे उसी पर कर रहे हों; क्योंकि जिस राज्य को परमेश्वर ने स्थापित किया था उसे खोखला करने का प्रयत्न करके वे अन्धे होकर और क्रूरता से उसी के विरुद्ध युद्ध कर रहे थे। यदि वे सब जो परमेश्वर के ठहराए हुए अधिकारियों का विरोध करते हैं परमेश्वर के विरुद्ध बलवा करनेवाले हैं, तो यह बात उस पवित्र राज्य पर और भी अधिक लागू होती है जो एक विशेष अधिकार के द्वारा स्थापित किया गया था।

Ne mesme y pensait. — फ्रांसीसी. न ही उसके विषय में सोचा तक था।

परन्तु अब समय आ गया है कि हम प्रतिरूप के सार पर आएँ। दाऊद ने मसीह के विषय में भविष्यद्वाणी की, यह इस बात से स्पष्ट प्रकट है कि वह जानता था कि उसका अपना राज्य मात्र एक छाया है। और जो कुछ दाऊद ने प्राचीन काल में अपने विषय में गाया, उसे मसीह पर लागू करना सीखने के लिए हमें यह सिद्धान्त थामे रहना चाहिए, जो हमें सब भविष्यद्वक्ताओं में सर्वत्र मिलता है, कि वह अपने वंश समेत अपने ही लिए इतना नहीं, जितना छुड़ानेवाले का प्रतिरूप होने के लिए राजा बनाया गया था। आगे चलकर हमें इस विषय पर बार-बार लौटने का अवसर मिलेगा, परन्तु इस समय मैं अपने पाठकों को संक्षेप में बताना चाहता हूँ कि क्योंकि दाऊद का लौकिक राज्य परमेश्वर की प्राचीन प्रजा के लिए उस अनन्त राज्य का एक प्रकार का बयाना था जो अन्त में मसीह के व्यक्तित्व में सचमुच स्थापित हुआ, इसलिए जो बातें दाऊद अपने विषय में घोषित करता है वे मसीह पर न तो जबरदस्ती, और न ही रूपक के रूप में लागू की जाती हैं, वरन् वे सचमुच उसी के विषय में पहले से कही गई थीं। यदि हम इस राज्य के स्वरूप पर ध्यान से विचार करें, तो हम समझ जाएँगे कि उसके अन्त अथवा लक्ष्य की उपेक्षा करके मात्र छाया पर ठहर जाना मूर्खता होगी। कि यहाँ भविष्यद्वाणी के आत्मा के द्वारा मसीह के राज्य का वर्णन किया गया है, इसकी पर्याप्त गवाही हमें प्रेरितों से मिलती है, जो दुष्टों को मसीह के विरुद्ध षड्यन्त्र रचते देखकर प्रार्थना में इसी शिक्षा से अपने आप को सुसज्जित करते हैं (प्रेरितों के काम 4:24)। परन्तु हमारे विश्वास को सब कुतर्कों की पहुँच से परे रखने के लिए, सब भविष्यद्वक्ताओं से यह स्पष्ट प्रकट होता है कि जिन बातों की गवाही दाऊद ने अपने राज्य के विषय में दी, वे ठीक-ठीक मसीह पर लागू होती हैं। इसलिए इसे एक निश्चित सिद्धान्त माना जाए कि वे सब जो अपने आप को मसीह के अधिकार के अधीन नहीं करते, परमेश्वर से युद्ध करते हैं। क्योंकि परमेश्वर को यह अच्छा लगता है कि वह अपने ही पुत्र के हाथ से हम पर शासन करे, इसलिए जो लोग स्वयं मसीह की आज्ञा मानने से इन्कार करते हैं, वे परमेश्वर के अधिकार का इन्कार करते हैं, और उनका इसके विपरीत दावा करना व्यर्थ है। क्योंकि यह कथन सत्य है: "जो पुत्र का आदर नहीं करता, वह पिता का जिसने उसे भेजा है, आदर नहीं करता" (यूहन्ना 5:22)।

और इस अविच्छेद्य सम्बन्ध को दृढ़ता से थामे रहना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है कि जैसे परमेश्वर का प्रताप उसके एकलौते पुत्र में चमका है, वैसे ही पिता का भय और उसकी उपासना उसी पुत्र के व्यक्तित्व के बिना कदापि नहीं की जा सकती।

इस खण्ड से दोहरी सान्त्वना प्राप्त की जा सकती है:— पहली, जब जब संसार मसीह के राज्य की समृद्धि में विघ्न डालने और उसका अन्त कर देने के लिए रोष करता है, तब तब हमें केवल इतना स्मरण रखना है कि इस सब में वही बात पूरी हो रही है जिसकी भविष्यद्वाणी बहुत पहले की गई थी, और तब कोई भी परिवर्तन जो घटित हो, हमें अधिक व्याकुल नहीं करेगा। हाँ, वरन् जो कुछ प्रेरितों ने अनुभव किया उसकी तुलना उन बातों से करना जो हम इस समय देख रहे हैं, हमारे लिए अत्यन्त लाभदायक होगा। अपने आप में तो मसीह का राज्य शान्तिमय होता, और उसी से संसार में सच्ची शान्ति प्रवाहित होती है; परन्तु मनुष्यों की दुष्टता और द्वेष के कारण वह कभी भी उपद्रवों के भड़के बिना अप्रकटता से निकलकर खुले रूप में सामने नहीं आता। और यदि मसीह के लिए सिंहासन स्थापित होते ही संसार रोष करने लगे, तो यह न कुछ आश्चर्य की बात है और न असाधारण। दूसरी सान्त्वना जो इसके बाद आती है, यह है कि जब दुष्ट अपनी सेनाएँ एकत्र कर लेते हैं, और जब अपनी विशाल संख्या, अपने धन और अपने रक्षा के साधनों पर भरोसा करके वे न केवल अपनी घमण्ड भरी निन्दा उण्डेलते हैं, वरन् रोष में आकर स्वयं स्वर्ग पर भी आक्रमण करते हैं, तब हम केवल इस एक बात पर भरोसा रखकर निश्चिन्त होकर उनका उपहास कर सकते हैं कि जिस पर वे आक्रमण कर रहे हैं वह स्वर्ग में रहनेवाला परमेश्वर है। जब हम मसीह को अपने शत्रुओं की संख्या और बल से लगभग दबा हुआ देखें, तब हम स्मरण रखें कि वे उस परमेश्वर से युद्ध कर रहे हैं जिस पर वे प्रबल न होंगे, और इसलिए उनके प्रयत्न, चाहे वे जैसे भी हों और चाहे कितने ही बढ़ते जाएँ, मिट्टी में मिल जाएँगे और सर्वथा निष्फल होंगे। इसके अतिरिक्त हम यह भी सीखें कि यह शिक्षा सम्पूर्ण सुसमाचार में व्याप्त है; क्योंकि प्रेरितों की वह प्रार्थना जिसे मैंने अभी उद्धृत किया है, स्पष्ट गवाही देती है कि इसे केवल मसीह के व्यक्तित्व तक सीमित नहीं रखना चाहिए।

3. आओ, हम तोड़ डालें, इत्यादि। यह मानवीकरण (prosopopoeia) है, जिसमें भविष्यद्वक्ता अपने शत्रुओं को बोलते हुए प्रस्तुत करता है; और वह इस अलंकार का प्रयोग उनकी अधर्मी और विश्वासघाती युक्ति को और अच्छी रीति से प्रकट करने के लिए करता है। ऐसा नहीं कि उन्होंने खुले रूप में अपने आप को परमेश्वर के विरुद्ध बलवाई स्वीकार किया हो (क्योंकि वे तो अपने बलवे को हर सम्भव बहाने से ढाँपते थे, और ढिठाई से यह डींग मारते थे कि परमेश्वर उनकी ओर है); परन्तु क्योंकि उन्होंने पूरी तरह ठान लिया था कि उचित-अनुचित हर उपाय से दाऊद को सिंहासन से हटा देंगे, इसलिए वे मुँह से चाहे जो कुछ कहते रहे हों, उनकी सारी सम्मति का निचोड़ यही था कि जिस राज्य को स्वयं परमेश्वर ने स्थापित किया था उसे किस प्रकार उलट दें। जब वह अपने विरोधियों के मुँह से अपने शासन का वर्णन बन्धनों और जूए के रूपकों में करवाता है, तो वह परोक्ष रूप से उनके घमण्ड की निन्दा करता है। क्योंकि वह उन्हें अपने शासन के विषय में तिरस्कार से बोलते हुए दिखाता है, मानो उसके अधीन होना दासों की-सी और लज्जाजनक अधीनता हो; ठीक वैसे ही जैसे हम मसीह के सब शत्रुओं में देखते हैं, जो जब उसके अधिकार के अधीन होने के लिए विवश किए जाते हैं, तब इसे उतना ही अपमानजनक समझते हैं मानो उन पर घोर से घोर अनादर डाला गया हो।

भजन 2:4-6

एक अलंकार, जिसमें व्यक्तियों या वस्तुओं के बोलने की कल्पना की जाती है; मानवीकरण।

4. वह जो स्वर्ग में रहता है उन पर हँसेगा; प्रभु उनको ठट्ठों में उड़ाएगा। 5. तब वह अपने क्रोध में उनसे बातें करेगा, और अपने प्रचण्ड कोप में उन्हें घबरा देगा। 6. मैंने अपने राजा को अपने पवित्र पर्वत सिय्योन पर अभिषिक्त किया है।

जब दाऊद अपने शत्रुओं के उपद्रव और हलचल, उनकी युक्तियों और घमण्ड, उनकी तैयारी और साधनों, उनके बल और प्रयत्नों का वर्णन कर चुका, तो इन सब के विरोध में वह केवल परमेश्वर के सामर्थ्य को रखता है, जिसके विषय में वह यह निष्कर्ष निकालता है कि वह उनके विरुद्ध काम में लाया जाएगा, क्योंकि वे उसके ठहराव को विफल करने का प्रयत्न कर रहे थे। और जैसे थोड़ा पहले उसने उन्हें पृथ्वी के राजा कहकर उनकी निर्बल और नाशवान दशा को प्रकट किया था, वैसे ही अब वह जो स्वर्ग में रहता है इस उच्च उपाधि के द्वारा वह परमेश्वर के सामर्थ्य की महिमा करता है, मानो वह कह रहा हो कि मनुष्य उसके विरुद्ध चाहे जो प्रयत्न करें, वह सामर्थ्य अक्षुण्ण और अटल बना रहता है। वे अपने आप को चाहे जितना ऊँचा उठाएँ, वे स्वर्ग तक कभी नहीं पहुँच पाएँगे; हाँ, जब वे स्वर्ग और पृथ्वी को एक साथ उलट-पुलट कर देने की सोचते हैं, तब वे टिड्डियों के समान हैं, और इस बीच प्रभु ऊपर से शान्त भाव से उनकी उन्मत्त उछल-कूद को देखता रहता है। और दाऊद दो कारणों से परमेश्वर पर हँसने का आरोप करता है: पहला, हमें यह सिखाने के लिए कि दुष्ट मनुष्यों के बलवे को दबाने के लिए उसे बड़ी-बड़ी सेनाओं की आवश्यकता नहीं, मानो यह कोई कठिन और दुष्कर काम हो, वरन् इसके विपरीत, वह जब चाहे पूरी सहजता से ऐसा कर सकता है। दूसरा, वह चाहता है कि हम यह समझें कि जब परमेश्वर अपने पुत्र के राज्य को उपद्रव से ग्रस्त होने देता है, तब वह इसलिए हस्तक्षेप करने से नहीं रुकता कि वह कहीं और व्यस्त है, या सहायता देने में असमर्थ है, या अपने पुत्र के आदर की उपेक्षा करता है; वरन् वह जानबूझकर अपने क्रोध के दण्ड को उचित समय तक, अर्थात् तब तक के लिए टाल देता है जब तक वह उनके उन्मत्त रोष को सब के सामने उपहास का विषय न बना दे। इसलिए हम अपने मन में यह निश्चय कर लें कि यदि परमेश्वर तुरन्त दुष्टों के विरुद्ध अपना हाथ नहीं बढ़ाता, तो यह उसके हँसने का समय है; और यद्यपि इस बीच हमें रोना ही पड़े, तौभी हम इस विचार से अपने शोक की कड़वाहट को शान्त करें, हाँ, अपने आँसू भी पोंछ डालें, कि परमेश्वर अपने शत्रुओं की दुष्टता की ओर से आँखें इसलिए नहीं मूँद लेता कि वह आलसी या निर्बल है, वरन् इसलिए कि वह कुछ समय के लिए उनकी धृष्टता का सामना शान्त तिरस्कार से करना चाहता है। तब क्रियाविशेषण के द्वारा वह न्याय करने के उपयुक्त समय की ओर संकेत करता है, मानो वह कह रहा हो कि जब प्रभु कुछ समय तक अपने पुत्र के शासन का विरोध करनेवालों के कुकर्मों की ओर प्रत्यक्ष रूप से कोई ध्यान न देता हुआ दिखाई देगा, तब वह अचानक अपना मार्ग बदल देगा, और दिखा देगा कि वह किसी भी बात को ऐसी धृष्टता से बढ़कर घृणा के साथ नहीं देखता।

हमारी इब्रानी बाइबलों में यह शब्द Elohai है; परन्तु बहुत सी हस्तलिपियों में यह Jehovah (यहोवा) है। "बाद के युगों में यहूदी यहोवा शब्द का उच्चारण करने से अन्धविश्वासपूर्ण भय मानते थे, और पवित्रशास्त्र की अपनी हस्तलिपियों में प्रायः उसके स्थान पर Adonai और Elohim लिख देते थे। परन्तु अधिक प्राचीन हस्तलिपियों में बहुधा वहाँ यहोवा है जहाँ अधिक आधुनिक हस्तलिपियों में Adonai और Elohim है। डॉ. केनिकॉट द्वारा मिलाई गई साठ हस्तलिपियों में और डी रॉसी की पच्चीस हस्तलिपियों में यहाँ यहोवा है।" — स्ट्रीट, 2:4.

इसके अतिरिक्त वह परमेश्वर पर बोलने का आरोप अपने शत्रुओं को शिक्षा देने के उद्देश्य से नहीं, वरन् केवल उन्हें उनके पागलपन का दोषी ठहराने के लिए करता है; वास्तव में बोलना शब्द से उसका अर्थ परमेश्वर के क्रोध के प्रकटीकरण के सिवा और कुछ नहीं, जिसे दुष्ट तब तक नहीं पहचानते जब तक उसे भुगत न लें। दाऊद के शत्रु सोचते थे कि उस व्यक्ति को नष्ट कर देना संसार का सबसे सरल काम होगा, जिसने एक तुच्छ चरवाहे की झोंपड़ी से निकलकर, उनकी दृष्टि में, ढिठाई से प्रभुसत्ता अपने हाथ में ले ली थी। शमूएल की भविष्यद्वाणी और अभिषेक उनके अनुमान में मात्र हास्यास्पद ढोंग थे। परन्तु जब परमेश्वर ने अन्त में उन्हें उलट दिया और दाऊद को सिंहासन पर स्थिर कर दिया, तब इस कार्य के द्वारा उसने अपने आप को दाऊद के राज्य का संस्थापक प्रकट करने के लिए जीभ से इतना नहीं, जितना हाथ से बोला। इसलिए भजनकार यहाँ कार्यों के द्वारा बोलने की ओर संकेत करता है, जिनके द्वारा प्रभु एक भी शब्द कहे बिना अपना अभिप्राय प्रकट कर देता है। इसी प्रकार, जब कभी वह अपने क्रोध के चिह्नों और दण्डों के द्वारा अपने पुत्र के राज्य की दुष्टों से रक्षा करता है, तब यद्यपि वह एक भी शब्द नहीं बोलता, तौभी वास्तव में वह अपनी बात समझा देने के लिए पर्याप्त बोलता है। इसके बाद दाऊद परमेश्वर के नाम से बोलते हुए और भी स्पष्ट रीति से दिखाता है कि उसके शत्रु, उस व्यक्ति के प्रति जिसे परमेश्वर ने राजा बनाया था, अपनी घृणा में किस प्रकार दुष्टता से स्वयं परमेश्वर के विरुद्ध लड़ने के दोषी थे। सारांश यह है: दुष्ट मनुष्य अभी चाहे जितनी दुष्टता से आचरण करें, परन्तु अन्त में वे अनुभव करेंगे कि स्वर्ग से युद्ध करना क्या होता है। मैं सर्वनाम पर भी बल है, जिसके द्वारा परमेश्वर यह जताता है कि वह इस संसार के मनुष्यों से इतना ऊँचा है कि वे सब मिलकर भी उसकी महिमा को तनिक भी धुँधला नहीं कर सकते। इसलिए जब जब मनुष्य का सामर्थ्य हमें भयानक दिखाई दे, तब तब हम स्मरण करें कि परमेश्वर का सामर्थ्य उससे कितना बढ़कर है। इन शब्दों में हमारे सामने परमेश्वर का वह अपरिवर्तनीय और अनन्त अभिप्राय रखा गया है कि वह अपने पुत्र के राज्य की, जिसका वह संस्थापक है, अन्त तक प्रभावशाली रीति से रक्षा करेगा; और यह बात संसार के अशान्त तूफानों के बीच हमारे विश्वास को भली भाँति सँभाल सकती है। इसलिए मनुष्य उसके विरुद्ध चाहे जो षड्यन्त्र रचें, हमें सन्तुष्ट करने के लिए यह एक विचार पर्याप्त हो कि वे परमेश्वर के अभिषेक को निष्फल नहीं कर सकते। यहाँ सिय्योन पर्वत का उल्लेख स्पष्ट शब्दों में इसलिए नहीं किया गया कि दाऊद का अभिषेक पहले-पहल वहीं हुआ था, वरन् इसलिए कि अन्त में परमेश्वर के अपने समय पर उसके राज्याभिषेक की गम्भीर विधि के द्वारा भविष्यद्वाणी की सच्चाई प्रकट हुई और वास्तव में स्थापित हुई। और यद्यपि इन शब्दों में दाऊद ने परमेश्वर की प्रतिज्ञा का ध्यान रखा, और अपना तथा दूसरों का ध्यान उसकी ओर फिर से खींचा, तौभी साथ ही वह यह भी जताना चाहता था कि उसका अपना राज्य पवित्र है और परमेश्वर के मन्दिर से अविच्छेद्य रूप से जुड़ा हुआ है। परन्तु यह बात मसीह के राज्य पर और भी अधिक उपयुक्त रीति से लागू होती है, जिसके विषय में हम जानते हैं कि वह आत्मिक भी है और याजकपद से जुड़ा हुआ भी है, और यही परमेश्वर की उपासना का प्रमुख अंग है।

Il avoit a Leur avis. — फ्रांसीसी. उनकी दृष्टि में उसने।

Encore qu'il ne dise un seul, si est ce qu'en effect il parle assez pour se faire entendre. — फ्रांसीसी. यद्यपि वह एक भी शब्द नहीं बोलता, तौभी वास्तव में वह अपनी बात समझा देने के लिए पर्याप्त बोलता है।

भजन 2:7-8

7. मैं उस ठहराव का प्रचार करूँगा: यहोवा ने मुझसे कहा, तू मेरा पुत्र है; आज मैंने तुझे जन्माया है। 8. मुझसे माँग, और मैं जाति जाति के लोगों को तेरा निज भाग होने के लिए, और पृथ्वी की छोर तक को तेरी निज सम्पत्ति होने के लिए दे दूँगा।

7. मैं प्रचार करूँगा, इत्यादि। दाऊद, अपने शत्रुओं से अज्ञानता का हर बहाना छीन लेने के लिए, परमेश्वर के ठहराव को प्रकाशित करने हेतु प्रचारक का पद ग्रहण करता है; या कम से कम वह यह घोषणा करता है कि वह अपनी बुलाहट के निश्चित और स्पष्ट प्रमाण के बिना सिंहासन पर नहीं आया; मानो वह कह रहा हो, मैं बिना सोचे-समझे राज्य को हड़पने के लिए खुले रूप में आगे नहीं बढ़ा, वरन् मैं परमेश्वर की आज्ञा अपने साथ लेकर आया, जिसके बिना ऐसे सम्मानपूर्ण पद तक अपने आप को ऊँचा उठाने में मैं ढिठाई का काम करता। परन्तु यह बात मसीह में और भी सच्चाई से पूरी हुई, और निःसन्देह दाऊद ने भविष्यद्वाणी के आत्मा के प्रभाव में विशेष रूप से उसी की ओर संकेत किया था। क्योंकि इस प्रकार सब दुष्ट निरुत्तर ठहराए जाते हैं, क्योंकि मसीह ने न केवल अपने आश्चर्यकर्मों के द्वारा, वरन् सुसमाचार के प्रचार के द्वारा भी प्रमाणित किया कि वह परमेश्वर की ओर से वैध अधिकार से विभूषित है। वास्तव में यही गवाही सारे संसार में गूँजती है। पहले प्रेरितों ने, और उनके बाद पास्टरों और शिक्षकों ने गवाही दी कि मसीह परमेश्वर पिता के द्वारा राजा बनाया गया; परन्तु क्योंकि वे मसीह के स्थान पर राजदूतों के रूप में कार्य करते थे, इसलिए जो कुछ उनके द्वारा किया गया उसका श्रेय वह उचित और ठीक रीति से केवल अपने ही लिए लेता है। तदनुसार, पौलुस (इफिसियों 2:17) जो कुछ सुसमाचार के सेवकों ने मसीह के नाम से किया उसका श्रेय मसीह को देता है। वह कहता है, "उसने आकर उन्हें जो दूर थे, और उन्हें जो निकट थे, शान्ति का सुसमाचार सुनाया।" इससे सुसमाचार का अधिकार भी और अधिक दृढ़ता से स्थापित होता है, क्योंकि यद्यपि वह दूसरों के द्वारा प्रकाशित किया जाता है, तौभी वह मसीह का सुसमाचार होना नहीं छोड़ता। इसलिए जब जब हम मनुष्यों के द्वारा सुसमाचार का प्रचार सुनते हैं, तब तब हमें यह समझना चाहिए कि बोलनेवाले इतने वे नहीं, जितना उनके द्वारा बोलनेवाला मसीह है। और यह एक अनुपम लाभ है कि मसीह प्रेम से अपनी ही वाणी के द्वारा हमें अपनी ओर खींचता है, ताकि हम किसी भी प्रकार उसके राज्य के प्रताप पर सन्देह न करें।

इस कारण हमें और भी अधिक सावधान रहना चाहिए कि हम उस राजाज्ञा को दुष्टता से अस्वीकार न करें जिसे वह प्रकाशित करता है, तू मेरा पुत्र है। यह सच है कि दाऊद अपनी राजकीय प्रतिष्ठा के कारण उचित रूप से परमेश्वर का पुत्र कहलाया जा सकता था, ठीक जैसे हम जानते हैं कि राजकुमार और शासक, दूसरों से ऊँचे पद पर होने के कारण, ईश्वर और परमेश्वर के पुत्र दोनों कहलाते हैं। परन्तु यहाँ परमेश्वर उस अनुपम उच्च उपाधि के द्वारा, जिससे वह दाऊद को सम्मानित करता है, उसे न केवल सब नश्वर मनुष्यों से, वरन् स्वर्गदूतों से भी ऊँचा उठाता है। प्रेरित (इब्रानियों 1:5) बुद्धिमानी और परिश्रम से इस बात पर विचार करता है जब वह हमें बताता है कि यह भाषा कभी किसी भी स्वर्गदूत के विषय में प्रयोग नहीं की गई। व्यक्तिगत रूप से देखा जाए तो दाऊद स्वर्गदूतों से छोटा था, परन्तु जहाँ तक वह मसीह के व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करता था, वहाँ तक उसे अत्यन्त उचित कारण से उनसे कहीं ऊपर स्थान दिया गया है। इसलिए इस स्थान पर परमेश्वर के पुत्र से हमें बहुतों में से एक पुत्र नहीं, वरन् उसका एकलौता पुत्र समझना चाहिए, ताकि स्वर्ग और पृथ्वी दोनों में केवल उसी को प्रधानता प्राप्त हो। जब परमेश्वर कहता है, मैंने तुझे जन्माया है, तो इसे मनुष्यों की समझ या ज्ञान के सन्दर्भ में समझना चाहिए; क्योंकि दाऊद परमेश्वर से तब जन्मा जब राजा होने के लिए उसका चुनाव स्पष्ट रूप से प्रकट हुआ। इसलिए आज शब्द इस प्रकटीकरण के समय को सूचित करता है; क्योंकि ज्योंही यह ज्ञात हुआ कि वह परमेश्वर के ठहराव से राजा बनाया गया है, त्योंही वह ऐसे व्यक्ति के रूप में सामने आया जो अभी-अभी परमेश्वर से जन्मा हो, क्योंकि इतना बड़ा सम्मान किसी साधारण व्यक्ति का नहीं हो सकता था। मसीह पर लागू किए जाने पर भी इन शब्दों की यही व्याख्या की जानी चाहिए। उसके विषय में किसी और अर्थ में नहीं कहा गया कि वह जन्मा, सिवाय इसके कि पिता ने उसके विषय में गवाही दी कि वह उसका अपना पुत्र है। मैं जानता हूँ कि बहुतों ने इस खण्ड की व्याख्या मसीह के अनन्त जन्म के सन्दर्भ में की है; और आज शब्दों से उन्होंने बड़ी चतुराई से यह तर्क किया है मानो वे समय से किसी भी सम्बन्ध के बिना एक अनन्त क्रिया को सूचित करते हों। परन्तु पौलुस, जो इस भविष्यद्वाणी का अधिक विश्वासयोग्य और अधिक योग्य व्याख्याकार है, प्रेरितों के काम 13:33 में हमारा ध्यान मसीह की उस स्वर्गीय महिमा के प्रकटीकरण की ओर खींचता है जिसकी चर्चा मैंने की है। इसलिए जन्माया जाना इस अभिव्यक्ति का यह तात्पर्य नहीं कि वह उस समय परमेश्वर का पुत्र होने लगा, वरन् यह कि उसका पुत्र होना उस समय संसार पर प्रकट किया गया। अन्त में, इस जन्माने को पिता और पुत्र के बीच विद्यमान परस्पर प्रेम के अर्थ में नहीं समझना चाहिए; इसका अर्थ केवल यह है कि वह, जो आदि से पिता की पवित्र गोद में छिपा हुआ था, और जिसकी छाया बाद में व्यवस्था के अधीन धुँधले रूप में दिखाई गई थी, उस समय से परमेश्वर का पुत्र जाना गया जब वह पुत्रत्व के प्रामाणिक और स्पष्ट चिह्नों के साथ प्रकट हुआ, जैसा यूहन्ना 1:14 में कहा गया है, "हमने उसकी ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते की महिमा।" फिर भी साथ ही हमें वह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए जो पौलुस सिखाता है (रोमियों 1:4), कि जब वह मरे हुओं में से जी उठा तब वह सामर्थ्य के साथ परमेश्वर का पुत्र ठहराया गया; और इसलिए जो कुछ यहाँ कहा गया है उसका मुख्य संकेत उसके पुनरुत्थान के दिन की ओर है। परन्तु संकेत चाहे किसी भी विशेष समय की ओर हो, पवित्र आत्मा यहाँ उसके प्रकटीकरण के गम्भीर और उचित समय की ओर संकेत करता है, ठीक जैसे वह बाद में इन शब्दों में करता है, "आज वह दिन है जो यहोवा ने बनाया है; हम इसमें मगन और आनन्दित हों।" (भजन संहिता 118:24)

8. मुझ से माँग। यह सच है कि मसीह ने अपने पिता से विनती की (यूहन्ना 17:5) कि "वह उसे उस महिमा से महिमान्वित करे जो जगत के होने से पहले उसकी उसके साथ थी;" तौभी यहाँ का अधिक स्पष्ट अर्थ यह है कि पिता अपने पुत्र को ऐसी कोई वस्तु देने से इन्कार न करेगा जो उसके राज्य को पृथ्वी की छोर तक फैलाने से सम्बन्ध रखती है। परन्तु इस अद्भुत विषय में मसीह को पिता के सम्मुख प्रार्थनाएँ लेकर उपस्थित होते हुए दिखाया गया है, ताकि परमेश्वर की उस सेंतमेंत उदारता को प्रकट किया जाए जिसके द्वारा वह मनुष्यों को यह सम्मान प्रदान करता है कि उसने अपने ही पुत्र को सारे जगत का शासक ठहराया है। यह सच है कि परमेश्वर के अनन्त वचन के रूप में मसीह के हाथ में सर्वोच्च अधिकार और प्रताप अधिकारपूर्वक सदा से रहा है, और इस नाते उसमें कोई वृद्धि नहीं हो सकती; तौभी वह उस मानव स्वभाव में ऊँचा किया गया है जिसमें उसने दास का रूप धारण किया। इसलिये यह पदवी उस पर केवल परमेश्वर होने के नाते ही लागू नहीं होती, वरन् मध्यस्थ के सम्पूर्ण व्यक्तित्व तक फैली हुई है; क्योंकि मसीह के अपने आप को शून्य कर देने के पश्चात् उसे वह नाम दिया गया जो सब नामों में श्रेष्ठ है, कि उसके सामने हर एक घुटना टिके (फिलिप्पियों 2:9)। हम जानते हैं कि दाऊद ने बड़ी-बड़ी विजयें प्राप्त करने के बाद एक विस्तृत भूभाग पर राज्य किया, यहाँ तक कि अनेक जातियाँ उसकी करदाता बन गईं; परन्तु जो बात यहाँ कही गई है वह उसमें पूरी नहीं हुई। यदि हम उसके राज्य की तुलना अन्य राजतन्त्रों से करें, तो वह बहुत ही संकीर्ण सीमाओं में सिमटा हुआ था। अतः जब तक हम यह न मान लें कि राज्य के इस विशाल विस्तार के विषय में यह भविष्यद्वाणी व्यर्थ और झूठी कही गई, तब तक हमें इसे मसीह पर ही लागू करना होगा, जिसने अकेले ही सारे जगत को अपने वश में कर लिया है और सब देशों तथा जातियों को अपने प्रभुत्व के अधीन समेट लिया है। इसलिये यहाँ, जैसे अनेक अन्य स्थानों में, अन्यजातियों के बुलाए जाने की भविष्यद्वाणी की गई है, ताकि कोई यह कल्पना न करे कि जो छुड़ानेवाला परमेश्वर की ओर से भेजा जानेवाला था, वह केवल एक ही जाति का राजा है। और यदि अब हम उसके राज्य को बँटा हुआ, घटा हुआ और टूटा-फूटा देखते हैं, तो यह मनुष्यों की उस दुष्टता से उत्पन्न होता है जो उन्हें ऐसे सुखद और वांछनीय शासन के अधीन रहने के अयोग्य बना देती है। परन्तु यद्यपि मनुष्यों की कृतघ्नता मसीह के राज्य को फलने-फूलने से रोकती है, तौभी वह इस भविष्यद्वाणी को निष्फल नहीं कर देती; क्योंकि मसीह अपनी प्रजा के बिखरे हुए बचे हुओं को चारों ओर से इकट्ठा करता है, और इस दयनीय उजाड़ के बीच भी उन्हें विश्वास के पवित्र बन्धन से परस्पर जोड़े रखता है, जिससे केवल एक कोना ही नहीं, वरन् सारा जगत उसके अधिकार के अधीन हो जाता है। इसके अतिरिक्त, दुष्ट लोग चाहे कितनी ही ढिठाई से व्यवहार करें, और चाहे उसकी प्रभुता को कितना ही ठुकराएँ, तौभी वे अपने विद्रोह के द्वारा उसके अधिकार और सामर्थ्य को नष्ट नहीं कर सकते। इसी विषय से वह बात भी सम्बन्ध रखती है जो तुरन्त आगे आती है: भजन 2:9

9. तू उन्हें लोहे के डण्डे से तोड़ डालेगा, और कुम्हार के बर्तन के समान चकनाचूर कर डालेगा।

यह बात स्पष्ट रूप से इसलिये कही गई है कि हमें सिखाया जाए कि मसीह को ऐसी सामर्थ्य प्राप्त है जिसके द्वारा वह उन पर भी राज्य करता है जो उसके अधिकार से विमुख हैं और उसकी आज्ञा मानने से इन्कार करते हैं। दाऊद के शब्दों का आशय यह है कि सब लोग स्वेच्छा से उसका जूआ ग्रहण न करेंगे, वरन् बहुत से हठीले और विद्रोही होंगे, जिन्हें फिर भी वह बलपूर्वक वश में करेगा और अपने अधीन होने के लिये विवश करेगा। यह सच है कि जिस राज्य की चर्चा दाऊद करता है उसकी शोभा और महिमा तब और भी अधिक तेजस्वी रूप से प्रकट होती है, जब एक स्वेच्छा से तत्पर प्रजा उसकी सामर्थ्य के दिन मसीह के पास दौड़ी चली आती है, ताकि अपने आप को उसकी आज्ञाकारी प्रजा प्रमाणित करे; परन्तु जब मनुष्यों का अधिकांश भाग ऐसे उग्र वेग के साथ उसके विरुद्ध उठ खड़ा होता है जो हर प्रकार के अंकुश को ठुकरा देता है, तो यह सत्य जोड़ना आवश्यक था कि यह राजा ऐसे सब विरोध पर प्रबल सिद्ध होगा। युद्ध में इस अजेय सामर्थ्य का एक नमूना परमेश्वर ने पहले दाऊद के व्यक्तित्व में दिखाया, जिसने, जैसा हम जानते हैं, शस्त्रबल से अनेक शत्रुओं को परास्त किया और उन्हें उखाड़ फेंका। परन्तु यह भविष्यद्वाणी मसीह में और भी पूर्ण रूप से सत्य सिद्ध होती है, जो न तलवार से न भाले से, वरन् अपने मुँह की फूँक से दुष्टों को यहाँ तक मारता है कि उनका पूर्ण विनाश हो जाता है।

तौभी यह आश्चर्यजनक प्रतीत हो सकता है कि जहाँ पवित्रशास्त्र के अन्य भागों में भविष्यद्वक्ता हमारे प्रभु की नम्रता, दया और कोमलता का गुणगान करते हैं, वहाँ यहाँ उसका वर्णन ऐसा किया गया है मानो वह अत्यन्त कठोर, उग्र और भय से भरा हुआ हो। परन्तु यह कठोर और भयानक प्रभुता हमारे सामने किसी और उद्देश्य से नहीं, केवल उसके शत्रुओं के मन में भय उत्पन्न करने के लिये रखी गई है; और यह उस करुणा से तनिक भी असंगत नहीं है जिसके द्वारा मसीह अपने लोगों का कोमलता और मधुरता से पालन-पोषण करता है। जो अपनी दीन भेड़ों के लिये प्रेमी चरवाहा ठहरता है, उसे जंगली पशुओं के साथ कुछ कठोरता से व्यवहार करना ही पड़ता है, ताकि या तो उन्हें उनकी क्रूरता से फेर दे, या उसे प्रभावशाली रूप से रोक दे। इसी के अनुसार भजन 110:5 में, भक्तों की आज्ञाकारिता की प्रशंसा किए जाने के तुरन्त बाद, मसीह को ऐसी सामर्थ्य से सुसज्जित किया गया है कि वह अपने क्रोध के दिन उन राजाओं और उनकी सेनाओं को नष्ट करे जो उसके विरोधी हैं। और निश्चय ही ये दोनों स्वरूप उचित रूप से उस पर आरोपित किए जाते हैं: क्योंकि वह पिता की ओर से इसलिये भेजा गया कि दीनों और दुखियों को उद्धार के समाचार से ढाढ़स दे, बन्दियों को छुड़ाए, रोगियों को चंगा करे, और शोकितों तथा पीड़ितों को मृत्यु के अन्धकार से निकालकर जीवन की ज्योति में लाए (यशायाह 61:1); और दूसरी ओर, क्योंकि बहुत से लोग अपनी कृतघ्नता के कारण उसके क्रोध को अपने विरुद्ध भड़काते हैं, इसलिये वह मानो एक नया स्वरूप धारण कर लेता है, ताकि उनकी कठोरता को कुचल डाले। यह पूछा जा सकता है कि वह लोहे का राजदण्ड कौन-सा है जिसे पिता ने मसीह के हाथ में दिया है, कि उससे वह अपने शत्रुओं को चकनाचूर करे? मेरा उत्तर यह है: उसके मुँह की फूँक उसके लिये अन्य सब शस्त्रों का स्थान ले लेती है, जैसा मैंने अभी यशायाह से दिखाया है। इसलिये यद्यपि मसीह एक उँगली भी न हिलाए, तौभी अपने बोलने मात्र से वह अपने शत्रुओं के विरुद्ध पर्याप्त भयानक रूप से गरजता है, और केवल अपने मुँह के दण्ड से उन्हें नष्ट कर देता है। वे चाहे कितना ही कुढ़ें और लातें मारें, और पागल के-से उन्माद के साथ उसका कितना ही विरोध करें, परन्तु अन्त में उन्हें यह अनुभव करने के लिये विवश होना पड़ेगा कि जिसे वे अपना राजा मानकर आदर देने से इन्कार करते हैं, वही उनका न्यायी है। संक्षेप में, वे विविध रीतियों से तब तक चकनाचूर किए जाते हैं जब तक कि वे उसके पाँवों की चौकी न बन जाएँ। सुसमाचार का सिद्धान्त किस अर्थ में लोहे का डण्डा है, यह कुरिन्थियों के नाम पौलुस की पत्री (2 कुरिन्थियों 10:4) से समझा जा सकता है, जहाँ वह सिखाता है कि मसीह के सेवक आत्मिक हथियारों से सुसज्जित हैं, ताकि हर एक ऊँची बात को जो मसीह के विरोध में उठती है, ढा दें, इत्यादि। मैं यह स्वीकार करता हूँ कि स्वयं विश्वासी भी परमेश्वर के लिये बलि चढ़ाए जा सकते हैं, ताकि वह अपने अनुग्रह से उन्हें जिलाए; क्योंकि उचित है कि मसीह के हमें बचाने के लिये हाथ बढ़ाने से पहले हम धूल में दीन किए जाएँ। परन्तु मसीह अपने चेलों को पश्चाताप की शिक्षा इस रीति से देता है कि वह उन्हें भयानक न लगे; इसके विपरीत, अपने चरवाहे की लाठी दिखाकर वह शीघ्र ही उनके शोक को आनन्द में बदल देता है; और उन्हें चकनाचूर करने के लिये अपने लोहे के डण्डे का प्रयोग करने से वह इतना दूर है कि वह उन्हें अपने हाथ की चंगाई देनेवाली छाया तले सुरक्षित रखता है, और अपनी सामर्थ्य से उन्हें सम्भाले रहता है। इसलिये जब दाऊद तोड़ने और कुचलने की बात करता है, तो यह केवल उन विद्रोहियों और अविश्वासियों पर लागू होता है जो मसीह के अधीन इसलिये नहीं होते कि वे पश्चाताप के द्वारा वश में किए गए हैं, वरन् इसलिये कि वे निराशा से कुचल दिए गए हैं। यह सच है कि मसीह सब मनुष्यों से अक्षरशः बात नहीं करता; परन्तु क्योंकि जो-जो न्याय वह उन पर करता है उन सबकी घोषणा वह अपने वचन में करता है, इसलिये यह ठीक ही कहा जा सकता है कि वह अधर्मी को अपने मुँह की फूँक से मार डालता है (2 थिस्सलुनीकियों 2:8)। भजनकार एक सुन्दर उपमा के द्वारा उनके मूर्खतापूर्ण घमण्ड को लज्जित करता है; और हमें सिखाता है कि यद्यपि उनका हठ पत्थरों से भी कठोर है, तौभी वे मिट्टी के बर्तनों से भी अधिक भंगुर हैं। फिर भी, क्योंकि हम छुड़ानेवाले के शत्रुओं को तुरन्त चकनाचूर होते नहीं देखते, वरन् इसके विपरीत कलीसिया स्वयं ही उनके लोहे के हथौड़े के नीचे मिट्टी के निर्बल बर्तन के समान प्रतीत होती है, इसलिये भक्तों को यह चेतावनी देने की आवश्यकता है कि जो न्याय मसीह प्रतिदिन करता है, उन्हें वे उस भयानक विनाश के पूर्व-लक्षण समझें जो सब दुष्टों के लिये रखा हुआ है, और धीरज से उस अन्तिम दिन की बाट जोहें, जब वह उस धधकती आग के द्वारा, जिसमें वह आएगा, उन्हें पूरी तरह भस्म कर देगा। इस बीच, आइए हम इसी में सन्तुष्ट रहें कि वह "अपने शत्रुओं के बीच में शासन करता है।"

भजन 2:10-11

10. और अब, हे राजाओ, बुद्धिमान बनो; हे पृथ्वी के न्यायियो, शिक्षा ग्रहण करो। 11. डरते हुए यहोवा की सेवा करो, और काँपते हुए आनन्द करो।

दाऊद परमेश्वर के न्यायों के प्रचारक के रूप में उस पलटे का वर्णन कर चुका है जो परमेश्वर अपने शत्रुओं से लेगा; अब वह भविष्यद्वक्ता और शिक्षक के रूप में अविश्वासियों को पश्चाताप के लिये उपदेश देता है, ताकि ऐसा न हो कि बहुत देर हो जाने पर उन्हें भयंकर अनुभव से यह मानने को विवश होना पड़े कि परमेश्वर की धमकियाँ न तो व्यर्थ हैं और न निष्फल। और वह नाम लेकर राजाओं और शासकों को सम्बोधित करता है, जो सहज ही विनम्र मनोदशा में नहीं लाए जाते, और जिन्हें इसके अतिरिक्त उनकी अपनी बुद्धि का वह मूर्खतापूर्ण अभिमान, जिससे वे फूले रहते हैं, उचित बात सीखने से रोकता है। और यदि दाऊद स्वयं राजाओं को भी नहीं छोड़ता, जो व्यवस्थाओं से अनियन्त्रित और साधारण नियमों से मुक्त प्रतीत होते हैं, तो उसका उपदेश सामान्य श्रेणी के मनुष्यों पर तो और भी अधिक लागू होता है, ताकि छोटे से बड़े तक सब परमेश्वर के सामने अपने आप को दीन करें। अब क्रियाविशेषण के द्वारा वह उनके शीघ्र पश्चाताप की आवश्यकता को प्रकट करता है, क्योंकि उन्हें सदा ऐसा अवसर प्राप्त न होगा। साथ ही वह उन्हें मौन रूप से यह समझाता है कि उसने उन्हें उन्हीं के हित के लिये चेतावनी दी, क्योंकि यदि वे शीघ्रता करें तो पश्चाताप के लिये अभी भी अवसर था। जब वह उन्हें बुद्धिमान बनने की आज्ञा देता है, तो वह अप्रत्यक्ष रूप से अपनी ही बुद्धि पर उनके झूठे भरोसे की निन्दा करता है, मानो वह कहता हो: सच्ची बुद्धि का आरम्भ तब होता है जब मनुष्य अपना घमण्ड त्याग देता है और अपने आप को मसीह के अधिकार के अधीन कर देता है। इसलिये संसार के राजा-महाराजा अपनी चतुराई के विषय में चाहे कितनी ही ऊँची राय रखें, हम निश्चित रह सकते हैं कि जब तक वे मसीह के चरणों में दीन शिष्य नहीं बन जाते, तब तक वे निरे मूर्ख ही हैं। इसके अतिरिक्त, वह उन्हें डरते हुए प्रभु की सेवा करने की आज्ञा देकर यह बताता है कि उन्हें किस रीति से बुद्धिमान बनना था। अपने ऊँचे पद पर भरोसा करके वे अपने आप को यह सोचकर बहलाते हैं कि वे उन व्यवस्थाओं से मुक्त हैं जो शेष मानवजाति को बाँधती हैं; और इसका घमण्ड उन्हें इतना अन्धा कर देता है कि वे परमेश्वर के अधीन होना भी अपनी शान के विरुद्ध समझते हैं। इसलिये भजनकार उनसे कहता है कि जब तक वे उसका भय मानना नहीं सीखते, तब तक वे सारी सही समझ से रहित हैं। और निश्चय ही, क्योंकि वे निश्चिन्तता के कारण इतने कठोर हो गए हैं कि परमेश्वर की आज्ञाकारिता से अपने आप को हटा लेते हैं, इसलिये आरम्भ में ही कड़े उपाय काम में लाने आवश्यक हैं, ताकि वे उसका भय मानने के लिये लाए जाएँ और इस प्रकार उनके विद्रोह से उन्हें फेरा जाए। कहीं वे यह न समझ बैठें कि जिस सेवा के लिये वह उन्हें बुलाता है वह भारी है, इसलिये वह आनन्द करो शब्द के द्वारा उन्हें सिखाता है कि वह कितनी सुखद और वांछनीय है, क्योंकि वह सच्चे आनन्द का कारण प्रदान करती है। परन्तु कहीं ऐसा न हो कि वे अपनी सामान्य रीति के अनुसार उच्छृंखल हो जाएँ, और व्यर्थ सुखों के नशे में चूर होकर परमेश्वर के शत्रु रहते हुए भी अपने आप को सुखी समझने लगें, इसलिये वह भय के साथ शब्दों के द्वारा उन्हें आगे दीन और कर्तव्यनिष्ठ अधीनता के लिये उपदेश देता है। शान्त विवेक की उस सुखद और प्रफुल्ल दशा में, जिसका आनन्द विश्वासी उस परमेश्वर का अनुग्रह पाकर उठाते हैं जिसका वे भय मानते हैं, और उस निरंकुश ढिठाई में, जिसकी ओर दुष्ट लोग परमेश्वर की अवहेलना और विस्मृति के कारण बहा ले जाए जाते हैं, बहुत बड़ा अन्तर है। इसलिये भविष्यद्वक्ता के शब्दों का आशय यह है कि जब तक घमण्डी लोग शरीर की अभिलाषाओं की तृप्ति में लम्पटता से आनन्द मनाते हैं, तब तक वे अपने ही विनाश से खिलवाड़ करते हैं; जबकि इसके विपरीत, एकमात्र सच्चा और कल्याणकारी आनन्द वही है जो परमेश्वर के भय और श्रद्धा में विश्राम करने से उत्पन्न होता है।

भजन 2:12

12. पुत्र को चूमो, ऐसा न हो कि वह क्रोध करे, और तुम मार्ग ही में नाश हो जाओ, जब क्षण भर में उसका क्रोध भड़क उठे। अहा, धन्य हैं वे सब जो उस पर भरोसा रखते हैं।

दाऊद और भी स्पष्ट रूप से प्रकट करता है कि परमेश्वर किस प्रकार का भय और किस प्रकार की सेवा चाहता है। क्योंकि परमेश्वर की इच्छा यह है कि वह अपने पुत्र के हाथ से राज्य करे, और क्योंकि उसने उसके व्यक्तित्व पर अपनी महिमा के चिह्न और प्रतीक अंकित किए हैं, इसलिये उसके प्रति हमारी आज्ञाकारिता और भक्ति का उचित प्रमाण यह है कि हम उसके पुत्र को, जिसे उसने हम पर राजा ठहराया है, श्रद्धापूर्वक गले लगाएँ, उस वचन के अनुसार कि "जो पुत्र का आदर नहीं करता, वह पिता का जिसने उसे भेजा है, आदर नहीं करता" (यूहन्ना 5:23)। [Ou, car son; अथवा, क्योंकि उसका। — फ्रांसीसी हाशिया।]

चूमो शब्द उस आदर के गम्भीर चिह्न या प्रतीक की ओर संकेत करता है जो प्रजा अपने राजाओं को अर्पित किया करती थी। सारांश यह है कि यदि मसीह में परमेश्वर की सेवा न की जाए, तो परमेश्वर अपने आदर से वंचित किया जाता है। इब्रानी शब्द בר Bar का अर्थ पुत्र भी है और चुना हुआ व्यक्ति भी; परन्तु आप इसे चाहे जिस अर्थ में लें, आशय एक ही रहेगा। मसीह वास्तव में पिता के द्वारा चुना गया, जिसने उसे सारा अधिकार दिया है, कि वह अकेला ही मनुष्यों और स्वर्गदूतों दोनों से ऊपर सर्वश्रेष्ठ ठहरे। इसी कारण यह भी कहा गया है कि परमेश्वर ने उस पर "छाप लगाई है" (यूहन्ना 6:27), क्योंकि उसे एक विशेष प्रतिष्ठा प्रदान की गई, जो उसे सब सृजी हुई वस्तुओं से बहुत ऊपर कर देती है। कुछ व्याख्याकार इसका अर्थ यह करते हैं, "जो शुद्ध है उसे चूमो या गले लगाओ," जो एक विचित्र और कुछ खींचतान-भरी व्याख्या है। जहाँ तक मेरी बात है, मैं प्रसन्नता से पुत्र नाम को ही बनाए रखता हूँ, जो पहले के उस वाक्य से भली-भाँति मेल खाता है जहाँ कहा गया था, "तू मेरा पुत्र है, आज मैं ही ने तुझे जन्माया है।"

इसके तुरन्त बाद जो आता है वह मसीह का तिरस्कार करनेवालों के लिये चेतावनी है कि उनका घमण्ड बिना दण्ड के न छूटेगा, मानो वह कहता हो: जैसे मसीह का तिरस्कार पिता का अनादर किए बिना नहीं होता, जिसने उसे अपनी ही महिमा से विभूषित किया है, वैसे ही पिता स्वयं अपने पवित्र अधिकारों पर ऐसे आक्रमण को बिना दण्ड दिए न जाने देगा। और उन्हें यह सिखाने के लिये कि वे लम्बे विलम्ब की आशा से अपने आप को व्यर्थ धोखा देने से, और अपनी वर्तमान सुख-सुविधा के कारण व्यर्थ सुखों में लिप्त होने से सावधान रहें, उन्हें स्पष्ट बताया गया है कि उसका क्रोध क्षण भर में भड़क उठेगा। क्योंकि हम देखते हैं कि जब परमेश्वर कुछ समय तक दुष्टों की ओर से आँख मूँद लेता है और उन्हें सहता है, तब वे और भी ढीठ होकर उसकी इस सहनशीलता का दुरुपयोग करते हैं, क्योंकि वे उसके न्यायों के विषय में दृष्टि और अनुभूति के अतिरिक्त और किसी रीति से विचार ही नहीं करते।

शब्द בר Bar, जिसका अर्थ यहाँ पुत्र है, कभी-कभी शुद्ध के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है, जैसे अय्यूब 11:4, भजन 24:4 और 73:1 में। पहले अर्थ में यह कसदी (अरामी) शब्द है, और दूसरे अर्थ में इब्रानी। यह अनुवाद, जिसे कैल्विन अस्वीकार करता है, सार रूप में सेप्टुआजिन्ट का है, जो δραξασθε παιδειας पढ़ता है, जिसका शाब्दिक अर्थ है, शिक्षा को पकड़े रहो। परन्तु क्योंकि भजनों का अरबी अनुवाद, जो सामान्यतः सेप्टुआजिन्ट का अनुसरण करता है, यहाँ (और अन्य अनेक स्थानों में भी, जहाँ सेप्टुआजिन्ट में παιδειας है) एक ऐसे शब्द का प्रयोग करता है जिसका अर्थ केवल शिक्षा ही नहीं, वरन् सदाचार और सद्गुण भी है, इसलिये स्ट्रीट का विचार है कि सेप्टुआजिन्ट के अनुवादकों ने παιδειας से सामान्यतः सदाचार या सद्गुण का अर्थ लिया, और उन्होंने בר Bar को उसी बात के लिये एक सामान्य अभिव्यक्ति समझा। कसदी, वल्गेट और इथियोपियाई अनुवाद भी בר Bar का अनुवाद ऐसे शब्द से करते हैं जिसका अर्थ सिद्धान्त या अनुशासन है। डॉ. एडम क्लार्क कहते हैं, "यह एक उल्लेखनीय बात है, और विशेषकर यह कि इस कविता जैसी शुद्ध इब्रानी रचना में בן Ben के स्थान पर एक कसदी शब्द בר Bar पाया जाए, जो न तो अभिव्यक्ति के बल में कुछ जोड़ता है और न कविता की सुन्दरता में। मैं जानता हूँ कि בר Bar कसदी के साथ-साथ शुद्ध इब्रानी शब्द भी है; परन्तु इब्रानी भाषा में यह शुद्ध करने के अर्थ में लिया जाता है; सम्भवतः अनुवादों ने यहाँ इसे इसी प्रकार समझा: जो शुद्ध है उसे, अर्थात् परमेश्वर के सिद्धान्त को, गले लगाओ।"

मैं जानता हूँ कि कुछ व्याख्याकार इब्रानी शब्द כמעט Camoat की, जिसका अनुवाद हमने क्षण भर में किया है, एक भिन्न रीति से व्याख्या करते हैं, अर्थात् यह कि परमेश्वर का क्रोध थोड़ा-सा भी भड़कते ही तिरस्कृत लोगों का अन्त हो जाएगा। परन्तु इसे समय पर लागू करना, और इसे घमण्डियों के लिये इस चेतावनी के रूप में देखना अधिक उपयुक्त है कि वे अपनी मूढ़ता और उदासीनता में कठोर न बनें, और न परमेश्वर के धीरज के कारण दण्ड से बच निकलने की आशा से अपने आप को बहलाएँ। इसके अतिरिक्त, यद्यपि यह शब्द पहले कही गई बात का कारण बताने के लिये रखा गया प्रतीत होता है, अर्थात् यह कि जो पुत्र को चूमने से इन्कार करते हैं वे क्यों नाश होंगे, और यद्यपि इब्रानी शब्द כי ki का अर्थ प्रायः जब की अपेक्षा क्योंकि अधिक होता है, तौभी मैं सामान्यतः स्वीकृत अनुवाद से हटना नहीं चाहता, और मैंने मूल शब्द का अनुवाद जब क्रियाविशेषण से करना उचित समझा है, जो कही गई बात के कारण और समय दोनों को सूचित करता है। कुछ लोग मार्ग से नाश हो जाना वाक्यांशों की व्याख्या टेढ़े मार्ग, या जीवन की दुष्ट रीति के अर्थ में करते हैं। अन्य लोग इसका अर्थ यों करते हैं, ऐसा न हो कि तुम्हारा मार्ग नाश हो जाए, पहले भजन के उस कथन के अनुसार, दुष्टों का मार्ग नाश हो जाएगा। परन्तु मैं इन शब्दों को एक भिन्न अर्थ देने की ओर अधिक झुकता हूँ, और इन्हें दुष्टों के विरुद्ध एक ऐसी घोषणा मानता हूँ जिसके द्वारा उन्हें चेतावनी दी जाती है कि परमेश्वर का क्रोध उन्हें तब काट डालेगा जब वे अपने आप को अपनी दौड़ के बीच ही में समझते होंगे। हम जानते हैं कि परमेश्वर का तिरस्कार करनेवाले समृद्धि में किस प्रकार अपने आप को बहलाते हैं, और रंगरलियों में कितनी अति कर जाते हैं। इसलिये भविष्यद्वक्ता बड़ी उपयुक्तता से यह धमकी देता है कि जब वे कहेंगे, "कुशल है, और कुछ भय नहीं," और अपने आप को अपने अन्त से बहुत दूर समझेंगे, तब उन पर अचानक विनाश आ पड़ेगा और वे काट डाले जाएँगे (1 थिस्सलुनीकियों 5:3)।

भजन का समापन-वाक्य मसीह की कठोरता के विषय में पहले कही गई बात को संतुलित करता है; क्योंकि यदि यह सान्त्वना न जोड़ी जाती, तो उसका लोहे का डण्डा और परमेश्वर का धधकता क्रोध बिना भेदभाव के सब मनुष्यों को भयभीत कर देता। इसलिये अविश्वासियों के सिर पर मँडराते भयानक न्याय की चर्चा कर चुकने के बाद, अब वह परमेश्वर के अनुग्रह की मधुरता को प्रस्तुत करके उसके विश्वासयोग्य और भक्त सेवकों को शुभ आशा रखने के लिये प्रोत्साहित करता है। पौलुस भी इसी क्रम का पालन करता है (2 कुरिन्थियों 10:6); क्योंकि यह घोषणा करने के बाद कि आज्ञा न माननेवालों के विरुद्ध पलटा लेने को तैयारी है, वह विश्वासियों को सम्बोधित करते हुए तुरन्त जोड़ता है, "जब तुम्हारा आज्ञा मानना पूरा हो जाए।" अब हम भजनकार का आशय समझते हैं। क्योंकि विश्वासी उस कठोरता को, जिसका वह उल्लेख करता है, अपने ऊपर लागू कर सकते थे, इसलिये वह उनके लिये आशा का एक शरणस्थान खोल देता है, जहाँ वे भागकर जा सकें, ताकि परमेश्वर के क्रोध के आतंक से वे दब न जाएँ; ठीक वैसे ही जैसे योएल (योएल 2:32) भी दुष्टों को परमेश्वर के उस भयानक न्यायासन के सामने बुलाने के बाद, जो अपने आप में मनुष्यों के लिये भयावह है, तुरन्त यह सान्त्वना जोड़ता है, जो कोई प्रभु का नाम लेगा, वह उद्धार पाएगा। क्योंकि मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि यह उद्गार, धन्य हैं वे सब जो उस पर भरोसा रखते हैं, अपने आप में एक अलग वाक्य के रूप में पढ़ा जाना चाहिए। सर्वनाम उस को परमेश्वर पर भी लागू किया जा सकता है और मसीह पर भी; परन्तु मेरी समझ में इसे मसीह के विषय में समझना पूरे भजन के अभिप्राय से अधिक मेल खाता है, जिसे चूमने की आज्ञा भजनकार ने पहले पृथ्वी के राजाओं और न्यायियों को दी थी।

31 Pour rendre raison du precedent ascavoir pour quoy c'est qu'ila periront. — फ्रांसीसी. पहले कही गई बात का कारण बताने के लिये, अर्थात् यह कि वे क्यों नाश होंगे।
32 Pour n'estre point accablez de la frayeur d'ire de Dieu. — फ्रांसीसी. ताकि वे परमेश्वर के क्रोध के आतंक से दब न जाएँ।

Qui de soy est espouvantable aux hommes — फ्रांसीसी. जो अपने आप में मनुष्यों के लिये भयावह है।

शब्द אשרי ashre, जो भजन के आरम्भ में आता है, यहाँ भी प्रयुक्त हुआ है; और इसलिये इस शब्द का अनुवाद यों किया जा सकता है, अहा, उन सब की धन्यताएँ जो उस पर भरोसा रखते हैं।

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