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भजन 4
भजन 4.
भजन के आरम्भ में परमेश्वर से अपनी सहायता के लिए प्रार्थना करने के बाद दाऊद तुरन्त अपनी बात अपने शत्रुओं की ओर मोड़ता है, और परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर भरोसा रखते हुए एक विजेता के समान उन पर जयजयकार करता है। इसलिए वह अपने उदाहरण से हमें यह सिखाता है कि जब कभी हम विपत्ति के बोझ से दबे हों, या अत्यन्त बड़े संकट में फँसे हों, तब हमें परमेश्वर की उन प्रतिज्ञाओं पर मनन करना चाहिए जिनमें उद्धार की आशा हमारे सामने रखी गई है, ताकि इस ढाल से अपनी रक्षा करते हुए हम उन सब परीक्षाओं को चीरकर पार निकल सकें जो हम पर आक्रमण करती हैं।
प्रधान बजानेवाले के लिये: नगीनोत पर। दाऊद का भजन। यह निश्चित नहीं है कि यह भजन किस समय रचा गया। परन्तु इसके भाव से यह अनुमान लगाया जाता है, और वह भी सम्भावना के साथ, कि उस समय दाऊद भगोड़ा और निर्वासित था। इसलिए मैं इसे उस समय से जोड़ता हूँ जब शाऊल उसे सता रहा था। तौभी यदि कोई इसे उस समय से सम्बन्धित समझना अधिक उचित माने जब अबशालोम के षड्यन्त्र के कारण उसे भागकर अपने प्राण बचाने पड़े, तो मैं इस विषय पर अधिक विवाद नहीं करूँगा। परन्तु क्योंकि थोड़ा आगे चलकर वह एक ऐसी अभिव्यक्ति का प्रयोग करता है, अर्थात् "कब तक?" (पद 3), जिससे यह प्रकट होता है कि उसे लम्बे समय तक संघर्ष करना पड़ा, इसलिए जो मत मैंने पहले रखा है वही अधिक सम्भव है। क्योंकि हम जानते हैं कि जिस समय से शाऊल उसका शत्रु बना, उस समय से लेकर पूर्ण छुटकारा पाने तक वह कैसी-कैसी विविध परीक्षाओं से सताया गया। इस पद में जो शब्द हैं उनके विषय में मैं केवल एक-दो संक्षिप्त टिप्पणियाँ करूँगा।
"Ascavoir, Jusques a quand, a vers. 3." — फ्रांसीसी.
कुछ लोग מנתה Lamnetsah शब्द का अनुवाद "सदा के लिए" करते हैं; और वे कहते हैं कि यह किसी प्रचलित गीत का आरम्भ था, जिसकी धुन पर यह भजन रचा गया था; परन्तु इसे मैं एक खींचतान भरा अनुवाद मानकर अस्वीकार करता हूँ। दूसरे लोग अधिक सच्चाई के साथ यह मत रखते हैं कि מנצה Menetsah का अर्थ है वह जो सब से बढ़कर हो और सब से श्रेष्ठ हो। परन्तु क्योंकि व्याख्याकार इस बात पर एकमत नहीं हैं कि यहाँ किस विशेष प्रकार की श्रेष्ठता और प्रतिष्ठा की बात कही गई है, इसलिए इतना ही पर्याप्त है कि इस शब्द से गायक-मण्डली का प्रधान स्वामी या अध्यक्ष सूचित होता है। इस शब्द का अनुवाद "विजेता" करना मुझे उचित नहीं लगता; क्योंकि यद्यपि यह वर्तमान भजन की विषय-वस्तु से मेल खाता है, तौभी यह उन दूसरे स्थानों में बिल्कुल ठीक नहीं बैठता जहाँ हम इसी इब्रानी शब्द को प्रयुक्त पाएँगे। दूसरे शब्द, नगीनोत, के विषय में मेरा विचार है कि यह נגך Nagan क्रिया से निकला है, जिसका अर्थ है प्रहार करना या बजाना; और इसलिए मुझे सन्देह नहीं कि यह कोई वाद्य-यन्त्र था। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यह भजन केवल कण्ठ से ही नहीं, वरन् वाद्य-यन्त्रों के साथ भी गाए जाने के लिए रचा गया था, जिनका संचालन और नियमन वह प्रधान बजानेवाला करता था जिसकी चर्चा हमने अभी की है।
भजन 4:1
1. हे मेरे धर्ममय परमेश्वर, जब मैं पुकारूँ तब तू मुझे उत्तर दे; संकट में तू ने मुझे विस्तार दिया है; मुझ पर दया कर, और मेरी प्रार्थना सुन ले।
इन शब्दों में दाऊद का विश्वास प्रकट होता है, जो यद्यपि घोर संकट तक पहुँचा दिया गया था, और विपत्तियों की एक लम्बी शृंखला से मानो लगभग भस्म हो चुका था, तौभी अपने शोक के नीचे डूब नहीं गया; और न उसका मन ऐसा टूट गया कि वह अपने छुड़ानेवाले परमेश्वर की शरण लेने से रुक जाए। अपनी प्रार्थना के द्वारा उसने यह गवाही दी कि जब वह सब पार्थिव सहायता से पूरी रीति से वंचित हो गया था, तब भी उसके लिए परमेश्वर में आशा शेष थी। इसके अतिरिक्त, वह उसे अपनी धार्मिकता का परमेश्वर कहता है, जो मानो उसे अपने अधिकार का पक्ष लेनेवाला कहने के समान है; और वह परमेश्वर की दुहाई देता है, क्योंकि सब मनुष्य सब कहीं उसे दोषी ठहराते थे, और उसकी निर्दोषता उसके शत्रुओं की निन्दा भरी बातों और साधारण लोगों के कुटिल निर्णयों के नीचे दबा दी गई थी। और दाऊद के साथ किए गए इस क्रूर और अन्यायपूर्ण व्यवहार पर ध्यानपूर्वक विचार करना चाहिए। क्योंकि यद्यपि झूठे दोष लगाए जाने से, और एक ही समय में अन्यायपूर्ण हिंसा और निन्दा सहने से बढ़कर हमारे लिए कुछ भी अधिक पीड़ादायक नहीं है, तौभी भलाई करने के कारण बुरा कहा जाना एक ऐसा क्लेश है जो पवित्र लोगों पर प्रतिदिन आता है। और उनके लिए उचित है कि वे इसके नीचे ऐसे साधे जाएँ कि संसार के सब प्रलोभनों से मुँह मोड़कर पूरी रीति से केवल परमेश्वर ही पर निर्भर रहें। इसलिए यहाँ धार्मिकता से एक अच्छे पक्ष का अर्थ समझना चाहिए, जिसका साक्षी दाऊद परमेश्वर को ठहराता है, जब वह अपने प्रति मनुष्यों के द्वेषपूर्ण और अन्यायपूर्ण आचरण की शिकायत करता है; और अपने उदाहरण से वह हमें सिखाता है कि यदि कभी संसार हमारी खराई को न देखे और न माने, तो इस कारण हमें निराश नहीं होना चाहिए, क्योंकि स्वर्ग में हमारा एक है जो हमारे पक्ष का न्याय करेगा। अन्यजातियों ने भी कहा है कि सद्गुण के लिए मनुष्य के अपने विवेक से बढ़कर कोई उत्तम रंगमंच नहीं है। परन्तु जब मनुष्य हम पर अन्यायपूर्वक घमण्ड करते हैं, तब यह जानना कि हम परमेश्वर और स्वर्गदूतों की दृष्टि के सामने खड़े हैं, इससे कहीं बढ़कर सान्त्वना है। हम जानते हैं कि पौलुस इसी स्रोत से उत्पन्न साहस से भरा हुआ था (1 कुरिन्थियों 4:5); क्योंकि जब कुरिन्थियों के बीच उसके विषय में बहुत सी बुरी बातें फैलाई गईं, तब वह परमेश्वर के न्याय-आसन की दुहाई देता है। यशायाह भी इसी भरोसे से दृढ़ होकर (यशायाह 50:6 और अगला पद) उन सब निन्दाओं को तुच्छ जानता है जिनसे उसके शत्रु उसे कलंकित करते थे। इसलिए यदि हमें संसार में कहीं भी न्याय न मिले, तो हमारे धीरज का एकमात्र सहारा यही है कि हम परमेश्वर की ओर देखें और उसके न्याय की निष्पक्षता से सन्तुष्ट रहें। तौभी आपत्ति के रूप में यह पूछा जा सकता है: जबकि मनुष्यों की सारी शुद्धता परमेश्वर की दृष्टि में केवल मलिनता है, तो भक्त लोग उसके सामने अपनी धार्मिकता को प्रस्तुत करने का साहस कैसे कर सकते हैं? दाऊद के विषय में इस प्रश्न का उत्तर देना सरल है। उसने अपनी धार्मिकता पर घमण्ड नहीं किया, सिवाय अपने शत्रुओं के सम्बन्ध में, जिनकी निन्दाओं से उसने अपने को निर्दोष ठहराया। उसके पास एक शुद्ध विवेक की यह गवाही थी कि उसने परमेश्वर की बुलाहट और आज्ञा के बिना कुछ भी करने का प्रयत्न नहीं किया था; और इसलिए जब वह परमेश्वर को अपने अधिकार का रक्षक और समर्थक कहता है, तो वह उतावली में नहीं बोलता। इससे हम सीखते हैं कि दाऊद ने परमेश्वर को स्तुति की यह उपाधि इसलिए दी कि उसे सारे संसार के विपरीत और भी सहजता से खड़ा कर सके। और जब वह दो बार सुने जाने की विनती करता है, तो इसमें हमारे सामने उसके शोक की प्रचण्डता और उसकी प्रार्थनाओं की आतुरता दोनों प्रकट होती हैं। पद के अन्तिम भाग में वह यह भी दिखाता है कि जिस वस्तु की उसे आवश्यकता थी उसे वह कहाँ से पाने की आशा रखता था, अर्थात् परमेश्वर की दया से। और निश्चय ही, जब कभी हम परमेश्वर से कुछ माँगते हैं, तब हमें इसी से आरम्भ करना चाहिए, और उससे विनती करनी चाहिए कि वह अपनी सेंतमेंत भलाई के अनुसार हमारे दुःखों को दूर करे।
"Et ils disent que c'estoit le commencement d'une chanson commune au chant de laquelle ce psaume a este compose." — फ्रांसीसी. "Le principal chantre, ou maitre de la musique qui avoit charge de mettre les psaumes en chants et accords." — फ्रांसीसी. प्रधान गायक, या संगीत का अगुवा, जिस पर भजनों को धुनों और स्वर-संगतियों में बाँधने का दायित्व था।
"Mon protecteur, celuy qui maintient mon droit." — फ्रांसीसी. मेरा रक्षक, वह जो मेरे अधिकार को स्थिर रखता है।
संकट में तू ने मुझे विस्तार दिया है। कुछ लोग सोचते हैं कि दाऊद यहाँ अपने आप से उस बात की प्रतिज्ञा करता है जिसका उसने अभी तक अनुभव नहीं किया था; और आशा का प्रयोग करते हुए परमेश्वर के अनुग्रह के उन प्रकटीकरणों को पहले से ही देख लेता है जिनसे उसे आगे चलकर कृपा प्राप्त होनी थी। परन्तु मेरे विचार में वह इसके बजाय उन उपकारों का उल्लेख करता है जो उसने पहले परमेश्वर से पाए थे, और उनके द्वारा आनेवाले समय के लिए अपने आप को दृढ़ करता है। इसी प्रकार विश्वासी लोग उन बातों को स्मरण करने के अभ्यस्त होते हैं जो उनके विश्वास को दृढ़ करने में सहायक होती हैं। आगे चलकर हमें इसके समान बहुत से स्थल मिलेंगे, जहाँ दाऊद आतंकों और खतरों के विरुद्ध अपने विश्वास को बल देने के लिए उन अनेक अनुभवों को एकत्र करता है जिनसे उसने सीखा था कि परमेश्वर अपने लोगों के साथ सदा उपस्थित रहता है और उनकी अभिलाषाओं को कभी निष्फल नहीं होने देगा। जिस प्रकार की अभिव्यक्ति का वह यहाँ प्रयोग करता है वह रूपकात्मक है, और इसके द्वारा वह सूचित करता है कि जब वह चारों ओर से घेरा और बन्द कर दिया गया था, तब भी उसके लिए बच निकलने का मार्ग खोल दिया गया। जिस संकट की वह बात करता है, वह मेरे विचार में बाहरी क्लेश की परिस्थितियों से कम नहीं, वरन् उतना ही उसके मन की दशा से सम्बन्ध रखता है; क्योंकि दाऊद का हृदय ऐसे लोहे के साँचे में ढला हुआ नहीं था कि विपत्ति उसे और गहरी मानसिक वेदना में न डाल सके।
भजन 4:2-3
2. हे मनुष्यों के पुत्रो, तुम कब तक मेरी महिमा को लज्जा में बदलने का यत्न करते रहोगे? तुम कब तक व्यर्थ बातों से प्रीति रखोगे, और झूठ की खोज में लगे रहोगे? सेला। 3. परन्तु यह जान रखो कि यहोवा ने अपने लिये एक दयालु जन को चुन लिया है; जब मैं यहोवा को पुकारूँगा तब वह सुन लेगा।
2. हे मनुष्यों के पुत्रो। दाऊद की प्रार्थना का सुखद परिणाम यह हुआ कि फिर से साहस पाकर वह न केवल अपने शत्रुओं के क्रोध को पीछे हटा सका, वरन् अपनी ओर से उन्हें ललकार भी सका, और निडर होकर उनकी सब युक्तियों को तुच्छ जान सका। इसलिए, कि हमारा भरोसा अटल बना रहे, जब दुष्ट हम पर आक्रमण करें तब हमें दाऊद के समान उन्हीं हथियारों से सुसज्जित हुए बिना संघर्ष में नहीं उतरना चाहिए। सारांश यह है कि जब परमेश्वर ने अपनी सामर्थ्य से दाऊद की रक्षा करने का निश्चय कर लिया था, तो संसार के सारे मनुष्यों का उसे नष्ट करने का प्रयत्न व्यर्थ था, चाहे उनके पास अन्यथा उसे हानि पहुँचाने की कितनी ही बड़ी शक्ति क्यों न हो। जिनसे वह बात करता है उन्हें आदम के पुत्र, या किन्हीं साधारण लोगों के पुत्र नहीं, वरन् मनुष्यों के पुत्र कहकर वह प्रसंगवश उनके घमण्ड को डाँटता प्रतीत होता है। मैं कुछ यहूदी व्याख्याकारों से सहमत नहीं हूँ जो सोचते हैं कि यहाँ कुलीनों या ऊँचे पद के लोगों से अभिप्राय है। यह तो इसके बजाय उस बात की व्यंग्यपूर्ण स्वीकृति है जिसका वे अपने लिए दावा करते थे; और इसके द्वारा वह उनकी ढिठाई का उपहास करता है कि वे अपने आप को कुलीन और बुद्धिमान समझते थे, जबकि केवल अन्धा क्रोध ही उन्हें दुष्ट उपक्रमों की ओर धकेल रहा था।
"Contre les effrois et dangers qui se presentoyent." — फ्रांसीसी. उन आतंकों और खतरों के विरुद्ध जो सामने आ खड़े होते थे।
"Le mot Hebrieu ne signifie pas simplement Homme, mais homme viril at robuste; en quoy il semble taxer, en passant, leur arrogance." — फ्रांसीसी. इब्रानी शब्द का अर्थ केवल मनुष्य नहीं, वरन् बलवन्त और हृष्ट-पुष्ट मनुष्य है; और इस शब्द के द्वारा वह प्रसंगवश उनके अहंकार को डाँटता प्रतीत होता है।
"कब तक" शब्दों में वह उनके कुटिल हठ को दोषी ठहराता है; क्योंकि उसका अभिप्राय यह नहीं कि वे केवल किसी आकस्मिक आवेग से उसके विरुद्ध भड़क उठे थे, वरन् यह कि उसे हानि पहुँचाने का हठीला संकल्प उनके हृदयों में गहराई से जम गया था। यदि उनकी दुष्टता ने उनकी समझ को उनसे छीन न लिया होता, तो उन अनेक उदाहरणों ने, जिनमें परमेश्वर ने अपने आप को दाऊद का रक्षक सिद्ध किया था, उन्हें उसके विरुद्ध अपने प्रयत्नों से रुक जाने के लिए विवश कर दिया होता। परन्तु क्योंकि उन्होंने उस व्यक्ति का अनादर करने की पूरी ठान ली थी जिसे परमेश्वर ने राजसिंहासन तक ऊँचा किया था, इसलिए वह उनसे पूछता है कि वे कब तक उसकी महिमा को लज्जा में बदलने के अपने प्रयत्नों में लगे रहेंगे। और यह ध्यान देने योग्य है कि यद्यपि ऊँचे और नीचे, दोनों प्रकार के लोगों के बीच उस पर हर प्रकार की निन्दा लादी गई थी, तौभी वह साहस के साथ राजपद की उस महिमा या प्रतिष्ठा को दृढ़ता से थामे रहता है जिसकी परमेश्वर ने अनुग्रहपूर्वक उससे प्रतिज्ञा की थी, या जो उसने उसे प्रदान की थी; और उसे पूरा निश्चय है कि अन्त में परमेश्वर उस पर उसके अधिकार को सिद्ध करेगा, चाहे उसके शत्रु उसके दावों का उपहास और तिरस्कार करके उसे मिटाने और धुँधला करने का कितना ही दुष्टतापूर्ण प्रयत्न क्यों न करें।
तुम कब तक व्यर्थ बातों से प्रीति रखोगे? इन शब्दों में वह कुछ तो अपने शत्रुओं को उन दुष्ट और कुटिल वासनाओं के लिए धिक्कारता है जिनसे उसने उन्हें प्रेरित होते देखा, यद्यपि वे झूठमूठ यह दिखावा करते थे कि वे भक्तिपूर्ण उत्साह से प्रेरित हैं; और कुछ वह उनकी मूर्खता का उपहास करता है कि वे परमेश्वर से लड़ते हुए भी सफलता की आशा से अपने आप को फुसलाते थे। और यह अत्यन्त तीखी फटकार है। जब अभक्त लोग अत्यन्त स्पष्ट द्वेष के साथ हर प्रकार की दुष्टता में सिर के बल दौड़ पड़ते हैं, तब भी वे छलपूर्ण चापलूसी से अपने आप को बहलाते हैं, ताकि पछतावे की भावनाएँ उन्हें विचलित न करें। इसलिए दाऊद पुकारकर कहता है कि जान-बूझकर अपनी आँखें मूँद लेने और अपने अधर्म पर छलपूर्ण रंगों का मुलम्मा चढ़ाने से उन्हें कुछ लाभ न होगा। अभक्त लोग निःसन्देह अपनी चापलूसी कर सकते हैं और अपने आप को धोखा दे सकते हैं, परन्तु जब उन्हें सचमुच परख के लिए लाया जाएगा, तब यह सदा प्रकट होगा कि उनके धोखा खाने का कारण यह है कि आरम्भ ही से उन्होंने छल का व्यवहार करने की ठान ली थी। अब, जब कभी हम देखें कि दुष्ट लोग चतुराई और धूर्तता में हम से बढ़कर हैं, तब हमें इस स्थल से अजेय दृढ़ता की ढाल ले लेनी चाहिए। क्योंकि चाहे वे किसी भी यन्त्र से हम पर आक्रमण करें, तौभी यदि हमारे पास शुद्ध विवेक की गवाही है, तो परमेश्वर हमारे पक्ष में बना रहेगा, और उसके विरुद्ध वे प्रबल न होंगे। वे बुद्धि-कौशल में बहुत बढ़े-चढ़े हो सकते हैं, और हमें हानि पहुँचाने की बड़ी सामर्थ्य रख सकते हैं, और उनकी योजनाएँ और सहायक साधन पूरी तैयारी में हो सकते हैं, और वे परखने में बड़े चतुर हो सकते हैं; तौभी वे जो कुछ भी गढ़ें, वह झूठ और व्यर्थता ही होगा।
"D'une malice si evidente qu'on la pourroit toucher au doigt." — फ्रांसीसी. ऐसे द्वेष के साथ जो इतना स्पष्ट हो कि उसे उँगली से छुआ जा सके।
3. यह जान रखो कि यहोवा ने अलग कर लिया है, इत्यादि। यह पिछले पद की पुष्टि है, क्योंकि यह दिखाता है कि दाऊद के साहस का कारण यह था कि वह परमेश्वर पर, जो उसके राज्य का संस्थापक था, निर्भर रहता था। और निश्चय ही हम तब सुरक्षित रूप से अपने शत्रुओं पर जयजयकार कर सकते हैं जब हमें यह निश्चय हो कि जिस पद को हम सँभाले हुए हैं, या जिस कार्य में हम लगे हुए हैं, उसके लिए हमें परमेश्वर की बुलाहट प्राप्त है। तदनुसार दाऊद यहाँ अपनी सामर्थ्य, या धन, या सेनाओं पर घमण्ड नहीं करता जिनके द्वारा उसने राज्य प्राप्त किया। परन्तु क्योंकि वह परमेश्वर के द्वारा चुना गया था, इसलिए वह सूचित करता है कि उसके विरुद्ध उसके शत्रुओं के अनेक प्रयत्न निष्फल होंगे, क्योंकि वे अनुभव से जान लेंगे कि परमेश्वर, जिसकी सामर्थ्य का वे सफलतापूर्वक सामना नहीं कर सकते थे, उनके विरुद्ध था। पहले तो वह कहता है कि परमेश्वर ने उसे अलग किया था, जिससे उसका अभिप्राय यह है कि वह मनुष्य की इच्छा से, या अपनी महत्त्वाकांक्षा से नहीं, वरन् परमेश्वर के ठहराव से सिंहासन तक पहुँचाया गया था। इब्रानी शब्द פלה Phalah का अर्थ है अलग करना, और यहाँ इसका सम्बन्ध आदर और प्रतिष्ठा के लिए अलग किए जाने से है; मानो वह कहता हो, तुम किसी को राजा नहीं मानते सिवाय उसके जो तुम्हारे अपने मतों से चुना गया हो, या जो तुम्हें भाता हो; परन्तु जिसे चाहे उसे चुनना परमेश्वर का विशेष अधिकार है। "दयालु" या "उदार" शब्द के द्वारा वह निःसन्देह इस तथ्य के आधार पर राजा होने के अपने अधिकार का समर्थन करता है कि यह एक ऐसा गुण था जो उसमें विद्यमान था; यह मानो ऐसा है जैसे उसने अपनी बुलाहट का चिह्न या बिल्ला प्रस्तुत किया हो। क्योंकि पुरानी कहावत में यह सच ही कहा गया है कि दया राजाओं के लिए सबसे उपयुक्त सद्गुण है। अब, परमेश्वर जिन्हें यह आदर प्रदान किए जाने के योग्य समझता है, उन्हें प्रायः अपने पद के निर्वाह के लिए आवश्यक गुणों से सम्पन्न करता है, ताकि वे मृत मूरतों के समान न हों। कुछ लोग חסיד chasid शब्द को कर्मवाच्य अर्थ में समझते हैं, अर्थात् किसी उपकारी व्यक्ति के अर्थ में नहीं, वरन् ऐसे व्यक्ति के अर्थ में जिसे परमेश्वर की कृपा से सिंहासन पर बैठाया गया हो। परन्तु क्योंकि पवित्रशास्त्र में मुझे इस शब्द के इस अर्थ का कोई उदाहरण नहीं मिलता, इसलिए मैं सामान्य व्याख्या का अनुसरण करना अधिक सुरक्षित समझता हूँ, जो यह है: परमेश्वर ने एक ऐसा राजा चुना है जो उस चरित्र के अनुरूप है जो ऐसे ऊँचे पद पर बुलाए गए सब लोगों में होना चाहिए, क्योंकि वह दयालु और उपकारी है। इससे वह यह निष्कर्ष निकालता है कि जब कभी वह परमेश्वर को पुकारेगा, तब परमेश्वर उसकी सुनेगा; क्योंकि परमेश्वर अपनी विश्वासयोग्यता मुख्यतः इसी में प्रमाणित करता है कि वह अपने हाथों के कार्य को नहीं त्यागता, वरन् जिन्हें उसने एक बार अपनी कृपा में ग्रहण कर लिया है उनकी निरन्तर रक्षा करता है। इसलिए हमें सिखाया जाता है कि हम निडर होकर अपने मार्ग पर आगे बढ़ें; क्योंकि जो कुछ भी हमने उसकी इच्छा के अनुसार हाथ में लिया है, वह कभी निष्फल न होगा। तो फिर यह सत्य हमारे मनों में स्थिर स्थान पा ले कि जो लोग सच्चाई से अपने मार्ग पर चलते रहते हैं, उनसे परमेश्वर अपनी सहायता कभी नहीं रोकेगा। इस सान्त्वना के बिना विश्वासियों का हर क्षण निराशा में डूब जाना अनिवार्य होगा।
भजन 4:4-5
4. तो काँपो, और पाप मत करो; अपने बिछौने पर अपने ही मन से बातें करो, और चुप रहो। सेला। 5. धर्म के बलिदान चढ़ाओ, और प्रभु पर भरोसा रखो।
4. तो काँपो। अब वह अपने शत्रुओं को पश्चाताप के लिए उभारता है, यदि कदाचित् उनका पागलपन पूरी रीति से असुधार्य न हो। पहले तो वह उन्हें काँपने, या व्याकुल होने की आज्ञा देता है; एक ऐसा शब्द जिससे वह उनकी जड़ता को डाँटता है कि वे परमेश्वर के किसी भय या खतरे के किसी बोध के बिना अपने दुष्ट मार्ग में सिर के बल दौड़े जा रहे थे। और निश्चय ही सब अभक्त लोगों का वह बड़ा दुस्साहस, जिससे वे परमेश्वर के विरुद्ध युद्ध छेड़ने में तनिक भी नहीं हिचकिचाते, इस बात से उत्पन्न होता है कि वे एक मोहग्रस्त निश्चिन्तता के द्वारा कठोर हो गए हैं; और अपनी लापरवाही से वे अपने आप को जड़ बना लेते हैं, और परमेश्वर तथा अपने आप दोनों को भूलकर, और जहाँ कहीं वासना उन्हें ले जाए उसके पीछे चलकर, और भी हठीले हो जाते हैं। वह उनसे कहता है कि उनके क्रोध को ठीक करने और उन्हें आगे पाप करने से रोकने का सबसे उत्तम उपाय यह होगा कि वे अपनी मूर्च्छा से जागें और डरने और काँपने लगें; मानो वह कहता हो, ज्योंही तुम अपनी तन्द्रा और संवेदनहीनता को झाड़ फेंकोगे, त्योंही तुम्हारी पाप करने की इच्छा घट जाएगी; क्योंकि अभक्त लोग जो भले और सीधे लोगों को सताते हैं और इतनी गड़बड़ी उत्पन्न करते हैं, उसका कारण यह है कि वे अपने आप से बहुत अधिक निश्चिन्त रहते हैं।
इसके बाद वह उन्हें चिताता है कि वे अपने बिछौने पर अपने ही मन से बातें करें, अर्थात् अवकाश में, और मानो किसी गहरे एकान्त स्थान में, अपने आप का लेखा लें; यह एक ऐसा अभ्यास है जो उनकी उच्छृंखल वासनाओं की छूट के विपरीत है। पद के अन्त में वह उन्हें चुप रहने की आज्ञा देता है। अब यह ध्यान देने योग्य है कि इस शान्ति का कारण वही व्याकुलता और काँपना है जिसका उसने पहले उल्लेख किया था। क्योंकि यदि कोई अपनी मोहग्रस्त लापरवाही के कारण पाप में बह गए हों, तो खरी बुद्धि की ओर उनके लौटने का पहला कदम यह है कि वे अपनी गहरी नींद से जागकर भय और कँपकँपी की दशा में आएँ। इसके बाद शान्त और सोचा-समझा चिन्तन आता है; तब वे बार-बार विचार करते हैं कि वे अपने आप को किन खतरों में डालते रहे हैं; और इस प्रकार अन्त में वे, जिनकी ढीठ आत्माएँ किसी भी बात से नहीं सकुचातीं, व्यवस्थित और शान्तिप्रिय होना सीखते हैं, या कम से कम अपनी उन्मत्त हिंसा पर लगाम लगाते हैं।
"Et estans retirez a part pour sonder leurs consciences." — फ्रांसीसी. और अपने अपने विवेक को टटोलने या जाँचने के लिए अलग एकान्त में जाकर।
अपने बिछौने पर मन से बातें करना, यह अभिव्यक्ति मनुष्यों के सामान्य व्यवहार और अनुभव से ली गई है। हम जानते हैं कि दिन के समय मनुष्यों के साथ मेल-जोल के बीच हमारे विचार बिखरे रहते हैं, और हम प्रायः बाहरी रूप से धोखा खाकर उतावली से निर्णय कर बैठते हैं; जबकि एकान्त में हम किसी भी विषय पर अधिक गहराई से ध्यान दे सकते हैं; और इसके अतिरिक्त, उस समय लज्जा की भावना मनुष्य को बिना किसी आवरण के अपने दोषों के विषय में सोचने से नहीं रोकती। इसलिए दाऊद अपने शत्रुओं को उभारता है कि वे उन लोगों से हट जाएँ जो जीवन के सार्वजनिक रंगमंच पर उनके कार्यों को देखते और परखते थे, और अकेले हो जाएँ, ताकि वे अधिक सच्चाई और ईमानदारी से अपने आप को जाँच सकें। और यह उपदेश हम सब से सम्बन्ध रखता है; क्योंकि मनुष्य किसी बात की ओर इतने झुके हुए नहीं हैं जितने खोखली प्रशंसा से एक दूसरे को धोखा देने की ओर, जब तक कि हर एक अपने भीतर प्रवेश न करे और अकेले अपने मन से बातें न करे। पौलुस, जब इफिसियों 4:26 में इस स्थल को उद्धृत करता है, या कम से कम दाऊद के भाव की ओर संकेत करता है, तब वह सेप्टुआजिन्ट का अनुसरण करता है: "क्रोध तो करो, पर पाप मत करो।" और तौभी उसने इसे बड़ी कुशलता और सुन्दरता से अपने उद्देश्य पर लागू किया है। वहाँ वह हमें सिखाता है कि मनुष्यों को अपने पड़ोसियों पर दुष्टता से अपना क्रोध उण्डेलने के बजाय अपने ही ऊपर क्रोध करने का उचित कारण है, ताकि इस उपाय से वे पाप से बचे रहें। और इसलिए वह उन्हें आज्ञा देता है कि वे इसके बजाय भीतर ही भीतर कुढ़ें और अपने आप पर क्रोध करें; और फिर दूसरों के व्यक्तियों पर उतना नहीं, जितना उनके दोषों पर क्रोध करें।
5. बलिदान चढ़ाओ। बहुत से लोगों का यह मत है कि दाऊद अपने शत्रुओं को अपने पश्चाताप का कुछ प्रमाण देने के लिए उभारता है; और मैं निश्चय ही यह स्वीकार करता हूँ कि बलिदानों की आज्ञा कुछ अंश में इस उद्देश्य से भी दी गई थी कि मनुष्य नए जीवन की चाल चलने को प्रेरित हों। परन्तु जब मैं उन मनुष्यों के चरित्र पर विचार करता हूँ जो दाऊद के विरोधी थे, तो मुझे निश्चय हो जाता है कि वह यहाँ उनके कपट की निन्दा करता है और उनके निराधार घमण्ड को चूर करता है। जब दाऊद एक भगोड़े के रूप में जंगलों में, या गुफाओं में, या पहाड़ों पर, या अपने देश से बाहर के प्रदेशों में भटकता फिरता था, तब ऐसा प्रतीत हो सकता था कि वह परमेश्वर की कलीसिया से अलग कर दिया गया है; और निश्चय ही वह सामान्यतः एक सड़े हुए अंग के समान समझा जाता था जो देह से और पवित्र लोगों की सहभागिता से काट दिया गया हो। इस बीच वाचा का सन्दूक उसके शत्रुओं के हाथ में था, मन्दिर पर उनका अधिकार था, और बलिदान चढ़ाने में वे सबसे आगे थे। इसलिए वे दाऊद के विरुद्ध उसी ढिठाई और दुस्साहस के साथ घमण्ड करते थे जिससे, हम जानते हैं, कपटी लोग सदा फूले रहे हैं। और इसमें सन्देह नहीं कि वे घमण्ड के साथ परमेश्वर के नाम का दुरुपयोग करते थे, मानो केवल वे ही उसके सच्चे उपासक हों।
परन्तु जैसे यिर्मयाह (यिर्मयाह 7:4) अभक्त लोगों को उस झूठे भरोसे के कारण डाँटता है जो वे यहोवा के मन्दिर पर रखते थे, वैसे ही दाऊद भी इस बात का खण्डन करता है कि परमेश्वर केवल बाहरी विधियों से प्रसन्न हो जाता है, क्योंकि वह शुद्ध बलिदान चाहता है। इन शब्दों में धर्म के बलिदानों और उन सब व्यर्थ और नकली रीतियों के बीच एक निहित विरोधाभास है जिनसे परमेश्वर के बनावटी उपासक अपने आप को सन्तुष्ट कर लेते हैं। इसलिए सारांश यह है: "तुम घमण्ड करते हो कि परमेश्वर तुम्हारे पक्ष में है, क्योंकि उसकी वेदी तक तुम्हारी बेरोक पहुँच है कि वहाँ बड़ी धूमधाम से अपने बलिदान चढ़ाओ; और क्योंकि मैं पवित्र देश से निर्वासित हूँ और मुझे मन्दिर में आने नहीं दिया जाता, इसलिए तुम सोचते हो कि मैं ईश्वरीय चिन्ता का पात्र नहीं हूँ। परन्तु यदि तुम उसके हाथ से कोई भलाई पाने की आशा रखते हो, तो तुम्हें परमेश्वर की उपासना बिल्कुल भिन्न रीति से करनी होगी; क्योंकि तुम्हारे वे अशुद्ध बलिदान, जिनसे तुम उसकी वेदी को अपवित्र करते हो, उसे तुम पर अनुग्रहकारी बनाना तो दूर रहा, उसके क्रोध को भड़काने के सिवाय और कुछ न करेंगे।" आइए, हम इस स्थल से सीखें कि सच्चे धर्म को बिगाड़नेवालों से संघर्ष करते समय, जिनके मुँह में परमेश्वर का नाम निरन्तर रहता हो, और जो उसकी बाहरी उपासना के पालन के कारण घमण्ड करते हों, हम निःसंकोच उनके घमण्ड को डाँट सकते हैं, क्योंकि वे उचित बलिदान नहीं चढ़ाते। परन्तु साथ ही हमें चौकस रहना चाहिए कि कहीं भक्ति का कोई खोखला दिखावा सच्ची आशा के स्थान पर हम में एक कुटिल और निराधार भरोसा न पाल ले।
"Comme s'ils eussent este gens de bien, adonnez a son service et qu'il n'y eust eu zele qu'en eux." — फ्रांसीसी. मानो वे उसके सच्चे लोग हों जो उसकी सेवा में समर्पित थे, और मानो उनके सिवाय और कहीं कोई उत्साह न था। "Entre les sacrifices de justice et toutes les ceremonies, quand elles sont destituees de la verite interieure et destournees de leur droit usage et par consequent falsifiees." — फ्रांसीसी. धर्म के बलिदानों और उन सब विधियों के बीच, जब वे हृदय की सच्चाई से रहित हों, और अपने उचित प्रयोग से भटका दी गई हों, और परिणामस्वरूप नकली हों।
भजन 4:6-7
6. बहुत से कहते हैं, कौन हमें भलाई दिखाएगा? हे यहोवा, तू अपने मुख का प्रकाश हम पर उठा। 7. जिस समय उनका अन्न और उनका दाखमधु बढ़ता है, उस समय उनको जितना आनन्द होता है, उससे अधिक आनन्द तू ने मेरे मन को दिया है।
6. बहुत से कहते हैं। कुछ लोगों का मत है कि दाऊद यहाँ अपने शत्रुओं के क्रूर द्वेष की शिकायत करता है, क्योंकि वे लालच से उसके प्राण के खोजी थे। परन्तु मुझे कोई सन्देह नहीं कि दाऊद उस एकमात्र अभिलाषा की, जिससे उसका अपना हृदय जल रहा था, उन अनेक इच्छाओं से तुलना करता है जिनसे लगभग समस्त मानवजाति विचलित रहती है। क्योंकि अभक्त मनुष्य इस सिद्धान्त को न तो मानते हैं और न उस पर चलते हैं कि केवल वे ही सच्चे और पूर्ण रूप से सुखी हो सकते हैं जो परमेश्वर की कृपा के भागी हैं, और कि उन्हें संसार में परदेशियों और यात्रियों के समान जीना चाहिए, ताकि आशा और धीरज के द्वारा ठीक समय पर एक उत्तम जीवन प्राप्त करें, इसलिए वे नाशवान वस्तुओं से सन्तुष्ट रहते हैं; और इसलिए यदि उन्हें बाहरी समृद्धि प्राप्त हो, तो परमेश्वर के विषय में उन्हें कोई बड़ी चिन्ता नहीं सताती। तदनुसार, जब वे निचले पशुओं की रीति पर विभिन्न वस्तुओं पर झपटते हैं, कोई एक वस्तु पर तो कोई दूसरी पर, यह सोचकर कि उनमें उन्हें परम सुख मिलेगा, तब दाऊद बहुत उचित कारण से अपने आप को उनसे अलग करता है, और अपने सामने एक बिल्कुल विपरीत प्रकार का लक्ष्य रखता है। मैं उस व्याख्या से झगड़ा नहीं करता जो यह मानती है कि दाऊद यहाँ अपने ही अनुयायियों की शिकायत कर रहा है, जो अपने ऊपर आई कठिनाइयों को सहने के लिए अपनी शक्ति को अपर्याप्त पाकर, और थकान और शोक से चूर होकर, कुड़कुड़ाने लगे थे, और व्याकुलता से विश्राम चाहते थे। परन्तु मेरा झुकाव इन शब्दों को और आगे तक फैलाने की ओर है, और उन्हें इस अर्थ में देखने की ओर कि दाऊद, केवल परमेश्वर की कृपा से सन्तुष्ट होकर, यह घोषणा करता है कि जिन वस्तुओं की दूसरे लोग उत्कट अभिलाषा करते हैं, उनकी वह परवाह नहीं करता और उन्हें कोई मूल्य नहीं देता। दाऊद की अभिलाषा की संसार की अभिलाषाओं से यह तुलना इस महत्त्वपूर्ण शिक्षा को भली-भाँति स्पष्ट करती है कि विश्वासी लोग वर्तमान अच्छी वस्तुओं का कम मूल्य आँककर केवल परमेश्वर में विश्राम करते हैं, और इस बात को अनुभव से जानने से बढ़कर किसी वस्तु को अधिक मूल्यवान नहीं समझते कि वे उसकी कृपा के भागी हैं। इसलिए दाऊद पहले तो यह सूचित करता है कि वे सब मूर्ख हैं जो समृद्धि का आनन्द लेना तो चाहते हैं, परन्तु परमेश्वर की कृपा खोजने से आरम्भ नहीं करते; क्योंकि ऐसा करने की उपेक्षा करने के कारण वे उन विविध झूठी धारणाओं के द्वारा इधर-उधर बहाए जाते हैं जो चारों ओर फैली हुई हैं। दूसरे, वह एक और दोष को डाँटता है, अर्थात् स्थूल और सांसारिक मनुष्यों का यह दोष कि वे अपने आप को पूरी रीति से शरीर के आराम और सुख-सुविधाओं में लगा देते हैं, और किसी ऊँची बात का विचार किए बिना केवल इन्हीं के भोग में जम जाते हैं या इन्हीं से सन्तुष्ट हो जाते हैं। इसी से यह भी होता है कि जब तक उन्हें दूसरी वस्तुएँ उनकी इच्छा के अनुसार मिलती रहती हैं, तब तक वे परमेश्वर के विषय में पूरी रीति से उदासीन रहते हैं, मानो उन्हें उसकी कोई आवश्यकता ही न हो। इसके विपरीत, दाऊद गवाही देता है कि यद्यपि वह अन्य सब अच्छी वस्तुओं से वंचित हो, तौभी परमेश्वर का पितृवत् प्रेम उन सब की हानि की भरपाई करने के लिए पर्याप्त है। इसलिए पूरे का आशय यह है: "अधिकांश मनुष्य लालच से वर्तमान सुखों और लाभों के पीछे दौड़ते हैं; परन्तु मैं दृढ़ता से कहता हूँ कि सिद्ध आनन्द केवल परमेश्वर की कृपा में ही पाया जा सकता है।"
पाठक ध्यान देंगे कि कैल्विन "कोई" शब्द का प्रयोग नहीं करता, जो एक पूरक शब्द है और हमारे अंग्रेज़ी संस्करण में पाया जाता है। निश्चय ही इस शब्द के बिना प्रश्न अधिक प्रभावशाली है। डॉ. एडम क्लार्क कहते हैं, "'कोई' शब्द मूल पाठ में नहीं है, और न उसके समान कोई और शब्द; तौभी बहुत से लोगों ने इसे उद्धृत किया है, और इस पाठ पर प्रचार किया है, और मुख्य बल इसी अवैध शब्द पर दिया है।"
दाऊद "परमेश्वर के मुख का प्रकाश" अभिव्यक्ति का प्रयोग उसके प्रसन्न और मनोहर मुख को, अर्थात् उसकी कृपा और प्रेम के प्रकटीकरणों को सूचित करने के लिए करता है; ठीक वैसे ही जैसे, दूसरी ओर, जब परमेश्वर अपने क्रोध के चिह्न दिखाता है तब उसका मुख हमें अन्धकारमय और मेघाच्छन्न दिखाई देता है। एक सुन्दर रूपक के द्वारा कहा गया है कि यह प्रकाश ऊपर उठाया जाता है, जब वह हमारे हृदयों में चमककर भरोसा और आशा उत्पन्न करता है। हमारे लिए परमेश्वर का प्रिय होना पर्याप्त न होता, यदि इस प्रेम का बोध हमारे हृदयों तक न पहुँचता; परन्तु पवित्र आत्मा के द्वारा उन पर चमककर वह हमें सच्चे और ठोस आनन्द से प्रफुल्लित करता है। यह स्थल हमें सिखाता है कि वे लोग दुःखी हैं जो पूरे संकल्प के साथ अपने आप को पूरी रीति से परमेश्वर में विश्राम नहीं देते और उसी में सन्तोष नहीं पाते, चाहे उनके पास सब पार्थिव वस्तुओं की उमड़ती हुई बहुतायत क्यों न हो; जबकि दूसरी ओर, विश्वासी लोग, यद्यपि वे अनेक क्लेशों के बीच उछाले जाते हैं, सचमुच सुखी हैं, चाहे इसके लिए और कोई आधार न हो सिवाय इसके कि परमेश्वर का पितृवत् मुख उन पर चमकता है, जो अन्धकार को प्रकाश में बदल देता है, और, यदि मैं ऐसा कहूँ, मृत्यु को भी जीवित कर देता है।
"or ceste comparaison du desir de David avec ceux des mondains amplifie bien la substance de ceste doctrine." — फ्रांसीसी. दाऊद की अभिलाषा की सांसारिक लोगों की अभिलाषाओं से यह तुलना इस शिक्षा के सार को भली-भाँति विस्तार से स्पष्ट करती है।
"Se contentent d'en jouir sans panser plus haut." — फ्रांसीसी. किसी ऊँची बात का विचार किए बिना उनके भोग से ही सन्तुष्ट रहते हैं।
"Se repose totalement en Dieu et y prendre contentement." — फ्रांसीसी. पूरी रीति से परमेश्वर में विश्राम करना और उसी में सन्तोष पाना।
7. तू ने मेरे मन को अधिक आनन्द दिया है। एक और तुलना के द्वारा वह अपने अनुराग की प्रबलता को और अच्छी रीति से व्यक्त और स्पष्ट करता है, यह दिखाते हुए कि जिस भलाई की वह लालसा करता था उसे पा लेने के बाद, वह दूसरों के धन और सुख-भोगों से तनिक भी डाह नहीं करता, वरन् अपने भाग से पूरी रीति से सन्तुष्ट है। सारांश यह है कि परमेश्वर के मेल-मिलाप किए हुए मुख को अपने ऊपर चमकते देखने में उसे उससे अधिक सन्तोष मिलता था, जितना अन्न से भरे खत्तों और दाखमधु से भरे तहखानों के स्वामी होने में मिलता। व्याख्याकार מעת me-eth शब्द के विषय में एकमत नहीं हैं, जिसका अनुवाद हमने "उस समय" किया है। कुछ लोग इसका यह अनुवाद करते हैं: "जिस समय से उनका अन्न और दाखमधु बढ़ा, तब से तू ने मेरे मन में आनन्द भर दिया है"; मानो दाऊद ने कहा हो, जब मैं अपने शत्रुओं को संसार में फलते-फूलते देखता हूँ तब मैं आनन्दित होता हूँ। परन्तु पहला अनुवाद मुझे कहीं अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है, जिसके अनुसार दाऊद यह घोषणा करता है कि वह केवल परमेश्वर की कृपा में उससे अधिक आनन्दित होता है, जितना सांसारिक मनुष्य तब आनन्दित होते हैं जब वे उन सब पार्थिव अच्छी वस्तुओं का भोग करते हैं, जिनकी अभिलाषा से वे सामान्यतः जलते रहते हैं। उसने उन्हें सांसारिक समृद्धि के पीछे पड़ने में ऐसा लीन और आसक्त दिखाया था कि उन्हें परमेश्वर की कोई बड़ी चिन्ता नहीं थी; और अब वह यह जोड़ता है कि अपने दाखमधु और अन्न की बहुतायत और बढ़ती में उनका आनन्द उतना बड़ा नहीं है जितना केवल ईश्वरीय भलाई के बोध में उसका आनन्द है। यह पद अत्यन्त लाभदायक शिक्षा से भरा है। हम देखते हैं कि सांसारिक मनुष्य परमेश्वर के अनुग्रह को तुच्छ जानकर और क्षणभंगुर सुखों में सिर से पाँव तक डूबकर, उनसे सन्तुष्ट होना तो दूर रहा, उनकी बहुतायत ही उनकी अभिलाषाओं को और भड़का देती है; और इस प्रकार उनकी परिपूर्णता के बीच भी एक गुप्त बेचैनी उनके मनों को अशान्त बनाए रखती है। इसलिए जब तक परमेश्वर की कृपा हम पर न चमके, तब तक हमें कभी अविचल शान्ति और ठोस आनन्द प्राप्त न होगा। और यद्यपि विश्वासी लोग भी अपनी सांसारिक सुविधाओं की इच्छा करते और उन्हें खोजते हैं, तौभी वे असीम और अनियन्त्रित उत्कण्ठा से उनके पीछे नहीं दौड़ते; वरन् यदि वे जानते हों कि वे ईश्वरीय चिन्ता के पात्र हैं, तो उनसे वंचित होना भी धीरज से सह सकते हैं।
भजन 4:8
यहाँ संकेत कटनी और दाख तोड़ने के समय के आनन्द की ओर है।
"Or combien que les expositeurs varient en ce mot que nous avons traduit, Au temps: pource qu'aucuns traduisent, Tu m'as donne liesse au coeur depuis le temps que, etc., comme s'il disoit, Je suis joyeux quand je voy prosperer mes ennemis en ce monde." — फ्रांसीसी.
63 "Seul ou a part." — फ्रांसीसी. अकेला या अलग।
8. मैं लेट जाऊँगा, और एक साथ शान्ति से सो जाऊँगा; क्योंकि हे प्रभु, तू ने मुझे अकेले ही निश्चिन्तता में बसाया है।
वह यह कहकर समाप्त करता है कि क्योंकि परमेश्वर की सामर्थ्य उसकी रक्षा करती है, इसलिए वह ऐसी सुरक्षा और शान्ति का आनन्द लेता है मानो पृथ्वी की सारी सेनाएँ उसकी रक्षा कर रही हों। अब हम जानते हैं कि सब भय से, और चिन्ता की यातना और व्याकुलता से मुक्त होना, अन्य सब वस्तुओं से बढ़कर वांछनीय आशीष है। इसलिए यह पद पिछले कथन की पुष्टि है, जो यह सूचित करता है कि दाऊद परमेश्वर के पितृवत् प्रेम के प्रकाश से उत्पन्न आनन्द को उचित ही अन्य सब वस्तुओं से बढ़कर मानता है; क्योंकि मन की भीतरी शान्ति निश्चय ही उन सब आशीषों से बढ़कर है जिनकी हम कोई कल्पना कर सकते हैं। बहुत से टीकाकार इस स्थल की व्याख्या यह करते हैं कि यह दाऊद की इस आशा को प्रकट करता है कि उसके शत्रु उससे मेल कर लेंगे, जिससे वह उनके साथ शान्ति से सो सके, क्योंकि परमेश्वर ने उसे यह विशेष अधिकार दिया था कि वह किसी मनुष्य के द्वारा विचलित या व्याकुल हुए बिना विश्राम कर सके। परन्तु मेरे निर्णय में इसका उचित अर्थ यह है कि वह अकेला भी उतनी ही शान्ति और सुरक्षा से रहेगा जितनी मनुष्यों की एक बड़ी सेना के बीच, क्योंकि परमेश्वर उसकी रक्षा करता है; क्योंकि "मैं एक साथ सो जाऊँगा" इन शब्दों में मैं "मानो" शब्द को समझा हुआ मानता हूँ, मानो पाठ "मानो एक साथ" हो, अर्थात्, मानो एक भीड़ के साथ। कुछ लोग לבדד lebadad, "अकेले", को परमेश्वर से जोड़ते हैं, और शब्दों का अनुवाद यों करते हैं: "हे प्रभु, केवल तू ही ने मुझे सुरक्षा में रखा है"; परन्तु इसे मैं बिल्कुल स्वीकार नहीं करता, क्योंकि "एक साथ" और "अकेले", इन दोनों शब्दों के बीच का विरोधाभास हटा देने से वाक्य की बहुत सी सुन्दरता नष्ट हो जाती है। संक्षेप में, दाऊद यह गर्व से कहता है कि केवल परमेश्वर की सुरक्षा पर्याप्त थी, और उसके अधीन वह सब मानवीय रखवाली से वंचित होने पर भी उतनी ही निश्चिन्तता से सोता है, मानो बहुत से लोग निरन्तर उस पर पहरा और चौकसी कर रहे हों, या मानो एक बड़ा दल चारों ओर से उसकी रक्षा कर रहा हो। इसलिए आइए, हम उसके उदाहरण से यह सीखें कि परमेश्वर को यह आदर दें — यह विश्वास करें कि यद्यपि मनुष्यों की ओर से हमारे लिए कोई सहायता दिखाई न दे, तौभी केवल उसके हाथ के नीचे हम शान्ति और सुरक्षा में रखे जाते हैं, मानो हम एक बड़ी सेना से घिरे हुए हों।
